राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : राघवन ने लिखी किताब, ...गैंग ऑफ फोर...
06-Sep-2020 6:22 PM 8
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : राघवन ने लिखी किताब, ...गैंग ऑफ फोर...

राघवन ने लिखी किताब, ...गैंग ऑफ फोर...

छत्तीसगढ़ के शुरुआती बरसों में जो अफसर शुरू से विवादों में रहे उनमें एक आईएएस डॉ. पी.राघवन भी थे। उन पर कई तरह के आरोप लगे, और जांच में उन्हें दोषी भी पाया गया, लेकिन फिर जाने कोई कार्रवाई हुई या नहीं हुई। उन्होंने 2004 से 2018 तक की छत्तीसगढ़ की नौकरशाही पर एक किताब लिखी है जिसमें दूसरे आईएएस अफसरों के बारे में बड़ी दिलचस्प बातें हैं।

कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने अपनी चुनाव घोषणा पत्र कमेटी बनाई थी तब रिटायर्ड पी.राघवन को उस कमेटी का सदस्य भी बनाया था। अब कांग्रेस की सरकार आ गई है, और राघवन की यह किताब भी आ गई है। इस किताब को सरसरी नजर से देखने पर ही लगता है कि साथी अफसरों के बारे में राघवन के बहुत ऊंचे विचार नहीं थे। और जिस तरह चीन के राजनीतिक इतिहास में वहां सत्तारूढ़ गैंग ऑफ फोर गिना जाता है, राघवन ने छत्तीसगढ़ की नौकरशाही के चार लोगों को गैंग ऑफ फोर लिखा है। और भी बहुत से अफसरों के बारे में इतना कुछ लिखा है कि लोगों की दिलचस्पी को इसे पढऩे में रहेगी ही। छत्तीसगढ़ के अफसरों को कम से कम कुछ घंटे टीवी पर रिया देखने, सुशांत के बारे में सुनने से बेहतर कुछ काम मिलेगा, अगर उनके पास इस किताब की कॉपी आ जाएगी।

कुंडली देखकर टिकट?

कोरोना की तेज रफ्तार के बाद भी मरवाही का चुनावी माहौल धीरे-धीरे गरमा रहा है। वैसे तो जोगी पार्टी ने अमित जोगी को प्रत्याशी बनाने की घोषणा कर दी है, लेकिन आशंका जताई जा रही है कि अमित का चुनाव लडऩा खटाई में पड़ सकता है। कलेक्टर ने उनकी जाति प्रमाण पत्र की जांच के लिए कमेटी बना दी है, जिसकी सुनवाई चल रही है। ये अलग बात है कि अमित नोटिस के बावजूद अपना पक्ष रखने के लिए कमेटी के सामने हाजिर नहीं हुए हैं। उन्होंने कमेटी के गठन की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े किए हैं।

अमित जहां फर्जी जाति प्रमाण पत्र प्रकरण में उलझे हुए हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस और भाजपा चुनाव को लेकर व्यूह रचना तैयार करने में जुटी हुई हैं। भाजपा के नेता फिलहाल ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, लेकिन कांग्रेस ने चुनाव तैयारियों के मामले में जोगी पार्टी और भाजपा को काफी पीछे छोड़ दिया है। सरकार के आधा दर्जन से अधिक मंत्री मरवाही हो आए हैं। टिकट के दावेदार अपने समर्थकों के साथ बायोडाटा लेकर राजीव भवन पहुंच रहे हैं।

मरवाही में चुनाव की कमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत के करीबी जयसिंह अग्रवाल संभाल रहे हैं। मोटे तौर पर यह माना जा रहा है कि मरवाही में महंत की पसंद पर ही मुहर लगेगी। मरवाही विधानसभा वैसे भी श्रीमती ज्योत्स्ना महंत की संसदीय सीट का हिस्सा है, और इस लोकसभा सीट से चरणदास महंत खुद भी सांसद रह चुके हैं. सुनते हैं कि कांग्रेस में टिकट के दावेदारों के न सिर्फ जनसमर्थन का आंकलन किया जा रहा है बल्कि ज्योतिषी से कुछ की कुंडलियां भी दिखवाई गई हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा रहा है कि सारे पैमाने पर खरा उतरने वाले को ही टिकट मिलेगी।

आपदा को अवसर बनाने पर लगी रोक

छत्तीसगढ़ में जिस तेजी से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का उस तेजी से विस्तार नहीं हो पा रहा है। अप्रैल माह में यहां केस बढऩे शुरू हुए और उसके बाद अब तो हर दिन हज़ारों नये मरीज जुड़ रहे हैं। सरकारी अस्पतालों के अलावा सामुदायिक भवनों, छात्रावासों में भी अस्थायी अस्पताल शुरू किये गये हैं, स्टेडियम में भी। पर, अब निजी अस्पतालों की भी जरूरत आ पड़ी है। निजी अस्पताल पहले तो कोरोना की सेवायें देने के लिये राजी नहीं हो रहे थे, पर शासन की ओर से कड़ाई बरती गई तो धीरे-धीरे उनमें भी उपचार की सुविधा शुरू हो रही है। आनाकानी करने वाले कुछ अस्पतालों को तो लाइसेंस रद्द करने की चेतावनी भी देनी पड़ी। कुछ प्राइवेट अस्पताल इस मुश्किल घड़ी को भी अवसर में बदलने से नहीं चूके। उन्होंने कोरोना मरीजों को उपचार देना पहले से ही शुरू कर दिया था। मगर ठीक होने के बाद जो बिल मरीज को मिलता था उससे हाथ-पैर फूलने लगे। कई मरीजों से पांच से सात लाख रूपये वसूल किये गये। जनप्रतिनिधियों से इसकी शिकायत हुई और मुख्यमंत्री तक भी बात पहुंची। कई गंभीर बीमारियों में इलाज की अधिकतम दर पहले से निर्धारित है। अब कोरोना के लिये भी ऐसा कर दिया गया है। निजी अस्पताल श्रेणी के अनुसार एक दिन का अधिकतम बिल 17-18 हजार रुपये का ही दे सकेंगे। बीते एक माह से कुछ निजी अस्पताल जो कोरोना के इलाज के नाम पर जबरन अनाप-शनाप बिल दे रहे थे, एक हद तक इसमें लगाम लगेगी। हालांकि आम लोगों के लिये यह खर्च भी उठाना आसान नहीं है। उन्हें 8-10 दिन भर्ती रहना पड़ सकता है। दूसरी बात, यह महामारी है, परिवार में एक को हुआ तो दूसरे, तीसरे तक भी फैल सकता है। फिर भी, अब निजी अस्पतालों का रुख करने से पहले मरीज मानसिक रूप से संभावित खर्च को लेकर सचेत तो रहेगा ही। हालांकि बहुत से डॉक्टरों की यह सलाह भी गौर करने लायक है कि यदि ऑक्सीजन लेवल ठीक है तो सबसे अच्छा होगा, होम आइसोलेशन पर रहकर कोरोना से छुटकारा पायें। कितने ही तथाकथित वीआईपी ऐसा करके ठीक हो चुके हैं।

अस्पताल-होटल भाई-भाई

लेकिन रायपुर में बड़े तो बड़े, छोटे अस्पतालों के भी मजे हो गए हैं। उन्होंने होटलों के साथ सौदा कर लिया है। तो मरीज बिना लक्षणों के हैं, उन्हें होटल में भर्ती कर लेते हैं। वहां डॉक्टर-नर्स ड्यूटी पर हैं। किसी की तबीयत बिगड़ी तो एम्बुलेंस से अस्पताल ले जाते हैं. होटल भी कुछ काम पाकर खुश हैं, लेकिन कर्मचारी भगवन भरोसे हैं, उनकी सेहत की फिक्र अस्पताल-दर्जे की तो हो नहीं रही।

मैसेंजर पर सम्हलकर ही लिखें...

सोशल मीडिया और वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर की वजह से एक बार फिर हाथ से निकल गया तो निकल गया। उसे सुधारने की कोशिश करते रहें, तो भी कोई न कोई स्क्रीनशॉट सम्हालकर रख ही लेते हैं।

अब एक जिले में कलेक्टर किसी वॉट्सऐप ग्रुप में से, और किसी वजह से ग्रुप को छोड़ भी दिया था। उसके बाद लोगों ने उन्हें फिर जोड़ा। लेकिन किसी ने एक समाचार का लिंक इस ग्रुप में डाला जिसमें लिखा था कि कोरोना काल में ठोस निर्णय लेने में नाकामयाब जिला प्रशासन। इससे नाराज होकर कलेक्टर ने फिर से ग्रुप छोड़ दिया, लेकिन छोडऩे के पहले उन्होंने जो लिखा वह तो दूसरे लोगों ने स्क्रीन-सेव करके रख भी लिया था। अब यह जुबान सोशल मीडिया में बहस का सामान बनी हुई है। सोशल मीडिया दुधारी तलवार है, उससे लोग अपना काम भी कर सकते हैं, और बिगाड़ भी कर सकते हैं।

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