राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : शुभ टोटका है यह राज्य..!
13-Feb-2021 5:51 PM 207
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : शुभ टोटका है यह राज्य..!

शुभ टोटका है यह राज्य..!

प्रदेश भाजपा की प्रभारी डी पुरंदेश्वरी, सहप्रभारी नितिन नबीन के साथ शनिवार को रायपुर पहुंची, तो कई नेताओं ने नबीन को बधाई दी। नबीन कुछ दिन पहले ही बिहार सरकार में मंत्री बने हैं। एक नेता ने उनसे कहा कि छत्तीसगढ़ आप लोगों  के लिए शुभ है, जो भी यहां प्रभारी रहा, उसकी राजनीतिक उन्नति हुई है। इस पर दोनों नेता मुस्करा दिए। सर्वविदित है कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद नरेन्द्र मोदी प्रभारी रहे। वे तो प्रदेश भाजपा कार्यालय में आगजनी के साक्षी भी रहे हैं। बाद में वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने, और अब प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाल रहे हैं। कुछ समय बाद वेंकैया नायडू यहां के प्रभारी बनाए गए। बाद में वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, और केन्द्र सरकार में मंत्री रहे। अभी उपराष्ट्रपति के पद पर हैं।

छत्तीसगढ़ में पहली बार विधानसभा आम चुनाव के पहले राजनाथ सिंह को प्रभारी बनाया गया था। उस समय राजनाथ सिंह के उत्तरप्रदेश में सीएम रहते पार्टी को बुरी हार गई थी। मगर छत्तीसगढ़ प्रभारी बनते ही उनकी भी किस्मत चमक गई। वे केन्द्र सरकार में मंत्री बने। बाद में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे, और वर्तमान में रक्षा मंत्री का दायित्व संभाल रहे हैं। राजनाथ सिंह के बाद धर्मेन्द्र प्रधान को यहां का प्रभारी बनाया गया। बाद में उनकी भी राष्ट्रीय राजनीति में पैठ बनी, और पिछले 6 साल से केन्द्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।

धर्मेन्द्र प्रधान के बाद जगतप्रकाश नड्डा यहां के प्रभारी रहे। बाद में वे पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री बने, फिर केन्द्र सरकार में मंत्री रहे, और वर्तमान में राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व संभाल रहे हैं। कुछ समय के लिए रामशंकर कठेरिया प्रभारी रहे, लेकिन वे यहां नहीं आए। फिर भी उनकी राजनीतिक उन्नति हुई। वे केन्द्र सरकार में मंत्री रहे, और वर्तमान में अनुसूचित जाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

कठेरिया के बाद डॉ. अनिल जैन प्रभारी रहे। उनके कार्यकाल में यहां पार्टी की दुर्गति हो गई। फिर भी उन्हें केन्द्र सरकार में मंत्री बनाए जाने की चर्चा चल रही है। वर्तमान सह प्रभारी नितिन नबीन तो कुछ दिनों के भीतर ही बिहार में मंत्री पद पा गए। प्रभारी डी पुरंदेश्वरी की भी उज्जवल भविष्य की संभावनाएं जताई जा रही है। पहली तो यह कि वे आंध्रप्रदेश में भाजपा का चेहरा हो सकती हैं। पुरंदेश्वरी, आंध्रप्रदेश के सीएम रहे एनटी रामाराव की बेटी हैं। वे केन्द्र सरकार में मंत्री रही हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन का प्रभार संभालने के बाद वे भी बाकियों की तरह राजनीतिक परिदृश्य में छा जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी यहां पिछले  रिकॉर्ड को देखते हुए तो कम से कम यह कहा ही जा सकता है।

अजय चंद्राकर तैयारी से हैं..

पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर और महामंत्री भूपेन्द्र सवन्नी के बीच विवाद अब तक खत्म नहीं हुआ है। इस विवाद पर प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने महामंत्री (संगठन) पवन साय से बात की थी। सुनते हैं कि अजय ने बकायदा एक लिस्ट तैयार की, जिससे यह साफ हो जाएगा कि उन्हें कब-कब बैठक में नहीं बुलाया गया। जबकि बैठक व्यवस्था और सूचना देने की जिम्मेदारी सवन्नी की थी। अजय इस बार पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। देखना है कि पुरंदेश्वरी इस विवाद का निपटारा कैसे करती हैं।

जान को खतरा या कुर्सी की लड़ाई?

को-वैक्सीन का इस्तेमाल नहीं करने को लेकर स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के बयान और चि_ियों पर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और सनसनी नहीं फैलाने की नसीहत दी । हालांकि उन्होंने माना है कि इसे क्लीनिकल ट्रायल के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाना है। यह स्वास्थ्य विभाग के विशेषज्ञ और परीक्षण के सिद्धांतों को जानने वाले बता पायेंगे कि क्या बड़े पैमाने पर आम लोगों को क्लीनिकल ट्रायल के तौर पर क्या कोई वैक्सीन दी जा सकती है? क्या लोगों का यह अधिकार नहीं है कि वे ट्रायल के लिये तैयार होने से मना कर दें। सरकार इस मामले में लोगों पर दबाव डाले?  केन्द्र का कहना है कि देशभर में इस तरह के ट्रायल हो रहे हैं। इसमें कोई खराबी नहीं है। लक्ष्य के अनुरूप वैक्सीनेशन नहीं कर पाने के कारण छत्तीसगढ़ सरकार लोगों का ध्यान भटका रही है।

इधर पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने इसे सीधे प्रदेश कांग्रेस में सत्ता की राजनीति से जोड़ दिया और कहा कि यह मंत्रिमंडल का सामूहिक फैसला नहीं है। कुर्सी की लड़ाई में कोविड मरीजों की जान को जोखिम में डाला जा रहा है। केन्द्रीय मंत्री की जवाबी चि_ी और प्रदेश के भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया के बाद क्या को-वैक्सीन इस्तेमाल करने का निर्णय पलट दिया जायेगा, या फिर टीके  रखी रह जायेंगी, यह आने वाले दिनों में मालूम होगा।

हवाई चप्पल वाले कैसे उड़ेंगे ?

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से हवाई सेवा शुरू करने की मांग राज्य बनने के बाद से ही होती रही है लेकिन इस मांग ने धार पकड़ी जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने रुचि ली। इसी दौरान शहर के नागरिकों ने संघर्ष समिति बना ली और वे बीते एक साल से भी ज्यादा समय से वे अखंड धरना दे रहे हैं। हाईकोर्ट में लगी याचिकाओं ने भी हवाई सेवा शुरू करने के लिये केन्द्र और राज्य सरकार दोनों पर दबाव बनाया है। अब मार्च से यहां से उड़ानें शुरू हो जाने की घोषणा की गई है। उड़ान स्कीम के अंतर्गत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उड़ान- उड़े देश का आम नागरिक (यूडीएएन) योजना शुरू करते हुए घोषणा की थी कि हवाई चप्पल पहनने वाले भी हवाई सफर कर सकेंगे। बिलासपुर से अधिकांश महानगरों की दूरी 600 किलोमीटर से अधिक है, जिसके चलते उड़ान स्कीम में टिकटों पर रियायत नहीं मिलने वाली। ऊपर से अब यात्रा टिकट 30 प्रतिशत तक महंगी भी कर दी गई है। न्यूनतम किराया भी 2200 रुपये हो गया है। बिलासपुर हवाई अड्डे को तैयार करने के रास्ते में अनेक बाधायें तो दूर कर ली गईं, पर उड़ानें शुरू होने के बाद देखना होगा कि चप्पल पहनने वाले कितने लोग इनमें यात्रा का सुख ले पायेंगे।

सूपेबेड़ा से इच्छा मृत्यु की मांग

राज्यपाल अनुसूईया उइके सुपेबेड़ा, गरियाबंद के दौरे पर 22 अक्टूबर 2019 को गई थीं। इस दौरान सरकार और राज्यपाल के बीच थोड़ा टकराव भी हुआ। हेलिकॉप्टर देने या नहीं देने के नाम पर। आखिरकार राज्यपाल वहां गईं, साथ में स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव भी थे। राज्यपाल ने किडनी पीडि़तों और उनके परिवार के लोगों की तकलीफें सुनीं। सरकार को कई निर्देश दिये। स्वास्थ्य मंत्री ने आश्वस्त किया कि यहां के किडनी मरीजों का न केवल इलाज मुफ्त होगा बल्कि अस्पताल में रहने खाने का खर्च भी उठाया जायेगा। अन्य विभागों ने भी शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। लेकिन अब वहां क्या स्थिति है। जिस तेल नदी से शुद्ध पेयजल पहुंचाने का वादा किया था वह फाइलों में उलझ गई है। किडनी से मौतों का सिलसिला अब भी जारी है और यहां लोगों को राहत नहीं मिली। यही वजह है कि गरियाबंद में कल कलेक्टर से मिलकर सुपेबेड़ा और आसपास के 10 गावों के लोगों ने इच्छा मृत्यु मांगी है और अपनी बात राज्यपाल तक पहुंचाने का निवेदन किया है। ग्रामीण बता रहे हैं कि हाल के दिनों में मौतों का आंकड़ा 90 से ऊपर जा चुका है।

सुपेबेड़ा व आसपास के गांवों की यह समस्या करीब 10 साल से है। अब तक वहां किडनी से मौतें हो रही हैं। राज्यपाल, स्वास्थ्य मंत्री और अन्य नेताओं की पहल के बावजूद। क्या यह पीड़ादायक नहीं है?

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