राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : जागो व्यापारियों जागो...
12-Mar-2021 5:46 PM (205)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : जागो व्यापारियों जागो...

जागो व्यापारियों जागो...

चेम्बर चुनाव में प्रचार के दौरान पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी, अमर पारवानी को बुरा-भला कहने में कोई मौका नहीं चूकते रहे हैं। पारवानी कभी सुंदरानी के सहयोगी थे, और बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए। पारवानी अब व्यापार जगत का बड़ा चेहरा बन गए हैं, और वे जय व्यापार पैनल के तले एकता पैनल को तगड़ी चुनौती दे रहे हैं, जिसके मुखिया श्रीचंद सुंदरानी हैं। वैसे तो पारवानी का सीधा मुकाबला योगेश अग्रवाल से है, लेकिन सुंदरानी ने चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ रखा है।

योगेश, पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई हैं। स्वाभाविक है कि प्रदेशभर में बृजमोहन समर्थकों का उन्हें साथ मिल रहा है। व्यापारियों के इस सबसे बड़े संगठन के इस चुनाव को कुछ लोग अग्रवाल वर्सेस सिंधी भी बता रहे हैं। व्यापारियों के बीच चर्चा है कि अग्रवाल, योगेश के पक्ष में, तो सिंधी वोटर पारवानी के पक्ष में लामबंद हो रहे हैं। और जब श्रीचंद सुंदरानी पहले चरण के मतदान के बीच पारवानी के साथ कानाफूसी करते नजर आए, तो एकता पैनल में हडक़ंप मच गया। वॉटसएप पर व्यापारियों की कुछ इस तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली कि जागो व्यापारियों जागो...।

बृजमोहन अग्रवाल की पैनी नजर

चेम्बर चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बड़े नेता रूचि ले रहे हैं। गुरूवार को पहले चरण के मतदान के बाद कई समीकरण बनते-बिगड़ते नजर आए। सुनते हैं कि योगेश अग्रवाल को भाजपा के जिस ताकतवर अग्रवाल नेता से भरपूर मदद की उम्मीद थी, उन्होंने अमर पारवानी का साथ दिया है। यही नहीं, दिग्गज अग्रवाल नेता के धमतरी रहवासी करीबी रिश्तेदारों ने भी पारवानी का साथ निभाया। चर्चा है कि  बृजमोहन के भाजपा में विरोधी नेता, पारवानी के पक्ष में काम कर रहे  हैं। इन सबके बाद भी पारवानी की राह आसान नहीं है, क्योंकि चुनाव पर बृजमोहन अग्रवाल की पैनी नजर है, जो कि भाजपा के सबसे सफल चुनाव संचालक माने जाते हैं। यही वजह है कि तमाम विपरीत खबरों के बाद भी योगेश अग्रवाल के समर्थक चुनाव नतीजे को लेकर आशान्वित है।

लॉकडाउन की आहट

महाराष्ट्र और देश के दूसरे राज्यों में एक बार फिर कोरोना संक्रमण बढ़ रहा है। मुम्बई, पुणे के बाद अमरावती, नागपुर क्षेत्र भी तेजी से कोरोना की चपेट में आ रहा है। अब वहां एक सप्ताह के लिये सम्पूर्ण लॉकडाउन 15 मार्च से लागू हो रहा है। पिछली बार भी महाराष्ट्र के बाद कोरोना का असर छत्तीसगढ़ में देखा गया था।

सख्ती कम होने के बाद रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव से नागपुर, मुम्बई लोगों का आना-जाना बढ़ा है। अब ट्रेनों, बसों में यातायात सामान्य दिखने लगा है। बाजारों, दफ्तरों, फैक्ट्रियों में भी भीड़ है। धार्मिक संस्थानों, स्कूलों, शादी ब्याह सबकी छूट दी जा चुकी है। जबकि गाइडलाइन का पालन सभी सार्वजनिक स्थानों पर करने की जरूरत है। रायपुर में जिला प्रशासन ने बिना मास्क पहने निकलने, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करने के साथ कोरोना की बीमारी छिपाने पर एफआईआर दर्ज कहा है।

यह तो दिख रहा है कि पूरे प्रदेश में मास्क पहनने के लिये फिर से कड़ाई बरती जा रही है। पर नये मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। अब सीमा में प्रवेश करने वालों की जांच निर्देश जारी किया गया है। इसी तरह रेलवे ने स्टेशनों पर नये सिरे से व्यवस्था की है। पर, यह सब उस गंभीरता से नहीं हो रहा है, जितना कोरोना के पहले चरण में दिखा। नये मामलों की रफ्तार यही रही तो नागपुर जैसी परिस्थितियां राजधानी रायपुर सहित दूसरे शहरों में बन सकती है।

जंगल में समृद्ध हिंदी की बयार..

आम तौर पर किसी को कोई बात समझ नहीं आती तो कहते हैं, झल्लाकर कहा जाता है हिंदी में समझाऊं क्या?  लगता है बारनयापारा में किसी अधिकारी ने अपने वन कर्मचारियों को ऐसा ही कहा होगा फिर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवा भी दिया। वैसे इसे अंग्रेजी पसंद लोग वायरलेस मॉनिटरिंग रूम भी कह देते हैं।

कर मुक्त नहीं तो, तस्कर मुक्त ही कर दें...

देवभोग इलाके में जब हीरों के अकूत भंडार का पता चला था तो पहले मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने कहा था कि छत्तीसगढ़ को देश का अकेला कर मुक्त राज्य बनाया जा सकता है। कुछ सर्वे तो यह दावा करते हैं कि यहां का हीरा पूरे देश के कर्ज को चुका सकता है। पर फिलहाल तो यह हीरा तस्करी का अड्डा बना हुआ है। इस साल जनवरी के बाद यह दूसरा मामला है जब लाखों रुपये के कीमती सैकड़ों हीरों के साथ तस्कर पकड़े गये। हर साल दो तीन तस्कर पकड़ में आ ही रहे हैं।

देवभोग का मामला इतना जटिल रहा कि लगता है कोई भी सरकार इसमें हाथ नहीं डालना चाहती। संयुक्त मध्यप्रदेश के दौर में सन् 1992 के आसपास डी बियर्स की कम्पनी को जब तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ठेका दिलवाया तो स्व. अजीत जोगी ने उन पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया और कहा कि कम्पनी के खर्च पर वे दक्षिण अफ्रीका गये। इसके बाद 1998 में डि बियर्स, रियो टिंटो, एनएमडीसी और बी. विजय कुमार ने टेंडर भरा। बी. विजय कुमार को खनन का ठेका मिलने पर भाजपा नेता रमेश बैस ने अनुबंध को ही गलत बताया और कहा कि हीरे के अलावा दूसरे बहुमूल्य खनिज निकलेंगे, उसका क्या होगा?  इसके बाद लगातार मामले टेंडर लेने वाली कम्पनियों के बीच अदालती लड़ाई चल रही है, जिसका किस्सा लम्बा है। वर्तमान में स्थिति यह है कि जो सुरक्षा के बाड़ टूटे हुए हैं। कोई भी वहां प्रवेश कर सकता है। यहां के निर्धन ग्रामीणों से बिचौलिये पत्थरों की खुदाई कराते हैं, कुछ सौ रुपये में हीरे के खंड खरीदते हैं फिर मध्यम श्रेणी के व्यापारी उसे आकर हजारों में खरीद रहे हैं और दूसरे राज्यों के हीरा व्यापारियों को लाखों रुपये में बेच रहे हैं।

मौजूदा सरकार देवभोग सहित बस्तर और रायगढ़ की संभावित हीरा खदानों को शुरू कराने, अदालतों में रुके मामलों को तेजी से निपटाने के बारे में कुछ सोच रही है या नहीं, यह पता नहीं चल रहा है। पर जब प्रदेश सरकार को अपने चुनावी वायदे पूरे करने के लिये एक के बाद एक नया कर्ज लेना पड़ रहा हो, आम लोग भी करों के बोझ से त्रस्त हों तो इस अकूत खनिज संपदा के दोहन से जुड़े मामले तेजी से निपटाना चाहिये।

यह अगर बाजार है तो...

सरकारी कामकाज की संस्कृति एक बार बिगड़ती है तो उसे कई बार निजीकरण भी नहीं सुधार पाता। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के म्युनिसिपल में स्मार्टसिटी के नाम पर आने वाले अंधाधुंध पैसों से किसी प्राइवेट एजेंसी को प्रचार-प्रसार में लगाया जाता है। करोड़ों के ऐसे प्रचार-प्रसार में खूब बर्बादी भी की जाती है। अब शहर की एक रिहायशी कॉलोनी के मैदान में पत्तों से खाद बनाने के इस प्रयोग को यह बैनर लगाकर बताया जा रहा है। अब है तो यह मैदान, और इसके आसपास भी एक पान ठेला तक नहीं है, लेकिन यहां बैनर लगा दिया गया है- जीरो वेस्ट बाजार!

मैदान और बगीचे के पत्तों से बन रही खाद जो कि बेची भी नहीं जाएगी, वहां पर किसी बाजार में लगने वाले बैनर की तर्ज पर बैनर लगा दिया गया है। खेलने आने वाले छोटे बच्चे यही नहीं समझ पाएंगे कि यह अगर बाजार है तो गोलबाजार और सदरबाजार क्या मैदान हैं?

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