राजपथ - जनपथ

Date : 06-Nov-2018

पुलिस के कई रिटायर्ड अफसर भाजपा और कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं। रिटायर्ड डीजी राजीव श्रीवास्तव समेत कई रिटायर्ड पुलिस अफसर भाजपा की फिर सरकार बनाने के लिए माहौल बनाने में जुटे हैं, तो कांग्रेस के पक्ष में भी कुछ रिटायर्ड पुलिस अफसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें चर्चित नाम जीएस बाम्बरा का भी है। 
डीएसपी के पद से रिटायर हो चुके बाम्बरा किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। वे सालों से रायपुर में रहे हैं और हर तरह की गुत्थियां सुलझाने में माहिर माने जाते हैं। रिटायर्ड होने के बावजूद पुलिस शीर्ष अफसर अब भी अलग-अलग मामलों में उनकी सेवाएं और राय लेते हैं। बाम्बरा सिख फोरम से जुड़े हैं। वे रायपुर उत्तर के कांग्रेस प्रत्याशी कुलदीप जुनेजा को मदद कर रहे हैं। सुनते हैं कि कांग्रेस के ही कई नेता जुनेजा से खफा रहे हैं, लेकिन बाम्बरा ने उन्हें कुलदीप के पक्ष में प्रचार के लिए राजी किया। वे मूलत: सरगुजा के रहवासी हैं और सिंहदेव परिवार से उनके अच्छे संबंध हैं। वे न सिर्फ रायपुर बल्कि अन्य सीटों पर भी पार्टी के बड़े नेताओं को सलाह मशविरा दे रहे हैं। जब बाम्बरा जैसे लोग कोई सलाह देते हैं, तो उनकी बातें बिना किसी किन्तु-परन्तु के मानी जाती है। 

एक पंथ दो काज
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय कांग्रेस प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार करने आए हैं। सहाय पड़ोसी राज्य झारखंड के रहने वाले हैं। वैसे तो वे कोई भीड़ जुटाने वाले नेता तो नहीं है, लेकिन छत्तीसगढ़ से उनका नाता जरूर है। हल्ला है कि सिलतरा स्थित एक स्टील कंपनी में उनकी भागीदारी है, ऐसे में उनका छत्तीसगढ़ आना-जाना लगा रहता है। अब चुनाव चल रहे हैं, तो हिसाब-किताब देखने के साथ-साथ प्रचार भी हो जा रहा है। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 05-Nov-2018

सिंधी समाज के नेताओं ने भाजपा हाईकमान पर दबाव बनाकर श्रीचंद सुंदरानी के लिए रायपुर उत्तर की टिकट हासिल तो कर ली है, लेकिन उन्हें जिताने के लिए एकजुटता नहीं दिख रही है। श्रीचंद से नाराज कई सिंधी नेता जोगी पार्टी के प्रत्याशी अमर गिदवानी के समर्थन में आ गए हैं। गिदवानी को चुनाव मैदान से हटाने की भरसक कोशिश हुई, कई स्तरों पर चर्चा भी चली, लेकिन गिदवानी नाम वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुए। ऐसे में सिंधी वोटरों का बंटवारा तय माना जा रहा है। हालांकि सिंधी वोटरों की संख्या कोई बहुत ज्यादा नहीं है। मात्र 12 हजार सिंधी मतदाता हैं, पर जिस अंदाज में रायपुर उत्तर की सीट पर समाज से जुड़े कई लोगों ने हक जताया, उससे फायदा कम नुकसान होता ज्यादा दिख रहा है। 
रायपुर उत्तर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी कुलदीप जुनेजा को दूसरे समाजों का बैठे-बिठाए समर्थन मिल रहा है। सुनते हैं कि गुजराती समाज के एक बड़े तबके ने कुलदीप को समर्थन देने का ऐलान किया है। समाज से जुड़े लोग इस बात से ज्यादा नाराज है कि सिंधी से ज्यादा वोटर रायपुर उत्तर में गुजराती हैं। फिर भी टिकट के लिए सामाजिक दबाव नहीं बनाया। और तो और सिंधी समाज के कांग्रेस नेता अब कुलदीप के पक्ष में प्रचार के लिए तैयार हो गए हैं। पिछले चुनाव में ये नेता एक तरह से तटस्थ हो गए थे। यानी श्रीचंद की राह कठिन हो गई है, लेकिन वे भी एक जीवट विधायक की तरह पूरे 5 बरस अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे रहे। सुबह मरीन ड्राइव पर सैकड़ों लोगों से मिलकर दिन शुरू करना, और हर समारोह में पहुंचना, मेकाहारा में मरीजों से संपर्क रखना। ये सारे काम उनके काम भी आ सकते हैं। 

कमाऊ विभागों का यहां भी बोलबाला
कई पूर्व पुलिस और आबकारी अफसर अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ रहे हैं। दो रिटायर्ड डीएसपी आरके राय गुण्डरदेही और श्यामलाल कंवर रामपुर से फिर चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले चुनाव में दोनों ने अच्छे खासे वोटों से जीत हासिल की थी।  इस बार कोटा से नौकरी छोड़ चुके डीएसपी विभोर सिंह कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पूर्व सीएम अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी को टक्कर दे रहे हैं। पूर्व थानेदार अनूपनाग भी अंतागढ़ सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में डटे हैं। इससे परे पूर्व आबकारी अफसर इंद्रशाह मंडावी मानपुर-मोहला सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इससे परे एक अन्य आबकारी अफसर की पत्नी लक्ष्मी ध्रुव भी कांग्रेस टिकट से नगरी-सिहावा सीट से चुनाव मैदान में है। पुलिस और आबकारी अफसरों की राजनीति में सक्रियता चर्चा का विषय है। वैसे भी राजनीति में पैसे का बोलबाला हो गया है। ऐसे में पुलिस और आबकारी अफसर मौजूदा राजनीति की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम दिखते हैं। राजनीतिक दल भी इन्हें टिकट देने में गुरेज नहीं करती, क्योंकि ये चुनावी खर्चे के लिए दल पर निर्भर नहीं रहते हैं। ये फंड का जुगाड़ खुद कर लेते हैं। कभी कभार दूसरों की मदद भी कर देते हैं।
 सुनते हैं कि एक रिटायर्ड पुलिस अफसर ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद एक बड़े राजनेता को करीब 50 लाख उधार दिए थे।  पैसा तो वापस नहीं मिला, लेकिन पार्टी की नीति निर्धारक जरूर बन गए। अफसर को भी पैसे वापसी की जल्दी नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि नेताजी पॉवर में आएंगे तो हिसाब-किताब हो जाएगा। इधर भूपेश बघेल के खिलाफ पाटन से लड़ रही एक ताकतवर महिला प्रत्याशी के पति एक सबसे कमाऊ विभाग में इंजीनियर हैं, और वहां पर करोड़ों के खर्च की चर्चा है। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 04-Nov-2018

टिकट बंटने के बाद कांग्रेस में खींचतान और बढ़ गई है। हाल यह है कि प्रत्याशियों को नाराज नेताओं को मनाने में ज्यादा समय देना पड़ रहा है। रायपुर की सीमा से सटे विधानसभा क्षेत्र के प्रत्याशी को अपने ही दल के नेताओं से जूझना पड़ रहा है। राजीव भवन के कर्ता-धर्ता एक पदाधिकारी के भाई-बंधुओं ने प्रचार करना तो दूर, पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ ही माहौल बनाना शुरू कर दिया है। सुनते हैं कि पार्टी पदाधिकारी ने किसी एक को प्रत्याशी बनवाने के लिए प्रॉमिस कर दिया था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। अब उन्होंने पार्टी प्रत्याशी की राह में  रोड़े अटकाने शुरू कर दिए हैं। इसी तरह रायपुर जिले की एक सीट के प्रदेश संगठन के एक बड़े पदाधिकारी प्रत्याशी को पिछले दिनों एक अन्य दावेदार की नाराजगी झेलनी पड़ी। 
हुआ यूं कि संगठन के प्रमुख पदाधिकारी बी-फार्म लेने के लिए पार्टी दफ्तर पहुंचे थे। दफ्तर पहुंचते ही उनका सामना एक नेता से हो गया जो कि उसी सीट से टिकट के दावेदार थे। पहले संगठन के प्रमुख पदाधिकारी ने उनके लिए प्रयास करने का भरोसा दिलाया था, लेकिन बाद में वे उसी सीट से खुद प्रत्याशी बन गए। टिकट के वंचित नेता, पदाधिकारी को देखते ही भड़क गए। आसपास कोई और सुन न ले इसलिए पदाधिकारी उन्हें एक कमरे में ले गए। बाहर सिर्फ तेज आवाज ही सुनी गई। बाहर जब दोनों निकले तो उनके चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था। न सिर्फ रायपुर जिला बल्कि अन्य जगहों पर भी इसी तरह का तनाव देखने को मिल रहा है। 

पुनिया अब पस्त हैं
प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया अब पहले की तरह सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। वे पिछले प्रभारियों की तुलना में ज्यादा सक्रिय रहे हैं। और चुनाव शुरू होने से पहले तकरीबन सभी विधानसभा क्षेत्रों में जा चुके थे। चुनाव को लेकर इतने ज्यादा सक्रिय थे कि उन्होंने पार्टी के एक नेता को किराए का मकान देखने के लिए कह दिया था। मतदान खत्म होने तक यहां रहकर चुनाव संचालन की उनकी योजना थी, लेकिन जैसे ही विधानसभा सीटों की कथित सौदेबाजी की सीडी जारी हुई, वे यहां आने से कन्नी काटने लगे। यह भी हल्ला उड़ा कि पुनिया की भी सीडी जारी हो सकती है, काफी दिनों तक नहीं आए। चर्चा तो यह भी है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ का प्रभार छोडऩे की इच्छा भी जाहिर कर दी थी, लेकिन हाईकमान की समझाइश पर वे फिलहाल पद पर बने रहने के लिए तैयार हो गए। उनकी भूपेश बघेल से मतभेद की खबर मीडिया में छाई हुई है और उन्होंने प्रचार छोड़कर अपने आपको बैठकों तक ही सीमित कर लिया है। चर्चा तो यह भी है कि वे छत्तीसगढ़ के प्रभार से किसी तरह पीछा छुड़ाना चाहते हैं। 

सूत न कपास, जुलाहों में...
भाजपा में कुर्सी को लेकर सूरतेहाल यह है कि राजनांदगांव के शहरी नेता मधुसूदन यादव ने डोंगरगांव का रूख क्या किया, उनकी संभावित जीत के गुमान में महापौर की कुर्सी के लिए अंदरूनी तौर पर दौड़ शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव के नतीजों का अता-पता नहीं है, लेकिन नगर निगम में बहुमत वाली भाजपा में बिना लड़े एक साल की मेयर की कुर्सी को लेकर सियासी बिसात बिछ रही है। बताते हैं कि यादव के विजयी होने की पूरी उम्मीद को लेकर मेयर इन काउंसिल के सदस्य और मुखर महिला पार्षदों ने भी कुर्सी पर टकटकी लगाई  है। यादव के निर्वाचित होने की आस में बैठे भाजपा पार्षद बिना किसी उठापटक के  सीट को हथियाने की जुगत में है। पार्टी में इस  तरह की हड़बड़ाहट को लेकर कई पार्षदों को डपट खानी पड़ी। उत्साही पार्षदों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि महापौर और विधायक के पद पर एक साथ रहने में कानूनी अड़चन नहीं है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 03-Nov-2018

रायपुर उत्तर विधानसभा सीट पर जोगी कांग्रेस ने टिकट के दो दावेदारों को बी-फॉर्म जारी कर दिया है। वैसे तो जोगी कांग्रेस में जो न हो वो कम है, लेकिन इस अनोखी घटना का राज हर कोई जानने को बेताब है, एक टिकट के लिए दो बी-फॉर्म दिए जाने को लेकर तरह-तरह की कहानियां सुनने को मिल रही है। एक तो यह कि टिकट के दोनों दावेदार अमर गिदवानी और नितिन भंसाली जोगी परिवार में अच्छी पकड़ रखते हैं। इसलिए इसे दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी कहानी भाजपा के सेठ प्रत्याशी की ओर इशारा कर रही है। जोगी बंगले के ही एक दमदार नेता की मानें तो अमर गिदवानी के चुनाव लडऩे से भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगेगी। आखिर गिदवानी अपने समाज से ही वोट बटोरेंगे, जो श्रीचंद सुंदरानी के लिए नुकसानदेह साबित होगा। इसीलिए गिदवानी की जगह भंसाली को भी बी-फॉर्म दे दिया गया है, लेकिन गिदवानी को मैदान से हटाने का फैसला अभी फाइनल नहीं हुआ है। 

 प्रत्याशियों की भीड़ का राज 
इस बार विधानसभा चुनाव में लगभग हर सीट पर प्रत्याशियों की भीड़ दिख रही है। चुनाव के पंडितों के अनुसार धनलाभ के लिए चुनाव बेहतर अवसर है। प्रत्याशियों को चुनाव लडऩे को धन मिलता है और चुनाव मैदान से हटने या फिर घर बैठने का भी धन लाभ प्राप्त होता है। रायपुर दक्षिण सीट पर परंपरागत रूप से अधिक प्रत्याशी मैदान में हैं। यहां 50 में से 23 प्रत्याशी मुस्लिम समाज से हैं। दरअसल इस क्षेत्र में पिछले 27 सालों से मुस्लिम समाज एकदम से सक्रिय हो जाता है, और उसकी वजह से कांग्रेस को वोटों का नुकसान लगातार बना हुआ है।  सौ-दो सौ वोट भी पाने वाले मुस्लिम प्रत्याशी को सफल मान लिया जाता है। हजार-हजार वोटों को मिलाकर ही बड़ा फासला बनता है। आखिर में चुनावी मैदान में जो प्रत्याशी बाकी बचेंगे, वे शहर के अलग-अलग हिस्सों से कुछ दर्जन या कुछ सौ वोट पाने के हकदार साबित होंगे। लेकिन इस बार अजमेर जाना कितने लोगों को नसीब होगा, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। 
पिछले चुनाव का नतीजा देखें तो अब्दुल नईम खान को 929, शमशेर अली को 737, रईस फाजिल को 596, श्रीमती नजत अली को 259, मो. सगीरुद्दीन को 264, नियाज भाई को 247, अब्दुल कय्यूम खान को 205, वाशिम अफरीदी को 179, अजमत भाई को 105, अनवर भाई को 91, हबीब भाई को 86, मो. अफजल को 85, मजहर इकबाल को 73, मौलाना सलाम को 65, इलियास हुसैन को 64, महबूब खान को 59, फिरोज खान को 57, मो. वासिम रिजवी को 57, फरहा नाज को 50, ताजदार खान को 49, हाजी सैय्यद हकीमुद्दीन को 40 वोट मिले थे। 

दरबारियों का दुख 
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को किनारे लगा दिया है। बघेल की यह हालत यहां उनके कुछ दरबारियों को बेहद खल रही है। वे दुखी हैं और मौका मिलते ही भड़ास भी निकाल रहे हैं। सुनते हैं कि कांग्रेस भवन में रोज दोपहर को कुछ दरबारी एकत्र होते हैं और एक कमरे में बैठकर पुुनिया, सिंहदेव, महंत, जैसों को घंटों कोसते हैं और फिर घर लौट जाते हैं। वो भी दिन थे, जब प्र्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात करने के लिए लोग इन्हीं दरबारियों के आगे-पीछे घूमते थे। 

तोडफ़ोड़ के फायदे 
प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद कांग्रेस के दफ्तरों में हुई तोडफ़ोड़ और उससे हुए नुकसान को तो लोगों ने घर बैठे देख लिया। कांग्रेसजन अब तोडफ़ोड़ करवाने के फायदे भी देख रहे हैं। पार्टी के प्रदेश मुख्यालय राजीव भवन में जहां तोडफ़ोड़ करवाई गई थी, वहीं शुक्रवार को अजीब नजारा देखने को मिला। तोडफ़ोड़ करवाने वाले युवा पार्षद को पार्टी की ओर से हीरो के रूप में पेश किया गया। बकायदा उस युवा पार्षद की प्रेस कांफ्रेंस करवाई गई। प्र्रेस कांफ्रेंस में उस युवा पार्षद ने तोडफ़ोड़ के लिए माफी मांगी और पार्टी ने उसे माफ भी कर दिया। बताया गया कि तोडफ़ोड़़ से हुए नुकसान की भरपाई युवा पार्षद ही करेंगे। एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने उस पार्षद की तारीफ के कसीदे पढ़ते हुए यहां तक कह दिया कि वो तन-मन और धन से कांग्रेस के साथ हैं। ऐसे में टिकट से वंचित अन्य दावेदार हाथ मल रहे हैं कि उन्होंने हीरो बनने और पब्लिसिटी का एक बेहतर अवसर गवां दिया है।

नोट लाने-ले जाने का इंतजाम...
प्रदेश में नोटों की धरपकड़ ऐसी चल रही है कि नेता तो नेता, कारोबारी भी परेशान हो चुके हैं। ऐसे में एक पार्टी ने नोटों के लिए एक तरकीब निकाली है। इन दिनों राजधानी रायपुर में घर तक खाना पहुंचाकर देने वाले नौजवान मोटरसाइकिलों पर पीछे बड़े-बड़े बैग लिए सरपट आते-जाते हैं। एक पार्टी ने इसी मार्के वाले ऐसे ही बैग का इंतजाम किया है, और आधी रात तक आसानी से उसका इस्तेमाल हो सकता है। एक बैग में करोड़ों के नोट आ सकते हैं, या दर्जनों लीटर दारू।

भाई नहीं तो ससुर की टिकट से खुश
 राज्य पुलिस के एक बड़े अफसर के घर में कुछ दिनों से कांग्रेस की टिकट नहीं मिलने का गम अचानक से खुशियों में बदल गया और यह खुशी छत्तीसगढ़ के रास्ते नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश से होकर घर तक पहुंची। सुनते हैं कि राजधानी में पदस्थ एएसपी प्रफुल्ल ठाकुर के भाई वीरेश ठाकुर कांकेर की भानुप्रतापपुर सीट से कांग्रेस से टिकट की उम्मीद से थे। पर कांग्रेस ने मनोज मंडावी पर फिर भरोसा किया। सुनते हैं कि यह परिवार लंबे समय से कांग्रेस समर्थक रहा है। टिकट नहीं मिलने का मलाल के बीच एएसपी ठाकुर के परिवार में उस वक्त दुख सुख में बदल गया जब मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा के अमरवाड़ा सीट से ससुर प्रेमनारायण ठाकुर को भाजपा ने मैदान में उतारा। चर्चा है कि एएसपी ठाकुर का परिवार इस बात से ही खुश हो गया है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भले ही उनके परिवार को नजरअंदाज किया, लेकिन मध्यप्रदेश भाजपा में उनकी सुनी गई। कभी दिग्विजय सिंह सरकार में परिवहन मंत्री रहे प्रेमनारायण ठाकुर का राजनीतिक रसूख अमरवाड़ा इलाके में बरकरार रहा। गत चुनाव में वहां से एएसपी ठाकुर के साले साहब को भाजपा ने मौका दिया था और वे मामूली अंतर से पराजित हुए थे।   rajpathjanpath@gmail.com


Date : 02-Nov-2018

रायपुर दक्षिण की टिकट नहीं मिलने पर पार्षद एजाज ढेबर के समर्थकों ने पीसीसी दफ्तर में जमकर उत्पात मचाया। ढेबर समर्थकों का गुस्सा स्वाभाविक था। सुनते हैं कि कांग्रेस के बड़े नेता ढेबर परिवार के एक तरह से मेहमान की तरह रहे हैं। वे उनके चार सितारा होटल में ठहरते थे और लजीज व्यंजनों का लुफ्त उठाकर मुंह पोंछकर निकल जातेे थे। होटल में कभी किसी ने उन्हें बिल के लिए नहीं पूछा। और तो और प्रत्याशी चयन के लिए रायपुर आई स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य भी ढेबर के होटल में रूके थे। पिछले दो साल से कांग्रेसियों के लिए ढेबर का होटल एक तरह से गेस्ट हाऊस की तरह उपयोग हो रहा था। अब पता नहीं किस तरह स्क्रीनिंग की गई, जिसके होटल में रूके थे उनका नाम ही पैनल में नहीं रखा गया। लाखों फूंकने के बाद टिकट हाथ नहीं आई तो गुस्सा किसी न किसी पर उतरना था। सो, पीसीसी दफ्तर में बड़े नेताओं नेताओं की गैर मौजूदगी में ढेबर समर्थकों ने उनके कमरों में तोडफ़ोड़ कर खीझ निकाली। कुछ समय पहले तक कांग्रेसियों के लिए गुरुमुख सिंह होरा का होटल ऐसे ही काम आता था, और अब यह एक होटल और जुड़ गया है।

सीडी के बाद की सतर्कता

कांग्रेस में प्रत्याशी चयन में इस बार अतिरिक्त सतर्कता बरती गई। विधानसभा सीटों की सौदेबाजी की कथित सीडी आने के बाद पैसे वाले दावेदारों की पसंदीदा सीटों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया था। 
सुनते हैं कि रायगढ़ सीट के लिए एक बड़े कारोबारी ने आसपास की चार सीटों के प्रत्याशियों का खर्च उठाने की पेशकश भी की थी। प्रदेश के  एक-दो नेता तो इसके लिए तैयार भी थे, लेकिन छानबीन समिति ने कारोबारी की टिकट के लिए अनुशंसा करना तो दूर, उनका नाम पैनल में भी नहीं रखा। टिकट भी ऐसे व्यक्ति को दी गई जो कि जातिगत समीकरण के हिसाब से फिट बैठ रहा था। इसी तरह रायपुर उत्तर से पूर्व विधायक कुलदीप जुनेजा सिर्फ इसलिए टिकट पा गए कि वे सर्वे में सबसे ऊपर थे। जबकि प्रदेश के ज्यादातर बड़े नेताओं का रूझान कुकरेजा या प्रमोद दुबे की तरफ था, जिन्होंने बड़े नेताओं की सेवा सत्कार में कभी कोई कमी नहीं की। जबकि कुलदीप हाथ हिलाकर निकल जाते थे। रायपुर उत्तर की सीट पर जब मंथन हुआ तो यह बात सामने आई कि कुलदीप की जीत की संभावना सबसे ज्यादा है। विपरीत परिस्थितियों में भी वे पिछले चुनाव में कम वोटों से हारे थे। ऐसे में स्थानीय नेताओं की अनुशंसा को दरकिनार कर कुलदीप को प्रत्याशी बना दिया गया। 

खरसिया फिर चर्चा में
खरसिया का इस बार का चुनाव इस चुनाव क्षेत्र को दूसरी बार चर्चा में ला रहा है। पहली बार मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जब 80 के दशक में यहां से उपचुनाव लडऩे आए थे, और दिलीप सिंह जूदेव ने उन्हें नाकों चने चबवा दिए थे। उसके बाद इस बार का चुनाव अनोखा है कि एक कलेक्टर भरी जवानी में इस्तीफा देकर मतदाताओं के सामने उतरा हुआ है। ओपी चौधरी भाजपा की टिकट पर लड़ रहे हैं, और कहीं वे शेविंग किट बांट रहे हैं तो कहीं मतदाताओं को चमका भी रहे हैं। कुल मिलाकर वे खबरों में हैं। 
यह सीट नंद कुमार पटेल की परंपरागत सीट मानी जाती है, और जीरम घाटी के नक्सल हमले में उनके शहीद होने के बाद उनका बेटा उमेश पटेल यहां से कांगे्रस विधायक बना। इस हिसाब से यह सीट अफसरी से राजनीति में आए चौधरी के लिए आसान नहीं थी, लेकिन चुनाव में उन्होंने अपने पक्ष में एक लहर खड़ी की है। नंद कुमार पटेल के पूरी जिंदगी के साथी रहे बालक राम पटेल इस बार ओपी चौधरी के चुनाव-प्रचार में रात-दिन जुटे हुए हैं। 
कवर्धा में चौकसी
कवर्धा में पिछले चुनाव में नोटा से कम वोटों से हारने वाले कांगे्रस प्रत्याशी मोहम्मद अकबर ने पिछली बार जो सबक लिए हैं, उनका इस्तेमाल इस बार वे करने वाले हैं। अब वहां पर न तो मतदान के समय किसी एंबुलेंस से कोई सामान इधर-उधर लाया ले जाया जा सकेगा, और न ही नोटा की तरकीब काम लाई जा सकेगी।
हाथी किसके हैं?
छत्तीसगढ़ में जगह-जगह हाथियों के जत्थे खेतों और इंसानों को रौंद रहे हैं। रात-दिन चुनाव में मशगूल एक नेता ने कहा कि चारों तरफ कमल का निशान देखकर हाथियों को लग रहा है कि लक्ष्मीजी कहीं आसपास ही होंगी, और उनके अगल-बगल खड़े होने के लिए हाथी चारों तरफ तलाश कर रहे हैं। दूसरी तरफ राजनीति के कुछ और लोग कहते हैं कि बसपा का हाथी लक्ष्मीजी को ढूंढते घूम रहा है कि वे मिलें तो बैठूं। तीसरी थ्योरी यह है कि छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी बसपा के हाथी के महावत बन बैठे हैं, और उन्होंने जानबूझकर कुछ चुनिंदा इलाकों को कुचलने के लिए हाथियों को ढील दे रखी है, अब उन इलाकों के उम्मीदवारों पर है कि वे इन हाथियों की कैसी आवभगत करते हैं। फिलहाल हाथी अधिक परेशान नहीं है क्योंकि न तो वे चुनावी बातें सुनते, और न ही अखबार पढ़ते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 01-Nov-2018

दिग्गज भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ रायपुर दक्षिण सीट से कांग्रेस प्रत्याशी कौन होगा, इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। पिछले चुनाव में बृजमोहन ने तेज तर्रार नेत्री किरणमयी नायक को रिकार्ड 37 हजार से अधिक वोटों से हराया था। बृजमोहन के खिलाफ प्रत्याशी को लेकर यह धारणा रहती है कि वे या तो उनके अपने रहते हैं या फिर अपने होने का हल्ला उड़ा दिया जाता है। किरणमयी को लेकर भी कुछ इसी तरह की अफवाह उड़ी थी, जबकि वे चुनाव हारने के बाद बृजमोहन के खिलाफ अलग-अलग मामलों को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रही हैं। खैर, इस बार चुनाव में कांग्रेस से टिकट के कई दावेदार हैं। सुनते हैं कि पार्टी जिन दो-तीन नामों पर गंभीरता से विचार कर रही है उनमें से एक तो पिछले दिनों रामसागरपारा स्थित एक होटल में नजर आए। होटल जाना सामान्य बात है और इसमें किसी आपत्ति भी नहीं हो सकती, लेकिन वहां रायपुर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के भाजपा के रणनीतिकारों की बैठक चल रही थी। इस बैठक में कांग्रेस टिकट के ये प्रबल दावेदार नेता भी मौजूद थेे। अब पार्टी उनके अपने को प्रत्याशी बना देती है, तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 
वैसे बृजमोहन अग्रवाल कई मायनों में भाजपा के एक मंत्री से बड़े नेता हैं। वे कम से कम एक दर्जन सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की मदद करते हैं, नगद भी, और सामान भी। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के अलावा वे ही अकेले मंत्री हैं जो कि बहुत सी दूसरी सीटों पर, दूसरे जिलों में प्रचार करने को जाएंगे। दूसरी सीटों के लिए जिसे समय निकालना हो, वह अगर अपनी सीट पर विपक्षी चुनने में दिलचस्पी भी ले, तो उसमें नाजायज क्या है? इससे विपक्ष तक पकड़ तो पता लगती ही है।
टिकटों में चली किसकी?
यह चर्चा आम है कि भाजपा में प्रत्याशी का चयन सही नहीं किया गया। पार्टी का एक खेमा इसके लिए राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय को जिम्मेदार ठहरा रहा है। सुनते हैं कि सरोज ने आधा दर्जन से अधिक टिकटें बदलवा दी, जिससे समीकरण एकदम बिगड़ गया। सीएम जगदलपुर-कोण्डागांव सहित कई जगहों पर नया चेहरा चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। 
चर्चा तो यह भी है कि राजिम से चंद्रशेखर साहू और अभनपुर से अशोक बजाज को टिकट देने की सिफारिश की गई थी। इतना ही नहीं, जांजगीर-चांपा से नारायण चंदेल की जगह व्यास कश्यप को टिकट देने का सुझाव दिया गया था। कुछ जगह बृजमोहन अग्रवाल की वजह से टिकट नहीं बदल पाई, तो कई जगहों पर सरोज का अड़ंगा आ गया। टिकट वितरण में सरोज की अच्छी-खासी चल गई, लेकिन वे अपने भाई को टिकट नहीं दिला पाई। अब उनके लिए तेज तर्रार भाई-भाभी को मना पाना मुश्किल हो रहा है। पार्टी हाईकमान नेताओं के बागी तेवर पर निगाह रखे हुए हैं। ऐसे में आज सरोज पाण्डेय अपने भाई को लेकर भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचीं, और उससे माहौल कुछ शांत हुआ है।
भीड़ का इंतजाम मुश्किल
चुनाव आचार संहिता के चलते भाजपा-कांग्रेस नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। पिछले दिनों कांकेर की एक सभा में केन्द्रीय मंत्री रामकृपाल यादव की सभा में मात्र 40-50 लोग ही जुटे थे। कांग्रेस के पास संसाधनों की कमी है, ऐसे में प्रदेश के बड़े नेताओं की सभा में गिनती के लोग ही आ रहे हैं। राहुल गांधी की सभा में भी ज्यादा भीड़ जुट नहीं पाई थी, लेकिन भाजपा के लोग भीड़ को लेकर संवेदनशील रहते हैं और बड़े नेताओं की सभा में अच्छी खासी भीड़ जुट जाए, इसकी कोशिश रहती है। 
बावजूद इसके सीएम की चारामा के निकट हलबा गांव की सभा में गितनी के लोग ही पहुंच पाए थे। यह सभा 29 तारीख को हुई थी। सुनते हैं कि एक जिम्मेदार व्यक्ति ने सभा के लिए जरूरी इंतजाम करने के लिए जिला संगठन के प्रमुख पदाधिकारी को पांच पेटी दी थी। इन सबके बावजूद भीड़ नहीं जुटी, तो 30 तारीख को जिले के पदाधिकारी को बुलाकर खोज-खबर ली गई। जिले के पदाधिकारी इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते नजर आए। इस पर पदाधिकारियों को जमकर सुननी पड़ी। 

सीट आखिर सिंधी समाज में रही
आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद रायपुर उत्तर सीट से मौजूदा विधायक श्रीचंद सुंदरानी को टिकट मिल गई। इस बार उन्हें अपने ही समाज के अमर परवानी से लोहा लेना पड़ा। भाजपा हाईकमान मोटे तौर पर सिंधी प्रत्याशी बनाने के लिए सहमत था, लेकिन दोनों में से किसको प्रत्याशी बनाया जाए इसको लेकर अलग-अलग राय थी।  दोनों ने अपनी टिकट के लिए हाईकमान को हिला दिया था। 
सुनते हैं कि सुंदरानी को टिकट दिलाने में शदाणी दरबार के प्रमुख संत युधिष्ठिर लाल की भूमिका अहम रही है। इसके अलावा सुंदरानी के लिए नागपुर के प्रभावशाली सिंधी नेता घनश्याम कुकरेजा लॉबिंग कर रहे थे। कुकरेजा के आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से करीबी रिश्ते बताए जाते हैं, तो परवानी के लिए भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य लद्दाराम प्रयासरत थे। लद्दाराम मुंबई के रहने वाले हैं और वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। पार्टी का एक खेमा श्रीचंद सुंदरानी को टिकट देने के सख्त खिलाफ रहा है और समाज के कई लोग उनके विरोध में मुखर रहे हैं। ऐसे में परवानी का दावा मजबूत दिख रहा था। बुधवार को सरदार पटेल की जयंती के मौके पर मरीन ड्राईव में पार्टी नेता एकत्र हुए। उनमें से कुछ ने सुंदरानी को अग्रिम बधाई भी दे दी थी, लेकिन बाद में परवानी को एक मैसेज मिला, इसके बाद वे और उनके समर्थक सक्रिय हो गए। परवानी ने सिविल लाईन में कार्यालय के लिए जगह भी चिन्हित कर ली थी और वहां साफ-सफाई भी शुरू हो गई थी। दोपहर बाद खबर आई कि सुंदरानी के टिकट क्लीयर हो गई है। इसके बाद परवानी समर्थक कार्यालय बंद कर निकल गए। (rajpathjanpath@gmail.com)