राजपथ - जनपथ
जितने मुँह उतनी बातें
भाजपा में नए प्रभारी की नियुक्ति की सुगबुगाहट है। निवर्तमान प्रभारी नितिन नबीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं। ऐसे में पार्टी जल्द ही उनकी जगह प्रभारी की नियुक्ति करने वाली है। पार्टी के अंदरखाने में कुछ नामों पर चर्चा भी हो रही है।
सुनते हैं कि नबीन की जगह पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े ले सकते हैं। महाराष्ट्र के मंत्री रहे तावड़े, वर्तमान में बिहार भाजपा के प्रभारी हैं। एक चर्चा यह भी है कि पार्टी के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख संजय मयूख को प्रभारी बनाया जा सकता है। मयूख पिछले तीन-चार विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में सक्रिय रहे हैं। वो भी मूलत: बिहार के हैं, और नितिन नबीन के साथ युवा मोर्चा में काम कर चुके हैं।
पार्टी के कुछ स्थानीय नेता संबित पात्रा को छत्तीसगढ़ का प्रभार मिलने की संभावना जता रहे हैं। संबित पात्रा, पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं, और ओडिशा के पुरी लोकसभा सीट से सांसद हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के लिए छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता दिल्ली में थे, तो उनके बीच नए प्रभारी को लेकर आपस में चर्चा होती रही। तमाम अटकलों से परे कोई नया नाम आ जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
पंजाब का छत्तीसगढ़ कनेक्शन
केन्द्रीय चुनाव आयोग ने अगले साल पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए तैयारी शुरू कर दी है। वर्तमान में मार्च-अप्रैल में चार राज्यों के विधानसभा के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। पंजाब में विधानसभा चुनाव के लिए प्रशासनिक तैयारी चल रही है। इसमें पंजाब सरकार ने चुनाव आयोग की अनुशंसा पर बिलासपुर की बेटी श्रीमती आनंदिता मित्रा को मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी नियुक्त किया गया है।
आईएएस की वर्ष-07 बैच की आईएएस आनंदिता मित्रा सचिव स्तर की अफसर हैं। उनके पति डॉ. एसके राजू, पंजाब सरकार में प्रमुख सचिव स्तर के अफसर हैं, और वर्तमान में राष्ट्रीय इस्पात निगम में सीईओ के पद पर पदस्थ हैं। डॉ. राजू, कांकेर, सरगुजा और रायगढ़ कलेक्टर रह चुके हैं। आनंदिता मित्रा आईएएस में बाद में सलेक्ट हुई, और फिर उन्हें पंजाब कैडर आबंटित हुआ। इसके बाद डॉ. राजू भी 2008-09 अपने पत्नी के कैडर में चले गए।
आनंदिता मित्रा बिलासपुर की रहने वाली है, और उनके पिता रेलवे में अफसर थे। खास बात ये है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है, और आम आदमी पार्टी ने छत्तीसगढ़ के लोरमी के रहने वाले संदीप पाठक को राज्यसभा में भेजा है। यही नहीं, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के बड़े नेता, और पूर्व सीएम भूपेश बघेल, पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हैं। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ के लोग पंजाब चुनाव में अहम रोल निभाएंगे।
आज बात कुछ जोड़ों की
हाल के वर्षों में एक ही बैच के आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के बीच शादी के आधार पर कॉमन कैडर च्वाइस या इंटर-कैडर ट्रांसफर में काफी बढ़ोतरी हुई है। किसी अधिकारी को गृह राज्य में इंटर-कैडर ट्रांसफर की अनुमति नहीं है।
हालांकि नियम कुछ खास परिस्थितियों में ऐसे ट्रांसफर की अनुमति देते हैं, लेकिन इस क्षेत्र में इसकी बड़ी संख्या ने नौकरशाही और राजनीतिक हलकों में कैडर मैनेजमेंट, संस्थागत संतुलन और शासन में पावर कपल्स की बढ़ती मौजूदगी के बारे में बातचीत शुरू कर दी है। ट्रांसफर आमतौर पर जीवनसाथी के कैडर में होता है।
कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) इन्हें मंज़ूरी देता है, और अक्सर यह सुनिश्चित करता है कि अधिकारी को जीवनसाथी के कैडर में ही भेजा जाए। छत्तीसगढ़ में भी ऐसी नौकरशाह दंपतियां है जिन्होंने ट्रेनिंग में रहते या बाद में विवाह कर कैडर बदला है। हालिया वर्षों में आईएएस वैशाली जैन- आईपीएस हर्षित मेहर, नम्रता जैन -निखिल, प्रतिष्ठा ममगई उनके पति, आईएएस सुरुचि सिंह -आईपीएस लक्ष्य शर्मा, आईपीएस योगेश पटेल- आईएएस पत्नी प्रमुख हैं। बीते दो दशकों में ऐसी और भी दंपतियां रहीं हैं।
वैसे अखिल भारतीय स्तर पर इनमें सर्वाधिक संख्या पंजाब हरियाणा राज्यों में सामने आई है। जहां कम से कम 66 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के ट्रांसफर हुए हैं, जो देश में सिविल सेवा कपल्स के सबसे बड़े ज्ञात समूहों में से एक है। हरियाणा कैडर को खास तौर पर पसंद किया जाता है, जिसमें हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और यूपी कैडर सहित कई आईएएस अधिकारियों ने हरियाणा में रहने वाले अधिकारियों से शादी के बाद वहां ट्रांसफर करवाया है। इनमें छत्तीसगढ़ के भी एक पूर्व आईएएस एस के राजू भी राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में अपनी पत्नी मधुमिता मित्रा के मूल कैडर हरियाणा चले गए थे। पूर्व में नक्सल समस्या को देखते हुए भी कुछ अफसरों खासकर आईपीएस ने अपने जीवनसाथी के कैडर को चुना है।
अविभाजित मध्यप्रदेश को ऐसा राज्य माना जाता था जहाँ दूसरे राज्यों से आने वाले अफ़सर-जोड़ों का स्वागत किया जाता था। कई ऐसे राज्य भी रहते थे जो ऐसे जोड़ों की अजऱ्ी मंजूर नहीं करते थे।
हमारी शहर सरकारें गरीब क्यों हैं?
संविधान के अनुच्छेद 243-आई और 243-वाई में लिखा है कि हर पांच साल में राज्य वित्त आयोग बनना जरूरी है। यह आयोग राज्य सरकार की आय का हिस्सा पंचायतों और नगरीय निकायों को देने की सिफारिश करता है। यह स्थानीय स्वशासन की आर्थिक रीढ़ है। लेकिन विडंबना, कई राज्यों में यह आयोग या तो बनता ही नहीं या जानबूझकर निष्क्रिय रखा जाता है। शायद सरकारें नहीं चाहतीं कि निकायों को उनका हक मिले। इससे उनका बजट पर नियंत्रण कम होता है और राजनीतिक दबदबा घटता है। कोई दंड नहीं होने से सरकारें देरी करती हैं। नतीजा? निकाय राज्य पर निर्भर रहते हैं, अपनी आय, जैसे संपत्ति कर बढ़ा नहीं पाते। शहरों में सडक़, पानी, सफाई जैसी सेवाएं प्रभावित होती हैं।
एक रिपोर्ट कहती है कि जहां एसएफसी कमजोर है, वहां नगरीय निकायों की 70-80 फीसदी आय राज्य से आनी चाहिए पर वास्तव में यह अनिश्चित रहती है।
छत्तीसगढ़ राज्य बने 25 साल हो गए, लेकिन स्टेट फाइनेंस कमीशन का गठन देरी से होता रहा है। चौथी बार भाजपा सरकार है, मगर सिर्फ एक बार वीरेंद्र पांडेय को पूरे पांच साल का कार्यकाल मिला। बाकी बार देर से गठित हुआ। पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तो 2003 के चुनाव से छह महीने पहले टीएस सिंहदेव को अध्यक्ष बनाया। एक बार दोबारा आई- कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने भी देर की। इधर हाल में अनेक निगम, मंडल, सहकारी संस्थाओं में नियुक्तियां की गईं, लेकिन एसएफसी जैसी महत्वपूर्ण संस्था को छोड़ दिया गया। इसके चलते नगरीय निकायों को फंड आवंटन की शक्ति वित्त मंत्री और विभागीय मंत्री के हाथ में है। कायदे से यह आवंटन एसएफसी की सिफारिशों पर होना चाहिए, पर वह तो है ही नहीं। राजनीतिक वफादारों को पद देना जरूरी है, लेकिन वह पद जो बड़े काम का है, किसी को नहीं दिया जा रहा। इससे शहरों की आर्थिक आजादी नहीं मिल रही, माली हालत खराब है। नगरपालिकाएं कर्मचारियों के वेतन के लिए राज्य की ओर देखती हैं, विकास योजनाएं सिफारिशों पर टिकी रहती हैं- बिजली का बिल भी भुगतान नहीं कर पाते। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक में एसएफसी नियमित हैं, वहां निकाय मजबूत हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ की तरह उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे राज्यों में देरी आम है। अरुणाचल प्रदेश में तो अब तक गठित ही नहीं।
सरकारें बचती हैं, क्योंकि एसएफसी एक संवैधानिक आयोग है। उसकी सिफारिशें बाध्यकारी हैं, जो बजट पर बोझ डालती हैं।
शहरों के गरीब होने की एक बड़ी वजह यह है क्योंकि उन्हें राज्य के राजस्व का जायज हिस्सा नहीं मिलत रहा। यह हिस्सा तब मिलने की संभावना होती है जब राज्य वित्त आयोग काम करता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में- जहां डबल-ट्रिपल इंजन विकास की बातें होती हैं, वहां नगरपालिकाएं और नगर निगम पैसों के लिए तरस रहे हैं।
राज्यसभा, एक-दो अनार, दर्जनों बीमार
राज्यसभा की दो रिक्त सीट के लिए अप्रैल में चुनाव होंगे। कांग्रेस और भाजपा, दोनों को एक-एक सीट मिलना तय है। कांग्रेस से तो दूसरे राज्य से भी प्रत्याशी बनाए जाते रहे हैं। ऐसा होते आया है, लेकिन भाजपा में अब तक स्थानीय को ही राज्यसभा में भेजा गया है। ये अलग बात है कि भाजपा अब नामों को लेकर चौंकाते रही हैं।
पिछली बार भाजपा में स्थानीय स्तर पर वरिष्ठ नेता रामप्रताप सिंह के नाम पर सहमति बन गई थी। वो नामांकन के लिए जरूरी कागजात एकत्र में जुटे थे तभी पार्टी ने रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह को प्रत्याशी घोषित कर दिया।
कुछ इसी तरह वर्ष-2018 विधानसभा चुनाव के पहले धरमलाल कौशिक भी राज्यसभा में जाने की तैयारी कर रहे थे। तत्कालीन सीएम डॉ रमन सिंह ने दिल्ली में पार्टी में कुछ प्रमुख नेताओं से चर्चा भी कर ली थी। कौशिक ने तो नामांकन पत्र मंगवा भी लिए थे इस आशय की खबर लीक होने के बाद पार्टी ने धरमलाल कौशिक की जगह सरोज पांडेय को प्रत्याशी बना दिया, और कौशिक राज्यसभा में जाने से रह गए। उन्हें विधानसभा चुनाव लडऩा पड़ा, और वो विधायक बनकर नेता प्रतिपक्ष बने। वर्तमान में रिक्त सीट पर कई हारे हुए नेताओं की नजर टिकी हुई है। कुछ रिटायर्ड अफसर भी अपनी संभावना तलाश रहे हैं। मगर पार्टी हमेशा चौंकाते आई है। कुछ इस बार भी ऐसा हो सकता है।
मनरेगा को आकार देने वालों के विचार
केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को रद्द कर दिया है और उसकी जगह विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) या वीबी-ग्रामजी या वीबी जी राम जी, को लाया है। सरकार इसे मनरेगा से बेहतर बता रही है- ज्यादा काम के दिन, बेहतर योजना और विकास पर फोकस, लेकिन कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल गरीबों पर हमला। यह कह कर कि इससे काम का अधिकार छिन जाएगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होगी। राजनीतिक बहस में दोनों पक्ष अपनी-अपनी बातें जोर-शोर से रखते हैं, लेकिन आम आदमी उलझ जाता है कि सच्चाई क्या है?
क्या यह वाकई सुधार है या गरीबों की कमर तोडऩे की साजिश? ऐसे में जरूरी है कि हम उन विचारकों की सुनें जिनका इस मुद्दे से सीधा जुड़ाव है, जो जमीन पर काम करते हैं और जिनकी बातें राजनीति से ऊपर उठकर आती हैं।
फ्रंटलाइन पत्रिका के नए अंक में प्रकाशित निखिल डे और अरुणा रॉय का लेख- सर्जिकल स्ट्राइक ऑन द पुअर, इसी तरह की गहरी पड़ताल है। ये दोनों सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) के संस्थापक सदस्य। अरुणा रॉय पूर्व आईएएस अधिकारी हैं, जिन्होंने सरकारी नौकरी छोडक़र ग्रामीण गरीबों के अधिकारों के लिए जीवन समर्पित किया। वे सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून की आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाईं। निखिल डे भी दशकों से ग्रामीण मजदूरों के संघर्ष में सक्रिय हैं। दोनों ने मनरेगा कानून बनाने के आंदोलन में अहम हिस्सा लिया और उसके कार्यान्वयन पर नजर रखी। इस विषय पर विचार रखने की उनकी पात्रता इसलिए है क्योंकि वे किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जमीन की हकीकत जानते हैं। उन्होंने लाखों मजदूरों के साथ काम किया, जहां मनरेगा ने गरीबी के खिलाफ लड़ाई में मदद की। ऐसे में उनका लेख राजनीतिक शोर से अलग, तथ्यों पर आधारित मान सकते हैं।
लेख में उनकी सबसे बड़ी चिंता है काम के अधिकार का खत्म होना। मनरेगा में हर ग्रामीण को साल में 100 दिन काम मांगने का हक था, जो मांग पर आधारित था। लेकिन वीबी-जी रामजी में यह गारंटी नहीं है। केंद्र सरकार तय करेगी कहां काम होगा, किस तरह का और कितना। यह सेंट्रलाइजेशन है, जहां दिल्ली से फैसले होंगे, जबकि मनरेगा में ग्राम सभाएं और पंचायतें फैसला करती थीं। उनके मुताबिक इससे लोकतंत्र कमजोर होगा और स्थानीय जरूरतें नजरअंदाज।
दूसरी चिंता वित्तीय बोझ की है। नया कानून केंद्र और राज्य के बीच 60:40 अनुपात में खर्च बांटता है, जो राज्य सरकारों पर दबाव डालेगा। अगर राज्य पैसा नहीं दे पाए, तो योजना बंद हो सकती है और गरीब मजदूर बीच में लटक जाएंगे। लेखक कहते हैं कि इससे संघीय ढांचा कमजोर होगा और केंद्र राज्यों से पैसे नहीं मिलने का बहाना बनाएगा।
तीसरी बड़ी चिंता मजदूरों के शोषण की। वीबी-जी राम जी में फसल के मौसम में 60 दिन काम बंद करने का प्रावधान है, जो बड़े किसानों को सस्ती मजदूरी मिलने देगा। मनरेगा न्यूनतम मजदूरी की तरह काम करता था, जो अब खत्म। मजदूरी दरें भी केंद्र तय करेगा, बिना मुद्रास्फीति को ध्यान में रखे।
लेखक इसे श्रम कानूनों में बदलाव की कड़ी बताते हैं, जहां मजदूरों के अधिकार कम हो रहे हैं और नियोक्ताओं को फायदा। उन्होंने कोविड महामारी का उदाहरण दिया, जब मनरेगा ने करोड़ों को बचाया, लेकिन अब ऐसा कोई सुरक्षा जाल नहीं रहेगा। कुल मिलाकर, वे कहते हैं कि यह बदलाव गरीबों पर सर्जिकल स्ट्राइक है, जो कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देगा।
पार्टी पदों के लिए इंटरव्यू!!
कांग्रेस में शीर्ष पदों पर नियुक्ति के लिए इंटरव्यू की औपचारिकता निभाई जा रही है। पहले जिला अध्यक्षों की नियुक्ति से पहले दावेदारों का इंटरव्यू लिया गया था, और अब प्रदेश महिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए इंटरव्यू हुआ है।
एआईसीसी ने राष्ट्रीय सचिव अलका लांबा की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने इंटरव्यू कर नाम प्रस्तावित करने का जिम्मा दिया है। बताते हैं कि कमेटी ने दावेदारों की शार्ट लिस्टिंग कर पांच नेत्रियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया था। इनमें तीन पूर्व विधायक, और एक वर्तमान विधायक संगीता सिन्हा थीं।
पूर्व विधायकों में छन्नी साहू, ममता चंद्राकर, डॉ लक्ष्मी ध्रुव हैं। तीनों की टिकट कट गई थी। इसके अलावा दिवंगत पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा की पुत्री तुलिका कर्मा का भी इंटरव्यू हुआ। अलका लांबा कमेटी ने पांच जनवरी को दिल्ली में पांचों दावेदार का इंटरव्यू लिया था। इसके बाद अपनी अनुशंसा एआईसीसी को भेज दी है।
ममता और तुलिका तो पहले ही महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय पदाधिकारी बन चुकी है। ऐसे में बाकी तीन छन्नी, संगीता सिन्हा, और डॉ लक्ष्मी ध्रुव में से फैसला होना है। पार्टी के कई लोग मान रहे हैं कि स्थानीय बड़े नेताओं की सिफारिश को ही महत्व दिया जाएगा। ऐसा जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में देखने को मिल चुका है। महिला कांग्रेस अध्यक्ष के मामले में क्या होता है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
आकांक्षा के खिलाफ फिर एफआईआर
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के रामानुजगंज में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर आकांक्षा टोप्पो के खिलाफ एफआईआर फिर से दर्ज कराई गई है। इस बार मामला केवल एक थाने तक सीमित नहीं रहा। मंत्री रामविचार नेताम के समर्थकों ने अलग-अलग आठ थानों में लिखित शिकायतें दी हैं। आरोप है कि आकांक्षा ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए मंत्री पर अभद्र और आपत्तिजनक टिप्पणी की है।
सूरजपुर जिले के एक वन विश्राम गृह में कथित अश्लील नृत्य का वीडियो सामने आने पर मंत्री ने कहा कि केवल सीताराम-सीताराम करना ही कला नहीं है, कला का दायरा व्यापक है। इसी बयान को आकांक्षा टोप्पो ने अपनी रील में तीखे, व्यंग्यात्मक और कुछ आपत्तिजनक शब्दों के साथ निशाने पर लिया। रील में एक कथित ऑडियो क्लिप भी जोड़ी गई, जिसमें मंत्री किसी कार्यकर्ता को झिडक़ते और ‘पागल’ कहते सुनाई देते हैं।
इससे पहले महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो पर टिप्पणियों के मामले में आकांक्षा की गिरफ्तारी हुई थी।
भाजपा कार्यकर्ताओं का तर्क है कि ऐसी टिप्पणियां जनप्रतिनिधियों की छवि धूमिल करती हैं और समाज में वैमनस्य फैलाती हैं। यह मांग कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शालीनता की कसौटी पर खड़ी दिखती है।
मीडिया में परंपरागत भाषा और मर्यादा की उस परंपरा का पालन नहीं किया जाता, जो अखबारों में दिखाई देता है। शायद, सत्ता के प्रति असंतोष को भरोसे की भाषा से लोगों को तसल्ली नहीं मिल रही, इसलिए एफआईआर दर्ज होने वाली बातें कहने के बावजूद आकांक्षा टोप्पो को हजारों लाइक्स मिल रहे हैं।
आदिम अवस्था में बैगा समुदाय
यह तस्वीर अमरकंटक की है, जहां नर्मदा नदी का उद्गम होता है। एक बैगा जनजाति की महिला दिख रही हैं, जो अपनी सिर पर बहुत बड़ा बोझ उठाए हुए हैं। यह बोझ गरुड़ पेड़ की जड़ से भरा है, जो जंगल से इक_ा की गई एक महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी है। जनजाति समुदाय जंगल पर निर्भर रहता है। ऐसी ही जड़ी-बूटियां, जंगली सब्जियां व फल बेचकर वे अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं।
बैगा देश की सबसे पिछड़ी और विशेष रूप से संवेदनशील जनजाति (पीवीटीजी) में से एक हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश के बालाघाट, मंडला, डिंडोरी और अनूपपुर जिलों में इनकी अच्छी-खासी आबादी है। ये जंगल से औषधीय पौधे इक_ा करते हैं और बाजार में बेचने कस्बों और साप्ताहिक हाट-बाजारों में पहुंचते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति अब भी बहुत कमजोर है। गरीबी, शिक्षा की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव इनकी जिंदगी की बड़ी चुनौतियाँ हैं।
इस महिला के माथे पर अंग्रेजी के वी आकार का गोदना देखा जा सकता है। बैगा जनजाति की महिलाओं में यह गोदना बहुत आम है। इसे बचपन में, लगभग 8-10 साल की उम्र में लगवाया जाता है। यह सीता रसोई या अग्नि का प्रतीक माना जाता है और बैगा होने की पहचान देता है। गोदना पूरे शरीर पर लगाए जाते हैं, जो उनकी संस्कृति, पहचान और सुंदरता का हिस्सा हैं। बैगा महिलाएं इन्हें अपनी स्थायी संपत्ति मानती हैं, जो मरने के बाद भी उनके साथ रहती है।
बात करें अमरकंटक की तो यहां आजकल बड़े-बड़े आश्रम और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कांक्रीट की बड़ी-बड़ी संरचनाएं खड़ी हो चुकी हैं, लेकिन बैगा समुदाय का उत्थान उतनी तेजी से नहीं हुआ। प्रोजेक्ट बैगा जैसी सरकारी योजनाएं चलीं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर जोर था- पर असर सीमित है। यह महिला भी ठंडी हवा और शीत लहर में कठिन परिश्रम कर रही है।
यह फोटो हमें बैगा जीवन की सादगी, संघर्ष और मजबूती दिखाती है। साथ ही यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास के बीच इनकी स्थिति को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है?
कुंजाम तैयार होंगे...
बस्तर में नक्सलियों का सफाया हो रहा है। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई अंतिम चरण में है। केन्द्र सरकार ने 31 मार्च से पहले नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा कर चुकी है। इससे परे यहां विकास के साथ-साथ राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो रही है। भाजपा तो सक्रिय है ही, लेकिन कांग्रेस भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। चर्चा है कि कांग्रेस के रणनीतिकार पूर्व विधायक मनीष कुंजाम को अपने पाले में करने की कोशिश में जुट गए हैं।
सीपीआई लीडर कुंजाम दो बार विधायक रह चुके हैं। बस्तर में अब सीपीआई की पकड़ काफी कमजोर हो गई है। खुद कुंजाम सीपीआई लीडरशिप से नाखुश बताए जाते हैं। विधानसभा चुनाव में तो उन्हें तकनीकी कारणों से सीपीआई का अधिकृत चुनाव चिन्ह तक नहीं मिल पाया था। इसके कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा। चर्चा है कि बस्तर की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए मनीष कुंजाम सीपीआई का साथ छोड़ सकते हैं। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व, कुंजाम को अपने साथ जोडऩे के लिए रूचि दिखा रहे हैं।
बताते हैं कि कुंजाम के कांग्रेस प्रवेश के लिए बस्तर में सक्रिय रहे कुछ सामाजिक कार्यकर्ता प्रयासरत हैं। हालांकि इस तरह की कोशिशें पहले भी हुई थी। वर्ष 2018 के पहले तो राहुल गांधी के कुछ करीबी लोगों की कुंजाम से चर्चा भी हुई थी, मगर बात आगे नहीं बढ़ पाई। अब बस्तर के हालात बदल रहे हैं, और पूर्व मंत्री कवासी लखमा जेल में है। ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकारों को कुंजाम के रूप में एक बड़े चेहरे की जरूरत महसूस हो रही है। देखना है कि कुंजाम कांग्रेस में शामिल होने तैयार होते हैं या नहीं।
छोटी विधानसभा का बड़ा बजट सत्र या....

संसद और मप्र विधानसभा के बजट सत्र की घोषणा हो चुकी है लेकिन छत्तीसगढ़ में अभी इंतजार करना होगा। हालांकि संसदीय कार्य विभाग से सत्र आहूत करने का प्रस्ताव सरकार को बढ़ाए सप्ताह बीत गया है। लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव और अन्यान्य राजनीतिक कारणों से अधिसूचना के लिए अभी 5-7 दिन और लग सकते हैं। संसद सत्र दो चरणों में अप्रैल मध्य तक होगा वहीं मप्र का बजट सत्र 16 फरवरी से 9 मार्च तक। 230 विधायकों वाले मप्र विधानसभा की 12 ही बैठकें होंगी। इसी दौरान बजट पेश और पारित किया जाएगा। इतनी बड़ी विधानसभा के इतनी कम बैठकों की चर्चा छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में भी हो रही है। कांग्रेस विधायक दल के वरिष्ठ नेताओं का कहना था कि कहीं यहां भी ऐसा न हो जाए। वैसे भी छोटी विधानसभाओं की कम बैठकों की चर्चा भी होती रहती है। इस पर सरकारी पक्ष का कहना रहता है अधिक बैठकें कर हमारे कामकाज को लेकर विपक्ष को घेरेबंदी का अवसर क्यों दिया जाए। इसकी शुरुआत कांग्रेस सरकारों के पहले कार्यकाल से की गई थी। बहरहाल इन चर्चाओं से दूर छत्तीसगढ़ में 20 बैठकों वाले सत्र की चर्चा, विधानसभा के गलियारों में चल रही है। अब देखना है कि सरकार कितनी बैठकों पर सहमति देती है। चर्चाओं के अनुसार सत्र 16 या 23 फरवरी से शुरू हो सकता है और बजट होली अवकाश से पहले पेश किया जाने की संभावना है। और होली के बाद विभाग वार मांगे पारित कर 20 मार्च के आसपास सत्रावसान कर दिया जाए। ताकि उसके बाद राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जा सके। 9 अप्रैल से पहले राज्यसभा के लिए छत्तीसगढ़ से दो सीटों पर चुनाव होने हैं।
सांसद ने मांगा भी तो क्या मांगा?
कांकेर के सांसद भोजराज नाग अक्सर अलग-अलग वजहों से चर्चा में रहते हैं। इस बार भी मुख्यमंत्री की मौजूदगी में मंच से कुछ ऐसा कह दिया जिसकी वजह से लोग हैरान रह गए। मकर संक्रांति मेले में पहुंचे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के समक्ष एकमात्र मांग यह रखी कि पखांजूर में एग्रीकल्चर कॉलेज खोला जाए। इसके अलावा उन्होंने और कोई मांग सीएम से नहीं की। वास्तविकता यह है कि पखांजूर में पहले से ही एग्रीकल्चर कॉलेज खुल चुका है। सन् 2023 से इसका संचालन हो रहा है। आगामी सत्र के लिए प्रवेश की प्रक्रिया चल रही है। ऐसा नहीं है कि वे कॉलेज के लिए भवन की मांग कर रहे थे। क्योंकि भवन की स्वीकृति भी पहले से मिल चुकी है और उसका भी निर्माण कार्य चल रहा है। सीएम के जाने के बाद लोगों ने सांसद से सवाल किया कि यहां तो एग्रीकल्चर कॉलेज शुरू हो चुका है, क्या आप एक और एग्रीकल्चर खोलने की मांग कर रहे हैं? नाग ने स्वीकार कर लिया कि उन्हें मालूम नहीं था कि यहां एग्रीकल्चर कॉलेज खुल चुका है..। कांकेर संसदीय सीट और जिले की ढेर सारी समस्याएं होंगी- सीएम के सामने मांग रखने का मौका मिला था, पर सांसद अपने क्षेत्र की जरूरतों से वाकिफ नहीं लगे। उन्होंने वह मांग कर डाली, जो मांग पहले ही पूरी हो चुकी है।
नए यूनिफार्म पर गर्व
छत्तीसगढ़ कैडर 2013 बैच के आईपीएस जितेन्द्र शुक्ला की एक तस्वीर सोशल मीडिया में नए यूनिफार्म पहने वायरल हो रही है। हाल ही में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति में एनएसजी ज्वाईन करने वाले युवा आईपीएस जितेन्द्र शुक्ला ने दिल्ली में आमद दे दी है। बीते सोमवार को उन्होंने छत्तीसगढ़ से दिल्ली जाकर एनएसजी के मुख्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। एनएसजी ने उन्हें ग्रुप कमांडर के पद पर काम करने का दायित्व सौंपा है। ग्रुप कमांडर का काम नेशनल थ्रेट से निपटने और आतंकी हमलों का जवाब देने के लिए सैनिकों को तैयार करना है। देश की सुरक्षा से जुड़े उपायों को लेकर भी एनएसजी के ग्रुप कमांडर न सिर्फ स्वयं को बल्कि अपने अधीनस्थ सिपाहियों को आधुनिक तकनीक के साथ लडऩे के लिए तैयार करते हैं।
जितेन्द्र की छत्तीसगढ़ पुलिस में एक ईमानदार अफसर की साख रही है। वह सीधे और साफ तरीके से काम करने में रूचि रखते हैं, इसलिए वह राजनीतिक रूप से फायदा लेने वाले जनप्रतिनिधियों और अन्य लोगों को सटीक जवाब देने के लिए भी जाने जाते हैं। इससे परे शुक्ला के बैचमेट मोहित गर्ग का भी दिल्ली रूख करने की खबरें आ रही है। मोहित ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के लिए अप्लाई किया है, जल्द ही उन्हें भी क्लियरेंस मिलने की आईपीएस बिरादरी में चर्चा है।
होटल और बाबा
राजधानी रायपुर के तेलीबांधा रोड स्थित आलीशान होटल के सौदे की काफी चर्चा हो रही है।
यह सौदा करीब 97 करोड़ में होने का दावा किया जा रहा है, और कांग्रेस से जुड़े लोग एक 'बाबा’ की हिस्सेदारी होने का दावा कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर होटल के सौदे को लेकर काफी कुछ लिखा जा रहा है। होटल के कथित सौदे में 'बाबा’ की हिस्सेदारी है या नहीं, यह साफ नहीं है। 'बाबा' निशाना बनाने एक वजह यह बताई जा रही है कि उन्होंने पूर्व सीएम भूपेश बघेल पर तीखा बयान दिया था। इसके बाद से कांग्रेस नेता उन्हें निशाने बना रहे हैं। इसके अलावा भूमाफिया से बाबा का घरोबा भी ऐसी चर्चाओं को हवा देता है।
दूसरी तरफ, इस होटल का सौदा पहले भी हो चुका है। होटल के मालिक बदलते गए हैं। कुछ साल पहले कांग्रेस के एक ताकतवर नेता ने इस होटल को खरीदने में रुचि दिखाई थी। नेताजी राजधानी में स्थाई ठिकाना चाहते थे। मगर उनसे जुड़े कुछ लोगों ने होटल के आसपास ट्रैफिक आदि से जुड़ी दिक्कतें गिनाई, इसके बाद वो पीछे हट गए। कुल मिलाकर होटल एक फिर चर्चा में है।
विदेशी ब्रांड में स्वदेशी संकल्प
रायपुर में युवा दिवस के अवसर पर राज्य युवा आयोग की ओर से स्वदेशी संकल्प दौड़ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मंत्री टंकराम वर्मा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए और युवाओं के साथ दौड़ लगाकर उन्हें राष्ट्रप्रेम, स्वदेशी भावना और सकारात्मक सोच अपनाने का संदेश दिया। मंच से दिया गया उनका उद्बोधन देशभक्ति से भरा था, लेकिन कार्यक्रम के बाद चर्चा किसी भाषण की नहीं, बल्कि मंत्री के पहनावे की होने लगी।
दौड़ के लिहाज से टी-शर्ट पहनना स्वाभाविक था और मंत्री भी उसी अनुरूप परिधान में नजर आए। लेकिन उनकी टी-शर्ट पर अंग्रेजी में लिखा एक शब्द- जीएपी, सोशल मीडिया पर बहस की वजह बन गया। दरअसल, गैप एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है, जिसका मुख्यालय अमेरिका में है। हालांकि, इसका उत्पादन भारत समेत एशिया के कई देशों में होता है और यह रायपुर के स्टोर्स व ऑनलाइन आसानी से उपलब्ध है, लेकिन ब्रांड विदेशी होने के कारण आलोचकों को मौका मिल गया।
सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा जा रहा है कि स्वदेशी का संकल्प दिलाने पहुंचे मंत्री खुद विदेशी ब्रांड की टी-शर्ट पहनकर आए थे। यदि मंच से स्वदेशी अपनाने की अपील की जा रही थी, तो किसी देसी ब्रांड का चयन भी किया जा सकता था।
कुछ नामों पर पेंच, बाक़ी भी टले
प्रदेश के आईपीएस अफसरों की पदोन्नति को लेकर माथापच्ची चल रही है। इस सिलसिले दो बाद मंत्रालय में उच्चस्तरीय बैठक हो चुकी है। कुछ अफसरों की प्रस्ताव पर पेंच है। यही वजह है कि पदोन्नति लिस्ट फाइनल नहीं हो पाई है।
ताजा जानकारी यह है कि अगले हफ्ते विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक है। चर्चा है कि जो अफसर जांच के घेरे में आए थे, भले ही उनके खिलाफ आरोपपत्र जारी नहीं हुए हैं,उन सभी की पदोन्नति रोकी जा सकती है।
बताते हैं कि करीब दर्जनभर से अधिक अफसरों को पदोन्नति दी जाएगी। इनमें डीआईजी और आईजी के पद पर पदोन्नति का प्रस्ताव है। सभी को एक जनवरी से पदोन्नति दी जाएगी।
मंत्री के एकाउंट का वीडियो फेक?
वन मंत्री केदार कश्यप ने फेसबुक और अपने कुछ अन्य सोशल मीडिया पेज पर कल एक वीडियो क्लिप शेयर की और एक पंक्ति में बताया कि बारसुर मार्ग पर तेंदुआ का शानदार दृश्य। वीडियो जारी होने के बाद उनके ही विभाग के अधिकारियों ने दावा किया कि यह फेक वीडियो है। यह तस्वीर बारसुर की नहीं है। वास्तव में कहां से ली गई है, इसका पता लगाया जा रहा है। एक अफसर का यह भी कहना है कि जानबूझकर इस तरह के वीडियो डालकर भ्रम फैलाए जाते हैं। हालांकि उन्होंने मंत्री पर कोई आरोप नहीं लगाया, लेकिन दावे पर वे कायम हैं कि वीडियो बारसूर इलाके का नहीं है। मंत्री कश्यप ने भी सिर्फ एक लाइन लिखी। कब देखा गया, किसने वीडियो बनाई, आसपास के गांवों में कोई दहशत का माहौल तो नहीं है। सडक़ पर बैठा तेंदुआ भी सुरक्षित है नहीं- जैसे विवरण हैं ही नहीं। हैरानी की बात है कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह वीडियो सोशल मीडिया से मंत्री ने हटाया नहीं है। शायद वे वन अफसरों की बात से इत्तेफाक नहीं रखते, जो बता रहे हैं कि वीडियो बारसूर का नहीं है। मंत्री केदार कश्यप के ही एकाउंट से सोशल मीडिया पर एक खबर कुछ दिन पहले चली थी, जिसमें बाघ को रेस्क्यू करने का जिक्र था। वह वीडियो भी फेक ही निकला। अब दूसरा मौका है जब मंत्री पर फेक वीडियो डालने का आरोप लग रहा है।
आगे-पीछे लिखा फ़लसफ़ा
पहले केवल ट्रक-बस या किसी और मालवाहक के पीछे फलसफे की बातें लिखी रहती थीं, बात के बरसों में टी-शर्ट के सामने भी यह लिखना शुरू हुआ, लोग बिना सोचे-समझे दार्शनिक की तरह बड़ी-बड़ी बातें टांगे घूमते हैं। लेकिन कुछ बातें बड़ी मजेदार रहती हैं।
टी-शर्ट के सामने लिखी बातें- ‘मैं आलसी नहीं हूं, बैटरी बचा रहा हूं।‘ ‘बैटरी खत्म होने को है, बाद में परेशान करें।’ ‘मैं बहस नहीं कर रहा हूं, सिर्फ यही बता रहा हूं कि मैं सही क्यों हूं।’ ‘मैं बूढ़ा नहीं हूं, मैं एंटीक हूं।’
एक लाइन टी-शर्ट के पीछे भी लिखी दिखती है- ‘मेरा पीछा मत करो, मैं खुद ही राह भटक चुकी हूं।’
गाडिय़ों के पीछे लिखा दिखता है, ‘हँस मत पगली, प्यार हो जाएगा।’ ‘धीरे-धीरे चलोगे तो बार-बार मिलेंगे, तेज चलोगे तो हरिद्वार मिलेंगे।’ ‘जरा कम पी मेरी रानी, बहुत महंगा है इराक का पानी।’ ‘बुरी नजर वाले तू सौ साल जिए, तेरे बच्चे दारू पी-पीके मरें।’ ‘सावधानी हटी, सब्जी-पूड़ी बटी।’
अभी एक ऐसा टी-शर्ट देखने में आया जिसके सामने लिखा है- ‘नेवर क्विट, डू युअर बेस्ट, ’ (कभी पलायन मत करो, अपनी सबसे कड़ी कोशिश करो)।
अब प्रेरणा, या मजे की इन बातों का क्या मतलब निकालना चाहिए, यह सडक़ों पर या दूसरी जगहों पर इन्हें पढक़र निकालते रहें।
चुनाव और धनबल
चुनाव लोकतंत्र का पर्व कहलाता है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि अधिकांश चुनावों में पैसा निर्णायक भूमिका निभा रहा है। महाराष्ट्र में म्युनिसिपल चुनाव प्रचार के लिए छत्तीसगढ़ से गए कुछ नेताओं ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि हाईप्रोफाइल बीएमसी(मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन) के चुनाव में तो मर्सिडीज में घूमने वाले लोगों ने भी प्रत्याशियों से नगद-उपहार लेने में संकोच नहीं किया।
छत्तीसगढ़ में भी म्युनिसिपल, और पंचायत के चुनावों में धन बल का काफी इस्तेमाल हुआ है। चुनाव में धन बल का इस्तेमाल अब निजी संस्थाओं में होने लगा है। करीब 60 साल पुराने रायपुर प्रेस क्लब के चुनाव में भी धन बल का खुलकर प्रयोग किया गया। यह चुनाव हाईकोर्ट के आदेश पर जिला प्रशासन की निगरानी में हुआ।
ये वही प्रेस क्लब है जहां शुरूआत में एक दशक पत्रकार निर्विरोध पदाधिकारियों का चुनाव करते थे। इस बार प्रेस क्लब का नेता बनने के लिए पत्रकारों में होड़ मची रही। चुनाव के दौरान मोतीबाग स्थित प्रेस क्लब बैनर-पोस्टर से पटा रहा। होटलों में पार्टियों का दौर खूब चला।
अध्यक्ष के बाद कोर कमेटी?
भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। छत्तीसगढ़ से सीएम विष्णुदेव साय, दोनों डिप्टी सीएम अरूण साव व विजय शर्मा के अलावा प्रदेश अध्यक्ष किरण देव समेत कुल 17 नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रस्तावक, और समर्थक बनेंगे।
पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी भी हैं। लिहाजा, उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर निर्वाचन को लेकर छत्तीसगढ़ के नेता उत्साहित हैं। इसी महीने नितिन नबीन की जगह नए प्रभारी की नियुक्ति भी हो जाएगी।
संकेत यह भी है कि छत्तीसगढ़ भाजपा की सबसे ताकतवर कोर कमेटी का पुनर्गठन भी होगा। कोर कमेटी में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह भी हैं, लेकिन अब वो स्पीकर के पद पर हैं लिहाजा उनकी जगह नई नियुक्ति भी हो सकती है। कोर कमेटी में सीएम विष्णुदेव साय के अलावा प्रदेश अध्यक्ष किरणदेव, दोनों डिप्टी सीएम के अलावा रामविचार नेताम, केन्द्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू सहित अन्य सदस्य हो सकते हैं। चर्चा है कि नई कोर कमेटी महीनेभर में अस्तित्व में आ जाएगी।
उदंती में इंद्रधनुषी गिलहरी

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व की जंगल सफारी उस वक्त और खास हो गई, जब कुछ पर्यटकों की नजर एक बेहद खूबसूरत और दुर्लभ जाइंट गिलहरी पर पड़ गई। पेड़ की ऊंची डाल पर आराम फरमाती और फिर फुर्ती से छलांग लगाती इस गिलहरी ने देखते ही देखते सबका ध्यान खींच लिया। रंग-बिरंगा शरीर और लंबी, घनी पूंछ देखकर लोग रोमांच से भर उठे। कैमरे से कुछ अच्छी तस्वीरें भी ले ली गईं।
इसे आम बोलचाल में इंद्रधनुषी गिलहरी कहा जाता है। काले, भूरे, लाल और पीले रंगों का ऐसा अनोखा मेल कि देखने वाला ठहर जाए। आमतौर पर यह प्रजाति पश्चिमी घाट के जंगलों में पाई जाती है, इसलिए छत्तीसगढ़ के इस टाइगर रिजर्व में इसका दिखना अपने आप में बड़ी बात मानी जा रही है। महाराष्ट्र में इसे शेकरू कहा जाता है, जो वहां का राजकीय पशु भी है। यह गिलहरी दिन में ज्यादा सक्रिय रहती है और पेड़ों के बीच 15-20 फीट तक छलांग लगा सकती है। फल, बीज और पत्तियां ही इसका भोजन हैं। वन विभाग का कहना है कि जाइंट गिलहरी का यहां नजर आना इस बात का संकेत है कि जंगल का माहौल सुरक्षित और संतुलित है।
मेहनतकश लोगों से बना बेजोड़ पुल

जब शासन-प्रशासन की राह देखने के बजाय गांव खुद पहल करता है, तो विकास की राह अपने आप निकल आती है। कोंडागांव जिले के छोटे से गांव सोनाबाल ने यही कर दिखाया है। शिक्षा और आस्था के प्रति जिम्मेदारी समझते हुए ग्रामीणों ने श्रमदान से लकड़ी का बेली ब्रिज तैयार कर लिया, जो आज गांव के लिए जीवनरेखा बन चुका है। बरसात के दिनों में गांव के चारों ओर बहने वाले नालों में पानी भर जाने से रास्ते बंद हो जाते थे। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों को होती थी, जिन्हें स्कूल पहुंचने में जोखिम उठाना पड़ता था। पिछले साल इसी समस्या से जूझने के बाद ग्रामीणों ने तय किया कि अब हर साल हालात और प्रशासन के भरोसे नहीं रहा जाएगा। गांव के लोगों ने सामूहिक निर्णय लिया और स्थानीय शिल्पकार ने पुल का डिजाइन तैयार किया। इसके बाद लकड़ी, औजार और मेहनत, सब गांव से ही जुटा। किसी ने सामग्री दी, तो किसी ने पुल निर्माण में हाथ बंटाया।
आज इस पुल को बने एक साल हो चुका है। बच्चे बेखौफ स्कूल जा रहे हैं, श्रद्धालु नियमित मंदिर पहुंच रहे हैं और ग्रामीण खुद पुल की देखरेख कर रहे हैं। सोनाबाल का यह पुल सिर्फ रास्ता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर गांव की जमीनी तस्वीर है, जो बताती है कि सामूहिक इच्छाशक्ति से असंभव भी संभव हो सकता है।
राहुल, सिंहदेव की बैठक
प्रदेश में जिला कांग्रेस के बाद ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति भी हो गई। अब बारी प्रदेश कांग्रेस संगठन में बदलाव की है। महामंत्री, और संयुक्त महामंत्री के कई पद खाली हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के भविष्य को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही है। इन सबके बीच पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव की दिल्ली में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से लंबी चर्चा हुई है।
बुधवार को राहुल के साथ सिंहदेव की करीब डेढ़ घंटे बैठक चली। इस बैठक में कुछ देर पार्टी के वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक भी रहे। बाद में वो निकल गए। बैठक में मुख्य रूप से तमिलनाडु, और पुडुचेरी के विधानसभा प्रत्याशी चयन पर चर्चा हुई। सिंहदेव दोनों ही प्रदेश के लिए पार्टी की स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन है। कांग्रेस, डीएमके के साथ मिलकर चुनाव लडऩे जा रही है। चर्चा है कि बैठक में जल्द से जल्द प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया शुरू करने पर जोर दिया गया।
राहुल के साथ चर्चा में सिंहदेव की छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की गतिविधियों पर भी चर्चा हुई है। हालांकि औपचारिक रूप से सिंहदेव ने इसको लेकर कुछ नहीं कहा है। मगर राहुल के साथ सिंहदेव की बैठक को काफी अहम माना जा रहा है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि प्रदेश कांग्रेस में कुछ भी बदलाव चार राज्यों के चुनाव के बाद ही होगा। देखना है आगे क्या होता है।
2.5 करोड़ के टॉयलेट, अब 2500 करोड़ की सडक़
जंबूरी के आयोजन में 2.5 करोड़ रुपये टॉयलेट पर खर्च करने पर अभी सरकार की तरफ से कोई जवाब आया भी नहीं है कि पूर्व मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता ननकीराम कंवर ने 2500 करोड़ रुपये का सवाल उठा दिया है। कोरबा कलेक्टर को हटवा कर दम लेने के बाद अब कंवर ने प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना फेस-4 की निविदाओं पर उंगली रखी है।
उनका कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों की सडक़ों के लिए स्वीकृत करीब ढाई हजार करोड़ रुपए की निविदाओं में शर्तों से खेल किया जा रहा है। प्रभारी प्रमुख अभियंता केके कटारे नियमों को ताक पर रखकर कुछ खास ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने की तैयारी में हैं। कंवर ने यह शिकायत मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक पहुंचाई है और कहा है कि सीबीआई जांच होनी चाहिए। कंवर के आरोप सही हो सकते हैं। उनको भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश महामंत्री देवेंद्र माहला का समर्थन मिला है। बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी टेंडर शर्तों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि देश के किसी भी टेंडर में इस तरह की शर्तें नहीं हैं, जो फेस-4 की सडक़ों के लिए जोड़ दी गई हैं। मगर, विधानसभा के भीतर और बाहर भाजपा के ही सीनियर्स सरकार को आए दिन कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। पीएम सडक़ का मामला तो प्रक्रियागत गड़बड़ी हो सकती है, पर जंबूरी और कोरबा कलेक्टर को हटाने का मामला तो व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जुड़े सवाल है। अपने ही नेता बार-बार सार्वजनिक रूप से सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, तो अंदरखाने क्या सुलग रहा है? चर्चा यह भी है कि कुछ बड़ा होने वाला है, पर, क्या होने वाला है- अभी उस पर ठोस कोई कुछ नहीं कह रहा। इसलिए प्रतीक्षा करें।
केंद्र ने और आईपीएस मांगे

केंद्रीय गृह विभाग ने राज्यों से और भी आईपीएस अफसर प्रतिनियुक्ति पर मांगें हैं। ताकि केंद्रीय सुरक्षा बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों में अफसरों की कमी पूरी की जा सके। इससे उम्मीद की जा रही है कि छत्तीसगढ़ से अभी कुछ और आईपीएस दिल्ली भेजे जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ आईपीएस कैडर में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का कोटा 31 अफसरों का हैं इसके विरुद्ध 10 अफसर ही भेजे गए हैं। इनमें जयदीप प्रसाद, मयंक श्रीवास्तव, आरएन दास, आशुतोष सिंह, नीतू कमल, डी श्रवण, जितेंद्र शुक्ला, पुष्कर शर्मा प्रमुख हैं। वहीं मोहित गर्ग इंतजार कर रहे हैं।
बहरहाल केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने राज्यों को सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज और सेंट्रल पुलिस ऑर्गेनाइजेशन में मिडिल से सीनियर पदों को भरने के लिए ज़्यादा इंडियन पुलिस सर्विस अधिकारियों को सेंट्रल डेपुटेशन पर भेजने के लिए लिखा है। इसमें सीबीआई, एनआईए, और एनसीबी शामिल हैं।
यह पत्र पिछले पहले हफ़्ते में भेजा गया था। जो छत्तीसगढ़ गृह विभाग को भी मिला है। गृह सचिव के पत्र में कहा गया है कि हर कैडर में 40 प्रतिशत सीनियर ड्यूटी पद सेंट्रल डेपुटेशन रिजर्व के तौर पर रखे गए हैं। हालांकि, यह अनुभव रहा है कि कुछ राज्य/ कैडर सेंट्रल डेपुटेशन के लिए पर्याप्त संख्या में नॉमिनेशन नहीं भेजते हैं। इस कमी को पूरा करने केंद्र ने यह भी प्रयास किया था कि वह अच्छे सीआर वाले अफसरों को स्वयं बुला लें लेकिन राज्य उन्हें रिलीव नहीं कर रहे थे।
यह पत्र सुप्रीम कोर्ट में 28 अक्टूबर, 2025 को खारिज केंद्र की उस रिव्यू पिटीशन के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है जिसमें कोर्ट के 23 मई, 2025 के फैसले के खिलाफ सीएएफ में सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) या इंस्पेक्टर-जनरल के रैंक तक आईपीएस अधिकारियों के डेपुटेशन को धीरे-धीरे कम करने की बात कही गई थी।
अभी, सीएएफ में डीआईजी के रैंक में 20 प्रतिशत पद और आईजी के रैंक में 50 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं। कोर्ट के फैसले का मकसद सीएएफ में आईएफएस के दबदबे को काफी कम करना है। इस फैसले से लगभग 13,000 सीएपीएफ अधिकारियों को फायदा होने की उम्मीद है, जिससे उन्हें तेजी से प्रमोशन मिलेगा और ठहराव की समस्या खत्म होगी। गृह मंत्रालय सीएपीएफ और आईपीएस दोनों का कैडर-कंट्रोलिंग अथॉरिटी है। दिसंबर तक,बीएसएफ, सीआरपीएफ , सीआईएसएफ आईटीबीपी, एसएसबी में आईजी , डीआईजी स्तर के 188 पदों में से जो आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं, उनमें से 36 पद खाली हैं। इस याचिका पर सुनवाई को लेकर हम इस कॉलम में सतत जानकारी देते रहे हैं।
पानी कम होगा, तभी पंख फैलाएंगे मेहमान

कोपरा जलाशय को हाल ही में रामसर साइट का दर्जा मिला है। यह बिलासपुर ही नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने के बाद उम्मीद जगी कि यहां देश-विदेश से प्रवासी पक्षियों की रौनक लौटेगी। लेकिन टैग मिल जाने से पक्षी नहीं आते। आते हैं तो आहार और अनुकूल परिस्थितियों के भरोसे।
सात-आठ साल पहले का कोपरा में जब पानी कम था, मकर संक्रांति के आसपास यहां रडी शेलडक, रेड क्रेस्टेड पोचर्ड, बार-हेडेड गूज, कूट, पेंटेड स्टॉर्क, वूली-नेक्ड स्टॉर्क, ब्लैक-हेडेड आइबिस, ग्रे-लेग गीज़, पर्पल हेरन, ग्रे हेरन, किंगफिशर, गार्गेनी, गडवाल जैसी कई प्रजातियां डेरा डाली हुई थीं। मगर इस मकर संक्रांति में कोपरा में पानी जरूरत से ज्यादा भरा दिख रहा है। नतीजा यह कि यहां वही पक्षी दिख रहे हैं जिनकी टांगें लंबी हैं, चोंच गहरी है, और जो ज्यादा पानी में भी खड़े रह सकते हैं। उथले पानी और कीचड़ वाले टीलों की कमी है। यह कमी प्रवासी पक्षियों की संख्या को सीमित कर रही है।
दरअसल, कोपरा प्रजनन स्थल नहीं, बल्कि आहार स्थल है; यहां पक्षी पेट भरने आते हैं, ठहरने नहीं। इसलिए जल स्तर का संतुलन सबसे अहम है।
अधिक पानी में केवल चुनिंदा प्रजातियां ही टिक पाती हैं- जैसे रेड क्रेस्टेड पोचर्ड या कॉमन कूट। ये गोताखोरी कर या मछली पकडक़र आहार जुटा लेती हैं। ये पक्षी आज भी दिखते हैं, लेकिन गिनती में। जबकि बत्तख जैसी टांगों वाले पक्षी, हेरन-स्टॉर्क समूह और किनारों पर भोजन खोजने वाले पक्षी तब आते हैं, जब पानी पीछे हटे, जमीन के टीले दिखें और उथले हिस्से बनें। लंबे पैरों वाले पक्षी किनारों पर खड़े होकर भोजन खोजते हैं, जबकि बत्तख जैसे पैरों वाले पक्षी उथले पानी में सहजता से आहार पा लेते हैं। पिछले कुछ वर्षों से पानी लगातार ज्यादा भर रहा है; नतीजा, पक्षी कम और दृश्य सीमित।
अब जब कोपरा रामसर साइट है, तो वन विभाग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यहां जल प्रबंधन ऐसा हो कि सर्दियों में निश्चित स्तर तक पानी घटे, टीले उभरें, किनारे सांस लें। तभी प्रवासी और गैर-प्रवासी पक्षियों की आमद बढ़ेगी। यही संतुलन सैलानियों को भी खींचेगा और स्थानीय जैव विविधता को मजबूती देगा। भरतपुर का केवला देव राष्ट्रीय उद्यान और ओडिशा का चिल्का (मंगलाजोड़ी), दोनों रामसर साइट हैं और दोनों की सफलता का सूत्र एक ही है- मौसम के अनुसार जल स्तर का सटीक प्रबंधन। कोपरा भी वही रास्ता अपनाए, तो पंखों की सरसराहट फिर लौटेगी।
अमरूद खा लेने पर शो कॉज नोटिस
सरकारी दफ्तरों में निचले स्तर के कर्मचारियों पर किस तरह औपचारिक, कठोर और कई बार असंवेदनशील कार्रवाई की जाती है, उसे समझने के लिए एक नोटिस और उसके जवाब पर नजर डालते हैं।
राज्य आपदा मोचन बल लखनऊ के सूबेदार ने ड्यूटी पर तैनात एक गार्ड को नोटिस जारी किया। इसमें लिखा कि जिन पांच दिनों में आप कमांड हाउस में ड्यूटी पर थे, वहां आपकी तैनाती की जगह के ठीक सामने अमरूद का पेड़ है। यहां से अमरूद तोडऩे वाले को न तो रोका, न ही अमरूद तोड़े जाने की सूचना ही आपने अपने किसी उच्च अधिकारी को दी। यह कृत्य लापरवाही है, अनुशासनहीनता को दर्शाता है, कर्तव्य के प्रति शिथिलता और मनमानी का परिचायक है।
अफसर ने गार्ड से लिखित स्पष्टीकरण मांगा ताकि उचित कार्रवाई नियमानुसार की जा सके।
गार्ड ने जवाब में क्या लिखा? उसने लिखा 05 जनवरी की रात स्पेशल खाने में पनीर की गुणवत्ता सही नहीं थी। इसके कारण उन्हें तेज पेट दर्द होने लगा। छुट्टियों पर रोक लगी थी, इसलिए वे डॉक्टर को नहीं दिखा सके। उन्होंने यूट्यूब पर देखा था कि अमरूद खाने से पेट दर्द में राहत मिलती है और इसी कारण उन्होंने अमरूद खाया। साथ ही उसने स्वीकार किया कि यह उसकी पहली गलती है। वे भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं करेंगे। गार्ड ने क्षमा की प्रार्थना भी की।
इस जवाब को आप चालाकी भरा मान सकते हैं लेकिन है बचाव के लिए कानूनी भाषा से भरी हुई है। बीमार कर्मचारी अपनी गलती भी मान रहा है और बता रहा है कि मामला उसकी सेहत का होने के बावजूद छुट्टी लेने में वह असमर्थ था, क्योंकि उसे इसकी इजाजत ही नहीं थी।
पता नहीं, गार्ड के जवाब से सूबेदार संतुष्ट हुआ या नहीं। मगर, गार्ड ने उनके लिए कुछ सवाल जरूर छोड़ दिए- क्या पेट दर्द से परेशान हो जाने पर सामने के पेड़ से अमरूद तोड़ लेना अनुशासन तोडऩा है? पेट दर्द के बावजूद डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाने पर उसे ड्यूटी के प्रति जिम्मेदार और प्रताडि़त माना जाए या लापरवाह? इससे ऊपर क्या ऐसे मामले में नोटिस जारी भी किया जाना चाहिए? आखिरी सवाल, आखिर उस अमरूद के पकने का इंतजार कौन कर रहा था?
बृजमोहन, सरकार, और संगठन
स्काउट्स एंड गाइड्स के राज्य इकाई के अध्यक्ष पद से हटाने के खिलाफ सांसद बृजमोहन अग्रवाल अपनी ही सरकार के खिलाफ कोर्ट चले गए हैं। हाईकोर्ट ने बृजमोहन की याचिका पर राज्य सरकार को जवाब-तलब भी किया है। चर्चा है कि बृजमोहन के तेवर से सरकार असहज जरूर है, लेकिन वो कोर्ट के बाहर प्रकरण को निपटाने में रूचि नहीं दिखा रही है।
डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने तमाम विवादों पर बृजमोहन से चर्चा की थी, लेकिन विवाद नहीं सुलझा। इन सबके बीच पार्टी के राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) बी सतीश रायपुर आए थे। बृजमोहन ने उन्हें मंगलवार को अपने निवास चाय पर आमंत्रित किया। दिल्ली जाने से पहले सतीश, रायपुर सांसद के निवास करीब आधा घंटा रुके, और कहा जा रहा है कि बृजमोहन ने तमाम विवादों पर अपना पक्ष रखा।
हल्ला है कि पार्टी संगठन, बृजमोहन के रूख से सहमत नहीं है। कुछ इसी तरह का विवाद छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ से भी जुड़ा हुआ है। संघ में कार्यकारी अध्यक्ष पद पर बृजमोहन की नियुक्ति का प्रस्ताव पारित किया गया था। ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सीएम विष्णुदेव साय हैं। वन मंत्री केदार कश्यप, और बृजमोहन अग्रवाल उपाध्यक्ष हैं। मगर कार्यकारी अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का आदेश नहीं निकल पाया। अब सतीश से अनौपचारिक मुलाकात के बाद बृजमोहन के समर्थकों को तमाम विवादों का निपटारा होने की उम्मीद है। देखना है आगे क्या होता है।
आवारा कुत्तों पर सोशल मीडिया का नजरिया
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ की अगुवाई वाली बेंच ने राज्यों और स्थानीय निकायों को चेतावनी देते हुए कल कहा कि हर डॉग बाइट, विशेष रूप से बच्चों या बुजुर्गों पर हमले के मामले में, भारी मुआवजा लगाया जाएगा। साथ ही, कुत्तों को फीड करने वालों की जिम्मेदारी तय करते हुए कहा कि अगर वे कुत्तों से इतना प्यार करते हैं, तो उन्हें घर ले जाएं, सडक़ों पर न छोड़ें जहां वे लोगों को काटते या डराते घूमें। कोर्ट ने कहाहर मौत या चोट के लिए राज्य को भारी जुर्माना भरना पड़ेगा, और फीडर्स भी जिम्मेदार होंगे। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर तीखी बहस छेड़ दी है।
डॉग लवर्स और एनिमल एक्टिविस्ट्स की ओर से फैसले पर कड़ी आलोचना आई। एक उपयोगकर्ता स्वप्निल शिव ने गंभीर टोन में लिखा है कि फीडिंग को अपराध बताना गलत है। कहा है कि कृष्ण की इस भूमि पर दया का कार्य अपराध कैसे? सभी कुत्ते नहीं काटते, सिर्फ हमलावरों को सजा दो। कुछ यूजर्स ने रोचक तरीके से तंज कसा है। जैसे एक ने लिखा कि कुत्तों को घर ले जाना आसान नहीं, लेकिन इंसानों की सुरक्षा भी जरूरी है। एनिमल लवर्स ने तर्क दिया है कि समस्या कुत्तों में नहीं, बल्कि स्टेरलाइजेशन और वैक्सीनेशन की कमी में है। वे कोर्ट के घर ले जाओ वाले बयान को अव्यावहारिक बताते हैं। वे कह रहे हैं कि इससे आवारा जानवरों की समस्या और बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, फैसले का जोरदार स्वागत भी करने वाले लोग हैं। ञ्चक्च4क्रड्डद्मद्गह्यद्धस्द्बद्वद्धड्ड बाई राकेश सिंहा हैंडल पर जज के वक्तव्य को उत्कृष्ट बयान कहा गया है। उन्होंने लिखा है कि कुत्तों का काटना जीवनभर का दाग छोड़ता है, फीडर्स घर ले जाएं। फौजदार नाम के हैंडल पर लिखा गया है कि अगर इतना प्यार है तो घर ले जाओ, सडक़ों पर वर्चुअल सिग्नलिंग बंद करो। इंसान पहले, पूंछ बाद में।
अलजेब्रा आईएनडी की पोस्ट में 1800 लाइक्स आए, जहां लिखा गया कि हर बाइट के लिए जिम्मेदारी तय होगी। सनातन प्रभात ने लिखा है- सार्वजनिक सुरक्षा पहले, रोमांटिसाइजेशन बंद करो। कुल मिलाकर, एक्स पर लोगों का निष्कर्ष विभाजित लेकिन समर्थन की ओर झुका हुआ लगता है। अधिकांश पोस्ट्स मानते हैं कि यह लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान है। एनिमल लवर्स इसे जानवरों के प्रति क्रूरता मानते हैं, लेकिन नियंत्रण समर्थक इसे मानव अधिकारों की जीत बताते हैं।
सहकारी बैंकों में भर्ती की तैयारी
प्रदेश के जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों में अध्यक्ष, और उपाध्यक्ष पद पर नियुक्तियां हुई है। नवनियुक्त पदाधिकारियों की रविवार को पार्टी दफ्तर कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में बैठक हुई। ये पदाधिकारी, सहकारिता मंत्री केदार कश्यप से मिलने आए थे, लेकिन उनके राजधानी से बाहर होने की वजह से मुलाकात नहीं हो पाई। दो-तीन दिनों में बैंक पदाधिकारी, सहकारिता मंत्री से मिलेंगे।
मुलाकात की बड़ी वजह यह है कि रायपुर और एक-दो बैंकों को छोडक़र बाकी बैंक घाटे में हैं। रायपुर सहित कई बैंकों में कर्मचारियों की भारी कमी है। धान खरीदी की वजह से बैंकों पर काफी दबाव है। नव नियुक्त पदाधिकारी चाहते हैं कि सरकार, बैंकों में भर्तियों की अनुमति दें। यही नहीं, अंबिकापुर सहित कुछ बैंकों में भ्रष्टाचार की गंभीर शिकायतें आई है। जांच भी चल रही है। बैंक पदाधिकारी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के मामलों पर प्रभावी कार्रवाई हो। इसके अलावा खुद की सुविधाएं बढ़ाने की भी मांग है। देखना है कि नवनियुक्त पदाधिकारियों की मांगों पर सरकार क्या फैसला लेती है।
नाच-गाने की चकाचौंध में हाशिये पर संघर्ष
यह तस्वीर गरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लॉक की है। उसी दिन की, जब उसी इलाके से प्रशासनिक अफसरों और पुलिसकर्मियों के नर्तकियों के साथ थिरकते, नोट उड़ाते दृश्य सैकड़ों प्लेटफॉर्म पर वायरल हुए। वह तस्वीर हर जगह दिखी, खूब साझा हुई। लेकिन यह तस्वीर, जहां आदिवासी अपने हक के लिए सडक़ पर बैठे हैं, कहीं-कहीं ही जगह बना पाई।
12 जनवरी को आदिवासी बहुल राजापड़ाव और आसपास की 8 पंचायतों के 30 गांवों के ग्रामीणों ने इस साल पहली बार नेशनल हाईवे जाम कर दिया। दोनों ओर सैकड़ों वाहनों की लंबी कतार लग गई। पिछले साल वे चार बार सडक़ जाम कर चुके हैं। मुद्दा तब भी वही था, आज भी वही है बिजली।
ये गांव उदंती-सीता नदी अभयारण्य के अधीन हैं। यहां बिजली लाइन की मंजूरी वर्षों पहले मिल चुकी है। अभयारण्य के कोर एरिया में गांवों के होने के कारण अंडरग्राउंड बिजली लाइन बिछाई जानी है। लेकिन मंजूरी के बावजूद काम ठप पड़ा है। बिजली और वन विभाग के अफसरों से पूछा जाता है तो जवाब मिलता है- बजट नहीं है।
साल 2023 में कुछ सीमित काम जरूर हुआ, दो-तीन गांवों में आंशिक प्रगति दिखी। उसके बाद पिछले दो से ढाई साल से हालात जस के तस हैं। रोशनी पहुंची नहीं, अंधेरे में जिंदगी चल रही है।
जिस इलाके में बजट का अभाव बताकर आदिवासी समुदाय को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है, उसी इलाके के अफसरों के पास नाच-गाने में पैसे लुटाने का वक्त निकल आता है। सूरजपुर से लेकर गरियाबंद तक सिस्टम समस्याओं के समाधान से ज्यादा तमाशे में मशगूल है।
जांच और प्रमोशन
आईएएस के वर्ष-2010 बैच के चार अफसर सारांश मित्तर, पदुम सिंह एलमा, रमेश कुमार शर्मा, और धर्मेश कुमार साहू सचिव के पद पर पदोन्नत हुए। इसी बैच के दो अफसर पति-पत्नी जेपी मौर्य, और रानू साहू पदोन्नति से वंचित रह गए। दोनों के खिलाफ ईओडब्ल्यू-एसीबी, और ईडी कोयला घोटाला प्रकरण की जांच कर रही है। रानू तो निलंबित है, लेकिन जेपी मौर्य पर कोई विभागीय कार्रवाई नहीं हुई है। ऐसे में मौर्य के पदोन्नति की अटकलें लगाई जा रही थी, मगर उनकी भी पदोन्नति रूक गई। अब आईपीएस अफसरों की पदोन्नति लिस्ट पर निगाहें टिकी हुई है।
दर्जनभर आईपीएस अफसर एक जनवरी से पदोन्नति के पात्र हो गए हैं। इनमें 99 बैच के आईपीएस डॉ. आनंद छाबड़ा भी हैं, जो कि आईजी से एडीजी के पद पर पदोन्नति का प्रस्ताव है। इसी तरह डीआईजी से आईजी के पद पर पारूल माथुर, प्रशांत अग्रवाल, डी श्रवण, और नीथू कमल की पदोन्नति का भी प्रस्ताव है।
बताते हैं कि कुछ अफसर जांच एजेंसियों के घेरे में आए हैं। उनके यहां जांच पड़ताल भी हुई थी। मगर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब जेपी मौर्य की पदोन्नति रोकी गई है, तो जांच के घेरे में आए पुलिस अफसरों की पदोन्नति भी रूक सकती है। चर्चा है कि जांच के घेरे में आए पुलिस अफसरों को पदोन्नति के लिए जरूरी विजिलेंस क्लीयरेंस जारी नहीं हो पाया है। ऐसे में पदोन्नति प्रस्ताव अटका पड़ा है। देखना है आगे क्या होता है।
हेलमेट नहीं तो काम नहीं
बढ़ती सडक़ दुर्घटनाओं से जीवन को सुरक्षित रखने हेलमेट नि:संदेह आवश्यक है। जो नहीं पहनते हैं उनके लिए अनिवार्य करने बिना हेलमेट पेट्रोल नहीं, गाड़ी की डिलीवरी के समय हेलमेट देने जैसी व्यवस्थाएं की गई। इनका भी पालन नहीं हो रहा। अब प्रशासन ने एक नया तरीका अपनाया है।अब बिना हेलमेट कलेक्टोरेट में प्रवेश निषेध कर दिया है। ऐसे लोगों को पकडऩे गेट पर ही सिपाही बिठा दिए गए हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि आम लोग शासकीय कार्यों के लिए भटक रहे हैं।
कलेक्टोरेट परिसर में कोषालय, खाद्य,खनिज, न्यायालय, पंजाब नेशनल बैंक, बाजू में कोर्ट आदि अनेक कार्यालय हैं, जो आम जनता से जुड़े हुए हैं। यहां आने वाले ग्रामीण चालान का शिकार हो रहे हैं। और शहरी आम जन,कर्मचारी, अधिवक्ताओं से ट्रैफिक पुलिस वालों से की बहस होती है। वे कहते हैं कि अब नेता चुनाव में हेलमेट पहन के आएंगे तभी वोट देंगे। आज एक ऐसे ही अधिवक्ता ने पुलिस कर्मियों को बताया कि यह जनतंत्र के विपरीत है। भारतीय संविधान की उद्देशिका जनता का, जनता के द्वारा,जनता के लिए की नीति अंतिम सांस ले रही है। जितनी दुर्घटनाएं हेलमेट के बिना हुई या मृत्यु हुई उससे अधिक शराब के नशे में हुई। शराबबंदी क्यों नहीं किया जाता। कलेक्टर कार्यालय के अंदर में ही आबकारी विभाग है जहां बिना हेलमेट के प्रवेश वर्जित है, अच्छा होता बिना शराब के प्रवेश वर्जित होता है शराबबंदी होती।
कुछ और खबरें अफसरों की
मंत्रालय में एक बड़े प्रशासनिक फेरबदल की तैयारी है। आईएएस के तीन अफसर डॉ. प्रियंका शुक्ला, जगदलपुर कलेक्टर एस हरीश, और बलौदाबाजार-भाटापारा कलेक्टर दीपक सोनी केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। तीनों अफसरों की पोस्टिंग भी हो गई है। तीनों अफसरों को एक-दो दिन के भीतर रिलीव किया जा सकता है।
चर्चा है कि कुछ निगम-मंडल अध्यक्षों के अलावा सरकार के एक मंत्री ने अपने विभाग के संचालनालय प्रमुख को बदलने के लिए सीएम से गुहार लगाई है। ये सभी अपने मातहत अफसरों से नाखुश चल रहे हैं। कहा जा रहा है कि फेरबदल की सूची में इन सभी के नाम हो सकते हैं। मंत्री जी का तर्क है कि सरकार बदलने के साथ ही तकरीबन सभी विभागों के प्रमुखों को बदला जा चुका है। मगर उनका विभाग फेरबदल से अछूता रहा है। देखना है कि क्या कुछ बदलाव होता है।
एक मात्रा ने छीन ली नौकरी...
तिल्दा ब्लॉक के नकटी स्कूल में अर्धवार्षिक परीक्षा का प्रश्न पत्र तैयार करने में हुई गड़बड़ी और कथित रूप से धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के मामले की जांच हो गई है और कार्रवाई का ऐलान भी कर दिया गया है। कार्रवाई को देखकर पता चलता है कि शिक्षा विभाग में जिम्मेदारी का बंटवारा कितना असंतुलित है।
सबसे पहले संविदा शिक्षिका नम्रता वर्मा जो अस्थायी कर्मचारी हैं, उनकी नौकरी सबसे आसानी से छीनी जा रही है। सवाल यह है कि प्रश्न-पत्र जैसा संवेदनशील काम इतने अनुभवहीन या संविदा शिक्षक को क्यों सौंपा गया? यह विभाग की व्यवस्था की नाकामी नहीं है?
जांच कमेटी के सामने प्रधान पाठक शिखा सोनी ने खुद गलती मानी कि विकल्प में बड़ी ऊ की मात्रा को राम शब्द के साथ जोडऩा था। प्रश्न पत्र उन्होंने देखा था पर इस गलती की तरफ ध्यान नहीं गया, इसलिये कुत्ते के नामों के विकल्प में रामू की जगह भगवान का नाम छपा हुआ बंट गया। इनका वेतन नौकरी से हटाई गई संविदा कर्मचारी से कई गुना अधिक होगा, पर कार्रवाई छोटी हुई है, निलंबन की। छत्तीसगढ़ में शिक्षकों की पहले से ही भारी कमी है। कुछ महीने बाद शायद उन्हें बहाल भी कर दिया जाए।
उनसे बड़े अधिकारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी होते हैं। सिस्टम के हिसाब से अनुभवी शिक्षक चुनने और सही मॉडरेटर तय करने की जिम्मेदारी उनकी ही थी। मगर उनको सिर्फ चेतावनी पत्र जारी किया गया है। जिला शिक्षा अधिकारी ने जांच करवाई है, मानो उनकी कोई गलती ही नहीं हो। उनके जिले में ऐसे कितने स्कूल हैं, जहां संविदा या अस्थायी कर्मचारियों, शिक्षकों के भरोसे प्रश्न पत्र तैयार करने जैसा संवेदनशील और गंभीर काम हो रहा है। क्या उन्होंने पहले पता किया है? वैसे उन्होंने जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, उसमें भी व्याकरण की अनेक त्रुटियां है, जो म में मात्रा छूट जाने से भी बड़ी है।
आस्था का मामला होने के कारण मामले ने तूल पकड़ा और सबसे नीचे की अस्थायी कर्मचारी को नौकरी से हाथ धोना पड़ गया। मामला आस्था से जुड़ गया था, वरना ऐसी गलतियां तो प्रश्न पत्रों में भी ढेरों मिल जाती हैं। पूरे के पूरे विकल्प ही गलत मिल जाते हैं, वह भी प्रायमरी स्कूलों में नहीं, बड़ी-बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी। चार विकल्पों में एक भी सही नहीं होता, या फिर एक से अधिक विकल्प सही निकलते हैं।
हालांकि एक बात सरकारी कामकाज में कॉमन है कि दोष ऊपर से नीचे धकेल दिया जाए। जब किसी चूक पर बवाल मचता है तो बलि का बकरा सबसे नीचे के स्टाफ को ही बनाया जाता है। असल में जिनकी जवाबदेही होती है वे बच निकलते हैं, बचा लिए जाते हैं। इस मामले में भी गलती पूरी व्यवस्था की है, पर नौकरी छिनी कम वेतन पर संविदा में काम कर रही एक शिक्षिका की।
महाराष्ट्र में छत्तीसगढिय़ा
महाराष्ट्र में म्युनिसिपल के चुनाव चल रहे हैं। यहां सभी दलों ने अपनी ताकत झोंक रखी है। छत्तीसगढ़ के कई कांग्रेस, और भाजपा नेता अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के प्रचार के लिए गए हैं। इन चुनावों की काफी अहमियत है। बीएमसी (बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन) का अकेले का बजट छत्तीसगढ़ सरकार के बजट से अधिक है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व की नजर म्युनिसिपल चुनाव पर है।
कांग्रेस से पूर्व मंत्री गुरु रूद्र कुमार के अलावा तीन विधायक दलेश्वर साहू, संदीप साहू, और यशोदा वर्मा की ड्यूटी लगाई गई है। ये नेता नागपुर म्युनिसिपल में पार्टी प्रत्याशियों का प्रचार कर रहे हैं। नागपुर, और आसपास के इलाकों में छत्तीसगढ़ के लोग काफी संख्या में रहते हैं। ये कांग्रेस नेता छत्तीसगढिय़ों के बीच अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं।
भाजपा से धमतरी के मेयर रामू रोहरा, और रायपुर जिला उपाध्यक्ष ललित जैसिंघ की प्रचार में ड्यूटी लगाई गई है। रामू, मुंबई में भाजपा प्रत्याशियों के लिए वोट मांग रहे हैं, तो ललित जैसिंघ की ड्यूटी उल्हासनगर में हैं। ललित, उल्हास नगर के भाजपा विधायक कुमार ऐहलानी के साथ चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। कुल मिलाकर यहां मुकाबला काफी दिलचस्प है।
अपनी ही फाइलों के लिए आरटीआई!!
बेमेतरा जिले के देवकर (साजा) नगर पंचायत के वर्तमान अध्यक्ष सुरेश सिहोरे हैं। वो पहले कांग्रेस में थे, लेकिन टिकट नहीं मिली, तो उन्होंने दुखी आत्मा पार्टी के नाम से नया दल बनाया, और नगरीय निकाय चुनाव में उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों के उम्मीदवारों को पीछे छोडक़र जीत दर्ज की।
हालांकि, चुनाव जीतने के बाद उन्हें प्रशासन चलाने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें पार्षदों का पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पा रहा है। सहारे से जुड़े लोगों का कहना है कि सीएमओ (मुख्य नगर पालिका अधिकारी) का रवैया भी सहयोगात्मक नहीं है और वे अध्यक्ष पर प्रशासनिक दबाव बनाए रखते हैं।
स्थिति इतनी जटिल हो गई है कि निर्वाचित अध्यक्ष को अपनी ही नगर पंचायत की फाइलों और कार्यों की जानकारी पाने के लिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) लगाना पड़ रहा है। यह इस बात का संकेत है कि देवकर नगर पंचायत में चुने हुए प्रतिनिधि की स्थिति कितनी कमजोर हो गई है और प्रशासनिक तंत्र किस हद तक हावी हो चुका है। देवकर आज इस बात का उदाहरण बन गया है कि एक निर्वाचित अध्यक्ष किस तरह सिस्टम के सामने मजबूर हो सकता है।
दिग्गजों में मुकाबला
भाजपा के दो दिग्गज आपस में भिड़ गए हैं। दोनों ही ऊंचे ओहदों पर हैं, और विनम्र माने जाते हैं। सामाजिक रूप से भी एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं। बावजूद इसके दोनों के बीच मतभेद की पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है।
बताते हैं कि दोनों के बीच विवाद की खबर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंची है। पहले तो स्थानीय संगठन के बड़े नेताओं ने दखल देकर शांत कर दिया था, लेकिन अब मतभेद गहराने लगे हैं। फिलहाल तो दोनों ही सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी से परहेज कर रहे हैं, लेकिन देर-सबेर दोनों के बीच विवाद सार्वजनिक होने के आसार दिख रहे हैं। एक कोशिश यह भी चल रही है कि दोनों दिग्गजों को साथ बिठाकर विवाद सुलझा लिया जाए, लेकिन अब तक इसमें सफलता नहीं मिली है। देखना है आगे क्या होता है।
सरकार में सराहना लायक काम

साय सरकार अब बेहतर कार्यों के लिए विभागों, और जिलों को पुरस्कृत कर रही है। शनिवार को सीएम विष्णुदेव साय ने एक कार्यक्रम में सुशासन, और नवाचार के लिए पांच विभागों और जिलों को पुरस्कृत किया। इनमें दंतेवाड़ा, जशपुर, जीपीएम, गरियाबंद व नारायणपुर हैं।
5 विभागों की योजनाओं की काफी प्रशंसा हुई, और विभाग प्रमुख को सम्मानित किया गया। इनमें पंचायत ग्रामीण विकास विभाग की चर्चित मनरेगा की क्यूआर सूचना प्रणाली शामिल है। बिना कोई खर्च के मनरेगा के कार्यों में पारदर्शिता आई है। ग्राम पंचायतों में क्यूआर चस्पा कर दिए गए हैं।
कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन कर मनरेगा की पिछले 5 साल की सम्पूर्ण जानकारी ले सकते हैं। इसका अन्य राज्य भी अनुशरण कर रहे हैं। इसके लिए ग्रामीण विकास विभाग की प्रमुख सचिव निहारिका बारिक सिंह और मनरेगा आयुक्त तारण प्रकाश सिन्हा को पुरस्कृत किया गया।
इसी तरह वन विभाग में ई-कुबेर डिजिटल भुगतान प्रणाली लागू की गई है। जिससे विभागीय कार्यों में भुगतान में पारदर्शिता आई है, और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। इन सबके बीच गरियाबंद जिले में हाथी ट्रैकिंग एवं अलर्ट ऐप की भी काफी सराहना हुई है। इससे मोबाइल पर हाथियों का लोकेशन पता चलता है।
आबकारी विभाग की ई-गर्वेनेंस सुधार, और उद्योग विभाग के वन क्लिक सिस्टम विन्डो सिस्टम को भी सराहा गया, और सीएम ने पुरस्कृत किया। कुल मिलाकर अब बेहतर कार्यों की सराहना होने लगी है।
बिना नेता के विज्ञापन...

यह तस्वीर ‘पहल’ के मार्च 1977 के अंक के अंदरूनी कवर पेज पर छपा एक सरकारी विज्ञापन है। यह वह दौर था, जब सरकारी संदेश सादगी, संवेदना और सीधे संवाद के साथ जनता तक पहुँचते थे। नारे छोटे होते थे, लेकिन अर्थ गहरे। इस पोस्टर में बाल विवाह के खिलाफ संदेश साफ है। मां अपनी नाबालिग बेटी के कान में काम की बात बता रही है। 18 की होने तक विवाह मत करना, कानून इसकी मनाही करता है।
अस्पतालों की दीवारों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और सिनेमाघरों के बाहर ये पोस्टर लगे होते थे। उद्देश्य किसी दल या नेता प्रचार नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाना था।
आज हालात बदल गए हैं। बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर नेताओं की विशाल तस्वीरें छाई रहती हैं, लेकिन संदेश कहीं कोने में सिमट जाता है या पूरी तरह गुम है। संदेश से ज़्यादा प्रदर्शन महत्वपूर्ण हो गया है।
फिर वही गलती दोहराई गई
बीते साल 10 अक्टूबर को राजधानी रायपुर के मेकहारा में एक एचआईवी पीडि़त महिला की पहचान उजागर कर दी गई थी। न केवल पहचान बताई गई बल्कि उसके नवजात की बेड के सामने एक पोस्टर लिखकर चिपका दिया गया था कि उसकी मां एचआईवी ग्रस्त है। महिला के पति ने मेडिकल कॉलेज के डीन और पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। स्वत: संज्ञान लेते हुए मुख्य सचिव से हलफनामा मांगा था। कोर्ट ने कहा था कि यह अमानवीय और अनैतिक कृत्य है। कोर्ट ने पीडि़त परिवार के लिए 2 लाख रुपये मुआवजा तय किया और दोषियों पर कार्रवाई का निर्देश दिया। दो लाख रुपये तो पीडि़त को दे दिए गए लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसके लिए जिम्मेदार स्टाफ पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस ने एफआईआर पर कोई एक्शन नहीं लिया, न ही राज्य के दूसरे अस्पतालों के लिए कोई दिशा निर्देश स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी किए गए। हालांकि दिशा-निर्देश जारी करने की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि आम लोगों को भी पता है कि एड्स पीडि़तों की पहचान उजागर नहीं की जानी चाहिए। मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोगों को इतना ज्ञान होगा, यह अपेक्षा स्वाभाविक रूप से की जा सकती है। मगर, एक बार फिर ऐसी ही घटना सामने आ गई है। एक माह पहले जगदलपुर के मेडिकल कॉलेज में डिलीवरी के लिए आई गर्भवती महिला की पहचान डॉक्टरों और वहां के स्टाफ ने उजागर कर दी। महिला के पति ने इस मामले में भी एफआईआर दर्ज करा दी। खबरों के मुताबिक एफआईआर के बाद पीडि़ता के परिवार को, खासकर महिला सदस्यों को फोन पर धमकियां दी गई। पुलिस ने न तो पहचान उजागर करने के मामले में कोई एक्शन लिया न ही धमकी के मामले में। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन बीते एक माह से जांच ही कर रहा है कि पहचान उजागर करने वाले स्टाफ के कौन से लोग हैं। एक परिसर का ही मामला है, फिर भी इतना वक्त लगा है। स्थिति यह है कि पीडि़त महिला के परिवार ने पुलिस को फिर बताया है कि पहचान उजागर होने के कारण उसे गांव और रिश्तेदारों के बीच उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़ रहा है। पीडि़ता तो गांव से वापस ही लौट चुकी है और वापस जाने से घबरा रही है। पुलिस ने यह सब बयान दर्ज किया है, पर कार्रवाई अब तक किसी के खिलाफ न उसने की है न ही अस्पताल प्रबंधन ने। ऐसी उम्मीद भी करना ठीक नहीं कि रायपुर के मामले में हाईकोर्ट के रुख को नजीर मानते हुए, जगदलपुर की पीडि़ता को भी कुछ मुआवजा देने की पहल सरकार करे।
ऑटो-बूम की तैयारी
छत्तीसगढ़ में ऑटो सेक्टर में बूम आने के आसार हैं। वजह यह है कि राजधानी रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान में 20 जनवरी से 5 फरवरी तक ऑटो एक्सपो लग रहा है। इसमें रोड टैक्स पर 50 फीसदी की छूट जैसे बड़े ऑफर दिए गए हैं। कैबिनेट ने रोड टैक्स में छूट के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इसके बाद से छत्तीसगढ़ के आसपास के पांच राज्यों से भी वाहन खरीदी के लिए लोग यहां आ सकते हैं।
बताते हैं कि ऑटो एक्सपो में रोड टैक्स के लिए सरकार पहले तैयार नहीं थी। वजह यह है कि पड़ोस के राज्यों की आपत्ति भी रही है। उनके यहां वाहनों की खरीदी कम हो जाती है। ग्राहक वहां से वाहन खरीदना पसंद करते हैं, जहां छूट ज्यादा होती है। चर्चा है कि ऑटो एक्सपो के लिए व्यापारी संस्था कैट ने मेहनत की थी। कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमर पारवानी तो यहां लगातार वित्त मंत्री ओपी चौधरी से चर्चा करते रहे हैं।
दिल्ली के भी कैट के पदाधिकारी छत्तीसगढ़ में ऑटो एक्सपो के लिए अपने-अपने संपर्कों से सरकार पर दबाव बनाते रहे हैं। चैम्बर के पदाधिकारी भी अपने-अपने स्तर पर जोर लगाते रहे हैं। व्यापारी संगठनों की मेहनत का नतीजा रहा कि ऑटो एक्सपो में सरकार ने रोड टैक्स में भारी भरकम छूट की घोषणा कर दी। इससे बड़ी संख्या में वाहनों की खरीदी होने के आसार हैं। स्वाभाविक है कि ऑटो डीलर काफी खुश हैं।
खबरों में बृजमोहन
विवादों के बीच बालोद के दुधली में शुक्रवार को जंबूरी की रंगारंग शुरुआत हो गई। इसमें देश-विदेश से 15 हजार स्काउट्स एंड गाइड्स शिरकत कर रहे हैं। जंबूरी के खिलाफ सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने मोर्चा खोल रखा है। वो खुद को स्काउट्स एंड गाइड्स के प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाने के तौर तरीके से खफा हैं। उन्हें मनाने की कोशिश भी हुई। गृहमंत्री विजय शर्मा ने बृजमोहन से चर्चा भी की, और इसके बाद बृजमोहन के तेवर नरम पड़ते दिखाई दिए।
बाद में स्काउट्स एंड गाइड्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनिल जैन के एक बयान से फिर नाराज हो गए। डॉ. जैन ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ तौर पर कह दिया कि बृजमोहन अग्रवाल की जगह गजेन्द्र यादव स्कूल शिक्षा मंत्री की हैसियत से पदेन प्रदेश अध्यक्ष हैं। उन्होंने बृजमोहन के निर्वाचित होने के दावे को भी खारिज कर दिया। डॉ. जैन ने कह गए कि चुनाव के लिए मुख्यालय से कभी ऑब्ज़र्वर नहीं भेजे गए थे।
डॉ. अनिल जैन, छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं। उनके बयान के बाद बृजमोहन की प्रतिक्रिया सामने आ गई। उनके दफ्तर ने बकायदा प्रेस नोट जारी किया, और बताया कि किस तरह नियमों में संशोधन कर बृजमोहन अग्रवाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था।
बृजमोहन ने यह भी बताया कि राष्ट्रीय मुख्यालय ने नियमों में संशोधन पर सहमति दी थी। इसका भी पत्र मीडिया को जारी किया। कुल मिलाकर बृजमोहन अब पीछे हटने के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह भी कल रायपुर में थे। वो वन मंत्री केदार कश्यप, और पूर्व स्पीकर गौरीशंकर अग्रवाल से उनके परिवार में शोक पर मिलने भी गए थे। खास बात ये है कि सौदान सिंह से आपसी बातचीत में बृजमोहन के तेवर की चर्चा होती रही। हल्ला तो यह भी है कि देर सबेर मामले पर हाईकमान दखल दे सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
कर्मफल का भय और जीरो टॉलरेंस

जेन जी के युग में ऐसे भी लोग हैं जो नेताओं को अवतार और भगवान की श्रेणी में रख देते हैं। नैतिकता तो यह कहती है कि जो ईष्ट और देव स्वरूप हैं, जिनके द्वारा सृष्टि के रचनाकारों में की जाती है उनके समकक्ष मानवों को न खड़ा किया जाए। खैर अंधभक्त ऐसा करें तो समझ में आता है लेकिन यह लोकतांत्रिक संस्था कार्यपालिका के ज्ञानी लोग ऐसा करें तो यह समझ नहीं आता। एक सरकारी विभाग ने छत्तीसगढ़ के शक्तिपीठों व देवी मंदिरों की प्रतिमाओं के चित्र टेबल कैलेंडर में छापे हैं, उनकी मंशा रही होगी कि अधिकारी कर्मचारी दिन की शुरुआत अपने छत्तीसगढ़ की देवी शक्तियों दर्शन के साथ करें ताकि उनमें भ्रष्टाचार के कर्मफल का भय हो। लेकिन देवी देवताओं के क्रम में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की तस्वीर भी लगा दी गई है, यानी वे भी पूजनीय और प्रात: स्मरणीय हो गए हैं? वैसे दिल्ली से लेकर रायपुर तक भ्रष्टाचार तो ज़ीरो टालरेंस से निपटा जा रहा है।
बिल्ली पालने से रुकेगा भ्रष्टाचार?
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले में सुनवाई करते हुए कल यह दलील नहीं मानी कि इनकी वजह से चूहों से बचाव होता है। छत्तीसगढ़ में हजारों की तादात में आवारा कुत्तों के होने के बावजूद चूहे बड़े-बड़े कांड कर रहे हैं, यह जज के नजरिये को सही ठहराता है। कबीरधाम जिले में एक सरकारी धान संग्रहण केंद्र से लगभग 26 हजार क्विंटल करीब 7 करोड़ रुपये का धान गायब है। अफसरों का दावा है कि यह धान चूहों, दीमकों और अन्य कीड़ों द्वारा नष्ट हो गया। गोदाम में रखा धान या तो पूरी तरह गायब है या क्षतिग्रस्त हो चुका है।
बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद कई बार ऐसी घटनाएं सामने आईं जहां जब्त की गई शराब के गायब होने का दोष चूहों पर डाला गया। सबसे चर्चित मामला 2017 का है, बिहार पुलिस ने दावा किया कि हजारों लीटर शराब चूहों ने पी ली। अकेले पटना से लगभग 9 लाख लीटर शराब गायब हो गई थी। 2018 में 10 लाख लीटर शराब चूहों द्वारा पी ली गई। धनबाद के व्यापारियों ने 800 बोतल शराब गायब होने का दोष चूहों पर मढ़ दिया था। यूपी में भारतीय खाद्य निगम के गोदाम से 3 करोड़ रुपये कीमत का अनाज चूहों द्वारा खा लिया गया। यहीं पर दो तीन साल पहले पुलिस गोदाम से 500 किलो गांजा गायब हो गया था। पुलिस अफसरों ने दावा किया इसे चूहे खा गए।
दरअसल ये घटनाएं दिखाती हैं कि कैसे सरकारी भंडारण में लापरवाही या भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए चूहों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट जज का सुझाव मान लिया जाए तो कुत्तों की जगह बिल्लियों को पालने और उनकी आबादी बढ़ानी चाहिए, जो चूहों से निपटने के लिए अधिक सक्षम जीव है।
जम्बूरी के बाद?
प्रदेश के ताकतवर नेता, और सांसद बृजमोहन अग्रवाल के तेवर की राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा हो रही है। उन्होंने जिस तरह ‘जंबूरी’ का खुला विरोध किया है, उससे भाजपा संगठन और सरकार में हलचल मची है। दिलचस्प बात ये है कि बृजमोहन के विरोध के बाद भी शुक्रवार को ‘जंबूरी’ का रंगारंग उद्घाटन हो गया।
बालोद के दुधली में राष्ट्रीय रोवर-रेंजर जंबूरी हो रहा है। इसमें देश-विदेश से कुल 15 हजार रोवर-रेंजर और सीनियर स्काउट गाइड शिरकत कर रहे हैं। बृजमोहन, स्काउट्स एंड गाइड्स के राज्य इकाई के अध्यक्ष थे। वो शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफे के बाद भी अध्यक्ष बने रहे, और जब गजेन्द्र यादव स्कूल शिक्षा मंत्री बने तो फिर 13 दिसंबर 2025 को स्काउट्स एंड गाइड्स की राज्य इकाई के अध्यक्ष बन गए।
गजेन्द्र यादव लंबे समय से स्काउट्स एंड गाइड्स से जुड़े रहे हैं। वो 2014 से 2019 तक स्काउट्स एंड गाइड्स के मुख्य आयुक्त रह चुके हैं। इस संस्था की अहमियत वो जानते हैं, और प्रदेश से हजारों युवा संस्था से जुड़े हैं। बताते हैं कि बृजमोहन की नाराजगी इस बात को लेकर रही है कि उनकी जानकारी के बिना ही अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, जिसे वो असंवैधानिक बता रहे हैं। वो इसको लेकर हाईकोर्ट भी गए हैं।
उन्होंने इस पूरे कार्यक्रम को स्थगित करने की घोषणा की थी, और आयोजन की तैयारियों में खर्चों को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। बृजमोहन की नाराजगी की परवाह किए बिना पूरी सरकार गजेन्द्र यादव के साथ खड़ी हो गई है, और कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटी है। चर्चा है कि बृजमोहन ने स्काउट्स एंड गाइड्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनिल जैन से चर्चा कर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।
डॉ. अनिल जैन, छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं। उन्होंने सीएम, और स्कूल शिक्षा मंत्री से चर्चा भी की। चर्चा का लब्बोलुआब यह रहा कि बृजमोहन की तमाम आपत्तियों को नजर अंदाज कर दिया गया, और सरकार व पार्टी के कुछ प्रमुख नेता आयोजन को सफल बनाने में जुट गए हैं। डॉ. जैन भी रायपुर आ गए हैं, और वो खुद पूरे आयोजन की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। पहली नजर में बृजमोहन आयोजन का विरोध कर अलग-थलग होते दिख रहे हैं। उनकी हाईकोर्ट में याचिका पर सुनवाई की तिथि तय नहीं हुई है। कुल मिलाकर ‘जंबूरी’ निपटने के बाद ही सुनवाई के आसार हैं। ऐसे में बृजमोहन के विरोध के बाद भी ‘जंबूरी’ को झटके के रूप में देखा जा रहा है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि पार्टी हाईकमान देर सबेर इस पूरे मामले को संज्ञान में ले सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
आसंदी दूर है!
52 एकड़ में 350 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बना नया विधानसभा भवन भले ही विशाल हो, लेकिन इससे विधानसभा सचिवालय पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। सचिवालय का कहना है कि भवन को आवश्यकता से अधिक फैलाकर बनाया गया है, जिससे पूरे परिसर में कॉम्पैक्टनेस की कमी है। सदन भी लंबे आकार में निर्मित किया गया है, जिसके कारण विधायक आसंदी से काफी दूर बैठे हैं। दरअसल, सदन का मानक आकार अर्धवृत्ताकार होना चाहिए था, लेकिन उसे लंबा बना दिया गया। शीत सत्र के दौरान सामने आई ऐसी कई कमियों को सचिवालय ने नोट किया है और इनके सुधार के लिए लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को अवगत करा दिया गया है।
कुछ ऐसे कार्य हैं, जिन्हें बजट सत्र से पहले पूरा किया जा सकता है, लेकिन ईएनसी का कहना है कि उनके पास इसके लिए बजट में एक लाख रुपये भी उपलब्ध नहीं हैं। माना जा रहा है कि अब नए बजट में करोड़ों रुपये का प्रावधान कर मानसून सत्र तक इन खामियों को दूर करने की योजना बनाई जाएगी। प्रमुख खामियों में सदन में अध्यक्ष और सचिव की आसंदी को शेष सदस्यों से काफी दूर रखा जाना शामिल है। इसके अलावा मुख्यमंत्री और मंत्रियों के कक्ष भी आवश्यकता से अधिक बड़े बनाए गए हैं, जबकि उनमें सुविधाओं और इंटीरियर का स्पष्ट अभाव है।
इसी तरह पत्रकार दीर्घा की व्यवस्था में भी कई कमियां सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर, नोटिंग के लिए कुर्सियों में नोटपैड की व्यवस्था नहीं है और ईयरफोन भी उपलब्ध नहीं हैं। दरअसल, भवन के सिविल और मौजूदा इंटीरियर कार्य के दौरान ईएनसी और प्रभारी अभियंताओं ने विधानसभा सचिवालय से कोई राय नहीं ली और निर्माण कार्य चलता रहा। अब सचिवालय चाहता है कि बजट सत्र से पहले इन खामियों को दूर किया जाए, लेकिन बजट की कमी आड़े आ रही है। आगे क्या होता है, यह देखना होगा।
स्मार्ट मीटर: उपभोक्ताओं की चिंता से मुंह चुराता विभाग

छत्तीसगढ़ में स्मार्ट मीटर को लेकर बिजली के घरेलू उपभोक्ताओं में काफी दिनों से असंतोष देखा जा रहा है। एक जागरूक नागरिक, इंजीनियरिंग कॉलेज के रिटायर्ड एसोसिएट प्रोफेसर घनाराम साहू की हालिया फेसबुक पोस्ट से पता चलता है कि इस मुद्दे पर बिजली विभाग के अफसर कुछ न कुछ तो छिपाना चाहते हैं। प्रो. साहू ने बिना अपनी मांग के अपने घर में लगाए गए स्मार्ट मीटर के तकनीकी प्रमाण पत्र की मांग की। छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ने इसे देने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, उन्हें शुल्क जमा कर परीक्षण कराने की सलाह दी गई। यह मामला वे विद्युत उपभोक्ता शिकायत निवारण फोरम में ले गए हैं। पहले 8 जनवरी को सुनवाई होने वाली थी, अब वहां तारीख बढ़ाकर 14 जनवरी कर दी गई है।
राज्य में करीब 61 लाख बिजली उपभोक्ता हैं। इनमें से 25 लाख के घरों में स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं या लगाए जा रहे हैं। हजारों उपभोक्ताओं की शिकायत है कि इन मीटरों के लगने के बाद उनके बिजली बिल अनाप-शनाप बढ़ गए हैं। पुराने मीटरों की तुलना में ये बिल इतने भारी-भरकम आ रहे हैं कि आम आदमी का बजट हिल गया है। तब क्या यह संभव नहीं कि मीटर में कोई तकनीकी गड़बड़ी हो, जो गलत रीडिंग दे रही हो? एक उपभोक्ता को यह जानने का पूरा हक है कि उसके घर जो मशीन लगाई गई है उसकी गणना और स्पीड सही है या नहीं। बिजली विभाग तकनीकी प्रमाण पत्र को क्यों छिपा रहा है? निर्माता द्वारा किए गए टेस्ट की रिपोर्ट देना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए। अगर सब कुछ ठीक है, तो पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जा रही? बिजली विभाग ने हाल ही में छूट घटा दी, टैरिफ बढ़ा दिया। अब स्मार्ट मीटर पर सवाल किए जाने पर वह दुनिया भर के कायदे-कानून बता रहा है। बजाय, सरल तरीके से जानकारी उपलब्ध कराने के। पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करें तभी स्मार्ट मीटर जैसी तकनीक वाकई ‘स्मार्ट’ साबित होगी, अभी तो यह मशीन बोझ लग रही है।
राज्य से मंत्री बढ़ेंगे?
मकर संक्रांति के बाद देश की राजनीति में उथल-पुथल के संकेत हैं। राष्ट्रीय दल भाजपा, और कांग्रेस संगठन में बदलाव की प्रक्रिया चल रही है। इन सबके बीच संसद सत्र के आसपास केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें लगाई जा रही है। ऐसी चर्चा है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है।
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद यहां से अब तक एक भी कैबिनेट मंत्री नहीं बने हैं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में छत्तीसगढ़ से रमेश बैस, और दिलीप सिंह जूदेव मंत्री थे। मगर दोनों ही राज्यमंत्री थे। ये अलग बात है कि राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे। इसके बाद दस साल के यूपीए सरकार में पहले पांच साल में छत्तीसगढ़ को प्रतिनिधित्व नहीं मिला। मगर अगले पांच साल में डॉ. चरणदास महंत को केन्द्रीय राज्यमंत्री के रूप में जगह मिली।
यूपीए सरकार के बाद फिर एनडीए की सरकार बनी। पहले कार्यकाल में रेणुका सिंह राज्यमंत्री रही। दूसरे कार्यकाल में विष्णुदेव साय राज्यमंत्री के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहे। तीसरे कार्यकाल में वर्तमान में छत्तीसगढ़ से बिलासपुर के सांसद तोखन साहू अकेले राज्यमंत्री हैं। जबकि पड़ोसी राज्य झारखंड में भाजपा के आठ सांसद हैं, यहां से तीन मंत्री हैं। इनमें से अर्जुन मुंडा, और अन्नपूर्णा देवी कैबिनेट मंत्री, और संजय सेठ राज्यमंत्री हैं। ऐसे में अब छत्तीसगढ़ से प्रतिनिधित्व बढऩे की उम्मीद जताई जा रही है।
पार्टी के कुछ लोगों के मुताबिक केन्द्र सरकार ने नक्सलवाद के खात्मे के लिए दम लगाया है, और अगले दो-तीन महीनों में नक्सलवाद का पूरी तरह खात्मा हो जाएगा। ऐसे में नक्सल प्रभावित बस्तर में विकास की रफ्तार तेज करने के लिए हर संभव कोशिश हो रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कह चुके हैं कि अगले पांच साल में बस्तर देश के विकसित संभागों में होगा। चर्चा तो यह भी है कि बस्तर के सांसद महेश कश्यप को अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। कुछ लोग तो उन्हें केन्द्र में मंत्री पद के दावेदारों के रूप में भी देख रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।
राजनीतिक भाषा पर अफसर का निलंबन

मध्यप्रदेश के इंदौर में दूषित पानी की सप्लाई का मामला देशभर में सुर्खियों में है। इस पूरे प्रकरण में यदि किसी बड़े अफसर पर कार्रवाई हुई हो तो वह देवास के एसडीएम आनंद मालवीय का निलंबन है। नहीं, दूषित पानी की सप्लाई में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। उनकी गलती कहीं और थी जो सिस्टम के लिए अक्षम्य हो गई।
एसडीएम ने इंदौर की घटना को लेकर कांग्रेस को प्रदर्शन की अनुमति दी। यह सामान्य बात है। पर अनुमति देने वाले आदेश में जो शब्द लिखे गए, वही उनके लिए संकट बन गया। आदेश में उल्लेख किया गया कि इंदौर में भाजपा शासित नगर निगम द्वारा सप्लाई किए गए कथित रूप से मल-मूत्रयुक्त पानी से 14 लोगों की मौत हुई और 2800 से अधिक लोग बीमार पड़े। साथ ही, प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की कथित टिप्पणी घंटा को असंवेदनशील बताते हुए, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के निर्देश पर विरोध प्रदर्शन की घोषणा की गई है।
आदेश में यह भी लिखा गया कि इस अमानवीय व्यवहार के विरोध में भाजपा सांसदों और विधायकों के निवास के सामने घंटा बजाकर प्रदर्शन किया जाएगा। प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संबंधित अधिकारियों की ड्यूटी लगाई जाती है। यानी, प्रदर्शन की अनुमति ही नहीं दी गई, बल्कि प्रदर्शन के उद्देश्य और राजनीतिक आरोपों को भी आदेश का हिस्सा बना दिया गया।
यह आदेश एसडीएम पर भारी पड़ गया। आदेश जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर उन्हें निलंबित कर दिया गया। उज्जैन संभाग के आयुक्त द्वारा जारी निलंबन आदेश में कहा गया कि एसडीएम ने रीडर द्वारा तैयार किए गए आदेश पर बिना समुचित परीक्षण किए हस्ताक्षर कर दिए।
यहां पता चलता है कि सरकारी दफ्तर किस ढर्रे पर चलते हैं। सामान्य समझ यही कहती है कि रीडर ने कांग्रेस के ज्ञापन की भाषा को लगभग शब्दश: आदेश में उतार दिया होगा। फ्रेश आदेश तैयार करने की जहमत नहीं उठाई। उस आदेश पर अंतिम हस्ताक्षर एसडीएम के थे, जिन्होंने उस आदेश को दस्तखत से पहले पढऩे का कष्ट नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक शब्दावली और आरोपों से भरे आदेश का ठीकरा एसडीएम के सिर पर फूट गया।
ईडी में अब बाकी की बारी
भारतमाला परियोजना की ईडी पड़ताल कर रही है। पिछले दिनों आधा दर्जन से अधिक ठिकानों पर छापेमारी भी की, लेकिन किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई। ईडी की टीम दो प्रमुख जमीन कारोबारियों से पूछताछ कर रही है। चर्चा है कि ईडी उन लोगों को घेर सकती है, जो पहले बच गए थे। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने घोटाले पर चुनिंदा लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी, जिनमें से ज्यादातर को जमानत मिल गई है। सिर्फ भू-राजस्व अफसर बचे हैं, जो कि फरार चल रहे हैं। हल्ला है कि जमीन कारोबारियों ने कुछ अफसरों को उपकृत किया था। अफसरों के सहयोग से अधिक मुआवजा पाने में सफल रहे। ये अफसर अब तक बचे रहे हैं, लेकिन अब ईडी उनसे पूछताछ कर सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
मंत्रियों के स्टाफ के किस्से
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार को 2 साल पूरे हो गए हैं। इस मौके पर राज्य सरकार के मंत्री विभागवार अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं, तो इस दौरान मंत्रियों के निजी स्थापना में लगातार ओएसडी, पीए बदले जाने पर भी चर्चा हो रही हैं।
वित्तमंत्री ओपी चौधरी को छोड़ सभी मंत्रियों के ओएसडी बदले गए हैं। इसके पीछे कई प्रशासनिक कारण बताए जा रहे हैं। इनका मंत्री के साथ तालमेल न होना, मंत्री के क्षेत्र और विभागीय काम में ओएसडी का सक्रिय ना होना, मंत्रियों को अंधेरे में रख दाएं-बाएं से काम करवाना आदि-आदि। भाजपा संगठन को मिली शिकायतों पर भी एक दो बदलाव किए गए। यह बदलाव विपक्ष के लिए सीधे आरोपों का अवसर दे जाते हैं।
पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा कि कहीं ना कोई कोई गड़बड़ी हुई होगी इसलिए हटाया गया है। इन आरोपों पर डिप्टी सीएम अरुण साव का कहना है प्रशासनिक परिवर्तन समय-समय पर होते रहता है। कांग्रेसियों को केवल भ्रष्टाचार ही दिखता है। जिन्होंने अपने कांग्रेस शासन काल में भ्रष्टाचार में रिकार्ड कायम किए। कांग्रेस सरकार सिंडिकेट तरीके से भ्रष्टाचार करती थी। जिसमें कांग्रेस सरकार में कई अधिकारी शामिल थे। जिनमें कई जेल में तो कई पर मुकदमे चल रहे हैं।
आरोप-प्रत्यारोपों से परे दो वर्षों में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के ओएसडी संजय मरकाम और अजय कन्नौजे हटाए गए। उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन के ओएसडी भागवत जायसवाल, पीए प्रवीण पांडेय हटाए गए। खाद्य मंत्री दयालदास बघेल ने ओएसडी संजय गजघाटे हटाए गए। डिप्टी सीएम अरुण साव के ओएसडी विपुल गुप्ता हटाए गए।
राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा की निजी स्थापना से ओएसडी दुर्गेश वर्मा और बी रघु, पीए दुर्गेश धारे को हटाया गया है। कृषि मंत्री रामविचार नेताम के ओएसडी तारकेश्वर देवांगन, वन मंत्री केदार कश्यप के ओएसडी सुनील तिवारी और जितेंद्र गुप्ता हटाए गए। तीनों नए मंत्री गजेन्द्र यादव, गुरु खुशवंत साहेब, और राजेश अग्रवाल भी अपनी निजी स्थापना में बदलाव कर चुके हैं। पिछली सरकार में भी मंत्रियों की निजी स्थापना से ओएसडी-पीए हटाए गए थे, लेकिन इस बार संख्या अधिक होने पर चर्चा ज्यादा हो रही है।
लोकार्पण का स्थगन, सियासत का प्रदर्शन!
बिलासपुर नगर निगम की ओर से सोमवार को सकरी क्षेत्र में करीब 50 करोड़ रुपये के विकास कार्यों के लोकार्पण और भूमिपूजन का कार्यक्रम तय किया गया था। समय सुबह 11.30 बजे होना था, लेकिन कुछ घंटे पहले ही सूचना आई कि कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया है। सरकारी स्तर पर वजह बताई गई कि कुछ और लोकार्पण-भूमिपूजन कार्यों को कार्यक्रम में शामिल किया जाना है, इसलिए आयोजन बाद में होगा।
चूंकि कार्यक्रम नगर निगम की ओर से तय था, इसलिए जब महापौर पूजा विधानी से ही कारण पूछा गया। उन्होंने अलग तर्क दिया। उनके अनुसार, सकरी क्षेत्र तखतपुर विधानसभा का हिस्सा है। यहां के विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर की तबीयत ठीक न होने के कारण कार्यक्रम टालना पड़ा।
मगर स्थगन की जड़ निमंत्रण पत्र और प्रचार सामग्री में दिखी। इनमें बिलासपुर सांसद एवं केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल का नाम शामिल ही नहीं किया गया था। कहा जा रहा है कि दोनों नेताओं के नाम गायब होने से मामले ने तूल पकड़ लिया और अंतत: कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। मीडिया के सवालों पर महापौर के जवाबों ने भी अप्रत्यक्ष रूप से इसी आशंका की पुष्टि कर दी। उन्होंने कहा कि अगली बार निमंत्रण पत्र प्रकाशित करते समय ध्यान रखा जाएगा कि किसी जनप्रतिनिधि का नाम न छूट जाए।
यह पहला मौका नहीं है जब विधायक अमर अग्रवाल को ऐसी उपेक्षा का सामना करना पड़ा हो। महज 15 दिन पहले, मुख्यमंत्री के मुख्य आतिथ्य में हुए युवा महोत्सव में उनकी सीट पीछे रखी गई थी। समर्थकों की नाराजगी के बाद और मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से स्थिति संभली, लेकिन असंतोष मंच पर सबके सामने दिख गया।
दरअसल, इन दिनों बिलासपुर भाजपा के भीतर सियासी संतुलन तेजी से बदलता दिख रहा है। केंद्रीय स्तर पर तोखन साहू और राज्य में अरुण साव ताकतवर स्थिति में हैं। कई विधायक और नगरीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधि, जो कभी अमर अग्रवाल के आवास के इर्द-गिर्द नजर आते थे, अब पाला बदल चुके हैं या बदलने की तैयारी में हैं।
मंत्रिमंडल में दोबारा वापसी की संभावना कमजोर पडऩे के साथ रही सही झिझक भी टूटती नजर आ रही है। इसके बावजूद, अमर अग्रवाल के पास अब भी भरोसेमंद समर्थकों की एक सशक्त टीम है, जो शहर की राजनीति में किसी और के वर्चस्व को रोकने की कोशिश में जुटी हुई है।
महंगी कॉलोनियों पर निशाना
पिछले तीन-चार साल में राजधानी रायपुर के सौ से अधिक उद्योगपति, कारोबारी, नेता, और अफसरों के यहां छापेमारी हुई। इन छापों का केन्द्र बिन्दु स्वर्णभूमि, लॉ विस्टा, वालफोर्ट सिटी, आनंदम, और सिग्नेचर होम रहा है। इन कॉलोनियों को मध्य भारत की सबसे महंगी कॉलोनियों में गिना जाता है। तमाम प्रभावशाली लोग इन्हीं कॉलोनियों में रहते हैं।
वीआईपी रोड स्थित लॉ विस्टा में तो करीब दर्जनभर से अधिक लोगों के यहां छापे डल चुके हैं। बाकी जगहों की तुलना में मीडियाकर्मियों को यहां छापे का कवरेज के लिए ज्यादा सुविधाजनक हो गया है। ये सुविधा किसी और की तरफ से नहीं बल्कि कांग्रेस के मीडिया विभाग के सदस्य विकास बजाज ने उपलब्ध कराई है। वो मीडियाकर्मियों के लिए चाय नाश्ते का बंदोबस्त करते हैं। पिछले दिनों जमीन कारोबारी हरमीत खनूजा के यहां ईडी ने छापेमारी की। सुबह-सुबह ईडी की टीम खनूजा के निवास पर पहुंच गई थी। मीडिया को खनूजा निवास पर ईडी की कार्रवाई की जानकारी हुई, तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग के वहां पहुंच गए। ठंड में चाय की तलब लगी, तो खनूजा के पड़ोस में रहने वाले विकास बजाज के घर पहुंच गए। बजाज ने भी खातिरदारी में कोई कसर बाकी नहीं रखी। उनके यहां दोपहर 12 बजे तक चाय नाश्ता का दौर चलता रहा। इस दौरान सुरक्षा के लिए आए सीआईएसएफ के जवान भी वहां पहुंच गए, और उन्होंने भी मीडियाकर्मियों के साथ चाय नाश्ता किया।
इससे पहले भी इसी कॉलोनी में पूर्व मंत्री अमरजीत भगत के करीबी राजू अरोरा के यहां भी ईओडब्ल्यू-एसीबी ने छापेमारी की थी। तब भी विकास ने मीडियाकर्मियों के जलपान का बंदोबस्त किया था। यही वजह है कि लॉ विस्टा में कवरेज के लिए जाना मीडियाकर्मियों को सुविधाजनक लगने लगा है।
एक दशक से बंद डीजीपी-कॉन्फ्रेंस
पूरे प्रदेश में इन दिनों सभी 33 जिलों के एसपी और एसएसपी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जुटे हुए हैं। हर कोई अपने जिले की कानून-व्यवस्था, बीते साल में हुए अपराधों और उनके आरोपियों की गिरफ्तारी के आँकड़े गिना रहा है। साथ ही, अपने से पहले वाले साथी अफ़सर के कार्यकाल की उपलब्धियों से तुलना भी कर रहा है।
इन सबके बीच पत्रकार एक और सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतज़ार करते रहे, जो पिछले 10-12 साल से नहीं हो रही है—प्रदेश पुलिस प्रमुख, यानी डीजीपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस।
डीजी की सालाना प्रेस कॉन्फ्रेंस की यह परंपरा अविभाज्य मध्यप्रदेश में रही और बाद में छत्तीसगढ़ में भी जारी रही। छत्तीसगढ़ में अब तक हुए डीजीपी ने शुरुआती दस वर्षों तक इस परंपरा को निभाया। पिछली अंतिम कॉन्फ्रेंस विश्वरंजन ने ली थी, लेकिन उसके बाद इस सिलसिले पर ब्रेक लग गया। ए.एन. उपाध्याय के कार्यकाल से यह परंपरा बंद कर दी गई।
स्वयं उपाध्याय और उनके बाद के हर डीजीपी 3-4 वर्षों तक पद पर रहे, लेकिन किसी भी साल यह कॉन्फ्रेंस नहीं ली गई। मीडिया-फ्रेंडली डीजीपी कहे जाने वाले डी.एम. अवस्थी ने एक बार जरूर कॉन्फ्रेंस की, लेकिन दूसरी बार तक वे पद पर नहीं रहे। मिनट भर की बाइट देने से भी गुरेज़ करने वाले उनके उत्तराधिकारी अशोक जुनेजा ने तो अपना दफ़्तर ही मीडिया के लिए बंद कर दिया था—ऐसे में वार्षिक कॉन्फ्रेंस की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
नए डीजीपी अरुण देव गौतम ने भी इस बार बंद पड़ी परंपरा को दोबारा शुरू करने में कोई रुचि नहीं दिखाई।
रायपुर हवाई अड्डे का निजीकरण !

एयरपोर्ट एथॉरिटी ऑफ इंडिया के अधीन संचालित रायपुर के स्वामी विवेकानंद हवाई अड्डे को केंद्र सरकार की तीसरे चरण की निजीकरण योजना में शामिल कर लिया गया है। रायपुर एयरपोर्ट को औरंगाबाद के साथ जोडक़र पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल में निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है। मार्च 2026 तक इसकी टेंडर प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
रायपुर से बड़ी संख्या में लोग इलाज, नौकरी, पढ़ाई और कारोबार के लिए देश के अलग-अलग शहरों की यात्रा करते हैं। अन्य राज्यों और विदेशों से पहुंचने वाले पर्यटकों का आना-जाना इसी हवाईअड्डे से होता है। यह प्रदेश का एकमात्र व्यस्त विमानतल है, जहां से देश के विभिन्न बड़े शहरों से कनेक्टिविटी है और विदेश की यात्रा भी यहीं से शुरू होती है।
यात्रियों का अनुभव बताता है कि पीपीपी मॉडल पर चल रहे बड़े हवाई अड्डों पर यात्रियों से तरह-तरह के शुल्क वसूले जाते हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे एयरपोर्ट पर यूजर डेवलपमेंट फीस और अन्य चार्जेस में भारी बढ़ोतरी की गई है। मुंबई में घरेलू यात्रियों से वसूला जाने वाला शुल्क पहले 175 रुपये था जो अब कई मौकों पर 38 सौ रुपये तक पहुंच जाता है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए 13 हजार रुपये तक शुल्क देना पड़ जाता है। अंतरराष्ट्रीय यात्रियों पर लैंडिंग चार्ज, डिस एम्बार्केशन फीस जैसे नए शुल्क जोड़े गए हैं, जो पहले नहीं थे। शुल्क बढऩे के बावजूद ज्यादातर हवाई अड्डों पर सुविधाओं में सुधार नहीं दिखता। पार्किंग, सुरक्षा जांच और यात्री सुविधा जैसे सवाल जस के तस हैं। निजी कंपनियां अक्सर कम आय का अनुमान दिखाकर बाद में शुल्क बढ़ाने का रास्ता अपनाती हैं। खबरों के मुताबिक इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने भी भारत में बढ़ते एयरपोर्ट चार्ज पर चिंता जताई है, क्योंकि इससे एयरलाइंस की लागत बढ़ती है और अंतत: टिकट और महंगी हो जाती हैं।
अगर यही मॉडल रायपुर में लागू हुआ, तो इसका सीधा असर यहां के यात्रियों पर पड़ेगा। रायपुर जैसे कई मध्यम श्रेणी के शहरों में हवाई सेवाओं का लाभ ग्रामीण, मध्यम वर्ग और छोटे कारोबारी यात्री उठाते आए हैं। पीपीपी मॉडल से उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। पर्यटन और व्यापार महंगे सफर के कारण प्रभावित हो सकते हैं। वैसे तो सरकार का लक्ष्य है-उड़े देश का आम नागरिक, मगर ये नया मॉडल आम यात्रियों को कहीं हवाई यात्रा से दूर करने पर तुला है।
7वां वेतनमान अब अस्तित्वविहीन
7वां वेतन आयोग और उसकी लागू सिफारिशें 31 दिसंबर की आधी रात से अस्तित्व विहीन हो गई हैं। हालांकि यह वेतनमान अभी 16 महीने तक लागू रहेगा। क्योंकि 8 वें (रंजना देसाई) आयोग की सिफारिश 2027 से लागू होंगी। एक दशक पहले जनवरी 2016 में लागू हुए 7 वें वेतन आयोग ने करीब 1.2 करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की सैलरी, भत्तों और पेंशन को पिछले एक दशक तक तय किया। इसमें कुछ रद्दोबदल कर छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों ने भी अपनाया। क्योंकि राज्यों में पृथक आयोग के गठन की व्यवस्था खत्म हो गई है। इस तरह से अब सबकी नजरें नए बने 8वें वेतन आयोग पर टिकी हैं। अच्छी बात यह है कि कई बार बढ़ा हुआ वेतन और पेंशन पिछली तारीख से एरियर के साथ दी जाती है।
कर्मचारियों के मुताबिक 7वें वेतन आयोग की सबसे बड़ी खासियत रही बेसिक सैलरी में भारी बढ़ोतरी। उदाहरण के तौर पर, लेवल-1 कर्मचारियों की बेसिक सैलरी 7,000 से बढक़र 18,000 हो गई, यानी करीब 157 प्रतिशत की बढ़ोतरी। वहीं, टॉप लेवल (लेवल-18) के अधिकारियों की बेसिक सैलरी 90,000 से बढक़र 2.5 लाख प्रति माह तक पहुंच गई। शुरुआत में डीए शून्य कर दिया गया था, लेकिन 10 साल में यह बढक़र अब 58 प्रतिशत हो चुका है, जो 7वें वेतन आयोग के तहत आखिरी डीए है।
7वें वेतन आयोग का सबसे ज्यादा चर्चित शब्द रहा 2.57 फिटमेंट फैक्टर। इसी फॉर्मूले से पुरानी सैलरी को नई पे मैट्रिक्स में बदला गया। यानी पुरानी बेसिक सैलरी को 2.57 से गुणा करके नई बेसिक तय हुई। इसी वजह से ज्यादातर कर्मचारियों और पेंशनर्स को बड़ी सैलरी बढ़ोतरी देखने को मिली, खासकर शुरुआती और जूनियर लेवल पर। जब डीए 50 प्रतिशत के पार गया, तो सरकार ने जनवरी 2024 से ग्रेच्युटी की टैक्स-फ्री सीमा 20 लाख से बढ़ाकर 25 लाख कर दी।
नियम के अनुसार, डीए के 50 प्रतिशत पार करने पर कई भत्तों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाती है, जिसका फायदा कर्मचारियों को मिला। 7वें वेतन आयोग के दौरान सरकार ने एनपीएस में अपना योगदान 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 14 प्रतिशत (पे + डीए) कर दिया। इसके अलावा कर्मचारियों को बेहतर फंड विकल्प, लाइफ साइकिल फंड और टैक्स छूट जैसे फायदे भी मिले, जिससे एनपीएस पहले से ज्यादा आकर्षक बन गया। इस तरह से अब आगे 8वें वेतन आयोग से ऐसी ही उम्मीदें हैं।
बस्तर की धरती पर हरित गुफा

कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान की गहराइयों में छिपी ग्रीन केव जल्द ही पर्यटन मानचित्र में शामिल होने जा रहा है। अद्भुत प्राकृतिक धरोहरों से संपन्न बस्तर के कुटुमसर गुफा परिसर के कंपार्टमेंट नंबर 85 में यह गुफा मौजूद है। चूना पत्थर और शैल संरचनाओं से बनी यह गुफा कांगेर घाटी की दुर्लभ और विशिष्ट गुफाओं में गिनी जा रही है। गुफा की दीवारों, छत और लटकती चूने की संरचनाओं पर दिखाई देने वाली हरे रंग की परतें इसको अलग पहचान दे रही हैं।
ग्रीन केव तक पहुंचने का रास्ता रोमांचक है, जो बड़े-बड़े पत्थरों और प्राकृतिक बाधाओं से होकर गुजरता है। गुफा के भीतर एक विशाल कक्ष नजर आता है, जहां चमकदार और भव्य स्टैलेक्टाइट्स तथा बहते पानी से बनी पत्थर की परतें गुफा को भव्यता प्रदान करती हैं।
दरअसल, ग्रीन केव के भीतर दिखाई देने वाला हरा रंग पेंट या कृत्रिम कारण से नहीं, बल्कि सूक्ष्मजीवी गतिविधि है। गुफा के भीतर लगातार नमी, सीमित प्रकाश और चूना पत्थर की सतह पर रिसते पानी के कारण शैवाल, सायनोबैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव विकसित हो जाते हैं। ये चूने की संरचनाओं पर हरी परत बना लेते हैं, जिससे पूरी गुफा हरे रंग में रंगी प्रतीत होती है। यह प्रक्रिया हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होती है। वन विभाग कुटुमसर गुफा के इस हिस्से को बहुत जल्दी आम पर्यटकों के लिए खोलने की तैयारी में है।
शांति के दौर में असंतोष की आहट
बस्तर के तोकापाल ब्लॉक के डिलमिली काटाकांदा में ग्रामीणों ने ‘मावा नाटे मावा राज संघर्ष समिति’ का गठन किया है। इसमें जरिये उन्होंने छठवीं अनुसूची को प्रभावी तरीके से लागू करने के साथ पृथक बस्तर राज्य की मांग उठाई है। ठीक उसी तरह जैसे अलग गोंडवाना लैंड की मांग भी उठाई जाती है। अलग राज्य की मांग के पीछे की ध्वनि के पीछे आदिवासी अधिकारों और संसाधनों के वितरण में भेदभाव प्रतीत होता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे का ऐलान कर रखा है। कल नक्सली लीडर देवा के आत्मसमर्पण के बाद यह दावा भी किया जा रहा है कि बस्तर में नक्सलियों का नेतृत्व पूरी तरह खत्म हो चुका है। 1500 से अधिक नक्सलियों के आत्मसमर्पण और सुरक्षा बलों के ऑपरेशन के बाद माओवादी गतिविधियां बस्तर में अपने न्यूनतम स्तर पर है।
छत्तीसगढ़ राज्य की मांग 1920 के दशक में शुरू हुई थी, जिसमें बस्तर को जोड़ा गया, मगर इसकी अलग पहचान हमेशा से एक मुद्दा रही।
भौगोलिक कारणों से यह मांग मजबूत है। बस्तर घने जंगलों, पहाड़ों और प्राकृतिक संसाधनों से भरा है, जो इसे छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों से अलग करता है। यह क्षेत्र लौह अयस्क, बॉक्साइट से समृद्ध है, लेकिन विकास की कमी और बाहरी शोषण ने असंतोष बढ़ाया है। सामाजिक रूप से, यहां 70 फीसदी से अधिक आबादी आदिवासी- गोंड, मारिया, हल्बा आदि है, जिनकी संस्कृति, भाषा और परंपराएं मुख्यधारा से भिन्न हैं। शोषण, भूमि अधिग्रहण और सांस्कृतिक ह्रास ने अलग राज्य की मांग को बल देता रहा है।
ताजा मांग छठवीं अनुसूची के अनुच्छेद 244(2) के तहत आदिवासी क्षेत्रों में जिला परिषद और स्वशासन की है। पृथक बस्तर राज्य की मांग पेसा कानून दिवस पर हुई बैठक से उठी। ग्रामीणों ने-हमारा बस्तर, हमारा राज का नारा बनाया है। यह मांग दर्शाती है कि नक्सलवाद के कमजोर पडऩे से शांति आई है, लेकिन मूल मुद्देभूमि अधिकार, संसाधन का वितरण, शोषण और सांस्कृतिक संरक्षण की मांग अभी भी जिंदा हैं। नक्सली जिस लक्ष्य के लिए हिंसा का सहारा लेने का दावा करते रहे हैं वह अहिंसक और लोकतांत्रिक रूप में सामने आ रहा है।
अभी आंदोलन व्यापक स्तर पर नहीं है, पर यह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए चुनौती है। छठवीं अनुसूची प्रभावी तरीके से लागू करने पर आदिवासी सशक्त होंगे, लेकिन राज्य विभाजन से प्रशासनिक और आर्थिक जटिलताएं बढ़ेंगी। विभाजन से छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी, क्योंकि खनिज समृद्ध बस्तर छत्तीसगढ़ के राजस्व में बड़ी भूमिका निभाता है।
पुलिस कमिश्नरी पर खींचतान
आखिरकार राजधानी रायपुर में 23 तारीख को पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हो जाएगी। आईजी स्तर के अफसर की पुलिस कमिश्नर के पद पर पोस्टिंग होगी। पहले एक जनवरी से पुलिस कमिश्नरी प्रणाली लागू करने की चर्चा थी, लेकिन तकनीकी अड़चनों से लागू नहीं किया जा सका। अब चर्चा है कि जिस तरह पुलिस कमिश्नरी को लागू किया जा रहा है, उससे विशेषकर आईपीएस लॉबी संतुष्ट नहीं है।
सरकार ने पुलिस कमिश्नर के अधिकार को लेकर डीजीपी से सुझाव मांगे थे। एडीजी प्रदीप गुप्ता की कमेटी ने महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओडिशा, और कर्नाटक के पुलिस कमिश्नरी सिस्टम का अध्ययन कर रिपोर्ट डीजीपी को सौंप दी थी, और फिर गृह विभाग को रिपोर्ट भेजी गई। रिपोर्ट में कमिश्नर के अधिकार को लेकर सिफारिशें की गई थी, और इसके लिए एक्ट में संशोधन का सुझाव भी दिया गया था।
पहले चर्चा थी कि अध्यादेश लाकर एक्ट में संशोधन किया जाएगा। मगर ऐसा नहीं हुआ, कैबिनेट की बैठक में सिर्फ कमिश्नर प्रणाली लागू करने की तिथि को मंजूरी दी गई। चर्चा है कि आईपीएस बिरादरी चाहती है कि ओडिशा की तरह छत्तीसगढ़ के पुलिस कमिश्नर को अधिकार दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। हालांकि यह कहा जा रहा है कि जरूरत पडऩे पर संशोधन किए जाएंगे, और कमिश्नर का अधिकार दिए जाएंगे। देखना है कि 23 तारीख के बाद राजधानी की पुलिस व्यवस्था में क्या कुछ बदलाव होता है।
राजभवन की बढ़ती दखल
राजभवन के ताजा फरमान से सरकार में हडक़ंप मचा हुआ है। इसमें कहा गया है कि सरकारी विवि के कुलसचिव, प्रभारी कुलसचिव की नियुक्ति या पदस्थापना के लिए कुलाधिपति से अनुमोदन प्राप्त किया जाए।
यही नहीं, उच्च शिक्षा और कृषि सचिव को लिखे पत्र में यह भी कहा गया कि विवि के शिक्षक, अधिकारी-कर्मचारी के विरूद्ध जांच के बाद अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले कुलाधिपति का अनुमोदन लिया जाए।
राजभवन की चि_ी के चलते बहस भी हो रही है। ऐसी चि_ी क्यों निकाली गई है, इसको लेकर मंत्रालय में कई तरह की चर्चा है। बताते हैं कि बिलासपुर विवि के कार्यपरिषद ने कुलसचिवों की नियुक्ति या पदस्थापना से पहले कुलाधिपति का अनुमोदन लेने का सुझाव दिया था। इसके बाद सभी विवि के लिए चि_ी जारी कर दी गई। विवि के कुलसचिवों की नियुक्ति राज्य शासन करती आई है, लेकिन अब इसमें राजभवन की भी दखल रहेगी। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
भूपेश की कथा, साहू समाज नाराज
छत्तीसगढ़ की राजनीति में कथावाचकों पर बयानों से इतर कथा की आड़ में सियासी निशाने साधे जा रहे हैं। कुछ कथावाचकों को अंधविश्वास फैलाने वाला बताकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इन दिनों अलग-अलग समाज के कार्यक्रमों में खुद कथा-कहानी सुना रहे हैं, उनकी ऐसी ही कथा-कहानी पर साहू समाज बिफर गया है। मामला शुरू हुआ बिलासपुर के लिंगियाडीह से, जहां पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उपमुख्यमंत्री अरुण साव पर तंज कसते हुए छत्तीसगढ़ी में कह दिया- बेंदरा ल राजा बना दिस। जंगल की कहानी थी, बंदर राजा था, और संकेत साफ था कि राजा तो बना दिया गया है, लेकिन काम उछल-कूद तक ही सीमित है, इसी मिसाल के साथ बघेल ने कहा कि इन दिनों अरुण साव की भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। इस पर डिप्टी सीएम अरुण साव ने प्रतिक्रिया दी और कहा कि नेताओं को भाषा की मर्यादा रखनी चाहिए, एक पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ये बयान अक्षम्य है।
राजनीति में तंज नई बात नहीं, लेकिन यहां कहानी जंगल से निकलकर समाज तक पहुंच गई। साहू समाज ने भूपेश बघेल को 10 दिन का अल्टीमेटम दे दिया, अगर वे सार्वजनिक माफी नहीं मांगेगे तो समाज प्रदेशव्यापी आंदोलन करेगा। इधर, टीएस सिंहदेव ने इसे व्यक्तिगत टिप्पणी बताकर मामला हल्का करने की कोशिश की, लेकिन सोशल मीडिया ने वजन बढ़ा दिया। इधर एक साहू समाज के बुद्धिजीवी ने तो बाकायदा दार्शनिक व्याख्या कर दी है, उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा है कि बंदर गलत है, वानर बेहतर होता। क्योंकि वानर तो त्रेतायुग में राम भक्त थे, संजीवनी लाने वाले थे। अगर बघेल जी ने वानर कहा होता, तो शायद बात अभिनंदनीय बन जाती। इतना ही नहीं बीते दिनों साहू समाज के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अरुण साव के सामने अंतरजातीय विवाह पर रोक लगाने और ओरिजिनल साहूओं की संख्या घटने की चर्चा पर भी चटकारे लिए जा रहे हैं। लिखा जा रहा है कि राजनीति में बंदर की कहानी सुनाई जा सकती है, लेकिन समाज में ओरिजिनल और नकली की बहस खतरनाक होती है।
किसानों को आखिर जीत मिली
जमीन और खेती बचाने के लिए किए जाने वाले किसानों के आंदोलन को कभी-कभी सफलता भी मिल जाती है, वरना प्रशासन कार्पोरेट के दबाव में मामले को लंबा खिंचता रहता है। खैरागढ़ जिले के जगमड़वा और आसपास के तीन गांवों में चूना पत्थर के लिए 305 हेक्टेयर जमीन की नीलामी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब केवल यह साफ होना था कि खदान किसे आवंटित होगा। मगर, इस बीच किसानों का आंदोलन तेज हो गया। इस खदान से प्रभावित होने वाले करीब 55 गांवों के किसानों ने प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि चूना पत्थर खदान खोला गया तो वे आंदोलन करेंगे। दो दिन के भीतर नीलामी निरस्त करने की मांग भी उठाई। इलाके में पहले से ही काफी संख्या में चूना पत्थर की खदानों के कारण खेती को बड़ा नुकसान हो रहा है। नई खदान खुली तो उनकी कृषि भूमि पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी। फिलहाल तो प्रशासन ने इस नीलामी को निरस्त कर दिया है, पर ग्रामीणों की मांग है कि क्षेत्र में प्रस्तावित सभी चूना पत्थर ब्लॉक और सीमेंट फैक्ट्रियों की परियोजनाओं को निरस्त किया जाए।
जांच जारी, और प्रमोशन?!
नए साल में आईएएस अफसरों के प्रमोशन तो हो गए हैं, लेकिन आईपीएस अफसरों की प्रमोशन लिस्ट जारी नहीं हो पाई है। चर्चा है कि जांच के घेरे में आए कुछ अफसरों के प्रमोशन प्रस्ताव पर उलझन पैदा हो गई है।
बताते हैं कि आईएएस अफसरों की एक प्रमोशन लिस्ट में जेपी मौर्य का नाम है। वो सचिव के पद पर प्रमोट होंगे। वो ईडी के जांच के घेरे में थे। मगर प्रमोशन में रूकावट नहीं आई। हालांकि अभी औपचारिक आदेश जारी नहीं हुए हैं। सचिव के पदों की संख्या को लेकर अनुमोदन के लिए फाइल डीओपीटी को भेजी गई। मंजूरी मिलते ही संभवत: अगले हफ्ते प्रमोशन आर्डर जारी हो जाएंगे।
दूसरी तरफ, आईपीएस में डीआईजी से आईजी पद पर प्रमोशन की फाइल अटकी पड़ी है। वजह ये है कि दो डीआईजी स्तर के अफसर जांच के घेरे में आए हैं। ईडी ने ईओडब्ल्यू-एसीबी प्रमुख को कार्रवाई के लिए लिखा था। ऐसे में पीएचक्यू में सवाल उठाए जा रहे हैं कि मौर्य के प्रमोशन में अड़चन नहीं है, तो बाकी दोनों पुलिस अफसरों के प्रमोशन में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। चर्चा है कि इन बिंदुओं पर परामर्श लिया जा रहा है देखना है आगे क्या कुछ होता है।
दिल्ली की ओर
आईपीएस के वर्ष-2013 बैच के अफसर जितेन्द्र शुक्ला केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति चले गए हैं। वो एनएसजी ग्रुप कमांडर बन गए हैं। उन्हें शुक्रवार को रिलीव कर दिया गया है। दुर्ग एसपी पद से हटने के बाद जितेन्द्र शुक्ला बटालियन में पोस्टेड थे। उनके राजनांदगांव एसपी बनने की चर्चा थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने केन्द्रीय एजेंसी की राह पकड़ ली। इसी तरह राजनांदगांव में एसपी रहे मोहित गर्ग भी केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए आवेदन दिया है। उनकी पोस्टिंग नारकोटिक्स ब्यूरो में होने की चर्चा है। सब कुछ ठीक रहा, तो पखवाड़े भर में वो भी दिल्ली की राह पकड़ लेंगे।
चौथी इकॉनामी वाले देश में...
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सीतापुर थाना क्षेत्र के ग्राम भरतपुर लकरालता की यह तस्वीर किसी एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि विकास के दावों पर करारा तमाचा है। दुर्गम पहाड़ी इलाके में बसे इस गांव में आज भी सडक़ जैसी बुनियादी सुविधा नसीब नहीं है। हालात इतने बदतर हैं कि यहां इंसान को जीते-जी तो संघर्ष करना ही पड़ता है, मरने के बाद भी उसे सम्मानजनक अंतिम यात्रा तक नसीब नहीं होती।
तालाब में मछली पकडऩे के दौरान डूबने से आदिवासी युवक सुरेन्द्र तिर्की की मौत हो गई। सडक़ नहीं होने के कारण परिजन और ग्रामीण शव को खाट पर लादकर कई किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य मार्ग तक पहुंचे।
सरगुजा, बस्तर सहित छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों से इस तरह की तस्वीरें लगातार आ रही हैं। यह तस्वीर उसी दिन सामने आई जब देश की मीडिया में दो बड़ी उपलब्धियों की चर्चा हो रही थी। एक- कुछ महीनों के बाद देश में पहली बुलेट ट्रेन चलने लगेगी, दूसरी- भारत ने जापान की अर्थव्यवस्था को पीछे कर दिया है और अपना देश इस मामले में चौथे नंबर पर आ गया है।
साव के खिलाफ भूपेश की टिप्पणी
पिछले दिनों बिलासपुर प्रवास के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने डिप्टी सीएम को लेकर एक टिप्पणी की थी। उन्होंने एक प्रचलित कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि एक बार जंगल में वन प्राणियों ने बंदर को अपना राजा चुन लिया। राजा चुने जाने के बाद एक बकरी फरियाद लेकर आई कि शेर उसे खाने के लिए पीछा कर रहा है। बंदर ने पेड़ों पर खूब उछलकूद मचाई, डालियों को तोड़ डाला। फिर कहा- देखो मैंने कुछ तो किया न शब्दश: नहीं, भाव कुछ ऐसा ही था। उस जंगल के राजा की तुलना बघेल ने डिप्टी सीएम साव से कर दी।
अब छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ ने इसे मुद्दा बनाया है। इसके अध्यक्ष डॉ. नीरेंद्र साहू ने संगठन के सभी जिला अध्यक्षों को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि समाज के गौरव साव जी पर बघेल द्वारा की गई आपत्तिजनक, अत्यंत अमर्यादित टिप्पणी के विरुद्ध अपने जिले के पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपें। 10 दिन के भीतर अपने बयान के लिए भूपेश बघेल सार्वजनिक क्षमा याचना करें। यदि ऐसा नहीं किया गया तो साहू समाज संगठित और चरणबद्ध आंदोलन करेगा।
यह पत्र सोशल मीडिया पर वायरल है। बहुत सी प्रतिक्रियाएं हैं, जिनमें से कुछ अलग हटकर भी हैं- जिन्हें लाइक्स भी ठीक-ठाक संख्या में किए गए हैं। जैसे एक ने कहा है कि राजनीतिक टिप्पणी का जवाब दमदार मंत्री खुद ही दे सकते हैं। इसे सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए। लवकुश साहू नाम की आईडी से लिखा गया है कि बेहतर होगा, प्रदेश साहू संघ का भाजपा में विधिवत विलय कर दिया जाए। गिरवर लाल साहू ने लिखा है कि डिप्टी सीएम बनने के बाद साव जी ने साहू समाज के लिए क्या किया? पहले बताएं, फिर समाज खुद सहयोग करेगा। खुद को बचाने के लिए समाज का सहारा ले रहे हैं। वाल्मीकि साहू ने लिखा है कि इस तरह का निर्देश देकर साहू समाज को एक राजनीतिक दल का गुलाम बनाने की कोशिश की जा रही है, अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए। घनश्याम साहू का कहना है कि साहू संघ के पूर्व अध्यक्ष भूपेश बघेल सरकार की मदद से अध्यक्ष बने थे। उनके आगे-पीछे टहल रहे थे। वर्तमान अध्यक्ष जी सत्ताधारी पार्टी का आशीर्वाद पाने का प्रयास कर रहे हैं। आगे यही परंपरा स्थापित होने वाली है।
शाह, राहुल के बीच नबीन
हमने पिछले सप्ताह इसी कालम में बताया था कि भाजपा के प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन से छत्तीसगढ़ के नेता कार्यकर्ताओं की मेल मुलाकात अब आसान नहीं होगी। क्योंकि सुरक्षा, प्रोटोकॉल, राष्ट्रीय स्तर की बैठकें और देश के दौरों के साथ सभी राज्यों के नेता कार्यकर्ताओं की भीड़। इसके साथ अब एक और कड़ी जुड़ रही है। वह यह कि नितिन नवीन को लुटियंस दिल्ली में एक सरकारी आवास अलॉट किया गया है। - सुनहरी बाग रोड पर बंगला नंबर 9। यह जगह इसलिए खास है क्योंकि यह गृह मंत्री के बंगले के बगल में है। और राहुल गांधी भी उनके पड़ोसी न सही, उसी लोकेलिटी में बंगला नंबर-5, सुनहरी बाग में रहते हैं।
नबीन को पार्टी के अध्यक्ष के रूप में शाह की छत्रछाया मिल गई है। वैसे उनके चयन नियुक्ति में भी अमित शाह की ही भूमिका रही है। अब नितिन का पड़ोसी बनना शाह से निकटता को दिखाता है।
राजनीतिक गलियारों में इस अलॉटमेंट को बीजेपी की केंद्रीय लीडरशिप में नवीन के बढ़ते कद के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, जो बिहार की राजनीति से पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में एक ज़्यादा अहम राष्ट्रीय भूमिका की ओर उनके बदलाव को दिखाता है। बहरहाल छत्तीसगढ़ के नेताओं को मुलाकात के लिए लंबे क्यू में लगना पड़ेगा। वैसे नबीन ने बिहार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है तो जल्द ही छत्तीसगढ़ संगठन का प्रभार भी छोड़ देंगे ऐसी उम्मीद है।
किफायत की मिसाल

देशभर में प्रदेशों की राजधानी में जो राजभवन थे उनका नाम बदलकर अब लोक भवन रख दिया गया है ताकि थोड़ी सादगी दिखे। राजभवन से एक राज की भावना झलकती थी जिसको लोक कर दिया गया है। अभी नए साल की शुभकामनाओं का जो कार्ड छत्तीसगढ़ के लोक भवन से, राज्यपाल की तरफ से आया है, उसमें पहले से छपे हुए कार्ड और पहले से छपे हुए लिफाफों के ऊपर ही लोक भवन के स्टीकर लगा दिए गए हैं। सरकारी खर्च पर होने वाले कामकाज में कई बार पहले से छपी स्टेशनरी को खारिज करके नई स्टेशनरी छपवा ली जाती है। ऐसे में यह सादगी अच्छी है कि पहले से छपे हुए लिफाफों को, कार्ड को, बर्बाद न करके उन पर स्टिकर चिपका दिया जाए, क्योंकि पैसा तो जनता की जेब का ही लगता है। दूसरे बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों के जब नाम-पते, फोन नंबर, या विभागों के नाम बदलते हैं, तो उनको भी राज्यपाल की इस मिसाल को याद रखना चाहिए।
संगठन में बदलाव का दौर
चर्चा है कि मकर संक्रांति के बाद कांग्रेस संगठन में बड़ा बदलाव होगा। बदलाव पश्चिम बंगाल, केरल, और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर हो रहा है। तीनों राज्यों के चुनाव में प्रत्याशी चयन के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया जाएगा। संकेत है कि छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं को विधानसभा चुनाव में अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।
बिहार चुनाव में पूर्व सीएम भूपेश बघेल को प्रचार की जिम्मेदारी दी गई थी। भिलाई विधायक देवेन्द्र यादव भी पिछले छह महीने से बिहार में डटे थे। इससे परे पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव बिहार में पार्टी टिकट बंटवारे से जुड़े विवाद के निपटारे के लिए गठित कमेटी के सदस्य थे। बावजूद इसके पार्टी को बिहार चुनाव में बुरी हार का सामना करना पड़ा। मगर पार्टी प्रदेश के कुछ प्रमुख नेताओं को तीनों चुनाव वाले राज्यों में भेजने की तैयारी कर रही है। छत्तीसगढ़ में कोई चुनाव नहीं है। इसलिए यहां के नेताओं को वहां प्रचार में जाने में कोई दिक्कत भी नहीं है। दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ संगठन में भी काफी बदलाव होना है। जिलाध्यक्षों की नियुक्ति तो हो गई है। प्रदेश महामंत्री, और संयुक्त महामंत्री के पद खाली हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज पद पर बने रहेंगे या नहीं, इस पर भी फैसला होना बाकी है। कुल मिलाकर अगले एक-डेढ़ महीने में प्रदेश संगठन में बदलाव देखने को मिल सकता है।
वन भैंसा- जनभागीदारी ही काम आ रही

छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वन भैंसा कभी मध्य भारत के विशाल जंगलों में आजाद विचरण करता था। आज वह विलुप्ति के कगार पर है। इधर एक अलग हटकर खबर आई है कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के 17 गांवों के निवासियों ने इस लुप्तप्राय प्रजाति को बचाने के लिए एकजुट होकर प्रयास शुरू किए हैं। वे जंगल की आग रोकने, अवैध कटाई पर अंकुश लगाने और कब्जा की गई भूमि को खाली करने का संकल्प तो ले ही रहे हैं , इसके जरिये वन भैंसों के लिए अनुकूल माहौल बने- यह कोशिश कर रहे हैं।
वन विभाग के प्रयासों की बात करें तो लाखों रुपये खर्च कर असम से वन भैंसे लाकर प्रजनन बढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन यह विफल साबित हुई। 2020 में मनास नेशनल पार्क से लाए गए भैंसे अभी भी युवा हैं और प्रजनन में समय लगेगा, जबकि पहले के प्रयासों में क्लोनिंग जैसी तकनीकों पर भी संदेह जताया गया। सरकारी योजनाओं की अपनी सीमाएं हैं। वे कई बार जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर देती हैं। ट्रांसलोकेशन जैसी महंगी योजना बाहरी हस्तक्षेप पर निर्भर हैं। यह वनों में रहने वालों के साथ संघर्ष की नौबत भी ला देती है।
इन 17 गावों की कोशिश यह बात रही है कि वन्यजीवों का यदि हम सचमुच संरक्षण और संवर्धन करना चाहते हैं, तो वन के ग्रामीणों को ही केंद्र में रखना होगा। वे जंगल की नब्ज जानते हैं। उसकी मिट्टी, पानी और मौसम से वाकिफ होते हैं। उनकी भागीदारी के बिना कोई योजना लंबे समय के लिए सफल नहीं हो सकती। उदंती क्षेत्र के 17 ग्राम सभाओं को सक्रिय करने के लिए कुछ स्थानीय नेता अर्जुन सिंह नायक, साहेबिन श्यामलाल आदि सामने आए हैं। उन्होंने ग्राम सभाओं को लुप्त हो रहे वनभैंसों को बचाने के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया है।
वन विभाग के पास बजट होता है और अफसर उसे खर्च करने का रास्ता ढूंढते हैं। बाहर से वनभैंसों को लाकर वंशवृद्धि की कोशिश इसी का उदाहरण है। बजाय बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहने के, विभाग को चाहिए कि वह स्थानीय ग्रामीणों और सभाओं के साथ साझेदारी को मजबूत करें। ग्रामीणों की आजीविका को वन्यजीव संरक्षण से भी जोड़ा जा सकता है, जो एक टिकाऊ प्रयोग होगा।
नितिन नबीन का साल
गुजरे साल में प्रदेश भाजपा में कई बड़े बदलाव हुए, और कुछ को तरक्की भी मिली। सबसे बड़ी तरक्की प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन की हुई, जो पार्टी संगठन के शीर्ष नेता के रूप में स्थापित हुए। बहुत कम लोगों को मालूम है कि नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की स्क्रिप्ट छत्तीसगढ़ में लिखी गई थी।
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनी, तो नितिन नबीन की मेहनत को काफी सराहा गया। उन्होंने अपने गृह प्रदेश बिहार के विधानसभा चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व के बीच पुल का काम किया। उनके चुनाव प्रबंधन की काफी प्रशंसा भी हुई। वो बिहार सरकार में ताकतवर मंत्री भी बन गए। मगर उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष जिम्मेदारी दी जाएगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था।
बताते हैं कि बस्तर ओलंपिक के समापन कार्यक्रम के लिए 11 दिसंबर को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह रायपुर आए थे। इस दौरान प्रदेश संगठन की एक अलग बैठक कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में हुई थी। इस बैठक में शिरकत करने नितिन नबीन को रायपुर आना था, लेकिन उनकी फ्लाइट छूट गई। इसी बीच नवा रायपुर के होटल में ठहरे शाह ने नबीन के आने को लेकर पूछताछ की, और फिर राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा राज्य शासन का विमान लेकर पटना पहुंचे। उनके साथ नितिन नबीन रायपुर आए। वो कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में जाने के बजाए अमित शाह से मिले। दोनों के बीच करीब आधा घंटे बंद कमरे में चर्चा हुई।
बैठक के बाद शाह जगदलपुर निकल गए। नितिन नबीन,कुशाभाऊ ठाकरे परिसर पार्टी बैठक में शामिल हुए, और फिर बैठक के बाद स्टेट प्लेन से वापस पटना चले गए। उन्हें छोडऩे के लिए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव पटना साथ गए थे। इसके दो दिन बाद नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। नबीन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने से छत्तीसगढ़ भाजपा के छोटे -बड़े नेता काफी खुश हैं। कुल मिलाकर गुजरा साल भाजपा के लिए बेहतर रहा।
निष्कासित से राष्ट्रीय पदाधिकारी!
पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने फेसबुक पर महिला कांग्रेस के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची साझा की, और छत्तीसगढ़ से नवनियुक्त पदाधिकारियों को शुभकामनाएं दी। इनमें पंडरिया की पूर्व विधायक ममता चंद्राकर को राष्ट्रीय महासचिव, मयूरी सिंह, और तूलिका कर्मा को राष्ट्रीय सचिव के साथ ही प्रीति उपाध्याय व राशि त्रिभुवन को राष्ट्रीय समन्वयक का दायित्व सौंपा गया है।
महासमुंद की पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष राशि त्रिभुवन को राष्ट्रीय समन्वयक बनाए जाने पर पार्टी में गुस्सा फुट पड़ा है। दिलचस्प बात ये है कि राशि को विधानसभा चुनाव में अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लडऩे पर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। न सिर्फ राशि बल्कि उनके पति त्रिभुवन महिलांग को भी छह साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया गया।
दोनों के साथ ही महासमुंद के आठ और नेताओं को निष्कासित किया गया था। इन सभी की पार्टी में वापसी नहीं हो पाई है। बावजूद इसके राशि को राष्ट्रीय स्तर का पद दे दिया गया। इसकी शिकायत अलग-अलग स्तरों पर हुई है। यह पूछा जा रहा है कि निष्कासित नेत्री को राष्ट्रीय पदाधिकारी बनाने की सिफारिश किसने की थी? यह बात सामने आ रही है कि प्रदेश के किसी बड़े नेता ने राशि की सिफारिश नहीं की थी, बल्कि दिल्ली में अपने संपर्कों के जरिए पद पाने में कामयाब रही। निष्कासित नेत्री को पद देने पर पार्टी के अंदरखाने में हलचल मची हुई है। अब आगे क्या होता है, यह देखना है।
महानदी विवाद पुराना, माहौल नया
छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा महानदी यहां से निकलकर ओडिशा पहुंचती है और वहां के लाखों लोगों की सिंचाई, उद्योग और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करती है।हाल ही में छत्तीसगढ़ द्वारा उदंती नदी पर बैराज बनाने की प्रक्रिया शुरू करने पर ओडिशा में विपक्षी दल बीजेडी और कांग्रेस ने वहां की भाजपा सरकार पर सवाल उठाए हैं।
धमतरी जिले से निकलने वाली महानदी करीब 858 किलोमीटर बहकर ओडिशा में समुद्र में मिलती है। इसका करीब 53 प्रतिशत हिस्सा छत्तीसगढ़ में है, बाकी ओडिशा में। 1957 में बना हीराकुंड बांध इस नदी पर स्थित है, जो ओडिशा के बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए महत्व रखता है। महानदी में कई सहायक नदियां मिलती हैं। उनमें से ही एक उदंती है। यह छत्तीसगढ़ से निकलकर ओडिशा के नुआपाड़ा और कालाहांडी जिलों से गुजरते हुए तेल नदी में मिल जाती है, और अंतत: महानदी के सिस्टम में। छत्तीसगढ़ का दावा है कि हम ऊपरी भाग में बैराज बनाकर अपने इलाके की सिंचाई और विकास सुनिश्चित कर रहे हैं, जबकि ओडिशा का कहना है कि ये निर्माण पानी की मात्रा कम कर देंगे, जिससे हीराकुड बांध प्रभावित होगा।
महानदी के पानी के बंटवारे को लेकर बहस हीराकुंड बांध के निर्माण के समय से ही चल रही है। छत्तीसगढ़ जब मध्यप्रदेश से अलग हुआ तब भी विवाद था। मगर, 2016 में यह ज्यादा तीव्र हुआ, जब ओडिशा ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ ऊपरी इलाकों में बिना अनुमति के कई बांध और बैराज बना रहा है। उस समय छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार थी, और ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजेडी सरकार। ओडिशा ने सुप्रीम कोर्ट में केस किया, जिसके बाद 2018 में महानदी रिवर वाटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल बना। ट्रिब्यूनल अभी भी काम कर रहा है, और अगली सुनवाई फरवरी 2026 में है।
सन् 2016 में ओडिशा का एक हाई-पावर प्रतिनिधिमंडल, जिसमें सांसद, विधायक और अधिकारी शामिल थे, छत्तीसगढ़ पहुंचा था। उन्होंने रायपुर और बिलासपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ में महानदी की ऊपरी धारा पर करीब 7 बैराज कांकेर, महासमुंद और अन्य इलाकों में बिना केंद्रीय जल आयोग की मंजूरी के बनाए जा रहे हैं। ओडिशा की टीम ने साइट विजिट भी की और दावा किया कि ये बैराज पानी को रोककर ओडिशा के हिस्से को कम कर रहे हैं, साथ ही उद्योगों को अवैध रूप से पानी सप्लाई किया जा रहा है। बीजेडी और कांग्रेस ने अलग-अलग डेलिगेशन भेजे थे। जवाब में, रमन सिंह ने 2017 में ओडिशा का दौरा किया और कहा कि यह गलतफहमी है। छत्तीसगढ़ केवल अपना हक इस्तेमाल कर रहा है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने भी 2016 में दोनों मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई, लेकिन कोई स्थायी हल नहीं निकला।
अब यह ताजा खबर उदंती बैराज की मंजूरी की है। इस बैराज का 2018 में ओडिशा ने इसका विरोध किया था, लेकिन हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने इन-प्रिंसिपल अप्रूवल दिया है। ओडिशा सरकार ने ज्वाइंट टेक्निकल कमेटी की दो बैठकों में इस पर चर्चा की, लेकिन विपक्षी बीजेडी के लेनिन मोहंती और कांग्रेस के भक्त चरण दास ने सवाल उठाया कि जब छत्तीसगढ़ बैराज बना रहा है, तो समझौता कैसे आगे बढ़ेगा?
दिलचस्प बात यह है कि अब दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। पहले जब सरकारें अलग दलों की थीं, विवाद ज्यादा जोर-शोर से उठता था। अब ओडिशा सरकार खुलकर विरोध नहीं कर रही, जबकि विपक्ष ने मोर्चा संभाल लिया है। छत्तीसगढ़ का स्टैंड वही है- हम ओडिशा को जरूरी पानी दे रहे हैं, इसलिए अपने इलाके में बैराज बनाने का हक है।
गुटबाजी का मतलब, कांग्रेस जिंदा है!
कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री पद के लिए भूपेश बघेल, और टीएस सिंहदेव के बीच ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय हुआ था, लेकिन इसका क्रियान्वयन नहीं होने पर दोनों के बीच खाई बनी थी, वह अब तक नहीं भर पाई है। भूपेश, सरगुजा संभाग के दौरे पर हैं। वो अंबिकापुर पहुंचे, तो सिंहदेव समर्थक गायब रहे।
हालांकि सिंहदेव के विरोधी माने जाने वाले पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने पूर्व सीएम के स्वागत में कोई कसर बाकी नहीं रखी। भूपेश, अमरजीत भगत के घर भी गए। मगर अंबिकापुर शहर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बालकृष्ण पाठक, और अन्य पदाधिकारी पूर्व सीएम से मिलने नहीं पहुंचे। इस पर सिंहदेव समर्थकों ने सफाई दी कि पूर्व सीएम के आने की सूचना जिला कांग्रेस को नहीं दी गई थी।
बात यही खत्म नहीं हुई। सूरजपुर जिला कांग्रेस अध्यक्ष शशि सिंह का शपथ ग्रहण समारोह था। इसमें पूर्व सीएम तो मौजूद थे, लेकिन टीएस सिंहदेव नहीं आए। पीसीसी चीफ दीपक बैज रायगढ़ दौरे पर थे, लेकिन वो भी सूरजपुर नहीं गए। पूर्व सीएम के सम्मान में भगत के करीबी खाद्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष गुरूप्रीत सिंह ने अपने निवास पर भोजन भी रखा था। इसमें सिंहदेव समर्थकों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन सिंहदेव समर्थक नहीं आए। कुल मिलाकर भूपेश, और सिंहदेव के बीच रिश्तों में खटास आई थी, वो अब मैदानी कार्यकर्ताओं में भी दिखने लगी है।
शिक्षकों पर एक और डिजिटल बोझ?

स्कूल शिक्षा विभाग ने शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए विद्या समीक्षा केंद्र (वीएसके) मोबाइल ऐप डाउनलोड करने का आदेश हाल ही में जारी किया है। इसके माध्यम से शिक्षकों की शालाओं में उपस्थिति दर्ज की जाएगी। शिक्षक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षकों पर दबाव डालकर उनके निजी मोबाइल फोन में शासकीय ऐप को इंस्टाल करने का निर्देश देना उनकी निजता पर चोट है और पेशे के प्रति निष्ठा पर अविश्वास जताने जैसा है। शिक्षकों का यह भी कहना है कि यदि उनकी हाजिरी ही दर्ज करनी है तो शालाओं में बायोमेट्रिक उपकरण लगा दिए जाएं। या फिर उन्हें सरकारी फोन या टेबलेट उपलब्ध कराया जाए। वैसे प्रदेश के शिक्षक पहले ही दर्जन भर से अधिक सरकारी ऐप्स और पोर्टलों पर काम कर रहे हैं। मिड-डे मील, निष्ठा, दीक्षा, यू-डायस, छात्रवृत्ति पोर्टल, इंस्पायर अवॉर्ड, जादुई पिटारा, अपार आईडी, दर्पण पोर्टल, स्कूल रेडिनेस, मासिक चर्चा पत्र, धान-चावल और प्रतिदिन लाभान्वित विद्यार्थियों की ऑनलाइन एंट्री जैसे कार्य पहले से उनके जिम्मे हैं और यह सब उनके निजी मोबाइल फोन के जरिये ही किया जाता है। इस बीच एक और ऐप अनिवार्य कर दिया गया है। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों मोबाइल कंपनियों को निर्देश दिया था कि संचार साथी ऐप को प्री-इंस्टाल करके ही मोबाइल सेट बेचें। यह भी कहा गया था कि इसे डिलीट नहीं किया जा सकेगा। पर, विपक्ष ने इसे बड़े मुद्दे के रूप में पेश किया। कहा, कि सरकार इसके जरिये नागरिकों पर निगरानी रखना चाहती है। सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा। संचार साथी को अनिवार्य करने के फैसले को वापस लेना पड़ा है। छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग का वीएसके ऐप दरअसल, शिक्षकों की स्कूलों में उपस्थिति को दर्ज करने वाला है। दूरदराज और ग्रामीण इलाकों की शालाओं में अक्सर शिक्षकों के गैरहाजिर होने की शिकायतें जनप्रतिनिधि और छात्र करते आ रहे हैं। यह ऐप न केवल शिक्षकों की, बल्कि छात्रों की गतिविधियों को भी रियल टाइम दर्ज करेगा। स्कूल में कौन सी गतिविधियां चल रही हैं, इसका ब्यौरा भी विभाग को मिल जाएगा। छुट्टी के लिए आवेदन भी इसी ऐप के जरिये करना होगा। फायदे तो बहुत हैं, पर शिक्षकों की ओर से उठाया जा रहा निजता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। आदेश को वापस लेने की संभावना कम ही दिखाई देती है क्योंकि यह नई शिक्षा नीति- 2020 के तहत किया गया प्रावधान है। अन्य राज्यों में भी ये ही अथवा इसी तरह के दूसरे ऐप इंस्टाल कराए जा रहे हैं।
जांच और प्रमोशन
पहली जनवरी को भारतीय पुलिस सेवा के वर्ष-08 बैच के डीआईजी स्तर के अफसर आईजी के लिए पात्र हो जाएंगे, इसके लिए डीपीसी की प्रक्रिया चल रही है। मगर इसी बैच के अफसर कमलोचन कश्यप बुधवार को आईजी के पद पर प्रमोट हुए बिना रिटायर हो गए।

कमलोचन कश्यप मूलत: बस्तर के रहने वाले हैं। वो दंतेवाड़ा, और बीजापुर एसपी रह चुके हैं। नक्सल इलाकों में बतौर डीआईजी के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। उम्मीद थी कि साल के अंतिम दिन डीपीसी हो जाएगी, और प्रमोशन लिस्ट जारी होगा। मगर ऐसा नहीं हो पाया।
चर्चा है कि इस बैच के अफसरों के प्रमोशन में कई पेंच है। एक-दो अफसरों के खिलाफ जांच चल रही है। ईडी ने उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए चि_ी राज्य शासन को भेजी है। इन सब वजहों से संबंधित अफसरों को विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं मिल पाया है। उनकी पदोन्नति रुक सकती है। अब आगे क्या होता है यह तो डीपीसी होने के बाद ही पता चल पाएगा।
तीर्थ पर तुलना!
सरकार की तीर्थ यात्रा योजना को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। पिछले दिनों रायपुर जिले के साढ़े 8 सौ लोग अयोध्या, और बनारस की यात्रा में गए थे। यात्रियों को किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए हर संभव प्रयास किए गए थे। सभी यात्रियों को पहचान के लिए परिचय पत्र, और कैप भी दिए गए थे।
ये यात्री अयोध्या पहुंचे, तो वहां अलग ही नजारा देखने को मिला। महाराष्ट्र से भी सैकड़ों की संख्या में तीर्थयात्री अयोध्या पहुंचे थे। महाराष्ट्र के तीर्थ यात्री केसरिया टोपी लगाए थे, तो छत्तीसगढ़ के तीर्थ यात्री सफेद टोपी लगाए हुए थे। अयोध्या में मिले दोनों ही राज्य के यात्री अपनी-अपनी सरकारों द्वारा की गई व्यवस्थाओं की पूछपरख कर रहे थे।
रायपुर से गए यात्रियों ने पूरे सफर के दौरान की गई व्यवस्थाओं से संतुष्टि जताई है। खासकर ट्रेन में मिले भोजन, नाश्ते की गुणवत्ता को बेहतर बताया। साथ ही रात्रिकालीन आवासीय व्यवस्था को भी घर जैसा ही माना। बस, इस यात्रा में बुजुर्ग कम पार्टी कार्यकर्ता और उनके सगे संबंधी अधिक रहे।
देवेंद्र और भूपेश की दूरी
भिलाई के कांग्रेस विधायक देवेन्द्र यादव का भिलाई से जुड़ी समस्याओं को लेकर अनशन तो तीन दिन पहले खत्म हो गया, लेकिन उनके अनशन से पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमा दूर रहा। पार्टी के अंदरखाने में इसकी काफी चर्चा है। देवेन्द्र बिहार कांग्रेस के प्रभारी सचिव हैं, और वो हाईकमान से सीधे जुड़े हैं। यहां भी उनका अलग खेमा तैयार हो गया है, जिसमें युवक कांग्रेस व एनएसयूआई के पदाधिकारी हैं। चर्चा है कि भूपेश बघेल, देवेन्द्र की कार्यशैली से नाखुश बताए जाते हैं।
और जब देवेन्द्र यादव आधा दर्जन मांगों को लेकर भिलाई के सिविक सेंटर में अनशन पर बैठे, तो भूपेश बघेल नहीं गए। देवेन्द्र समर्थकों की कोशिश थी कि पूरे दुर्ग संभाग के नेता अनशन के समर्थन में साथ आ दिखे। मगर उनकी कोशिश सफल नहीं हो पाई। पूर्व नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे अनशनरत देवेन्द्र से मिलने नहीं गए। हालांकि पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू और पूर्व विधायक अरुण वोरा ने देवेन्द्र को समर्थन देने अनशन स्थल पहुंचे थे। देवेन्द्र का अनशन पांच दिन चला। संगठन का हाल यह रहा कि भूपेश के करीबी दुर्ग ग्रामीण के जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर नजर नहीं आए।
इसी तरह दुर्ग शहर के जिलाध्यक्ष धीरज बाकलीवाल ने भी देवेन्द्र के अनशन से दूरी बना ली थी। इससे परे भूपेश के करीबी भिलाई जिलाध्यक्ष मुकेश चंद्राकर एक दिन जरूर देवेन्द्र के साथ रहे, लेकिन अगले दिन से वो भी गायब हो गए। कुल मिलाकर देवेन्द्र के प्रदर्शन से भूपेश खेमे ने दूरी बना ली थी। हालांकि अनशन खत्म होने के बाद देवेन्द्र, पूर्व सीएम भूपेश बघेल से मिलने भिलाई-3 स्थित निवास भी गए थे। फिर भी भूपेश, देवेन्द्र को खास तवज्जो नहीं दे रहे हैं। कुल मिलाकर देवेन्द्र का अनशन गुटबाजी से अछूता नहीं रहा।
भारतमाला कई गर्दनों का फंदा
आखिरकार भारतमाला परियोजना मुआवजा घोटाले की ईडी ने पड़ताल शुरू कर दी है। ईडी ने जमीन कारोबारी हरमीत सिंह खनूजा के रायपुर के लॉ विस्टा स्थित घर पर दबिश दी। करीब 16 घंटे तक जांच पड़ताल चलती रही। मुआवजा घोटाले की जांच ईओडब्ल्यू-एसीबी कर रही है। खनुजा सहित आधा दर्जन आरोपी जमानत पर हैं, लेकिन ईडी ने उन्हें फिर घेर लिया है।
रायपुर-विशाखापटनम भारतमाला सडक़ परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहित हुई थी, और रायपुर से सटे अभनपुर-कुरूद आदि जगहों पर अपात्र लोगों को मुआवजा मिल गया। करीब 43 करोड़ रुपए अतिरिक्त भुगतान हुआ है। राज्य सरकार ने भी मुआवजा वितरण में गड़बड़ी को माना है, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई थी। बताते हैं कि नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, उनकी पत्नी कोरबा सांसद डॉ. ज्योत्सना महंत, और रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल के अलावा पूर्व सांसद सुनील सोनी ने घोटाले पर कार्रवाई के लिए केंद्र को चि_ी लिखी थी। केन्द्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया था। इस पर राज्य की जांच एजेंसी, और एनएचएआई (राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण)के बीच मतभेद रहे हैं। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने एनएचएआई के चार अफसरों के खिलाफ भी प्रकरण दर्ज किया है।
एनएचएआई का तर्क है कि मुआवजा वितरण का विषय स्थानीय प्रशासन का था, और एनएचएआई अफसरों की कोई भूमिका नहीं रही है। एनएचएआई ने कार्रवाई के लिए अनुमति नहीं दी है। इसलिए अब तक एनएचएआई के अफसरों से पूछताछ नहीं हो पाई है। अब केंद्र की एजेंसी ईडी जांच में जुटी है, तो सब कुछ साफ होने की उम्मीद जताई जा रही है। चर्चा है कि तत्कालीन कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर नरेन्द्र भुरे से भी पूछताछ हो सकती है। भुरे केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
नई सडक़ के साथ जोर-आजमाइश

कवर्धा की जर्जर सडक़ों ने इस बरसात आम लोगों को खूब परेशान किया। जगह-जगह गड्ढे, कीचड़ और फिसलन के बीच लोगों का आना-जाना मुश्किल हो गया। बारिश थमने के बाद सडक़ों की मरम्मत कराई गई, लेकिन मरम्मत की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ है। दावा किया जा रहा है कि यह वीडियो प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा के क्षेत्र में हाल ही में बनी सडक़ का है। वीडियो में कार से उतरे कुछ लोग सडक़ की सतह को हाथों से ही उखाड़ते दिखाई दे रहे हैं। डामर की पूरी परत इतनी कमजोर है कि वह बिना किसी औजार के सडक़ को छोड़ देती है। वीडियो में सुनाई देता है कि सडक़ तो लोगों के चलने से कुछ दब गई, वरना यह कपड़े की तरह एक झटके में अलग हो जाती। सडक़ के नीचे गिट्टी और मुरूम का बेस दिखाई नहीं दे रहा है।
इस वीडियो को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) और फेसबुक पेज पर साझा किया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ऐसी सडक़ केवल भ्रष्टाचार का नतीजा हो सकती है। कट और कमीशन के खेल में जनता के साथ सीधा छल किया जा रहा है।
वायरल वीडियो पर लोगों की प्रतिक्रियाएं भी कम दिलचस्प नहीं हैं। एक यूजर ने व्यंग्य करते हुए लिखा कि यह तो बड़ी सहूलियत की सडक़ है। उखाड़ो और जहां मन हो वहां ले जाकर बिछा दो, गांव-गली कहीं भी स्थापित कर दो। वहीं दूसरे ने कहा कि कांग्रेसी सडक़ बनवाते नहीं, उखाड़ते ही हैं और जो लोग सडक़ उखाड़ रहे हैं, उनके खिलाफ सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कार्रवाई होनी चाहिए।
कुल मिलाकर सवाल यही है कि नई सडक़ें जनता को राहत देने के लिए बन रही हैं या फिर उसकी मजबूती सिर्फ कागजों में हैं।
नए साल में शुरू नहीं होगी बस्तर ट्रेन
एक केंद्रीय राज्य मंत्री सहित 10 भाजपा सांसदों की केंद्र में मौजूदगी के बावजूद छत्तीसगढ़ से जुड़ी रेलवे और हवाई सेवाओं की जनाकांक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं। खासतौर पर रेलवे से जुड़ी आम लोगों की मांगों पर लंबे समय से सिर्फ आश्वासन चल रहा है। दिल्ली में रेल मंत्री के साथ सांसदों की मुलाकातों की तस्वीरें समय-समय पर सामने आती हैं, जिससे लोगों को उम्मीद बंधती है कि उनके क्षेत्र में रेल सेवाओं का विस्तार होगा, लेकिन उम्मीद बार-बार टूट जाती है।
बात यदि बस्तर को राज्य की राजधानी रायपुर से जोडऩे की करें, तो कभी एक ट्रेन इस जरूरत को काफी हद तक पूरा करती थी। यह ट्रेन थी दुर्ग–जगदलपुर–दुर्ग एक्सप्रेस, जिसकी शुरुआत वर्ष 2012 में हुई थी। यह भले ही सीधे रायपुर तक नहीं पहुंचाती थी, लेकिन दुर्ग पहुंचने के बाद बस्तर के लोगों के लिए राजधानी से जुडऩा आसान हो जाता था। करीब 16 घंटे और 640 किलोमीटर की लंबी यात्रा होने के बावजूद, अधिकतर सफर रात में होने और किराया किफायती होने के कारण यह ट्रेन यात्रियों की पहली पसंद बनी रही।
यह ट्रेन न केवल बस्तर को जोड़ती थी, बल्कि ओडिशा के प्रमुख शहरोंखरियार रोड, कांटाबांजी और रायगढ़ा से भी संपर्क होता था। यूपीए-2 सरकार के दौरान शुरू की गई इस ट्रेन को केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद बंद कर दिया गया। कुछ समय के लिए इसे दोबारा चलाया गया, लेकिन फिर रोक दिया गया। वजह बताई गई कि यह ट्रेन रेलवे की आय के ढांचे में फिट नहीं बैठती।
इस महीने सांसद महेश कश्यप ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात कर इस ट्रेन का मुद्दा उठाया था। मंत्री की ओर से गंभीरता से विचार करने का आश्वासन भी दिया गया। लेकिन हाल ही में जारी नई रेलवे समय-सारिणी में जगदलपुर–दुर्ग–जगदलपुर ट्रेन का नाम नहीं है। इससे बस्तर के लोगों की उम्मीदों को एक बार फिर झटका लगा है।
विडंबना यह है कि रेलवे एक-एक साधारण यात्री ट्रेन के घाटे और मुनाफे का हिसाब तो लगाती है, लेकिन वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी महंगी ट्रेनों से हो रहे नुकसान की चिंता नहीं करती, जिनकी टिकटें आम यात्रियों की पहुंच से बाहर हैं। हजारों यात्रियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने वाली ट्रेन के घाटे को आधार बनाकर बंद कर दिया जाता है।
यह सही है कि रेलवे को नुकसान नहीं होना चाहिए, लेकिन कारोबारी, छात्र और नौकरीपेशा लोग ऐसी ट्रेनों से न सिर्फ यात्रा करते हैं, बल्कि समय और पैसे की बचत भी करते हैं। इस तरह वे देश की अर्थव्यवस्था में कुछ तो योगदान देते हैं। वैसे भी रेलवे आरक्षित टिकटों पर यह स्वीकार करती है कि यात्री सेवाओं के खर्च का बड़ा हिस्सा वह स्वयं वहन करती है।
इधर, बिलासपुर रेलवे जोन देश के सर्वाधिक राजस्व देने वाले जोनों में शामिल है। यहां से कोयला, बॉक्साइट और सीमेंट जैसे खनिजों की मिलियन्स टन ढुलाई रेलवे को निरंतर आय देती है। ऐसे में कम से कम इतनी उम्मीद तो की जा सकती है कि रेलवे बिना नफा-नुकसान की गिनती किए, छत्तीसगढ़ में यात्री सेवाओं का विस्तार करे।
रेल मंत्री वर्ष में दो-तीन बार वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में रेलवे अधोसंरचना पर पहले से कई गुना अधिक खर्च किया जा रहा है। यदि वास्तव में इतनी उदारता और निवेश है, तो फिर रेल सुविधाओं का विकास छत्तीसगढ़ के लोगों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप क्यों नहीं हो रहा है?
एक नियुक्ति, चर्चा ही चर्चा

रिटायर्ड आईएएस अशोक अग्रवाल की राज्य निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग के सचिव पद पर नियुक्ति क्या हुई, वो सोशल मीडिया पर ट्रोल हो गए। ‘छत्तीसगढ़’ ़ ने 22 दिसंबर को दैनिक कॉलम राजपथ-जनपथ में अशोक अग्रवाल की नियुक्ति, और पर्दे के पीछे की कहानी को प्रमुखता से प्रकाशित किया था।
नियामक आयोग के सचिव के पद पर डिप्टी कलेक्टर, अथवा सहायक प्राध्यापक स्तर के अफसर ही पदस्थ होते रहे हैं। अब इस पद पर सचिव स्तर के पद से रिटायर्ड अशोक अग्रवाल की नियुक्ति की गई है। अशोक अग्रवाल सूचना आयुक्त भी रह चुके हैं जो कि हाईकोर्ट जज के समकक्ष का पद है। बावजूद इसके अशोक अग्रवाल कई पायदान नीचे के पद पर काम करने के लिए तैयार हो गए।
पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी ने राजपथ-जनपथ को फेसबुक पर पोस्ट किया, उस पर काफी प्रतिक्रियाएं आई है। अशोक अग्रवाल को लेकर एक ने लिखा सरकारों को इनसे कितना विशिष्ट फायदा मिलता रहा होगा, यह जांच का विषय होना चाहिए। साथ ही सिविल सर्विसेस के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने योग्य उदाहरण भी है।
एक अन्य यूजर ने लिखा कि ये गलत तरीका है नौकरशाही में। आरटीआई एक्टिविस्ट संजय सिंह ठाकुर ने लिखा कि रायपुर कमिश्नर रहा व्यक्ति, रिटायरमेंट के बाद सूचना आयुक्त बना, फिर रोडक्रास में, और अब विवि नियामक आयोग में क्लास-टू पद पर...। सरकार और इसने दोनों ने ही लाज शर्म बेच खाई है। कुल मिलाकर अशोक अग्रवाल की नियुक्ति की काफी चर्चा हो रही है।
अब बारी एल्डरमैन की
चर्चा है कि सरकार के भीतर नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति के लिए सहमति नहीं बन पाई है। प्रदेश की कुल पौने दो सौ निकायों में साढ़े सात सौ से अधिक एल्डरमैन(मनोनीत पार्षद) की नियुक्ति होनी है।
सरकार से जुड़े कुछ का मानना है कि एल्डरमैन की नियुक्ति से सिर्फ फिजूलखर्ची होती है। ऐसे में नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। नियुक्ति के प्रावधान को ही खत्म करने का सुझाव दिया गया है। जबकि सांसद-विधायक, कार्यकर्ताओं को उपकृत करने के लिए एल्डरमैन नियुक्त करने के लिए दबाव बना रहे हैं। नगर निगमों में आठ, नगर पालिकाओं में पांच, और नगर पंचायतों में तीन एल्डरमैन नियुक्त किए जा सकते हैं। इस तरह 759 एल्डरमैन नियुक्त होना है। कहा जा रहा है कि प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद नए प्रभारी की नियुक्ति होनी है। नए प्रभारी के आने के बाद निगम-मंडलों, और एल्डरमैन की नियुक्ति पर फैसला हो सकता है। फिलहाल तो पद के आकांक्षी कार्यकर्ताओं को इंतजार करना होगा।
महादेव की जांच का क्या?
चर्चा है कि महादेव ऑनलाइन सट्टेबाजी प्रकरण पर जांच रोक दी गई है। पिछली सरकार में महादेव ऑनलाइन सट्टा प्रकरण में कई नामी लोगों के नाम आए थे। कई पुलिस अफसर जांच के घेरे में आए थे, और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों, और अन्य लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी।
ताजा जानकारी यह है कि महादेव सट्टेबाजी केस से जुड़े सारे अभियुक्त जमानत पर रिहा हो चुके हैं। पहले ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर कोई कानून नहीं था। अब केन्द्र सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग एक्ट लाया है, जो कि 1 अक्टूबर 2025 से प्रभावशील हो गया है। इस कानून के तहत, देश में ऑनलाइन मनी गेमिंग यानी रुपए लगाकर खेले जाने वाले सभी गेमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसमें ऑनलाइन जुआ, सट्टेबाजी शामिल है। पहले कोई एक्ट नहीं था, फिर भी जांच एजेंसियां कार्रवाई कर रही थी। ऐसे में कार्रवाई में आरोपियों को सजा दिलवाना कठिन था। लिहाजा, पुराने पेंडिंग केसों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
सोशल मीडिया पर आकांक्षा को समर्थन
सरगुजा की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर आकांक्षा टोप्पो को मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों के प्रयोग के आरोप में बीएनएस की धारा 352 (2) के तहत गिरफ्तार किया गया। इस मामले में शिकायत मंत्री और विधायक के समर्थक किसी कार्यकर्ता द्वारा की गई थी। चूंकि इस धारा में अधिकतम दो वर्ष की सजा का प्रावधान है, इसलिए आकांक्षा को थाने से ही जमानत पर रिहा कर दिया गया। यह धारा आईपीसी की पुरानी धारा 504 का संशोधित रूप है, जो जानबूझकर गाली-गलौज या ऐसे इशारों से जुड़ी है, जिनका उद्देश्य सामने वाले को उकसाकर सार्वजनिक शांति भंग कराना हो।
आकांक्षा की गिरफ्तारी जिस इंस्टाग्राम वीडियो के आधार पर हुई, उसमें उन्होंने मंत्री और विधायक को एक परिवार को बेघर किए जाने के लिए जिम्मेदार ठहराया है। यह परिवार 12 सदस्यों का है, जिनमें चार मूक-बधिर हैं। बताया गया है कि वे लोग पिछले 70 वर्षों से उसी जमीन पर रह रहे हैं, जहां अब आंगनबाड़ी भवन बनाने का प्रस्ताव है। बेदखली की कार्रवाई न रोके जाने से आहत होकर इस परिवार ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर इच्छा मृत्यु की मांग की थी, जिसके आधार पर आकांक्षा ने अपना वीडियो तैयार किया।
यह पहला मौका नहीं है जब आकांक्षा सोशल मीडिया पर चर्चा में आई हों। अंबिकापुर शहर और सरगुजा क्षेत्र की जर्जर सडक़ों पर बनाए गए उनके कई रील्स लाखों बार देखे जा चुके हैं। हालांकि, जिस रील को लेकर यह विवाद खड़ा हुआ, उसमें की गई कुछ टिप्पणियों को पुलिस ने आपत्तिजनक माना है। जैसे मंत्री के लिए ‘वही औरत’, ‘घमंडी’ जैसे शब्दों का प्रयोग और यह टिप्पणी कि- विधायक और मंत्री दोनों का दिमाग क्या घुटने में चला गया है?
वीडियो में आकांक्षा यह भी कहती हैं कि दिल्ली में मंत्री ने अपने ड्राइवर को यह कहकर गाड़ी से उतार दिया था कि उसने शराब पी रखी है। इसे महिला सम्मान का मुद्दा बताया गया। वहीं, जब दिव्यांग महिलाएं और उनका परिवार घर से बेदखल किए जा रहे हैं, तो उन्हें वही महिला सम्मान क्यों नजर नहीं आता? आकांक्षा मंत्री के क्षेत्र बिहारपुर में खोले गए आईटीआई का उदाहरण भी देती हैं, जहां संस्थान तो है लेकिन प्रशिक्षक नहीं। छात्रों की मांगें वर्षों से सुनी नहीं जा रही हैं। इसके अलावा, उन्होंने मंत्री की 2022 की एक प्रचार सामग्री का क्लिप भी साझा किया है, जिसमें शराब बिक्री के खिलाफ तत्कालीन कांग्रेस सरकार के विरुद्ध आंदोलन का उल्लेख है। आकांक्षा के मुताबिक आज इसी मंत्री के ही इलाके में चार नई शराब दुकानें खुल चुकी हैं।
गिरफ्तारी के बाद आकांक्षा की यही रील और अधिक वायरल हो गई। केवल इंस्टाग्राम पर इसे अब तक लगभग 3.5 लाख बार देखा जा चुका है और करीब 25 हजार लाइक्स मिल चुके हैं। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने उनका समर्थन किया है। हाई कोर्ट के कुछ अधिवक्ताओं ने भी उनका मुकदमा लडऩे की पेशकश की है।
इन सबके बीच सबसे अहम पहलू इस वीडियो पर आए कमेंट्स हैं। कुछ लोगों ने जरूर लिखा कि मुद्दों से वे सहमत हैं, लेकिन बोलने का तरीका संयमित होना चाहिए। इसके बावजूद, अधिकांश यूजर्स ने आकांक्षा की खुलकर सराहना की है। उनका हौसला बढ़ाया जा रहा है, सच को सामने लाते रहने की उम्मीद रखी गई है। सवाल यही है कि ऐसा क्यों है? मंत्री और विधायक माननीय जनप्रतिनिधि हैं, लेकिन इस मामले में उन्हें समर्थन क्यों नहीं मिल पा रहा?
बाहर जाने के नुकसान
आईपीएस के एक अफसर को अपने प्रमोशन के लिए लड़ाई लडऩी पड़ रही है। कैडर लिस्ट के हिसाब से तो अफसर को डीआईजी के पद पर प्रमोट होना चाहिए था, लेकिन वो अभी एसपी हैं। अफसर पहले दो जिलों के एसपी रह चुके हैं। वर्तमान में एसपी के रूप में तीसरा जिला संभाल रहे हैं।
प्रमोशन लिस्ट में अफसर अपने बैच के बाकी अफसरों से पीछे चल रहे हैं। उन्होंने कैट में याचिका भी दायर की थी। कैट से उनके पक्ष में फैसला भी आ गया, लेकिन प्रमोशन पर पीएचक्यू में कोई फैसला नहीं हो पाया है। दरअसल, अफसर, राज्य पुलिस सेवा से आए हैं। वो छत्तीसगढ़ नहीं आना चाहते थे।
वो मध्यप्रदेश में ही पदस्थ रहे, लेकिन आईपीएस अवार्ड का समय आया, तो वो अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर छत्तीसगढ़ आ गए। इससे छत्तीसगढ़ कैडर के उनके बैच के बाकी अफसर खफा हो गए, और इसकी शिकायत गृह विभाग में की गई। साथियों को नाराज करना अफसर को भारी पड़ रहा है। उनके बैचमेट तो प्रमोट हो चुके हैं, लेकिन वो अटके पड़े हैं। नए साल में अफसर को प्रमोशन मिल पाता है या नहीं, यह देखना है।
संपन्न लोगों को प्राथमिकता!
प्रदेश भाजपा के मोर्चा-प्रकोष्ठों में पखवाड़े भर पहले संयोजक-सहसंयोजकों की नियुक्ति हुई, और नए पदाधिकारियों ने काम शुरू भी कर दिया है। जिला स्तर पर अध्यक्षों की खोज चल रही है। प्रदेश संयोजक, जिलों में ऐसे नेताओं को चाहते हैं, जो आर्थिक रूप से सक्षम भी हो। ताकि छोटे-मोटे कार्यक्रमों पर खर्चों के लिए प्रदेश दफ्तर की तरफ न देखना पड़े।
बताते हैं कि उत्साही संयोजकों ने जिलों में अटलजी की जयंती को जोर शोर से मनाने के लिए निर्देश जारी किए थे। ताकि मोर्चा-प्रकोष्ठों की अपनी अलग पहचान नजर आए। कुछ जिलों में तो कार्यक्रम बेहतर ढंग से हुआ। मगर एक-दो जगहों में कार्यक्रमों में दिक्कत आ गई। जिले के नेताओं ने आर्थिक तंगी का हवाला दे दिया। अब संयोजक ऐसे नेताओं को जिले की कमान सौंपना चाहते हैं, जो जरूरत पडऩे पर कार्यक्रमों का खर्चा खुद भी वहन कर सके।


