राजपथ - जनपथ

Date : 14-Dec-2018

चुनावी चंदे को लेकर राजनीतिक हल्कों में चर्चा हो रही है। यह भी खबर आई है कि भाजपा की महिला प्रत्याशी पैसे के लिए तरस गईं। जबकि प्रत्याशियों को फंड की कोई कमी नहीं होने देने का भरोसा दिलाया गया था। चर्चा तो यह भी है कि तखतपुर सीट से भाजपा प्रत्याशी हर्षिता पाण्डेय को बाकी प्रत्याशियों के बराबर फंड तक नहीं दिया गया, जबकि  प्रदेश भाजपाध्यक्ष धरम कौशिक पड़ोस की बिल्हा सीट से उम्मीदवार थे, और कौशिक को पार्टी फंड के अलावा भी रकम की कोई कमी नहीं थी। यह सब होते हुए भी हर्षिता संसाधनों की कमी के चलते मामूली वोटों से हार गईं। यही हाल भटगांव से प्रत्याशी रजनी त्रिपाठी और मानपुर-मोहला से प्रत्याशी  कंचनमाला भूआर्य का भी रहा। सुनते हैं कि कंचनमाला को अपने कार्यकर्ताओं को पैसे देने के लिए चुनाव संचालकों से मिन्नतें करनी पड़ती थी, जबकि पुरूष प्रत्याशियों के इलाकों में तो शराब भी भेजी गए थे। कई जगह गाडिय़ां पकड़ी भी गई। चर्चा तो यह भी है कि खरसिया का किला ढहाने के लिए  इतना फंड भेजा गया कि यह छत्तीसगढ़ के इतिहास में किसी भी दल ने अब तक किसी भी एक सीट पर नहीं किया। पार्टी प्रबंधकों के इस दोहरे व्यवहार की अंदरखाने में जमकर चर्चा हो रही है।  

कांग्रेस तंगहाली में लड़ती रही
कांग्रेस पूरे चुनाव में फंड की कमी से जूझते रही है। मीडिया मैनेजमेंट के लिए प्रदेश संगठन ने करीब 18 करोड़ का प्रस्ताव भेजा था। जिसमें इलेक्ट्रॉनिक-प्रिंट मीडिया के विज्ञापन का खर्चा मुख्य रूप से था। पर हाईकमान ने फंड की कमी का हवाला देकर प्रस्ताव अमान्य कर दिया और खुद दिल्ली की विज्ञापन एजेंसी के जरिए गिने-चुने छोटे-छोटे विज्ञापन जारी किए। 
इन सबके बीच एक खबर यह भी उड़ी है कि कांग्रेस के प्रबंधकों ने दो बड़े उद्योगपतियों का फंड लेने से मना कर दिया। चर्चा है कि ये दोनों उद्योगपति सरकार के बेहद करीबी रहे हैं। शासन-प्रशासन में इनकी खूब दखल रही है। यही वजह है कि दोनों विपक्ष की आंखों की किरकिरी बने रहे। ऐसे में प्रदेश में परिवर्तन की बयार बह रही थी तब उन्होंने विपक्ष को साधने के लिए चुनावी फंड देने का प्रस्ताव दिया, लेकिन कांग्रेस नेताओं ने साफ तौर पर मना कर दिया। अब देखना है कि कांग्रेस सरकार इन दोनों उद्योग घरानों से कैसा सलूक करती है, जिनमें से एक तो महज सरकार की दारू-खरीद मोनोपोली के चलते जमीन से आसमान तक पहुंच चुकी है। कांगे्रस ने पूरी शराब बंदी का चुनावी वायदा किया है, और ऐसे में राज्य के उन शराब उत्पादकों को दिक्कत होना तय है जो अभी तक इस राज्य में बिक्री में मोनोपोली चलाकर कारखाना चला रहे थे। अब राज्य के बाहर खुले बाजार में ब्रांड के मुकाबले में निकलना पड़ेगा। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 13-Dec-2018

प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ने अभी शपथ नहीं ली है, लेकिन ज्यादातर अफसरों और नेताओं के मिजाज में परिवर्तन आ रहा है। ये लोग अब सुकून महसूस कर रहे हैं। विशेषकर सरकारी अफसर और नेता अब मोबाइल से बात करने में नहीं हिचक रहे हैं। पहले जरूरी होने पर वाट्सएप से ही बात करते थे। यह चर्चा आम रही कि बड़े पैमाने पर सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों और अफसरों के  मोबाइल टेप करा रही है। खुद नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव विधानसभा में अपने भाषण में यह बात कह चुके हैं।
सिंहदेव का दर्द यह था कि मोबाइल से बात करना जोखिम भरा हो गया है और वाट्सएप कॉल से ठीक से बात नहीं हो पाती है। दूर-दराज इलाकों में वाट्सएप कॉल नहीं लग पाता था। यह हाल सिंहदेव जैसे नेता का था, जिन्हें मुख्यमंत्री का करीबी भी माना जाता रहा है। वे मुख्यमंत्री को अपना बड़ा भाई बताते रहे हैं। न सिर्फ विपक्ष बल्कि सरकार के कुछ मंत्री भी मोबाइल से गोपनीय चर्चा करने में हिचकते थे। 
सुनते हैं कि सरकार के कुछ करीबी अफसर निजी स्तर पर टेपिंग  करा रहे थे। जबकि सरकारी स्तर पर टेलीफोन टेपिंग के लिए गृह विभाग की अनुमति जरूरी होती है। चर्चा तो यह भी है कि इसमें कुछ कर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी। इसके अलावा निजी डिटेक्टिव एजेंसियों का सहारा लेने का भी हल्ला है। अब जो लोग यह सब काम करा रहे थे, वे खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में लोगों का मिजाज बदलाव समझ में आ रहा है। फिलहाल राज्य में राहत की बात यह है कि लोग फोन पर एक-दूसरे से बात करने के लिए तैयार हो रहे हैं।
दीवारों के कान
कल छत्तीसगढ़ के सबसे बुजुर्ग कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा ने दिल्ली से आए हुए पर्यवेक्षक और लोकसभा में कांग्रेस सांसद दल के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े से अलग से मुलाकात की। पूरी बात अकेले में हुई, और जाहिर है कि किसे मुख्यमंत्री बनाया जाए इस पर भी बात हुई। दीवारों का कहना है कि वोराजी ने अपनी कोई पसंद नहीं बताई, महज अपनी नापसंद बता दी, और चले गए। अब दीवारें कितनी भरोसेमंद हैं, यह शाम तक पता लग जाएगा।
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Date : 12-Dec-2018

चुनाव सिर्फ प्रबंधन से नहीं जीते जाते। प्रत्याशियों की छवि जीत-हार में अहम रोल अदा करती हंै। कई भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ एंटी इंकमबेंसी के बावजूद उनकी आर्थिक ताकत, प्रबंध क्षमता और पार्टी के भीतर उनकी हैसियत को देखकर शीर्ष नेतृत्व टिकट काटने का हौसला नहीं दिखा पाया।   इनमें विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल, अमर अग्रवाल, लाभचंद बाफना और केदार कश्यप का नाम प्रमुखता से चर्चा में रहा है। 
सुनते हैं कि कसडोल में गौरीशंकर के बजाए जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष योगेश चंद्राकर को लड़ाने पर पार्टी और सरकार के अंदरखाने में चर्चा भी हुई थी। पार्टी के एक-दो रणनीतिकारों को गौरीशंकर के खिलाफ उनके इलाके में भारी नाराजगी का अंदाजा था। चर्चा है कि उन्होंने अपने भांजे के खिलाफ हिट एंड रन केस में बचाव के लिए जिस तरह प्रशासन पर दबाव बनाया था, उससे इलाके के लोग उबल रहे थे। परंतु पार्टी के लोगों को उनकी प्रबंध क्षमता पर पूरा भरोसा था। स्थानीय प्रशासन-पुलिस में गौरीशंकर के भरोसे के लोगों की पदस्थापना की गई। उनके मुकाबले कांग्रेस ने शकुंतला साहू को चुनाव मैदान में उतारा था। कांग्रेस का कोई बड़ा नेता वहां प्रचार के लिए नहीं गया। इन सबके बावजूद एक साधारण महिला प्रत्याशी के हाथों प्रदेश के एक सबसे संपन्न उम्मीदवार गौरीशंकर की सबसे बुरी हार हुई। 
यही हाल अमर अग्रवाल और केदार कश्यप का भी था। केदार की जगह उनके बड़े भाई दिनेश को उतारने पर विचार किया गया था। दोनों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर वातावरण था। इसी तरह लाभचंद बाफना परिवार के अवैध खनन की चर्चा भी स्थानीय स्तर पर होती रही है। उनके विरोधी भाजपा नेता उन्हें रेतीचंद तक कहते रहे हैं। लाभचंद का भाई एक आरटीओ इंस्पेक्टर को पीटने के बावजूद मुकदमे से बच गया, और इंस्पेक्टर को लाइन अटैच कर दिया गया था। छोटे से लेकर बड़े तक ज्यादातर पदाधिकारियों ने उन्हें टिकट न देने की वकालत की थी, लेकिन पार्टी ने अमान्य कर दिया। इसके बाद जो परिणाम आया वह सबके सामने है। लाभचंद को 32 हजार से  अधिक वोटों से हार का सामना करना पड़ा।  
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Date : 10-Dec-2018

भाजपा के कई नेता मानते हैं कि कांग्रेस नेताओं के हाथ में गंगाजल लेकर किसानों को बकाया बोनस-समर्थन मूल्य 25 सौ रूपए देने के वादे ने चुनाव में हलचल पैदा कर दी और एक तरह से किसानों के बीच कांग्रेस के पक्ष में माहौल बन गया। यह एक टर्निंग पाइंट था। 
सुनते हैं कि चुनावी वादे को पूरा करने के लिए गंगाजल की सौगंध खाने का विचार पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरपीएन सिंह का था। उन्होंने राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल और राधिका खैरा के साथ राजीव भवन में प्रेस कॉफ्रेंस से पहले एक होटल में इसकी योजना तैयार की। इसकी जानकारी प्रदेश कांग्रेस के संचार विभाग के नेताओं को भी नहीं थी। आरपीएन सिंह ने बिना कुछ बताए प्रदेश प्रवक्ता विकास तिवारी को गंगाजल लाने के लिए भेजा। तिवारी गंगाजल के 8-10 डिब्बे लेकर सीधे राजीव भवन पहुंचे और प्रेस कॉफ्रेंस से पहले सभी के टेबल पर जमा दिया। थोड़ी देर बाद शैलेष नितिन त्रिवेदी वहां पहुंचे, तो गंगाजल के डिब्बे देखकर भड़़क गए और उन्होंने विकास तिवारी से डिब्बों को अंदर रखने के लिए कह दिया। बाद में आरपीएन सिंह प्रेस कॉफ्रेंस के लिए पहुंचे, तो उन्होंने विकास तिवारी से गंगाजल फिर मंगा लिया। इसके बाद आरपीएन सिंह और प्रेस कॉफ्रेंस में मौजूद नेताओं ने हाथ में गंगाजल धान बोनस- समर्थन मूल्य के चुनावी वादे को पूरा करने की कसम खाई, तो रायपुर से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया। 
चर्चा है कि शैलेष नितिन इसको लेकर असहज थे उन्होंने बाकी नेताओं के गंगाजल हाथ में लेने के बाद आखिरी में लिया। उन्हें बड़े विवाद की आशंका थी। यहां किसी भी तरह की अव्यवस्था और विवाद होने की दशा में पहली जिम्मेदारी संचार विभाग के प्रमुख होने के नाते उनकी ही बनती थी। हाईकमान ने उन्हेें चुनाव से पहले ही इसको लेकर दिशा निर्देश दिए थे। पर कांग्रेस नेताओं का गंगाजल की सौगंध खाने की रणनीति कामयाब हो गई। धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल के खिलाफ चुनाव आयोग में कांग्रेस की शिकायत करने के बजाए सीएम से लेकर पीएम तक भाजपा के छोटे-बड़े नेता अपने भाषणों में गंगाजल की सौगंध खाने को लेकर कोसते रहे। और कांग्रेस खूब प्रचार मिल गया। चूंकि इसकी चर्चा आम मतदाताओं के बीच खूब हुई। चुनाव नतीजों के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि गंगाजल की सौगंध खाना कितना फायदेमंद था। अब यह एक अलग बात है कि असल जिंदगी में गंगा ऐसी मैली हो चुकी है कि उसके किनारे अपनी प्रतिमा बनने की बात सुनकर राम भी बहुत फिक्रमंद हैं कि रात-दिन इतने गंदगी कैसे बर्दाश्त करेंगे? (rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 09-Dec-2018

सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का। प्रदेश में सरकार है तो मतगणना में धांधली की आशंका भाजपा प्रत्याशियों को नहीं है। तभी तो पिछले दिनों पार्टी दफ्तर में मतगणना को लेकर प्रेजेंटेशन दिया जा रहा था, तब  भाजपा प्रत्याशी आपसी चर्चा में मशगुल थे। एक-दो बार टोककर प्रत्याशियों को शांत कराने की कोशिश की गई, लेकिन फिर भी चर्चा जारी रही। तब सौदान सिंह ने माइक हाथ में लेकर प्रत्याशियों से कहा कि आप लोगों की दिलचस्पी मतगणना के प्रेजेंटेशन में नहीं है, यह समझ में आ रहा है, लेकिन कोई व्यक्ति अगर कुछ बता रहा है तो उसे सुन लेना चाहिए।
दरअसल, प्रत्याशियों को उम्मीद थी कि चुनाव प्रचार के उनके अनुभव सुने जाएंगे। कुछ को भीतरघात की शिकायत करनी थी, लेकिन बैठक से पहले यह साफ कर दिया कि सिर्फ मतगणना की तैयारियों पर होगी। बाकी बातें बाद में सुनी जाएगी। इसके बाद प्रत्याशियों की बैठक को लेकर दिलचस्पी ही खत्म हो गई थी।

सीएम पद को लेकर दौड़

सुत न कपास, जुलाहे में लट्ठम-लट्ठा। अभी चुनाव नतीजे घोषित नहीं हुए हैं और कांग्रेस में सीएम पद को लेकर चर्चा चल रही है। कांग्रेस के अंदरखाने में इसको लेकर जोरदार लॉबिंग भी हो रही है। टीएस सिंहदेव, भूपेश बघेल, ताम्रध्वज साहू और डॉ. चरणदास महंत के नाम चर्चा में हैं, लेकिन अब आदिवासी नेताओं ने रामपुकार सिंह का नाम उछाला है। रामपुकार प्रदेश कांग्रेस के सबसे सीनियर नेता हैं और सबसे ज्यादा समय तक रहने वाले विधानसभा के सदस्य भी। 
सुनते हैं कि कांग्रेस को बहुमत मिला तो विधायकों की संख्या बल देखकर हाईकमान कोई फैसला लेगा। यदि विधायकों की संख्या 46-47 तक ही रह पाता है, तो फिर सबको साथ लेकर चलने की क्षमता का मूल्यांकन कर कोई फैसला लिया जाएगा। इसमें वरिष्ठता को तरजीह दी जा सकती है, लेकिन संख्या 50 पार हुई तो हाईकमान के पास विकल्प खुले होंगे। फिर पार्टी लोकसभा चुनाव और अन्य बिन्दुओं को ध्यान में रखकर कोई फैसला लेगी। फिर भी सीएम पद के दावेदार अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 08-Dec-2018

चुनाव नतीजे घोषित नहीं हुए हैं, लेकिन दो मंत्रियों ने अपने सामान पैक कर लिए हैं। वैसे मंत्री पद नहीं रहने पर बंगला खाली करने के लिए एक माह का समय रहता है। हड़बड़ी में पैकिंग को लेकर कई तरह की चर्चा हो रही है। एक का बंगला खाली करने की तैयारी करना तो समझ में आता है, क्योंकि उन्हें टिकट नहीं मिली। पर दूसरे मंत्रीजी की हालत खराब है और चुनाव नतीजे पक्ष में आने की उम्मीद भी कम दिख रही है। ऐसे में सरकार बन भी गई, तो भी उन्हें बंगला खाली करना पड़ेगा। लिहाजा, वे तैयारी में जुट गए हैं। 

सीआर की दिक्कत
सीआर लिखवाने के लिए आईएएस अफसरों में आपाधापी मची हुई है। विधानसभा भंग होने से पहले अफसरों का 30 नवंबर तक का सीआर लिखा जाना है, लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग से एक बड़ी चूक हो गई। सुनते हैं कि साप्रवि ने इसकी सूचना ही 6 दिसंबर को विभाग के वेबसाइट में डाली। कई मंत्री-सीनियर अफसर बाहर हैं। ऐसे में सीआर लिखवाने के लिए अफसरों को भाग-दौड़ करना पड़ रहा है। सीआर में कई तरह का ब्योरा देना होता है, इस वजह से अफसरों को परेशानी उठानी पड़ रही है।  

ट्विटर पर अनिंद्य चक्रवर्ती ने लिखा है- अभी भाजपा के जीवीएल नरसिंह राव को कहते सुना कि 2014 से अभी तक हर एक्जिट पोल में भाजपा की संभावित सीटों को कम आंका जाता है। यहां पर मैं सामने रख रहा हूं 2014 से अब तक हुए प्रमुख राज्यों के एक्जिट पोल के, पोल ऑफ पोल्स डाटा को जिनमें यूपी के अलावा हर राज्य में भाजपा की सीटों को अधिक आंका गया था और वे कम निकलीं। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 06-Dec-2018

भाजपा के रणनीतिकार रायपुर उत्तर की सीट को कमजोर मानकर चल रहे हैं, पर पार्टी प्रत्याशी श्रीचंद सुंदरानी ऐसा नहीं मानते। सुंदरानी से जुड़े लोगों का दावा है कि अंतिम तीन दिनों में विशेषकर बस्तियों के वोटरों को अपने पाले में करने के लिए काफी कुछ किया गया। इससे माहौल बदल गया। सुनते हैं कि पिछले दिनों पार्टी के एक बड़े नेता ने सुंदरानी की जीत पर संदेह जता दिया। इसके बाद सुंदरानी अपने अध्यात्मिक गुरू गुलाब बाबा का आशीर्वाद लेने सतना निकल गए। उन्हें बाबा पर भरोसा है और उम्मीद है कि मतगणना के बाद पार्टी के बड़े नेताओं की धारणा बदलेगी। 

मैत्रीपूर्ण मैच?
रायपुर दक्षिण के प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल की बड़ी जीत के दावे किए जा रहे हैं। उनके समर्थकों का अंदाजा है कि पिछले चुनाव के मुकाबले अधिक वोटों से जीत हासिल होगी। यानी करीब 40 हजार वोटों से जीत का दावा किया जा रहा है। रायपुर दक्षिण में करीब एक लाख 47 हजार वोट पड़े हैं। इसमें से बृजमोहन को 80 हजार के आसपास वोट मिलने की उम्मीद जताई गई है। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी कन्हैया अग्रवाल को 35 हजार के आसपास वोट मिलने का आंकलन किया गया है। बाकी वोट निर्दलियों के खाते में जा सकते हैं। 
हालांकि रायपुर और आसपास में कुछ हद तक बदलाव की हवा चलने का दावा किया जा रहा है। इसके बावजूद इतनी बड़ी जीत के दावे को लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही है। हल्ला यह भी है कि रायपुर दक्षिण में एक तरह से मैत्री मैच खेला गया। इस विधानसभा क्षेत्र के एक हिस्से में दोनों ही दलों के लोग जिस तरह मिलकर प्लॉटिंग कर रहे हैं, उससे मैत्रीपूर्ण मैच की चर्चाओं को बल मिला है। खैर, चुनाव नतीजे के बाद सारी तस्वीर साफ होने की उम्मीद जताई जा रही है।  

स्टिंग बाजार का सन्नाटा
चुनाव के पहले तरह-तरह के स्टिंग ऑपरेशनों में जितनी खलबली मचाई थी, वह सब अचानक शांत हो गई है। लोगों को समझ नहीं आया कि क्या हुआ है। कई और लोगों के नाम स्टिंग ऑपरेशनों में गिनाए गए थे, तस्वीरें भी दिखाई गई थीं, लेकिन उनमें से कम से कम तीन ऐसे बड़े नाम रहे जिनका स्टिंग कभी सामने आया ही नहीं। इसके अलावा राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि बड़ी संख्या में अफसरों के स्टिंग मौजूद थे, और वे एक साथ दफन करवा दिए गए। एक भी अफसर का स्टिंग बाद में नहीं आ पाया। चर्चाओं के सिर-पैर तो होते नहीं, इसलिए वे कितने नंबर का जूता पहनती हैं, यह कैसे पता लगेगा, लेकिन जो भी हुआ हो, बहुत से अफसर राहत से हैं, चाहे सरकार जो भी आए वे कम से कम स्टिंग को लेकर महफूज हैं। अब यह राहत सामग्री कैसे जुटाई गई इसे लेकर जितने मुंह, उतनी बातें। 

दिल बड़ा हो, तो दोस्त बनते हैं और, अक्ल बड़ी हो तो दुश्मन!

घमंड शराब जैसा होता है साहब,
खुद को छोड़कर सबको पता चलता है कि इसको चढ़ गई है।

छोटे शहर के अखबार जैसा हूं मैं जनाब...
दिल से लिखता हूं इसलिए कम बिकता हूं...

23 साल पहले पूजा भट्ट की फिल्म आई थी 'सड़कÓ, और अब उसकी बहन आलिया भट्ट की फिल्म आई है 'हाईवे'।

भारत के दिमागी तौर से बीमार और मूर्ख लोग ही भगवान के करोड़ों रूपये के धंधे का साधन है

पेट्रोलियम कीमतों को लेकर फ्रांस में व्यापक आगजनी हो रही है 
हम लोग यहां 4 साल से ख़ुशी-ख़ुशी अपनी राहजनी करवाते रहे

बजरंग बली हनुमान क्षत्रिय थे और उनका ताल्लुक जैन धर्म से था - जैन मुनि आचार्य निर्भय सागर

क्या हनुमानजी के सभी मंदिरों में पुजारी का पद दलित वर्ग के लिए आरक्षित होगा ? 
ऐसी मांग अब जगह जगह से उठ रहीं है।


तीनों राज्यों में आ सकती है कांग्रेस की सरकार..?
बस कर पगले रुलाएगा क्या..

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Date : 05-Dec-2018

खबर है कि भाजपा के एक दिग्गज नेता की फाइल तैयार है।  नेताजी ने बंगले का निर्माण कराया है। बंगला बनाना गलत नहीं है, लेकिन नेताजी ने बंगले को भव्य रूप देने के लिए सड़क को ही गायब करा दिया। संबंधित विभाग ने इसकी फाइल तो तैयार कर ली थी, पर नेताजी के रसूख के चलते कार्रवाई नहीं हो पाई। इस प्रकरण पर कार्रवाई होगी या नहीं, इसको लेकर विभाग में चर्चा हो रही है। सुनते हैं कि फिर भाजपा सरकार बनी, तो यथास्थिति बरकरार रहेगी लेकिन कांग्रेस सरकार आई तो प्रकरण की जांच-पड़ताल शुरू हो सकती है। वैसे नेताजी के कांग्रेसी मित्र भी कम नहीं है। पर कार्रवाई इस बात निर्भर होगी कि सीएम कौन बनता है। यदि फाइल खुली तो नेताजी की मुश्किलें बढ़ सकती है। 

संपर्क के रास्ते कई हैं...
मंत्रालय में प्रशासनिक अफसर ज्यादा समय चुनाव नतीजों की चर्चा में गुजार रहे हैं। चुनाव नतीजे 11 तारीख को आएंगे, लेकिन नौकरशाहों में उत्सुकता ज्यादा दिख रही है। सुनते हैं कि सरकार बदलने की संभावना को देखते हुए ज्यादातर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसर कांग्रेस के बड़े नेताओं के संपर्क में आ चुके हैं। कुछ अफसर  जो नेताओं से सीधे संवाद करने में शरमा रहे हैं, वे नेताओं के पीए और अन्य करीबियों से हालचाल ले रहे हैं। कांग्रेस नेताओं से सीधे चर्चा न करने की एक वजह और भी है। कहा जा रहा है कि सट्टा बाजार में कांग्रेस और भाजपा दोनों को बराबर सीटें मिलने का दावा किया गया है। यानी सरकार किसी भी दल की बन सकती है। अफसरों की निगाहें सट्टा बाजार पर भी है, जिसका अनुमान अपेक्षाकृत ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। अब जब सट्टा बाजार में ही नई सरकार को लेकर ऊहापोह है तो ऐसे में अफसर सीधे संवाद कायम करने का जोखिम भी नहीं उठाना चाह रहे हैं। 

औरत को आदमी के पैरों तले दबाकर रखने के लिए अलग-अलग धर्मों में और अलग-अलग समाजों में तरह-तरह के पाखंड को विज्ञान का दर्जा भी दे दिया जाता है। हिन्दी की अनगिनत वेबसाईटों पर लक्ष्मी-विष्णु के एक पोस्टर सहित कुछ लाईनें चारों तरफ फैलाई जा रही हैं। इसमें लिखा है- स्त्री को अपने पति का पांव क्यों दबाना चाहिए, इसके पीछे ग्रहों का कारण छिपा है। पुरुष के घुटने से लेकर पिंडली तक का भाग शनि का होता है, तथा स्त्री की कलाई से लेकर ऊंगली तक का भाग शुक्र का होता है। और जब भी शनि पर शुक्र का प्रभाव पड़ता है, तो धन प्राप्ति का योग बनता है। इसलिए स्त्री को प्रतिदिन अपने पति का पैर दबाना चाहिए। इसीलिए हमेशा लक्ष्मीजी भगवान विष्णु का पैर दबाती रहती हैं, और इसी कारण वे धन की देवी हैं। सभी मित्र, भाई अपनी पत्नी तक यह संदेश पहुंचाएं, फायदा हो सकता है।
अब ऐसी एक वेबसाईट में लक्ष्मी के विष्णु के पैर दबाते हुए एक वीडियो भी पोस्ट किया गया है। लेकिन इसी वेबसाईट पर इसी पाखंड के बगल में जो दूसरे लिंक पोस्ट किए गए हैं, वे जिंदगी का दूसरा और असल सच बताते हैं। ये लिंक हैं, सर्दियों में ऐसे सेक्स करने से होते हैं सेहत को अत्याधिक लाभ। इस पोर्न स्टार के फोटोशूट ने पूरी दुनिया में मचाया तहलका, तस्वीरें पागल कर देंगी आपको। ऐसी लड़कियों में हमेशा होती है सेक्स में कुछ नया करने की चाह। महिलाओं के वजानिया से जुड़ी ऐसी बातें जिसे पुरुष जानकर हो जाएंगे पागल। इस तरह के सेक्स करने से बहुत ज्यादा बढ़ती है सेक्स स्टेमिना, जरूर करें ट्राई। (rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 04-Dec-2018

जोगी समर्थक विधायक आर के राय, सियाराम कौशिक और अमित जोगी की सदस्यता खत्म करने की याचिका पर फैसला पेंडिंग हैं। कहा जा रहा है कि विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल की टेबल पर फाइल पड़ी है, लेकिन इस पर वे फैसला नहीं ले पाए हैं। नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव और अन्य कांग्रेस विधायकों ने तीनों विधायकों की सदस्यता खत्म करने के लिए विधानसभा सचिवालय को आवेदन दिया था। 
कांग्रेस विधायक दल की याचिका पर तीनों विधायकों को नोटिस जारी किया गया था और काफी पहले तीनों जवाब भी दे चुके हैं। हालांकि दलबदल के फैसले का अब कोई ज्यादा महत्व भी नहीं है, क्योंकि चुनाव हो चुके हैं और 11 तारीख के बाद नए विधायक शपथ लेंगे। फिर भी इस बात को लेकर उत्सुकता है कि विधानसभा चुनाव परिणाम के पहले तीनों विधायकों की सदस्यता को लेकर कोई फैसला आता है या नहीं। 
अलग-अलग किस्म के भीतरघात
भाजपा ने 7 तारीख को अपने प्रत्याशियों की बैठक रखी है। कहा जा रहा है कि इस बैठक में भाजपा के कई प्रत्याशी भीतरघात की शिकायत कर सकते हैं। धमतरी में कुछ अलग ही तरह की शिकायत सामने आ रही है। सुनते हैं कि यहां के जिला पदाधिकारियों ने कांग्रेस का काम किया। जबकि कांग्रेस के बड़े पदाधिकारियों ने भाजपा प्रत्याशी का साथ दिया। भीतरघात से बड़े नेता भी जूझते रहे हैं। चर्चा है कि प्रदेश अध्यक्ष, नगरीय प्रशासन मंत्री सहित कई नेताओं के खिलाफ भी पार्टी के कुछ नेताओं ने मोर्चाबंदी की थी। पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी को कई कांग्रेस नेता मदद पहुंचा रहे थे, तो कुछ दिग्गज भाजपा नेताओं की सद्भावना कांग्रेस प्रत्याशी उमेश पटेल के साथ थी। चूंकि चार महीने बाद लोकसभा के चुनाव हैं, ऐसे में दिग्गजों के खिलाफ शिकायतें सुनी जाएगी, इसकी संभावना कम है। फिर यह बात भी अपनी जगह है कि भीतरघात करके विपक्षी को मदद पहुंचाने के मामले में दोनों ही पार्टी के नेता और कार्यकर्ताओं के बीच जिस तरह का भाईचारा (चूंकि महिलाओं का नाम सामने नहीं आया है इसलिए बहनचारा लिखना ठीक नहीं है) सामने आया है, उसमें अब मामले को न कुरेदा जाए तो ही बेहतर है।
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Date : 03-Dec-2018

अब दस दिन भी नहीं बचे हैं कि छत्तीसगढ़ में नई सरकार की शक्ल साफ हो जाएगी। वैसे तो 11 दिसंबर की शाम तक सत्तारूढ़ पार्टी तय हो जाने की एक संभावना है, लेकिन किसी वजह से अगर किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला, तो उसके बाद दो-चार दिन लग सकते हैं कि किसी जरूरी और संभावित गठबंधन का रास्ता साफ हो सके। अभी कांग्रेस के प्रदेश के सबसे बड़े नेता टी.एस. सिंहदेव ने एक कैमरे के सामने जोगी के साथ किसी संभावित गठबंधन से अपने सौ फीसदी परहेज की बात को दुहराने से इंकार किया, और कहा कि उन्हें कहा गया है कि वे इस मुद्दे पर कहने से बचें। इसका एक मतलब यह है कि अगर जरूरत पड़ी तो कांग्रेस शायद जोगी से भी हाथ मिला ले। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी जोगी से परहेज पर अब कुछ नर्म पड़े हैं। हफ्ते भर का असमंजस आज निपटाना किसी को ठीक नहीं लग रहा है क्योंकि राजनीति में अटपटे हमबिस्तर होते ही रहते हैं। और तो और बड़बोला मीडिया भी चुप्पी मारकर बैठा है, और हवा के रूख की अटकल लगाने के बजाय 11 तारीख की शाम का इंतजार कर रहा है ताकि नतीजों के मुताबिक चुनिंदा कतरनों या वीडियो क्लिपों को निकालकर यह साबित कर सके कि उसने तो कई हफ्ते पहले ही यह कह दिया था। 


इस चुनाव के बाद लोकसभा पर नजर
भाजपा के मुख्यमंत्री तो पहले से घोषित और तय हैं, लेकिन कांग्रेस के मुख्यमंत्री को लेकर पसंद बड़ी लंबी-चौड़ी हैं। चुनाव जीतने में सबसे अधिक मेहनत करने वाले को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, या सबसे धीर-गंभीर को, या सबसे सीधे-सरल को, या मंत्री के कामकाज के सबसे तजुर्बेकार को? यह सवाल कांग्रेस के सामने आसान नहीं होगा। इसकी एक वजह यह भी है कि 6 महीने बाद के लोकसभा चुनाव की चुनौती इस प्रदेश में मुख्यमंत्री के साथ-साथ सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष के लिए भी होगी, और इन दोनों के बीच तालमेल और संतुलन पर भी होगी। यह भी हो सकता है कि कांग्रेस अगर अपने दावे के मुताबिक 50 से अधिक सीटें जीत ले, तो उसके कुछ विधायकों को लोकसभा चुनाव में उतारा जा सकता है, और उनका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन कांग्रेस अगर सरकार बनाने से दूर रहती है, और खासी दूर रहती है, तो भी कांग्रेस के कुछ विधायकों को आम चुनाव में लड़ाया जा सकता है, और यही बात भाजपा के साथ भी है। पैंतालीस के निर्धारक-आंकड़े से पार्टी जितनी अधिक अधिक होगी, या जितनी अधिक कम होगी, उतनी ही संभावना कुछ विधायकों के लोकसभा चुनाव लडऩे की रहेगी। कुल मिलाकर 18 बरस के अपने अस्तित्व में छत्तीसगढ़ में ऐसी अनिश्चितता कभी देखी न थी। फिलहाल हर पार्टी और हर उम्मीदवार को अपनी जीत के दावे इसलिए भी करने पड़ रहे हैं कि कुछ लोगों से चंदा और मिल जाए, कुछ और लोगों से चंदा मिल जाए, और चुनावी बिल लेकर खड़े हुए लोग कुछ और इंतजार कर लें। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 01-Dec-2018

राहुल गांधी की खासियत है कि वे मिलने आए नेताओं से कुछ न कुछ सवाल जरूर पूछते हैं। उनकी आदत से कुछ नेता परेशान भी रहते हैं। वे सरगुजा में कुछ महीने पहले किसान सम्मेलन में आए, तो उन्होंने रामदयाल उइके से पूछ लिया कि भाजपा और कांग्रेस में क्या फर्क है? तब उइके प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष थे। वे वर्ष-2001 में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे। जोगी के लिए उन्होंने मरवाही विधानसभा सीट छोड़ी थी। 
सुनते हैं कि राहुल के सवाल पर उइके हड़बड़ा गए थे फिर उन्होंने संभलकर कहा कि भाजपा, भाजपा और कांग्रेस, कांग्रेस है। भाजपा कभी कांग्रेस की तरह नहीं बन सकती और कांग्रेस कभी भाजपा नहीं बन सकती। राहुल को उइके का जवाब समझ में नहीं आया। वे अन्य नेताओं की तरफ देखने लगे। तभी उइके ने अपने जवाब को स्पष्ट करते हुए कहा कि भाजपा को आरएसएस चलाती है और भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार बहुत है। बाद में उइके फिर पलट गए और जिस पार्टी की सरकार में भ्रष्टाचार अधिक होने की बात कही थी, उसमें वे शामिल हो गए। गनीमत यही है कि भाजपा में जाने के बाद अब उन पर से यह खतरा हट गया है कि कभी राहुल से सामना होगा और वे पुराने जवाब को याद दिलाते हुए नया सवाल करेंगे।
मंडल की पहली पसंद
एसीएस आरपी मंडल और जितेंद्र शुक्ला का चोली दामन का साथ रहा है। मंडल जब बिलासपुर कलेक्टर थे तब जितेंद्र वहां एसडीएम थे। बाद में मंडल मंत्रालय आए, तो पीछे-पीछे जितेंद्र भी आ गए। पहले नगरीय प्रशासन में दोनों साथ काम कर चुके हैं। बाद में आईपीएल आयोजन के लिए मंडल पर क्रिकेट स्टेडियम को तैयार करने की जिम्मेदारी थी, तो उन्होंने सहयोग के लिए संचालक खेल के रूप में जितेंद्र को ही पसंद किया। इसके बाद मंडल को एसीएस वन का दायित्व सौंपा गया, तो जितेंद्र शुक्ला वन विभाग के संयुक्त सचिव बन गए। अब जब मंडल ने पंचायत विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, तो जितेंद्र डायरेक्टर हैं। पिछले दिनों राकेश चतुर्वेदी को पीएमजीएसवाय सीईओ के दायित्व से मुक्त किया गया, तो जितेंद्र को उनकी जगह सीईओ का अतिरिक्त प्रभार मिल गया। यानी मंडल, जितेंद्र की पहली पसंद रहे हैं। 
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Date : 30-Nov-2018

सौदान सिंह प्रदेश भाजपा के सबसे ताकतवर नेता माने जाते हैं। न सिर्फ मंंंंत्री बल्कि संगठन के छोटे-बड़े पदाधिकारी उनसे भय खाते हैं।  मगर, इस चुनाव में उनका भय चला गया है, ऐसा प्रतीत होता है। चुनाव के दौरान बस्तर और धमतरी जिले में कई असंतुष्ट पदाधिकारियों के घर बैठने की शिकायत हुई थी। सौदान तक कुछ लोगों ने पदाधिकारियों के काम नहीं करने की बात पहुंचाई, तो उन्होंने जिला संगठन के प्रमुख नेताओं को कहलवा भेजा कि यदि असंतुष्ट लोगों ने काम शुरू नहीं किया, तो वे सबकी खबर लेंगे। सौदान की बातों का असर यह हुआ कि असंतुष्ट नेता धमतरी में पार्टी प्रत्याशी के बजाए निर्दलीय प्रत्याशी के प्रचार में जुट गए। कांकेर और कई अन्य जगहों पर भी पार्टी नेताओं ने भीतरघात किया है। यह पहला मौका है जब सौदान सिंह की चेतावनी को असंतुष्टों ने हल्के में लिया। 

नांदगांव तक में हेराफेरी
राजनांदगांव जिले कीचुनावी बिसात में भाजपा की अंदरूनी हालत बेहद पतली रही। प्रचार के नाम पर न सिर्फ  शीर्ष नेताओं ने खानापूर्ति की बल्कि अदने कार्यकर्ताओं ने भी चुनाव प्रचार के लिए मिली रकम में हेरफेर किया। आला नेताओं के ढीले रूख को भांपते निचले कार्यकर्ताओं ने जमकर चांदी काटी। सुनते हंै कि कि सीएम के निर्वाचन क्षेत्र में डैमेज कंट्रोल और प्रचार-प्रसार के लिए पार्टी नेतृत्व ने खजाना खोल दिया। हाथ में रकम आते ही चुनाव प्रबंधन से जुड़े नेताओं ने खर्च करने के बजाए राशि दबा दी। बताते हैं कि सीएम के समक्ष ऐसे नेताओं की सूची भी पहुंच गई है। इन नेताओं में कुछ ऐसे भी है जिनका सरकार ने पूरे पांच साल पूरा ख्याल रखा। और जिले में पार्टी काथिंकटैंक माना जाता है। राजनांदगंाव जिले में प्रचार के दौरान भाजपा की बेतरतीब हालत के लिए इन नेताओं को जिम्मेदार माना जा रहा है। 

भीतरघाती-ऊपरघाती
कांग्रेस प्रत्याशियों ने पिछले दिनों प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के समक्ष भीतरघात करने वाले नेताओं के नाम का खुलासा किया। कई का तो कद इतना ऊंचा है कि प्रदेश प्रभारी ने उनके खिलाफ शिकायतों को अनदेखा करना ही उचित समझा। सुनते हैं कि भीतरघातियों की सूची में पार्टी का कोष देखरेख करने वाले नेता का भी नाम है। यही नहीं, दुर्ग जिले के प्रदेश के बड़े नेता भी अपने इलाके में भीतरघात का शिकार हुए। फिलहाल बड़े नेताओं ने भीतरघातियों पर मौन साधकर रखा है। पार्टी संगठन भीतरघातियों के खिलाफ कार्रवाई के पक्ष में नहीं है। चुनाव नतीजे आने के बाद कुछ नेताओं को धीरे से पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। फिर भी कई प्रभावशाली नेता बाकी रहेंगे, क्योंकि उनके खिलाफ कार्रवाई से लोकसभा चुनाव में नुकसान उठना पड़ सकता है। इस बीच पार्टियों की बैठकों में एक नया शब्द उभरकर सामने आया है। अब तक चुनाव में नुकसान पहुंचाने वाले भीतरघाती होते थे, अब जिन लोगों ने खुलकर नुकसान पहुंचाया है उन्हें पार्टी की बैठकों में ऊपरघाती कहा गया है। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 29-Nov-2018

विधानसभा चुनाव में कुछ आईएएस अफसरों की अतिसक्रियता की जमकर चर्चा है। करीब आधा दर्जन अफसर रायगढ़ के एक होटल में हफ्तेभर डेरा डाले रहे। चर्चा है कि ये अफसर चुनाव ड्यूटी पर नहीं थे, लेकिन अलिखित चुनाव कार्य से जुड़े थे। सुनते हैं कि अफसरों में केन्द्र सरकार के एक उपसचिव भी थे, जो कि कभी रायगढ़ में कलेक्टर रहे हैं। इसके अलावा नगर निगम के ऊंचे ओहदे पर तैनात अफसर भी वहां डेरा डाले हुए थे। निगम अफसर की तबियत कुछ खराब चल रही थी। और वे छुट्टी लेकर आराम करने रायगढ़ पहुंच गए। इन सभी की दिलचस्पी खरसिया सीट को लेकर थी। खरसिया में उनके आगे-पीछे काम कर चुके ओपी चौधरी चुनावी मुकाबले में थे, तो उनका चुनाव में दिलचस्पी लेना स्वाभाविक था। ये सभी न सिर्फ वहां चौधरी को जीताने की मुहिम में जुटे रहे  बल्कि अपने-अपने संपर्कों को टटोलकर चौधरी के पक्ष में काम करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। ये काम कानूनन भले ही सही न हो, पर पूर्व सहयोगी के प्रति उनकी निष्ठा-सद्भावना की कई लोग तारीफ भी कर रहे हैं। 

प्रेक्षक ठंडे क्यों पड़े रहे?
विधानसभा चुनाव नतीजों का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है। इन सबके बीच मतदान के दौरान चुनाव प्रेक्षकों के ठंडे रूख पर भी राजनीतिक दलों के लोग हैरानी जता रहे हैं। पिछले चुनाव में तो प्रेक्षक के सख्त तेवर के चलते सरकार के प्रभावशाली मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी मुश्किलों में घिरे रहे। इस बार प्रेक्षक कौन थे? इसकी भी लोगों को जानकारी नहीं रही। कांग्रेस के लोगों ने जब मुख्य चुनाव आयुक्त से इसकी शिकायत की गई, तो चुनाव प्रेक्षकों के नंबर सार्वजनिक किए गए। 
सुनते हैं कि कोरबा सीट पर गुजरात के अफसर प्रेक्षक बनकर पहुंचे थे। उनके पास आचार संहिता उल्लंघन की शिकायत करने राजनीतिक दल के लोग पहुंचे, तो शिकायत पर कार्रवाई के बजाए शिकायतकर्ताओं को ही कह दिया कि छोटी-छोटी बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। कुल मिलाकर चुनाव खर्चों और आचार संहिता पर निगरानी रखने आए चुनाव प्रेक्षकों के रूख से विपक्ष के लोग काफी निराश रहे।  rajpathjanpath@gmail.com


Date : 22-Nov-2018

सरकार का सर्वाधिक पैसा रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग शहर में खर्च होता है, लेकिन यहां पोलिंग में गिरावट से हर कोई हैरान है। रायपुर में तो प्रदेश में सबसे कम 60 फीसदी पोलिंग हुई। यही हाल बिलासपुर और दुर्ग का भी रहा। जबकि यहां भाजपा-कांग्रेस से दिग्गज नेता मैदान में थे। दोनों प्रमुख दलों के बड़े नेता प्रचार के लिए यहां आए थे। मतदान के लिए जागरूकता अभियान भी यहां खूब चला। इन सबके बावजूद पोलिंग में कमी को लेकर कई तरह की चर्चा हो रही है। 
सुनते हैं कि पोलिंग में गिरावट के लिए दोनों पार्टियों के प्रमुख नेताओं को जिम्मेदार माना जा रहा है। हल्ला है कि बिलासपुर में तो एक प्रत्याशी के खास समर्थकों ने तो एक समुदाय विशेष के लोगों के बीच बकायदा अभियान चलाया था कि यदि वे वोट नहीं करेंगे, तो उन्हें निर्धारित राशि ईनाम के रूप में दी जाएगी। उन्हें प्रमाण के रूप में अपनी ऊंगलियां दिखानी है, जिनकी ऊंगलियों में निशान नहीं होंगे उन्हें मतदाता सूची में नाम देखकर राशि दी जाएगी। यह सब पोलिंग के बाद होगा। कहा जा रहा है कि यह तरीका अपनाकर प्रत्याशी ने अपने खिलाफ पडऩे वाले करीब दो हजार वोट बचा लिए। 
रायपुर की एक सीट में तो मोहल्ले के कई लोगों को पोलिंग के दिन पिकनिक के लिए बाहर भेज दिया गया। यह सब व्यवस्था विरोधी दल के लोगों ने नहीं बल्कि प्रत्याशी के अपने ही लोगों ने ही की थी। जबकि मोहल्ले के सारे वोट किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में गिरने की संभावना थी। यह सब इसलिए किया गया कि पार्टी के टिकट के कई दावेदार नाखुश चल रहे थे। उनमें से एक ने तो अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को हराने के लिए भरपूर मेहनत की और विरोधी पार्टी के प्रत्याशी को जिताने के लिए हर संभव कोशिश की। साथ ही साथ पिकनिक का पूरा खर्चा भी वहन किया। ये बात अलग है कि पार्टी के शीर्ष स्तर तक यह बात पहुंच गई है और चुनाव परिणाम आने के बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है। 

सट्टा बाजार का भरोसा कायम
मतदान के बाद नतीजों को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। भाजपा के रणनीतिकार प्रदेश में पिछले चुनाव की तुलना में कम मतदान को अपने पक्ष में बता रहे हैं। यानी मात्र एक फीसदी कम मतदान हुआ है। वे मानते हैं कि सरकार के खिलाफ कोई नाराजगी नहीं रही है और लोग यथास्थिति चाहते हैं। उन्हें भरोसा है कि पिछले चुनाव के बराबर सीटें मिलेंगी। ये अलग बात है कि वे उन 30 सीटों को खतरनाक मान रहे हैं, जहां 80 फीसदी से अधिक मतदान हुआ है। भाजपा के लोगों की सोच है कि ये सीटें कांग्रेस को मिल सकती है। जबकि कांग्रेस के लोग मतदान के फीडबैक से बेहद खुश हैं और वे एक तरह से 15 साल का वनवास खत्म होने की उम्मीद पाले हुए हंै। पार्टी के लोग तो भावी सीएम को लेकर भी बात कर रहे हैं। इन सबके बीच सट्टा बाजार पर भी नेताओं की निगाह टिकी हुई है, जो कि तमाम मीडिया आंकलन को नजर अंदाज कर अभी भी भाजपा के मजबूती से खड़ा दिख रहा है। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 19-Nov-2018

खरसिया में पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी और युवा कांग्रेस अध्यक्ष उमेश पटेल के बीच कांटे की टक्कर है। पहली नजर में चौधरी अपने आक्रामक तौर-तरीकों और लाव-लश्कर के चलते प्रचार-प्रसार में आगे हैं। उनके प्रचार के लिए दूसरे राज्यों से भी लोग आए हैं। वे पेशेवर राजनीतिज्ञ की तरह चुनाव प्रचार कर रहे हैं। सुनते हैं कि चौधरी के प्रचार में जांजगीर-चांपा जिले का एक निगरानीशुदा बदमाश भी जुटा है, जिसे उन्होंने कलेक्टर रहते जिलाबदर भी किया था। वैसे तो मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज माना जाता है। ऐसे में राजनीतिक हल्कों में निगरानीशुदा बदमाश का चुनाव प्रचार में जुटना गलत नहीं माना जा रहा है। फिर भी इस चुनाव में अपराधियों के दखल की काफी चर्चा हो रही है। ऐसा नहीं है कि पहली बार चुनाव में अपराधी प्रवृत्ति के लोगों सेवाएं ली जा रही है। गुजरे जमाने के बड़े नेता विद्याचरण शुक्ल के चुनाव प्रचार के लिए भोपाल के गैंगस्टर रूसी पठान आता था। देश-प्रदेश के सत्ता-विपक्ष के बड़े नेता अपराधियों की सेवाएं लेते रहे हैं। 

दुख में साथ देना काम आया
राजनीतिक दलों को कई तरह की चतुराई दिखानी पड़ती है। बिना किसी वजह के रायपुर उत्तर से श्रीचंद सुंदरानी की टिकट लटक गई थी जो कि प्रदेश में सबसे आखिर में जाकर जारी हुई। नतीजा यह हुआ कि उस सीट से भाजपा के कुछ और नेताओं की उम्मीदें जाग गई थीं। लेकिन टिकट आखिरकार श्रीचंद को मिली जिसके पीछे शदाणी दरबार के संत की सिफारिश भी काम आई, और प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल मेकाहारा के कुछ डॉक्टरों की कही यह बात भी काम आई कि श्रीचंद साल के हर दिन किसी भी इलाके से आए मरीज के इलाज के लिए जुटे रहते हैं, और उनकी यह मदद वोटर याद रखेंगे। 
टिकटों का फैसला जहां हुआ वहां तक डॉक्टरों की यह बात पहुंची, और इससे फैसले में मदद भी मिली। गरीब मरीजों के इलाज के लिए श्रीचंद कई बार डॉक्टरों से उलझ भी जाते थे, लेकिन अपने मिजाज के मुताबिक नरमी ही बरतते थे, दूसरे कई नेताओं की तरह बदसलूकी नहीं करते। अब चुनाव प्रचार में अस्पताल ड्यूटी की वजह से उन्हें मदद भी मिल रही है क्योंकि दुख के वक्त मिला साथ गरीब लोग नहीं भूलते।

रियायती कार्रवाई
बालोद के एक होटल में चुनाव उडऩदस्ते ने छापामार कर एक भाजपा नेता के पास से 60 हजार रुपये बरामद किए। इतने कम रकम के लिए इतना प्रोपेगंडा को लेकर चर्चा होने लगी है। हल्ला तो यह भी है कि भाजपा नेता के पास करीब 40 लाख थे, लेकिन उडऩदस्ते ने सिर्फ 60 हजार का प्रकरण बनाया। इसी तरह भिलाई में एक जगह शराब होने की सूचना उडऩदस्ते को दी गई। सुनते हैं कि उडऩदस्ता तीन घंटे विलंब से पहुंचा और थोड़ी सी शराब की बरामदगी का प्रकरण बनाया। चर्चा तो यह है कि बाकी शराब पार करने के लिए राजनीति दल के लोगों को पर्याप्त मौका दिया। यानी वहां 6 सौ पेटी शराब थी, लेकिन कुछ पेटियों की ही बरामदगी दर्ज की गई।

दीनहीन उम्मीदवार
जांजगीर-चांपा जिले की सीटों में तगड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। चंद्रपुर में सीधे सरल कांग्रेस प्रत्याशी रामकुमार यादव को जशपुर राजघराने की बहू संयोगिता से लोहा लेना पड़ रहा है। यादव डरे सहमे चुनाव प्रचार कर रहे हैं। उनके तौर-तरीकों की जमकर चर्चा हो रही है। पिछले चुनाव में वे बसपा प्रत्याशी के रूप में संयोगिता के पति युद्धवीर से टकरा चुके हैं। सुनते हैं कि पिछले चुनाव में 14 राउंड तक वे युद्धवीर से आगे चल रहे थे। तभी मतगणना के दौरान किसी ने उन्हें बता दिया कि युद्धवीर के लोग गुस्से में हंै। कुछ अनर्थ हो सकता है। इसके बाद वे बुरी तरह कांप गए थे। जब चुनाव हारे तो उन्होंने राहत की सांस ली। इस बार भी वे वहां फंसे हुए हैं। सुनते हैं कि झारखंड-जशपुर से बाहुबली टाइप के लोग वहां आए हुए हैं। इससे भी रामकुमार और उनसे जुड़े लोग डरे-सहमे बताए जाते हैं। रामकुमार हाथ-पैर जोड़कर वोट मांग रहे हैं। वे यह कहते फिर रहे हैं कि गरूवा(पशुधन)चराकर चुनाव लडऩे के लिए आए हैं। जीत गए तो विधायक बनकर आपकी सेवा करूंगा, हार गया तो भी गरूवा चराकर सेवा ही करेंगे। कई लोगों को रामकुमार का यह भोलापन काफी पसंद आ रहा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 18-Nov-2018

चुनाव आयोग की चौकसी के बाद भी कई प्रत्याशी अपने वोटरों के लिए शराब जुगाडऩे में सफल रहे हैं। कुछ जगह शराब भी पकड़ी गई है,   लेकिन इसमें आयोग के अमले या पुलिस का रोल नहीं रहा है। बल्कि शराब बरामद करवाने में विरोधी दल के कार्यकर्ताओं की भूमिका रही है। सुनते हैं कि एक-दो विरोधी दल के प्रत्याशियों को आबकारी अमले और पुलिस का भरपूर सहयोग मिल रहा है। उनकी मुखबिरी के चलते ही शराब पकड़ी गई। 
बीते शनिवार को तो गुंडरदेही के जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी आर के राय  की सूचना पर करीब 6 सौ पेटी शराब पकड़ी गई। यह आरोप है कि भाजपा प्रत्याशी से जुड़े लोगों के लिए शराब ले जा रही थी। राय डीएसपी रहे हैं। आबकारी विभाग के एक संविदा अफसर से भी उनके अच्छे ताल्लुक बताए जाते हैं। ऐसे में जब शराब पकड़ी गई, तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। 
आबकारी विभाग से रिटायर होने के कई बरस बाद तक, शायद आधा दर्जन बार संविदा नियुक्ति पा चुका एक अफसर अपने पूरे तजुर्बे का इस्तेमाल करके राज्य भर में समय के पहले ही दारू पटवा चुका था, उसी में से कुछ बूंदें अभी पकड़ा रही हैं।

काम बाकी तो है, पर दिखता है
रायपुर शहर में पुल और सड़क के आधा दर्जन ऐसे निर्माण हैं जो कि अधूरे रह गए हैं। चुनाव के पहले इनको पूरा करवाने के लिए लोक निर्माण विभाग के मंत्री राजेश मूणत, और अफसरों ने जान लगा दी, लेकिन काम तो होते-होते ही हो सकता है। इस बीच एक बड़ी ठेका कंपनी पर आयकर का छापा पड़ा, तो उसका काम तकरीबन बंद हो गया, और शहर के बीचों-बीच फुट ओवरब्रिज अधूरा रह गया। काम रात-दिन जारी है, लेकिन चुनाव तक फिर भी पूरा नहीं हो पाया। दूसरी तरफ छोटी लाईन पटरी की जगह जो सड़क बन रही है, उससे लाखों लोगों की रोज की दिक्कत दूर होगी, लेकिन रात-दिन काम के बाद भी अभी उसमें कुछ महीने बाकी हैं। राजेश मूणत का चुनाव दो दिन बाद है, और उनकी मेहनत में जरा सी देर से कसर रह गई है। फिर भी लोगों का मानना है कि यह चुनाव न सही, छह महीने बाद के आम चुनाव में यह सारी सुविधा काम आएगी, और लोग उस वक्त इस सरकार के योगदान को याद रखेंगे। विधानसभा चुनाव में वे लोग जरूर ऐसे सड़क-पुल देखकर वोट देंगे जो जानते हैं कि कुछ महीने बाद ये पूरे हो जाएंगे।  और उसके बाद म्युनिसिपल के चुनावों तक तो सारे पुल-सड़क सज जाएंगे, और भाजपा के पार्षद-प्रत्याशी उसका फायदा पाएंगे। फिलहाल ऐसे सड़क-पुल से जिन कॉलोनियों के दाम बढऩे हैं, वहां कारोबारी भी फायदा पा रहे हैं, और बिल्डरों के इश्तहारों से अखबार वाले भी। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 17-Nov-2018

भाजपा के चर्चित किसान नेता चंपू भैया मुश्किल में फंस गए हैं। अभनपुर सीट से उनका नाम घोषित होते ही कई पदाधिकारियों ने पार्टी छोड़ दी थी। उन्हें इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि विधानसभा का समीकरण उनके अनुकूल था। वे यह कहते फिर रहे थे कि नाराज नेताओं के भाजपा छोडऩे से उन्हें फायदा होगा। उनका मुकाबला मौजूदा विधायक और उनके पुराने प्रतिद्वंदी धनेंद्र साहू से है, लेकिन कांग्रेस के बागी और जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी दयाराम निषाद से उन्हें फायदा मिल रहा था। निषाद कांग्रेस के परंपरागत वोटों पर सेंध लगा रहे थे। निषाद आर्थिक रूप से सक्षम भी हैं। सुनते हैं कि कुछ दिन पहले निषाद की तबियत अचानक बिगड़ गई। इसके बाद उन्होंने डॉक्टरों की सलाह पर प्रचार बंद कर दिया। ऐसे समय में जब चुनाव प्रचार शबाब पर है, जोगी पार्टी के उम्मीदवार का प्रचार कम होने से कांग्रेस को फायदा हो रहा है और कांग्रेस प्रत्याशी धनेंद्र मजबूत स्थिति में दिख रहे हैं। इन सबके चलते चंपू भैया के लिए एक बार फिर विधानसभा जाने का रास्ता कठिन हो चला है। 

विरोधियों को भी मदद
खबर है कि प्रदेश के एक ताकतवर नेता ने विरोधी दल के कई उम्मीदवारों को चुनावी चंदा उपलब्ध कराया है। विरोधी प्रत्याशी चंदे के लिए भटक रहे थे। पार्टी भी उनकी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रही थी। ऐसे में नेताजी की सहयोग राशि से उन्हें काफी मदद मिली है। सुनते हैं कि बस्तर के कई प्रत्याशियों को 15-15 पेटी तक दिए गए। कहावत है कि दान की बछिया के दांत नहीं देखे जाते। ऐसे में मदद कहीं से भी मिले, गलत नहीं है।

कर्जा माफ
सरकार बनी तो कांग्रेस ने किसानों का कर्जा माफ करने का वादा किया है। महासमुंद जिले के एक विधानसभा के निर्दलीय प्रत्याशी ने भी कर्जा माफ की घोषणा की है। दरअसल वे छोटे-मोटे ब्याज का धंधा भी करते हैं। कई गरीब वोटरों ने इनसे कर्ज ले रखा है। इन वोटरों से वोट मांगते कहा कि वे जीत गए तो उनका कर्जा माफ, लेकिन हार गए तो उन्हें लौटाना होगा। क्योंकि हार जाने के बाद इन्हीं रुपयों से गुजारा होगा। तुरंत खुशी, तुरंत गम में डूबे ये वोटर समझ नहीं पा रहे क्या करें, क्या न करें?
जनसैलाब शब्द का पतन
चुनाव प्रचार घमासान है। हर नेता-प्रत्याशी ज्यादा समर्थन का दावा कर रहा है। अखबार के लिए विज्ञप्ति ई-मेल से जारी किए जा रहे हैं। किसी भी दल का प्रत्याशी हो इन विज्ञप्तियों में जिस शब्द का इस्तेमाल कर रहा है, वह है-जन सैलाब।  प्रचार के दौरान किसी चौक या मुहल्ला हो या फिर गांव की गलियां, महज हजार-पांच सौ की भीड़, उन्हें जनसैलाब दिखने लगी है। रुपये की तरह अवमूल्यन का शिकार यह शब्द आने वाले दिनों में कहीं दर्जनों के लिए भी इस्तेमाल होने न लगे।
बड़े सितारे को छोटों की मदद
चुनावी सभाओं के लिए छत्तीसगढ़ी लोकगायक-कलाकार ज्यादा कारगर साबित हो रहे हैं, तभी तो  बसना विधानसभा के एक जनसभा में गई भाजपा की स्टार प्रचारक स्मृति ईरानी की सभा में भीड़ लाने के लिए छत्तीसगढ़ी लोककलाकारों को लगाया गया था। 
रोजी पर रिश्तेदारों के घर
बसना-सरायपाली विधानसभा का इलाका ओडिशा सीमा से लगा हुआ है। सीमावर्ती इलाके के लोगों का रोटी-बेटी का संबंध है। इस चुनाव ने इन दिनों ओडिशा के इन लोगों को काम दे दिया है। तीन सौ रुपये रोजी के साथ, खाना-पीना भी।  रिश्तेदारों के घर घूमना भी हो रहा है।  
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Date : 16-Nov-2018

चुनाव में अनाप-शनाप पैसे खर्च होते हैं। ऐसे समय में जब व्यापार-उद्योग मंदी की मार झेल रहे हैं, चुनावी चंदा जुटाने में प्रत्याशियों को काफी पापड़ बेलने पड़ रहे हंै। सत्ता में होने की वजह से भाजपा के प्रत्याशियों को फिर भी पार्टी और बाहर से किसी तरह फंड का इंतजाम हो जा रहा है, लेकिन वे भी इस बार सोच-समझकर खर्च कर रहे हैं। रायपुर के एक भाजपा प्रत्याशी ने तो फंड बांटने की जिम्मेदारी खुद अपने हाथ में ले रखी है। वे अपने संचालकों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। सुनते हैं कि पिछले चुनाव में नेताजी को 70 पेटी का चूना लग गया था। जिन्हें बांटने के लिए पैसे निकाले थे वह संबंधित तक नहीं पहुंच पाया। यानी बीच के लोगों ने गड़बड़झाला कर दिया था। इस बार वे सतर्क हैं और खुद पैसे बांट रहे हैं। 
एक खबर यह भी उड़ी है कि बस्तर की एक सीट के भाजपा प्रत्याशी को आखिरी में फंड के लिए काफी जूझना पड़ा। जिस चुनाव संचालक को फंड नीचे तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गई थी, वह दीवाली के दूसरे दिन जुएं में काफी कुछ गंवा बैठा। ले-देकर किसी तरह फंड का इंतजाम हो पाया और टेंशन में चुनाव निपटा। 
प्रदेश में माहेश्वरी समाज का अकेला उम्मीदवार भाटापारा से सुनील माहेश्वरी है। नतीजा यह है कि प्रदेश भर से इस समाज के लोग अपनी बिरादरी से एक विधायक बनाने के लिए खूब नगद मदद कर रहे हैं। इस समाज के कुछ लोगों का कहना है कि मारवाडिय़ों के नाम पर अब तक महज अग्रवाल और जैन लोगों को ही टिकट मिलते रही है, और अब इस जाति के कोटे से एक माहेश्वरी को टिकट मिली है तो उसे जिताना सबकी जिम्मेदारी है। प्रदेश भर से इस समाज के कई लोग प्रचार के लिए भी भाटापारा पहुंच रहे हैं।

स्टिंग के खतरों के बीच
छत्तीसगढ़ में बहुत सी पार्टियों के बहुत से नेताओं पर स्टिंग ऑपरेशनों का हमला होते रहा है, और जारी भी है। अब जिन नेताओं को अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं के खिलाफ बयान देते हुए कैमरों पर कैद किया गया है, वे इस परेशानी में हैं कि इस चुनाव में उन बड़े नेताओं से मदद कैसे मांगें। दूसरी तरफ अधिकतर बड़े नेताओं का यह मानना है कि कभी न कभी वे भी किसी से बंद कमरे में ऐसी बातें करते हैं जो अगर बाहर आएं तो वे आत्मघाती होंगी। इसलिए वे स्टिंग ऑपरेशनों पर प्रतिक्रिया देने के भी खिलाफ हैं। ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह छत्तीसगढ़ के सबसे सुरक्षित नेता हैं। वे इतना कम बोलते हैं कि अगर कोई रिकॉर्ड भी कर ले, तो भी गलत बात शायद ही रिकॉर्ड हो। 
हालांकि वे यह भी जानते और मानते हैं कि फोन पर बात करने वाले बहुत से लोग बातचीत रिकॉर्ड करते हैं, और एक अनौपचारिक चर्चा में उन्होंने एक बार कहा था कि वे मानकर चलते हैं कि उनसे फोन पर बात करने वाले तीन चौथाई लोग उसे रिकॉर्ड कर रहे होंगे। जो इतना जागरूक हो, उसके खुद के फंसने का खतरा कम ही रहता है।

भीड़ की हकीकत और तस्वीर
चुनावी सभा के बाद भीड़ को देखकर कार्यक्रम और प्रत्याशी की सफलता को लेकर गुणा भाग किया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता-वक्ता तो नहीं रहे कि जिन्हें सुनने देखने दूर-दूर से लोग खुद होकर पहुंचे। अब तो, ले-देकर, खा-पीकर भी लोग सभा में नहीं जाते। वैसे भी ठंड ने दस्तक दे दी है। कोरिया-सरगुजा जैसे वनांचल में शाम होने से पहले लोग घरों में दुबक रहे हैं। हाथियों का डर सो अलग। वहीं धान कटाई के कारण किसान खेतों में हैं। गांवों में वोटर नहीं मिल रहे हैं। भीड़ का टोटा होने लगा है। लिहाजा कम भीड़ को ज्यादा कैसे दिखाया जाए इसकी चिंता प्रत्याशियों को लगी हुई है। जनसभा ऐसी जगहों पर ली जा रहा है जहां कम भीड़ भी ज्यादा लगे। सभा खचाखच भरा हुआ दिखाई दे।  
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Date : 15-Nov-2018

सदर बाजार के प्रतिष्ठित पुजारी परिवार के सदस्य ओमप्रकाश पुजारी करीब दो दशक बाद भाजपा की राजनीति में मुख्य धारा में लौटे हैं। पार्टी ने उन्हें रायपुर ग्रामीण के भाजपा प्रत्याशी नंदकुमार साहू का चुनाव संचालक बनाया है। पुजारी सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के अभिन्न मित्र रहे हैं और उनके साथ छात्र राजनीति और युवा मोर्चा में काम किया। उस वक्त शिवराज सिंह चौहान और मौजूदा केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी युवा मोर्चा के पदाधिकारी थे। बृजमोहन और ओमप्रकाश पुजारी के बीच दूरियां उस वक्त बढ़ गई जब 90 के विस चुनाव में पार्टी ने बृजमोहन अग्रवाल को  रायपुर शहर से प्रत्याशी बनाया। पुजारी भी टिकट के प्रबल दावेदार थे। तब पार्टी केकई बड़े नेता पुजारी को ही टिकट देने के पक्ष में थे। खैर, बृजमोहन प्रत्याशी बने और जीतकर पटवा सरकार में मंत्री भी बन गए। बाद में उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इससे परे पुजारी, पार्टी के पटवा विरोधी खेेमे से जुड़ गए और धीरे-धीरे भाजपा की राजनीति में हाशिए पर चले गए। वे केंद्रीय मंत्री उमा भारती के करीबी रहे हैं। 
ओमप्रकाश कुशल संगठनकर्ता माने जाते हैं और उन्होंने कई मौकों पर इसको साबित भी किया। राज्य बनने से पहले उन्हें कठिन माने जाने वाले गुंडरदेही उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी का चुनाव संचालक बनाया गया था, जिसमें पार्टी प्रत्याशी डॉ. दयाराम साहू को जीत हासिल हुई। वे दिवंगत भाजपा नेता डॉ. रमेश के भी चुनाव संचालक रहे। संगठन के बड़े नेताओं से नाराजगी के बाद ओमप्रकाश पुजारी ने पार्टी छोड़ दी। बाद में पार्टी में वापसी हुई, तो वे आरएसएस के सहयोगी संगठन धर्म जागरण मंच के लिए काम करने लगे। पार्टी ने विपरीत परिस्थितियों में उनकी फिर सेवाएं ली है। नंदकुमार साहू का चुनाव प्रचार पहले बिखरा हुआ था, लेकिन पुजारी के कमान संभालने के बाद धीरे-धीरे स्थिति सुधरती दिख रही है और कांग्रेस प्रत्याशी सत्यनारायण शर्मा से मुकाबला कड़ा हो चला है। अब जब बृजमोहन अग्रवाल, सीएम डॉ. रमन सिंह के विरोधी खेमे की अगुवाई करते प्रतीत हो रहे हैं। ऐसे में ओमप्रकाश पुजारी के मुख्यधारा में लौटने की पार्टी के भीतर जमकर चर्चा हो रही है।

स्याही लगवाओ, नोट लो
वैसे मुस्लिम वोट बैंक को लेकर राजनीतिक दलों ने कई प्लान तैयार कर रखे हैं। मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में कुछ लोग नोटों के बंडल लेकर घूम रहे हैं। उनका ऑफर है कि वोट डालने न जाएं, घर बैठे ही ऊंगली में स्याही लगवा लें और 2 हजार रुपए प्रति वोट के हिसाब से ले लें। इसी बीच एक प्रत्याशी को शिकायत मिली है कि उसके आदमी मुस्लिमों को 2 हजार की जगह 1 हजार रुपए का ऑफर दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में बिलासपुर में भी मुस्लिमों को वोट से रोकने के लिए एक रात पहले ही उनकी उंगलियों पर निशान लगा देने के लिए भुगतान का सौदा किया गया था।

मोबाइल ब्रांड का इस्तेमाल ईंटों तक पर 
पिछले दो दशक से ही हिंदुस्तानियों की जिंदगी में आए मोबाइल फोन ने इतना असर डाला है कि अब कामयाबी मोबाइल ब्रांड का इस्तेमाल ईंटों तक पर हो रहा है। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 14-Nov-2018

खबर है कि सरोज पांडेय और रामविचार नेताम के लिए परेशानी बढ़ गई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें अपने-अपने जिले में पार्टी प्रत्याशियों को जिताने की जिम्मेदारी दे दी है। सरोज के गृह जिले दुर्ग में तकरीबन सभी प्रत्याशी मुश्किल में हैं। टिकट की घोषणा के बाद से कार्यकर्ताओं में असंतोष फैला था वह अभी तक कम नहीं हुआ है। पार्टी के रणनीतिकारों ने पहले चरण के मतदान की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि दूसरे चरण की सीटों में बेहतर प्रदर्शन करना होगा, तभी सरकार बन पाएगी। चर्चा है कि बिलासपुर संभाग में त्रिकोणीय संघर्ष के कारण अनुकूल स्थिति बन रही है, लेकिन दुर्ग और सरगुजा संभाग में सीधे मुकाबले के कारण पार्टी प्रत्याशी मुश्किल में हैं। कहा जा रहा है कि दुर्ग और सरगुजा में कई जगहों पर प्रत्याशी चयन सही ढंग से नहीं हुआ। इसकी वजह से भी स्थिति बिगड़ी है। अब जिन्होंने टिकट की सिफारिश की है, उन्हें जिम्मेदारी तो लेनी होगी। चूंकि दुर्ग जिले की सीटों के ज्यादातर प्रत्याशी सरोज की पसंद से तय हुए थे। ऐसे में उन्हें जिताने की जिम्मेदारी भी उन पर आ पड़ी है। 

राजधानी की सभी सीटों पर...
रायपुर पश्चिम में पीडब्ल्यूडी मंत्री राजेश मूणत और कांग्रेस के विकास उपाध्याय के बीच मुकाबला है। मूणत समर्थक कुछ दिनों तक इस बात को लेकर परेशान रहे कि उनके कार्यक्रम में कुछ विघ्नसंतोषी तत्व माहौल खराब करके निकल जाते हंै। हीरापुर-जरवाय में मूणत के खिलाफ नारेबाजी भी हुई। खोजबीन करने पर पता चला कि वे कांग्रेस से जुड़े लोग थे और भाजपा के कार्यक्रम में आड़े-तिरछे सवाल पूछकर बाकी लोगों को भी भरमा देते थे। बे्रवरेज कॉर्पाेरेशन की शराब से भरी एक गाड़ी पकड़ी गई, तो यह हल्ला उड़ा कि भाजपा प्रत्याशी बस्तियों में शराब बंटवाने की कोशिश कर रहे हैं। रोज-रोज के विवाद से परेशान मूणत समर्थकों ने अब नई रणनीति बनाई है। मंत्रीजी के कार्यक्रम को अब गुप्त रखा जाने लगा है। मंत्री के प्रचार में जाने से पहले सिर्फ संबंधित वार्ड के प्रमुख नेता को इसकी सूचना दी जाने लगी है। अब जाकर व्यवस्थित तरीके से प्रचार हो पा रहा है। 
लेकिन मूणत समर्थकों को पिछले 5 बरस में रायपुर शहर में मूणत के विभागों द्वारा करवाए गए सैकड़ों करोड़ के काम पर पूरा भरोसा है कि शहर का नक्शा बदल देने वाले इतने काम अनदेखे नहीं रह सकते। कैनाल रोड से लेकर छोटी लाईन पटरी की जगह पर बन रहे एक्सपे्रस हाईवे ने शहर के भीतर सड़कों का जाल बना दिया है। इसके अलावा रिंग रोड पर, दूसरी सड़कों पर जगह-जगह ओवरब्रिज बनाने से पटरियों पर रूकना करीब-करीब खत्म हो गया है। राजेश मूणत के कामों से रायपुर की चारों सीटों पर भाजपा को फायदा मिलना है, अब यह अलग बात है कि भाजपा का कौन सा प्रत्याशी मतदाताओं को कितने स्टेडियम, कितने सभागृह, कितने गरीब-आवास, कितने तालाब-बगीचे गिना सकता है। जो लोग 5 बरस बाद रायपुर आते हैं, वे शहर को ठीक से पहचान भी नहीं पाते। रायपुर के राजधानी होने की वजह से इस पर मूणत के लोक निर्माण विभाग द्वारा किया गया अतिरिक्त खर्च विधानसभा से बजट में पास भी करवा लिया गया था, इसलिए राज्य के पैसों का किसी एक शहर में यह अनाधिकृत इस्तेमाल भी नहीं है। भाजपा के अलावा कांगे्रस के लोगों का भी कहना है कि मूणत ने जितने काम करवाए हैं, उसका कोई जवाब किसी पार्टी के पास नहीं हो सकता। (rajpathjanpath@gmail.com)