राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : गणेश कौन हैं?
04-Oct-2020 6:39 PM 22
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : गणेश कौन हैं?

गणेश कौन हैं?

राजनीतिक दलों में बहुत सी बातें जो निजी तौर पर कही जानी है, उन्हें सार्वजनिक दीवारों पर लिखकर कहा जाता है। इससे कभी सनसनी फैलती है, और कभी सुगबुगाहट। लोग हैरान होते रहते हैं कि यह लिखने का राज क्या है। सोशल मीडिया के आ जाने से एक सहूलियत ही हो गई है।

अब रायपुर शहर के पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष राजीव कुमार अग्रवाल ने फेसबुक पर आज लिखा- काश हम भी कर्म करने की जगह स्वाभिमान गिरवी रख गणेश परिक्रमा करना सीखे होते।

अब उनकी बात का मतलब निकालना आसान भी है और मुश्किल भी है। अभी महीने भर पहले ही शहर जिला भाजपा अध्यक्ष पद पर श्रीचंद सुंदरानी को पार्टी ने मनोनीत किया है। भाजपा के भीतर के गणित बताते हैं कि श्रीचंद से राजीव अग्रवाल की अधिक बनती नहीं है। लेकिन राजीव ने कौन से गणेश की चर्चा की है, यह अंदाज लगाना पार्टी के भीतर के कुछ लोगों के लिए आसान होगा, पार्टी के बाहर बाकी लोगों के लिए कुछ मुश्किल हो सकता है। यह एक अलग बात है कि श्रीचंद को बनवाने वालों में रमन सिंह और राजेश मूणत के नाम लिए जा रहे हैं, और ये दोनों ही राजीव अग्रवाल के भी खासे करीबी रहते आए हैं। तो यह गणेश रमन सिंह के लिए है, या मूणत के लिए है, या किसी और के लिए कोई बताएंगे?

सूर्य ऊगा, और तुरंत ही...

रायपुर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष के लिए चार बार के पार्षद सूर्यकांत राठौर का नाम पहले तय कर लिया गया था। उन्हें सूचना भी भेज दी गई थी। फेसबुक और वाट्सएप पर राठौर को बधाईयों का तांता लग गया था। फिर देर शाम तक जिला भाजपा संगठन ने कार्यकर्ताओं को सूचना दी कि अभी प्रदेश संगठन ने नियुक्ति रोक दी है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि रायपुर जिले के बड़े नेताओं की आपसी खींचतान की वजह से पिछले 9 महीने से भाजपा नगर निगम के पार्षद दल का नेता नहीं चुन पा रही है।

पिछले दिनों नगर निगम के सभापति प्रमोद दुबे ने भाजपा पार्षदों से आग्रह किया था कि सामान्य सभा होनी है, इसलिए नेता प्रतिपक्ष का नाम तय कर सूचित करें। इसके बाद से भाजपा में पार्षद दल का नेता चुनने की कवायद चल रही थी। सुनते हैं कि प्रदेश संगठन ने पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सबसे चर्चा कर नाम तय करने की जिम्मेदारी दी थी। बृजमोहन ने सूर्यकांत राठौर का नाम तय कर भेजा, तो विरोध शुरू हो गया। चर्चा है कि जिला अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी और राजेश मूणत, सूर्यकांत के पक्ष में नहीं हैं। इनकी पहली पसंद मीनल चौबे रहीं। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि  सूर्यकांत पिछली बार भी नेता प्रतिपक्ष का दायित्व संभाल चुके हैं ऐसे में किसी नए को मौका मिलना चाहिए।

कुछ नेताओं को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी में विधानसभा चुनाव का गणित भी दिख रहा है। सूर्यकांत स्वाभाविक तौर पर रायपुर उत्तर से टिकट के दावेदार रहेंगे। वे चार बार अलग-अलग वार्डों से चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में रायपुर उत्तर के बाकी दावेदार उन्हें पसंद नहीं कर पा रहे हैं। हाल यह है कि निकाय चुनाव निपटने के बाद सभी जगहों पर पार्षद दल के मुखिया तय हो चुके हैं, लेकिन अकेले रायपुर में यह काम अब तक नहीं हो पाया है।

जोगी का चुनाव कौन सम्हालेंगे?

जोगी पार्टी ने अमित जोगी को मरवाही प्रत्याशी घोषित कर दिया है। मगर उनकी राह कठिन हो चली है। पहले जाति का झंझट तो चल ही रहा है, अब उनके प्रचार की कमान कौन थामेगा, यह भी समस्या आ गई है। पहले जोगी पार्टी विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह, अमित का चुनावी रथ हांकने वाले थे। मगर अब धर्मजीत कोरोना पीडि़त हैं, और वे एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे में अब धर्मजीत सिंह ठीक होने के बाद भी प्रचार में जुट पाएंगे, इसमें संदेह है। दो और विधायक देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा को लेकर यह चर्चा है कि दोनों मरवाही जाएंगे, इसकी संभावना कम है। देवव्रत तो कांग्रेस के साथ दिखते हैं। अब अमित जोगी के पास सिर्फ मां रेणु जोगी ही सहारा है।

डाकघरों से कोरोना की डिलिवरी

कोरोना से बचने के लिये कॉलेजों की परीक्षा इस बार नहीं ली गई और घरों से ही प्रश्नों को हल कर उत्तरपुस्तिकायें जमा करने के लिये छात्र-छात्राओं से जमा करने के लिये कहा गया। रायपुर व बिलासपुर के विश्वविद्यालयों में उत्तर पुस्तिकाओं को डाकघरों के माध्यम से जमा करने के लिये कहा गया है। इसके चलते डाकघरों में छात्र-छात्राओं की भीड़ उमड़ रही है। विद्यार्थियों को घंटों कतार में लगना पड़ रहा है। परीक्षायें परीक्षा केन्द्रों में नहीं लेने के पीछे जो उद्देश्य था वह तो पूरा ही नहीं होता दिख रहा है। दरअसल उत्तरपुस्तिकाओं को जमा करने के लिये समय भी लाखों परीक्षार्थियों को पांच दिन का ही दिया गया। जमा करने के लिये आपा-धापी मची हुई है। अब जब घर से ही सवाल हल करने हैं तो क्या पांच दिन और क्या दस दिन। समय बढ़ाया जा सकता था जिससे भीड़ की नौबत न आती। दूसरी बात डाकघरों में एक छात्र को कम से कम 10 से 15 मिनट लग रहे हैं। यही काम यदि कॉलेजों में काउन्टर खोलकर किया जाता तो शायद पांच मिनट में ही एक विद्यार्थी का काम हो जाता और लम्बी कतारें भी नहीं लग पाती। ऐसी ही भीड़ कॉलेजों में तब जमा होने लगी थी जब उत्तरपुस्तिकाओं को कॉलेज से लेने के लिये कहा गया था। हंगामा खड़ा होने पर व्यवस्था की गई कि छात्र उत्तर पुस्तिका खुद ही कहीं से भी ले सकते हैं। हो सकता है कि कोरोना से बचने के लिये जो फैसले लिये जाते हों वे फैसले लेते समय वही सबसे अच्छा तरीका लगता हो, लेकिन अमल में लाये जाने के बाद खतरा बढ़ रहा हो तो फैसले बदले भी जाने चाहिये। छात्रों की मांग है कि हमें उत्तरपुस्तिकायें जमा करने के लिये ज्यादा समय दिया जाये। कॉलेजों में भी काउन्टर खोले जायें। लेकिन अभी ऐसा नहीं किया गया है। प्रशासन ने फिलहाल कुछ डाकघरों में काउन्टर की संख्या ही बढ़ाई है।

यदि सब संदेही टेस्ट कराने लगें तो?

कोरोना की कल आई रिपोर्ट पर नजर डालें तो पूरे प्रदेश में 2610 कोरोना पॉजिटिव मिले और टेस्ट हुए 18591 हुए। यानि हर सातवां व्यक्ति कोरोना संक्रमित पाया गया। लगभग यही औसत हर दिन है। बहुत से चिकित्सकों का मानना है कि यदि सब लक्षण वाले बिना डरे टेस्ट के लिये पहुंच जायें तो कोविड टेस्ट सेंटर में बहुत लम्बी कतार लग जायेगी। सबके टेस्ट हुए तो वास्तविक मरीजों की संख्या कई गुना और बढ़ भी जायेगी। महाससमुंद में टेस्ट कराने वाले हर 12 वें व्यक्ति में कोरोना के लक्षण मिले, बिलासपुर में हर आठवें व्यक्ति को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। रायपुर, दुर्ग में इससे भी ज्यादा गंभीर स्थिति बनी हुई है। बहुत से लोग तो कोरोना टेस्ट से बचने की कोशिश में लगे रहते हैं। कई लोगों का मन बदल जाता है जब कोविड टेस्ट सेंटर्स में लगने वाली कतार और परेशानियों के बारे में सुनते हैं। यदि ऐसे सब लोगों की टेस्ट की व्यवस्था हो जाये, तो पता नहीं और कितने पॉजिटिव केस निकल जायें। इन सबको इलाज की सुविधा कैसे पहुंचायी जायेगी। होम आइसोलेशन में रहेंगे तब भी दवाओं और निगरानी के लिये कितनी बड़ी टीम की जरूरत पड़ेगी? क्या पता ऐसे लोग दफ्तरों, दुकान और बाजारों में भी घूम रहे हों। जैसे-जैसे जनजीवन सामान्य होता जाता है लोगों में सोशल डिस्टेंस, मास्क पहनने, सैनेटाइजर का इस्तेमाल करने के प्रति बेफिक्री होती जाती है। अब तो लॉकडाउन को भी लोग गंभीरता से नहीं ले रहे।

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