राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : संचार विभाग की सम्भावना
12-May-2021 5:34 PM (122)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : संचार विभाग की सम्भावना

संचार विभाग की सम्भावना

वैसे तो कोरोना संक्रमण की वजह से निगम-मंडलों में नियुक्तियों पर कोई बात नहीं कर रहा है। फिर भी कांग्रेस हल्कों में यह चर्चा है कि संचार विभाग से शायद ही अब किसी को लालबत्ती मिले। वर्तमान में संचार विभाग से शैलेष नितिन त्रिवेदी, राजेन्द्र तिवारी, किरणमयी नायक, सुरेन्द्र शर्मा, महेन्द्र छाबड़ा लालबत्तीधारी हैं।

संचार विभाग के सदस्य रमेश वल्र्यानी, सुशील आनंद शुक्ला, आर पी सिंह, और घनश्याम राजू तिवारी सहित कई और नेता निगम-मंडल में पद की आस में हैं। इन सभी को अगली सूची का इंतजार है। मगर इन सबकी इच्छा पूरी हो पाएगी, इसमें कुछ लोग संदेह जता रहे हैं। संदेह की वजह यह है कि पिछले दिनों सीएम भूपेश बघेल, संचार विभाग के सदस्यों के साथ वर्चुअल बैठक की, इसमें उन्होंने कोरोना को लेकर हमलावर हो रही भाजपा का पुख्ता जवाब देने की सलाह दी।

चर्चा के दौरान कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कुछ दिक्कतें भी गिना दी, और यह भी कहा कि उन्हें सरकार से समय पर आंकड़े नहीं मिल पा रहे हैं। एक ने तो आगे बढक़र कोरोना प्रबंधन में सरकारी प्रयासों की सराहना की, और सीएम से क्षमायाचना कर विपक्ष का पुरजोर तरीके से जवाब देने का भरोसा दिलाया। सब कुछ बढिय़ा चल रहा था कि एक ने मौका पाकर प्रवक्ताओं के लिए लैपटॉप की मांग कर दी, ताकि कामकाज बेहतर ढंग से हो सके।

इस पर सीएम ने भी तुरंत हामी भर दी, और शैलेष को सभी प्रवक्ताओं को लैपटॉप उपलब्ध कराने के लिए कह दिया। अब लालबत्ती की लाइन में लगे प्रवक्ताओं को संदेह है कि लैपटॉप की मांग पूरी होने के बाद लालबत्ती शायद ही मिलेगी। बाकी लोग संचार विभाग के सदस्य को कोस रहे हैं, जिसने लैपटॉप की मांग की थी। नाराज सदस्यों का कहना था कि निगम-मंडल पद मिल जाता, तो दूसरे को लैपटॉप गिफ्ट कर सकते थे। अब लैपटॉप मांग पूरी हो गई है, तो पद की गुंजाइश कम हो जाती है।

वन ग्रामों तक पहुंचा कोरोना

कोरोना संक्रण अब वन ग्रामों तक पहुंच गया है। बारनवापारा अभ्यारण्य के कर्मचारी और ग्रामवासियों समेत कुल 70 लोगों के पॉजिटिव होने की खबर है। यही नहीं, सीतानदी अभ्यारण्य के गांव देवपुर, जहां 20-25 घर हैं। गांव में रहने वाला हरेक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव है।

दंतेवाड़ा, और सुकमा के नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर नक्सली भी पॉजिटिव हो गए हैं। इनमें से कई की मृत्यु भी हो चुकी है। कोरोना से नक्सल पस्त हो रहे हैं। सुरक्षाबलों के लिए राहत की खबर तो है, लेकिन गांव वाले भी संक्रमित हो रहे हैं। यह चिंता का विषय बना हुआ है।

एकदम से बदले सुर

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के संचार विभाग में आपसी खींचतान किसी से छिपी नहीं है। पार्टी के कई नेता एक व्यक्ति एक पद का राग अलाप रहे हैं। हालांकि वरिष्ठ नेताओं पर इसका कोई असर होता नहीं दिख रहा है, फिर कांग्रेस कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती को मूल मंत्र मानकर प्रयास कर रहे हैं। संचार विभाग के कुछ सदस्य अच्छे-बुरे दोनों वक्त में कोशिश करने से पीछे नहीं हटते। अब देखिए जब संचार विभाग के एक वरिष्ठ सदस्य और बड़े निगम के पदाधिकारी कोरोना से संक्रमित हुए तो दूसरे एक सदस्य ने उनकी तारीफों के पुल बांधना शुरु कर दिया। इतना ही नहीं लंबा-चौड़ा प्रेस नोट तक जारी कर दिया कि संक्रमित होने के बावजूद वे दो-दो लड़ाई एक साथ लड़ रहे हैं। कोरोना के साथ-साथ केन्द्र सरकार और राज्य के विपक्षी नेताओं के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि यह बात जगजाहिर है कि इन दोनों नेताओं की आपस में पटती नहीं। दोनों एक-दूसरे की शिकायतें भी करते रहते हैं। ऐसे में इस जूनियर सदस्य ने मोर्चा खोलने का नया तरीका निकाल लिया है। जिसमें वे वरिष्ठ सदस्य की खूब तारीफ करते हैं और बकायदा मीडिया को बयान भी जारी करते हैं। ऐसा करने के पीछे उनकी रणनीति है कि कोई कह नहीं सकेगा कि वरिष्ठ सदस्य से मतभेद हैं। कांग्रेस के संचार विभाग में यह रणनीति कितनी काम आती है यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन कांग्रेसी आपस में ही काना-फूसी करते हैं कि जूनियर सदस्य के सुर एकदम से बदल गए हैं।

हम तो उसमें मगन जिसमें लगी है लगन

छत्तीसगढ़ में कोराना के बाद शराब दूसरा हॉट टॉपिक बना हुआ है। शराब की ऑनलाइन बिक्री शुरु होने के बाद विपक्ष को राज्य सरकार को घेरने का मौका मिल गया। शराब के मुद्दे पर विपक्षी दल इस कारण भी सरकार के खिलाफ मुखर रहते है, क्योंकि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में शराबबंदी का वादा किया था। ऐसे में लॉकडाउन में शराब बिक्री  गाहे-बगाहे सरकार के खिलाफ आक्रमक हथियार के रुप में इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा नहीं है कि शराब केवल छत्तीसगढ़ में ही बिक रही है। दूसरे राज्यों में भी बिक्री शुरु हो गई है। कई राज्यों ने बकायदा दुकानें खोल दी गई है, लेकिन वहां विपक्ष के लिए उतना बड़ा मुद्दा नहीं हो पाता, जितना बड़ा यहां है। जबकि हर बार यहां ऑनलाइन बिक्री से शराब की बिक्री होती है, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो। यहां तक दूसरे राज्यों में शराब दुकानों की भीड़ की तस्वीरें देखने को मिलती है, पर वहां पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं होने के आरोप लगते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं ने दूसरे और खासतौर पर बीजेपी शासित राज्यों की शराब दुकानों में लगने वाली भीड़ को विपक्ष को जवाब देने के लिए हथियार बनाने का फैसला लिया है। इसी कड़ी में राज्य कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में शराब दुकानों में भीड़ को सोशल मीडिया पर साझा कर राज्य और केन्द्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा है। कुल मिलाकर मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप के लिए दोनों पार्टियों के पास पर्याप्त दलीलें है। यह भी साफ दिखाई पड़ रहा है कि फिलहाल राज्य में शराबबंदी के कोई आसार नहीं है, क्योंकि शराब को लेकर सरकारों के मोह के बारे में किसी से कुछ छिपा नहीं है। राजनीति से जुड़े कुछ लोग तो वो दौर को भी याद करते हैं, जब पिछले विधानसभा चुनाव के समय रमन सरकार ने शराबबंदी की ओर कदम बढ़ाने की कोशिश की थी और चुनाव आते-आते शराबबंदी करने का बड़ा फैसला लेने की तैयारी में थी, लेकिन लॉबी-ब्यूरोक्रेसी के दबाव में यह फैसला टल गया। ऐसे में यह बात में समझ लेनी चाहिए कि चुनावी वायदे सरकार बनने और बनाने तक ज्यादा जोर-शोर से उठते हैं, उसके बाद उस पर फैसला इतना आसान नहीं होता। खैर, इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच उन मदिरा प्रेमियों को तो राहत मिल गई जो इसके इंतजार में बैठे थे। उन्हें सियासी दांव-पेंच से कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि उनकी चिंता उस समय बढ़ गई थी, जब साइट क्रैश होने की वजह से ऑर्डर नहीं कर पा रहे थे। इसलिए तो कहा जाता है कि कोई काहु में मगन, हम तो उसमें मगन जिसमें लगी है लगन। 

आबकारी पोर्टल ने जवाब क्यों दे दिया?

जिस जोर शोर से शराब की ऑनलाइन बुकिंग शुरू हुई और बड़े पैमाने पर आर्डर किए गए उससे स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन का पोर्टल ही बैठ गया। शराब के शौकीनों की बड़ी बदनामी हुई। इतने उतावले थे कि ऑर्डर पर ऑर्डर करते गये, सब्र नहीं था, थोड़ा रुक जाते। पर इस ट्रैफिक जाम में बेचारे पीने वालों की अकेले गलती नहीं थी। खबर आई है कि आबकारी के कर्मचारियों, सेल्स मैन, सुपरवाइजर आदि ने भी मोर्चा संभाल लिया था। उन्होंने मीडियम रेंज की पापुलर ब्रांड, जिसकी ज्यादा मांग होती है, फटाफट उसकी बुकिंग कर डाली। अलग-अलग नामों और दुकानों से। एक बार में पांच लीटर तक की सप्लाई हो सकती है इसलिये अच्छा खासा माल इक_ा हो गया। और जब दोपहर बाद पोर्टल में स्टाक खत्म बताया जाने लगा तब उनका अपना खेल शुरू हुआ। सीधे दुकान के आसपास ज्यादा कीमत पर हाथों-हाथ शराब बेची गई। बता रहे हैं कि कमाई का यह सिलसिला कम से कम एक हफ्ते तक तो बंद नहीं होने वाला है।

आप चाहें तो उन्हें लताड़ सकते हैं पर जब जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे लोगों के लिये रेमडेसिविर और ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी करने से लोग बाज नहीं आ रहे हों तो सोचिये, इन्होंने क्या उनसे ज्यादा बुरा किया?

कोरोना की चपेट में नक्सली

पालनार के जंगलों में बस्तर पुलिस को एक मुठभेड़ के दौरान मिली एक चि_ी से पता चलता है कि कुछ नक्सली कैंपों में कोरोना फैला हुआ है। कुछ की मौत हो गई और दर्जनों संक्रमित हैं। इसके चलते बहुत से लोग दस्ते को छोडक़र भी जा रहे हैं। पुलिस अधिकारियों ने ऑफर दिया है कि नक्सली हथियार डालकर सामने आयें। उन्हें डॉक्टर व चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जायेगी। मानवीय आधार पर पुलिस का प्रस्ताव तो ठीक है पर क्या नक्सली इसके लिये राजी होंगे?  आमने-सामने मुठभेड़ के दौरान एक झटके में गोलियां खाकर ढेर होना एक बात है और महामारी की वेदना सहते हुए धीरे-धीरे मौत के मुंह में जाना अलग बात। पर सवाल यह है कि शहरों से, सीमाओं से परे सारे साधन, सुविधायें नक्सलियों तक पहुंच जाती हैं। क्या कोरोना से बचने की दवाईयां और मेडिकल उपकरण भी उन तक भी पहुंच पाएंगे?  ऐसा लगता है कि पुलिस और सरकार से मदद लेने की बात तो वे जल्दी नहीं सोचेंगे।

झोलाछाप डॉक्टरों की अहमियत...

मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र से आने वाले विधायक विपिन वानखेड़े ने वहां के कलेक्टर को लिखी चि_ी में कहा है कि झोलाछाप डॉक्टरों को कोरोना बीमारी के इलाज के लिए प्रशिक्षण दिया जाए। तर्क दिया है कि गांवों में कोरोना के इलाज को लेकर काफी दहशत है। डर के कारण ग्रामीण जिला अस्पताल नहीं पहुंच रहे हैं। झोलाछाप डॉक्टरों ही ग्रामीओं को भरोसा है। इनको कोरोना के इलाज की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। इनके साथ पटवारी, पंचायत सचिव या दूसरे कर्मचारियों की ड्यूटी लगा दें।

इधर अपने छत्तीसगढ़ में भी झोलाछाप डॉक्टरों की अहमियत मध्यप्रदेश से कम नहीं है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो लोग टीका लगवाने से मना कर रहे हैं वे कह रहे हैं कि कोरोना पकड़ेगा तो झोलाछाप डॉक्टर से दवा, इंजेक्शन ले लेंगे। टीका लगवाने के लिये ग्रामीणों को तैयार करना अफसरों के लिये मुश्किल होता जा रहा है। अफवाहें गांवों में फैलती जा रही है। कई गांवों में लोग न पुलिस की सुन रहे, न तहसीलदार, न ही कलेक्टर की। इस स्थिति से निपटने के लिये मालवा के विधायक के सुझाव में क्या अपने यहां भी कोई संभावना दिख रही है?  

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