राजपथ - जनपथ

11-May-2020

जोगी के लिए साय की प्रार्थना

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी इस समय जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। उन्हें दवाओं के साथ दुआओं की भी जरुरत है। उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए डॉक्टरों के साथ समर्थक और जानने वाले भी अपने-अपने तरीकों से कोशिश कर रहे हैं। इसी में एक नाम है वरिष्ठ आदिवासी नेता नंदकुमार साय का। साय जोगी के लिए महामृत्यृजंय का जाप कर रहे हैं।

जबकि जोगी और साय के बीच सियासी कटुता किसी से छिपी नहीं है। जोगी जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री थे, तो साय नेता प्रतिपक्ष हुआ करते थे। दोनों अलग-अलग विचारधारा के साथ अलग-अलग राजनीतिक दल से जुड़े हैं। सीएम और नेता प्रतिपक्ष का पद भी एक दूसरे के विरोध का माना जाता है। जोगी के मुख्यमंत्रित्वकाल में साय ने उनके निवास के सामने बड़ा प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में पुलिस ने जमकर लाठियां भांजी थीं । पुलिस की लाठी खाने से साय का पैर भी फ्रैक्चर हुआ था। जोगी पर विपक्षी  दल के नेताओं की आवाज को दबाने के लिए पुलिस से पिटवाने के आरोप लगे थे। उस वक्त मुकेश गुप्ता रायपुर के एसपी हुआ करते थे।

जोगी की जाति के मसले को साय कोर्ट तक ले गए थे। अनुसूचित जाति जनजाति आयोग का अध्यक्ष रहते हुए भी उन्होंने जोगी की जाति पर सवाल उठाए थे। मरवाही से साय जोगी के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुके हैं। जिसमें साय को हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद ही उन्होंने जोगी की जाति के मसले पर कोर्ट में याचिका लगाई थी। इतना सब कुछ होने के बाद भी साय भलमनसाहत दिखाते हुए जोगी  के लिए अपने तरीके से प्रार्थना कर रहे हैं। यह छत्तीसगढ़ की सियासत की खासियत है कि जिंदगी भर एक दूसरे के घोर विरोधी भी जीवन मरण के मसले पर साथ खड़े हैं।

जोगी के बारे में भी कहा जाता है कि उनके हमेशा से अपने विरोधियों से अच्छे संबंध रहे हैं। जबकि, सियासी मैदान में विरोध करते करते कब कौन किसका दुश्मन बन जाता है, यह पता भी नहीं चलता। बात व्यक्तिगत टिप्पणियों से होते हुए बुरा-भला सोच तक पहुंच जाती है। पिछले दिनों बीजेपी के एक बड़े नेता के स्वास्थ्य को लेकर कई तरह की कहानियां सोशल मीडिया में सुनने को मिल रही थीं, जिसका उन्हें खंडन करना पड़ा। हम अक्सर राजनीति में शुचिता की बात करते हैं, लेकिन जब इसके पालन करने की बात होती है, तो सभी सियासी विरोध को प्रमुखता देते हैं। ऐसे समय में साय ने गिरते राजनीतिक मूल्यों के बीच मिसाल पेश की है। हम भी आशा करते हैं कि साय और उनके जैसे तमाम भलेमनसाहत रखने वालों की प्रार्थना स्वीकार हो, ताकि राजनीति में शुचिता को मुकाम हासिल हो सके। 

कोरोना गया, प्रदेश अध्यक्ष आया?

लॉकडाउन में राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम काफी सक्रिय हैं। वे वीडियो कॉन्फ्रेंस कर सरगुजा संभाग के पदाधिकारियों की बैठक ले चुके हैं। वे राज्य सरकार पर तीखा हमला बोल रहे हैं। रामविचार का कद पार्टी के भीतर काफी बढ़ा है। उन्हें झारखंड के चुनाव में अहम जिम्मेदारी दी गई थी। चुनाव नतीजे भले ही पार्टी के अनुकूल नहीं आए। मगर उन्होंने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास पार्टी के मुखिया बाबूलाल मरांडी को भाजपा में शामिल कराने में अहम भूमिका निभाई। वैसे तो मरांडी की घरवापसी के लिए अमित शाह सीधे प्रयासरत थे, लेकिन नेताम की भूमिका को नकारा नहीं जा रहा है। रामविचार प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में भी हैं। उन्हें सरोज पाण्डेय और सौदान सिंह का साथ मिल रहा है, लेकिन चर्चा है कि पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह उनके नाम पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं। यही वजह है कि उनके नाम की घोषणा नहीं हो पा रही है। माना जा रहा है कि कोरोना संक्रमण में कमी आते ही नए अध्यक्ष की घोषणा हो सकती है।

निर्वाचित लोग तो झांसे से बचें...

छत्तीसगढ़ के शहरों में लॉकडाऊन को लेकर जिस तरह के प्रयोग देखने मिल रहे हैं, वे लॉकडाऊन की पूरी जरूरत और नीयत, इन दोनों को खारिज कर दे रहे हैं। दारू के बारे में हम जितना लिख चुके हैं, उससे ज्यादा अब लिखने की जरूरत नहीं है क्योंकि केन्द्र सरकार ने जिस तरह दारू को खोला, उससे देश के तमाम राज्यों को चाहे-अनचाहे दारू शुरू करना पड़ा, और उसने पीने वाले तबके, और उनके संपर्क में आने वाले लोगों का शारीरिक-दूरी की, सोशल डिस्टेंसिंग की सारी कामयाबी को खत्म कर दिया। अब पाकिस्तान के एक मशहूर शायर की जुबान से, हर किसी को  हर किसी से खतरा है।

लेकिन शनिवार-इतवार दो दिन के बाजार बंद के बाद आज जब बाजार खुले, तो शहर के बीच ट्रैफिक जाम हो गया। सारे दुपहिया वाले एक-दूसरे के बगल खड़े रहे, और डेढ़ महीने से चली आ रही मशक्कत किसी काम की नहीं रही। लेकिन सरकार के बीच बात की जाए तो पुलिस विभाग प्रशासनिक अधिकारियों को यह कहकर डरा देता है कि पुलिस के अमले पर वैसे भी बहुत दबाव है, काम के बोझ से वे थके हुए हैं, और ऐसे में दुकानों को खुलने के घंटे बढ़ाने का मतलब पुलिस का तनाव बढ़ाना है, और ऐसे में कभी पुलिस लाठी चलाने के बजाय गोली चला दे, तो पुलिस को जिम्मेदार न माना जाए। अब ऐसी चेतावनी के बाद प्रशासनिक अफसर ढीले पड़ जाते हैं कि कौन गोली चलने की नौबत लाए।

सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ में सुबह से रात तक दुकानों को अगर खोला जाए तो बाजार की भीड़ एकदम घट जाएगी, दुकानों पर लोगों का शारीरिक संपर्क नहीं होगा, और आज जब व्यापारी संगठनों से लेकर पार्षद और विधायक तक बाजार खोलने के हिमायती हैं, तब यह गैरजरूरी रोक-टोक खत्म होनी चाहिए। हर इलाके के पार्षद हैं, विधायक हैं, और सांसद भी अपने-अपने इलाकों में हैं। हर इलाकों के व्यापारी संगठन हैं, और इन पर जिम्मेदारी डालकर बाजार बिल्कुल सुबह से देर रात तक खोलने की छूट देनी चाहिए ताकि मुर्दा पड़ा हुआ बाजार चल सके, गरीब कारीगरों के चूल्हे जल सकें। दारू से मोटी कमाई करने वाली सरकार को भी यह समझना चाहिए कि अगर बाजार से कलपुर्जे नहीं मिलेंगे, तो मरम्मत करने वाले कारीगर भी कमा नहीं पाएंगे, और सस्ती दारू के ग्राहक टूटने लगेंगे। आज गरीब-मजदूरों, कारीगरों, छोटे-बड़े व्यापारियों के भले के लिए बाजार को बेरोक-टोक खोलने नहीं दिया जा रहा, तो कम से कम दारू की बिक्री के हित में बाजार को पूरे वक्त खुलने देना चाहिए। संक्रमण को रोकने के लिए जरूरी हो तो भी लगातार दो दिन बाजार बंद रखने के बजाय हर तीन दिन के बाद एक दिन बाजार बंद करना चाहिए, और जिन दिनों बाजार खुले, उसे चौबीसो घंटे खुले रखने की छूट रहनी चाहिए। अफसरों को एक ही कार्रवाई समझ में आती है, जिसका नाम प्रतिबंध है। इसलिए हर जगह पुलिस और प्रशासन प्रतिबंध बढ़ाकर समझ लेते हैं कि कानून व्यवस्था बेहतर हो गई है। जनता के बीच से चुनकर आने वाले विधायकों, और उनमें से बने हुए मंत्रियों को इस झांसे से बचना चाहिए।

 


10-May-2020

नेताओं की अगली पीढ़ी

कांग्रेस के बड़े नेताओं के परिवार के सदस्य अब धीरे-धीरे राजनीति में कूद रहे हैं। कुछ तो आ चुके हैं, और कुछ उच्च शिक्षित युवा प्रोफेशनल कांग्रेस के जरिए राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं। पूर्व केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर की अगुवाई में ऑल इंडिया प्रोफेशनल कांग्रेस दो साल पहले ही अस्तित्व में आया था। इसके जरिए इंजीनियर, डॉक्टर, सीए और अन्य उच्च शिक्षित लोगों को कांग्रेस से जोडऩा मकसद रहा है। छत्तीसगढ़ में प्रोफेशनल कांग्रेस का पुनर्गठन हुआ है। यहां अध्यक्ष का दायित्व संभाल रहे धमतरी के नेता पंकज महावर की जगह अब क्षितिज विजय चंद्राकर को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

क्षितिज, दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री चंदूलाल चंद्राकर के परिवार से हैं, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दामाद भी हैं। क्षितिज आईटी एक्सपर्ट हैं और वे कनाडा में काम कर चुके हैं। थरूर ने प्रोफेशनल कांग्रेस के सचिव की जिम्मेदारी सुश्री ऐश्वर्या सिंहदेव को सौंपी है। ऐश्वर्या, पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव की भतीजी हैं और जिला पंचायत सदस्य आदित्येश्वर शरण सिंहदेव की बहन है। ऐश्वर्या की पढ़ाई लंदन में हुई है। और वे महिलाओं की समस्याओं को लेकर जागरूक भी हैं। राजनीतिक परिवार से होने से पहचान को लेकर संकट नहीं है। मगर उन्हें अब प्रोफेशनल कैरियर से हटकर काम कर दिखाना होगा।

राजधानी के बल्लम नेताओं का संघर्ष

राजधानी रायपुर में कांग्रेस के बड़े नेताओं को अपनी सियासी साख बचाए रखने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। 15 साल बाद पार्टी सत्ता में आई तो उम्मीद थी कि उनका भी कुछ भला होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उलटे सरकार बनने के बाद जनता की अपेक्षाएं बढ़ गई। ऐसे में विधायकी बचाए रखने के लिए जमकर पसीना बहाना पड़ रहा है। शहर के एक युवा विधायक तो अब आटो रिक्शा चलाते गली-गली घूम रहे हैं। कोरोना संक्रमण में क्षेत्र के लोगों को राशन से लेकर तमाम जरुरी सामान खुद उपलब्ध करा रहे हैं। इतना ही नहीं पानी, सफाई जैसी तमाम समस्याओं के लिए वे वार्ड वार्ड घूम रहे हैं। दरअसल, उन्होंने प्रदेश की हाईप्रोफाइल सीट से बीजेपी के बड़े नेताओं को हराया है। ऐसे में अगले चुनाव में पत्ता साफ होने का खतरा भी हो सकता है। लिहाजा नेताजी कोई कोर कसर छोड़ नहीं रहे हैं। माना जाता है कि सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधियों के पास लोगों को उपकृत करने के कई अवसर होते हैं, लेकिन अभी तक उन्हें यह अवसर मिला नहीं है, तो जनता से सीधा जुड़ाव रखना जरुरी है, वरना पब्लिक तो चुनाव में पूरा हिसाब-किताब चुकता कर देती है। इसी तरह रायपुर नगर निगम के एक नेताजी विपक्षी दल की सरकार में खूब चांदी काट चुके हैं, लेकिन अपनी पार्टी की सरकार बनने के बाद पद के लिए भी लाले पड़ गए थे। खैर, जैस-तैसे एडजस्ट हो पाए। चूंकि काफी मान मन्नौवल के बाद पद मिला है, तो नेताजी चुपचाप बैठने में ही भलाई समझ रहे हैं। उनको भी पता है कि ज्यादा सक्रियता दिखाने से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ेंगी और उन्हें पूरा करने की स्थिति में हैं नहीं। हालांकि नेताजी को दिल्ली जाने का मौका मिला था, लेकिन उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। उनके बारे में कहा जाता है कि वे दिल्ली जाने से पहले ही इतने मशगूल हो गए थे, जिसका भी उन्हें नुकसान हुआ। वे सोशल मीडिया में अपनी एक पोस्ट के कारण भी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने सरकार में नंबर टू की तारीफ की थी। हो सकता है कि कोई खिचड़ी पका रहे हों। इसी तरह राजधानी के एक और वयोवृद्ध नेताजी को उम्मीद दी थी कि सरकार बनने के बाद बड़ा ओहदा मिलेगा, लेकिन उनकी स्थिति भी जस की तस है। इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। कुल मिलाकर इन नेताओं का समय पद बचाने की चुनौती और संघर्ष में ही बीतता दिख रहा है। 

 


09-May-2020

अफसर का बाल-बांका नहीं

सरकार के एक मंत्री अपने विभाग के निगम में गड़बड़झाले से काफी  परेशान हैं। वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने इसके लिए जिम्मेदार निगम के प्रमुख अफसर को हटाने के लिए चिठ्ठी लिखी थी, लेकिन अफसर का बाल-बांका नहीं हुआ। अब निगम में जो कुछ भी गड़बड़ हो रहा है, उसका ठीकरा मंत्रीजी पर फूट रहा है।

सुनते हैं कि अफसर, कांग्रेस के एक बड़े पदाधिकारी के करीबी हैं। ऐसे में उन्हें हटाना भी आसान नहीं रह गया है। आखिरकार मंत्रीजी ने परिस्थितियों को भांपकर अफसर की शिकायत करना छोड़ दिया है और सिफारिश की है कि अफसर को और अहम जिम्मेदारी दे दी जाए। अब देखना है कि मंत्रीजी की सिफारिश मान्य होती है, अथवा नहीं।

किराए की उम्मीद भी नहीं

लॉकडाउन के चलते कई जगहों पर किराएदार और मकान मालिक के बीच विवाद चल रहा है। शहर के मध्य में स्थित एक व्यावसायिक कॉम्पलेक्स के दर्जनभर से अधिक दुकानदार किराया नहीं पटा पा रहे हैं। ऐसे में दुकान के मालिकों ने उन्हें किराया देने अथवा दुकान खाली करने के लिए दबाव बनाया है। कुछ व्यापारी नेता इस विवाद को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। दुकान के मालिकों को समझाइश देने की कोशिश हो रही है कि दुकान बंद है। कारोबार नहीं हो रहा है। ऐसे में किराए के लिए दबाव बनाना उचित नहीं है।

कुछ इसी तरह का मिलता-जुलता मामला एक खास कारोबार से भी जुड़ा है।  सुनते हैं कि इस कारोबार ने अपने दफ्तर का तीन महीने का किराया नहीं पटाया है। मकान मालिक ने जब उन पर किराया देने अथवा दफ्तर खाली करने के लिए दबाव बनाया, तो उन्होंने पीएम के उस कथन का जिक्र करते हुए लंबा चौड़ा खत लिख दिया जिसमें पीएम ने किरायादारों पर दबाव नहीं बनाने का आग्रह किया था। अब मालिक परेशान हैं, और कोरोना संकट खत्म होने तक किराए की उम्मीद भी नहीं दिख रही है।

कोरोनारुपी खुशी

सरकारी कामकाज और ठेकों में लेन-देन सामान्य शिष्टाचार माना जाता है। हालांकि यह काम भी पूरी सावधानी और कोड वर्ड में किया जाता है। जैसा कि इस समय कोरोना संक्रमण का दौर चल रहा है, लिहाजा कोड वर्ड भी उसी हिसाब से तय हो रहे हैं। चर्चा है कि इस समय कोरोना के नाम से ही लेन-देन चल रहा है। आशय यह है कि अगर किसी को कुछ देना है तो वे कोरोना देना है कहकर इशारा कर रहे हैं। अब समझदार के लिए इशारा काफी होता है, जो कोड वर्ड को समझ गए, वो खुशी-खुशी कोरोना ले रहे हैं लेकिन जो नहीं समझ पाए, उनके भाग्य में कोरोनारुपी खुशी नहीं है।

धनिया का टेंशन

छत्तीसगढ़ में खेता किसानी से जुड़े विभाग ने धनिया से तौबा कर ली है। ऐसा नहीं है कि धनिया से कोई नुकसान हो रहा है, बल्कि यह फायदे का सौदा है। खाने में तो धनिया का विशेष महत्व होता है। धनिया के बिना तो किचन अधूरा ही रहता है। अमीर-गरीब सभी के खाने में धनिया तो आवश्यक है। इसके बावजूद विभाग के लोग इससे परहेज करते हैं। उनकी समस्या यह है कि वो किसानों को धनिया बोने की सलाह भी नहीं दे सकते, क्योंकि इसके कई मतलब निकाले जा सकते हैं। समस्या केवल इतनी सी होती तो बात नहीं बिगड़ती। दरअसल, अब तो उन पर किसानों की धनिया बोने के आरोप लग रहे हैं। लिहाजा धनिया का नाम सुनते ही वे लोग टेंशन में आ जाते हैं।इसके पीछे का राज बहुतों को मालूम है।


08-May-2020

पशोपेश में माननीय

सार्वजनिक जीवन में लोगों से मिलना-जुलना अनिवार्य माना जाता है, लेकिन कोरोना संक्रमण के इस दौर में यह किसी आफत से कम नहीं। लिहाजा, नेता-मंत्री लोगों से मेल-मुलाकात से एकदम से परहेज कर रहे हैं। हालांकि इतने से उनका काम बन नहीं रहा है। संकट के इस समय में लोग मदद के लिए बंगलों तक भी पहुंच रहे हैं। कुछ लोग फोन से लोकेशन ले रहे हैं। ऐसे में नेता-मंत्री भी बदल-बदलकर अपना लोकेशन बता रहे हैं। इससे थोड़ी बहुत राहत जरुर मिल रही है, लेकिन पूरी तरह से नहीं। जैसे-तैसे वीआईपी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। लोगों की समस्या को सुनना और सुलझाना भी जरुरी है। इस पूरे संक्रमण काल में उनकी दिक्कत यह भी है कि ज्यादातर लोग एक जगह से दूसरी जगह या अपने प्रदेश लौटना चाहते हैं। ऐसे में नेता-मंत्री उनकी मदद नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि प्रवासियों की वापसी नियमों और सावधानी के साथ ही होनी है। फिर भी माननीय कोशिश भी कर रहे हैं। अपने विधानसभा के लोगों की ऐसी ही समस्या के लिए मंत्री बकायदा अफसरों को फोन भी कर रहे हैं, लेकिन अफसरों की भी अपनी मजबूरियां है। चाहकर भी अफसर-मंत्रियों के निर्देश का पालन नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में माननीयों की स्थिति खराब हो रही है। एक तरफ आम लोगों को लगता है कि नेता मिल नहीं रहे हैं और मशक्कत के बाद बात हो भी रही है, तो उनके काम नहीं हो रहे हैं। दूसरी तरफ अधिकारी भी नियम कानून का हवाला देकर काम नहीं कर रहे हैं। कुल मिलाकर माननीय बड़े पशोपेश में हैं कि मिले तो मुश्किल नहीं मिले तो समस्या। लोगों की समस्या को सुलझाए तो परेशानी और न सुलझाए तो बड़ी परेशानी।

मांस-मटन से खुला राज

छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विवि के कुलपति लॉकडाउन के कारण दिल्ली में फंसे हैं, लेकिन उनकी सरकारी गाड़ी लगातार दौड़ रही है। कई बार लोगों को संशय हो जाता है कि कहीं कुलपति महोदय लौट तो नहीं गए हैं। हालांकि ऐसा है नहीं। धीरे-धीरे लोगों ने ध्यान देना बंद कर दिया था। इस बीच विवि के लोगों का माथा उस वक्त ठनका जब कुलपति जी की गाड़ी मांस-मटन की दुकान पर खड़ी देखी गई। दरअसल, कुलपति तो लहसून-प्याज तक नहीं खाते। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि उनकी गाड़ी मांस-मटन की दुकान में क्या करती है। इसके बारे में जानकारी जुटाई गई तो पता चला कि कुलपति जी की गाड़ी दरअसल, विश्वविद्यालय के एक बड़े साहब के जुगाड़ के लिए दौड़ रही है। अब विवि के गलियारे की यह कानाफूसी दिल्ली कुलपति जी तक पहुंच गई। उन्हें जैसे ही पता चला उन्होंने तत्काल दिल्ली से ड्राइवर को फोन करके इंक्वारी की। साथ ही रीडिंग और लॉग बुक के बारे में जानकारी ली। उन्होंने आते ही गाड़ी का लॉगबुक चेक करने के लिए ताकीद किया। इतनी पूछताछ के बाद से तो ड्राइवर सकते में है। दौड़ते-भागते उसने इसकी सूचना बड़े साहब को दी। अब देखना यह है कि मांस-मटन के लिए किस गाड़ी का उपयोग किया जाएगा। हालांकि लॉकडाउन से पहले जब कुलपति की नियुक्ति नहीं हुई थी, तब भी साहब गाडिय़ों का उपयोग करते थे, लेकिन उस समय लोगों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। अब जब मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, तो इसने नया रंग ले लिया है।

किसानी का क्या होगा?

कोरोना के कारण गांव, गरीब और किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इस दौर में गांवों में खेती किसानी चौपट हो गई है और मजदूरों को रोजगार नहीं मिल रहा है। हालत यह है कि सभी के सामने रोजी रोटी का संकट हो गया है। हालांकि सरकार का दावा है कि राज्य में किसान और गरीब दोनों की स्थिति अच्छी है। राज्य सरकार मनरेगा में काम उपलब्ध कराने में भी अव्वल रहा है। दूसरी तरफ 25 सौ रुपए समर्थन मूल्य के कारण किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी होने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन राज्य के किसानों को अभी भी 25 सौ रुपए का बकाया यानि करीब पौने 7 सौ रुपए मिलने का इंतजार है। सरकार ने मई में किसानों को बकाया राशि देने का मन बनाया है। ऐसे में यह राशि किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित होगी, क्योंकि राज्य में साग-भाजी और फलों की फसल तो खरीददार नहीं मिलने के कारण चौपट हो गई है। कोरोना के कारण उत्पन्न स्थिति का असर आने वाले कुछ सालों तक रहने वाला है। आशंका जताई जा रही है कि इस महामारी के बाद नौकरी जाने का खतरा है, लिहाजा लोग गांव की तरफ जा सकते हैं। ऐसे में ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है। यह सोच सही है, लेकिन इसके लिए किसानी को प्रोत्साहित करने की जरुरत है और सरकार को लघु-कुटीर उद्योगों की स्थापना के लिए पहल करनी होगी। अन्यथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चौपट होने में देर नहीं लगेगी। किसानों का मानना है कि धान के कटोरे को बचाए रखने के लिए उपज का एक-एक दाना समर्थन मूल्य पर खरीदने की जरुरत है। क्योंकि सरकार केवल 15 क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर खरीद रही है। छत्तीसगढ़ में सरकार सूबे के खेत खलिहानों से ही निकल कर बनी है। किसानों ने बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसलिए भी बंपर जीत दिलाई, ताकि उसकी फसल का वाजिब मूल्य मिल सके। कोरोना महामारी के बाद फिलहाल तो कोई चुनाव नहीं है। संभव है कि किसानों की तरफ से सरकार का ध्यान हट जाए, जबकि खेती किसानी पर विशेष ध्यान की आवश्यकता है। फिलहाल तो इसके सियासी नफा-नुकसान नहीं है, लेकिन देर करने पर नुकसान ज्यादा हो सकता है, क्योंकि किसान बाजी पलट भी सकते हैं। 15 साल तक सत्ता में रहने के इससे एकदम से दूर हुई बीजेपी इसका दर्द अच्छे से समझ सकती है। लोगों का तो यह भी कहना है कि रमन सिंह को दिल्ली से अनुमति मिल गई होती, तो शायद पार्टी की इतनी दुर्गति नहीं होती। उम्मीद है कि उनको अब यह बात समझ आ गई होगी, लेकिन फिलहाल को समझने की बारी सरकार की है, क्योंकि कहा जाता है कि अब पछताए होत क्या जब चिडिय़ा चुग गई खेत।


07-May-2020

शराब पर सियासत और नफा-नुकसान की कहानी

लॉकडाउन पीरियड में शराब बिक्री के पीछे राजस्व को बड़ा कारण माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि राज्य सरकारों को शराब बिक्री से करोड़ों-अरबों का राजस्व मिलता है और राजस्व नहीं मिलेगा तो राज्य की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। विकास कार्य तो रुकेंगे ही साथ ही कोरोना संकट के इस दौर में उसकी रोकथाम पर होने वाले खर्च की व्यवस्था करने में दिक्कत होगी। कुछ राज्य तो केन्द्र से राजस्व की भरपाई की शर्त पर शराब बिक्री बंद करने के लिए सहमति जता रहे हैं। कांग्रेस के संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने शराब बिक्री के मामले में बचाव की मुद्रा में कहा है कि कांग्रेस ने 5 साल के भीतर शराबबंदी का वादा किया है। नोटबंदी या लॉकडाउन की तरह शराबबंदी नहीं की जा सकती। कोरोना काल में सभी राज्यों में आर्थिक गतिविधियां शून्य हो गई हैं। राज्य सरकारों पर कर्मचारियों को वेतन देने के साथ कोरोना खर्च का बोझ है। उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी समुचित व्यवस्था और राज्य के राजस्व की वैकल्पिक व्यवस्था बनाने के बाद ही की जाएगी।

कुल मिलाकर उन्होंने अपनी सरकार के शराब बिक्री के फैसले को वाजिब ठहराने के लिए तमाम दलीलें पेश की। दूसरी तरफ कांग्रेस के इन तर्कों से सामाजिक संगठन और शराबबंदी आंदोलन से जुड़े लोग सहमत नहीं है। सीए और सामाजिक कार्यकर्ता निश्चय वाजपेयी का कहना है कि शराब के राजस्व का विकल्प काफी पहले तलाश लिया गया था। कामराज के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने पहले ही ऐसा टैक्स लगाया हुआ है। कांग्रेस ने शराब से मिलने वाले राजस्व की भरपाई के लिए सेल्स टैक्स को शराबबंदी टैक्स के रूप में लागू किया था। कई हिस्सों में शराबबंदी भी की गई। बाद की सरकारों ने शराब बिक्री तो वापस शुरू कर दी मगर शराबबंदी टैक्स यानी सेल्स टैक्स बंद नही किया। उनका कहना है कि आज भी यह टैक्स जीएसटी का एक बड़ा हिस्सा है। सरकारों को इससे शराब से कहीं अधिक राजस्व मिलता है।

देखा जाए तो शराब का मुद्दा लॉकडाउन के दौर में गरमाया हुआ है। विपक्ष के साथ सामाजिक संगठन और महिलाओं ने लॉकडाउन पीरियड में भी शराब का खुलकर विरोध शुरु कर दिया है। वे घरों की बरबादी और महिलाओं पर हो रही हिंसा के लिये शराब को जिम्मेदार मान रहे हैं। उनका मानना है कि कोरोना महामारी के कारण 45 दिनों तक प्रदेश की शराब दुकानें अचानक बंद करनी पड़ीं। इतनी लंबी अवधि तक शराब नही मिलने के बावजूद प्रदेश में कोई जन हानि नही हुई। बल्कि इसके उलट शराबियों का स्वास्थ्य सुधर गया। उनकी खुराक बढ़ गई। घरेलू हिंसा बंद हो गई। गांव मे लड़ाई-झगड़े बंद हो गए और सुख-शांति का वातावरण बन गया। ऐसे में राजस्व का बहाना कर कर शराब बेचना उचित नहीं है।

वाजपेयी ने तो यह भी मांग की है कि कांग्रेस को खुलासा करना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के एक लाख करोड़ के सालाना बजट में से शराब से मात्र चार हजार करोड़ ही आते हैं। इसमे से 1600 करोड़ की शराब खरीदी जाती है। इसके अलावा आबकारी विभाग और आठ सौ सरकारी शराब की दुकानों पर मोटी रकम खर्च करने के बाद सरकारी खजाने मे कोई विशेष आमदनी जमा नही होती। फिर ऐसा क्या कारण है कि कोरोना महामारी के बीच वो राजस्व का बहाना बनाकर शराब दुकानों पर हजारों की  भीड़ इक_ा कर रही है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर शराब बिक्री का इतना मोह क्यों है। राजनीति और प्रशासन से जुड़े लोग भी मानते हैं कि शराब बिक्री से सरकार को तो भारी भरकम कमाई होती है, साथ ही इससे होने वाली अवैध कमाई भी कई सौ करोड़ में है। यह एक बड़ी वजह है जिसके कारण सरकार किसी भी पार्टी की हो, यह सिलसिला लगातार चल रहा है।

शराब से सरकारी कमाई को कम आंकने वाले थोड़ी और तफ्तीश करेंगे तो पता चलेगा कि शराब से सरकारी खजाने में 3 से साढ़े 3 हजार करोड़ का मुनाफा होता है। निश्चित तौर पर इस बरस यह आंकड़ा और बढ़ सकता है, क्योंकि शराब के दाम में 30 फीसदी की बढ़ोतरी की है। शराब बिक्री में खर्च करीब-करीब उतना ही आना है, जितना पिछले बरस आया था। जानकारी के मुताबिक पिछले साल वेतन भत्ता, बिजली-पानी, किराया, टैक्स तमाम मद में 150-200 करोड़ के बीच खर्च हुआ था। 1350 करोड़ के आसपास की दारु खरीदी गई। जबकि बिक्री पांच हजार तीन सौ करोड़ से अधिक की हुई थी। इस तरह शराब से आमदनी का मोटा अंदाजा लगाया जा सकता है। फिर भी शराब से हो रही बरबादी के आगे इस मुनाफे को न्यूनतम आंका जाना चाहिए।

 

 

 

 

 


06-May-2020

राजधानी में जनता पर नजर रखी जा रही?

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में क्या कोई कंपनी लोगों पर नजर रखने और निगरानी करने की तरकीबें सार्वजनिक जगहों पर लगाने जा रही है? ये सवाल कल तब उठा जब इस अखबार को ऐसा एक गोलमोल प्रेस नोट मिला जिसमें ऐसी जानकारी दी गई थी, और एक कंपनी का नाम भी लिखा हुआ था कि वह शहर में कैमरे और निगरानी उपकरण लगाने जा रही है। कंपनी की ओर से फोन करने वाली महिला से जब पूछा गया कि शहर में ऐसा करने की इजाजत उन्हें सरकार की किस विभाग से मिली है, तो कुछ मशक्कत के बाद उसने यह जानकारी दी कि स्मार्ट सिटी ने उन्हें यह इजाजत दी है। जब इस बारे में स्मार्ट सिटी के एमडी सौरभ कुमार से पूछा गया कि उन्होंने ऐसी किसी कंपनी का नाम भी सुना हुआ नहीं था। उन्होंने साफ-साफ बताया कि किसी भी कंपनी को ऐसा कुछ करने की कोई इजाजत नहीं दी गई है।

अब आज कोरोना की रोकथाम के नाम पर कोई भी सरकार, कोई भी कंपनी लोगों की निजी जिंदगी में ताकझांक करने वाली टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करना राष्ट्रवाद मान रही हैं। केन्द्र सरकार के लाए गए एक आरोग्य-सेतु नाम के मोबाइल ऐप के बारे में कहा गया है कि वह लोगों के कोरोनाग्रस्त होने पर उनके बचाव और उनसे बचाव का काम करेगा। लेकिन इसमें जुटाई जा रही जानकारी को लेकर देश के बहुत से लोगों को आशंका है कि सरकार में बैठे लोग अगर चाहेंगे तो इसे निगरानी और जासूसी के एक औजार और हथियार की तरह भी इस्तेमाल कर सकेंगे। कल ही एक फ्रेंच हैकर ने ट्विटर पर यह पोस्ट किया था कि भारत सरकार के आरोग्य सेतु नाम के मोबाइल ऐप में गंभीर समस्याएं हैं और भारत सरकार जानना चाहती है तो उससे संपर्क करे। आज उसने पोस्ट किया है कि भारत सरकार की ओर से उससे संपर्क किया गया और उसने इस ऐप की कमजोरी की जानकारी दे दी है। अब वह लिख रहा है कि वह इंतजार कर रहा है कि भारत सरकार इस ऐप की मरम्मत कर लेती है तो ठीक है, वरना वह इस कमजोरी को उजागर करेगा।

अब छत्तीसगढ़ की राजधानी में निगरानी रखने वाले ऐसे कैमरों या टेक्नालॉजी या दोनों को लगाने का दावा करने वाली कंपनी ने इस अखबार के मांगने पर कल से आज तक उसे मिली किसी इजाजत का कागज भी नहीं दिखाया है, दूसरी तरफ स्मार्ट सिटी ने उसके दावे का खंडन किया है। वीहांत टेक्नालॉजीज नाम की यह कंपनी कई तरह की निगरानी रखने की तकनीक का दावा तो कर रही है, लेकिन जनता के निजता के अधिकार की निगरानी रखने वाले अखबार के एक साधारण से सवाल के जवाब में उसने चुप्पी साध ली है। अब यह कंपनी और स्मार्ट सिटी प्रा.लि. दोनों तो सच बोलते हो नहीं सकते। राज्य सरकार की पुलिस में साइबर महकमा देखने वाले अफसरों को भी ऐसी किसी कंपनी और ऐसी किसी निगरानी की कोई खबर नहीं है। कुल मिलाकर यह जांच के लायक एक पुख्ता मामला है।

एक तो कोरोना, फिर गर्मी से बेहाल...

वैसे तो लॉकडाउन के बीच सरकारी दफ्तरों में एक तिहाई अधिकारी-कर्मचारियों के साथ कामकाज शुरू हो गया है। मंत्रालय का हाल यह है कि प्रमुख सचिव-सचिव स्तर के ज्यादातर अफसर बंगले से ही काम कर रहे हैं। कुछ अफसर शहर में स्थित अपने विभाग के निगम-मंडल दफ्तरों में बैठकर काम निपटा रहे हैं। मंत्रालय में नहीं बैठने की एक वजह यह भी है कि वहां सेंट्रल एसी को बंद कर दिया गया है। कुछ के कमरे में पंखा जरूर लग गया है, लेकिन गर्मी इतनी है कि वहां काम करना मुश्किल हो गया है।

छोटे अधिकारी-कर्मचारियों का तो और बुरा हाल है। अवर सचिव स्तर के एक अफसर ने इधर-उधर से अपने लिए एक टेबल फैन का जुगाड़ कर लिया था। वे थोड़ी देर हवा ले पाए और किसी काम से सीनियर अफसर के कक्ष में गए। वापस लौटे, तो उनका पंखा गायब था। पंखा उनका अपना तो था नहीं, इसलिए ज्यादा कुछ नहीं कह पाए।   गर्मी के बेहाल कर्मचारियों सीएस से मिलने भी गए और सीएस ने भरोसा दिलाया कि एक हफ्ते के भीतर सभी कक्ष में पंखा लगा दिया जाएगा। तब तक तो कर्मचारी पसीना-पसीना हो रहे हैं।

नींद उड़ा दी है

सरकार के एक दफ्तर में अफरा-तफरी का माहौल है। वजह यह है कि दफ्तर के चपरासी के बेटा का दोस्त कोरोना पीडि़त है। पहले यह खबर उड़ी थी कि चपरासी का बेटा ही कोरोना पीडि़त है। बाद में चपरासी ने वस्तु स्थिति स्पष्ट की, तब कहीं जाकर अफसरों ने चैन की सांस ली, लेकिन आपसी चर्चा में छत्तीसगढ़़ से जुड़ी एक और खबर ने उनकी नींद उड़ा दी है।

छत्तीसगढ़ के चीफ जस्टिस रहे और लोकपाल सदस्य अजय कुमार त्रिपाठी की कोरोना से मौत हो गई। पूर्व चीफ जस्टिस सीधे कोरोना संक्रमित नहीं थे। बल्कि पहले उनका रसोईया कोरोना पीडि़त हुआ। इसके बाद पूर्व चीफ जस्टिस की बेटी कोरोना संक्रमित हो गई और फिर पूर्व चीफ जस्टिस भी इसकी जद में आ गए। कोरोना के तेजी से फैलाव को देखते हुए अफसरों ने चपरासी और उनके बेटे को कोरोना टेस्ट कराने के लिए कहा है। जब तक रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक बैचेन रहना स्वाभाविक है। 


05-May-2020

शराब दुकान या हॉट स्पॉट

लॉकडाउन में शराब बिक्री हॉट टॉपिक है। इस फैसले की चौतरफा चर्चा हो रही है। शराब प्रेमी इसके फायदे बता रहे हैं, तो दूसरा तबका इसकी आलोचना कर रहा है। पक्ष-विपक्ष भी एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं, लेकिन इतना तो तय है कि सरकारें शराब बेचना चाह रही है। उनकी दुविधा यह है कि कोई इसे अपने सिर पर लेना नहीं चाहते। यही वजह है कि राज्य सरकारें केन्द्र का निर्देश बता रही हैं, तो केन्द्र का कहना है कि यह राज्य सरकारों पर निर्भर है। पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने बस खुलकर शराब बिक्री की वकालत की थी। उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ बैठक में इस मुद्दे को उठाया था।

दरअसल पंजाब जैसे राज्य में शराब खुली संस्कृति का हिस्सा है, इसलिए कैप्टन ने सहजता से अपनी बात रख दी, लेकिन छत्तीसगढ़ सहित दूसरे राज्यों में ऐसी स्थिति नहीं है, यहां पंजाब की तरह खुलकर शराब का चलन नहीं है । परंपराओं और संस्कृति से परे फिलहाल मसला कोरोना संक्रमण का है। जिस तरह से शराब दुकानों में भीड़ उमड़ी उससे तो निश्चित तौर पर संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया है। सोशल डिस्टेसिंग को बनाये रखने में छत्तीसगढ़ में ऑनलाइन बिक्री की व्यवस्था की गई है और दिल्ली में 70 फीसदी का टैक्स लगाया जा रहा है। इन दोनों तरीकों से शराब जैसी सामाजिक बुराई से निपट पाना मुश्किल है। क्योंकि गरीब और मजदूर वर्ग में शराब को लेकर समस्या ज्यादा है। वो ऑनलाइन शराब खरीदेगा इसकी संभावना कम ही दिखती है, लिहाजा भीड़ तो रहने ही वाली है। दूसरी तरफ दाम बढ़ाने से भी असर मजदूर वर्ग पर पड़ेगा और शराब नहीं मिलने से वे हिंसा पर उतारु हो सकते हैं। ऐसे स्थिति में उसके दुष्परिणाम ही ज्यादा नजर आ रहे हैं।

इस बीच एक तथ्य यह भी सामने आया है कि लॉकडाउन के पीरियड में बड़ी संख्या में शराब के आदी इससे दूर हुए हैं। मजदूर और गरीब वर्ग में सुख शांति का वातावरण निर्मित हुआ था। ऐसे में यह समय शराबबंदी की तरफ कदम अच्छा फैसला हो सकता है। क्योंकि दुकान खुलते ही शराब बिक्री के आंकड़े बताते हैं कि जो लोग शराब से दूर थे, वे फिर से इसकी ओर लौट गए हैं। अलग अलग स्त्रोतों से जो जानकारी मिल रही है उसमें कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों ने बिक्री के पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सरगुजा जिले के एक आबकारी अधिकारी का दावा है कि उनके जिले में एक दिन में 65 लाख की दारु बिक गई। पूरे प्रदेश में 25 करोड़ की शराब बिक्री की जानकारी मिल रही है।

क्वॉरंटीन में रहने के बजाए

कोरोना संक्रमण के चलते दूसरे राज्यों से आने वाले अफसरों-कर्मियों को 14 दिन तक क्वॉरंटीन में रहना अनिवार्य किया गया है। मगर सरकार के इस निर्देश का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन हो रहा है। सरकार के एक निगम के एमडी दो-तीन पहले ही कोरोना संक्रमण से बुरी तरह प्रभावित राज्य में करीब डेढ़ महीना गुजारने के बाद लौटे हैं। उन्होंने लौटने के बाद क्वॉरंटीन में रहने के बजाए दफ्तर जाना शुरू कर दिया है। वे रोजाना बैठक ले रहे हैं।

सुनते हैं कि अफसर की बैठकों से निगम के बाकी अफसर असहज महसूस कर रहे हैं। वे ज्यादा कुछ नहीं बोल पा रहे हैं।  चर्चा है कि अफसर को अपने तबादले का अंदेशा है। वे प्रतिनियुक्ति पर हैं और उनके विभाग के एक-दो को छोडक़र बाकी अफसर अपने मूल विभाग में जा चुके हैं। ऐसे में अफसर पुराना कोई हिसाब-किताब बाकी नहीं रखना चाह रहे हैं और इन सब वजहों से कोरोना की गाइडलाइन को नजर अंदाज कर ओवरटाईम कर रहे हैं।

पहली बोतल पर सम्मान

महासमुंद से भी एक खबर आई कि वहां की महिलाओं ने शराब की पहली बोतल लेने वाले को माला पहनाकर उसकी फोटो वायरल की। कुल मिलाकर महिलाएं अपने स्तर पर विरोध में उतर गई हैं। एक अलग बात है कि शराबियों पर उसका असर कम ही पड़ा है। वे तो शराब के नशे में सबकुछ भूलकर दारु के जुगाड़ में ही लगे हैं। दुकाने खुलने के पहले ही दिन सोशल मीडिया के जरिए जो रुझान मिल रहे हैं, उससे पता चलता है कि शराब के पक्ष में तरह तरह के दलील पेश कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था इसी से चल रही है तो किसी की दलील है कि शराब से ही विकास संभव है। विकास या बरबादी से बड़ा मुद्दा कोरोना संक्रमण का है, जिसमें सरकार से लेकर आम आदमी की भागीदारी आवश्यक है।

महिलाओं का मोर्चा

ऐसे में साफ है कि लोग शराब का स्टॉक भी कर रहे होंगे। कीमत ज्यादा होने का भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में शराबबंदी का आंदोलन एक फिर जोर पकड़ सकता है, क्योंकि इससे प्रदेश की महिलाएं और बेटियां सर्वाधिक परेशान हैं। घरेलू हिंसा और सडक़ों पर छेड़छाड़ उनकी लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है। जांजगीर चांपा के गांव कापन में तो वहां की महिलाओं ने लॉकडाउन के दौरान ही बड़ी संख्या में इक_ा होकर शराब दुकान के खिलाफ प्रदर्शन किया। उन्होंने वहां शराब दुकान खुलने नहीं दी। लाठी-डंडे और बैनर पोस्टर के साथ इन महिलाओं ने पूरे प्रदेश की महिलाओं को संदेश दिया है। प्रदर्शन के दौरान उन्होंने न केवल सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया, बल्कि मास्क लगाकर सुरक्षित तरीके से अपनी बात शासन तक पहुंचाई। यहां पुलिस के अधिकारियों ने धारा 144 लगे होने का हवाला देकर गिरफ्तारी तक की चेतावनी दी गई, लेकिन महिलाओं ने अपना प्रदर्शन जारी रखा और दुकान नहीं खुलने दी। दूसरी तरफ पूरे प्रदेश ने उन तस्वीरों को भी देखा है जिसमें पुलिस के जवान धारा 144 के बीच शराब बिकवा रहे थे। ऐसे में कामकाज और परिवार को छोडक़र सडक़ों पर उतरीं उन महिलाओं की पीड़ा को समझा जा सकता है कि शराब के कारण उन्हें किस कदर परेशानी है। यही वजह है कि पुलिसिया धमकी भी बेअसर साबित हुई।


04-May-2020

शराब दुकानों की भीड़

छत्तीसगढ़ में 40 दिन के लॉकडाइन के बाद सोमवार से शराब की दुकानें खुलीं। राजधानी रायपुर से लेकर पूरे प्रदेश की तमाम जगहों से शराब दुकानों में भीड़ के नजारे देखने मिल रहे हैं। सुबह दुकान खुलने से पहले ही वहां मदिराप्रेमी इक_ा होने शुरु हो गए थे और थोड़ी ही देर में दुकानों पर कई सौ मीटर की लंबी लंबी कतारें दिखाई देने लगी। वॉकर के सहारे भी चलकर लोग शराब लेने पहुंचे थे, तो कोई अपने साथ परिवार के सदस्यों के साथ लाइन में खड़े थे। कोरोना युग में किसी को इस बात का ध्यान नहीं था कि पर्सनल या सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना है। हालांकि लोग मास्क या गमछा बांधकर जरुर आए थे, लेकिन कोरोना से ज्यादा भय इस बात का था कि कोई पहचान न लें। इस लिहाज से उनके लिए गमछा या मास्क जरुर उपयोगी साबित हुआ। शहर से दूर या गांव के इलाकों में खेत-खलिहान तक में लाइन लगी हुई थी। कुल मिलाकर शराब के लिए लोगों की तड़प का अंदाजा लाइन देखकर लगाया जा सकता था। दूसरी तरफ शराब दुकानों पर मदिराप्रेमियों की भीड़ देखने के लिए मीडिया के लोगों के साथ-साथ आम लोग भी मोबाइल कैमरे के साथ तैनात थे। लिहाजा शराब प्रेमी बचते बचाते शराब लेते दिखाई दिए। उधर, सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म शराब दुकानों के वीडियो और तस्वीरों से भरे पड़े हैं। इसके साथ लोग सरकारों को कोस भी रहे हैं कि ऐसे महामारी के समय में शराब दुकान खुलवाकर अपनी नीयत को जाहिर किया है, लेकिन लोग जानते हैं कि उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने 15 दिन पहले शराब और बीयर बनाने वाली डिस्टलरी को खोलने का आदेश दे दिया था। वहां तो बीजेपी की सरकार है और उसके मुखिया एक योगी हैं। ऐसे में कांग्रेस शासित राज्यों में बीजेपी के लोगों को तो विरोध करने का हक ही नहीं बनता। खैर राजनीति में तो आरोप-प्रत्यारोप एक आम बात है। विपक्षी दल का काम ही है कि सरकार की नीतियों और कामकाज की आलोचना करे। वही दल सत्ता में आता है तो उसका भी आचरण वैसे ही हो जाता है।

स्कूटर सवार सीएस के अफसर

कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए केन्द्र हो या राज्य, हर संभव कोशिश कर रही है। ऐसे मौके पर प्रशासन की भूमिका बेहद अहम रहती है। मगर प्रदेश में एक-दो जिलों में कलेक्टरों का रवैया गैर जिम्मेदाराना रहा है। सुनते हैं कि सीमावर्ती जिले के एक कलेक्टर के खिलाफ तकरीबन रोजाना शिकायत कमिश्नर तक पहुंच रही है। कमिश्नर ने कलेक्टर के गैरजिम्मेदाराना रूख की शिकायत प्रशासनिक मुखिया तक पहुंचाई है। मगर कलेक्टर इससे बेपरवाह हैं। वे आम लोग तो दूर, कुछ सीनियर अफसरों और जनप्रतिनिधियों का भी फोन नहीं उठाते। अक्सर उनका मोबाइल बिजी मोड में रहता है।

एक सीनियर अफसर बताते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान आम लोगों की शिकायतें सुनने की सीख दी जाती रही है। अविभाजित मध्यप्रदेश में तो कलेक्टर सुविधाएं न होने के बावजूद आम लोगों की समस्याओं के निराकरण के लिए इतने तत्पर रहते थे कि वे साइकिल या अन्य दोपहिया वाहन से लोगों के बीच पहुंच जाते थे। खुद मौजूदा सीएस आरपी मंडल भी सडक़-सफाई व्यवस्था देखने के लिए अक्सर स्कूटर से निकल जाते हैं। मगर नए कलेक्टर, सीएस की कार्यप्रणाली से भी कोई प्रेरणा नहीं ले रहे हैं। सीमावर्ती जिले के इस कलेक्टर की हरकत से अब कोरोना के मामले में उनका जिला संवेदनशील होता जा रहा है।

मजदूर भी मंजूर नहीं

छत्तीसगढ़ के जिले-जिले से मनरेगा में मजदूरी देने के जो आंकड़े आ रहे हैं, वे कामयाबी पर हैरान करते हैं. यह राज्य देश में रोजगार देने में अव्वल साबित हो रहा है. जबकि गाँव में हालत यह है कि जगह-जगह लोगों ने सडक़ें काट दी हैं, बाहर के किसी को गाँव में घुसने नहीं दिया जा रहा. प्रधानमंत्री सडक़ योजना के लोगों को जाकर काम नहीं करने दिया जा रहा. किसी ने ठीक ही कहा था कि कोरोना से सावधानी में गाँव आगे हैं, वे अधिक सतर्क हैं. शहरी कॉलोनियों में तो लोग दूसरे शहर से आकर घर घुस जा रहे हैं, लेकिन गाँव में तो आये हुए लोगों को बाहर ही स्कूल जैसी किसी बिल्डिंग में ठहरा दिया जा रहा है. सरकारी रोजगार के कामों में इस वजह से भी दिक्कत आ रही है।


03-May-2020

एलके जोशी की यादें...

कोई अफसर वैसे तो अपने राजनीतिक मुखिया के बढ़ाए किसी महत्वपूर्ण समझी जाने वाली कुर्सी पर पहुंचते हैं, लेकिन वहां पहुंच जाने के बाद वे अपने राजनीतिक-मुखिया को चढ़ाने या गिराने के काफी हद तक जिम्मेदार रहते हैं। कोई सत्तारूढ़ नेता उतने ही कामयाब हो सकते हैं जितने अच्छे अफसर वे अपने आसपास रखते हैं। कल दिल्ली में जब अविभाजित मध्यप्रदेश के एक रिटायर्ड आईएएस एलके जोशी गुजरे तो लोगों को याद आया कि वे मोतीलाल वोरा के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके जनसंपर्क सचिव थे, और फिर जब मोतीलाल वोरा उत्तरप्रदेश के राज्यपाल बने, तब भी उन्होंने एलके जोशी को साथ राजभवन ले जाने की समझदारी दिखाई थी। नतीजा यह था कि वोराजी की कामयाबी से बढक़र उनकी शोहरत होती चली गई। ऐसा नहीं कि वे काबिल नहीं थे, लेकिन बहुत से लोग काबिल रहते हुए भी जनता तक अपनी खूबी नहीं पहुंचा पाते, और एलके जोशी ने इस मामले में वोराजी के लिए खूब काम किया था।

एमपी-छत्तीसगढ़ के ही एक दूसरे अफसर सुनिल कुमार को देखें, तो वे वोराजी के वक्त उनका जनसंपर्क देख चुके थे, अर्जुन सिंह के वक्त वे उनके साथ दो-दो बार दिल्ली में रहे, और उनके सबसे काबिल और पसंदीदा अफसर थे। छत्तीसगढ़ राज्य बना तो वे अजीत जोगी के सचिव भी रहे, जनसंपर्क सचिव भी रहे, और इस राज्य को खड़ा करने में वे बुनियाद के एक बड़े पत्थर रहे। भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह लगातार सुनिल कुमार को दिल्ली से वापिस बुलाने में लगे रहे, और आखिर में जब वे लौटे, तो उनको मुख्य सचिव भी बनाया, और रिटायर होने के बाद दिल्ली से बुलाकर योजना मंडल उपाध्यक्ष बनाया, साथ में अपना सलाहकार भी बनाया।

कल एलके जोशी के गुजरने की खबर आने के बाद छत्तीसगढ़ में बसे कुछ रिटायर्ड बड़े अफसरों ने फोन करके इन सब बातों को याद किया, और कहा कि उन्होंने वोराजी को भोपाल से लेकर लखनऊ तक, उनके कद से खासा अधिक बड़ा पेश किया। लेकिन पहली खूबी तो वोराजी की ही थी जो कि उन्होंने एक काबिल व्यक्ति को छांटा था। जोशी की बहुत सी यादें लोगों के पास हैं, जो कि बाकी अफसरों के लिए एक मिसाल भी हो सकती हैं।

एक काबिल अफसर का निलंबन खत्म

आखिरकार भारतीय वनसेवा के अफसर एसएस बजाज का निलंबन खत्म हो गया। उनकी जल्द ही पोस्टिंग भी हो जाएगी। बजाज को नवा रायपुर के पौंता चेरिया में नई राजधानी के शिलान्यास स्थल को आईआईएम को देने के पुराने प्रकरण पर निलंबित कर दिया गया था। हालांकि बजाज की सीधे कोई भूमिका नहीं थी। जमीन देने का फैसला एनआरडीए बोर्ड का था, और इसके चेयरमैन तत्कालीन मुख्य सचिव पी जॉय उम्मेन थे। खैर, बजाज की साख अच्छी रही है और यही वजह है कि आईएफएस अफसर उनकी बहाली के लिए लगातार प्रयासरत थे।

बजाज के इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों के साथी कांग्रेस के संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेष नितिन त्रिवेदी ने भी सीएम से मिलकर बजाज की बहाली के लिए गुजारिश की थी। नियमानुसार आईएफएस अफसर को राज्य सरकार एक माह के लिए निलंबित कर सकती है, लेकिन बाद में विधिवत केन्द्र से अनुमति लेनी पड़ती है। केन्द्र ने निलंबन को लेकर कुछ बिंदुओं पर जवाब भी मांगा था। मगर राज्य ने निलंबन आगे बढ़ाने में कोई रूचि नहीं दिखाई। इसके बाद बजाज का निलंबन स्वमेव खत्म हो गया। सरकार भी अब उनकी योग्यता और अनुभव का पूरा लाभ लेना चाह रही है। वैसे अभी भी विभाग से जुड़े तमाम विषयों पर उनसे काम लिया जा रहा है। मगर उनके पास कोई प्रभार नहीं है, लेकिन जल्द ही उनको काम मिलने के संकेत हैं।


02-May-2020

बृजमोहन के विरोध का राज

पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का शुक्रवार को जन्मदिन था। वैसे तो हर साल बृजमोहन के जन्मदिन पर प्रदेशभर में जलसा होता है। मगर इस बार कोरोना प्रकोप के चलते बृजमोहन ने जन्मदिन नहीं मनाने का निर्णय लिया था। वे होम आइसोलेशन में हैं। और उन्होंने अपने समर्थकों को हिदायत भी दी थी कि वे घर न आएं, लेकिन तमाम हिदायतों के बाद भी बड़ी संख्या में समर्थक बंगले में जुट गए। बस फिर क्या था कांग्रेस प्रवक्ता विकास तिवारी को मौका मिल गया और उन्होंने रेड जोन में होने के बाद भी मंत्री समर्थकों द्वारा लॉकडाउन का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया में जमकर खिंचाई की।

विकास तिवारी पिछले कुछ समय से बृजमोहन के खिलाफ आक्रामक अभियान चला रहे हैं। आमतौर पर कांग्रेस के लोग बृजमोहन के खिलाफ कुछ बोलने से बचते हैं। वजह यह है कि पिछले 15 सालों में सरकार में रहते हुए बृजमोहन ने कांग्रेसी मित्रों का पूरा ख्याल रखा और उनकी निजी जरूरतों को हर संभव पूरा करने की कोशिश की। हालांकि विकास तिवारी भी भाषा पर संयम रखते हुए बृजमोहन के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। वैसे उनका यह अभियान पार्टी से परे, कुछ निजी भी है।

 सुनते हैं कि ब्राम्हणपारा वार्ड में विकास की पत्नी चुनाव मैदान में थी। विकास की पत्नी की जीत सुनिश्चित लग रही थी, तभी बृजमोहन की ब्राम्हणपारा वार्ड में इंट्री हुई और भाजपा की बागी पूर्व पार्षद प्रेम बिरनानी की पत्नी ने अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में नाम वापस ले लिया। बृजमोहन ने यहां रोड शो और डोर-टू-डोर प्रचार किया। इन सबके चलते विकास की पत्नी चुनाव जीतने से रह गईं। चूंकि बृजमोहन ने यहां अतिरिक्त मेहनत कर दी है, तो विकास भी उनके खिलाफ दिन-रात एक कर रहे हैं।लेकिन एक बात और है, राजधानी रायपुर में कांग्रेस के हर नौजवान की हसरत रहती है कि पार्टी उसे बृजमोहन के खिलाफ चुनाव लडऩे का मौका दे. यही हसरत लिए हुए कई नौजवान बूढ़े भी हो गए. इसलिए भी कई कांग्रेसी बृजमोहन के मुकाबले खुद को पेश करने में लगे रहते हैं. चुनाव के वक्त सुना है कि यह बड़े फायदे का भी होता है।

कोटा के बच्चों को प्राथमिकता का कोटा !

राजस्थान के कोटा से हजारों बच्चों को छत्तीसगढ़ सरकार तो लेकर आ गयी, लेकिन समाज के बहुत से तबकों ने सवाल उठाये कि वे वहां पढ़ाई तो नहीं कर रहे थे, वे तो आगे के बड़े कॉलेजों में दाखिले के मुकाबले के लिए कोचिंग ले रहे थे. इस कोचिंग की फीस और वहां रहने का खर्च ही कम से कम लाख रूपये सालाना होता है. ऐसे में सरकार क्यों उनको लाने का खर्च करे? सरकार के लोगों का कहना है कि करीब सौ बसों को हजार किलोमीटर भेजना, वापिस लाना, पुलिस और स्वास्थ्य कर्मचारियों को साथ भेजना, रास्ते के खाने का इंतजाम, और अब 14 दिनों के क्वॉरंटीन का खर्च, कोटा पर राज्य सरकार का एक करोड़ से अधिक का खर्च आ रहा है।

अब लोगों का यह कहना है कि जो मां-बाप लाख रूपए सालाना या और अधिक खर्च करके बच्चों को कोटा में कोचिंग दिला रहे हैं, उन्हें खुद होकर सरकार को यह लागत चुकानी चाहिए। लेकिन अब तक खबरों में हजारों मां-बाप में तो दो-चार की भी मुख्यमंत्री राहत कोष में कोई रकम देने की खबर भी नहीं आई है। सरकारी खजाना तो सभी का होता है, और छत्तीसगढ़ की गरीब आबादी का हक उस पर अधिक है, ऐसे में लोगों को लग रहा है कि गरीब के हक की रकम संपन्न बच्चों पर खर्च की गई, और ये बच्चे कोटा की कोचिंग से लौटकर दूसरे गरीब बच्चों को इन्ट्रेंस एग्जाम में पीछे छोड़ेंगे। लेकिन सरकार का काम इसी तरह चलता है, और उसमें राजनीतिक-न्याय अधिक होता है, सामाजिक-आर्थिक न्याय कम। अब अगर कोटा में पढ़ रहे कुछ हजार बच्चों के समाज में बेहतर हालत वाले मां-बाप की तरह प्रवासी मजदूरों के लिए कहने वाले भी कुछ वजनदार लोग होते तो हो सकता है कि पहली बारी उन लोगों की आती जो कि सडक़ किनारे, बेघर, बेसहारा, बेरोजगार पड़े हुए हैं। अब जब ट्रेन से मजदूरों को उनके इलाकों में पहुंचाने की बात शुरू हुई है, तो केन्द्र और राज्यों के बीच यह बहस भी चल रही है कि ट्रेन का खर्च कौन उठाए। केन्द्र सरकार अगर राज्यों को उसके मजदूरों को पहुंचाने का बिल वसूलने का सोच रही है, तो यह बहुत ही शर्मिंदगी की बात होगी। इस बीच छत्तीसगढ़ में जहां कोटा से लौटे हुए बच्चों को रखा गया है, वे खाना खराब मिलने की शिकायत कर रहे हैं, कई बच्चे और उनके मां-बाप कमरों के एसी न होने की बात कह रहे हैं, कुछ का कहना है कि उन्हें पश्चिमी शैली का शौचालय ही लगता है, और अधिकतर बच्चों ने गद्दे नापसंद कर दिया है। सडक़ किनारे मजदूर इनमें से किसी बात की शिकायत नहीं कर रहे, क्योंकि इनमें से खाना छोड़ उन्हें और कुछ भी नहीं मिल रहा है, और खाने के बारे में अधिकतर जगहों का यह कहना है कि दिन में एक वक्त मिल जाए तो भी बहुत है, और उससे एक वक्त का पेट भी भर पाए तो भी बहुत है। कोटा न हुआ, प्राथमिकता का कोटा हो गया। ऐसे तमाम बच्चों के मां-बाप मुख्यमंत्री राहत कोष में कम से कम 25-25 हजार रूपए तो दें। सरकार तो इन बच्चों के साथ कोटा में अगर मां-बाप भी रह रहे थे, तो उनको भी साथ लेकर आई है, और उनको भी क्वॉरंटीन में ठहराया है।

अकेले भूपेश मैदान में ?

केन्द्र सरकार ने लॉकडाऊन-3 शुरू करते हुए जो निर्देश जारी किए हैं, उनमें 65 बरस से अधिक और 10 बरस से कम उम्र के लोगों को घर से बाहर न निकलने की कड़ी सलाह दी गई है। कहा गया है कि केवल मेडिकल जरूरत पर ही वे बाहर निकलें। अब छत्तीसगढ़ सरकार में एक दिलचस्प तस्वीर बन रही है। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत, स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव, और गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू सभी 65 बरस से अधिक के बताए जा रहे हैं, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इन सबके बीच अकेले हैं जिनका यह पूरा कार्यकाल भी उन्हें 65 तक नहीं पहुंचाएगा। सरकार में ऊंचे ओहदे पर बैठे एक आदमी ने मजाक किया, भूपेश मोदी सरकार के चाहे कितना टकराव मोल लेते हों, मोदी सरकार ने राज्य में अकेले उन्हीं को काम करने का मौका दिया है, बाकी सभी को घर बैठना है।  


01-May-2020

मॉक ड्रिल किससे पूछकर?

कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए धमतरी जिला प्रशासन की मॉकड्रिल विवादों में घिर गई है। इस मॉकड्रिल के चलते बुधवार करीब 4 घंटे तक पूरे धमतरी शहर में तनाव का माहौल रहा। बाद में प्रशासन ने जब वस्तु स्थिति स्पष्ट की, तब कहीं जाकर लोगों ने राहत की सांस ली। भाजपा सांसद सुनील सोनी ने इस मॉकड्रिल पर कड़ी आपत्ति जताई है और उन्होंने सीधे-सीधे प्रशासन को अपने इस कृत्य के लिए एम्स प्रबंधन और स्वास्थ्य टीम से माफी मांगने तक की सलाह दे डाली।

धमतरी में न तो कोरोना इलाज की सुविधा है और न ही जांच के लिए कोई लैब तैयार है। ऐसे में कोरोना से बचाव के लिए जनजागरूकता अभियान चलाने के बजाए मॉकड्रिल के नाम पर भय का वातावरण बनाने की कड़ी आलोचना हो रही है। सुनते हैं कि धमतरी कलेक्टर ने मॉकड्रिल से पहले प्रभारी मंत्री से चर्चा तक नहीं की थी, लेकिन भाजपा के एक पूर्व मंत्री को विश्वास में लिया था और अपनी सारी योजनाओं  से अवगत कराया था। पूर्व मंत्री ने तो मॉकड्रिल से असहमत होने के बाद भी कलेक्टर का साथ देते हुए खामोशी ओढ़ ली, लेकिन भाजपा के बाकी नेता कलेक्टर पर पिल पड़े हैं। अब चाहकर भी पूर्व मंत्री, कलेक्टर का बचाव भी नहीं कर पा रहे हैं।

सुब्रमण्यिम के रहने का फायदा मजदूरों को

जम्मू-कश्मीर में दो सौ से ज्यादा 36गढ़ी मजदूर फंसे हैं। मगर प्रशासन उनकी अच्छी तरह देखभाल कर रहा है, और मजदूर भी मोटे तौर पर प्रशासनिक व्यवस्था से खुश हैं। यह सब इसलिए भी हो पा रहा है कि जम्मू-कश्मीर के चीफ सेक्रेटरी बीवीआर सुब्रमण्यिम हैं, जो छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर हैं। सुब्रमण्यिम छत्तीसगढ़ में एसीएस (गृह) के पद पर काम कर चुके हैं।

सुनते हैं कि सुब्रमण्यिम ने व्यक्तिगत रूचि लेकर 36गढ़ी मजदूरों को राहत दिलवाई है। सुब्रमण्यिम को लेकर एक बुरी चर्चा यह भी है कि वे ज्यादातर अफसरों का फोन तक नहीं उठाते हैं। अलबत्ता, श्रम सचिव सोनमणी बोरा की सुब्रमण्यिम से फोन पर बातचीत हो जाती है। इसकी एक वजह यह भी है कि बोरा जब आईएएस ट्रेनिंग एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहे थे, तब सुब्रमण्यिम उनकी क्लास लेते थे। तब से उनका परिचय है। इसका फायदा भी छत्तीसगढ़ को मिल रहा है।


29-Apr-2020

पहुंच और किस्मत का धनी अफसर

सरकार किसी की भी हो, लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे जुगाड़ू होते हैं कि उनकी हमेशा तूती बोलती है। कई बार तो ऐसी स्थिति आ जाती है जब बड़े अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी जुगाड़ुओं का कुछ नहीं बिगाड़ पाते और वे अपनी मनचाही जगह पर जमे रहते हैं। ऐसे ही बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में पदस्थ सहायक खाद्य अधिकारी अनिल जोशी हैं, जिनकी सेटिंग और पहुंच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विधायक-कलेक्टर तक उसको ट्रांसफर के बाद रिलीव नहीं करा पा रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि वो कोई बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, बल्कि इस अफसर का तबादला ही शिकायतों के आधार पर हुआ था। बताते हैं कि इस सहायक खाद्य अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं। जिले के एक पूर्व कलेक्टर ने तो उनके खिलाफ बकायदा गोपनीय जांच करवाई थी और रिपोर्ट सरकार को भेजी थी। जिसमें उन्होंने लिखा था कि उक्त अधिकारी चोरी-छुपे राइस मिल संचालित कर रहा है और विभाग के काम में बेवजह दखलंदाजी करता है। उसे फील्ड से हटाकर ऑफिस में अटैच भी किया गया। कलेक्टर की चि_ी के बाद शासन स्तर पर उसका तबादला कर दिया गया था। सालभर से ज्यादा समय बीत गया है. लेकिन वो रिलीव नहीं किए गए हैं। 

कलेक्टर के इतने कड़े पत्र और शासन स्तर पर ट्रांसफर के बाद भी उसका उसी जिले में जमे रहना बड़े अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को चिढ़ाने के लिए पर्याप्त है। उसके खिलाफ जांच में पाया गया कि वह मुख्यालय के बजाए राजधानी में रहता है। तबादला आदेश की तामीली के लिए स्थानीय विधायक ने भी शासन-प्रशासन से पत्राचार और शिकायतें की, लेकिन इस अधिकारी की सेटिंग की दाद देनी पड़ेगी कि उसका बाल भी बांका नहीं हो पाया है। इस मामले में समाचार पत्रों और टीवी में भी खूब खबरें प्रसारित हुई। इसका भी आज तक कुछ असर नहीं हुआ। कई बार तो ऐसे मौके भी आए जब इस अधिकारी की ओर से दूसरे उच्च और समकक्ष अधिकारियों ने मीडिया से लेकर जनप्रतिनिधियों के समक्ष पैरवी की। विधानसभा तक में उसके खिलाफ सवाल लगाए गए। मीडिया के सवाल और जनप्रतिनिधि के दबाव में मंत्री जी ने भी 15 दिनों के भीतर ट्रांसफर करने का ऐलान कर दिया था। लेकिन अभी तक उसका कुछ नहीं हुआ और वह स्थानीय अनाज व्यापारियों और राइस मिलर्स की नाक में दम किए हुए है। 

इस अधिकारी के ग्रह नक्षत्र भी उसका भरपूर साथ देते हैं। जैसे ही कार्रवाई की बात जोर पकड़ती है। कुछ ना कुछ जरुरी कामकाज का रोडा अटक जाता है। पिछले दिनों उसका तबादला इसलिए रुक गया था कि धान खरीद का सीजन चल रहा था और किसान सीधे खाद्य विभाग के जुड़े रहते हैं। धान खरीद निपटा तो कोरोना आ गया। इस समय भी राशन वितरण से लेकर तमाम काम खाद्य विभाग के जरिए संचालित हो रहे हैं। ऐसे में ट्रांसफर से कामकाज प्रभावित होने की आशंका से पेंच फंस गया। इस जिले में राइस मिल की कस्टम मिलिंग के चावल में भी करोड़ों की फेरा-फेरी उजागर हुई थी। करोडों रुपए का चावल जमा नहीं किए जाने के कारण एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी और खाद्य अफसरों की भूमिका पर सवाल उठे थे। कुल मिलाकर जुगाड़ के साथ-साथ इस अधिकारी की किस्मत भी बुलंद है। जैसे ही कार्रवाई होने की उम्मीद दिखती है, कोई न कोई जुगाड़ फिट हो जाता है और कार्रवाई रुक जाती है। उक्त खाद्य अफसर बड़े-बड़ों को तू डाल-डाल तो मैं पात-पात की तर्ज पर चकमा दे रहा है।

सेवा के बहाने खुद को स्थापित
पीएम केयर में चंदा जुटाने के लिए भाजपा में किचकिच चल रही है। पार्टी के कई इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी के गृह जिले कांकेर का हाल यह है कि उन्होंने अलग-अलग समाज के प्रमुखों से पीएम केयर में दान देने की अपील की थी। मगर जिले में प्रभावशाली क्षत्रिय समाज के लोगों ने पीएम केयर के बजाए सीएम कोष में दान दे दिया। जबकि इस समाज के मुखिया महावीर सिंह राठौर हैं, जो कि भाजपा के सीनियर नेता हैं।

राठौर की प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी से नहीं जमती है। ऐसे में उसेंडी की बात मानना उनके लिए जरूरी भी नहीं था। यही नहीं, पार्टी के एक बड़े नेता को पीएम केयर में धन जुटाने का अहम दायित्व सौंपा गया है। मगर नेताजी के बेटे ने खुद एनजीओ का गठन किया और अलग-अलग जगहों से राशि जुटाकर पीपीई किट और अन्य सामग्री बांटना शुरू कर दिया। नेता पुत्र की निगाह अगले विधानसभा चुनाव पर है और वे इसके लिए अभी से तैयारी कर रहे हैं। सेवा के बहाने खुद को स्थापित करने का अच्छा मौका है, वे चूकना नहीं चाहते हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


28-Apr-2020

जिम्मेदारी से बाहर जाकर काम..

छत्तीसगढ़ के दो अफसर अपनी सीधी जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर जिस तरह सोशल मीडिया पर लोगों की मदद करते दिख रहे हैं, वह उन्हें बाकी लोगों से अलग कर रहा है. जिलों के कलेक्टर या एसपी का तो कई किस्म का जिम्मा भी बनता है, लेकिन बिलासपुर के आईजी दीपांशु काबरा , और राजभवन के सचिव, श्रम सचिव सोनमणि बोरा एक-एक ट्वीट देखते ही उस दिक्कत को सुलझाने में लग जाते हैं. सरकारी इंतजाम में ट्विटर पर जवाब देने के बाद भी बहुत से फ़ोन करने पड़ते हैं, तब कहीं जाकर कोई काम हो पता है. लेकिन ट्विटर पर दीपांशु और सोनमणि जिस तरह लगे हुए हैं, वह देखने लायक है. वे न सिर्फ मदद का वायदा कर रहे हैं, बल्कि काम हो जाने पर उसकी जानकारी भी पोस्ट कर रहे हैं. अफसरों का ऐसा उत्साह भी सरकार की छवि बनाता है, लोगों की मदद तो करता ही है।

सोनमणि बोरा को इस अखबार को मिली एक तकलीफ भेजी गयी. किसी ने पुणे से फ़ोन करके 'छत्तीसगढ़Ó अख़बार को बताया था कि वे छत्तीसगढ़ के हैं, पुणे में फंसे हैं, और काने को भी नहीं है. सोनमणि बोरा ने कुछ घंटों के भीतर ही जवाब भेजा- श्रमिक पुणे में केमिकल कंपनी पोस्ट विंस प्रोसेसर में कार्यरत है. श्रमिक से बात किया गया।  प्रारम्भ में उन्होंने भोजन कोई नहीं पहुंचा रहा है ऐसी शिकायत की थी.  इनसे सुपरवाइज का नंबर 7385------- लिया गया उनसे संपर्क करने पर उन्होंने बताया कि 12 अप्रैल को ही श्रमिकों को भुगतान हुआ है और आवेदक जीवन लाल को 12000 रुपये भुगतान किया गया है , इस संबंध में फैक्ट्री मालिक श्री जाधव जी 9881----- से भी संपर्क किया गया उनके द्वारा भी यही जानकरी दी गई। साथ ही नजदीक के राशन दुकान में सामान देने को कह दिया गया है बताया गया, पुष्टि के लिए पुन: श्रमिक से संपर्क किया गया और श्रमिक ने भी स्वीकार किया कि 12000 रुपये 11 य 12 अप्रैल को प्राप्त हुए है. श्रमिक का कहना है कि मैं अकेले पड़ गया हूं इसलिये डर लग रहा है घर वापस जाना चाहता हूँ. उन्हें लॉक डाउन तक घर पर ही सुरक्षित रहने की सलाह दी गई।

बेवजह की बदनामी
सियासी मामले-मुकदमे आखिर में अदालतों तक ही पहुंचते हैं। पत्रकार अर्नब गोस्वामी के खिलाफ तीन राज्यों में दर्ज एफआईआर की सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट में हुई। यह मामला भी सियासी आरोप-प्रत्यारोप का ही है। सभी राज्यों से अलग छत्तीसगढ़ में अर्नब गोस्वामी के खिलाफ रायपुर से लेकर सुकमा तक 101 एफआईआर दर्ज कराई गई थी। सुनवाई से कुछ देर पहले तक पुलिस लिखा पढ़ी करती रही। ऐन वक्त पर पत्रकार को हाजिर होने के लिए नोटिस जारी किया गया। खैर ये तो कानूनी प्रक्रिया है, जिसके तहत कार्रवाई की जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि मामले मुकदमे दर्ज करने से लेकर नोटिस जारी करने तक कानून की किताबें तो जरुर खंगाली जाती होंगी, लेकिन जिरह के दौरान जिस तरह से कोर्ट ने पाया कि एक साथ 101 एफआईआई का कोई औचित्य नहीं है और इसे विधि सम्मत नहीं माना जा सकता, ऐसी स्थिति में राज्य के कानून विशेषज्ञों और सलाहकारों पर सवाल उठना लाजिमी है।  

सभी जानते हैं कि अदालतों में छोटी सी गलती और सियासी नफा-नुकसान के लिए उठाए गए कदमों का बड़ा संदेश जाता है, क्योंकि अदालतों में सुनवाई तथ्यों और सबूत के आधार पर होती है। ऐसे में बारीक से बारीक बिन्दु का अध्ययन जरुरी है। वरना कोर्ट की फटकार भी लग सकती है। फटकार न भी मिले तो दूसरे पक्ष को राहत मिलना भी बड़ी बात होती है। इस केस में भी कानून विशेषज्ञ इस बात से दुखी है कि केवल सियासी और प्रशासनिक सलाह पर कोर्ट कचहरी की कार्रवाई नहीं चलती। उनका मानना है कि अदालती नतीजा अगर पक्ष में है तो कोई बात नहीं, लेकिन खिलाफ में है, तो सभी कानून के जानकारों की भूमिका पर सवाल उठाते हैं। पहले ही छत्तीसगढ़ के कई कानूनी मामलों में पक्ष में फैसला नहीं आने से सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में इस मामले में भी कमजोर कानूनी तैयारी ने एक बार कानूनी सलाहकारों को कटघरे में ला दिया है। वे इसी बात से परेशान हैं कि बेवजह की बदनामी उन्हें मिल रही है। 

कांग्रेस पार्टी में दिल्ली के स्तर पर ऑपरेशन-अर्नब को नामी वकील और कांग्रेस राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा देख रहे थे. वहीं से एक ड्राफ्ट बनकर आया कि पार्टी जगह-जगह ऐसी पुलिस-रिपोर्ट करवाए. अंग्रेज़ी से हिंदी किया गया और पार्टी के हुक्म को पूरा किया गया. पहले भी बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस-रिपोर्ट की ऐसी कार्पेट-बॉम्बिंग के खिलाफ राहत दी हुई है. अर्नब गोस्वामी को तुरंत राहत मिल गयी. जब कई प्रदेशों में एक सरीखी रिपोर्ट दजऱ् होती है, तो सुप्रीम कोर्ट को भी अभियान समझ आ जाता है. कुल मिलकर देश भर में कांग्रेस के खिलाफ ही माहौल बन गया. यह एक अलग बात है कि इसी दौर में छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंहदेव भी मौके पे चौका लगाने रिपोर्ट लिखने थाने पहुँच गए, जो कि कई लोगों का मानना है कि एक मंत्री को नहीं करना चाहिए था। 

दिग्गजों के चक्कर में नेता प्रतिपक्ष नहीं... 
चार महीने बाद भी भाजपा रायपुर नगर निगम में पार्षद दल का नेता नहीं तय कर पाई है। जबकि प्रदेश के अन्य निकायों में चुनाव के थोड़े दिनों बाद ही पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष का नाम घोषित कर दिया था। रायपुर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष के लिए अभी तक किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई है। 

सुनते हैं कि सांसद सुनील सोनी और पूर्व मंत्री राजेश मूणत अपने करीबी पार्षद को नेता प्रतिपक्ष बनाना चाहते हैं। दोनों ही अड़ गए हैं। यही वजह है कि नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी अब तक खाली है। चर्चा है कि  सुनील सोनी, सीनियर पार्षद सूर्यकांत राठौर को नेता प्रतिपक्ष बनाने के पक्ष में हैं, तो राजेश मूणत, पार्षद मीनल चौबे को पार्षद दल का मुखिया बनाना चाहते हैं। 

पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने अब तक किसी का नाम नहीं लिया है, लेकिन कहा जा रहा है कि वे भी सूर्यकांत राठौर को नेता प्रतिपक्ष बनाने के पक्ष में हैं। पार्षद दल का नेता नहीं चुने जाने से भाजपा निगम के भीतर विपक्ष की भूमिका अदा नहीं कर पा रही है। कोरोना संक्रमण के चलते रायपुर शहर में लॉकडाउन है, तो अब पीलिया का कहर टूट पड़ा है। भाजपा के कई पार्षदों का हाल यह है कि वे अपने वार्ड में जरूरतमंद लोगों को राशन और अन्य जरूरत की सामग्री उपलब्ध कराने के लिए कांग्रेस के नेताओं के आगे-पीछे हो रहे हैं। पीलिया से करीब 5 हजार लोग पीडि़त हैं। इतना सब होते हुए भी भाजपा पार्षदों ने खामोशी ओढ़ ली है। अब नेता ही नहीं तो लड़ाई-झगड़े का सवाल ही नहीं है।

पीडब्ल्यूडी में फेरबदल के मायने 
आखिरकार पीडब्ल्यूडी में बहुप्रतीक्षित फेरबदल हो ही गया। डीके अग्रवाल की जगह विजय कुमार भतप्रहरी को ईएनसी का प्रभार सौंपा गया। सुनते हैं कि अग्रवाल को हटाने के लिए सालभर पहले ही नोटशीट चल गई थी। भतप्रहरी को अग्रिम बधाई देने वालों का तांता लग गया था। मगर नोटशीट अटक गई थी। इससे परे अग्रवाल निर्विवाद रहे हैं। उनकी साख भी अच्छी रही है। ऐसे में उन्हें हटाने का फैसला आसान नहीं था। लेकिन स्काईवॉक से लेकर एक्सप्रेस-वे में अनियमितता आदि को लेकर अग्रवाल पर भी छींटे पड़ रहे थे। उन पर कामकाज में नियंत्रण न होने का आरोप लग रहा था। 

इन सबके बीच में कुछ दिन पहले एक युवा नेता ने उनके खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा ईओडब्ल्यू को सौंपा था। ऐसे में संकेत मिलने लग गए थे कि देर-सवेर अग्रवाल की बिदाई हो सकती है। ठेकेदारों ने भी इसके लिए जमकर मेहनत भी की थी। ऐसे में सोमवार देर रात को विधिवत आदेश निकला, तो किसी को हैरानी नहीं हुई। खाद्यमंत्री अमरजीत भगत के करीबी एमएल उरांव एसई, सेतु मंडल को अंबिकापुर प्रभारी चीफ इंजीनियर का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया है। उरांव की पदस्थापना से टीएस सिंहदेव के गढ़ में अमरजीत भगत का दबदबा बढ़ा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


27-Apr-2020

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : ऑनलाइन विधानसभा, सम्भावना और आशंका 

ऑनलाइन विधानसभा, सम्भावना और आशंका 

छत्तीसगढ़ विधानसभा के लम्बे समय तक सचिव रहे, और अब भोपाल जा बसे देवेंद्र वर्मा ने एक नया सवाल खड़ा किया है. उन्होंने कल फेसबुक पर लिखा- हमारे देश में कोरोना की वजह से विगत दिनों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों की विधानसभाएं बिना कार्य सम्पादित किये अथवा आपाधापी में बिना चर्चा के एक दिन में चौदह चौदह विधेयक पारित कर स्थगित की गयी. लोकसभा की भी पचास से अधिक् विभिन्न समितियों की बैठकें जो अप्रैल एवं मई माह में प्रस्तावित थी स्थगित कर दी गयी. ऐसी स्थिति में लोकसभा, विधानसभा की वर्चुअल बैठकें शीघ्र आरंभ होना समय की मांग है जिसका श्री गणेश ब्रिटेन में हो चुका है और वहां 21 अप्रैल को संसद की वर्चुअल बैठक भी सम्पादित हुई।

अब अगर उनकी सलाह के मुताबिक छत्तीसगढ़ विधानसभा की अगर ऑनलाइन बैठक होती है तो क्या होगा? एक तो सरकार इस बात को पसंद नहीं करेगी कि कोरोना-मुसीबत से जूझते हुए उसके सर पर विपक्ष भी सवार हो जाये जिसके जिम्मे इस राज्य में तो कुछ है नहीं. दूसरी तरफ दो दिन पहले राजस्थान हिघ्कोर्ट में जैसा हुआ, वैसा भी हो सकता है. वहां वीडियो कांफ्रेंस पर चल रही सुनवाई के दौरान एक वकील साहेब बनियान पहने ही कैमरे के सामने आ गए. जज खफा हो गए, और पेशी बढ़ा दी. अब पता लगेगा कि छत्तीसगढ़ के कोई विधायक गमछे में ही ऑनलाइन विधानसभा में पहुँच गए. वैसे आज देश के हर राज्य के सामने यह रिकॉर्ड बनाने का मौका है कि वहां की विधानसभा ऑनलाइन होने वाली पहली विधानसभा रही।

राधाबाई की रामकोठी काम आई 

छत्तीसगढ़ परंपराओं और रीति-रिवाजों के मामलों में काफी धनी माना जाता है। यहां अच्छे-बुरे सभी तरह की परिस्थितियों के लिए कुछ ना कुछ परंपरा प्रचलित है। खुशी और गम दोनों तरह के वक्त के लिए यहां लोग व्यवस्था रखते हैं। राज्य में नई सरकार बनने के बाद पिछले एक डेढ़ बरस से तीज-त्यौहार और परंपराएं प्रचलित भी हुई हैं। बात चाहे तीजा पोला की हो या फिर पुन्नी मेला की। इनको काफी धूमधाम से मनाया गया। सूबे के मुखिया भूपेश बघेल ने खुद सभी त्यौहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सभी को याद होगा कि भूपेश बघेल छेरछेरा पुन्नी के दिन खुद सड़क पर निकलकर लोगों से दान लिया था। मान्यता है कि इस दिन दान पुण्य करने से सुख समृद्धि बढ़ती है। दरअसल, छत्तीसगढ़ में मान्यता है कि प्रत्येत किसान अपने घर में रामकोठी रखते हैं। इसमें धान की आमदनी या पैदावार का कुछ हिस्सा रखा जाता है। जोकि आड़े वक्त में काम आता है। यह भी मान्यता है कि रामकोठी कभी खाली नहीं होता। घर में कोई शुभ कार्य के लिए इसी रामकोठी की बचत का उपयोग किया जाता है। इतना ही नहीं परिवार या गांव में सामाजिक कार्य हो या आपदा की स्थिति हो तो हर घर से रामकोठी के अनाज का उपयोग किया जाता है। मुख्यमंत्री ने छेराछेरा मांगते समय रामकोठी का स्मरण कराया था, तब से रामकोठी एक बार चर्चा में था और लोग अपने पुरखों की परंपरा को बनाए रखने रामकोठी में अनाज या बचत का हिस्सा रखते हैं। आज जब पूरा विश्व कोरोना के संकट से जूझ रहा है। ऐसे में फिंगेश्वर जनपद के गांव सरगोड़ की एक बुजुर्ग किसान महिला राधाबाई सिन्हा ने इसके महत्व को बढ़ा दिया है। दरअसल उन्होंने इसी रामकोठी से कोरोना की लड़ाई के लिए दस हजार रुपए मुख्यमंत्री सहायता कोष में जमा करवाई है। 85 साल की राधाबाई सिन्हा अपने पुरखों द्वारा तैयार की गई रामकोठी को सहेजे हुए है। इस कठिन समय में वे मदद के लिए आगे आई हैं।  कोरोना महामारी के चलते इस साल गांवों में धार्मिक, मांगलिक और दूसरे आयोजन नहीं हो रहे हैं। ऐसे में रामकोठी की वह राशि जिससे जरूरतमंदों की मदद में खर्च की जानी थी, मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराया है। छत्तीसगढ़ खेती किसानी वाला राज्य है और इस काम भी सूखा-बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा का भी सामना करना पड़ता है। इस बुजुर्ग किसान महिला ने कोरोना के खिलाफ इस भागीदारी के जरिए बड़ा संदेश दिया है। (rajpathjanpath@gmail.com)


26-Apr-2020

पुरानी कहानी पर नई फिल्म
बात तीस साल पुरानी है रायपुर शहर में एक आबकारी अफसर के यहां छापा पड़ा। अफसर के परिजनों ने नोटों से भरा बैग पड़ोसी के घर फेंका, मगर यह भी छापामार अफसरों की निगाह से नहीं बच पाया और बैग जब्त हो गया। आप सोच रहे होंगे कि पुरानी बातों का यहां जिक्र क्यों हो रहा है? वो इसलिए कि कुछ इसी तरह का वाक्या दोबारा हुआ है। फर्क इतना है कि नोटों से भरा बैग तो बच गया, लेकिन इसमें से नोटों के कुछ बंडल गायब हो गए, जिसको लेकर अभी तक किचकिच चल रही है।
 
हुआ यूं कि कुछ समय पहले नामधारी लोगों के यहां छापा पड़ा था। इनमें से एक को छापेमार दल के आने की सूचना मिल गई, आनन-फानन में परिवार के एक सदस्य ने नोटों से भरा सूटकेस पड़ोसी के यहां फेंक दिया। जब सब कुछ निपट गया, तो दो-तीन दिन बाद नामधारी पड़ोसी के यहां पहुंचा। उसे बैग जैसे का तैसा मिला। 

पड़ोसी ने अपना धर्म निभाया और सूटकेस का पूरा ध्यान रखा। नामधारी, पड़़ोसी के गले लगकर इस उपकार का धन्यवाद दिया। बात यही खत्म नहीं हुई, नामधारी ने बाद में सूटकेस में रखे नोटों की गिनती की, तो इसमें करीब आधा सीआर नोट कम निकले। नामधारी ने पड़ोसी से इसको लेकर पूछताछ की, तो पड़ोसी ने अनभिज्ञता जताई। 

थोड़ा बहुत नोट होता, तो कोई बात नहीं थी। पूरा आधा सीआर गायब हो गया। नामधारी की दिक्कत यह है कि इसको लेकर वह कानूनी मदद लेना तो दूर, किसी को बता भी नहीं पा रहा है। एक-दो ने हस्तक्षेप भी किया, मगर कुछ नहीं हुआ। अब पड़ोसी से रिश्ते में खटास आ गई है। मगर करे क्या, कालाधन तो काला ही होता है। पड़ोसी ने सूटकेस सुरक्षित रख इज्जत भी तो बचाई है। 

  ..पहले भी आ सकते थे मगर... 
सरकार के एक मलाईदार निगम के प्रमुख अफसर लॉकडाउन की वजह से तमिलनाडु में फंस गए। महीनेभर बाद किसी तरह अनुमति लेकर अब सड़क मार्ग से वापस आ रहे हैं। उनके आने-जाने का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। हुआ यूं कि अफसर पड़ोसी राज्य में खेलकूद के लिए गए थे। वहां उनका कंधा लचक गया। अफसर को यहां के डॉक्टरों पर भरोसा नहीं था, उन्होंने तमिलनाडु की तरफ रूख किया, तब से वहां फंसे हैं।
 
सुनते हैं कि अफसर अनुमति लेकर पहले भी सड़क मार्ग से आ सकते थे। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। अंदर की खबर यह है कि निगम में एक बड़े बिल को लेकर किचकिच चल रही थी। अफसर उसे क्लीयर नहीं करना चाहते थे। लिहाजा, उन्होंने मार्गदर्शन के लिए शासन के पास भेज दिया और खुद लॉकडाउन में फंसे रहे। इसी बीच उन्हें सूचना मिली कि भुगतान को हरी झंडी मिल गई है। पार्टियों को भुगतान करना बाकी है। उन्होंने तुरंत कोशिश कर रायपुर आने की अनुमति प्राप्त कर लिया। मोटा भुगतान है। ऐसे में पार्टियां सेवा सत्कार के लिए स्वाभाविक तौर पर तैयार रहती हैं। ऐसे में अफसर क्यों पीछे रहे। 

गाली नहीं प्यार मिला
कोरोना महामारी के इस दौर में पुलिस को कई तरह की चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। कानून व्यवस्था के साथ लॉकडाउन और सार्वजनिक स्थानों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराना मुश्किल टॉस्क है। चौक-चौराहों और सड़कों पर बेवजह घूमने वालों पर कार्रवाई करना, डॉक्टरों और मेडिकल स्टॉफ को सुरक्षा देना जैसे कई काम एक साथ पुलिस के ही जिम्मे में आ गया है। हालांकि छत्तीसगढ़ में दूसरे राज्यों की तरह पुलिस और मेडिकल स्टाफ पर हमले की खबर नहीं मिलना राहत की बात है, लेकिन इन सब कामों में कड़ाई करने के कारण सीधा असर छवि पर पड़ता है और गालियां ही मिलती है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस की अच्छी छवि बनी है। पुलिस के जवान और निचले स्तर के कर्मी भी इससे काफी खुश है। दिन रात हर मौसम सड़कों पर ड्यूटी करने वाले जवानों के प्रति सम्मान का भाव जगा है। पब्लिक से लेकर वीआईपी भी उनके इस काम की तारीफ कर रहे हैं। ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि पुलिस को उनके काम के लिए हर वर्ग के लोगों से सराहना मिले। सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ताओं से लेकर आम व्यक्ति भी पुलिस की मदद के लिए सामने आ रहे हैं। चौक चौराहों में तैनात जवानों को कोई पानी की बोतल दे रहा हैं, तो कोई कोल्ड ड्रिंक दे रहे हैं। इतना ही नहीं उनके खाने पीने के लिए लोग घरों से टिफिन पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इसमें घर की महिलाएं और आसपास के बच्चे भी शामिल हैं। लोगों के मन में पुलिस के प्रति सम्मान से जवान भी गर्व अनुभव कर रहे हैं। उनकी बातचीत और काम करने के तरीके में काफी बदलाव देखा जा रहा है। इस महामारी के दौर में राहत की बात है कि पब्लिक और पुलिस के बीच दोस्ताना व्यवहार कायम हो पाया है। पुलिस के जवान भी इस बात को महसूस कर रहे हैं कि ऐसा पहली बार हुआ कि गाली खाने वालों को प्यार मिल रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह बदलाव लॉकडाउन के बाद भी बना रहेगा। (rajpathjanpath@gmail.com)


25-Apr-2020

कितने इंतजाम करें? 
लॉकडाउन के चलते व्यसन के आदी लोगों को काफी दिक्कतें हो रही है। सुनते हैं कि भाजपा के एक ताकतवर नेता को भी पान मसाले-जरदे की बुरी लत लगी है। उनके लिए पान मसाला-जर्दा का बंदोबस्त करने में पार्टी के लोगों को काफी परेशानी हो रही है। नेताजी संगठन के कर्ता-धर्ता माने जाते हैं। ऐसे में उनके लिए पान मसाले-जर्दा का जुगाड़ करने के लिए कई नेता लगे रहे। नेताजी को विशेष ब्रांड का पान मसाला ही पसंद है। मगर लॉकडाउन की वजह से उनके लिए मनपसंद ब्रांड का पान मसाला नहीं मिल पा रहा था। 

किसी तरह कुछ नेताओं ने थोक व्यापारी के पता ठिकाना ढूंढकर नेताजी के लिए दो-तीन डिब्बा किसी तरह पान मसाला का बंदोबस्त किया। नेताजी भी शौकीन निकले। खाली बैठे-बैठे हफ्ते-दस दिन के कोटे को दो-तीन दिनों में ही खत्म कर दिया। पार्टी के लोग नेताजी के पान मसाले के व्यसन से काफी परेशान हैं। पहले पार्टी ने उन्हें पीएम केयर के लिए राशि जुगाड़ करने का दायित्व सौंप दिया है और अब नेताजी के लिए पान मसाला-जर्दा का इंतजाम करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी आन पड़ी है, जो कि पीएम केयर के लिए धन राशि जुटाने से ज्यादा पड़ रहा है।

ठलहा बनिया का करय...
छत्तीसगढ़ी में एक कहावत काफी मशहूर है कि ठलहा बनिया का करय, ये कोठी के धान ल वो कोठी म करय। यह कहावत दरअसल व्यापारियों के लिए है, जो कभी खाली नहीं बैठते। और तो और वे खाली समय में एक कमरे का सामान दूसरे कमरे में रखने का जुगाड़ निकाल लेते हैं। भले ही दूसरों के लिए इसका कोई औचित्य न हो। लॉकडाउन के इस समय में कई लोग ठलहा बनिया हो गए हैं, उनके पास भी कोई काम नहीं है तो एक कोठी के धान को दूसरे में करने में लगे हैं। ऐसा ही नजारा छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में देखने को मिल रहा है, जहां पर एक कोठी के धान को दूसरे कोठी में करने के लिए पानी की तरह पैसे बहाए जा रहे हैं। साल भर पहले रुसा से विश्वविद्यालय को 20 करोड़ रुपए मिले थे। जिसमें से करीब 7 करोड़ रुपए भावी पत्रकारों के लिए स्टूडियो बनाने में खर्च किया गया।  स्टूडियो बनाने के बाद भी 13 करोड़ रुपए बच गए। ऐसे में यहां के अफसरों ने साल भर पहले बने स्टूडियो में ही तोड़ फोड़ शुरु कर दिया। बताया जा रहा है कि लॉकडाउन में यहां की टाइल्स उखाड़ दी गई, जबकि टाइल्स बिल्कुल सही सलामत है। बावजूद इसके यहां नई टाइल्स लगवाई जा रही है। विवि प्रशासन ने लॉकडाउन में ठलहा बनिया की तरह धान को इधर से उधर करने का काम तो ढूंढ लिया, लेकिन उनको कौन बताए कि ठलहा बनिया पाई पाई का सही उपयोग करता है और एक रुपए का भी नुकसान करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। लेकिन पत्रकारिता विवि में तो अफसर करोड़ों रुपए फूंक कर ठलहा बनिया बनने की कोशिश कर रहे हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी उन्हें कोई रोकने टोकने वाला नहीं है। एक तो यहां लॉकडाउन का उल्लंघन करके मजदूरों से काम करवाए जा रहा है, उलटे सरकारी पैसों का खुलकर दुरुपयोग किया जा रहा है। पहले ही इस निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। उससे भी अधिकारियों का मन नहीं भरा तो तोडफ़ोड़ कर करोड़ों का वारा न्यारा करने में तुले हैं। ऐसे उदाहरण और दूसरे विभागों में मिल जाएंगे, जहां सिर्फ सरकारी पैसों की अफरा-तफरी के लिए अधिकारी ठलहा बनिया बनते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसा करने की छूट कैसे मिल सकती है। लोगों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में पिछले कई सालों से सेठों और धन कुबेरों की सरकार थी, तो संभव है कि उस दौर में ठलहा बनिया की परिभाषा बदल गई हो, लेकिन एक बरस से ज्यादा समय से राज्य में खालिस छत्तीसगढिय़ा की सरकार है। ऐसे में तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इस छत्तीसगढ़ी कहावत का सही मायने निकाला जाएगा।

जय वीरु या गब्बर-ठाकुर? 
कोरोना युग में देशभर में जिलों के एसपी कलेक्टर पर बड़ी जिम्मेदारी है। सभी लॉकडाउन और कानून व्यवस्था के साथ कोरोना संक्रमण के खिलाफ अपने-अपने तरीके से लड़ाई लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी एसपी कलेक्टर इस अभियान में जुटे हुए हैं। हालांकि राजधानी होने के कारण पूरी सरकार, पूरा प्रशासनिक अमला और तमाम बड़े लोगों की राजधानी की एक-एक गतिविधियों पर नजर है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। राजधानी रायपुर में भी लॉकडाउन का पांचवा हफ्ता गुजरने वाला है। राजधानी को कोरोना संक्रमण और दूसरे मामलों में सुरक्षित माना जा रहा है। ऐसे में एसपी कलेक्टर को तो क्रेडिट का कुछ हिस्सा जाना ही चाहिए। बड़ा हिस्सा तो सरकार और प्रशासन के बड़े लोगों को जाना तय है। फिर भी दोनों अफसरों ने अपने लिए क्रेडिट का कुछ हिस्सा बचा लिया, यह भी बड़ी बात है। हालांकि कुछ हिस्सा पाने के लिए इन अफसरों को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। राज्य के मुखिया और प्रभावशाली प्रशासनिक अमले के सामने तो ये दोनों अफसर जय-वीरु की जोड़ी की तरह डटे रहे। फ्लैग मार्च और सोशल डिस्टेंशिंग को लागू करवाने के लिए भी दोनों अफसर सड़क पर एक साथ उतरे। 

कलेक्टर-एसपी के बीच जय वीरु का कॉम्बिनेशन वैसे तो काफी पुराना है। रमन सिंह अपने राज में तो कलेक्टर एसपी को इन्हीं फिल्मी किरदारों के अनुरुप तालमेल रखने की हिदायत देते थे, लेकिन उस वक्त विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने इसकी आलोचना की थी। अब जब कांग्रेस सत्ता में है और अफसर जय वीरु की तरह दोस्ती निभा रहे हैं, तो किसी को आपत्ति तो नहीं होनी चाहिए। 

किसी जिले को बर्बाद होना हो, तो वह कलेक्टर और एसपी के बीच झगडे से हो सकता है. और यह झगड़ा पानी में हगे की तरह तुरंत ही सतह पर दिखने लगता है. हर राज्य में ऐसे कुछ मामले होते हैं, और तेज मुख्यमंत्री तुरंत ही किसी एक को हटा देते हैं. जय-वीरू की जोड़ी गब्बर और ठाकुर की जोड़ी की तरह हो जाती है जो अधिकारों के लिए, ये हाथ हमका दे-दे ठाकुर, के अंदाज़ में झगड़ते हैं. 

छत्तीसगढ़ की राजधानी में पिछले 40 बरसों से अच्छी तालमेल वाली जोडिय़ां ही आम तौर पर रही हैं. कुछ जोडिय़ां जरूरत से ज्यादा अच्छी भी रहीं. सुनील कुमार कलेक्टर थे, और सीपीजी उन्नी एसपी, दोनों की दोस्ती भी अच्छी थी, और काम भी अच्छा था. दिक्कत यह थी कि दोनों मलयाली थे. और लोगों के बीच आपस में कोई गोपनीय बात करनी होती थी तो मलयाली में शुरू हो जाते थे. कलेक्टर-एसपी की कहानियां अनंत रहती हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


24-Apr-2020

यहां से आगे कहाँ?
लॉकडाउन खत्म होने के बाद पुलिस में एक छोटा सा फेरबदल हो सकता है। इसमें दो-तीन जिलों के एसपी को बदला जा सकता है। सुनते हैं कि रायपुर एसएसपी आरिफ शेख भी बदले जा सकते हैं। वैसे तो, उनके कामकाज को लेकर किसी तरह की शिकायतें नहीं है। उन्हें  रिजल्ट ओरिएंटेड अफसर माना जाता है। अपने सालभर के कार्यकाल में उन्होंने प्रवीण सोमानी अपहरण कांड जैसे बेहद संवेदनशील और कठिन प्रकरणों को सुलझाया। इसकी काफी तारीफ भी हो रही है। अब ऐसे में उन्हें बदला जाएगा, तो कोई अहम दायित्व ही मिलेगा। कुछ लोगों का अंदाजा है कि आरिफ का अगला ठिकाना परिवहन विभाग हो सकता है।विभाग के मंत्री मोहम्मद अकबर हैं, और आरिफ उनकी पहली पसंद बताये जाते हैं। 

अगला कौन?
पुलिस जवानों को युद्धकला की ट्रेनिंग के लिए 14 साल पहले कांकेर में जंगलवार ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना की गई थी। इस ट्रेनिंग स्कूल में हजारों जवान ट्रेंड होकर नक्सल मोर्चे पर डटे हुए हैं। न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि अन्य राज्यों के जवानों को भी यहां ट्रेनिंग दी जाती है। जवान बसंत पोनवार के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग पाते हैं। पोरवार सेना के रिटायर्ड ब्रिगेडियर हैं और वे पिछले 15 साल से संविदा पर ट्रेनिंग स्कूल में संचालक के पद पर पदस्थ हैं। उनकी संविदा अवधि जल्द ही खत्म होने वाली है। सुनते हैं कि पोरवार की संविदा अवधि बढ़ाने के लिए फाइल भेजी गई थी, लेकिन मंजूरी नहीं मिल पाई है। चर्चा है कि सरकार अब उनकी संविदा नहीं बढ़ाना चाहती है। ट्रेनिंग स्कूल आगे किस तरह काम करेगा, इसका खुलासा नहीं हो पाया है। फिलहाल तो लॉकडाउन की वजह से जवानों की ट्रेनिंग बंद है। 

सरकार की तुरंत प्रतिक्रिया 
इन दिनों सोशल मीडिया की मेहरबानी से उन लोगों को अपने कामों पर जनप्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है जो कि सोशल मीडिया पर चर्चित हैं. लेकिन इसे पूरी प्रतिक्रिया मान लेना ठीक नहीं. बुरी आलोचना करने वाले लोग बिगाड़ करने सामने नहीं आते, और तारीफ करने वाले मौका नहीं छोड़ते. इस तरह सार्वजनिक प्रतिक्रिया अमूमन तारीफ की ओर झुकी रहती है. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोटा में कोचिंग पा रहे बच्चों को वापिस लाने के लिए बसें भेजने की घोषणा की, तो उनकी ट्वीट पर लोगों ने तुरंत तारीफ की बौछार कर दी. लेकिन इस बात को लिखने वाले भी कम नहीं थे कि सिर्फ पैसे वालों के बच्चों को ला रहे हैं, गरीब मजदूरों का क्या? उनको भी वापिस लाएंगे? आलोचना की ट्वीट भी कम नहीं थीं. अच्छा है कि वोट के दिन के पहले भी सरकार को अपने फैसलों को लेकर कम से कम कुछ लोगों की लिखी बातों का पता चलते ही रहता है. भूपेश सरकार के बारे में एक दूसरी बात जिस पर खूब लिखा जा रहा है, वह है शराब को लेकर. अब बहुत से लोग मानने लगे हैं कि एक महीने से ज्यादा तो कोई मेडिकल प्रयोग भी नहीं हो सकता. जब लोग इतने लम्बे वक़्त तक शराब के बिना रह ही चुके हैं, उनकी सेहत और घर की माली हालत दोनों सुधर रहे हैं, तो फिर अब चुनावी वायदे के मुताबिक दारूबंदी कर ही दी जाये !(rajpathjanpath@gmail.com)


23-Apr-2020

हमारे देश के लोग

भोपाल की रहने वाली तेजी ग्रोवर और उनके पति रुस्तम सिंह ग्रोवर वहां फंसे लोगों की मदद में लगे हुए हैं. उनका संपर्क लगातार छत्तीसगढ़  से भी हो रहा है, और उनके लिए भी वे अपनी सीमा से बहार जाकर भी मदद जुटा रही हैं।

आज सुबह उन्होंने फेसबुक पर लिखा- कल शाम पता चला कि 19 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के प्रताप सिंह जी को किराए के मकान से निकाल दिया गया था। वे 22 मार्च को ही भोपाल पहुंचे थे और मात्र एक दिन की दिहाड़ी उन्हें मिल पाई थी कि लॉकडाउन घोषित कर दिया गया। वे मकान मालिक को 1500 अग्रिम किराया दे चुके थे। महीना खत्म हुआ भी न था कि उन्हें और उनकी गर्भवती पत्नी को निकाल दिया गया।

मैंने फ़ोन करके पूछा कि कोई और कमरा उधर मिल रहा हो तो ले लीजिए। ( पत्नी को घबराहट, अपच सब हो रहा है।)

अब सुनिए क्या बोले-वे अभी तो साथियों के साथ झुग्गी में किसी तरह पड़े रहेंगे। आप किराए की व्यवस्था करेंगी तो 3 को लॉकडाउन खुलने से किराया बेकार चला जाएगा। मैंने कहा क्या पता खुलता भी है या नहीं, आप तो ढूंढ लीजिए। उन्होंने हमें कष्ट न देने की गरज़ से मना कर दिया।

कुछ दिन बाद मित्रों से निवेदन करूंगी कि वे इन परिवारों के खातों में सीधे कुछ राशि जमा करवा दें। क्योंकि वे चिंतित हैं कि गांव में जाकर भी वे भूखे ही मरेंगे।

देखिए फल से फल-फूल रहे हैं होटल कारोबारी
लॉकडाइन ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। इस बीच धीरे धीरे मिल रही छूट से कारोबार शुरू होने लगे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि धीरे-धीरे ही सही उद्योग धंधे पटरी पर लौटेंगे, लेकिन ऑनलाइन ट्रेंडिंग और पेमेंट की सुविधा सबसे बड़ी अड़चन दिखाई दे रही है, क्योंकि लोग इसे ज्यादा सुरक्षित और सहूलियत भरा मान रहे हैं। यही वजह है कि पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के कारोबारियों ने ऑनलाइन बिजनेस के खिलाफ थाली-घंटी बजाकर विरोध भी किया था। इस विरोध का कितना असर होगा, ये तो कारोबारी ही बता पाएंगे, लेकिन ऑनलाइन बिजनेस ने तो जोर पकडऩा शुरू कर दिया है। राज्य सरकार ने खुद ऑनलाइन सुविधाओं का विस्तार शुरू कर दिया है। दूध, दही और पनीर जैसे उत्पादों के बाद साग-सब्जी की ऑनलाइन डिलीवरी के लिए पोर्टल शुरु हो गए हैं। जाहिर है इससे थोक-चिल्हर व्यापारियों के धंधे पर असर पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि लोगों को एक बार सुविधा की आदत पड़ जाए तो उसे बदलना मुश्किल होता है। फिलहाल तो सुरक्षागत कारणों और सोशल डिस्टेंसिंग के लिए ऐसा किया जा  रहा है, लेकिन आदत पडऩे पर थोक और चिल्हर कारोबारियों के सामने रोजी रोटी का संकट पैदा हो सकता है। हालांकि छत्तीसगढ़ में सरकार का कहना है कि इसमें सभी छोटे-बड़े व्यापारियों को जोड़ा जाएगा। खैर ये तो बाद की बात है, लेकिन फिलहाल तो इस ऑनलाइन कारोबार में भी चंद लोग फल फूल रहे हैं। चर्चा तो यह है कि होटल कारोबार से जुड़े कई बड़े लोग इसमें कूद गए हैं। लॉकडाउन के कारण होटल-रेस्टारेंट तो बंद है, ऐसे में इन लोगों ने होटल से सब्जी-भाजी का धंधा शुरू कर दिया है। अब फल से फलने-फूलने का इससे बड़ा उदाहरण कहां मिल सकता है।

राम भरोसे बीजेपी
छत्तीसगढ़ में लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने वाली बीजेपी सियासी परिदृश्य से एकदम ओझल सी हो गई है। राज्य में अब तक हुए चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा है, लिहाजा पार्टी कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक निराशा तो है, लेकिन फिर भी दुनिया के सबसे ज्यादा सदस्यों वाली पार्टी का दावा करने वाले दल के लोग छत्तीसगढ़ से एकदम से गायब कैसे हो गए हैं, यह बात गले से उतरती नहीं। जबकि पार्टी के राज्य में भारी भरकम सांसद हैं। एक-दो को छोड़ दिया जाए तो बाकियों तो मानो सांप सूंघ गया है। कोरोना जैसी महामारी के दौर में भी उनकी न तो कोई गतिविधियां दिखाई देती है और न ही कोई बयान सुनने-पढऩे को मिलते हैं । खैर, ये पार्टी का अंदरुनी मामला है। इसलिए इस चुप्पी की मीडिया में भी कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हो रही है। गाहे-बगाहे ऐसी चर्चाओं में भाजपाई इसे तूफान के पहले की शांति का नाम दे देते हैं, तो कई अपनी पार्टी को राम भरोसे बताते हैं। जबकि स्थिति तो यह है कि तूफान के इंतजार में बैठे भाजपाई हवा के झोंके में खुद उड़ रहे हैं और जो राम के भरोसे बैठे हैं, उन्हें यह तो पता ही होगा कि छत्तीसगढ़ के लोग उन्हें भांचा मानकर निकल पड़े हैं राम वन गमन पथ पर। अब देखना होगा कि राम किसकी नैया पार लगाते हैं। अपने भांजों की या फिर अपने भक्तों की। 

अंडे का क्या हो?
अंडा खाया जाये या नहीं, मुर्गा-मटन खाया जाये या नहीं इस पर हिंदुस्तान में धार्मिक भावना से भरपूर बहस चलती ही रहती है. अभी छत्तीसगढ़ में इन सबकी बिक्री पर रोक लगी हुई है. प्रदेश में भोजन के अधिकार को लेकर अभियान चलने वाले लोगों ने इस रोक के खिलाफ आवाज़ उठाई है और राज्य सरकार का छपवाया हुआ इश्तहार साथ में  ट्विटर पर पोस्ट भी किया है जो कहता है- अंडा और चिकन से मिलता है उत्तम प्रोटीन, बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता- छत्तीसगढ़ शासन पशुधन विकास विभाग। यह िष्ट: और ट्वीट अभी पिछले ही पखवाड़े सरकार ने छपवाया था, लॉकडाउन शुरू हो जाने के बाद 7 अप्रेल को।(rajpathjanpath@gmail.com)


22-Apr-2020

कोराना युग मीडियाकर्मियों के लिए संकट भरा
इस कोरोना युग में पत्रकार और मीडियाकर्मी चौतरफा संकट से घिर गए हैं। मुंबई में एक साथ 53 पत्रकार कोरोना पॉजिटिव हैं। इसके पहले भोपाल में भी कई पत्रकार कोरोना संक्रमित पाए गए। डॉक्टर, मेडिकल स्टॉफ या दूसरे आवश्यक सेवा के कर्मियों के लिए तो बचाव और सुरक्षा के किट उपलब्ध हैं। आपात स्थिति में परिवार के लिए सरकारी मदद की गुंजाइश है, लेकिन पत्रकारों के पास न तो सुरक्षा के संसाधन हैं और न ही आपात स्थिति में परिवार के लिए राहत की कोई योजना है। फिर भी टीवी के पत्रकार और फोटोग्राफर जान जोखिम में डालकर अपना काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं कोरोना काल में पल पल खतरों के बीच काम कर रहे पत्रकारों के लिए नौकरी बचाना मुश्किल हो रहा है। कई छोटे-बड़े संस्थानों ने मंदी का रोना रोकर कॉस्ट कटिंग तक शुरू कर दी है। लिहाजा पत्रकारों के सामने दोनो तरफ विकट स्थिति है। जबकि सरकारों ने तमाम संस्थानों को सख्त हिदायत दी है कि अपने कर्मचारियों के सुरक्षा के उपाय के साथ उनके भविष्य की योजनाओं पर विचार किया जाना चाहिए। सरकारी निर्देशों का बहुत ज्यादा असर मीडिया संस्थानों में दिख नहीं रहा है। दूसरे तरफ संकट के समय में पत्रकारों को काफी कुछ सीखने समझने का मौका मिल रहा है। प्रेस ब्रीफिंग के लिए मौके पर जाने की जरुरत नहीं पड़ रही है। वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए प्रेस कांफ्रेंस हो रहे हैं, जिससे तकनीक के प्रति जागरुक हो रहे हैं। हालांकि इस युग में नेता-मंत्री और अफसरों के पास वीडियो कांफ्रेंस के आयोजन के लिए तमाम लोग और सुविधा उपलब्ध है, लेकिन पत्रकारों को सब खुद मैंनेज करना पड़ता है, जिससे वे अपडेट हो रहे हैं। इस तरह के कल्चर से आम लोगों के लिए संवाद स्थापित करना आसान हो रहा है। संभव है कि आने वाले दिनों में नेता मंत्री गांव और दूरस्थ इलाकों से जनता के साथ संवाद कर सकते हैं। सीखने समझने की गुंजाइश के बीच मीडिया हाउस में भी इस तरह के आधुनिक संसाधनों के उपयोग का चलन बढ़ सकता है। यह भी पत्रकारों के लिए मुश्किलों भरा साबित हो सकता है। इस स्थिति में स्टूडियो से लाइव या रिकार्डेड इंटरव्यू ज्यादा आसान हो सकते हैं। 

बच्चों की स्मार्ट पढ़ाई !
छत्तीसगढ़ सरकार ने लॉकडाउन अवधि में स्कूली बच्चों की पढ़ाई के नुकसान को देखते हुए ऑनलाइन पोर्टल की शुरुआत की है। पढ़ई तुंहर दुवार नाम से शुरु किए गए इस पोर्टल में वीडियो अपलोड किए गए हैं, लेकिन इस पोर्टल का कितना लाभ मिलेगा, इस पर संशय है। इसके जरिए पढ़ाई करने के लिए छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों के सामने कई तरह समस्या है। अधिकांश बच्चों के पास मोबाइल तो नहीं है, उन्होंने माता-पिता या घर के दूसरे सदस्यों के नंबर दिए हैं। ऐसी स्थिति में उनको पढ़ाई के लिए घर के सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ेगा। उसमें भी दिक्कत यह है कि आधे लोगों के पास स्मार्ट फोन नहीं है, वे केवल बातचीत का काम आने वाला फोन उपयोग करते हैं। मान लिया जाए कि उसमें से कुछ स्मार्ट फोन यूज करते भी होंगे तो उनके सामने नेट पैक की समस्या आती है, क्योंकि लॉकडाउन के कारण गरीब और मजदूर वर्ग के लोग नैट पैक की सुविधा कम ही ले रहे हैं। कुछ ले भी रहे होंगे तो उसको निश्चित समय तक चलना भी है। बच्चों के हाथ में गया और एकाध वीडियो देखने में ही पूरा नेट पैक निपट सकता है। कुल मिलाकर ऑन लाइन पढ़ाई के लिए वेबसाइट से बच्चे पढ़ पाएंगे इसकी संभावना तो कम ही दिख रही है। ऐसे समय में कुछ लोग रमन सिंह की स्मार्ट फोन योजना को याद कर रहे हैं। यह योजना चालू होती तो शायद सरकारी स्कूल के बच्चे भी स्मार्ट बन पाते। (rajpathjanpath@gmail.com)


21-Apr-2020

मोर्चे पर अकेली अफसर 
लॉक डाउन में थोड़ी ढील देने के बाद कुछ अफसरों का मंत्रालय में बैठना शुरू हो गया है। मगर राजस्व सचिव रीता शांडिल्य ही एकमात्र ऐसी अफसर हैं, जिन्होंने एक दिन भी ऑफिस नहीं छोड़ा। रीता के पास आपदा प्रबंधन का भी प्रभार है। ऐसे में कोरोना संक्रमण से निपटने की अहम जिम्मेदारी उन पर है। आईएएस की वर्ष-2002 बैच की अफसर रीता शांडिल्य सामान्य प्रशासन विभाग का भी दायित्व संभाल रही हैं। 

वैसे तो रीता के पास भी विकल्प था कि वे बाकी अफसरों की तरह घर में बैठकर फाइलें निपटा सकती थीं और बैठकें ले सकती थीं। मगर वे इक्का-दुक्का अधिकारी-कर्मचारियों के साथ रोजाना मंत्रालय आती थीं और पूरे समय काम में लगी रही। ऐसे समय में जब कोरोना संक्रमण के चलते कई राज्यों का आपदा प्रबंधन गड़बड़ा गया है, रीता की मेहनत से छत्तीसगढ़ आपदा प्रबंधन के मामले में सबसे आगे है। 

मुश्किलें बढ़ेंगी

कोरोना फैलाव रोकने के लिए एहतियात के तौर पर सेंट्रल एसी और कूलिंग सिस्टम को बंद करने के आदेश दिए गए हैं। इससे विशेषकर मंत्रालय के अधिकारी-कर्मचारियों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।  मंत्रालय के बड़े अफसरों के कक्ष में तो टेबल पंखा लगा दिया गया है। लेकिन छोटे कर्मचारी बिना एसी-पंखे के पसीने से तरबतर काम कर रहे हैं। अभी उपस्थिति बेहद कम है, लेकिन जैसे ही लॉकडाउन खुलेगा, कर्मचारियों की मुश्किलें बढ़ेंगी। 

ताश आवश्यक सामग्री ?
लॉक डाउन के चलते कामकाजी लोगों को घर में समय काटना मुश्किल हो चला है। ज्यादातर लोग टीवी देखकर, किताबें पढ़कर समय गुजार रहे हैं। मनोरंजन के लिए लोग ताश का भी सहारा ले रहे हैं। एकाएक ताश की मांग काफी बढ़ गई है। कई किराना दूकानों में तो ताश नहीं मिल रहा है। ऐसे में किराना दूकानों को ताश सप्लाई कर अच्छा मुनाफा कमाने के फेर में एक व्यवसायी पुलिस के हत्थे चढ़ गया।

हुआ यूं कि व्यवसायी का रायपुर शहर के मध्य में किराने की दूकान हैं। उनके पास ताश का स्टॉक पड़ा हुआ था। पिछले दिनों व्यवसायी ताश को कार्टन में भरकर ले जा रहा था तभी पुलिस ने उन्हें रोक लिया।  कार्टन की तलाशी ली, तो स्वाभाविक था कि उसमें ताश की गड्डियां ही थी। पुलिस ने पूछ लिया कि क्या ताश आवश्यक सामग्री में आता है, जिसकी सप्लाई करना जरूरी हो गया है? व्यवसायी को जवाब देते नहीं बना। इसके बाद पुलिस उसे ले गई। काफी प्रभावशाली लोगों के फोन घनघनाए लेकिन पुलिस टस से मस नहीं हुई। व्यावसायी और उसके परिवारवालों ने काफी अनुनय-विनय किया, तब कहीं जाकर पुलिस ने हिसाब-किताब कर उसे छोड़ा। 

छत्तीसगढिय़ा का भांचा प्रेम
लॉकडाउन पीरियड में रामायण सीरियल का रिपीट टेलीकॉस्ट पहली बार जैसा लोकप्रिय रहा है। अमूमन हर घर में परिवार सहित सीरियल देखने में लोगों की दिलचस्पी देखी गई। रामायण अब अपने क्लाइमेक्स पर है। रावण का वध कर राम अयोध्या पहुंच गए हैं। उनकी इस जीत पर अयोध्यावासी खुशियां मना रहे हैं। त्रेता युग में भगवान राम की जीत का जश्न हजारों-लाखों साल के बाद कलयुग के कोरोना युग में छत्तीसगढ़ में भी देखने सुनने को मिल रहा है। सोशल मीडिया और वाट्सएप पर लोग राम की जीत की बधाई दे रहे हैं। कई लोगों का आचरण तो ऐसा है जैसे उनके किसी अपने या करीबी रिश्तेदार ने लंका फतह कर ली हो। 

दरअसल, पिछले कुछ समय से भगवान राम का छत्तीसगढ़ कनेक्शन खूब प्रचारित हुआ है। मान्यता है कि वनवास काल का बड़ा समय उन्होंने छत्तीसगढ़ में ही बिताया था और राज्य को राम का ननिहाल भी बताया जाता है। इस कनेक्शन के बाद छत्तीसगढिय़ा का भांचा प्रेम जाग गया है और राम को भांचा (भांजा) मानकर लंका विजय की एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं। स्वाभाविक है कि परिवार के किसी करीबी की सफलता पर खुशी तो होती है, लिहाजा यहां भी माहौल ऐसा ही बन गया है। सोशल मीडिया में बधाई संदेशों की बाढ़ आ गई है। 

दूसरी तरफ राज्य सरकार ने भी राम वन गमन पथ और उनके ननिहाल को पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने के लिए खजाना खोल दिया है। कोरोना फैलने के ठीक पहले इस पर तेजी से काम भी शुरू हो गया था। सूबे के प्रशासनिक मुखिया खुद निर्माण कार्य का मोर्चा संभाले हुए थे और उन स्थानों का दौरा कर निर्माण कार्यों की प्रगति का जायजा ले रहे थे। ऐसे में लोगों की भावनाएं कुलांचे मार रही है, तो आश्चर्य की बात नहीं है। सियासतदार भी लोगों की भावनाओं को खूब हवा दे रहे हैं। क्योंकि राम भले ही लोगों की भावनाओं से जुड़े हैं, लेकिन सियासत में तो वे वोट बटोरने के लिए ब्रम्हास्त्र से कम नहीं है। उम्मीद है कि कोरोना युग के निपटने के बाद त्रेता युग के तमाम अस्त्र शस्त्र चुनाव समर तक खूब चलेंगे।(rajpathjanpath@gmail.com)