राजपथ - जनपथ
साव के खिलाफ भूपेश की टिप्पणी
पिछले दिनों बिलासपुर प्रवास के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने डिप्टी सीएम को लेकर एक टिप्पणी की थी। उन्होंने एक प्रचलित कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि एक बार जंगल में वन प्राणियों ने बंदर को अपना राजा चुन लिया। राजा चुने जाने के बाद एक बकरी फरियाद लेकर आई कि शेर उसे खाने के लिए पीछा कर रहा है। बंदर ने पेड़ों पर खूब उछलकूद मचाई, डालियों को तोड़ डाला। फिर कहा- देखो मैंने कुछ तो किया न शब्दश: नहीं, भाव कुछ ऐसा ही था। उस जंगल के राजा की तुलना बघेल ने डिप्टी सीएम साव से कर दी।
अब छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ ने इसे मुद्दा बनाया है। इसके अध्यक्ष डॉ. नीरेंद्र साहू ने संगठन के सभी जिला अध्यक्षों को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि समाज के गौरव साव जी पर बघेल द्वारा की गई आपत्तिजनक, अत्यंत अमर्यादित टिप्पणी के विरुद्ध अपने जिले के पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपें। 10 दिन के भीतर अपने बयान के लिए भूपेश बघेल सार्वजनिक क्षमा याचना करें। यदि ऐसा नहीं किया गया तो साहू समाज संगठित और चरणबद्ध आंदोलन करेगा।
यह पत्र सोशल मीडिया पर वायरल है। बहुत सी प्रतिक्रियाएं हैं, जिनमें से कुछ अलग हटकर भी हैं- जिन्हें लाइक्स भी ठीक-ठाक संख्या में किए गए हैं। जैसे एक ने कहा है कि राजनीतिक टिप्पणी का जवाब दमदार मंत्री खुद ही दे सकते हैं। इसे सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाना चाहिए। लवकुश साहू नाम की आईडी से लिखा गया है कि बेहतर होगा, प्रदेश साहू संघ का भाजपा में विधिवत विलय कर दिया जाए। गिरवर लाल साहू ने लिखा है कि डिप्टी सीएम बनने के बाद साव जी ने साहू समाज के लिए क्या किया? पहले बताएं, फिर समाज खुद सहयोग करेगा। खुद को बचाने के लिए समाज का सहारा ले रहे हैं। वाल्मीकि साहू ने लिखा है कि इस तरह का निर्देश देकर साहू समाज को एक राजनीतिक दल का गुलाम बनाने की कोशिश की जा रही है, अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए। घनश्याम साहू का कहना है कि साहू संघ के पूर्व अध्यक्ष भूपेश बघेल सरकार की मदद से अध्यक्ष बने थे। उनके आगे-पीछे टहल रहे थे। वर्तमान अध्यक्ष जी सत्ताधारी पार्टी का आशीर्वाद पाने का प्रयास कर रहे हैं। आगे यही परंपरा स्थापित होने वाली है।
शाह, राहुल के बीच नबीन
हमने पिछले सप्ताह इसी कालम में बताया था कि भाजपा के प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन से छत्तीसगढ़ के नेता कार्यकर्ताओं की मेल मुलाकात अब आसान नहीं होगी। क्योंकि सुरक्षा, प्रोटोकॉल, राष्ट्रीय स्तर की बैठकें और देश के दौरों के साथ सभी राज्यों के नेता कार्यकर्ताओं की भीड़। इसके साथ अब एक और कड़ी जुड़ रही है। वह यह कि नितिन नवीन को लुटियंस दिल्ली में एक सरकारी आवास अलॉट किया गया है। - सुनहरी बाग रोड पर बंगला नंबर 9। यह जगह इसलिए खास है क्योंकि यह गृह मंत्री के बंगले के बगल में है। और राहुल गांधी भी उनके पड़ोसी न सही, उसी लोकेलिटी में बंगला नंबर-5, सुनहरी बाग में रहते हैं।
नबीन को पार्टी के अध्यक्ष के रूप में शाह की छत्रछाया मिल गई है। वैसे उनके चयन नियुक्ति में भी अमित शाह की ही भूमिका रही है। अब नितिन का पड़ोसी बनना शाह से निकटता को दिखाता है।
राजनीतिक गलियारों में इस अलॉटमेंट को बीजेपी की केंद्रीय लीडरशिप में नवीन के बढ़ते कद के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है, जो बिहार की राजनीति से पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में एक ज़्यादा अहम राष्ट्रीय भूमिका की ओर उनके बदलाव को दिखाता है। बहरहाल छत्तीसगढ़ के नेताओं को मुलाकात के लिए लंबे क्यू में लगना पड़ेगा। वैसे नबीन ने बिहार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है तो जल्द ही छत्तीसगढ़ संगठन का प्रभार भी छोड़ देंगे ऐसी उम्मीद है।
किफायत की मिसाल

देशभर में प्रदेशों की राजधानी में जो राजभवन थे उनका नाम बदलकर अब लोक भवन रख दिया गया है ताकि थोड़ी सादगी दिखे। राजभवन से एक राज की भावना झलकती थी जिसको लोक कर दिया गया है। अभी नए साल की शुभकामनाओं का जो कार्ड छत्तीसगढ़ के लोक भवन से, राज्यपाल की तरफ से आया है, उसमें पहले से छपे हुए कार्ड और पहले से छपे हुए लिफाफों के ऊपर ही लोक भवन के स्टीकर लगा दिए गए हैं। सरकारी खर्च पर होने वाले कामकाज में कई बार पहले से छपी स्टेशनरी को खारिज करके नई स्टेशनरी छपवा ली जाती है। ऐसे में यह सादगी अच्छी है कि पहले से छपे हुए लिफाफों को, कार्ड को, बर्बाद न करके उन पर स्टिकर चिपका दिया जाए, क्योंकि पैसा तो जनता की जेब का ही लगता है। दूसरे बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों के जब नाम-पते, फोन नंबर, या विभागों के नाम बदलते हैं, तो उनको भी राज्यपाल की इस मिसाल को याद रखना चाहिए।
संगठन में बदलाव का दौर
चर्चा है कि मकर संक्रांति के बाद कांग्रेस संगठन में बड़ा बदलाव होगा। बदलाव पश्चिम बंगाल, केरल, और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर हो रहा है। तीनों राज्यों के चुनाव में प्रत्याशी चयन के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया जाएगा। संकेत है कि छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं को विधानसभा चुनाव में अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।
बिहार चुनाव में पूर्व सीएम भूपेश बघेल को प्रचार की जिम्मेदारी दी गई थी। भिलाई विधायक देवेन्द्र यादव भी पिछले छह महीने से बिहार में डटे थे। इससे परे पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव बिहार में पार्टी टिकट बंटवारे से जुड़े विवाद के निपटारे के लिए गठित कमेटी के सदस्य थे। बावजूद इसके पार्टी को बिहार चुनाव में बुरी हार का सामना करना पड़ा। मगर पार्टी प्रदेश के कुछ प्रमुख नेताओं को तीनों चुनाव वाले राज्यों में भेजने की तैयारी कर रही है। छत्तीसगढ़ में कोई चुनाव नहीं है। इसलिए यहां के नेताओं को वहां प्रचार में जाने में कोई दिक्कत भी नहीं है। दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ संगठन में भी काफी बदलाव होना है। जिलाध्यक्षों की नियुक्ति तो हो गई है। प्रदेश महामंत्री, और संयुक्त महामंत्री के पद खाली हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज पद पर बने रहेंगे या नहीं, इस पर भी फैसला होना बाकी है। कुल मिलाकर अगले एक-डेढ़ महीने में प्रदेश संगठन में बदलाव देखने को मिल सकता है।
वन भैंसा- जनभागीदारी ही काम आ रही

छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वन भैंसा कभी मध्य भारत के विशाल जंगलों में आजाद विचरण करता था। आज वह विलुप्ति के कगार पर है। इधर एक अलग हटकर खबर आई है कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के 17 गांवों के निवासियों ने इस लुप्तप्राय प्रजाति को बचाने के लिए एकजुट होकर प्रयास शुरू किए हैं। वे जंगल की आग रोकने, अवैध कटाई पर अंकुश लगाने और कब्जा की गई भूमि को खाली करने का संकल्प तो ले ही रहे हैं , इसके जरिये वन भैंसों के लिए अनुकूल माहौल बने- यह कोशिश कर रहे हैं।
वन विभाग के प्रयासों की बात करें तो लाखों रुपये खर्च कर असम से वन भैंसे लाकर प्रजनन बढ़ाने की कोशिश की गई, लेकिन यह विफल साबित हुई। 2020 में मनास नेशनल पार्क से लाए गए भैंसे अभी भी युवा हैं और प्रजनन में समय लगेगा, जबकि पहले के प्रयासों में क्लोनिंग जैसी तकनीकों पर भी संदेह जताया गया। सरकारी योजनाओं की अपनी सीमाएं हैं। वे कई बार जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर देती हैं। ट्रांसलोकेशन जैसी महंगी योजना बाहरी हस्तक्षेप पर निर्भर हैं। यह वनों में रहने वालों के साथ संघर्ष की नौबत भी ला देती है।
इन 17 गावों की कोशिश यह बात रही है कि वन्यजीवों का यदि हम सचमुच संरक्षण और संवर्धन करना चाहते हैं, तो वन के ग्रामीणों को ही केंद्र में रखना होगा। वे जंगल की नब्ज जानते हैं। उसकी मिट्टी, पानी और मौसम से वाकिफ होते हैं। उनकी भागीदारी के बिना कोई योजना लंबे समय के लिए सफल नहीं हो सकती। उदंती क्षेत्र के 17 ग्राम सभाओं को सक्रिय करने के लिए कुछ स्थानीय नेता अर्जुन सिंह नायक, साहेबिन श्यामलाल आदि सामने आए हैं। उन्होंने ग्राम सभाओं को लुप्त हो रहे वनभैंसों को बचाने के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया है।
वन विभाग के पास बजट होता है और अफसर उसे खर्च करने का रास्ता ढूंढते हैं। बाहर से वनभैंसों को लाकर वंशवृद्धि की कोशिश इसी का उदाहरण है। बजाय बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहने के, विभाग को चाहिए कि वह स्थानीय ग्रामीणों और सभाओं के साथ साझेदारी को मजबूत करें। ग्रामीणों की आजीविका को वन्यजीव संरक्षण से भी जोड़ा जा सकता है, जो एक टिकाऊ प्रयोग होगा।
नितिन नबीन का साल
गुजरे साल में प्रदेश भाजपा में कई बड़े बदलाव हुए, और कुछ को तरक्की भी मिली। सबसे बड़ी तरक्की प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन की हुई, जो पार्टी संगठन के शीर्ष नेता के रूप में स्थापित हुए। बहुत कम लोगों को मालूम है कि नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की स्क्रिप्ट छत्तीसगढ़ में लिखी गई थी।
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनी, तो नितिन नबीन की मेहनत को काफी सराहा गया। उन्होंने अपने गृह प्रदेश बिहार के विधानसभा चुनाव में केंद्रीय नेतृत्व के बीच पुल का काम किया। उनके चुनाव प्रबंधन की काफी प्रशंसा भी हुई। वो बिहार सरकार में ताकतवर मंत्री भी बन गए। मगर उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष जिम्मेदारी दी जाएगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था।
बताते हैं कि बस्तर ओलंपिक के समापन कार्यक्रम के लिए 11 दिसंबर को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह रायपुर आए थे। इस दौरान प्रदेश संगठन की एक अलग बैठक कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में हुई थी। इस बैठक में शिरकत करने नितिन नबीन को रायपुर आना था, लेकिन उनकी फ्लाइट छूट गई। इसी बीच नवा रायपुर के होटल में ठहरे शाह ने नबीन के आने को लेकर पूछताछ की, और फिर राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा राज्य शासन का विमान लेकर पटना पहुंचे। उनके साथ नितिन नबीन रायपुर आए। वो कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में जाने के बजाए अमित शाह से मिले। दोनों के बीच करीब आधा घंटे बंद कमरे में चर्चा हुई।
बैठक के बाद शाह जगदलपुर निकल गए। नितिन नबीन,कुशाभाऊ ठाकरे परिसर पार्टी बैठक में शामिल हुए, और फिर बैठक के बाद स्टेट प्लेन से वापस पटना चले गए। उन्हें छोडऩे के लिए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव पटना साथ गए थे। इसके दो दिन बाद नबीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। नबीन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने से छत्तीसगढ़ भाजपा के छोटे -बड़े नेता काफी खुश हैं। कुल मिलाकर गुजरा साल भाजपा के लिए बेहतर रहा।
निष्कासित से राष्ट्रीय पदाधिकारी!
पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने फेसबुक पर महिला कांग्रेस के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की सूची साझा की, और छत्तीसगढ़ से नवनियुक्त पदाधिकारियों को शुभकामनाएं दी। इनमें पंडरिया की पूर्व विधायक ममता चंद्राकर को राष्ट्रीय महासचिव, मयूरी सिंह, और तूलिका कर्मा को राष्ट्रीय सचिव के साथ ही प्रीति उपाध्याय व राशि त्रिभुवन को राष्ट्रीय समन्वयक का दायित्व सौंपा गया है।
महासमुंद की पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष राशि त्रिभुवन को राष्ट्रीय समन्वयक बनाए जाने पर पार्टी में गुस्सा फुट पड़ा है। दिलचस्प बात ये है कि राशि को विधानसभा चुनाव में अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लडऩे पर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। न सिर्फ राशि बल्कि उनके पति त्रिभुवन महिलांग को भी छह साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया गया।
दोनों के साथ ही महासमुंद के आठ और नेताओं को निष्कासित किया गया था। इन सभी की पार्टी में वापसी नहीं हो पाई है। बावजूद इसके राशि को राष्ट्रीय स्तर का पद दे दिया गया। इसकी शिकायत अलग-अलग स्तरों पर हुई है। यह पूछा जा रहा है कि निष्कासित नेत्री को राष्ट्रीय पदाधिकारी बनाने की सिफारिश किसने की थी? यह बात सामने आ रही है कि प्रदेश के किसी बड़े नेता ने राशि की सिफारिश नहीं की थी, बल्कि दिल्ली में अपने संपर्कों के जरिए पद पाने में कामयाब रही। निष्कासित नेत्री को पद देने पर पार्टी के अंदरखाने में हलचल मची हुई है। अब आगे क्या होता है, यह देखना है।
महानदी विवाद पुराना, माहौल नया
छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा महानदी यहां से निकलकर ओडिशा पहुंचती है और वहां के लाखों लोगों की सिंचाई, उद्योग और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करती है।हाल ही में छत्तीसगढ़ द्वारा उदंती नदी पर बैराज बनाने की प्रक्रिया शुरू करने पर ओडिशा में विपक्षी दल बीजेडी और कांग्रेस ने वहां की भाजपा सरकार पर सवाल उठाए हैं।
धमतरी जिले से निकलने वाली महानदी करीब 858 किलोमीटर बहकर ओडिशा में समुद्र में मिलती है। इसका करीब 53 प्रतिशत हिस्सा छत्तीसगढ़ में है, बाकी ओडिशा में। 1957 में बना हीराकुंड बांध इस नदी पर स्थित है, जो ओडिशा के बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए महत्व रखता है। महानदी में कई सहायक नदियां मिलती हैं। उनमें से ही एक उदंती है। यह छत्तीसगढ़ से निकलकर ओडिशा के नुआपाड़ा और कालाहांडी जिलों से गुजरते हुए तेल नदी में मिल जाती है, और अंतत: महानदी के सिस्टम में। छत्तीसगढ़ का दावा है कि हम ऊपरी भाग में बैराज बनाकर अपने इलाके की सिंचाई और विकास सुनिश्चित कर रहे हैं, जबकि ओडिशा का कहना है कि ये निर्माण पानी की मात्रा कम कर देंगे, जिससे हीराकुड बांध प्रभावित होगा।
महानदी के पानी के बंटवारे को लेकर बहस हीराकुंड बांध के निर्माण के समय से ही चल रही है। छत्तीसगढ़ जब मध्यप्रदेश से अलग हुआ तब भी विवाद था। मगर, 2016 में यह ज्यादा तीव्र हुआ, जब ओडिशा ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ ऊपरी इलाकों में बिना अनुमति के कई बांध और बैराज बना रहा है। उस समय छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार थी, और ओडिशा में नवीन पटनायक की बीजेडी सरकार। ओडिशा ने सुप्रीम कोर्ट में केस किया, जिसके बाद 2018 में महानदी रिवर वाटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल बना। ट्रिब्यूनल अभी भी काम कर रहा है, और अगली सुनवाई फरवरी 2026 में है।
सन् 2016 में ओडिशा का एक हाई-पावर प्रतिनिधिमंडल, जिसमें सांसद, विधायक और अधिकारी शामिल थे, छत्तीसगढ़ पहुंचा था। उन्होंने रायपुर और बिलासपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ में महानदी की ऊपरी धारा पर करीब 7 बैराज कांकेर, महासमुंद और अन्य इलाकों में बिना केंद्रीय जल आयोग की मंजूरी के बनाए जा रहे हैं। ओडिशा की टीम ने साइट विजिट भी की और दावा किया कि ये बैराज पानी को रोककर ओडिशा के हिस्से को कम कर रहे हैं, साथ ही उद्योगों को अवैध रूप से पानी सप्लाई किया जा रहा है। बीजेडी और कांग्रेस ने अलग-अलग डेलिगेशन भेजे थे। जवाब में, रमन सिंह ने 2017 में ओडिशा का दौरा किया और कहा कि यह गलतफहमी है। छत्तीसगढ़ केवल अपना हक इस्तेमाल कर रहा है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने भी 2016 में दोनों मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई, लेकिन कोई स्थायी हल नहीं निकला।
अब यह ताजा खबर उदंती बैराज की मंजूरी की है। इस बैराज का 2018 में ओडिशा ने इसका विरोध किया था, लेकिन हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने इन-प्रिंसिपल अप्रूवल दिया है। ओडिशा सरकार ने ज्वाइंट टेक्निकल कमेटी की दो बैठकों में इस पर चर्चा की, लेकिन विपक्षी बीजेडी के लेनिन मोहंती और कांग्रेस के भक्त चरण दास ने सवाल उठाया कि जब छत्तीसगढ़ बैराज बना रहा है, तो समझौता कैसे आगे बढ़ेगा?
दिलचस्प बात यह है कि अब दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। पहले जब सरकारें अलग दलों की थीं, विवाद ज्यादा जोर-शोर से उठता था। अब ओडिशा सरकार खुलकर विरोध नहीं कर रही, जबकि विपक्ष ने मोर्चा संभाल लिया है। छत्तीसगढ़ का स्टैंड वही है- हम ओडिशा को जरूरी पानी दे रहे हैं, इसलिए अपने इलाके में बैराज बनाने का हक है।
गुटबाजी का मतलब, कांग्रेस जिंदा है!
कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री पद के लिए भूपेश बघेल, और टीएस सिंहदेव के बीच ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय हुआ था, लेकिन इसका क्रियान्वयन नहीं होने पर दोनों के बीच खाई बनी थी, वह अब तक नहीं भर पाई है। भूपेश, सरगुजा संभाग के दौरे पर हैं। वो अंबिकापुर पहुंचे, तो सिंहदेव समर्थक गायब रहे।
हालांकि सिंहदेव के विरोधी माने जाने वाले पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने पूर्व सीएम के स्वागत में कोई कसर बाकी नहीं रखी। भूपेश, अमरजीत भगत के घर भी गए। मगर अंबिकापुर शहर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बालकृष्ण पाठक, और अन्य पदाधिकारी पूर्व सीएम से मिलने नहीं पहुंचे। इस पर सिंहदेव समर्थकों ने सफाई दी कि पूर्व सीएम के आने की सूचना जिला कांग्रेस को नहीं दी गई थी।
बात यही खत्म नहीं हुई। सूरजपुर जिला कांग्रेस अध्यक्ष शशि सिंह का शपथ ग्रहण समारोह था। इसमें पूर्व सीएम तो मौजूद थे, लेकिन टीएस सिंहदेव नहीं आए। पीसीसी चीफ दीपक बैज रायगढ़ दौरे पर थे, लेकिन वो भी सूरजपुर नहीं गए। पूर्व सीएम के सम्मान में भगत के करीबी खाद्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष गुरूप्रीत सिंह ने अपने निवास पर भोजन भी रखा था। इसमें सिंहदेव समर्थकों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन सिंहदेव समर्थक नहीं आए। कुल मिलाकर भूपेश, और सिंहदेव के बीच रिश्तों में खटास आई थी, वो अब मैदानी कार्यकर्ताओं में भी दिखने लगी है।
शिक्षकों पर एक और डिजिटल बोझ?

स्कूल शिक्षा विभाग ने शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करने के लिए विद्या समीक्षा केंद्र (वीएसके) मोबाइल ऐप डाउनलोड करने का आदेश हाल ही में जारी किया है। इसके माध्यम से शिक्षकों की शालाओं में उपस्थिति दर्ज की जाएगी। शिक्षक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षकों पर दबाव डालकर उनके निजी मोबाइल फोन में शासकीय ऐप को इंस्टाल करने का निर्देश देना उनकी निजता पर चोट है और पेशे के प्रति निष्ठा पर अविश्वास जताने जैसा है। शिक्षकों का यह भी कहना है कि यदि उनकी हाजिरी ही दर्ज करनी है तो शालाओं में बायोमेट्रिक उपकरण लगा दिए जाएं। या फिर उन्हें सरकारी फोन या टेबलेट उपलब्ध कराया जाए। वैसे प्रदेश के शिक्षक पहले ही दर्जन भर से अधिक सरकारी ऐप्स और पोर्टलों पर काम कर रहे हैं। मिड-डे मील, निष्ठा, दीक्षा, यू-डायस, छात्रवृत्ति पोर्टल, इंस्पायर अवॉर्ड, जादुई पिटारा, अपार आईडी, दर्पण पोर्टल, स्कूल रेडिनेस, मासिक चर्चा पत्र, धान-चावल और प्रतिदिन लाभान्वित विद्यार्थियों की ऑनलाइन एंट्री जैसे कार्य पहले से उनके जिम्मे हैं और यह सब उनके निजी मोबाइल फोन के जरिये ही किया जाता है। इस बीच एक और ऐप अनिवार्य कर दिया गया है। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों मोबाइल कंपनियों को निर्देश दिया था कि संचार साथी ऐप को प्री-इंस्टाल करके ही मोबाइल सेट बेचें। यह भी कहा गया था कि इसे डिलीट नहीं किया जा सकेगा। पर, विपक्ष ने इसे बड़े मुद्दे के रूप में पेश किया। कहा, कि सरकार इसके जरिये नागरिकों पर निगरानी रखना चाहती है। सरकार को कदम पीछे खींचना पड़ा। संचार साथी को अनिवार्य करने के फैसले को वापस लेना पड़ा है। छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग का वीएसके ऐप दरअसल, शिक्षकों की स्कूलों में उपस्थिति को दर्ज करने वाला है। दूरदराज और ग्रामीण इलाकों की शालाओं में अक्सर शिक्षकों के गैरहाजिर होने की शिकायतें जनप्रतिनिधि और छात्र करते आ रहे हैं। यह ऐप न केवल शिक्षकों की, बल्कि छात्रों की गतिविधियों को भी रियल टाइम दर्ज करेगा। स्कूल में कौन सी गतिविधियां चल रही हैं, इसका ब्यौरा भी विभाग को मिल जाएगा। छुट्टी के लिए आवेदन भी इसी ऐप के जरिये करना होगा। फायदे तो बहुत हैं, पर शिक्षकों की ओर से उठाया जा रहा निजता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। आदेश को वापस लेने की संभावना कम ही दिखाई देती है क्योंकि यह नई शिक्षा नीति- 2020 के तहत किया गया प्रावधान है। अन्य राज्यों में भी ये ही अथवा इसी तरह के दूसरे ऐप इंस्टाल कराए जा रहे हैं।
जांच और प्रमोशन
पहली जनवरी को भारतीय पुलिस सेवा के वर्ष-08 बैच के डीआईजी स्तर के अफसर आईजी के लिए पात्र हो जाएंगे, इसके लिए डीपीसी की प्रक्रिया चल रही है। मगर इसी बैच के अफसर कमलोचन कश्यप बुधवार को आईजी के पद पर प्रमोट हुए बिना रिटायर हो गए।

कमलोचन कश्यप मूलत: बस्तर के रहने वाले हैं। वो दंतेवाड़ा, और बीजापुर एसपी रह चुके हैं। नक्सल इलाकों में बतौर डीआईजी के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। उम्मीद थी कि साल के अंतिम दिन डीपीसी हो जाएगी, और प्रमोशन लिस्ट जारी होगा। मगर ऐसा नहीं हो पाया।
चर्चा है कि इस बैच के अफसरों के प्रमोशन में कई पेंच है। एक-दो अफसरों के खिलाफ जांच चल रही है। ईडी ने उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए चि_ी राज्य शासन को भेजी है। इन सब वजहों से संबंधित अफसरों को विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं मिल पाया है। उनकी पदोन्नति रुक सकती है। अब आगे क्या होता है यह तो डीपीसी होने के बाद ही पता चल पाएगा।
तीर्थ पर तुलना!
सरकार की तीर्थ यात्रा योजना को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। पिछले दिनों रायपुर जिले के साढ़े 8 सौ लोग अयोध्या, और बनारस की यात्रा में गए थे। यात्रियों को किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए हर संभव प्रयास किए गए थे। सभी यात्रियों को पहचान के लिए परिचय पत्र, और कैप भी दिए गए थे।
ये यात्री अयोध्या पहुंचे, तो वहां अलग ही नजारा देखने को मिला। महाराष्ट्र से भी सैकड़ों की संख्या में तीर्थयात्री अयोध्या पहुंचे थे। महाराष्ट्र के तीर्थ यात्री केसरिया टोपी लगाए थे, तो छत्तीसगढ़ के तीर्थ यात्री सफेद टोपी लगाए हुए थे। अयोध्या में मिले दोनों ही राज्य के यात्री अपनी-अपनी सरकारों द्वारा की गई व्यवस्थाओं की पूछपरख कर रहे थे।
रायपुर से गए यात्रियों ने पूरे सफर के दौरान की गई व्यवस्थाओं से संतुष्टि जताई है। खासकर ट्रेन में मिले भोजन, नाश्ते की गुणवत्ता को बेहतर बताया। साथ ही रात्रिकालीन आवासीय व्यवस्था को भी घर जैसा ही माना। बस, इस यात्रा में बुजुर्ग कम पार्टी कार्यकर्ता और उनके सगे संबंधी अधिक रहे।
देवेंद्र और भूपेश की दूरी
भिलाई के कांग्रेस विधायक देवेन्द्र यादव का भिलाई से जुड़ी समस्याओं को लेकर अनशन तो तीन दिन पहले खत्म हो गया, लेकिन उनके अनशन से पूर्व सीएम भूपेश बघेल खेमा दूर रहा। पार्टी के अंदरखाने में इसकी काफी चर्चा है। देवेन्द्र बिहार कांग्रेस के प्रभारी सचिव हैं, और वो हाईकमान से सीधे जुड़े हैं। यहां भी उनका अलग खेमा तैयार हो गया है, जिसमें युवक कांग्रेस व एनएसयूआई के पदाधिकारी हैं। चर्चा है कि भूपेश बघेल, देवेन्द्र की कार्यशैली से नाखुश बताए जाते हैं।
और जब देवेन्द्र यादव आधा दर्जन मांगों को लेकर भिलाई के सिविक सेंटर में अनशन पर बैठे, तो भूपेश बघेल नहीं गए। देवेन्द्र समर्थकों की कोशिश थी कि पूरे दुर्ग संभाग के नेता अनशन के समर्थन में साथ आ दिखे। मगर उनकी कोशिश सफल नहीं हो पाई। पूर्व नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे अनशनरत देवेन्द्र से मिलने नहीं गए। हालांकि पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू और पूर्व विधायक अरुण वोरा ने देवेन्द्र को समर्थन देने अनशन स्थल पहुंचे थे। देवेन्द्र का अनशन पांच दिन चला। संगठन का हाल यह रहा कि भूपेश के करीबी दुर्ग ग्रामीण के जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर नजर नहीं आए।
इसी तरह दुर्ग शहर के जिलाध्यक्ष धीरज बाकलीवाल ने भी देवेन्द्र के अनशन से दूरी बना ली थी। इससे परे भूपेश के करीबी भिलाई जिलाध्यक्ष मुकेश चंद्राकर एक दिन जरूर देवेन्द्र के साथ रहे, लेकिन अगले दिन से वो भी गायब हो गए। कुल मिलाकर देवेन्द्र के प्रदर्शन से भूपेश खेमे ने दूरी बना ली थी। हालांकि अनशन खत्म होने के बाद देवेन्द्र, पूर्व सीएम भूपेश बघेल से मिलने भिलाई-3 स्थित निवास भी गए थे। फिर भी भूपेश, देवेन्द्र को खास तवज्जो नहीं दे रहे हैं। कुल मिलाकर देवेन्द्र का अनशन गुटबाजी से अछूता नहीं रहा।
भारतमाला कई गर्दनों का फंदा
आखिरकार भारतमाला परियोजना मुआवजा घोटाले की ईडी ने पड़ताल शुरू कर दी है। ईडी ने जमीन कारोबारी हरमीत सिंह खनूजा के रायपुर के लॉ विस्टा स्थित घर पर दबिश दी। करीब 16 घंटे तक जांच पड़ताल चलती रही। मुआवजा घोटाले की जांच ईओडब्ल्यू-एसीबी कर रही है। खनुजा सहित आधा दर्जन आरोपी जमानत पर हैं, लेकिन ईडी ने उन्हें फिर घेर लिया है।
रायपुर-विशाखापटनम भारतमाला सडक़ परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहित हुई थी, और रायपुर से सटे अभनपुर-कुरूद आदि जगहों पर अपात्र लोगों को मुआवजा मिल गया। करीब 43 करोड़ रुपए अतिरिक्त भुगतान हुआ है। राज्य सरकार ने भी मुआवजा वितरण में गड़बड़ी को माना है, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई थी। बताते हैं कि नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, उनकी पत्नी कोरबा सांसद डॉ. ज्योत्सना महंत, और रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल के अलावा पूर्व सांसद सुनील सोनी ने घोटाले पर कार्रवाई के लिए केंद्र को चि_ी लिखी थी। केन्द्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया था। इस पर राज्य की जांच एजेंसी, और एनएचएआई (राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण)के बीच मतभेद रहे हैं। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने एनएचएआई के चार अफसरों के खिलाफ भी प्रकरण दर्ज किया है।
एनएचएआई का तर्क है कि मुआवजा वितरण का विषय स्थानीय प्रशासन का था, और एनएचएआई अफसरों की कोई भूमिका नहीं रही है। एनएचएआई ने कार्रवाई के लिए अनुमति नहीं दी है। इसलिए अब तक एनएचएआई के अफसरों से पूछताछ नहीं हो पाई है। अब केंद्र की एजेंसी ईडी जांच में जुटी है, तो सब कुछ साफ होने की उम्मीद जताई जा रही है। चर्चा है कि तत्कालीन कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर नरेन्द्र भुरे से भी पूछताछ हो सकती है। भुरे केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
नई सडक़ के साथ जोर-आजमाइश

कवर्धा की जर्जर सडक़ों ने इस बरसात आम लोगों को खूब परेशान किया। जगह-जगह गड्ढे, कीचड़ और फिसलन के बीच लोगों का आना-जाना मुश्किल हो गया। बारिश थमने के बाद सडक़ों की मरम्मत कराई गई, लेकिन मरम्मत की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ है। दावा किया जा रहा है कि यह वीडियो प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा के क्षेत्र में हाल ही में बनी सडक़ का है। वीडियो में कार से उतरे कुछ लोग सडक़ की सतह को हाथों से ही उखाड़ते दिखाई दे रहे हैं। डामर की पूरी परत इतनी कमजोर है कि वह बिना किसी औजार के सडक़ को छोड़ देती है। वीडियो में सुनाई देता है कि सडक़ तो लोगों के चलने से कुछ दब गई, वरना यह कपड़े की तरह एक झटके में अलग हो जाती। सडक़ के नीचे गिट्टी और मुरूम का बेस दिखाई नहीं दे रहा है।
इस वीडियो को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) और फेसबुक पेज पर साझा किया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ऐसी सडक़ केवल भ्रष्टाचार का नतीजा हो सकती है। कट और कमीशन के खेल में जनता के साथ सीधा छल किया जा रहा है।
वायरल वीडियो पर लोगों की प्रतिक्रियाएं भी कम दिलचस्प नहीं हैं। एक यूजर ने व्यंग्य करते हुए लिखा कि यह तो बड़ी सहूलियत की सडक़ है। उखाड़ो और जहां मन हो वहां ले जाकर बिछा दो, गांव-गली कहीं भी स्थापित कर दो। वहीं दूसरे ने कहा कि कांग्रेसी सडक़ बनवाते नहीं, उखाड़ते ही हैं और जो लोग सडक़ उखाड़ रहे हैं, उनके खिलाफ सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कार्रवाई होनी चाहिए।
कुल मिलाकर सवाल यही है कि नई सडक़ें जनता को राहत देने के लिए बन रही हैं या फिर उसकी मजबूती सिर्फ कागजों में हैं।
नए साल में शुरू नहीं होगी बस्तर ट्रेन
एक केंद्रीय राज्य मंत्री सहित 10 भाजपा सांसदों की केंद्र में मौजूदगी के बावजूद छत्तीसगढ़ से जुड़ी रेलवे और हवाई सेवाओं की जनाकांक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं। खासतौर पर रेलवे से जुड़ी आम लोगों की मांगों पर लंबे समय से सिर्फ आश्वासन चल रहा है। दिल्ली में रेल मंत्री के साथ सांसदों की मुलाकातों की तस्वीरें समय-समय पर सामने आती हैं, जिससे लोगों को उम्मीद बंधती है कि उनके क्षेत्र में रेल सेवाओं का विस्तार होगा, लेकिन उम्मीद बार-बार टूट जाती है।
बात यदि बस्तर को राज्य की राजधानी रायपुर से जोडऩे की करें, तो कभी एक ट्रेन इस जरूरत को काफी हद तक पूरा करती थी। यह ट्रेन थी दुर्ग–जगदलपुर–दुर्ग एक्सप्रेस, जिसकी शुरुआत वर्ष 2012 में हुई थी। यह भले ही सीधे रायपुर तक नहीं पहुंचाती थी, लेकिन दुर्ग पहुंचने के बाद बस्तर के लोगों के लिए राजधानी से जुडऩा आसान हो जाता था। करीब 16 घंटे और 640 किलोमीटर की लंबी यात्रा होने के बावजूद, अधिकतर सफर रात में होने और किराया किफायती होने के कारण यह ट्रेन यात्रियों की पहली पसंद बनी रही।
यह ट्रेन न केवल बस्तर को जोड़ती थी, बल्कि ओडिशा के प्रमुख शहरोंखरियार रोड, कांटाबांजी और रायगढ़ा से भी संपर्क होता था। यूपीए-2 सरकार के दौरान शुरू की गई इस ट्रेन को केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद बंद कर दिया गया। कुछ समय के लिए इसे दोबारा चलाया गया, लेकिन फिर रोक दिया गया। वजह बताई गई कि यह ट्रेन रेलवे की आय के ढांचे में फिट नहीं बैठती।
इस महीने सांसद महेश कश्यप ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात कर इस ट्रेन का मुद्दा उठाया था। मंत्री की ओर से गंभीरता से विचार करने का आश्वासन भी दिया गया। लेकिन हाल ही में जारी नई रेलवे समय-सारिणी में जगदलपुर–दुर्ग–जगदलपुर ट्रेन का नाम नहीं है। इससे बस्तर के लोगों की उम्मीदों को एक बार फिर झटका लगा है।
विडंबना यह है कि रेलवे एक-एक साधारण यात्री ट्रेन के घाटे और मुनाफे का हिसाब तो लगाती है, लेकिन वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी महंगी ट्रेनों से हो रहे नुकसान की चिंता नहीं करती, जिनकी टिकटें आम यात्रियों की पहुंच से बाहर हैं। हजारों यात्रियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने वाली ट्रेन के घाटे को आधार बनाकर बंद कर दिया जाता है।
यह सही है कि रेलवे को नुकसान नहीं होना चाहिए, लेकिन कारोबारी, छात्र और नौकरीपेशा लोग ऐसी ट्रेनों से न सिर्फ यात्रा करते हैं, बल्कि समय और पैसे की बचत भी करते हैं। इस तरह वे देश की अर्थव्यवस्था में कुछ तो योगदान देते हैं। वैसे भी रेलवे आरक्षित टिकटों पर यह स्वीकार करती है कि यात्री सेवाओं के खर्च का बड़ा हिस्सा वह स्वयं वहन करती है।
इधर, बिलासपुर रेलवे जोन देश के सर्वाधिक राजस्व देने वाले जोनों में शामिल है। यहां से कोयला, बॉक्साइट और सीमेंट जैसे खनिजों की मिलियन्स टन ढुलाई रेलवे को निरंतर आय देती है। ऐसे में कम से कम इतनी उम्मीद तो की जा सकती है कि रेलवे बिना नफा-नुकसान की गिनती किए, छत्तीसगढ़ में यात्री सेवाओं का विस्तार करे।
रेल मंत्री वर्ष में दो-तीन बार वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में रेलवे अधोसंरचना पर पहले से कई गुना अधिक खर्च किया जा रहा है। यदि वास्तव में इतनी उदारता और निवेश है, तो फिर रेल सुविधाओं का विकास छत्तीसगढ़ के लोगों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप क्यों नहीं हो रहा है?
एक नियुक्ति, चर्चा ही चर्चा

रिटायर्ड आईएएस अशोक अग्रवाल की राज्य निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग के सचिव पद पर नियुक्ति क्या हुई, वो सोशल मीडिया पर ट्रोल हो गए। ‘छत्तीसगढ़’ ़ ने 22 दिसंबर को दैनिक कॉलम राजपथ-जनपथ में अशोक अग्रवाल की नियुक्ति, और पर्दे के पीछे की कहानी को प्रमुखता से प्रकाशित किया था।
नियामक आयोग के सचिव के पद पर डिप्टी कलेक्टर, अथवा सहायक प्राध्यापक स्तर के अफसर ही पदस्थ होते रहे हैं। अब इस पद पर सचिव स्तर के पद से रिटायर्ड अशोक अग्रवाल की नियुक्ति की गई है। अशोक अग्रवाल सूचना आयुक्त भी रह चुके हैं जो कि हाईकोर्ट जज के समकक्ष का पद है। बावजूद इसके अशोक अग्रवाल कई पायदान नीचे के पद पर काम करने के लिए तैयार हो गए।
पूर्व महाधिवक्ता कनक तिवारी ने राजपथ-जनपथ को फेसबुक पर पोस्ट किया, उस पर काफी प्रतिक्रियाएं आई है। अशोक अग्रवाल को लेकर एक ने लिखा सरकारों को इनसे कितना विशिष्ट फायदा मिलता रहा होगा, यह जांच का विषय होना चाहिए। साथ ही सिविल सर्विसेस के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने योग्य उदाहरण भी है।
एक अन्य यूजर ने लिखा कि ये गलत तरीका है नौकरशाही में। आरटीआई एक्टिविस्ट संजय सिंह ठाकुर ने लिखा कि रायपुर कमिश्नर रहा व्यक्ति, रिटायरमेंट के बाद सूचना आयुक्त बना, फिर रोडक्रास में, और अब विवि नियामक आयोग में क्लास-टू पद पर...। सरकार और इसने दोनों ने ही लाज शर्म बेच खाई है। कुल मिलाकर अशोक अग्रवाल की नियुक्ति की काफी चर्चा हो रही है।
अब बारी एल्डरमैन की
चर्चा है कि सरकार के भीतर नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति के लिए सहमति नहीं बन पाई है। प्रदेश की कुल पौने दो सौ निकायों में साढ़े सात सौ से अधिक एल्डरमैन(मनोनीत पार्षद) की नियुक्ति होनी है।
सरकार से जुड़े कुछ का मानना है कि एल्डरमैन की नियुक्ति से सिर्फ फिजूलखर्ची होती है। ऐसे में नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। नियुक्ति के प्रावधान को ही खत्म करने का सुझाव दिया गया है। जबकि सांसद-विधायक, कार्यकर्ताओं को उपकृत करने के लिए एल्डरमैन नियुक्त करने के लिए दबाव बना रहे हैं। नगर निगमों में आठ, नगर पालिकाओं में पांच, और नगर पंचायतों में तीन एल्डरमैन नियुक्त किए जा सकते हैं। इस तरह 759 एल्डरमैन नियुक्त होना है। कहा जा रहा है कि प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद नए प्रभारी की नियुक्ति होनी है। नए प्रभारी के आने के बाद निगम-मंडलों, और एल्डरमैन की नियुक्ति पर फैसला हो सकता है। फिलहाल तो पद के आकांक्षी कार्यकर्ताओं को इंतजार करना होगा।
महादेव की जांच का क्या?
चर्चा है कि महादेव ऑनलाइन सट्टेबाजी प्रकरण पर जांच रोक दी गई है। पिछली सरकार में महादेव ऑनलाइन सट्टा प्रकरण में कई नामी लोगों के नाम आए थे। कई पुलिस अफसर जांच के घेरे में आए थे, और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों, और अन्य लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी।
ताजा जानकारी यह है कि महादेव सट्टेबाजी केस से जुड़े सारे अभियुक्त जमानत पर रिहा हो चुके हैं। पहले ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर कोई कानून नहीं था। अब केन्द्र सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग एक्ट लाया है, जो कि 1 अक्टूबर 2025 से प्रभावशील हो गया है। इस कानून के तहत, देश में ऑनलाइन मनी गेमिंग यानी रुपए लगाकर खेले जाने वाले सभी गेमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसमें ऑनलाइन जुआ, सट्टेबाजी शामिल है। पहले कोई एक्ट नहीं था, फिर भी जांच एजेंसियां कार्रवाई कर रही थी। ऐसे में कार्रवाई में आरोपियों को सजा दिलवाना कठिन था। लिहाजा, पुराने पेंडिंग केसों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
सोशल मीडिया पर आकांक्षा को समर्थन
सरगुजा की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर आकांक्षा टोप्पो को मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े और सीतापुर विधायक रामकुमार टोप्पो के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों के प्रयोग के आरोप में बीएनएस की धारा 352 (2) के तहत गिरफ्तार किया गया। इस मामले में शिकायत मंत्री और विधायक के समर्थक किसी कार्यकर्ता द्वारा की गई थी। चूंकि इस धारा में अधिकतम दो वर्ष की सजा का प्रावधान है, इसलिए आकांक्षा को थाने से ही जमानत पर रिहा कर दिया गया। यह धारा आईपीसी की पुरानी धारा 504 का संशोधित रूप है, जो जानबूझकर गाली-गलौज या ऐसे इशारों से जुड़ी है, जिनका उद्देश्य सामने वाले को उकसाकर सार्वजनिक शांति भंग कराना हो।
आकांक्षा की गिरफ्तारी जिस इंस्टाग्राम वीडियो के आधार पर हुई, उसमें उन्होंने मंत्री और विधायक को एक परिवार को बेघर किए जाने के लिए जिम्मेदार ठहराया है। यह परिवार 12 सदस्यों का है, जिनमें चार मूक-बधिर हैं। बताया गया है कि वे लोग पिछले 70 वर्षों से उसी जमीन पर रह रहे हैं, जहां अब आंगनबाड़ी भवन बनाने का प्रस्ताव है। बेदखली की कार्रवाई न रोके जाने से आहत होकर इस परिवार ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर इच्छा मृत्यु की मांग की थी, जिसके आधार पर आकांक्षा ने अपना वीडियो तैयार किया।
यह पहला मौका नहीं है जब आकांक्षा सोशल मीडिया पर चर्चा में आई हों। अंबिकापुर शहर और सरगुजा क्षेत्र की जर्जर सडक़ों पर बनाए गए उनके कई रील्स लाखों बार देखे जा चुके हैं। हालांकि, जिस रील को लेकर यह विवाद खड़ा हुआ, उसमें की गई कुछ टिप्पणियों को पुलिस ने आपत्तिजनक माना है। जैसे मंत्री के लिए ‘वही औरत’, ‘घमंडी’ जैसे शब्दों का प्रयोग और यह टिप्पणी कि- विधायक और मंत्री दोनों का दिमाग क्या घुटने में चला गया है?
वीडियो में आकांक्षा यह भी कहती हैं कि दिल्ली में मंत्री ने अपने ड्राइवर को यह कहकर गाड़ी से उतार दिया था कि उसने शराब पी रखी है। इसे महिला सम्मान का मुद्दा बताया गया। वहीं, जब दिव्यांग महिलाएं और उनका परिवार घर से बेदखल किए जा रहे हैं, तो उन्हें वही महिला सम्मान क्यों नजर नहीं आता? आकांक्षा मंत्री के क्षेत्र बिहारपुर में खोले गए आईटीआई का उदाहरण भी देती हैं, जहां संस्थान तो है लेकिन प्रशिक्षक नहीं। छात्रों की मांगें वर्षों से सुनी नहीं जा रही हैं। इसके अलावा, उन्होंने मंत्री की 2022 की एक प्रचार सामग्री का क्लिप भी साझा किया है, जिसमें शराब बिक्री के खिलाफ तत्कालीन कांग्रेस सरकार के विरुद्ध आंदोलन का उल्लेख है। आकांक्षा के मुताबिक आज इसी मंत्री के ही इलाके में चार नई शराब दुकानें खुल चुकी हैं।
गिरफ्तारी के बाद आकांक्षा की यही रील और अधिक वायरल हो गई। केवल इंस्टाग्राम पर इसे अब तक लगभग 3.5 लाख बार देखा जा चुका है और करीब 25 हजार लाइक्स मिल चुके हैं। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने उनका समर्थन किया है। हाई कोर्ट के कुछ अधिवक्ताओं ने भी उनका मुकदमा लडऩे की पेशकश की है।
इन सबके बीच सबसे अहम पहलू इस वीडियो पर आए कमेंट्स हैं। कुछ लोगों ने जरूर लिखा कि मुद्दों से वे सहमत हैं, लेकिन बोलने का तरीका संयमित होना चाहिए। इसके बावजूद, अधिकांश यूजर्स ने आकांक्षा की खुलकर सराहना की है। उनका हौसला बढ़ाया जा रहा है, सच को सामने लाते रहने की उम्मीद रखी गई है। सवाल यही है कि ऐसा क्यों है? मंत्री और विधायक माननीय जनप्रतिनिधि हैं, लेकिन इस मामले में उन्हें समर्थन क्यों नहीं मिल पा रहा?
बाहर जाने के नुकसान
आईपीएस के एक अफसर को अपने प्रमोशन के लिए लड़ाई लडऩी पड़ रही है। कैडर लिस्ट के हिसाब से तो अफसर को डीआईजी के पद पर प्रमोट होना चाहिए था, लेकिन वो अभी एसपी हैं। अफसर पहले दो जिलों के एसपी रह चुके हैं। वर्तमान में एसपी के रूप में तीसरा जिला संभाल रहे हैं।
प्रमोशन लिस्ट में अफसर अपने बैच के बाकी अफसरों से पीछे चल रहे हैं। उन्होंने कैट में याचिका भी दायर की थी। कैट से उनके पक्ष में फैसला भी आ गया, लेकिन प्रमोशन पर पीएचक्यू में कोई फैसला नहीं हो पाया है। दरअसल, अफसर, राज्य पुलिस सेवा से आए हैं। वो छत्तीसगढ़ नहीं आना चाहते थे।
वो मध्यप्रदेश में ही पदस्थ रहे, लेकिन आईपीएस अवार्ड का समय आया, तो वो अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर छत्तीसगढ़ आ गए। इससे छत्तीसगढ़ कैडर के उनके बैच के बाकी अफसर खफा हो गए, और इसकी शिकायत गृह विभाग में की गई। साथियों को नाराज करना अफसर को भारी पड़ रहा है। उनके बैचमेट तो प्रमोट हो चुके हैं, लेकिन वो अटके पड़े हैं। नए साल में अफसर को प्रमोशन मिल पाता है या नहीं, यह देखना है।
संपन्न लोगों को प्राथमिकता!
प्रदेश भाजपा के मोर्चा-प्रकोष्ठों में पखवाड़े भर पहले संयोजक-सहसंयोजकों की नियुक्ति हुई, और नए पदाधिकारियों ने काम शुरू भी कर दिया है। जिला स्तर पर अध्यक्षों की खोज चल रही है। प्रदेश संयोजक, जिलों में ऐसे नेताओं को चाहते हैं, जो आर्थिक रूप से सक्षम भी हो। ताकि छोटे-मोटे कार्यक्रमों पर खर्चों के लिए प्रदेश दफ्तर की तरफ न देखना पड़े।
बताते हैं कि उत्साही संयोजकों ने जिलों में अटलजी की जयंती को जोर शोर से मनाने के लिए निर्देश जारी किए थे। ताकि मोर्चा-प्रकोष्ठों की अपनी अलग पहचान नजर आए। कुछ जिलों में तो कार्यक्रम बेहतर ढंग से हुआ। मगर एक-दो जगहों में कार्यक्रमों में दिक्कत आ गई। जिले के नेताओं ने आर्थिक तंगी का हवाला दे दिया। अब संयोजक ऐसे नेताओं को जिले की कमान सौंपना चाहते हैं, जो जरूरत पडऩे पर कार्यक्रमों का खर्चा खुद भी वहन कर सके।
नौ सौ गवाह, 10 साल लगेंगे?
आखिरकार ईडी ने चर्चित शराब घोटाला केस में शुक्रवार को जिला विशेष अदालत में अंतिम चालान पेश कर दिया। करीब साढ़े 37 करोड़ के घोटाला में 81 आरोपी हैं। नौवें चालान में 59 नए आरोपी बनाए गए हैं। इनमें आबकारी विभाग के वे सभी अधिकारी शामिल हैं जिन्हें गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली हुई है।
सुप्रीम कोर्ट ने शराब घोटाला केस में ईडी को तीन माह के भीतर अंतिम चालान पेश करने के आदेश दिए थे, और इसके बाद चालान प्रस्तुत किया है। पूर्व मंत्री कवासी लखमा, पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा, निरंजन दास समेत कई और आरोपी अब भी जेल में हैं। विशेष अदालत में अब जल्द ट्रायल शुरू होगा।
जानकारों का मानना है कि सुनवाई पूरी होते तक पांच से 10 साल तक का समय लग सकता है। ईडी ने 9 सौ गवाहों की सूची दी है। इतनी गवाहों के बयान,और क्रॉस एग्जामिन में वक्त तो लगेगा ही। तब तक राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप चलते रहेंगे।
नए साल में बस्तर का पर्यटन

नक्सल हिंसा में कमी का असर बस्तर के पर्यटन उद्योग में दिखाई दे रहा है। पहले नक्सली भय से बंद पड़े कई स्थल अब खुल गए हैं। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, चित्रकोट और तीरथगढ़ जैसे स्थलों पर पर्यटकों की भीड़ इन दिनों बढ़ गई है। खबरों के मुताबिक नए साल के लिए जगदलपुर और अन्य जिलों के होटल व रिसॉर्ट्स में बुकिंग लगभग फुल है। पड़ोसी तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा राज्यों से भी पर्यटक बड़ी संख्या में आ रहे हैं। यह सिलसिला नए साल और उसके बाद तक चलेगा। कुछ समय से यहां आत्मसमर्पित नक्सली पांडुम कैफे जैसे प्रयोग के जरिये पर्यटकों का ध्यान खींच रहे हैं। होमस्टे, गाइड, हस्तशिल्प और इको-टूरिज्म में आदिवासी युवा जुड़ रहे हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि बस्तर में आने वाले दिनों में पर्यटन व्यवसाय को नई उड़ान मिलने वाली है। इसका संकेत बस्तर में नए साल के लिए हुई बुकिंग से ही पता चल जाता है। अभी तो स्थानीय आदिवासियों को जोडऩे की बात हो रही है, लेकिन जैसे ही बड़े औद्योगिक घराने इस व्यवसाय में भविष्य की संभावनाओं को देखेंगे तो वे बड़ा निवेश करेंगे। ऐसे में खतरा यह है कि स्थानीय युवाओं को हाशिये पर न धकेल दिया जाए और व्यवसाय उनके हाथ से छिन जाए। दूसरी बात, बस्तर अपनी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों, झरनों, गुफाओं और समृद्ध आदिवासी संस्कृति के लिए ही विश्वविख्यात है। जब बड़ी पूंजी निवेश की जाएगी, तब उसे अक्षुण्ण बनाए रखना भी एक चुनौती भरा काम होगा।
...और भनक नहीं लगी

राज्य का नया बजट बनने लगा है। इससे पहले अधिकारी कर्मचारी संघ ने अपने-अपने वेतन भत्तों मांगों को लेकर दबाव बनाने धरना-प्रदर्शन-हड़ताल करने लगे हैं। तो कुछ कंबल ओढक़र घी पीने में सफल हो रहे हैं। ऐसे ही राज्य अधीनस्थ वित्त सेवा के अधिकारी अपना ग्रेड पे बढ़ाने में सफल रहे। यह इतनी गोपनीय तरीके से किया गया कि इसकी जीएडी और वित्त में काम करने वाले कर्मियों को भी भनक नहीं लगी। इनका कहना है कि राज्य वित्त सेवा के अधिकारी मंत्रालय में बैठ कर अपनी सभी मांगों/आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेते हैं, अन्य विभागों के लिए बजट और नियमों का हवाला देते हैं।
अब इसे लेकर दीगर कर्मचारी संघों में बवाल मच गया है। वे भी हलचल बढ़ा रहे हैं। खासकर मंत्रालय संघ इसी ग्रेड के समकक्ष अपने साथियों के लिए भी मांग बुलंद करने अपने नेताओं को जागृत करने में जुट गए हैं। उनका कहना है कि सचिवालय सेवा को छोड़ सबका भला हो जाता है।और अपने मुंह ताकते रह जाते हैं।
ना कोई मांग, ना कोई विरोध, ना कोई हड़ताल,ना कोई चर्चा। आखिर ये वेतनमान किस आधार पर बढ़ाया गया इसका पता लगाना चाहिए और जीएडी ने भी सहमति दे दी,बिना किसी परीक्षण के। और फिर इसके आधार पर संघ को मंत्रालय के सभी पदों के वेतनमान बढ़ाने के लिए ज्ञापन देना चाहिए। मंत्रालय संवर्ग के एएसओ, का ग्रेड पे 9 से 10 करने और एसओ का भी ग्रेड पे 5400 करने के लिए। ऐसे ही, चुप रहे तो मंत्रालय कर्मचारियों का कुछ नहीं होगा। हमारे तो बिना वित्तीय भार वाला काम भी नहीं हो पा रहा है। संघ वाले ज्ञापन दे कर भूल जाते हैं।
उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि ऐसा कोई विभाग बता दे जहां 4400 के बाद कोई 6600 में सीधा प्रमोट होता है और ऐसा कोई विभाग बता दे जिनका 4300 का प्रमोशन 5400 में नहीं होता है। इसलिए संघ को भी सहायक अनुभाग अधिकारी का वेतनमान मैट्रिक्स लेवल -9 के स्थान पर मैट्रिक्स लेवल-10 किये जाने की मांग सरकार से करना चाहिए।
बाबा आए हैं तो आपके खर्चे पर
बाबा बागेश्वर धाम के एक इंस्टाग्राम पेज में बताया गया है कि 25 दिसंबर को महाराज जी हवाई मार्ग से रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट पर उतरे। जनप्रतिनिधियों ने ढोल, नगाड़ों और पुष्पवर्षा से उनका स्वागत किया। जानकारी साझा की गई वे मिनी इंडिया कहे जाने वाले दुर्ग-भिलाईवासियों को अगले 5 दिन तक हनुमंत कथा सुनाएं। एक दिन ‘दिव्य दरबार’ लगाएंगे। यह भी बताया गया है कि इस दौरान उनका स्वागत करने वालों में कई भाजपा नेता शामिल थे, जिनमें भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे और छत्तीसगढ़ सरकार के कैबिनेट मंत्री गुरु खुशवंत साहेब भी शामिल थे..। यहीं पर इस सूचना में थोड़ी गड़बड़ी दिख रही है। मंत्री खुशवंत सिंह का 24 दिसंबर को अधिकारिक तौर पर जारी दौरा कार्यक्रम बताता है कि वे 25 दिसंबर को सुबह स्टेट प्लेन से सतना गए और बाबा बागेश्वर धाम उर्फ धीरेंद्र शास्त्री को लेकर वापस लौटे। साझा चित्र भी यही बताता है कि धीरेंद्र शास्त्री स्टेट प्लेन से ही आए हैं। उनके साथ ही तो मंत्री भी आए। साफ-साफ नहीं लिखा गया कि राज्य सरकार का विमान धीरेंद्र शास्त्री को लेने के लिए भेजा गया। खाली शासकीय विमान भेजकर शास्त्री को लाया नहीं जा सकता है। इसकी पात्रता वे नहीं रखते। इसलिये मंत्री जी ने व्यस्त समय निकाला और उन्हें लेने के लिए सतना पहुंचे। आभार प्रगट करना तो बनता है। इस बारे में कोई बात ही पोस्ट में नहीं है। अब, सोशल मीडिया पर कुछ लोग कह रहे हैं कि राज्य की जनता के टैक्स और संसाधन को बाबा को लाने में बर्बाद किया जा रहा है।
प्रमोशन नए साल में?

अगले कुछ दिनों में आईपीएस अफसरों की प्रमोशन लिस्ट जारी हो सकती है। इनमें डीआईजी से आईजी, और एसएसपी से डीआईजी की प्रमोशन लिस्ट है। ये सारे अफसर एक जनवरी से प्रमोट होंगे।
आईपीएस के वर्ष-2008 बैच के अफसर, जो वर्तमान में डीआईजी के पद पर हैं। ये सभी एक जनवरी से आईजी के पद पर प्रमोट हो सकते हैं। प्रमोशन लिस्ट में सुश्री पारूल माथुर, प्रशांत कुमार अग्रवाल, नीथू कमल, डी श्रवण, मिलना कुर्रे, और कमलोचन कश्यप का नाम शामिल है। डी श्रवण और नीथू कमल केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। कमलोचन कश्यप 31 दिसंबर को रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में कमलोचन कश्यप प्रमोट हो पाएंगे या नहीं, इसको लेकर संशय है। इनके अलावा वर्ष-2012 बैच के आईपीएस बिलासपुर एसपी रजनेश सिंह, जशपुर एसपी शशि मोहन सिंह, बेमेतरा एसपी रामकृष्ण साहू, और आशुतोष सिंह डीआईजी प्रमोट होंगे।
दूसरी तरफ, वर्ष-2013 बैच के अफसर एसएसपी के पद पर प्रमोट हो जाएंगे। इनमें जीतेन्द्र शुक्ला, मोहित गर्ग, अभिषेक पल्लव, और भोजराम पटेल है। इनमें से भोजराम पटेल ही मुंगेली एसपी के पद पर हैं। चर्चा है कि जनवरी में आईपीएस अफसरों की एक बड़ी ट्रांसफर लिस्ट निकल सकती है। रायपुर में पुलिस कमिश्नर की पोस्टिंग के साथ ही लिस्ट जारी होगी। रायपुर में कमिश्नर के अलावा दो एसएसपी स्तर के अफसर पोस्टेड होंगे। इन सबको देखते हुए पीएचक्यू में हलचल है।
अब मिलने में कुछ मुश्किल
छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन के पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद मेल मुलाकात आसान नहीं है। नबीन से मिलने देशभर से पार्टी के नेता दिल्ली पहुंच रहे हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि नबीन का सबसे मिल पाना मुश्किल है। वो फिलहाल विधायक-सांसदों, और मंत्री का दर्जा प्राप्त निगम-मंडल के पदाधिकारियों से ही सीधे मुलाकात कर रहे हैं।
नबीन अगले दो-तीन महीने में पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्ष बन जाएंगे। इस वजह से देशभर के भाजपा के नेता उनसे मुलाकात के लिए लालायित हैं। छत्तीसगढ़ के कई नेता दिल्ली में डेरा डाले हुए थे, लेकिन उन्हें मुलाकात के लिए समय नहीं मिल पाया। ये अलग बात है कि पार्टी के कई सांसद, और विधायक नबीन से मिल आए हैं। अब कुछ नेता अपने साथ विधायक को तैयार कर दिल्ली ले जा रहे हैं ताकि विधायक के साथ उनकी भी मुलाकात हो जाए। पार्टी के नेताओं को इसमें सफलता भी मिली है।
नबीन को पहले की तरह किसी से मुलाकात से परहेज नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद बधाई देने के लिए मुलाकातियों का तांता लगा है। देशभर से आ रही भीड़ को देखते हुए पार्टी कार्यालय ने उनसे मुलाकात के लिए नियम भी बना दिए हैं। चर्चा है कि नबीन जनवरी-फरवरी में छत्तीसगढ़ आ सकते हैं। उन्होंने एक-दो नेताओं को मुलाकात में संकेत भी दिए हैं। नबीन का पूरा ध्यान बंगाल के विधानसभा चुनाव पर है, और वो ज्यादा वक्त बंगाल में देंगे। कुल मिलाकर नबीन के कार्यकारी अध्यक्ष बनने से छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता काफी खुश हैं।
कंप्यूटर नहीं तो चश्मा भत्ता दे सरकार

राज्य सरकार के सौ से अधिक संगठनों वाले अधिकारी कर्मचारी फेडरेशन 29 तारीख से हड़ताल पर जा रहा है। इसे टालने के लिए सरकार के समक्ष 11 मांगे रखीं गई हैं। इनमें से क?ई तो वर्षों, दशक भर पुरानी है। इससे इतर मंत्रालय कर्मचारी संघ के अहम घटक कहे जाने वाले अनुभाग अधिकारी भी काम बंद करने की तैयारी कर रहे हैं। मंत्रालयीन व्यवस्था अनुसार उनका अनुभाग अधिकारी बनने के बाद 500 कंप्यूटर भत्ता नहीं दिया जाता। इसके पीछे जीएडी का तर्क रहता है कि सहायक ग्रेड-3 से 1 के लिपिकों की तुलना में काम कम करना पड़ता है। लेकिन इन अनुभाग अधिकारियों का कहना है कि दिन भर नीचे से आई नोटशीट को अवर सचिव, और उप्र तक कैरी फॉरवर्ड करने के लिए तो दिन भर कंप्यूटर स्क्रीन पर टकटकी लगाए रहना पड़ता है न। आंख तो इस्तेमाल करना पड़ता है। रेटिना पर असर तो पड़ता है। इसे लेकर सभी अनुभाग अधिकारी एक ज्ञापन सौंपने जा रहे हैं। इसमें कहा गया है कि शासन के अधीन पूर्व में तृतीय वर्ग कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे, उस अवधि में शासन के प्रचलित नियमों के अनुसार हमें 500/- प्रतिमाह कंप्यूटर भत्ता प्रदान किया जाता था। अनुभाग अधिकारी पदोन्नति उपरांत राजपत्रित अधिकारी बनने के पश्चात हमारा कंप्यूटर भत्ता बंद कर दिया गया है, जबकि वर्तमान में सभी के द्वारा कार्यालयीन कार्यों हेतु कंप्यूटर/डिजिटल उपकरण का नियमित रूप से उपयोग किया जा रहा है, जैसे—ई-ऑफिस कार्य पत्राचार, प्रतिवेदन/नोटशीट तैयार करना
ऑनलाइन पोर्टल एवं सॉफ्टवेयर का उपयोग कर रहे हैं। कार्य की प्रकृति एवं डिजिटल दायित्वों को दृष्टिगत रखते हुए यह न्यायसंगत प्रतीत होता है कि पदोन्नति उपरांत भी 500/- प्रतिमाह कंप्यूटर भत्ता प्रदान किया जाए, जिससे कर्मचारियों/ अधिकारियों को तकनीकी कार्य संपादन में प्रोत्साहन मिल सके। इनका कहना है कि यह भत्ता नहीं दे सकते तो चश्मा भत्ता दिया जाए क्योंकि शासन के ही काम काज से आंखें खराब हुईं हैं। इनका कहना है कि हम विधायकों की तरह दैनिक क्षेत्र भत्ता (टीएडीए),प्लेन ट्रेन के मुफ्त यात्रा कूपन थोड़ी मांग रहे।
आखिर प्रतिमा ने सूरज देखा
राजधानी रायपुर के फुंडहर चौक पर सीएम विष्णुदेव साय ने दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर गुरुवार को प्रतिमा का अनावरण किया। छत्तीसगढ़ निर्माता अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा पिछले तीन माह से लगकर तैयार थी। मगर अलग-अलग कारणों से टलती रही।
भाजपा संगठन के नेताओं ने पीएम नरेंद्र मोदी से अटल जी की प्रतिमा अनावरण का कार्यक्रम तैयार किया था। पहले राज्योत्सव के मौके पर पीएम के हाथों अनावरण होना था, लेकिन उसी दौरान पीएम का विधानसभा परिसर में अटल जी की प्रतिमा का अनावरण कार्यक्रम था। इसलिए फुंडहर चौक की प्रतिमा के अनावरण कार्यक्रम को आगे बढ़ा दिया गया। इसके बाद पीएम 28 से 30 नवंबर तक डीजीपी-आईजी कॉन्फ्रेंस के सिलसिले में रायपुर में थे। पार्टी संगठन ने प्रतिमा अनावरण के लिए पीएमओ को प्रस्ताव भेजा था। मगर पीएमओ से यह संदेश दिया गया कि पीएम, डीजीपी-आईजी कॉन्फ्रेंस को छोड़ किसी और कार्यक्रम में नहीं शामिल होंगे। अंतत: प्रतिमा अनावरण के साथ रोड-शो का कार्यक्रम टल गया। आज अटल जी का 101वां जन्मदिवस है। पार्टी की पहल पर सीएम ने पीएम की प्रतिमा का अनावरण किया। इस मौके पर डिप्टी सीएम अरुण साव, और पार्टी के सभी प्रमुख पदाधिकारी मौजूद थे।
सलामी गारद का विसर्जन
छत्तीसगढ़ सरकार ने बुधवार को एक आदेश जारी कर मंत्रियों, नेताओं, और सीनियर अफसरों को दिए जाने वाले गार्ड ऑफ ऑनर की परंपरा को समाप्त कर दिया है। ब्रिटिश शासन के समय से चली आ रही परंपरा को खत्म करने की पहल खुद डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने की। वो खुद भी इसके दायरे में आएंगे।
राज्य के भीतर मंत्रियों के सामान्य दौरों, आगमन-प्रस्थान, और निरीक्षण के दौरान गृह मंत्री व अन्य मंत्रियों, डीजीपी के अलावा अन्य सीनियर अफसरों को जिले के दौरे, भ्रमण या निरीक्षण के समय गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता रहा है। इस प्रचलित व्यवस्था में संशोधन किया गया है। यह फैसला अचानक नहीं लिया गया। चर्चा है कि उत्तर प्रदेश में गार्ड ऑफ ऑनर से जुड़े हाल ही में एक विवाद को ध्यान में रखकर फैसला लिया गया है।
उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में पिछले दिनों प्रख्यात कथावाचक पुंडरीक महाराज को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इस पर काफी विवाद हुआ, और इस मामले में एसपी को जवाब-तलब किया गया। बताते हैं कि बहराइच एसपी रामनयन सिंह खुद परेड के आगे चल रहे थे। इस पर राजनीतिक दलों ने एसपी की काफी आलोचना की है। प्रोटोकॉल के मुताबिक संवैधानिक पदों पर आसीन अतिविशिष्ट व्यक्तियों, और मंत्रियों को ही गार्ड ऑफ ऑनर देने की परंपरा रही है। मगर एसपी ने इसका ध्यान नहीं रखा। कहा जा रहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने इस तरह के विवादों से बचने के लिए पहले ही नियमों में संशोधन कर दिया है।
हालांकि सरकार की तरफ से यह कहा गया कि पुलिसबल की कार्यक्षमता बढ़ाने, और औपनिवेशिक परंपराओं को समाप्त करने के उद्देश्य से गार्ड ऑफ ऑनर से जुड़े नियमों में संशोधन किया गया। गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, शहीद पुलिस स्मृति दिवस, राष्ट्रीय एकता दिवस, राजकीय समारोह, पुलिस दीक्षांत समारोहों और वीवीआईपी के लिए गार्ड ऑफ ऑनर की व्यवस्था पहले की तरह जारी रहेगी।
निगम-मंडल की अगली लिस्ट?
चर्चा है कि सरकार के निगम-मंडलों के पदाधिकारियों की एक और लिस्ट विधानसभा के बजट सत्र के बाद जारी हो सकती है। पार्टी ने निगम-मंडलों के उपाध्यक्ष, और संचालकों की सूची तैयार रखी है। ये सूची जारी होने वाली थी, लेकिन पार्टी के रणनीतिकारों ने थोड़ा और रुक कर जारी करने का फैसला लिया है।
बताते हैं कि निगम-मंडलों के पदाधिकारियों की सुविधाओं को लेकर पहले से ही किचकिच चल रही है। जरूरी नियुक्तियां हो चुकी है। ऐसे में बजट सत्र के बाद 50 से अधिक नेताओं को निगम-मंडलों में पद दिए जाएंगे। इससे पहले पार्टी प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्यों की सूची को अंतिम रूप देने में लगी है। प्रदेश कार्यकारिणी की सूची अगले दो-तीन दिनों में जारी हो सकती है।
हेल्थ कैंपों की भीड़, कमजोरी का भी आईना
सरगुजा से बस्तर तक, रायपुर से गौरेला-पेंड्रा-मरवाही तक, छत्तीसगढ़ के किसी भी कोने में जब मेगा हेल्थ कैंप लगते हैं, तो मरीजों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। हाल ही में रायपुर के मेगा हेल्थ कैंप-2025 में हजारों मरीज पहुंचे, जहां उन्हें मुफ्त जांच और इलाज की सुविधा उपलब्ध मिली। ऐसे शिविरों का आयोजन करने वाले संगठनों और व्यक्तियों के प्रयास कई जिंदगियां बचाते हैं। मगर, सवाल यह है कि इन कैंपों में इतनी भीड़ क्यों लगती है?
जवाब ढूंढना आसान है। राजधानी रायपुर का मेकाहारा राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। यहां लगभग 1340 बेड हैं। यहां भी आठ विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। रोजाना सैकड़ों मरीज ओपीडी में आते हैं, फिर भी विशेषज्ञ सेवाओं की कमी से कई को रेफर करना पड़ता है। 960 बिस्तरों वाले एम्स में बढ़ती मरीजों की संख्या के चलते वेटिंग चलती रहती है, सिफारिशें लगानी पड़ती हैं। डीकेएस में भी विशेषज्ञों की भारी कमी है।
बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी है। रूरल हेल्थ स्टेटिस्टिक्स- ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी की एक रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी सबसे अधिक छत्तीसगढ़ में हैं, लगभग 71 प्रतिशत पद खाली। आदिवासी इलाकों में पहुंच कठिन है, सडक़ें नहीं हैं। पिछले दिनों बालोद जिले की तस्वीर आई थी कि किसी तरह 10 किलोमीटर पहाड़ी में चलकर खाट पर मरीज को सडक़ तक लाया गया तब एंबुलेंस मिली। खाट और कंधे पर मरीजों और शवों को ढोने की तस्वीरें आती ही रहती हैं। कई जगहों पर विशेषज्ञ डॉक्टर सालों से नहीं आए। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जैसे नए जिलों में तो और बुरा हाल है। यहां के एक स्वास्थ्य केंद्र का प्रभार तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को सौंपना पड़ा था। बलरामपुर-रामानुजगंज से लेकर जीपीएम तक आदिवासी जिलों में मलेरिया, कुपोषण और अन्य संक्रामक रोग आम हैं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने से मौतें होती हैं।
बिल्डिंग तो बन जाती हैं, लेकिन सुविधाएं नहीं शुरू होतीं। बिलासपुर के कोनी में मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल का उद्घाटन दो साल पहले हो चुका है, लेकिन अभी तक केवल ओपीडी स्तर की सेवाएं ही चल रही हैं। राज्य में कई जिला अस्पतालों में आईसीयू की सुविधा नहीं है। सीटी स्कैन, एमआरआई और डायलिसिस जैसी आवश्यक मशीनें भी नहीं हैं। नए जिलों में इसका अभाव ज्यादा दिखा है।
2024-25 में नए मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों के लिए 1390 करोड़ से अधिक की मंजूरी बजट में मिली, लेकिन समस्या भर्तियों की है। राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ में डॉक्टर-मरीज अनुपात का फासला बड़ा है। मजबूरन, आम लोग महंगे निजी अस्पतालों का सहारा लेने को मजबूर होते हैं या फिर ऐसे ही मेगा कैंपों की राह देखते हैं।
4 वर्ष बाद नए सीएस को मौका
करीब 4 वर्ष बाद किसी नए मुख्य सचिव (विकास शील) को देश भर के मुख्य सचिवों के राष्ट्रीय कॉफ्रेंस में शामिल होने का अवसर मिलेगा। ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि बीते 4 सम्मेलनों में छत्तीसगढ़ से अमिताभ जैन ही शामिल होते रहे हैं। इसे लेकर पौने पांच वर्ष मुख्य सचिव रहे जैन ने अपने आप में एक रिकॉर्ड बनाया। उन्हें छ माह का सेवा विस्तार भी दिया गया था। वैसे केंद्र सरकार ने इन सम्मेलनों की शुरुआत ही पांच वर्ष पहले की थी। वहीं पुलिस के डीजीपी की कांफ्रेंस तो 64 हो चुके थे लेकिन मुख्य सचिवों की कॉफ्रेंस की शुरुआत मोदी 2.0 के अंतिम वर्षों में की गई। इस बार का यह सम्मेलन दिल्ली में आईसीएआर में 26-27 में आयोजित होना है। इसमें विकासशील के साथ सचिव जीएडी, कृषि, पंचायत ग्रामीण विकास जैसे बड़े फील्ड डिपार्टमेंट के सचिव भी बुलाए जाते हैं। नवंबर में मुख्य सचिव की जिम्मेदारी सम्हालने वाले विकासशील को भी अगले तीन साल शामिल होने का अवसर मिलेगा। छत्तीसगढ़ में अब तक 13 मुख्य सचिव हुए हैं। इनमें अधिकांश एक दो वर्ष का कार्यकाल कर चुके हैं। जैन से पहले विवेक ढांड को ही 4 वर्ष का कार्यकाल मिला था।
जब नई सडक़ का मटेरियल कचरा बन जाए
अंबिकापुर के सदर रोड की यह तस्वीर सिस्टम का एक आईना है। रातोंरात नई सडक़ बनी थी और सुबह होते-होते उसी सडक़ को सफाई कर्मचारियों ने बेलचों से उखाड़ दिया। उन्हें क्या पता कि परत इतनी पतली और मटेरियल इतना घटिया है कि उसके बेलचे से उखड़ जाएगी। छत्तीसगढ़ युवक कांग्रेस के महामंत्री विष्णु देव सिंह ने अपने फेस बुक पोस्ट पर इसका एक वीडियो साझा किया है। यह दावा भी उन्हीं का है कि रात में सडक़ बनी थी। मटेरियल इतना खराब था कि उसने मोहल्ले में कचरा साफ करने वाले कर्मचारी ने उखाडक़र ट्रैक्टर पर लाद दिया। युवक कांग्रेस नेता ने लिखा है कि लोगों के यहां सडक़ पर चोरी हो जाती होगी लेकिन अपने यहां सडक़ ही चुरा ली जाती है।
जनता की रेल-अमीरों की रेल
भारतीय रेलवे ने एक बार फिर यात्री किराए में वृद्धि की है,जो दो दिन बाद लागू हो जाएगी। इसी साल जुलाई में भी किराया बढ़ाया गया था। इस बार साधारण श्रेणी में 215 किलोमीटर से अधिक दूरी पर एक पैसा प्रति किलोमीटर, जबकि मेल एक्सप्रेस की नॉन-एसी (जनरल और स्लीपर सहित) तथा सभी एसी श्रेणियों में 2 पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी हो जाएगी। रेलवे का दावा है कि इससे चालू वित्त वर्ष में करीब 600 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होगी, जबकि जुलाई की वृद्धि से अब तक 700 करोड़ रुपये मिल चुके हैं।लेकिन क्या यह वास्तव में मामूली है?नहीं। मजदूर, छात्र, छोटे व्यापारी हजारों किलोमीटर का सफर करते हैं और महीने में एक से अधिक बार, कुछ व्यापारी तो लगातार यात्रा पर रहते हैं। रेलवे खुद कह रहा है कि इससे 600 करोड़ की कमाई होगी। यह राशि हमारी आपकी जेब से ही निकल रही है।रेलवे का फोकस वंदे भारत, तेजस जैसी प्रीमियम ट्रेनों और अमृत भारत स्टेशनों पर है, जिनका किराया कितना ऊंचा है कि आम यात्री इन्हें वहन नहीं कर सकता। ये सुविधाएं अमीर वर्ग के लिए हैं, लेकिन किराया बढ़ोतरी का बोझ गरीब पर। जनरल कोच में भीड़, गंदगी, सुरक्षा की कमी बरकरारहै। छत्तीसगढ़ से चलने और गुजरने वाली ट्रेनों के स्लीपर और जनरल डिब्बों का हाल देखा जा सकता है। कई बार थर्ड एसी में भी गंदगी और भीड़ मिलती है। सुविधाओं को लेकर तेजस, वंदेभारत, राजधानी, दुरंतो आदि ट्रेनों पर ध्यान अधिक है। पर जब किराये में वृद्धि की बात आती है तो सभी श्रेणी के यात्रियों से एक जैसा बर्ताव होता है। इस बार भी यही हुआ है।
सुलगते जिले से तबादला
आईपीएस अफसरों की एक छोटी तबादला सूची सोमवार की रात जारी की गई। इसमें कांकेर एसपी इंदिरा कल्याण एलेसेला का तबादला सरगुजा रेंज डीआईजी के पद पर किया गया। एलेसेला की जगह गरियाबंद एसपी निखिल रखेचा को कांकेर एसपी बनाया गया है।
कांकेर पिछले कुछ दिनों से अशांत रहा है। यहां चर्च जलाने की घटना हुई, और दो समुदायों के बीच मारपीट हुई। इसके चलते कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए थे, और समुदाय विशेष की तरफ से एसपी को हटाने की मांग भी हो रही थी। कांकेर एसपी के तबादले की बड़ी वजह यही रही है। कांकेर के नए एसपी निखिल रखेचा ने गरियाबंद में काफी बेहतर काम किया है।
रखेचा की आईएएस पत्नी नम्रता जैन को दो दिन पहले ही पड़ोस के जिले नारायणपुर कलेक्टर बनाया गया है। नम्रता जैन मूलत: दंतेवाड़ा जिले की रहवासी हैं, और वो बस्तर की आदिवासी संस्कृति से परिचित हैं। इसके अलावा आईपीएस अफसर वेदव्रत सिरमौर को गरियाबंद एसपी बनाया गया है। सिरमौर पर्यटन बोर्ड में जीएम के पद पर थे। सिरमौर से पर्यटन विभाग में प्रतिनियुक्ति से सेवाएं वापस ली गई। पर्यटन मंडल में पुलिस अफसर की नियुक्ति भी पहली बार की गई थी। इन सबके बावजूद पुलिस में कुछ और फेरबदल की संभावना बनी हुई है।
अनुसूचित जाति इलाकों में...
भाजपा अनुसूचित जाति इलाकों में पैठ जमाने की भरपूर कोशिश कर रही है। इस कड़ी में सोमवार को अनुसूचित जाति बाहुल्य जांजगीर-चाम्पा जिले के खोखराभाठा में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की सभा भी हुई। भीड़ के मामले में सभा काफी सफल रही। नड्डा ने सीएम और प्रदेश अध्यक्ष किरण देव की पीठ भी थपथपाई।
भाजपा को विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत मिली थी, मगर जांजगीर-चांपा लोकसभा की सभी विधानसभा सीटें हार गई। बाद में नगरीय निकाय व पंचायत चुनाव में फिर भाजपा का परचम लहराया है। अब तीन साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी के रणनीतिकार अनुसूचित जाति बाहुल्य इलाकों में अभी से ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि इलाके में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति कमजोर हुई है। इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला है। अब अनुसूचित जाति मतदाताओं के बीच पैठ बनाने के लिए काम चल रहा है। नड्डा की सभा भी इसी रणनीति का हिस्सा था। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि महतारी वंदन योजना के चलते अनुसूचित जाति वर्ग की महिलाओं के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत हुई है। इन सबको देखते हुए सीएम विष्णुदेव साय ने रायपुर लौटने के बाद प्रदेश सरकार के तीसरे साल को महतारी गौरव वर्ष घोषित किया। यानी अगला पूरा साल महतारी गौरव वर्ष के रूप में मनाया जाएगा। भाजपा अनुसूचित जाति महिला मोर्चा के बैनर तले कई कार्यक्रम करने की योजना है। इसमें सीएम विशेष रूप से मौजूद रहेंगे। आरएसएस के पदाधिकारी भी इलाके में सक्रिय हो गए हैं। ऐसे में भाजपा यहां मजबूत स्थिति में आ जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
नई नियुक्तियों ने पुराने जख्म कुरेद डाले
राज्य सरकार ने हाल ही में पांच जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों में नियुक्तियां की है। इस सूची को देखकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का पुराना जख्म फिर ताजा हो गया है। लंबे समय से सहकारिता क्षेत्र से जुड़े बिलासपुर के तरु तिवारी उन कांग्रेस कार्यकर्ताओं में शामिल हैं, जिन्हें कांग्रेस भवन में लाठी चार्ज के दौरान चोट पहुंची। आंदोलनों में कई बार गिरफ्तारियां दी। जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद तत्कालीन भूपेश सरकार ने नियुक्तियां कीं, मगर वर्तमान भाजपा सरकार ने न केवल अध्यक्ष बल्कि उपाध्यक्षों का मनोनयन भी किया गया है। तिवारी ने सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा जाहिर किया है। उनका कहना है कि इस आदेश को देखकर स्पष्ट समझ आता है कि कांग्रेस के शासन काल में जानबूझकर निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की गई । जब भाजपा सरकार में सहकारी बैंकों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बन सकते हैं तो , कांग्रेस के शासन काल में उपाध्यक्ष क्यों नहीं बनाए गए? राज्य में 6 जिला सहकारी बैंक है। उपाध्यक्ष बनाने से 6 और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को सम्मान मिल सकता था, पर ऐसा नहीं किया गया। जानबूझ कर ऐसा किया गया । बस ऐसे ही कारण हैं कि दूसरी बार कांग्रेस की सरकार नहीं बनी, जबकि उपाध्यक्ष के साथ हर बैंक में तीन संचालक भी बनाए जा सकते थे। इससे 18 कार्यकर्ता और सम्मान पाते। तिवारी याद दिलाते हैं कि 2010 में भाजपा सरकार के दौरान उन्होंने संचालक का चुनाव लड़ा था। बराबरी का वोट मिलने के बावजूद टॉस की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, वरना भाजपा शासनकाल में वे एकमात्र निर्वाचित संचालक होते। कांग्रेस सरकार में मेरिट के आधार पर उनका हक था। कितनी बार तब सीएम से मिला, उपाध्यक्ष नहीं- संचालक ही बना दें लेकिन समय निकला, सरकार चली गई। यही कारण है कि आज कांग्रेस सत्ता से बाहर है। 2023 में चुनाव की तैयारियों के दौरान महासचिव पुनिया ने कहा था, सरकार तो बनाओ, हमारे पास दो से ढाई हजार पद हैं। जो लोग लाठी चलती देख कांग्रेस भवन से भाग गए, उनको सरकार बनने पर पद दिया गया।
जोड़ी फिर साथ-साथ
रिटायरमेंट के बाद कई प्रशासनिक अफसर सरकारी सुख-सुविधाओं का मोह नहीं छोड़ पाते हैं, और ऐन-केन प्रकारेण पद के लिए कोशिश भी करते हैं। इनमें बहुत सारे अफसरों को सफलता भी मिल जाती है। कुछ अफसरों की उपयोगिता सरकार समझती है, और उनके अनुभवों का लाभ लेने के लिए अलग-अलग पदों पर नियुक्ति भी देती है। मगर प्रदेश में रिटायर्ड अफसर की नियुक्ति का एक ऐसा उदाहरण सामने आया है जो पहले कभी देखने-सुनने में नहीं आया है।
बात सचिव स्तर के आईएएस अफसर अशोक अग्रवाल की है। अशोक कई जिलों के कलेक्टर रहे हैं। वो रायपुर के कमिश्नर भी रह चुके हैं। उनका पूरा प्रशासनिक करियर तकरीबन छत्तीसगढ़ में गुजरा। वो कांग्रेस, और भाजपा में अपार संपर्कों के लिए जाने जाते हैं। रिटायर होते ही उन्हें सूचना आयुक्त का पद मिल गया। सूचना आयुक्त का कार्यकाल खत्म हुआ, तो वो रेडक्रॉस सोसायटी के सचिव बन गए।
रेडक्रॉस सोसायटी में पूरे पांच साल गुजारने के बाद दो दिन पहले उन्हें राज्य निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग के सचिव पद पर संविदा नियुक्ति दे दी गई। दिलचस्प बात ये है कि आयोग के अध्यक्ष डॉ.वी.के.गोयल, कभी अशोक अग्रवाल के मातहत काम कर चुके हैं। अशोक अग्रवाल माध्यमिक शिक्षा मंडल के सचिव थे तब डॉ.गोयल मंडल में उपसचिव के पद पर थे। बताते हैं कि मंडल के सचिव बनने के बाद अशोक अग्रवाल ही डॉ.वी.के. गोयल को मंडल में लेकर आए थे।
तब डॉ.गोयल सहायक प्राध्यापक के पद थे। दोनों के बीच घनिष्ठता किसी से छिपी नहीं है। और अब जब अशोक अग्रवाल पूरी तरह खाली हो गए, तो डॉ. गोयल के प्रयासों से उन्हें सचिव की जिम्मेदारी मिल गई। मजे की बात ये है कि सचिव का पद पर सहायक प्राध्यापक या फिर डिप्टी कलेक्टर स्तर के अफसर ही रहते आए हैं। मगर अशोक अग्रवाल ने कई पायदान नीचे के पद पर काम करने से परहेज नहीं किया। अब जहां तक निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग की कार्यप्रणाली का सवाल है तो इस पर विधानसभा के शीतकालीन सत्र में काफी बातें हुई हैं।
पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने एक विधेयक की चर्चा के दौरान निजी विवि नियामक आयोग की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठाई है। राज्यपाल रामेन डेका तो खुलकर आयोग की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जता चुके हैं। ऐसे में गोयल-अग्रवाल की जोड़ी आगे क्या कुछ करती है, यह देखना है।
आरोपों में दम नहीं
सरकार ने पिछले दिनों आधा दर्जन कलेक्टर बदल दिए। इनमें कोरबा कलेक्टर अजीत बसंत भी थे, जिन्हें कोरबा से सरगुजा भेजा गया है। खास बात ये है कि पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने अजीत बसंत के खिलाफ 14 बिंदुओं पर शिकायत की थी, और सरकार ने बिलासपुर कमिश्नर से जांच प्रतिवेदन मांगा था। जांच प्रतिवेदन मिलने के बाद सरकार ने अजीत बसंत को कोरबा से हटाकर सरगुजा कलेक्टर बना दिया है।
सरगुजा पुराना जिला है, और कोरबा के मुकाबले बेहतर पोस्टिंग मानी जा रही है। बिलासपुर कमिश्नर के जांच प्रतिवेदन में क्या था, यह तो सार्वजनिक नहीं हुआ है। मगर अजीत बसंत की सरगुजा पोस्टिंग से अंदाजा लगाया जा रहा है कि उनके खिलाफ आरोपों में दम नहीं है। कंवर भी सिर्फ इतना चाहते थे कि अजीत बसंत को हटा दिया जाए। सरकार ने उनकी इच्छा पूरी कर दी, और अजीत बसंत को बेहतर पोस्टिंग देकर उनका मान रख लिया है।
रेडियो के जुनून ने मशहूर कर दिया
रेडियो केवल गीत सुनने का माध्यम नहीं रहा है। यह मनोरंजन, जानकारी और श्रोताओं की भागीदारी का एक सशक्त मंच भी बन चुका है। कभी रेडियो श्रोता अपने पसंदीदा गीतों की फरमाइश चि_ियों के जरिए भेजा करते थे। कई श्रोता तो अपने नाम, पते, गीतकार और संगीतकार तक की अलग-अलग सील बनवाकर रखते थे, ताकि खाली जगह भरकर एक साथ कई रेडियो केंद्रों में पत्र भेज सकें। उस दौर में रेडियो एकतरफा माध्यम था, जहां सिर्फ उद्घोषक की आवाज सुनाई देती थी।
समय के साथ रेडियो में फोन-इन कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। इससे श्रोता की आवाज भी सीधे प्रसारण का हिस्सा बनने लगी। इस बदलाव ने रेडियो को जीवंत और संवादात्मक बना दिया है। साथ ही इंटरनेट की सुविधा मिलने के बाद देश-विदेश के किसी भी रेडियो स्टेशन के कार्यक्रम सुने जा सकते हैं।
फोन-इन कार्यक्रमों के कुछ श्रोता ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए यह केवल शौक नहीं, बल्कि जुनून बन जाता है। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के ग्राम सिरखाबांधा निवासी योगेश जांगड़े ऐसे ही जुनूनी रेडियो श्रोता हैं। उन्हें फोन-इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेने का विशेष शौक है। देशभर के सैकड़ों रेडियो केंद्रों में वे लगातार कॉल करते रहे हैं।
योगेश के पास यह पूरी जानकारी होती है कि किस रेडियो स्टेशन पर किस दिन फोन-इन कार्यक्रम प्रसारित होता है। वे अब तक एक ही दिन में 32 अलग-अलग रेडियो केंद्रों पर फोन कर चुके हैं। इनमें जयपुर, गंगापुर, ईटानगर, मथुरा, भोपाल, गोरखपुर, गोपालगंज, शिलांग, परभणी, सतारा, कोटा, रामपुर जैसे देश के कई प्रमुख रेडियो स्टेशन शामिल हैं।
खास बात यह है कि योगेश के पास यह भी पूरा रिकॉर्ड मौजूद है कि किस स्टेशन पर, किस तारीख को उनकी बातचीत प्रसारित हुई और उस कार्यक्रम में कौन-सा पसंदीदा गीत सुनाया गया। योगेश जांगड़े के इसी जुनून ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला दी है। गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड ने उन्हें
रेडियो फोन-इन कार्यक्रमों में सबसे अधिक कॉल करने के लिए Certificate of E&cellence सर्टिफिकेट ऑफ एक्सीलेंस प्रदान किया है।
रिकॉर्ड के अनुसार, 15 दिसंबर 2025 तक योगेश जांगड़े देश के विभिन्न ऑल इंडिया रेडियो केंद्रों पर 12,870 से अधिक फोन कॉल कर चुके थे, ताकि वे अपनी पसंद के गीत सुन सकें।
अरपा रेडियो बिलासुप की संचालिका संज्ञा टंडन ने एक फेसबुक पोस्ट में यह जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि योगेश अरपा रेडियो के भी नियमित श्रोता हैं। ‘हेलो अरपा रेडियो’ कार्यक्रम में उनकी दसवीं बार कॉल लगने के दौरान यह जानकारी सामने आई कि देशभर में उनकी कुल बातचीत की संख्या अब 13,000 के करीब पहुंच चुकी है।
योगेश जांगड़े की लगन ने उसके नाम पर एक खास तरह अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि जोड़ दी है।
कांग्रेस की लिस्ट कब?

कांग्रेस के सभी 41 संगठन जिलों में अध्यक्षों की नियुक्ति तो हो गई है। ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति बाकी है। चर्चा है कि प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने प्रदेश कांग्रेस की सूची पर मुहर लगवा दी है। इस मामले में उन्होंने चुनिंदा कुछ प्रमुख नेताओं से चर्चा की है। ब्लॉक अध्यक्षों की सूची जल्द जारी हो सकती है।
हालांकि इसको लेकर पार्टी में विवाद भी है। नवनियुक्त जिलाध्यक्ष चाहते हैं कि ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति में उनकी राय को महत्व दिया गया। नवनियुक्त जिलाध्यक्षों का मानना है कि विरोधी नेता, ब्लॉक के पदाधिकारी बन जाते हैं तो इसका असर पार्टी कार्यक्रमों पर पड़ सकता है। चर्चा है कि ब्लॉक अध्यक्षों की सूची जारी होने के बाद पार्टी के भीतर खींचतान शुरू हो सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
21 दिसंबर : रसायन शास्त्री पियरे और मैरी क्यूरी ने रेडियम की खोज की
नयी दिल्ली, 21 दिसंबर। इतिहास में 21 दिसंबर की बात करें तो यह दिन विज्ञान जगत के लिए बेहद अहम है। वर्ष 1898 में इसी दिन मैरी क्यूरी और उनके पति पियरे ने रेडियम की खोज की। खनिज का अध्ययन करते हुए जब उन्होंने उससे यूरेनियम अलग कर दिया, तो पाया कि बाकी बचे हिस्से में अब भी कोई रेडियोधर्मी तत्त्व बाकी था। उन्होंने इस तत्व को रेडियम नाम दिया।
देश-दुनिया के इतिहास में 21 दिसंबर की तारीख में दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है:-
- 1898 : रसायन शास्त्री पियरे और मैरी क्यूरी ने रेडियम की खोज की।
- 1910 : इंग्लैंड के हुलटन में कोयला खदान में हुए विस्फोट में 344 श्रमिकों की मौत।
- 1914 : अमेरिका में पहली मूक हास्य फीचर फिल्म “तिल्लीस पंचर्ड रोमांस” रिलीज हुई।
- 1931 : आर्थर वेन का बनाया दुनिया का पहला क्रॉसवर्ड ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ अखबार में प्रकाशित हुआ।
- 1949 : पुर्तग़ाली शासकों ने इंडोनेशिया को संप्रभु राष्ट्र घोषित किया।
- 1952 : सैफुद्दीन किचलू तत्कालीन सोवियत संघ का लेनिन शांति पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय बने।
- 1963 : अभिनेता गोविंदा का जन्म।
- 1968 : फ्लोरिडा के केप केनेडी स्पेस सेंटर से ‘अपोलो-8’ को प्रक्षेपित किया गया।
- 1975 : मेडागास्कर में संविधान लागू।
- 1988 : स्कॉटलैंड की सीमा के नजदीक लॉकरबी शहर में पैन एम का एक जंबो जेट विमान 258 यात्रियों के साथ दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
- 1998 : नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने इस्तीफा दिया।
- 2008 : कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान को अमेरिकी पत्रिका ‘न्यूज वीक’ ने दुनिया के 50 शक्तिशाली लोगों की सूची में शामिल किया।
- 2011 : देश के जाने-माने परमाणु वैज्ञानिक पी के आयंगर का निधन।
- 2012 : दक्षिण कोरिया के एक गायक का ‘गंगनम स्टाइल’ यूट्यूब पर एक अरब बार देखा जाने वाला पहला वीडियो बना।
- 2020: कोरोना वायरस के नए प्रकार के सामने आने पर भारत, फ्रांस समेत कई देशों ने ब्रिटेन से संपर्क तोड़ा।
- 2021: पाकिस्तान ने बाबर क्रूज मिसाइल की और अधिक दूरी तक मार करने वाली मिसाइल का सफल परीक्षण किया।
- 2022: नेपाल की शीर्ष अदालत ने ‘सीरियल किलर’ चार्ल्स शोभराज को रिहा करने का आदेश दिया।
- 2023: जम्मू-कश्मीर में सेना के दो वाहनों पर घात लगाकर किए गए हमले में तीन सैनिक शहीद।
- 2024: यूक्रेन के कई ड्रोन ने रूस में तातारस्तान क्षेत्र के कजान शहर में आवासीय इमारतों को निशाना बनाया। (भाषा)
चंद्राकर मैन ऑफ़ द सीरीज
विधानसभा के इस बार का शीतकालीन सत्र पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के नाम रहा। सत्र शुरू होने के दो दिन पहले संसदीय कार्यमंत्री केदार कश्यप ने पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को छत्तीसगढ़ अंजोर विजन डॉक्यूमेंट-2047 पर सत्ता पक्ष की तरफ से चर्चा की शुरूआत करने की जिम्मेदारी दी थी तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि अजय सदन में विपक्ष की कमी महसूस नहीं होने देंगे। विपक्ष ने तो चर्चा का बहिष्कार कर दिया था।
विजन डॉक्यूमेंट-2047 पर चर्चा की शुरूआत में पूर्व मंत्री चंद्राकर ने वित्तमंत्री ओ.पी.चौधरी से ही पूछ लिया कि ओपन माइंड से बात रखनी है या सिर्फ पीठ थपथपाना है। इससे हड़बड़ाए वित्तमंत्री ने ओपन माइंड से अपनी बात रखने के लिए कह दिए। इसके बाद चंद्राकर आसंदी की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए, और कहा कि यह पहले स्पष्ट हो जाना चाहिए था कि किस नियम से चर्चा कराई जा रही है। शासकीय-अशासकीय संकल्प की तरह चर्चा होगी, और फिर मंत्रीजी का जवाब देंगे। उन्होंने यह भी कह दिया कि नई परंपरा की शुरूआत हो रही है। बाद में विजन डॉक्यूमेंट की सिंचाई से लेकर रोजगार और उद्योग पर खामियों को गिनाया। और यह कह गए कि इसमें मेक इन छत्तीसगढ़ की सोच को नजरअंदाज किया गया है।
कुल मिलाकर अजय चंद्राकर के उठाए सवालों से सत्ता पक्ष परेशान दिखा। अगले दिन विपक्षी कांग्रेस सदस्य सदन की कार्रवाई में हिस्सा लिया तो उन्होंने चंद्राकर की पीठ थपथपाई। नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत ने तो उन्हें धन्यवाद दिया। और जब एक सवाल के जवाब में चंद्राकर, कृषि मंत्री रामविचार नेताम से एक सवाल का जवाब चाह रहे थे, तो नेताम ने चंद्राकर से कहा कि आप पहले काफी कुछ बोल चुके हैं। हास-परिहास के बीच में कांग्रेस सदस्य श्रीमती संगीता सिन्हा ने तो चंद्राकर से कह दिया कि आप 15 विधायक तोडक़र लाईए, हम आपको सीएम बना देंगे। कुल मिलाकर अजय चंद्राकर ने सुर्खियां बटोरी है। ये अलग बात है कि पार्टी उनसे असहज नजर आई है। अब इसका क्या प्रभाव पड़ता है, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।
अदाणी को किसी भी जगह छूना मना है?
देश के विभिन्न हिस्सों में अदाणी समूह के प्लांट्स में मजदूरों का असंतोष है। झारखंड का गोड्डा हो, जहां अप्रैल 2025 में भूमि अधिग्रहण के बदले नौकरी के वादे पर मजदूरों ने भूख हड़ताल की, या छत्तीसगढ़ का रायखेड़ा पावर प्लांट, जहां दिसंबर 2025 से मजदूर हड़ताल पर हैं। हसदेव से लेकर रामगढ़ तक जंगल की कटाई पर उठाई जा रही आवाज को तो अनसुना किया जा रहा है, मगर ऐसा लगता है कि जहां भी अडाणी का नाम आए मंत्री और अफसर आंख मूंद लेते हैं।
रायखेड़ा (तिल्दा) में स्थित अदाणी पावर प्लांट में करीब 1600 मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों की शिकायत है कि पिछले 10 वर्षों से उनकी मजदूरी दर नहीं बढ़ी, जो श्रम कानूनों का उल्लंघन है। 10 महीने पहले हड़ताल के दौरान प्रबंधन ने वादा किया था कि मांगों पर विचार किया जाएगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। श्रमायुक्त के पास आवेदन और कई बैठकें भी बेनतीजा रहीं। मजबूरन, 8 दिसंबर 2025 से मजदूरों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की, जो आज 13वें दिन में प्रवेश कर चुकी है। इस हड़ताल से बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ, और रायपुर लेबर कोर्ट ने आंदोलन को 6 महीने के लिए स्थगित करने का आदेश दिया, लेकिन मूल समस्या बनी हुई है।
दिलचस्प यह है कि इस हड़ताल से धरसीवां के पूर्व विधायक देवजी भाई पटेल भी विचलित हैं। उन्होंने वाणिज्य, उद्योग एवं श्रम मंत्री लखनलाल देवांगन को पत्र लिखकर मजदूरों की मांगों पर तत्काल कार्रवाई की गुहार लगाई है। पत्र लिखकर कहा है कि ये छत्तीसगढ़ के गरीब मजदूर हैं, जो भूखे मरने की कगार पर हैं, और शासन-प्रशासन की चुप्पी से क्षेत्र में रोष फैल रहा है। पूर्व विधायक ने मंत्री से आग्रह किया कि विभागीय अधिकारियों को निर्देश देकर मजदूरों की उचित मांगें पूरी की जाएं। देखें, इस कड़ी ठंड में बर्फ पिघलती है या नहीं।
पुलिस हमारा बाप है....

एक वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहा है, जिसमें मुंगेली की पुलिस छेड़छाड़ के आरोपियों का सडक़ पर जुलूस निकाल रही है। पुलिस के कहने पर आरोपी नारा लगा रहे हैं कि छेडख़ानी पाप है, पुलिस हमारा बाप है। ऐसे वीडियो अक्सर दिखाई पड़ते हैं। पहले सिर्फ तस्वीरें आती थीं, मगर, जब से मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्ड करना आसान हुआ है, वीडियो क्लिप भी पुलिस शूट करती है और उसे खुद ही अधिकारिक तौर पर जारी करती है। पोस्ट करने वाले का कहना है कि पुलिस का यह कृत्य निंदनीय है। अभी वह सिर्फ आरोपी है। सजा देना अदालत का काम है। कल को यदि अदालत में ये लोग निर्दोष साबित हो गए तो? इसके अलावा पुलिस क्यों चाहती है कि उसे कोई आरोपी अपना बाप माने। बाप तो वही होता है, जिसने उसे पैदा किया। क्या बाप के नक्शे-कदम पर बेटा चल पड़ा है? प्रतिक्रिया में बहुत से लोगों ने पुलिस के कदम को सही माना है। ऐसे ही जुलूस निकालने से अपराधियों में भय पैदा होगा। कुछ लोगों ने रायपुर के तोमर के जुलूस का भी जिक्र किया है और याद दिलाया है कि इससे लोगों का डर भागा। दोनों तरफ की बातें कुछ-कुछ सही और थोड़ी गलत हो सकती है। बस, पाठकों के विचार के लिए यह मुद्दा सामने रख दिया गया है।
टाइगर इज बैक
प्रदेश के जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के अध्यक्ष, और उपाध्यक्ष पद पर नियुक्तियां हो गई है। सहकारिता मंत्री केदार कश्यप, विभागीय अधिकारियों को नवनियुक्त पदाधिकारियों से संपर्क कर पदभार ग्रहण कार्यक्रम तय करने के लिए कहा, तो पता चला कि ज्यादातर बैंक अध्यक्षों ने आदेश निकलते ही पदभार ग्रहण कर लिया है। बाकी निगम मंडल के पदाधिकारियों की तरह पदभार ग्रहण की औपचारिकता नहीं निभाई।
नवनियुक्त पदाधिकारियों के पदभार ग्रहण की हड़बड़ी को लेकर कई बातें हो रही है। यह कहा जा रहा है कि प्रदेश में धान खरीदी तेजी से चल रही है। इसमें बैंकों की भूमिका अहम होती है। रोजाना सैकड़ों करोड़ का भुगतान हो रहा है। चर्चा है कि नवनियुक्त पदाधिकारी पूरी व्यवस्था के भागीदार बनना चाह रहे थे, इसलिए उन्होंने आनन-फानन में पदभार ग्रहण कर लिया।
दूसरी तरफ, रायपुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के नवनियुक्त उपाध्यक्ष अनिमेष कश्यप (बॉबी) गुरूवार को जिला ग्रामीण भाजपा पदाधिकारी की बैठक में पहुंचे तो उनका पदाधिकारियों ने जोरदार स्वागत किया। कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं ने 'टाइगर इज बैक’ के नारे लगाए। दरअसल, अनिमेष कश्यप को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा दिया गया था। इससे पदाधिकारियों का एक खेमा नाखुश रहा, और जब उन्हें नई जिम्मेदारी मिली तो स्वागत में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
बैंकों में मनोनयन के राज
सरकार ने सहकारिता चुनाव की अटकलों पर फिलहाल विराम लगा दिया है, और जिला सहकारी बैंकों में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की नियुक्ति कर दी है। खास बात ये है कि राज्य बनने के बाद अब तक सिर्फ दो बार ही सहकारी संस्थाओं के चुनाव हुए हैं। अब तक सहकारी संस्थाओं में मनोनयन ही होता आया है। जबकि सरकार ने सहकारी संस्थाओं के चुनाव के लिए आयोग बनाया है।
सरकार ने जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों के अध्यक्ष, और उपाध्यक्ष की सूची जारी की है। पार्टी ने स्थानीय समीकरण को ध्यान में रखकर नियुक्तियां की है। ये अलग बात है कि रायपुर और बिलासपुर को छोडक़र बाकी बैंक घाटे में चल रहे हैं। रायपुर में धमतरी जिले के सीनियर भाजपा नेता निरंजन सिन्हा को अध्यक्ष बनाया गया है। जबकि उपाध्यक्ष अनिमेष कश्यप (बॉबी) की नियुक्ति की गई है। अनिमेष रायपुर जिला ग्रामीण अध्यक्ष रह चुके हैं।
दुर्ग जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष पद पर प्रीतपाल बेलचंदन की नियुक्ति की गई है। प्रीतपाल पहले भी जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्हें अध्यक्ष बनाने के लिए सांसद विजय बघेल ने जोर लगाया था। इससे परे बेलतरा के पूर्व विधायक रजनीश सिंह को बिलासपुर ग्रामीण जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष बनाया गया।
रजनीश, उन 15 विधायकों में से थे जो 2018 में कांग्रेस की लहर में जीतकर आए थे। इनमें से दो विधायक रजनीश सिंह, और डमरूधर पुजारी को टिकट नहीं दी गई थी। बावजूद इसके रजनीश सिंह पार्टी संगठन का काम करते रहे। उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी मिलने की चर्चा थी। आखिरकार जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष बनाया गया।
राजनांदगांव से सचिन सिंह बघेल पहले भी अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके नाम की स्पीकर डॉ.रमन सिंह ने सिफारिश की थी, जबकि उपाध्यक्ष पद पर भरत वर्मा की नियुक्ति की गई, जो कि डोंगरगांव सीट से विधानसभा का चुनाव मामूली वोट हार गए थे। भरत वर्मा प्रदेश भाजपा के महामंत्री रहे हैं। इससे परे रामकिशुन सिंह को सरगुजा जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष बनाया गया है। रामकिशुन सिंह बलरामपुर-रामानुजगंज जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। इससे परे जगदलपुर जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष पद पर दिनेश कश्यप की नियुक्ति की गई है।
दिनेश, संसदीय कार्यमंत्री केदार कश्यप के बड़े भाई हैं। दिनेश बस्तर से सांसद रह चुके हैं। उपाध्यक्ष पद पर श्रीनिवास मिश्रा की नियुक्ति की गई है। उनके लिए प्रदेशाध्यक्ष किरणदेव ने सिफारिश की थी। संकेत है कि कुछ और सहकारी संस्थाओं में नियुक्तियां हो सकती है।
विनोद शुक्ल की सेहत पर चिंता
हिंदी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता 88 वर्षीय विनोद कुमार शुक्ल इस समय स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या के चलते रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती हैं। दिसंबर 2025 की शुरुआत में उनकी तबीयत बिगडऩे के बाद उन्हें आईसीयू में रखा गया है, जहां उनका इलाज चल रहा है।
छत्तीसगढ़ के पूर्व महाधिवक्ता और साहित्यकार कनक तिवारी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में शुक्ल की स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने सरकार से अपील की है कि बेहतर उपचार के लिए उन्हें मुंबई या किसी अन्य उन्नत केंद्र में भेजा जाए। तिवारी ने दिल्ली की ठंड और प्रदूषण को असुविधाजनक बताते हुए मुंबई को बेहतर विकल्प माना है। उन्होंने कई साल पहले पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा अपनी बीमारी में दी गई असाधारण मदद का उदाहरण देते हुए सरकार से उसी तरह की सक्रियता की उम्मीद की है। तिवारी ने अपनी पोस्ट में एम्स रायपुर की सुविधाओं पर सवाल उठाया है। परिवार के सदस्यों को जमीन पर सोने जैसी शिकायतों का भी उल्लेख है, इसे उन्होंने एम्स प्रशासन के लिए शर्मनाक बताया है। वैकल्पिक रूप से विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम बुलाने का सुझाव भी उन्होंने दिया है।
मालूम हो कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 9 दिसंबर को एम्स रायपुर पहुंचकर शुक्ल से मुलाकात की, उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली थी। उन्होंने चिकित्सकों को बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी 17 दिसंबर को अस्पताल पहुंचकर उनका कुशलक्षेम जाना और शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की थी।
आज की पीढ़ी को बता दें कि विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढिय़ा मूल के हिंदी के पहले ज्ञानपीठ विजेता हैं। उनकी रचनाएं -नौकर की कमीज और दीवार में एक खिडक़ी रहती थी सरल भाषा में गहन संवेदना के लिए दुनिया भर में विख्यात हैं। साहित्य जगत में उनके स्वास्थ्य को लेकर बड़ी चिंता है, और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की जा रही है।
निर्गुण भक्ति के सच्चे पुजारी
बाबा गुरु घासीदास सत्य की खोज में थे। एक बार वे अपने भाई के साथ ओडिशा के जगन्नाथ पुरी, तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे। रास्ते में सारंगढ़ के घने जंगलों में उन्हें कुछ अलग ही अनुभव हुआ। उन्हें एहसास हुआ कि सच्चा ईश्वर मंदिरों या तीर्थों में नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय में बसता है। वे यात्रा छोडक़र वापस लौट आए और जंगलों में कठोर तपस्या शुरू कर दी। इसी तप से उन्हें सतनाम का बोध हुआ। बाबा ने सिद्धांत अपनाया मूर्ति या मंदिर नहीं, सिर्फ सत्य का नाम ही उनका देवता है।
गिरौदपुरी धाम से लेकर, आज छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में संत शिरोमणि कहे जाने वाले गुरु घासीदास की 269वीं जयंती धूमधाम से मनाई जा रही है। मनखे-मनखे एक समान का नारा उनका ही दिया हुआ है। हर राजनीतिक दल इसे अपनाने की बात करता है, पर जमीन पर गुरु घासीदास के सिद्धांतों को अपनाते हुए कोई नहीं दिखता। बाबा जातिवाद, मूर्तिपूजा और कुरीतियों के सख्त खिलाफ थे। मगर आज राजनीतिक विकृति के तौर पर यह मौजूद है।
बाबा की कई कहानियां हैं ,जो चलन में कैसे आई- कह नहीं सकते। इनकी सच्चाई को भी आज नहीं परखा जा सकता। जैसे, एक प्रसिद्ध कहानी है कि बाबा बिना किसी सहारे के हवा में ही गीले कपड़े सुखा देते थे। लोग हैरान होकर देखते कि कपड़े हवा में तने रहते और सूख जाते। कई कथाएं किताबों में हैं कि उन्होंने मृतकों को जीवित किया। अपनी पत्नी सफुरा माता और पुत्र को भी पुनर्जन्म दिया।
ये कहानियां लोक मान्यताओं से अधिक नहीं हो सकती लेकिन उनके सात सिद्धांत आज के वक्त में अधिक प्रासंगिक हैं। उनका कहना था कि निर्गुण ईश्वर ही एकमात्र सत्य है। ईश्वर निराकार है, मूर्तियों या प्रतिमाओं की पूजा न करें। सभी मनुष्य जन्म से समान हैं। मनखे-मनखे एक समान का सिद्धांत अपनाओ, जातिवाद और छुआछूत का त्याग करो। मांसाहार और किसी भी जीव की हत्या से दूर रहो। पशुओं पर दया करो। गुरु घासीदास पशुओं की पीड़ा को बहुत गहराई से समझते थे। वे कहते थे कि दोपहर में खेत की जुताई मत करो, वरना बैलों को बहुत तकलीफ होगी। उन्होंने कहा कि शराब, तंबाकू या किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहो। व्यभिचार या परस्त्रीगमन से दूर रहो। महिलाओं का सम्मान करो और नैतिकता बनाए रखो। ईमानदारी से जीवन यापन करो। चोरी, जुआ या किसी भी अनैतिक कार्य से बचो।
छत्तीसगढ़ में सतनाम अनुयायियों की संख्या 14 प्रतिशत से अधिक है। राजनीतिक रूप से यह बेहद प्रभावशाली है। जो सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित नहीं हैं, वहां भी प्रभाव है। कैबिनेट में गुरु घासीदास की पीढ़ी के एक सदस्य धर्मगुरु बाल दास के बेटे गुरु खुशवंत सिंह को भी लिया गया है। मगर आप कभी नहीं पाएंगे कि गुरु घासीदास के सिद्धांतों को अपनाने के लिए वे प्रदेश में कोई आंदोलन चला रहे हों। छत्तीसगढ़ में एक आंदोलन लखन पाटले चला रहे हैं जो कहते हैं कि केवल वंशज होने के कारण किसी को धर्मगुरु का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। उसे मिले जो जीव हत्या और नशा न करे, मांसाहार त्यागे और इसी तरह के गुरु घासीदास के बाकी सिद्धांतों का पालन करे।
दोनों में आएँगे नए प्रभारी?
नए साल में भाजपा और कांग्रेस, दोनों में ही नए प्रभारी की नियुक्ति हो सकती है। प्रदेश भाजपा के प्रभारी नितिन नबीन, पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बन गए हैं। स्वाभाविक है कि उन्हें प्रदेश भाजपा का प्रभार छोडऩा पड़ेगा।
अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस महीने के आखिरी अथवा जनवरी के पहले पखवाड़े में नए प्रभारी की नियुक्ति हो सकती है। कुछ ऐसा ही कांग्रेस में भी है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने प्रभारी के दायित्व से मुक्त होने की मंशा जता दी है।
चर्चा है कि पायलट ने कुछ दिन पहले दोबारा हाईकमान को अपनी भावनाओं से अवगत कराया है। वो पूरा समय राजस्थान में देना चाहते हैं। पायलट पहले भी छत्तीसगढ़ में काम करने के अनिच्छुक रहे हैं। चर्चा है कि पायलट की जगह जल्द ही नए प्रभारी की नियुक्ति हो सकती है।
इनको बनाया किसने था?

राजनीतिक दलों में कई नियुक्तियां ऐसी हो जाती है जिससे पार्टी संगठन पशोपेश में पड़ जाता है, और सफाई देते नहीं बनता है। कुछ ऐसी ही नियुक्ति भाजपा में हो गई। भाजपा पदाधिकारियों की सूची जारी हुई, तो रायपुर एससी महिला मोर्चा की अध्यक्ष पद पर सावित्री जगत की नियुक्ति कर दी गई। थोड़ी देर बाद पार्टी ने प्रेसनोट जारी किया, और स्पष्ट किया कि सावित्री जगत की नियुक्ति आदेश त्रुटिपूर्ण है। नई नियुक्ति जल्द की जाएगी।
दरअसल, सावित्री की नियुक्ति आदेश जारी होने के बाद से पार्टी के अंदरखाने में काफी तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। सावित्री पार्टी से बगावत कर विधानसभा चुनाव में रायपुर उत्तर सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गई थी। वो बमुश्किल डेढ़ हजार वोट ही हासिल कर पाई। उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। मगर नगरीय निकाय चुनाव के ठीक पहले पार्टी में वापिसी हो गई। पार्षद टिकट नहीं मिली तो वो फिर बगावत कर निर्दलीय खड़ी हो गई। सावित्री को बुरी हार का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके कुछ समय बाद उन्हें फिर पार्टी में ले लिया गया। और जब जिलाध्यक्ष बनाया गया, तो पार्टी के अंदरखाने में काफी बवाल मचा। आनन-फानन में नियुक्ति त्रुटिपूर्ण बताकर निरस्त किया गया।
अब पार्टी के भीतर इस बात की जांच हो रही है कि सावित्री जगत को अध्यक्ष बनाने की सिफारिश किसने की थी।
कुछ ऐसा ही वाक्या कांग्रेस में भी हुआ। ड्रग्स-पिस्तौल के साथ पकड़ाए युवक कांग्रेस के प्रदेश सचिव राहुल ठाकुर को लेकर पार्टी ने सफाई दी कि उनका कांग्रेस से कोई नाता नहीं है। उन्हें 12 अक्टूबर को ही पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। बैक डेट से जारी निष्कासन लेटर में यह बताया गया कि निष्क्रियता की वजह से राहुल ठाकुर को निष्कासित किया गया है।
हड़बड़ी में जारी निष्कासन लेटर पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्योंकि युवक कांग्रेस के इतिहास का ये पहला उदाहरण है, जब निष्क्रियता के आधार पर किसी का निष्कासन किया गया है। न सिर्फ युवक कांग्रेस बल्कि अन्य संगठन में निष्कासन सिर्फ इसलिए नहीं होता कि वो पार्टी में ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। दरअसल, पार्टी ने बदनामी से बचने के लिए राहुल ठाकुर को निष्कासित किया है। ये अलग बात है कि निष्कासन के कारण किसी के गले नहीं उतर रही है।
जरूरत से ज़्यादा सहूलियत

नवा रायपुर के नए विधानसभा भवन में तीन दिन का शीतकालीन सत्र बुधवार को निपट गया। नए विधानसभा भवन में पहला सत्र था। करीब 51 एकड़ में फैले भव्य विधानसभा भवन को लेकर विधायकों, और आम लोगों में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सुनने को मिली। चर्चा है कि अधिकतर विधायक भी नए भवन से संतुष्ट नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि विधानसभा भवन में सुविधाओं की कोई कमी है, बल्कि यह अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है।
विधायकों का तर्क था कि यह इतना बड़ा है कि एक जगह से दूसरे जगह जाना काफी थकाऊ है। सदन को दो सौ सदस्यों के लायक तैयार किया गया है, मगर वर्तमान में 90 सदस्य हैं। कुल मिलाकर आपस में चर्चा के दौरान सत्ता और विपक्ष के कई विधायक यह कहते सुने गए कि पुराना विधानसभा बेहतर था।
विधानसभा सचिवालय के अफसर-कर्मियों के लिए भव्य कमरा है। विधानसभा के जनसंपर्क अधिकारी का कक्ष, चीफ सेक्रेटरी के कक्ष से बड़ा है। एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक में जाने में काफी मुश्किल होती है। यहां रखरखाव के लिए भी पुराने विधानसभा के मुकाबले दोगुने से अधिक खर्च होने का अनुमान है। हालांकि यह सौ साल की आगामी जरूरतों को देखकर बनाया गया है, लेकिन फिर भी पुराने विधानसभा का मोह नहीं छूट पा रहा है।
दूबर बर दू असाढ़ - जी राम जी
मनरेगा में केंद्र सरकार अकुशल मजदूरी का सौ प्रतिशत और सामग्री लागत का 75 प्रतिशत वहन करती थी। व्यवहार में केंद्र और राज्य का अनुपात लगभग 90:10 रहता था। यानी छत्तीसगढ़ जैसे सामान्य राज्य को कुल खर्च का करीब 10 प्रतिशत ही देना पड़ता था।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में मनरेगा के तहत छत्तीसगढ़ को केंद्र से 2295.02 करोड़ रुपये मिले हैं। पुराने पैटर्न के हिसाब से राज्य का हिस्सा करीब 255 करोड़ रुपये के आसपास बैठता है। विकसित भारत- जी राम जी बिल 2025 में केंद्र-राज्य हिस्सेदारी को बदलकर 60:40 करने का प्रस्ताव है। उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों को छोडक़र छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों पर यह नियम लागू होगा। यानी अब राज्य सरकार को कुल खर्च का 40 प्रतिशत देना होगा।
कुल व्यय को कुछ कम कर देते हैं, क्योंकि 100 फीसदी राशि तो इस योजना की आज तक खर्च नहीं हुई। मान लें कि छत्तीसगढ़ ने चालू आवंटन के अनुसार करीब 2550 करोड़ रुपये केंद्र से हासिल किया। तो पुराने पैटर्न में राज्य का हिस्सा 255 करोड़ रुपये का होगा। लेकिन अब नए पैटर्न में राज्य का हिस्सा 1020 करोड़ रुपये हो जाएगा। इस हिसाब से छत्तीसगढ़ पर करीब 765 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।
इधर, छत्तीसगढ़ सरकार इस समय जबरदस्त वित्तीय दबाव में है। राज्य का राजस्व बढ़ाने के लिए एक के बाद एक ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं, जिनका सीधा असर आम जनता पर पड़ा है। बिजली दरों में 10 से 20 पैसे प्रति यूनिट की बढ़ोतरी की गई और रियायत सीमित की गई। इसी तरह जमीन रजिस्ट्री के लिए कलेक्टर गाइडलाइन रेट्स में कई जगहों पर 100 से 900 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी गई। विरोध के चलते बिजली रियायत में संशोधन करना पड़ा, जमीन रजिस्ट्री की नई गाइडलाइन को वापस लेना पड़ा। इसके चलते राजस्व बढ़ाने के ये दोनों उपाय काम नहीं आए।
वैसे महतारी वंदन योजना में खर्च कुछ कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। लाभार्थी के लिए ई केवाई सी सत्यापन अनिवार्य किया गया है। लोकसभा चुनाव के पहले इस पर कोई बात थी, जिसने आवेदन किया- सबको मिला। इधर, धान खरीदी में टोकन का भारी टोटा है। मामला किसान के जहर पीने तक चला गया है। खरीदी की रफ्तार पिछले साल के मुकाबले कम है। सरकार कम धान खरीदना चाहती है ताकि भुगतान कम करना पड़े। यह विपक्ष का सदन में लगाया गया आरोप है ।
युवाओं की नाराजगी थामने की कोशिश करते हुए भी सरकार दिखती है। बीते दिनों दो साल की उपलब्धियों को गिनाते हुए वही वायदा दोहराया गया है जो 2023 के विधानसभा चुनाव में किया गया था। तब हजारों सरकारी खाली पदों पर भर्ती की गारंटी थी। हर साल करीब एक लाख लोगों के लिए। मगर, आज 16 लाख से अधिक बेरोजगार केवल रोजगार कार्यालय की फाइलों में दर्ज हैं। जिन्होंने पंजीयन नहीं कराया, उनकी संख्या अलग जोड़ लें।
भीड़ कैसे जाएगी उस दूसरी दुनिया

विधानसभा के नए भवन में शीतकालीन सत्र आज खत्म हो जाएगा। 4 दिन का यह सत्र, पंडरी से लेकर जीरो प्वाइंट तक के तीन लाख लोगों के लिए मानो-अच्छा सत्र हुआ था क्या? जैसी स्थिति में निपट गया। वर्ना 9-10 किमी का यह पूरा इलाका 25 नहीं तो 20 वर्ष से हर सत्र में विधानसभा घेराव के राजनीति प्रदर्शनों से हलाकान रहता था। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, छुट्टी देनी पड़ती थी। मोवा के मेडिकल हब में मरीज, परिजन अस्पताल नहीं पहुंच पाते। फ्लाइट, बस-ट्रेन पकडऩे वालों को घंटों पहले घर छोडऩा पड़ता रहा। रोजी मजदूर, ठेला कारोबारियों को एक दिन के लिए धंधा बंद करना पड़ता। इन सबसे अलग पुलिस प्रशासन की अपनी अलग परेशानी रहती थी। अब इन सबसे मुक्ति ही मिल गई शहर के इस हिस्से को। अब यह सब कुछ 30 किमी दूर नवा रायपुर में होगा। वहां ऐसे प्रदर्शन के लिए दलों की एक नई समस्या होगी। वह है-भीड़ जुटाने की। यहां पंडरी मंडी गेट के पास तो भीड़ पहुंच जाती रही लेकिन वहां के लिए भीड़ जुटाने के साथ लाने ले जाने का भी इंतजाम करना होगा जो महंगा पड़ेगा। क्योंकि भीड़ एक हाथ ले दूजे से ले वाली हो गई है। ऐसे ही हर सत्र में विधानसभा घेराव अब संभव नहीं। साल में एक प्रदर्शन हो जाए तो बहुत है। संभव हो नए शहर को मुक्ति मिले।
जल्द होगी सूचना आयुक्तों की नियुक्ति?
केंद्रीय सूचना आयोग में लंबे समय से रिक्त पड़े मुख्य सूचना आयुक्त और आठ सूचना आयुक्तों के पदों पर आखिरकार नियुक्तियां हो गईं। पूर्व आईएएस अधिकारी राज कुमार गोयल ने 15 दिसंबर को मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में शपथ ली, जबकि आठ नए सूचना आयुक्तों ने कल पदभार संभाला। इधर छत्तीसगढ़ में राज्य सूचना आयोग में 2022 से मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिक्त है। दो सूचना आयुक्तों के पद खाली पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर में सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ का जिक्र किया था, जहां आयोग केवल एक आयुक्त के भरोसे चल रहा था और 35 हजार से ज्यादा अपीलें या शिकायतें लंबित थीं। मार्च 2025 में दो पदों के लिए आवेदन मंगाए गए थे, अप्रैल तक 72 उम्मीदवारों ने दावेदारी की थी और इंटरव्यू की प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है। हाईकोर्ट में प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज कराते हुए याचिका दायर की गई थी, जिसमें भी शासन के पक्ष में फैसला आ चुका है।
केंद्रीय स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के दबाव के चलते ही सही, रिक्तियां भर दी गईं, पर छत्तीसगढ़ में इतनी देरी हो रही है। ऐसा लगता है कि राज्य सरकार को केंद्र के इशारे की जरूरत थी। अब जल्द से जल्द मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हो सकती है।
कब बबा मरही, कब बरा खाबो
बचपन में हम सबने एक कहानी सुनी है। एक गरीब व्यक्ति भीख मांग-मांग कर थोड़ा-थोड़ा सत्तू इक_ा करता है। वह सत्तू एक घड़े में भरकर टांट से लटका देता है, नीचे खटिया डालता है और सपनों की दुनिया में खो जाता है। वह सोचता है, अकाल पड़ेगा तो सत्तू 100 रुपये में बिकेगा। उससे बकरियां लूंगा, फिर मेमने होंगे, फिर गाय आएगी, दूध बिकेगा, खूब पैसा होगा, शादी होगीज्। और, जब पत्नी मेरी बात नहीं मानेगी तो मैं उसे लात मार दूंगा। सपने में मारी गई वही लात असल में घड़े पर पड़ती है। घड़ा टूटता है, सारा सत्तू जमीन पर बिखर जाता है। विधानसभा में वित्त मंत्री का बयान सुनकर यही कहानी याद आ गई। फर्क बस इतना है कि यहां सत्तू नहीं, बल्कि जनता के सपने टांट पर लटकाए जा रहे हैं। टूटने की बस देर है। केंद्र की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कभी 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना दिखाया था। अब छत्तीसगढ़ के वित्त मंत्री ओपी चौधरी सीधे 26 ट्रिलियन की गणित समझा रहे हैं। हकीकत यह है कि आज भी छत्तीसगढ़ की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीडि़त हैं और 38 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। विधायक देवेंद्र यादव की, विजन 2047 पर यह प्रतिक्रिया है। छत्तीसगढ़ में इसके लिए आसान सी कहावत है- कब बूढ़े दादा की मौत होगी तो कब पोते को स्वादिष्ट बड़ा खाने का मौका मिलेगा।
खेलों के लिए बड़े सपने
सरकार के विजन डॉक्यूमेंट-2047 में ग्रोथ हब की परिकल्पना की गई है। खेल गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में भी काम चल रहा है। बीसीसीआई क्रिकेट अकादमी की स्थापना कर रही है। इसके लिए नवा रायपुर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के समीप जमीन भी आबंटित की जा चुकी है। इन सबके बीच सरकार कई और खेल अकादमी की स्थापना की कोशिश कर रही है।
पूर्व क्रिकेटर रवि शास्त्री से भी यहां एक और क्रिकेट अकादमी की स्थापना के लिए चर्चा चल रही है। इसके अलावा पूर्व अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी और कोच पी गोपीचंद को यहां अपना बैडमिंटन अकादमी स्थापित करने के लिए भी तैयार किया जा रहा है। गोपीचंद की हैदराबाद बैडमिंटन अकादमी से पीवी सिंधु सहित कई नामी खिलाड़ी निकले हैं, जो वर्तमान में देश का नाम रौशन कर रहे हैं।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी की कोशिश है कि प्रदेश में माइकल फेल्प्स की स्विमिंग अकादमी की स्थापना की जाए। इसके लिए वो अकादमी से जुड़े लोगों से चर्चा कर रहे हैं। विख्यात तैराक माइकल फेल्प्स के नाम से मुंबई, दिल्ली, पुणे सहित कई शहरों में अकादमी है। इन सबके बीच दिल्ली से स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अफसरों की एक टीम बस्तर आने वाली है। ये टीम बस्तर में तीरंदाजी, और अन्य अकादमी की स्थापना की संभावना तलाश करेगी, और वहां के खेल प्रतिभाओं को प्रशिक्षण देने की योजना है, ताकि भविष्य में बस्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकलकर सामने आए। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
तो पिछला हिसाब पूछ लेते

बताइए इन बेजुबान जानवरों से निपटने में भी नगर निगम-सरकार फेल हो रही हैं। इस पर सवाल उठाते हमारे एक पाठक ने अपना यह पोस्ट हमसे साझा किया है। उनका कहना है निगम करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी आवारा कुत्तों की समस्या का निराकरण नहीं कर पाया। अब सरकार इन्हें निजी एजेंसियों को सौंपने जा रही है। इस पर फिर वही सवाल सामने आता है कि जिस काम को सरकारी एजेंसियां पूरा नहीं कर पाती उन्हीं कामों को फिर निजी एजेंसियां कैसे पूरा कर लेती हैं? क्या निजी एजेंसियों में देश से बाहर के लोग काम करते हैं? उनके पास ऐसी कौन सी अतिरिक्त योग्यता होती है जो सरकारी एजेंसियां के पास नहीं होती?
आखिर क्यों फेल हो जाती है सरकारी एजेंसियां और क्यों पास हो जाती है निजी एजेंसियां? चाहे सरकारी अस्पताल हो,स्कूल हो या फिर बस सेवा या टेलीकॉम सेक्टर हर क्षेत्र में निजी एजेंसी/कंपनियों का ही क्यों बोलबाला है? क्यों सरकारी संस्थाएं इसमें फेल होती नजर आती है?
फिर अगर आवारा कुत्तों को भी नहीं संभाल पर रहे है तो फिर वो करते क्या हैं? अब निजी एजेंसियों को फिर होगा करोड़ों का भुगतान,यानी किसी न किसी का सर कढ़ाई में होगा ही। तो क्या इतने वर्षों से कुत्तों की नसबंदी के नाम पर खेल ही हो रहा था। अब उन्हें पकडऩे में आपके हमारे टैक्स के पैसे का खेल होने जा रहा है। इनकी जुबान होती तो पूछ बैठते पिछले धरपकड़ और नसबंदी अभियान में कितना खर्च हुआ और हमारी संख्या बढ़ी या घटी।
सरकारी दफ्तर बिजली बचाएंगे ?
केंद्र सरकार की रिवैंप्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम -आरडीएसएस के तहत देशभर में स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं। उद्देश्य यह बताया गया है कि बिजली वितरण कंपनियों- डिस्कॉम की तकनीकी और एटीएंडसी लॉस को 12 से 15 फीसदी तक कम किया जाए, बिलिंग अधिक दक्षता के साथ हो और बिजली कंपनियों को घाटे से बाहर लाया जाए। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के पिछले माह के अपडेट्स से पता चलता है कि देशभर में 24 करोड़ स्मार्ट मीटर लगाने का लक्ष्य दिसंबर माह के अंत तक रखा गया था लेकिन सिर्फ 4 करोड़ 76 लाख लग पाए हैं। छत्तीसगढ़ में करीब 59-60 लाख उपभोक्ता हैं। सिंचाई के लिए बिजली लेने वाले किसानों को छोडक़र सभी घरेलू, व्यावसायिक, औद्योगिक और सरकारी संस्थाओं में स्मार्ट मीटर लगाया जाना है। मामला सरकार के राजस्व में वृद्धि से जुड़ा है, इसलिये देर-सबेर लक्ष्य तो पूरा कर ही लिया जाएगा। यहां 47 प्रतिशत लक्ष्य हासिल किया जा चुका है।
स्मार्ट मीटर प्रीपेड और पोस्टपेड दोनों तरह से काम करेंगे। ये मीटर रियल-टाइम में खपत रिकॉर्ड करते हैं और डेटा सीधे डिस्कॉम को भेजते हैं। मैनुअल रीडिंग की जरूरत नहीं पड़ती। दावा है कि इससे गलत बिलिंग और चोरी कम हो जाएगी। प्रीपेड मोड में रिचार्ज खत्म होने पर बिजली अपने आप कट जाएगी।
अब छत्तीसगढ़ सरकार ने तय किया है कि सरकारी विभागों में प्री-पेड आधार पर बिजली सप्लाई की जाएगी। इस समय सरकारी विभागों का बिजली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी पर करीब 3000 करोड़ का बकाया है। इनमें से दो तिहाई- करीब 2000 करोड़ नगरीय निकायों का ही है, जिनकी वित्तीय स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। प्री-पेड लागू होने के बाद विभागों को न केवल पिछला बकाया जमा करना होगा, बल्कि बिजली कटने से पहले रिचार्ज भी कराना होगा। तीन हजार करोड़ इतनी भारी भरकम राशि है कि इसके लिए संभवत: बजट में अलग से प्रावधान करना पड़े। ये बकाया दो चार महीनों का नहीं- सालों का हो सकता है। हर माह बिजली की बिलिंग होती है। तय समय पर राशि जमा नहीं करने पर सरचार्ज बढ़ाया जाता है। खपत की गई यूनिट का स्लैब भी महंगे दर में चला जाता है। पर, विभागों के प्रमुखों को इसकी परवाह नहीं होती- क्योंकि उन्हें रकम जेब से नहीं भरनी होती। यदि वास्तव में यह व्यवस्था लागू हो गई तो जिस तरह वेतन की व्यवस्था अनिवार्य रूप से किया जाना होता है- स्मार्ट मीटर को रिचार्ज करने के लिए भी करना होगा। शायद बिजली की खपत में कुछ अनुशासन दिखे और साहबों के खाली चेंबर के एसी चालू न मिलें।
बच्चों का स्टार्ट-अप बिजनेस

कोरबा जिले के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सतरेंगा की ओर जाते रास्ते में रविवार को सडक़ किनारे एक छोटी-सी दुकान ने पर्यटकों का ध्यान खींच लिया। चार नन्हे बच्चे जमीन पर बोरी बिछाकर मौसंबी बेचते दिखे। मुस्कान, आत्मविश्वास और मेहनत के जज्बे के साथ।
खेल-कूद की उम्र में ये बच्चे बाजार, लागत, मुनाफा और साझेदारी को व्यवहार में उतार रहे हैं। बच्चों ने बताया कि छुट्टी का दिन है। चारों ने अपनी-अपनी जेब से थोड़े-थोड़े पैसे मिलाए- कुछ किलो मौसंबी खरीदी। अब वही फल 10-20 रुपये की चिल्हर में राहगीर, पर्यटकों को बेच रहे हैं। जो भी कमाई होगी, उसे आपस में बराबर बांट लेंगे। जब ‘स्टार्ट-अप’ शब्द बड़े शहरों और कॉर्पोरेट से जुड़ा लगे, तब ये ग्रामीण बच्चे बिना ऐप-इंटरनेट के अपने दम पर अपनी क्षमता प्रदर्शित रहे हैं।
फेसबुक ने मजबूरी में बनाए औजार

फेसबुक पर लोग अपने को नापसंद पोस्ट को सामने से हटा सकते हैं, ताकि वह दुबारा न दिखे। इससे भी अधिक जो नापसंद हो, उसे पोस्ट करने वाले व्यक्ति की किसी भी पोस्ट को 30 दिन के लिए सामने आने से रोका जा सकता है। इसके बाद भी जो लोग न सुधरें, उन्हें अनफॉलो किया जा सकता है, ताकि उनकी कोई भी पोस्ट न दिखे। और अगर इससे भी ज्यादा आपत्तिजनक पोस्ट है, तो उस पोस्ट की शिकायत फेसबुक से की जा सकती है। लेकिन अगर इसके बाद भी बात न बने, तो ऐसे किसी व्यक्ति या पेज को पूरी तरह से ब्लॉक किया जा सकता है।
फेसबुक से यह पूछा गया कि इतने तरह के नकारात्मक विकल्प उसने क्यों बनाए हैं, तो उसने कहा कि हिन्दी के लेखकों की किताब जब आती हैं, तब वे जिस अंदाज में उसके बारे में पोस्ट करते हैं, उससे बचने के लिए लोगों की मांग पर फेसबुक को ये औजार बनाने पड़े।
नई विधानसभा में सबसे पहले
1 नवंबर को उद्घाटित छत्तीसगढ़ विधानसभा के नए भवन में पहले शीतकालीन सत्र का आज विधिवत पहला दिन था। इस मेडन (पहले)अवसर पर पहली-पहली कार्यवाही को लेकर विधायक, स्पीकर ने अपने अपने तरीके से उद्धृत किया। जैसे पहला प्रश्न काल, उसमें पहला प्रश्न, उत्तर देने वाले पहले मंत्री आदि आदि। क्योंकि यह सारे तथ्य नए भवन में नया इतिहास में दर्ज होने हैं। आज का पहला प्रश्न भाजपा के वरिष्ठ विधायक धरमलाल कौशिक ने महिलाओं की शुचिता पर सेनेटरी नैपकिन से जुड़ा प्रश्न पूछा। पहला जवाब महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने दिया। यह उल्लेख स्वयं कौशिक ने किया। इस पर स्पीकर रमन सिंह ने कहा पहला दिन पहला प्रश्न एक तरफ धर्म, दूसरी तरफ लक्ष्मी। कुछ ऐसा ही संयोग रोजगार कौशल विकास मंत्री गुरू खुशवंत के साथ भी जुड़ा। तीन माह पहले मंत्री बने खुशवंत का आज पहला प्रश्नकाल वह भी नए भवन में। स्पीकर ने कहा -गुरू खुशवंत मंत्री बनने के बाद पहली बार उत्तर देने जा रहे हैं। प्रश्न कर्ता सदस्य लखेश्वर बघेल वरिष्ठ विधायक हैं। बघेल जी अच्छा प्रश्न करिए, और अच्छे से जवाब लीजिए। इस पर भाजपा के अजय चंद्राकर ने कहा कि लखेश्वर जैसे ही प्रश्न का मैं 5 साल तक उमेश पटेल (पूर्व मंत्री) से जवाब नहीं ले पाया। उमेश जी ने बेरोजगारों को ठगा था।
जल है तो कल है...
धर्म की कुछ बातें भी पर्यावरण की भी हो सकती हैं। अब जैसे छत्तीसगढ़ में दिखी इस गाड़ी के पीछे लिखा है, सारी समस्या का हल, एक लोटा जल।
अब यह जल सूरज को चढ़ाने की बात हो रही है, या एक लोटा जल बचाने की बात हो रही है, या किसी प्यासे को पिलाने की बात हो रही है, यह तो नहीं पता, लेकिन यह तो तय है कि पर्यावरण के हिसाब से आने वाले दशकों में जल सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाला है, देशों के बीच जंग भी पानी को लेकर होगी, ऐसा भी कई लोगों का अंदाज है।
शाह का मिशन बस्तर
नक्सलियों के खिलाफ अभियान चल रहा है। इन सबके बीच केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह लगातार बस्तर दौरा कर रहे हैं। जब भी उन्हें बस्तर में किसी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया जाता है, तो वो हामी भर देते हैं। शाह पिछले दिनों डीजीपी-एसपी कॉन्फ्रेंस में शिरकत करने रायपुर आए थे, तो उस वक्त डिप्टी सीएम अरुण साव ने बस्तर ओलंपिक के समापन समारोह में शामिल होने का आमंत्रण दिया था। शाह ने तुरंत सहमति दे दी, और वो शनिवार को बस्तर ओलंपिक के समापन कार्यक्रम में उपस्थित हुए।
शाह का बस्तर दौरा हो रहा है, तो कांग्रेस के नेता सवाल भी उठा रहे हैं। पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने पूछ लिया, कि शाह बार-बार बस्तर क्यों आ रहे हैं? उन्होंने यह भी पूछा कि वो (शाह) मणिपुर क्यों नहीं जाते हैं? पूर्व सीएम ने आरोप लगाया कि बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के साथ ही अडानी की एंट्री हो जाएगी। पूर्व सीएम के बयान पर भाजपा की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन अमित शाह ने बस्तर ओलंपिक के समापन मौके पर अपने इरादे साफ किए।
उन्होंने कहा कि अगले पांच साल में बस्तर के सात जिले प्रदेश के सबसे विकसित आदिवासी जिले बनेंगे। शाह ने अपने उद्बोधन में बस्तर प्लान से भी अवगत कराया, और बताया कि किस तरह सरकारी संस्थाओं के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जाएगा। उन्होंने वनोपज आधारित उद्योग लगाने, पर्यटन को बढ़ावा देकर बस्तर को विकसित करने के लक्ष्य की जानकारी दी। शाह ने साफ तौर पर संकेत दिए कि वो बस्तर की विकास योजनाओं की सीधी मॉनिटरिंग कर रहे हैं। सहकारिता विभाग, अमित शाह के पास है। ऐसे बस्तर के विकास में सहकारी संस्थाओं की भूमिका अहम होगी। देखना है कि आगे क्या होता है।
घरवालों का इंतजाम

एक आदमी अपने घर में लोगों को लगातार यह बोल-बोलकर निराश करते रहता था कि उसकी जिंदगी का अब कोई ठिकाना नहीं है। जब कोई दिन में चार बार ऐसी बात करे, तो उसका असर तो खत्म होना ही था। एक दिन रात को खाने के साथ टेबिल पर उसे एक छोटा सा सीलबंद प्याला भी मिला जिस पर लेबल लगा था- गंगाजल।
उसने हैरान होकर पूछा कि यह क्या है?
परिवार ने कहा कि आपकी तबियत ठीक नहीं रहती है, आप ही सारे वक्त ऐसा बोलते हैं, इसलिए थोड़ी सी तैयारी कर रखी है।
लिवर को यकृत कहना कैसा लगेगा?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में उठाए गए कई कदमों से एक यह है कि हिंदी के गौरव को बढ़ाने और प्रचार-प्रसार के लिए ज्यादा से ज्यादा पाठ्यक्रम हिंदी में हों। कई हिंदी भाषा-भाषी राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाते हुए मेडिकल जैसी कठिन पढ़ाई को भी हिंदी में शुरू करने का फैसला किया। इनमें मध्य प्रदेश सबसे पहला राज्य था- जहां मेडिकल की किताबें हिंदी में आ गई और पढ़ाई शुरू हो गईं। इसके बाद राजस्थान, बिहार, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सरकारों ने भी घोषणा की। छत्तीसगढ़ में भी हिंदी में पढ़ाई का पूरा इंतजाम कर लिया गया। भावनात्मक तौर पर यह एक अच्छा फैसला था क्योंकि इन राज्यों के अधिकांश युवा हिंदी से ही हायर सेकेंडरी परीक्षा पास किए हुए होते हैं। अंग्रेजी माध्यम से भी पढ़े हों तब भी हिंदी से उनका गहरा संपर्क होता है, मातृभाषा है। मगर, हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई छात्र करना नहीं चाहते। छत्तीसगढ़ में बीते सत्र में पूरे प्रदेश के केवल 2 छात्रों ने हिंदी में परीक्षा देने का विकल्प चुना था, जबकि अभी जो सत्र चालू हुआ है- उसमें एक भी छात्र नहीं है। डीएमई ने खुद यह बात मीडिया से कही है। यह जानकारी भी दी है कि हिंदी पढ़ाई के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पूरा तैयार किया गया है। मध्यप्रदेश सहित दूसरे राज्यों का भी यही हाल है- जहां हिंदी में पढ़ाई और परीक्षा नगण्य है। किताबें लाइब्रेरियों में रखी गईं, यहां तक कि परीक्षा शुल्क में छूट जैसे प्रोत्साहन भी दिए गए, फिर भी छात्र दूर भाग रहे हैं।
मेडिकल टर्मिनोलॉजी दरअसल अंग्रेजी पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय जर्नल, रिसर्च पेपर, दवाइयां, उपकरण और ग्लोबल स्टैंडर्ड सब अंग्रेजी में हैं। हिंदी अनुवाद बोलें तो हिंदी नहीं हिंग्लिश है जैसे लिवर को लिवर ही लिखना पड़ रहा है। इसे यदि यकृत लिखकर पढ़ाया जाए तो छात्र और शिक्षक दोनों सिर पकड़ लेंगे। इधर, नीट-पीजी की प्रवेश परीक्षाएं तो हिंदी में शुरू हुई नहीं हैं। इंटरनेशनल रिसर्च पेपर, नई किताबें सबसे पहले अंग्रेजी में छपकर आती हैं। हिंदी में तो सिर्फ पाठ्यक्रम की किताबें मिल रही हैं, यदि प्रैक्टिस, रिसर्च और करियर का दायरा बढ़ाने की जरूरत हुई तो अंग्रेजी की ओर देखना पड़ेगा। यही वजह है कि हिंदी पृष्ठभूमि वाले छात्र भी अंग्रेजी चुन रहे हैं।
10 करोड़ दिलों तक पहुंची लावण्या

पिछड़े वर्ग से आने वाली जगदलपुर के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक की बेटी रील क्रिएटर लावण्या दास मानिकपुरी इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त हलचल मचा रही हैं। अपने घर के छोटे से कमरे में, सीमित संसाधनों के बीच बनाई गई उनकी इंस्टाग्राम रील जिसमें वह अफगान जलेबी गाने पर कमर पर तलवार संतुलित करते हुए नृत्य करती दिख रही हैं। 3 दिसंबर को रिलीज इस रील ने आज करीब 10 दिनों में 10 करोड़ से ज्यादा व्यूज़ बटोर लिए हैं। इस एक मिनट की रील पर 60 लाख से अधिक लाइक्स भी आ चुके हैं और उनके फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढक़र 15 लाख से ज्यादा हो गई है। कुछ दिन पहले तक जिनका नाम सीमित दायरे में था, आज वही लावण्या देश-विदेश में देखी और सराही जा रही हैं।
लावण्या के पास न बड़ा स्टूडियो है, न भारी संसाधन। बस मेहनत और अभ्यास ने उसे मशहूर कर दिया। उसके और भी कई रील्स हैं, जो करोड़ों में देखे जा चुके हैं। सोशल मीडिया नायाब चीज है। यहां प्रतिभा की तरफ लोगों का ध्यान गया तो रातों-रात मशहूर हुआ जा सकता है।
केन्द्रीय सूचना आयोग में छत्तीसगढ़
केन्द्र सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी), और आठ सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर दी है। खास बात ये है कि आयोग के गठन के बाद पहली बार सारे पदों पर नियुक्ति हुई है। पद पाने वालों में छत्तीसगढ़ कैडर के रिटायर आईपीएस अफसर स्वागत दास भी हैं, जिन्हें सूचना आयुक्त बनाया गया है।
आईपीएस के 87 बैच के अफसर स्वागत दास लंबे समय तक आईबी में रहे। वो स्पेशल डायरेक्टर थे, और फिर केन्द्र सरकार में आंतरिक सुरक्षा के विशेष सचिव के पद से रिटायर हुए। यद्यपि उनका नाम यहां डीजीपी पद के लिए भी चर्चा में रहा। मगर अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें केन्द्रीय सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया है।
केन्द्रीय मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर राजकुमार मीणा की नियुक्ति की गई है, जो कि 90 बैच के आईपीएस अफसर हैं। अन्य सूचना आयुक्तों में सुरेन्द्र सिंह मीणा, आशुतोष चतुर्वेदी, सुधा रानी रेलंगी, पीआर रमेश, खुशवंत सिंह सेठी, जया वर्मा सिन्हा, संजीव कुमार जिंदल हैं। ये सभी अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञ माने जाते हैं।
विधानसभा की प्रतिमाएं और संयोग

कल से नई नवेली विधानसभा में कामकाज शुरू होने जा रहा है। 51-52 एकड़ के परिसर में दरो-दीवार सब कुछ नया-नया सा होगा। खर्च भी भारी भरकम हुआ है। पुराने भवन की कोई भी कामकाजी वस्तु नए भवन में रियूज़ नहीं की जा रही है। हालांकि 25 वर्ष के इतिहास को सहेज कर सम्मान का संकल्प दोहराया जा रहा है। यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, युवा शक्ति के प्रतीक स्वामी विवेकानंद और संविधान के प्रतीक अशोक स्तंभ की प्रतिमाएं शिफ्ट होंगी ।
इनमें से ध्यान मग्न महात्मा गांधी, और अशोक स्तंभ पहली विधानसभा के समय स्थापित किए गए थे। और स्वामी विवेकानंद चौथी विधानसभा के समय। इन प्रतिमाओं के साथ एक और संयोग जुड़ा है। वह यह कि तीनों प्रतिमाएं हमारे छत्तीसगढ़ भिलाई के शिल्पकार पद्म श्री जेएम. नेल्सन ने बनाए हैं। यही एक अहम वजह भी है कि नई विधानसभा में नई प्रतिमाएं बनवाने के बजाय इन्हें ही स्थापित करने का निर्णय लिया गया। यह भी बता दें कि नए भवन परिसर में स्थापित छत्तीसगढ़ निर्माता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की प्रतिमा को भी नेल्सन ने ही आदमकद आकार दिया है। अब तीनों प्रतिमाएं अटलजी के पास ही स्थापित की जाएंगी। यह कार्य शीत सत्र पूरा होने के बाद होगा।
नौकर-चाकर भी करोड़पति

पिछले दिनों आयकर की टीम ने रायपुर के एक स्टील कारोबारी के यहां छापेमारी की। कारोबारी का परिवार मूलत: हरियाणा का है, और कुछ साल पहले यहां आकर कारोबार शुरू किया था। उन्होंने रायपुर में तीन स्पंज आयरन प्लांट खड़ा किया, और जमीनों में काफी कुछ निवेश किए। और आयकर की टीम जांच में जुटी, तो कई बेनामी निवेश के खुलासे होने लगे।
आयकर की टीम ने 42 ठिकानों पर छापे डाले हैं। आमतौर पर जांच दो-तीन दिनों में ही पूरी हो जाती है लेकिन यह छापा लंबा चला और आयकर की टीम हफ्ते भर तक जांच करती रही। कारोबारी अग्रवाल परिवार के सीए के यहां भी आयकर टीम ने दबिश दी। यह बात छनकर सामने आई है कि स्टील कारोबारी ने अपने ड्राइवर, नौकर-चाकरों के नाम से करोड़ों रुपए निवेश किए हैं। उनके नाम पर करीब 20 से अधिक बैंक खातों का पता चला है। यानी नौकर-चाकर भी कागजों में करोड़पति बन गए हैं।
आयकर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में बेनामी निवेश का अब तक का सबसे बड़ा मामला है। कारोबारी परिवार राजधानी रायपुर के एक धार्मिक ट्रस्ट से जुड़े हुए हैं। जिसकी सत्ता की गलियारों में अच्छी-खासी दखल है। फिलहाल तो जांच-पड़ताल जारी है। कारोबारी कितना सरेंडर करते हैं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
कोपरा को मिली राष्ट्रीय पहचान

कोपरा जलाशय को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की रामसर सूची में शामिल कर लिया गया है। छत्तीसगढ़ के लिए यह उपलब्धि ऐतिहासिक है। बिलासपुर शहर से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित कोपरा जलाशय पक्षियों, जलीय जीवों और वनस्पतियों का संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है। यहां प्रवासी पक्षियों की आवाजाही इस आर्द्रभूमि की समृद्धि को दर्शाती हैं, जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल गई है। पर्यावरण व पक्षी प्रेमी इसकी लंबे समय से मांग कर रहे थे। इसके साथ ही भारत में रामसर स्थलों की संख्या बढक़र 96 हो गई है। मगर, रामसर दर्जा मिलने के बाद लोगों को आदत डालनी होगी कि जलाशय की सुरक्षा की जाए। वन विभाग ने एक बोर्ड लगाकर चेतावनी दे दी है, जिसमें बताया गया है कि अतिक्रमण, प्रदूषण, शिकार और प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ जैसी गतिविधियों पर जेल भी हो सकती है। कोपरा जलाशय से कुछ दूर से ही नेशनल हाईवे निकली है। हालांकि शिकारियों को रोकने के लिए ग्रामीण पहले से ही सतर्क हैं, पर गाडिय़ों के धुएं और शोर की समस्या अब भी बनी हुई है।
केन्द्रीय सूचना आयोग में स्वागत दास
केन्द्र सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी), और आठ सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर दी है। खास बात ये है कि आयोग के गठन के बाद पहली बार सारे पदों पर नियुक्ति हुई है। पद पाने वालों में छत्तीसगढ़ कैडर के रिटायर आईपीएस अफसर स्वागत दास भी हैं, जिन्हें सूचना आयुक्त बनाया गया है।
आईपीएस के 87 बैच के अफसर स्वागत दास लंबे समय तक आईबी में रहे। वो स्पेशल डायरेक्टर थे, और फिर केन्द्र सरकार में आंतरिक सुरक्षा के विशेष सचिव के पद से रिटायर हुए। यद्यपि उनका नाम यहां डीजीपी पद के लिए भी चर्चा में रहा। मगर अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें केन्द्रीय सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया है।
केन्द्रीय मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर राजकुमार मीणा की नियुक्ति की गई है, जो कि 90 बैच के आईपीएस अफसर हैं। अन्य सूचना आयुक्तों में सुरेन्द्र सिंह मीणा, आशुतोष चतुर्वेदी, सुधा रानी रेलंगी, पीआर रमेश, खुशवंत सिंह सेठी, जया वर्मा सिन्हा, संजीव कुमार जिंदल हैं। ये सभी अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञ माने जाते हैं।

विधानसभा की प्रतिमाएं और संयोग
कल से नई नवेली विधानसभा में कामकाज शुरू होने जा रहा है। 51-52 एकड़ के परिसर में दरो-दीवार सब कुछ नया-नया सा होगा। खर्च भी भारी भरकम हुआ है। पुराने भवन की कोई भी कामकाजी वस्तु नए भवन में रियूज़ नहीं की जा रही है। हालांकि 25 वर्ष के इतिहास को सहेज कर सम्मान का संकल्प दोहराया जा रहा है। यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, युवा शक्ति के प्रतीक स्वामी विवेकानंद और संविधान के प्रतीक अशोक स्तंभ की प्रतिमाएं शिफ्ट होंगी ।
इनमें से ध्यान मग्न महात्मा गांधी, और अशोक स्तंभ पहली विधानसभा के समय स्थापित किए गए थे। और स्वामी विवेकानंद चौथी विधानसभा के समय। इन प्रतिमाओं के साथ एक और संयोग जुड़ा है। वह यह कि तीनों प्रतिमाएं हमारे छत्तीसगढ़ भिलाई के शिल्पकार पद्म श्री जेएम. नेल्सन ने बनाए हैं। यही एक अहम वजह भी है कि नई विधानसभा में नई प्रतिमाएं बनवाने के बजाय इन्हें ही स्थापित करने का निर्णय लिया गया। यह भी बता दें कि नए भवन परिसर में स्थापित छत्तीसगढ़ निर्माता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई की प्रतिमा को भी नेल्सन ने ही आदमकद आकार दिया है। अब तीनों प्रतिमाएं अटलजी के पास ही स्थापित की जाएंगी। यह कार्य शीत सत्र पूरा होने के बाद होगा।

नौकर-चाकर भी करोड़पति
पिछले दिनों आयकर की टीम ने रायपुर के एक स्टील कारोबारी के यहां छापेमारी की। कारोबारी का परिवार मूलत: हरियाणा का है, और कुछ साल पहले यहां आकर कारोबार शुरू किया था। उन्होंने रायपुर में तीन स्पंज आयरन प्लांट खड़ा किया, और जमीनों में काफी कुछ निवेश किए। और आयकर की टीम जांच में जुटी, तो कई बेनामी निवेश के खुलासे होने लगे।
आयकर की टीम ने 42 ठिकानों पर छापे डाले हैं। आमतौर पर जांच दो-तीन दिनों में ही पूरी हो जाती है लेकिन यह छापा लंबा चला और आयकर की टीम हफ्ते भर तक जांच करती रही। कारोबारी अग्रवाल परिवार के सीए के यहां भी आयकर टीम ने दबिश दी। यह बात छनकर सामने आई है कि स्टील कारोबारी ने अपने ड्राइवर, नौकर-चाकरों के नाम से करोड़ों रुपए निवेश किए हैं। उनके नाम पर करीब 20 से अधिक बैंक खातों का पता चला है। यानी नौकर-चाकर भी कागजों में करोड़पति बन गए हैं।
आयकर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में बेनामी निवेश का अब तक का सबसे बड़ा मामला है। कारोबारी परिवार राजधानी रायपुर के एक धार्मिक ट्रस्ट से जुड़े हुए हैं। जिसकी सत्ता की गलियारों में अच्छी-खासी दखल है। फिलहाल तो जांच-पड़ताल जारी है। कारोबारी कितना सरेंडर करते हैं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
रविवार से सत्र की शुरूआत इसलिए...
विधानसभा का शीतकालीन सत्र 14 दिसंबर यानी रविवार से शुरू हो रहा है। यह सातवां सत्र है। आम तौर पर शनिवार, और रविवार को विधानसभा का अवकाश रहता है, लेकिन इस बार छुट्टी के दिन रविवार से ही सत्र की शुरुआत हो रही है।
राज्य बनने के बाद पहला विधानसभा का सत्र राजकुमार कॉलेज के जशपुर हॉल में 14 दिसंबर 2000 को हुआ था। हालांकि सदन की कार्रवाई के पहले दिन कुछ विपक्षी कांग्रेस सदस्य गैरहाजिर रह सकते हैं। इसकी वजह है कि 14 तारीख को ही दिल्ली में कांग्रेस की बड़ी रैली-सभा होने जा रही है।
सभा में देशभर के कार्यकर्ताओं को बुलाया गया है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल, पूर्व मंत्री उमेश पटेल के साथ ही कई विधायक सभा में शिरकत करने दिल्ली जा रहे हैं।
हालांकि नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत को भी दिल्ली जाना था, लेकिन चूंकि वो विधायक दल के मुखिया हैं, इसलिए वो यहां रहकर सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेंगे। पहले दिन प्रश्नकाल-ध्यानाकर्षण नहीं होगा। सरकार की तरफ से विजन-2047 को लेकर प्रेजेंटेशन दिया जाएगा। ऐसे में सदन की कार्रवाई जल्द निपटने के आसार हैं
शादी बहरीन- बिलासपुर की और गूगल
इस वर्ष के शादियों के मुहूर्त खत्म हो रहे हैं। इस दौरान इनमें शामिल बराती-घराती आमंत्रित मेहमानों के बीच एक चर्चा रही अन्न की बर्बादी कैसे रूके। जरूरत के मुताबिक खाद्यान्न लेने के बजाय प्लेट भर लेकर छोडऩे की आदत कैसे छूटे। वैसे शुगर बीपी, अपच जैसे समस्या से, प्लेट के भराव में कमी आई है। हम यह इसलिए कह, बता रहे कि हाल में बिलासपुर में एक शादी हुई। बिलासपुर मूल के देवांगन परिवार ने बहरीन से आकर अपने बेटे का विवाह किया। बहु बिलासपुर की है जो अब पति के साथ यूरोप में रहेगी। यह परिवार शादी में यहां के खान-पान पर दांतों तले उंगली दबाते रहा। मेहमानों के हाथ में भरे भरे प्लेट देख कहते रहे कितना खाते हैं और कितना बर्बाद कर रहे। और एक शादी में कितनी बार खाते हैं।
एक परिजन से रहा नहीं गया तो पूछ बैठा। जवाब मिला बहरीन में शादी एक ही बार लंच या डिनर बस..चाहे घराती हो बराती या आमंत्रित। और प्लेट में कुछ ग्राम बिरयानी, कुछ खजूर और हलवा बस। सवाल करने वाले से रहा नहीं गया। उसने गूगल पर सच्चाई क्लिक किया तो यह जवाब मिला-बहरीन में शादी का खाना पारंपरिक और स्वादिष्ट होता है, जिसमें मचबूस (मसालेदार चावल और मांस/मछली), कूजी (चावल के साथ भरवां मेमना), और सलूना (सब्जिय़ों का स्टू) जैसे मुख्य व्यंजन होते हैं, जिन्हें खुब्ज (रोटी) के साथ खाया जाता है। मीठे में मुहम्मर (खजूर और गुलाब जल), रहश, और खानफरुश (पेस्ट्री) जैसे पकवान होते हैं, और गहवा (कॉफी) गर्मजोशी से परोसी जाती है, जो बहरीनी शादियों में मेहमानों को भरपूर और यादगार भोजन का अनुभव कराता है।
सूचना आयोगों में नियुक्ति अगले सप्ताह?
संसद का सत्र चल रहा है। इस दौरान केन्द्रीय सूचना आयुक्तों के रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए भी दिल्ली में बैठक होने वाली है। इससे परे छत्तीसगढ़ में भी मुख्य सूचना आयुक्त, और सूचना आयुक्त की नियुक्ति को लेकर हलचल है।
छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त, और सूचना आयुक्त की नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस वजह से यहां नियुक्ति की प्रक्रिया रूक गई। हाईकोर्ट ने कुछ दिन पहले ही नियुक्ति से जुड़ी याचिकाओं को निराकृत कर दिया है। इसके बाद मुख्य सूचना आयुक्त, और सूचना आयुक्त की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। प्रदेश में मुख्य सूचना आयुक्त के अलावा सूचना आयुक्त के दो पद खाली हैं। इसके लिए आवेदन बुलाए गए थे। मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए इंटरव्यू हो चुका है। विधानसभा का सत्र 14 तारीख से शुरू हो रहा है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सत्र की अवधि में सीएम बैठक कर नियुक्ति कर सकते हैं। मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए पूर्व सीएस अमिताभ जैन, पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा सहित दर्जनभर से अधिक रिटायर्ड अफसरों, और अन्य अभ्यर्थियों ने इंटरव्यू दिए थे। अमिताभ जैन रिटायरमेंट के बाद अभी उन्हें कोई और दायित्व नहीं दिया गया है। ऐसे में उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
समर्पण की जीवंत तस्वीर
छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ प्रेस-फोटोग्राफर गोकुल सोनी फेसबुक पर अपना देखा सच खूबसूरती से बताते हैं। अभी उन्होंने लिखा है- क्या आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर में इतनी सजी-संवरी हरियाली देखी है?
यह तस्वीर रायपुर के के.के. रोड, जयस्तंभ चौक के आगे स्थित क्चस्हृरु दफ्तर की है। हैरानी की बात यह है कि यहाँ फैली हरियाली सरकार के एक भी पैसे से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के समर्पण, प्रेम और जिम्मेदारी से सींची गई है।
इस ऑफिस में अब्दुल खलील केयरटेकर हैं, लेकिन सिर्फ केयरटेकर कहना उनके समर्पण के साथ अन्याय होगा। खलील साहब ने तीन सौ से ज़्यादा गमले, विभिन्न पौधे, मिट्टी, खाद—सब कुछ अपनी जेब से खरीदकर लगाया है। पानी देना, देखभाल करना, सफाई करना—यह सब वे रोज़ खुद करते हैं। विभाग की ओर से उन्हें इस काम के लिए एक रुपया भी नहीं मिलता। वे यह सब सिर्फ पर्यावरण प्रेम और अपनी खुशी के लिए करते हैं।
खलील साहब का इस जगह से रिश्ता भी पुराना और गहरा है। जब यह ज़मीन बिल्कुल खाली पड़ी थी, उसी दौर से वे यहाँ जुड़े हुए हैं। 4 फरवरी 1994 को जब तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने तारघर भवन का भूमि पूजन किया था, तभी से अब्दुल खलील यहाँ सेवा दे रहे हैं। 10 अक्टूबर 1996 को भवन बनकर तैयार हुआ और तारघर स्थापित हुआ—तब से वे केयरटेकर और जनरेटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हैं। तीन दशक बाद भी उनका यह सफर बिना रुके जारी है।
आज भी सुबह-सुबह आप उन्हें पौधों में खाद-पानी देते, सूखे पत्ते हटाते, नई कलियों को सहेजते देख सकते हैं। उन्होंने इस सरकारी दफ्तर को सिर्फ कार्यस्थल नहीं, एक जीवंत बगीचा बना दिया है—जहाँ हर पौधा उनके श्रम और संवेदनशीलता की खामोश कहानी सुनाता है।
बृजमोहन के अलावा देवजी भी
प्रदेश में जमीन की गाइडलाइन दरों की वृद्धि से जुड़ा विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इस सिलसिले में सरकार ने गाइडलाइन दरों का पुनरीक्षण प्रस्ताव मांग कर कुछ हद तक मामले को ठंडा करने की कोशिश भी की है। बावजूद इसके भाजपा के भीतर ही गाइडलाइन दरों में वृद्धि को वापस लेने की मांग जोर पकड़ रही है।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने तो खुले तौर पर गाइडलाइन दरों में वृद्धि पर असहमति जताई है, और अब पूर्व विधायक देवजी पटेल भी गाइडलाइन दरों में वृद्धि के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। देवजी पटेल ने सीएम विष्णुदेव साय को चि_ी लिखी है। पत्र में उन्होंने कहा कि गाइडलाइन की दरों में पुनरीक्षण हर साल होना चाहिए, मगर सरकार के सिपहसलारों के चलते नियंत्रित रूप से पुनरीक्षण नहीं किया गया, और वर्तमान सरकार के समय से ही एकमुश्त 8-9 वर्षों के पुनरीक्षण का नतीजा एक साथ 50 से 500 फीसदी तक वृद्धि स्पष्ट रूप से दृष्टिगत हो रहा है।
देवजी ने कहा कि सरकार के उच्चाधिकारियों द्वारा बिना सोचे समझे एकमुश्त वृद्धि जनता के लिए नासूर बन गया है। इसका नतीजा यह है कि पूरे प्रदेश में सरकार के खिलाफ माहौल बन गया है। उन्होंने कहा कि गाइडलाइन दरों में इतनी वृद्धि संभवत: पहली बार हुई है। अविभाजित राज्य के समय भी इस प्रकार की घटना नहीं हुई। परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ प्रदेश की आम जनता चाहे वह किसान हो, या बिल्डर हो, या आमजन सभी लिए शहरी-ग्रामीण क्षेत्र के जमीन संबंधी लेनदेन में इसका असर दिख रहा है।
प्रदेश के रजिस्ट्री कार्यालयों में वीरानी छाई हुई है। देवजी ने कहा कि प्रदेश की जनता के हित में जमीन की गाइडलाइन की दरों में वृद्धि के आदेश को निरस्त किया जाना चाहिए। देव जी के पत्र पर तो सरकार का रुख सामने नहीं आ पाया है। मगर इसे नजर अंदाज कर पाना मुश्किल होगा।
कब तक चलेगा जननी सुरक्षा नाटक?
आदिवासी बाहुल्य सरगुजा के लोगों को दो बार गर्व करने का मौका मिला। एक बार 2013 में कांग्रेस की सरकार बनी तो टी.एस. सिंहदेव प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बने उसके बाद दूसरी बार श्याम बिहारी जायसवाल। यहां लोगों को लगा था कि अब तो अपने इलाके का स्वास्थ्य ढांचा चमक जाएगा, मां-बच्चों की जान नहीं जाएगी। लेकिन कुछ भी नहीं बदला, बल्कि और बदतर हो गया। सरगुजा की गर्भवती माताएं और उनके नवजात आज भी एंबुलेंस के इंतजार में, अस्पताल के बंद ताले के सामने या रास्ते में दम तोड़ रहे हैं। व्यवस्था की नाकामी क्रूर विडंबना ही बनी रह गई है।
सूरजपुर की कविता सिंह सोमवार-मंगलवार की रात प्रसव पीड़ा लेकर जिला अस्पताल पहुंचीं। उनका बीपी 180 पहुंच गया था। यह हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का साफ-साफ संकेत था। प्रोटोकॉल कहता है कि ऐसे में पहले बीपी कंट्रोल किया जाए, फिर रेफर करें। लेकिन यहां से तुरंत रेफर कर दिया गया। एंबुलेंस में ही प्रसव हुआ और अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज पहुंचते-पहुंचते कविता सिंह और उनका बच्चे की जान चली गई। सिविल सर्जन डॉ. अजय मरकाम का जवाब देते हैं- हमारे यहाँ स्त्री रोग विशेषज्ञ ही नहीं हैं। यही सच है, वाहवाही के लिए सूरजपुर को जिला तो बना दिया, पर महिलाओं के लिए डॉक्टर ही नहीं। पिछले छह महीने में सूरजपुर में यह तीसरी घटना है। 8 अगस्त को भटगांव सीएचसी में महिला जमीन पर तड़पती रही, प्रसव हो गया। 24 सितंबर को जिला अस्पताल में इलाज नहीं मिला, रेफर किया, मौत हो गई। और अब कविता सिंह और उनका बच्चे की जान चली गई।
सप्ताह भर पहले लांजीत गांव के पीएचसी पर ताला लगा था। गर्भवती बाहर तड़पती रही, फिर किराए की कार में रास्ते में प्रसव कराना पड़ा। सिंहदेव के स्वास्थ्य मंत्री रहते (2013-18) भी बलरामपुर-वाड्रफनगर में आदिवासी खून की कमी से मर गए थे। वहां महीनों तक कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ता झांकने नहीं गया था। सरगुजा से रोज खबरें मिलेंगी रेफर, एंबुलेंस उपलब्ध नहीं- मरीज पैदल या बाइक में ढोते हुए- रास्ते में मौत। और उसके बाद जांच कमेटी, निलंबन का नाटक और फिर बहाली, सब पहले जैसा।
अचरज की बात नहीं है कि इन सबके चलते ही नवजात मृत्यु दर में सरगुजा सबसे आगे है। पिछले छह महीनों में पूरे छत्तीसगढ़ में 3,184 नवजात और 221 माताएं मर चुकी हैं। कौन जिम्मेदार है? 2024-25 में स्वास्थ्य का बजट सिर्फ 4.8 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत 6 प्रतिशत से ऊपर है। मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर जैसे राज्य स्वास्थ्य पर 10 प्रतिशत के आसपास खर्च करते हैं। छत्तीसगढ़ में तो डॉक्टरों के 9,000 से ज्यादा पद खाली हैं। इनमें स्पेशलिस्ट के 70-80 प्रतिशत पद रिक्त हैं। तकनीशियन, नर्स और एनेस्थेटिस्ट की भी भारी कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 40 फीसदी से ज्यादा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या तो बिना डॉक्टर के हैं या बिना बिजली-दवा के।
सरकारें बदलती हैं, मंत्री बदलते हैं, योजनाएं बदलती हैं। जननी सुरक्षा योजना का नाम बहुत है, लेकिन जमीन पर क्या है? नशे में ड्यूटी करते डॉक्टर मिलते हैं, सर्जरी की कैंची भी थाम लेते हैं। क्या यह मान लिया जाए कि सत्ता और कुर्सी किसी की भी हो, आदिवासी जीवन की कीमत उनके लिए आज भी सस्ती है।
महासमुंद की सशक्त महिलाएं

दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल में हाल ही में महासमुंद जिले के बुंदेली गांव की एक रिपोर्ट ‘एक गांव’ के एपिसोड में प्रसारित की गई। बुंदेली गांव में महिलाओं ने अवैध शराब और नशे के खिलाफ एक प्रभावी आंदोलन चलाया है, जिसने गांव की सामाजिक स्थिति को बदला है और उन्हें आर्थिक रूप से भी सशक्त बनाया है। महिलाओं ने एकजुट होकर गांव में अवैध शराब की बिक्री और सेवन के खिलाफ मोर्चा खोला। पहले यह गांव पूरी तरह से शराब की चपेट में था और घरेलू स्थिति काफी खराब थी। स्थानीय पुलिस के मार्गदर्शन में महिलाओं ने एक समूह का गठन किया। इस पहल के बाद गांव में मद्य निषेध पूरी तरह लागू है।


