राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : गणेश शंकर मिश्रा की अगली मुहिम
12-Aug-2021 5:47 PM (630)
छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : गणेश शंकर मिश्रा की अगली मुहिम

गणेश शंकर मिश्रा की अगली मुहिम

केन्द्रीय भाजपा दफ्तर में छत्तीसगढ़ प्रभारी डी पुरंदेश्वरी से मिलने पहुंचे पार्टी नेता उस वक्त चकित रह गए, जब वेटिंग रूम में रिटायर्ड आईएएस गणेश शंकर मिश्रा प्रभारी से मिलने अपनी बारी का इंतजार करते दिखे। बताते हैं कि मिश्रा, पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं से मेल मुलाकात के लिए दिल्ली में डटे हैं। उनकी कई और अन्य नेताओं से मुलाकात भी हुई है।

चर्चा है कि मिश्राजी, तामझाम के साथ भाजपा जाइन करना चाहते हैं। वैसे तो कुछ माह पहले ही पार्टी ने उन्हें प्रदेश की पर्यावरण समिति के संयोजक की जिम्मेदारी सौंप दी थी। मगर हमेशा सुर्खियों में रहने वाले गणेश शंकर मिश्रा की सक्रिय राजनीति में प्रवेश की चर्चा मीडिया में नहीं हो पाई। राजनीति में सफल होने के लिए सुर्खियों में रहना जरूरी है। और मिश्राजी इसी कोशिश में लगे हैं।

बदले-बदले से नजर आते हैं सरकार

एनडीए-टू में भाजपा सांसदों का हाल काफी बुरा है। हाईकमान ने सांसदों को पद के लिए लिखित में अनुशंसा करने तक से रोक रखा है।  दो साल की सांसद निधि तो कोरोना के चक्कर में नहीं मिल पाई। प्रदेश  के भाजपा सांसदों का हाल इससे अलग नहीं है। गुहा राम अजगल्ले को छोडक़र बाकी सभी नए हैं।

प्रदेश के सांसदों के लिए सुविधाजनक बात यह है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा व्यक्तिगत रूप से सभी को जानते हैं। नड्डा छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं। मगर उनसे भी मुलाकात  हो पाना आसान नहीं है। एक सांसद कुछ महीना पहले उनसे मिलने के लिए घर चले गए थे। नड्डाजी फुर्सत में भी थे, लेकिन उन्होंने पीए के जरिए कहलवा भेजा कि अभी मुलाकात नहीं हो पाएगी। जब कभी मिलना हो, तो पहले समय लेकर आएं।

नए नवेले मंत्री अश्विनी वैष्णव तो घर में किसी से मुलाकात ही नहीं करते हैं। प्रदेश के सांसदों ने उनसे मिलने की कोशिश की, तो कहलवा भेजा कि ऑफिस में ही मिल सकेंगे। इसके लिए पहले से ही समय लेना होगा। पहली बार के मंत्री के तेवर देखकर सांसद भी चकित हैं।

हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे पर कांग्रेसियों की चिंता

आजकल चुनावों में हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा खूब उछलता है। माना जाता है कि बीजेपी के लिए यह ऑल टाइम फेवरेट और हॉट इश्यू रहता है। इस मुद्दे से बीजेपी को चुनावों में सफलता भी मिलती है। बीजेपी बड़ी आसानी से कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाकर हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करने में सफल हो जाती है। छत्तीसगढ़ की सियासत में भी अब हिन्दू-मुस्लिम का एंगल दिखाई देने लगा है और कांग्रेस के विधायक इस मुद्दे को लेकर अभी से चिंतित नजर आ रहे हैं। दरअसल, कांग्रेस के नेताजी निकाय में बड़े पदाधिकारी हैं और उनकी नजर रायपुर की विधानसभा सीट पर भी है। ऐसे में वे अपने लिए माहौल बना रहे हैं, साथ ही अपने समाज के लोगों को रायपुर की चारों सीटों के अलग-अलग इलाकों में स्थापित कर रहे हैं, ताकि उनकी दावेदारी मजबूत हो सके और चुनावी लाभ मिल सके। उनके इस सियासी जोड़-तोड़ से मौजूदा विधायकों पर टिकट कटने और वोटों का समीकरण गड़बड़ाने का खतरा मंडरा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस बीजेपी के इस मुद्दे पर अपने ही लोगों के कारण घिरती नजर आ रही है।

कलेक्टर साहब की बैलेसिंग इमेज

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के सीएम बनने के बाद छत्तीसगढिय़ा वाद की खूब हवा चली है। स्थानीय तीज-त्यौहार धूमधाम से मनाए जाने के सरकारी निर्देश हैं। हरेली, तीजा-पोला जैसे त्यौहार और गेड़ी-भौंरा जैसे खेल पापुलर हो रहे हैं। पिछले दिनों सरकारी निर्देशानुसार राजधानी सहित जिलों में हरेली की धूम देखने को मिली। हरेली के दिन खेती-किसानी के औजारों की पूजा के साथ गेड़ी चढऩे का चलन हैं। भूपेश बघेल गेड़ी चढऩे और पारंपरिक खेलों में काफी सहज है और वे गेड़ी का खूब आनंद लेते हैं, लेकिन नए और शहरी वातावरण में पले-बढ़े लोगों के लिए गेड़ी चढऩा किसी करतब से कम नहीं है। बिना प्रैक्टिस के गेड़ी पर बैलेंस बनाना मुश्किल के साथ रिस्की भी है। पिछले दो-ढाई बरस से इन पारंपरिक खेलों को देख रहे अफसर और जनप्रतिनिधि थोड़े तो फ्रेंडली हुए हैं और वे गेड़ी चढऩे की कोशिश करते हैं। रायपुर के कलेक्टर सौरभ कुमार की भी गेड़ी चढऩे की तस्वीर सामने आई। हालांकि वे अभी पूरी तरह से पारंगत नहीं हुए हैं, लेकिन लोगों को भरोसा है कि जिस तरह वे रायपुर नगर निगम के कमिश्नर के रुप में बैलेंस बनाकर राजधानी रायपुर की कलेक्टरी तक पहुंचे हैं, उसी तरह वे गेड़ी में भी बैलेंस बनाकर चलने में पारंगत हो जाएंगे।

ऊपरवाले का सैटेलाईट

किसी शहर की असली संस्कृति देखनी हो तो वह वहां के संग्रहालय में, किसी कला दीर्घा में, या किसी मॉल में देखने नहीं मिल सकती। असली संस्कृति शहर के आम फुटपाथों  पर, बाजारों में देखने मिलती है, जहां यह समझ पड़ता है कि लोग कितने साफ-सुथरे हैं, कितने सलीकेदार हैं। सरकारी खर्च से कंक्रीट की सडक़ें तो बन जाती हैं, लेकिन उन सडक़ों के किनारे कचरा डालने की जगह रहने पर भी खाए हुए केले के छिलके जिस तरह सडक़ के बीच उछाले जाते हैं, उससे शहर की संस्कृति दिखती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हर रोज दर्जनों लोगों के हाथ-पांव टूटते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे रहते हैं जो इस तरह फेंके गए केले के छिलकों पर पिछड़ फिसल कर अपनी हड्डियां तुड़वा  बैठते हैं, लेकिन बहुत से ऐसे रहते हैं जिन्होंने पिछले कुछ दिनों में ही इसी तरह कहीं केले का छिलका फेंका था, और उसके एवज में कुदरत ने उन्हें कहीं दूसरी जगह पटक मारा। सब कुछ हिसाब इसी धरती पर चुकता करना रहता है, केले का छिलका लापरवाही से सडक़ के बीच फेंक कर दूसरों को खतरे में डालने वाले लोग जरूरी नहीं है कि खुद केले के छिलके से ही अपनी हड्डियां तुड़वाएं, किसी और तरह के हादसे में किसी और तरह से फिसलकर भी उनकी कमर टूटती है, लेकिन यह मान कर चलिए कि जैसे कर्म किए जाते हैं वैसे फल इसी धरती पर इसी जीवन में और कुछ हफ्तों के भीतर ही नसीब हो जाते हैं. ऊपर वाले का सेटेलाइट सडक़ के बीच में फेंके गए ऐसे केले के छिलके तुरंत पकड़ लेता है और फेंकने वाले लोगों को तुरंत निशाने पर रख लेता है बस इसके बाद पहला मौका मिलते ही...

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