राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : थानों का इतिहास लेखन...
23-Dec-2020 4:33 PM 334
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : थानों का इतिहास लेखन...

थानों का इतिहास लेखन...

एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ की पुलिस के हर थाने को कहा जाता था कि वह अपने इलाके के सभी किस्म के इतिहास का एक छोटा ब्यौरा बनाकर रखे। अभी बिहार के एक पत्रकार पुष्य मित्र ने वहां अररिया जिले की एक तस्वीर पोस्ट की है जिससे याद आया कि हर थाने को अपने इलाके के इतिहास से थोड़ा तो वाकिफ रहना चाहिए।

बहुत पहले अविभाजित रायपुर जिले में एसपी सीपीजी उन्नी के वक्त थानों से इतिहास लिखवाया गया था। अभी के महासमुंद जिले में उस वक्त तुमगांव थाने  के इतिहास में लिखा था कि थाने के मालखाने में एक डुगडुगी रखी हुई है जो कि वहां के राजा ने एक किसी की खाल खिंचवाकर बनवाई थी, और जो मुनादी के काम आती है। अब फणीश्वरनाथ रेणु की धरती से लेकर थाने की इस डुगडुगी तक बहुत सी दिलचस्प बातें थाने अपने इलाके के बारे में दर्ज कर सकते हैं। कोई कल्पनाशील पुलिसवाले रहें तो वे अपने इलाके का एक आम इतिहास लेखन करवा सकते हैं।

मंत्री से सीधे अध्यक्ष

आखिरकार काफी खींचतान के बाद भाजपा ने दुर्ग में डॉ. शिवकुमार तमेर और भिलाई में विरेन्द्र साहू को जिलाध्यक्ष बना दिया। चर्चा है कि दोनों नियुक्ति में सरोज पाण्डेय की चली है। यानी सांसद विजय बघेल, प्रेमप्रकाश पाण्डेय और विद्यारतन भसीन के सारे प्रयास धरे के धरे रह गए।

डॉ. तमेर तो संघ के पसंदीदा हैं, और वे दुर्ग के मेयर रह चुके हैं। उनकी गिनती छत्तीसगढ़ के नामी न्यूरोलोजिस्ट में हैं। ऐसे में उनका नाम आया, तो किसी तरह का विरोध नहीं हुआ, लेकिन विरेन्द्र साहू के नाम का ऐलान हुआ, तो पार्टी के नेता ही उनका बैकग्राउंड खंगालते रहे। विरेन्द्र साहू जिले के मंत्री रहे हैं, और वे बीएसपी कर्मी थे। जिले के मंत्री से सीधे अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी के अंदरखाने में तीखी प्रतिक्रिया भी हो रही है।

सुनते हैं कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के कक्ष में हास परिहास के बीच एक-दो विधायकों ने रमन सिंह से पूछ लिया, कि विरेन्द्र साहू कौन है? इस पर रमन सिंह ने अनभिज्ञता जताई। एक सीनियर विधायक ने हैरानी जताई, और कहा कि आप लोग नियुक्ति करते हैं, और आपको ही पता नहीं? एक अन्य ने कहा कि विरेन्द्र जिला संगठन मंत्री हैं। इस पर सीनियर विधायक ने कटाक्ष किया कि पार्टी में कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रशिक्षण सत्र इस विषय पर भी होना चाहिए कि जिले के मंत्री से सीधे अध्यक्ष कैसे बन सकते हैं। उनकी टिप्पणी पर वहां मौजूद  विधायकों ने जमकर ठहाका लगाया।

भोपाल आ जाइए

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान छत्तीसगढ़ के विशेषकर बृजमोहन अग्रवाल खेमे के नेताओं से काफी घुले मिले हैं। दोनों युवा मोर्चा में साथ काम कर चुके हैं। मंगलवार को दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा की अंतिम यात्रा में शामिल होने का उनका कार्यक्रम बना, तो एक दिन पहले ही उन्होंने बृजमोहन को फोन किया, और कहा कि उन्हें साथ दुर्ग चलना है। दोनों एयरपोर्ट से भिलाई पहुंचे। वहां प्रेमप्रकाश पाण्डेय उनकी अगवानी के लिए खड़े थे। फिर शिवराज सिंह चौहान, एक ही कार में बृजमोहन और प्रेमप्रकाश के साथ वोराजी के घर गए।

अंतिम संस्कार कार्यक्रम से लौटे, तो एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा, नारायण चंदेल के साथ छत्तीसगढ़ की राजनीतिक स्थिति पर सामान्य चर्चा की। चर्चा है कि इन नेताओं ने पार्टी की अंदरूनी दिक्कतों को भी गिनाया। उन्होंने अजय चंद्राकर के जुझारू तेवर की सराहना की, और कहा कि वे उन्हें टीवी चैनलों में देखते हैं।  उन्होंने कहा कि जल्द ही वे बिना किसी कार्यक्रम के रायपुर आएंगे, और आप सबके साथ चर्चा करेंगे। या फिर आप लोग समय निकालकर भोपाल आ जाइए। वहां अच्छे से बात हो जाएगी। संकेत है कि शिवराज सिंह अब पार्टी संगठन में हाशिए पर चल रहे बृजमोहन खेमे को मुख्य धारा में लाने के लिए पहल कर सकते हैं।

बोर्ड परीक्षाओं पर चिंता भी, राहत भी

छत्तीसगढ़ के जिन स्कूलों में सीजी बोर्ड परीक्षायें नहीं होतीं उनमें केन्द्रीय परीक्षाओं के लिये सीबीएसई ही अधिक प्रचलित है। कोरोना महामारी के चलते हुए नुकसान के कारण ज्यादातर स्थानीय परीक्षाओं में जनरल प्रमोशन दिया जा रहा है पर बोर्ड परीक्षाओं में ऐसा करना मुश्किल है। विशेषकर केन्द्रीय बोर्ड की। एक-एक परीक्षार्थी की क्षमता का समग्र मूल्यांकन होना जरूरी है क्योंकि आगे इंटरमीडियेट और स्नातक स्तर की परीक्षाओं का रास्ता तय होना है।

केन्द्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने कल साफ कर दिया है कि जनरल प्रमोशन या ऑनलाइन परीक्षाओं का विकल्प सीबीएसई एग्जाम के लिये तय नहीं किया जा सकता। परीक्षायें ऑफलाइन ही होंगी। हां, छात्रों को तैयारी का कम से कम दो माह का समय और मिल गया है। स्कूलों में ताला लगा है और ऑनलाइन कक्षाओं की तैयारी से अभिभावक, शिक्षक और स्वयं छात्र संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे में ऑफलाइन परीक्षायें ली भी नहीं जा सकतीं। दो माह टलने के बाद परीक्षायें निरापद ढंग से हो जायें तब शायद छात्रों का साल खराब होने से बचाया जा सकता है।

10वीं-12वीं बोर्ड के बच्चों के लिये आने वाले दो महीने तनाव के हो सकते हैं क्योंकि इस बीच उन्हें साल भर की तैयारी करनी है। ऐसी परीक्षा के लिये जिसमें सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का दबाव होता है। अभी केन्द्रीय बोर्ड परीक्षाओं की तारीखें घोषित नहीं की गई हैं। शायद आने वाले दिनों में कोरोना के ट्रेंड का अनुमान लगाया जा रहा है। यदि दो माह बाद भी परीक्षायें नहीं हुई तो विद्यार्थियों, अभिभावकों को यह ज्यादा मायूस करेगा, क्योंकि इससे तो उनका पूरा एक साल व्यर्थ चला जायेगा।

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