राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बेचैनी कहें तो कैसे, किससे ?
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बेचैनी कहें तो कैसे, किससे ?
28-May-2020 7:05 PM

बेचैनी कहें तो कैसे, किससे ?

वित्त विभाग के सरकारी खर्च में कटौती के आदेश से हडक़ंप मचा हुआ है। यह आदेश निगम-मंडलों में भी समान रूप से लागू होगा। कोरोना फैलाव के चलते खर्च में कटौती के आदेश के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि निगम-मंडलों में पदाधिकारियों की नियुक्ति कुछ समय के लिए टल सकती है। जबकि लालबत्ती के लिए अब तक प्रदेशभर से करीब 2 हजार से अधिक बॉयोडाटा सीएम-मंत्रियों और पार्टी संगठन तक पहुंच चुके हैं। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार को डेढ़ साल हो चुके हैं, और ऐसे में निगम-मंडलों में नियुक्ति नहीं होने से पद की चाह रखने वाले नेताओं-कार्यकर्ताओं में बेचैनी साफ देखी जा सकती है।

ऐसा नहीं है कि दाऊजी को कार्यकर्ताओं की बेचैनी का अंदाज नहीं है। यही वजह है कि लॉकडाउन के बीच रोजाना पार्टी नेताओं से अलग-अलग मिल रहे हैं। मेल-मुलाकात कराने की जिम्मेदारी गिरीश देवांगन पर है। कुछ लोग तो दाऊजी को व्यक्तिगत काम बताकर निकल जा रहे हैं। कई ऐसे भी हैं, जिन्हें उम्मीद है कि जल्द ही निगम-मंडलों में नियुक्ति होगी। ये व्यक्तिगत काम कराने के बजाय पार्टी संगठन और क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा कर निकल जा रहे हैं।

 पिछले दिनों रायपुर के चार-पांच पुराने नेताओं को बुलावा आया। इनमें से एक-दो तो रोजाना टीवी डिबेट में नजर आते हैं। अचानक बुलावे का वे कारण नहीं समझ पाए और चूंकि सभी एक साथ बैठे थे इसलिए दिल की बात दाऊजी को नहीं बता पाए।  दाऊजी मोबाइल पर गेम खेलते रहे और हालचाल पूछते रहे। इन सभी की अकेले में चर्चा करने की इच्छा थी, लेकिन वे दाऊजी के सामने व्यक्त नहीं कर पाए। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें हुई। और जब दाऊजी को लगा कि सब कुछ ठीक-ठाक है, तो सिर हिलाकर इशारा कर दिया। सभी निकल आए। अब कोई कुछ बोलेगा नहीं, तो दाऊजी को पता चलेगा भी तो कैसे? ऐसे में पद न मिले तो बुरा नहीं मानना चाहिए।

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत...

कल रायपुर कलेक्ट्रेट में मंदिरों के पुजारी पहुंचे थे कि उनके भूखों मरने की नौबत आ गई है, सरकार उनकी मदद करे। अब भला सरकारी अमले की क्या हस्ती हो सकती है कि वह ईश्वर की नुमाइंदों की मदद करे? लेकिन ईश्वर को छोडक़र पुजारी सरकार की शरण में हैं। मौका ईश्वर के बारे में भी सोचने का है, और उसके भक्तों के बारे में भी जो कि मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरूद्वारे लगातार जाते ही रहे हैं, और ईश्वर के ऐसे नुमाइंदों को जानते-पहचानते भी हैं। मंदिर-मस्जिद में भीड़ की मनाही है, लेकिन भक्तों को किसी ने रोका तो नहीं है कि आते-जाते वहां रूककर इन लोगों की कुछ मदद ही कर दें?

फिर यह भी सोचने का मौका है कि ईश्वर यह कर क्या रहा है? जिसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, जिसकी मर्जी के बिना किसी को एक सांस भी कम या ज्यादा नहीं मिलती, जो कण-कण में मौजूद है, जो सर्वव्यापी है, सर्वज्ञ है, जो मन की बातों को पढ़ लेता है, जो भविष्य तय कर लेता है, वह आज कहां हैं, और उसके भक्तों का यह हाल क्यों है? एक अकेला अनदेखा कोरोना किस तरह पूरी दुनिया पर राज कर रहा है, यह भी सोचने की बात है। आज तो तीनों लोकों में कोरोना ही विराजमान दिख रहा है, और वही दुनिया को चलाते दिख रहा है।

आस्थावानों के लिए आज पहेलियां ही पहेलियां हैं, सवाल ही सवाल हैं, दूसरी तरफ नास्तिकों के लिए कल तक विज्ञान था, और आज भी विज्ञान है। बदलते वक्त के साथ नास्तिकों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि विज्ञान हर सवाल का आखिरी जवाब है, और हर आस्थावान को बचने के लिए आखिर में विज्ञान के पास ही जाना पड़ रहा है। और तो और पिछले दो-तीन महीनों से गोमूत्र और गोबर की महिमा का गान भी गायब हो गया है, और लोग डॉक्टर-नर्स की आरती उतार रहे हैं। कोरोना चाहे जितनों को मारे, विज्ञान जितनों को बचा लेगा, वे कम से कम यह तो समझ ही जाएंगे कि ईश्वर की धारणा कुछ वैसी ही है, जैसी कि मियां गालिब ने लिखी थी- हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल के खुश रखने को गा़लिब ये खय़ाल अच्छा है...।

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