राजपथ - जनपथ
साइबर क्राइम में तेजी की रिपोर्ट
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि छत्तीसगढ़ में साइबर अपराधों की रफ्तार बेहद तेज हुई है। इस डरावने ट्रेंड पर उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने पिछली जुलाई में ही आंकड़ा विधानसभा में रखा गया था। विधायक सुनील सोनी के सवाल और गजेंद्र यादव के पूरक प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया था कि जनवरी 2023 से जून 2025 के बीच राज्य में 67,000 से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें पीडि़तों को कुल 791 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।
इसी विवरण के मुताबिक औसतन हर 20 मिनट में एक नया मामला सामने आ रहा है। अकेले 2024 में ही 31,000 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं और नुकसान 200 करोड़ रुपये से ऊपर रहा। जुलाई 2025 तक के 18 महीनों में ही 1,301 मामलों में 107 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया।
एनसीआरबी के आंकड़ों में यह बताया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर मुंबई के लोग सबसे अधिक साइबर अपराधों के शिकार हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में राजधानी रायपुर। इसका मतलब यह है कि जिन शहरों में आर्थिक गतिविधियां अधिक तेज हैं, वहां पर साइबर अपराधी घात लगाए बैठे रहते हैं। 2024 में रायपुर में ही 17,000 से अधिक शिकायतें आईं और 48 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज हुआ। इसके बाद दुर्ग और बिलासपुर सबसे प्रभावित जिले रहे। लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि इतनी बड़ी संख्या में शिकायतों और नुकसान के बावजूद, केवल 107 पीडि़तों को ही पैसा वापस मिल पाया। बैंक से जुड़ी धोखाधड़ी में तो अब तक सिर्फ तीन गिरफ्तारी और सात सजाएं हुई हैं। शिकायतों की बड़ी संख्या का मतलब धोखाधड़ी के उद्देश्य से किया गया कॉल है, चाहे उसमें ठगी हो पाई हो या नहीं। छत्तीसगढ़ पुलिस की सन् 2024 की जांच में पाया गया कि बिहार, झारखंड, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों के ठग गिरोह बीमा, नौकरी और लोन के नाम पर लोगों को फंसाते हैं। वहीं राजस्थान के ठग सेक्सटॉर्शन जैसे मामलों से छत्तीसगढ़ के लोगों को जाल में फंसा रहे हैं। मतलब है कि छत्तीसगढ़ देशभर के साइबर अपराधियों के लिए एक सॉफ्ट टारगेट बन चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता की कमी और स्मार्टफोन-इंटरनेट के तेजी से फैलते इस्तेमाल ने अपराधियों के लिए रास्ता और आसान कर दिया है। हालांकि, शिकार लोगों में बैंक मैनेजर, उपक्रमों के महाप्रबंधक, यहां तक कि पुलिस और विजिलेंस के अधिकारी भी शामिल हैं।
उप-मुख्यमंत्री, गृह मंत्री विजय शर्मा ने विधानसभा में यह भी बताया था कि छत्तीसगढ़ ने सभी पांच संभागीय मुख्यालयों में साइबर पुलिस स्टेशन स्थापित किए हैं, और बजट में नौ और स्वीकृत किए गए हैं। हर थाने में एक साइबर सेल मौजूद है, और रायपुर में एक डेडिकेटेड साइबर बिल्डिंग स्थापित किया गया है। पुलिस मुख्यालय में 129 कर्मियों की नई नियुक्ति की गई है, और एक विशेषज्ञ, तकनीकी जानकारी से लैस पुलिस बल तैयार करने के लिए एक साइबर कमांडो योजना पर काम चल रहा है। अधिकारियों को सरदार वल्लभभाई पटेल पुलिस अकादमी और सी-डैक ढ्ढ4 जैसे संस्थानों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन तथ्यों के बावजूद साइबर अपराधों में कोई कमी नहीं आ रही है। छत्तीसगढ़ में साइबर सुरक्षा को धरातल पर प्रभावी बनाने की जरूरत है। वरना आम नागरिकों की जेब खाली होती रहेगी। एनसीआरबी की रिपोर्ट इस पर गौर करने के लिए कहती है।
जलकर भी, डूबकर भी
राजधानी में बूंदाबांदी के बीच गुरुवार को दशहरे पर रावण दहन हुआ। शहर के प्रमुख दशहरा उत्सव कार्यक्रम में सीएम विष्णु देव साय, और सांसद-विधायक मौजूद रहे। बारिश की संभावनाओं के चलते कार्यक्रम में काफी हड़बड़ी में निपटा।
रायपुर के सबसे पुराने रावणभाठा के दशहरा उत्सव कार्यक्रम में उस वक्त अजीबोगरीब गरीब स्थिति पैदा हो गई, जब सीएम का भाषण हुआ, और पूजा अर्चना हुआ था कि किसी ने रावण में आग लगा दी। यह सब हड़बड़ी में हुआ क्योंकि हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई थी। फिर भी इसको लेकर आयोजकों में काफी नाराजगी देखी गई। कुछ इसी तरह की स्थिति सुंदरनगर दशहरा उत्सव कार्यक्रम में भी देखने को मिला। स्वागत सत्कार का कार्यक्रम लंबा खिंचते देख मुख्य अतिथि सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने माइक संभाला, और मंच पर मौजूद अतिथियों विधायक सुनील सोनी, मेयर मीनल चौबे, शहर जिला भाजपा अध्यक्ष रमेश सिंह ठाकुर, और अन्य अतिथियों से क्षमा मांगते हुए कह दिया कि किसी का भाषण नहीं होगा। उन्होंने सीधे रावण दहन करने की अपील की।
बृजमोहन ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में जीएसटी कमी के फायदे गिनाए, और कहा कि इस बार रावण न सिर्फ जलेगा, बल्कि डूबकर भी मरेगा। डब्ल्यूआरएस सहित अन्य जगहों में भी बारिश की संभावना को देखते हुए रावण दहन का कार्यक्रम को संक्षिप्त कर दिया गया। इन सबके बावजूद रावण दहन का कार्यक्रम बिना किसी बाधा के हो पाया, और रावण के डूबकर मरने की नौबत नहीं आई।
डीए की घोषणा और वेतन आयोग
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को दशहरा दिवाली का तोहफा दिया। केंद्रीय अधिकारी कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ते में 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है जो नवंबर के वेतन से मिलेगा। कर्मचारियों का कहना है कि अभी अभी तो जुलाई में डीए मिला है और अगला जनवरी में ड्यू है। ऐसे में अचानक एक और किस्त की घोषणा, दाल में कुछ काला जैसा है।
यह घोषणा परंपरा नियमों से हटकर की गई है। केंद्रीय कार्मिक बताते हैं कि एक बारगी जब वेतन आयोग के गठन की घोषणा कर दी जाती है तो डीए नहीं दिया जाता सीधे नया वेतनमान ही लागू किया जाता है। इस बार ऐसा होता न दिखने से केंद्र ने बिहार चुनाव से पहले नाराजगी, हड़ताल धरना प्रदर्शन रोकने यह निर्णय लिया है। इन्हीं चुनाव को लेकर ही मोदी 2.0 में नया वेतन आयोग ने बनाने का निर्णय लेने वाली सरकार ने इस वर्ष 16 जनवरी को गठन का फैसला किया। यह अलग बात है कि 10 महीने में अध्यक्ष, सचिव सदस्यों की नियुक्ति नहीं की जा सकी है।
समझा जा रहा है कि तीन फीसदी डीए देकर आयोग के गठन को और टाला जाए। वेतन आयोग पारंपरिक रूप से दस साल के चक्र पर आते हैं, और 7वें वेतन आयोग के 2016 में लागू होने के साथ, 8वें वेतन आयोग के भी करीब आने की उम्मीद है, जो 2026 के आसपास लागू होने की उम्मीद है। कर्मचारियों के लिए, महंगाई भत्ते में यह बढ़ोतरी मौजूदा मुद्रास्फीति के दबावों की याद दिलाती है, जिन्हें आयोग को और व्यापक रूप से संबोधित करना है।
राजनीतिक पर्यवेक्षक का मानना है कि हालांकि आम चुनावों से पहले कोई आधिकारिक घोषणा होने की संभावना नहीं है,लेकिन केंद्रीय विभागों के भीतर जमीनी स्तर पर विचार-विमर्श आने वाले वर्ष के लिए चुपचाप मंच तैयार कर सकता है। इस अर्थ में 8 वें वेतन आयोग के गठन अभी भी कुछ समय है। ऐसे में जनवरी में भी एक और किस्त मिलने की उम्मीद लगाए रखें। लेकिन आयोग के गठन की अनिवार्यता को नजरअंदाज करना सरकार के लिए मुश्किल होगा है।
आत्मविश्वास का अंदाज

सिविल ड्रेस में हाथों में बंदूक थामे ये महिलाएं किसी फिल्म या रील्स की शूटिंग हिस्सा नहीं हैं। ये सचमुच शूट कर सकती हैं। दरअसल, ये सब बिलासपुर की राज्य पुलिस सेवा की अधिकारी हैं, जिन्होंने दशहरा पर्व पर आयोजित शस्त्र पूजन कार्यक्रम में परंपरा के अनुसार हथियारों की पूजा की और उसके बाद तस्वीरें खिंचाईं।
अमेरिका से आई है यह ख़ुशी
मंगलवार राज्य संवर्ग के पांच लाख अधिकारी कर्मचारियों के लिए मंगलमय रहा। अब ये कर्मचारी अब अपने मासिक वेतन को एडवांस (वेतन के विरूद्ध अल्पावधि ऋण) के रूप में भी अग्रिम ले सकेंगे। इसके लिए कैबिनेट ने कल वित्त विभाग के एक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
इसके लिए वित्त विभाग जल्द ही वित्तीय संस्थान संभवत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से एमओयू करेगा। उसके बाद इसके एडवांस मंजूरी और रिकवरी के नियम, अधिकतम सीमा, ब्याज दर आदि तय होंगी। वित्त विभाग की योजना है इसे इसी वित्त वर्ष से लागू कर दिया जाए। अब तक के ब्लू प्रिंट के अनुसार इस एडवांस के बदले 8-9 त्न ब्याज पर अधिकतम छह माह के वेतन की निकासी कर सकेंगे। यह भी जानकारी दी गई है कि इसमें कैशलेस ट्रीटमेंट को भी जोड़ा जा सकता है। इसके साथ ही राज्य कर्मचारी स्वयं, परिजनों के स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा और अन्य आकस्मिक जरूरत के खर्च के लिए यह एडवांस ले सकेंगे। इतना ही नहीं घर बनाने, रंग रोगन जैसे लाख दो लाख तक का लोन भी ले सकेंगे। अब तक ये लोग अन्य परिजनों से मदद, न मिलने पर सूदखोरों के चंगुल में फंसते रहे हैं। अब ऐसा नहीं होगा।
इस योजना की परिकल्पना और मंजूरी तक का घटनाक्रम चर्चित है। या यूं कहें कि यह योजना अमेरिका से आई है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। दरअसल दो माह पहले वित्त मंत्री ओपी चौधरी 30 जुलाई को अमेरिका की सप्ताह भर के प्रवास पर गए थे। वहां न जाने किस भारतीय, किस अमेरिकी व्यक्ति से स्टाफ वेलफेयर पर चर्चा हुई। उन्होंने तत्काल वित्त सचिव, ओएसडी को काल कर कहा कि मेरे आने तक इसका प्रस्ताव बना लें कैबिनेट में ले जाना है। वित्त अफसरों ने चर्चाएं, राजस्थान, गोवा, गुजऱात राज्यों में लागू स्कीम का अध्ययन और यहां के कर्मचारी अधिकारी संघों के नेताओं के साथ ब्लू प्रिंट तैयार किया। दो माह तक एक-एक बिंदु को परिष्कृत करने के बाद चौधरी ने कल कैबिनेट में रखा और मंजूर कराया। अब कर्मचारी संघ कह रहे पूर्व आईएएस के मंत्री बनने से ऐसे फायदे होते हैं।
दिव्यांगों का सफर सुप्रीम कोर्ट तक
फर्जी दिव्यांग अफसर-कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दिव्यांग सेवा संघ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। संघ ने कोर्ट में 19 अफसर-कर्मियों की सूची दी है। इनमें डिप्टी कलेक्टर से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। इनमें दो डिप्टी कलेक्टर हैं। इससे परे कुछ दिव्यांग सर्टिफिकेटधारी अधिकारी-कर्मचारियों ने भी सुप्रीम कोर्ट की तरफ रुख किया है। ये अफसर-कर्मी अपने खिलाफ जांच करने के हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी है।
दिव्यांग सेवा संघ ने हाईकोर्ट में 70 अफसर-कर्मचारियों की सूची सौंपी थी, और यह कहा था कि सभी ने फर्जी सर्टिफिकेट के सहारे नौकरी पाई है। कोर्ट ने सभी को राज्य मेडिकल बोर्ड के सामने हाजिर होकर जांच करा रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा था। मगर इसमें से 4 ने ही जांच कराई है। बाकी जांच कराने के लिए तैयार नहीं हैं, और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। कुल मिलाकर फर्जी सर्टिफिकेट के सहारे नौकरी हासिल करने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट के रूख पर दिव्यांगजनों की नजरें टिकी हुई हैं। देखना है आगे क्या होता है।
चार लोगों ने कांधे पर उठा लिया...

यह तस्वीर सडक़ पर यातायात नियमों की खुली अवहेलना और लापरवाही की गवाही दे रही है। बीजापुर के नेशनल हाइवे पर पांच युवक एक ही स्कूटी पर सवार दिखाई दे रहे हैं। हालात यह रहे कि सीट की जगह न मिलने पर युवकों ने पांचवे को कंधे पर उठाकर यात्रा जारी रखी। यह खतरनाक करतूत न सिर्फ उनकी जान के लिए जोखिम भरी है, बल्कि अन्य राहगीरों को भी खतरे में डाल सकती है। वीडियो वायरल होने के बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने इसे साझा कर राज्य सरकार से सवाल उठाए हैं कि सडक़ सुरक्षा पर ऐसी लापरवाहियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
सिफारिश नहीं चलेगी
कांग्रेस में जिला अध्यक्षों के चयन की नई प्रक्रिया से पार्टी के दिग्गज नेता परेशान हैं। हाईकमान ने पहले ही संदेश दे दिया है कि जिला अध्यक्षों के चयन में सिफारिशें नहीं चलेंगी। ऐसा मध्यप्रदेश कांग्रेस के जिला अध्यक्षों के चयन में हो चुका है, और बड़े नेताओं को झटका भी लगा है।
बताते हैं कि मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने अपने गृह जिले राजगढ़, और आसपास के 11 जिलों के लिए पर्यवेक्षकों के माध्यम से अपने करीबियों के नाम भेजे थे। दिग्विजय सिंह के पुत्र पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह खुद दिल्ली में डटे हुए थे। मगर पार्टी ने जयवर्धन सिंह को ही गुना जिले का अध्यक्ष बना दिया। गुना, केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का संसदीय क्षेत्र है, और वो कांग्रेस में रहते दिग्विजय सिंह के धुर विरोधी रहे हैं। कहा जाता है कि सिंधिया ने दिग्विजय सिंह की वजह से कांग्रेस छोड़ी थी। अब दिग्विजय सिंह पिता-पुत्र को गुना इलाके में पार्टी को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी दे दी गई।
छत्तीसगढ़ में भी कुछ इसी तरह का डर कांग्रेस के बड़े नेताओं को सता रहा है। अब तक जिलाध्यक्षों के चयन में स्थानीय बड़े नेताओं की पसंद को तवज्जो मिलती रही है। मगर इस बार ऐसा हो पाएगा, इसकी संभावना कम दिख रही है। इसका अंदाजा उस वक्त लगा, जब एआईसीसी पर्यवेक्षकों की नियुक्ति के बाद जिले का आबंटन होना था। चर्चा है कि पीसीसी ने पर्यवेक्षकों के लिए अपनी तरफ से जो जिला प्रस्तावित किया था, पार्टी हाईकमान ने बदल दिया। ऐसे में जिला अध्यक्षों के चयन में बड़े नेताओं की पसंद को दरकिनार कर दिया जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
संगठन या चुनाव

कांग्रेस ने जिला अध्यक्षों के लिए कुछ मापदंड भी तैयार किए हैं। इसमें यह है कि जिला अध्यक्षों को विधानसभा या लोकसभा टिकट नहीं दी जाएगी। हालांकि पहले भी इस तरह की बातें पार्टी के अंदरखाने में चलती रही हैं। मगर इसका पालन नहीं हो पाता था। मोहन मरकाम को प्रदेश अध्यक्ष पद से सिर्फ इसलिए हटाया गया था कि वो विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे। मगर मरकाम की जगह प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद दीपक बैज ने सांसद रहते हुए अडक़र विधानसभा की टिकट हासिल कर ली थी, लेकिन चुनाव नहीं जीत पाए।
विधानसभा चुनाव में दुर्ग ग्रामीण, महासमुंद, और एक-दो अन्य जिलों के अध्यक्षों ने भी चुनाव लड़ा था। और ज्यादातर चुनाव हार गए। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि विशेषकर जिलाध्यक्ष के चुनाव लडऩे से संगठन का काम प्रभावित हो जाता है। इससे चुनाव में नुकसान उठाना पड़ता रहा है। अब नए नियम को कड़ाई से पालन किया जाएगा। देखना है कि इसका कितना पालन हो पाता है।
साहित्य युवाओं का शौक बन रहा...

ये कोई क्रिकेटर नहीं, फिल्म स्टार नहीं। देश बदल रहा है। रायपुर में आयोजित हिंद युग्म उत्सव 2025 के साहित्य समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल के पास ऑटोग्राफ के लिए युवाओं की लंबी कतार लगी रही। मार्च 2025 में उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान मिला, जो हिंदी साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार है। छत्तीसगढ़ के पहले लेखक हैं, जिन्हें यह सम्मान मिला। फोटो में वृद्ध लेखक टेबल पर बैठे किताबें साइन कर रहे हैं। उनके सामने युवा लडक़े-लड़कियां किताबें थामे उत्साहित खड़े हैं। चेहरे पर मुस्कान, आंखों में श्रद्धा। क्या यह दृश्य साहित्य के प्रति नई पीढ़ी के लगाव को नहीं दिखाता?
उनके उपन्यास दीवार में एक खिडक़ी रहती थी की हाल ही में हजारों प्रतियां बिकीं। प्रकाशकों से छह महीने की रॉयल्टी के रूप में बड़ी धनराशि मिली, जो 60-70 लाख तक पहुंच सकती है
ईडी की बात सुनेगी सरकार?
ईडी ने प्रदेश के दस आईएएस, आईपीएस, और राज्य सेवा के अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण के अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए सरकार को चि_ी लिख दिया है। इसकी पुलिस, और प्रशासनिक हलकों में काफी चर्चा है।
जिन आईएएस अफसरों के खिलाफ ईडी ने कार्रवाई के लिए लिखा है उनमें तो रानू साहू, और समीर विश्नोई के खिलाफ पहले से ही जांच चल रही है, और वो जमानत पर हैं। मगर आईपीएस अफसरों पर जांच एजेंसी ने कोई कार्रवाई नहीं की है। ये अलग बात है कि ईडी ने उनसे पूछताछ जरूर की थी। ये सारे आईपीएस पिछली सरकार में काफी ताकतवर रहे हैं। अब ईडी की ताजा चि_ी को अफसरों को एक तरह से राहत के रूप में देखा जा रहा है। यानी ईडी अब इन अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगी, और अफसरों के प्रकरण राज्य सरकार के हवाले कर दिया है। राज्य सरकार अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के लिए ईओडब्ल्यू-एसीबी को लिख सकती है।
पहले ही शराब, कोयला, और डीएमएफ के प्रकरणों के चलते काफी ईओडब्ल्यू-एसीबी ओवरटाइम कर रहा है। ऐसे में ईडी की चि_ी में उल्लेखित अफसरों के खिलाफ जांच-कार्रवाई में देरी हो सकती है। कुल मिलाकर एक तरह से पुलिस अफसरों को राहत मिलती दिख रही है। देखना है आगे क्या होता है।
ईडी वाले रावण

नवरात्रि की सप्तमी पूरी हो रही है और चहूंओर विजयदशमी पर रावण दहन की चर्चा, तैयारियां हो रही। राजधानी में एक दर्जन से अधिक इलाकों में दहन होने वाले रावण पुतले को इलाके या अगुवाकर्ता नेता गणमान्य के नाम से पुकारा जाता है। मसलन समता कॉलोनी रावण दहन, रावणभाठा, डब्ल्यू आर एस कालोनी, अमलीडीह ,माना बस्ती आदि। इसी नाम से लोग पास भी मांगते हैं। इसमें इस बार एक नया नाम जुड़ गया वो यह कि ईडी के आरोपी वाले रावण।
आयोजन पुराने ऐतिहासिक इलाके में ही हो रहा है लेकिन आयोजन समिति में शराब घोटाले के एक आरोपी शामिल होने से यह नाम रख दिया गया है। इनके यहां ईडी की दबिश हो चुकी है। बहरहाल इस आयोजन के तैयारी की कल शुरुआत भी हो गई। 2 अक्टूबर को सरकार के प्रमुखों से लेकर दलीय नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है।अब देखना है कि कौन कौन आरोपी के साथ मंच साझा करते हैं। वैसे कल के भूमिपूजन पत्रकार वार्ता में आरोपी नजर नहीं आए थे।
सर्दियों की आहट के साथ आए विदेशी मेहमान

साइबेरियन स्टोन चैट पक्षी इस साल भी ठीक समय पर मोहनभाठा (बिलासपुर) पहुंच गए हैं, ताकि यहां शीतकालीन प्रवास कर सकें। हालांकि अभी इनकी संख्या दो-चार के आसपास है। यह छोटे आकार के पक्षी मात्र 12–13 सेंटीमीटर लंबे और 15–18 ग्राम वजन वाले होते हैं। सर्दियों के दौरान इन्हें मोहनभाठा में चरौटा की झाडिय़ों या फेंसिंग वायर पर देखा जा सकता है।
साइबेरिया के लेक बैकाल क्षेत्र, मंगोलिया, कजाकिस्तान और रूस के उत्तरी खुले घास के मैदानों में सर्दियों में तापमान अत्यधिक कम हो जाता है और आहार की कमी हो जाती है। इस कारण ये पक्षी हर साल प्रवास करते हैं। साइबेरियन स्टोन चैट पक्षी सितंबर–अक्टूबर में दक्षिण की ओर उड़ान भरना शुरू करते हैं। उनका मार्ग चीन और मध्य एशिया (किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, कज़ाखस्तान) से गुजरता है। इसके बाद वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान होते हुए भारत के मध्य क्षेत्र मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र तक पहुंचते हैं। यह लंबी उड़ान पक्षियों की अद्भुत सहनशक्ति और प्राकृतिक प्रवास की सुंदरता का उदाहरण है।
क्या मिलेगा?
आईएएस के 89 बैच के अफसर अमिताभ जैन 30 तारीख को सीएस के दायित्व से मुक्त हो जाएंगे। जैन करीब पौने पांच सीएस रहे। वो सबसे लंबे समय तक प्रदेश के सीएस के पद पर रहे हैं। अमिताभ जैन राज्य के पहले सीएस हैं जिन्हें एक्सटेंशन भी मिला है।
जैन का रिटायरमेंट पुनर्वास भी तय माना जा रहा है। उन्हें क्या मिलेगा,यह अभी अस्पष्ट है। अमिताभ जैन, योजना आयोग के उपाध्यक्ष के प्रभार भी हैं। कुछ लोगों का अंदाज है कि वो योजना के उपाध्यक्ष पद पर यथावत बने रह सकते हैं। इसके बाद चाहे तो वो स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन के चेयरमैन के लिए अप्लाई कर सकते हैं। चेयरमैन के लिए विज्ञापन अगले हफ्ते जारी होने की उम्मीद है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में पीजी अमिताभ जैन रेगुलेटरी कमीशन के चेयरमैन के लिए सारी अहर्ता को पूरी करते हैं।
एक बात और, चेयरमैन की नियुक्ति के लिए अलग से कमेटी बनाने की जरूरत नहीं है। कुछ महीने पहले इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन में मेंबर की नियुक्ति हुई, ये सलेक्शन कमेटी अब भी प्रभावशील है।
कमेटी में हाईकोर्ट जस्टिस के अलावा सीएस व सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन के मेम्बर हैं। सब कुछ ठीक रहा, तो अक्टूबर के आखिरी तक चेयरमैन की नियुक्ति हो जाएगी। इसके अलावा जैन चाहे तो सीआईसी भी बन सकते हैं। वो इस पद के लिए इंटरव्यू तो दे ही चुके हैं। यानी उनके दो हाथ में लड्डू है। उन्हें क्या कुछ मिलता है, ये मंगलवार को साफ हो पाएगा।
क्यों नहीं आए?
दो दिन पहले छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ की बैठक में बड़ा फैसला हुआ। संघ ने फैसला लिया है कि प्रदेश से जो कोई भी ओलंपिक में हिस्सा लेगा, उसे 21 लाख रुपए की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। सीएम विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में हुई बैठक में साई के रीजनल सेंटर, जो अभी भोपाल में हैं, उसे रायपुर लाने के लिए पहल करने का प्रस्ताव भी पारित किया गया। साय और बाकी पदाधिकारी बैठक में थे, लेकिन सदस्यों की नजरें उपाध्यक्ष बृजमोहन अग्रवाल को ढूंढ रही थी, जो कि बैठक में नहीं आए।
वैसे बृजमोहन के दैनिक कार्यक्रम में ओलंपिक संघ की बैठक में शामिल होने की सूचना दी गई थी। मगर वो बैठक से दूर रहे। बैठक में क्यों नहीं आए, इसको लेकर कई चर्चा है। एक चर्चा यह भी है कि बृजमोहन अग्रवाल को पहली बैठक में कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था। मगर ये आदेश अब तक जारी नहीं हो पाया।
हल्ला यह भी है कि वो संघ के एक पदाधिकारी से नाखुश हैं। इसलिए बैठक में नहीं आए। हालांकि जिस समय संघ की बैठक चल रही थी, उस समय वो जीएसटी महोत्सव में थे। वे दुकानों में जाकर ग्राहकों, और संचालकों से बात कर रहे थे। कुल मिलाकर ओलंपिक संघ की बैठक में बृजमोहन की गैरमौजूदगी की चर्चा रही।
गवर्नर की किस्सागोई
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका का लंबा और गहरा राजनीतिक अनुभव है। शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे होने के कारण उनकी बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के सिल्वर जुबली समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए डेका ने राजनीति और न्याय व्यवस्था से जुड़े कई रोचक किस्से साझा किए।
अपने संबोधन में उन्होंने न्याय व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए। डेका ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर चुका है कि जमानत पाना आरोपी का अधिकार है और उसका न मिलना अपवाद, तो फिर व्यवहार में ऐसा क्यों नहीं होता? आखिर क्यों आम लोगों को जमानत के लिए ऊंची अदालतों की शरण लेनी पड़ती है? इस टिप्पणी ने न्यायाधीशों का ध्यान खींचा।
उन्होंने वकीलों के कामकाज पर भी तंज कसा। एक प्रसंग सुनाते हुए डेका ने कहा कि राज्यपाल बनने से पहले वे एक मामले में कैविएट दायर करने किसी हाईकोर्ट में पहुंचे थे। अपने नियमित वकील के अनुपस्थित रहने पर उन्होंने एक परिचित वकील से मदद ली। वकील ने भरोसा दिलाया कि कैविएट दाखिल हो जाएगा, लेकिन अगले दिन पता चला कि ऐसा हुआ ही नहीं और विरोधी पक्ष को स्टे मिल गया।
राज्यपाल डेका ने अपने संबोधन में प्रसिद्ध विधिवेत्ता राम जेठमलानी का एक दिलचस्प किस्सा भी सुनाया। उन्होंने बताया कि जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, तब जेठमलानी उनसे मिले और मंत्री बनाए जाने की मांग रखी। देसाई ने उनके योगदान को स्वीकारते हुए भी यह कहकर इंकार कर दिया कि मंत्रिमंडल का सदस्य शराब पीता हो, यह उचित नहीं लगेगा। यह बात जेठमलानी को खल गई। कुछ समय बाद मोरारजी देसाई की सरकार अल्पमत में आ गई और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। अगले ही दिन जेठमलानी उनके पास पहुंचे और कटाक्ष करते हुए बोले- देसाई जी, आपकी सरकार गिराने वाले चरण सिंह और जगजीवन राम हैं, और दोनों ही शराब नहीं पीते।
चिता की आग पर बनी चाय...
छत्तीसगढ़ के एक सबसे सीनियर फोटो-जर्नलिस्ट गोकुल सोनी ने अपनी जिंदगी का एक असल किस्सा बताया है, राजधानी रायपुर शहर का।
यह जगह एक श्मशान घाट है। सामान्यत: यहाँ सभी लोगों का अंतिम संस्कार होता है, लेकिन फिर भी इसे मारवाड़ी श्मशान घाट कहा जाता है। इसके नाम के पीछे एक बड़ा कारण है, जिसे मैं किसी और दिन विस्तार से बताऊँगा। आज मैं आपसे अपने बचपन की एक घटना साझा करना चाहता हूँ, जो इसी श्मशान घाट से जुड़ी है।
अस्सी के दशक की बात है। इस श्मशान घाट में उस समय एक अघोर बाबा रहा करते थे उनका नाम था कल्लू बाबा। वे हमेशा काला कपड़ा ही पहना करते थे। बढ़ी हुई दाढ़ी से उनका चेहरा बड़ा डरावना लगता था। मेरे पिता जी से उनकी मित्रता थी। पिता जी कभी - कभी उनसे मिलने जाया करते थे। एक दिन वे मुझे भी अपने साथ ले गए। मेरे पिता जी मिलिट्री में थे, इसलिए उन्हें न डर-भय छूता था और न ही वे छुआ-छूत जैसी बातों को मानते थे।
जब मैं पहली बार वहाँ पहुँचा तो देखा, श्मशान घाट परिसर के जिस कमरे में बाबा रहते थे उसके सामने एक विशाल पीपल का पेड़ था। उस पेड़ पर असली नरमुंडों ( खोपडिय़ों ) की माला टंगी हुई थी। मेरा बाल मन सिहर उठा। नजरें अनायास ही उन मुंडों पर टिक गईं और मन में एक अजीब-सी दहशत बैठ गई।
इसी बीच बाबा ने पिता जी से कहा—सोनी जी आओ, चाय पीते हैं।
उन्होंने एक जर्मन (एल्युमिनियम) के बर्तन में पानी डाला, उसमें चायपत्ती, शक्कर और दूध डाला और फिर उस बर्तन को एक लंबी चिमटी में फँसाकर उठा लिया। मैं यह देखकर चौंक गया कि बाबा उसे पास ही जल रही चिता की आग पर रख रहे हैं! कुछ ही देर में चाय खौलने लगी। बाबा ने बर्तन उतारा और चाय तीन कपों में बाँट दी—एक कप पिता जी को दिया, दूसरा खुद रख लिया और तीसरा मेरी ओर बढ़ा दिया।
कप मेरे हाथ तक पहुँचा ही था कि मेरा दिल जोर-जोर से धडक़ने लगा। मन ही मन मैं सोच रहा था—क्या मैं सचमुच चिता की आग पर बनी चाय पी लूँगा ? मेरे चेहरे के भाव देखकर पिता जी सब समझ गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए बाबा से कहा— बाबा, बेटा चाय नहीं पीता। और इस तरह मैं उस दिन चिता में बनी चाय पीने से बच गया।
आज भी जब-जब मैं किसी के अंतिम संस्कार में उस श्मशान घाट में जाता हूँ, यह घटना आँखों के सामने ताज़ा हो जाती है।
अब आप बताइए—अगर उस दिन मेरी जगह आप होते, तो क्या आप चिता की आग पर बनी चाय पी लेते ? अपने विचार ज़रूर साझा कीजिएगा।
कुछ अच्छी चर्चा हो जाए
मनरेगा के कार्यों, और भुगतान पर नजर रखने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने सभी पंचायतों में क्यूआर कोड प्रणाली शुरू की है। धीरे-धीरे यह प्रणाली चर्चा का विषय बन गई है, और इसकी गूंज राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी है। भारत सरकार ने पिछले दिनों एक बैठक में मनरेगा आयुक्त तारण प्रकाश सिन्हा की न सिर्फ तारीफ की, बल्कि इस प्रणाली को पूरे देश में लागू करने की बात कही। ताकि मनरेगा के कार्यों में पारदर्शिता आ सके।
बताते हैं कि पंचायत ग्रामीण विकास विभाग की प्रमुख सचिव श्रीमती निहारिका बारिक सिंह ने विभागीय बैठकों में मनरेगा के कार्यों पर नजर रखने और भुगतान की स्थिति की पंचायतों को जानकारी हो सके, इसके लिए क्यूआर कोड प्रणाली शुरू करने के प्रस्ताव पर सहमति दी थी। इसके बाद प्रदेश में तकरीबन सभी जिलों में क्यूआर कोड प्रणाली लागू कर दी गई।
पंचायतों में क्यूआर कोड चस्पा किए गए, और ग्रामीण मोबाइल से इन कोड को स्कैन कर मनरेगा के पिछले पांच साल के कार्यों और भुगतान की अद्यतन स्थिति की जानकारी ले सकते हैं। क्यूआर कोड प्रणाली के चलते प्रदेश के पंचायतों में लोग अब मनरेगा के कार्यों को लेकर काफी सजग और सतर्क हो गए हैं, और मोबाइल से जानकारी लेकर वस्तुस्थिति की जानकारी ले रहे हैं। इससे मनरेगा के कार्यों में गड़बड़ी का भी पता चल रहा है।
पिछले दिनों केन्द्रीय ग्रामीण विकास विभाग की दिल्ली में उच्चस्तरीय बैठक हुई थी। इसमें मनरेगा के कार्यों और भुगतान में पारदर्शिता लाने के छत्तीसगढ़ सरकार की पहल की सराहना की। बिना कोई खर्च के जिस तरह क्यूआर कोड प्रणाली लागू की गई, उसे पूरे देश में लागू करने पर विचार हो रहा है। कोई काम अच्छा होगा तो सराहना तो होगी ही। वैसे भी छत्तीसगढ़ शराब, कोयला, और अन्य घोटालों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में बना रहा है।
कांग्रेस संगठन में हलचल

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में जिलाध्यक्षों के चयन के लिए 17 पर्यवेक्षक नियुक्त किए गए हैं। इन पर्यवेक्षकों को 41 संगठन जिलों में जाकर जिलाध्यक्षों के नामों का पैनल तैयार करने के लिए कहा गया है। कुछ पर्यवेक्षक तो अपने प्रदेश के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं।
मसलन, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय झारखंड कांग्रेस के बड़े नेता हैं। अजय कुमार लल्लू उत्तरप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके हैं। इसी तरह अन्य पर्यवेक्षकों की भी अपनी अलग पहचान है।
हर पर्यवेक्षक को दो या तीन जिले दिए गए हैं। ये पर्यवेक्षक जिलों में जाकर ब्लॉक स्तर तक के कार्यकर्ताओं से रायशुमारी करेंगे, और अधिकतम 6 नाम का पैनल हाईकमान को देंगे। रायपुर शहर और ग्रामीण जिला अध्यक्ष के लिए नागपुर के प्रफुल्ल गुडधे को पर्यवेक्षक बनाया गया है। गुडधे, महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फडनवीस के खिलाफ विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं।
अजय कुमार लल्लू को दुर्ग शहर, ग्रामीण, और भिलाई जिले के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। मध्यप्रदेश के विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को बिलासपुर शहर, ग्रामीण, और मुंगेली जिले का पर्यवेक्षक बनाया गया है। इन सबको लेकर कांग्रेस में अलग ही तरह की हलचल है। वजह यह है कि पार्टी ने 6 माह पहले ही 11 जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की थी। अब उन जिलों में भी अध्यक्ष का नाम सुझाने के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किए गए हैं। इससे जिलाध्यक्षों के साथ ही उन्हें बनवाने वाले पार्टी के बड़े नेता भी असमंजस में हैं। अब देखना है कि इन जिलाध्यक्षों को रिपीट किया जाता है, या नहीं।
संविदा की परंपरा रही है
विधानसभा के नए भवन के उद्घाटन की तैयारी चल रही है। इस सिलसिले में स्पीकर डॉ. रमन सिंह, सीएम विष्णुदेव साय, और डिप्टी सीएम अरुण साव के साथ बैठक कर चुके हैं। अगले कुछ दिनों में नया विधानसभा भवन, छत्तीसगढ़ सचिवालय को हैंडओवर कर दिया जाएगा। इससे परे विधानसभा सचिवालय के कुछ सीनियर अफसरों को संविदा नियुक्ति देने पर विचार चल रहा है।
विधानसभा के डिप्टी सेक्रेटरी आरके अग्रवाल 30 सितंबर को रिटायर हो रहे हैं। उन्हें संविदा नियुक्ति देने पर विचार चल रहा है। स्पीकर ने उनकी फाइल बुलवाई है। सब कुछ ठीक रहा, तो अग्रवाल का एक साल की संविदा नियुक्ति दी जा सकती है। एक नवंबर को नए विधानसभा भवन का उद्घाटन है, और 30 नवंबर को सचिव दिनेश शर्मा रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में उन्हें भी संविदा नियुक्ति मिल सकती है।
संविदा नियुक्ति देने के पीछे एक तर्क यह भी है कि विधानसभा में सीनियर अफसरों की कमी है। कई अफसरों का प्रमोशन विलंब से हुआ, और इस वजह से शीर्ष पद तक पहुंचने लायक अनुभव नहीं है। वैसे भी दिनेश शर्मा से पहले देवेन्द्र वर्मा, और चंद्रशेखर गंगराडे को संविदा नियुक्ति मिली थी। ऐसे में संविदा की परम्परा आगे भी जारी रह सकती है।
संविदा विभाग बना निर्माण विभाग
प्रदेश का एक निर्माण विभाग इन दिनों संविदा विभाग बना हुआ है। इस विभाग के सचिवालय से लेकर संचालनालय, प्रमुख अभियंता, मुख्य अभियंता, कार्यालय में संविदा नियुक्ति आसानी से मिल सकती है। इसके पीछे एक कुछ लोग सक्रिय हैं बस उन्हें ही चढ़ावा देने की जरूरत होती है। 2 वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त लोगों को भी बुलाकर संविदा नियुक्ति दी जा रही है।
लेनदेन के बल पर ऐसे सक्षम लोग पहुंच के माध्यम से पदोन्नत के लिए इन दो वर्षों से इंतजार कर रहे। अधिकारों का हनन कर रहे हैं। 5 वर्ष से विभाग में कोई नियुक्ति न होने से वहां कार्यरत संविदा प्लेसमेंट अस्थाई कर्मचारी भी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। ऐसी नियुक्तियों की शिकायत पर पूर्व मंत्री ने अपने एक निज सचिव को हटा दिया था। यह सोचकर की संविदा गिरोह टूटेगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया । हाल में सेवानिवृत्ति के एक माह के अंदर मुख्य अभियंता कार्यालय में कार्यरत पर्यवेक्षक को नियुक्ति दी गई और एक उप अभियंता की संविदा नियुक्ति एक वर्ष बढ़ा दी गई। वर्तमान में भी अनेक लोग इस चैनल को पकड़ कर संविदा नियुक्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं। लगभग 6-7 आवेदन ऊपर अग्रेषित करा लिए गए हैं। इनसे पहले मुख्य अभियंता, ईएनसी संविदा नियुक्ति प्राप्त करने में सफल रहे हैं। बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद उसी पद पर पदस्थ भी हो रहे हैं। ऐसे बड़े पद से सेवानिवृत्त होने पर ओपीएस में 50000/- रू से अधिक पेंशन पाने के बाद संविदा वेतन प्राप्त कर रहे है। तो स्थाई अधिकारी कर्मचारियों को रिक्त पद में समायोजन के अधिकार से वंचित होना पड़ रहा है। कुल मिलाकर यह विभाग संविदा विभाग बना हुआ है।
मेहमाननवाजी से दूर रहें
कांग्रेस ने जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के लिए नया तरीका अपनाया है। इसके लिए पार्टी ने संगठन सृजन कार्यक्रम शुरू किया है। कार्यक्रम के तहत पर्यवेक्षक जिलों में जाएंगे, और फिर जिला अध्यक्ष के लिए छह नामों का पैनल हाईकमान को भेजेंगे। पार्टी इसमें से किसी एक नाम पर मुहर लगाएगी।
वैसे तो अविभाजित मध्यप्रदेश, और फिर छत्तीसगढ़ में जिला अध्यक्ष स्थानीय बड़े नेताओं की मर्जी से ही तय होते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में रायपुर-दुर्ग संभाग में पूर्व सीएम भूपेश बघेल, बस्तर में कवासी लखमा, मोहन मरकाम, और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज व सरगुजा संभाग में टीएस सिंहदेव और बिलासपुर संभाग में डॉ. चरणदास महंत के सुझाव को ही महत्व मिलता रहा है। मगर अब ऐसा नहीं होगा। जिला अध्यक्ष के चयन में जिले कार्यकर्ताओं की राय को महत्व मिलेगा,यह दावा किया जा रहा है। हाईकमान ने ओडिशा, मध्य प्रदेश, झारखंड, और अन्य राज्यों के 17 सीनियर नेताओं को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा गया है। इन नेताओं में ओडिशा के सांसद सप्तगिरि उल्का, आरसी खुंटिया छत्तीसगढ़ में संगठन का काम देख चुके हैं। पर्यवेक्षकों में पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय, महाराष्ट्र सरकार के पूर्व मंत्री नितिन राउत, और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू भी हैं। ये पर्यवेक्षक, जिलों में जाकर कार्यकर्ताओं से रायशुमारी करेंगे।
पर्यवेक्षकों के जिलों में ठहरने की व्यवस्था पीसीसी करेगी। खास बात ये है कि पर्यवेक्षक को स्थानीय बड़े नेताओं की मेहमान नवाजी से दूर रहने की हिदायत दी गई है। पर्यवेक्षक स्वतंत्र रूप से कार्यकर्ताओं से चर्चा कर पैनल तैयार करेंगे। जिला अध्यक्षों के चयन में बड़े नेताओं की चलती है या नहीं, यह देखना है।
हिसाब-किताब चलते रहता है
हालांकि यह उपक्रम सरकारी विभागों में नया नहीं पुराना है। वह यह कि सहकर्मी यदि किसी अहम पद पर है तो उसके खिलाफ माहौल बनाकर कुर्सी से हटने के बाद ही दम लिया जाए। इसके लिए विरोधी बेनामी शिकायतों के साथ जातिगत, दलीय विचारधारा समेत कामकाज के तरीके पर शक भी पैदा करने से नहीं चूकते। फिर इसमें महिला पुरुष भी नहीं देखा जाता।
विभागीय अधिकारी, बजट, स्थापना, तबादले जैसे सेक्शन के अहम पदों पर महिलाओं को इसलिए नियुक्त करते हैं कि काम गोपनीय, ईमानदारी से हो। राज्य मंत्रालय में यह काम देख रही कुछ महिला कर्मचारी ऐसी शिकायतों से परेशान हैं। हाल में विरोधी ने एक ऐसी ही बेनामी शिकायत कर दी। वह भी भाजपा के एक ऐसे नेता के नाम से, जो मंडल अध्यक्ष जैसे इतने छोटे पद पर कभी रहा ही नहीं। शिकायतकर्ता ने जोश में होश खो दिया। इस हाई प्रोफाइल नेता को इस पद का मंडल अध्यक्ष लिख दिया। यह शिकायत, उस सहकर्मी ने किया जो अर्से से मलाईदार स्थापना विंग पर नजर गड़ाए हुए है।
ऐसे ही पिछले दिनों एक मंत्रालय अटैच कॉलेज कर्मी के साथ हुआ। एक अवर सचिव ने एक पत्रकार के नाम से मिली शिकायत पर महिला कर्मी को वापस कालेज लौटा दिया। हालांकि यह मामला, पहले वाले से कुछ अलग है। इससे मंत्रालय अटैच लोगों की मूल कार्यस्थल पर वापिसी के कवायद शुरू की गई।
दिवाली, और सरकारी गिफ्ट

केंद्र सरकार ने सभी मंत्रालयों और विभागों से अब दीपावली या अन्य त्योहारों पर गिफ्ट या इससे संबंधित आइटम पर खर्च की परंपरा को बंद करने के लिए कहा है। वित्त मंत्रालय ने कैबिनेट सचिव के साथ ही सभी मंत्रालयों और विभागों के वित्तीय सलाहकार और सेक्रेटरी को भी पत्र भेजा है।
डीओपीटी के जॉइंट सेक्रेटरी पीके सिंह का यह पत्र सेक्रेटरी (एक्सपेंडिचर) के अप्रूवल से जारी किया गया है।यह आदेश भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार डा सुमंत्र पाल की ओर से जारी आदेश के बाद आया है। उन्होंने कहा था कि गिफ्ट देने की परंपरा से सरकार का खर्च बढ़ता है।
पब्लिक रिसोर्स का उपयोग न्यायपूर्ण तरीके से हो, इसके लिए यह कदम उठाना जरूरी है। उन्होंने किसी भी त्योहार पर गिफ्ट के लेनदेन को रोकने के लिए कहा था। वैसे तो इस आदेश का राज्यों से लेना देना नहीं है लेकिन यहां के अफसरों में काफी चर्चा हो रही है। जो सहमत हैं वो कह रहे फिजूलखर्ची रूकेगी, जो नहीं है वो कह रहे एक बूंद निकाल लेने से सागर सूख नहीं जाएगा। ऐसे आदेशों का पालन राज्यों में भी होता है यदि उसमें आल स्टेट्स चीफ सेक्रेटरी लिखा हो। इसमें ऐसा कुछ नहीं लिखा है।
बावजूद इसके, छत्तीसगढ़ में आदेश का पालन हो तो कई विभागों में नेता, अफसर, अन्य गणमान्य लोगों को दिवाली गिफ्ट के नाम पर होने वाले लाखों के वारे न्यारे पर रोक लगेगी। साथ इसकी जरिए पुराने अनाप शनाप खर्च को एडजस्ट नहीं कर पाएंगे। दो दशक पहले छत्तीसगढ़ में ऐसे ही सरकारी गिफ्ट शुरू हुए थे। हर साल बजट पारित होने पर वित्त मंत्री की ओर से सभी 90 विधायकों, अफसरों को यह गिफ्ट दिया जाता था। एक बारगी खबर क्या लीक हुई अब यह घोषित रूप से बंद और अघोषित रूप से घर पहुंच सेवा जारी है।
नेता के जश्न में सिग्नल का क्या काम है?

यातायात नियमों का पालन करने के लिए रोजाना तरह-तरह के चालान करने वाली ट्रैफिक पुलिस और नगर को साफ-सुथरा रखने के लिए अभियान चलाने वाले नगर निगम में बैठे अफसर तब आंख मूंद लेते हैं, जब ऐसी बाधा किसी रसूख वाले जनप्रतिनिधि के समर्थकों की ओर डाली गई होती हो। विधायक मंत्री का करीबी बताने का सबसे आसान तरीका होता है, सडक़ों को पोस्टर बैनर से पाट देना। बिलासपुर के विधायक पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल का हाल ही में जन्मदिन था। उनके समर्थकों ने यही किया। शहर में जगह-जगह बड़े-बड़े पोस्टर, होर्डिंग उनके अभिनंदन के लिए लगाए गए। ऐसा करते समय उन्होंने इस बात की भी परवाह नहीं की, कि बीच चौराहे का सिग्नल उनके पोस्टर से के पीछे छिप गया है। यह पोस्टर कई दिन से लगा हुआ है। जिस दिन जन्मदिन मनाया गया, उसी के आसपास ट्रैफिक पुलिस को हाईकोर्ट ने फटकार लगाई थी, जब कारों के काफिले के साथ हाईवे पर उत्पात मचाने वाले युवकों के साथ पुलिस ने नरमी बरती थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि गरीब लोगों का, आम लोगों का चालान काटा जाता है पर रसूखदारों को छोड़ दिया जाता है।
रियायत लागू होने में लगेगा वक्त
जीएसटी की नई दरों से आम जनता को बड़ी राहत मिलने का दावा किया जा रहा है। भाजपा तो जीएसटी में कमी का जोर शोर से प्रचार-प्रसार कर रही है, और आम जनता को मिलने वाली राहत को बचत महोत्सव का रूप दे रही है। रोजमर्रा की जरूरतों के करीब पौने चार सौ वस्तुओं के दाम कम होने की बात कही जा रही है, और भाजपा के लोग रैली निकालकर प्रचारित भी कर रहे हैं। तमाम प्रचार-प्रसार के बावजूद कई वस्तुओं के दाम कम नहीं हुए हैं।
मसलन, सीमेंट की कीमत प्रति बोरा 280 से 300 रुपए चल रहा है। खास बात ये है कि जीएसटी की नई दरें प्रभावशील होने से पहले सीमेंट कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए थे। ऐसे में सीमेंट पर जीएसटी घटने का कीमतों पर कोई असर नहीं पड़ा है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने बकायदा स्टीकर भी बनवाया है। रेट लिस्ट जारी की गई है। इसमें सीमेंट की कीमत 320 रूपए प्रति बोरा बताई गई है। हालांकि पार्टी के लोगों ने बाजार से पतासाजी करने के बाद सीमेंट की स्टीकर को बंटने से रोक दिया।
यही हाल, बाकी सामानों का भी है। पुराने स्टॉक के सामान की कीमतें अभी भी कम नहीं हुई है। एफएमसीजी से जुड़ी कंपनियों ने जरूर अपने डिस्ट्रीब्यूटर तक नया रेट लिस्ट जारी किया है। कुल मिलाकर कीमतों में कमी आने में थोड़ा वक्त लगेगा। एक भाजपा ने अनौपचारिक चर्चा में कहा कि उपभोक्ताओं को खुद होकर आगे आना होगा, और दुकानदारों पर दबाव बनाना पड़ेगा। तब कहीं जाकर जीएसटी में कमी का तुरंत फायदा मिल पाएगा।
दिल्ली पर नजरें

इस महीने के आखिरी में बड़े प्रशासनिक फेरबदल की तैयारी है। चर्चा है कि दो सीनियर आईएएस अफसरों ने केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जाने का मन बना लिया है। अक्टूबर में केन्द्र सरकार के सचिव पद के लिए 94 बैच के अफसर सूचीबद्ध होंगे। इस बैच के सभी अफसर केन्द्र सरकार में काम कर चुके हैं।
यहां 94 बैच के अफसरों में एसीएस मनोज पिंगुवा, और रिचा शर्मा ही पदस्थ हैं। इसी बैच के विकासशील, और निधि छिब्बर केन्द्र सरकार में पदस्थ रहे हैं। विकासशील तो एडीबी में थे, और राज्य सरकार की पहल पर वो 7 साल बाद छत्तीसगढ़ लौट रहे हैं। पिंगुवा, और रिचा शर्मा केन्द्र सरकार में काम कर चुके हैं। ऐसे में इस बैच के अफसरों को सूची पर नजर है।
यही नहीं, वर्ष-2006 बैच के मंत्रालय में पदस्थ सचिव स्तर के एक अफसर ने भी केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जाने की इच्छा जाहिर कर दी है। वैसे भी केन्द्र सरकार में कम से कम पांच साल काम करने के बाद ही आगे का रास्ता खुलता है। कुल मिलाकर अगले दो-तीन महीने में दो-तीन सीनियर अफसर केन्द्र सरकार की ओर रुख कर सकते हैं।
सडक़ की दुर्दशा पर चीख-चीख कर चोट

अंबिकापुर को जोडऩे वाली मुख्य सडक़ों की हालत पर आम लोग लगातार आवाज उठा रहे हैं लेकिन यहां की एक युवती आकांक्षा टोप्पो के अलग अंदाज ने लोगों का ध्यान खींचा है। सोशल मीडिया पर उनके कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें वे उन सडक़ों पर खड़ी हैं, जहां लोग इन गड्ढों के कारण लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं। बसें घिसट-घिसट कर चल रही हैं और ऑटो रिक्शा पलट जा रहे हैं। वे चीख-चीख कर चुभते हुए सवाल जनप्रतिनिधियों, मंत्री, विधायकों से कर रही हैं। आकांक्षा का चिल्ला चिल्ला कर नेताओं, अफसरों का कोसना उन लोगों को बहुत भा रहा है जो इन बदहाल सडक़ों की वजह से दिक्कत झेल रहे हैं। उसकी सोशल मीडिया पोस्ट को कई न्यूज चैनलों में कवर किया जा रहा है। एक न्यूज चैनल के मुताबिक अब आकांक्षा पर दबाव डाला जा रहा है कि वह अपने ये सब रील्स और पोस्ट हटा लें। सडक़ तो देर-सबेर बन ही जाएगी।
सुनसान सफर वैष्णो देवी का
छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख खिलाड़ी, और अंतरराष्ट्रीय बॉडीबिल्डर संजय शर्मा हर बरस एक-दो बार वैष्णो देवी दर्शन को जाते हैं। इस बार वहाँ का नजारा उन्हें बदला हुआ मिला। उन्होंने आज सुबह लिखकर भेजा-
40 वर्षों में पहली बार कोरोना के एक वर्ष को छोड दें तो जहाँ कटड़ा में यात्रियों की हर जगह भीड़ देती थी, होटल में रूम के लिये कई बार इंतजार करना पड़ता था, रात-दिन सडक़ों पर यात्री बस दिखाई देते थे, आज जब मैं ्रद्बह्म्श्चशह्म्ह्ल से बस पकडऩे रेलवे स्टेशन के पास पहुंचा तो अधिकांश बसें खड़ी थीं। लोग कहने लगे, ट्रेन के आने तक रुकना पड़ेगा। मैं आटो पकडकर बस स्टैण्ड गया, वहाँ भी यात्री की कमी के कारण कम बसों का आवागमन ठप्प था। कुछ देर मुख्य मार्ग में इंतजार करने पर स्टेट ट्रान्सपोर्ट की बस मिली, उसमें भी गिने-चुने यात्री थे।
जहाँ कटड़ा में यात्रा पर्ची के लिए घंटों लाइन में लगना पड़ता था आज वहाँ भी बस स्टैण्ड में भी सन्नाटा था। और तो और जब मैं कटड़ा बस स्टैण्ड में स्थित त्रिदेव होटल जहाँ मैं सालों से यात्रा के दौरान रुकता हूं, जब रूम का मोल-भाव कर रहा था, तो मैनेजर बोला, सर, आपको जो उचित लगे वो किराया देना। रूम दिखाने पर बोला, सर आपको जो अच्छा लगता है वहाँ ठहर जायें, एक रूम छोडक़र। मैंने पूछा ऐसा क्यों वो बोला, उसमें यात्री रुका है 46 रूम में से बाक़ी 45 खाली थे। जबकि हमेशा पहुँचने पर उसको सूचित करना पडता था और पहुँचने पर रूम खाली होने का इंतजार करना पडता था। शायद इसका कारण कुछ दिनों पहले त्रिकुट पर्वत में हुए हादसा हो सकता है समय के साथ फिर से नयी शुरुआत हो जायेगी सब कुछ सामान्य हो जाएगा कल मुझे भी यात्रा शुरू करना है। जय माता दी।
अपने राज्य में तालमेल नहीं, इधर...

प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट भले ही अपने गृहराज्य राजस्थान में पूर्व सीएम अशोक गहलोत के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में वो स्थानीय बड़े नेताओं के बीच समन्वय बेहतर करने की कोशिश में जुटे हैं।
पायलट पिछले दिनों रायगढ़, कोरबा, मुंगेली, और राजनांदगांव के दौरे पर थे। एक जगह टी.एस.सिंहदेव ने गाड़ी ड्राइव की, उसमें पायलट के साथ प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत, और ताम्रध्वज साहू बैठे थे। इन सबके बीच काफी कुछ बातें हुईं। बेमेतरा मार्ग पर तो पायलट ने स्टेयरिंग संभाली, तो पूर्व सीएम भूपेश बघेल, सिंहदेव, डॉ.महंत और दीपक बैज साथ हो लिए। कुल मिलाकर पिछले दिनों रविन्द्र चौबे प्रकरण और फिर बड़े नेताओं के बयानबाजी के चलते जिस तरह पार्टी के भीतर विवाद चल रहा था, उसकी पुनरावृत्ति न हो, इस दिशा में पायलट ने पहल की है। पायलट को इसमें कितनी सफलता मिलती है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। मगर पार्टी के कार्यक्रमों में जिस तरह भीड़ उमड़ी है, उससे वो काफी खुश होकर गए हैं।
बड़ी देर की मेहरबां जाते-जाते!
भ्रष्टाचार के प्रकरणों पर ईओडब्ल्यू-एसीबी, और ईडी एक के बाद एक कार्रवाई कर रही है। इन सबके बीच रायपुर नगर निगम के एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी जयचंद कोसले के यहां ईओडब्ल्यू-एसीबी ने दबिश दी, तो कांग्रेस के एक खेमे में हलचल मच गई।
कोसले, पूर्व सीएम भूपेश बघेल के ऑफिस स्टाफ में हैं। कई लोग उन्हें पिछली सरकार का ‘राजदार’ मानते हैं। वैसे कोसले के यहां क्या कुछ मिला है, यह अभी साफ नहीं हो पाया है।
बताते हैं कि कोसले को पूर्व सीएम की डिप्टी सेक्रेटरी रहीं सौम्या चौरसिया का करीबी माना जाता है। सौम्या, जब रायपुर नगर निगम में उपायुक्त थीं तब जयचंद उनके ऑफिस स्टॉफ में थे। इसके बाद सौम्या के सीएम सचिवालय में डिप्टी सेक्रेटरी बनने के बाद कोसले की भी वहां पोस्टिंग हो गई।
शराब-कोयला घोटाला प्रकरण की ईडी, और ईओडब्ल्यू-एसीबी लंबे समय से जांच कर रही है। मगर कोसले जांच के घेरे में नहीं आए हैं। अब उनके यहां ईओडब्ल्यू-एसीबी ने दबिश दी है, तो कई चौंकाने वाले खुलासे होने की अटकलें लगाई जा रही है। देखना है कि कोसले से पूछताछ में क्या कुछ निकलता है।
टेक्नोलॉजी पर भारी भूत-प्रेत
भिलाई स्मृति नगर चौकी इलाके में एक 20 वर्ष के युवक से 1 लाख 60 हजार रुपए की ठगी की गई। जो यह बताने के लिए काफी है कि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना, पढ़ा लिखा युवा होना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह लोग अंधविश्वास और अवैज्ञानिक दावों के जाल में नहीं फंस सकता। सोशल मीडिया पर मौजूद तथाकथित ‘गुरुमाता’ आईडी ने तंत्र-विद्या और पूजा-पाठ के नाम पर और भूत प्रेत का भय दिखाकर अलग-अलग तरीकों से रकम ऐंठी। वीडियो कॉल के जरिए नकली पूजा दिखाकर और सोने का चूड़ा देने का लालच देकर लगातार राशि की मांग की जाती रही। इन दिनों इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर तंत्र-मंत्र, वशीकरण और प्रेत बाधा दूर करने वाले विज्ञापनों की भरमार है। इन्हें देखकर पढ़े-लिखे और तकनीक से जुड़े युवा भी ठगी का शिकार हो जाते हैं। मोबाइल, इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे अत्याधुनिक उपकरण केवल तभी कारगर हैं, जब उनका इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति तार्किक सोच और विवेक से काम ले। तकनीक का उद्देश्य हमें आगे बढ़ाना है, अंधविश्वास से बाहर निकालना है, लेकिन यह तभी संभव है जब उपयोगकर्ता भी जिज्ञासु हो, प्रश्न करने की आदत विकसित करे।
बीती ताहि बिसार दे...
खेल विभाग में सामग्री की सप्लाई पर काफी विवाद चल रहा है। यह विवाद पहले टंकराम वर्मा के पास था, जो कि अब डिप्टी सीएम अरुण साव के पास आ गया है। बस्तर ओलंपिक से लेकर अलग-अलग कार्यक्रमों के लिए खेल सामग्री की खरीद को लेकर शिकवा-शिकायतें हुई हैं। पिछले दिनों युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने खेल अफसरों का घेराव भी किया था।
बताते हैं कि डिप्टी सीएम अरुण साव खेल विभाग से जुड़ी शिकायतों से अनभिज्ञ रहे हैं। और अब एक-एक कर उड़ती-उड़ती शिकायतें पहुंच रही हैं, तो उन्होंने विभाग के आला अफसरों को हिदायत दे दी है। साव ने कह दिया है कि पहले क्या चलता था, उन्हें इसकी जानकारी नहीं है, लेकिन अब कोई भी शिकायतें आई, तो जांच कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अफसरों को खिलाडिय़ों के हित में काम करने की नसीहत दे रखी है। देखना है कि साव की चेतावनी का क्या असर होता है।
अपने से बड़े साहब को धमकी!
अब तक तो ठेकेदारों के कार्टेल बनाने, टेंडर में भाग न लेने या टेंडर वापस लेने को लेकर एक दूसरे को धमकी देने के मामले देखे सुनने में आते रहे हैं। लेकिन सरकारी विभागों में अफसरों के ऐसे कृत्यों के दृष्टांत बहुत कम ही सुनने में आए हैं। वह भी राज्य और केंद्र सरकार के विभागों के अधिकारियों में। हालांकि विभाग के अफसर इसे धमकी के बजाय आग्रह का नाम दे रहे हैं। प्रदेश में एक विभाग और उसके एक उपक्रम द्वारा बस्तर में भारत नेट के तहत ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क बिछाने का का काम किया जा रहा है। सैकड़ों करोड़ का यह काम अब तक देश की एक विश्वसनीय कंपनी कर रही थी।
पहले भाजपा फिर कांग्रेस और अब फिर भाजपा की राज्य सरकारों के उलझन में फंसकर, या फंसाकर कंपनी को बाहर करवा दिया गया। और सैकड़ों करोड़ की सुरक्षा निधि भी राजसात कर दी गई। इस योजना में हस्तक्षेप कर केंद्रीय संचार विभाग ने यह काम राज्य सरकार के उपक्रम से छीनकर-लेकर बीएसएनएल को दिया। इससे राजकीय उपक्रम के साहबों का कारोबार प्रभावित हो रहा है। इससे नाखुश साहबों ने बीएसएनएल के एक महाप्रबंधक को कॉल कर काम न करने का लिखित रिफ्यूजल देने कहा।
आईटीएस अफसर भला अपने से दशकों जूनियर की इस धमकी-आग्रह को भला कैसे मान लेते। उन्होंने कह दिया कि यहां से संभव नहीं दिल्ली संचार भवन से करवा लाने का सुझाव-जवाब दे दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई, राज्य के अफसर ने महाप्रबंधक को उनकी और अपने सेवाकाल को याद दिलाते हुए भविष्य में काम बिगाडऩे की धमकी दे दी। अब देखना होगा कि जूनियर साहब दिल्ली से रिफ्यूजल ला पाते हैं या नहीं।
सरहद पार से आया है स्वाद...
राजधानी रायपुर में दूसरे प्रदेशों से ट्रैक्टर-ट्रॉली में लादकर सेंधा नमक लाकर बेचा जा रहा है। अब सेंधा नमक, और काला नमक, बैनर तो दोनों का लगा है, और दोनों की बड़ी-बड़ी चट्टानें सरीखी ट्रैक्टर-ट्ऱॉली पर लदी हुई हैं, और उन्हीं के ऊपर मचान बनाकर रह रहा परिवार साथ-साथ चल रहा है। एक ही ट्रैक्टर घर, दुकान, और गोदाम सब खींचकर ले जा रहा है।
बदले हुए माहौल में अब ये मजदूर सरीखे कारोबारी यह चर्चा करना नहीं चाहते कि यह नमक आया कहां से है। फिलहाल जिन लोगों को न पता हो, वे जान लें कि पाकिस्तान से आए हुए सेंधा नमक के बिना हिंदुओ का उपवास का खाना नहीं होता। पाकिस्तान से यह स्वाद अगर न आए तो लोग हिंदु-उपवास का खाना गले नहीं उतार पाएंगे क्योंकि उसमें साधारण और सफेद नमक तो चलता नहीं है। कम से कम जिस एक दिन उपवास में यह नमक खाएं, उस एक दिन तो दुश्मनी की बात नहीं करना चाहिए।
रेत के कारोबार में एआई की एंट्री

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले के पामगढ़ विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक शेषराज हरबंश सिंह का एक कथित ऑडियो पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर तहलका मचा रहा है। इसमें विधायक को महानदी से अवैध रेत खनन करने वालों से कथित रूप से कमीशन मांगते हुए सुना जा सकता है। लाखों के लेनदेन का जिक्र हो रहा है। ऑडियो वायरल होते ही विधायक ने पत्रकार वार्ता कर इसे एआई जनरेटेड फेक ऑडियो करार दिया। उन्होंने कहा कि यह मेरी आवाज की नकल है, जो आधुनिक तकनीक से बनाई गई है। आजकल कुछ भी संभव है।
सवाल उठता है कि क्या यह दावा सही है? अगर हां, तो कैसे साबित होगा? आसानी से नहीं होगा। यह एक तकनीकी जांच का विषय है। लेकिन हम आप भी कुछ बुनियादी संकेतों से शक पैदा कर सकते हैं। आपके पास ऑडियो हो तो दो चार बार ध्यान से सुनें और अपनी राय बना सकते हैं। इसके कुछ सरल तरीके हैं। असली आवाज में उतार-चढ़ाव, हिचकिचाहट या भावनाएं होती हैं। एक ऑडियो में आवाज सपाट या रोबोटिक लग सकती है, जैसे कोई मशीन पढ़ रही हो। सुनकर देखें कि ऑडियो में विधायक की आवाज में सामान्य तनाव या स्थानीय छत्तीसगढ़ी लहजा गायब है, तो आपका शक जायज है। इसी तरह से जब इंसान बोलते समय सांस लेता है या ‘उम्म’ जैसे कुछ फिलर्स का इस्तेमाल करता है। एआई में ये नेचुरल ब्रेकिंग पैटर्न अक्सर गायब होते हैं। असली रिकॉर्डिंग में हल्का शोर हो सकता है। जैसे हवा या फोन की गूंज हो सकती है। एआई में ऑडियो में भी यह डाला जा सकता है पर वह बनावटी लगेगा। इंटरनेट पर कई फ्री टूल्स हैं, जैसे इलेवन लैब, एआई स्पीच क्लासिफियर, एआई वाइस डिटेक्टर। दावा है कि ये साइट्स ऑडियो की असलियत को 90 फीसदी तक परख सकते हैं।
जो एक्सपर्ट्स इस फील्ड में काम कर रहे हैं उनके पास उन्नत तरीके हैं, जो मशीन लर्निंग और फॉरेंसिक एनालिसिस पर आधारित होते हैं। वे ऑडियो को विजुअल वेवफॉर्म में बदलकर देखते हैं। ऑडियो में असमान फ्रीक्वेंसी या साउंड ब्लेंडिंग की खामियों को पहचान लेते हैं। अगर विधायक की असली आवाज के सैंपल से तुलना करें, तो एआई क्लोन में माइक्रो-पॉज या इमोशनल प्रवाह को गायब पाएंगे। विशेषज्ञ विधायक की पुरानी स्पीच के आधार पर वाइस प्रिंट तैयार करेंगे- जिसके लिए फिर कई लर्निंग मॉडल हैं। यदि एआई से तैयार है तो यह भी पता चल सकता है कि किस टूल का इस्तेमाल कर एआई ऑडियो तैयार किया गया।

जांजगीर पुलिस ने मामले को जांच में लिया है। विधायक की शिकायत के आधार पर आवाज की फोरेंसिक जांच कराई जाएगी। इसे हैदराबाद के सीडीएफडी लैब में भेजा जा सकता है। दिल्ली में भी फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में एक लैब है। यहां अब एआई वाइस और वीडियो डिटेक्शन की सुविधा मौजूद हैं। अपने रायपुर स्थित फोरेंसिक लैब में भी इस तरह की जांच एक सीमा तक हो सकती है।
बहरहाल, यदि यह साफ हो जाता है कि ऑडियो एआई जनरेटेड है तो यह छत्तीसगढ़ में पहला मामला होगा, जिसके जरिये किसी राजनीतिक हस्ती को फंसाने की कोशिश की गई। मगर, यदि जांच में पाया जाता है कि ऑडियो वास्तविक है, छेड़छाड़ नहीं है तो यह विधायक शेषराज हरबंश ही नहीं- कांग्रेस के लिए भी बड़ा झटका होगा।
नुमाइश की चाह सोलर से...
अब तक बड़े-बड़े सरकारी, या राजनीतिक ओहदों पर बैठे हुए लोग अपनी गाडिय़ों पर पदनाम की तख्ती लगाते घूमते थे, जिसका मकसद ट्रैफिक पुलिस को डराना रहता था। अब यह मामला नीचे उतरकर मंत्रालय के किसी निज सचिव तक आ गया है। यह भी साफ नहीं है कि निज सचिव किसी अफसर के हैं, या किसी मंत्री के। खैर, जो भी हो, लोगों का अपने ओहदों की नुमाइश का शौक पूरा ही नहीं होता है। जब उनका ओहदा गुजर भी जाता है, और वे भूत बन जाते हैं, तो भी इन्हीं तख्तियों के शुरुआत में इतने बारीक अक्षरों से भूपू लिखवा लेते हैं कि जिसे पढऩे के लिए जौहरी का लेंस लगे। ताकत के मीनाबाजार की चाह जाती ही नहीं है। इसे देखकर मारुति का एक पुराना इश्तेहार याद आता है जिसमें एक छोटा बच्चा खिलौने की अपनी छोटी कार को मोटे-तगड़े लेटे हुए बाप के बदन पर दौड़ाते रहता है, और बाप के डांटने पर कहता है कि पेट्रोल खतम ही नइ होंदा है।
ताकत की नुमाइश की चाह सोलर से चलती है, उसमें पेट्रोल भी नहीं डलाना पड़ता।
पश्चिम से मनोज कुमार जैसा परहेज!

छत्तीसगढ़ के व्यापारी संगठन चेंबर ऑफ कॉमर्स के महिला विंग की मीटिंग का एक न्यौता बवाल बन गया। इसकी अध्यक्ष प्रदेश की एक प्रमुख मानसिक परामर्शदाता डॉ. इला गुप्ता हैं। उन्होंने अपनी महिला सदस्यों को जो न्यौता भेजा, उसमें एक कार्यक्रम में आने के लिए लिखा कि उसका ड्रेस कोड पश्चिमी पोशाक रहेगा, और महिलाएं अच्छे ग्लैमरस मेकअप में आएं, और यह भी दिखा सकें कि वे कैसी स्मार्ट, इंटेलिजेंट, और सेक्सी हैं।
चेंबर का यह महिला विंग सिर्फ बालिग और कामकाजी महिलाओं का है। इला गुप्ता का इसी मीटिंग के बाद जन्मदिन समारोह भी था। उन्होंने विवाद खड़ा होने पर माफी मांगते हुए यह सफाई दी है कि जन्मदिन की पार्टी के हिसाब से उन्होंने मजाक में ये बातें लिखी थीं, जो कि सिर्फ महिला सदस्यों के लिए आपसी संदेश था।
हिंदुस्तान की यह एक बड़ी दिक्कत है कि मर्द गोवा चले जाएं, थाईलैंड जाकर आ जाएं, वह सब जायज है, लेकिन महिलाएं अगर अपनी आपसी पार्टी में भी अगर बन-ठनकर पहुंचें, तो इससे मर्दानगी के अहंकार को चोट लग जाती है। अब ऐसे में माफीनामे से कम में भला मरहम-पट्टी कैसे होगी।
लेकिन हैरानी यह है कि राज्य महिला आयोग भी इस आंतरिक और निजी न्यौते पर कोड़े बरसाने के लिए कूद पड़ा है, और तो और, महिला आयोग को पश्चिमी पोशाक पर भी आपत्ति हो गई है। अब तमाम पश्चिमी चीजों का बहिष्कार करने कहा जाएगा, तो सब लोगों को बड़ी दिक्कत और असुविधा हो जाएगी, इनकी लिस्ट गिनाना ठीक नहीं है, वरना अगला निशाना इस कॉलम पर लगेगा।
सीएस पर निशाना जारी

भूपेश सरकार के आबकारी घोटाले की परतें खुल रही हैं। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने गुरुवार को तत्कालीन आबकारी सचिव निरंजन दास को गिरफ्तार किया। दास की गिरफ्तारी पर भाजपा नेता, और अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता ने खुशी जताई है। गुप्ता घोटाले में संलिप्त लोगों की गिरफ्तारी को लेकर काफी मुखर रहे हैं, और इस सिलसिले में पीएमओ को भी पत्र लिखा था।
गुप्ता ने फेसबुक पर लिखा कि अब जांच कर छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कार्पोरेशन लिमिटेड की तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी को गिरफ्तार करने की बारी है। उन्होंने छत्तीसगढ़ मार्केटिंग कार्पोरेशन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला, और लिखा कि छत्तीसगढ़ राज्य विपणन लिमिटेड पीने योग्य शराब का प्रबंधन करता है। पीने योग्य शराब एक उपभोग वस्तु है जिसमें पीने योग्य अल्कोहल या अन्य रसायन होते हैं। कार्पोरेशन की भूमिका छत्तीसगढ़ में उपभोक्ताओं को सभी प्रकार की शराब, बीयर और वाइन की खुदरा बिक्री करना है। किसी भी वस्तु की अनुपलब्धता संबंधी निर्माता द्वारा छत्तीसगढ़ में उस वस्तु को न बेचने का निर्णय छत्तीसगढ़ में कोई वस्तु जिस कीमत पर उपलब्ध है ( किसी अन्य जगह की तुलना में) वह निर्माता और राज्य उत्पाद शुल्क कानूनों द्वारा मूल्य निर्धारण को नियंत्रित करने वाले कारकों के कारण हैं।
सीएसएमसीएल शराब की खरीद की भूमिका निभाती है, और शराब की गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करने, और उन्हें उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त कदम उठाती है। कार्पोरेशन के माध्यम से लाई गई शराब में बोतल के ढक्कन पर होलोग्राफिक स्टीकर चिपकाए जाते हैं। कार्पोरेशन की गतिविधि पूरी तरह छत्तीसगढ़ उत्पाद शुल्क कानूनों और उसमें बनाए गए नियमों के अनुसार पीने का निर्णय लेते समय उपभोक्ता को अपनी स्वास्थ्य स्थिति जाननी होगी। शराब किसी भी अन्य उपभोग वस्तु की तरह स्वतंत्र रूप से विपणन योग्य वस्तु नहीं है बल्कि इसे केवल लाइसेंस के माध्यम से ही बेचा जा सकता है। इस दृष्टि से एक संदेश यह भी है कि उपभोक्ता को शराब पीते समय अपने स्वास्थ्य की भी जांच करनी होगी।
बिना शोरगुल शुरू हो गया एसआईआर
भारत निर्वाचन आयोग की घोषणा के मुताबिक बिहार के बाद अब छत्तीसगढ़ सहित देश के अन्य राज्यों में भी मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण का काम शुरू हो गया है। बिहार में वहां की विधानसभा चुनाव के कुछ माह पहले ही यह प्रक्रिया शुरू की गई। कम समय और दस्तावेजों की कमी को लेकर यह प्रक्रिया काफी विवादित हो गई, जबकि मतदाता सूची को अपडेट करना एक नियमित प्रक्रिया है। बिहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद यह साफ हो गया है आधार कार्ड को भी एक पहचान पत्र के तौर पर वैध दस्तावेज के रूप में मान्य किया जाएगा, भले ही यह नागरिकता का आधार हो या नहीं। पिछले तीन चार दिनों से छत्तीसगढ़ में जिलों के कलेक्टर बैठके ले रहे हैं। कुछ जिलों में एसआईआर की प्रक्रिया समझाने के लिए राजनीतिक दलों के साथ चर्चा भी की जा चुकी है, जो धीरे-धीरे बाकी जिलों में भी होगी। एसडीएम मतदाता सूची में नाम जोडऩे, हटाने और सुधारने की प्रक्रिया पर नजर रखेंगे और तहसीलदार, मातहत बीएलओ के जरिये मतदाता सूची से नामों की छंटनी करेंगे। अभी दफ्तर में ही बैठकर सरसरी तौर पर मतदाता सूचियों के अध्ययन का काम चल रहा है। बाद में बीएलए ( यानि राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों) की मदद से सर्वे का काम शुरू किया जाएगा। ऐसे मतदाताओं के नाम हटाए जाएंगे जो स्थायी रूप से बाहर जा चुके हैं, जैसे वे महिलाएं जिनकी शादी हो चुकी और अब यहां नहीं रहते। जो जीवित नहीं हैं, उनके नाम भी कटेंगे। दो जगह नाम दर्ज हो तब भी कटेगा। पिछला एसआईआर सन् 2002 में हुआ था। इसलिये 2003 की मतदाता सूची में जिन लोगों का नाम है, यदि 2025 की सूची में भी है तो उन्हें कोई दस्तावेज देने की जरूरत नहीं होगी, मगर उस पुरानी सूची में नाम नहीं है और 2025 की सूची में शामिल है, तो उन्हें अपने माता-पिता के दस्तावेज देने होंगे। 1987 के बाद जन्म लेने वाले मतदाताओं को भी दस्तावेज देने होंगे। इनमें मतदाता परिचय पत्र, आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र आदि शामिल होंगे। मतदाता सूची में सुधार के लिए छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में काफी वक्त है। इस सूची के आधार पर तीन साल तक कोई चुनाव नहीं होने वाला है। बहरहाल, शहर से लेकर गांवों तक एसआईआर की हलचल शुरू हो गई है। राजस्व और शिक्षा विभाग के नियमित कामकाज पर असर भी दिखने लगा है। आम लोगों को दफ्तर पहुंचने पर बताया जा रहा है कि तहसीलदार, पटवारी एसआईआर के काम में व्यस्त हैं।
दिल के अरमां आसुओं में बह गए...
योगी के यूपी में वाराणसी से अभी एक ऐसा वीडियो सामने आया जिसमें अदालत परिसर में वकीलों की पिटाई से लहूलुहान पुलिस दारोगा को देखकर पुलिस कमिश्नर की आंखें भर आईं, और उन्होंने कहा कि सीसीटीवी से सबकी पहचान हो गई है, और किसी भी हमलावर को बख्शा नहीं जाएगा। ऐसा कहीं-कहीं पर होता है जब वकील एकमुश्त किसी पर टूट पड़ते हैं तो वे मुजरिम को भी पीट देते हैं, और पुलिस को भी। लेकिन पुलिस कमिश्नर के इस डबडबाए हुए वीडियो के नीचे लोगों ने जो टिप्पणियां लिखी हैं, वे देखने लायक हैं।
एक ने लिखा है कि आपको अंदाज नहीं है कि वकीलों ने जिस तरह पुलिस को पीटा है, उससे कितने गरीबों का दिल ठंडा हुआ होगा क्योंकि पुलिस लोगों का दिल दुखाती रहती है। एक दूसरे ने लिखा है आज आप आंसू बहा रहे हैं, लेकिन आपकी पुलिस ने विनय तिवारी को जेल में पीट-पीटकर मार डाला था तब आंसू नहीं निकले, कभी पुलिस आर्मी के जवानों को पीटती है, कभी वकीलों को, और कभी किसानों को।
सीआरपीएफ के एक जवान ने लिखा है कि उसे पुलिस चौकी में चौकी प्रभारी के सामने कुछ लोगों ने डराया-धमकाया और दारोगा जी मुस्कुरा रहे थे। सबसे ज्यादा भ्रष्ट पुलिस हो गई हो जो मनमानी करती है, दबंगों का साथ देती है, और कमजोर गरीबों को परेशान करती है।
एक अन्य ने लिखा है- पुलिस विद्यार्थियों को जब लहूलुहान करती है तब दिल नहीं पिघलता? अगले ने लिखा है- वकील कभी गलत नहीं करते, और वकीलों से ही पुलिस काबू में है वरना यूपी में जंगलराज कायम करने में पुलिस की भूमिका सबसे बड़ी है।
एक ने लिखा- तुम लोग सिर्फ आम जनता पर फर्जी मुकदमा दर्ज करने में अपनी वर्दी का इस्तेमाल करते हो। जब खुद जूता-लात खाते हो तो भावुक हो जाते हो। और जब दूसरों को प्रताडि़त करते हो तो मेडल पाते हो, तुमको सिर्फ वकील ही सही कर सकते हैं। नीचे पोस्ट की गई दर्जनों प्रतिक्रियाओं में शायद एक भी पुलिस के पक्ष में नहीं थी, और पूरी पोस्ट, जो कि पुलिस कमिश्नर के आंसुओं से भीगी हुई थी, वह बर्बाद हो गई।
एनटीपीसी में लगातार उजागर होते घोटाले

रायगढ़ में एनटीपीसी के डिप्टी जीएम विजय दुबे को एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम ने 4.5 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया। मामला जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास मुआवजे से जुड़ा था। शिकायतकर्ता पिता और बेटों को अधिग्रहित जमीन का मुआवजा मिल चुका था, लेकिन पुनर्वास योजना के 30 लाख रिलीज करने के लिए घूस मांगी गई। इसका एक हिस्सा पहले ही दिया जा चुका था, शेष राशि लेते वक्त अफसर पकड़ा गया।
यह घटना एनटीपीसी लारा परियोजना में हुए बड़े घोटाले की याद ताजा करती है। परियोजना के लिए 9 गांवों से जमीन अधिग्रहित की गई थी। शुरू में खातेदारों की संख्या केवल 500 थी, लेकिन परियोजना शुरू होते ही यह संख्या बढक़र 2000 हो गई। राजस्व अफसरों ने छोटे-छोटे टुकड़ों में जमीन बांट दी, क्योंकि प्रत्येक खाते पर 5 लाख मुआवजा मिलना था। नतीजतन, एनटीपीसी को अरबों रुपये अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा।
मामले की तत्कालीन कमिश्नर और कलेक्टर ने जांच कराई तथा मोटी फाइल तैयार हुई। इस जांच में डिप्टी कलेक्टर तीर्थराज अग्रवाल पर सबसे अधिक संदेह था, लेकिन कुछ माह पहले उन्हें क्लीन चिट देकर फाइल बंद कर दी गई। सामान्य प्रशासन विभाग इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचा, यह आज तक स्पष्ट नहीं है। इधर, प्रभावित परिवार पुनर्वास नीति का लाभ पाने के लिए एनटीपीसी अफसरों को रिश्वत देने को मजबूर हैं।
एनटीपीसी रायगढ़ में दूसरे घोटाले भी हो रहे हैं। हाल ही में फ्लाई ऐश ट्रांसपोर्ट घोटाला सामने आया। यहां से निकली फ्लाई ऐश की गाडिय़ां भारतमाला परियोजना के लिए अभनपुर ले जाने के बजाय रायगढ़ के पास के खाली प्लॉट में डंप करती पाई गईं। जांच में खुलासा हुआ कि जीपीएस ट्रैकर हैक कर वाहनों को नजदीक ही डंप कराया जाता है और पूरा भाड़ा वसूला जाता है। यह सब एनटीपीसी अफसरों की जानकारी में होने का आरोप है।
इन सबने रायगढ़ की पहले से प्रदूषित हवा को और जहरीला बना दिया है। यहां के अधिवक्ताओं ने न केवल जिलाधीश बल्कि जिला जज से भी कार्रवाई की मांग की है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जब सोशल मीडिया पर इस मामले को उठाया तो उन्हें फोन पर ट्रांसपोर्टरों से धमकी मिली। पुलिस ने इस पर एक कारोबारी के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की। केंद्रीय उपक्रम हर साल सतर्कता सप्ताह मनाते हैं। संकल्प लेते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस रखेंगे। लोगों की राय भी आम तौर पर यही है कि राज्य सरकार के दफ्तरों के मुकाबले केंद्रीय संस्थानों में भ्रष्टाचार के खिलाफ रुख कड़ा होता है, पर एनटीपीसी के भ्रष्टाचार से जुड़े मामले चर्चाओं में लगातार है।
बृजमोहन, और बाकी की भी अनदेखी
रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक, और नगर निगम में भाजपा के पार्षद खफा हैं। इसकी वजह यह है कि पीएम नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के मौके पर बुधवार को लोक कल्याण उत्सव आयोजित किया गया था। कार्यक्रम रायपुर के मेडिकल कॉलेज के सभागार में हुआ। कार्यक्रम में सीएम विष्णुदेव साय, डिप्टी सीएम अरुण साव, और रायपुर के चारों विधायक थे। मगर कार्यक्रम के होर्डिंग्स में सांसद, मेयर, और विधायकों की तस्वीर नहीं थी। इस पर पार्षदों ने आपत्ति जताई है।
कार्यक्रम में सीएम ने सभी को स्वच्छता की शपथ दिलाई। साथ ही डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन वाहनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। भाजपा के पार्षद इस बात से खफा थे कि सांसद बृजमोहन अग्रवाल, और मेयर तक की तस्वीर नहीं लगी है। एक-दो पार्षदों ने तो मेयर से पूछ लिया कि निगम के कार्यक्रम में आपकी तस्वीर क्यों नहीं है? एक जोन अध्यक्ष ने तो कई जगहों पर आपत्ति दर्ज कराई है।
जोन अध्यक्ष का तर्क था कि पिछली सरकार में रायपुर नगर निगम के कार्यक्रम में सांसद,और विधायकों की तस्वीर जरूर होती थी। तब निगम में कांग्रेस काबिज थी। बावजूद इसके भाजपा सांसद सुनील सोनी का प्रमुख कार्यक्रमों में आमंत्रण के साथ-साथ उनकी तस्वीर रहती थी। सरकार बदलते ही कई जगहों पर प्रोटोकॉल को अनदेखा करने की बात सामने आ रही है। इससे पहले भी राजभवन में शिक्षक दिवस के मौके पर सम्मान समारोह में सांसद, और विधायकों को एक तरह से नजर अंदाज कर दिया गया था। सांसद-विधायक कार्यक्रम में नहीं गए थे। अब फिर उसी तरह की चूक सामने आई है। इससे भाजपा के अंदरखाने में शिकवा शिकायतें चल रही हैं।
अफसर जोड़े आगे बढ़ते
सब कुछ सामान्य रहा तो इस माह या अक्टूबर में छत्तीसगढ़ के दो अफसर केंद्र में सचिव बनेंगे। डीओपीटी ने 1995 बैच से देश भर के 30 आईएएस अफसरों को इंपैनल कर लिया है। जो केंद्रीय विभागों के सचिव बनाए जाएंगे। हालांकि इनमें से 20 अफसर अभी भी सचिव के समकक्ष पदों पर कार्यरत हैं। इस बैच से छत्तीसगढ़ कैडर की श्रीमती डॉ. मनिंदर कौर द्विवेदी और गौरव द्विवेदी शामिल हैं। ये दोनों भी सचिव स्तर के पदों पर हैं।
गौरव प्रसार भारती में 2022 से सीईओ, और मनिंदर कौर जुलाई 23 से राष्ट्रीय बीज निगम (एनएससी) की वर्तमान अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक हैं। गौरव ने प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी ऑनलाइन नागरिक मंच, माय गव इंडिया शुरू किया था जो सफलता से चल रहा है। छत्तीसगढ़ की ऑनलाइन पीडीएस सिस्टम को भी गौरव ने डिजाइन किया था। वे दोनों कुल मिलाकर 15-17 वर्षों से केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत रहे हैं।
वैसे इनके अलावा छत्तीसगढ़ के दो और आईएएस अमित अग्रवाल आधार कार्ड बनाने वाले प्राधिकरण के सीईओ, और निधि छिब्बर नीति आयोग में डायरेक्टर हैं। उनके पति विकासशील भी एडीबी में ईडी पद पर कार्य करने के बाद हाल में वापसी के लिए रिलीव हो चुके हैं।
असली माल नहीं दिखता...
आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन पर बहुत से लोगों ने सडक़ों पर झाडू लगाते हुए अपने फोटो-वीडियो सोशल मीडिया पर डाले हैं। इन्हें देखकर कुछ लोगों ने आज ही सुबह इन्हीं शहरों में चारों तरफ बिखरीं गंदगी की खींची गईं तस्वीरें भेजीं, और लिखा कि सफाई करने की इतनी हसरत थी, तो सचमुच ही जहां गंदगी थी, वहां जाना था, और बिना कैमरे जाना था। सुबह से शाम हो जाती, तब भी गंदगी साफ नहीं हुई रहती, और झाडू से तो बिल्कुल ही नहीं हुई रहती। उसके लिए रांपा, घमेला, और ट्रक लगे होते। ऐसी जगहें हर शहर में दर्जनों हैं, लेकिन ‘वीडियो-सफाईकर्मियों’ को वे नहीं दिखतीं।
पुत्र में पिता की झलक
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प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट मंगलवार को ओडिशा होते रायगढ़ में वोट चोर, गद्दी छोड़ कार्यक्रम में शरीक होने पहुंचे, तो उनका जोरदार स्वागत किया गया। इस मौके पर मंच से ही पायलट ने पूर्व मंत्री उमेश पटेल की जमकर तारीफों के पुल बांधे।
उन्होंने कहा कि वो पिछले दो साल से उमेश पटेल के काम देख रहे हैं। उनमें मुझे दिवंगत नंदकुमार पटेल की झलक दिखाई दे रही है। सचिन पायलट की टिप्पणी पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उमेश पटेल जिंदाबाद के नारे लगाए। पायलट ने कार्यकर्ताओं को शांत रहने का इशारा करते हुए आगे कहा कि जब तक सोना तपता नहीं है तब तक खरा नहीं बनता है।
उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि आपने, और इलाके के लोगों ने उतार-चढ़ाव के बाद भी इस मुकाम पर लेकर आए हैं, जो इनको (उमेश) और बाकी नेताओं को ताकत देंगे कि सभी आगे बढ़ सकें। उमेश ने हाथ जोडक़र कार्यकर्ताओं का अभिवादन स्वीकार किया। इस मौके पर मंच पर नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, और प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज भी थे। सचिन पायलट की खुले मंच से उमेश पटेल की तारीफों को लेकर कांग्रेस में काफी हलचल है।
ऊँट पहाड़ के नीचे

रायपुर की कोतवाली थाने के समीप भाजपा के प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय की खड़ी इनोवा कार में किसी ने गमला फेंककर क्षतिग्रस्त कर दिया। पवन साय अपने दांत का इलाज कराने डेंटल क्लीनिक गए हुए थे। साय की गाड़ी को क्षतिग्रस्त होने की जानकारी मिलने पर पुलिस तुरंत हरकत में आई, और प्रकरण दर्ज कर लिया। इस मामले में एक पुलिसकर्मी सस्पेंड भी कर दिया गया है।
पुलिस महकमा कार में तोडफ़ोड़ की घटना की जांच में जुटी, तो कई चौकाने वाली जानकारी सामने आई। बताते हैं कि कार एक पुलिसकर्मी के घर के सामने खड़ी थी। पुलिस कर्मी, और उसके परिवार के लोगों को इस बात की आपत्ति रही है कि उनके घर के बाहर गाड़ी पार्क कर दी जाती है। इससे पहले भी कई गाड़ी पर पत्थर फेंका जा चुका है।
थाने में पहले भी शिकायत हुई थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। वजह यह है कि पुलिसकर्मी ही खुद घटना में शामिल रहा है। अब जब भाजपा के ताकतवर नेता की गाड़ी क्षतिग्रस्त हुई है, तो न सिर्फ पुलिसकर्मी पर कार्रवाई हो रही है बल्कि कुछ और अफसरों पर भी गाज गिर सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
राखी की मौत के बाद सफीर की इंसानियत

तिरुवनंतपुरम के एक पंचायत वार्ड सदस्य टी. सफीर ने मानवता की ऐसी मिसाल पेश की है, जो धर्म और जाति की सीमाओं को लांघकर इंसानियत की ताकत से पहचान कराती है। घटना का संबंध छत्तीसगढ़ से है।
44 साल की राखी नाम की एक महिला छत्तीसगढ़ की मूल निवासी थी। वह मानसिक रूप से बीमार थी। वहां एक चैरिटेबल अस्पताल में इलाज होने के बाद तिरुवनंतपुरम जिले के ही मीनामकुलम के बेनेडिक्ट मेनी नाम की एक संस्था द्वारा चलाए जाने वाले पुनर्वास केंद्र में रह रही थी। वहां पता चला कि उसे स्तन और यकृत का कैंसर है, वह चौथे स्टेज का। बीते 12 सितंबर को राखी की तबीयत बिगड़ गई और उसे पुथेनथोप नाम के गांव में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। डॉक्टरों ने कुछ ही देर बाद उसे मृत घोषित कर दिया।
मौत से पहले राखी ने अपनी अंतिम इच्छा जताई थी कि उसका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से किया जाए। पता नहीं, वह छत्तीसगढ़ से केरल इलाज के लिए कैसे पहुंची थी, वहां उसका कोई अपना नहीं था। पुनर्वास केंद्र में नियमित आने-जाने वाले गांव के पंच टी. सफीर को उसकी मौत और अंतिम इच्छा के बारे में पता चला। अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए सफीर ने न केवल उनके अंतिम संस्कार को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार पूरा कराया, बल्कि उनकी अस्थियों को वर्कला के पापनासम समुद्र तट पर ले जाकर विसर्जित किया। सफीर के लिए पहला मौका नहीं था; वे पहले भी तीन अन्य लोगों के अंतिम संस्कार हिंदू परंपराओं के अनुसार करा चुके हैं। सफीर स्वयं इस्लाम को मानते हैं। वे कहते हैं कि परित्यक्त और असहाय लोगों के लिए थोड़ा आगे बढक़र वे अपने बच्चों को दया और करुणा के मूल्यों से परिचित कराते हैं। वे चाहते हैं कि मानवता की शिक्षा अगली पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए।
कुछ दाग-धब्बे बने रहते हैं
प्रदेश के 13 आईएफएस अफसरों के तबादले किए गए। इनमें आईएफएस के 2003 बैच के अफसर राजेश चंदेले की फील्ड में पोस्टिंग की गई है। उन्हें कांकेर सीसीएफ बनाया गया है। चंदेले स्वीमिंग पूल विवाद पर जांच के घेरे में आए थे। हालांकि बाद में उन्हें क्लीन चिट मिल गई, और प्रमोट भी हो गए।
मामला दस साल पुराना है, तब चंदेले दंतेवाड़ा में डीएफओ थे। मीडिया में यह बात सामने आई थी कि डीएमएफ की राशि से डीएफओ बंगले में 70 लाख खर्च कर स्वीमिंग पूल का निर्माण किया गया। इसके बाद चंदेले को हटा दिया गया, और मामले की जांच के लिए वन विभाग ने कमेटी बनाई।
जांच में यह बात सामने आई कि स्वीमिंग पूल निर्माण स्थल, कलेक्टर-डीएफओ बंगलों का कॉमन लैंड है। वन विभाग की जांच में यह कहा गया कि स्वीमिंग पूल के निर्माण में विभागीय मद का उपयोग नहीं किया गया है, बल्कि डीएमएफ की राशि, और ठेकेदारों का सहयोग लेकर किया गया। डीएमएफ कमेटी के चेयरमैन कलेक्टर होते हैं, और कलेक्टर की अनुशंसा पर ही स्वीमिंग पूल के लिए राशि जारी की गई थी।
साफ था कि कलेक्टर, और अन्य अफसरों ने अपने लिए स्वीमिंग पूल का निर्माण कराया था। ये अलग बात है कि कलेक्टर जांच के घेरे में नहीं आए, और अहम पोस्टिंग पाते रहे। अब वो केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर चले गए हैं। मगर विभाग से क्लीन चिट मिलने के बाद चंदेले पर अब भी स्वीमिंग पूल का दाग निकल नहीं पाया है।
कॉलेज में स्ट्रेस रिलीज बोतलें

नशे की पार्टियां अब क्लब, होटल, बार-रेस्टोरेंट, फार्म हाउस की रंगीन रातों से बाहर निकल गई हैं। अब ये पार्टियां राजधानी के कालेजों में पहुंच गई हैं। वह भी कॉलेजों में। पांच से छह कालखंड की कथित पढ़ाई का स्ट्रेस दूर करने छात्र घर जाने से पहले क्लास रूम या कालेज की छत पर शराबखोरी कर रहे हैं। इसे स्ट्रेस रिलीज पार्टी का नाम देकर बोतलें खोली जा रही हैं। इसमें छात्रों के साथ छात्राएं भी हिस्सेदार हो रही हैं।
यह मामला कल तब खुला जब शहर के बीच के एक कॉलेज में नशे की हालत में छात्रों में जूतमपैजार हुई। होश वालों ने यह बात कालेज में तो पता नहीं चलने दिया लेकिन बात थाने तक पहुंच गई। यह बात हमें पुलिस वालों ने ही बताई यह कहते हुए कि आजकल बच्चों को क्या हो गया है? स्कूल कालेज में प्रिंसिपल, शिक्षकों से भी बेखौफ हो गए हैं।
सही भी है क्योंकि प्राचार्यों या अधिष्ठाता का पूरे परिसर में होने वाला चेकिंग राउंड का न होना, छुट्टी के बाद सूने क्लास रूम और छतों की जांच न करना, सब कुछ बंद हो गए हैं। छोटी सी किसी बात पर किसी छात्र-छात्रा को कुछ कह दिया तो एनएसयूआई, एबीवीपी की गुट राजनीतिक नारेबाजी पर उतर आते हैं। नैतिकता सिखाने से बेहतर है प्राचार्य, प्राध्यापक क्लास लेकर घर जाएं।
छात्राओं की आवाज अनसुनी क्यों?

स्कूलों और शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं, ऐसा दावा शिक्षा विभाग का है, मगर जिस तरह से फैसले लिए गए हैं- उससे पता चलता है कि विभाग ने स्कूलों की संख्या घटाने के लिए पहले से ही मन बना लिया था। इसका एक उदाहरण गरियाबंद जिले के फिंगेश्वर के मामले से समझा जा सकता है। यहां के एक गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल को इस प्रक्रिया के चलते ब्वायज स्कूल में मर्ज कर दिया गया है। कहा तो यह जा रहा है कि जिन शालाओं में दाखिला कम है, उनमें युक्तियुक्तकरण किया जा रहा है लेकिन इस स्कूल में 425 छात्राएं पढ़ रही हैं। उनको अब उस स्कूल में जाने के लिए कहा जा रहा है जहां लडक़े पढ़ते हैं। वहां लडक़ों की संख्या 225 ही है। यानि लगभग दो गुनी दर्ज संख्या वाले स्कूल को बंद कर वहां की छात्राओं को छात्रों के साथ पढ़ाई करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। शिक्षा विभाग के अधिकारी सह-शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कहकर इस फैसले को सही ठहरा रहे हैं लेकिन यहां छात्राओं की बात समझने की जरूरत है। वे कहते हैं कि हमें उनके साथ पढऩे में असुविधा होगी। हमें छात्रों के शरारतों, उपद्रवों का सामना करना पड़ेगा। कन्या शाला में हम काफी सहजता के साथ पढ़ाई कर लेते हैं, नई जगह पर, नए माहौल मे पढऩे के हमें क्यों बाध्य किया जा रहा है, जबकि छात्राओं की दर्ज संख्या पर्याप्त है। इस मुद्दे के विरोध में छात्राएं अपने अभिभावकों के साथ कलेक्टर से मिलने के लिए गरियाबंद पहुंच गईं। मगर, उन्हें निराशा हुई जब कलेक्टर उनसे मिले बिना ही दफ्तर से बाहर निकल गए। इससे नाराज छात्राओं ने फिंगेश्वर-महासमुंद मार्ग पर चक्काजाम भी कर दिया। यूनिफॉर्म में ही सडक़ पर बैठ गईं। मगर यह आंदोलन कितनी देर चल पाता, सब वापस लौट गए। पर नाराजगी अभी दूर नहीं हुई है। युक्तियुक्तकरण के फैसले के खिलाफ भी और कलेक्टर के रवैये को लेकर भी। शिक्षा विभाग जब दो स्कूलों को एक साथ मर्ज कर देता है तो दोनों के लिए अलग-अलग शिक्षकों की मांग नहीं रहेगी। शायद इसी मंशा से छात्राओं की दर्ज संख्या और उनकी भावनाओं और चिंता का ध्यान रखे बिना युक्तियुक्तकरण कर दिया गया। जब बेटियों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने की बात पर जोर दिया जाता है तो फिर ऐसे फैसले क्यों लिए जा रहे हैं?
प्लेन तो ले आए थे, मुसाफिर कहां से?

कुछ महीने पहले अंबिकापुर से विमानसेवा शुरू होने पर स्थानीय कारोबारियों, और नेताओं ने खुशियां मनाई थी। केन्द्र सरकार की ‘उड़ान’ योजना के जरिए अंबिकापुर-बिलासपुर, और रायपुर के लिए पिछले साल दिसंबर में निजी कंपनी फ्लाई बिग ने विमान सेवा शुरू की थी। मगर चार महीने बाद भी विमानसेवा पर ब्रेक लग गया। हाल यह है कि पिछले दो महीने से विमानसेवा पूरी तरह बंद हो गया।
विमानसेवा बंद होने के पीछे विमानन कंपनी फ्लाई बिग प्रबंधन का तर्क है कि अंबिकापुर-बिलासपुर के लिए पैसेंजर पर्याप्त संख्या में नहीं मिल पा रहे थे। इस वजह से विमानसेवा बंद करनी पड़ी। स्थानीय लोगों की मांग रही है कि रायपुर-अंबिकापुर-बनारस के लिए विमानसेवा शुरू की जानी चाहिए।
वजह यह है कि अंबिकापुर से बनारस आने जाने वालों की संख्या काफी ज्यादा है। मगर बिलासपुर, और फिर रायपुर तक विमानसेवा शुरू की गई थी, जो कि फायदेमंद नहीं हो सकती थी। स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने रूट बदलने की मांग कर रहे हैं ताकि विमान सेवा शुरू हो सके। लेकिन फिलहाल इसके आसार कम दिख रहे हैं। इससे परे रायपुर-जगदलपुर, और हैदराबाद विमानसेवा सफलतापूर्वक चल रही है।
विधायक क्या चीज है?
रायपुर के बड़े जमीन कारोबारी बसंत अग्रवाल का एक वीडियो वायरल हो रहा है। जिसमें वो खुले तौर पर ये कह रहे हैं कि विधायक भी उनके आगे कही नहीं लगते हैं। बसंत भाजपा से जुड़े हैं, और रायपुर जिले में सबसे ज्यादा 15 हजार सदस्य बनवाए हैं।
वो धार्मिक आयोजनों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। उन्होंने गुढिय़ारी में पंडित प्रदीप मिश्रा के शिवमहापुराण कथा का आयोजन कराया था जिसमें लाखों की संख्या में जुटे थे। इसी तरह कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर दही हांडी प्रतियोगिता का आयोजन कराया था जिसमें सीएम, और अन्य विशिष्ट लोग मौजूद थे।
बसंत अग्रवाल, बागेश्वर धाम के महाराज धीरेन्द्र शास्त्री का कार्यक्रम कराने जा रहे हैं। इस मौके पर वो प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कह रहे हैं कि बिना भगवा चोला पहने बसंत अग्रवाल धर्म का वो काम कर रहे हैं, जो कोई और नहीं कर रहा है। विधायक भी उनके सामने कहीं नहीं लगते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि बसंत अग्रवाल की स्थानीय विधायक राजेश मूणत से छत्तीस का आंकड़ा है। वो धार्मिक आयोजनों के बहाने मूणत को चुनौती देते नजर आते हैं। बसंत अपने कारोबारी विवाद को लेकर चर्चा में रहे हैं। उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत भी हुई थी। उनके परिजनों की कंपनी के अवैध प्लाटिंग पर जिला प्रशासन ने सख्ती से कार्रवाई की थी। एक गिराई गई कॉलोनी का तो नाम ही बसंत विहार है। अब मूणत का नाम लिए बिना जिस अंदाज में चुनौती दी है उससे भाजपा और मूणत समर्थकों में नाराजगी देखी जा रही है। अब पार्टी क्या करती है यह देखना है।
एक चुनाव प्रचार जारी
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संसद से लेकर पंचायत तक के चुनावों की तडक़ भडक़ का असर जन संगठनों के चुनावों पर भी देखा जाता है। मतदाताओं को रिझाने और वोट के लिए बार होटलों में वीकेंड पार्टी आम हो चले हैं। ऐसे माहौल में मंत्रालय कर्मचारी संघ के चुनाव बिना किसी खर्च पानी के होने जा रहे हैं। पूछो तो कहते हैं चार वर्ष डीए का एरियर्स नहीं मिला, नए वेतन आयोग का पता नहीं, इंक्रीमेंट लगा नहीं..नहाएं क्या, निचोड़े क्या?
ऐसी हालत में महानदी भवन के गेट पर रोजाना सभी 27 प्रत्याशी हाथ जोड़े खड़े हो कर और वाट्सएप पर मैसेज कर वोट मांग रहे हैं। तो कुछ प्रत्याशी अपने चुनाव चिन्ह हाथों में लिए घूमते देखे जा सकते हैं। मंत्रालय की पुराने शहर के मीडिया से दूरी की वजह से भी चुनाव में वो हाइप नहीं बन पाया है और दो दिन बाद मतदान के साथ नतीजे भी घोषित कर दिए जाएंगे। बहरहाल इन त्रिवार्षिक चुनाव में घमासान प्रचार अभियान जारी है। सभी पदों पर बहुकोणीय मुकाबला है। कुछ प्रत्याशी अपनी उपलब्धियों का पांपलेट बांट रहे हैं तो नए लोग वादे कर रहे हैं।
इस चुनाव में तीन पैनल हमर संगवारी, नव जागृत और समाधान पैनल और एक स्वतंत्र पैनल से नए पुराने प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इस चुनाव के लिए 772 मतदाताओं में से 193 वोट 4 प्रत्याशी में से जिस किसी ने भी पाया वो अध्यक्ष होगा।
मध्यप्रदेश से फिर बाघ लाने की तैयारी मगर...

ताजा सर्वे के मुताबिक छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या 2022 में 17 थी, जो अप्रैल 2025 में बढक़र 35 तक पहुंच गई है। इनमें सबसे अधिक 18 बाघ अब बिलासपुर के अचानकमार टाइगर रिजर्व (एटीआर) में हैं। यानी बाघों के लिहाज से अचानकमार एकाएक समृद्ध हो गया है। हालांकि पर्यटक अक्सर निराश होते हैं कि भ्रमण के दौरान उन्हें बाघ दिखाई नहीं देते। कई लोग सवाल उठाते हैं कि क्या सचमुच यहां इतने बाघ मौजूद हैं? मगर मानक तकनीक से की गई गिनती पर संदेह नहीं किया जा सकता। प्रकृति प्रेमियों का दावा है कि यहां की गिनती में वे बाघ भी शामिल हो जाते हैं, जो मध्यप्रदेश के कान्हा या बांधवगढ़ से कुछ दिनों के लिए यहां आते हैं और फिर लौट जाते हैं। ऐसे दो-चार मामले बीते वर्षों में सामने भी आए हैं। आंकड़ों के अनुसार तमोर पिंगला में 7, इंद्रावती में 6, भोरमदेव में 3 और उदंती-सीतानदी में केवल 1 बाघ है।
अरसे बाद बाघों को लेकर आई इस अच्छी ख़बर के बाद वन अफसरों ने हाल ही में पत्राचार शुरू किया है कि बांधवगढ़ से 3 और कान्हा से 3 बाघ मिल जाएं। इन्हें उदंती-सीतानदी और गुरु घासीदास टाइगर रिज़र्व-तमोर पिंगला में शिफ्ट किया जाए। इसके लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने मध्यप्रदेश सरकार से पहल की है और साथ ही नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) से भी परामर्श लिया है। उद्देश्य यह है कि तीन सालों में दोगुनी हुई संख्या अब कम न हो और कम से कम स्थिर तो बनी रहे। लेकिन इसके लिए देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ़ इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया का मूल्यांकन आवश्यक है, जिसके बिना यह स्थानांतरण संभव नहीं होगा।
सवाल यह है कि जब दो जोड़ी बाघ लाने की तीन-चार साल से कोशिश हो रही है और अब तक धरातल पर नहीं उतरी, तो नए प्रस्ताव पर अमल कब होगा? अगर पीछे देखें तो राज्य वन्यजीव बोर्ड की योजना थी कि प्रोजेक्ट बघवा के तहत मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ को दो बाघ और दो बाघिन मिलें, जिनमें से एक जोड़े को अचानकमार अभयारण्य में छोड़ा जाना था। यह प्रस्ताव कांग्रेस सरकार के समय आया था, लेकिन अब तक लागू नहीं हुआ। हालांकि, अचानकमार में मध्यप्रदेश की सीमाओं से बाघों का स्वाभाविक आना जारी है।

एटीआर में वर्षों से यहां गाँवों के विस्थापन की प्रक्रिया अधूरी है क्योंकि बजट आवंटन नहीं हुआ। यहां बड़े पैमाने पर अवैध दैहान मौजूद हैं, जिन्हें हटाने की कार्रवाई नहीं हो रही। गांवों और दैहानों को हटाने का विरोध राजनीतिक स्तर पर भी है। घास के मैदानों की कमी के कारण शिकार योग्य जानवर कम हैं और यही वजह है कि बाघों के लिए भोजन की उपलब्धता चुनौती बनी हुई है।
पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि बाघों की संख्या बढऩे के बाद वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे मौजूदा बाघों की वंशवृद्धि के लिए आवश्यक संसाधन बढ़ाएं। मध्यप्रदेश से नए बाघ लाने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मौजूदा बाघों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और संसाधन विकसित हों। हकीकत क्या है, इसे लेकर- बारनवापारा का उदाहरण दिया जाता है, जहां महीनों तक एक नर बाघ बाघिन की तलाश में भटकता रहा और बाद में कसडोल क्षेत्र में भटकता रहा।
सरहद के दोनों तरफ के रिश्ते

बस्तर के बाद जशपुर में भी होम स्टे की शुरुआत हुई है। पांच गांवों में देश विदेश के पर्यटक स्थानीय आदिवासी परंपराओं से रूबरू हो पाएंगे। जशपुर में सीएम विष्णुदेव साय ने होम स्टे की शुरुआत के मौके पर मंचासीन झारखंड के पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा की तारीफ की, और याद दिलाया कि किस तरह मुंडा जी ने केन्द्रीय मंत्री रहते कंवर आदिवासियों से जुड़ी समस्याओं को सुलझाया था।
साय ने बताया कि वो कंवर समाज से आते हैं। उनकी माता झारखंड की रहवासी हंै। छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे झारखंड के 18-20 गांवों में कंवर समाज के लोग रहते हैं। झारखंड में कंवर समाज को आदिवासी नहीं माना जाता था। जिसके कारण झारखंड के कंवर समाज के लोगों को आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल रहा था। साय ने बताया कि एनडीए की वाजपेयी सरकार में अर्जुन मुंडा जी आदिम जाति विकास मंत्री थे। मैंने उनके सामने झारखंड के कंवर आदिवासियों की दिक्कतों का जिक्र किया।
मुंडा ने चार महीने समय मांगा, और फिर समय सीमा के भीतर कंवर समाज को आदिवासी होने मान्यता दिलवाई। साय की बात सुनकर मंच पर अर्जुन मुंडा जी मंद-मंद मुस्कुराते दिखे।
मोदी के लिए धन्यवाद प्रस्ताव
जीएसटी में कमी से रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम में कमी आने वाली है। नई दरें 22 सितंबर से प्रभावशील होंगी। भाजपा के रणनीतिकारों ने जीएसटी में सुधार का श्रेय पीएम नरेंद्र मोदी को देकर व्यापक प्रचार-प्रसार की रणनीति बनाई है। पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री अरुण सिंह ने शुक्रवार की रात छत्तीसगढ़ के प्रमुख नेताओं से वीडियो कॉन्फ्रेंस पर चर्चा की।
अरुण सिंह ने कहा है कि आम उपभोक्ताओं तक जीएसटी में कमी के फायदे की जानकारी पहुंचनी चाहिए। अरूण सिंह ने एक माह के भीतर सभी नगरीय निकायों से जीएसटी में कमी, और उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाने के लिए पीएम के नाम धन्यवाद प्रस्ताव पारित कर जानकारी भेजने के लिए कहा है।
यही नहीं, एनडीए शासित राज्यों की विधानसभाओं में भी जीएसटी में सुधार के लिए पीएम के नाम धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया जाएगा। छत्तीसगढ़ में विधानसभा के शीतकालीन सत्र में प्रस्ताव पारित होने की उम्मीद है।
आईबी में छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ कैडर के 97 बैच के आईपीएस अफसर जयदीप सिंह आईबी में एडिशनल डायरेक्टर के पद पर प्रमोट हो गए हैं। जयदीप पिछले दो दशक से आईबी में हैं। वो छत्तीसगढ़ कैडर के उन चुनिंदा अफसरों में हैं, जो शीर्ष खुफिया एजेंसी में अहम दायित्व संभाल रहे हैं।
जयदीप सिंह से पहले विश्वरंजन, और स्वागत दास आईबी में स्पेशल डायरेक्टर के पद तक पहुंचे। विश्वरंजन बाद में छत्तीसगढ़ में डीजीपी भी रहे। इसके अलावा बीके सिंह भी स्पेशल डायरेक्टर के पद पर रहे, और रिटायरमेंट के करीब आते-आते वापस छत्तीसगढ़ आ गए। बीके सिंह ईओडब्ल्यू-एसीबी के डीजी रहे। यही नहीं, रायपुर आईजी अमरेश मिश्रा भी आईबी में असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर सेवाएं दे चुके हैं।
कुछ महीने पहले डीआईजी स्तर के अफसर डी श्रवण की भी पोस्टिंग आईबी में हुई है। श्रवण तीन जिलों के एसपी रह चुके हैं। वो वर्तमान में गुवाहाटी में सेवाएं दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर केन्द्रीय जांच एजेंसियों में अहम भूमिका निभाते आए हैं। रवि सिन्हा तो रॉ के डायरेक्टर रहे। एडीजी अमित कुमार सीबीआई में करीब 10 साल सेवाएं दे चुके हैं। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ के अफसर अपनी कार्यशैली के बूते पर केन्द्रीय एजेंसियों में अहमियत पाते रहे हैं।
रामगढ़ बचे न बचे, रिपोर्ट तो हाजिर है...

छत्तीसगढ़ का रामगढ़ पर्वत, सरगुजा जिले में बसा वह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक खजाना है, जहां प्राचीन गुफाएं, शिलालेख और रामायण काल की कथाएं आज भी जीवित हैं। लेकिन कोयला खनन की वजह से दरारें और कंपन की खबरें सामने आ रही हैं, और सरकार की जांच टीम ने कुछ घंटों में 'सब ठीक है' का कह दिया। यह सर्टिफिकेट दिया है, भाजपा विधायकों की जांच टीम ने। इनके साथ न कोई भूगर्भ विशेषज्ञ था, न पर्यावरणविद्। जैसे कोई झोलाछाप मरीज का उपचार कर देता हो। इस टीम के संयोजक शिवरतन शर्मा एमए, एलएलबी हैं। विधायक रेणुका सिंह 12वीं पास हैं। तीसरे अखिलेश सोनी एमए किए हुए हैं, लेकिन इनमें से किसी के अध्ययन का विषय भूगर्भ विज्ञान नहीं रहा है। पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल टीम में नहीं थे, लेकिन साथ घूमते रहे। उनकी भी पढ़ाई रेणुका सिंह जितनी ही है। टीम ने मौके पर जाकर फोटो सेशन किया और घोषणा कर दी है कि कोई खतरा नहीं।
मगर क्या यह जांच रिपोर्ट विवाद को दफन कर देगा? सत्तारूढ़ दल हमेशा छत्तीसगढ़ के खनन उद्यमियों के साथ रहे हैं। हसदेव अरण्य में कांग्रेस के शासनकाल में पेड़ों की कटाई हुई, कई तरह की मंजूरी मिली और जब भाजपा की सरकार आई तो सरकार ने शपथ भी नहीं ली थी कि दोबारा पेड़ कटने लगे थे। हसदेव को लेकर ग्रीनपीस की रिपोर्ट बताती है कि कोयला खनन से बाघों के गलियारे और जैव विविधता को खतरा है, और स्थानीय निवासियों में श्वास रोग, टीबी जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। वहीं, रामगढ़ जैसी जगह, जहां 250-300 मिलियन वर्ष पुरानी चट्टानें हैं, पर ब्लास्टिंग का असर दरारों और भूस्खलन के रूप में दिख रहा है। कई भू-वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि कोयले के लिए गहराई तक खुदाई से संरचना कमजोर हो सकती है।
इस जांच टीम में शामिल शिवरतन शर्मा ने 2022 में विधानसभा में केंटे एक्सटेंशन परियोजना के खिलाफ संकल्प पर हस्ताक्षर किए थे। अब सरकार आ गई है तो खदान की वकालत कर रहे हैं। पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव (कांग्रेस) ने सही सवाल उठाया है। मगर, उन्होंने अपने कार्यकाल में हसदेव की कटाई होते देखा। विरोध तो किया लेकिन विरोध स्वरूप कोई निर्णायक फैसला नहीं लिया। उनके ही कार्यकाल में सरगुजा कलेक्टर की रिपोर्ट आ चुकी थी कि रामगढ़ को कोई खतरा नहीं, जो पहले की रिपोर्ट से बिल्कुल विपरीत थी। कल शर्मा वनवास में आज सिंहदेव वनवास में हैं। जनता के सुर में सुर मिलाने के लिए राजनीतिक वनवास जरूरी हो जाता है। जब पर्यटन और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल को बनाया गया तो लोगों ने सोचा वे धर्मसंकट में पड़ जाएंगे। अपने ही इलाके के रामगढ़ को बचाने के लिए वे क्या करेंगे? मगर, यह संशय मिट चुका है। उन्होंने भाजपा की जांच टीम की हां में हां मिलाई है और घोषित कर दिया है कि रामगढ़ को कोई खतरा नहीं है।
दिग्गज आदिवासी नेता ननकी राम कंवर एक के बाद एक डीएमएफ, और अन्य मामले को लेकर सीधे पीएमओ को शिकायत भेज रहे हैं। एक-दो मामलों पर पीएमओ ने सरकार ने जांच प्रतिवेदन भी मांगा है। चर्चा है कि कंवर की शिकायतों से राज्य सरकार, और संगठन के नेता नाखुश हैं।
पिछले दिनों मध्य क्षेत्र विकास प्राधिकरण की बैठक कोरबा में थी। सीएम विष्णु देव साय और अन्य कई मंत्री व विधायक बैठक में थे। कई फैसले भी लिए गए। मगर पूर्व गृहमंत्री कंवर सौजन्य मुलाकात के लिए भी नहीं गए। इसको लेकर पार्टी के भीतर काफी चर्चा भी रही। कंवर की नाराजगी कोरबा कलेक्टर के खिलाफ भी है। वो कलेक्टर को बदलना चाहते हैं, लेकिन उन्हें शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि पार्टी में पूछपरख नहीं होने से कंवर भी कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। मगर नंदकुमार साय का हाल देखकर ऐसा कुछ करेंगे, इसको लेकर संदेह जताया जा रहा है। देखना है आगे क्या होता है।
पितृ पक्ष, और फूले मुँह
सरकार के निगम-मंडलों, और भाजपा संगठन की दूसरी सूची पर फिलहाल ब्रेक लग गया है। सूची अब अक्टूबर-नवंबर में जारी हो सकती है।
नाम फाइनल होने के बाद भी सूची अटकने के पीछे कई वजहें सामने आई है। बताते हैं कि पितृपक्ष में पार्टी नई नियुक्तियों से परहेज़ करते आई है। इससे परे पार्टी हाईकमान ने 2 अक्टूबर तक कई कार्यक्रमों की सूची भेजी है। इन कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए प्रदेश और जिला कार्यालयों में बैठकें चल रही है।
पार्टी नेता मानते हैं कि सरकार और संगठन की सूची जारी होने असंतोष भी उभर कर सामने आ सकता है। वैसे भी पार्टी के पुराने नेता संगठन में जगह नहीं मिलने से मुंह फुलाए बैठे हैं। इन सब वजहों से पार्टी के कार्यक्रम प्रभावित होने का खतरा दिख रहा था। इस वजह से नियुक्तियों को फिलहाल रोक दिया गया है।
आंदोलन को जीवंत रखने के तरीके

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के हजारों कर्मचारी पिछले 25 दिनों से हड़ताल पर हैं। उनकी मुख्य मांग भाजपा सरकार से चुनाव पूर्व किए गए उस वायदे को पूरा करने की है, जिसमें नियमितिकरण और सरकारी सेवा में शामिल किए जाने की बात कही गई थी। संगठन पदाधिकारियों का दावा है कि विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अपने घरों के बाहर बैनर लगाए थे, जिन पर लिखा था, कि यहां कांग्रेसियों का प्रवेश वर्जित है। कांग्रेस शासन से उन्हें धोखा मिला और अब भाजपा सरकार ने भी उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। लंबी हड़तालों में सबसे बड़ी चुनौती कर्मचारियों का उत्साह बनाए रखना होता है। रोज-रोज कर्मचारियों को धरना स्थल तक लाना और आंदोलन को जीवंत रखना आसान काम नहीं है। लेकिन एनएचएम कर्मियों ने इसके लिए पहले से पुख्ता तैयारी कर रखी है। जगदलपुर में कल आंदोलनकारियों ने पुराना कृषि उपज मंडी प्रांगण में लोकनृत्य किया। कुछ कर्मचारियों ने सरकार की वादाखिलाफी पर गीत तैयार किए, जिन्हें धुन में गाकर सुनाया गया। इससे पहले वे बारिश में बाइक रैली निकाल चुके हैं। धरना स्थल पर ढोल-मंजीरा संग भजन और पैरोडी गाए जा रहे हैं, जिनमें उनकी मांगों की फेहरिस्त होती है। कभी समूह में मंदिरों में देवी दर्शन, तो कभी चुनरी यात्रा निकालकर वे लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहे हैं।
वैसे हड़ताल का असर सरकारी अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों तक है। ग्रामीण क्षेत्रों में एएनएम भी हड़ताल पर हैं, जिनके भरोसे मिनी पीएचसी (आरोग्य मंदिर) चलते हैं। बड़े अस्पतालों में भी मरीजों को मरहम-पट्टी और दवाओं के लिए भटकना पड़ रहा है। जब भी उल्टी-दस्त और डायरिया जैसी बीमारियों का प्रकोप फैलता है, तो एनएचएम कर्मचारी ही फील्ड में सबसे ज्यादा सक्रिय रहते हैं। इस काम पर भी असर पड़ा है। महामारी नियंत्रण, जन्म-मृत्यु पंजीयन, महतारी प्रसव, ओपीडी सेवाओं समेत दर्जनों स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।
सरकार की ओर से आंदोलनकारियों की कुछ मांगों पर आश्वासन दिया गया है, लेकिन कर्मचारी केवल मौखिक भरोसे से संतुष्ट नहीं हैं। वे लिखित आश्वासन और समयबद्ध निराकरण की मांग पर कर रहे हैं।
राहुल के हाइड्रोजन बम का इंतजार
कांग्रेस लोकसभा, और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में वोट चोरी का आरोप लगा रही है, और सहयोगी दलों के साथ मिलकर देशभर में आंदोलन छेड़े हुए हैं। छत्तीसगढ़ में भी प्रदेश स्तरीय धरना-प्रदर्शन हुआ है। इन सबके बीच लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाइड्रोजन बम का राग छेड़ दिया है। उन्होंने कहा है कि हाइड्रोजन बम जब आएगा, तो सब कुछ साफ हो जाएगा।
राहुल ने संकेत दिया कि वोट चोरी को लेकर विस्फोटक सुबूत सामने लाया जाएगा। स्वाभाविक है कि राहुल के बयान के बाद राजनीतिक दलों में हलचल है। प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट छत्तीसगढ़ दौरे पर आए, तो पार्टी नेताओं के बीच हाइड्रोजन बम पर आपस में चर्चा होती रही। पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि राहुल का हाइड्रोजन बम बनारस से जुड़ा हुआ है। बनारस, पीएम नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र है।
हल्ला है कि बनारस में बड़े पैमाने पर फर्जी पोलिंग हुई थी। पीएम नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर घटकर 1 लाख 52 हजार रह गया था। कांग्रेस बनारस के लोकसभा चुनाव से जुड़े कुछ दस्तावेज सामने रख सकती है जिसे चुनाव में गड़बड़ी के सुबूत के तौर पर पेश किया जाएगा। हालांकि राहुल, या कांग्रेस ने हाईड्रोजन बम पर खुलासा नहीं किया है। वस्तु स्थिति तो बम के सामने आने पर ही पता चलेगा। और 'बम' फूटता भी है या नहीं, यह देखना है।
भालू का कोल्ड ड्रिंक पीता रील, हाथी खदेड़ते लोग

जनरेशन ज़ेड की सोच और सोशल मीडिया का क्रेज़ कभी-कभी खतरनाक भी हो सकता है। हम नेपाल की बात नहीं कर रहे हैं। कांकेर जिले के नारा गांव में ही इसका उदाहरण देखने को मिला। एक जंगली भालू भोजन की तलाश में गांव तक पहुंच गया। कुछ युवाओं ने उसके भटकाव को रील बनाने का साधन मान लिया। उन्होंने भालू के सामने कोल्ड ड्रिंक की बोतल रख दी और वीडियो शूट कर ली। भालू ने बोतल उठाई और गटागट पी भी डाली। यह वीडियो बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। पर सोचने वाली बात है कि अगर भालू ने अचानक हमला कर दिया होता तो? क्या कुछ सेकंड की रील इतनी कीमती है कि जान जोखिम में डाल दी जाए? यह मनोरंजन नहीं बल्कि लापरवाही का नमूना है। कुछ दिन पहले रायगढ़ का भी एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक हथिनी ने शावक को अभी-अभी जन्म दिया था और लोग उन्हें खदेडऩे लगे। मां अपने नवजात को छोडक़र कैसे भागती? सुरक्षा को लेकर चिंतित थी, वह बदहवास थी- लेकिन लोगों को इसकी फिक्र नहीं थी। ऐसे रील्स बनाकर तो दूसरों को भी उकसाया जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में विचरण करने वाले वन्यजीवों के साथ छेडख़ानी कर उन्हें परेशान किया जाए।
पहले पुलिस कमिश्नर पर अटकलें

रायपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने के साथ ही पुलिस के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की तैयारी है। इससे परे भी कई आईपीएस अफसरों को इधर से उधर किया जा सकता है। इसको लेकर चर्चा चल रही है। कहा जा रहा है कि आधा दर्जन जिलों के एसपी बदले जा सकते हैं।
चर्चा है कि कांकेर, राजनांदगांव, कवर्धा, महासमुंद जिले के एसपी को बदला जा सकता है। कांकेर, और राजनांदगांव एसपी को दो साल होने जा रहे हैं। महासमुंद एसपी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। ऐसे में उनकी जगह नई पोस्टिंग तय है। रायपुर में तो लाल उम्मेद सिंह आखिरी एसएसपी होंगे। वजह यह है कि एक नवंबर से कमिश्नर की पोस्टिंग हो सकती है, जो कि एडीजी या आईजी रैंक के होंगे। इस बात की भी एक संभावना है कि मौजूदा आईजी अमरेश मिश्रा ही कमिश्नर होंगे। उनके पास ईओडब्ल्यू-एसीबी का भी प्रभार है। ऐसे में उन्हें दोनों में से एक प्रभार छोडऩा पड़ सकता है।
इसके अलावा दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग, और बिलासपुर आईजी संजीव शुक्ला का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। गर्ग सीबीआई में पांच साल सेवाएं दे चुके हैं। संजीव शुक्ला तो रायपुर, दुर्ग और नांदगांव एसपी रह चुके हैं। यही वजह है कि इन नामों की चर्चा है। कुल मिलाकर पुलिस में फेरबदल पर नजरें टिकी हुई है।
बहुत महंगी खुशी...

इन दिनों महंगी कारों में छत खुलने वाला एक कांच लगे रहता है, और बच्चे खेल-खेल में उस सनरूफ को खोलकर वहां से बाहर निकले रहते हैं। अभी एक शहर का यह वीडियो सामने आया है जिसमें एक कार की सनरूफ से बाहर निकला हुआ यह बच्चा जाकर सडक़ के आर-पार लगे लोहे के गर्डर से टकराता है, उसके बाद के नतीजे का अंदाज लगाया जा सकता है। अपने बच्चों को इस तरह की खुशी देने के पहले एक सावधानी भी बरतना चाहिए कि किसी का फेंका हुआ कोई सामान भी उनको लग सकता है और किसी गेट या गर्डर से वे टकरा भी सकते हैं।
मूणत नाखुश हैं?
चर्चा है कि पूर्व मंत्री राजेश मूणत नाखुश चल रहे हैं। मूणत मंत्री बनने की दौड़ में थे। स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने उन्हें कैबिनेट में जगह दिलाने के लिए काफी दम भी लगाया था। मगर पार्टी ने नए चेहरे को कैबिनेट में जगह देने का मन बना लिया था, और इन सब वजहों से मूणत, अमर, और अजय चंद्राकर मंत्री बनने से रह गए। मूणत ने नाराजगी का खुले तौर पर इजहार तो नहीं किया है, लेकिन वो सार्वजनिक कार्यक्रमों में पहले जैसी रुचि नहीं दिखा रहे हैं। पार्टी के कई लोग इसे उनकी नाराजगी से जोडक़र देख रहे हैं।
गणेश विसर्जन स्वागत के लिए मूणत का अलग से पंडाल लगता था। इस बार उनके खेमे की तरफ से मेयर मीनल चौबे ने जयस्तंभ चौक पर स्वागत पंडाल लगाया। खुद सीएम, और सरकार के दो-तीन मंत्री भी मेयर के पंडाल में शरीक हुए, और झांकियों का स्वागत किया। मगर मूणत नहीं आए। इसकी राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा रही। इस बार नागरिक आपूर्ति निगम के चेयरमैन संजय श्रीवास्तव ने भी स्वागत पंडाल लगाया था। इसमें भी पार्टी के कई प्रमुख नेताओं ने शिरकत की, लेकिन इस तरह के आयोजनों में अपनी पूरी ऊर्जा लगाने वाले राजेश मूणत नहीं दिखे, तो चर्चा का विषय बन गया।
नशे का धंधा, जितने मुँह, उतने नाम!
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रायपुर के कटोरा तालाब की नव्या मलिक, और विधि अग्रवाल की गिरफ्तारी के बाद ड्रग्स रैकेट का खुलासा हुआ है। उनके आधा दर्जन सहयोगियों को पुलिस अब तक गिरफ्तार कर चुकी है। ड्रग्स रैकेट में नव्या मलिक का किरदार काफी अहम है। इसके तार विदेशों तक जुडऩेे की खबर आ रही है। पुलिसिया पूछताछ में विशेषकर नव्या को लेकर कई चौंकाने वाली जानकारी सामने आ रही है। ड्रग्स रैकेट में राजनेताओं से लेकर बड़े कारोबारियों के बेटों के जुड़े होने की चर्चा है।
करीब 30 बरस की युवती नव्या पहले एक संस्थान में मैनेजर थीं, और इंटीरियर डिजाइन के काम से जुड़ी रहीं। फिर फैशन डिजाइन, और वर्तमान में इवेंट कंपनी संभाल रही थीं। इस दौरान उनकी नामी-गिरामी लोगों से जान पहचान हो गई। कुछ से नजदीकी संबंध भी बन गए। पार्टियों में ड्रग्स सप्लाई भी करने लगीं। और अब जब नव्या के कॉल डिटेल्स निकाले गए, तो आगे कार्रवाई करने में पुलिस के भी हाथ पांव फूल रहे हैं।
चर्चा है कि एक विधायक के बेटे के नाम तो लोगों की जुबान में है, कई बड़े नामों को लेकर कानाफुसी हो रही है। दुर्ग संभाग के एक बड़े नेता के पोते, और एक और विधायक के बेटे का नाम भी ग्राहकों की सूची में बताया जा रहा है। रायपुर के प्रभावशाली नेता के भतीजे, और एक बिल्डर के बेटे का नाम भी नव्या, और विधि अग्रवाल से जुड़ा होना बताया जा रहा है।
पुलिस कई लोगों से पूछताछ कर चुकी है, लेकिन सिर्फ वाट्सऐप चैट के आधार पर आगे कुछ कार्रवाई करने के पक्ष में नहीं है। भाजपा, और कांग्रेस के बड़े नेता ड्रग्स रैकेट के खुलासे के बाद एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। मगर ड्रग्स रैकेट के तार तो दलीय सीमा को पार करते दिख रहे हैं। देखना है कि सारे राज सामने आ पाते हैं, या नहीं।
सरगुजा से झांकती आंगनबाड़ी की सच्चाई

छत्तीसगढ़ में 52 हजार 474 आंगनबाड़ी केंद्र हैं, जहां 6 वर्ष तक की आयु वाले 27 लाख से अधिक बच्चों के नाम दर्ज हैं। ये केंद्र केवल बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा और सेहत की देखभाल ही नहीं, बल्कि बीपीएल श्रेणी की महिलाओं की कार्यशक्ति में हिस्सेदारी बढ़ाने का भी माध्यम हैं। कामकाजी माताएं अपने बच्चों को आंगनबाड़ी में छोडक़र निश्चिंत होकर काम पर जा सकती हैं।
हाल ही में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है कि इन केंद्रों में आने वाले बच्चों की संख्या घट रही है। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में सरगुजा के केंद्रों में आने वाले बच्चों की संख्या करीब 14 हजार कम हो चुकी है। सरगुजा से जमीनी रिपोर्टिंग करने वाले मीडियाकर्मियों ने अप्रैल 2025 में वीडियो और तस्वीरों के साथ दिखाया था कि केंद्रों में मुश्किल से चार-पांच बच्चे मौजूद थे, जबकि रजिस्टर में सब हाजिर हैं।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर अभिभावक बच्चों को आंगनबाड़ी भेजना क्यों कम कर रहे हैं। लाभार्थियों और स्टाफ से हुई चर्चा में यह सामने आया कि केंद्रों का जीर्ण-शीर्ण बुनियादी ढांचा इसकी सबसे बड़ी वजह है। अधिकांश भवन छोटे बजट में पंचायतों और आरईएस के जरिये बनाए जाते हैं, जिसमें हिस्सेदारी का बंटवारा होता है और चार-पांच साल में ही भवन जर्जर हो जाते हैं। भौतिक निरीक्षण कराया जाए तो सैकड़ों केंद्रों की छत टपकती हुई और प्लास्टर उखड़ा हुआ मिलेगा। कई जगह जर्जर भवन से बच्चों को हटाकर किराये के कमरों में शिफ्ट किया गया है, लेकिन 1200 रुपये स्वीकृत किराया होने के कारण वे जगहें भी दुरुस्त नहीं होतीं। कई केंद्र झोपडिय़ों में तो कई छोटे और अंधेरे कमरों में संचालित हो रहे हैं। लोग वहां अपने बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों को लेकर चिंतित हैं, जहां भेज कर उन्हें निश्चिंत हो जाना चाहिए।
हाल ही में एक रिपोर्ट और आई थी कि लखनपुर ब्लॉक के एक आंगनबाड़ी केंद्र को जिस किराये के छोटे कमरे में शिफ्ट किया गया, वहां अंधेरे की वजह से बच्चों को आंगन में बैठकर भोजन करना पड़ता है। उसी आंगन में एक खुला कुआं भी है। स्टाफ को लगातार नजर रखनी पड़ती है कि कहीं बच्चे खेलने के दौरान उसकी तरफ न चले जाएं। अगस्त 2025 की बिलासपुर की घटना तो अधिक सिहरन वाली थी। यहां सरकारी स्कूल के एक कमरे में, जो मध्यान्ह भोजन के लिए निर्धारित था, आंगनबाड़ी केंद्र चलाया जा रहा था। इसी केंद्र में अवैध रूप से रखा गया लोहे का पाइप बच्ची के ऊपर गिरा और उसकी मौत हो गई।
इन खतरनाक परिस्थितियों के बावजूद विभाग के अफसर, मंत्री और जिला कलेक्टर ज्यादातर बेपरवाह ही नजर आते हैं। एक तरफ आंगनबाड़ी केंद्रों की यह स्थिति है, दूसरी ओर जुलाई 2025 में महिला एवं बाल विकास विभाग की केंद्रीय राज्य मंत्री सावित्री देवी ने लोकसभा में जानकारी दी थी कि अब इन केंद्रों के साथ शिशुओं के लिए झूलाघर खोलने की योजना को मंजूरी दी गई है। इनमें सबसे अधिक 1500 केंद्र छत्तीसगढ़ के लिए हैं। मौजूदा आंगनबाड़ी केंद्र जब ठीक तरह से नहीं चल रहे हों तो झूलाघर में कितनी माताओं की दिलचस्पी होगी? छत्तीसगढ़ में, हाल ही में विभाग चर्चा में तब आया जब टेंडर और सप्लाई में करोड़ों रुपये के घोटाला उजागर हुआ। शायद, झूलाघर के बजट पर भी लोगों की नजर होगी।
बने, और जमे हुए हैं शैलेश पाठक

छत्तीसगढ़ कैडर के 88 बैच के पूर्व आईएएस अफसर शैलेश पाठक, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज मुंबई में वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त किए गए हैं। पाठक छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद डायरेक्टर जनसंपर्क, कलेक्टर महासमुंद, और पीडब्ल्यूडी के विशेष सचिव व राजभवन में सचिव भी रहे। बाद में वो अवकाश लेकर निजी क्षेत्र में चले गए, और फिर उन्होंने आईएएस से त्यागपत्र दे दिया।पाठक ने आईएलएंडएफसी समूह के साथ निजी क्षेत्र में सेवाएं शुरू की। उन्होंने आईसीआईसीआई में निवेश बैंकिंग, एलएंडटी आईडीपीएल, चेन्नई के सीईओ और फिक्की, दिल्ली के जनरल सेकेटरी रहे। और अब उन्हें मुंबई स्थित नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त किया गया है। खास बात ये है कि छत्तीसगढ़ में पाठक के दो बैचमेट केडीपी राव, और बीएल अग्रवाल पहले ही रिटायर हो चुके हैं। बीएल अग्रवाल को तो जबरिया रिटायर किया गया था। केडीपी राव एसीएस होकर रिटायर हुए। पाठक आईएएस की नौकरी छोडऩे के बाद भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
बृजमोहन को विसर्जन में आने नहीं मिला...
उपराष्ट्रपति पद के लिए एनडीए प्रत्याशी सीपी राधाकृष्णन को बड़ी जीत हासिल हुई है। इसमें छत्तीसगढ़ भाजपा के दो सांसद बृजमोहन अग्रवाल, और संतोष पाण्डेय ने भी भागीदारी निभाई। दोनों ही सांसदों को पार्टी के सांसदों की शत प्रतिशत वोटिंग सुनिश्चित करने का जिम्मा दिया गया था।
बताते हैं कि केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने चुनाव की कमान संभाली थी। चर्चा है कि उन्होंने करीब चार सौ सांसदों से तो सीधे बातचीत की थी, और उम्मीद से अधिक वोटों से जीत हासिल हुई, तो बृजमोहन और संतोष पाण्डेय को भी बधाई मिली।
बृजमोहन का 8 तारीख को रायपुर आने का कार्यक्रम था, वो गणेश विसर्जन की झांकी में शामिल होने वाले थे। पिछले 40 साल से उनके समर्थकों द्वारा पंडाल लगाया जाता रहा है, लेकिन इस बार वो अपने पंडाल में बैठकर झांकी का स्वागत नहीं कर पाए। उन्हें रायपुर जाने से मना कर दिया गया था। और जैसे ही उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की घोषणा हुई, तो बृजमोहन ने सीपी राधाकृष्णन से मिलकर उन्हें बड़ी जीत के लिए बधाई दी। राधाकृष्णन ने भी बृजमोहन का आभार माना है। पिछले कुछ सालों से पार्टी में हाशिए पर चल रहे बृजमोहन अग्रवाल को आगे क्या कुछ महत्व मिलता है यह देखना है।
चावल के खेतों में दिखेंगे ये पक्षी

ब्राउन क्रेक जिसे हिंदी में तपकीरी या फटाकडी भी कहते हैं, इन दिनों छत्तीसगढ़ के कई स्थानों में देखे जा रहे हैं। खासकर छत्तीसगढ़ के खेतों में इन्हें देखा जा सकता है। यह पक्षी भारत के कई हिस्सों में प्रवास करती है। शहर के सड्डू और नया रायपुर इलाके के खेतों में पक रही धान की बालियों के बीच यह इन दिनों नजर आ सकते हैं। चावल के खेतों की आर्द्रभूमि और झाडिय़ों में ये पाये जाते हैं। यह तस्वीर भी रायपुर की है जिसे छायाकार दिलीप वर्मा ने सोशल मीडिया पर साझा किया है।
ऐसे में कैसे विकसित होगा छत्तीसगढ़?

जगदलपुर के पीजी कॉलेज में विकसित छत्तीसगढ़ 2047 का आयोजन था। मंच से भारत को 2047 तक विकसित बनाने की बातें हो रही थीं, लेकिन उसी वक्त कॉलेज हॉल की छत का हिस्सा टूटकर गिर पड़ा और एक छात्रा गंभीर रूप से घायल हो गई। सवाल यह है कि जब शैक्षणिक संस्थान सुरक्षित ही नहीं रहेंगे तो विकास की बातें खाली वाणी विलास बनकर रह जाएगी। अब तक प्राइमरी स्कूलों की जर्जर दशा पर खबरें आती थीं, मगर यह घटना बता रही है कि कॉलेज के भवनों का भी भौतिक परीक्षण करने की जरूरत है। हैरानी की बात यह है कि भवन के जिस हिस्से में यह हादसा हुआ, उसकी मरम्मत दो माह पहले ही कराई गई थी। निर्माण की गुणवत्ता का अंदाजा इस दुर्घटना से लगाया जा सकता है। घटना में एक छात्रा घायल हो गई है। उसे अस्पताल दाखिल कराना पड़ा है। 2047 तक विकसित भारत को देखने के लिए पता नहीं आज के कितने लोग बचेंगे, पर आज 2025 में कॉलेज की छतें गिर रही हों, अस्पतालों में मशीनें और स्टाफ नहीं हों, सडक़ें गड्ढों से भरी हों तो उस पर बात करने का क्या मतलब?
व्याव. शिक्षकों की भर्ती, चैट पोल खोल रहे
स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव ने काम संभालते ही व्यावसायिक शिक्षकों की भर्ती में गड़बड़ी मामले की जांच के आदेश दिए हैं। स्कूल शिक्षा विभाग का प्रभार सीएम के पास था। सीएम ने ही व्यावसायिक शिक्षकों की भर्ती में गड़बड़ी की शिकायत की जांच कराई थी, और प्रारंभिक जांच में गड़बड़ी की पुष्टि हुई। प्रकरण ईओडब्ल्यू-एसीबी को सौंपा जा रहा है।
व्यावसायिक शिक्षकों की नियुक्ति 11 महीने के लिए होती रही है। पिछले साल भर्ती नहीं हो पाई थी। बावजूद इसके परीक्षा हो गई, और विद्यार्थियों को उत्तीर्ण कर दिया गया। इस बार आधा दर्जन कंपनियों को शिक्षकों की भर्ती का जिम्मा दिया गया था। कंपनियों ने एक हफ्ते में ही सारी प्रक्रिया पूरी कर विभाग को चयनित अभ्यार्थियों की सूची सौंप दी, और 15 सौ अभ्यार्थियों को नियुक्ति दे दी गई।
चर्चा है कि कंपनियों ने विभाग के अफसरों की मिलीभगत से गड़बड़ी की, और शिक्षकों की भर्ती के एवज में लेनदेन की भी चर्चा है। इसके वाट्सऐप चैट भी सामने आए हैं। विभाग के दो अफसरों की भूमिका संदेहास्पद बताई जा रही है। इनमें से एक डिप्टी डायरेक्टर स्तर के अफसर हैं, जिनका साल भर पहले तबादला हुआ था। मगर उन्हें रिलीव नहीं किया गया। एक अन्य अफसर को भूपेश सरकार के शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह का करीबी माना जाता है। सीएम भर्ती मामले में गड़बड़ी को लेकर काफी खफा रहे हैं, और कहा जा रहा है कि दोषी अफसरों पर गाज गिर सकती है। देखना है कि आगे क्या होता है।
उपराष्ट्रपति चुनाव में छत्तीसगढ़

उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए मंगलवार को मतदान हुआ। इसमें छत्तीसगढ़ के 11 लोकसभा, और पांच राज्यसभा सांसदों ने भी मतदान किया। चुनाव में एनडीए प्रत्याशी सीपी राधाकृष्णन को जीताने के लिए भाजपा हाईकमान ने पुख्ता रणनीति की, और केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, और अन्य चार केन्द्रीय मंत्रियों को पार्टी के सांसदों का शत प्रतिशत वोटिंग सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदारी दी थी। शिवराज सिंह चौहान के साथ रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल को लगाया गया। बृजमोहन के साथ-साथ प्रदेश भाजपा के मुख्य प्रवक्ता संतोष पाण्डेय का भी रोल अहम रहा है। संतोष पाण्डेय, भाजपा संसदीय दल के सचेतक हैं। वो भी सांसदों को जल्द से जल्द वोट डालने के लिए प्रेरित करते नजर आए। उनकी एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें वो सांसदों के साथ वोट डालने के लिए लाइन में खड़े हैं। बृजमोहन अग्रवाल तो आज सुबह 6 बजे ही शिवराज सिंह चौहान के निवास पहुंच गए थे, और फिर नाश्ते के बाद सांसदों को वोट डालने के लिए संसद भवन लेकर निकले। इन सबके बीच पूर्व सांसद प्रदीप गांधी की सक्रियता चर्चा में रही है। चुनाव में उनका सीधा कोई रोल नहीं है। क्योंकि सिर्फ लोकसभा, और राज्यसभा सदस्यों को ही उपराष्ट्रपति चुनाव में वोट डालने का अधिकार है। मगर गांधी हाल ही में कांस्टीट्यूशन क्लब के चुनाव में सर्वाधिक वोट पाकर कार्यकारिणी के सदस्य निर्वाचित हुए हैं। ऐसे में उनकी भी उपयोगिता पार्टी ने समझी है। हल्ला है कि प्रदीप गांधी को एनडीए से परे इंडी गठबंधन के सांसदों को साधने की जिम्मेदारी दी गई है। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ के नेता उपराष्ट्रपति चुनाव में अहम रोल निभाते नजर आए हैं। देखना है कि पार्टी आगे इन सबका क्या कुछ उपयोग करती है।
घटना जिससे मृत्युभोज पर रोक लग गई
बौद्ध समाज प्रगतिशील माना जाता है, लेकिन कई पुरानी प्रथाएं आज भी इसमें देखने को मिलती हैं। ऐसे में, हाल ही में अंबागढ़ चौकी के हालमकोडो गांव में एक परिवार पर मृत्यु भोज का खर्च उठाने का संकट आया। परिवार ने निर्णय लिया कि मृत्यु भोज नहीं कराया जाएगा, बल्कि आने वाले लोगों को केवल स्वल्पाहार दिया जाएगा।
आमतौर पर छत्तीसगढ़ में ऐसे मामलों में परिवारों को सामाजिक उलाहने या बहिष्कार तक का सामना करना पड़ता है, लेकिन यहां स्थिति अलग रही। इस घटना के बाद डोंगरगांव इलाके के बौद्ध समाज ने बैठक बुलाई और सकारात्मक निर्णय लिया कि अब समाज में मृत्युभोज पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। परिजनों को यह स्वतंत्रता होगी कि वे चाहें तो स्वल्पाहार दें या बिल्कुल न दें।
वैसे छत्तीसगढ़ में कई जातीय और सामाजिक संगठनों ने मृत्यु भोज को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग नियम बनाए हैं। कहीं संख्या सीमित कर दी गई है, तो कहीं केवल सादा भोजन की परंपरा रखी गई है, किसी भी तरह का पकवान प्रतिबंधित है। यह अलग बात है कि कुछ शिक्षित और संभ्रांत परिवारों में अब भी मृत्यु भोज को बड़े भव्य आयोजन की तरह मनाया जाता है, ताकि मेहमान उनके रुतबे से परिचित हो सकें।
चिंतामणि महराज गदगद
उप राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कल दिल्ली में भाजपा के देश भर के सांसदों की कार्यशाला हुई। इसमें हुए एक घटनाक्रम को लेकर सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज के निकटवर्ती समर्थक गदगद हैं। और फेसबुक पर तस्वीर देखकर एक से बढक़र एक कमेंट भी होने लगे हैं। हुआ यूं कि इस कार्यशाला में प्रधानमंत्री मोदी भी शामिल हुए। वे परंपरा से हटकर इस बार सांसदों की पिछली पंक्ति में सांसद चिंतामणि महराज के बाजू की कुर्सी पर जा बैठे।
यह कार्यशाला वैसे तो तीन सत्रों में शाम तक चली। लेकिन मोदी, अपने संबोधन तक रहे। और उनका नाम पुकारे जाने तक मोदी महाराज के बाजू ही बैठे रहे। इतने निकट बैठे प्रधानमंत्री, चिंतामणि महाराज से बात किए बगैर चुप तो नहीं बैठे होंगे। बात हुई होगी तो प्रदेश की राजनीति हवा की जानकारी ली होगी। बस कुछ ऐसे ही संकेत महाराज की ओर से सरगुजा तक परकुलेट होते ही समर्थक गदगद हैं।
उनका कहना है कि आने वाले दिनों में केंद्रीय कैबिनेट का भी विस्तार होना है। और मोदी शाह की पहल पर ही महाराज कांग्रेस से भाजपा में आए थे। और चुपचाप अपना काम कर रहे हैं। और फिर महाराज संत गहिरा गुरू के पुत्र भी हैं। फेसबुक पर कमेंट करने वाले अंबिकापुर, रेणुकूट रेल लाइन की मंजूरी की उम्मीद जता रहे हैं। देखें इस सान्निध्य का क्या फायदा होगा।
हड़ताल, और सरकार

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अधिकारी-कर्मचारी हड़ताल पर हैं। सरकार ने 25 कर्मियों को नौकरी से निकाला, लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा। हड़ताली कर्मचारियों ने उल्टे सामूहिक इस्तीफा भेजना शुरू कर दिया है। चर्चा है कि ज्यादातर मांगों पर सहमति बन गई है, लेकिन हड़ताली कर्मचारी नियमितीकरण के लिए अड़े हैं। सरकार की दिक्कत यह है कि नियमितीकरण के मसले पर कोई आश्वासन देने की स्थिति में नहीं है।
चूंकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन केन्द्र सरकार का प्रोजेक्ट है, और 60 फीसदी राशि केन्द्र सरकार उपलब्ध कराती है। ऐसे में 16 हजार अधिकारी-कर्मचारियों के नियमितीकरण का फैसला आसान नहीं है। राज्य सरकार ने नियमितीकरण पर विचार के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया है। इस पर कर्मचारी नेताओं के बीच मंथन चल रहा है। बताते हैं कि नियमितीकरण की कमेटी के प्रस्ताव पर कर्मचारी नेताओं के बीच एकमत नहीं है। पिछली सरकार में भी संविदा, और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए सचिवों की एक कमेटी बनी थी। भूपेश सरकार के पांच साल में कमेटी की कई बैठक हुई, लेकिन कमेटी यह भी पता नहीं लगा पाई कि प्रदेश में कुल कितने संविदा, और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी हैं। कुल मिलाकर कमेटी के गठन प्रस्ताव पर कर्मचारी भरोसा नहीं जता पा रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।
फर्जी ई-चालान से साइबर ठगी का नया जाल
छत्तीसगढ़ में परिवहन विभाग ने ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर नजऱ रखने के लिए तकनीक का सहारा लिया है। जगह-जगह चौक-चौराहों पर कैमरे लगाए गए हैं, जो बिना पुलिस की मौजूदगी के भी नियम तोडऩे वालों को पकड़ लेते हैं और ऑनलाइन चालान भेज देते हैं। देखने में यह व्यवस्था आधुनिक और पारदर्शी लगती है, क्योंकि ओवरस्पीडिंग, रेड सिग्नल क्रॉसिंग या ओवरटेकिंग जैसी घटनाएं सीधे कैमरे की नजऱ में आ जाती हैं। चालान भी सीधे वाहन मालिक के मोबाइल पर पहुंच जाता है।
लेकिन इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसका भी फायदा अब साइबर ठग उठा रहे हैं। नकली ई-चालान और फर्जी लिंक भेजकर लोगों से ठगी की जा रही है। दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर में कई मामले हाल ही में सामने आए हैं। मगर, कम पढ़े-लिखे मजदूर, दिहाड़ीदार और पढ़े-लिखे मगर, डिजिटल तकनीक से अनजान लोग इन जालसाजों का आसान शिकार बन रहे हैं। चालान न भरने पर कार्रवाई का डर दिखाकर क्यू आर कोड या फर्जी लिंक के जरिए उनसे पैसे ऐंठे जा रहे हैं।
परिवहन विभागर और यातायात पुलिस की ओर से तो सलाह दे दी गई है कि आधिकारिक पोर्टल पर जाकर ही ई-चालान की जांच करें और भुगतान करें। असली चालान की जानकारी लेने के लिए वेबसाइट पर ‘पे ऑनलाइन’ पर क्लिक कर वाहन नंबर या चालान नंबर डालना होता है। इसके बाद ओटीपी वेरिफिकेशन से सही जानकारी मिल जाती है। सवाल है कि क्या सिर्फ अपील करना काफी है? जब सरकार ने चालान वसूली को पूरी तरह तकनीकी बना दिया है तो सुरक्षित और भरोसेमंद सिस्टम देना भी उसकी जिम्मेदारी है। समस्या का हल केवल लोगों को सतर्क रहने की सलाह देकर नहीं निकलेगा। यातायात पुलिस का जो चालान आता है वह किसी ऐसे यूनिक फॉर्मेट में नहीं है कि लोग आसानी से पहचान सकें। लाखों की संख्या में वाहन का इस्तेमाल करने वाले लोग हैं। दुर्घटनाओं से बचने के लिए इनके बीच जागरूकता अभियान तो चलाया जाता है लेकिन सही ई चालान को लोग पहचानें इसके लिए कोई मुहिम नहीं चल रही है। ट्रैफिक पुलिस का कोई हेल्पलाइन भी नहीं है कि ई चालान मिलने पर लोग विभाग में फोन लगाकर पूछ सकें कि क्या वह वास्तविक है? गाड़ी नंबर फर्जी लगाकर घूमने वालों पर भी यातायात पुलिस की तकनीक विफल है। गोरखपुर के एक वकील की गाड़ी कभी बिलासपुर आई थी नहीं, उसके नाम पर हाल ही में चालान भेज दिया गया था। आखिर उन्होंने कोर्ट जाने की चेतावनी दी तो चालान रद्द किया गया। ई-चालान व्यवस्था ने ट्रैफिक प्रबंधन को तो आसान बना दिया है, लेकिन फर्जीवाड़ा रोकने के उपाय नहीं किए गए तो यह सुविधा लोगों के लिए मुसीबत ही बनती जाएगी।
सौ बार उठक-बैठक की सजा
सरगुजा जिले के प्रतापगढ़ स्थित डीएवी स्कूल की घटना ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि छोटे बच्चों के साथ शिक्षक-शिक्षिकाओं का व्यवहार कैसा होना चाहिए। दूसरी कक्षा की एक बच्ची टॉयलेट जाने के लिए निकली तो नाराज शिक्षिका ने उसे डंडे से पीटा और क्लास रूम में सौ बार उठक-बैठक लगाने की सजा दे दी। मासूम बच्ची का शरीर यह यातना सह नहीं पाया और उसकी तबीयत बिगड़ गई। वह अपने पैरों पर खड़ी तक नहीं हो पा रही है। वह मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती है।
जानकारी के मुताबिक, घटना से पहले शिक्षिका क्लासरूम से बाहर निकलकर मोबाइल फोन चला रही थी। संभवत: अनुशासन बनाए रखने का उनका तरीका यह था कि एक बच्ची को कठोर दंड देकर बाकी बच्चों को भयभीत कर दिया जाए और मोबाइल देखने में व्यवधान न हो। मगर, इस घटना ने न केवल सजा पाने वाली बच्ची में बल्कि क्लास रूम में मौजूद दूसरे बच्चों के मन में स्कूल और टीचर्स को लेकर गहरी नकारात्मक छवि बन गई होगी।
छोटे बच्चों के साथ व्यवहार करने की कला और संवेदनशीलता के लिए विशेष प्रशिक्षण जरूरी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षक-शिक्षिकाओं की नियुक्ति को लेकर लंबे समय तक विवाद रहा, जब पिछली सरकार के दौरान बी.एड. डिग्रीधारकों को प्राथमिक कक्षाओं में नियुक्त कर दिया गया। इसके खिलाफ डीएलएड अभ्यर्थियों ने अदालत का रुख किया। अदालत ने डीएलएड अभ्यर्थियों के पक्ष में फैसला दिया। यह तो सरकारी स्कूलों की बात है, पर निजी नामचीन स्कूलों में नियुक्ति के मापदंड ऐसे नहीं होते। अक्सर देखा जाता है कि ये पब्लिक स्कूल शिक्षक-शिक्षिकाओं की भर्ती में उनकी शैक्षणिक योग्यता और प्रशिक्षण से समझौता कर लेते हैं ताकि उन्हें कम वेतन पर काम कराया जा सके। शिक्षक परीक्षा परिणाम को लेकर बच्चों से कहीं अधिक दबाव में रहते हैं। उन्हें नौकरी की स्थिरता को लेकर चिंता होती है। वे बच्चों पर कड़ा नियंत्रण करने को अच्छे परिणाम का तरीका समझते हैं।
शायद ही किसी निजी स्कूल में शिक्षकों को बाल संरक्षण कानून या बच्चों के अधिकारों की जानकारी दी जाती हो। उन्हें यह तक मालूम नहीं होगा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत शारीरिक दंड पूरी तरह प्रतिबंधित है। इस घटना ने साबित कर दिया है कि छोटे बच्चों का टीचर बनना, बड़े बच्चों का टीचर बनने से कहीं अधिक जिम्मेदारी भरा काम है।
मंत्रालय चुनाव और मुद्दा

मंत्रालय कर्मचारी संघ के त्रिवार्षिक चुनाव की हलचल शुरू हो गई है। मंगल योग के साथ 9 तारीख से दावेदार नामांकन पत्र दाखिल करने लगेंगे। अध्यक्ष समेत 7 पदों पर चुनाव होंगे। मंत्रालय संवर्ग के 778 कर्मचारी मतदाता हैं।
अब रही बात चुनावी टसल की। वर्तमान अध्यक्ष, वर्तमान सचिव के साथ पूर्व अध्यक्ष ने भी दावेदारी ठोंक दी है। एक ही खेमे के माने जाने वाले तीनों ने एक दूसरे को सूचित कर दिया। और वोट बंटवारा रोकने एक दूसरे को लडऩे से मना भी कर चुके हैं। अब भला लोकतंत्र में कैसे कोई रोक और मना कर सकता है। तीनों तैयार नहीं हैं। एक ने कहा आप भी लड़ लें,मगर दुष्प्रचार न करें। वैसे संघ के वर्तमान नेतृत्व के खिलाफ ऐसा कोई एंटी इंकम्बेंसी नहीं है कि दोबारा चुने जाने में दिक्कत हो। पुराने दावेदार 8 माह बाद रिटायर होने वाले हैं।यानी पुन: अध्यक्ष चुनने की नौबत आएगी। सात सौ से अधिक मतदाता बार बार चुनाव नहीं चाहते।
अब बात चुनावी वादे मुद्दों की। तरो ताजा मामला उपसचिव पदों की वृद्धि, महीनों से लंबित इसके आदेश और फिर डीपीसी है। भारसाधक मंत्री (सीएम)ने अनुमोदन भी कर दिया है। इसके मुताबिक 40 प्रतिशत पद सचिवालय सेवा से भरे जाएंगे।
इसे लेकर संघ के वाट्सएप ग्रुप में भी हलचल है। एक ने कहा अत्यंत दुखद, मुख्यमंत्री के अनुमोदन के उपरान्त भी आदेश अभी तक नहीं जारी किया गया, जो सरासर कर्मचारी हितों के विरूद्ध कार्य को दर्शाता है, मंत्रालय के समस्त कर्मचारियों को ऐसी स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन हैं एवं इसका उपचार क्या है, इस संबंध मे तत्काल मंथन-चर्चा कर आगामी कार्यवाही करना चाहिए...अन्यथा मंत्रालय मे ऐसे ही अत्याचार-तानाशाही सहने के लिए तैयार रहिये। दूसरे ने कहा 17 तारीख (मतदान तिथि)से पहले जो करवाएगा वही अध्यक्ष बनेगा, 100 बातों की एक बात। तीसरे ने कहा -एकदम सही बात भाई। साथ ही डीपीसी भी होनी चाहिए।
फिर जवाब आया -भाई साहब, 17 तारीख के पहले पहले तक तो यह मुमकिन नहीं दिख रहा है किंतु जो अध्यक्ष और सचिव पद के लिए उम्मीदवार हो अगर वह वादा करें कि रुका हुआ आदेश जल्द जारी करवाएंगे साथ ही पदोन्नति हो, तो ऐसे उम्मीदवार को सबको सहयोग करना चाहिए आगामी चुनाव में। कर्मचारी हित सर्वोपरि होना चाहिए, संगठन को मजबूत-सार्थक बनाने में सभी कर्मचारी सहयोग करें, आगामी चुनाव मे बेस्ट को चुने, कर्मचारी एकता जिंदाबाद। 17 तारीख बहुत समय है,एक दिन में ही अनुमोदन और आदेश निकलते देखा हैं। अब देखना है आगे क्या होता है।
मुहर क्यों नहीं?

आईपीएस के वर्ष-92 बैच के अफसर अरुण देव गौतम अब तक कार्यवाहक डीजीपी बने हुए हैं। यद्यपि यूपीएससी ने तो जुलाई के पहले पखवाड़े में ही डीजीपी के लिए दो नाम का पैनल राज्य को भेज दिया था। इनमें से किसी के एक नाम पर मुहर लगनी थी, और विधिवत पूर्णकालिक डीजीपी का आदेश जारी होना था। मगर दो महीने बाद भी पूर्णकालिक डीजीपी का आदेश जारी नहीं हो पाया है।
सरकार के भीतर अरुण देव गौतम के नाम पर सहमति है। वजह यह है कि गौतम सीनियर हैं, और उनकी साख अच्छी है। बावजूद इसके पूर्णकालिक डीजीपी का आदेश जारी नहीं होने को लेकर पुलिस महकमे में कई तरह की चर्चा है। एक चर्चा यह भी है कि डीजीपी पद के बाकी दावेदार भी सत्ता, और संगठन में पकड़ रखते हैं। उनके दबाव की वजह से आदेश जारी नहीं हो पा रहा है।
दूसरी तरफ, यूपी में तो कार्यवाहक डीजीपी चार साल तक रहे। ऐसे में कार्यवाहक डीजीपी के रूप में अरुण देव गौतम कार्य करते रहेंगे या फिर पूर्णकालिक का आदेश निकलेगा, यह देखना है। वैसे तो गौतम के रिटायरमेंट में अभी दो साल बाकी है।
वाट्सएप चैट..

एक दोस्त ने बड़े प्यार से फ्रेंड को फरेंड लिख दिया और दूसरे ने सोचा कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा है। दोस्तों की नाराजगी से डरता कौन है, मान जाएगा, इसलिए उसने आपत्ति के बावजूद अगला शब्द जेंटलमैन भी गलत लिख दिया। चैट का स्क्रीनशॉट इतना ही है। आगे शनिवार की पार्टी हुई या नहीं पता नहीं चल रहा है।


