राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : रमन काका को देवव्रत देते थे सेहत-सलाह
19-Nov-2021 5:04 PM (147)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : रमन काका को देवव्रत देते थे सेहत-सलाह

रमन काका को देवव्रत देते थे सेहत-सलाह

खैरागढ़ विधायक देवव्रत सिंह का यूं इस तरह दुनिया से जाना हर किसी को खल रहा है। संसार में नहीं होने के बाद उनकी अच्छाई में से एक बात पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के जेहन में भी है। आपसी संवाद में देवव्रत रमन को काका पुकारते हुए कई बार सेहत के लिए फिक्रमंद होने पर जोर देते थे। राजघराने से वास्ता रखने के बाद भी देवव्रत ने निजी जिंदगी में नशे को अपने पर हावी नहीं होने दिया। राजनीतिक जीवन में कई तरह के तनाव और संघर्षों से घिरे होने के बावजूद देवव्रत ने नशे का रास्ता नहीं चुना। पूर्व सीएम रमन से मेल-मुलाकात में देवव्रत खानपान पर संयम रखने की चर्चा छेड़ देते थे। खैरागढ़ के राजा के बजाय देवव्रत ने आम जीवन में एक सादगीपसंद जीवन बिताया। अचानक दुनिया को छोडकऱ जाने के बाद राजनेताओं के किस्सों में देवव्रत की खूबियां हैरान करने के साथ उनकी सरलता को भी जाहिर कर रही है। रमन समेत कई गैर कांग्रेसी उनकी फिटनेस से बेहद प्रभावित रहे।

अकबर सीएम-देवव्रत को लाए नजदीक

पिछले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोडकऱ जोगी कांग्रेस में शामिल हुए देवव्रत ने बेहद ही रोचक मुकाबले में भाजपा के हाथ से जीत छीन ली थी। कांग्रेस छोडऩे की वजहों पर देव्रवत ने कभी भी खुलकर चर्चा नहीं की, पर उनके करीबियों की जुबां में कांग्रेस अध्यक्ष रहते सीएम बने भूपेश बघेल को लेकर तल्खियां थी। मुख्यमंत्री बघेल के साथ विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत के बाद भी रिश्ते सुधरते नहीं देखकर देवव्रत ने सीएम के सबसे विश्वस्त मंत्री मोहम्मद अकबर को साधा। अकबर के साथ प्रगाढ़ राजनीतिक रिश्ते को सीढ़ी बनाकर धीरे-धीरे देव्रवत सीएम के भरोसे को वापस पाने के कगार पर पहुंचने लगे थे। अकबर स्व. शिवेन्द्र बहादुर के भतीजे होने की वजह से पसंद करते थे। बताते है कि अकबर को अविभाजित राजनांदगांव की सियासत में शिवेन्द्र बहादुर ने ही जगह दिलाई। वीरेन्द्र नगर विधानसभा से अकबर ने चुनावी राजनीति का सफर शुरू किया। अकबर आज भी शिवेन्द्र बहादुर की इस पहल को उपकार के तौर पर मानते हैं, इसलिए उनका खैरागढ़ राजघराने के लिए गहरा लगाव है। देवव्रत को सीएम के नजदीक लाने में जुटे अकबर ने प्रभारी मंत्री की हैसियत से काम देने में खुलकर सहयोग किया। सुनते हैं कि देवव्रत को जरूरत से ज्यादा मदद करते देखकर कांग्रेस के कुछ नेताओं ने सीएम से उनकी शिकायत कर दी। अकबर ने भी सीएम को काम करने की वजहों से अवगत कराया। बताते हंै कि देवव्रत ने अकबर के जरिये सीएम को भरोसा दिया कि किसी भी सूरत में सरकार के खिलाफ नहीं जाएंगे। मरवाही उपचुनाव का समय था कि देवव्रत ने जनता कांग्रेस के खिलाफ  माहौल बनाया, जिसे सियासी जगत में चुनाव जीतने में एक बड़ा मदद माना गया।

कलेक्टर की मुसीबत बना अधिकारी

जिलों में सभी विभागों के प्रमुख कलेक्टर के अधीन काम करते हैं, अपना बॉस मानकर चलते हैं। यह अलग बात है कि कलेक्टर के पास राजस्व जैसे एक दो विभागों को छोडक़र बाकी में सीधे दखल करने का अधिकार नहीं है। छोटे कर्मचारियों पर वे वेतन काटने, रोकने और निलंबन की कार्रवाई तो कर देते हैं पर यदि कोई राजपत्रित अधिकारी है तो उन्हें सचिवालय को अनुशंसा भेजना होता है। कुछ अधिकारी कलेक्टर की इस सीमा को समझते हैं और इसीलिये उनकी परवाह नहीं करते। समय सीमा की जिलों में हर सप्ताह बैठक होती है, कार्यों की प्रगति कितनी हुई इसकी समीक्षा होती है। वहां से अधिकारी फटकार सुनकर लौट जाते हैं। पर कलेक्टर के साथ समस्या होती है कि राज्य सरकार उनको ही उत्तरदायी मानकर चलती है। खासकर उन मामलों में जो सरकार, या कहें मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी (फ्लैगशिप) योजना हो।

रायगढ़ कलेक्टर ने धान के अलावा दूसरी खेती को प्रोत्साहित करने के लिये जो आंकड़े मांगे, उसमें बताया जाता है कृषि उप-संचालक ने गड़बड़ी की, जमीनी हकीकत और रिपोर्ट में भारी अंतर दिखा। अन्य कई विभागीय कार्य पूरे नहीं हुए। बीते एक साल से परेशान कलेक्टर ने उप-संचालक को हटाने की अनुशंसा ऊपर की। इसके बाद उनका तबादला हो गया। उप-संचालक कोर्ट से स्थगन आदेश लेकर आ गये। अब कलेक्टर को तो काम चाहिये था, सो उन्होंने सोचा होगा-कोर्ट का ऑर्डर है तो बैठे रहें। उनका प्रभार उन्होंने एक डिप्टी कलेक्टर को दे दिया। अब कृषि उप-संचालक खाली बैठे हैं।

मालूम हुआ है कि प्रभार छीनने की बात को अदालत की अवमानना बताते हुए उप-संचालक ने अपने विभाग में पत्राचार शुरू किया है।

क्या खास है मदकू द्वीप में?

रायपुर से करीब 75 किलोमीटर बाद मुंगेली जिले में, बिलासपुर मार्ग पर मनोरम दृश्य से भरपूर मदकू द्वीप के लिये दाहिनी ओर रास्ता है। शिवनाथ नदी यहां कुछ इस तरह घुमावदार है कि बचा हुआ मिट्टी का टीला द्वीप दिखाई देता है। सुरम्य वातावरण में हर साल फरवरी माह में मसीही समाज का मेला लगता है, जो करीब 110 सालों से चला आ रहा है। पांच-छह दिन तक न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से क्रिश्चियन समुदाय के लोग यहां पहुंचते हैं। वे यहां तरह-तरह से मनोरंजन और आध्यात्मिक कार्यक्रम करते हैं। इसी दौरान बहुत से रिश्ते भी तय हो जाते हैं। सभी समुदायों के लोग मेला पहुंचते हैं। पहले द्वीप तक जाने के लिये नौकाओं का सहारा था लेकिन अब स्टाप डेम बन जाने के बाद पुल-पुलिया भी तैयार हो गई हैं। पर्यटन विभाग ने मदकू द्वीप में बोटिंग की सुविधा भी शुरू कर दी है।

मदकू द्वीप में जब कुछ आध्यात्मिक महत्व के अवशेषों का पता चला तो अब से करीब 25-30 साल पहले इसका सर्वेक्षण शुरू हुआ। सेवानिवृत्त पुरातत्वविद् अरुण शर्मा ने इस पर काफी काम किया। यहां के धूमकेश्वर महादेव, राधा कृष्ण, गणेश, हनुमान, ऋषि मांडूक व श्री राम मंदिर 11वीं शताब्दी के हैं। कई अवशेषों को संकलित कर पुननिर्माण यहां कराया गया है और अब यह हिंदुओं के धार्मिक स्थल के रूप में भी जाना जाता है।

छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिये धर्मांतरण एक बड़ा मुद्दा है, जिसे उनको आगामी चुनावों तक न केवल जिंदा रखना है बल्कि उसे और बड़ा आकार देना है। समझा जा सकता है कि मदकू द्वीप को क्यों आरएसएस के सम्मेलन के लिये चुना गया है।

एक मुद्दा तो टला टकराव का..

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की घोषणा के बाद अब छत्तीसगढ़ के बिल का क्या होगा? अक्टूबर 2020 में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर राज्य ने कृषि उपज मंडी (संशोधन विधेयक) पारित किया । मुख्य बात थी केंद्र के कानून से निजी मंडियों की स्थापना होने वाली थी, छत्तीसगढ़ सरकार ने विधेयक के जरिये उनको नियंत्रित करने का अधिकार ले लिया। जब्ती, तलाशी, निगरानी, निरीक्षण का अधिकार सरकार को मिलता। अब केंद्र के तीनों बिल वापस होने का रास्ता खुलने के बाद छत्तीसगढ़ के बिल के इस हिस्से का औचित्य नहीं रह गया है।

पर बिल में कुछ बातें हैं जिनकी  प्रासंगिकता अभी भी है ,जैसे इसमें कृषि उत्पादों को व्यापक दायरे में परिभाषित किया गया है। इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म विकसित करने की बात की गई है। बहरहाल, पीएम के संबोधन के बाद कम से कम एक मुद्दा समाप्त हुआ जिसमें प्रदेश सरकार और गवर्नर के बीच टकराव नहीं होगा।

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