राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सहकर्मी से समधी तक...
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सहकर्मी से समधी तक...
Date : 19-Nov-2019

सहकर्मी से समधी तक...
दो आईएफएस अफसर संजय शुक्ला और जयसिंह म्हस्के की दोस्ती अब रिश्तेदारी में बदलने जा रही है। संजय जल्द ही पीसीसीएफ बनने वाले हैं, और म्हस्के वन मुख्यालय में एपीसीसीएफ की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वैसे तो म्हस्के, संजय शुक्ला से एक साल जूनियर हैं, लेकिन दोनों लंबे समय तक पंचशील नगर में एक-दूसरे के पड़ोसी रहे हैं। दोनों ही रायपुर के ही रहने वाले हैं। संजय के पिता कान्यकुब्ज सभा के अध्यक्ष भी रहे हैं और म्हस्के के परिवार के लोग राजनीति में है। और अब संजय के पुत्र सूर्यांश का विवाह अगले महीने म्हस्के की पुत्री से होने जा रहा है। दोनों का परिवार एक-दूसरे से बरसों से परिचित रहा है।

ऐसे में दोनों परिवारों ने आपसी रजामंदी से दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने का फैसला लिया। संजय के पुत्र सूर्यांश की पढ़ाई विदेश में हुई है और उनका अपना खुद का कारोबार है। संजय और म्हस्के, छत्तीसगढ़ के पहले आईएफएस हैं, जो पद पर रहते आपस में रिश्तेदार बनने जा रहे हैं। इससे पहले अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहे शरदचंद बेहार ने अपने पुत्र का विवाह अपने जूनियर अफसर एस के मिश्रा की पुत्री के साथ किया था। मिश्रा बाद में छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव बने और रिटायरमेंट के बाद कई अहम पदों पर रहे। 

हक तो बनता है...
प्रदेश भाजपा संगठन के कर्ता-धर्ता माने जाने वाले गौरीशंकर अग्रवाल अपनी ही पार्टी के प्रमुख नेताओं की आंखों की किरकिरी बन गए हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष होने के नाते गौरीशंकर को तमाम सरकारी सुविधाएं हासिल हैं। वे पूरे लाव-लश्कर के साथ पार्टी दफ्तर आते हैं। वे वैसे तो किसी अहम पद पर नहीं है, लेकिन उनके मंच पर बैठने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। 

सुनते हैं कि प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक में दो वरिष्ठ नेताओं ने महामंत्री (संगठन) पवन साय को पर्ची भेजकर जानना चाहा कि गौरीशंकर को किस आधार पर मंच पर बिठाया गया। इससे पार्टी में हलचल मच गई। पिछले दिनों जिला अध्यक्ष की रायशुमारी के लिए वरिष्ठ नेताओं की बैठक में भी गौरीशंकर मौजूद थे, तब भी कुछ प्रमुख नेताओं ने उनकी मौजूदगी पर आपत्ति की थी। 

गौरीशंकर भले ही किसी पद पर न हो, पार्टी में साधन-संसाधन जुटाने की जिम्मेदारी उन पर रहती है। लोगों को याद है कि जब पार्टी लगातार विपक्ष में थी तब भी रायपुर में भाजपा कार्यालय गौरीशंकर अग्रवाल ने ही खड़े रहकर बनवाया था, और तब से लेकर विधानसभा अध्यक्ष रहने तक भी राजनीतिक और चुनावी खर्च की तमाम इंतजाम बैठकों में वे रखे ही जाते थे। ऐसे में मंच पर बैठने का हक तो बनता ही है, लेकिन पार्टी दिग्गज नेताओं की नाराजगी को भी अनदेखा नहीं कर पा रही है। चूंकि पार्टी विपक्ष में है, ऐसे में दिग्गजों को साथ लेना मजबूरी भी है। इन सबको देखते हुए तोड़ निकाला गया कि मंच पर कुर्सी में अब नेताओं का नाम चिपका दिया जाता है। जिनका नाम होता है, वे ही मंच पर कुर्सी में बैठ सकते हैं। इससे सभी का सम्मान रह जाता है। 

संभावनाएं अभी बाकी हैं...
आरपी मंडल के मुख्य सचिव बनने के साथ ही उनके बैचमेंट चित्तरंजन खेतान मंत्रालय से बाहर हो गए क्योंकि आमतौर पर लोग अपने बराबर के, या अपने से जूनियर अफसर के मातहत काम नहीं करते। खेतान के राजस्व मंडल जाने के अलावा इन दोनों से वरिष्ठ एक अफसर, पूर्व मुख्य सचिव अजय सिंह भी सरकार के बाहर हैं, लेकिन वे राजस्व मंडल से नया रायपुर, योजना आयोग में उपाध्यक्ष के पद पर आ गए हैं, जहां अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं। एक और सीनियर अफसर एन. बैजेंद्र कुमार केंद्र सरकार के एनएमडीसी में सीएमडी के बहुत महत्वपूर्ण और ताकतवर पद पर हैं, लेकिन उनका रिटायरमेंट भी कुछ ही महीने दूर है। ऐसे में अभी ऊपर के ये चारों नाम कुछ महीनों से लेकर डेढ़ बरस तक अलग-अलग जगह काम भी करेंगे, लेकिन लोगों की नजरें इस पर भी हैं कि क्या मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इनमें से किसी को सलाहकार भी बनाएंगे? पिछली भाजपा सरकार में शिवराज सिंह और सुनिल कुमार दो रिटायर्ड मुख्य सचिव सलाहकार बने थे, और भूपेश सरकार में कोई भी रिटायर्ड अफसर सलाहकार नहीं है। कुछ लोगों को लगता है कि भूतपूर्व अफसर भी काम के हो सकते हैं, हालांकि भूपेश बघेल ने जो चार गैरसरकारी पृष्ठभूमि वाले सलाहकार बनाए हैं, वह अपने-आपमें एक अनोखा और महत्वपूर्ण प्रयोग है। इनमें से तीन तो अखबारी दुनिया से आगे बढ़े हुए हैं, और एक राजनीतिक पृष्ठभूमि से आए हैं। अब जो अफसर मुख्य सचिव बन गए, या नहीं बन पाए, उनके सामने सलाहकार बनने की एक दूर की संभावना दिखती है।

(rajpathjanpath@gmail.com)
 

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