राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : एक व्यक्ति ही अपने संस्थान की पहचान
30-Nov-2020 7:00 PM 405
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : एक व्यक्ति ही अपने संस्थान की पहचान

एक व्यक्ति ही अपने संस्थान की पहचान

सीएस आरपी मंडल रिटायर हो गए। मंडल के साथ-साथ मंत्रालय से दूर संस्कृति संचानालय में पदस्थ संयुक्त संचालक राहुल सिंह भी आज रिटायर हो गए। मंडल के रिटायरमेंट की चर्चा मीडिया में सुर्खियां बनी हैं, और कुछ निर्माण कार्यों का जिक्र कर उनके योगदान को गिनाया जा रहा है। मगर राहुल सिंह के योगदान का जिक्र सिर्फ आपसी चर्चा तक ही सीमित है। जबकि राज्य की संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनका अहम योगदान रहा है। उनके साथ काम कर चुके मुख्यमंत्री के संयुक्त सचिव तारण प्रकाश सिन्हा ने फेसबुक पर राहुल सिंह के काम को लेकर अपने विचार साझा किए हैं।

उन्होंने लिखा है-राहुल सिंहजी आज सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि कोई व्यक्ति अपने अनुभव, ज्ञान, कार्यकुशलता और मिलनसारिता के बूते अपने संस्थान की ही पहचान बन जाए, और यदि ऐसा हो जाए तो ऐसे व्यक्ति की सेवानिवृत्ति भी संस्थागत रिक्तता-सी प्रतीत हुआ करती है। और फिर संस्कृति विभाग के संयुक्त-संचालक राहुलजी की सेवानिवृत्ति से होने वाली रिक्तता तो इससे भी कहीं ज्यादा है।

राहुलजी मूल रूप से अकलतरा के हैं, अकलतरा पूर्व में अविभाजित बिलासपुर जिले का भाग था, राहुलजी से पारिवारिक संबंधों के साथ शासकीय संबंध भी रहे। मुझे संस्कृति विभाग के संचालक के रूप में साथ काम करने का अवसर मिला, और इस तरह उन्हें करीब से जानने-समझने का भी। प्रदेश की संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व को लेकर न केवल उनकी गहरी समझ है, बल्कि मौलिक दृष्टि भी है। अपनी माटी को लेकर उनका दृष्टिकोण एक ठेठ-छत्तीसगढिय़ा का दृष्टिकोण है, जिसमें अपने सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित करने की छटपटाहट है।

ददरिया से लेकर बांस-गीत तक, प्रतिमाओं से लेकर मुद्राओं तक, भाषा से लेकर भंगिमाओं तक, मालगुजारों से लेकर राजे-महाराजाओं तक, चिडिय़ों से लेकर तितलियों तक, ऐसे ढेरों विषय हैं, जिनमें आप उनसे घंटों बात कर सकते हैं। हालांकि इनमें से ज्यादातर विषय उनके काम से ही जुड़े हुए हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा उनकी जीवनचर्या से भी। राज्य की संस्कृति और पुरातत्व के संरक्षण-संवर्धन के लिए उन्होंने अपने दायित्वों से कहीं आगे जाकर काम किया। उन्होंने न केवल राज्य के कलाकारों को, संस्कृतिकर्मियों को, पूरा-प्रेमियों को अपने साथ जोड़े रखा, बल्कि युवाओं को भी हमेशा साथ लेकर चलते रहे।

राहुलजी एक बढिय़ा लेखक भी हैं। उनकी एक पुस्तक ‘एक थे फूफा’ पठनीय है, उनका एक लोकप्रिय ब्लॉग है-सिंहावलोकन। इस ब्लॉग का मैं भी नियमित पाठक हूं। वे एक लेखक और शोधार्थी के रूप में भी इस ब्लाग के जरिये प्रदेश के सांस्कृतिक वैभव को समृद्ध करते रहे हैं। संतोष की बात यह है कि उनका यह ब्लाग अब मार्गदर्शी किताब के रूप में भी हमारे लिए उपलब्ध है।

शायद यह राहुल सिंहजी  की उपस्थिति के कारण ही था कि संस्कृति विभाग के बाद अब जनसंपर्क विभाग में काम करते हुए मुझे विभागीय दूरी कभी महसूस ही नहीं हुई। जब भी आवश्यकता हुई, राहुलजी ने उतनी ही तत्परता से मेरी मदद की। राहुलजी की सेवानिवृत्ति हालांकि एक विभागीय प्रक्रिया है, लेकिन इस अनिवार्य घटना का सुखद पहलु यह है कि एक विशेषज्ञ, शोधार्थी और लेखक के रूप में हम सबके बीच अपनी कहीं ज्यादा व्यापकता के साथ उपस्थित रहेंगे। उनकी रचनात्मकता के जरिये उनके अनुभवों का लाभ हमें मिलता रहेगा।

ठग-जालसाज ओवरटाईम कर रहे...

भारत सरकार तरह-तरह से लोगों को चौकन्ना कर रही है कि वे टेलीफोन और इंटरनेट पर ठगी का शिकार न हों। कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन आरबीआई की तरफ से बार-बार यह घोषणा करते हैं कि टेलीफोन पर बैंक धोखाधड़ी के शिकार न हों। लेकिन सरकारी नियंत्रण वाली देश की टेलीफोन और इंटरनेट सेवाओं के तहत रात-दिन धोखाधड़ी के संदेश जाते हैं। जिन्होंने किसी कंपनी की कोई बीमा पॉलिसी नहीं ली है उन्हें बार-बार संदेश आता है कि उनका बीमे का वक्त पूरा हो रहा है, और पॉलिसी आगे बढ़ाने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें। जिन्होंने बैंक से कर्ज नहीं मांगा है, उन्हें संदेश जा रहे हैं कि उनका लोन मंजूर हो गया है, और वे आज ही वह लोन उठा सकते हैं, इसके लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें। लोगों को लगातार ऐसे संदेश मिल रहे हैं, और एक बार क्लिक करते ही उनका फोन हैक हो जाने, उसके पासवर्ड चोरी हो जाने, उससे भुगतान हो जाने का खतरा खड़ा हो जाता है। यह एक रहस्य है कि जो सरकार अपने विरोधियों के फोन और संदेश पर तो निगरानी रख सकती है, लेकिन ऐसे जालसाजों और धोखेबाजों के संदेश क्यों नहीं पकड़ सकती?

देश में रोजाना हजारों लोग साइबर ठगी के शिकार हो रहे हैं, और सरकार है कि वह आधार कार्ड अनिवार्य करने से लेकर डिजिटल भुगतान तक को बढ़ावा देने, उसे अनिवार्य करने पर आमादा है। हिफाजत का ठिकाना नहीं, लेकिन इस्तेमाल करवाने की जिद।

यह मामला कुछ छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की सरकारी गौशाला जैसा हो गया जहां कुत्तों के झुंड ने भीतर घुसकर बीमार गाय को मार डाला। गायों को सरकारी गौशाला या गोठान में रखने की भी जिद, और हिफाजत का भी इंतजाम नहीं। 

मानव तस्करी की महामारी

धान पकने के बाद रोजगार के लिये दूसरे राज्यों में जाना और बोनी के दिनों में वापस लौट जाना छत्तीसगढ़ के हर इलाके में होता रहा है। श्रम विभाग ने अनुमान लगाया था कि 7 लाख श्रमिक कोरोना काल में छत्तीसगढ़ वापस लौटेंगे। इनकी स्किल मैपिंग की बात हुई थी ताकि उनके हुनर का राज्य के उद्योग धंधों में इस्तेमाल हो सके, उद्योगपतियों ने भी आश्वस्त किया था। पर, जैसे ही समय बीता इसे जवाबदार लोग श्मशान वैराग्य की तरह भूल गये।

पिछली सरकार ने दावा किया था कि हम रोजगार के ऐसे मौके देंगे कि पलायन पूरी तरह खत्म हो जायेगा। मगर प्रवास बसों, रेलों, प्राइवेट गाडिय़ों या तक कि बाइक के जरिये प्रवास जारी है। लॉकडाउन लगने के बाद जो भारी तकलीफ मजदूरों ने उठाई थी, इसकी परवाह किये बगैर।

अब जो मामले पकड़े जा रहे हैं, वे ज्यादा चिंताजनक है। बच्चों और महिलाओं की सरेआम तस्करी हो रही है। रायपुर, कोरबा, बिलासपुर, रायगढ़ आदि जिलों में लगातार मामले पकड़े जा रहे हैं। बस्तर का आदिवासी जमीन छोडऩा पसंद नहीं करता लेकिन ख़बरें वहां से भी हैं।

चिंताजनक है कि तस्करी में लिप्त लोगों को राजनैतिक संरक्षण भी है। रायपुर में भाजपा नेत्री का पकड़ा जाना बताता है कि सप्लाई का नेटवर्क तगड़ा है और छत्तीसगढ़ में यह एक फलता-फूलता कारोबार हो चुका है। महिलाओं के अलावा नाबालिग बच्चियों को भी बहला-फुसलाकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जा रहा है।

पुलिस जांच में ही पता चला है कि अकेले डोंगरगढ़ से 35 महिलायें गायब हैं। कुछ साल पहले राज्य महिला आयोग ने बताया था कि प्रदेश की 19 हजार महिलायें और बच्चियां गायब हैं जिनमें ज्यादातर जशपुर इलाके की हैं। उसके बाद का कोई आंकड़ा प्रकाश में नहीं है। इनको बेहतर सुविधा और सम्मानजनक कार्य के नाम पर ले जाया गया पर उन्हें यौन शोषण के दलदल में धकेला गया, कई लोग वेश्यालयों में मिले, अनेक की लाशें मिलीं। कोरोना महामारी के बाद पैदा आर्थिक संकट की एक काली तस्वीर यह भी है जिसकी तरफ सरकार अभी गंभीर नहीं दिखती।

कार्यकर्ता अब क्या नेताओं की हाय-हाय करें?

आम कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिये कांग्रेस समन्वय समिति की बैठक उत्साहजनक नहीं रही। निगम-मंडलों में नियुक्ति का मसला एक बार फिर टाल दिया गया है। तय यह हुआ है कि पहले संगठन में खाली पड़े पदों को भरा जाये उसके बाद जो बचेंगे उनके नाम निगम, मंडल, आयोग, परिषद् आदि में तय होंगे।

सत्ता से जुडऩे की लालसा लिये कार्यकर्ताओं के लिये इस बैठक में दोहरी मार हुई, एक तो नियुक्तियों का कोई समय-सीमा तय नहीं की गई दूसरी उन पर जवाबदारी दे दी गई वे सरकार की नरवा-गरुवा, किसान न्याय आदि योजनाओं के फायदे लोगों को बतायें। यानि जब विपक्ष में थे तो सडक़ों पर लाठी खायें और अब जब सरकार बन गई तो बचे हुए चुनाव जितायें, सरकार की उपलब्धियों को बताने घिसें। हर हाल में सडक़ पर।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस भवन के सामने अपने ही नेताओं के खिलाफ प्रदर्शन करना, उनका विरोध जताना पहले भी हो चुका है, नियुक्तियों को टालने वाले नेताओं को यह पता होगा ही।

ठगी अमर से नहीं हो सकती

सोशल मीडिया के जरिये तरह-तरह की ठगी के तरीकों में फेसबुक पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर पैसे मांगना भी शामिल है। पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल दिल्ली में हैं और उनके समर्थकों ने थाने में शिकायत दर्ज करा दी है। किसी ने फेसबुक पर उनकी फर्जी प्रोफाइल बना ली और लोगों से 10-10 हजार रुपये की मांग की जा रही है। इसके पहले एक आईएएस अफसर और एक पुलिस अधिकारी के मामले भी आ चुके हैं।

जिसने भी ठगी की उसने गलत जगह दांव लगाया। फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया पर अमर अग्रवाल का अपना आईटी सेल है। बहुत से महापुरुषों की जयंती के बारे में तो उनकी टीम ही वाट्सअप, ट्विटर और फेसबुक पर याद दिलाती है। जन्मदिन की रिकॉर्डेड बधाई, पर्व-त्यौहारों की शुभकामनायें देती हैं। कोविड-19 का प्रकोप शुरू हुआ तो कलेक्ट्रेट में अमर के समर्थकों ने एक कम्प्यूटराइज्ड सिस्टम दे दिया, टोल फ्री नंबर पर लोग मिस कॉल कर शिकायत दर्ज करा सकते हैं। अमर समर्थकों ने पुलिस से की गई शिकायत में एक मोबाइल नंबर दिया है जिसके एकाउन्ट में पैसे मांगे गये हैं। यह तय है कि यदि पुलिस पता नहीं लगा पाई तो अमर की टीम पता लगा लेगी कि कौन इस फोन नंबर का इस्तेमाल कर रहा है।

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