राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बाबूलाल तो लाल हुए थे बीजेपी शासन में
29-Nov-2020 5:09 PM 299
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बाबूलाल तो लाल हुए थे बीजेपी शासन में

बाबूलाल तो लाल हुए थे बीजेपी शासन में

ईडी छत्तीसगढ़ के कई अफसरों-कारोबारियों के खिलाफ शिकायतों की पड़ताल कर रहा है। बाबूलाल अग्रवाल तो ईडी के शिकंजे में आ चुके हैं। कुछ और जांच के घेरे में हंै। मगर स्वास्थ्य विभाग के पुराने घपलों को लेकर ईडी ने कुछ लोगों से पूछताछ शुरू की, तो जवाब सुनकर ईडी के अफसरों को ज्यादा कुछ कहते नहीं बना।

हुआ यूं कि पिछली सरकार के पहले कार्यकाल में बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते विभाग में कई घोटाले हुए थे। मलेरिया उन्मूलन के नाम पर पैसों की अफरा-तफरी हुई थी, और सीबीआई ने भी इस पर कार्रवाई की थी। कुछ और जानकारी के लिए ईडी ने धमतरी और भाटापारा के दो बड़े सप्लायरों को तलब किया। वैसे तो ईडी का नाम सुनते ही घपले-घोटालेबाजों के हाथ-पांव फूल जाते हैं। मगर इन दोनों सप्लायरों का आत्मविश्वास देखने लायक था।

ईडी ने मलेरिया घोटाले को लेकर जैसे ही पूछताछ शुरू की। सप्लायरों ने उनसे कहा कि साब, हमसे क्या पूछते हैं? अफसरों ने जो सप्लाई ऑर्डर दिया था, हमने सप्लाई कर दिया। ईडी अफसरों ने पूछा कि किस अफसर ने आप लोगों को ऑर्डर दिया था? सप्लायरों ने कहा कि  उस वक्त के मलेरिया उन्मूलन प्रभारी थे डॉ. ओम कटारिया थे, उन्होंने ही ऑर्डर दिया था।

ईडी का अगला सवाल था कि ओम कटारिया कहां हैं? सप्लायरों ने कहा कि वे कुछ साल पहले ही दिवंगत हो चुके हैं। प्रकरण को लेकर और जानकारी पटेल बाबू दे सकते हैं, लेकिन वे भी अब इस दुनिया में नहीं रहे। और ज्यादा कुछ जानकारी चाहिए, तो दो पूर्व स्वास्थ्य मंत्री ही इस पर प्रकाश डाल सकते हैं। इसके बाद ईडी अफसरों ने ज्यादा कुछ नहीं पूछा, और रवाना किया।

खर्च करने की चर्चा

खबर है कि पीएचई के जल मिशन के ठेके में अनियमितता की पड़ताल के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। वजह यह है कि राशि का आहरण नहीं हुआ है, तो घोटाला कैसे? टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता  की बात आई है। मगर अंदर की खबर यह है कि टेंडर नियमों पर कैबिनेट ने मुहर लगाई थी। विभाग के प्रस्ताव पर सीएस ने विधि विभाग से भी राय ली थी। सबकी सहमति के बाद टेंडर हुए थे, और ऐसे में नियम में गड़बड़ी के लिए किसी अकेले को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है। हां, टेंडर मिलने की प्रत्याशा में कुछ ठेकेदारों और कंपनियों के एडवांस में अफसरों पर कुछ खर्च करने की चर्चा जरूर रही है। मगर इसके कोई सबूत नहीं है। ऐसे में प्रकरण पर सिवाय हल्ला-गुल्ला के ज्यादा कुछ नहीं हो पाया।

नया रायपुर अब क्या आबाद हो पायेगा?

मंत्रिपरिषद् की बैठक में जो बड़े फैसले लिये गये उनमें एक यह भी है कि नया रायपुर में रोजगार, निवेश और बसाहट बढ़ाने औद्योगिक भूखंडों की कीमत 50 प्रतिशत घटाई जायेगी। नया रायपुर बस जाये इसके लिये क्या-क्या नहीं किया गया। अपने पुराने रायपुर के लिये मंजूर की गई रकम भी वहां लगा दी गई। चौड़ी-चौड़ी सडक़ें, जगमगाती रौशनी, मार्किंग, बड़े-बड़े गार्डन, सफारी। नया रायपुर को स्मार्ट सिटी परियोजना में भी ले लिया गया। मंत्रालय और संचालनालय भी वहां भेजा गया।

अऩुमान है कि यहां अब तक करीब 8 हजार करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं। पर कोई भी गांव या शहर, लोगों से ही बसता है जो कि यहां दिखाई नहीं देता। अफसर ड्यूटी पर जाते हैं शाम को लौट आते हैं। हाउसिंग बोर्ड की कॉलोनियां खाली पड़ी हुई है। एनआरडीए ने तकरीबन तीन साल पहले सोसाइटियों को दो प्रतिशत मार्जिन मनी देकर भूखंड देने की योजना बनाई थी। इलाके को डेवलप करने में जो लागत आई, वह प्लाट, फ्लैट की कीमत में मुनाफे के साथ जोड़ दी गई। कीमत नहीं घटने के चलते नई कॉलोनियों के लिये लोगों का हिम्मत जुटाना मुश्किल हो गया।

रायपुर के हर छोर पर, जिले से बाहर जाकर भी नई-नई कॉलोनियां विकसित करने में रुचि दिखाई गई, लेकिन 24 किलोमीटर दूर नया रायपुर की तरफ हिम्मत जुटाने वाले कम ही मिल रहे हैं। मौजूदा सरकार ने इससे पहले वहां विधानसभा, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के निवास के लिये भूमिपूजन किया है अब भूखंडों में छूट दी गई है। छूट पहले भी सन् 2016 में दी गई थी, कुछ उद्योगपतियों ने इसका फायदा भी उठाया। एक साल बाद यह रियायत वापस ले ली गई थी। अब फिर से यह स्कीम लाई जा रही है।

बात यह भी है कि इन पांच सालों में रेट बढ़ाया भी नहीं गया है। अभी सिर्फ औद्योगिक भूखंडों की बात हुई है। एनआरडीए और हाऊसिंग बोर्ड का भी रुख लचीला हो जाये तो नया रायपुर को आबाद होने की ओर बढ़ सकता है। 

जुर्माना लगाकर तो देखें लोग पटायेंगे..

विवाह की सूचना थाने में देनी होगी, मास्क, सैनेटाइजर पर्याप्त रखने होंगे, अनुमति केवल निर्धारित जगह और समय के लिये होगी, एसडीएम जांचेंगे कि जो खाना परोसा गया है उसकी गुणवत्ता सही है। बैंडबाजा, धुमाल पार्टी का इस्तेमाल धीमी आवाज में होगा, रात सिर्फ 10 बजे तक। कोई संक्रमित पाया गया तो जवाबदारी आयोजक की होगी।

कोविड से बचने के लिये जारी शासन के सर्कुलर में ये सब बंदिशें बताई गई हैं। इनका पालन नहीं करने पर? प्रावधान सिर्फ यह है कि अनुमति निरस्त कर दी जायेगी। थोड़ा बहुत उल्लंघन हो जाये तो कोई फिक्र नहीं। इसी के चलते जुर्माने का कोई ऐसा केस यहां नहीं बना है, जैसा उदयपुर (राजस्थान) में बन गया। वहां आयोजक और रिसोर्ट मालिक पर तहसीलदार ने 30 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया। अपने यहां अधिकारी घबराते हैं, हिम्मत दिखायें। शादी ब्याह में अक्सर खुले हाथ से खर्च किया जाता है, जुर्माने की परवाह किसे है?

टेस्ट के आंकड़े बढ़ाने के लिये एंटिजन किट ही सही

छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कार्पोरेशन ने स्वास्थ्य विभाग की उस शिकायत को सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें कोविड की जांच के लिये भेजे गये एंटिजन किट की गुणवत्ता पर संदेह जताया गया था। रायपुर में कई ऐसे मामले आये हैं, जब एंटिजन किट से किये गये टेस्ट के नतीजे दो चार घंटे के भीतर भी अलग-अलग मिले। करीब 20 हजार एंटिजन किट स्वास्थ्य विभाग ने वापस भी कर दिये। पर सीजीएमएससी ने किट को सही बताया, टैक्नीशियन पर सवाल उठा दिया। कहा है कि आपके टैक्निशियन जांच के लिये स्वाब के साथ सही मात्रा में वीटीएम केमिकल नहीं मिलाते होंगे।

सप्लाई करने वाली कम्पनी से सीजीएमएससी ने कोई सवाल-जवाब किया हो ऐसी खबर नहीं है। चूंकि सप्लाई का जिम्मा कॉर्पोरेशन का है इसलिये स्वास्थ्य विभाग को जांच उसी किट से करनी होगी जिसे लेकर संदेह हैं। वैसे यह देश के अनेक राज्यों ने माना है कि एंटिजन टेस्ट 60 प्रतिशत तक ही सही रिपोर्ट दे पाती है, फिर इसे प्रामाणिक टेस्ट क्यों माना जाता है इस पर भी सवाल है। आरटी-पीसीआर में ज्यादा समय, ज्यादा संसाधनों की जरूरत पड़ती है पर उसे ही सर्वश्रेष्ठ तरीका माना गया है। एंटिजन टेस्ट में आधा घंटा भी नहीं लगता है। शायद टेस्ट का आंकड़ा बढ़ाने के दबाव ने एंटिजन किट पर निर्भरता बढ़ाई है।

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