राजपथ - जनपथ

Posted Date : 30-Mar-2018

  • आखिरकार राज्यपाल ने रविशंकर विवि और दुर्ग विवि के कुलपति की नियुक्ति कर दी। रविवि में भाषा विज्ञानी प्रो. केसरीलाल वर्मा को मौका मिला, तो दुर्ग में रविवि के ही फार्मेसी विभाग के प्रमुख शैलेंद्र सराफ को कुलपति बनाया गया। प्रो. सराफ का कुलपति बनना तकरीबन तय माना जा रहा था। सुनते हैं कि वे संघ परिवार से हैं और उनके पिता सागर में आरएसएस के जिला प्रमुख रह चुके हैं। संघ से जुड़े लोगों ने उनके नाम की सिफारिश की थी। उनका नाम रायपुर के लिए चर्चा में था, लेकिन उन्हें दुर्ग भेजा गया। इससे परे प्रो. केसरीलाल वर्मा ने भाषा विज्ञान के क्षेत्र में काफी काम किया है, साथ ही साथ वे स्थानीय भी हैं। कहा जा रहा है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश बैस ने भी उनके नाम की सिफारिश की थी। ऐसे में स्थानीय-बाहरी विवाद से बचने वर्मा के नाम पर मुहर लगाई गई। राज्य बनने के बाद अभी तक तो प्रदेश के विवि में कुलपति ठीक-ठाक ही रहे हैं। दक्षिण के राज्यों में कुछ जगहों पर तो ठेकेदार और सप्लायर इतने प्रभावशाली हो गए हैं, कि वे अपनी पसंद से कुलपति तक बनवा देते हैं। हालांकि यहां कारोबारियों को महत्व नहीं मिल पाया है, लेकिन फिर भी जो भी कुलपति रहे हैं, उनमें से कई अपने राजनीतिक संपर्कों के बूते पर ही पद पाने में कामयाब रहे हैं। 

    इम्तिहान कब?
    एक सामाजिक संस्था सुमित फाउंडेशन 'जीवनदीप' के रविन्द्र सिंह क्षत्री को छत्तीसगढ़ की एक ट्रेन में अपने नेत्रहीन पिता की लाठी थामे और दूसरे हाथ से भीख मांगती एक बच्ची मिली। नौ बरस की यह बच्ची  पिता के सामने राह दिखाते चल रही थी और फिर भाटापारा स्टेशन पर उतरी। उससे पूछा गया कि क्या वह पढ़ती नहीं है तो जवाब मिला कि पढ़ती है, इम्तिहान चल रहा है, और दो दिन की छुट्टी मिली है, इसलिए पापा के साथ वह मांगने के लिए ट्रेन में आ गई है। पिता का यह रोज का काम है, लेकिन छुट्टी के दिन पिता के काम को आसान करने के लिए  नौ बरस की शबाना भी आ गई। अब यह सोचना मुश्किल काम है कि इम्तिहान दो दिन बाद है, या इन दो दिनों में।

    ऊपर धुआं, नीचे गड्ढा

    राजधानी रायपुर में घूमने के लिए सबसे लोकप्रिय जगहों में से एक, मरीन ड्राइव पर इन दिनों लगातार दिक्कत हो रही है। उसके किनारे बसे हुए देवार डेरे के लोग लगातार हर सुबह कहीं से तार और केबल लाकर उसमें से धातु निकालने के लिए आग लगा देते हैं, और रबर का केबल-कवर जलकर आसपास लोगों को दम घोंटने लगता है। लोगों की शिकायत पर निगम कमिश्नर तुरंत कर्मचारियों को भेज रहे हैं जो जाकर आग बुझाते हैं, लेकिन यह रोज का सरदर्द बना हुआ है। साफ और ठंडी हवा में घूमने के शौकीन लोग इस धुएं से हलाकान तो हैं ही आज सुबह इनमें से कुछ लोग इस धुएं को देखते हुए एक और खतरे में पड़ गए। तालाब के चारों ओर चलने के लिए बनी रास्ते का एक बड़ा टुकड़ा अचानक जमीन में धंस गया, और धुआं देखते चलने वाले लोग रोज के भरोसे के साथ चलते हुए इसमें गिरते-गिरते भी बचे।

    • विजय माल्या भागा हुआ है और अब शादी कर रहा है। इसे कहते हैं भागकर शादी करना।
    • आपकी पहली पुरूष-संतान पर मार्क जुकरबर्ग का हक है। जब आपने फेसबुक की शर्ते मंजूर कीं, तब उसमें यह बात भी शामिल थी।
    • गेंद से छेडख़ानी पर वीरेन्द्र सहवाग ने अब तक कुछ कहा नहीं क्योंकि छेडख़ानी करने वाला मुस्लिम नहीं था।
    • इस देश में रहना है तो आधार ले लो। भाग जाना है तो उधार ले लो।
    • अफवाह और गढ़ी हुई खबरें आज हिंदुस्तानियों को एक-दूसरे से जोड़े रखने की सबसे बड़ी तरकीब हो गई है...
    • सीबीएसई पेपर लीक के लिए नेहरू जिम्मेदार हैं क्योंकि सीबीएसई का गठन 1962 में नेहरू ने किया था।
    •   rajpathjanpath@gmail.com
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Posted Date : 29-Mar-2018
  • प्रदेश की राजनीति को लेकर कांग्रेस हाईकमान ने दिशा तय कर दी है। पिछड़ा वर्ग के नेताओं को अहम जिम्मेदारी देकर भविष्य की राजनीति को लेकर भी संकेत दे दिए हैं। अब तक प्रदेश में अनुसूचित जाति-जनजाति के नेताओं को आगे कर पार्टी यहां काम करती रही है। लेकिन अब कुर्मी समाज से प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल और अन्य पिछड़ा वर्ग से डॉ. चरणदास महंत के साथ-साथ साहू समाज से पार्टी के पिछड़ा वर्ग विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताम्रध्वज साहू को बिठाकर 52 फीसदी पिछड़ा मतदाताओं को साधने की कोशिश की है। 

    राज्य बनने के बाद अजीत जोगी को सीएम की कुर्सी के पद पर बिठाकर आदिवासी नेतृत्व को महत्व दिया था और पिछले 15 सालों में प्रदेश कांग्रेस की राजनीति जोगी के इर्द-गिर्द घुमती रही। हालांकि, पार्टी की राष्ट्रीय कार्य समिति में मोतीलाल वोरा और प्रदेश में डॉ. महंत व दिवंगत नंदकुमार पटेल, महेन्द्र कर्मा अलावा रविन्द्र चौबे भी अहम पद पर रहे। लेकिन पार्टी ने अनुसूचित जाति-जनजाति नेताओं को आगे किया। जोगी और दिवंगत महेन्द्र कर्मा केन्द्र बिन्दु में रहे। लेकिन अब धीरे-धीरे प्रदेश में पार्टी लाईन बदलने के संकेत मिल रहे हंै। विधानसभा सत्र के बाद नेता प्रतिपक्ष की भूमिका नहीं रह जाती है। प्रदेश अध्यक्ष और चुनाव अभियान समिति के प्रमुख पर ही चुनाव संचालन की जिम्मेदारी रहती है। ऐसे में अब उनके सहयोग के लिए एक और पिछड़ा वर्ग नेता को लगाया गया है। वैसे तो, दो कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शिवकुमार डहरिया और रामदयाल उइके भी हैं, लेकिन उनकी कोई खास भूमिका नहीं रहती है। पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर और सरगुजा के आदिवासी इलाकों में कांग्रेस को अच्छी सफलता मिली थी।  पिछड़ा वर्ग नेताओं की बड़ी परीक्षा विधानसभा चुनाव में होगी। इसमें वे कितने सफल रहते हैं और आदिवासी इलाकों में पार्टी का क्या हाल रहता है, यह देखना है। 

    सांप बचाने जुट गया परिवार
    नया रायपुर में एक सांप की खबर मिलने पर उसे बचाने के लिए वहां रहने वाली बलवंत कौर बल गईं तो उन्हें सांप घायल हालत में मिला। उन्होंने अपनी बेटी मंजीत कौर बल को फोन पर बताया तो उन्होंने मां से कहा कि सांप को बचाने के लिए तुरंत डॉक्टर के पास लेकर जाना पड़ेगा। दो और साथी जयदीप और मिलन सिंह सांप को शहर तक लाए और फिर उसे पशु चिकित्सक डॉ. पदम जैन के पास ले जाया गया। सांप बचाने का उनके लिए यह नया तजुर्बा था। उन्होंने उसे बेहोश करके ऑपरेशन किया, और अब यह सांप एक हफ्ते के बेडरेस्ट पर रखा गया है। (तस्वीरें और जानकारी मंजीत कौर बल के फेसबुक पेज से, जो कि कहीं सांप निकलने पर खबर मिलते ही जाकर उसे सुरक्षित जगह पर छोड़कर आती हैं)  rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 28-Mar-2018
  • पखवाड़े भर पहले कोटा विधायक श्रीमती डॉ. रेणु जोगी की सोनिया गांधी से मुलाकात की जमकर चर्चा है। इसकी पुष्टि कोई नहीं कर रहा है, लेकिन कांग्रेस के एक खेमे में इसको लेकर बेचैनी दिख रही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि पूर्व सीएम अजीत जोगी की देर सबेर कांग्रेस में वापसी हो सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि जोगी तो इसके लिए तैयार हैं लेकिन अमित जोगी इसके खिलाफ हैं। वे कांग्रेस में वापस नहीं आना चाहते हैं। 

    सुनते हैं कि कुछ नेताओं ने एक फार्मूला तैयार किया है, जिसमें सरकार बनने पर रेणु जोगी के साथ-साथ अमित को भी अहम जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव है। हल्ला यह भी है कि डॉ. रेणु जोगी के जरिए यह सब कोशिश हो रही है। पार्टी हाईकमान का सोचना यह है कि कांग्रेस भले ही भाजपा से ज्यादा सीट ले आए लेकिन बिना जोगी के कांग्रेस की सरकार मुश्किल है। त्रिकोणीय संघर्ष की हालत में भाजपा को फायदा भी हो सकता है। वैसे अब तक जोगी पिता-पुत्र  का रूख कांग्रेस के प्रति सख्त रहा है और कुछ दिन पहले राज्यसभा चुनाव में झटका भी दे चुके हैं। ऐसे में फिलहाल कांग्रेस-जोगी पार्टी के एक होने की संभावना कम दिख रही है, लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। अगले दो महीने में बड़े राजनीतिक उलटफेर की संभावना भी जताई जा रही है।
    लेकिन एक काल्पनिक स्थिति की बात करें, और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के बाद अगर कांगे्रस या भाजपा के पास अपने बूते बहुमत न जुटे, और जोगी के चाहे जितने भी विधायक हों, उनकी जरूरत पड़े, तो जोगी इन दोनों में से किस पार्टी के साथ रहना चाहेंगे, और इन दोनों पार्टियों में से कौन जोगी का साथ लेना चाहेगी? लेकिन ऐसी नौबत आने पर यह भी हो सकता है कि रहस्यमय तरीके से कांगे्रस के कुछ विधायक इस्तीफा दे दें, और अपनी पार्टी के विधायक दल को छोटा कर दें। राजनीति में कुछ भी हो सकता है, ठीक अनुपम खेर के एक टीवी कार्यक्रम की कैच लाईन की तरह। (  rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 27-Mar-2018
  • भूपेश बघेल ने एक बार फिर सरकार पर हमला बोला है। इस बार उन्होंने देश के बड़े औद्योगिक समूह अडानी पर मेहरबानी को लेकर राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया और सांठ-गांठ के आरोप लगाए। अडानी समूह सरगुजा जिले में कोयला खनन कर रही है। लेकिन भूपेश के आरोपों से भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लोग ही परेशान हैं। सुनते हैं कि अडानी के कोयला खदान में परिवहन का काम कांग्रेस से जुड़े नेताओं के हाथ में हैं। अमित जोगी ने इसको लेकर कुछ समय पहले नेता प्रतिपक्ष पर आरोप लगाए थे, तो उन्होंने मानहानि का मुकदमा दायर करने की चेतावनी दी थी। स्थानीय निकाय के कांग्रेस के एक प्रमुख पदाधिकारी की परिवहन व्यवसाय में भागीदारी की चर्चा है। ऐसा नहीं है कि भाजपा के लोग खदान से कोयला परिवहन के काम में रूचि नहीं रखते हैं। कहा जा रहा है कि कंपनी प्रबंधन ने बड़े नेताओं के दबाव में कुछ भाजपा नेताओं को काम भी दिया था। लेकिन उन्होंने मोटी रकम लेकर दूसरों को काम दिला दिया। 
    कुल मिलाकर अडानी समूह से स्थानीय नेता इतने उपकृत हैं कि गाडिय़ों के आने-जाने में दिक्कत न हो, इसलिए चौक से गांधी प्रतिमा को हटाकर किनारे लगवा दिया। खास बात यह है कि अंबिकापुर नगर निगम में कांग्रेस का कब्जा है, लेकिन यह काम आम सहमति से हुआ। वैसे भी मौजूदा राजनीतिक परिवेश में गांधी की विचारधारा हाशिए पर है। ऐसे में प्रतिमा को हटाने में कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई। 
    अडानी से परे भी बलौदाबाजार के सीमेंट कारखानों के ट्रांसपोर्ट और पैकिंग के ठेके कांगे्रस के नेता दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए लेने लगे थे, और इसी कारोबार में वे लखपति से अरबपति हो गए। आज भी कुछ रायपुर में बसे नेता, कुछ बलौदाबाजार में बसे हुए, और कुछ भाटापारा के, इस काम में लगे हुए हैं, और कारखानेदारों को नेताओं से कोई दिक्कत भी नहीं होती। 

    मार्च में बना दी अपै्रल की दवा?
    सोशल मीडिया पर सच से अधिक कारोबार झूठ कर लेता है। दरअसल सच तो बेस्वाद खिचड़ी सरीखा होता है, और झूठ चटपटी चाट जैसा। इसलिए लोग सेहत के लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा, जानते हुए भी झूठ को आगे बढ़ाकर मजा लेते चलते हैं। लेकिन बहुत सी सच्ची बातें भी रहती हैं जिन्हें लोग अपनी पसंद या नापसंद के आधार पर झूठ भी मान लेते हैं। अभी बाबा रामदेव की कंपनी की एक दवा की तस्वीर सोशल मीडिया पर तैर रही है जिसमें मार्च महीने के बीच में ही ऐसी पैकिंग की तस्वीर है जिसमें दवा के बनने की तारीख अपै्रल 2018 लिखी गई है। यह सच है या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन लोग इसके मजे खूब लेते हैं, और बाबा के लिए जवाबदेही की एक चुनौती भी खड़ी कर देते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 26-Mar-2018
  • रायपुर उत्तर एक ऐसी विधानसभा सीट हो गई है, जिसे भाजपा का हर कोई नेता अपना मान रहा है। वैसे तो श्रीचंद सुंदरानी की सक्रियता में कहीं कोई कमी नहीं है, लेकिन व्यापारियों के चेंबर चुनाव के पचड़े में पड़े रहने से उनके विरोधियों की संख्या बढ़ गई है। रायपुर उत्तर से संजय श्रीवास्तव, छगनलाल मुंदड़ा सहित कई अन्य दावेदार हैं। संजय को पाटन का प्रभार दिया गया है। पाटन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल का विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे में वहां संगठन को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी संजय के कंधों पर है। इसी तरह मुंदड़ा को सीएम के विधानसभा क्षेत्र का जनसंपर्क पदयात्रा का प्रभारी बनाया गया है। व्यस्तता के बावजूद दोनों नेता रायपुर उत्तर के लिए समय निकाल लेते हैं। वैसे तो, पूर्व महापौर सुनील सोनी को रायपुर उत्तर का मजबूत दावेदार माना जाता है। लेकिन सुंदरानी को उनसे कोई दिक्कत नहीं है। क्योंकि सुनील सोनी प्रदेश की सभी 90 सीटों की यात्रा के प्रभारी हैं। वे कुछ वार्डों में सुंदरानी के कहने पर व्यस्तता के बावजूद पदयात्रा में शामिल भी हुए पर संजय और मुंदड़ा के यात्रा में शामिल होते ही उनकी टेंशन बढ़ जाती है। 
    भाजपा के भीतर विधानसभा सीटों को लेकर यह भी चर्चा है कि भिलाई और वैशालीनगर सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों की पसंद कुछ बदल भी सकती है। इनसे लगी हुई पाटन की सीट पर विजय बघेल भाजपा के विधायक रह चुके हैं, लेकिन ऐसी चर्चा है कि उन्हें अगर भिलाई या वैशालीनगर से लडऩा पड़े, तो भी वे मना नहीं करेंगे क्योंकि पाटन इतनी लंबी-चौड़ी सीट है कि उसमें जनसंपर्क और चुनाव प्रचार खासी मशक्कत का काम हो जाता है।
    कलेक्टर बनने में दिलचस्पी नहीं!
    लोक सुराज के बाद कुछ जिलों के कलेक्टरों को बदले जाने की चर्चा चल रही है। बड़े जिलों में साफ छवि के सीधी भर्ती के आईएएस को बिठाने पर विचार चल रहा है। सुनते हैं कि बिलासपुर कलेक्टर पी दयानंद के काम से अमर अग्रवाल खुश नहीं हैं। अमर बिलासपुर शहर के विधायक भी हैं और चर्चा है कि वे दयानंद को बदलना चाहते हैं। बड़े जिलों के लिए जिन अफसरों के नाम सामने आए हैं, उनमें पॉवर वितरण कंपनी के एमडी अंकित आनंद भी हैं। उनके पास क्रेडा सीईओ का दायित्व भी है। अंकित आनंद की छवि एक साफ सुथरे अफसर की है। पॉवर कंपनी में उनके काम से हर कोई खुश है। वे दो जिलों के कलेक्टर रह चुके हैं। लेकिन कहा जा रहा है कि कलेक्टर बनने में उनकी कोई रूचि नहीं है। 
    अंकित आनंद के विचार जानकर सरकार के आला अफसर हैरान भी हैं। क्योंकि बिलासपुर-दुर्ग जाने के लिए तो सचिव स्तर के कई अफसर एक टांग पर तैयार खड़े हैं। अब डीएमएफ फंड आने के बाद तो कई सीनियर अफसरों को छोटे जिलों में जाने से परहेज नहीं रह गया है। ऐसे में अब चुनाव की दृष्टि से निर्विवाद-साफ सुथरे अफसरों  के नाम छांटे जा रहे हैं। सूची 2-3 अप्रैल तक फाइनल हो सकती है। 
    छात्र आंदोलन, कल, आज, और कल
    अमरीका के स्कूल-कॉलेज में आए दिन कहीं न कहीं गोलीबारी होती है, और कम या अधिक लोग मारे जाते हैं। वहां हर किसी को अनगिनत हथियार रखने की छूट है, और ऐसे भयानक ऑटोमेटिक हथियार भी खरीदकर रख सकते हैं जो कि महज किसी जंग में इस्तेमाल के लायक रहते हैं। हथियार-कारखानेदार लॉबी इतनी मजबूत है, और सांसदों से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनावों में इतना बड़ा चंदा देती है कि उसके पेट पर लात मारने सरीखा काम सरकारें सोच नहीं पातीं। लेकिन अभी दो दिन पहले वहां के 700 शहरों में छात्रों ने प्रदर्शन किया, और राजधानी वाशिंगटन में तो 5 लाख लोग एक साथ सड़क पर उतरे। छात्रों की यह जागरूकता देखकर दुनिया में लोगों को बड़ी उम्मीदें जागी हैं।
    लेकिन ऐसे में छत्तीसगढ़ के छात्र आंदोलनों का इतिहास भी याद पड़ता है जो कि बहुत निराशा से भरा हुआ था। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त आज से करीब 40 बरस पहले रायपुर में जो एक बड़ा छात्र आंदोलन हुआ था, वह शहर के सबसे महंगे दर्जी, कन्हैया-पैराडाइज के सिलाई के रेट कम करवाने के लिए था। अब उस वक्त यह सवाल किसी ने उठाया नहीं था कि सेठों के दर्जी से कपड़े सिलवाना छात्रों की समस्या कैसे हो गई? एक दूसरा बड़ा छात्र आंदोलन अंगे्रजी के खिलाफ हुआ था जो कि बाकी शहरों तक भी फैला था। नतीजा यह हुआ कि छत्तिसगढिय़ा सबसे बढिय़ा होने में अंगे्रजी की कमी रह गई, और तबके छात्र नेता खुद तो वकालत में लग गए, लेकिन पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग बेरोजगार बने रहे। दक्षिण भारत के राज्यों से आकर छत्तीसगढ़ में लोगों को टाइपिस्ट और स्टेनो जैसे काम मिलने लगे, और छत्तीसगढ़ी लोग पिछड़ते चले गए। ऐसे में लगता है कि दुनिया के दूसरे देशों में छात्र आंदोलनों के जो गंभीर मुद्दे रहते हैं, क्या ऐसे किसी मुद्दे को लेकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भी छात्र आंदोलन हो सकते हैं? आज तो महज कांगे्रस और भाजपा के छात्र संगठन एक-दूसरे के खिलाफ टकराव ढूंढते रहते हैं, और छात्र आंदोलनों को देखकर यह पक्का लगता है कि नौजवान पीढ़ी का सामाजिक-राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण शून्य है। जिस उम्र में भगत सिंह ने दुनिया के इतिहास को पढ़कर, लिखकर और करकर इतिहास बना डाला था, उस उम्र में आज यहां के नौजवान पीढ़ी मोबाइल और मोबाइक से आगे नहीं बढ़ पा रहे।

     

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Posted Date : 25-Mar-2018
  • चुनाव को कुछ ही महीने बचे हैं, और छत्तीसगढ़ सरकार नए-नए मुद्दे खड़े होने दे रही है। ये तमाम बातें टाली जा सकती थीं, लेकिन कांगे्रस की झोली में मानो मुद्दे टपक रहे हैं। प्रदेश के चार सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को निजी हाथों में देने का फैसला विपक्ष के साथ-साथ आम जनता को भी याद दिला गया कि सरकार ने स्कूलें घटा दी हैं, राज्य में निजी स्कूलें बढ़ती चली जा रही हैं, कॉलेज तो बहुत से निजी हैं ही, अब सरकारी इलाज से भी सरकारी छुट्टी पाने के चक्कर में दिख रही है, और निजी मैनेजमेंट की शुरूआत सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में की जा रही है। इससे लोगों को फिर याद आया कि सरकार ने शराब का धंधा तो ठेकेदारों से ले लिया और खुद उसे कर रही है, दूसरी तरफ जो इलाज कल तक सरकार करती थी, उसे अब ठेकेदार करेंगे। मामला तो दवा-दारू का ही है, लेकिन आम जनता की आम समझ के मुताबिक कुछ उल्टा है। यह कुछ वैसा ही लगता है जैसे कि कल नलों में पानी निजी कंपनी देने लगे, और मुर्गी-मछली का पूरा कारोबार सरकार अपने हाथ में ले ले। चुनावी बरस में इलाज का मुद्दा बड़ी आबादी को छूने वाला है।

    पूरे फायदे गिनाना नामुमकिन...
    सरकारी कार्यक्रमों और इश्तहारों में कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल बकरीपालन को बढ़ावा देते दिखते हैं। वे अपनी पार्टी और हिंदुत्व की रीति-नीति के मुताबिक बकरी को गरीब की गाय भी कहते हैं। लेकिन वे खुद एक शाकाहारी हैं, और मांसाहार को बढ़ावा देना उनके मिजाज में नहीं है, इसलिए वे बकरी पालने के फायदों को अधिक दूर तक नहीं गिनाते। बकरी पालने का मतलब दूध का कारोबार नहीं होता है, गोश्त का कारोबार होता है। दूध तो बहुत थोड़ा सा मिलता है जिसका बाजार भी बड़ा छोटा है, और बकरी के दूध की मार्केटिंग का कोई इंतजाम है भी नहीं। इसलिए मोटे तौर पर बकरी पालने वालों को गोश्त के बाजार में ही जाना होता है। अब इसी तरह कृषि मंत्री की जिम्मेदारियों में मछलीपालन भी आता है, और मंत्री होने के नाते उसे भी बढ़ावा देना पड़ता है। मुर्गियां भी उन्हीं के विभाग में आती हैं, सुअरपालन भी उन्हीं के विभाग के जिम्मे है। अब इस राज्य में दारू न पीने वाले अमर अग्रवाल कई कार्यकाल से आबकारी मंत्री बने हुए हैं, शाकाहारी बृजमोहन अग्रवाल पशुपालन मंत्री बने हुए हैं, और भी कुछ मंत्रियों के विभाग उनके मिजाज और तौर-तरीकों के खिलाफ हैं, लेकिन हर बात की चर्चा तो लिखकर हो नहीं सकती। 

    * पहले दरवाजे की घंटी बजाकर भाग जाते थे और बंदा सोचते रह जाता था कि कौन था?
    अब मैसेज वॉट्सऐप करके डिलीट फॉर एवरीवन कर देते हैं। और सभी बंदे सोचते रह जाते हैं कि भेजा क्या था?

    * टीवी के रिमोट के साथ दिक्कत यह है कि जब वह कहीं छुप जाता है तो उसे घंटी करके ढूंढा नहीं जा सकता, फोन की तरह...

    * भारत-चीन सरहद पर डोकलाम पर चीन का दावा टल ही नहीं रहा। दरअसल जब चीनी राष्ट्रपति गुजरात आए थे तो मोदी ने झूला झूलते हुए कहा था आप ढोकल तो लीजिए, और चीनी नेता से सुनने में गलतफहमी हो गई...

    * सावधान इंडिया और क्राइम पेट्रोल ने हालत यह कर दी है कि कोई बंदा घर में एक घंटा अधिक सो ले तो लोग उसे लाश समझने लगते हैं।

    * पिता- अबे नालायक, गाड़ी आहिस्ता चला...
    बेटा- डैडी, अभी कार स्टार्ट भी नहीं की है...
    पिता- फालतू बहस करता है, स्टार्ट कर फिर आहिस्ता चला...

    * कुछ बेटों को बाप से अमूमन फोन पर यह सुनने मिलता है- कैसे हो? तबियत ठीक है? लो मम्मी से बात करो।
    अगर जिंदगी फिल्म होती तो पिता का काम बस इन डायलॉग से चल जाता। (  rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 24-Mar-2018
  • आखिरकार सरोज पांडेय राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो गईं। उनका चुनाव जीतना तय था, क्योंकि संख्याबल भाजपा के पास था। लेकिन जिस तरह चुनाव को लेकर खींचतान चल रही थी, उससे जीत के अंतर को लेकर उत्सुकता थी। खैर, सरोज को उम्मीद से अधिक वोट मिलने से भाजपा में जश्न का माहौल रहा। इन सबके बीच संसदीय सचिव लाभचंद बाफना की सक्रियता चर्चा में रही। पैर की चोट की वजह से सरोज विधानसभा परिसर में व्हीलचेयर पर थीं। सुरक्षाकर्मियों के अलावा व्हीलचेयर को धक्का देने वालों में बाफना भी थे। सुनते हैं कि सरोज पाण्डेय के लोकसभा चुनाव में बाफना ने उन्हें 'धक्काÓ दे दिया था और वे प्रचार के अंतिम क्षणों में गायब रहे। हाल यह हुआ कि सरोज साजा से पिछड़ गई, जहां ठीक पहले के विधानसभा चुनाव में बाफना को 10 हजार से अधिक मतों से जीत मिली थी। इसके बाद नगरीय निकाय और फिर पंचायत चुनाव में भी साजा में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। चंूकि विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बाकी हैं और अब परीक्षा की बारी बाफना की है, पहले उन्हें टिकट के लिए जद्दोजहद करनी होगी, इसमें सरोज की राय अहम होगी। ऐसे में बाफना का सरोज के आगे-पीछे होना स्वाभाविक था और वे उन्हें खुश करने के लिए कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे। अब इससे सरोज और पार्टी कितनी खुश होते हैं, और पिछली नाराजगी से कितना उबरते हैं, यह देखना है। फिलहाल साजा में बाकी सबकी हार के चुनावी नतीजों के अलावा उस आरटीओ अफसर का भी वीडियो भी तैयार है जिसमें वह खुलासे से बता रहा है कि लाभचंद बाफना के भाई ने उसकी कैसी ठुकाई की थी, कपड़े कैसे फाड़ दिए थे, और पुलिस थाने में बैठे रहने के बावजूद उसकी रिपोर्ट कैसे नहीं लिखी गई थी।

    सुरक्षा कर्मचारी, और फेटिश
    मनोविज्ञान में लोगों की मानसिक बीमारियों का जिक्र तो रहता ही है, उनकी पसंद और नापसंद से जुड़ी हुई सोच का भी बहुत जिक्र रहता है।  इनमें से एक पसंद होती है फेटिश। कुछ लोगों को जूते छूना पसंद होता है, कुछ लोगों को महिलाओं के कपड़े छूने की लत होती है, और कुछ लोगों को किसी के कमरे या बाथरूम में तांकझांक की। कुछ लोग ऐसे भी रहते हैं जो सूखते हुए कपड़ों में से कुछ खास किस्म के कपड़े चुराकर इक_ा करने की लत रखते हैं। महिलाओं के कपड़ों के शौकीन ऐसे फेटिश लोगों में से बहुत से कपड़े सिलने वाले बन जाते हैं, या फिर महिलाओं के भीतरी कपड़े बेचने वाली दूकानों पर कम तनख्वाह पर भी  काम करने लगते हैं। महिलाओं के पैर छूने के लिए बावले ऐसे फेटिश लोग चप्पल-जूतों की दूकानों पर काम करते हैं, और छूने का ऐसा मौका मिलने पर उन्हें तसल्ली मिलती है। 
    छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में जाने पर गेट पर तैनात पुलिस कर्मचारी फ्रिस्किंग करते हैं, यानी बदन को टटोलकर देखते हैं कि भीतर कुछ छुपा हुआ तो नहीं है। ऐसे कई कर्मचारी लंबे समय से इसी जगह पर तैनात रहते हैं, और यह एक काम वे खासी दिलचस्पी से करते हैं। इस जगह का और तो कोई बड़ा आकर्षण रहता नहीं है, लेकिन हो सकता है कि उन्हें ऐसी जांच करने से एक अलग तसल्ली मिलती हो। 
    मंत्रालय से परे एयरपोर्ट जैसी जगह भी रहती है जहां बारीकी से ऐसी तलाशी ली जाती है, और कपड़ों के ऊपर से बदन टटोला जाता है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को अपने कर्मचारियों की मनोवैज्ञानिक जांच भी करवानी चाहिए कि वे किसी फेटिश के शिकार तो नहीं हैं।

    * एक गांव में एक औरत दूसरी से कह रही थी- हमरो लेटरिन आ रहिस हे, रोगहा सरपंच ह खा दिस...

    * फेसबुक कह रहा है यहां कुछ लिखें।
    सोच रहा हूँ ये लिखूं...
    तेरा बाप चोर है

    * डाटा चुराकर भी नाम
    कर सकते हो! वरना 
    टाटा, बाटा बेचारों ने सामान बेच-बेचकर नाम कमाने में जिंदगी बर्बाद कर दी!

    ( rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 22-Mar-2018
  • सरकार आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रही है। आदिवासी आरक्षण 32 फीसदी करने के बाद प्रदेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण 58 फीसदी हो गया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी आरक्षण की सीमा रखी है। लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने तमिलनाडू और कर्नाटक का उदाहरण देकर आरक्षण की सीमा बढ़ाने उचित ठहराया है। खैर, सुप्रीम कोर्ट में महंगे वकीलों की सेवाएं लेकर सरकार अपने फैसले को सही ठहराने में जुटी हुई है। पिछले 4 साल से यह मामला कोर्ट में है। लेकिन अब इसमें एक और पेंच आ गया है। सरकार की पैरवी कर रहे एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने आगे पैरवी करने से मना कर दिया है। 
    सुनते हैं कि अधिवक्ता की करीब 30 लाख के आसपास फीस बकाया है और यह राशि संबंधित विभाग यानी आदिम जाति कल्याण विभाग को देनी है। लेकिन अधिवक्ता की फीस का मामला फाइलों में ही फंसा है। कोर्ट में अगली सुनवाई 16 अप्रैल को है। यह विषय  सरकार की प्रतिष्ठा का सवाल है। चुनावी साल में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के राजनीतिक असर भी हो सकते हैं। चुनावी साल है इसलिए अधिवक्ता भी बकाया पैसे को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इस मामले को कोर्ट में अपना पक्ष कितनी मजबूती से रख पाती है। 
    नाम क्या है?
    मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की पोती, और सांसद अभिषेक सिंह की बेटी के दिल्ली के एम्स में भर्ती होने की खबर सुबह से फैली तो दोपहर तक सारे लोग पूछताछ करने लगे। खबरों में बच्ची का नाम लिखने के लिए जब पूछताछ की गई तो पता लगा कि अभी तक उसका कोई नाम रखा नहीं जा सका है। जाहिर है कि आजकल नाम रखना एक खासी बड़ी चुनौती का काम है। अब दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि हर बच्चे के लिए यह माना जाता है कि किसी दिन उसे किसी दूसरी भाषा और संस्कृति वाले देश में जाकर रहना पड़े, पढऩा पड़े, और काम करना पड़े। ऐसे में नाम के मायने भी वैसे किसी देश में कोई गलत मतलब न रखें, नाम के हिज्जे भी कोई गलत मायने न सुझाएं। इसके साथ-साथ अब यह भी जरूरी हो चला है कि नाम का उच्चारण और उसके हिज्जे भी जटिल न हों। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि घर का नाम और बाहर का नाम एक होना चाहिए, और अलग-अलग नहीं होना चाहिए, क्योंकि ऐसे में घर के नाम से कुछ लोगों को बाहर शर्मिंदगी भी होने लगती है। नामों के सिलसिले में कुछ लोग मजाक में याद करते हैं कि पंजाब में डेढ़-दो दर्जन घरेलू नामों में 90 फीसदी लड़के-लड़कियां निपट जाते हैं। हर घर में इन्हीं नामों के बच्चे मिलते हैं। अब जैसे छत्तीसगढ़ में ही एक ही कारोबार में लगे हुए दो करीबी रिश्तेदार ऐसे हैं जिनका दोनों का ही नाम पप्पू है। ऐसे में लोग एक को पप्पू नांदगांव, और दूसरे को पप्पू खरोरा कहकर काम चलाते हैं। 
    पहले नाम रखना अधिक आसान होता था क्योंकि घर के मुखिया जो नाम तय कर देते थे, उससे बाकी लोग, बच्चों के मां-बाप भी कोई असहमति नहीं रखते थे। करण जौहर के शो में एक सवाल के जवाब में रणधीर कपूर ने बताया था कि उनका घरेलू नाम डब्बू उनके दादा पृथ्वीराज कपूर ने रखा था। यह नाम इसलिए रख दिया था कि जब वे पैदा हुए तो बहुत ही गोरे थे। और घर पर उस समय एकदम सफेद एक कुत्ता था जिसका नाम डब्बू था। इसे देखकर पृथ्वीराज कपूर ने कहा कि यह भी एकदम गोरा हुआ है, इसलिए इसका नाम भी डब्बू रहेगा। और संयुक्त परिवारों में कोई विरोध तो करते नहीं थे, इसलिए वही नाम आजतक चल रहा है। अभी बहुत से परिवारों में बच्चों का नाम रखना खासी बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।


    * जब रविशंकर प्रसाद जी फेसबुक डेटा चोरी मामले को लेकर मार्क जकरबर्ग को भारत तलब कर लेने की चेतावनी दे रहे थे तब ललित मोदी, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी और विजय माल्या जैसे भगोड़े, मंत्री जी के इस बयान को सुनकर ठहाके मारकर हंस रहे होंगे।

    * भारत को एक और सेनानी मिला। कनिष्क गोल्ड का मालिक भूपेंद्र जैन बैंक का एक हजार करोड़ लेकर भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुआ...

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 30-Jan-2018
  • सरकार के प्रभावशाली मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ विधायक खुद की टिकट पक्की मानकर विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। मतदाताओं के बीच सकारात्मक संदेश जाए, इसके लिए वे धार्मिक और सांस्कृतिक व सामाजिक कार्य के लिए भरपूर समय दे रहे हैं। मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत, अजय चंद्राकर के बाद अब धरसींवा के विधायक देवजी पटेल के इलाके में रामकथा का आयोजन हो रहा है। धार्मिक आयोजन के बीच गरीब परिवार के तीन सौ जोड़े परिणय सूत्र में बंधेंगे। देवजी पटेल का कहना है कि धार्मिक आयोजन तो होना ही चाहिए, लेकिन उसके साथ एक सामाजिक पहलू भी जुड़ा होना जरूरी है। इसलिए वे अपने विधानसभा क्षेत्र के सभी धर्मों की कन्याओं का सामूहिक विवाह करवा रहे हैं, और इसमें अब तक ढाई सौ के करीब नाम दर्ज हो चुके हैं। हिंदू कन्याओं के अलावा मुस्लिम और ईसाई कन्याओं का विवाह भी उन्हीं के धार्मिक रीति-रिवाजों के मुताबिक होगा, और आयोजकों की तरफ से सभी दुल्हनों को एक बराबर सामान तोहफे में दिए जाएंगे।
    लेकिन दूसरी तरफ सुनते हैं कि धार्मिक आयोजनों से परे सरकार के एक मंत्री अपने करीबी लोगों को सेक्स-टूरिज्म के लिए कुख्यात बैंकाक-पटाया भेज रहे हैं। कुल मिलाकर 60-70 लोगों को वहां भेजने की तैयारी है। पहली ट्रिप एक-दो दिन में रवाना होगी। मंत्री समर्थकों को यकीन है कि तन-मन शांत होने से ही एकाग्रता आएगी और चुनाव में पूरा ध्यान लगा पाएंगे। 

    निर्माण-विभागों के अफसरों की ताकत
    नए जिले बनने के बाद निर्माण विभाग के अफसरों की पसंद भी बदल गई है।  निर्माण अफसरों की पहली पसंद कोरबा जिला है। इसके बाद बलौदाबाजार-भाटापारा जिले को मलाईदार माना जाता है। इन दोनों जिलों में पोस्टिंग के लिए न सिर्फ प्रदेश भाजपा, बल्कि भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की सिफारिशें आ रही हैं। सुनते हैं कि कुछ समय पहले मंत्री ने स्थानीय लोगों की सिफारिश पर एक एसडीओ की पोस्टिंग के लिए फाइल चलाई थी कि कुछ घंटे के भीतर एक वजनदार केंद्रीय मंत्री का फोन एक दूसरे अफसर के लिए आ गया। हड़बड़ाए विभागीय मंत्री ने आनन-फानन में नोट शीट बदली और केन्द्रीय मंत्री की सिफारिश के मुताबिक काम किया। पूर्व मंत्री रामचंद्र सिंहदेव ने तो एक बार विधानसभा में यहां तक कहा था कि एक सब इंजीनियर अपने पक्ष में आधा दर्जन विधायकों को खड़ा कर सकता है। अविभाजित मध्यप्रदेश में तो रायगढ़ के रहवासी एक सिंचाई अफसर के तबादले के लिए 57 विधायकों ने मुख्यमंत्री से सिफारिश की थी। इतने विधायकों की सिफारिशी पत्र देखकर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हड़बड़ा गए थे और उन्होंने अफसर से मिलने की इच्छा जताई और उनसे मिलने के बाद ही तबादला किया। सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो, निर्माण अफसर समय-समय पर अपनी ताकत दिखाते रहे हैं। छत्तीसगढ़ बनने के बाद एक निर्माण विभाग के अफसर ने अपने लिए इतने मंत्रियों से मुख्यमंत्री को सिफारिश करवाई थी कि थककर सीएम ने कहा- इसकी पोस्टिंग के लिए मेरे पास आने के बजाय कैबिनेट में प्रस्ताव ज्यादा आसानी से पास हो सकता है।
    वैसे जिन लोगों को पता न हो, उन्हें यह जानकर कुछ हैरानी होगी कि केरल में तमाम आईएएस और आईपीएस अफसरों की पोस्टिंग कैबिनेट से होती है।
    सरकार की छापामार एजेंसियां जिन अफसरों को अरबपति साबित करती हैं, वे भी इन अफसरों को दुबारा टकसाल जैसी कुर्सियों पर पहुंचने से नहीं रोक पातीं। हर किस्म के बदनाम, और बेईमान साबित होते अफसर आखिरी सजा पाने तक सरकार में बैठकर बड़े-बड़े काम करते रहते हैं, और पकड़ाने के बाद की कमाई का इस्तेमाल छूटने के लिए करते हैं।

    सौ गुनाह माफ
    प्रदेश के एक ऐसे चर्चित पुलिस अफसर अपने ही गृह जिले के अपने ही गृहनगर में तैनात हैं, और पुलिस में आने के पहले के वक्त के बहुत से बहुत से मामले उनके खिलाफ दर्ज हैं। कुछ जुर्म तो ऐसे हैं जिनमें उन्होंने रिपोर्ट लिखाने वालों से समझौता करके मामला रफा-दफा करवाया है। अवैध कब्जा करके सरकारी जमीन पर मंदिर भी बनवाया है, और भी दूसरे अवैध कब्जे हैं। लेकिन वर्दी वाले सारे विभागों में यह कहावत चलती है कि ऊपरवाला मेहरबान तो नीचेवाला पहलवान, इसलिए इस अफसर के सौ गुनाह माफ चल रहे हैं। अब मातहत परेशान हों, तो होते रहें, कुछ मातहतों को महंगे मोबाइल फोन का इंतजाम करना पड़ रहा है, ताकि कुछ दूसरी मातहतों को अफसर वे हैंडसेट तोहफे में दे सकें। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 29-Jan-2018
  • धमतरी के कुख्यात आरा मिल घोटाले के सभी आरोपी अफसर एक-एक करके छूट गए। सबसे पहले एक आईएफएस अफसर श्रीनिवास राव इस मामले से बरी किए गए और उसके बाद अलग-अलग बड़े अफसरों के दस्तखत से एक-एक करके बाकी अफसर भी छूटते गए। आखिर में जाकर एस.एस.डी. बडग़ैया और राकेश चतुर्वेदी, ये दो आईएफएस फंसे रहे क्योंकि उस वक्त के एसीएस एन. बैजेन्द्र कुमार इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं थे कि इन्हें बख्शा जाए। जब कभी इन पर से मामले खत्म करने की बात होती थी, बैजेन्द्र कुमार इसे गंभीर अपराध मानते हुए अड़े रहते थे। अब उनके जाने के बाद इन दोनों को उम्मीद बंधी थी कि दिल्ली से एक हमदर्द यूपीएससी को साथ लेकर ये भी बच जाएंगे। अब इनमें से राकेश चतुर्वेदी को तो बरी किया गया है और लंबे नुकसान के बाद वे मुकदमे से बचे हैं। उनके कई बैच जूनियर लोग उनके ऊपर पहुंच गए, और सबके मददगार रहने के लिए विख्यात राकेश चतुर्वेदी प्रमोशन से दूर रखे गए। अब बडग़ैया की बात है तो वे भाजपा के एक बहुत बड़े नेता की नाक के बाल हैं। उन पर कई तरह के छापे पड़ चुके हैं, अनुपातहीन संपत्ति मिल चुकी है, लेकिन वे किसी कड़ी कार्रवाई से बचे हुए हैं। अब ऐसे में उनकी फाईल पर अभी यह फैसला नहीं हुआ है कि उनको भी बरी किया जाए, या अदालत के कटघरे में भेजा जाए।

    रुपये और डॉलर
    गणतंत्र दिवस की शाम राजभवन में काफी हलचल रही। राज्यपाल की तरफ से आयोजित चाय पार्टी में कई पूर्व और वर्तमान नौकरशाहों के अलावा अलग-अलग क्षेत्रों के विशिष्टजन आपसी चर्चा में मशगूल थे। मुख्यमंत्री भी कुछ अफसरों के साथ अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा का अनुभव साझा कर रहे थे। वे वहां के लोगों की दिनचर्या बता रहे थे कि कैसे शाम 7-8 बजे के बाद सड़कें वीरान हो जाती है। लोग अपने घरों में बंद हो जाते हैं। रात को जल्दी सोना और सुबह जल्दी उठना ऑस्ट्रेलियाई लोगों की आदत है। वे बता रहे थे कि खान मजदूरों की हालत वहां काफी बेहतर है। 15-20 पहिए वाली ट्रेलर चालक हर महीने एक से डेढ़ लाख कमा लेते हैं। तभी सिंचाई सचिव सोनमणि बोरा ने कहा कि सर, इतना पैसा तो यहां के ट्रेलर चालक भी कमा लेते हैं। यहां भी बड़ी गाडिय़ों के चालकों का अच्छा वेतन है। इस पर शिवराज सिंह ने उन्हें टोका और कहा कि साहब, रुपये की नहीं, डॉलर की बात कर रहे हैं। 


    रेरा की बाकी कुर्सियां
    रेरा में जल्द ही दो सदस्यों की नियुक्ति होगी। सदस्य बनने के लिए कई रिटायर्ड आईएएस-आईएफएस अफसर प्रयासरत हैं। उन अफसरों को दोबारा आवेदन करने की जरूरत नहीं है, जिन्होंने पहले आवेदन किया था। इनमें दिनेश श्रीवास्तव, बीएल तिवारी, मनोहर पाण्डेय सहित कई शामिल हैं। सदस्य के लिए 31 जनवरी तक आवेदन बुलाए गए हैं। सुनते हैं कि चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में गठित कमेटी नए नामों पर ही विचार करेगी। यानी प्रचलित नामों से अलग हटकर किसी नए को मौका मिल सकता है।

    एक साथ पौने दो लाख नाराज
    मध्यप्रदेश में शिक्षाकर्मियों के संविलियन के फैसले से यहां के पौने 2 लाख शिक्षाकर्मी विचलित हैं। वे मानते हैं कि दोनों राज्यों में के नियम एक जैसे ही हैं, तो यहां भी सरकार को संविलियन करना पड़ेगा। वैसे भी एक-एक शिक्षाकर्मी 10-20 बच्चों और उनके पालकों से सीधे जुड़े रहते हैं। ऐसे में चुनावी साल में 50 लाख मतदाताओं तक पहुंच वाले शिक्षाकर्मियों को सरकार अनदेखा नहीं कर सकती। शिक्षाकर्मियों की ये बेचैनी मानो काफी नहीं थी कि भाजपा के  कर्मकार मंडल के अध्यक्ष, राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त भाजपा नेता मोहन एंटी ने एक टीवी चैनल के डिबेट में उन्हें मजदूर का दर्जा दे दिया। कांग्रेस तो इस तरह के मुद्दे को लपकने के लिए एक टांग पर खड़ी रहती है, उन्हें सरकार के खिलाफ बैठे-बिठाए एक और मुद्दा मिल गया। दिल्ली में पी चिदम्बरम ने प्रधानमंत्री के बयान पर यह कहकर कटाक्ष किया कि जब पकौड़ा बेचना रोजगार है तो भीख मांगना भी रोजगार माना जाना चाहिए। रोजगार और मजदूरी को लेकर बहस चल रही है। लेकिन मजदूरों की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टियां चुप हैं कि मजदूरी करना सम्मान है या अपमान। अब देखना है कि भाजपा समर्थित मजदूर संगठन मजदूरी करने को क्या मानती है, कुल मिलाकर सरकार के लिए फजीहत बढ़ती जा रही है, और एकमुश्त पौने दो लाख लोगों को नाराज करने का काम कम से कम भाजपा नेताओं को तो नहीं करना चाहिए। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 28-Jan-2018
  • देश भर में फिल्म पद्मावत के खिलाफ चल रहा विरोध अब साबुन के झाग की तरह एकाएक ठंडा पड़ गया दिख रहा है। ऐसा लगता है कि फिल्म रिलीज होने के पहले उसका प्रचार करने के मकसद से कई तरह से विरोध किया जाता है, और उसी तरह इस बार भी किया गया। लेकिन इस दौरान राजस्थान और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद उसके खिलाफ फिर अदालत तक दौड़ लगाई थी, और इसके लिए उन्हें अदालत से फटकार भी पड़ी। हरियाणा सहित कुछ और भाजपा-राज्यों ने अपने सिनेमाघरों पर दबाव डालकर, और हिंसा की मानो इजाजत देकर फिल्म को रूकवाया। ऐसे में छत्तीसगढ़ शायद अकेला भाजपा राज्य रहा जिसने किसी भी दूसरी फिल्म की तरह इस फिल्म को भी सेंसर के फैसले के साथ जारी होने दिया, और पुलिस हिफाजत मुहैया कराई। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गणतंत्र दिवस का झंडा बस्तर के जगदलपुर में फहराया और वहां कार्यक्रम में इस फिल्म के गीत-संगीत वाला घूमर डांस भी हुआ। कल रायपुर में आनंद समाज लाइबे्ररी के नए कलेवर के लोकार्पण के मौके पर उन्होंने कहा किताबें ज्ञान बढ़ाती हैं, और गलतफहमियों को दूर करती हैं। लोगों को पद्मावत भी पढ़ लेना चाहिए, तो वास्तविकता पता लग जाएगी। एक राजपूत मुख्यमंत्री का ऐसे वक्त पर सार्वजनिक रूप से ऐसा कहना, और ऐसा करना दोनों ही मायने रखते हैं।

    वोटर-विश्लेषण, और चुनावी रणनीति
    बिलासपुर के सैयद मकबूल को वहां के सरकारी जिला अस्पताल में  जीवनदीप समिति का सदस्य बनाया गया है। वहां के मंत्री अमर अग्रवाल की सिफारिश पर स्वास्थ्य मंत्री ने यह मनोनयन किया है। अब मकबूल के बारे में बिलासपुर के बाहर के लोग कुछ कम जानते हैं, लेकिन प्रदेश भाजपा में बहुत से लोग उनके हुनर से वाकिफ हैं। वे छत्तीसगढ़ के मतदाताओं की जानकारी को बूथ स्तर तक रखते हैं, और जाति, धर्म, उम्र, जैसी बातों के साथ उन्हें जोड़कर किसी भी विधानसभा क्षेत्र और उसके भीतर बूथ स्तर तक का चुनावी विश्लेषण करने में माहिर हैं। प्रदेश के कई बड़े नेताओं के लिए वे चुनाव विश्लेषण और चुनाव रणनीति का काम करते हैं, लेकिन गुजरात, बिहार, और पंजाब में जिस तरह भाजपा और कांगे्रस का काम करके प्रशांत किशोर ने वाहवाही पाई थी, उस किस्म की रोशनी से मकबूल दूर रहते हैं। वे कुछ विधानसभा सीटों पर कुछ बड़े नेताओं के लिए काम करना पहले से मंजूर कर लेते हैं, और फिर वहां पर उनके मुकाबले किसी और का काम नहीं लेते। लेकिन किसी एक पार्टी या किसी नेता से वे बंधे हुए भी नहीं रहते, और उनका कम्यूटर-विश्लेषण उम्मीदवारों में उम्मीद जगा देता है, लेकिन जैसा कि दुनिया की हर अच्छी चीज के साथ होता है मकबूल का काम भी सस्ता नहीं आता। वे जाति, धर्म, और पिछले चुनावी नतीजों का विश्लेषण करके नए उम्मीदवारों के लिए माकूल सीट भी निकाल देते हैं।

    बिलासपुर से डॉक्टर बुलाकर नसबंदी?
    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सड़कों पर बेघर कुत्ते जिस रफ्तार से लोगों को काट रहे हैं, और जिस रफ्तार से बच्चों की मौत हो रही है, और जिस तरह सरकारी अस्पतालों में ऐसी नौबत में जरूरी इंजेक्शन नहीं हैं, इन सबको देखते हुए लोगों के बीच भारी नाराजगी भी है, और भारी दुविधा भी है कि क्या किया जाए? कई ऐसे लोग हैं जो जानवरों को मारने के खिलाफ हैं, चाहे उनकी सोच मेनका गांधी की बढ़ाई हुई पशुप्रेम की सोच हो, या फिर किसी धार्मिक भावना की वजह से वे ऐसा सोचते हों, वे लोग जानवरों को, कुत्तों को मारने के खिलाफ हैं। दूसरी तरफ कुछ लोग हैं जो कुत्तों की नसबंदी करना चाहते हैं ताकि उनकी आबादी बढऩे से रूके, और सड़कों पर उनका आतंक घटे। बड़ी-बड़ी सोच की वकालत करने वाले बड़े-बड़े लोग आमतौर पर कारों में चलते हैं, इसलिए उन्हें सड़कों पर कुत्तों से डर लगता नहीं है। लेकिन जो लोग पैदल या दुपहियों पर चलते हैं, जिनके बच्चे खुले में घूमते या खेलते हैं, वे लोग जानते हैं कि कुत्तों के दौड़ाने और काटने की दहशत क्या होती है। 
    अब कुत्तों की नसबंदी करवाना म्युनिसिपल के जिम्मे आता है जो कि शहर को स्मार्ट बनाने में लगी है, और स्मार्ट सिटी के पैमानों में चूंकि कुत्तों को मारने या उनकी नसबंदी करने पर कोई नंबर नहीं हैं, इसलिए कुत्ते अभी म्युनिसिपल की प्राथमिकता से परे हैं। कुछ लोग जो मौत के मजाक में भरोसा रखते हैं, उनका कहना है कि इन कुत्तों की नसबंदी के लिए बिलासपुर से उन्हीं डॉक्टरों को बुलाया जाए जिन्होंने वहां महिलाओं की नसबंदी करके उन्हें मारा था। या तो उनकी नसबंदी कामयाब होगी, या मारने की उनकी क्षमता। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 27-Jan-2018
  • छत्तीसगढ़ के 20 बड़े कांगे्रस नेताओं की दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात सामूहिक चर्चा तो रही ही, इसके अलावा राहुल गांधी ने इन सभी से एक-एक करके अलग-अलग भी बात की। लेकिन इस मुलाकात के बाद जो गु्रप फोटो बाहर आया वह थोड़ा चौंकाने वाला था। इन 20 में कुल दो महिलाएं थीं, भाजपा से कांगे्रस में आने वाली करूणा शुक्ला, और राज्यसभा सदस्य छाया वर्मा। इन दोनों को पीछे कतार में खड़ा रखा गया, और सामने दर्जन भर नेता बैठे हुए थे। करूणा शुक्ला कांगे्रस में आने से पहले भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थीं, भाजपा राष्ट्रीय महिला मोर्चा की अध्यक्ष थीं, और दो बार विधायक, एक बार संसद सदस्य भी थीं। उनके मुकाबले सामने कतार में बैठे अमितेष शुक्ला कुल दो बार विधायक रहे, एक बार मंत्री रहे, और मंत्री रहने के बाद चुनाव हारे थे। उनको सामने बिठाकर करूणा शुक्ला को उनके पीछे खड़ा करना कांगे्रस का दिमागी दीवालियापन था क्योंकि इसके बाद अब भाजपा से किसी बड़े नेता के कांगे्रस जाने पर उसके साथ कैसा सुलूक होगा यह जाहिर हो गया है। अमितेष शुक्ला का आज राजनीति में वजन अपने कुनबे की विरासत के दावे से परे कुछ नहीं बचा है, और कांगे्रस के पास छत्तीसगढ़ में भाजपा से आज तक पहुंचीं सबसे बड़ी नेता करूणा शुक्ला ही हैं। इसके अलावा वे भाजपा के इतिहास के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी भी हैं। इन सबसे परे किसी भी तरह के शिष्टाचार में महिलाओं को सम्मान की जगह दी जानी चाहिए थी, खासकर इंदिरा और सोनिया की पार्टी में। खैर, इस तरह की लापरवाह-नासमझी कांगे्रस में आम बात है।  

    हम साथ-साथ हैं...
    राज्य बनने के बाद अब तक सात मुख्य सचिव हुए हैं। इनमें से चार रिटायर होने के बाद अब भी सरकार का हिस्सा हैं। वे अपनी प्रशासनिक दक्षता और काबिलियत के बूते पर प्रभावशाली बने हुए हैं। दूसरे मुख्य सचिव एसके मिश्रा ने राज्य बनने के बाद वित्त विभाग के  प्रभार पर रहते राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में काफी काम किए। यही वजह है कि सरकार ने उन्हें अब तक रिटायर नहीं होने दिया और एक के बाद एक जिम्मेदारी मिलती गई। इससे परे शिवराज सिंह को मुख्य सचिव के पद से हटने के बाद पहले निर्वाचन आयुक्त और फिर सरकार के सलाहकार की जिम्मेदारी दी गई। वे पावर कंपनी के चेयरमैन का दायित्व भी संभाल रहे हैं। 
    शिवराज सिंह को नियमों का गहरा जानकार माना जाता है और वे कई मौकों पर सरकार को मुश्किलों से बाहर निकाल चुके हैं। जब डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में दर्जनभर से अधिक विधायक लाभ के पद के दायरे में आ गए थे तब कानून बनाकर उन्होंने सरकार को मुश्किलों से बाहर निकाला। बाद में मप्र और अन्य राज्यों ने भी छत्तीसगढ़ का अनुशरण किया। वे सीएम के भरोसेमंद माने जाते हैं और उन्हें सरकारी कामकाज की पेचिदगियों को सुलझाने में महारत हासिल है। शिवराज सिंह से परे सुनिल कुमार ने पहले तो मुख्य सचिव पद से हटने के बाद कोई जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया था। लेकिन बाद में राज्य योजना आयोग की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हो गए। सुनिल कुमार की प्रशासन में गहरी पकड़ रही है और प्रदेश के योजना आयोग को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। सुनिल कुमार के उत्तराधिकारी विवेक ढांड को कुछ दिन पहले ही मुख्य सचिव की कुर्सी छोडऩे के बाद रेरा चेयरमैन की जिम्मेदारी दी गई। वे इसी राज्य के रहने वाले पहले मुख्य सचिव थे।  धनाढ्य परिवार से आए ढांड ने अपने कार्यकाल में प्रशासन की धमक गांवों तक पहुंचाने में अहम योगदान दिया। ग्राम सुराज हो या श्रम कल्याण की योजनाएं, उन्होंने अपने सेवा काल में गांव-गरीब और किसानों की खूब चिंता की। खुद मुख्यमंत्री ने कैबिनेट में उनके  कामकाज की सराहना की। सिर्फ दो ही मुख्य सचिव आरपी बगई और पी जॉय उम्मेन ही बाद में किसी पद पर नहीं रहे। ऐसा नहीं है कि उन्हें कोई पद ऑफर नहीं किया गया था। बगई को बारदाने घोटाले में फंसे होने के बावजूद पीएससी चेयरमैन का पद ऑफर किया गया था, लेकिन वे बड़ा पद चाहते थे। जबकि जॉय उम्मेन मुख्य सचिव पद से हटाए जाने के बाद इतने नाराज थे कि उन्होंने कोई दूसरी जिम्मेदारी संभालने से मना कर दिया, उन्हें एक से अधिक कई तरह के पद का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन वे यहां रहने को तैयार हुए ही नहीं। बाद में वे अपने गृह राज्य केरल में वित्त निगम अध्यक्ष बनाए गए।  
    अब पुराने मंत्रालय भवन, डीकेएस के सामने छोटी-बड़ी कुछ इमारतों के एक तिकोने जंगल में इतने रिटायर्ड सीएस-एससीएस अलग-अलग कुर्सियों पर बैठ रहे हैं कि वह जगह बापू की कुटिया हो गई है। इस तिकोने में पहले जचकी अस्पताल था और वहां पर रात-दिन बच्चे पैदा होते थे, अब वहां पर नई-नई सोच, और योजना पैदा हो रही हैं। इस जगह के एक पुराने जानकार ने कहा कि डीके अस्पताल के जचकी वार्ड के समय से यहां एक पुराना बरगद है, और वटवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त होने की पुरानी कहानी है इसलिए ज्ञानियों को यहां बिठाया गया है। ( rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 24-Jan-2018
  • छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सड़क किनारे से ठेले-खोमचे, और फेरीवाले बेदखल किए जा रहे हैं। अब इनमें सैकड़ों ठेले पकौड़े बनाने वालों के हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभी एक चैनल पर इंटरव्यू में कहा कि सड़क किनारे पकौड़े बेचना भी रोजगार है। और खुद मोदी बताते हैं कि उनका बचपन स्टेशन के बाहर चाय बेचते हुए गुजरा है। ऐसे में भाजपा के राज वाले छत्तीसगढ़ के अफसरों को यह सोचना चाहिए कि चाय-पकौड़े के ठेलों को इस तरह हटाकर लोगों को बेरोजगार करना राष्ट्रवाद के खिलाफ गिना जाएगा या नहीं? 

    सोशल मीडिया की वजह से लोगों में हास्य और व्यंग्य दोनों की समझ और इस्तेमाल, दोनों ही बढ़ चले हैं। जिनके हाथ कुछ लिखने या लिखा हुआ आगे बढ़ाने की ताकत नहीं थी, वे भी अब सोशल मीडिया और वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों के मार्फत चटखारे लेकर मजेदार बातों को आगे बढ़ाते चलते हैं। पिछले दो दिनों से यह पोस्टर फैल रहा है जिसे कि कांगे्रस और भाजपा का पहला संयुक्त उपक्रम बताया जा रहा है। बेंगलुरू के एक चाय वाले ने अपनी दूकान का नाम कुछ ऐसा रख दिया है कि वह रातोंरात राहुल गांधी और मोदी, दोनों का भागीदार बन गया दिख रहा है। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 22-Jan-2018
  • मुख्यमंत्री और उनकी टीम इसी हफ्ते लंबे विदेश प्रवास से लौट रही है, और सबसे पहले जिन तबादलों की लिस्ट बननी है उनमें कुछ जिलों के कलेक्टर और कुछ जिलों के जिला पंचायत सीईओ बदलने हैं। जिनको बेहतर जगहों पर जाने की उम्मीद है, वे बेसब्री से राह देख रहे हैं, और जिन्हें ठीक-ठाक जगह से हटने का खतरा दिख रहा है, वे बेचैनी से राह तक रहे हैं। नतीजा यह है कि एक दर्जन से अधिक लोग ऐसा मान रहे हैं कि उन्हें हटना है, और ऐसे में कुछ लोग जो अधिक चतुर हैं, या कम से कम ऐसा समझते हैं कि वे अधिक चतुर हैं, वे अपने दफ्तर की फाईलों की फोटोकॉपी करवाने में जुट गए हैं। इसकी दो वजहें हैं, एक तो यह कि फाईलों में उन्होंने कुछ नाजायज किया हुआ है, और उन्हें आशंका है कि बाद में इन्हें लेकर जवाब देने की जरूरत पड़ सकती है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें यह आशंका है कि उनके जाने के बाद फाईलों में कुछ छेडख़ानी हो सकती है, इसलिए वे अपने रहते-रहते ऐसी नाजुक फाईलों की कॉपी करवा ले रहे हैं। कम से कम एक जिले में एक ऐसे कलेक्टर थे जिन्होंने हटने के बाद भी पिछली तारीखों पर बहुत से ऑर्डर किए थे, और ऐसा करने के लिए, या कि ऐसे गलत काम से बचने के लिए भी फाईलों की फोटोकॉपी बहुत काम आएगी।
    कलेक्टर बनने की बारी
    गणतंत्र दिवस के बाद एक छोटा सा प्रशासनिक फेरबदल हो सकता है। दो-तीन जिलों के कलेक्टर बदले जा सकते हैं। गरियाबंद कलेक्टर सुश्री श्रुति सिंह तीन साल की प्रतिनियुक्ति पर अपने गृह राज्य उत्तरप्रदेश जा रही हैं। माना जा रहा है कि फेरबदल में राज्य प्रशासनिक सेवा से अखिल भारतीय सेवा में आए अफसरों को कलेक्टरी का मौका मिल सकता है। सीधी भर्ती के वर्ष 2010 बैच तक के अफसर कलेक्टर बन चुके हैं। जबकि राज्य प्रशासनिक सेवा से आए वर्ष 2007 के अफसर जनक पाठक, शारदा वर्मा और वर्ष 2008 बैच के चंद्रकांत उइके सहित कई अफसर हैं जो कि जिले में पदस्थापना की राह देख रहे हैं। 
    सुनते हैं कि सरकार भी चुनावी साल में सीधी भर्ती के बजाए राज्य सेवा से आए अफसरों को ज्यादा महत्व दे सकती है। क्योंकि राज्य सेवा से आए अफसर चुनावी माहौल में अपेक्षाकृत ज्यादा सुविधाजनक होते हैं। ऐसे में नई लिस्ट में राज्य सेवा से आए अफसरों के नाम ज्यादा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 21-Jan-2018
  • छत्तीसगढ़ भाजपा के एक बड़े नेता पिछले दिनों एक सीडी कांड की चर्चा में आते-आते रह गए। पहले तो उन्हीं के नाम की चर्चा थी, फिर बाद में पता लगा कि फर्जी सीडी किसी और के चेहरे को जोड़कर बनाई गई है। लेकिन परेशानी का खतरा बना हुआ है इसलिए ये नेता पिछले दिनों एक ज्योतिषी के पास पहुंचे और अपनी समस्या बताई, उसका समाधान पूछा। समस्या आसान है और आम है, किसी महिला को देखकर मन विचलित होने लगता है। अब वैसे तो यह बात उतनी ही आम है जितना आम किसी आदमी का सांस लेना है। आदमी है तो महिला को देखकर मन विचलित तो होगा ही। लेकिन एक सीडी कांड में फंसते-फंसते एक बार बच जाने के बाद अब मन आशंका से भर गया है। लेकिन ज्योतिषी डॉक्टरों की तरह मरीज की गोपनीयता की किसी शपथ से बंधे तो रहते नहीं हैं, इसलिए पार्टी के ही एक दूसरे नेता तक बात पहुंच गई, और बातचीत की कुछ रिकॉर्डिंग विधानसभा चुनाव का इंतजार कर रही है। 

    छोटा बरगद, या बड़ा बोन्साई?
    जो लोग पेड़ों के बहुत बौने से रूप तैयार करते हैं, उनके बीच वटवृक्ष बड़ा लोकप्रिय होता है। बोन्साई बनाने के लिए वटवृक्ष पर शुरू से ही मेहनत की जाती है, और विशाल बरगद एक गमले में अपना पूरा रूप ले लेता है। लेकिन इन दोनों के बीच एक दिलचस्प पेड़ देखने मिला रायपुर के राहुल सिंह को। रायपुर से कुम्हारी और बेरला होकर बेमेतरा जाते हुए अहिवारा के पास कुछ अनोखा दिखता हुआ यह वटवृक्ष एक छोटे बरगद, या बड़े बोन्साई सरीखा दिख रहा है। लगता है कि किसी वक्त इसका तना छोड़ ऊपर का सब काट दिया गया होगा, लेकिन जिद्दी और जुझारू पेड़ ने तने के ऊपर फिर एक मजबूत और कामयाब शक्ल ले ली।


    दो मंत्री सीट बदलने के फेर में
    विधानसभा चुनाव में 8 माह बाकी रह गए हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ भाजपा के विधायकों को टिकट की चिंता सताने लगी है। पार्टी के आंतरिक सर्वे में यह बात सामने आई है कि ज्यादातर मंत्री और विधायकों का दोबारा जीत पाना मुश्किल है। कहा जा रहा है कि कुछ अपनी स्थिति को भांपकर सीट बदलने की कोशिश भी कर रहे हैं। इनमें सरकार के दो मंत्रियों के नाम भी लिए जा रहे हैं। सुनते हैं कि इनमें से एक मंत्री से जुड़े लोग उनकी सीट पर निगाह जमाए हुए हैं। खुद मंत्री यहां के कार्यकर्ताओं के लगातार संपर्क में है और वे कई बार दौरा भी कर चुके हैं। इसी तरह सरगुजा के एक मंत्री के लिए उनकी अपनी सीट आसान नहीं रह गई है। पंचायत चुनाव में उनके परिवार के सभी सदस्य यहां से हार गए। इसलिए वे अब दूसरी सीट से चुनाव लडऩा चाहते हैं। 
    वह एक सामान्य सीट है, लेकिन आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका में है। इसलिए यह सीट मंत्री के समर्थकों को आसान लग रही है। अब पार्टी पर निर्भर है कि वह सीट बदलने की अनुमति देती है अथवा नहीं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 20-Jan-2018
  • सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए डॉक्टर काबिल होते हैं, लेकिन मरीजों की भीड़, जांच और इलाज से लेकर दवा जारी होने तक या अस्पताल में भर्ती होने तक अस्पताल के ढांचे की क्षमता चुक चुकी होती है। ऐसे में लोगों को राह देखनी पड़ती है, कई बार कई-कई दिन तक, और लोगों का सब्र टूटने लगता है। ऐसे में अस्पताल का हाल भयानक दिखता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रदेश का सबसे बड़ा मेडिकल कॉलेज अस्पताल कुछ ऐसा ही दिखता है। वहां पर कुछ वार्डों में भीड़ किसी मेले सरीखी दिखती है, और मेला भी दुख, दर्द, और तकलीफ से भरा हुआ। इसे देखकर आज सुबह एक निराश आदमी ने कहा- यहां का हाल मौत के पहले आरएसी जैसा है, जब तक बर्थ कनफर्म नहीं होती है, ट्रेन में लोगों को बैठने को अगर सीट दी जाती है तो उसे आरएसी कहा जाता है, रिजर्वेशन अगेंस्ट कनफर्मेशन। बात कुछ अधिक निराशा भरी थी, लेकिन सरकारी अस्पताल में लंबे इंतजार के बाद बेसहारा गरीब मरीज की निराशा कम नहीं होती है। सरकारी अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की भीड़, और अस्पताल की क्षमता का आपस में कोई रिश्ता नहीं दिखता है। 
    संसदीय सचिवों का क्या होगा?
    छत्तीसगढ़ के संसदीय सचिव सचमुच काफी भाग्यशाली हैं। उनकी सुख-सुविधाओं पर सरकार करीब 50 करोड़ रुपये फूंक चुकी है। हाईकोर्ट ने यद्यपि उनके पावर सीज करने के आदेश दिए हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर पावर में कहीं कोई कमी नहीं आई है। सभी संसदीय सचिव नए जिलों में गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराएंगे और परेड की सलामी भी लेंगे। दुर्ग संभाग के एक संसदीय सचिव ने तो अपने पावर का इस्तेमाल कर इतना माल बनाया कि अगले दो-तीन पीढिय़ों तक को कोई काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पूरे इलाके के रेत खनन में उनके परिवार का एकाधिकार है। जबकि दिल्ली सरकार के संसदीय सचिवों को कोई सुविधा नहीं मिली थी। दिल्ली से बाहर जाने पर उन्हें मात्र वाहन भत्ता देने का ही प्रावधान रखा गया था। इसका भी वे उपयोग नहीं कर पाए और सदस्यता भी चली गई। 
    सरकारी मकानों के अलावा संसदीय सचिवों ने सरकार से परे भी मकान ले लिए हैं, जैसे लाभचंद बाफना का यह बड़ा सा बंगला भिलाई के 32 बंगले कॉलोनी में बीएसपी से हासिल किया गया है। और लोगों को यह तो याद होगा ही कि किस तरह बाफना के भाई ने एक आरटीओ के अफसर को पीट-पीटकर कपड़े फाड़ दिए थे, और बाद में पुलिस ने उस अफसर की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की थी, क्योंकि जाहिर है कि लाभचंद बाफना गृह विभाग से जुड़े हुए संसदीय सचिव हैं।
    सरकारी-धार्मिक आस्था के रिकॉर्ड
    मध्यप्रदेश में अभी आदि शंकराचार्य की प्रतिमा बनाने के लिए चरण पादुकाओं की शोभायात्रा पूरे प्रदेश में निकल रही हैं, और कई जिलों में कलेक्टर उन्हें सिर पर लेकर चल रहे हैं। सत्तारूढ़ पार्टी की धार्मिक नीतियों को बढ़ावा देकर बहुत से आईएएस अफसर अपने नंबर बढ़वा रहे हैं। 
    अब इधर राजिम में कुछ हफ्तों में शुरू होने वाले राजिम-कुंभ में भी कुछ ऐसा ही माहौल दिख रहा है। धर्मस्व विभाग के सचिव सोनमणि बोरा ने धर्मस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को सुझाव दिया है कि वहां पहुंचने वाले साधु-संतों के स्वागत के लिए दिए जलाए जाएं, और इन दियों की संख्या का एक विश्व रिकॉर्ड बनाया जाएगा। इस सुझाव का श्रेय बृजमोहन अग्रवाल ने ही अपने बयान में सोनमणि बोरा को दिया है और कहा है कि आम जनता और अधिकारी-कर्मचारी भी अपने घरों से मिट्टी के दिए लाकर जलाएं, 7 फरवरी को ऐसे ढाई लाख मिट्टी के दिए जलाने की घोषणा की गई है। अभी तो यह मेला शुरू होने में ही एक पखवाड़ा बचा है, आने वाले दिनों में और भी तरह-तरह के सुझाव सामने आएंगे, और आस्था के नए पैमानों का रिकॉर्ड बनेगा। इसी राजिम-कुंभ में एक दिन एक साथ 15सौ शंख फूंकने का भी कार्यक्रम रखा गया है। ( rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 19-Jan-2018
  • सुप्रीम कोर्ट में जजों के बीच आपसी मतभेद के चलते राज्य के कई चर्चित प्रकरणों की सुनवाई अटक गई है। पिछले दिनों सरकारी हेलिकॉप्टर  अगुस्ता वेस्टलैंड की खरीद में गड़बड़ी के मामले को लेकर जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूवी ललित की पीठ में सुनवाई होनी थी, लेकिन यह सुनवाई भी टल गई। राज्य सरकार ने हेलिकॉप्टर खरीद में किसी तरह की गड़बड़ी से इंकार किया है और खरीदी से जुड़े तमाम दस्तावेज अदालत को उपलब्ध कराए हैं। सरकार की तरफ से महेश जेठमलानी, तो याचिकाकर्ताओं की तरफ से प्रशांत भूषण और संजय हेगड़े जैसे दिग्गज वकील पैरवी कर रहे हैं। 
    सुनते हैं कि प्रशांत भूषण व्यक्तिगत तौर पर सरकार से खफा बताए जाते हैं। यही वजह है कि वे सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े प्रकरणों में रूचि ले रहे हैं। कहा जा रहा है कि दो साल पहले उनके साथ काम करने वाले प्रशिक्षु वकीलों से बस्तर में दुव्र्यवहार हुआ था। इस पूरे मामले में बस्तर पुलिस पर भी आरोप लगे थे। उस समय एसआरपी कल्लूरी आईजी के पद पर थे। पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई न होने से प्रशांत भूषण इतने नाराज हुए कि वे यहां के मामलों पर विशेष रूचि ले रहे हैं। वे नान घोटाला में भी सरकार के खिलाफ कोर्ट में खड़े हुए थे। ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रकरण हाईकोर्ट को भेज दिया। चर्चा तो यह भी है कि कुछ लोगों ने दुव्र्यवहार को लेकर प्रशांत भूषण को सफाई देने की कोशिश भी की, लेकिन प्रशांत भूषण की नाराजगी दूर नहीं हो रही है।


    गंदगी हटाते भाषा गंदी
    शहर को साफ-सुथरा बनाने के चक्कर में राजधानी रायपुर के म्युनिसिपल कार्पोरेशन के स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट ने हर तरफ तरह-तरह के पोस्टर टांगने शुरू किए हैं जिनमें कई जगहों पर बॉलीवुड फिल्मों के विलेन भी सफाई की बातें करते दिखते हैं। इन बातों में कुछ बातें तो बेसिर-पैर की हैं जो कि कोई असर नहीं डाल सकतीं, बहुत से पोस्टर डिवाइडरों पर ऐसे लगे हैं कि वहां से गुजरते हुए कोई उन्हें पढ़ नहीं सकते। फिर सड़क से लेकर तालाब तक शायद ही कोई पोस्टर ऐसे हों जिनमें हिन्दी के हिज्जों की बहुत सी गलतियां न हों। अब छत्तीसगढ़ जैसा हिन्दीभाषी प्रदेश, और महंगे खर्च से छपने वाले सरकारी पोस्टर या होर्डिंग ऐसी गलतियों वाले हैं कि बच्चे उन्हें पढ़ें तो गलत हिन्दी सीखें, गलत हिज्जे सीखें। शहर को साफ-सुथरा दिखाने की हड़बड़ी इतनी है कि म्युनिसिपल के डिजाइनर भाषा गंदी करके रख दे रहे हैं। इससे भी ऊपर यह कि एक डिजाइन तो ऐसी बनी है जिसमें गाली-गलौज की जुबान में बात लिखी गई है। यह तो समय रहते म्युनिसिपल कमिश्नर को किसी ने इसके बारे में बताया, और उन्होंने कुछ देर के भीतर ही वह डिजाइन हटवा दी। अब सवाल यह उठता है कि क्या मोदी का स्वच्छ भारत हिन्दी फिल्मों के खलनायकों की तस्वीरों के साथ आएगा, और क्या उसके लिए गाली-गलौज का इस्तेमाल होगा?

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Posted Date : 18-Jan-2018
  • रेरा के दो सदस्यों के लिए फिर से आवेदन बुलाए गए हैं। इन पदों के लिए 31 जनवरी तक आवेदन दिए जा सकेंगे। एक पद न्यायिक सेवा, तो दूसरा अखिल भारतीय सेवा के अफसरों के लिए आरक्षित है। यानी सचिव स्तर के अफसर इसके लिए पात्र होंगे। पहले चेयरमैन और दोनों सदस्यों के लिए आवेदन बुलाए गए थे लेकिन सिर्फ चेयरमैन की ही नियुक्ति की गई। चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में गठित कमेटी दोनों पदों के लिए उपयुक्त नामों का पैनल बनाकर भेजेगी और उम्मीद है कि फरवरी के पहले पखवाड़े में दोनों पदों पर नियुक्ति हो जाएगी। 
    रेरा सदस्य के लिए कई नामों की चर्चा है। सुनते हैं कि पीएससी के पूर्व चेयरमैन आरएस विश्वकर्मा भी पद की दौड़ में हैं। विश्वकर्मा को पीएससी चेयरमैन के रूप में काम करने का मात्र दो साल का ही मौका मिला। वे सरकार के पसंदीदा हैं और रेरा के चेयरमैन विवेक ढांड से भी अच्छे संबंध है। पीएससी चेयरमैन के रूप में उनका कामकाज बेहतर माना गया है। सो, उन्हें रेरा सदस्य के लिए फिट माना जा रहा है। हालांकि रिटायर्ड आईएफएस और आईपीएस भी इसके लिए जोर मार रहे हैं। आईपीएस का तो होना मुश्किल है। अलबत्ता आईएफएस के नाम पर विचार जरूर हो सकता है। 

    कांग्रेस की बूथ-तैयारी से चिंता
    कांग्रेस में जिस तरह बूथ लेबल पर कार्यकर्ताओं की फौज तैयार हो रही है उससे भाजपा के रणनीतिकारों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं। चुनाव से पहले इस स्तर पर तैयारी कांग्रेस में पहले कभी नहीं हुई।  इससे परे भाजपा की अंदरूनी हालत बहुत अच्छी नहीं रह गई है। सौदान सिंह जहां-जहां जा रहे हैं, उनके समक्ष शिकवा-शिकायतों के छोड़ कुछ नहीं हो रहा है, भाजपा की उनकी बैठकों की ऐसी ही खबरें मीडिया में लगातार छा रही हैं। भू-राजस्व संशोधन कानून के चलते आदिवासियों का एक बड़ा तबका सरकार के खिलाफ हो गया है। हालांकि कानून को वापस लेने की घोषणा भी हो गई है, लेकिन विवाद अभी भी बाकी है। कुल मिलाकर कांग्रेस के रणनीतिकार इसका फायदा उठाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भाजपा में डेमैज कंट्रोल की कोशिश नहीं हो रही है। सीएम विदेश से लौटने के बाद सरकार और पार्टी की बैठकों में शामिल होंगे और छोटी-छोटी समस्याओं को हल करने की पूरी कोशिश होगी ताकि चुनाव में जाने से पहले सबकुछ ठीक हो जाए।  

    बापू की कुटिया, और बा की?
    अविभाजित मध्यप्रदेश के दिनों में छत्तीसगढ़ से जो लोग भोपाल जाते थे उनके लिए सड़क किनारे के एक-दो सबसे सस्ते रेस्त्रां में से एक का नाम बापू की कुटिया था। अब भोपाल महज यादों में ही रह गया है, इसलिए वहां का खाना कम ही लोगों का हो पाता होगा। इस बीच छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक खबर आई कि इस शहर में बापू की कुटिया बनने वाली है। सुर्खी पढ़कर हैरानी हुई कि भोपाल का वह बड़ा छोटा से भोजनालय रायपुर में भी ब्रांच खोलने जा रहा है। फिर पता लगा कि यह काम सरकार कर रही है और शहर के अलग-अलग हिस्सों में बाग-बगीचों के भीतर बुजुर्गों के बैठने के लिए ऐसी कुटिया बनाई जा रही हैं जहां वे मनोरंजन कर सकें। 
    अब जैसा कि नाम से जाहिर है, यह बापुओं के लिए बनती जगह दिख रही है जहां पर बा के लिए जगह शायद न हो। सरकार की जुबान पर भी पुरूषप्रधान भाषा  ऐसी चढ़ी हुई है कि पुरूष के भीतर महिला को गिन दिया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने आम औरत शामिल मान लिया जाता है। शहर मेें ऐसी पचास कुटिया बनाने की तैयारी है और यह देखना है कि क्या बुजुर्ग महिलाओं को भी इनमें कोई आरक्षण मिल सकेगा? 
    वैसे इस कुटिया की योजना से हटकर लगे हाथों बुजुर्गों के बारे में एक दूसरी बात। रायपुर के एक प्रमुख चिकित्सक रोज सुबह घूमने के शौकीन थे। और उन्हें बगीचों में बैठी हुई बुजुर्गों की टोली अगर हंसते-मुस्कुराते दिखती थीं, खुश दिखती थीं, तो उनका यह मानना रहता था कि वे उस सुबह पेट अच्छी तरह साफ होने को लेकर खुश हैं। अब कुटिया मिल जाने से हो सकता है कि बुजुर्ग कुछ और मुद्दों पर भी बात कर सकें, जिन पर खुले में बात करना कुछ मुश्किल होता होगा।

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Posted Date : 17-Jan-2018
  • राजधानी रायपुर में एक बहुमंजिली कारोबारी इमारत कपड़ा बाजार में तोडऩे की कोशिश कई बार हुई, लेकिन म्युनिसिपल की फौलादी मशीनें वहां से बार-बार लौट आईं। इस अवैध इमारत के बारे में म्युनिसिपल, पुलिस और सरकार में हर किसी को मालूम था कि यह विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े एक बड़े आदमी की है, और इसीलिए इसके टूटने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन जो लोग नरेन्द्र मोदी और बीएचपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा के संबंध जानते हैं, वे जानते हैं कि मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने कभी तोगडिय़ा को गुजरात में उत्पात नहीं करने दिया। अब कल की प्रेस कांफ्रेंस के बाद यह जाहिर है कि गुजरात और राजस्थान की भाजपा-पुलिस और मोदी सरकार की आईबी पर तरह-तरह के आरोप लगाने वाले तोगडिय़ा ने मोदी और भाजपा से अपने तनाव खुद ही उजागर कर दिए, और अपनी जान को खतरा बताया है। अब मुठभेड़-हत्या की आशंका का आरोप लगाने वाले तोगडिय़ा के छत्तीसगढ़ के साथियों का वजन क्या भाजपा सरकार में अब भी उतना ही रहेगा, या अब भाजपा सरकार मोदी-अमित शाह की एक राज्य सरकार की तरह काम करेगी, और तोगडिय़ा के एक आदमी की अवैध इमारत को छूने का सोचेगी? 


    ताजमहल नहीं छोड़ा, तो यहां क्या है...
    लोग जहां जाते हैं, अपने व्यक्तित्व की, अपनी सोच और सीख की, और खासकर अपने मां-बाप की छाप जरूर छोड़ जाते हैं। राजधानी रायपुर में जगह-जगह म्युनिसिपल ने, और कई दूसरे लोगों ने भी सड़क किनारे तरह-तरह की पेंटिंग बनाकर दीवारों को गंदगी से बचाने की कोशिश की है। बाग-बगीचों में भी ऐसी पेंटिंग की गई है, और अब बाकी लोगों का मौका शुरू हो गया है कि उन तस्वीरों पर खरोंच-खरोंचकर अपना नाम लिखें, या उस लड़के-लड़की का नाम लिखें जिसकी चाहत मन में अधूरी बैठी हुई है। नतीजा यह हुआ है कि लोगों की गंदगी खुलकर दीवारों पर दिखने लगी है। कौन किससे मोहब्बत करता है, इसकी नुमाइश भारत की संस्कृति के मुताबिक ही हो रही है। जिस देश के लोग ताजमहल और कुतुबमीनार तक को छोड़ते नहीं हैं, पेड़ों तक को नामों से गोद डालते हैं, वे दीवारों को भला क्यों छोड़ेंगे। रायपुर से अभी दिल्ली गई एक महिला पत्रकार ने वहां के पेड़ों की गुदाई की जो तस्वीरें अभी पोस्ट की हैं, उसका तगड़ा मुकाबला छत्तीसगढ़ के शहरों में भी मौजूद है। इसे देखकर कोफ्त से भरे हुए एक आदमी ने कहा- लोग सार्वजनिक जगहों पर अपनी हरकतों से इस बात के सुबूत छोड़ते जाते हैं कि उनके मां-बाप किस किस्म के थे। 


    मंत्रालय की ताकत
    जिस तरह एक वक्त किसी जिले में किसी अफसर का दफ्तर कलेक्ट्रेट के भीतर हो या फिर बाहर कहीं, इससे उसके रूतबे में खासा फर्क पड़ जाता था। राजधानी बनने के बाद रायपुर में यही हाल मंत्रालय का हो गया है। वैसे तो मंत्रालय में बैठने वाले अफसरों की बराबरी के अफसर डायरेक्ट्रेट में भी बैठते हैं, और शहर भर में फैले दूसरे कई और दफ्तरों में भी बैठते हैं, लेकिन जो ताकत अपना पता मंत्रालय का बताते हुए दिखती है, वह बाहर कहीं नहीं दिखती, सिवाय कलेक्टर जैसी अनोखी ताकत वाली कुर्सी के।  
    मंत्रालय में जो अफसर किसी ओहदे पर रहते हैं, उनसे बाहर से आने वाले उनसे कई सीनियर अफसर भी आकर मिलते रहते हैं क्योंकि उनकी वरिष्ठता मंत्रालय के सामने धरी रह जाती हैं। नतीजा यह होता है कि मंत्रालय से निकलकर राजधानी के किसी दूसरे दफ्तर में लोग जाना नहीं चाहते। और यही वजह है कि मंत्रालय से तबादला होता है, तो उसे रूकवाने की कोशिश में कुछ लोग वहां के दफ्तर को खाली नहीं करते, और मंत्रालय में तैनात होने वाले नए अफसरों को तुरंत कमरे नहीं मिल पाते।


    देवव्रत राहुल से भी सीनियर
    कांग्रेस छोडऩे वाले भूतपूर्व सांसद देवव्रत सिंह ने कांग्रेस के छत्तीसगढ़ के लिए प्रभारी कांग्रेस के पी.एल. पुनिया के लिए कहा कि वे राजनीति में कुछ बरसों पहले ही आए हैं, और खुद देवव्रत 22 बरस से कांग्रेस की राजनीति में रहे इसलिए वे राजनीति में पुनिया के मुकाबले बहुत सीनियर हैं। अब अगर सीनियर होना ही आगे बढऩे की सबसे बड़ी योग्यता हो, तो एक वक्त रायपुर के कांग्रेस भवन में चाय पिलाने वाला छन्नू भी शहर या जिला कांग्रेस का अध्यक्ष होता। और जिस राहुल गांधी के मातहत अब तक देवव्रत चले आ रहे थे, वे राहुल गांधी भी 22 बरस से राजनीति में नहीं हैं, और इस हिसाब से देवव्रत को राहुल से पहले अध्यक्ष बनने का दावा भी करना था। दरअसल चुनाव को अब एक बरस भी बचा नहीं है, और ऐसे में अपना महत्व बताने, और एक पार्टी से दूसरी या तीसरी पार्टी में जाने का यह सिलसिला चलता ही रहेगा। कांग्रेस और भाजपा से परे अजीत जोगी एक ऐसी पार्टी खोलकर बैठे ही हैं जिसमें अपनी-अपनी पार्टी से नाराज लोगों के लिए अलग से रेड कार्पेट बिछाया गया है। आगे-आगे देखें होता है क्या।  ( rajpathjanpath@gmail.com)

     

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Posted Date : 16-Jan-2018
  • पुलिस में डीजी के दो और पद बनाने के प्रस्ताव को भेजे माहभर हो गए हैं, लेकिन केंद्र से अब तक मंजूरी नहीं मिल पाई है। इस वजह से 88 बैच के आईपीएस अफसर एडीजी संजय पिल्ले, आरके विज और मुकेश गुप्ता की पदोन्नति रूकी हुई है। एमडब्ल्यू अंसारी के रिटायर होने के बाद संजय पिल्ले की पदोन्नति में दिक्कत नहीं है, लेकिन अतिरिक्त पदों की मंजूरी के बिना विज और मुकेश गुप्ता की पदोन्नति नहीं हो सकती।
    केंद्र से अतिरिक्त पदों की मंजूरी में विलंब को लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है। सुनते हैं कि विज को लेकर ज्यादा दिक्कत नहीं है, लेकिन दबंग अफसर मुकेश गुप्ता के विरोधी सक्रिय हैं। गुप्ता के विरोधियों ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को पीछे लगा दिया है और शिकायतों का पुलिंदा केंद्रीय गृह मंत्रालय से लेकर पीएमओ तक भेज दिया। 
    कहा जा रहा है कि शिकवा-शिकायतों के चलते ही अतिरिक्त पदों को मंजूरी नहीं मिल पा रही है। लेकिन दिक्कत पिल्ले को हो रही  है। सीधे-सादे सरल स्वभाव संजय पिल्ले की पदोन्नति भी राजनीति में उलझकर रह गई है। 

    गुरू घासीदास का ऐसा अपमान!
    एक तरफ तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए, और साफ-सुथरा शहर बनाने के लिए दसियों करोड़ खर्च किए जा रहे हैं, दूसरी तरफ शहर में जो संगठित गंदगी है उसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा। चारों तरफ सरकारी और गैरसरकारी दीवारों पर हर दिन दसियों हजार नए पोस्टर चिपक जाते हैं जिनमें सड़क और पता बताने वाले सरकारी बोर्ड भी दबते हैं, और एक्सीडेंट से बचाने के लिए लगाए गए रिफ्लेक्टरों पर भी पोस्टर चिपकाए जाते हैं। पूरी रात पुलिस गश्त करती है, और पूरी रात पेशेवर लोग पोस्टर भी चिपकाने का काम करते हैं। अब गंदगी रोकने का जिम्मा मानो अकेले म्युनिसिपल का है इसलिए पुलिस पोस्टर चिपकाने वालों को इस बात पर भी नहीं पकड़ती कि सड़कों के डिवाईडरों पर लगे रिफ्लेक्टरों पर भी पोस्टर चिपकाए जा रहे हैं। 
    लेकिन अब तो हद हो गई जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने  गुरू घासीदास की तस्वीरों वाले पोस्टर मरीन ड्राईव के ग्रेनाईट स्तंभों पर तो चिपका ही दिए, डिवाईडरों पर चिपका दिए, और तो और कचरे के डिब्बों पर भी धर्म से जुड़े ये पोस्टर चिपका दिए गए हैं। सत्तारूढ़ पार्टी का छात्र संगठन होने के नाते म्युनिसिपल इस पर कोई कार्रवाई तो करने से रही, लेकिन गुरू घासीदास की तस्वीरों को कचरे के डिब्बों पर चिपकाना किस तरह की संस्कृति है? और साफ-सुथरी जगहों पर ऐसे पोस्टर चिपकाकर उन्हें गंदा और बर्बाद करके नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत का सपना किस तरह पूरा किया जा रहा है? 

    अलग-अलग मामले, अलग-अलग पैमाने
    आमतौर पर शांत रहने वाले प्रदेश के पुलिस मुखिया के एक फैसले को लेकर विवाद हो रहा है। मामला अनुकंपा नियुक्तियों को लेकर है। नक्सल इलाकों में शहीद दो जवान के आश्रितों को उन्होंने लिपिक के पद पर अनुकंपा नियुक्ति दे दी। लेकिन अन्य इसी तरह के प्रकरण पर उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। एक मामले में उन्होंने राज्य शासन से मार्गदर्शन मांग लिया। लेकिन सरकार ने इस मामले को गंभीरता से ले लिया है। सुनते हैं कि सरकार ने पूछ लिया कि पहले के प्रकरणों में मार्गदर्शन की जरूरत नहीं पड़ी। अब क्यों? (rajpathjanpath@gmail.com)

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