राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : पेट पर वार
27-Feb-2021 6:15 PM 226
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : पेट पर वार

पेट पर वार

विधानसभा में अकसर ऐसा मौका आता है, जब सरकार के मंत्री पिछली सरकार के भ्रष्टाचार, या फिर भाजपा नेताओं के कारोबार पर कटाक्ष कर देते हैं, और सदन का माहौल गरम हो जाता है। ऐसे ही धान की मिलिंग-परिवहन के सवाल पर खाद्य मंत्री अमरजीत भगत घिरने लगे, तो वे सवाल करने वाले भाजपा सदस्य शिवरतन शर्मा से कह गए, कि आपको तो परिवहन की काफी जानकारी है।

फिर क्या था, शिवरतन शर्मा भडक़ गए, और उन्होंने मंत्री से कहा कि उन्हें न सिर्फ परिवहन बल्कि आपके पूरे विभाग की जानकारी है। दरअसल, शिवरतन शर्मा के परिवार के लोग नान के बड़े परिवहनकर्ता हैं। परिवहन संबंधी गड़बड़ी के एक मामले में शिवरतन के परिवार के एक सदस्य के खिलाफ डेढ़ साल पहले प्रकरण भी दर्ज हुआ था। और जब अमरजीत ने शिवरतन के पारिवारिक व्यवसाय पर कटाक्ष किया, तो उनका भडक़ना स्वाभाविक था।

ऐसी-ऐसी जानकारी मांगी

सरकार के एक मंत्री, अपने तिकड़मी पीए की वजह से बुरी तरह उलझते-उलझते रह गए। पीए, हमेशा कारोबारियों के संगत में रहते हैं, और उन्होंने मंत्रीजी के नाम से अपने विभाग के प्रमुख सचिव से ऐसी-ऐसी जानकारी मांगी, जिससे बाद में दिक्कतें पैदा हो सकती थी। सुनते हैं कि जिस अंदाज में पीए ने प्रमुख सचिव से जानकारी चाही, उससे शक पैदा हो गया। प्रमुख सचिव ने तुरंत मंत्रीजी से संपर्क साधा, और जानना चाहा कि वाकई उन्होंने इस तरह की जानकारी मांगी है? मंत्रीजी ने अनभिज्ञता जताई। पीए की इस हरकत पर मंत्रीजी, कोई कार्रवाई करते, उन्हें बचाने के लिए कई प्रभावशाली लोग आगे आ गए। फिर क्या था, पीए की कुर्सी बच गई।

क्या पैर उखड़ रहे हैं नक्सलियों के?

बस्तर में माओवादी कितने सक्रिय और ताकतवर हैं इसके लिये अगर मुठभेडों को पैमाना माना जाये तो लगातार सरकार की स्थिति सुधर रही है। सन् 2020 में कुल 84 मुठभेड़ हुईं, जो 2019 की 121 और 2018 की 166 मुठभेड़ के मुकाबले काफी कम हैं। पर ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में नई सरकार के बनने के बाद ही यह स्थिति बनी। मुठभेड़ों में कमी पिछले पांच सालों से दर्ज की जा रही है। 2016 में 211, 2017 में 198 मुठभेड़ हुईं थीं। यानि गिरावट का सिलसिला भाजपा की सरकार के रहने के दौरान ही शुरू हो चुका था।

यह कहा जाता है कि बस्तर के औद्योगिकीकरण के लिये असहमति, अधिसूचित क्षेत्रों के लिये बने कानूनों और ग्राम सभाओं की परवाह किये बिना पूर्ववर्ती सरकार के दौरान बड़ी-बड़ी परियोजनायें लाई गईं, जिसकी रफ्तार में अब कमी आई है। पर बीते एक साल से जो ख़बरें आ रही हैं, उससे भी आभास मिलता है कि नक्सली मूवमेंट कम क्यों हो रहे हैं। अक्टूबर 2019 में मारे गये एक नक्सली के पास से बरामद पत्र में खुलासा हुआ था कि सरकारी नीतियों के प्रति आदिवासियों का झुकाव बढऩे के कारण उन्हें अपना पैर जमाये रखने में दिक्कत हो रही है। बीते साल जनवरी में खबर आई थी कि नये लड़ाके नक्सली संगठनों में शामिल होने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। वे अपनी संख्या बढ़ाने के लिये हर परिवार से एक लडक़ा और 50 रुपया मांग रहे हैं। वैसे नक्सली यहां के व्यापारियों, कुछ चिन्हित विभागों और सरकारी निर्माण कार्य में लगे ठेकेदारों से आम तौर पर फंड जुटाते ही रहे हैं। पर उनके आर्थिक स्त्रोत घटे हैं।

इसके बावजूद क्या सचमुच नक्सलियों के पैर उखड़ रहे हैं? नई सरकार बनने के बाद ही भाजपा के एक विधायक भीमा मंडावी की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। बस्तर पुलिस ने बीते साल खुलासा किया था कि कम संख्या में अधिक प्रभावी हमला करने के लिये नक्सली स्नाइपर ट्रेनिंग देने की योजना पर काम कर रहे हैं। हाल ही में पुलिस द्वारा चिपकाये गये एक पर्चे को भाजपा ने मुद्दा बनाया था, जिसमें ग्रामीणों को नक्सली खतरे के चलते गांव छोड़ देने की सलाह दी गई थी।

कोदो, कुटकी के लिये एमएसपी

दिल्ली में आंदोलनरत किसानों की मांगों में तीनों कृषि कानून वापस करने के अलावा न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जामा पहनाने की मांग भी शामिल है। केन्द्र सरकार का रुख अब तक तो इस पर साफ नहीं है, सिवाय इसके कि विचार करेंगे। पर छत्तीसगढ़ सरकार ने धान पर समर्थन मूल्य के साथ राजीन किसान बोनस और कई स्थानीय फसलों, वनोपज को समर्थन मूल्य पर देने का फैसला लिया। इसी पर आगे कदम बढ़ाया गया है कोदो, सवां, ज्वार, कुटकी, बाजरा आदि का समर्थन मूल्य तय करना। छोटे किसान और जंगल में तराई में खुली जमीन पर खेती करने वाले आदिवासी इसे बड़े पैमाने पर उगाते हैं। इसमें पानी और खाद की कम जरूरत पड़ती है, लागत कम आती है। आम तौर पर कोदो, कुटकी गरीबों की ही खेती है। कोदो कुटकी पौष्टिक होने के अलावा ब्लड प्रेशर, शुगर आदि रोगों के लिये कारगर है। औषधियों में भी इसका उपयोग होता है। अभी इसका कोई दाम नहीं। व्यापारी, आढ़तियों की मनमानी चलती है। एमएसपी तय होने से किसानों को मेहनत का वाजिब भुगतान होने की संभावना बनती है। पर यहां दिक्कत यह है कि कहीं किसान जब तक खरीदी केन्द्र में अपनी उपज लायें, उसके पहले व्यापारी ही उन तक पहुंच जाये और कम दाम देकर खरीद लें। खरीदी की व्यवस्था निचले स्तर पर हो तो ही इसका लाभ उत्पादक किसानों को मिलेगा वरना आढ़तिये ही उनकी उपज लेकर खरीदी केन्द्रों में खड़े दिखेंगे।

हर सवाल का एक जवाब...

विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिये कांग्रेस वही कर रही है जो दिल्ली में बैठी भाजपा सरकार कर रही है। यानि उनके कार्यकाल का अध्याय खोलकर रख देना। पूर्व स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप ने आरोप लगाया कि आरटीई के 74 लाख रुपये गबन कर लिये गये। गरीब बच्चों की फीस की बंदरबांट कर ली गई। आरोपियों पर कार्रवाई नहीं हो रही है। टेकाम ने जवाब देते हुए कहा कि 250 करोड़ रुपये आरटीई के अब भी केन्द्र के पास रुके हुए हैं, वह राशि दिलवायें। आगे यह भी कहा कि भाजपा के समय शिक्षा और परीक्षा का क्या हाल था, सब जानते हैं। परीक्षार्थी की जगह कोई दूसरा बैठकर परीक्षा देता था। जाहिर है, यह कश्यप पर सीधे प्रहार था, क्योंकि मामला सीधे-सीधे उनसे ही सम्बन्धित था। दूसरी तरफ केदार कश्यप द्वारा उठाया गया मामला गंभीर है। जनवरी में रायपुर से रिटायर्ड हुए जिला शिक्षा अधिकारी पर आरोप है कि उन्होंने आरटीई फीस के रूप में 74 लाख ऐसी स्कूलों को लौटाये जो बंद थे। रकम भी स्कूल के खाते में नहीं, निजी एकाउन्ट में डाले गये। अब इस बहस में घोटाले पर क्या कार्रवाई हुई या होगी, लोग नहीं जान सकें।

फोटोग्राफर सत्यप्रकाश पांडेय ने देखा और लिखा-

‘बिलासपुर के पक्षियों के गाँव ‘कोपरा’ में पिछले दिनों कुछ लोग पहुंचे, चिडिय़ों के लिए महोत्सव रखा गया था। सरकारी कोशिशों के बीच पक्षियों के संरक्षण को लेकर जागरूकता की अलख जगाने के दावे किए गए। पक्षी महोत्सव का नफा-नुकसान भविष्य की तारीखें तय करेंगी, फिलहाल वन अफसर के उन दावों का सच तस्वीरें बयान कर रहीं हैं जिसमें स्वच्छता का उल्लेख था। अरे साहब। मेला, महोत्सव के बाद भी कोपरा हो आये होते। पढ़े-लिखे और जागरूकता का संदेश देने पहुंचे लोगों द्वारा छोड़ी गई हकीकत आपको भी दिखाई पड़ जाती। ये खाने के पैकेट्स और पन्नियों का कचरा जगह-जगह किसी और ने नहीं बल्कि महोत्सव में उत्सव मना रहे कुछ लोगों ने छोड़ा है।’ 

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