राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : रणनीति पर भाजपा में विरोधाभास
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : रणनीति पर भाजपा में विरोधाभास
17-May-2020

रणनीति पर भाजपा में विरोधाभास

क्या भाजपा में रमन सिंह अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं? कम से कम हाल के दिनों के घटनाक्रमों को देखकर तो यही लगता है। जिस तरह कोरोना प्रकोप के बीच वे दारूबंदी और मजदूरों की बेहाली को लेकर राज्य सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, उससे पार्टी का एक बड़ा खेमा असहमत है। यह खेमा फिलहाल सरकार के कामकाज के तौर तरीके से कुछ बिंदुओं पर असहमत होने के बावजूद किसी तरह मोर्चा खोलने के सख्त खिलाफ दिख रहा है।

रमन सिंह दो दिन पहले यह कहते सुने गए, कि कोरोना संक्रमण और प्रवासी मजदूरों की समस्याओं की वापसी को लेकर सरकार विपक्ष को विश्वास में नहीं ले रहा है। दूसरी तरफ, पार्टी के दो सीनियर विधायकों ने उसी दिन मुख्यमंत्री निवास में भूपेश बघेल के साथ बैठक कर मजदूरों की वापसी से लेकर सरकारी इंतजामों पर विस्तार से चर्चा की और अपनी तरफ से सुझाव भी दिए। ये अलग बात है कि इन विधायकों ने जानकारी शायद रमन सिंह को न दी हो।

पार्टी के एक नेता अनौपचारिक चर्चा में दारूबंदी की रमन सिंह की मांग से असहमत दिखे। वे कहते हैं कि रमन सिंह के सीएम रहते एक बड़े दारू कारोबारी की कार बिना चेकिंग के सीएम हाऊस में जाती थी। रमन सरकार में दारू कारोबारियों की धमक रही। ये बातें कम से कम राजनीतिक और कारोबार के क्षेत्र से जुड़े तकरीबन सभी लोग जानते हैं। ऐसे में जब प्रदेश कोरोना संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, रमन सिंह का दारूबंदी का विरोध फिलहाल उचित नहीं है।

छुट्टी का दिन और बड़ी-बड़ी गाडिय़ां

सरकारी दफ्तरों में कामकाज का हाल कामकाज के दिनों में तो दिखता ही है, छुट्टी के दिनों में भी दिखता है। रायपुर में जमीनों के काम से जुड़े एक दफ्तर में दूसरे भी कई प्रशासनिक काम हैं। कल वहां जब मीडिया से जुड़े कुछ लोग दूसरे जिले या प्रदेश जाने के पास बनवाने खड़े थे, मुख्यमंत्री के एक बहुत पुराने परिचित और कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी खड़े थे, तब डिप्टी कलेक्टर रैंक के इस अफसर के साथ कमरे में कई लोग बैठे हुए थे जिनके नाम और चेहरे जानना जरूरी नहीं है, बाहर उनकी 50-50 लाख से अधिक की कारें खड़ी हुई थीं जो बता रही थीं कि छुट्टी के दिन इस तरह बैठने में किसे प्राथमिकता है। मीडिया के लोग बाहर खड़े रहे, और अधिक हॉर्सपॉवर के लोग भीतर इत्मिनान से साहब के साथ बैठे थे। सत्तारूढ़ पार्टी जरूर बदली है लेकिन अफसरों के तौर-तरीके जरा भी नहीं बदले हैं। जिनके खिलाफ सत्तारूढ़ लोग भी शिकायत करते रहे, उनका भी कुछ बिगड़ता नहीं है।

लालबत्ती के दावेदार फिर उम्मीद से

छत्तीसगढ़ में लालबत्ती के दावेदार नेताओं के बीच उम्मीद की किरण जगी है। चर्चा है कि इस महीने के आखिर तक निगम-मंडल की एक छोटी सूची जारी हो सकती है। हालांकि इसकी अधिकृत पुष्टि नहीं है, लेकिन दावेदार सक्रिय हो गए हैं। उनका मानना है कि छत्तीसगढ़ में कोरोना की स्थिति नियंत्रण में है। ऐसे में 10-12 लोगों को लालबत्ती की सौगात मिल सकती है। लेकिन जिस तरह से सरकार कोरोना के कारण खर्च में कटौती कर रही है। ऐसे में नई नियुक्तियों की संभावना कम ही दिखती है। इन चर्चाओं को सच मान भी लिया जाए, तो केवल 10-12 लोगों को उपकृत करने का जोखिम सरकार उठाएगी, इसके आसार भी कम ही दिखाई देते हैं। छत्तीसगढ़ में 15 साल बाद कांग्रेस की सरकार बनी है। पार्टी का हर दूसरा-तीसरा नेता लालबत्ती का सपना संजोए हुए है। इस स्थिति में असंतोष बढ़ सकता है। सरकार से जुड़े लोगों का तो कहना है कि कोरोना युग में नियुक्ति करने से असंतोष के साथ संदेश भी अच्छा नहीं जाएगा। जबकि दावेदार नेताओं का कहना है कि हाल फिलहाल में नियुक्ति नहीं की गई तो वे ठीक से लालबत्ती का सुख भी नहीं भोग पाएंगे, क्योंकि डेढ़ साल से ज्यादा का समय तो बीत गया है और कोरोना से पूरी तरह से निजात मिलने की संभावना तो दूर-दूर तक दिख नहीं रही है। सरकार की शुरुआत का पहला एक साल और आखिरी का एक साल तो चुनाव में बीत जाता है। बचे तीन साल ही कुछ काम करने को मिलते हैं, उसमें भी कटौती हो ही रही है। दावेदारों को लगता है कि तत्काल नियुक्ति होगी तभी दो-ढाई साल काम करने का मिल पाएगा। इसलिए वे कोरोना युग में भी लालबत्ती के लिए दबाव बनाए हुए हैं, लेकिन सरकार की समस्या यह है कि एक अनार हैं और बीमार सौ हैं। एक भी बीमार छूटता है तो बवाल मचना तय है। लिहाजा सरकार भी समय काट रही है। अब देखना यह है कि लालबत्ती के किस-किस दावेदार को सेहत सुधारने का मौका मिलता है या फिर वे बीमार ही बने रहते हैं।

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