राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : क्या फिर खाली रह जायेंगे रेलवे के बेड?
20-Apr-2021 6:32 PM (207)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : क्या फिर खाली रह जायेंगे रेलवे के बेड?

क्या फिर खाली रह जायेंगे रेलवे के बेड?

रेलवे ने बीते साल कोरोना का प्रकोप बढऩे पर बोगियों में आइसोलेशन बेड बनाये। बिलासपुर व रायपुर में 52 बोगियों को इसके लिये तैयार किया गया, जिनमें 400 से अधिक बेड उसी समय से बनकर तैयार हैं। रेलवे को राज्य सरकार से शिकायत थी कि हमारे परिवर्तित बोगियां स्टेशनों पर खड़ी हैं पर उनका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। अब इस दूसरी लहर में इतने मरीज आ रहे हैं कि रेलवे की इन बोगियों की जरूरत पडऩे लगी है। कांग्रेस नेताओं ने इसके लिये रेलवे के अधिकारियों से बात की, उन्होंने कोच का निरीक्षण भी किया। बिस्तर तो लगे हुए हैं। एयर कंडीशन्स भी चालू किये जा सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या आ गई है, कोविड मरीजों के देखभाल की। रेलवे ने कहा है कि हम डॉक्टर, तकनीशियन, नर्सिंग स्टाफ नहीं दे सकते। ऑक्सीजन और वेंटिलेटर तो है ही नहीं।

समस्या तो राज्य सरकार के पास भी यही है। जिस रफ्तार से नये केस रोजाना बढ़ रहे हैं आने वाले दिनों में और भी बहुत से डॉक्टर, नर्सिंग और साफ-सफाई के स्टाफ की जरूरत पड़ेगी। राज्य सरकार अपने साधनों से हॉस्टल, सार्वजनिक भवनों में बेड बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जिनका इस्तेमाल करना रेलवे की बोगियों के मुकाबले ज्यादा आसान होगा। क्या एक बार फिर रेलवे की आइसोलेशन बोगियों का इस्तेमाल नहीं हो पायेगा? यह तय होगा आने वाले दिनों में महामारी कितने और लोगों को अपने चपेट में लेती है।

अस्पताल की आग ठंडी हो गई? 

पुलिस किसी मामले में तत्परता से कार्रवाई करती है तो इसे प्रचारित भी किया जाता है। हत्या, चोरी, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ के मामले में पुलिस के हाथ आरोपी तुरंत लग जाये तो उसे वह अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करती है, पर जिन घटनाओं में लोगों की अपेक्षा होती है कि तुरंत कार्रवाई हो वहां ऐसा नहीं दिखता। राजधानी अस्पताल में हुई आगजनी को ही मामले में देख लें। पुलिस ठोस कार्रवाई में कितने सारे रोड़े बता रही है। जैसे वह प्रत्यक्षदर्शियों का बयान नहीं ले पाई है। बिजली विभाग, स्वास्थ्य विभाग, फायर सेफ्टी विभाग का प्रतिवेदन, अस्पताल को मिली कोरोना इलाज की अनुमति, मरीजों की निर्धारित क्षमता जैसी कितनी ही रिपोर्ट चाहिये जो तय करेंगे संचालकों पर कार्रवाई किस हद तक की जाये। पर आम लोगों की आखों के सामने वो निर्दोष आधा दर्जन लोगों की मौत झूल रही है।

यह सही है कोविड से लडऩे के लिये विषम परिस्थितियों में अस्पताल, डॉक्टर्स और अधीनस्थ कर्मचारी दिन रात विषम परिस्थिति में भारी दबाव के बीच काम कर रहे हैं। पर इन्हीं में से कुछ के खिलाफ गंभीर शिकायतें भी हैं। रेमडेसिविर की कालाबाजारी करते हुए पकड़े गये आरोपियों पर भी पुलिस की नरमी ही दिखी। क्या यह ऊपर से कोई आदेश है कि चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगों के खिलाफ शिकायत आने पर सिर्फ कार्रवाई करते दिखा जाये पर कोई कड़ा एक्शन न लिया जाये?

और ये मौतें कोरोना से नहीं हुई..

यूपी एक चिमनी भ_े में में काम करने वाले छत्तीसगढ़ के एक मजदूर की एक ट्रैक्टर की चपेट में आने से मौत हो गई। शव को उसके गांव रानी झिरिया लाने के लिये एक एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई। पर एम्बुलेंस चालक रात को दो बजे गढ़वा (झारखंड) जिले के चिनिया थाना क्षेत्र में शव उतारकर भाग गया। साथ आ रहे लोगों को भी उतार दिया और कहा कि वह डीजल भरवाकर आ रहा है। घंटों पुलिस के आने तक वह शव वहीं पड़ा रहा। शव को गांव भिजवाने के बाद अब कानूनी कार्रवाई के लिये पुलिस एम्बुलेंस चालक की तलाश कर रही है।

दूसरी घटना तो बिलासपुर की ही है। कल एक 72 साल के वृद्ध की सामान्य मौत घर पर हो गई। उसके घर के लोग उन्हें बीमारी की अवस्था में ही छोडक़र दूसरे घर चले गये थे। पास-पड़ोस के लोग भी उसके अंतिम संस्कार के लिये नहीं निकल रहे थे। किसी ने इसकी जानकारी महापौर रामशरण यादव तक पहुंचा दी। महापौर ने उनके रिश्तेदारों को फोन कर बताया और दाह संस्कार करने कहा, कोई नहीं पहुंचा। तब लॉकडाउन के बीच बांस, कफन की व्यवस्था की गई और दाह संस्कार किया गया। चार कांधे देने वाले बड़ी मुश्किल से जुटे, जिनमें एक खुद महापौर थे।

ये दोनों मौतें कोरोना से नहीं थी, पर इन दिनों इससे होने वाली मौतें शायद समाज को यह पाठ भी सिखा रही है कि शवों के साथ भी कितना अमानवीय बर्ताव किया जा सकता है। 

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