राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : इंदिरा बैंक का जिन्न बाहर
18-Sep-2021 5:27 PM (478)
छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : इंदिरा बैंक का जिन्न बाहर

इंदिरा बैंक का जिन्न बाहर

इंदिरा बैंक सहकारी घोटाले की फाइल खुल गई है। चर्चा है कि खातेदारों के दबाव में एजी से राय लेकर पुलिस ने घोटाले की फिर से पड़ताल शुरू कर दी है। करीब 53 करोड़ के इस घोटाले में तत्कालीन सीएम रमन सिंह, उनके कैबिनेट के सदस्यों, और पुलिस के आला अफसरों पर संलिप्तता के आरोप लगे थे। मगर इस केस में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई।

जबकि खुद भूपेश बघेल ने आठ साल पहले कांग्रेस भवन में प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर घोटाले को उजागर किया था। तब घोटाले मुख्य सूत्रधार बैंक मैनेजर उमेश सिन्हा के नार्को टेस्ट की वीडियो क्लिपिंग दिखाई थी। इसमें उमेश सिन्हा ने रमन सिंह, और उनके कैबिनेट के सहयोगियों के नाम लिए थे। उस समय नार्को टेस्ट के वीडियो क्लिपिंग की सत्यता पर भी सवाल उठे थे।

 मगर एक दशक बीत जाने के बाद भी इस केस में कुछ निकलकर नहीं आ पाया। सैकड़ों खातेदार ऐसे हैं जिन्हें अब तक उनकी जमा राशि नहीं मिल पाई है। ऐसे में सरकार ने प्रकरण पर कार्रवाई में रुचि दिखाई है। अब इस घोटाले के चलते प्रदेश की राजनीति में उबाल आने के आसार दिख रहे हैं।

पितर पक्ष में काया होगा !

पितृ पक्ष परसों से शुरू हो रहा है। हिन्दू मान्यताओं में पितृपक्ष के दौरान पखवाड़े भर शुभ कार्य वर्जित है। सरकार तो दूर, अमूमन राजनीतिक दल भी पितृ पक्ष में कोई बड़ा राजनीतिक फैसला लेने से बचती हैं। यही वजह है कि वो लोग निराश हैं, जो कि कांग्रेस विधायकों के एक साथ दिल्ली जाने के बाद राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की उम्मीद पाले हुए थे।

पूर्व सीएम रमन सिंह ने तो मीडिया में कह भी दिया कि पिछले डेढ़ महीने से छत्तीसगढ़ में कोई मुख्यमंत्री नहीं है। हमने तो 6 महीने में 5 मुख्यमंत्री बदल दिए। पूरा कैबिनेट बदल डाला और ये एक पर ही अटके हुए हैं। कुछ लोग बताते हैं कि जगदलपुर चिंतन शिविर से पहले रमन सिंह की शिव प्रकाश, और अन्य नेताओं से अनौपचारिक चर्चा हुई थी।

भाजपा नेताओं को उम्मीद थी कि प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन जल्द होगा, और उस हिसाब से पार्टी को आगे की रणनीति बनानी होगी। मगर अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ, और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं से बेपरवाह सीएम भूपेश बघेल भी एक के बाद एक फैसले ले रहे हैं। जो कांग्रेस की राजनीति को बेहतर समझते हैं वो मानते हैं कि पितृ पक्ष तक कुछ नहीं होने वाला है।

स्कूल खुले पर गेम की लत लग गई...

छत्तीसगढ़ उन राज्यों में शामिल है, जहां कोरोना के नये मामलों में कमी देखे जाने के बाद स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई शुरू करा दी गई है। कैंपस में चहल-पहल तो शुरू हो गई है पर कई पाबंदियां हैं, जैसे खेलकूद नहीं होंगे, केवल 50 प्रतिशत मौजूदगी होगी। शिक्षण संस्थानों में पुराने दिन लौटने में वक्त लगेगा और छात्रों को पुरानी आदतों के अनुरूप फिर से ढ़लने में भी। इधर लम्बे समय तक ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों को मोबाइल नाम के औजार का आदी बना दिया। इसके नुकसान को जानते हुए भी मम्मी-पापा की मजबूरी ही थी कि वे बच्चों को इंटरनेट के साथ स्मार्ट मोबाइल फोन उपलब्ध करा दें। मुमकिन नहीं कि हर वक्त वे निगरानी रख पायें कि किस वक्त बच्चे इस फोन का इस्तेमाल पढ़ाई करने में और किस वक्त गेम खेलने में बिता रहे हैं।

आरंग में इससे जुड़ा मामला सामने आया है। घर के पैसे गायब होने लगे। पहले तो घर में लोगों ने ध्यान नहीं दिया, सोचा नौकरों का हाथ होगा, या फिर निकले होंगे, हिसाब नहीं मिल रहा है। पर जब गायब रकम 85 हजार रुपये पहुंच गई तो सीसीटीवी खंगाला गया। पता चला कि चोरी बाहर से आकर किसी ने नहीं की, बल्कि घर के 16 साल के बच्चे की करतूत है। उसे मोबाइल फोन पकड़े-पकड़े ऑनलाइन गेम खेलने की लत लग गई। वह घर से नगद निकालता फिर दोस्तों के जरिये ऑनलाइन ट्रांजेक्शन कर गेम खेलता था। कुछ समय पहले खरोरा में भी ऐसा मामला आया था। दुकान से रुपये गायब होने लगे। रकम तीन लाख तक पहुंच गई। पता चला कि गेम की लत में दुकानदार का बेटा रोजाना गल्ले से 3-4 हजार रुपये पार कर देता था।

ऑनलाइन पढ़ाई ने वैसे भी लगभग जनरल प्रमोशन दे दिया। परीक्षाओं की औपचारिकता पूरी की गई और सभी पास कर दिये गये। पढ़ाई न हुई न सही, अब हो जायेगी। पर गेम की लत तो चिपक गई, वह कब छूटेगी?

सत्ता मिली तो कांग्रेसियों के जख्म भर गये?

भाजपा शासन में बिलासपुर के कांग्रेस भवन में घुसकर पुलिस ने कई नेताओं को लाठियों से खूब पीटा, दौड़ाया। कई लोग घायल हो गये, कुछ अपोलो में भर्ती हुए, कुछ सिम्स में। राहुल गांधी, सोनिया गांधी ने निंदा की। प्रदेश के सभी बड़े नेता और पीएल पुनिया आधी रात को बिलासपुर गये, कार्यकर्ताओं का हाल जाना। पूरे प्रदेश में यह ज्यादती चुनाव प्रचार का मुद्दा बनी। कांग्रेस की जीत पर इसका असर भी देखा गया। बिलासपुर से अमर अग्रवाल की सीट 20 साल बाद छिन गई। कांग्रेस ने न्यायिक जांच की मांग की, दंडाधिकारी जांच की उसी दिन तत्कालीन सीएम डॉ. रमन सिंह ने घोषणा कर दी। तीन माह का वक्त दिया गया, कलेक्टर को रिपोर्ट सौंपने का। आज उस घटना को तीन साल पूरे हो गये हैं। लगता है कि अब न तो लाठी चलाने का आदेश देने वाले अफसरों को जांच का डर है न कांग्रेसियों को हिसाब लेने में रुचि। जांच रिपोर्ट नहीं आ पाने का कोई अफसोस कांग्रेस नेताओं में दिखाई नहीं देता। एएसपी नीरज चंद्राकर सहित कई पुलिस अधिकारी जिन्हें कांग्रेसियों ने जिम्मेदार बताया था, दंडाधिकारी की नोटिस की परवाह नहीं करते और आज तक बयान देने नहीं गये। मार खाने वाले कई कांग्रेस नेता भी बार-बार नोटिस देने के बावजूद दंडाधिकारी के पास बयान देने नहीं पहुंचे। हो सकता है कि सत्ता मिलने पर कांग्रेस नेता अपना जख्म भरा हुआ महसूस कर रहे हों, पर लोग तो यह सवाल करेंगे कि खुद के मामले में जब न्याय की चिंता नहीं हो तो पुलिस ज्यादती की दूसरी शिकायतों का क्या होगा?

और नये जिलों की उम्मीद में आंदोलन

बीते 15 अगस्त को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की घोषणा के बाद छत्तीसगढ़ में जिलों की संख्या बढक़र 32 हो गई है। इन नये जिलों की घोषणा के बाद जिला मुख्यालय कहां पर बने, इस पर आंदोलन होने लगे। जिलों के नामकरण में सभी जगहों को शामिल कर इस असंतोष की भरपाई करने की कोशिश की गई है। इस बीच कहा जा रहा है कि चुनाव से पहले चार और जिले बनाये जा सकते हैं। यानि छत्तीसगढ़ राज्य में नाम के अनुरूप 36 जिले होंगे। देर नहीं करते हुए, इसके लिये भी दावेदारी शुरू हो गई है। बस्तर में अंतागढ़ और भानुप्रतापपुर को जिला बनाने की मांग उठने लगी है। पखांजूर पहले से ही मैदान में है। बस्तर में कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में एकतरफा जीत मिली थी। इस नक्सल प्रभावित इलाकों में नारायणपुर, सुकमा जैसे जिले बने फिर भी कई गांव जिला मुख्यालय से 100-150 किलोमीटर तक दूर हैं। कोयलीबेड़ा के ग्रामीणों ने पिछले दिनों इसी मुद्दे को लेकर प्रदर्शन भी किया। सैकड़ों ग्रामीणों ने कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन कर मांग की कि उन्हें नारायणपुर जिले में शामिल किया जाये, जो 60 किलोमीटर दूर है, जबकि अभी कांकेर 150 किलोमीटर है।

नये जिले कब बनेंगे, कितने बनेंगे इस पर सरकार की ओर से अधिकारिक रूप से कोई संकेत अभी नहीं है लेकिन नये चार जिलों के बनने से बस्तर के लोगों में एक नई उम्मीद तो जाग गई है। 

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