राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : ...तो मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : ...तो मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं
Date : 24-Jun-2019

प्रदेश के खेल संगठनों ने एकमतेन सीएम भूपेश बघेल को छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बनने का आग्रह किया है। भूपेश बघेल ने अभी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। वर्तमान में डॉ. रमन सिंह ओलंपिक संघ के अध्यक्ष हैं और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया है। ऐसे में उन्हें हटाकर ही भूपेश बघेल को अध्यक्ष बनाया जा सकता है। सीएम  अध्यक्ष बनने के लिए सहमत हो जाते हैं, तो खेल संगठन रमन सिंह को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव ला सकते हैं। यानी ओलंपिक संघ में एक बार फिर घमासान मचना तय है। 

संघ में विवाद नया नहीं है। राज्य बनने के बाद से ही ओलंपिक संघ में विवाद चलता रहा है।  इसकी शुरूआत उस वक्त हुई, जब जोगी सरकार में मंत्री रहे विधान मिश्रा ने अपने साथी खेल मंत्री शंकर सोढ़ी के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ का गठन किया और खुद पदाधिकारी बन गए। भिलाई के खेल संगठनों में पकड़ रखने वाले बशीर अहमद खान ने दोनों मंत्रियों को चुनौती दी और फिर विवाद खत्म करने की नीयत से तत्कालीन सीएम अजीत जोगी को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया। जोगी खुशी-खुशी तैयार हो गए, लेकिन यह सब आसान नहीं रहा। जोगी को उस वक्त के अपने सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंदी विद्याचरण शुक्ल के विरोध का सामना करना पड़ा। विद्याचरण अखिल भारतीय ओलंपिक संघ के आजीवन अध्यक्ष रहे। ऐसे में जोगी को मान्यता मिलना ही कठिन था। 

शुक्ल ने जोगी के समांतर अपने करीबी पूर्व महापौर बलवीर जुनेजा को ओलंपिक संघ का अध्यक्ष  और सलाम रिजवी को सचिव बनवा दिया। चूंकि सारे खेल संघ जोगी के प्रभाव-दबाव के चलते उनके साथ थे। ऐसे में शुक्ल समर्थकों ने रातों-रात नए खेल संघों का गठन भी किया था। दिल्ली से पर्यवेक्षक भी आए और भिलाई के एक होटल में बैठक हुई, जिसमें जुनेजा को अध्यक्ष व सलाम को सचिव के रूप में मान्यता दे दी गई। ओलंपिक संघ में जोगी को हार बर्दाश्त नहीं थी और तब शुक्ल समर्थक कई पदाधिकारियों को धमकी भी मिली थी। 

सुनते हैं कि उस वक्त जोगी के खेल सलाहकार रहे पूर्व आईपीएस रामलाल वर्मा, दिल्ली से आए पर्यवेक्षक से मिलने पहुंचे, तो उन्होंने शुक्ल से मिलने की सलाह दे दी। रामलाल वर्मा जब शुक्ल से मिलने उनके निवास राधेश्याम भवन पहुंचे, तो उन्हें तीन घंटे इंतजार करना पड़ा। शुक्ल बाहर आए, तो रामलाल वर्मा ने उनसे पूरी प्रक्रिया निरस्त करने के लिए हस्तक्षेप आग्रह किया। है। इस पर शुक्ल ने कहा कि चुनाव इसी तरह होते हैं। इसके बाद रामलाल वर्मा अपना मुंह लेकर लौट आए। बाद में विवाद  दिल्ली हाईकोर्ट में भी गया। जोगी के पक्ष में फैसला भी आया, लेकिन फिर इसको सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती दी गई। यानी सीएम रहते जोगी निर्विवाद अध्यक्ष नहीं रह पाए। 

जोगी के सीएम पद से हटने के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं और शुक्ल के प्रभाव में उनके करीबी राजनांदगांव के पूर्व महापौर विजय पाण्डेय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष बन गए। बाद में शुक्ल के दामाद डॉ. अनिल वर्मा ने सीएम डॉ. रमन सिंह को अध्यक्ष बनवा दिया। रमन की ताजपोशी भी आसान नहीं रही। क्योंकि उस समय विद्याचरण शुक्ल को विश्वास में लिए बिना रमन सिंह अध्यक्ष बन गए थे। इससे उनके कुछ समर्थक नाराज थे। बाद में वे मान भी गए और सीएम पद से हटने के बाद रमन सिंह अध्यक्ष बने हुए हैं। चूंकि  ओलंपिक संघ का गणित सत्ता के साथ जुड़ा रहता है। ऐसे में रमन सिंह का अध्यक्ष बने रहना आसान नहीं है। चूंकि अखिल भारतीय ओलंपिक संघ में दखल रखने वाले विद्याचरण शुक्ल अब इस दुनिया में नहीं है और अब इस संघ में भाजपा का दबदबा है। ऐसे में रमन सिंह को उनकी मर्जी के खिलाफ हटाने से मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। 

गृहमंत्री के जिले का मोलभाव...
छत्तीसगढ़ सरकार के कई विभागों में भ्रष्टाचार पिछली सरकार का रिकॉर्ड भी तोड़ते दिख रहा है। अभी एक ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आई है जिसमें एक जिले के सीएसपी की टीम के दो सिपाही एक दारू स्मगलर से लाखों की वसूली कर रहे हैं। इस पूरी बातचीत की रिकॉर्डिंग में जिले का नाम, होटल का नाम, सिपाहियों का नाम सब कुछ है, लेकिन चूंकि अभी इस सुबूत को परखना बाकी है, इसलिए इन नामों को लिखना ठीक नहीं है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू के अपने जिले का यह हाल है, और इससे परे भी वहां चारों तरफ संगठित रूप से सट्टा चल रहा है, जिस पर कार्रवाई करने से नीचे के पुलिस अफसरों को रोक दिया गया है।

अभी इस रिकॉर्डिंग में एक महंगी गाड़ी टाटा सफारी में 40 पेटी दारू भरकर स्मगलर भिलाई के एक होटल में रूके हुए थे, और दो सिपाहियों ने वहां पहुंचकर गाड़ी पकड़ी, और काफी मोलभाव के बाद रेट पांच लाख से घटकर दो लाख तक आया, और स्मगलरों ने डेढ़ लाख रूपए दिए, और बाकी बाद में देने का वायदा करके गाड़ी छुड़ाई। इन चार घंटों तक सिपाही वहीं बैठकर पैसों का इंतजाम देखते रहे।

मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के अपने जिले में पुलिस के जितने किस्म के कारनामे सामने आ रहे हैं, वैसे तो कभी पिछली सरकार के वक्त भी देखने नहीं मिले। यह एक अलग बात है कि पिछली सरकार में एक भारी मलाईदार कुर्सी पर बरसों तक काबिज रहने वाले तबके मुख्यमंत्री के करीबी आज गृहमंत्री के ओएसडी बने हुए हैं, और उन्हें तमाम तरकीबें अच्छी तरह मालूम भी हैं। जब नेताओं की औलादें वसूली में ओवरटाईम करने लगती हैं, तो उनके अगले चुनाव का भविष्य भी तय हो जाता है। 

भाजपा में अब जुबान खुल रही...
भाजपा में संगठन मंत्रियों से अपेक्षा रहती है कि वे निष्पक्ष रहेंगे। मगर, पिछले 15 सालों में सरकार के सानिध्य में रहकर संगठन मंत्रियों का रूख भी बदलता दिखा। वे भी सत्ता के प्रभाव में सरकारी तंत्र की तरफ ज्यादा झुकते नजर आए। विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद अब कार्यकर्ता सौदान सिंह और रामप्रताप सिंह को खुले तौर पर भला-बुरा कहने में नहीं चूकते हैं। हाल यह है कि नवनिर्वाचित सांसदों में कुछ तो इन दोनों को नापसंद करते हैं। 

पार्टी हाईकमान को भी दोनों के खिलाफ नाराजगी का पूरा अंदाज है। तभी तो रामप्रताप सिंह को जगत प्रकाश नड्डा से मुलाकात के लिए 5 घंटे इंतजार करना पड़ा। जबकि उस दौरान प्रदेश के कई नेता नड्डा को बधाई देेकर निकल चुके थे। इसी तरह संसद भवन में अंदर जाने के लिए पास बनवाने के लिए भी रामप्रताप सिंह को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। ज्यादातर सांसदों ने कह दिया कि एक से अधिक की पात्रता नहीं है। और पहले से ही वे अपने लोगों के लिए पास बनवा चुके हैं। बिलासपुर संभाग के एक सांसद की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि रामप्रताप सिंह ने उन्हें संगठन में 10 साल तक पदाधिकारी नहीं बनने दिया। खैर, किसी तरह एक को उन पर तरस आ गया और फिर वे संसद भवन में दाखिल हो पाए।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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