राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : को-वैक्सीन को ना, कोरोलिन को हां ?
24-Feb-2021 5:52 PM 189
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : को-वैक्सीन को ना, कोरोलिन को हां ?

को-वैक्सीन को ना, कोरोलिन को हां ?

एक बार फिर बाबा रामदेव ने कोरोलिन दवा को कोरोना के उपचार के लिये कारगर बताते हुए लांच कर दिया। इस बार पुख्ता तैयारी थी कि उनके दावे पर कोई सवाल न उठे। उनकी प्रेस कांफ्रेंस में केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी तो थे ही, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन भी मौजूद थे। बाबा रामदेव ने दावा किया कि इस दवा को भारत सरकार ही नहीं, डब्ल्यूएचओ ने भी सर्टिफाई किया है।

कोशिश यही थी कि पतंजलि के इस उत्पाद को इस बार कोरोना की दवा साबित करने में कोई कसर बाकी न रहे। मगर, लोग तो बाबा के पीछे ही पड़ गये। जैसे, न्यूज लांड्री और इंडियन मेडिकल एसोसियेशन। न्यूज लॉड्री ने अगले ही दिन सबूतों के साथ दावे को गलत बता दिया। आईएमए ने भी बाबा रामदेव के बयान पर सवाल उठाये। दक्षिण पूर्व एशिया डब्ल्यूएचओ की तरफ से कोरोलिन का नाम लिये बिना तुरंत खंडन आ गया कि उन्होंने कोई सर्टिफिकेट किसी पारम्परिक औषधि को नहीं दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर आचार्य बालकृष्ण का ट्वीट आया। उन्होंने कहा कि वे इस भ्रम का निवारण करना चाहते हैं। डब्ल्यूएचओ किसी भी दवा का अनुमोदन नहीं करता है। उन्होंने सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन का हवाला दिया है। आईएमए ने इस पर भी सवाल किया है कि किसी भी डॉक्टर को किसी खास दवा को प्रमोट करने का अधिकार नहीं है फिर डॉ. हर्षवर्धन ने ऐसा क्यों किया, जबकि वे डब्ल्यूएचओ की गवर्निंग बॉडी में भी सदस्य हैं।

बीते जून 2020 में निम्स जयपुर के निदेशक डॉ. बीएस तोमर की मौजूदगी में कोरोलिन को बाबा रामदेव ने पहली बार लांच किया था। इसमें बताया गया था कि 200 लोगों पर टेस्ट किये गये, 70 प्रतिशत लोग 3 दिन में तो 100 प्रतिशत लोग एक सप्ताह में ठीक हो गये। पर आयुष मंत्रालय ने इसे मान्यता देने से इंकार कर दिया और कहा कि यह कोरोना की दवा नहीं है। इसके प्रचार-प्रसार, विज्ञापन पर भी पाबंदी लगा दी। बाबा और आचार्य उस वक्त पलट गये कि उन्होंने इसे कोरोना की दवा बताई थी।

अब आते हैं, छत्तीसगढ़ को कोरोना से मुक्त करने के उपायों पर। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और भाजपा की प्रतिक्रियाओं की परवाह किये बगैर राज्य सरकार इस बात पर टिकी हुई है कि वह को-वैक्सीन का टीकाकरण के लिये इस्तेमाल नहीं करेगी। इसका कारण है कि को-वैक्सीन के तीसरे चरण का ट्रायल नहीं होना। मगर इसी राज्य में कोरोलिन दवा कोरोना के नाम पर धड़ल्ले से बिक रही है। न केवल पतंजलि स्टोर्स, मेडिकल स्टोर्स में बल्कि किराना दुकानों में भी। महाराष्ट्र सरकार ने आईएएम और डब्ल्यूएचओ की प्रतिक्रिया के बाद कोरोलिन की बिक्री पर पाबंदी लगी दी है। पर छत्तीसगढ़ सरकार ने इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है। कोरोलिन का हो सकता है को-वैक्सीन की तरह साइड इफेक्ट की आशंका नहीं हो। पर छत्तीसगढ़ सरकार यह सुनिश्चित तो करे कि क्या यह कोरोना का नाम लेकर बेचा जा सकता है। जो लोग खरीद रहे हैं, वे तो पतंजलि के दावे पर विश्वास कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार का स्वास्थ्य विभाग क्या उनके दावे की पुष्टि करता है?

सरकारी सम्पत्ति आपकी अपनी!

चूंकि हिन्दुस्तान में सरकार ने ही यह नारा गढ़ा है कि सरकारी सम्पत्ति आपकी अपनी है, इसलिए लोग उसका तरह-तरह से इस्तेमाल करते हैं। अभी एक पत्रकार को एक महंगे रेस्त्रां में चाय-कॉफी के साथ यह शक्कर परोसी गई जो कि भारतीय रेल के लिए पैक की गई है। जाहिर है कि यह रेलवे से ही चोरी होकर आई होगी। आमतौर पर चोरी के माल को लोग पर्दे के पीछे, यानी घर के भीतर इस्तेमाल कर लेते हैं, यह रेस्त्रां भी अगर अपने किचन में शक्कर का इस्तेमाल कर लेता तो दिक्कत नहीं होती, बात नहीं पकड़ाती, लेकिन उसने तो धड़ल्ले से टेबल पर इसे परोस दिया।

वैसे शासकीय सम्पत्ति आपकी अपनी है यह बात लोगों को समझाने का नतीजा यह निकला था कि जब रेलगाडिय़ों में पहली बार बर्थ पर गद्दे लगे तो लोग उसके ऊपर का फोम लैदर ब्लेड से काटकर ले जाते थे, और उससे थैले बना लेते थे। फोम लैदर और फोम का नुकसान रेलवे को सैकड़ों झोलों से अधिक महंगा पड़ता था। धीरे-धीरे वह चोरी अब कम हुई क्योंकि लोगों को चोरी करने के लिए अधिक आसान और अधिक फायदेमंद दूसरे सरकारी सामान मिलने लगे हैं।

शिष्टाचार के हिसाब से बात गलत होगी, लेकिन शायद सरकारी नारा बदलकर, सरकारी सम्पत्ति आपके बाप की नहीं है, करने से हो सकता है कि कुछ असर हो।

लेकिन यह लिखने के बाद एक बात और भी है। जहां कहीं, प्लेन में या ट्रेन में, या किसी फास्टफूड रेस्त्रां में टेबिल पर खाने के साथ शक्कर, नमक, या टमाटर-सॉस के सैशे (पैकेट या पाऊच) दिए जाते हैं जो कि जूठन के साथ फेंक दिए जाएंगे, तो उन्हें उठाकर ले आना चाहिए, और बाद में इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन रेस्त्रां में सर्व किए गए ऐसे सैशे तो कहीं से बचाकर लाए हुए नहीं हो सकते, चोरी किए हुए ही हो सकते हैं।

महिला की जगह, पुरुष नहीं तो बैठक नहीं...

पंचायती राज कानून के तहत महिलाओं को तीन स्तरीय संरचना में पहले 33 फीसदी, फिर 50 फीसदी आरक्षण दिया गया। गांवों में महिला स्व सहायता समूह के जरिये आर्थिक स्थिति, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इनके पर्याप्त प्रतिनिधित्व की वजह से बदलाव भी दिखा है। दूसरी तरफ यह भी सच है कि अनेक महिला प्रतिनिधि आज भी अपने पति, पिता या बेटे के नाम पर चुनी जाती हैं। वे खुद फैसले नहीं ले पाती और उनके पुरुष रिश्तेदार ही उनके अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं। गांवों में एसपी का मतलब सरपंच पति मान लिया गया है। यदि कोई पुरुष जनपद, जिला पंचायत प्रतिनिधि कहा जा रहा है तो पता चल जाता है कि वह निर्वाचित नहीं हो सका, उसने रिजर्वेशन की मजबूरी के चलते अपने घर की किसी महिला को चुनाव जितवाया है। चुनाव महिला ने जीता पर पद को उनका पुरुष प्रतिनिधि जी रहा होता है। यहां तक कि सरकारी विभागों में, राजनीतिक सभाओं में निर्वाचित महिलायें या तो नदारत होती हैं या पीछे बैठी होती हैं। सरकारी बैठकों में भी उनकी जगह पर बैठ जाते हैं। समय-समय पर राज्य सरकार ने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि ऐसा न होने दें। पर सामान्यत: ऐसा होता नहीं है।

जनपद पंचायत बेमेतरा की पिछले गुरुवार की बैठक में सीईओ ने महिला प्रतिनिधियों की जगह पर उनके पति या बेटे के साथ बैठक लेने से इन्कार कर दिया। सीईओ को समझाने पुरुष प्रतिनिधि उनके चेम्बर में डटे रहे। सीईओ नहीं माने, बोले बैठक में तो जो निर्वाचित सदस्य हैं वे ही बैठेंगे, बाकी लोग बाहर होंगे। पुरुष सदस्यों की नहीं चली तो उन्होंने बैठक का बहिष्कार ही करा दिया। महिला प्रतिनिधियों ने बैठक में शामिल होने से मना कर दिया। बैठक नहीं हो पाई।

हैरानी है कि जिला प्रशासन या महिला आरक्षण के हिमायत करने वाले राजनैतिक दलों में इस गंभीर घटना की कोई प्रतिक्रिया ही नहीं है। यह सीधे-सीधे प्रशासनिक कामकाज को अनाधिकृत व्यक्तियों द्वारा अपने प्रभाव से रोकने का महिला विरोधी दु:स्साहस है। यह उन महिला नेत्रियों के लिये भी सोचने का विषय है जो अपने वर्ग की बराबरी के लिये सडक़ से लेकर संसद तक लडऩे का दावा करती हैं। जो महिला प्रतिनिधि बैठक के बहिष्कार के लिये राजी हो गईं, वे अपने घर के पुरुषों के दबाव में किस तरह काम कर रही हैं?

आध्यात्मिक आचार्य..

अटल बिहारी बाजपेयी यूनिवर्सिटी बिलासपुर के नव नियुक्त कुलपति प्रो. अरुण दिवाकर नाथ बाजपेयी अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। जब वे पहली बार कल बिलासपुर पहुंचे तो थ्री पीस सफेद सूट में लाल टाई पहना था। उनकी ही तरह बहुत से विद्वानों को हमने दाढ़ी रखते, टोपी पहनते व माथे पर तिलक लगाये हुए देखा है। यह सब उनके गहरे आध्यात्मिक झुकाव का परिचय तो देता ही है, पर प्रभार ग्रहण करते समय उन्होंने जो प्रक्रिया अपनाई उससे तय हो गया कि वे अपने धार्मिक मान्यताओं को भी खासा महत्व देते हैं। निजी जीवन में ही नहीं, बल्कि अपने दफ्तर में भी। विश्वविद्यालय के अपने कक्ष में प्रभार ग्रहण करने के लिये वे पहुंचे तो द्वार पर ओढ़ी हुई शॉल बिछा दी और हवन करने बैठे। पूजा-पाठ के बाद उन्होंने कक्ष में प्रवेश किया और कार्यभार संभाला। विश्वविद्यालय के स्टाफ ने नये कुलपति के आते ही वातावरण बदला-बदला सा महसूस किया है। अब छात्रों की इनसे मिलने की बारी है, जिनके पास समस्याओं और परेशानियों का अम्बार है।

 

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