राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : अपार जनसमूह का राज...
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : अपार जनसमूह का राज...
Date : 19-Jan-2020

डॉक्टर की स्वीकारोक्ति

डॉक्टर की स्वीकारोक्ति - आज अपने डॉक्टर की क्लीनिक में लगी एक मज़ेदार प्रार्थना देखी, जिसमें डॉक्टर लिखते हैं कि यह विडंबना है कि उनकी जीविका दूसरों की बीमारियों पर निर्भर करती है। मैं सोच रहा हूँ कि अगर कभी कोई राजनीतिक व्यक्ति अपने घर के आगे ऐसी ईमानदार स्वीकारोक्ति लगाये तो क्या लिखेगा कि उसकी जीविका कैसे चलती है? क्या खय़ाल है आपका?-ओमप्रकाश व्यास (फेसबुक पर)

अपार जनसमूह का राज...
इन दिनों फोटो में फेरबदल करने के आसान सॉफ्टवेयर के चलते लोग फर्जी तस्वीरें बनाकर उन्हें पोस्ट करते हैं, और अपनी बदनीयत आगे बढ़ाते हैं। जो लोग ऐसा करना नहीं जानते वे किसी एक देश की तस्वीर को किसी दूसरे देश की बताते हुए गलत जानकारी के साथ उसे पोस्ट करते हैं, और झूठ फैलाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, और चैन की नींद सोते हैं। अभी भारत के एक बड़े नेता की सभा में अपार भीड़ दिखाने के लिए नेता के पीछे जो तस्वीर दिख रही थी, उसकी जांच-पड़ताल करने पर पता लगा कि वह कालीन के रेशों की तस्वीर है जो कि रेशों को सिरों की तरह बता रही है। कालीन के रेशे अपार जनसमूह की तरह दिख रहे हैं। लेकिन ऐसी गढ़ी हुई तस्वीर देखकर एकदम से यह मान लेना भी ठीक नहीं है कि यह उस नेता के किसी समर्थक या प्रशंसक की ही गढ़ी हुई है। यह तस्वीर किसी विरोधी की गढ़ी हुई भी हो सकती है जो कि उस नेता को बदनाम करने के लिए बनाई गई हो, और फिर कालीन के रेशों की जानकारी बताते हुए पोस्ट की गई हों। फोटोशॉप के इस जमाने में कुछ भी हो सकता है, अनुपम खेर के एक टीवी शो की कैचलाईन की तरह।

नाजुक भावनाएं घर रखकर आएं... 
शादियों का मौसम चल रहा है और लोगों को एक-एक दिन एक से अधिक शादी में भी जाना पड़ रहा है। लेकिन बड़ी-बड़ी दावतों वाली शादियों में भी कोई यह पूछने या बोलने वाले नहीं रहते कि खाना खाया या नहीं, खाना खाकर ही जाईएगा। लोगों को खाने की इच्छा है तो खाएं, वरना घर जाकर नमकीन-सेंवई पकाकर खाएं। जो लोग ज्यादा संवेदनशील हैं कि मेजबान के कहे बिना वे कुछ खाएंगे नहीं, वे पहले से अपना इंतजाम करके आएं क्योंकि यह कहने का रिवाज अब खत्म हो गया है। अपनी नाजुक भावनाओं को घर छोड़कर जाना चाहिए, और जैसे चौथाई सदी पहले बुजुर्ग बफे डिनर या लंच को बफेलो खाना कहते थे, उसी तरह लोगों को मेज पर रख दिए गए खाने पर गाय-भैंस की तरह टूट पडऩा होता है।

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