राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : जब जोगी ने एक फिल्म में काम किया..
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : जब जोगी ने एक फिल्म में काम किया..
31-May-2020 5:45 PM

जब जोगी ने एक फिल्म में काम किया..

छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ अखबारी-फोटोग्राफर गोकुल सोनी  फेसबुक पर पुरानी यादगार तस्वीरों के साथ अपने संस्मरण लिखते भी रहते हैं। अभी भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के गुजरने के बाद उन्होंने एक पुरानी याद ताजा की है, और लिखा है-

साथियों, अजीत जोगीजी को हम किस रूप में देखते हैं-एक इंजीनियर, अच्छा प्रोफेसर, वकील, पुलिस ऑफिसर, कलेक्टर, मुख्यमंत्री, सांसद, लेखक, कुशल प्रवक्ता, प्रखर वक्ता, हाजिर जवाब और जिंदादिल इंसान... क्या आप यह जानते हैं कि वे कुशल अभिनेता भी थे?

जी हां, उन्होंने अपनी तमाम व्यस्तता के बीच एक छत्तीसगढ़ी फिल्म में अभिनय भी किया था। दरअसल रायपुर में कला दर्पण संस्था के बैनर तले मधुकर कदमजी एक छत्तीसगढ़ी फिल्म बना रहे थे। फिल्म का नाम था ‘मोर सपना के राजा’ फिल्म की कहानी के अनुसार मुख्य पात्र मोहन (आकाश कदम) पढऩे शहर जाता है। परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होकर जब वह पूरे प्रदेश में अव्वल आता है तो मुख्यमंत्री उन्हें सम्मानित करते हैं। मधुकर कदमजी इस दृश्य को फिल्माने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे थे जो अजीत जोगी जैसा दिखता हो। (उस समय जोगीजी नए छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री थे) काफी खोजबीन के बाद ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिला। उन्होंने सोचा कि क्यों न जोगीजी को ही फिल्म में रोल करने कहा जाए। जोगीजी फिल्म में अभिनय करने के लिए तैयार भी हो गए लेकिन अपनी व्यस्तता के कारण समय नहीं दे पा रहे थे। काफी सोच-विचार के बाद 21 दिसम्बर 2000 गुरूवार को सुबह करीब 10.30 बजे मुख्यमंत्री निवास में ही सेट तैयार किया गया। मंच बनाया गया, कैमरे, लाइट सहित पूरी तैयारी हो गई। जोगीजी सेट पर आए। वहां उनका हल्का मेकअप किया गया। मेकअप शिक्षक आनंद वर्माजी ने किया। अपने मजाकिया स्वभाव के लिए विख्यात जोगीजी ने छत्तीसगढ़ी में कहा- करिया आदमी ला अऊ कत्तक गोरिया करबे गुरुजी? खैर उसी समय उन्हें स्क्रिप्ट दिया गया। स्क्रिप्ट देखकर उन्होंने रख दिया। सबको लगा कि स्क्रिप्ट उन्हें पसंद नहीं आई। जोगीजी ने मुधकर कदमजी को अपने पास बुलाकर फिल्म की कहानी पूछी। फिर उन्होंने कैमरा, लाइट ऑन करने कहा और खुद अपने मन से पूरा का पूरा डायलॉग बोल दिए जो स्क्रिप्ट पर लिखा था। सबको बड़ा आश्चर्य हुआ कि बिना पढ़े कैसे बोल दिए ? उनसे जब पूछा गया तो उन्होंने छत्तीसगढ़ी में ही कहा कि ये तो हमर रोज के काम आय। बने पढ़इया लइका के तारीफ करना हे न सार्वजनिक रूप से। मोरो घलो कभू अइसनेच्च तारीफ होय। फिर उन्हें बताया गया कि कैमरे का एंगल बदलकर फिर उसी डायलॉग को बोलना है। जोगीजी ने हू-ब-हू फिर दूसरे एंगल पर खड़े होकर डॉयलाग दोहरा दिया। मैं बताना चाहता हूं कि हर इंसान में ऐसी प्रतिभा नहीं होती कि वह एक ही बात को चार बार कहे तो उसके शब्द न बदलें। ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी अजीत जोगी को मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। अंत में बताना चाहूंगा कि इस फिल्म कि स्टिल फोटोग्राफी मैंने की थी।

 उम्र की परवाह नहीं

पूर्व सीएम रमन सिंह इन दिनों काफी बेचैन दिख रहे हैं। केन्द्र सरकार ने कोरोना फैलाव को रोकने के लिए नसीहत दी है कि 65 साल से अधिक आयु के लोग घर से न निकले। मगर 67 के हो चुके रमन सिंह केन्द्र सरकार की एडवाइजरी को ध्यान नहीं दे रहे हैं। वे अपने समर्थकों के साथ मजदूरों का हाल देखने राजनांदगांव जिले की सीमा तक हो आए।

यही नहीं, प्रदेश कांग्रेस के सामाजिक और शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए वीडियो कॉफ्रेंस के जरिए पत्रकारवार्ता ले रहे हैं, तो रमन सिंह पार्टी दफ्तर में तमाम सुविधाएं होने के बावजूद प्रेस कॉफ्रेंस लेने प्रदेश अध्यक्ष के साथ एकात्म परिसर पहुंच गए। चूंकि रमन सिंह भाजपा के सबसे बड़े नेता हैं, तो उनके पार्टी दफ्तर में होने पर सामाजिक दूरी का पालन हो पाना संभव नहीं है।

कार्यकर्ताओं-मीडिया की भीड़ तो जुट ही जाती है। आम तौर पर उनकी भाषा शैली संयमित रही है और पिछले 15 साल सीएम रहते लोगों ने उन्हें इसी रूप में पसंद किया  था। मगर अब वे तल्ख दिख रहे हैं। मौजूदा सीएम-सरकार के खिलाफ तो उनके तेवर काफी गरम रहते हैं। हालांकि रमन सिंह- परिवार के खिलाफ जांच को देखकर उनकी तल्खी बेवजह भी नहीं लगती है। मगर उनके जैसे अनुशासित माने जाने वाले नेता के केन्द्र की एडवाइजरी को नजरअंदाज करने की चर्चा जरूर है।

एक इस्तीफा

आयुष संचालक जीएस बदेशा ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन दे दिया है। बदेशा नियमित संचालक हैं और वे पिछले पांच साल से इस पद पर हैं। वैसे तो पिछली सरकार में उन्हें हटाने की कोशिशें भी हुई, मगर यह सफल नहीं हो पाया। उनके रिटायरमेंट में सालभर बाकी है। ऐसे में समय से पहले ही पद छोडऩे के उनके फैसले को लेकर कई तरह की चर्चा है।

सुनते हैं कि बदेशा आरएसएस के करीबी माने जाते हैं और चर्चा है कि पद से हटने के बाद उनकी केन्द्र सरकार के आयुष मंत्रालय में सलाहकार अथवा किसी अन्य पद पर नियुक्ति हो सकती है। वैसे भी केन्द्र सरकार ने सीसीआईएम बोर्ड में बदलाव कर पूर्व में निर्वाचित लोगों को हटा दिया है और उनकी जगह संघ के पसंदीदा विशेषज्ञ-चिकित्सकों का मनोनयन किया गया है। ऐसे में बदेशा को कोई महत्वपूर्ण दायित्व मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

कांग्रेस प्रभारी के दौरे की खबर से हलचल

छत्तीसगढ़ में कैबिनेट फेरबदल और निगम मंडल में नियुक्तियों की चर्चा जोर पकडऩे लगी है। चर्चा है कि कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी इसी सिलसिले में छत्तीसगढ़ के दौर पर आने वाले हैं। वे संभवत: कैबिनेट फेरबदल और निगम मंडल के संबंध में चर्चा कर सकते है.  कोरोना काल में इस तरह के बड़े फैसले होंगे, इसकी संभावना कम ही दिखाई पड़ती है, लेकिन दावेदारी की सक्रियता इन दिनों कुछ ज्यादा ही देखी जा रही है। जिसके आधार पर कहा जा रहा है कि इस मसले पर कुछ विचार हो सकता है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि मंत्रिमंडल और निगम-मंडल के दावेदारों की जिस तरह बेचैनी बढ़ती जा रही है, उसके कारण भी कई बार इस तरह की खबरें उड़ती हैं ताकि उनको शांत किया जा सके।

खैर, जो भी बात हो लेकिन मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए हाथ पैर मार रहे विधायकों को थोड़ी बहुत तो उम्मीद जगी है और उन्होंने सक्रियता तेज कर दी है। दूसरी तरफ मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा के कारण सरगुजा जिला टेंशन में है, क्योंकि इस जिले से तीन मंत्री है और फेरबदल होता है, तो यहां से किसी एक का पत्ता कट भी सकता है। नियमों की बाध्यता के कारण बिना किसी को हटाए फेरबदल संभव नहीं है। इसी तरह एक-दो मंत्रियों की गंभीर शिकायतें भी है। जिसके कारण भी फेरबदल की चर्चा को बल मिल रहा है। प्रदेश प्रभारी भी कह चुके हैं कि परफार्मेंस के आधार पर मंत्रियों को बदला जा सकता है। कैबिनेट में कुछ फेरबदल की संभावना तो एक बार बन भी सकती है, लेकिन निगम मंडल में नियुक्तियों के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। क्योंकि, जिस तरह कर्मचारियों के वेतन वृद्धि, प्रमोशन जैसे फैसले लेकर सरकार खर्च में कटौती कर रही है, तो निगम मंडल में नियुक्ति कर खर्च बढ़ाने का लॉजिक समझ में आता नहीं। कर्मचारियों के वेतन में 30 फीसदी कटौती तक का प्रस्ताव तैयार है। इस स्थिति में राजनीतिक नियुक्तियों करने से सरकार के इमेज पर भी विपरीत असर पडऩे का खतरा है। कुल मिलाकर निगम-मंडल के उम्मीदवारों को एक बार फिर झटका खाने के लिए तैयार रहना चाहिए। कैबिनेट में फेरबदल की अटकलों में सच्चाई है, तो जिनकी कुर्सी जाएगी, उनको जोर का झटका लग सकता है। प्रदेश प्रभारी के दौरे की खबर से हलचल तो बढ़ गई है। देखना यह है कि वे कौन सा फार्मूला लेकर आते हैं और विचार-विमर्श का निष्कर्ष क्या निकलता है। 

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