राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : चेम्बर के वोटरों के लिए
20-Mar-2021 5:19 PM (200)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : चेम्बर के वोटरों के लिए

चेम्बर के वोटरों के लिए

चेम्बर चुनाव में वोटरों को रिझाने में एकता और जय व्यापार पैनल के लोगों ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। व्यापारियों के इस सबसे बड़े संगठन के प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव में राजनीतिक दलों की निगाहेें टिकी हुई है। रायपुर में सबसे आखिरी में शनिवार को मतदान हुआ। रायपुर में महासमुंद, भाटापारा, तिल्दा के व्यापारियों ने भी वोट डाले। रायपुर में सबसे ज्यादा करीब 9 हजार वोटर हैं।

जय व्यापार और एकता पैनल के समर्थकों ने व्यापारियों के लिए खाने-पीने के खास इंतजाम किए गए थे। पिछले 15 दिन से देवेन्द्र नगर के एक भवन में पापड़-पानी का दौर चल रहा था। मतदान से पहले शौकीन व्यापारियों के लिए ठंडी बियर की व्यवस्था की गई थी। कुल 17 हजार वोटरों पर प्रत्याशियों ने कुल मिलाकर एक करोड़ से अधिक खर्च किए हैं। इतना सबकुछ करने के बाद व्यापारी किसके साथ हैं, यह रविवार को पता चलेगा।

सुंदरानी, बृजमोहन साथ-साथ

चेम्बर चुनाव में पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दिया है। वे चुनाव प्रचार के दौरान खुले तौर पर यह बात कहते भी रहे हैं। वैसे तो एकता पैनल के अध्यक्ष प्रत्याशी योगेश अग्रवाल, पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई हैं। खुद बृजमोहन और उनके समर्थक, योगेश के लिए लॉबिंग कर रहे हैं। ऐसे में सुंदरानी  को अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाना किसी को हजम नहीं हो रहा है।

सुंदरानी व्यापारियों के सबसे बड़े नेता रहे हैं, और इस वजह से भाजपा ने उन्हें टिकट दी, और विधायक भी बने। चेम्बर में सबसे ज्यादा सिंधी समाज के वोटर हैं, जो कि सुंदरानी के साथ रहे हैं, और यही उनकी ताकत भी रही है। मगर इस चुनाव में सुंदरानी की अपील के बावजूद सिंधी समाज के वोटर का झुकाव साफ तौर पर योगेश के प्रतिद्वंदी अमर पारवानी की तरफ देखने को मिला है। ऐसे में यह संदेश जा रहा है कि सुंदरानी की सिंधी समाज में पकड़ पहले जैसी नहीं रही।  अब चुनाव नतीजों का बेसब्री से इंतजार है, जो कि कम से कम सुंदरानी का राजनीतिक भविष्य भी तय कर सकता है। फिलहाल तो लोग कयास ही लगा रहे हैं।

गणेश जी अपने हिस्से की फसल खा गये...

हाथी, जिसे हम गजराज, हतिन, हत्ती, गज, नाग आदि कई नामों से जानते हैं, का दुनियाभर में अलग-अलग धर्मों, विश्वासों के लोग पूजते, आदर करते हैं। अपने देश में वैदिक काल से ही हाथियों का विशेष स्थान है। गणेश जी को उनका ही स्वरूप माना जाता है, जिसे हम प्रथम पूज्य देव भी कहते हैं।

अपने छत्तीसगढ़ के दो चार जिलों को छोड़ दें तो कहीं कम, कहीं कुछ ज्यादा हाथियों की आवाजाही से आये दिन नुकसान होता है। फसलों, घरों को ही नहीं जान-माल को भी क्षति पहुंचती है। वन विभाग इन्हें मुआवजा भी देता है। पर, जांजगीर जिले में अनोखी घटना हुई। सारंगढ़, महासमुंद के रास्ते से दो हाथियों का एक छोटा दल मरघट्टी, देवगांव, बरपाली गांवों में दो दिन तक स्वच्छंद घूमता रहा। कई घरों की मिट्टी की दीवार गिरा दी। दर्जनों लोगों की फसल चौपट की और आगे बढ़ गये।

वन विभाग खबर मिलने पर मुआवजे का प्रकरण बनाने पहुंचा। ग्रामीणों ने नुकसान बताने से मना कर दिया। कहा- गणेश भगवान बड़े दिनों बाद दर्शन देने आये थे। अपनी जरूरत का प्रसाद ग्रहण किया और आगे बढ़ गये। इस बात का हम हर्जाना क्यों लें?,  एक रुपया नहीं लेंगे। 

मगर, वन विभाग के वहां पहुंचे अधिकारी कर्मचारी परेशान हुए, बाद में मुआवजा नहीं देने का आरोप उन पर लगेगा। तब सरपंच ने लिखकर दे दिया कि हम मुआवजा लेने से इंकार करते हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने लिखित सहमति मिलने के बाद राहत की सांस ली।

एलिफेंट कॉरिडोर तो बन नहीं रहा, हाथियों के इलाके में खनिज दोहन रुक नहीं रहा। पानी के स्त्रोत सूख रहे हैं। उनके जंगल उजड़ रहे हैं। इसलिये निकट भविष्य में समस्या का समाधान तो दिखता है नहीं। इन सबको देखते हुए आशंका है कि कहीं वन विभाग प्रदेश के दूसरे इलाकों में हाथियों से प्रभावित लोगों को जांजगीर के ग्रामीणों की आस्था से प्रेरणा लेने की सलाह न देने लगें।

पीएससी मॉडल आंसर का विशेषज्ञ कौन?

भाजपा शासनकाल में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने जितनी परीक्षायें लीं, कोई बिना विवाद के नहीं थी। कुछ के प्रकरण अब भी कोर्ट में हैं। इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस शासन के दौर में भी यह ढर्रा चलने दिया जाये। कुछ ऐसा ही तय करके भारतीय जनता पार्टी की युवा इकाई ने गुरुवार से प्रदेशभर में पीएससी की हाल ही में हुई प्रारंभिक परीक्षा के मॉडल आंसर में गड़बड़ी को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया है। यह अभी मंडल, जिला स्तर पर है जो बाद में राजधानी और पीएससी दफ्तर का घेराव करने तक चलेगा। आंदोलनकारी भाजयुमो ने अनेक मांगें रखी हैं, जिनमें से एक यह भी है कि उस विशेषज्ञ का नाम उजागर किया जाये जिसने मॉडल आंसर में बताया है कि छत्तीसगढ़ में मॉनसून की वर्षा दक्षिण पूर्व की हवाओं से होती है। यह मांग जायज तो लगती है क्योंकि स्कूल के दिनों से ही छात्रों को पता है कि दक्षिण-पश्चिमी हवाओं से छत्तीसगढ़ में मॉनसून आता है, पूर्वी हवाओं से नहीं।

पीएससी प्रारंभिक में एक लाख से भी अधिक छात्र शामिल हुए थे। रिक्त पदों से 10 गुना अधिक लोगों को मुख्य परीक्षा में शामिल होने की अनुमति मिल रही है। जाहिर है, बहुत से ऐसे छात्र होंगे जो इस एक सवाल की वजह से मुख्य परीक्षा की दौड़ से बाहर हो गये हों।

इधर, सीजीपीएससी ने पिछले अनुभवों को देखते हुए हाईकोर्ट में केवियेट दायर कर रखा है। यानि कोई भी परिणामों को चुनौती देकर आगे की प्रक्रिया पर जल्दी रोक नहीं लगवा पायेगा। विशेषज का नाम फिलहाल तो पीएससी के अफसर उजागर कर नहीं रहे हैं, शायद कोर्ट में सुनवाई हो तो सामने आये।

गरीबों का धंधा फिर चौपट

रंग, गुलाल, पिचकारी, मुखौटे, बताशे, ठंडाई सब आम लोगों की पहुंच के भीतर होती है। शहर कस्बों में सडक़ किनारे सैकड़ों अस्थायी वेन्डर होली पर काफी कमाई कर लेते हैं। इसके अलावा नगाड़ा बजाने, फाग गाने वाले लोक कलाकार इस मौके पर कुछ जोड़ लेने की उम्मीद करते हैं। इस बार कोरोना ने तो उनकी होली रंगीन करने के बजाय, पानी फेर दिया। प्रशासन का निर्देश भी है लोग सतर्क भी। सार्वजनिक रूप से होली खेलने लोग कम निकलेंगे और बाजार में छोटी दुकानें सजाने वालों के सामान कम बिकेंगे। खबर तो यह है कि कुछ थोक व्यापारियों ने जनवरी फरवरी में ऑर्डर दिया था तब वे उम्मीद में थे कि कोरोना की परछाई होली पर नहीं पड़ेगी। उनके सामान का उठाव भी इस बार कम है।

पिछले साल जब कोरोना का लॉकडाउन शुरू हुआ तो डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कमाई कई गुना बढ़ी। इस बार भी कुछ ऐसा हो तो आश्चर्य नहीं। बहुत से लोग वाट्सएप ही होली खेलेंगे।

ट्रैफिक पुलिस का हमला भी छोटों पर...

कारों से एक चौथाई दाम वाली मोटरसाइकिलों की नंबरप्लेट को लेकर आए दिन सडक़ों पर चालान होते दिखते हैं। लेकिन ट्रकों और बसों जैसी बड़ी गाडिय़ों, रेत-गिट्टी ले जाने वाली बड़ी-बड़ी डम्परों की नंबरप्लेट या तो गायब रहती है, या उनके पीछे लोहे की जाली लगाकर उन्हें छुपा दिया जाता है, और उनका कोई चालान नहीं होता जबकि ये गाडिय़ां मोटरसाइकिलों के मुकाबले सौ गुना अधिक जानलेवा होती हैं, और सौ गुना अधिक सफर करती हैं।

अब लोगों को गाडिय़ों के आगे-पीछे गार्ड लगाने का ऐसा शौक रहता है कि कोई आकर टक्कर मारे तो भी गाड़ी का कोई नुकसान न हों। यह अलग बात है कि केन्द्र सरकार ने नियम लागू करके बड़ी गाडिय़ों के आगे-पीछे ऐसे गार्ड लगाने पर रोक लगा रखी है क्योंकि ये अगर टक्कर झेल लेते हैं तो गाड़ी के मुसाफिरों को बचाने के लिए लगाए गए एयरबैग नहीं खुलते हैं। एयरबैग तभी खुलते हैं जब गाड़ी को टक्कर लगे, और जब सीट बेल्ट लगे हुए हों। ऐसे में नंबरप्लेट को छुपाने वाले गार्ड चाहे आगे लगे हों, चाहे पीछे, वे कई तरह के नियम तोड़ते हैं। राजधानी रायपुर की यह गाड़ी एक मिसाल है कि ट्रैफिक पुलिस के चालान का हमला भी छोटे लोगों पर अधिक होता है, और कार वालों पर तकरीबन होता ही नहीं है।

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