राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : मुकाबला किताबों का...
19-Sep-2020 7:39 PM 5
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : मुकाबला किताबों का...

मुकाबला किताबों का...

छत्तीसगढ़ के कुछ आईएएस-आईपीएस अफसरों के बीच एक दिलचस्प बहस चल रही है जिसमें वे अपनी किताबों की आलमारियों की तस्वीरें डालकर अपना खजाना दिखा रहे हैं। अब जब एक ने आलमारियां दिखा दीं, तो देखा देखी में दूसरे अफसर ने भी किताबों को अपना खजाना पेश कर दिया। लेकिन साथ-साथ विनम्रता से यह भी लिख दिया कि वे किताबें रखने का मुकाबला तो कर सकते हैं, ज्ञान का मुकाबला नहीं कर सकते।

आज के वक्त में अफसरों के बीच ज्ञान दुर्लभ है, और उससे थोड़ा ही कम दुर्लभ है गंभीर और महत्वपूर्ण किताबें रखना। कई अफसर तो ऐसे हैं जिनसे मिलते हुए आपको दस-बीस बरस गुजर जाएं, लेकिन उनके मुंह से कभी किसी एक किताब का नाम न निकले, कभी उनकी मेज पर किताब नाम की धूल जमी हुई न दिखे। गिने-चुने ही ऐसे लोग रहते हैं जो पढऩे में भरोसा रखते हैं। पुलिस महकमे में पिछले बरसों में कम से कम दो ऐसे अफसर रहे जो कि देश भर के पुलिसवालों में सबसे अधिक पढऩे वाले थे। सुभाष अत्रे, और विश्वरंजन। दोनों ही खूब किताबें खरीदते थे, खूब पढ़ते थे, और किताबों के ज्ञान की खूब चर्चा भी करते थे। इनमें से विश्वरंजन काफी कुछ लिखते भी थे, लेकिन सुभाष अत्रे उस मेहनत से बचे रहते थे। अभी जिन दो अफसरों में ट्विटर पर किताबों का मुकाबला चल रहा है, वे अभी-अभी डीजी बने आर.के.विज, और रेवेन्यू बोर्ड के अध्यक्ष चित्तरंजन खेतान हैं। विज लगातार देश के अखबारों में लिखते भी रहते हैं, और खेतान कम से कम पढ़ते तो रहते ही हैं। सरकार में रहते हुए पढऩे वालों का नजरिया कुछ अलग रहता है, इस बात को उनसे मिलने-जुलने वाले लोग समझ सकते हैं, यह एक अलग बात है कि उससे सरकार में उनका सम्मान बढ़ता हो, या न बढ़ता हो।

सुभाष अत्रे जब तक छत्तीसगढ़ में रहे उनसे कोई पढऩे के शौकीन मिलें, तो वे तुरंत मेज के बगल से बक्सा उठाकर ताजा आई किताबें दिखाने लगते थे। उनका ज्ञान भी इनसाइक्लोपीडिया सरीखा था, और विश्वरंजन का भी। अब दोनों यहां नहीं रहे, और इसका बड़ा नुकसान उनके साथ चर्चा करने वाले लोगों का हुआ है।

पुनिया से जुड़ी खुशी

पीएल पुनिया के दोबारा प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी बनने से कई समीकरण  बदल गए हैं। पहले उनके प्रभारी पद से हटने की चर्चा थी। यह भी हल्ला था कि पुनिया की मौजूदगी में निगम-मंडलों की जो सूची तैयार की गई थी, उसमें कुछ बदलाव होगा। दरअसल, पुनिया ने कुछ नाम जुड़वाए थे, जिस पर कई प्रमुख लोग सहमत नहीं थे। अब जब दोबारा प्रभारी बन गए हैं, तो निगम-मंडलों की सूची में बदलाव होना मुश्किल है। पुनिया के प्रभारी बनने एक युवा नेता काफी खुश हैं। पहले युवा नेता को निगम-मंडलों में पद देने पर सहमति बन गई थी। मगर पुनिया के हटने की चर्चा के साथ-साथ युवा नेता का नाम भी कटने के आसार जताए  जा रहे थे। अब जब पुनिया प्रभारी बन गए हैं, तो नाम कटने का  सवाल ही पैदा नहीं होता। ऐसे में युवा नेता का खुश होना लाजमी है।

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