राजपथ - जनपथ

10-Oct-2020 6:45 PM 38

कोरोना को पीछे धकेलने का सही मौका

देश और छत्तीसगढ़ दोनों से ख़बरें आ रही हैं कि कोरोना की रफ्तार धीमी पड़ रही है। महामारी से उबरकर ठीक होने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े बताते हैं कि 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर के बीच देश में 6 लाख 14 हजार 265 नये केस मिले जबकि इस बीच 55 लाख  से ज्यादा मरीज स्वस्थ हो गये। छत्तीसगढ़ में भी डिस्चार्ज होने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है रिकव्हरी रेट बढक़र करीब 80 फीसदी पहुंच चुकी है। कई जिलों में डोर-टू-डोर सर्वे भी चल रहा है जिसमें आशंकाओं के विपरीत बहुत कम नये केस सामने आ रहे हैं। यह सही है कि स्वास्थ्य विभाग के मैदानी कर्मचारी, कार्यकर्ता, नर्स, डॉक्टर और सोशल डिस्टेंसिंग तथा मास्क पहनने का पालन कराने वाली पुलिस तथा दूसरी एजेंसियां लगातार 8 माह तक इस काम में लगे होने के कारण ऊब रही हैं। शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भी सब थका महसूस कर रहे हैं, पर जरूरी यही है कि कुछ दिनों, हफ्तों तक हौसला, हिम्मत को बनाये रखा जाना चाहिये। हो सकता है लापरवाही बढऩे पर कोरोना के केस फिर बढऩे लग जायें। अब केस कम होने के आसार दिखाई दे रहे हैं तो इसे और पीछे धकलने की कोशिश जारी रहनी चाहिये।

मरवाही में रोज बदलते समीकरण

मरवाही विधानसभा के उप-चुनाव में रोज कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है जो चौंका देता है। गौरेला-पेन्ड्रा मरवाही में चुनाव प्रचार और रणनीति का काम संभालने वाले छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के अनेक नेता पहले ही पार्टी छोडक़र कांग्रेस में आ चुके हैं। पर गौरेला में पार्टी का सब कुछ संभालने वाले शिवनारायण तिवारी ने भी पार्टी छोड़ दी। बिलासपुर में समीर अहमद बबला का जोगी कांग्रेस से अलग होना भी कम आश्चर्यजनक घटना नहीं है। बबला पार्टी के लिये कम जोगी परिवार के लिये सबसे भरोसेमंद लोगों में एक थे। वे लगभग 24 घंटे उनके बंगले में नजर आते थे। अमित जोगी या डॉ. रेणु जोगी का लोकेशन जानने के लिये लोग बबला की मदद लेते थे। मरवाही से यदि अमित जोगी चुनाव लड़ पाते हैं तो उनके चुनाव अभियान की कमान कौन संभालेगा, क्या वे खुद? यह सवाल अब खड़ा हो गया है। डॉ. रेणु जोगी का यह कहना कि मरवाही सीट कांग्रेस को जोगी की याद में छोड़ देना चाहिये। क्या ऐसा कहना कांग्रेस में लौटने की संभावना तलाशना है?  देखते रहिये, तस्वीर कुछ दिनों में साफ होती जायेगी।


09-Oct-2020 4:38 PM 30

किस्सा नेता प्रतिपक्ष का 
चर्चा है कि पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने रायपुर नगर निगम में भाजपा पार्षद दल के नेता के चयन प्रक्रिया को रोक लगवाकर दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल को पटखनी दे दी है। बृजमोहन, सीनियर पार्षद सूर्यकांत राठौर का नाम तो तय करा चुके थे, लेकिन बाद में राजेश मूणत की दबाव में घोषणा रूक गई। भाजपा पार्षद दल के नेता के चयन के लिए पार्टी के अंदरखाने में चली खींचतान की कहानी काफी दिलचस्प है। 

पार्टी ने निगम चुनाव के लिए बृजमोहन अग्रवाल को संयोजक बनाया था। तमाम कोशिशों के बाद भी निगम में भाजपा को बहुमत नहीं मिला। इसके बाद से भाजपा पार्षद दल के नेता के चयन के लिए चर्चा चल रही थी। सभापति ने जब भाजपा पार्षद दल से नेता के नाम मांगे, तो पार्टी संगठन ने नाम तय करने के लिए कवायद शुरू कर दी। सुनते हैं कि प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय ने हाउसिंग बोर्ड के पूर्व चेयरमैन भूपेन्द्र सिंह सवन्नी को पार्षद दल का नेता चुनने के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया। 

जैसे ही सवन्नी का नाम पर्यवेक्षक के लिए तय किया गया, बृजमोहन खेमे ने इस पर आपत्ति जताई। चर्चा है कि खुद बृजमोहन अग्रवाल ने पवन साय से चर्चा कर सवन्नी को पर्यवेक्षक बनाए जाने पर ऐतराज किया। बृजमोहन की आपत्ति इस बात को लेकर थी कि चुनाव के लिए उन्हें संयोजक बनाया गया, तो पार्षद दल का नेता चुनने के लिए अलग से पर्यवेक्षक क्यों बनाया जा रहा है। बृजमोहन की आपत्ति के बाद पवन साय ने सवन्नी को पार्षद दल की बैठक में आने से मना कर दिया। 

फिर बृजमोहन अग्रवाल ने शहर जिलाध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी को पार्षद दल की बैठक बुलाने कहा। श्रीचंद ने बिना देर किए पार्षदों की बैठक बुलाई। पार्षद दल के नेता के लिए  तीन प्रमुख दावेदार मीनल चौबे, सूर्यकांत राठौर और मृत्युंजय दुबे थे। राजेश मूणत मीनल, और बृजमोहन सूर्यकांत को पार्षद दल का नेता बनाने के पक्ष में थे। मूणत खेमे ने बैठक के पहले ही पार्षदों के बीच मीनल को नेता बनाने के लिए माहौल बना दिया था। उन्हें श्रीचंद समर्थकों का भी साथ मिला। 

बृजमोहन और तीनों विधानसभा के पूर्व प्रत्याशियों की मौजूदगी में पार्षदों से राय ली गई। सुनते हैं कि सबसे ज्यादा पार्षद मीनल के पक्ष में थे। मीनल को नेता बनाने के पक्ष में करीब 15 पार्षदों ने राय दी थी। सात पार्षद सूर्यकांत और बाकी पार्षद मृत्युंजय को नेता बनाने के पक्ष में नजर आए। चर्चा है कि बृजमोहन ने सूर्यकांत का नाम तय कर पार्टी संगठन को इसकी सूचना भेज दी। फिर क्या था, राजेश मूणत ने बिहार फोन लगाकर सौदान सिंह को वस्तु स्थिति की जानकारी दी। 

सौदान सिंह ने तुरंत पवन साय को फोन कर नेता प्रतिपक्ष के नाम की घोषणा करने से रोक दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। नाम की घोषणा अटकी, तो सूर्यकांत राठौर भागे-भागे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के घर पहुंचे और उनसे सौदान सिंह से बात कर नाम की घोषणा करवाने का आग्रह किया। मगर गौरीशंकर ने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। कहा जा रहा है कि अब नए प्रदेश प्रभारी ही अब इस विवाद को सुलझाएंगे। 

कभी सौ फीसदी सही पीएससी हो पायेगी?
सरकार बदलने के बाद बहुत सी चीजें बदली बहुत सी नहीं बदली। जो नहीं बदली उनमें एक है छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के काम करने का तौर-तरीका। इन 20 सालों में पता नहीं कितने अध्यक्ष और सदस्य बदल गये, अफसर इधर-उधर हो गये पर हर परीक्षा विवाद से घिर जाती जाती है। ताजा मामला पीएससी मेन्स के एग्ज़ाम पर हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई रोक का है। हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी कि पीएससी ने जो मॉडल आंसर जारी किये वे गलत थे। 

जिन छात्रों को लगा कि मॉडल आंसर सही होते तो उन्हें मेन्स में बैठने का मौका मिल जाता, वे कोर्ट चले गये। कोर्ट जाने के अलावा छात्रों के पास कोई चारा नहीं है, क्योंकि आयोग ने शिकायतों की त्वरित सुनवाई के लिये कोई आंतरिक प्रक्रिया अपनाई ही नहीं है, जो जल्दी फैसला करे और समय पर परीक्षाओं को सम्पन्न कराना सुनिश्चित करे।
 
हाईकोर्ट से फैसला पता नहीं कब आये, रोक कब हटे पर इस बीच गंभीरता से तैयारी कर परीक्षा देने को तैयार बैठे विद्यार्थी किस मानसिक संत्रास से गुजर रहे होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अब तक सीजीपीएससी की एक भी परीक्षा ऐसी नहीं हुई है जो विवादों से न घिरी हो। प्राय: हाईकोर्ट में उन्हें चुनौतियां दी जा रही हैं। सन् 2008 की पीएससी परीक्षा में सरकार ने अपनी गलती मानी और आखिरी फैसला अब तक नहीं आया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। कई बार तो ऐसा लगता है कि पीएससी के अधिकारी खुद ही ऐसी गलतियों की अनदेखी करते हैं और अदालतों में मामला ले जाने का रास्ता छोड़ देते हैं।

कोरोना हुआ नहीं इलाज हो गया
कोरोना संक्रमण के फैलाव के तौर-तरीके पर नजर रखने वाले जानकार बता रहे हैं कि पहले वायरस का आक्रमण महानगरों में हुआ, फिर नगरों में उसके बाद कस्बों और अब इसका रुख गांवों की ओर है। जांजगीर-चाम्पा जिले में एक ही दिन में कल आये 300 से ज्यादा केस इस दावे की पुष्टि करते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता शहरी क्षेत्रों में चरमराई हुई तो है ही गांवों में और बुरी स्थिति है। शहर के लोग लक्षण महसूस होने पर कोविड टेस्टिंग के लिये पहुंच भी जाते हैं पर गांव के मरीज, सेंटर तक पहुंचने और इलाज कराने की जरूरत को नजरअंदाज कर सकते हैं। वे सामान्य सर्दी, खांसी, बुखार की दवा लेकर कोरोना से निपटने का उपाय कर सकते हैं।

इन सब के बीच जांजगीर-चाम्पा में एक अजीब किस्सा हुआ है। उपभोक्ता संरक्षण समिति के एक सदस्य और वहीं पर काम करने वाले स्टाफ को स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने फोन करके बताया कि उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। वे दोनों आइसोलेशन पर चले गये। तबियत ठीक लग रही थी फिर भी पूरे अनुशासन से रहे और दवाईयां खाते रहे। इस दौरान इन दोनों में से एक जो एक स्टेनो हैं, उन्होंने अपनी रिपोर्ट ऑनलाइन देखी तो पता चला कि रिपोर्ट तो निगेटिव थी। फिर फोरम के सदस्य ने अपनी रिपोर्ट देखी वह भी निगेटिव थी। अब ये क्या करते। बिना मर्ज के ही दवा ले चुके थे। 

बिलासपुर में तो एक मरीज को कोरोना पॉजिटिव बता कर इलाज किया जाता रहा और उसकी मौत भी हो गई। एक और केस में कोरोना मरीज के पॉजिटिव होने का लक्षण था पर उसे सामान्य मरीज बताकर भर्ती कर लिया गया। उसकी भी मौत हो गई। इन लापरवाहियों पर रोक कैसे लगे, स्वास्थ्य विभाग को विचार करना चाहिये।

(rajpathjanpath@gmail.com) 


08-Oct-2020 6:22 PM 48

दर्ज छलका अमित जोगी के पोस्ट पर...

मरवाही उप-चुनाव में सारा खेल जोगी के इर्द-गिर्द घूम रहा है। कांग्रेस की एक-एक गतिविधि पर निगाह रखना और उस पर पैनी प्रतिक्रिया इसकी एक वजह है, दूसरी वजह उनकी जाति का मामला है। कांग्रेसी मरवाही में उद्घाटन, शिलान्यास में लगे रहे, उस पर अमित जोगी सवाल करके घेरते रहे। इधर खामोशी के साथ उनकी पत्नी के नाम पर नया जाति प्रमाण पत्र बन गया। इसकी भनक भी कांग्रेसियों को पहले नहीं लगी। बीते 20 साल से अजीत जोगी को गैर आदिवासी सिद्ध करने की कोशिश कर रहे संतकुमार नेताम को इसका सबसे पहले पता चला। उन्होंने सितम्बर महीने के आखऱिी सप्ताह में ही इसकी शिकायत कलेक्टर मुंगेली से कर दी थी। नेताम ने इसकी ख़बर खुद से उजागर भी नहीं की। लोगों को पता चला तो उन्होंने शिकायत की पुष्टि पूछे जाने पर की। इधर अमित जोगी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका हर एक बयान पहले सोशल मीडिया पर ही आता है। नये जाति प्रमाण पत्र को लेकर उन्होंने एक पोस्ट डाली है जिसे फेसबुक पर ही तकरीबन साढ़े 6 हजार लाइक्स मिल चुके हैं। ज्यादातर प्रतिक्रिया उनके समर्थन में है, उनके प्रति लोगों का कितना प्रेम है दर्शाता है। पर एक यूजऱ की प्रतिक्रिया गौर करने के लायक है। इस पोस्ट में जोगी ने लिखा है कि जब ऋचा जोगी का पैतृक परिवार कम से कम पांच दशकों से अऩुसूचित जनजाति वर्ग से सरकारी नौकरियां करते आ रहा है, तब तो किसी को उनकी जाति की याद नहीं आई। इसी पर एक युवा की प्रतिक्रिया है। इनका प्रोफाइल, स्काउट गाइड होना बता रहा है- वे कहते हैं- यही तो दर्द है साहब, किसी की पीढ़ी-दर-पीढ़ी, दशकों से नौकरी कर रही है और कोई दो वक्त की रोटी के लिये भी मारे-मारे फिरता है...।

कीटनाशक दवा माफिया....

सडक़ पर पुलिस वसूली करती है हमें भ्रष्टाचार दिखाई दे जाता है, सडक़ें खराब मिलती है तो अफसरों को कोसते हैं। पर कई सरकारी विभाग हैं जिनमें बैठे अफसरों की करतूतें परदे के पीछे चलती हैं और आम लोगों को उसकी भनक नहीं लगती। ऐसा ही एक कृषि विभाग है। किसानों ने बीज बोये नहीं कि नकली और अमानक कीटनाशक दवाओं का कारोबार फलने फूलने लगता है। खंभों, ठेलों, दीवालों में इन दवाओं के इश्तेहार पटे रहते हैं। कृषि विभाग के अफसरों की छत्र-छाया में सब होता रहता है। फसल बर्बाद होने से बचाने के लिये हड़बड़ाया किसान अनाप-शनाप कीमत पर दवाईयां खरीदता है। कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं। यह बर्दाश्त कर भी लिया जाये तो दवा डालने के बाद फसल से कीड़े खत्म नहीं होते। दुर्ग के एक किसान ने आत्महत्या कर ली। ऐसी ही नकली कीटनाशक दवा डालकर वह लुट गया। अब प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारी उन दुकानों में छापा मारकर, सील कर रहे हैं। इसके पहले उन्हीं की शह पर यह सब खुलेआम बिक रहा था। कृषि विभाग का भारी भरकम विभाग कर क्या रहा था? छत्तीसगढ़ के कृषि विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ क्या कर रहे हैं? लोगों के उपभोग की दवाओं को बेचने की जिस तरह सख्त निगरानी होती है, लोगों का पेट पालने वाले खेतों में डाले जाने वाली दवाओं पर कोई निगरानी करने वाली टीम क्यों नहीं है। इस घटना में दो चार अफसरों को भी सस्पेंड क्यों नहीं किया जाना चाहिये?


07-Oct-2020 5:22 PM 41

रायबरेली सबपे भारी 

रायबरेली के संस्कृत शोध संस्थान के प्रमुख रहे डॉ. शिव वरण शुक्ल को छत्तीसगढ़ निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग को अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया है। डॉ. शुक्ल पिछले पांच साल से आयोग के सदस्य के रूप में काम कर रहे थे, उन्हें पिछली सरकार में तत्कालीन राज्यपाल बलरामजी दास टंडन यहां लेकर आए थे। डॉ. शुक्ल को आरएसएस का करीबी समझा जाता है। 

हालांकि अध्यक्ष पद पर डॉ. शुक्ल सिर्फ डेढ़ साल ही रह पाएंगे, क्योंकि अध्यक्ष पद पर अधिकतम तीन साल या 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक रह सकते हैं। डॉ. शुक्ल के 70 वर्ष पूरे होने में डेढ़ साल बाकी हैं। मगर उन्हें मौजूदा सरकार में अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई, तो कानाफूसी शुरू हो गई। 

सुनते हैं कि अध्यक्ष पद की दौड़ में पांच-छह शिक्षाविद थे। चूंकि डॉ. शुक्ल सोनिया गांधी के निर्वाचन क्षेत्र के रहवासी हैं, इसलिए सब पर भारी पड़ गए। चर्चा है कि डॉ. शुक्ल के नाम की सिफारिश कांग्रेस के एक राष्ट्रीय नेता ने की थी। वैसे भी सरकार सोनिया के क्षेत्र के आरएसएस समर्थक को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती थी। ऐसे में स्वाभाविक है कि शुक्लजी के नाम पर मुहर लगनी ही थी। संघ के नाम पर राज्यपाल, और रायबरेली के नाम पर मुख्यमंत्री, दोनों सहमत !

बस्तर और बिहार 

बिहार भाजपा के उपाध्यक्ष राजेन्द्र सिंह दो दिन पहले लोक जनशक्ति पार्टी में शामिल हो गए। आप सोच रहे होंगे कि राजेन्द्र सिंह का यहां जिक्र क्यों किया जा रहा है। दरअसल, राजेन्द्र सिंह छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बस्तर भाजपा के प्रभारी थे। वे सौदान सिंह के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं। बस्तर में राजेन्द्र सिंह की काफी धमक रही है। वे बिहार से पूरी टीम लेकर आए थे। और प्रचार खत्म होने तक डटे रहे। प्रत्याशियों को चुनावी फंड भी राजेन्द्र सिंह की निगरानी में बंटता था। 

पार्टी के एक नेता याद करते हैं कि आमतौर पर पार्टी दफ्तर में आगन्तुकों के लिए शाकाहारी भोजन का इंतजाम किया जाता है, लेकिन बिहार से राजेन्द्र सिंह संग आए नेताओं ने कांकेर में चिकन की मांग कर दी। इस पर स्थानीय नेताओं के साथ काफी वाद विवाद भी हुआ था। चुनावी नतीजे का हाल यह रहा कि बस्तर में भाजपा का सफाया हो गया। सिर्फ किसी तरह दंतेवाड़ा सीट जीत पाई थी। अब सौदान सिंह, बिहार में पार्टी का चुनाव अभियान संभाल रहे हैं, तो उनके करीबी राजेन्द्र सिंह साथ छोड़ गए हैं। सौदान सिंह अपने करीबी को पार्टी छोडऩे से नहीं रोक पाए, इसकी पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है।

चाय-पानी में भी आना-कानी !

नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक काफी समय बाद बस्तर के दौरे पर निकले।  बस्तर में नक्सल घटना में बढ़ोत्तरी और पीडीएस में गड़बड़ी पर लोगों का ध्यान आकृष्ट कराना उनका मुख्य ध्येय था। वे स्थानीय कार्यकर्ताओं से रूबरू हुए, लेकिन ज्यादातर नेता प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी से खुश नहीं थे। इसलिए उन्होंने नेता प्रतिपक्ष के दौरे को महत्व नहीं दिया। कांकेर में तो हाल और बुरा था। 

पार्टी संगठन को सूचना देने के बाद कौशिक कांकेर पहुंचे, तो कुछ पदाधिकारी मिलने पहुंच गए।  मगर जिलाध्यक्ष ने तो मेल मुलाकात करने में रूचि तक नहीं दिखाई। थके हारे कौशिक ने स्थानीय नेताओं से कॉफी पीने की इच्छा जताई। दो-तीन बार कहने के बाद उनके लिए कॉफी तो नहीं आई, किसी तरह काली चाय का इंतजाम किया गया। प्रदेश में सरकार थी, तो सारा इंतजाम पहले से ही हो जाता था। अब हाल यह है कि कार्यकर्ता चाय-पानी का इंतजाम करने में भी आना-कानी करने लगे हैं। 

अब तक हुई 1769 निर्दोष आदिवासियों की हत्या!

उत्तर पूर्व और कश्मीर में जब उग्रवाद और आतंक की घटनायें होती हैं तो बड़ी सुर्खियां बनती है पर बस्तर में होने वाली हिंसक घटनाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। बस्तर आईजी ने एक बयान में बताया है कि राज्य बनने के बाद से अब तक बस्तर में माओवादियों ने 1796 निर्दोष ग्रामीणों की हत्या कर दी है। इनमें बस्तर में तैनात सुरक्षा बलों का आंकड़ा शामिल नहीं है। अपने प्रधानमंत्रित्व काल में मनमोहन सिंह ने एक बार सही कहा था कि आतंकवाद से ज्यादा बड़ी समस्या बस्तर की हिंसा की है। जिन आदिवासियों के हित और अधिकारों की लड़ाई लडऩे की बात माओवादी करते हैं, उन्हीं के बीच से इतनी हत्यायें हैरान करने वाली हैं। कारण कुछ भी बताया जा सकता है, जैसे पुलिस की मुखबिरी करना, गोपनीय सैनिक होना। बीते कुछ दिनों से राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली किसी बड़ी घटना को अंजाम नहीं दिया है पर हत्यायें आये दिन हो रही हैं। दो तीन दिन पहले ही दो लोगों की हत्या कर दी गई थी। ताजा खबर है कि बीजापुर में नक्सलियों ने अपने ही पांच साथियों की हत्या कर दी जिन्होंने अपने लीडर की बात मानने से मना कर दिया था। आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, यहां तक कि मध्यप्रदेश में भी नक्सल हिंसा पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा चुका है। छत्तीसगढ़ में लम्बे समय तक बड़ी हिंसक घटना नहीं होती तो लगता है उनका खात्मा हो रहा है पर एकाएक बड़ी वारदात हो जाती है जो भ्रम तोड़ देती है।

कैसा होगा छत्तीसगढ़ का अपना कृषि कानून

केन्द्र सरकार के कृषि बिल का कांग्रेस पूरे प्रदेश में विरोध कर रही है। हाथरस के मामले में भी धरना प्रदर्शन हो रहा है। माहौल अच्छा है। कांग्रेसियों को आंदोलन करने का बीते 15-20 सालों का अनुभव रहा है, वह काम आ रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने केन्द्र के कृषि बिल को प्रदेश में लागू नहीं करने का फैसला लिया है। यह कहा है कि वह अपना नया कानून बनायेगी। संविधान को समझने वाले बताते हैं कि खेती राज्य का विषय है। केन्द्र को इस पर कानून नहीं बनाना चाहिये। विरोध का एक बड़ा कारण यह भी है। छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर धान भी खरीदा जायेगा, सहकारी समितियों और मंडियों की व्यवस्था भी बनी रहेगी। पर नया कानून कैसा हो इस पर कांग्रेस के धरना आंदोलनों में बात नहीं हो रही है। जब नया कानून बन ही रहा है तो कई परेशानियों को हल किया जाना चाहिये, जो खासकर सीमांत और मंझोले किसान दशकों से झेल रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि बीते एक दशक में 12 फीसदी किसान घट गये। इनमें 90 फीसदी किसान वे हैं जिनके पास खेत का छोटा सा ही टुकड़ा था। शादी, ब्याह, बीमारी, छत, उधारी का बड़ा कोई खर्च आया, बंटवारा हुआ तो खेत बिक गया। अब वे या तो खेतिहर मजदूर बन गये, शहर आकर इमारतें बनाने लगे या फिर दूसरे प्रदेशों में कमाने-खाने चले गये। प्रदेश में 37 लाख 46 हजार किसान हैं जिनमें से 30 लाख सीमांत किसानों की संख्या है यानि उनके पास 2 एकड़ से कम जमीन है। छत्तीसगढ़ कृषि भूमि के व्यापक व विविधतापूर्वक व्यावसायिक उपयोग की जागरूकता नहीं है। 90 फीसदी किसान दो बार फसल नहीं ले पाते। इन 20 सालों में सिंचाई का रकबा 32 प्रतिशत तक जा पहुंचा है जो पहले 19 था, सिंचाई क्षमता में अपेक्षित विस्तार नहीं हुआ पर बारिश अच्छी होती है, लगभग 1200 मिमी हर साल। धान की कीमत पर सरकारी बोनस ने उन्हें बाकी लाभदायी फसलों को लेने के लिये उत्सुक नहीं हैं। ऐसे बहुत से सवाल है। जिस तरह सरकार ने प्रदेश की औद्योगिक नीति उद्योगजगत के लोगों से मशविरा लेकर तैयार किया था, कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेनी होगी, जिसमें सबसे निचले स्तर के किसान की राय को भी सुना जाये। 

 


06-Oct-2020 7:22 PM 99

ऋचा जोगी को उतारने की रणनीति

दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी के चुनाव लडऩे पर कयास लगाए जा रहे हैं। चूंकि अमित जोगी के जाति प्रमाण पत्र की पड़ताल चल रही है, और यह भी संभावना जताई जा रही है कि उनके अनुसूचित जनजाति होने का प्रमाण पत्र निरस्त किया जा सकता है। छानबीन समिति ने पहले ही पूर्व सीएम अजीत जोगी के जाति प्रमाण पत्र को निरस्त कर दिया था, और उन्हें आदिवासी नहीं माना था। मरवाही चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है, और सारा दारोमदार जिला निर्वाचन अधिकारी पर है। अमित जोगी खुले तौर पर कह रहे हैं कि सरकार उन्हें चुनाव लडऩे से रोकना चाहती है। विकल्प के तौर पर वे अपनी पत्नी ऋचा जोगी को चुनाव मैदान में उतारने की रणनीति पर भी काम कर रहे हैं।

दूसरी तरफ, कांग्रेस के रणनीतिकारों की सोच है कि अमित जोगी चुनाव मैदान में उतरें। ताकि उन्हें अपनी राजनीतिक ताकत का अंदाजा हो जाए। अजीत जोगी थे, तब बात कुछ और थी। उनके निधन के बाद मरवाही में भी उनके ज्यादातर सहयोगी साथ छोडक़र कांग्रेस में चले गए हैं। ऐसे में कांग्रेस अमित को वजनदार नहीं मानती है। खुद सरकार के मंत्री रविन्द्र चौबे ने मीडिया से चर्चा में साफ तौर पर कहा कि लोकतंत्र में कौन किसी को चुनाव लडऩे से रोक सकता है। ऐसे में संकेत है कि छानबीन समिति का फैसला चुनाव के पहले शायद ही आए। इससे परे भाजपा भी अमित की उम्मीदवारी को ध्यान में रखकर ही प्रत्याशी तय करेगी।

भाजपा और जोगी पार्टी के बीच अघोषित तालमेल देखने को मिला है। जोगी पार्टी के विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह की पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह से निकटता जगजाहिर है। ऐसे में हल्ला है कि भाजपा यहां दमदारी से चुनाव लड़ेगी, इसमें संदेह है। वैसे भी चुनाव के कुछ दिन पहले ही भाजपा ने यहां जिला संगठन खड़ा किया और अध्यक्ष की नियुक्ति की।  ज्यादातर नेता मरवाही से दूरी बनाए हुए थे। चुनाव की घोषणा के बाद प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय और एक-दो अन्य नेता वहां बैठक की औपचारिकता पूरी कर आए हैं। कुल मिलाकर नाम वापसी के बाद सारी रणनीति का खुलासा हो सकता है।

मंतूराम की भविष्यवाणी

मरवाही चुनाव को लेकर चर्चित पूर्व विधायक मंतूराम पवार की भविष्यवाणी सोशल मीडिया में तैर रहा है। पूर्व सीएम अजीत जोगी के करीबी रहे मंतूराम पवार का मानना है कि अमित या ऋ चा जोगी के चुनाव लडऩे पर कांग्रेस पिछडक़र दूसरे नंबर पर चली जाएगी। जाति मामले में जोगी परिवार के चुनाव लडऩे से वंचित होने पर कांग्रेस की जीत पक्की है। मंतूराम पवार ने भाजपा को लेकर टिप्पणी की है कि भाजपा में दंतेवाड़ा उपचुनाव और चित्रकोट से भी परिस्थिति ज्यादा नाजुक है। संगठन चुनाव में रमन सिंह के लोगों को ही 99 फीसदी जगह मिलने से सीनियर भाजपा कार्यकर्ता नाराज हैं। अंतागढ़ उपचुनाव के दाग आज भी रमन सिंह की छवि में रच बस गये हैं, जिसके चलते भाजपा प्रत्याशी को नुकसान हो सकता है।


05-Oct-2020 6:08 PM 43

शराब वही, बोतल नई...

राज्य पॉवर कंपनी ने मोर बिजली एप लांच किया है। इसमें बिजली से संबंधित 16 तरह की समस्याओं को बिजली उपभोक्ता घर बैठे ही एप के माध्यम से निपटा सकते हैं। वैसे तो सालभर पहले ही यह एप लांच हो चुका था। तब 12 तरह की समस्याओं को हल करने की सुविधा थी।

 उस समय के पॉवर कंपनी के चेयरमैन शैलेन्द्र शुक्ला ने दावा किया था कि एक महीने के भीतर ही 50 हजार से अधिक एप डाउनलोड होने तक कीर्तिमान स्थापित हुआ है। गूगल प्ले स्टोर में यह एप कई बार दूसरे-तीसरे नंबर पर था।

अब पॉवर कंपनी के अफसरों ने सीएम भूपेश बघेल से दोबारा एप लांच कराने जा रहे हैं। जो काम पहले से ही चल रहा है, उसे एक उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है। इसे कहते हैं शराब वही, बोतल नई...।

प्रधानमंत्री को दो फीसदी ज्यादा छूट!

जब कोई नई तकनीक एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करती है, तो बड़े मजेदार मामले सामने आते हैं। अब जैसे भारत के लिए अमेजान ने अपनी एक नई वेबसाईट शुरू की, तो उस पर तमाम जानकारी हिन्दी में भी देना शुरू किया। एक पत्रकार आशुतोष भारद्वाज ने जब अमेजान प्राईम एप्लीकेशन इस्तेमाल किया तो उसमें प्राईम मेम्बर्स के लिए प्रधानमंत्री के सदस्यों लिखा हुआ आया, और नान प्राईम मेम्बर्स के लिए गैरप्रधानमंत्री सदस्य लिखा हुआ। जो प्रधानमंत्री सदस्य हैं, उन्हें दो फीसदी का ज्यादा फायदा है। अब यह अमेजान का मामला है, या देश में प्रधानमंत्री के लिए ऐसी रियायत रखी जाती है, इसे लोग खुद सोचते रहें।

दुबारा टेस्ट कराने की मनाही

कोरोना की जांच के लिये उपलब्ध कोई भी तकनीक सौ फीसदी कारगर नहीं है। स्वास्थ्य संगठनों ने माना है कि जांच में चूक भी हो सकती है और रिपोर्ट गलत भी हो सकती है। बहुत से लोगों की शिकायत है कि उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई पर उनकी सेहत दुरुस्त है। कोई तकलीफ नहीं हो रही है। चूंकि गाइडलाइन है इसलिये आइसोलेशन पर हैं। लेकिन यदि इसके ठीक उल्टा हुआ तो? यानि रिपोर्ट तो निगेटिव मिले लेकिन मरीज को कोरोना जैसे लक्षण और तकलीफ हों? ऐसी स्थिति में भी वह दुबारा जांच कम से कम सरकारी साधनों से कराने की पात्रता नहीं रखता। किसी की एंटिजन टेस्ट में रिपोर्ट पॉजिटिव मिली तो जांच की बात छिपाकर उसने ट्रू नॉट टेस्ट करा लिया। रिपोर्ट निगेटिव आ गई। हाल में रायगढ़ में इस तरह के कुछ मामले आये। बकौल स्वास्थ्य विभाग, अब एक बार किसी की रिपोर्ट पॉजिटिव या निगेटिव जैसी भी आई, उसे यह बात छिपाकर दुबारा टेस्ट नहीं कराना है। यदि ऐसा करता है तो कार्रवाई की जायेगी। हां, बाद में लक्षण प्रगट हों तो बात अलग है। कहा जा रहा है कि केन्द्र सरकार से भी ऐसी गाइडलाइन आ चुकी है। कोरोना सेंटर्स में टेस्ट का इतना दबाव है कि अब कांट्रेक्ट ट्रैसिंग लगभग बंद कर दी गई है। यानि कोई संक्रमित पाया जाता है तो उसके परिवार के सदस्यों और करीबियों को खुद ही क्वारांटीन हो जाना चाहिये। यह निर्णय इस हिसाब से तो ठीक है कि जांच का दायरा अलग-अलग परिवारों में बढ़ाया जा सकेगा, पर यदि कोई कोरोना के इलाज से बचने के लिये बार-बार टेस्ट करा रहा हो तो वह केवल खुद को बल्कि करीबियों को भी संकट में डालता है।

कोरोना ने कद घटा दिया ‘असत्य’ का

नवरात्रि के बाद अब दशहरे के लिये भी गाइडलाइन जारी कर दी गई है। हर बार इस पर्व के आने पर कुछ बौद्धिक विचार दोहराये जाते रहे हैं। जैसे किसी-किसी अतिथि के बारे में कह दिया जाता था कि एक रावण दूसरे को कैसे मारेगा? दूसरा, इतने बरस हो गये हम असत्य के प्रतीक रावण को खत्म क्यों नहीं कर पाये, उसका कद यानि पुतले की ऊंचाई बढ़ती क्यों जा रही है। इस बार यह सोचकर दुखी होने वाले संतोष कर सकते हैं। रावण दहन में सिर्फ पूजा करने वाले और आयोजन समिति के सदस्यों को शामिल रखने की अनुमति मिली है। भीड़ इक_ी न हो, इसका ध्यान रखा जायेगा। दहन कार्यक्रम की वीडियोग्राफ्री कराई जायेगी, ताकि कोई संक्रमित हो तो उनके सम्पर्क में आने वालों को पहचाना जा सके। भंडारा, प्रसाद वितरण, पंडाल, मंच, गाने-बजाने की अनुमति नहीं है। स्वागत की रस्म रखने की भी इजाजत नहीं है। बड़ी बात ये भी है कि आयोजन स्थल पर पहुंचने वाले प्रत्येक व्यक्ति का नाम पता रजिस्टर में दर्ज किया जाना है और इनमें से कोई भी संक्रमित पाया गया तो नियम दुर्गा पंडाल की ही तरह है। यानि इलाज का पूरा खर्च आयोजन समिति को वहन करना पड़ेगा। यदि इन सब नियमों का ठीक-ठीक पालन किया गया तो आयोजकों पर बड़ा बोझ पडऩे वाला है। अर्थात्, कोरोना ने रावण को भी अपनी लपेट में ले लिया है।

 

 


04-Oct-2020 6:39 PM 44

गणेश कौन हैं?

राजनीतिक दलों में बहुत सी बातें जो निजी तौर पर कही जानी है, उन्हें सार्वजनिक दीवारों पर लिखकर कहा जाता है। इससे कभी सनसनी फैलती है, और कभी सुगबुगाहट। लोग हैरान होते रहते हैं कि यह लिखने का राज क्या है। सोशल मीडिया के आ जाने से एक सहूलियत ही हो गई है।

अब रायपुर शहर के पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष राजीव कुमार अग्रवाल ने फेसबुक पर आज लिखा- काश हम भी कर्म करने की जगह स्वाभिमान गिरवी रख गणेश परिक्रमा करना सीखे होते।

अब उनकी बात का मतलब निकालना आसान भी है और मुश्किल भी है। अभी महीने भर पहले ही शहर जिला भाजपा अध्यक्ष पद पर श्रीचंद सुंदरानी को पार्टी ने मनोनीत किया है। भाजपा के भीतर के गणित बताते हैं कि श्रीचंद से राजीव अग्रवाल की अधिक बनती नहीं है। लेकिन राजीव ने कौन से गणेश की चर्चा की है, यह अंदाज लगाना पार्टी के भीतर के कुछ लोगों के लिए आसान होगा, पार्टी के बाहर बाकी लोगों के लिए कुछ मुश्किल हो सकता है। यह एक अलग बात है कि श्रीचंद को बनवाने वालों में रमन सिंह और राजेश मूणत के नाम लिए जा रहे हैं, और ये दोनों ही राजीव अग्रवाल के भी खासे करीबी रहते आए हैं। तो यह गणेश रमन सिंह के लिए है, या मूणत के लिए है, या किसी और के लिए कोई बताएंगे?

सूर्य ऊगा, और तुरंत ही...

रायपुर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष के लिए चार बार के पार्षद सूर्यकांत राठौर का नाम पहले तय कर लिया गया था। उन्हें सूचना भी भेज दी गई थी। फेसबुक और वाट्सएप पर राठौर को बधाईयों का तांता लग गया था। फिर देर शाम तक जिला भाजपा संगठन ने कार्यकर्ताओं को सूचना दी कि अभी प्रदेश संगठन ने नियुक्ति रोक दी है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि रायपुर जिले के बड़े नेताओं की आपसी खींचतान की वजह से पिछले 9 महीने से भाजपा नगर निगम के पार्षद दल का नेता नहीं चुन पा रही है।

पिछले दिनों नगर निगम के सभापति प्रमोद दुबे ने भाजपा पार्षदों से आग्रह किया था कि सामान्य सभा होनी है, इसलिए नेता प्रतिपक्ष का नाम तय कर सूचित करें। इसके बाद से भाजपा में पार्षद दल का नेता चुनने की कवायद चल रही थी। सुनते हैं कि प्रदेश संगठन ने पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सबसे चर्चा कर नाम तय करने की जिम्मेदारी दी थी। बृजमोहन ने सूर्यकांत राठौर का नाम तय कर भेजा, तो विरोध शुरू हो गया। चर्चा है कि जिला अध्यक्ष श्रीचंद सुंदरानी और राजेश मूणत, सूर्यकांत के पक्ष में नहीं हैं। इनकी पहली पसंद मीनल चौबे रहीं। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि  सूर्यकांत पिछली बार भी नेता प्रतिपक्ष का दायित्व संभाल चुके हैं ऐसे में किसी नए को मौका मिलना चाहिए।

कुछ नेताओं को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी में विधानसभा चुनाव का गणित भी दिख रहा है। सूर्यकांत स्वाभाविक तौर पर रायपुर उत्तर से टिकट के दावेदार रहेंगे। वे चार बार अलग-अलग वार्डों से चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में रायपुर उत्तर के बाकी दावेदार उन्हें पसंद नहीं कर पा रहे हैं। हाल यह है कि निकाय चुनाव निपटने के बाद सभी जगहों पर पार्षद दल के मुखिया तय हो चुके हैं, लेकिन अकेले रायपुर में यह काम अब तक नहीं हो पाया है।

जोगी का चुनाव कौन सम्हालेंगे?

जोगी पार्टी ने अमित जोगी को मरवाही प्रत्याशी घोषित कर दिया है। मगर उनकी राह कठिन हो चली है। पहले जाति का झंझट तो चल ही रहा है, अब उनके प्रचार की कमान कौन थामेगा, यह भी समस्या आ गई है। पहले जोगी पार्टी विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह, अमित का चुनावी रथ हांकने वाले थे। मगर अब धर्मजीत कोरोना पीडि़त हैं, और वे एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे में अब धर्मजीत सिंह ठीक होने के बाद भी प्रचार में जुट पाएंगे, इसमें संदेह है। दो और विधायक देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा को लेकर यह चर्चा है कि दोनों मरवाही जाएंगे, इसकी संभावना कम है। देवव्रत तो कांग्रेस के साथ दिखते हैं। अब अमित जोगी के पास सिर्फ मां रेणु जोगी ही सहारा है।

डाकघरों से कोरोना की डिलिवरी

कोरोना से बचने के लिये कॉलेजों की परीक्षा इस बार नहीं ली गई और घरों से ही प्रश्नों को हल कर उत्तरपुस्तिकायें जमा करने के लिये छात्र-छात्राओं से जमा करने के लिये कहा गया। रायपुर व बिलासपुर के विश्वविद्यालयों में उत्तर पुस्तिकाओं को डाकघरों के माध्यम से जमा करने के लिये कहा गया है। इसके चलते डाकघरों में छात्र-छात्राओं की भीड़ उमड़ रही है। विद्यार्थियों को घंटों कतार में लगना पड़ रहा है। परीक्षायें परीक्षा केन्द्रों में नहीं लेने के पीछे जो उद्देश्य था वह तो पूरा ही नहीं होता दिख रहा है। दरअसल उत्तरपुस्तिकाओं को जमा करने के लिये समय भी लाखों परीक्षार्थियों को पांच दिन का ही दिया गया। जमा करने के लिये आपा-धापी मची हुई है। अब जब घर से ही सवाल हल करने हैं तो क्या पांच दिन और क्या दस दिन। समय बढ़ाया जा सकता था जिससे भीड़ की नौबत न आती। दूसरी बात डाकघरों में एक छात्र को कम से कम 10 से 15 मिनट लग रहे हैं। यही काम यदि कॉलेजों में काउन्टर खोलकर किया जाता तो शायद पांच मिनट में ही एक विद्यार्थी का काम हो जाता और लम्बी कतारें भी नहीं लग पाती। ऐसी ही भीड़ कॉलेजों में तब जमा होने लगी थी जब उत्तरपुस्तिकाओं को कॉलेज से लेने के लिये कहा गया था। हंगामा खड़ा होने पर व्यवस्था की गई कि छात्र उत्तर पुस्तिका खुद ही कहीं से भी ले सकते हैं। हो सकता है कि कोरोना से बचने के लिये जो फैसले लिये जाते हों वे फैसले लेते समय वही सबसे अच्छा तरीका लगता हो, लेकिन अमल में लाये जाने के बाद खतरा बढ़ रहा हो तो फैसले बदले भी जाने चाहिये। छात्रों की मांग है कि हमें उत्तरपुस्तिकायें जमा करने के लिये ज्यादा समय दिया जाये। कॉलेजों में भी काउन्टर खोले जायें। लेकिन अभी ऐसा नहीं किया गया है। प्रशासन ने फिलहाल कुछ डाकघरों में काउन्टर की संख्या ही बढ़ाई है।

यदि सब संदेही टेस्ट कराने लगें तो?

कोरोना की कल आई रिपोर्ट पर नजर डालें तो पूरे प्रदेश में 2610 कोरोना पॉजिटिव मिले और टेस्ट हुए 18591 हुए। यानि हर सातवां व्यक्ति कोरोना संक्रमित पाया गया। लगभग यही औसत हर दिन है। बहुत से चिकित्सकों का मानना है कि यदि सब लक्षण वाले बिना डरे टेस्ट के लिये पहुंच जायें तो कोविड टेस्ट सेंटर में बहुत लम्बी कतार लग जायेगी। सबके टेस्ट हुए तो वास्तविक मरीजों की संख्या कई गुना और बढ़ भी जायेगी। महाससमुंद में टेस्ट कराने वाले हर 12 वें व्यक्ति में कोरोना के लक्षण मिले, बिलासपुर में हर आठवें व्यक्ति को कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। रायपुर, दुर्ग में इससे भी ज्यादा गंभीर स्थिति बनी हुई है। बहुत से लोग तो कोरोना टेस्ट से बचने की कोशिश में लगे रहते हैं। कई लोगों का मन बदल जाता है जब कोविड टेस्ट सेंटर्स में लगने वाली कतार और परेशानियों के बारे में सुनते हैं। यदि ऐसे सब लोगों की टेस्ट की व्यवस्था हो जाये, तो पता नहीं और कितने पॉजिटिव केस निकल जायें। इन सबको इलाज की सुविधा कैसे पहुंचायी जायेगी। होम आइसोलेशन में रहेंगे तब भी दवाओं और निगरानी के लिये कितनी बड़ी टीम की जरूरत पड़ेगी? क्या पता ऐसे लोग दफ्तरों, दुकान और बाजारों में भी घूम रहे हों। जैसे-जैसे जनजीवन सामान्य होता जाता है लोगों में सोशल डिस्टेंस, मास्क पहनने, सैनेटाइजर का इस्तेमाल करने के प्रति बेफिक्री होती जाती है। अब तो लॉकडाउन को भी लोग गंभीरता से नहीं ले रहे।


03-Oct-2020 5:47 PM 39

निराश ओपी फोन से बाहर

चर्चा है कि पूर्व कलेेक्टर ओपी चौधरी कोप भवन में चले गए हैं। उन्होंने पार्टी के प्रमुख नेताओं का फोन उठाना बंद कर दिया है। वैसे तो उनकी नाराजगी जायज है, क्योंकि वे युवा मोर्चा का अध्यक्ष अथवा प्रदेश भाजपा का महामंत्री बनना चाहते थे। मगर उन्हें मात्र प्रदेश मंत्री का पद दिया गया।

चौधरी के पहले अविभाजित मध्यप्रदेश में अजीत जोगी इंदौर कलेक्टर  रहते नौकरी छोडक़र कांग्रेस में आए थे। तब उन्हें हाथों-हाथ लिया था। कांग्रेस ने जोगी को तुरंत राज्यसभा में भेजा था। राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी दी। मगर चौधरी कलेक्टरी छोडक़र आए, तो भाजपा ने उन्हें खरसिया जैसी बेहद कठिन सीट पर झोंक दिया। जहां भाजपा कभी जीत नहीं पाई थी। यद्यपि भाजपा के कुछ लोग मानते हैं कि खरसिया में चौधरी को जिताने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखी गई थी। कसडोल से ज्यादा खर्च खरसिया में हुआ था। सारे संसाधन झोंकने के बाद भी ओपी चौधरी बुरी तरह हार गए।

नौकरशाह से नेता बने चौधरी ने कांग्रेस नेताओं को खूब भला-बुरा कहा था, तो उनका भी काला-पीला निकलना था। दंतेवाड़ा कलेक्टर रहते जमीन घोटाले की फाइल खुल गई, जिसमें सीधे-सीधे चौधरी पर आक्षेप लगे हैं। यद्यपि  चौधरी को हाईकोर्ट से जांच के खिलाफ स्थगन मिला हुआ है, लेकिन तकलीफ तो है ही। रायपुर में इन्होने डीएमएफ से लायब्रेरी बनवाई, जिसे लेकर कांग्रेस ने सवाल खड़े किये. अब पार्टी में भी उन्हें अपेक्षाकृत सम्मान नहीं मिल रहा है, तो बुरा लगना स्वाभाविक है।

सुनते हैं कि प्रदेश भाजपा के एक  संगठन के बड़े नेता ने उन्हें फोन लगाया, तो उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। जबकि कार्यकारिणी की घोषणा से पहले प्रमुख नेताओं से उनकी बात होते रहती थी। सरगुजा और अन्य जगहों से पार्टी के लोग उन्हें मोबाइल लगा रहे हैं, तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिल रहा है। यह भी संभव है कि चौधरी किसी और कारण से फोन नहीं उठा पा रहे हैं। फिर भी पार्टी के भीतर चौधरी के बदले रूख पर चर्चा हो रही है।

मरवाही बाहरी नेताओं के भरोसे...

मरवाही उप-चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही स्थानीय नेताओं के भरोसे नहीं हैं। दोनों ही दलों ने बिलासपुर, कोरबा और रायपुर के नेताओं को जिम्मेदारी दे रखी है। स्थानीय सिर्फ जोगी कांग्रेस के नेताओं को कहा जा सकता है क्योंकि जो मरवाही का नेता है वही उनका राज्य स्तर का भी नेता है। जोगी के रहते दोनों ही दलों ने यहां से चुनाव लडऩे में इतनी गंभीरता नहीं दिखाई जितनी उनके जाने के बाद दिखाई जा रही है। कांग्रेस के पास विधानसभा में बहुत बड़ा बहुमत है पर सवाल जोगी की सीट और कांग्रेस सरकार की लोकप्रियता का है, इसलिये लगातार दौरे पार्टी नेता कर रहे हैं और अपनी 70वीं सीट हासिल करने के लिये मेहनत कर रहे हैं। भाजपा जरूर कई चुनावों में दूसरे स्थान पर रही लेकिन जीत-हार का फासला बहुत कम रहा। उसे लगता है कि जोगी के नहीं रहने पर उनके लिये भी संभावना बन सकती है। प्रतिष्ठा दोनों ही दलों की दांव में लगी है। चुनाव के पहले कांग्रेस के मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, सांसद और कई विधायक तो आते ही रहे अभी भी बिलासपुर और रायपुर के नेताओं को चुनाव प्रचार और संचालन की जिम्मेदारी दी गई है। यही हाल भाजपा का है। पूर्व मंत्री, सांसद, नेता प्रतिपक्ष सब वहां दौरे कर रहे हैं। जोगी के रहते दोनों ही दलों में कोई स्थानीय नेता अपनी बड़ी पहचान नहीं बना पाये। इस चुनाव के नतीजों से तय होगा कि मरवाही से कोई स्थानीय नेता उभरकर सामने आ पायेगा या नहीं। फिलहाल तो सब जिले के बाहर के नेताओं ने मोर्चा संभाल रखा है।

वैसे भी यह नया जिला बना है, जीपीएम, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही. नाम शायद देश में सबसे बड़ा, इसीलिए बोलचाल में छोटा, जीपीएम, कर लिया गया है. राज्य सरकार ने पिछले महीनों में लगातार यहां अफसर-कर्मचारियों की पोस्टिंग करके सरकारी काम पटरी पर लाने की कोशिश में कोई कसर भी नहीं रखी है. नए जिले का पहला चुनाव, अफसरों के जिम्मे सरकार को खुश रखना भी है। 

छत्तीसगढ़ में सिर्फ 1 प्रतिशत मौत !

कोरोना को लेकर दो ख़बरें आज सुबह-सुबह मिल गईं। देश में कोरोना से मौतों की संख्या एक लाख पहुंच गई तो छत्तीसगढ़ में भी यह संख्या एक हजार को पार कर गई। वैसे तो राष्ट्रीय औसत के आधार पर कहा जा सकता है कि मौतें सिर्फ एक प्रतिशत हैं। पर एक भी मौत क्यों होनी चाहिये। अप्रैल-मई में जब छत्तीसगढ़ में बहुत कम कोरोना केस थे तब हम अपनी पीठ थपथपा रहे थे कि हमने कोरोना से लडऩा सीख लिया है पर धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती गई और अब भी बढ़ ही रही है। बहुत से रिसर्चर तो बल्कि यह कह रहे हैं कि ठंड के दिनों में संक्रमण तेजी से फैलेगा। अब तक कोरोना का कोई वैक्सीन नहीं आया है, शर्त लगाकर कोई नहीं कह सकता कि आने वाले दिनों में प्रकोप घटेगा ही। हाल के लॉकडाउन से हमने देख लिया कि व्यापार, काम-धंधे बुरी तरह प्रभावित हो जाते हैं। हो सकता है हमारी ही लापरवाही से फिर केस बढ़ें और हमें फिर लॉकडाउन की तरफ लौटने के अलावा कोई चारा दिखाई न दे। इसलिये सिर्फ एक प्रतिशत मौतें होने पर चैन की सांस लेने के बजाय नये केस घटाने और रिकवरी दर बढ़ाते रहने पर काम होना चाहिये।


02-Oct-2020 4:30 PM 60

अनुचित परीक्षा से थके हुए... 

आखिरकार पॉवर कंपनी के सीनियर अफसर अजय दुबे ने रिटायरमेंट के चार साल पहले ही नौकरी छोड़ दी। उन्होंने कंपनी के चेयरमैन को विधिवत आवेदन दे दिया, जिसकी मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है। दुबे पॉवर होल्डिंग कंपनी में डायरेक्टर रहे, और कुछ महीने पहले उन्हें पदावनत कर ईडी बना दिया  गया था। जिस पर वे पहले तकरीबन 11 साल से अधिक समय तक थे। वे सभी कंपनियों में काम कर चुके हैं। 

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दुबे के साथ काम कर चुके पॉवर कंपनी के तकरीबन सभी पुराने चेयरमैन उन्हें ईमानदार और मेहनती अफसर मानते रहे हैं,  मगर वे पिछले वर्षों में एमडी पद पर अजय दुबे की स्वाभाविक दावेदारी पर कुछ न कर सके। दुबे करीब ढाई साल तक होल्डिंग कंपनी के डायरेक्टर रहे। 

अपने से जूनियर अफसरों को संविदा नियुक्ति देकर एमडी बनाने के फैसले से आहत होकर सरकार को वीआरएस का आवेदन दे दिया। उन्होंने फेसबुक पर अपना दर्द जाहिर किया, और लिखा कि एक लंबे अर्से से अनुचित परीक्षा देते-देते थक सा गया था...। वरिष्ठ होकर सर्वोत्तम कार्य-मूल्यांकन उपार्जित कर भी मुझे अपने से कनिष्ठ, वरिष्ठ पदों में मुझसे कम अनुभवी संविदा युक्त एमडी के अधीन कार्य करने बाध्य किया जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं है। ऐसा जैसे अन्याय से अकेले ही लड़ता हूं...मैं लड़ा भी, लेकिन कब तक...उम्र, स्वास्थ्य और शांति पाने नमस्ते करना उचित समझा। 

ऐसा नहीं है कि सरकार ने इस अफसर को एमडी का दायित्व सौंपने पर विचार नहीं किया। जब भी एमडी के चयन के लिए समिति बैठती थी, अजय दुबे के नाम पर विचार होता था। पिछली सरकार में ट्रेडिंग कंपनी का एमडी का पद एक सीनियर आईएएस अफसर ने बरसों तक अपने पास सिर्फ इसलिए  रखा कि वे कंपनी से मिलने वाली सुविधाओं को भोग सके। अफसर के लिए 16 लाख की गाड़ी किराए पर ली गई थी। जबकि सुविधाभोगी अफसर के पास मंत्रालय में एक से अधिक विभागों का प्रभार था। स्वाभाविक था कि दमदार आईएएस के रहते अजय दुबे जैसों को एमडी नहीं बनाया जा सकता था। कुछ इसी तरह होल्डिंग कंपनी में भी एके गर्ग को  रिटायरमेंट के बाद दो बार संविदा नियुक्ति दे दी गई, जिस पर अजय दुबे की नियुक्ति होते-होते रह गई। 

पिछली सरकार में तो एक बार एमडी पद के लिए अजय दुबे की दावेदारी को सिर्फ इसलिए खारिज की गई, कि पॉवर कंपनी की एक निजी कंपनी के साथ ज्वाइंट वेंचर कंपनी का एमडी बनाए जाने के बाद भी छुट्टी पर चले गए। हकीकत यह थी कि सरकार ने खुद उन्हें एमबीए करने के लिए विशेष अध्ययन अवकाश मंजूर किया था। मौजूदा सरकार का हाल यह रहा कि ट्रेडिंग कंपनी के जिस राजेश वर्मा को एमडी बनाया गया, वे चीफ इंजीनियर पद से रिटायर होने के बाद जनरेशन कंपनी के एमडी बनाए गए थे। बाद में उन्हें हटाया गया और फिर ट्रेडिंग कंपनी की जिम्मेदारी दे दी गई। यह भी संयोग है कि अजय दुबे, आईएफएस अफसर एसएस बजाज के इंजीनियरिंग कॉलेज के सहपाठी हैं। कुछ इसी तरह की परिस्थितियों से बजाज भी गुजर चुके हैं। सरकारें चाहे कोई भी हो, व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लडऩा आसान नहीं होता। अधिकारी संगठन भी अपना दायित्व नहीं निभा पाते हैं। दूसरे अफसर अपनी जगह बना लेते हैं, अजय दुबे जैसे लोग थक हारकर हाथ जोड़ लेते हैं। 

निजी ख्वाहिशों को पूरा किया 

राज्य सरकार ने दो आईपीएस केएल ध्रुव और शलभ सिन्हा को उनके मौजूदा जिले से एक-दूसरे की जगह पदस्थ कर निजी ख्वाहिशों को पूरा किया है। दोनों अफसर को हटाने की वजहों को लेकर पुलिस महकमे में फुसफुसाहट चल रही है। दरअसल कवर्धा  पोस्टिंग से पहले  केएल ध्रुव को सुकमा भेजने की सरकार की तैयारी थी। मार्च में डीआरजी के 17 जवानों की शहादत की घटना के चलते  शलभ सिन्हा को वहां बनाए रखना सरकार की मजबूरी हो गई थी। वारदात के बीच एसपी को हटाए जाने से सरकार को अपनी छवि खराब होने का डर था। वैसे केएल ध्रुव भी व्यक्तिगत रूप से सुकमा में ही काम करने की इच्छा सरकार के करीबियों के समक्ष जाहिर कर चुके थे। प्रदेश सरकार के मंत्री कवासी लखमा भी अपने जिले में एक प्रमोटी आईपीएस की तैनाती की कोशिश में थे। लखमा का सीधी भर्ती के आईपीएस से कभी अच्छा रिश्ता नहीं  रहा। सरकार भी अपने मंत्री की पंसद के खिलाफ जाना नहीं चाहती थी। 

सुनते है कि नक्सल मामलों में केएल ध्रुव की समझ बेहतर मानी जाती है। बीजापुर जिले में वह सर्वाधिक तीन साल तक पदस्थ रहने वाले इकलौते एसपी हैं । बीजापुर और सुकमा में लगातार हो रही हिंसक वारदातों पर काबू पाने के लिए सरकार अनुभवी अफसर की तलाश में थी। सुकमा से सीधे कवर्धा पहुंचे शलभ सिन्हा को बाहर निकालने के लिए सरकार लंबे समय से विकल्प ढूंढ रही थी। एक दूसरी बात यह भी है कि बीजापुर के मौजूदा एसपी कमलोचन कश्यप को भी सरकार ने नक्सल अनुभव के चलते ही बस्तर वापस भेजा। ध्रुव भी थोड़े महीने मैदानी जिले में तैनाती के बाद वापस बस्तर भेजे गए।

दूसरे नशे के धंधे भी मिले... 

मुंबई की तरह छत्तीसगढ़ में भी ड्रग्स के कारोबार का खुलासा हुआ है। दो युवक को पुलिस ने गिरफ्तार किया, तो कुछ जानकारी निकलकर आ भी गई। एक आरोपी युवक तो कांग्रेस के एक भूतपूर्व पदाधिकारी का बेटा है। मगर ड्रग्स रैकेट से जुड़े लोगों के पूरे नाम सामने आ पाएंगे, इसकी उम्मीद बेहद कम है। 

सुनते हैं कि नव धनाढ्य युवक भी ड्रग्स रैकेट से जुड़ गए हैं।  बकायदा इन लोगों का ग्रुप है, जिनमें से सिर्फ दो को ही पकड़ा गया है। ये न सिर्फ ड्रग्स बल्कि ऑनलाइन जुआ भी खिलाते रहे हैं। ड्रग्स रैकेट में एक पूर्व मंत्री के बेटे का नाम भी चर्चा में है। देखना है कि पुलिस पूरे ड्रग्स रैकेट का खुलासा कर पाती है, या नहीं। आम चर्चा यह रहती है कि पुलिस की आम तौर पर इन धंधों के चलते रहने में दिलचस्पी रहती है, वह तो भला हो दारू के कारोबारियों का जो अपने नशे के मुकाबले सर उठाने वाले किसी भी दूसरे नशे पर नजऱ रखते हैं ताकि अपनी बिक्री काम न हो. उन्हीं की खबर से दूसरे नशे पकड़ाते हैं। 

और ये बलरामपुर, बेलगहना की बेटियां?

उत्तरप्रदेश के हाथरस में जुल्म की शिकार हुई बेटी की बलात्कार और हत्या और उसके बाद संदिग्ध तरीके से पुलिस द्वारा आधी रात को शव जलाने के मामले ने पूरे देश को झकझोरा। इसी हफ्ते छत्तीसगढ़  में इसी तरह की दो घटनायें हुईं। एक घटना छत्तीसगढ़ के उत्तरी छोर के बलरामपुर जिले में जहां लड़की से मारपीट कर, नशा देकर, उसके साथ सामूहिक -बलात्कार किया गया। पीडि़ता और उसके मां-बाप लोक लाज के डर से मेडिकल परीक्षण कराने के लिये भी राजी नहीं थे। पुलिस ने बार-बार समझाया तब एमएलसी रिपोर्ट बनी और बलात्कार की पुष्टि हुई। बलरामपुर पुलिस की बात मानें तो आरोपी गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इसी तरह की एक वारदात बेलगहना में हुई जहां रिश्ते का भाई एक मूक नाबालिग से रेप करता रहा। जब वह गर्भवती हुई तो आरोपी के मां-बाप ने गांव के प्रमुख, व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की जानकारी में, उसका अवैध गर्भपात कराया। बेलगहना के मामले में पुलिस का रवैया आरोपियों के प्रति झुकाव का रहा। उसने आरोपी, उसके मां-बाप और दादा को तो जेल भिजवाया पर गांव के प्रमुख लोग जो इस घटना को दबा रहे थे उन पर कोई कार्रवाई नहीं की। बलरामपुर और बेलगहना दोनों ही जगहों पर पीडि़ता की माताओं ने घटना को पुलिस तक ले जाने की हिम्मत जुटाई। उन्हें भी धमकाया गया पर उनकी हिम्मत नहीं टूटी। जहां सामाजिक संस्थायें नहीं पहुंची, कानूनी साक्षरता के कैम्प नहीं लग पाते, कानून और न्याय व्यवस्था क्या है इसे बताने वाले नहीं पहुंचते, वहां पीडि़त के माता-पिता हिम्मत दिखा पाये तो ठीक, वरना दबाव तो बहुत पड़ता है,क्योंकि ज्यादातर मामलों में प्रभावशाली लोग शामिल होते हैं। ऐसे में सरकार, मीडिया, जागरूकता, कानूनी सहायता वाली संस्थाओं का इन तक पहुंचना ज्यादा जरूरी है, जो ऐसी वारदातों को होने से पहले ही रोकें और हो जायें तो पीडि़त को हरसंभव न्याय मिले। महिला अत्याचार, रेप के मामलों में अपने प्रदेश का ग्राफ वैसे भी बहुत अच्छा नहीं है।

कोरोना की चुनावी गाइडलाइन

कोरोना काल में छत्तीसगढ़ में पहला चुनाव मरवाही में होने जा रहा है। बिहार विधानससभा चुनाव, मध्यप्रदेश का मिनी चुनाव भी साथ-साथ होने जा रहा है। कोविड के संक्रमण से बचाने के लिये कई दिलचस्प उपाय किये गये हैं। मसलन, 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को डाक मतदान की सुविधा दी गई है। दिव्यांग और कोरोना संक्रमित और आइसोलेशन में रह रहे मतदाता भी मतदान के लिये डाक का इस्तेमाल कर सकेंगे। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाने के लिये मतदाता को हैंड ग्लब्स दिया जायेगा। मतदाता पंजी में दस्तखत के लिये भी हैंड ग्लब्स का इस्तेमाल करना होगा। मगर नजर इस पर रखनी होगी कि प्रचार के लिये जो गाइडलाइन राजनैतिक दलों को दिया गया है, उसका कितना पालन हो पायेगा। मसलन, काफिले में पांच से ज्यादा गाडिय़ाँ नहीं होंगी, रोड शो भी निकालने की अनुमति होगी लेकिन उसमें भी सोशल डिस्टेंस का पालन करना होगा। घर-घर सम्पर्क में भी पांच से अधिक लोग एक साथ नहीं जा सकेंगे। मरवाही में चुनाव की तारीखों का ऐलान अभी भले ही हुआ हो पर चुनाव का माहौल दो माह से बन चुका है। यहां सभी दलों के राजनैतिक कार्यक्रम हो रहे हैं। ऊपर बताये गये किसी भी नियम का इसमें पालन नहीं हो रहा है। क्या चुनाव अभियान के दौरान इन बंदिशों को नेता कार्यकर्ता लागू कर पायेंगे? और हां, कोरोना संक्रमितों को भी वोट डालने का अधिकार दिया गया है। उन्हें आखिरी एक घंटे में मौका मिलेगा। 


01-Oct-2020 6:01 PM 63

साय के करीबी उम्मीद से...

भाजपा के अंदरखाने में दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय को राज्यपाल बनाने की चर्चा चल रही है। साय कई बार सांसद और विधायक रह चुके हैं। वे अविभाजित मध्यप्रदेश के भाजपा अध्यक्ष रहे हैं। मोदी सरकार ने उन्हें केन्द्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष का दायित्व सौंपा था। कुछ महीने पहले उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद से साय प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं।

 उन्हें प्रदेश कार्यसमिति में भी रखा गया है। मगर अब इस बार की चर्चा जोरों पर है कि झारखंड की राज्यपाल सुश्री द्रोपदी मुर्मू का कार्यकाल खत्म होने के बाद नंदकुमार साय उनकी जगह ले सकते हैं।  सुश्री द्रोपदी मुर्मू का कार्यकाल जल्द ही खत्म होने वाला है। सुश्री द्रोपदी मुर्मू ओडिशा की रहवासी हैं, और उन्हीं की तरह ओडिशा या छत्तीसगढ़ के ही किसी आदिवासी नेता को झारखण्ड का राज्यपाल बनाया जा सकता है। पार्टी के लोगों का मानना है कि साय इस मामले में फिट बैठते हैं। साय के करीबी लोग फिलहाल उम्मीद से हैं।

जिले के चक्कर में

राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम से प्रदेश भाजपा के बड़े नेता नाराज बताए जा रहे हैं। नेताम ने जिस तरह प्रदेश अध्यक्ष की सहमति के बिना अपने गृह जिले बलरामपुर की कार्यकारिणी घोषित करवा दी थी, उसकी शिकायत पार्टी हाईकमान को भेजी गई है। चर्चा है कि नेताम को धीरे-धीरे किनारे किया जा रहा है।

नेताम अब राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा नहीं रह गए हैं। वे अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। अब प्रदेश कार्यकारिणी में भी उनके धुर विरोधी पूर्व संसदीय सचिव सिद्धनाथ पैकरा की पत्नी उद्देश्वरी पैकरा को उपाध्यक्ष बनाया गया है। कार्यकारिणी को लेकर सिद्धनाथ ने रामविचार के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल रखा है, और वे उन पर कार्रवाई तक की मांग कर रहे हैं। अब हाल यह है कि जिले में दबदबा कायम रखने के चक्कर में नेताम की राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर पार्टी के भीतर हैसियत कम हो रही है।

फर्जी संस्थाओं का मुखौटा...

देश में सरकारी या संवैधानिक संस्थाओं से मिलते-जुलते नाम वाले फर्जी संगठन बनाकर उसके लेटरहैड और आईडी कार्ड बेचने का कारोबार खूब चलता है। इसमें मानवाधिकार आयोग, प्रेस कौंसिल, एंटीकरप्शन ब्यूरो के नाम पर तरह-तरह की कागजी संस्थाएं गढ़ी जाती हैं, और देश भर में उसके पदाधिकारी होने के आई कार्ड बेचे जाते हैं। अभी रायपुर के क्वींस क्लब में भिलाई के जिस हितेश पटेल नाम के आदमी ने गोली चलाई, उसके बारे में भी ऐसी शिकायत राज्य के सीएम को भेजी गई है।

भिलाई के एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने सीएम को भेजी शिकायत में कहा है कि हितेश पटेल अपने आपको इंडियन प्रेस कौंसिल नाम की एक कथित संस्था का उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार बताता है। अब भारत में प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया नाम के एक संवैधानिक संस्था है जिसके अध्यक्ष अनिवार्य रूप से सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज होते हैं। केन्द्र सरकार इसके सदस्य मनोनीत करती है, लेकिन हमेशा से ही इससे मिलते-जुलते नाम की कागजी दुकानें बनाकर देश भर में पहचानपत्र बिकते रहे हैं। लोग कारों पर भी ऐसी संस्थाओं की तख्तियां लगा लेते हैं। केन्द्र सरकार कई बरस पहले से यह आदेश निकालते आ रही है कि संवैधानिक संस्थाओं के नाम से मिलती-जुलती, या अपने नाम में इंडियन या नैशनल शब्द इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं की जांच की जानी चाहिए, लेकिन जब ऐसी संस्था, उसका कार्ड बंदूक की नोंक पर दिखाया जाए, तो गोलियों के बीच कौन जांच कर सकता है?

वैसे तो जिस क्वींस क्लब में गोली चलने के बाद यह बवाल खड़ा हुआ है, उसका नाम देखें तो वह भी अंग्रेजों के समय का सरकारी क्लब लगता है-क्वींस क्लब ऑफ इंडिया!

लुभावने चेहरों का झांसा...

फेसबुक पर बहुत से, या अधिकतर, लोगों को पहली नजर में फर्जी दिखने वाले लोगों की तरफ से फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट मिलती रहती है। किसी को कम, और किसी को ज्यादा। अगर ध्यान से देखें तो यह सारा फर्जी सिलसिला आसानी से पकड़ में आ जाता है, लेकिन हैरानी यह होती है कि बड़े काबिल और समझदार लोग भी चमचमाते चेहरों का न्यौता टाल नहीं पाते। आमतौर पर फेसबुक के आदमियों को जो न्यौते मिलते हैं, वे महिलाओं की तरफ से रहते हैं, उनमें बस दो-तीन तस्वीरें पोस्ट की हुई रहती हैं, और कोई भी जानकारी नहीं रहती, यह जरूर रहता है कि कभी-कभी आपके कुछ परिचित इसके दोस्तों की लिस्ट में निकल आएं। कुल मिलाकर धोखे से बचना चाहने वाले लोग आसानी से ऐसे फर्जी अकाऊंट पकड़ सकते हैं, लेकिन लुभावने चेहरों से धोखा खाना जिनकी नीयत में रहता है, उन्हें भला कौन बचा सकते हैं?

दुर्गा पंडाल में जाकर कोई संक्रमित हुआ तो?

दुर्गा पूजा पर्व के लिये आखिरकार गाइडलाइन आ ही गई। बहुत कड़े नियम-कायदे हैं। गणेश चतुर्थी से भी ज्यादा सख्ती होगी। प्रतिमा की ऊंचाई कम और पंडाल के आकार को बड़ा कर दिया गया है। एक पंडाल से दूसरे पंडाल की दूरी 250 मीटर से कम न हो। दर्शन के लिये आने वाले सभी व्यक्तियों का नाम, पता और मोबाइल फोन नंबर आयोजकों को एक रजिस्टर में दर्ज करना होगा। पंडाल में कम से कम 4 सीसीटीवी कैमरे लगाने होंगे ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो रहा है या नहीं इस पर निगरानी रखी जा सके। पंडाल के प्रवेश द्वार पर सैनेटाइजर रखना होगा और मास्क पहने बिना कोई भी व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकेगा। ऑक्सीमीटर और थर्मल स्क्रीनिंग का प्रबंध भी आयोजक को ही करना होगा। इन सब की व्यवस्था आयोजक कर भी लें तो एक और शर्त है जो उनके लिये बड़ी मुसीबत बन सकती है। इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति पंडाल जाने के कारण कोरोना से संक्रमित हो गया तो उसके इलाज का सारा खर्च मूर्ति की स्थापना करने वालों को उठाना पड़ेगा। अब सवाल यह है कि यह कैसे तय हो कि कोई पंडाल में ही जाकर ही संक्रमित हुआ। वहां से लौटने के बाद भी तो हो सकता है। अब तक तो लोग सिर्फ अनुमान लगाते हैं कि किसी कार्यक्रम में गये थे, कुछ लोगों से मिले थे, शायद इसलिये संक्रमित हो गये। अब यदि दो चार लोग दर्शन करने के बाद पूजा समिति पर खर्च का दावा कर दें तब तो आयोजन करने वालों को लेने के देने पड़ जायेंगे। इसलिए दुर्गापूजा के लिए अगले बरस का इंतजार बेहतर है..

फेल भले हो गये, पढऩे से नाता नहीं टूटा

रायपुर के सोनू गुप्ता ने केबीसी मं 12.50 लाख रुपये जीत लिये। इसके आगे के पायदान में सही जवाब देते तो 25 लाख रुपये जीत सकते थे, लेकिन समझदारी दिखाई। उत्तर मालूम नहीं था। अटकल लगाते वापस सीधे तीन लाख रुपये में रह जाते, जो जीती गई रकम की सिर्फ एक चौथाई होती। सोनू की दो बातें सीखने के लायक है। एक तो वह 12वीं फेल हो चुका है। इसके बावजूद उसने यह नहीं सोचा कि सामान्य ज्ञान, किताबों और अख़बारों से उसे नाता तोड़ लेना चाहिये। केबीसी में मौका मिले इसके लिये वह तमाम तरह की पत्र-पत्रिकायें पढ़ता रहा। दूसरी बात, इतनी कम पढ़ाई के बावजूद वह अपने पैरों पर खुद खड़ा है। 12वीं फेल को ठीक-ठाक नौकरी मिलने से तो रही। इसलिये उसने वाटर प्यूरीफायर सुधारने का तकनीकी काम सीख लिया। अब जीती गई रकम से वह अपने लिये घर खरीदेगा, क्योंकि अभी वह किराये के मकान में रहते हैं। सोनू की इस कामयाबी पर एक शाबाशी तो बनती है..।


30-Sep-2020 5:19 PM 76

भाजपा कार्यकारिणी इस तरह समझें..

प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी में नए-पुराने चेहरों का समावेश  है। ज्यादातर नाम पहले से ही तय थे। हाईकमान के कुछ निर्देशों के बाद कई नाम बदले भी गए। मसलन, यह कहा गया कि युवा मोर्चा में 35 साल से अधिक उम्र के लोग नहीं रहेंगे। इस वजह से पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी युवा मोर्चा अध्यक्ष बनने से रह गए। इससे पहले 50 बरस के नेता भी युवा मोर्चा अध्यक्ष रहते आए हैं। निवर्तमान अध्यक्ष विजय शर्मा तो 50 पार कर चुके हैं। हमने इसी कालम में 27 सितंबर को अमित साहू के भाजयुमो अध्यक्ष बनने की प्रबल संभावना जताई थी। तब भाजपा के ज्यादातर लोगों के लिए अमित अपरिचित चेहरा थे।

अमित को अध्यक्ष बनवाने में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह की भूमिका रही है, यद्यपि वे बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक रहे हैं। विधानसभा चुनाव के समय बृजमोहन के एक-दो वार्ड में उन्हें जिम्मेदारी दी जाती रही है। अब वे एकाएक प्रदेश के नेता हो गए। चौधरी को महामंत्री बनाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन उन्हें सिर्फ मंत्री बनाकर संतोष किया गया। एक बार फिर नलिनेश ठोकने को मीडिया विभाग की कमान सौंपी गई है। नलिनेश, सौदान सिंह के बेहद करीबी माने जाते हैं।

सच्चिदानंद उपासने तो खुले तौर पर नलिनेश की आलोचना करते रहे हैं। उनकी शिकायत रही कि प्रवक्ता होने के बावजूद नलिनेश उनकी विज्ञप्ति नहीं जारी करते हैं। श्रीचंद सुंदरानी के खिलाफ भी उपासने ने काफी कुछ कहा था। अब हाल यह है कि उपासने को ही उपाध्यक्ष और प्रवक्ता पद से बेदखल कर दिया गया। वे मात्र विशेष आमंत्रित सदस्य रह गए हैं। नलिनेश की धमक ऐसी है कि दुग्ध महासंघ के पूर्व चेयरमैन और मीडिया विभाग के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे रसिक परमार का नाम सूची में नहीं है। पूरी सूची में सौदान सिंह और रमन सिंह की छाया देखी जा रही है।

 समधियों के बीच..

यह भी संयोग है कि भाजपा और कांग्रेस का कोष संभालने वाले आपस में नजदीकी रिश्तेदार हैं। भाजपा ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल को कोषाध्यक्ष बनाया है। वैसे गौरीशंकर इस पद पर नहीं थे तब भी वे कोष का हिसाब किताब अप्रत्यक्ष रूप से उनके पास ही था। पार्टी में कोष नंदन जैन संभालते हैं। वे गौरीशंकर के अत्यंत भरोसेमंद हैं, पहली बार उन्हें सहकोषाध्यक्ष का पद दिया गया है। गौरीशंकर के समधी रामगोपाल अग्रवाल कांग्रेस का कोष संभालते हैं। रामगोपाल पिछले कई साल से यह काम देख रहे हैं। रामगोपाल की उपयोगिता का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें नागरिक आपूर्ति निगम का चेयरमैन बनाए जाने के बाद भी कोषाध्यक्ष पद से नहीं हटाया गया। दोनों ही समधी अपने विशिष्ट गुणों के कारण अपनी पार्टी में उपयोगी बने हुए हैं।

गजब का तालमेल

सुभाष राव को एक बार फिर प्रदेश कार्यालय प्रभारी बनाया गया है। सुभाष राव पिछले तीन दशक से कार्यालय का प्रभार देख रहे हैं। राज्य नहीं बना था, तब जिले का प्रभार देखते थे। कुछ दिनों के लिए उन्हें कार्यालय प्रभारी पद से हटाया गया था। तेज तर्रार नेता वीरेन्द्र पाण्डेय जब प्रदेश भाजपा के महामंत्री थे, तब उन्होंने सुभाष राव की जगह प्रदीप सराफ को कार्यालय प्रभारी बनाया था। थोड़े दिन बाद प्रदीप सराफ को हटा दिया गया। दिवंगत संगठन मंत्री गोविंद सारंग के करीबी रहे बालमुकुंद शर्मा याद करते हैं कि सारंगजी ने सुभाष राव की कार्यक्षमता को देखते हुए जगदलपुर से रायपुर बुलाया था और कार्यालय की जिम्मेदारी दी थी। उस समय जेब खर्च के लिए चार-पांच हजार रूपए ही मिलते थे। सुभाष राव मेहनती और ईमानदार व संगठन के प्रति निष्ठावान रहे। यही वजह है कि प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद लगातार 10 साल हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन रहे।

सुभाष राव के साथ छगन मूंदड़ा को सहप्रभारी बनाया गया है। दोनों के बीच अच्छी ट्यूनिंग है। पार्टी के भीतर गौरीशंकर अग्रवाल, राजेश मूणत, लता उसेंडी, सुभाष राव और छगनलाल मूंदड़ा व राजीव अग्रवाल के बीच गजब का तालमेल है। इन सभी को एक ही परिवार का सदस्य माना जाता है। साल-दो साल में ये सभी नेता एक साथ सैर सपाटे के लिए प्रदेश से बाहर भी जाते हैं। खास बात यह है कि ये सभी सौदान सिंह और रमन सिंह के अत्यंत भरोसेमंद हैं।

रोजमर्रा के कामों में आसानी

खबर है कि प्रवक्ता बनने से वंचित नेता अब मीडिया पैनलिस्ट बनने  की कोशिश में जुट गए हैं। मीडिया पैनलिस्ट को टीवी डिबेट में  पार्टी का पक्ष रखने के लिए भेजा जाता है। टीवी पर चेहरा दिखने से आम लोगों के बीच चर्चा होते रहती है। इतना ही राजनीतिक दुकानदारी चलाने के लिए काफी है। चर्चा तो यह भी है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट को मीडिया पैनलिस्ट बनाने के लिए एक धर्मगुरू भी सिफारिश करने वाले हैं। पहले भी धर्मगुरू की सिफारिश पर उन्हें मीडिया पैनलिस्ट बनाया गया था। एक अन्य के खिलाफ तो ढेरों मामले हैं। कोरोना का इलाज करा रहे इस नेता से एम्स प्रबंधन इतना तंग आ गया था कि एम्स प्रबंधन ने थाने में रिपोर्ट कराने की धमकी दी थी। तब सांसद सुनील सोनी ने हस्तक्षेप कर मामले को सुलझाया था। ये नेता भी मीडिया पैनलिस्ट बनने की कोशिश में हैं। राजनीतिक दलों के मीडिया पैनलिस्ट होने से अफसरों के बीच नाम और चेहरे की पहचान हो जाती है, रोजमर्रा के कामों में आसानी हो जाती है।

कांग्रेस अपनों पर तय नहीं कर पा रही...

कांकेर में पत्रकारों को पीटने के वीडियो सामने आने के बाद भी प्रदेश के कांग्रेस नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इससे कैसे निपटा जाए। कांग्रेस प्रवक्ता ने पहले दिन कहा कि हमलावर कांग्रेस से पहले ही निष्कासित है, और यह पत्रकारों की आपसी लड़ाई है। इसके बाद हमलावरों में से एक गफ्फार मेमन ने अपने आपको कांग्रेस पार्टी का और विधायक प्रतिनिधि बताने वाले लेटरहैड पर संसदीय सचिव और विधायक शिशुपाल सोरी को एक दिलचस्प इस्तीफा लिखकर भेजा। उसने लिखा- 26 सितंबर को आपसी विवाद से हुई घटना में कुछ लोगों के द्वारा सोशल मीडिया में अनावश्यक रूप से आपके और कांग्रेस पार्टी के साथ जोड़कर दुष्प्रचार किया जा रहा है। मैं नहीं चाहता कि उक्त घटना से आपकी प्रतिष्ठा पर आंच आए। मैं कांग्रेस का सच्चा सिपाही हूं, और हमेशा रहूंगा, और पार्टी का काम निष्ठापूर्वक करते रहूंगा। मेरे ऊपर लगे आरोप की जांच होने तक मैं विधायक प्रतिनिधि के पद से त्याग पत्र आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं।

अब इस इस्तीफे से जाहिर है कि जिसे कांग्रेस से निष्कासित कहा जा रहा था, वह तो कांग्रेस का सच्चा सिपाही था, है, और रहेगा, और वह विधायक प्रतिनिधि भी है। जो विधायक संसदीय सचिव भी है वह पार्टी से किसी निष्कासित को तो अपना प्रतिनिधि बनाएगा नहीं।

इसके बाद कल कांकेर जिला कांग्रेस अध्यक्ष सुभद्रा सलाम ने इस घटना के बाद जिला कांग्रेस महामंत्री अब्दुल गफ्फार मेमन को पार्टी संगठन के पद और सदस्यता से निलंबित करते हुए जो बयान जारी किया है, उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस ने हमले की इस घटना को मान लिया है।

सुभद्रा सलाम ने लिखा है कि कांग्रेस को प्राप्त वीडियो व अन्य जानकारी के  आधार पर यह निलंबन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि उक्त घटना में इस व्यक्ति द्वारा बेहद आपत्तिजनक एवं अश्लील गालियां देते हुए पत्रकार के साथ मारपीट करना दिख रहा है जो कि अत्यंत आपत्तिजनक है तथा उक्त हरकत से पार्टी की छवि धूमिल हुई है। इसलिए अब्दुल गफ्फार मेमन, महामंत्री जिला कांग्रेस कमेटी को पार्टी से निलंबित करके प्रदेश स्तरीय जांच समिति बनाई गई है। इस कमेटी में केशकाल के विधायक संतराम नेताम, जगदलपुर विधायक रेखचंद जैन, गुंडरदेही विधायक कुंवर सिंह निषाद, रवि घोष महामंत्री प्रदेश कांग्रेस को रखा गया है, और यह दो दिन में प्रदेश कांग्रेस को रिपोर्ट देगी।

कांकेर जिला कांग्रेस कमेटी ने निर्विवाद रूप से इस हमलावर को अपना माना, निलंबित किया, (जिसके लिए अपना होना जरूरी होता है), और हमले को भी हकीकत माना, यह भी माना कि इससे पार्टी की बेइज्जती हुई है।

अब कल ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी से एक चि_ी जारी हुई जिसमें एक और जांच कमेटी बनाई गई जिसे संशोधित लिखा गया। इस कमेटी में जगदलपुर विधायक रेखचंद जैन रायपुर उत्तर विधायक विकास उपाध्याय, गुंडरदेही विधायक कुंवर सिंह निषाद, और प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी महामंत्री रवि घोष को रखा गया। जिला कांग्रेस द्वारा घोषित कमेटी में से केशकाल विधायक संतराम नेताम को हटाया गया, और रायपुर के एक विधायक विकास उपाध्याय को जोड़ा गया। जिस कमेटी को दो दिन में अपनी रिपोर्ट देनी थी, उसके काम शुरू करने के पहले ही उसमें फेरबदल हो गया। दिलचस्प बात यह भी है कि प्रदेश कांग्रेस ने जिला कांग्रेस के बताए गए पार्टी पदाधिकारियों को फिर से कथित कांग्रेस कार्यकर्ता लिखा, यानी प्रदेश कांग्रेस ने हमलावरों को कांग्रेसी न मानने की शुरूआत जांच के पहले ही कर दी। दो दिनों में सामने आई इन तीन चि_ियों से कांग्रेस की और फजीहत हो रही है। इस बीच सोशल मीडिया ऐसे विज्ञापनों की तस्वीरों से पटा हुआ है जिनमें हमलावर अपने को कांग्रेस नेता बता रहे हैं।


29-Sep-2020 6:22 PM 34

सोचो कभी ऐसा हो तो क्या हो...

कई ऐसे मौके आते हैं जब लोग मुजरिमों के साथ मोहब्बत में पड़ जाते हैं। हिन्दुस्तान में एक वक्त नामी डाकुओं की मोहब्बत में उनके इलाके की कोई महिला पड़ जाती थी, उधर अमरीका में किसी माफिया सरगना से किसी भली महिला को मोहब्बत हो जाती थी। बहुत साल पहले एक डकैती के बाद एक लडक़ी को डकैत साथ ले जाते हैं, और उनके साथ रहते-रहते वह लडक़ी उन डकैतों की प्रशंसक हो जाती है, बाद में इसे मनोविज्ञान में स्टॉकहोम सिन्ड्रोम का नाम दिया गया। अब अभी एक ऐसा उपन्यास बाजार में आ गया है जिसमें कोरोना वायरस को मारने की तकनीक ढूंढने वाली एक वैज्ञानिक कोरोना की मोहब्बत में पड़ जाती है। अब जिस तरह बहुत सी विज्ञान कथाएं सच निकल जाती हैं, हकीकत में होने लगती हैं, ऐसे में अगर वैज्ञानिक की कोरोना से मोहब्बत सच हो जाए तो क्या होगा?

आईपीएल सट्टा कवरेज में है !

इस दौर में जब आम तौर पर लोग अपने काम-धंधे और रोजगार को लेकर चिंता में घुले जा रहे हैं कुछ ऐसे कारोबार हैं जिन पर कोई आंच नहीं आई है। जैसे आईपीएल क्रिकेट, और उस पर लगाया जाने वाला दांव। महामारी के बावजूद आईपीएल क्रिकेट नहीं रुका। भले ही देश से बाहर हो रहा है, दर्शकों के बगैर ही मैच हो रहे हैं लेकिन इसकी आड़ में चलने वाले सट्टे के धंधे पर कोई आंच नहीं आई है। हर रोज छत्तीसगढ़ में आठ-दस केस पकड़े जा रहे हैं। नेटवर्क कनेक्टिविटी का फायदा यह हुआ कि अब दांव लगाने वाले गांव-कस्बों से भी बड़ी संख्या में निकल रहे हैं। खाईवाल भी गज़ब कर रहे हैं। राजधानी में दबिश हुई तो कान्हा टाइगर रिजर्व निकल गये। वहीं एक रेस्ट हाउस में टीवी, स्मार्ट फोन और सट्टा पट्टी लेकर बैठ गये। पुलिस ने पीछा किया तो वापस आ गये पर यहां दांव लगाते हुए धर लिये गये। बिलासपुर में सूनसान कॉलोनी की छत पर और कार में सट्टे के खाईवाल अपना कारोबार चलाते हुए मिले। सट्टेबाजों को उन दिनों थोड़ी मुश्किल होती थी जब उन्हें लैंडलाइन फोन पर निर्भर होना पड़ता था। मोबाइल फोन आने के बाद भी कुछ सालों तक नेटवर्क वाली जगह तलाश करनी पड़ती थी। अब तो जंगल में भी इनका नेटवर्क चालू है। शिक्षा विभाग को संज्ञान लेना चाहिये कि क्यों इतनी अच्छी कनेक्टिविटी होने के बावजूद सरकारी स्कूलों के बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से महरूम हैं।

अनलॉक और आजादी..

रायपुर, बिलासपुर, अम्बिकापुर, जशपुर में आज लॉकडाउन समाप्त हो गया। एक दो दिन में बाकी शहरों से भी लॉकडाउन हट जायेगा। दुर्ग से एक साथ आये 500 से ज्यादा केस को अपवाद मानें तो अधिकांश जिलों के आंकड़े कह रहे हैं कि इस दौरान मरीजों की संख्या कुछ घटी है। पर समस्या उतनी ही बड़ी और गंभीर बनी हुई है। क्या सरकारी, क्या निजी अस्पताल, हर जगह मौतें हो रही हैं। लॉकडाउन से संक्रमण रोकने में कितनी मदद मिली अब आने वाले एक सप्ताह तक के आंकड़ों को देखने के बाद ही पता चलेगा। इस बीच स्वस्थ होने वालों की संख्या बढ़ी है। पर इसमें भी अधिक उत्साहित होना ठीक नहीं। लॉकडाउन और छुट्टियों के चलते टेस्ट के लिये ज्यादा लोग निकले नहीं और जो स्वस्थ हो रहे हैं वे लॉकडाउन से पहले से भर्ती हैं। सरकार, प्रशासन, व्यापारी, मजदूर सब मानते हैं कि लॉकडाउन हल नहीं है। अनलॉक रहते हुए कोरोना से बचने के नियमों को मानना ही सही तरीका है पर अफसोस, अनलॉक की छूट मिलती है तब यही वर्ग जनता के बीच नियमों को तोड़ते हुए दिखाई देते हैं। आम लोग भी इनको देखकर लापरवाही बरतने लगते हैं। मध्यप्रदेश के एक मंत्री ने तो साफ कह दिया था कि मैं मास्क नहीं पहनता, लेकिन जब दिल्ली से डंडा दिखाया गया तो मोदी का नाम लेकर माफी मांग ली. मंत्रीजी खुद कोरोनाग्रास्त भी हो गए। अपने यहां किसी ने कहा नहीं, पर मास्क को गले में लटकाये लोग दिख रहे हैं। अब जब छत्तीसगढ़ में केस एक लाख का आंकड़ा पार कर चुका है, आम, खास हर किसी को अपनी जिद छोड़ देनी चाहिये।


28-Sep-2020 6:33 PM 57

कानून सिर्फ गरीबों को भूखा मारने?

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक हफ्ते का कड़ा लॉकडाउन लगाया गया जिसमें मीडिया को भी यह सलाह दी गई थी कि मुमकिन हो तो लोग घरों से ही काम करें। सडक़ों पर जगह-जगह बैरियर लगा दिए गए थे, और जरूरी काम से आने-जाने वाले लोगों को भी कई जगहों पर चक्कर लगाकर जाना पड़ता था। चौराहों पर पुलिस दुपहिया सवारों को किनारे करके कई किस्म की पूछताछ कर रही थी। लेकिन इसी बीच कल रात की खबर हक्का-बक्का करने वाली है कि गैरकानूनी तरीके से बने हुए, और कानूनी झगड़े में फंसे हुए इस क्लब में दो महीने पहले पुलिस ने हुक्का बार पकड़ा था तो इसके एवज में एक थानेदार का तबादला कर दिया गया था। अब कल रात को इस दारू पार्टी में अगर गोली नहीं चल गई होती, और यह बात आनन-फानन फैल नहीं गई होती तो हो सकता है कि यहां रोज की दारू बिक्री चलती ही रहती।

इस राजधानी में लॉकडाउन के पूरे महीनों में लोगों ने शहर के कई ताकतवर लोगों के होटलों में रात-दिन शराब बिकते देखा है, और अफसरों को भी शायद ऐसे हुक्म हैं कि कहां-कहां अनदेखा करना है, और बाकी जगहों पर सब्जी वालों के टोकरे पलटने हैं। यह हैरान करने वाली नौबत है कि अगर इस शहर में पैसे और राजनीति की ताकत है, तो शासन-प्रशासन के नियम अपने जूतेतले कुचल सकते हैं। जब गरीबों को सडक़ किनारे मजदूरी का काम करना नसीब नहीं हो रहा है, तब अरबपतियों के कारोबार इस तरह सरकार के हुक्म के खिलाफ दारू बेच रहे हैं, पार्टियां करवा रहे हैं, और वहां पर गोलियां चल रही हैं। यह क्लब पिछली सरकार में भी तमाम नियम तोडक़र चल रहा था, और तो और विधायकों के आने-जाने के हक को इसने बंद कर दिया था, जो आज तक बंद है। और अब तो कलेक्टर के जिस आदेश से इस जिले के दसियों लाख लोग भूखे मरने की कगार पर पहुंच गए, उसे जूते से कुचलते हुए पैसे वालों ने दारू बहाना जारी रखा, बेचना और खरीदना जारी रखा।

किताबें देखकर लिखा, फिर भी पास नहीं..

कोरोना के चलते स्कूल कॉलेज लगे ही नहीं, मगर परीक्षा लेने की औपचारिकता पूरी की जा रही है। औपचारिकता इसलिये क्योंकि इस दौर में प्रश्न पत्र हल करना बड़ा आसान हो गया है। अटल बिहारी विश्वविद्यालय बिलासपुर में जो व्यवस्था की गई थी उसमें छात्रों के मोबाइल फोन पर प्रश्नपत्र ऑनलाइन भेजा गया। घर से ही प्रश्न पत्र हल करना था और उत्तर पुस्तिकायें सुविधा के अऩुसार डाकघरों के माध्यम से जमा करना था। 90 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों ने भाग लिया जिनमें से 50 हजार से ज्यादा के नतीजे रिकॉर्ड एक सप्ताह के भीतर आ गये हैं। प्रश्न पत्र हल करने के लिये किसी तरह की पर्ची छिपाकर नकल करने की जरूरत नहीं थी पूरी पुस्तक खोलकर जवाब लिखा जा सकता था, इसके बावजूद 8 प्रतिशत छात्र पास नहीं हो सके। ऐसा ही कुछ ओपन स्कूल की परीक्षाओं में हुआ है। 12वीं बोर्ड में 8 प्रतिशत और 10वीं बोर्ड में 11 प्रतिशत छात्र फेल हो गये। इन्हें भी इस बार परीक्षा केन्द्र में नहीं घर में परीक्षा देनी थी।

आपदा में अवसर

पं. रविशंकर विश्वविद्यालय की परीक्षायें भी 25 सितम्बर से शुरू हुई हैं। यहां भी घरों से ही प्रश्न पत्र हल करके उत्तर पुस्तिकाओं को जमा करना है। यूजीसी ने देशभर के विश्वविद्यालयों के लिये कोरोना को देखते हुए यही व्यवस्था कर रखी है। उत्तर पुस्तिकायें छात्रों को खुद के खर्च से खरीदनी है। छात्रों की शिकायत है कि जब वे परीक्षा शुल्क के रूप में 1800 से 2000 रुपये दे चुके हैं तो फिर आंसर शीट के लिये अपनी जेब से खर्च क्यों करना चाहिये?  बहुत से छात्र तो गरीब परिवारों से भी हैं जो छात्रवृत्ति के भरोसे ही पढ़ पा रहे हैं। कई स्टेशनरी दुकानों में खासकर राजधानी के बाहर इस मौके का खूब फायदा उठाया जा रहा है। 100-150 की उत्तर पुस्तिकाओं के सेट के लिये 500-600 रुपये खर्च करना पड़ रहा है। इन उत्तरपुस्तिकाओं को उन्हें डाकघरों से भेजना है। साधारण कूरियर का खर्च 40-50 रुपये से कम नहीं। यानि पूरे एक हजार रुपये का अतिरिक्त बोझ।


27-Sep-2020 5:17 PM 31

किसी तरह कॉफ्रेंस संपन्न  

कोरोना संक्रमण के खतरे के बीच कार्यक्रम कवरेज मीडियाकर्मियों के लिए जोखिमभरा हो गया है। वैसे तो राजनीतिक दल भी वर्चुअल प्रेस  कॉफ्रेंस पर ज्यादा जोर दे रहे हैं, लेकिन कभी-कभार अहम विषयों पर बड़े नेता मीडियाकर्मियों से रूबरू होकर चर्चा करना बेहतर समझते हैं। ऐसे मौके पर व्यवस्था बनाए रखना मीडियाकर्मियों के साथ-साथ आयोजनकर्ताओं के लिए चुनौती रहती है। राजीव भवन में सीएम भूपेश बघेल के प्रेस कॉफ्रेंस से पहले संचार विभाग के मुखिया शैलेष नितिन त्रिवेदी को तो अपने सहयोगी प्रवक्ताओं से व्यक्तिगत तौर पर संपर्क कर आग्रह करना पड़ा कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए वे प्रेस  कॉफ्रेंस में मौजूद न रहें। 

कई प्रवक्ता, जो कि शैलेष की जगह संचार विभाग का मुखिया बनने के उत्सुक हैं, वे शैलेष की अपील को नजर अंदाज कर प्रेस कॉफ्रेंस का हिस्सा बनने के लिए तैयार थे और वे उनकी बातों को गंभीरता से नहीं ले रहे थे। दो दर्जन प्रवक्ताओं की  कॉफ्रेंस में मौजूदगी से संक्रमण का खतरा भी था। तब शैलेष ने उनके तेवर भांपकर समझाइश दी कि सीएम साब ने खुद होकर सभी प्रवक्ताओं से हाथ जोड़कर अपील की है कि कोरोना के खतरे को देखते हुए राजीव भवन न आएं। प्रेस  कॉफ्रेंस में संचार विभाग के मुखिया के नाते वे खुद और गिरीश देवांगन ही मौजूद रहेंगे। अब जब सीएम ने हाथ जोड़ दिए, तो प्रवक्ताओं को बात माननी ही थी। इस बार कॉफ्रेंस में बाकी प्रवक्ता नहीं गए और शैलेष की चतुराई से सोशल डिस्टेंसिंग के साथ किसी तरह  कॉफ्रेंस संपन्न हो पाई। 

मंशा क्या पूरी हो पाएगी ?

खबर है कि प्रदेश भाजपा की सूची जल्द जारी हो सकती है। इस बार सूची में कई चौंकाने वाले नाम आ सकते हैं। मसलन, युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए अमित साहू का नाम तेजी से उभरा है। अमित, पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के नजदीकी माने जाते हैं, और वे रायपुर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले हैं। रायपुर दक्षिण का प्रतिनिधित्व पूर्व सीएम के धुर विरोधी बृजमोहन अग्रवाल करते हैं, जो कि अब तक अपराजेय हैं। 

रमन सिंह का खेमा अमित को अध्यक्ष बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है। इससे एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश है। अमित की नियुक्ति से सबसे बड़े पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक साहू समाज को साधने की तैयारी है, तो बृजमोहन के सामने उनके ही अपने विधानसभा क्षेत्र में नया नेतृत्व खड़ा करने की कोशिश भी है। मगर अनाम अमित के सहारे बृजमोहन को घेरने की मंशा क्या पूरी हो पाएगी, यह देखना है। 

आगे आप खुद समझदार हैं...

कोरोना से अस्पताल जाने की नौबत का पहले से तो कुछ पता होता नहीं। दिल की बीमारी हो, या डायबिटीज, लोगों को बरसों से पता होता है कि खर्च आ सकता है। इसलिए आज जब कोरोना से अचानक अस्पताल की नौबत आ जाती है, और सरकारी अस्पताल या तो मन को नहीं सुहाते, या दूसरे मरीज पसंद नहीं आते, तो लोगों को मन मारकर निजी अस्पताल जाना पड़ता है। निजी अस्पतालों के बिल बड़े बन रहे हैं, तो वे बड़ी तकलीफ भी दे रहे हैं। खासकर जो लोग बचकर आ जा रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि पूरा बिल बर्बाद हो गया, मानो चल बसे होते तो बिल काम आया होता। 

एक जानकार और समझदार ने आज सुबह इस बारे में कहा कि लोग केन्द्र और राज्य सरकारों को बजट का अधिक पैसा इलाज और पढ़ाई के लिए रखने को कहते हैं, विकसित और संपन्न देशों की मिसाल देते हैं कि वे इन दो कामों के लिए कितना फीसदी बजट रखते हैं। तो फिर लोग अपने इलाज के लिए अपने घरेलू बजट का अधिक हिस्सा क्यों नहीं रखते? और निजी अस्पतालों में आमतौर पर संपन्न या उच्च-मध्य वर्ग के लोग ही जा रहे हैं, जो कि चाहते तो समय रहते इलाज का बीमा ले सकते थे, या रकम बचाकर रख सकते थे। अपनी खुद की लापरवाही के बाद अब अस्पताल के बिल को क्यों रोना? 

एक समझदार ने इस बहस में आज कहा- इलाज और पढ़ाई इन दो चीजों में सस्ता ही महंगा पड़ता है। आगे आप खुद समझदार हैं...।

आसान टेक्नालॉजी से जिंदगी मुश्किल

कम्प्यूटरों के इस दौर में इनकी वजह से कई काम आसान हो जाते हैं, क्योंकि तेजी से होते हैं। लेकिन कई काम मुश्किल भी हो जाते हैं क्योंकि मुश्किलें खड़ी करना आसान है। 

किसी व्यस्त इंसान की जिंदगी में परेशानी घोलना हो, तो किसी ईमेल पाने वाले लोगों के सैकड़ों नामों के बीच उसका नाम जोड़कर मेल भेज दी जाए। नतीजा यह होता है कि जिन्हें ईमेल मिली है, वे महज उसे जवाब देने के बजाय जब रिप्लाई टू ऑल करने लगते हैं, तो उन सैकड़ों लोगों को ईमेल मिलने लगता है। इस अखबारनवीस को अभी कुछ महीनों की राहत के बाद ऐसा ही हमला फिर झेलना पड़ रहा है जब किसी एक ने एक हस्ताक्षर अभियान चलाते हुए उसका नाम भी सैकड़ों लोगों के साथ जोड़ दिया। अब लोग जवाब देते हुए रिप्लाई टू ऑल कर रहे हैं, और हर कुछ घंटों में ऐसा एक गैरजरूरी ईमेल आते जा रहा है। कम्प्यूटर टेक्नालॉजी का अगर सावधानी से इस्तेमाल न हो, तो दूसरों के लिए ऐसी परेशानी खड़ी होते रहती है। 

बिना फंड संवर रही प्रकृति..

विश्व पर्यटन दिवस एक बहाना होता है प्राचीन, ऐतिहासिक धरोहरों की यात्रा करने की। इससे जुड़े सरकारी विभागों का काम होता है कि संरक्षण के नाम पर फंड लगाये, खर्च करे। जमीन पर कितना काम होता है इससे ज्यादा मतलब नहीं पर प्रचार खूब होता है। इस बार का विश्व पर्यटन दिवस अलग तरह का है। जो लोग लॉकडाउन और कोरोना के बीच भी प्रकृति और सांस्कृतिक स्थलों का भ्रमण कर आये हैं वे वहां के नजारों को देखकर खुश हैं। कोरबा जिले में बुका झील का पानी खूब साफ दिखाई दे रहा है। अचानकमार में सड़कों को हिरण, वनभैंसा पार करते हुए दिन में आसानी से दिखाई दे रहे हैं। गरियाबंद के जंगल में रंग बिरंगे पक्षी बिना खौफ चहचहा रहे हैं। सबक यही मिलता है कि आउटिंग के नाम पर, प्रकृति प्रेम के नाम पर हम जो सालभर जंगलों, पर्यटन स्थलों को रौंदते रहते हैं उसे भी साल के कुछ दिन इत्मीनान से सांस लेते हुए नई फुर्ती, ताजग़ी लाने के लिये छोड़ देना चाहिये।

 


26-Sep-2020 6:18 PM 29

अब हाथी किसे हटाना चाहते हैं?

पिछले तीन दिनों में दो अलग-अलग इलाकों में हाथियों की एक ही किस्म से मौत से अब सवाल उठ खड़े हुए हैं कि क्या गांव-देहात के खेतों और जंगलों में बिछाए गए बिजली के गैरकानूनी तारों से मरने वाले जंगली जानवरों को राजधानी में बैठे राज्य स्तर के कोई अफसर बचा भी सकते हैं? पिछली बार जब लगातार कई हाथी मरे, तो मैदानी आला-अफसरों के साथ-साथ प्रदेश के वन्यप्राणी पीसीसीएफ अतुल शुक्ला को भी हटा दिया गया। उनके कुछ करीबी लोगों ने तनाव के बीच भी उनसे मजाक किया कि बसपा के चुनाव चिन्ह ने बसपा के पुराने नारे की तरह एक ब्राम्हण अफसर को बलि चढ़ा ही दिया। अतुल शुक्ला वाईल्ड लाईफ के मुखिया रहते हुए पूरे प्रदेश में जंगली जानवरों की मौत पर रात-दिन दौड़-भाग करते थे, लेकिन जब हाथी कोरबा और रायगढ़ के इलाके में पट-पट मरने लगे, तो सरकार के लिए आसान यही था कि वन्यप्राणी पीसीसीएफ को हटा दिया जाए।

अब सवाल यह उठता है कि पुलिस, वनविभाग, राजस्व विभाग, और कृषि विभाग सबके ही लोग गांव-जंगल में किसी न किसी काम से जाते हैं, और वहां के अवैध बिजली के तारों को देखते भी हैं। ऐसे में अगर वहां कोई कार्रवाई नहीं होती, अदालत में दिए गए हलफनामे के मुताबिक भी बिजली विभाग कार्रवाई नहीं करता, तो प्रदेश की राजधानी में बैठा जंगल-अफसर किस-किस विभाग के लिए जवाबदेह हो सकता है? अंग्रेजी में एक बात कही जाती है कि बक स्टॉप्स देयर। जिम्मेदारी कहां जाकर रूकती है। सरकार तो सरकार है वह कुछ भी मनमानी कर सकती है, और ईमानदार अफसर के खिलाफ तो कार्रवाई का मौका लोग ढूंढते ही रहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर पीसीसीएफ जिम्मेदार था, तो उसके ऊपर का वनविभाग प्रमुख, और वनमंत्री जिम्मेदार कैसे नहीं थे? जिम्मेदारी तय करते हुए प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत यह सुझाता है कि सिलसिला कहां जाकर थमना चाहिए।

कृषि बिल के बाद छत्तीसगढ़ के चावल का क्या होगा?

केन्द्र सरकार ने जैसे नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के बाद देशभर में ‘गलतफहमियां’ दूर करने के लिये मुहिम चलाई, वैसा ही अब कृषि बिल को लेकर कर रही है। ईश्तहार और ब्रीफिंग्स का ठीक वही सिलसिला चल पड़ा है। छत्तीसगढ़ के लिये इस बिल का एक दूसरा साइड इफैक्ट पडऩे वाला है। किसानों से चुनाव में वादा था, 2500 रुपये क्विंटल में धान खरीदने का। राज्य ने हाथ पसारे, केन्द्र से मदद नहीं मिली। किसी तरह जाकर समझौता हुआ तब केन्द्रीय कोटे में चावल जा सका, वह भी राज्य की अपेक्षा से कम। जानकार कह रहे हैं कि इस बिल के लागू होने के बाद केन्द्र की जवाबदेही खत्म हो जायेगी। तब क्या खरीदे हुए धान को बेचने के लिये राज्य को कार्पोरेट्स की मदद लेनी पड़ेगी? छत्तीसगढ़ सरकार ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना का रास्ता निकाला, तब जाकर वादे के मुताबिक भुगतान किसानों को हो सका है। उसका भी एक हिस्सा देना अभी भी बचा हुआ है। छत्तीसगढ़ ने फिलहाल तो यह बिल अपने यहां लागू करने से मना कर दिया है। कोरोना संकट के काल में उपज खरीदने की पूरी-पूरी जिम्मेदारी उठाना और फिर बेचने के लिये बाजार ढूंढकर भरपाई करना, सरकार के लिये दोहरी चुनौती बनने वाली है।

ये मरवाही के लिये चुनावी घोषणा थी भी?

अटकलें लगाई जा रही थी कि बिहार विधानसभा चुनाव के साथ-साथ चुनाव आयोग मध्यप्रदेश की सीटों और छत्तीसगढ़ के मरवाही सीट के उप-चुनाव की घोषणा कर देगा लेकिन अब यह तीन दिन के लिये टाल दिया गया है। मुख्यमंत्री ने 25 सितम्बर को गौरेला और पेन्ड्रा को नगर पंचायत से नगरपालिका बनाने की घोषणा की। लोगों को एकबारगी लगा कि यह घोषणा उप-चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिये की गई है। विरोधी दल/दलों के बयान भी इस बारे में तुरंत आने लगे। दिलचस्प यह है कि इन दोनों जगहों के ज्यादातर भाग कोटा विधानसभा क्षेत्र के हिस्से हैं। मरवाही के मतदाताओं को इसका सीधे कोई लाभ मिलता दिखाई नहीं देता। बगल के इलाके में दो नगरपालिका बना देने की घोषणा की गई। मरवाही तो अभी-अभी ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बनी है। उस पर भी राज्यपाल द्वारा किये गये सवालों के चलते संकट मंडरा ही रहा है। 


25-Sep-2020 6:39 PM 48

होशियारी खुद के ही काम न आई...

सरकार के बुद्धिमान लोग कई बार चूक कर जाते हैं, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है। मध्यप्रदेश के रेरा चेयरमैन एंटनी डिसा को लीजिए, वे शिवराज सिंह चौहान के पिछले कार्यकाल में सीएस रहे। चौहान ने रिटायर होने के बाद उन्हें रेरा चेयरमैन की जिम्मेदारी दी। मगर एंटनी डिसा कमलनाथ के करीबी बने रहे। कमलनाथ के इलाके छिंदवाड़ा के कलेक्टर रहने के साथ-साथ उनके केन्द्रीय मंत्री रहते पीएस भी थे। शिवराज सिंह चौहान से भी एंटनी डिसा की अच्छी ट्यूनिंग रही।

सुनते हैं कि कमलनाथ सीएम बने तो एंटनी डिसा उनके अघोषित सलाहकार रहे। परदे के आगे से वे रेरा चलाते थे, और परदे के पीछे से सरकार। कमलनाथ और शिवराज सिंह चौहान में तनातनी चल रही है। कमलनाथ के करीबियों पर शिवराज सिंह सरकार की तिरछी निगाह रही है। चूंकि एंटनी डिसा के नियुक्ति आदेश में कार्यकाल का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। लिहाजा इस सरकार को मौका मिल गया और आज ही उनके कार्यकाल को खत्म कर पदमुक्त कर दिया गया।

कुछ इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी हो चुका है। यहां भी सहकारिता आयोग के चेयरमैन गणेशशंकर मिश्रा का भी कार्यकाल सीमित कर भूपेश सरकार ने उन्हें पद से बेदखल कर दिया था, चूंकि सहकारिता आयोग के चेयरमैन के कार्यकाल की अवधि तय नहीं थी। गणेशशंकर मिश्रा, पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के करीबी माने जाते रहे हैं। ऐेसे में मिश्रा को हटना ही था। उनसे चूक यह हुई कि पिछली सरकार में पॉवरफुल रहते हुए भी अपने कार्यकाल की अवधि निश्चित नहीं करा पाए।

दरअसल जब सत्ता की ताकत रहती है, तो उसका नशा मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के गांजे से भी अधिक असरदार होता है. मध्यप्रदेश में भी, और छत्तीसगढ़ में भी।

मरवाही की तकदीर में क्या लिखा है?

मरवाही उप-चुनाव के ऐलान के ठीक पहले जारी हुए राजभवन के एक पत्र ने राज्य-शासन को चिंता में डाल दिया है। मरवाही को नगर पंचायत का दर्जा देने के बीते माह की गई घोषणा पर उन्होंने आपत्ति जताई है और आगे की कार्रवाई रोकने कहा है। पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों पर फैसले राज्यपाल की सहमति के बिना नहीं हो सकते। बाकी मामलों में उन्हें मंत्रिपरिषद् के प्रस्तावों के अनुसार जरूर चलना पड़ता है पर इन क्षेत्रों की ग्राम-सभाओं, नगर पंचायतों यहां लागू होने वाले कानूनों के मामलों में कुछ अतिरिक्त अधिकार होते हैं। अब चूंकि चुनाव की अधिसूचना जारी हो गई है, मरवाही नगर पंचायत में वैसे भी चुनाव खत्म होते तक कोई नया काम नहीं हो सकता। मरवाही को नगर पंचायत का दर्जा देना एक राजनैतिक फैसला होगा पर गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले की स्थिति कुछ हटकर है। गौरेला-पेन्ड्रा मरवाही के मुकाबले अधिक विकसित क्षेत्र तो है ही, बल्कि ट्रेन रूट से भी जुड़ा है। जिला बनने से पहले ही यहां एडीएम, एएसपी की अलग नियुक्ति होती रही है। मरवाही अलग-अलग थलग है। नया जिला बन जाने के बाद भी। अब भी मध्यप्रदेश की सीमाओं से लगने वाले कई गावों के लिये इसका जिला मुख्यालय 70-80 किलोमीटर दूर है। इस लिहाज से मरवाही में यातायात, शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य सभी तरह की सुविधायें बढऩी चाहिये। वरना इस छोर पर रहने वालों को नये जिले का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पायेगा। यह सब ग्राम पंचायत बनाये रखते हो सकता है या नहीं, यह एक सवाल सामने है। बहुत सी ग्राम पंचायतों को इसी आश्वासन के साथ नगर पंचायत का दर्जा प्रदेश में दिया गया कि वहां सुविधायें बढ़ेंगी विकास होगा, पर ऐसा हुआ नहीं। बल्कि वे शासन की कई योजनाओं के फायदे से वंचित हो गये जो गांवों को मिलते थे। जिले के संतुलित विकास के लिये मरवाही को भी ध्यान में रखना होगा। कानूनी पक्ष क्या कहता है, 29 सितम्बर को राज्यपाल के समक्ष अधिकारी क्या तर्क रखते हैं, फिर निर्णय क्या होगा, इस पर मरवाही के विकास की दिशा तय होगी।

अब कहां गये सामाजिक संगठन..

जिन दिनों कोरोना महामारी ने प्रकोप दिखाना शुरू किया था अनेक धार्मिक, सामाजिक संगठन उदारता के साथ सामने आये थे। अगर ये नहीं होते तो हजारों किलोमीटर दूर से घर लौटने वाले मजदूरों की हालत और खराब हो जाती। लम्बे लॉकडाउन में भूख से तडफ़ते लोगों को खाना, कपड़े, जूते नहीं मिलते। यह काम पीपीई किट बांटने सार्वजनिक स्थलों पर ऑटोमैटिक सैनेटाइजर लगाने, सैनेटाइजर और मास्क बांटने तक बीते माह तक चला। इस बीच जगह जगह तालियों और फूलों से डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों, सफाई कर्मचारियों, पुलिस जवानों का अभिनंदन भी किया गया। पर अब सब रुक सा गया है। कोविड-19 महामारी की व्यवस्था में 16-18 घंटे ड्यूटी कर रहे एक डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर इसी को लेकर तल्खी जताई है। उन्होंने लिखा गया कहां गये, वे क्लब वाले, सद्भावना वाले अब तो हमें उनकी ज्यादा जरूरत है। इधर पुलिस भी बता रही है कि जो सोशल वर्कर, छात्र और युवा संगठन हमारे काम में हाथ बंटाने आते थे उनकी संख्या घटकर आधी रह गई है। ये सब हुआ क्यों?  समाजसेवा के काम में फुर्ती और उतनी ही फुर्ती से अख़बारों में तस्वीरें भेजने वाले एक सज्जन का कहना है कि अब कोरोना की असली मार हो रही है। उस वक्त ऐसा लगा कि कुछ दिनों की आंधी है गुजर जायेगी। हमारे काम धंधे पर भी असर होने लगा है, पहले तो हाथ खुले रखते थे। अब समझ में आ रहा है पहले अपना ही घर संभाल लो। दरियादिली आखिर कितनी लम्बी चले? 

 


24-Sep-2020 6:44 PM 27

फिर खबरों में, नफ़ा होगा, या नुकसान ?

सोशल मीडिया पर बिना प्रमाण के व्यक्तिगत आरोप लगाना कभी-कभी भारी पड़ सकता है। ऐसे ही आरोप लगाने पर मेयर एजाज ढेबर और सभापति प्रमोद दुबे, भाजपा के प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास के खिलाफ पुलिस में शिकायत कर दी। अभी तक तो पुलिसिया कार्रवाई हुई नहीं है, लेकिन देर सवेर प्रकरण तूल पकड़ सकता है। उत्साही गौरीशंकर श्रीवास ने फेसबुक पर अपने पोस्ट में लिखा कि सैनिटाइजर छिडक़ाव के नाम पर करोड़ों रूपए फूंक दिया गया। इसका नतीजा सब भुगत रहे हैं।

उन्होंने सभापति पर आरोप मढ़ा कि इस पानी छिडक़ाव में अपने घर की बस (शारदा ट्रेवल्स) को लगाकर लाखों रूपए का बिल वसूल लिया। भाजपा प्रवक्ता का आरोप है, तो जबाव देना ही था। एजाज और प्रमोद दुबे, दोनों ही इस फेसबुक पोस्ट को लेकर एसएसपी से शिकायत कर आए। सुनते हैं कि जिस शारदा ट्रेवल्स की बस का जिक्र भाजपा प्रवक्ता ने फेसबुक पोस्ट में किया है, दरअसल वह सारडा एनर्जी की फायरब्रिगेड थी। सारडा ग्रुप से सैनिटाइजर छिडक़ाव के लिए गाड़ी मांगी थी। इसके लिए सारडा ग्रुप को कोई भुगतान भी नहीं हुआ। अब व्यक्तिगत आरोप लगा दिए हैं, तो प्रवक्ता को जवाब तो देना होगा।

वैसे भी यात्री बस का उपयोग सैनिटाइजर का छिडक़ाव के लिए होने की बात कुछ अटपटी लगती है। इससे पहले भी इसी तरह प्रवीण सोमानी अपहरण कांड पर पोस्ट कर गौरीशंकर श्रीवास सुर्खियों में आ गए थे। उन्होंने लिखा था कि प्रवीण सोमानी को चार करोड़ रूपए देकर छुड़ाया गया है। बाद में पुलिस ने नोटिस देकर प्रमाण मांगे, तो श्रीवास फंस गए और किसी तरह माफी मांगकर अपने को बचाया था।

इस बार अपने आरोपों पर गौरीशंकर श्रीवास को तुरंत कोई नुकसान नहीं होना है, लेकिन मेयर-सभापति उनके खिलाफ शिकायत लेकर गए हैं, तो उल्टे प्रचार पा गए। जिसकी चाह हर नेता को रहती है। प्रदेश भाजपा की कार्यकारिणी गठन होना है। संभव है कि उल्टे-सीधे आरोप लगाकर चर्चा में रहने वाले नेताओं को जगह भी मिल जाए।

कल टीवी पर किसानों का चक्काजाम या दीपिका ?

25 सितम्बर को देशभर के अनेक किसान संगठन लोकसभा और फिर उसके बाद ध्वनिमत से राज्यसभा में पारित कृषि विधेयक के विरोध में चक्काजाम, प्रदर्शन करने जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के अनेक किसान संगठनों और सभी वामपंथी दलों ने इस आंदोलन को समर्थन दिया है। कांग्रेस भी इस बिल के विरोध में है। राज्यसभा में जिस तरह से यह बिल ध्वनिमत से पारित किया गया उसे अलोकतांत्रिक तरीका बताते हुए कार्रवाई का बहिष्कार भी कर दिया। एनडीए सरकार ने इसका फायदा यह लिया कि दो दिन में रिकॉर्ड 15 विधयेक पारित हो गये। छत्तीसगढ़ में अमूमन उग्र किसान आंदोलन बहुत कम हुए हैं। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, यूपी में किसान ज्यादा मुखर हैं। वहां प्रदर्शन जबरदस्त हो सकता है। पर आपको यह सब टीवी पर कितना दिखेगा? आखिर विपक्ष के बहिष्कार को भी आप कितना देख पाये?  दो माह से तो सुशांत राजपूत-रिया चक्रवर्ती ने सारी जगह घेर रखी है। न्यूज चैनलों के हिसाब से देखें तो कल किसान आंदोलन से भी एक बड़ा मसला है। एनसीबी के सामने बॉलीवुड एक्टर दीपिका पादुकोण को पेश होना है। फिर 26 को श्रद्धा कपूर को बुलाया गया है। तो तैयार रहिये..अगले खुलासे को जानने के लिये। किसान के लिए किस मूर्ख चैनल पर जगह होगी? चैनल भी क्या किसान की तरह भूखा मरेगा?

कोरोना के खतरे से बेपरवाह एक जिला

अब जब प्रदेश का हर जिला कोरोना से आक्रांत होता जा रहा है, कलेक्टरों ने अपने-अपने जिलों में बारी-बारी लॉकडाउन दुबारा शुरू किया है। दो चार दिन के आगे-पीछे अमूमन हर जिला लॉकडाउन के घेरे में आ गया है। छोटे-छोटे जिले भी खतरा कम करने के लिये ऐसे कदम उठा रहे हैं। पर गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिला इन सबसे अलग है। एक बार वहां लॉकडाउन तब हुआ था, जब गिन-चुने केस थे और मौत केवल एक हुई थी। अब रोजाना पॉजिटिव केस मिल रहे हैं। इसी महीने पांच लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 400 पॉजिटिव केस सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद यहां लॉकडाउन को लेकर अफसरों के बीच कोई राय नहीं बनी है। हो भी कैसे, उप-चुनाव जो होने जा रहा है। हर दिन यहां नेताओं का काफिला और उसके पीछे समर्थकों की भीड़ निकल रही है। लॉकडाउन हुआ तो फिर चुनावी तैयारी कैसे होगी? इस बेपरवाही की कीमत जिले के आम लोगों को कहीं चुकाना न पड़ जाये। पता लगे कि चुनाव निपटने तक यहां आने-जाने वाला नेताओं का रेला कोरोना-वितरण केंद्र बन जायेगा !

लॉकडाउन के पहले मुनाफाखोरी

कोरोना महामारी से निपटने के लिये बारी-बारी छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी शहरों, कस्बों में लॉकडाउन किया जा रहा है। तकनीकी तौर पर यह लॉकडाउन नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र को कंटेनमेन्ट जोन घोषित किया जाना हुआ। केन्द्र सरकार के अनेक दिशानिर्देशों में यह भी है कि लॉकडॉउन केन्द्र की मंजूरी के बगैर नहीं किया जाना है और किया गया तो कम से कम 72 घंटे पहले इसकी सूचना सार्वजनिक करनी होगी। अब चूंकि तकनीकी रूप से लॉकडाउन है ही नहीं इसलिये अधिकारियों ने 72 घंटे पहले घोषणा करने की तकलीफ नहीं उठाई। कई जगह 48 घंटे तो कहीं कहीं 36 घंटे पहले ही पता चला कि हफ्ते, दस दिन के लिये सब कुछ बंद किया जाना है। लोग खासकर किराना सामान और सब्जियों को लेकर चिंता में पड़ गये। हर जगह से ख़बर आई कि बाज़ार में भीड़ टूट पड़ी। सब्जियां दुगने दाम पर बिकीं। हर एक जगह प्रशासन ने इस मनमानी से आंखें मूंद रखी थी, मानो उनकी जवाबदारी तो लॉकडाउन के बाद शुरू होती है। अब शिकायत भी कौन करे, लोग तो लॉकडाउन लागू होने के कारण घरों में कैद हैं और फिर क्या शिकायत करने से कुछ हो जायेगा?

फिर कई लोगों का यह भी कहना है कि सब्जीवाले अगर कुछ अधिक कमा भी ले रहे हैं, तो अगले कई दिन की कमाई तो खत्म ही है. लोग लॉक डाउन के बाद एक हफ्ते की सब्जी तो लोग अगले दिनों में खाएंगे नहीं।


23-Sep-2020 6:24 PM 52

राजिमवाले बरकरार...

स्वास्थ्य महकमे में डॉ. श्रीकांत राजिमवाले कई अहम जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वे छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी, मेडिकल काउंसिल के  रजिस्ट्रार के साथ-साथ डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य योजना के नोडल अधिकारी भी हैं। वैसे तो वे पिछली सरकार के लोगों के करीबी रहे हैं, और एक के बाद एक उन्हें अहम जिम्मेदारी मिलती रही। मगर सरकार बदलते ही उन्होंने थोड़े ही समय में नए लोगों के साथ तालमेल बिठा लिया।

ऐसे समय में जब विश्वविद्यालयों और अन्य अहम जगहों पर आरएसएस और पिछली सरकार से जुड़े लोगों को चुन-चुन कर हटाया गया, डॉ. राजिमवाले का बाल   भी बांका नहीं हुआ। ऐसा नहीं है कि डॉ. राजिमवाले के खिलाफ कोई शिकायत नहीं है। कुछ लोगों ने उनके खिलाफ काफी कुछ इक_ा कर सरकार के प्रभावशाली लोगों तक पहुंचाया भी है। मगर इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। सुनते हैं कि डॉ. राजिमवाले के पक्ष में दो प्रभावशाली नेता भी आगे आ गए हैं। यही वजह है कि उन्हें हटाना तो दूर, उनके खिलाफ शिकायतों की जांच तक शुरू नहीं हो पा रही है। कहावत है कि बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है। डॉ. राजिमवाले के प्रकरण में तो यही दिख रहा है।

पार्टी के भीतर हलचल

भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा जल्द ही हो सकती है। प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय, सौदान सिंह और पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह की सलाह से सूची तैयार कर दिल्ली में डटे हुए हैं। राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष की आपत्ति के बाद कुछ नामों में हेरफेर कर नए नाम जोड़े गए हैं। संतोष चाहते थे कि हारे हुए लोगों को संगठन में अहम दायित्व न दिया जाए, मगर ऐसा नहीं हो पाया। सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में हारे कुछ लोगों को पद मिल रहा है, उनमें से पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी का नाम प्रमुख है।

चौधरी को पहले युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाने की अनुशंसा की गई थी, लेकिन अब उन्हें शिवरतन शर्मा की जगह प्रदेश का मुख्य प्रवक्ता बनाए जाने की चर्चा है। सूची तो अब तक जारी नहीं हुई है, लेकिन मात्र उड़ती खबर से पार्टी दूसरे खेमे में नाराजगी बढ़ गई है। सौदान सिंह के करीबी लोग यह प्रचारित कर रहे हैं कि उनका सूची से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अंदर की खबर यह है कि वे बिहार चुनाव में व्यस्तता के बाद भी सूची पर पूरी निगाह रखे हुए हैं। और उनकी कोशिश है कि जल्द से जल्द सूची जारी हो जाए।

दूसरी तरफ, पार्टी के एक बड़े आदिवासी नेता कुछ लोगों के बीच यह कहते सुने गए कि विष्णुदेव साय की जगह नए अध्यक्ष की नियुक्ति  हो सकती है। उनकी बात सुनकर लोग चकित थे, क्योंकि साय को प्रदेश अध्यक्ष बने चार महीने भी नहीं हुए हैं। मगर आदिवासी नेता ने बताया कि केन्द्र सरकार अभी तक राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग  के अध्यक्ष और सदस्य की नियुक्ति नहीं कर पाई है। विष्णुदेव साय भी इस पद की दौड़ में हैं। चर्चा है कि केन्द्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने भी विष्णुदेव साय का नाम आगे बढ़ाया है। वाकई ऐसा होगा, यह कहना कठिन है। मगर इसको लेकर पार्टी के भीतर हलचल है।

मरवाही में कांग्रेस का चार गुना जोर..

मरवाही उप-चुनाव को कांग्रेस ने किस सीमा तक प्रतिष्ठा का सवाल बना रखा है वह प्रभारियों की नियुक्ति से मालूम होता है। आम तौर पर एक विधानसभा में एक ही प्रभारी होते हैं। यहां चार-चार प्रभारी बना दिये गये हैं जिनमें से दो तो विधायक भी हैं। कैडर वाले दलों की तरह कांग्रेस कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। दर्जन भर मंत्री, सांसद, अधिकारी वहां दौरा कर चुके, करते आ रहे हैं। प्रदेश स्तर के कई पदाधिकारियों ने स्थायी डेरा बना रखा है। रोज कोई न कोई उद्घाटन, शिलान्यास हो रहा है। मुख्यमंत्री ने करीब डेढ़ सौ करोड़ की नई-पुरानी योजनाओं की ऑनलाइन शुरूआत की। दो राय नहीं कि गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही को जिला बनाने की घोषणा करना मौजूदा सरकार का एक ईमानदारी भरा फैसला था। ताकतवर प्रतिनिधियों के रहते, 15 साल की भाजपा सरकार रहते हुए यह नहीं हो पाया। नये जिले की जरूरतें भी बहुत सी हैं तो इन उद्घाटन, शिलान्यासों को जरूरी माना जा सकता है पर इसमें चुनाव का एंगल तो छिपा हुआ है ही। मरवाही का अतीत बताता है कि अब तक हुए सभी चुनावों के नतीजों में प्रत्याशी के व्यक्तित्व को उन्होंने दल से ऊपर रखा। यदि कांग्रेस ने बाजी मारी तो पहला मौका हो सकता है जब यहां की जनता ने व्यक्ति से ज्यादा संगठन को महत्व देना तय किया है।

भूपेश बघेल की अगुवाई में कांग्रेस ने विपक्ष में रहते तो संगठित पार्टी की तरह काम किया ही था, अब तो पार्टी के साथ सरकार की ताकत भी है।

दूसरे सबसे बड़े शहर की त्रासदी

छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े शहर बिलासपुर के खाते में विकास के सारे अध्याय अधूरे ही लिखे हुए हैं। लगभग 30 साल पहले यहां से वायुदूत सेवा चलती थी। किसी वजह से बंद हो गई। अब कई सालों से यहां हवाई सेवा के लिये आंदोलन चल रहा है। दर्जनों बार हाईकोर्ट की फटकार, दो सौ से ज्यादा संगठनों के आंदोलन के बाद भी अब तक यहां से उड़ानें शुरू नहीं हुई हैं। देखते ही देखते बस्तर से भी हवाई सेवा शुरू हो गई। बीते दिनों जब केन्द्रीय नागरिक विमानन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बिलासपुर-भोपाल के बीच हवाई सेवा शुरू करने के फैसले के बारे में ट्वीट किया तो क्या कांग्रेस, क्या भाजपाई सब अपनी पीठ खुद ही थपथपाने लगे थे। जमीनी हक़ीकत देखने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। हवाईअड्डे के लिये जरूरी निर्माण कार्य कछुआ चाल से चल रहे हैं। रफ़्तार यही रही तो आने वाले 6 माह तक भी काम पूरा नहीं होना है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यहां के लिये जो राशि मांगी गई थी वह मंजूर तो कर दी, पर काम समय पर हो यह देखना तो स्थानीय नेतृत्व का काम है। अंडरग्राउन्ड सीवरेज पर 450 करोड़ रुपये फूंक दिये गये, काम अधूरा। रायपुर बिलासपुर नेशनल हाईवे पर टोल टैक्स वसूली शुरू हो गई पर काम बाकी। फ्लाईओवर के एक काम को 18 माह में पूरा होना था, तीन साल हो गये पूरा नहीं। अमृत मिशन से पेयजल सुविधा मिलनी थी, अधूरी। 18 पानी टंकियों से भी तीसरे माले तक पानी पहुंचाने की योजना थी, लाखों रुपये बहे काम आधा-अधूरा। बिलासपुरवासियों को स्व. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, स्व. बीआर यादव जैसे नेता याद आते हैं जिन्होंने यहां के विकास के लिये परिणाम मिलने वाले काम किये।

 


22-Sep-2020 7:05 PM 81

फिर नोटबंदी जैसी नौबत...

इंकम टैक्स के नियम और लॉकडाऊन की वजह से बंद बैंक मिलकर लोगों के लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं। निजी अस्पतालों में लाखों का बिल बन रहा है, और अस्पताल किसी मरीज के खाते में दो लाख रूपए से अधिक नगद जमा नहीं करते क्योंकि इंकम टैक्स ने यह सीमा बनाई हुई है। दूसरी तरफ बैंक के कार्ड कभी काम करते हैं, कभी नहीं भी करते। एटीएम में कभी कैश रहता है, कभी नहीं रहता है। ऐसे में जिनको अस्पताल में दो लाख के बाद भुगतान करना है उन्हें कार्ड लेकर जाना पड़ता है। अब जिन लोगों ने मुसीबत के वक्त के लिए बैंक से नगद निकालकर रखा हुआ है, वह दो लाख के ऊपर के भुगतान में किसी काम का नहीं है, लॉकडाऊन में बैंक बंद हैं, इसलिए रकम बैंक में वापिस भी नहीं डाली जा सकती। कुल मिलाकर बहुत सी नौबतों में इंसान की हालत मुगल-ए-आजम की अनारकली सरीखी हो गई है, सलीम तुझे मरने नहीं देगा, और हम तुझे जीने नहीं देंगे। जिनके पास अपना खुद का या लोगों से मांगा हुआ पैसा है, वे भी अस्पताल में उसे जमा नहीं कर सकते। फिर कुछ लोगों के खाते में पैसे हैं, तो कार्ड से भुगतान करने जाने पर अधिकतर कार्ड की सीमा एक दिन में अधिकतम 50 हजार रूपए है, उससे अधिक भुगतान कार्ड से भी नहीं हो सकता। नोटबंदी के समय लोगों की जो हालत थी, आज लॉकडाऊन, बैंकबंदी, और इंकम टैक्स के नियमों ने मिलकर कुछ वैसी ही नौबत फिर ला दी है। सेहत के लिए कोरोना और औकात के लिए सरकार एक सरीखे खतरनाक हो गए हैं।

अब अस्पताल से छुट्टी के वक्त लाखों का बिल अगर चुकाना है, तो लोग बैंकबंदी के बीच, शहरबंदी के बीच किस तरह बैंक से अस्पताल को भुगतान कर सकते हैं? और अस्पताल दो लाख से अधिक का कुल भुगतान एक मरीज के लिए नहीं ले सकता। अब लोगों को कई ऐसे दोस्तों-परिचितों के नाम की लिस्ट बनाकर रखनी चाहिए जिन्हें साथ ले जाकर उनके कार्ड से 50-50 हजार रूपए का भुगतान करवाया जा सके। यह डिजिटल अर्थव्यवस्था किस काम की जो कि अस्पताल की बड़ी बीमारी और बड़े दिल की नौबत में भी पैसा रखे हुए लोगों को बेसहारा कर दे।

देखो इंसान कहे जाने वालों को...!

रायपुर की एक सामाजिक कार्यकर्त्ता मंजीत कौर बल ने इंसानों की भयानक करतूत सामने रखी है-

हम लोग एक स्थान पर  चिडिय़ा देखने आए थे तो बया के घोंसले को तोडक़र उसके बच्चों और चिडिय़ा को निकाल कर जला कर उसे भूँजा गया है। यह एक पीड़ादायक और दर्दनाक दृश्य है..देखना कठिन रहा. लेकिन उससे अधिक कठिन हो रहा है कि यह सोचना कि कैसे इसको रोका जाये और समझाया जाये..

हमने सोचा है कि सभी  पंचायतों को एक छोटा सा पत्र या अपील जारी की जाए कि हमको आसपास के चिडिय़ों का सरंक्षण करना है।

 ‘अपील’

आप सभी को हम ये जानकारी देना चाहते हैं कि नया रायपुर के आसपास के क्षेत्र एवं सभी ग्राम पंचायत और पूरे राज्य व् देश में  जून- जुलाई से  लेकर सितंबर अक्टूबर तक बया के घोंसले बनाने का सबसे अच्छा एवं अनुकूल समय होता है. इस दौरान बया बहुत ही सुंदर घोंसले बनाती है जिसे देखकर  पूरे देश में इसको बुनकर चिडिय़ा के नाम से जाना जाता है। इस बुनकर चिडिय़ा के घोंसले बहुत आकर्षक होते हैं और इसका चुनाव लंबा और कठिन होता है । इसमें जो नर  चिडिय़ा होती है वो कई तरह के घोंसले बनाती है फिर मादा चिडिय़ा को देखने के लिए बुलाती है. मादा चिडिय़ा द्वारा घोंसले को देखकर पसंद करने के बाद ही उनका जोड़ा बनता है.

एक नर चिडिय़ा कम से कम 5 से 7 घोंसले बनाती है तब जाकर मादा द्वारा किसी एक घोंसले को पसंद कर अंतिम निर्णय दिया जाता है. घोंसले बनाने के लिए वह खजूर, छिंद के  पत्तों को छीलती है और छीले हुए पत्तों से वह घोंसला बुनती  है ।

यह बहुत सुंदर दृश्य होता है और बरसात में होता है इसलिए ये इस प्रकार बनाया जाता है कि उसके अंदर पानी ना घुसे। इस पूरी मेहनत के बाद उसके अंदर मादा चिडिय़ा अंडे देती है और इस  अंडे से बच्चे बड़े होते हैं और सितंबर के अंत तक यह पूरी प्रक्रिया समाप्त होती है। जैसे-जैसे वातावरण में प्रदूषण बढ़ रहा है, पेड़-पौधे कम हो रहे हैं वैसे भी चिडिय़ों की संख्या  भी कम होती जा रही है।

यह बहुत चिंता का विषय है कि ऐसे समय में हम चिडिय़ों का संरक्षण अधिक से अधिक कैसे करें? क्योंकि पर्यावरण में हर पशु-पक्षी, चिडिय़ों, छोटे-छोटे कीड़े -मकोड़े का भी विशेष महत्व है  ।

आज कोरोना और  कोविड के भय से हम जितना परेशान हैं  इसका भी एक प्रमुख कारण है पर्यावरण का दबाव व्यक्ति पर अधिक हो गया है जिससे वायरस उन व्यक्तियों पर आ रहे हैं.

ऐसे में एक दृश्य देखने को मिला जिसकी फोटो में अपील के साथ लगा रही हूं  और आप इस दृश्य को देखकर  कांप जाएंगे । मैं आसपास के गांव के सभी सरपंचों ,नागरिकों,  सभी से विनम्र अपील करती हूँ कि आप इस बया के घोंसले को बचाने के लिए छोटे बच्चों को  जानकारी एवं शिक्षा दें और आप प्रयास करें  कि हमारा छत्तीसगढ़ एक ऐसा क्षेत्र बने जो अधिक से अधिक घोंसलों को अधिक से अधिक पर्यावरण संरक्षण की ओर जा रहा है. हम ऐसी पंचायत बनाएं जहां कोई भी चिडिय़ा मारी नहीं जाती है, और कोई भी इस तरह के जानवर जिसकी संख्या कम होने से विश्व में पर्यावरण पर दबाव बनेगा।

बस्तर-रायपुर अब सिर्फ एक घंटे में...

बस्तर से कल एलायंस एयर की हवाई सेवा शुरू हुई तो वहां की पुलिस ने एक अनोखा काम किया। दस ऐसे ग्रामीणों को रायपुर की मुफ्त सैर कराई जो हवाई टिकट लेने और आसमान पर उडऩे की सोच नहीं सकते थे। इनके राजधानी घूमने, ठहरने और भोजन की व्यवस्था भी की। बस्तर पुलिस ने यह उदारता क्यों बरती इस पर कुछ साफ नहीं है। इन 10 ग्रामीणों का चुनाव भी किस पैमाने पर किया गया यह भी पता नहीं। इतना जरूर है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस नारे को सार्थक किया कि स्लीपर चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज पर चलेगा। राजधानी से बस्तर की हवाई सेवा सिर्फ एक घंटे का सफर है। व्यावसायिक रूप से जो लाभ होना है वह तो है ही कानून व्यवस्था और प्रशासन के लिये भी इसका फायदा मिल सकता है। बहुत से लोग बस्तर के अनूठे प्राकृतिक, पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहरों को देखने की इच्छा रखते हैं पर लम्बी उबाऊ यात्रा उन्हें रोकती है। उम्मीद है अब हवाई यात्रा से न केवल प्रदेश के, बल्कि देश-विदेश के सैलानियों को वहां की यात्रा करना आसान होगा, उनकी तादाद बढ़ेगी।


21-Sep-2020 6:09 PM 29

आम का खौफ और खास की बेफिक्री

आम लोग कोरोना के खौफ में जी रहे हैं। मगर विशेषकर सरकारी तंत्र से जुड़े कई प्रभावशाली लोग इससे बेपरवाह हैं, और वे अपने साथ-साथ दूसरों की जान भी जोखिम में डालने से पीछे नहीं हट रहे हैं। ऐसे ही एक कोरोना पॉजिटिव अफसर अपने दफ्तर जा धमके। अफसर दफ्तर के मुखिया भी हैं। उन्हें देखकर मातहत हैरान रह गए। वैसे अफसर के करीबी लोग यह तर्क देते रहे कि साहब की रिपोर्ट निगेटिव आ चुकी है। मगर कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद भी कम से कम पांच दिन क्वॉरंटीन रहना होता है, इस दिशा निर्देश पर पालन करना अफसर ने उचित नहीं समझा। कुछ दिन पहले इसी दफ्तर में डेढ़ दर्जन से अधिक कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। कोरोना से एक की मृत्यु हो चुकी है। पर अफसर बेखौफ हैं, इससे मातहत कर्मचारी काफी बेचैन हंै।

अवैध शराब, खुली छूट

प्रदेश के कई जिलों में लॉकडाउन है। रायपुर में भी इस बार कड़ा लॉकडाउन हो जा रहा है। लॉकडाउन में स्वाभाविक तौर पर शराब दूकानें बंद रहेंगी। ऐसे में शराब के शौकीन कुछ चिंतित हैं। ऐसे लोगों की चिंता एक वाट्सअप ग्रुप में दूर करने की कोशिश की गई। ग्रुप के एक सदस्य ने लिखा कि शराब अवैध रूप से डंप किया जा रहा है। राशि थोड़ी ज्यादा लगेगी लेकिन सम्माननीय लोगों को घर पहुंच सेवा उपलब्ध होगी। समय आने पर संबंधित होटल और रेस्टोरेंट की जानकारी उपलब्ध करा दी जाएगी। पिछले लॉकडाउन में भी चुनिंदा होटलों को अवैध शराब बेचने के लिए खुली छूट थी।

शक्ति, भक्ति और सख्ती

धर्मपरायण देश में कोरोना ने हमारी उत्सवधर्मिता पर बड़ा प्रहार कर दिया है। बीती नवरात्रि फीकी बीती, आने वाली नवरात्रि पर अधिक जमावड़ा होता है। जगह जगह दुर्गा प्रतिमायें विराजित की जाती हैं और तमाम सांस्कृतिक समारोह होते हैं। बड़ी प्रतीक्षा के बाद राज्य शासन की गाइडलाइन आ ही गई। प्रतिमा 6 फीट से ऊंची नहीं होगी, मास्क पहनकर ही दर्शन करना होगा। पांडाल में एक समय में 20 से ज्यादा लोग इक_े नहीं हो पायेंगे। सैनेटाइजर रखना होगा, सोशल डिस्टेंस का नियम मानना होगा। कम से कम तीन हजार वर्गफीट खुली जगह रखनी होगी। गणपति उत्सव के दौरान भी ऐसी ही पाबंदियां थीं। लोगों ने प्रतिमायें ही नहीं रखीं। दुर्गा पूजा न केवल धार्मिक, सामाजिक मेल-मिलाप का माध्यम है बल्कि जनप्रतिनिधियों के लिये अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत करने का भी जरिया हुआ करता है। एक चुने गये प्रतिनिधि को हर पंडाल के पीछे 50 हजार से लेकर 2 लाख रुपये तक का चंदा देना पड़ता है। इस बार कोरोना ने उनको बचा लिया।

किनके लिये अवसर बनकर आई आपदा

रोज-कमाने खाने वालों पर लॉकडाउन कहर बनकर टूट पड़ता है। मगर बहुत से लोग मजे में हैं। पूरे प्रदेश में हर जगह से ख़बर आ रही है कि सब्जियों के दाम में जबरदस्त उछाल आई। किराना सामान एमआरपी से नीचे मिल जाया करते थे पर लॉकडाउन के बाद विशेषकर खाद्यान्न के दाम बढ़ गये। इस कोरोना ने ऑनलाइन डिलिवरी वालों को बड़ा फायदा पहुंचाया है। लोग दिन रात मोबाइल, लैपटॉप पर चिपके हैं तो इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स का बिजनेस भी उछाल पर है। अफसर, कर्मचारी भी मजे में हैं। दफ्तरों में उनकी कुर्सियां पहले खाली रहती थी तो शिकायत होती थी, अब ऐसा है तो उसके पीछे कोरोना है। सडक़, पुल, पुलिया के काम जैसे भी हों चल रहे हैं, कोई निगरानी नहीं। इन सबसे ऊपर कोरोना के लिये जारी होने वाले बजट का मसला है। 750 करोड़ रुपये अब तक विभिन्न मदों में खर्च हो चुके हैं। कोई सवाल नहीं कि किस तरह खर्च किये गये। किन पर किये गये। जब कोरोना की आंधी गुजर जायेगी तब भी शायद ही कोई पूछताछ करे।