राजपथ - जनपथ

Date : 02-Feb-2020

नाम में राम, पर मारा था मोहन को...
नाम में क्या रखा है। दिल्ली में अभी रामभक्त गोपाल ने बेकसूरों पर पिस्तौल लहराई, धमकियां दीं, लोगों को गद्दार कहा, और गोली चलाकर एक को घायल भी कर दिया। नाम में गोपाल भी था, और अपने आपको वह फेसबुक पर रामभक्त भी लिखता था। इसी तरह दुनिया के कई देशों में आतंकी हमले करने वाले लोगों के नाम के साथ कहीं मोहम्मद लिखा होता है, तो कहीं किसी और धर्म का नाम। नामों का ही अगर असर हुआ होता तो फिर नाथूराम ने गांधी को क्यों मारा होता? उसके नाम राम था, और गांधी के नाम में मोहन था। इन दो युगों के बीच ऐसी हिंसा की गुंजाइश क्यों निकलनी थी? 

अब इधर छत्तीसगढ़ में रेलवे के लोहे की इतिहास की सबसे बड़ी चोरी पकड़ाई है तो चोरी का माल खरीदने वाले जिन दो कारखानों से जब्ती हो रही है, उनमें से एक का नाम हिन्दुस्तान क्वाइल लिमिटेड है, और दूसरे का नाम इस्पात इंडिया फैक्ट्री। नाम में हिन्दुस्तान भी है, और इंडिया भी, और ये दोनों हिन्दुस्तानी या इंडियन रेलवे से चोरी की गई पटरियों को गलाकर लोहा बनाते पकड़ाए हैं, और कारखानों में खूब सा लोहा भी बरामद हुआ है। इसलिए नामों के फेर में नहीं पडऩा चाहिए कि नाम भला होगा तो इंसान या कारोबार भी भले होंगे। 

निरर्थक स्वागतद्वारों पर फिजूलखर्च
छत्तीसगढ़ के पहले विश्वविद्यालय, पंडित रविशंकर शुक्ल विवि का इलाका नए और बाद में बने विश्वविद्यालयों की वजह से कटते-कटते अब केवल पुराने रायपुर जिले जितना बच गया है। आज से बीस बरस पहले जो रायपुर जिला महासमुंद, धमतरी, गरियाबंद, बलौदाबाजार को मिलाकर बना था, उसमें अब ये सब जिले बनकर हट गए और सिर्फ आज का रायपुर जिला छोटा सा रह गया है। रविशंकर विश्वविद्यालय फिलहाल अविभाजित रायपुर जिले जितना बड़ा है। अब इस विश्वविद्यालय में एक दूसरी दिशा में एक सड़क निकाली जा रही है जहां पर एक नया गेट बनाने की घोषणा रजिस्ट्रार गिरीशकांत पांडेय ने आज सुबह फेसबुक पर की है। 

हिन्दुस्तान में छोटी सी छोटी पंचायत, या गांव-कस्बे में भी गेट बनाना एक बड़ा ही लोकप्रिय काम है। जिस कस्बे में एक भी सार्वजनिक शौचालय न हो, वहां भी पांच-दस लाख रूपए लागत का एक स्वागतद्वार या गेट बना दिया जाता है। आज भी रविशंकर विश्वविद्यालय में जो अकेला प्रवेशद्वार है, वह इतना बड़ा और महंगा ढांचा है कि वह तस्वीरों में कई बार गिरौदपुरी में बनाए गए विशाल जैतखंभ जैसा दिखता है। इस गेट से विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा में कोई इजाफा नहीं होता। इतनी रकम की किताबें अगर लाइब्रेरी में ले ली जातीं, लाइब्रेरी को रात-दिन चौबीसों घंटे खुलने लायक बनाया जाता तो शायद यूनिवर्सिटी की इज्जत बढ़ती। लेकिन किसी गांव-देहात की तरह विश्वविद्यालय को भी स्वागतद्वार और गेट बनाने का शौक है। 

इंटरनेट पर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की तस्वीरों को सर्च करें, तो उनकी सैकड़ों तस्वीरों में भी कोई स्वागतद्वार नहीं दिखता है।

लोगों को याद रहना चाहिए कि पिछली सरकार में जब अजय चंद्राकर कुछ समय पर्यटन मंत्री भी थे, उन्होंने रायपुर-धमतरी सड़क से चंद्राकर के कस्बे कुरूद जाने वाली सड़क पर डेढ़-पौने दो करोड़ रूपए की लागत से स्वागतद्वार बनवाया था। उसकी वजह से एक पर्यटक भी कुरूद की ओर मुड़ा हो ऐसा नहीं लगता, लेकिन कोई शहर-कस्बा अपनी बाकी खूबियों से लोगों का स्वागत करे, उसके बजाय स्वागतद्वार का महंगा निर्माण करना सत्ता की एक रहस्यमय चाह रहती है। इसी तरह पूरी प्रदेश में पिछले बरसों में जगह-जगह ताकतवर मंत्रियों और विधायकों ने अपने इलाकों में पर्यटन-रिसॉर्ट बनवा दिए जो कि अब खंडहर हो रहे हैं। उन्हें ऐसी जगह बनाया गया जहां किसी पर्यटक के पहुंचने की संभावना नहीं थी, और अब आसपास निर्माण का ठेका लेने वाले ठेकेदार ऐसे रिसॉर्ट को अपने गोदाम की तरह इस्तेमाल करते हैं।
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Date : 01-Feb-2020

भाजपा में गुटबाजी-असंतोष
खबर है कि प्रदेश भाजपा में गुटबाजी से हाईकमान चिंतित है। कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के बड़े नेताओं के बीच खाई और बढ़ गई है। इस वजह से पहले विधानसभा उपचुनावों और फिर म्युनिसिपल चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। पंचायत चुनाव में भी कोई अच्छे आसार नहीं दिख रहे हैं। खुद अमित शाह के कार्यक्रम में गुटबाजी का नजारा साफ देखने को मिला। 

वैसे तो शाह करीब 2 घंटे कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में रहे। मगर मंच संचालन से लेकर स्वागत और मेल-मुलाकात संगठन में हावी नेताओं तक ही सीमित रहा। दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर और प्रेम प्रकाश पांडेय, नारायण चंदेल जैसे दिग्गज नेताओं को मंच पर बिठाना तो दूर, स्वागत सत्कार के लिए भी नहीं बुलाया गया। स्वागत भाषण से लेकर सत्कार और मेल-मुलाकात का पूरा कार्यक्रम संगठन पर हावी मंचस्थ 4-5 नेताओं तक ही सीमित रहा। जबकि कुछ नेता प्रदेश संगठन की स्थिति को लेकर अपनी बात अमित शाह तक पहुंचाना चाहते थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला।

सुनते हैं कि पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर दिल्ली में कई बड़े नेताओं से मिलकर कार्यकर्ताओं में बढ़ते असंतोष की तरफ ध्यान दिला चुके हैं। यह भी कहा गया है कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक और प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी का अब तक का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। ऐसे में दोनों में से कम से कम एक को बदलने पर जोर दिया जा रहा है। मगर कंवर जैसे नेताओं की शिकायतों को कितना महत्व मिलता है, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा, फिलहाल तो पिछले बरसों का इतिहास बताता है कि ननकीराम कंवर के पिछले दस बरस महज पार्टी के भीतर के असंतुष्ट की हैसियत से गुजरे हैं। वे जब गृहमंत्री थे, तब भी सरकार के भीतर कुछ जायज, या नाजायज वजहों से वे असंतुष्ट ही बने रहते थे।

पैसे वाला होना, और ईमानदार होना...
कुछ लोगों को यह लगता है कि जिनके पास बहुत पैसा है, वे लोग गलत तरीके से पैसा क्यों कमाएंगे? एक वक्त था जब चुनाव में किसी उम्मीदवार को वोट देते समय लोग यह चर्चा करते थे कि उसके पास पहले से इतना पैसा है, तो कम से कम लूटपाट तो नहीं करेगा। लेकिन ऐसे लोग भी जीतने के बाद करोड़पति से अरबपति, और अरबपति से खरबपति बनने के लिए मुंह पर गमछा बांधे बिना ही सरकारी लूटपाट में लग जाते थे, और धीरे-धीरे यह तर्क बेअसर हो गया। अब कुछ लोग गरीब को वोट देने की बात जरूर करते हैं कि उसे गरीबी में जीने की आदत है, और हो सकता है कि वह ईमानदारी से राजनीति और सरकार चला ले। 

लेकिन छत्तीसगढ़ में बड़े-बड़े रईसों के ऐसे-ऐसे भ्रष्टाचार, और आर्थिक अपराध सामने आए हैं कि लोगों को लगता है कि इनको जरूरत क्या थी? छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सेठ कहलाने वाले परिवार के अरबपति माने जाने वाले वारिस कुछ करोड़ की धोखाधड़ी में पूरे कुनबे सहित जेल और कटघरे में हैं। 

अभी बंगाल के कोलकाता में दो बड़े कारोबारियों के नौजवान लड़कों ने दर्जनों महिलाओं और लड़कियों के साथ अपने सेक्स-वीडियो बनाए, और उनको ब्लैकमेल करके उनसे पांच-दस लाख रूपए जैसी रकम वसूल करना शुरू किया। पुलिस को इनके जब्त किए गए लैपटॉप से ऐसे दर्जनों वीडियो मिले हैं, और इन दोनों रईस नौजवानों को गिरफ्तार किया गया है। इसलिए लोगों को किसी की संपन्नता की वजह से उसके मुजरिम न होने जैसी बात नहीं सोचना चाहिए। घर का रईस होना, करोड़पति या अरबपति होना किसी को जुर्म से परे रख पाए ऐसा जरूरी नहीं है। 


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Date : 31-Jan-2020

प्रकाश बजाज पर सनसनी

भाजपा नेता प्रकाश बजाज एक बार फिर सुर्खियों में है। बजाज चर्चित सेक्स-सीडी कांड के शिकायतकर्ता रहे हैं। उनके खिलाफ छेड़छाड़ और धोखाधड़ी के कई गंभीर आरोप हैं। बजाज को नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक का करीबी माना जाता है। सुनते हैं कि प्रकाश बजाज ने पिछले दिनों केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की। बजाज के साथ एक प्रतिनिधिमंडल भी था। 

बजाज की अमित शाह से मुलाकात ऐसे समय में हुई जब पार्टी के बड़े नेता उनसे मुलाकात के लिए मशक्कत कर रहे थे, लेकिन उन्हें समय नहीं मिला। सिर्फ चार प्रतिनिधिमंडलों को मुलाकात के लिए समय दिया गया था। इन्हीं में से एक के साथ प्रकाश बजाज भी अमित शाह से मिलकर आ गए। पार्टी के अंदरखाने में प्रकाश बजाज को अमित शाह से मुलाकात के लिए समय दिलाने की तीखी प्रतिक्रिया हो रही है। हालांकि कुछ लोग बजाज की अमित शाह से मुलाकात का खंडन भी कर रहे हैं। 

पार्टी के कई नेताओं ने मुलाकातियों की सूची निकलवाई भी है, जिसमें आखिरी में प्रकाशजी लिखा है। दावा किया जा रहा है कि उनके सरनेम को जानबूझकर छोड़ दिया गया, ताकि कोई विवाद न हो। प्रकाश बजाज की अमित शाह से क्या चर्चा हुई है, इसको लेकर उत्सुकता भी है। इस संवाददाता ने प्रकाश से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनका मोबाइल बंद मिला। मगर जिस व्यक्ति के खिलाफ कई गंभीर आरोप हैं और कुछ दिन पहले तक जेल में रहा है उसे केन्द्रीय गृहमंत्री से मुलाकात कराने की शिकायत पार्टी हाईकमान से भी की जा रही है। इस मामले में कुछ बड़े नेता निशाने पर भी हैं। 

हाईकोर्ट का फैसला, और अटकलें...
सरकार और सियासत से जुड़े हुए लोगों की अटकल लगाने की क्षमता अपार होती है। कल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का एक बड़ा कड़ा फैसला आया जिसमें पिछली सरकार के कार्यकाल में नि:शक्तजनों के लिए सरकार से अपार पैसा लिया गया, और उसे इधर-उधर कर दिया गया। अदालत ने इस मामले की जांच सीबीआई को दे दी, और जांच के घेरे में राज्य के कुछ सबसे बड़े अफसर रहे लोगों के नाम आ रहे हैं। ये नाम हक्का-बक्का कर रहे हैं। अब चूंकि इस मामले में अदालत ने राज्य सरकार से भी जवाब मांगा था, इसलिए यह अटकल भी लग रही है कि क्या सरकार इन अफसरों में से कुछ, या कई, या सभी को जांच में फंसने देना चाहती है? फैसला अदालत का है, लेकिन अदालत में सरकार का पक्ष तो सरकार ही रखती है, और उसी बात को लेकर कल रात राज्य में जगह-जगह यह अटकलबाजी चल रही थी। 

ठीक इसी तरह की अटकलबाजी इस बात को लेकर भी चल रही थी कि सीबीआई इस मामले में क्या रूख दिखाएगी। देश की यह सबसे बड़ी जांच एजेंसी लंबे वक्त बाद छत्तीसगढ़ में अदालती आदेश से किसी जांच में आने का एक मौका पा रही है, और इस बात को लेकर भी राज्य के कुछ लोगों में बेचैनी है, हालांकि सीबीआई यहां किसी और केस की जांच नहीं कर पाएगी, और इस मामले में भी तकरीबन सारे लोग रिटायर हो चुके हैं, या सरकार की फिक्र उन्हें लेकर नहीं है। अब चूंकि सीबीआई केन्द्र सरकार के मातहत है, इसलिए लोग यह अटकल भी लगा रहे हैं कि क्या भाजपा सरकार के दौरान का यह बड़ा मामला पूरी तरह हल किया जाएगा, या फिर सीबीआई कुछ नरमी बरतेगी? सीबीआई के कामकाज की जानकारी रखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि उसकी जांच में बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं डाला जा सकता, और अगर कागजात भ्रष्टाचार बताएंगे, तो वह बात जांच में आ ही जाएगी। 

फिलहाल यह छत्तीसगढ़ के इतिहास का एक सबसे बड़ा भ्रष्टाचार दिख रहा है, और सबसे बड़े नामों वाला भी। आगे पता लगेगा कि इसके लिए कौन कुसूरवार पाए जाते हैं। 
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Date : 30-Jan-2020

आदिवासी भाजपा नेताओं में तलवारें
भाजपा के दो पूर्व गृहमंत्री रामविचार नेताम और रामसेवक पैंकरा के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ गई है। नेताम की पत्नी पुष्पा नेताम जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ रही हैं। पुष्पा जिस क्षेत्र से चुनाव लड़ रही है, वह प्रतापपुर विधानसभा का हिस्सा है, जहां से पैकरा विधायक रह चुके हैं। ये अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में पैकरा को बुरी हार का सामना करना पड़ा था। सुनते हैं कि पैंकरा कतई नहीं चाहते थे कि रामविचार की पत्नी प्रतापपुर इलाके से चुनाव लड़े। 

नेताम अपनी पुत्री को तो अपने विधानसभा क्षेत्र रामानुजगंज से चुनाव लड़ा रहे हैं, लेकिन पत्नी को दूसरे के इलाके से चुनाव मैदान में उतार दिया है। पुष्पा चुनाव जीत जाती है, तो प्रतापपुर में रामविचार की दखल बढ़ जाएगी। वैसे भी रामानुजगंज के बजाए रामविचार प्रतापपुर विधानसभा सीट को अपने लिए ज्यादा बेहतर मानते हैं। यही वजह है कि वे अपनी पत्नी को जिताने के लिए मेहनत कर रहे हैं। दूसरी तरफ पार्टी के स्थानीय नेताओं के बीच चर्चा है कि पैंकरा से जुड़े लोग कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार को मदद कर रहे हैं। ऐसे में पुष्पा की राह आसान नहीं रह गई है। फिलहाल जानकारों की नजर इस हाईप्रोफाइल बन चुके जिला पंचायत सीट पर टिकी हैं।

देवव्रत ने पलटी मारी
वैसे तो म्युनिसिपल चुनाव में जोगी पार्टी के विधायक देवव्रत सिंह ने  कांग्रेस का साथ दिया था। मगर पंचायत चुनाव में उन्होंने पलटी मार दी। उन्होंने अपने खैरागढ़ विधानसभा क्षेत्र के जिला पंचायत के चुनाव में पूर्व सीएम रमन सिंह के भांजे विक्रांत सिंह को सपोर्ट किया। देवव्रत की मेहनत का ही नतीजा है कि विक्रांत किसी तरह चुनाव जीतने में सफल रहे। सुनते हैं कि देवव्रत ने अपने इलाके में लोधी फैक्टर को कमजोर करने के इरादे से ऐसा किया है। 

खैरागढ़ में लोधी समाज के मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। एक बार देवव्रत की पत्नी लोधी फैक्टर के चलते हार गई थी। खुद विधानसभा का चुनाव सिर्फ इस वजह से जीत पाए कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही लोधी उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे। लोधी मतों के बंटने का फायदा देवव्रत को मिला और वे किसी तरह चुनाव जीतने में सफल रहे। हल्ला यह भी है कि विधानसभा चुनाव में विक्रांत और उनके समर्थकों ने देवव्रत का अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग किया था। ऐसे में देवव्रत ने विक्रांत को सहयोग किया है, तो गलत नहीं है। वैसे भी देवव्रत को छोड़कर जोगी पार्टी के अन्य विधायक भाजपा के ज्यादा करीब दिख रहे थे। अब देवव्रत भी इसी राह पर जा रहे हैं। 

हवा बदली है समझो साहब...
छत्तीसगढ़ सरकार में अफसरों को भाजपा सरकार के तीन कार्यकाल के बाद बदले हुए माहौल को समझने में थोड़ा सा वक्त लग रहा है। आज गांधी पुण्यतिथि पर देश भर में केन्द्र सरकार के निर्देश पर लंबे समय से शहीद दिवस मनाया जाता है। केन्द्र सरकार के ही निर्देश का ही जिक्र करते हुए राज्य शासन ने कल एक आदेश निकाला जिसमें स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाले लोगों की स्मृति में दो मिनट का मौन रखने के लिए कहा गया। यह आदेश हर बरस से चले आ रहा है, और केन्द्र सरकार में भी यूपीए के समय का है। इसमें गांधी की शहादत की सालगिरह का कोई जिक्र नहीं है। लेकिन छत्तीसगढ़ की नई कांग्रेस सरकार लगातार गांधी को एक मुद्दा बनाकर एक वैचारिक लड़ाई लड़ते आ रही है। ऐसे में इस सर्कुलर में गांधी का जिक्र भी न होना थोड़ा सा अटपटा था, फिर चाहे वह प्रतिवर्षानुसार ही क्यों न हो, चाहे वह केन्द्र सरकार के सर्कुलर के अनुसार ही क्यों न हो। बीती रात जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ध्यान इस तरफ खींचा गया, तो उन्होंने खासी नाराजगी जाहिर की, और उसके बाद हड़बड़ी में स्कूल शिक्षा विभाग का एक सर्कुलर निकाला गया जिसमें आज गांधी पुण्यतिथि पर दो मिनट के मौन का जिक्र किया गया। 

कुछ ऐसा ही हाल मुख्यमंत्री की उस घोषणा का हुआ था जो कुछ महीने पहले उन्होंने विधानसभा में की थी। स्कूलों में संविधान का पाठ पढ़ाया जाएगा, इसकी घोषणा के बाद भी स्कूल शिक्षा विभाग ने ऐसा कोई आदेश नहीं निकाला था, और न ही कोई योजना बनाई थी। अभी चार दिन पहले स्कूल शिक्षा के नए प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला के आने के बाद ऐसा आदेश निकला और स्कूलों में संविधान पर चर्चा शुरू होने जा रही है। सरकार में कामकाज बंधी-बंधाई लीक पर चल रहा है, और देश-प्रदेश में बदली हुई सोच की कोई झलक उसमें कम ही दिखाई पड़ती है। 
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Date : 29-Jan-2020

जनसंपर्क की बदली हवा

सरकार बदलने के बाद जनसंपर्क विभाग के कामकाज में काफी बदलाव देखने को मिला है। आमतौर पर जनसंपर्क विभाग के सचिव-संचालक का पद काफी प्रतिष्ठा और चुनौतीपूर्ण माना जाता है। पिछली सरकार में तो इन पदों पर तैनात अफसरों पर राजनीतिक गतिविधियों में लिप्त रहने और विपक्षी नेताओं की सीडी बनवाने जैसे संगीन आरोप तक लगे थे। विभाग के कई अफसरों के खिलाफ जांच चल रही है। इन सबको देखकर सीएम भूपेश बघेल ने साफ-सुथरी छवि के अफसरों की पोस्टिंग की। अब डीडी सिंह को सरकार के प्रचार-प्रसार का जिम्मा दिया गया है। 

डीडी सिंह प्रदेश के उन चुनिंदा अफसरों में से हैं, जो राज्य प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में आए और केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव पद के लिए सूचीबद्ध हुए हैं। उनकी साख काफी अच्छी है। उनके मातहत संचालक तारण प्रकाश सिन्हा को भी डीडी सिंह की तरह नियम-कायदे पसंद और लो-प्रोफाइल में रहकर काम करने वाला अफसर माना जाता है। छत्तीसगढ़ बनने के बाद यह पहला मौका है कि जनसंपर्क सचिव के पद पर राज्य का ही एक आदिवासी अफसर नियुक्त हुआ है। डीडी सिंह के पहले झारखंड के आदिवासी राजेश सुकुमार टोप्पो इस विभाग के विशेष सचिव और प्रभारी सचिव रहे, लेकिन उनके कार्यकाल का अंत बहुत ही खराब हुआ।

खास बात यह है कि डीडी सिंह और तारण सिन्हा, दोनों ही अफसर छत्तीसगढिय़ा हैं और उनकी अपनी नौकरी का ज्यादा हिस्सा छत्तीसगढ़ में ही गुजरा है। बरसों बाद ऐसा मौका आया है जब मीडिया पर सरकारी तंत्र का कोई दबाव नहीं दिख रहा है। न सिर्फ दोनों बल्कि विभाग के अन्य अफसर पर चुपचाप लो-प्रोफाइल में काम करते दिख रहे हैं। इसका नजारा गणतंत्र दिवस के संवाद दफ्तर के ध्वाजारोहण कार्यक्रम में उस वक्त देखने को मिला, जब संवाद के प्रमुख उमेश मिश्रा ने खुद ध्वजारोहण करने के बजाए सबसे पुरानी महिला सफाईकर्मी से ध्वजारोहण कराकर सामाजिक भागीदारी और बराबरी का संदेश देने की कोशिश की।

बीच में एक समय ऐसा भी आया था जब रमन सिंह के एक जनसंपर्क सचिव अपने और अपने पिता के प्रचार में लगे रहते थे, और मीडिया से विभाग के संबंध सबसे खराब स्तर पर पहुंच गए थे। बाद में जब इस सचिव को गंभीर शिकायतों के चलते जनसंपर्क से हटाया गया, तो साथ-साथ उसका मलाईदार विभाग आबकारी भी चले गया था।

कमाई का जरिया बढ़ा...
जिला स्तर पर सरकारी अफसरों की कमाई के कुछ बंधे-बंधाए जरिये होते हैं। कुछ विभाग ही कमाऊ होते हैं जो विभागीय अफसरों के लिए और उनके ऊपर के अफसरों के लिए नियमित कमाई जुटाते रहते हैं। अब छत्तीसगढ़ में ऐसी कमाई में एक बड़ा इजाफा रेत की खदानों को लेकर हुआ है। सरकार ने रेत खदानों नीलामी की, तो अधिकतर पुराने शराब ठेकेदारों ने अपने लोगों के नाम से लॉटरी डाली, और जगह-जगह उनको खदानें मिल गई हैं। एक वक्त रेत खदान चलाने वाले छोटे लोग रहते थे, लेकिन अब जब कलेक्ट्रेट में यह बात साफ हो गई है कि किन नामों के पीछे कौन से अरबपति भूतपूर्व दारू ठेकेदार हैं, तो रेत से भी अफसरों को दारू जैसी कमाई की उम्मीद बंध गई। खनिज विभाग के अफसर रेत खदानों के एग्रीमेंट के पहले अपना हिस्सा भी रखवा रहे हैं, और अपने से ऊपर वालों का भी। नतीजा यह है कि कारोबार शुरू होने के पहले बड़ा पूंजीनिवेश हुए जा रहा है। एक जिले में कलेक्टर ने इतना बड़ा मुंह फाड़ दिया है कि खदान पाने वाले ने काम छोड़ देना तय किया है। खनिज अफसर अधिक व्यवहारिक रहते हैं, इसलिए वे कमाई का अंदाज लगाकर अपना हिस्सा मांगते हैं। लेकिन बड़े अफसर तो बड़े अफसर रहते हैं। ऐसे एक कलेक्टर को मातहत लोगों ने जाकर कहा कि उनके करीबी, एक दूसरे जिले के कलेक्टर इससे आधा भी नहीं ले रहे हैं, उनसे एक बार समझ तो लीजिए। 


Date : 28-Jan-2020

तस्वीरें असली हैं या नकली?
अड़ोस-पड़ोस के कुछ जिलों के कलेक्टर-एसपी और कुछ अन्य आला अफसरों  की पार्टी मनाते तस्वीरें वायरल हुई हंै। तस्वीरों में ऐसा-वैसा कुछ नहीं है। मगर पार्टी में मौजूद एक महिला अफसर ने सेल्फी ली और मोबाइल का एंगल कुछ इस तरह बन गया कि टेबल में मौजूद वाइन, और बीयर की बोतलें और चखना-चिकन भी आ गया। इसमें भी कोई बुरी बात नहीं है। गणतंत्र दिवस में प्रशासनिक-कानून व्यवस्था का टेंशन काफी रहता है। ऐसे में थकाऊ भरे कार्यक्रम के सफलतापूर्वक निपटने पर पार्टी तो बनती है। मगर आलोचकों का ध्यान खाद्य सामग्री पर ज्यादा है और वे इस पर टीका-टिप्पणी कर रहे हैं। दिक्कत यह भी हो गई है कि सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि फोटो गणतंत्र दिवस की शाम की हैं और पोस्ट करने के कुछ देर बाद उन्हें हटा भी दिया गया था। अब गणतंत्र दिवस को दारूबंदी रहती है, इसलिए फोटो अधिक सनसनीखेज लग रही हैं। यह ठिकाना नहीं है कि ये तस्वीरें सचमुच इनमें से एक अफसर के फेसबुक पर पोस्ट की गई थीं, या फिर किसी फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर से कहीं की फोटो किसी दिन की पोस्ट पर जोड़कर उसे गणतंत्र दिवस पर पीने की फोटो बता दिया गया। सब कुछ मुमकिन है। और लोगों का काम तो है ही कुछ न कुछ कहना....। 

कुर्सी गायब ही हो गई...
प्रोफेसर रोहणी प्रसाद को सरगुजा विवि के कुलपति पद से तो हटा दिया गया था, लेकिन रविवि में उनकी ज्वाइनिंग नहीं ली जा रही है। प्रसाद पर  यौन उत्पीड़ऩ सहित कई अन्य आरोप हैं। इन आरोपों के चलते उन्हें पद से हटाया गया। हालांकि प्रसाद ने जांच रिपोर्ट को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उनसे जुड़े लोग मानते हैं कि आरएसएस के करीबी होने की वजह से उन्हें निशाना बनाया गया। वैसे ऐसा कहना उन महिलाओं का अपमान है जिन्होंने यौन प्रताडऩा की शिकायत की थी। खैर, प्रसाद पद से हटे हैं, तो उनकी मूल पदस्थापना स्थल पर ज्वाइनिंग होनी थी। मगर रविवि प्रशासन ने उन्हें यह कहकर लौटा दिया कि प्रसाद के पास कोई रिलीविंग ऑर्डर नहीं है। 

चूंकि सरगुजा विवि में प्रसाद को हटाकर सरगुजा कमिश्नर को कुलपति का चार्ज दिया गया। कमिश्नर ने एकतरफा चार्ज भी ले लिया। ऐसे में उन्हें रिलीव कौन करता? प्रसाद ने राजभवन को पत्र भेजकर वस्तु स्थिति से अवगत कराया। सुनते हैं कि राजभवन ने रविवि प्रशासन को प्रसाद को पद से हटाए जाने की सूचना भी भेजी है। इन सबके बाद भी प्रसादजी की जाइनिंग नहीं हो पा रही है। प्रसादजी का हाल यह है कि वे कुलपति और कुल सचिव से मिल रहे हैं। मगर उन्हें ज्वाइन क्यों करने नहीं दिया जा रहा है, यह कोई बता नहीं रहा है। 


Date : 24-Jan-2020

हाथी का खरीददार नहीं
रायपुर का एक भव्य विवाहघर बिकने जा रहा है। चर्चा है कि विवाहघर की निर्माण में कई नेताओं ने अपनी पूंजी लगाई थी, लेकिन अपेक्षाकृत मुनाफा नहीं हो रहा है। उल्टे प्रभावशाली लोगों के यहां की शादियों के लिए तो किराया भी कम कर देना पड़ता है। यह सब देखकर अब निवेशकों ने विवाहघर के संचालक पर दबाव बनाया है कि वह उसे बेच दे। 

सुनते हैं कि पहले सवा सौ करोड़ के आसपास में विवाहघर को बेचना तय हुआ था। यह सौदा कई कांग्रेस नेताओं के पास भी पहुंचा। मगर इतनी राशि देने के लिए कोई तैयार नहीं है। भारी मंदी के चलते विवाहघर के लिए कीमत अब आधी कर दी गई है, लेकिन बाजार का हाल इतना बुरा है कि कोई खरीददार आगे नहीं आ रहा है। हाथी को पालना आसान नहीं होता, वह सर्कस में काम न करे, चुनावी रैली में न निकले, झांकियों में किराए पर न चले, तो भी रोज एक क्विंटल खाता है, और दो मजदूरों के उठाने लायक हगता है। ऐसे बड़े विवाहघर का हाल भी यही है।

दूसरे का माल, खुद की वाहवाही
रायपुर स्मार्ट सिटी परियोजना के कार्यों की केन्द्र सरकार गुपचुप जांच करा रही है। हुआ यूं कि डीएमएफ से हुए कई निर्माण कार्यों को स्मार्ट सिटी के मद से होना बता दिया गया है। स्मार्ट सिटी के ब्रोशर में नालंदा परिसर, आक्सीजोन सहित कई योजनाओं का जिक्र है। मगर ये सब कार्य डीएमएफ से हुए हैं। ऐसे में स्मार्ट सिटी परियोजना के कार्यों में भारी अनियमितता की शिकायत भी हुई है। इन शिकायतों को केन्द्र सरकार ने गंभीरता से लिया है। स्मार्ट सिटी के बहाने राज्य सरकार को घेरने का मौका भी है और देर सबेर कई छोटे-बड़े अफसर लपेटे में आ सकते हैं। रायपुर म्युनिसिपल और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की एक दिक्कत यह भी है कि इनकी रग-रग से वाकिफ सुनील सोनी दो बार यहां महापौर थे, और अब सांसद होने के नाते संसद की इस कमेटी में भी हैं जो स्मार्ट सिटी को भी देख रही है।

दांत तो दांत, अब पथरी भी!
स्मार्ट कार्ड से गंभीर बीमारियों के इलाज की सुविधा रहती है। सरकार ने कुछ बीमारियों को इससे अलग कर दिया है। जिसमें दांतों के रोग और पथरी की बीमारी भी शामिल हैं। दोनों बीमारियों के इलाज के नाम पर चिकित्सक मालामाल हो रहे थे। दांतों की चिकित्सा के नाम पर स्मार्ट कार्ड की राशि के दुरूपयोग के मामले की पड़ताल भी चल रही है। कुछ चिकित्सकों पर कार्रवाई भी हुई है। प्रदेश के दंत चिकित्सक और पथरी का ऑपरेशन करने वाले चिकित्सक एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं कि स्मार्ट कार्ड से इलाज की सुविधा दोबारा चालू की जाए। सुनते हैं कि कांग्रेस के कई प्रभावशाली नेताओं ने पथरी के डॉक्टरों के लिए लॉबिंग की है। पार्टी के बाबूजी ने भी अनुशंसा की है कि स्मार्ट कार्ड से इलाज की सुविधा में कम से कम पथरी के ऑपरेशन को भी रखा जाए। मगर सरकार है कि इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है।  ((rajpathjanpath@gmail.com))


Date : 23-Jan-2020

रिकॉर्ड टूटेगा या नहीं?
पंचायत चुनाव में दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर है। दिग्गज नेता अपने करीबियों को जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव अपने भतीजे आदितेश्वर शरण सिंहदेव (आदि बाबा) को अच्छे मतों से जिताने के लिए खुद मेहनत कर रहे हैं। आदि बाबा के पक्ष में अच्छा खासा माहौल भी दिख रहा है। सरगुजा के बड़े भाजपा नेता आदि बाबा के आगे नतमस्तक होते दिख रहे हैं। 

सिंहदेव के उत्साही समर्थक दावा कर रहे हैं कि आदि बाबा को रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल होगी। जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में सबसे ज्यादा मतों से जीत का रिकॉर्ड कवर्धा के पूर्व विधायक योगीराज सिंह के नाम पर दर्ज है। उन्हें जिला पंचायत चुनाव में करीब 92 फीसदी वोट मिले थे। आदि बाबा के समर्थक इस रिकॉर्ड को ध्वस्त करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। पहले तो यह लग रहा था कि आदि बाबा आसानी से रिकॉर्ड ध्वस्त कर सकते हैं। मगर जाति समीकरण भी आड़े आता दिख रहा है। उनके क्षेत्र में रजवाड़ वोटर काफी हैं। भाजपा ने यहां रजवाड़ समाज के प्रत्याशी का समर्थन कर आदि बाबा को थोड़ी चुनौती देने की कोशिश की है। ऐसे में योगीराज का रिकॉर्ड टूटेगा या नहीं, यह देखना है। 

खतरा और हिफाजत
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक उद्योगपति के अपहरण के बाद प्रदेश के पैसे वालों में एक दहशत फैली हुई हैं। जाहिर है कि जो तबका अपने आपको किसी धमकी या फिरौती के लायक संपन्न पाता है, उसे न सिर्फ डर होगा, बल्कि उस पर एक असर खतरा भी मंडराता रहेगा। फिर इस बार तो यह भी पता लगा है कि किसी अधिक संपन्न के धोखे में कम संपन्न उद्योगपति को उठा लिया गया क्योंकि दोनों के कारखाने अगल-बगल थे, और दोनों की गाडिय़ां एक रंग, एक मॉडल की थीं। अब बहुत से लोगों ने हिफाजत के लिए गनमैन रख लिए हैं, कुछ ने खुद के लिए नहीं रखे, तो अपने बच्चों के लिए रख लिए हैं। दूसरी तरफ मोबाइल फोन पर कुछ ऐसे एप्लीकेशन भी हैं जो कि फोन की लोकेशन दूसरे तय किए गए फोन पर दिखा सकते हैं, और इस तरह एक कंपनी के कुछ लोग, या एक परिवार के कुछ लोग एक-दूसरे की लोकेशन जानने की इजाजत फोन पर सेट कर सकते हैं। 

लेकिन इससे लोकेशन तो पता लगती है, लेकिन अपहरण करने वाले तो सबसे पहले मोबाइल फोन कब्जे में करके उसे बंद कर देते हैं ताकि आगे की फरारी का रास्ता पुलिस को फोन की लोकेशन से न दिखे। ऐसे में लोग बिना घंटी वाला एक दूसरा छोटा फोन, या लोकेशन-ट्रैकर कपड़ों में कहीं छुपा कर रख सकते हैं, और अगर वह अपहरण करने वालों को न दिखा तो उसकी चार्जिंग तक तो घर-दफ्तर के तय किए गए नंबरों पर लोकेशन दिखेगी। ये बातें तो साधारण समझ की हैं, लेकिन कुछ ऐसी जानकार इलेक्ट्रॉनिक कंपनियां बाजार में हैं जो कि मोबाइल फोन से छोटे लोकेशन-ट्रैकर भी बेचती हैं। इनमें से कुछ लोकेशन-ट्रैकर तो सिक्कों से थोड़े बड़े ही हैं। अब लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करके अपनी जरूरत के लायक ट्रैकर छांटें, और थोड़ी सी प्राइवेसी खोकर बड़ी सी हिफाजत का इंतजाम भी करें। ऐसे ट्रैकर महंगे सामानों के बैग में भी रखे जा सकते हैं, और स्कूली बच्चों के बैग में भी। लेकिन ये तभी तक हिफाजत देते हैं जब तक इनसे जुड़े हुए फोन किसी मुजरिम के हाथ न लग जाएं। 

अभी रायपुर में हुए अपहरण के बारे में यह पता लग रहा है कि इधर-उधर जगह बदलते हुए अपहरणकर्ता उद्योगपति के मोबाइल से ही उसके परिवार को फोन लगा लेते हैं, और फिर फोन बंद कर लेते हैं। पुलिस और अपहरणकर्ताओं के बीच लुकाछिपी चल रही है, और ऐसे में ज्यादा जानकारी देना जिम्मेदारी नहीं है, हालांकि गलाकाट मुकाबले के इस दौर में मीडिया के अपने पापी पेट का भी सवाल है जो अपने ग्राहकों को रोजाना कुछ न कुछ नई जानकारी देने को मजबूर भी हैं। 

अब उद्योगपतियों और कारोबारियों को हिफाजत की जरूरत के समय जो फोन एप्लीकेशन और उपकरण सूझ रहे हैं, वे बाहर घूम-फिरकर काम करने वाले कर्मचारियों पर नजर रखने के काम भी आ सकते हैं, और कहीं-कहीं पर आ भी रहे हैं। जो कारोबार के काम से दौरे पर रहते हैं, या शहर में ही घूम-फिरकर काम करते हैं, उनके फोन भी उनका ठिकाना और वक्त अच्छी तरह बता सकते हैं। टेक्नालॉजी तो अपने आपमें कोई अक्ल नहीं रखती है, लोकेशन पर नजर चाहे कुत्तों पर रखनी हो, चाहे बच्चों पर, चाहे खुद पर और या फिर कर्मचारियों पर। 


Date : 22-Jan-2020

पहले भुगतान का खतरा

खबर है कि सीएम भूपेश बघेल की सख्ती के चलते सरकारी स्कूलों में खेल सामग्री सप्लाई के नाम पर गड़बड़ी की कोशिशों पर अंकुश लगा है। सुनते हैं कि एक दिग्गज नेता ने कई सप्लायरों से ऑर्डर दिलाने  के नाम पर काफी कुछ ले लिया था। एक-दो ने तो बाजार से ब्याज पर रकम लेकर नेताजी को अर्पित कर दी थी। 

चर्चा है कि काफी दिनों तक ऑर्डर नहीं मिला तो सप्लायरों ने नेताजी के समक्ष गुहार लगाई। नेताजी झांसा देते रहे कि आबंटन अभी जारी नहीं हुआ है जैसे ही जिलों को आबंटन जारी हो जाएगा, उन्हें सप्लाई ऑर्डर मिल जाएंगे। मगर स्कूल शिक्षा विभाग की एक चिट्ठी से सप्लायरों के हाथ के तोते उड़ गए। चिट्ठी में यह साफ उल्लेखित था कि किन-किन जिलों को कितनी राशि का आबंटन हुआ है। कुल मिलाकर साढ़े 11 करोड़ का आबंटन खेल सामग्री का खरीदी आदेश महीनाभर पहले जारी हो चुका है। 

खेल सामग्री खरीदी के लिए स्कूल स्तर पर समिति बनाई गई है। ऐसे में सप्लायरों को ऑर्डर लेने के लिए हर स्कूल जाकर मशक्कत करनी पड़ेगी। यानी जिस काम के लिए उन्होंने नेताजी को अपना सबकुछ अर्पित कर दिया था। वह उन्हें नहीं मिलता दिख रहा है। इधर, जिन सूदखोरों ने ब्याज पर रकम दी थी, वे अब वापसी के लिए दबाव बना रहे हैं। नेताजी का हाल यह है कि वे अब भी दिलासा ही दे रहे हैं।  इन पूरी गतिविधियों पर नजर रखने वाले कुछ लोगों का अंदाज है कि नेताजी ने रकम वापस नहीं की, तो कुछ अनहोनी घट सकती है। 

मिस्टर 35 परसेंट कायम है
इस बीच सुना है कि स्कूल शिक्षा मंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल और बाद में केदार कश्यप के वक्त स्कूल लाइबे्ररी खरीदी में सरकारी मिस्टर 35 परसेंट रहा अधिकारी अभी तक उतने ही परसेेंट पर कारोबार चला रहा है, न महंगाई से परसेंटेज बढ़ा, न मंदी से घटा!

अमितेश हाशिए पर...
खबर है कि पूर्व मंत्री अमितेश शुक्ल के तौर-तरीकों से प्रदेश के बड़े नेता खफा हैं। अमितेश ने पहले मंत्री नहीं बनाए जाने पर खुले तौर पर नाराजगी जाहिर की थी। बाद में वे खामोश भी हो गए। मगर चर्चा है कि  वे दिल्ली दरबार में राज्य के प्रमुख नेताओं की शिकायत करते रहते हैं।  शुक्ल बंधुओं के इकलौते वारिस होने की वजह से दिल्ली में अमितेश की बातें सुनी भी जाती है। 

अमितेश गांधी जयंती के मौके पर विधानसभा के विशेष सत्र में अलग पोशाक में थे। जबकि सभी सदस्यों को एक ही तरह की पोशाक में आना तय हुआ था। इससे डॉ. चरणदास महंत इतने खफा हो गए कि संसदीय कार्यमंत्री के आग्रह के बाद भी अमितेश को बोलने का मौका नहीं दिया। पार्टी की नई समन्वय समिति में भी अमितेश का नाम गायब है। जबकि सत्यनारायण शर्मा और धनेन्द्र साहू को जगह दी गई है। पार्टी नेता बताते हैं कि चूंकि अमितेश को मंत्री नहीं बनाया गया है इसलिए ताकतवर समन्वय समिति में उन्हें जगह मिलना तय माना जा रहा था। मगर उनके तौर-तरीकों से प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया से लेकर सभी बड़े नेता खफा हैं। यही वजह है कि वे खुद ब खुद हाशिए पर जा रहे है। 

पत्रकारिता विवि का सस्पेंस 
 छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति पर 10 महीनों से सस्पेंस बना हुआ है। वो भी तब जब सरकार ने अपने पसंद के व्यक्ति को कुलपति बनाने के लिए नियमों में आमूलचूल परिवर्तन किया। नए नियमों के मुताबिक बीस साल पत्रकारिता का अनुभव रखने वाले को कुलपति बनाया जा सकता है। नियमों में बदलाव के बाद माना जा रहा था कि किसी वरिष्ठ पत्रकार को वीसी की कुर्सी मिल सकती है। दिल्ली के पत्रकार उर्मिलेश का नाम कुलपति के लिए प्रमुखता से उभरा था। 

इसी बीच संघ पृष्ठभूमि से जुड़े और वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने के नाम ने सभी को चौंका दिया। इसके अलावा बलदेव शर्मा, डॉ. आशुतोष मिश्रा, दिलीप मंडल, डॉ. मुकेश कुमार और पत्रकार निधीश त्यागी, सुदीप ठाकुर का नाम भी गाहे-बगाहे उछलता रहा है। लेकिन कहा जा रहा है कि जगदीश उपासने की एंट्री से पूरा मामला खटाई में चला गया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि राज्य सरकार ने अपनी पसंद के उम्मीदवार को वीसी बनाने इतनी कवायद की तो देरी किन कारणों से हो रही है? तो इसका जवाब आता है कि राजभवन ने नियुक्ति को अटका कर रखा है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि वीसी की नियुक्ति राज्य सरकार के परामर्श से होगी। ऐसे में राजभवन नियमों के खिलाफ जाए और सरकार के साथ टकराव की स्थिति निर्मित करे, इसकी संभावना कम ही दिखाई देती है। 

विवि के कुछ जानकारों का कहना है कि सरकार ने जिस खास को कुलपति बनाने के लिए सारी कवायद की, उन्होंने पद लेने से इंकार कर दिया है, जिसके कारण पूरा मामला लटक गया है। हालांकि जगदीश उपासने की मजबूत दावेदारी का प्रमाण सोशल मीडिया में देखने को मिला। उनका नाम आते ही सोशल मीडिया में खिलाफ में जमकर लिखा-पढ़ा गया। जेएनयू विवाद में भी वे खूब सुर्खियों में रहे। ऐसे में राजभवन के चाहने भर से राज्य की कांग्रेस सरकार किसी भी कीमत में उनको वीसी बनाने के लिए तैयार होगी, ऐसा लगता तो  नहीं। जगदीश उपासने की मां रजनी उपासने भाजपा की विधायक थीं, और छोटे भाई सच्चिदानंद उपासने भाजपा के पुराने नेता हैं और विधानसभा व अन्य चुनाव भी लड़ चुके हैं जिसमें उनके लिए मीडिया मैनेजमेंट करने के लिए दिल्ली से, इंडिया टुडे से, छुट्टी लेकर जगदीश उपासने रायपुर आकर डेरा डालते थे। 

कुल मिलाकर इस पूरे एपिसोड में किरकिरी सरकार की हो रही है, क्योंकि संघ के बैकग्राउंड के कारण जिस तत्परता से परमार को हटाया गया था, वैसी तेजी वो नई नियुक्ति में बिल्कुल भी दिखाई नहीं पड़ती, बल्कि संघ के दूसरे दावेदार के कारण कांग्रेस सरकार में नियुक्ति अटकना आश्चर्यजनक लगता है। 

जानकार यह भी बताते हैं कि इस पद पर जिस किसी खास के लिए रास्ते खोले गए थे, उनके इंकार के बाद चाहने वाले अभी भी उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस चक्कर में विवि को नए कुलपति के लिए कितना इंतजार करना पड़ेगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन वास्तव में अगर कुलपति के लिए मान मन्नौवल का दौर चल रहा है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो सरकार के लिए कितना खासमखास है। खैर, विवि के लोग तो इस बात से अपने-आपको तसल्ली दे रहे हैं कि अगर समय लग रहा है तो देर आयद दुरुस्त आयद की तर्ज पर यहां किसी विशेष की एंट्री होना तय है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 21-Jan-2020

कुछ मंत्रियों से नाखुश, कुछ से खुश

खबर है कि प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और सीएम भूपेश बघेल कुछ मंत्रियों के परफार्मेंस से नाखुश चल रहे हैं। चर्चा है कि पुनिया ने अपने पिछले प्रवास के दौरान सीएम से मंत्रियों के कामकाज पर बात भी की थी। जिन मंत्रियों का परफार्मेंस खराब बताया जा रहा है, उनमें  बिलासपुर और सरगुजा संभाग के एक-एक और दुर्ग संभाग के दो मंत्री हैं। 

सुनते हैं कि इन मंत्रियों को बदले जाने पर भी विचार किया गया है। हालांकि अभी इस पर प्रारंभिक चर्चा ही हुई है। इन मंत्रियों के प्रभार और उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव के नतीजों की समीक्षा होना बाकी है। हल्ला यह है कि चुनाव समीक्षा में खरा नहीं उतरने पर चारों में से कम से कम दो को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। फेरबदल बजट सत्र के बाद होने की पूरी संभावना है। 

इससे परे दो-तीन मंत्रियों के कामकाज को बेहतर माना जा रहा है। इनमें नए नवेले कैबिनेट मंत्री उमेश पटेल भी हैं। पार्टी के भीतर यह माना जाता है कि उमेश के विभाग में करप्शन का स्तर दूसरे विभागों की तुलना में कम है। शिकवा-शिकायतों के बाद भी ट्रांसफर पोस्टिंग में उमेश ने पूरी पारदर्शिता बरती। यही नहीं, युवा महोत्सव का सफल आयोजन कर सीएम का भरोसा जितने में कामयाब रहे हैं। 

युवा महोत्सव में करीब 10 हजार प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। राज्य बनने के बाद अब तक का सबसे बड़ा आयोजन था। इसमें पूरी व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद थी कि कहीं से किसी को कोई शिकायत का मौका नहीं मिला। दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले रेलवे ने इसी तरह खेल आयोजन किया था, लेकिन कुछ सौ लोगों के बीच के आयोजन में कई तरह की खामियां रही। हाल यह रहा कि दूषित भोजन के चलते कई खिलाड़ी बीमार पड़ गए। मगर हजारों की संख्या में आए प्रतिभागी युवा महोत्सव की व्यवस्था को काफी सराहते रहे।

खुद सीएम ने प्रतिभागियों के बीच में जाकर उनसे व्यवस्था को लेकर पूछताछ की। प्रतिभागियों के फीडबैक से सीएम खुश नजर आए। यह सब उमेश की लगातार मॉनिटरिंग के बूते संभव हो पाया और उनके सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने भी काफी मेहनत की। प्रशासनिक फेरबदल में परदेशी का कद बढ़ा है और उन्हें पीडब्ल्यूडी जैसे बड़े विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में देर-सबेर उमेश के विभागों में भी इजाफा हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  

माफिया पर कार्रवाई
प्रदेश में अपराध नियंत्रण के लिए सीएम-गृहमंत्री ने पुलिस को फ्री हैण्ड दे दिया है। उन्होंने माफियाओं पर सख्त से सख्त कार्रवाई के लिए दिशा निर्देश दिए हैं। मगर सत्तारूढ़ दल के कई प्रभावशाली नेता ही ऐसे लोगों को बचाने में जुटे हैं। ऐसे ही एक प्रकरण में सत्ताधारी दल के एक सीनियर विधायक को भूमाफिया का बचाव करना काफी महंगा पड़ गया।

हुआ यूं कि पुलिस ने कुख्यात भूमाफिया की घेरेबंदी की, तो उसने विधायक के निवास में डेरा डाल दिया। पुलिस को तो सख्त निर्देश हैं, फिर क्या था पुलिस ने विधायक निवास को ही घेर दिया था। हड़बड़ाए विधायक ने यहां-वहां फोन लगाया, लेकिन कहीं से कोई राहत नहीं मिली। आखिरकार एक ताकतवर मंत्री के कहे हुए पुलिस वहां से हटी, और भूमाफिया को अपने घर से निकाला गया। उस दिन तो भूमाफिया तो बच निकला, लेकिन कुछ दिनों बाद रायपुर पुलिस ने आखिर उसे दबोचकर ही दम लिया। हुआ यह भी है कि मध्यप्रदेश में कांगे्रस सरकार जितने आक्रामक तरीके से तरह-तरह के भूमाफिया, हनीट्रैप माफिया, अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, उससे भी छत्तीसगढ़ में सरकार पर एक दबाव पड़ रहा है कि वह भी ऐसे छंटैल लोगों के खिलाफ कुछ तो करे।

हिंदी प्रदेश में हिंदी का हाल
छत्तीसगढ़ हिन्दीभाषी प्रदेश है, और यहां की हिंदी बेहतर भी मानी जाती है। लेकिन राजधानी रायपुर को देखें, तो राज्य सरकार, और म्युनिसिपल ने पिछले पन्द्रह-बीस बरस में जगह-जगह गेट बनाकर उन पर कुछ महान लोगों की लाईनें लिखी हैं, उनमें जगह-जगह हिज्जों की गलतियां दिखती हैं। इसके अलावा सड़क और चौराहे जिन नामों पर हैं, उनके हिज्जों में भी गलतियां खटकती हैं। भगत सिंह के नाम पर से ऊपर की बिंदी गायब दिखती है, और देश की महानता की कविताओं की लाईनें गलत लिखी गई हैं। अब राज्य सरकार और म्युनिसिपल की स्कूलों में सैकड़ों हिंदी-शिक्षक-शिक्षिकाएं हैं। कॉलेजों में भी हिंदी पढ़ाने वाले लोग हैं जो कि ऐसी गलतियों के सामने से रोज निकलते हैं, लेकिन भाषा की गलतियां सुधारने की कोई कोशिश नहीं दिखती। जो हिंदी भाषा का ही कमाते-खाते हैं, वे भी इस बारे में बेफिक्र रहते हैं। 

ये तो बात सरकारी बोर्ड की हुई, लेकिन निजी दुकानों के बोर्ड और होर्डिंग पर भी हिंदी और अंगे्रजी की गलतियां ही गलतियां दिखती हैं, और लोग इसे अनदेखा करके आते-जाते रहते हैं कि गलतियां सुधारना उनका काम तो है नहीं। नतीजा यह होता है कि स्कूल आते-जाते बच्चे भी इन गलतियों को सीखते चलते हैं, इन्हें ही सही मानने लगते हैं। 

इन दोनों से अलग एक बड़ी दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे हिंदीभाषी प्रदेशों से लेकर महाराष्ट्र जैसे मराठीभाषी बहुत से प्रदेशों तक ट्रक-कार जैसे गाडिय़ों पर जो शब्द सबसे अधिक गलत लिखा दिखता है, वह आशीर्वाद है। गाडिय़ों पर माँ-बाप का आशीर्वाद जैसी बातें लिखी दिखती हैं, और अधिकतर जगहों पर आशीर्वाद को आर्शीवाद लिखा जाता है। अब पेंटरों ने यह गलती कहां से सीखी इसका पता लगाना तो नामुमकिन है, लेकिन हिंदी को चाहने वाले कुछ लोग पेंटरों के पास रूककर उनकी गलतियां सुधारने का योगदान तो दे ही सकते हैं।


Date : 20-Jan-2020

आखिर मदनवाड़ा-जांच
आखिरकार भूपेश सरकार ने दस बरस पुराने मदनवाड़ा नक्सल प्रकरण की जांच के लिए आयोग के गठन का फैसला लिया है। राज्य के पूर्व लोकायुक्त जस्टिस शंभूनाथ श्रीवास्तव आयोग के मुखिया होंगे। मदनवाड़ा नक्सल हमले में राजनांदगांव के तत्कालीन एसपी विनोद कुमार चौबे समेत 29 जवान शहीद हो गए थे। इस पूरे प्रकरण पर पुलिस के आला अफसरों की रणनीतिक चूक भी सुर्खियों में रही है और इसके लिए तत्कालीन आईजी मुकेश गुप्ता निशाने पर रहे। मगर मुकेश गुप्ता को इस घटना के बाद गेलेन्ट्री अवार्ड मिल गया था। 

कांग्रेस नेता और पूर्व एसपी चौबे के परिजन बरसों से प्रकरण की न्यायिक जांच की मांग करते रहे हैं और जब आयोग के गठन की घोषणा हुई, तो भाजपा ने सरकार के इरादे पर ही सवाल खड़े कर दिए।  खैर, आयोग के अध्यक्ष जस्टिस शंभूनाथ श्रीवास्तव की साख काफी अच्छी रही है। उन्होंने प्रमुख लोकायुक्त के पद पर रहते कई अहम आदेश पारित किए थे। जस्टिस श्रीवास्तव ने पिछली सरकार में बेहद ताकतवर रहे पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता के खिलाफ शिकायतों की पड़ताल की थी और 30 पेज की जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। 

गुप्ता लोक आयोग के समक्ष हाजिर नहीं हुए। जांच रिपोर्ट में मुकेश गुप्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को सही पाया गया था और इसकी सीबीआई जांच की अनुशंसा की गई। ये अलग बात है कि जांच रिपोर्ट मिलने के बाद रमन सरकार के हाथ-पांव फूल गए और जीएडी में चार माह तक आयोग की अनुुशंसा धूल खाते पड़ी रही। इसी बीच लोकायुक्त की रिपोर्ट के खिलाफ मुकेश गुप्ता हाईकोर्ट चले गए और  कोर्ट से उन्हें राहत मिल गई। फिलहाल प्रकरण पर रोक लगी हुई है। अब जस्टिस शंभूनाथ श्रीवास्तव प्रकरण की जांच करेंगे, तो मदनवाड़ा का सच सामने आने की उम्मीद है। लोगों का अंदाज यह भी है कि इससे मुकेश गुप्ता की मुश्किलें और बढ़ सकती है। 

कुलपति को चुनौती के पीछे कौन?
छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विवि में पढ़ाई-लिखाई तो पहले से ही भगवान भरोसे है, अब तो यहां का कामकाज भी भगवान भरोसे है। लगता है न कोई बोलने वाला है और न ही टोकने वाला। अब इस वाकये को ही लीजिए जिसमें विवि के एक शिक्षक ने यहां के प्रभारी कुलपति को कोर्ट की नोटिस भेज दी और नोटिस भी ऐसी वैसी नहीं बल्कि उनकी नियुक्ति को लेकर। जिसमें कहा गया है कि संभाग आयुक्त को शासन ने 6 महीने के लिए कुलपति का प्रभार दिया था। छह महीने का समय बीत गया तब वे असंवैधानिक रूप से कुलपति के प्रभार पर बने हुए हैं। शिक्षक ने अदालत से मांग की है कि संभाग आयुक्त को प्रभारी कुलपति पद से हटाया जाए और उन्हें (स्वयं को) इस पद पर नियुक्ति दी जाए, क्योंकि वे सर्वाधिक काबिल और अर्हता पूरा करने वाले शिक्षक हैं। पत्रकारिता के इस शिक्षक को कौन बताए कि शासन ने नियमित कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने तक प्रभारी कुलपति का कार्यकाल बढ़ा दिया है। फिर भी वे कोर्ट पहुंच गए। आलम यह है कि शिक्षक महोदय विवि में सीना तानकर घूम रहे हैं और लोगों को बता रहे हैं कि उन्होंने प्रभारी कुलपति को हटाने के लिए कानूनी लड़ाई छेड़ दी है और देर सबेर उनकी नियुक्ति हो जाएगी। खैर, फैसला जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि विवि के शिक्षकों का अपना जलवा है, लेकिन प्रभारी कुलपति की नियुक्ति करने वाले शासन में बैठे लोग अब तक चुपचाप हैं, यह बात गले नहीं उतर रही है। कुछ लोगों का कहना है कि इन शिक्षक महोदय को संघ का समर्थन है। अगर, ऐसा है तो और बड़ी बात है, क्योंकि साल भर से राज्य में कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस सरकार में कोई संघ के समर्थन से ऐसा कर रहा है या इसके पीछे किसी फूल छाप कांग्रेसी का हाथ है, इस पर परदा उठना बाकी है।

काले जादू की दुकान...
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के चौराहों पर इन दिनों मजदूरी पर रखे गए लोग एक विजिटिंग कार्ड रूके हुए लोगों के बीच बांट रहे हैं। यह कार्ड किसी मूसा पठान बंगाली नाम के आदमी का है जिसका फोन नंबर भी इस पर दिया गया है। इसमें इस आदमी को विश्व का नंबर एक तांत्रिक बताया गया है, और काले व रूहानी इल्म का माहिर भी। यह कार्ड दावा करता है कि नौकरी, कारोबार, किया-कराया, गृहक्लेश, मनचाही शादी, सौतन-दुश्मन से छुटकारा, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका वश में करवाना, वशीकरण मुठकरणी करवाना या तोड़वाना, सभी समस्याओं का समाधान गारंटी के साथ। अब यह दावा अपने आपमें कानून के खिलाफ है जिसमें जादू को गैरकानूनी माना गया है। लेकिन छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में हर बरस बड़ी संख्या में महिलाओं को टोनही-जादूगरनी कहकर मारा जाता है, उन पर हमले होते हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार होता है। अंधविश्वास में इस तरह डूबे हुए देश में जादू-टोने का ऐसा दावा करने वाले लोग कमा भी रहे हैं, खा भी रहे हैं। फिलहाल रायपुर में जो कार्ड बंट रहा है उसमें पीछे की तरफ गुरूमुखी लिपि में भी यही बातें छपी हैं, याने मूसा पठान बंगाली पंजाब में भी लोगों को अपने हुनर का झांसा देकर या तो आया है, या यहां से उधर जाएगा। अब ऐसे खुले प्रचार के बाद भी पुलिस इन लोगों पर, ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई करती है या नहीं, पता नहीं। 

अदालती फैसला और समझबूझ
वैसे अभी त्रिपुरा हाईकोर्ट का एक ऐसा फैसला सामने आया है जो कि देश भर में बड़बोले अफसरों के लिए मददगार हो सकता है। नौ और दस जनवरी को इस हाईकोर्ट ने अभिव्यक्ति के आजादी के तहत, खासकर सोशल मीडिया के सिलसिले में यह कहा कि सरकारी कर्मचारी भी वहां पर अपनी राजनीतिक राय रख सकते हैं, और राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल भी हो सकते हैं। अब देश के किसी भी दूसरे प्रदेश में कोई मामला अदालत तक पहुंचने पर त्रिपुरा के इस फैसले की नजीर तब तक काम आएगी, जब तक उस राज्य का हाईकोर्ट, या सुप्रीम कोर्ट इसके खिलाफ कोई फैसला न दे। यह अदालती फैसला दूर तक जाएगा जो कि सरकारी कर्मचारियों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। लेकिन इसके साथ-साथ हर प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को इतना तो याद रखना ही पड़ेगा कि अदालत सिर्फ सजा से बचा सकती है, निलंबन खारिज कर सकती है, लेकिन किस अफसर को किस कुर्सी पर बिठाया जाए, और कहां से हटाया जाए, यह फिर भी सरकार का अपना विशेषाधिकार बने रहेगा, इसलिए लोगों को किसी अदालती फैसले के साथ-साथ अपनी सामान्य समझबूझ का भी इस्तेमाल करना चाहिए। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 19-Jan-2020

डॉक्टर की स्वीकारोक्ति

डॉक्टर की स्वीकारोक्ति - आज अपने डॉक्टर की क्लीनिक में लगी एक मज़ेदार प्रार्थना देखी, जिसमें डॉक्टर लिखते हैं कि यह विडंबना है कि उनकी जीविका दूसरों की बीमारियों पर निर्भर करती है। मैं सोच रहा हूँ कि अगर कभी कोई राजनीतिक व्यक्ति अपने घर के आगे ऐसी ईमानदार स्वीकारोक्ति लगाये तो क्या लिखेगा कि उसकी जीविका कैसे चलती है? क्या खय़ाल है आपका?-ओमप्रकाश व्यास (फेसबुक पर)

अपार जनसमूह का राज...
इन दिनों फोटो में फेरबदल करने के आसान सॉफ्टवेयर के चलते लोग फर्जी तस्वीरें बनाकर उन्हें पोस्ट करते हैं, और अपनी बदनीयत आगे बढ़ाते हैं। जो लोग ऐसा करना नहीं जानते वे किसी एक देश की तस्वीर को किसी दूसरे देश की बताते हुए गलत जानकारी के साथ उसे पोस्ट करते हैं, और झूठ फैलाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, और चैन की नींद सोते हैं। अभी भारत के एक बड़े नेता की सभा में अपार भीड़ दिखाने के लिए नेता के पीछे जो तस्वीर दिख रही थी, उसकी जांच-पड़ताल करने पर पता लगा कि वह कालीन के रेशों की तस्वीर है जो कि रेशों को सिरों की तरह बता रही है। कालीन के रेशे अपार जनसमूह की तरह दिख रहे हैं। लेकिन ऐसी गढ़ी हुई तस्वीर देखकर एकदम से यह मान लेना भी ठीक नहीं है कि यह उस नेता के किसी समर्थक या प्रशंसक की ही गढ़ी हुई है। यह तस्वीर किसी विरोधी की गढ़ी हुई भी हो सकती है जो कि उस नेता को बदनाम करने के लिए बनाई गई हो, और फिर कालीन के रेशों की जानकारी बताते हुए पोस्ट की गई हों। फोटोशॉप के इस जमाने में कुछ भी हो सकता है, अनुपम खेर के एक टीवी शो की कैचलाईन की तरह।

नाजुक भावनाएं घर रखकर आएं... 
शादियों का मौसम चल रहा है और लोगों को एक-एक दिन एक से अधिक शादी में भी जाना पड़ रहा है। लेकिन बड़ी-बड़ी दावतों वाली शादियों में भी कोई यह पूछने या बोलने वाले नहीं रहते कि खाना खाया या नहीं, खाना खाकर ही जाईएगा। लोगों को खाने की इच्छा है तो खाएं, वरना घर जाकर नमकीन-सेंवई पकाकर खाएं। जो लोग ज्यादा संवेदनशील हैं कि मेजबान के कहे बिना वे कुछ खाएंगे नहीं, वे पहले से अपना इंतजाम करके आएं क्योंकि यह कहने का रिवाज अब खत्म हो गया है। अपनी नाजुक भावनाओं को घर छोड़कर जाना चाहिए, और जैसे चौथाई सदी पहले बुजुर्ग बफे डिनर या लंच को बफेलो खाना कहते थे, उसी तरह लोगों को मेज पर रख दिए गए खाने पर गाय-भैंस की तरह टूट पडऩा होता है।


Date : 18-Jan-2020

सरकारी बंगले का मोह

सरकारी बंगले का बड़ा मोह होता है। एक तो बंगला हासिल करना काफी मुश्किल होता है और मिल जाए तो पद जाने के बाद महीनों तक इसका मोह छूटता नहीं। ऐसी ही स्थिति शहर के मेयर बंगले को लेकर देखने को मिल रही है। पुराने मेयर अभी भी बंगले में जमे हुए हैं और नए को बंगले की जरूरत महसूस हो रही है। यह अलग बात है कि दोनों ने अपनी मंशा जाहिर कर दी है। पुराने महापौर का कहना है कि उन्हें भी बंगला 6 महीने लेट से मिला था और 6 महीना तैयार होने में लगा था। इस तरह वे एक साल बाद बंगले में शिफ्ट हुए थे। इसके साथ ही उनका यह भी कहना है कि वे अपने घर में ऑफिस बनवा रहे हैं, जैसे ही काम पूरा होगा, वे बंगला खाली कर देंगे। अब समझने वाले के लिए इशारा काफी है कि नए मेयर को बंगले के लिए कम से कम 6 महीना से साल भर का इंतजार करना ही चाहिए। लेकिन नए मेयर इंतजार के मूड में बिल्कुल नहीं हैं, हालांकि वे भी लगातार कह रहे हैं कि वे बंगला खाली करने नहीं कहेंगे। भले ही उन्हें ऑफिस का कामकाज निपटाने के लिए बंगले की सख्त जरूरत है। यहां दोनों नेता तू डाल-डाल मैं पात-पात की रणनीति पर चल रहे हैं। अब देखना यह होगा कि कौन अपनी मुहिम में सफल होता है। बात यही खत्म नहीं होती, सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी जब दोनों नेता पहुंचते हैं तो भी बंगले का टॉपिक जरूर आता है। वे भले ही न करें, लेकिन समर्थक बंगला का मुद्दा ले आते हैं। अब समर्थकों को कौन समझाए कि जख्मों को जितना कुरेदा जाए, उतने ही हरे होते हैं। एक तो पुराने मेयर को इस बात का भारी मलाल है कि वे दोबारा कुर्सी पर नहीं बैठ पाए और ऊपर से लोग बंगले के पीछे पड़ गए हैं। कुछ लोगों ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा कि पद पांच साल के लिए मिला था, तो बंगले में एक साल और रहने के लिए पात्र हैं।

कलेक्टरी के साथ सलाह मुफ्त

एक युवा आईएएस को लंबे इंतजार के बाद कलेक्टरी मिली, तो स्वाभाविक है कि खुशी हुई होगी और बिना देरी किए पुरानी पोस्टिंग से कलेक्टरी के लिए रिलीव हो गए। पता नहीं कब सरकार का मूड बदल जाए और नया आदेश निकल जाए, इसलिए तो रिस्क लेना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। खैर, नई पोस्टिंग मिलने के बाद लोग बधाई के साथ ज्ञान भी खूब देते हैं। इन साहब को भी लोग सलाह मशविरा दे रहे हैं। कुछ लोगों ने ज्ञान दिया कि अब आप दीनदयाल उपाध्याय पर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन गांधी के बारे में बोलने से बचना पड़ेगा। शायद याद हो तो ये वही युवा आईएएस हैं, जिनकी सीईओ की कुर्सी पिछली सरकार में दीनदयाल उपाध्याय पर सवाल उठाने के कारण गई थी। हालांकि कांग्रेस ने उनकी बातों को हाथों हाथ लिया था। अब कुछ लोग यह भी मान रहे हैं कि कलेक्टरी भी इसी कारण से मिली है। वहीं कुछ लोगों ने उनको यह राय दी कि अभी सावरकर और गोडसे सोशल मीडिया और सरकार में ट्रेंड कर रहे हैं, इनके बारे में बोलने पर हो सकता है कि कुछ बड़ा इनाम मिल जाए। अब ये युवा आईएएस किसकी सलाह पर काम करते हैं और इनाम पाते हैं या सजा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन हम तो यही उम्मीद कर सकते हैं कि लंबे इंतजार के बाद कलेक्टरी पाने वाले इस अफसर को इस बात का अंदाजा तो जरूर होगा कि कौन सी सलाह उनके काम की है और कौन सी नहीं, क्योंकि पिछला अनुभव भी तो उनके सामने है।

नाम बदलना ठीक होगा...

अभी मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के गृह जिले दुर्ग में एक स्कूल में एक थानेदार बच्चों को ट्रैफिक के नियम पढ़ा रहे थे, और उन्होंने कहा कि लोगों को शराब पीकर गाड़ी नहीं चलाना चाहिए, तो हाईस्कूल के कुछ बच्चे खड़े हुए और कहा कि शराब तो पुलिस ही बिकवाती है। अब पुलिस चूंकि सरकार का पहला चेहरा रहती है, इसलिए कुछ भी होने पर लोग उसी को सरकार मान लेते हैं। पुलिस का शराब बिकवाने से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन सरकार की किसी भी बदनामी से वह आसानी से हाथ नहीं झाड़ पाती। अब किसी तरह यह बात आई-गई हुई, लेकिन सरकार और पुलिस विभाग को इस नौबत के बारे में जरूर सोचना चाहिए कि एक थाने का नाम भट्टी रहने से थानेदार को बच्चे भी दारूभट्टी वाला समझ रहे हैं। कम से कम थाने का नाम तो ठेका, भट्टी, अहाता जैसा न रहे, वह पुलिस की अपनी इज्जत के लिए भी ठीक है। एक वक्त शायद भिलाई स्टील प्लांट की फौलाद पिघलाने की भट्टी इस थाने के इलाके में आती होगी, और उस वजह से इसका नाम भट्टी रखा गया होगा। लेकिन ठेका और भट्टी किसी दूसरे संदर्भ में याद करने लायक शब्द नहीं है, लोग इनसे दारू का ही रिश्ता जोड़ते हैं। हालांकि यह थाना उत्तरप्रदेश में नहीं आता है, फिर भी इसका नाम बदला जा सकता है, ताकि यहां के थानेदार भी इज्जत से सिर उठाकर जी सकें।

वैसे किसी नए शहर में दारू की दुकान ढूंढने के लिए लोग एक आसान फॉर्मूला बताते हैं। जानकारों का कहना है कि शहर में एमजी रोड या महात्मा गांधी मार्ग ढूंढ लें, वहां पर दारू की दुकान जरूर रहती है। अब लोग अपने-अपने शहर-कस्बे में इस पैमाने को परख लें।


Date : 17-Jan-2020

भौंरा-गेड़ी तक तो ठीक है, लेकिन...
छत्तीसगढ़ की फिजां में इन दिनों छत्तीसगढिय़ावाद खूब रच बस गया है। सभी की जुबान पर गेड़ी, भौंरा और यहां के तीज त्यौहार का रंग ऐसे चढ़ गया है, मानों वे बरसों से इसके आदी हों। खैर, इसी बहाने राज्य की कला-संस्कृति को तो बढ़ावा मिल रहा है, लेकिन एक छत्तीसगढिय़ा सज्जन इस चक्कर में बुरे फंस गए। दरअसल, छत्तीसगढिय़ा सज्जन लोगों को ज्ञान दे रहे थे कि अब यहां छत्तीसगढ़ी कल्चर और तीज त्यौहार मनाने वालों के कामकाज बनेंगे, इसीलिए गेड़ी चढऩा और भौंरा चलाना सीख लेना चाहिए। दूसरे लोगों को लगा कि वे बात तो ठीक कर रहे हैं, क्योंकि आजकल तो इसी का हल्ला सुनाई देता है और तस्वीरें दिखाई देती है। छत्तीसगढिय़ा सज्जन ने बकायदा ऐलान कर दिया कि अगर कोई हाथ में भौंरा चलाना और गेड़ी चढऩा सीखना चाहता है तो संपर्क कर सकते हैं, वे सीखने में मदद कर सकते हैं। छत्तीसगढिय़ा सज्जन की बातों से दूसरे लोग बड़े हीनभावना से ग्रसित महसूस कर रहे थे कि ये तो नागरिकता प्रमाण पत्र हासिल करने से ज्यादा कठिन शर्त यहां चल पड़ी। अब तो कोई चारा नहीं बचा है। इसी बीच तमाम बातों को गंभीरता से सुन रहे एक दूसरे व्यक्ति ने पूछा कि भाई साहब कि ये सोंटा खाने का क्या सिस्टम है। सोंटा खाने की बात सुनते ही महाशय की बोलती बंद हो गई। दरअसल, छत्तीसगढ़ में गौरा-गौरी पूजा के समय कुश की बनी रस्सी से हाथ में मारा जाता है। जाहिर है कि मार खाना हिम्मत का काम है। भौंरा-गेड़ी तक तो ठीक है, लेकिन सोंटा सभी के बस की बात नहीं है। कई बार इस तरह का खतरा होता है कि अपनी ही गोली रिवर्स हो जाती है। यहां भी कुछ ऐसा ही माजरा देखने को मिला।  लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पिछले दिनों ऐसा सोंटा खाते हुए मीडिया में बड़ी शोहरत पा चुके हैं, इसलिए सोंटे के खिलाफ भी कुछ बोला तो नहीं जा सकता।

आईएएस-आईपीएस खींचतान
आईएएस-आईपीएस अफसरों के बीच छत्तीस का आंकड़ा कोई नहीं बात नहीं है। आईएएस अपने-आपको सुपीरियर ही मानते हैं और वे इसे साबित करने का शायद ही कोई मौका छोड़ते हैं। ऐसे ही पिछले दिनों युवा महोत्सव के दौरान देखने को मिला। हुआ यह कि सूबे के मुखिया इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे थे। इस कार्यक्रम में युवाओं की अच्छी खासी तादाद थी, वे सभी करीब से सीएम की एक झलक पाने के लिए बेताब थे। सभी अपने हाथों में मोबाइल लिए सीएम के नजदीक आने का इंतजार कर रहे थे। इसी बीच सीएम के सलाहकार और आईएएस अफसरों ने सुझाव दिया कि उनको युवाओं के बीच जाना चाहिए। सीएम साहब को इसमें कोई बुराई नहीं लगी तो उन्होंने तत्काल हामी भर दी। जब इस बात की जानकारी सीएम के सुरक्षा में तैनात अफसरों और आईपीएस अधिकारियों को लगी तो उनकी भृकुटी तन गई, क्योंकि भीड़ इतनी थी कि संभालना काफी मुश्किल और ऊपर से सीएम की सुरक्षा का सवाल था। इतना ही नहीं जहां युवाओं के बीच जाना था, वहां की जमीन भी उबड़-खाबड़ थी। ऐसे में वरिष्ठ आईपीएस अफसरों के पास सीएम को वहां जाने से रोकने के लिए भरपूर ग्राउंड था, तो उन्होंने तुरंत सीएम को समझाया कि वहां सुरक्षागत कारणों से जाना उचित नहीं है। अब सीएम साहब ने उनकी बात मान ली। इस बीच सलाहकारों और आईएएस अफसरों को इसकी भनक लगी, तो उन्होंने फिर से सीएम के कान में फुसफुसाया। सभी को लग रहा था कि युवाओं के बीच लोकप्रिय होने का इससे बेहतर मौका नहीं मिल सकता। फिर क्या था सीएम बिना किसी के सुने सीधे पहुंचे गए युवाओं के बीच। फिर वहां का नजारा ही देखने लायक हो गया। युवा सेल्फी लेने के लिए एकदम से टूट पड़े। इसके बाद तो सुरक्षा में तैनात, और आईपीएस अफसरों के पसीने ही छूटने लगे कि वे भीड़ को कैसे मैनेज करेंगे और इसमें कुछ ऊंच-नीच हुई तो गाज पुलिस वालों पर गिरना तय है। जैसे-तैसे कार्यक्रम निपटा तब तमाम पुलिस अफसरों की जान में जान आई। राहत की सांस लेते हुए एक आईपीएस ने कहा कि सलाह देने वाले अफसरों का क्या होगा वे तो बोल के निकल जाएंगे आखिर फंसना तो पुलिस को ही पड़ता है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 15-Jan-2020

अभी प्रदेश का एक बड़ा समारोह, युवा उत्सव, हुआ तो उसमें गांधी के एक बड़े से पोस्टर के सामने एक गरीब नौजवान श्रद्धा से प्रणाम करते हुए दिखा। अब यह तो गनीमत है कि यह छत्तीसगढ़ है, कोई और प्रदेश होता तो हो सकता है कि इस नौजवान की कहीं पिटाई हो जाती कि देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ रहा है। गांधी पर केंद्रित इस आयोजन में यह फोटो अजीम पे्रमजी फाउंडेशन के अवधूत ने खींची।

चाचा-भतीजे की जोड़ी
बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद प्रदेश संगठन में चुनाव होंगे। छत्तीसगढ़ बीजेपी को नया प्रदेश अध्यक्ष मिल सकता है। ऐसे में अध्यक्ष के नामों की चर्चा और लांबिग भी तेज हो गई है। जातीय समीकरण के अलावा सियासी पहलुओं के आधार पर भी नाम सुनने को मिल रहे हैं। कुछ लोगों की दलील है कि प्रदेश अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग से होना चाहिए, तो कई आदिवासी अध्यक्ष की वकालत कर रहे हैं। कांग्रेस ने आदिवासी को अध्यक्ष बनाया है और मुख्यमंत्री पिछड़ा वर्ग से आते हैं। ऐसे में बीजेपी में भी इसी फार्मूले को अजमाने के आसार हैं। पार्टी के भीतर कुछ लोगों को कहना है कि नेता प्रतिपक्ष का पद कुर्मी यानी पिछड़े वर्ग को दिया गया है, तो अध्यक्ष पिछड़े वर्ग से नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद दुर्ग जिले के एक पिछड़े वर्ग के नेता अध्यक्ष बनने के लिए खूब मेहनत कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि सरकार के खिलाफ पूरी ताकत से हमला बोलने के लिए दुर्ग जिले से ही अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री भी इसी जिले से आते हैं और सरकार के कई भारी भरकम मंत्री भी इसी जिले के हैं। सरकार को गृह क्षेत्र से ही घेरने के हिसाब से इसे महत्वपूर्ण एंगल माना जा रहा है। अगर, ऐसा हुआ तो सियासत में नए समीकरण बनकर उभरेंगे और दोनों पार्टियों के लिए केंद्र बिंदु दुर्ग जिला होगा, लेकिन इस जोड़तोड़ में रिश्तेदारी रोडा बनकर सामने आ रही है। दरअसल, प्रदेश के मुखिया और दुर्ग जिले के ये भाजपा नेता चाचा-भतीजे हैं। अगर रिश्तेदारी का अंडगा दूर गया तो चाचा-भतीजे के बीच सियासत रोचक हो सकती है। 

आईएएस और आईपीएस का फर्क
राज्य के दो आईएएस अफसरों को अभी प्रिंसिपल सेक्रेटरी सेे पदोन्नत करके अतिरिक्त मुख्य सचिव बनाया गया। यह कुर्सी प्रदेश के प्रशासनिक मुखिया, मुख्य सचिव, की कुर्सी से बस एक ही कदम पीछे रहती है। ऐसे में जाहिर है कि यह एक बड़ा प्रमोशन है। इस आदेश के आखिर में लिखा गया है कि इन प्रमोशन के लिए 11 दिसंबर को भारत सरकार को पत्र भेजा गया था, लेकिन वहां से 30 दिनों में कोई जानकारी न आने से, और मुख्य सचिव वेतनमान में रिक्तियां उपलब्ध होने से ये पदोन्नति की जा रही हैं।

इस आदेश को देखकर पुलिस विभाग के वो अफसर तो हैरान-परेशान हैं हीं जिनके प्रमोशन के लिए केंद्र सरकार से 9 दिसंबर को ही मंजूरी आ गई थी, लेकिन तबसे अब तक सवा महीने में भी दो आईपीएस के प्रमोशन के लिए डीपीसी नहीं की गई। दूसरी तरफ 11 दिसंबर को भेजी चि_ी के 30 दिन पूरे होते ही दो आईएएस के प्रमोशन कर दिए गए। पुलिस विभाग का यह मानना रहता है कि सत्ता पर बैठे नेता और आईएएस अफसर मिलकर पुलिस को मातहत ही बनाए रखते हैं, और बराबरी से उनका हक कभी नहीं मिलता। इन दो मामलों को देखकर तो ऐेसा लगता ही है। दूसरी तरफ नया रायपुर में आईएएस अफसरों के बैठने के सचिवालय को देखें तो वह 5 मंजिला इमारत है। दूसरी तरफ पुलिस मुख्यालय कुल दो मंजिला है जो कि पुलिस को उसका कद दिखाने का एक तरीका भी है।


Date : 14-Jan-2020

अफसर भी मुखिया की राह पर

छत्तीसगढ़ के मुखिया हाथ में भौंरा चलाने के कारण खूब ट्रेंड होते हैं। सड़क से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में उनकी यह कला सुर्खियों में रहती है। बचपन के ये खेल पचपन में भी लोगों के सिर चढ़कर बोलेगा, शायद ही किसी ने सोचा होगा। स्थिति यह है कि गांव-गलियों और शहर से निकलकर यह खेल सरकारी दफ्तरों और मंत्रालय के गलियारों तक पहुंच गया है। युवा उत्सव में शहर के एसपी-कलेक्टर भी भौंरा चलाते नजर आए। उन्होंने भी सूबे के मुखिया की तरह हाथ में भौंरा चलाकर लोगों को थोड़ा चकित किया, क्योंकि आमतौर पर ऐसे खेल गांवों में ज्यादा प्रचलित हैं, लेकिन मौजूदा दौर में तमाम पारंपरिक खेलकूद विलुप्त होते जा रहे हैं। अधिकांश गांवों में बच्चे और युवा क्रिकेट का बल्ला थामे दिखते हैं। ऐसे में राजधानी के इन दो युवा अफसरों, कलेक्टर और एसपी के भौंरा चलाने के वीडियो ने सभी का ध्यान खींचा है। इससे दूसरे जिलों के अफसरों को नया टॉस्क मिल गया है। जिन्हें भौंरा चलाना नहीं आता, वो थोड़े असहज महसूस करने लगे हैं। कुछ अफसरों ने तो बकायदा भौंरा चलाना, गेड़ी चढऩे की प्रैक्टिस शुरू कर दी है। संभव है कि अलग-अलग जिलों के अफसरों की भी भौंरा चलाते तस्वीर वायरल हो। वैसे अफसरों की तासीर होती है कि वे मुखिया को तेजी से फॉलो करते हैं। कुछ अफसरों को यह भी लगता है कि मुखिया की पसंद नापसंद के हिसाब से चलने में असुविधाजनक स्थिति की आशंका नहीं रहती। यह बात तो तय है कि मुखिया को खुश करने के चक्कर में छत्तीसगढ़ के स्थानीय खेलकूद और लोक पर्व की पूछपरख तो बढ़ गई है, लेकिन समस्या यह है अफसर भी भौंरा-गेड़ी में मग्न हो जाएंगे तो प्रशासनिक कामकाज का क्या होगा। कहा तो यह भी जाता है कि अफसरों के लिए सियासतदारों की नकल कभी भी भारी पड़ सकती है। 

लेकिन समाजशास्त्रियों का यह अनुभव है कि नौकरशाही अगर स्थानीय बोली, स्थानीय संस्कृति, स्थानीय पोशाक से जुड़कर चलती है, तो उसे जनता का विश्वास तेजी से मिल जाता है। देश के बहुत से सबसे कामयाब आलाअफसर ऐसे ही रहे हैं जिन्होंने स्थानीयता के साथ काम किया। अब अगर भौंरा चलाने, या गेड़ी पर चलने से सत्ता और जनता के बीच की दूरी घटती है, तो उस पर थोड़ा वक्त लगाना प्रशासन के लिए अच्छा ही है। और यह भी है कि इन अफसरों के बहाने इनके बच्चे भी देसी खेल सीख पाएंगे जिससे उनके आसपास के दूसरे बच्चों के बीच भी एक दिलचस्पी पैदा होगी।

फिल्मों के सियासी-पब्लिक मायने
देशभर में फिल्म को लेकर सियासत मची हुई है। छत्तीसगढ़ में भी इसका असर देखने को मिला। राज्य के मुखिया लाव लश्कर के साथ सिनेमा देखने पहुंचे। इसके तुरंत बाद पूर्व मुखिया ने भी पत्नी और पार्टी के नेताओं के साथ सिनेमा का आनंद उठाया। आमतौर पर लोग फिल्म मनोरंजन के लिए देखते हैं, लेकिन राजनीति में मनोरंजन से ज्यादा सियासी मयाने होते हैं। दोनों नेताओं ने अलग-अलग फिल्में देखकर पार्टी लाइन और विचारधारा का भी संदेश दे दिया। यहां पसंद-नापसंद से ज्यादा महत्व संदेश का होता है। इसी आधार पर दोनों सियासतदारों ने फिल्मों का सलेक्शन किया, लेकिन लोगों का क्या है, उनका काम तो बोलना है। लोगों ने चर्चा शुरू हो गई है कि डॉक्टर साहब कहीं तन्हा महसूस तो नहीं कर रहे हैं, जिसकी वजह से तानाजी देखने पहुंचे गए। अब लोगों को कौन समझाए कि तन्हा हो भी जाएं तो भी राजनीति में जाहिर नहीं किया जाता।

दूसरी बात यह है कि कांगे्रस-गैरभाजपाई पार्टियों की ताजा पसंद दीपिका की फिल्म आज के एक सामाजिक मुद्दे को लेकर है, हिंदुस्तानियों लड़कियों पर तेजाबी हमले पर। और उसके मुकाबले जिस दूसरी फिल्म को भाजपाई-बढ़ावा मिल रहा है वह एक ऐतिहासिक विषय पर बनी हुई है। ये दोनों ही किस्म की पसंदें इन दोनों राजनीतिक खेमों की अच्छी तरह स्थापित सोच के मुताबिक ही है। लेकिन जब भाजपा के कुछ लोगों ने यह तुलना शुरू की कि तानाजी की कमाई छपाक से बहुत अधिक है, तो एक गुटनिरपेक्ष आदमी ने कहा कि तानाजी की कमाई की तुलना करना है तो दूसरे ऐतिहासिक मुद्दों पर बनी हुई फिल्मों की कमाई से करें, जलते-सुलगते तेजाबी सामाजिक हकीकत पर बनी फिल्म की कमाई से तुलना तो नाजायज है।

तजुर्बा अनिवार्य नहीं होता...
राज्य सरकार में 3-3 भूतपूर्व पत्रकार सलाहकार के पद पर काम कर रहे हैं, उसका असर है, या फिर जनसंपर्क विभाग के खुद के कामकाज का, पिछली सरकार के मुकाबले तस्वीरों और खबरों के मामले में यह सरकारी अमला अब अचानक बेहतर काम करते दिख रहा है। आदिवासी नृत्य महोत्सव, और अब युवा उत्सव, इन दो बड़े आयोजनों में जनसंपर्क विभाग ने एक अभूतपूर्व चुस्ती दिखाई है, और शायद वह भी एक वजह है कि इन कार्यक्रमों का मीडिया में कवरेज बेहतर हो रहा है। रमन सिंह सरकार के समय तस्वीरों और खबरों के लिए चौकन्ने अखबारों को लगातार जनसंपर्क के अफसरों से संघर्ष करना पड़ता था, और अखबारों के संस्करण छपने जाते रहते थे, खबरों का ठिकाना नहीं रहता था। उस वक्त जनसंपर्क में कुछ भूतपूर्व पत्रकार थे, और अब तो विभाग में भूतपूर्व पत्रकार नहीं हैं, फिर भी अखबारी जरूरत बेहतर तरीके से पूरी हो रही है। मतलब यह कि किसी काम को अच्छा करने के लिए उस पेशे का तजुर्बा अनिवार्य नहीं होता, और उसके बिना भी बेहतर काम हो सकता है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 13-Jan-2020

ओनली कैश! 
शादी-ब्याह या किसी पारिवारिक कार्यक्रम में अधिकांश लोग उपहार स्वरुप लिफाफा लेकर जाते हैं, जिसमें हम अपनी हैसियत के मुताबिक कैश रखते हैं, लेकिन बहुत सारे लोग उपहार में कैश देना पसंद नहीं करते और गुलदस्ता या सामान बतौर गिफ्ट देते हैं। वैसे देखा जाए, तो उपहार लेने-देने का प्रचलन बरसों पुराना है, हालांकि समय के साथ इसमें बदलाव आया है, पुराने समय में तो कैश देने-लेने का ही रिवाज अधिक प्रचलित था। आजकल तो कई आमंत्रण में उपहार नहीं लाने के संदेश दिखाई और सुनाई देते हैं। ऐसा करने वालों की मंशा होती है कि पारिवारिक कार्यक्रमों को मेलजोल तक सीमित रखा जाए और उपहार की औपचारिकता में न बांधा जाए। बावजूद इसके शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रम में लोग खाली हाथ जाना उचित नहीं समझते और वर-वधू को आशीर्वाद स्वरुप कुछ न कुछ देना जरूरी समझते हैं। 

खैर, यहां पर उपहार का लेना-देना बहस का विषय नहीं है, क्योंकि यह व्यक्तिगत ज्यादा है। इसके जिक्र के पीछे भी एक शादी का न्यौता है, जोकि हमें सोशल मीडिया में देखने को मिला। दरअसल, कार्ड में लिखा गया है कि द कपल इज ऑन द मूव, सो ओलनी कैश एज गिफ्ट इज वेलकम। सही भी है क्योंकि नवदंपत्ति को शादी के बाद बाहर जाना है और उपहारस्वरुप मिले सामानों को वे अपने साथ ले जाने की स्थिति में नहीं है तो ऐसा संदेश वाजिब दिखाई पड़ता है। शादी-ब्याह में नई गृहस्थी के हिसाब से बड़े और महंगे उपहार भी दिए जाते हैं, जो या तो उनके पास पहले से होते हैं या फिर वे उसके उपयोग करने की स्थिति में नहीं होते। मना करने के बाद भी कुछ न कुछ उपहार दिए ही जाते हैं, तो कैश लिए जाना ही सही तरीका हो सकता है। यह मेहमान और मेजबान दोनों के लिए सुविधाजनक है और व्यर्थ के खर्चों से बचाने वाला भी है। 

कुछ लोग शादी पर उपहार देने में लड़के और लड़की में फर्क करते हैं। अगर वे दूल्हे के परिवार के न्यौते पर पहुंचे हैं, तो वे लिफाफे में सिर्फ शुभकामना का छपा हुए एक कार्ड लेकर जाते हैं, और अगर दुल्हन-परिवार की ओर से मिले न्यौते पर गए हैं, तो कोशिश करते हैं कि अपने खाए पर लड़की के पिता के हुए अंदाजन खर्च से अधिक का लिफाफा देकर आएं। इनमें भी रायपुर के एक प्रमुख व्यक्ति इतने कट्टर हंै कि एक दिन में ऐसी दो किस्म की शादियां हो, तो वे वर पक्ष के न्यौते वाला खाना खाते हैं, और कन्या पक्ष के न्यौते की दावत में कन्या को नगदी का लिफाफा देकर आते हैं। उनका मानना है कि लड़की के पिता को तो लड़के वाले वैसे ही लूट लेते हैं, उस पर और बोझ क्यों बना जाए।

लालबत्ती की बेचैनी
छत्तीसगढ़ में अब लालबत्ती के दावेदारों की बेचैनी बढऩे लगी है। सालभर से ज्यादा का इंतजार पूरा होने वाला है और बैक टू बैक चुनाव भी अंतिम पड़ाव पर है, हालांकि दावेदारों को खुश होना चाहिए, क्योंकि फल प्राप्ति का समय आ गया, लेकिन स्थिति उलट हो गई है। दरअसल, कहा जा रहा है कि लालबत्ती की लिस्ट भी किश्तों में निकाली जाएगी। संभव है कि पहली लिस्ट सीमित हो। कुछ खास लोगों को लालबत्ती मिले। ऐसे में नंबर कटने की आशंका से दावेदार परेशान हैं और इसके लिए रायपुर से लेकर दिल्ली तक लॉबिंग चल रही है। कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि लालबत्ती के लिए बोली भी शुरू हो गई है। इस दावे की सच्चाई पर संशय हो सकता है, लेकिन जोड़-तोड़ में कोई संशय नहीं है। इसका अंदाजा सरकार के नजदीकी लोगों और मंत्रियों के बंगलों में भीड़ को देखकर लगाया जा सकता है। तमाम दावेदार सक्रिय देखे जा सकते हैं। ऐसे ही एक दावेदार को इसकी जानकारी लगी तो समझ आया कि दावा मजबूत रखने के लिए ऐसा करना पड़ता है, वो भी निकल पड़े अभियान में। जैसे ही वो अभियान में कूदे उनका वास्ता दूसरे दावेदारों से हुआ। सभी के अपने अपने अनुभव और तौर तरीके। किसी ने उनसे कहा कि आपकी लालबत्ती तो पक्की है आपको ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं, लेकिन तीसरे दावेदार को पता चला तो उन्होंने जातीय समीकरण में उनको निपटा दिया। नेता बड़े कन्फ्यूज्ड हो गए कि लालबत्ती मिलेगी या नहीं और केवल प्रत्याशा में वे अभियान में कूद गए हैं, जिसमें पैसे भी खर्च हो रहे हैं। इस असमंजस में उनको परिवार के लोगों ने सलाह दी कि आपको लालबत्ती जब मिलेगी तब समझना, लेकिन अभी तो आपके नेतागिरी के चक्कर में धंधे पानी पर असर पड़ रहा है। बच्चों की शादी-ब्याह का समय निकल रहा है। लालबत्ती के चक्कर में धंधा पानी चौपट हो गया तो कहीं के नहीं रहेंगे। एक तो व्यापार पहले से मंदी की चपेट में है। बेचारे नेताजी को परिवार वालों की सलाह जची और कारोबार में ज्यादा फोकस कर रहे हैं और समय बचने पर ही दावा आपत्ति के लिए निकलते हैं और वो भी बंगले में जुटने वाले अभियान से हटकर दावेदारों को फिट अनफिट का समीकरण बताने में लग गए हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 12-Jan-2020

नामों में बहुत कुछ रक्खा है...
हिन्दुस्तान, और बाकी दुनिया का भी, शहरी मीडिया आदिवासियों या मूल निवासियों को लेकर मोटेतौर पर अनजान ही बने रहता है, या ये तबके शहरी आंखों के लिए पारदर्शी से रहते हैं। ऐसे में पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में जब एक राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव हुआ और जिसमें देश के बाहर के कुछ देशों से भी आदिवासी लोकनर्तक पहुंचे, तो वह छत्तीसगढ़ के इतिहास का एक किस्म से सबसे बड़ा जलसा बन गया। अब इस कार्यक्रम में पहुंचे आदिवासी-कलाकारों या उनके दल के मुखिया लोगों के नाम देखें तो कुछ दिलचस्प बातें दिखती हैं जो वहां के समाज और लोगों की जाति, उनके नाम को लेकर हैं।

अब ओडिशा से एक नृत्य ग्रुप आया तो उसमें ग्रुप लीडर का नाम तो प्रतिमा रथ था, लेकिन उनके अलावा जो सत्रह लोग ग्रुप में शामिल थे उनमें से हर एक का जाति नाम 'दुरुआ' था। मध्यप्रदेश से आए एक ग्रुप के मुखिया तो सतीश श्रीवास्तव थे लेकिन नर्तक दल के बाकी तमाम नौ लोगों के जातिनाम 'कोलÓ थे। राजस्थान से आए एक दल में कुछ राम, पूजा, जमुना जैसे हिन्दू नाम थे, और इतने ही मुस्लिम नाम भी थे। 

महाराष्ट्र से आए एक दल में आधा दर्जन लोगों में से पांच लोग ऐसे थे जिनके नाम में भास्कर और भोसले दोनों ही शब्द थे। 

चूंकि ये आदिवासी नृत्य दल थे, इसलिए बहुत से प्रदेशों से ये एक-एक जाति से ही निकले हुए दल थे, और उनमें सभी या अधिकतर लोगों के सरनेम या उपनाम एक जैसे थे। अरूणाचल प्रदेश के एक दल के पन्द्रह लोगों में से पांच के सरनेम पलेंग थे, और बहुत से लोगों के पहले नाम भी ईसाई जैसे थे। अरूणाचल प्रदेश के एक दूसरे दल में एक दिलचस्प बात यह थी कि एक दर्जन से अधिक लोगों में से किन्हीं भी दो लोगों के सरनेम एक सरीखे नहीं थे। 

झारखंड के एक दल के डेढ़ दर्जन लोगों में दर्जन भर महतो थे। झारखंड के ही एक दूसरे दल में भी महतो और मुंडा इन दो सरनेम की भरमार थी।

राजस्थान के एक दल में आधे लोगों का जातिनाम गमेती था। उत्तराखंड के एक दल में बहुत ही कम लोगों के जातिनाम लिखे थे, लेकिन जिनके लिखे थे उनमें तकरीबन सारे ही हिन्दवाल थे। केरल के नर्तक दल में किसी की भी जाति नहीं लिखी गई थी, और सारे के सारे नाम बस पहले नाम थे। कुछ ऐसा ही उत्तरप्रदेश के एक दल के साथ था जिसमें किसी के जाति नाम नहीं लिखे गए थे। 

गुजरात के एक दल के बीस लोगों में से उन्नीस के नाम के अंत में भाई शब्द था और एक महिला कलाकार के नाम में आखिर में बाई जुड़ा हुआ था। यह पूरी की पूरी टीम राठवा शब्द से शुरू होने वाले नामों की थी, और तमाम बीस नामों में स्त्री या पुरूष कलाकारों के साथ पिता के नाम भी जुड़े हुए थे, जैसे राठवा दीपिका बेन रंगू भाई। गुजरात की ही एक दूसरी टीम में हर किसी का नाम वासव, या वासवा से शुरू हुआ, और लगभग हर नाम में भाई शब्द था ही। 

लद्दाख की टीम के उन्नीस नामों में से हर एक का सरनेम अलग था, और कोई भी दो सरनेम एक सरीखे नहीं थे। 

चूंकि ये नाम अलग-अलग प्रदेशों से आए थे इसलिए लोगों ने उनमें से किसी लिस्ट में शादीशुदा होने या न होने की बात लिखी थी, किसी में नहीं लिखी थी, लेकिन तमिलनाडु की एक टीम के तमाम उन्नीस सदस्यों के नाम के साथ श्रीमती लिखा हुआ था जो कि हर सदस्य के शादीशुदा होने का संकेत था। 

अपने मुख्य आदिवासी इलाके झारखंड से अलग होने के बाद बाकी बचे बिहार को लेकर आदिवासी समुदाय की चर्चा कम होती है। लेकिन बिहार के जो नृत्य कलाकार यहां पहुंचे उस टीम के नाम देखें तो सारे के सारे नाम झारखंड के आदिवासी समुदाय के लगते हैं- एक्का, लकरा, तिग्गा, उरांव, टोप्पो, कुजूर, मिंज, बारा, केरकेट्टा वगैरह। 

गुजरात में बसे हुए अफ्रीकी मूल के एक सिद्दी समुदाय के आदिवासी कलाकारों के नाम देखें तो वे सारे के सारे मुस्लिम भी दिखते हैं, इमरान, बादशाह, बिलालभाई, साजिद सुल्तान, बाबूभाई, तौसीफभाई, हुमायूं, शब्बीर, शेख मूसा, रसीदभाई, गुलाम असलम, नसीरभाई, और मोहम्मद सलीम।

हिमाचल के एक नर्तक दल के नाम देखें तो वे लाल या चंद पर खत्म होने वाले थे, और महिलाओं और लड़कियों के नाम देवी और कुमारी पर खत्म हो रहे थे। इनके साथ जातिसूचक नाम नहीं थे। जम्मू से आई हुई टीम के दो दर्जन लोगों में से तकरीबन सारे ही मुस्लिम थे, लेकिन उनके बीच दो हिन्दू नाम भी दिख रहे थे। 

त्रिपुरा से आई हुई टीम शायद एक ही जाति की थी, और दर्जन भर से अधिक लोगों में से हर एक का जातिनाम देबबर्मा था। मध्यप्रदेश की एक और टीम एक ही जनजाति की थी, और उसमें टीम लीडर सलमान खान को छोड़ दें तो हर कलाकार का जातिनाम भील था। पश्चिम बंगाल के नृत्य दल के लोगों के नाम देखें तो उनमें आधे नाम झारखंड के आदिवासी समुदायों के दिखते थे, टुडू, मुरमू, सोरेन, हंसदा, किस्कू, और शायद इनका झारखंड और बंगाल का पड़ोसी प्रदेश होने से कुछ लेना-देना था। 

सिक्किम के एक दल के दस नामों में से नौ नौ नामों के साथ एक ही जातिनाम, लिम्बू का जिक्र था। 

लोगों के नाम कैसे रखे जाते हैं, उनके उपनाम कैसे रहते हैं, उनके नाम के साथ परिवार या पिता, या माता के नाम का जिक्र किस तरह होता है, यह एक बड़ा दिलचस्प समाजशास्त्रीय अध्ययन है, छत्तीसगढ़ आए देश भर के कलाकारों के नामों से यह एक झलक मिली है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 10-Jan-2020

जोगी-भाजपा साथ-साथ...

जोगी पार्टी की भाजपा से नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं। म्युनिसिपल चुनाव में जोगी पार्टी के सहयोग के दम पर गौरेला, पेंड्रा, रतनपुर और कोटा में भाजपा ने जीत हासिल की। यहां कांग्रेस ने जोगी पार्टी के लोगों को तोडऩे की कोशिश भी की, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिल पाई। कोटा और मरवाही विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व जोगी दंपत्ति करते हैं। वैसे तो जोगी परिवार की कांग्रेस में शामिल होने की खबर उड़ती रहती है। मगर यह परिवार भाजपा के ज्यादा नजदीक रहा है। 

बलौदाबाजार में भी जोगी पार्टी के विधायक हैं। यहां उम्मीद की जा रही थी कि जोगी पार्टी के पार्षदों का कांग्रेस को साथ मिलेगा और नगर पालिका में कांग्रेस का कब्जा हो जाएगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। नगर पालिका में जोगी पार्टी के पार्षदों का समर्थन भाजपा को मिल गया और भाजपा का नगर पालिका अध्यक्ष पद पर कब्जा हो गया। जोगी की जाति की जांच के मामले को भाजपा सरकार ने 15 साल तक लटकाए रखा। जबकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनते ही जांच में तेजी आई। ऐसे में जोगी पार्टी का भाजपा को साथ मिल रहा है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  

अपनी समझ भी इस्तेमाल करें...
छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने सिगरेट की खुली बिक्री पर रोक लगा दी है। अब जिसे खरीदना हो वह पूरा पैकेट ही खरीदे। मतलब यह कि कोई सिगरेट पीने की लत छोडऩे की कोशिश कर रहे हों, और एक बार में एक सिगरेट खरीद रहे हों, तो वह मुमकिन नहीं है। अब पूरे का पूरा पैकेट लेना होगा, और आदत छोडऩे की हसरत अगर हो, तो उस हसरत को ही छोडऩा होगा। इसके पीछे तर्क यह है कि सिगरेट के पैकेट पर तो उससे कैंसर होने की चेतावनी दर्ज रहती है, लेकिन सिगरेट पर अलग से ऐसी कोई चेतावनी नहीं रहती, और एक सिगरेट खरीदकर पीने वाले को सावधानी का ऐसा संदेश नहीं मिलता। 

कोई कानून किस तरह अपने मकसद को ही शिकस्त देने वाला हो सकता है, यह उसकी एक शानदार मिसाल है। यह छत्तीसगढ़ सरकार का अपना फैसला नहीं है, बल्कि बीते बरस केन्द्र सरकार ने ही कोटपा नाम के इस कानून को लागू किया है जिसके तहत सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू प्रोडक्ट की बिक्री पर कुछ प्रतिबंध और लागू किए गए हैं, और इन्हें तोडऩे पर बड़े जुर्माने का इंतजाम किया गया है। अभी प्रतिबंधित इलाकों में सिगरेट पीने पर भी दो सौ रूपए का जुर्माना है, और स्कूल-कॉलेज के आसपास सिगरेट-बीड़ी-तम्बाकू की बिक्री पर भी। केन्द्र सरकार ने सिगरेट की खुली बिक्री पर जुर्माना बढ़ाते हुए इस बात को अनदेखा किया है कि देश में करीब 70 फीसदी सिगरेट खुली बिकती है, और पैकेट खरीदने की ताकत भी कम लोगों में रहती है। अब यह नया जुर्माना एक तो लागू करना नामुमकिन है, दूसरी तरफ यह लोगों के जेब में हमेशा पैकेट को बनाए रखेगा जिससे उनका सिगरेट पीना बढ़ेगा। छत्तीसगढ़ सरकार को केन्द्र सरकार के इस नियम को लागू करते हुए अपनी खुद की समझ का भी इस्तेमाल करना चाहिए। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 09-Jan-2020

निर्बाध ताकत ने पूरा भ्रष्ट कर दिया
अंग्रेजी में कहावत है-पॉवर करप्ट्स एण्ड एब्सोल्यूट पॉवर करप्ट्स एब्सोल्यूटली। यानी ताकत भ्रष्ट करता है और निर्बाध ताकत पूरी तरह भ्रष्ट करती है। यह कहावत रमन सिंह के पीए ओपी गुप्ता और अरूण बिसेन पर एकदम फिट बैठती है। अरूण बिसेन कंसोल नाम की कंपनी से रिश्तों और, पत्नी की नियम विरूद्ध नियुक्ति को लेकर सुर्खियों में रहे हैं, तो रिंकू खनुजा आत्महत्या मामले में पुलिस एक बार उनसे पूछताछ कर चुकी है। गुप्ता के कारनामे तो और भी भयंकर हैं। उनके खिलाफ नाबालिग ने बरसों से लगातार यौन शोषण का मामला दर्ज कराया है। आरोप है कि गुप्ता बरसों से पढ़ाने के नाम पर एक नाबालिग स्कूली छात्रा को रखकर उसका यौन शोषण कर रहे थे। 

पुलिस फिलहाल ओपी गुप्ता से पूछताछ कर रही है। रमन राज में मामूली हैसियत के दोनों पीए गुप्ता और बिसेन की ताकत सीनियर आईएएस अफसरों से कम नहीं थी। मंतूराम पवार प्रकरण हो, या फिर निर्दलीय प्रत्याशियों की दबावपूर्वक नाम वापसी का मामला हो, रमन सिंह के दोनों पीए का नाम चर्चा में रहा है। इन शिकायतों को नजरअंदाज करना आज रमन सिंह के लिए भारी पड़ रहा है। सौम्य और मिलनसार रमन सिंह की छवि को भी नुकसान पहुंचा है। सुनते हैं कि ये दोनों सहायक आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर भी हैं। ओपी गुप्ता का राजेन्द्र नगर में भव्य बंगला है, तो अरूण बिसेन करोड़पतियों-अरबपतियों की कॉलोनी स्वर्णभूमि में निवास करते हैं। भाजपा के कई ताकतवर लोग इन दोनों के खिलाफ रहे हैं। मगर दोनों का बाल बांका नहीं हो पाया। अब जब दोनों जांच-पड़ताल के घेरे में आए हैं, तो पार्टी के लोग चैन की सांस ले रहे हैं। कहा भी जाता है कि जैसी करनी, वैसी भरनी। 

प्रेतनी बाधा से सीडी तक
वैसे ओपी गुप्ता इसके पहले भी बस्तर की एक स्थानीय निर्वाचित नेत्री के साथ रिश्तों को लेकर पार्टी और सरकार में सबकी जानकारी में विवाद में थे, और वे खुद आपसी बातचीत में मंजूर करते थे कि प्रेतनी-बाधा दूर करने में करोड़ों रुपये लग गए थे। दूसरी तरफ अरूण बिसेन का सीएम हाऊस में जलवा देखकर लोग हक्काबक्का रहते थे जब वे एक सबसे महत्वपूर्ण विभाग चला रहे आईएएस राजेश टोप्पो को राजेश कहकर ही बुलाते थे। इन्हीं दोनों के नाम मुंबई जाकर सेक्स-सीडी देखने से लेकर अंतागढ़ में पैसा पहुंचाने तक, चुनाव से नाम वापिस लेने तक के फोन जैसे कई मामलों में उलझे ही रहे।

भीतरघात की शिकायत
म्युनिसिपल चुनाव में भाजपा के कई बड़े नेताओं के खिलाफ भीतरघात की शिकायतें सामने आई है। इनमें पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी भी हैं। सुनते हैं कि रायपुर के एक वार्ड प्रत्याशी ने शिकायत की है कि श्रीचंद ने उनके खिलाफ काम किया है। प्रत्याशी ने पार्टी के प्रमुख नेताओं को मौखिक रूप से  श्रीचंद की चुनाव में गतिविधियों की जानकारी दी है। यह भी बताया गया कि श्रीचंद ने पार्टी के प्रत्याशी के बजाए निर्दलीय को सपोर्ट किया। भाजयुमो के महामंत्री संजूनारायण सिंह ठाकुर ने भी कई नेताओं के खिलाफ भीतरघात की शिकायत की है। हालांकि कुछ नेताओं के खिलाफ कार्रवाई तो की गई है, लेकिन बड़े नेताओं के खिलाफ कार्रवाई का हौसला संगठन नहीं जुटा पा रहा है। ऐसे में देर सबेर मामला गरमा सकता है। 

कांग्रेस की बड़ी कामयाबी
म्युनिसिपल चुनाव में कांग्रेस को अच्छी सफलता मिली है। प्रदेश के 10 में से 9 म्युनिसिपलों में कांग्रेस के मेयर-सभापति बने हैं। कोरबा में शुक्रवार को चुनाव हैं। कांग्रेस नेता मानकर चल रहे हैं कि कोरबा में भी कांग्रेस का मेयर-सभापति बनेगा। इस सफलता के बाद भी कांग्रेस में शिकवा-शिकायतों का दौर चल रहा है। कहा जा रहा है कि पार्टी ने अनारक्षित सीटों में भी आरक्षित वर्ग के नेताओं को मेयर बना दिया। पंचायत चुनाव में वैसे भी अनारक्षित वर्ग के नेताओं की भागीदारी नहीं के बराबर रह गई है। क्योंकि दो को छोड़कर बाकी सभी जिला पंचायत के अध्यक्ष के पद आरक्षित हो गए हैं।
 
असंतुष्ट नेता बताते हैं कि पिछले चुनाव में सैद्धांतिक रूप से फैसला लिया गया कि अनारक्षित सीटों पर सामान्य वर्ग से प्रत्याशी उतारने का फैसला लिया गया था। मेयर पद के लिए सामान्य वर्र्ग के प्रत्याशी उतारने के अच्छा संदेश भी गया। पार्टी को सरकार न रहने के बावजूद सफलता भी मिली। अब जब डायरेक्ट इलेक्शन नहीं हुए हैं ऐसे में अनुभवी और योग्य सामान्य वर्ग के नेताओं को नजर अंदाज कर दिया गया। खुद सीएम के विधानसभा क्षेत्र पाटन के कुम्हारी में ऐसा हुआ है। दुर्ग को छोड़कर कहीं भी सामान्य वर्ग से मेयर नहीं बन पाया। पार्टी के आलोचक मान रहे हैं कि सरकार बनने के बाद जातिवादी ताकतें हावी हो गई। जिनके दबदबे के चलते पिछले चुनाव की तरह कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। 

सुनते हैं कि पार्टी के कुछ नेता ने एक सीनियर विधायक को इसके लिए तैयार कर कर रहे हैं और उनके जरिए जल्द ही पार्टी हाईकमान को इससे अवगत कराया जाएगा। 

उधर चंद्राकर की पहल...
इससे परे भाजपा में पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर सामान्य वर्ग के नेताओं को संगठन में पर्याप्त महत्व मिले, इसके लिए मुखर रहे हैं। चंद्राकर ने धमतरी जिलाध्यक्ष के चयन के मौके पर बेबाकी से अपनी राय रखी थी। उन्होंने कहा कि जिले की तीन सीटों में खुद समेत दो पिछड़े वर्ग के विधायक हैं। एक सीट अजजा वर्ग के लिए आरक्षित है। ऐसे में संगठन में सामान्य वर्ग से अध्यक्ष बनाए जाने से संंतुलन बना रह सकता है और पार्टी की ताकत बढ़ सकती है। चंद्राकर के सुझाव की पार्टी के भीतर काफी प्रशंसा भी हो रही है। चंद्राकर के सुझाव को पार्टी बाकी जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में ध्यान रख सकती है।