राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : पारदर्शिता का तरीका
21-Aug-2021 6:33 PM (384)
छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : पारदर्शिता का तरीका

पारदर्शिता का तरीका
राजनांदगांव कलेक्टर तारणप्रकाश सिन्हा ने कलेक्टोरेट के अपने चेम्बर के दरवाजे बदलवाकर कांच लगवा दिया है। अब कलेक्टर अंदर क्या कर रहे हैं, यह बाहर से ही दिख जाता है। सर्वविदित है कि  ज्यादातर अफसर समस्याओं के निराकरण के लिए आए आम लोगों से मेल मुलाकात से कतराते हैं, और मीटिंग में व्यस्त होने का बहाना बना देते हैं। इस तरह की शिकायतों के चलते जीएडी को समय-समय पर दिशा निर्देश भी जारी करना पड़ता है।

बड़े अफसर तो मंत्री तक को गच्चा देने से बाज नहीं आते हैं। रमन सरकार के पहले कार्यकाल में स्कूल शिक्षा मंत्री रहे विक्रम उसेंडी, विभागीय सचिव आरसी सिन्हा से जरूरी सबजेक्ट पर चर्चा करना चाह रहे थे। उन्होंने सिन्हा को फोन लगवाया, तो जवाब मिला कि साब मीटिंग ले रहे हैं। करीब दो घंटे बाद फिर फोन मिलाया, तो वही जवाब मिला। इसके बाद उसेंडी सीधे सिन्हा के कमरे में चले गए।

सिन्हा अपने कमरे में अकेले थे, और चाय की चुस्कियां ले रहे थे। मंत्रीजी को एकाएक कक्ष में पाकर हड़बड़ा गए, और सफाई देने लगे। मंत्रीजी ने उन्हें जमकर फटकार लगाई, और फिर बाद में उन्हें विभाग से हटा दिया गया। एक सीएस, तो फाइलें निपटाकर अक्सर सरिता मैग्जीन पढ़ते थे। मगर चेम्बर के बाहर लाल लाइट जलती रहती थी इसका आशय यह था कि साब व्यस्त हैं। ऐसे चालबाज अफसरों से परे राजनांदगांव कलेक्टर ने पारदर्शी चेम्बर बनवाकर प्रशासन में पारदर्शिता लाने की कोशिश की है।

कैमरा भीतर, स्क्रीन बाहर !
भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अफसर आलोक कटियार जिस दफ्तर में रहते हैं, उसमें अपने चेम्बर के भीतर कैमरा लगवाकर उसे बाहर लगी स्क्रीन से जोड़ देते हैं। बाहर बैठे लोगों को दिखते रहता है कि साहब क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, कौन उनके साथ कितनी देर तक बैठे हैं। जो लोग किसी गलत अनुरोध के साथ आते हैं, वे कमरे में लगे कैमरे से नजारा बाहर से देखकर ही भीतर आते हैं। ऐसे में कोई गलत बात करने की हसरत जाती रहती है।  

महिला एसपी के साथ सेल्फी..
गरियाबंद में पदस्थ होने के बाद पुलिस अधीक्षक पारूल माथुर ग्रामीण इलाके के दौरे पर निकलीं। मैनपुर में  महिलायें उन्हें अपने बीच पाकर खुश हो गई। एसपी ने भी एक बच्ची को गोद में उठाकर दुलारा। गांव की महिलाओं ने उनके साथ सेल्फी लेकर इस दौरे की याद को सहेज लिया।

अपनी कोठी तैयार होने की खुशी
अंबिकापुर में नवनिर्मित कांग्रेस भवन का फीता मंत्री टी एस सिंहदेव ने काटा। पर मंत्री अमरजीत भगत के समर्थकों को यह रास नहीं आया और उन्होंने दूसरा फीता फिर बांधा, जिसे काटते हुए मंत्री भगत ने कहा कि कोई गुटबाजी वाली बात नहीं है, उनके समर्थक कार्यकर्ताओं में कुछ अधिक उत्साह था। उनकी इच्छा रखने के लिए ऐसा किया। पर लोगों का कहना है कि मंत्री भगत की खुशी इसलिए दोगुनी थी क्योंकि अब वे कांग्रेस की बैठकों में शामिल हो सकेंगे। दरअसल अब तक कांग्रेस कार्यालय महल के एक हिस्से, जिसे कोठीघर कहा जाता है, से संचालित होता रहा है। भगत वहां जाते ही नहीं थे।

श्रेय लेने की हड़बड़ी
प्रदेश में अब तक अनेक राजीव भवन यानी कांग्रेस भवनों का या तो निर्माण शुरू हो चुका या उनका लोकार्पण हो चुका है। यह हर जिले में बनाया जाना है। पर प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े जिले बिलासपुर में इसकी नींव रखना तो दूर,  अब तक जमीन का आवंटन भी नहीं कराया जा सका है। बौखलाए जिला कांग्रेस अध्यक्ष ने बयान दे दिया है कि नगर निगम आयुक्त बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं। भूमि आवंटन के आवेदन पर एनओसी नहीं दे रहे हैं।

हकीकत यह है कि आयुक्त को किसी जमीन आवंटन का एनओसी सामान्य सभा की मंजूरी देने का अधिकार नहीं है। सारी फाइलें तैयार है और सामान्य सभा के एजेंडे में यह शामिल कर लिया गया है। बैठक 24 को होने वाली है। मंजूरी मिलने में बस कुछ दिनों की देरी है। पर अध्यक्ष को डर था कि वे यह बयान नहीं देते हैं तो इस मंजूरी का श्रेय मेयर या किसी दूसरे नेता को मिल जाएगा।

डीएमएफ में कलेक्टर को अध्यक्ष बनाने की बात
छत्तीसगढ में कांग्रेस की सरकार बनी तो डीएमएफ के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी प्रभारी मंत्रियों को दे दी गई थी। खनिज न्यास ट्रस्ट का फंड छत्तीसगढ़ में 1000 करोड़ से अधिक का है। अधिकारी, नेता सब के लिए यह बड़े काम का है जिसमें ज्यादा औपचारिकताएं पूरी किए बगैर करोड़ों रुपए खर्च करने की मंजूरी दी जा सकती है।

अब केंद्र सरकार ने वापस कलेक्टरों को अध्यक्ष बनाने कहा है। राज्य सरकार के ऐसा न करने के आग्रह को ठुकरा भी दिया गया है। केंद्र की ओर से आरोप लगाया गया है कि इसका दुरुपयोग किया जा रहा है। वैसे जब बीजेपी सत्ता में थी तब भी फंड का मनमाना इस्तेमाल किया जाता था। खान प्रभावित क्षेत्र की जगह दूसरे शहरों में ऐसे कार्यों में राशि खर्च की गई जिसका प्रावधान ही नहीं। विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस इस दुरुपयोग के खिलाफ खूब आवाज उठाती रही, पर सरकार बनने के बाद वह भूल गई। शायद दो चार जिलों की जांच बिठा दी जाती तो केंद्र के सामने बदलाव रोकने के लिए दलील के काम आती। अब तो यही रह जाएगा कि कलेक्टर जिलों में नेताओ और डीएमएफ सदस्यों की बात सुन लिया करें। (rajpathjanpath@gmail.com)

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