राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : कलेक्टर से कोरोना खौफ खाती है?
17-Mar-2021 5:30 PM (251)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : कलेक्टर से कोरोना खौफ खाती है?

कलेक्टर से कोरोना खौफ खाती है?

प्रदेश में कल 850 से अधिक कोरोना पॉजिटिव केस आये, 12 लोगों की मौत भी 24 घंटे के भीतर हो गई। कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर केबिनेट की बैठक भी हुई है जिसमें नये सिरे से गाइडलाइन का पालन करने में सख्ती बरतने का फैसला हुआ है। सार्वजनिक स्थल पर मास्क नहीं पहनने और सोशल डिस्टेंस का पालन नहीं करने पर एफआईआर की बात हुई है। कई मंत्री, अधिकारी जो कुछ दिन पहले तक मास्क के बगैर घूमने लगे थे, वे भी अब दुबारा ठीक तरह से मास्क पहन रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच में मास्क के बगैर एंट्री भी नहीं हो रही है। मतलब, दुबारा कोरोना का प्रकोप फैलने में अपनी ओर से कोई गलती न हो इसकी कोशिश हर कोई कर रहा है।

पर एक कलेक्टर इन सबसे इत्तेफाक नहीं रखते। वे अक्सर बिना मास्क पहने हुए ही दफ्तर में बैठते हैं, दौरा करते और बैठकें लेते हैं। उन्होंने अपने जिले के करीब दो दर्जन अधिकारियों की कल बैठक ली तो सोशल डिस्टेंस उनके बीच खैर था नहीं, पर अधिकांश ने मास्क पहने थे। हमेशा की तरह कलेक्टर ने मास्क पहनने की जरूरत नहीं समझी। यह स्थिति तब है जब वे खुद एक बार कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। अभी एक और, जांजगीर-चाम्पा के कलेक्टर कोरोना के चलते होम आइसोलेशन में भी हैं। प्रदेश के कई आईएएस, आईपीएस अफसर भी कोरोना झेल चुके हैं। सरकार ने कलेक्टरों को ही जिम्मेदारी दी है कि वे जिले में कोरोना से बचाव के लिये तय की गई गाइडलाइन का पालन करायें, लेकिन जब वे खुद पहनने के लिये तैयार नहीं हैं तो उनकी अपील कौन सुनेगा?

गोबर के प्रोडक्ट कितना लाभ दिलायेंगे?

करीब सालभर पुरानी गोधन योजना के तहत प्रदेश में 324 ऐसे पशुपालक हैं जिन्हें गोबर बेचने पर एक लाख रुपये से अधिक की आमदनी हुई। इसी तरह 7 हजार से अधिक ऐसे हितग्राही हैं, जिन्हें 25 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक की आय हुई। खरीदी और भुगतान पारदर्शी हो इसके लिये गोबर बिक्री की रकम सीधे हितग्राहियों के बैंक एकाउन्ट में डाली जाती है। इस योजना की दूसरे राज्यों के बाद केन्द्र सरकार भी तारीफ कर चुकी है।

अब तक गोबर खरीदकर 80 करोड़ रुपये का भुगतान सरकार कर चुकी है। खाद, गो काष्ठ आदि बनाने वालों को भी सरकार की तरफ से ही मजदूरी भी दी जा रही है। इस भुगतान को सहायता के रूप में दिया जा रहा हो तो अलग बात है, पर देखना यह होगा कि स्व-सहाया समूह गो काष्ठ, दीये, वर्मी कम्पोस्ट, आदि बेचकर क्या इस स्थिति में आ पाते हैं कि गोबर की रकम का भुगतान सरकार को न करना पड़े। गोबर खरीदी सरकारी सहायता न होकर एक फायदेमंद कारोबार में बदल सके?

मास्क पहनकर होली कैसे?

बीते साल की होली के वक्त कोरोना का खौफ तो शुरू हो चुका था पर दूरी बनाकर रखने का नियम लागू नहीं हुआ था। इसलिये कुछ ने खौफ में तो कुछ ने बेफिक्री में होली मना ली थी। पर इस बार बड़ी अजीब स्थिति है। कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसा कोई चमत्कार हो नही सकता कि होली के पहले अचानक वह गायब हो जाये। बचने के लिये सबसे जरूरी बताया गया है मास्क लगाना और शारीरिक दूरी रखना। ठीक उल्टे, होली के लिये सबसे ज्यादा जरूरी है चेहरे पर गुलाल मलना और गले लगना। अब कोरोना से दो-दो हाथ करें या इस प्रेम, व्यवहार से बचें।

कल प्रदेशभर के प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक हुई। इसमें यह निर्देश तो दिया गया कि त्यौहार पर कोरोना से बचाव के उपायों को ढीला न होने दें। पर सीधे नहीं कहा गया कि होली न मनायें। ऐसा आदेश शायद लोगों को नाराज कर देगा। फिर भी, दूरे से रंग डालने, होलिका जलाने और फाग गाने का विकल्प तो बचा हुआ है ही। 

सरकारी घोषणाओं का फैक्ट चेक

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी सूचनाओं की बाढ़ आई हुई है। किसी नेता या दल की छवि बिगाडऩे, ऊपर उठाने के लिये पोस्ट तो की ही जाती है, लोगों को नौकरी, ऋ ण, भत्ते आदि का प्रलोभन देकर ठगी करने का मकसद भी होता है। फर्जी पोस्ट, फेक न्यूज़ की बाढ़ आने के बाद अब अनेक न्यूज पोर्टल इसके लिये अलग सेक्शन बना रखे हैं। कुछ न्यूज पोर्टल तो फैक्ट चेक का ही काम कर रहे हैं। पर इस काम में अब केन्द्र सरकार की खबर देने वाली एजेंसी पीआईबी शामिल हो गई है। ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम पर पीआईबी, फैक्टचैक या फैक ट्री के जरिये वह सरकार की छवि बिगाडऩे वाली झूठी सूचनाओं की असलियत बता रही है। इनमें कुछ ऐसे पोस्ट भी हैं, जिनमें सरकार की योजनाओं का हवाला देकर बेरोजगारों से पैसे मांगे जा रहे हैं। ऑनलाइन फास्टैग बनवाने की बात की जा रही है। कोरोना वैक्सिनेशन के लिये भ्रामक गाइडलाइन बताई जा रही है। आरटीआई से मिली सूचनाओं को तोड़-मरोडक़र डाला जा रहा है।

भले ही निजीकरण, बेरोजगारी, महंगाई, किसान आंदोलन, रेल किराया आदि के मुद्दे पर लोगों को सरकार के खिलाफ गुस्सा हो पर इसके बहाने झूठी खबरें तो लोगों को सरकार के खिलाफ और ज्यादा भडक़ायेगी। शायद, इसीलिये पीआईबी को अपने खुद का फैक्ट चैक करने के लिये कमर कसी है। 

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