राजपथ - जनपथ
‘ब्रांडेड’ बेइंसाफी और कुलीनता का पाखंड
आज के दौर में ‘नाम’ सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक विज्ञापन बन चुके हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जिस वैश्वीकरण ने हमें दुनिया भर के ब्रांड्स से जोड़ा, उसी ने हमें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के मामले में ‘अंधा’ बना दिया है। रायपुर की सडक़ों से लेकर बोस्टन के आलीशान क्लबों तक, राजनीतिक-सामाजिक बेइंसाफी का एक ऐसा तमाशा चल रहा है, जो अज्ञानता और अहंकार का मिला-जुला रूप है।
सडक़ों पर घूमता ‘नस्लवाद’
अभी कुछ अरसा पहले रायपुर की एक व्यस्त सडक़ पर एक युवक की पीठ पर बड़े अक्षरों में ‘NEGRO’ लिखा देखा गया। यह केवल एक टी-शर्ट का प्रिंट नहीं था, बल्कि हमारी उस संवेदनहीनता का ‘पोस्टर’ था जो दूसरों के सदियों पुराने दर्द को ‘फैशन’ मान बैठी है। ‘निग्रो’ वह शब्द है जिसने अमेरिका और अफ्रीका में करोड़ों इंसानों को बेडिय़ों, कोड़ों और अमानवीयता के अंधेरे में धकेला। आज पश्चिम के सभ्य समाज में इस शब्द को लेना भी ‘सोशल सुसाइड’ माना जाता है। लेकिन हमारे यहाँ? हमारे यहाँ यह केवल एक ‘कूल’ दिखने वाला विदेशी शब्द है। यह अज्ञानता नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक घाव पर नमक छिडक़ने जैसा है जिसे दुनिया अभी भरने की कोशिश कर रही है।
Negro शब्द क्यों अस्वीकार्य है? नस्लवाद का प्रतीक- यह शब्द गुलामी (Slavery) और अलगाववाद (Segregation) के दौर की याद दिलाता है। इसे श्वेत वर्चस्व (White Supremacy) के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। आज के दौर में, चाहे वह अमेरिका हो या भारत, इस शब्द का उपयोग करना न केवल असभ्य माना जाता है, बल्कि कई देशों में यह नफरत फैलाने वाली भाषा की श्रेणी में आता है। 1960 के दशक के बाद से, अश्वेत समुदाय ने इस शब्द को पूरी तरह से नकार दिया है। इसकी जगह अब ‘Black’ या "People of Colo" (POC) का सम्मानपूर्वक उपयोग किया जाता है।
‘हिटलर’ का देसी अवतार और जर्मनी का सबक
यही हाल ‘हिटलर’नाम का है। गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़ के दुर्ग तक, ‘हिटलर’ नाम की दुकानें शान से चल रही हैं। रायपुर में रविशंकर यूनिवर्सिटी कैंपस की बेंचों पर छात्र इस नस्लवादी जनसंहारी तानाशाह का नाम गर्व से खुरचते हैं। हम जिसे ‘अनुशासन का प्रतीक’ मानकर पूज रहे हैं, वह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा जनसंहारी था।
जर्मनी ने अपने इतिहास से सबक लिया है। वहां के ‘क्रिमिनल कोड’ (Section)(a) के तहत आप अपने बच्चे या कुत्ते का नाम भी ‘हिटलर’ नहीं रख सकते। वहां नाजी सैल्यूट करना आपको सीधे जेल पहुँचा सकता है। लेकिन भारत में, हम इस ‘राक्षस’ को एक ब्रांड बना देते हैं। यह दर्शाता है कि हमारा नैतिक पैमाना कितना टूट चुका है कि हमें ‘शक्ति’ और ‘क्रूरता’ के बीच का फर्क समझ नहीं आता।
‘बोस्टन ब्राह्मण’- कुलीनता की ‘स्मगलिंग’
पॉलिटिकल इनकरेक्टनेस का सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी उदाहरण है—‘बोस्टन ब्राह्मण’। 19वीं सदी में अमेरिकी अभिजात वर्ग (Elite) ने खुद को आम जनता से श्रेष्ठ दिखाने के लिए भारतीय ‘ब्राह्मण’ शब्द को उधार लिया। उन्होंने इसके पीछे के त्याग या पांडित्य को नहीं, बल्कि ‘पदानुक्रमा’ (Hierarchy) और ‘उच्चता’ को अपनाया।
इस शब्द को सबसे पहले 1860 में प्रसिद्ध लेखक और चिकित्सक डॉ. ओलिवर वेंडेल होम्स ने अपने उपन्यास ‘एल्सी वेनर’ में इस्तेमाल किया था। होम्स भारतीय दर्शन और वेदों से काफी प्रभावित थे। उन्होंने देखा कि भारत में ‘ब्राह्मण’ समाज का वह हिस्सा हैं जो शिक्षित हैं, बौद्धिक रूप से श्रेष्ठ माने जाते हैं और जिनके पास आध्यात्मिक और सामाजिक सत्ता है। उन्होंने बोस्टन के उन पुराने परिवारों के लिए यह शब्द चुना जो पीढिय़ों से अमीर थे, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े थे और राजनीति व व्यापार पर जिनका एकाधिकार था। होम्स ने उन्हें "The Brahmin Caste of New England" कहा।
आज अमेरिका में ‘Brahmin’ नाम का एक नामी ब्रांड है जो लग्जरी लेदर (चमड़े) के बैग बनाता है। यहाँ तक कि ‘Brahmin' नाम से बीयर (शराब) भी बेची जाती है।
विडंबना की पराकाष्ठा देखिए, भारत का जो समुदाय पारंपरिक रूप से चमड़े के काम और मदिरापान को वर्जित मानता रहा, उसी का नाम पश्चिम के बाजार ने ‘एलीट’ दिखने के लिए ‘लेदर’ और ‘लिकर’ पर चिपका दिया।
चाहे वह ‘निग्रो’ जैकेट पहनकर बाइक दौड़ाना हो, या ‘हिटलर’ के नाम पर धंधा करना—यह सब एक ही मानसिक बीमारी के लक्षण हैं- हमदर्दी की कमी। हम दूसरों की संस्कृति और उनके संघर्षों को ‘लेबल’ बनाकर अपनी पीठ पर लाद रहे हैं।
जब शब्द अपनी गहराई खो देते हैं और केवल ‘ब्रांड’ बन जाते हैं, तो समाज अपना विवेक खोने लगता है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को यही सिखाएंगे कि इतिहास का हर काला अध्याय केवल एक ‘टी-शर्ट प्रिंट’ है? यह समय अपनी ऐतिहासिक समझ को दुरुस्त करने का है, वरना हम ‘ब्रांडेड’ तो कहलाएंगे, लेकिन ‘सभ्य’ कभी नहीं।
आज भारत में सांप्रदायिक हरकतें करते घूमते नौजवान भगत सिंह की तस्वीर आते टी शर्ट पहनकर घूमते हैं. भगत सिंह पूरी, छोटी सी, जिंदगी जिन बातों के खिलाफ रहे, उन्हें करते हुए लोग उनके भक्त होने का दिखावा भी कर लेते हैं।
सत्ता की बिसात और विशेष ट्रेनें
सत्ता की बिसात बंगाल में बिछी है, लेकिन उसकी हलचल छत्तीसगढ़ की पटरियों पर महसूस की जा रही है। बंगाली बहुल भिलाई, रायपुर बिलासपुर कोरबा रायगढ़ रेलवे स्टेशनों पर इन दिनों कुछ अलग ही नजारा है। खडग़पुर, हावड़ा और शालीमार जाने वाली हर ट्रेन हाउसफुल है। वेटिंग लिस्ट का आंकड़ा 200 के पार जा चुका है। लेकिन ये भीड़ ‘वोट’ की है। वजह साफ है, पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव। यात्रियों के इस रेले को देखते हुए रेलवे प्रशासन भी अलर्ट मोड पर है। लंबी वेटिंग लिस्ट को क्लीयर करने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर जोन छत्तीसगढ़ से बंगाल और असम के लिए स्पेशल ट्रेनें चला रहा है। तो कुछ ट्रेनों में एक्स्ट्रा कोच भी जोड़े जा रहे हैं ताकि वोटर्स को उनके गंतव्य तक पहुंचाया जा सके। ये लंबी वेटिंग लिस्ट बता रही है कि इस बार बंगाल का चुनाव कितना दिलचस्प और अहम होने वाला है। रेलवे की स्पेशल ट्रेनें इन वोटर्स को सत्ता की मंजिल तक पहुंचाएगी या नहीं, ये तो वक्त बताएगा, लेकिन मतदाताओं का उत्साह सिस्टम पर भारी पड़ता दिख रहा है। देश के दूसरे प्रदेशों से भी बंगाल के लिए विशेष ट्रेनें बुक हो चुकी हैं, गुजरात से चार।
सेव इंडिया, सेव बंगाल व्हाट्सएप ग्रुप
इस पर यह भी गौर करने वाला घटनाक्रम है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के दो दिग्गजों ने सेव इंडिया, सेव बंगाल नाम से व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है बंगालियों के बीच। इस ग्रुप का पहला सामूहिक कार्यक्रम 29 मार्च को मन की बात के साथ रजबंधा मैदान में हुआ। इसे सुनने के लिए विशेष रूप से बंगालियों के लिए तैयारी की गई थी। लजीज भोजन भी करवाया गया। पीएम को सुनने के बाद बंगालियों की मैराथन बैठक हुई । इसमें तय हुआ अभी नहीं तो कभी नहीं..। की रणनीति के अनुसार जिनके रिश्तेदार पश्चिम बंगाल में है, यहां से सम्मानजनक ढंग से भेजा गया और भेजा जा रहा है ताकि बंगाल निवासी अपने रिश्तेदारों को भाजपा को वोट देने प्रेरित करें। इन परिवारों के सदस्य और चेहरे चिन्हित किए गए हैं। इनके साथ चार प्रोफेशनल नेता भी भारी लगेज के साथ भेजे गए हैं। ताकि उन पर नजर रखी जा सके।
नया चेहरा, या एक्सटेंशन?

क्या केंद्र सरकार मुख्य सचिव और डीजीपी की तरह हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को भी एक्सटेंशन देगी? यह सवाल इन दिनों प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल, हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स वी श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। अपने मजबूत संपर्कों के लिए पहचाने जाने वाले राव के संभावित एक्सटेंशन को लेकर अभी से कयास शुरू हो गए हैं।
1990 बैच के आईएफएस अधिकारी राव को पिछली भूपेश बघेल सरकार ने पांच सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाया था। मौजूदा सरकार ने भी उन्हें पद पर बरकरार रखा है। जहां तक एक्सटेंशन का सवाल है, तो राज्य में पहले ही अमिताभ जैन को तीन माह और अशोक जुनेजा को छह माह का एक्सटेंशन मिल चुका है। हालांकि फॉरेस्ट विभाग का इतिहास अलग रहा है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अब तक किसी भी पीसीसीएफ को एक्सटेंशन नहीं मिला है। अलबत्ता रिटायरमेंट के बाद संविदा नियुक्तियों के उदाहरण जरूर हैं। राव के बाद नए नए हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को लेकर भी हलचल तेज है। 1994 बैच के अरुण पाण्डेय स्वाभाविक दावेदार माने जा रहे हैं, जबकि इसी बैच के प्रेम कुमार भी दौड़ में शामिल हैं। इन सबके बीच 1995 बैच के ओपी यादव का नाम तेजी से उभरकर सामने आया है। ओपी यादव वर्तमान में कैम्पा का प्रभार संभाल रहे हैं। उनके बड़े भाई एसपी यादव यूपी कैडर के आईएफएस अधिकारी हैं और रिटायरमेंट के बाद केंद्र सरकार के एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं। संपर्कों के लिहाज से ओपी यादव को मजबूत दावेदार माना जा रहा है। इसमें सरगुजा कनेक्शन चर्चा का विषय है। अरुण पांडेय और ओपी यादव, दोनों ही सरगुजा के रहवासी हैं। ऐसे में अगर हेड आफ फारेस्ट फोर्स पद पर सरगुजा को प्रतिनिधित्व मिलता है, तो इसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाएगा। फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है कि राज्य सरकार राव के एक्सटेंशन के लिए प्रस्ताव भेजेगी या नहीं, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में इसको लेकर चर्चाएं तेज हैं। देखना है आगे क्या होता है।
सावधानी, निगरानी, या जासूसी?
प्रदेश के तकरीबन सभी जिलों में सर्वसुविधायुक्त भाजपा कार्यालय बन चुके हैं। यहां लाइब्रेरी के साथ-साथ बाहर से आने वाले कार्यकर्ताओं के ठहरने की भी व्यवस्था है। आम तौर पर ये कार्यालय संगठन की गतिविधियों से गुलजार रहते हैं, लेकिन सरगुजा के एक जिले का कार्यालय इन दिनों वीरान नजर आने लगा है।
हालत यह है कि केवल किसी बड़े पदाधिकारी के आने पर ही वहां रौनक लौटती है। बताते हैं कि जिलाध्यक्ष बदलते ही नए जिलाध्यक्ष ने कार्यालय में निगरानी के लिए वॉइस रिकॉर्डिंग वाला सीसीटीवी कैमरा लगवा दिया। इसके बाद से माहौल बदल गया है।
अब स्थिति यह बन गई है कि कार्यकर्ता कार्यालय जाने से कतराने लगे हैं। सीसीटीवी कैमरा तक तो ठीक माना जा रहा था, लेकिन वॉइस रिकॉर्डिंग से असहजता बढ़ गई है और इसे लेकर जासूसी जैसी चर्चा होने लगी है।
हालांकि, राजनीति में आस्था और गुट बदलते रहने की प्रवृत्ति भी आम मानी जाती है, ऐसे में कौन किसके साथ है, यह समझना भी संगठन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
अब विलुप्त प्राणी नहीं रहे काले हिरण
बरनावापारा में मिली सफलता से उत्साहित होकर वन विभाग अब गोमर्धा वन्यजीव अभ्यारण्य में काले हिरणों का एक और समूह लाने जा रहा है। दरअसल, ऐसा सौ साल बाद कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में काले हिरण अब विलुप्तप्राय वन्यजीव नहीं है। 1927 में अंतिम बार आधिकारिक तौर पर इसे देखा गया था। मगर, एक सदी बाद, अब राज्य में लगभग 130 काले हिरण स्वतंत्र रूप से बारनवापारा के जंगल में घूम रहे हैं और लगभग 80 काले हिरणों को छोड़े जाने की तैयारी हो रही है।
77 काले हिरणों का पहला जत्था यहां सन् 2018 में लाया गया। कोविड-19 महामारी के दौरान लगभग 15 जानवरों की मृत्यु हो गई। मगर अब यहां 130 काले हिरण हैं और खुले में छोड़े गए हैं। बाड़ों में भी 60 हिरणों को संरक्षित करके रखा गया है।
ब्लैकबक केवल देखने में आकर्षक जानवर नहीं हैं बल्कि वे पारिस्थितिकी संतुलन में भी विशेष भूमिका भी निभाते हैं। उनकी उपस्थिति अवांछित घास प्रजातियों के प्रसार को रोकते हैं और घास के मैदानों की उत्पादकता बढ़ाते हैं, जो अन्य वन्यजीवों के लिए भी अनुकूल होता है। वैसे काले हिरण गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों में विचरण करते हैं, पर छत्तीसगढ़ से यह लगभग 100 साल से लुप्त था। दिल्ली और कुछ अन्य चिडिय़ाघरों से 8 साल पहले लाए गए काले हिरणों की आबादी में विस्तार हुआ है। अभयारण्यों में भी इन्हें खुला छोड़ दिया गया है।
ख़ाली विमान निराशा से भरा होता है!
पिछले दिनों अंबिकापुर से दिल्ली के लिए बहुप्रतीक्षित विमान सेवा पूरे तामझाम के साथ शुरू की गई। सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज ने खुद यात्रियों का स्वागत कर मिठाई खिलाई, जिससे माहौल उत्साहपूर्ण बन गया। लेकिन शुरुआत के कुछ ही दिनों बाद इस सेवा के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
सोमवार को अचानक फ्लाइट रद्द होने से यात्रियों को निराशा झेलनी पड़ी। यही नहीं,अंबिकापुर-कोलकाता विमान सेवा, जो बिलासपुर होकर संचालित हो रही है, उसमें यात्रियों की संख्या बेहद कम दिखी। अंबिकापुर से महज तीन यात्री ही रवाना हुए।
दोनों सेवाएं बिलासपुर के रास्ते संचालित हो रही हैं, लेकिन अंबिकापुर से अपेक्षित यात्री नहीं मिल पाने के कारण इनके संचालन को लेकर संशय गहराता जा रहा है। इससे पहले फ्लाईबिग की अंबिकापुर-बिलासपुर-रायपुर सेवा भी महज एक महीने में बंद हो चुकी है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और राज्य सरकार के प्रयासों से एलायंस एयर की यह नई पहल शुरू तो हुई, लेकिन कम यात्री संख्या इसे फिर से बंद होने की कगार पर ला सकती है। अब देखना है कि यह उड़ान लंबे जारी समय जारी रहती है या नहीं।
सब चंगा सी
पिछले दिनों विदेश मंत्री एस जयशंकर आईआईएम के दीक्षांत समारोह में शिरकत करने रायपुर आए, तो कई भाजपा नेता स्वागत के लिए एयरपोर्ट पहुंचे थे। स्वाभाविक तौर पर भाजपा नेताओं की चिंता पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के चलते पेट्रोलियम पदार्थों की समस्या को लेकर थी। बताते हैं कि जयशंकर ने कम शब्दों में अपनी बात रखी, और आश्वस्त किया कि हमारी तैयारी पूरी है, और कोई समस्या नहीं आएगी।
पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहे युद्ध के चलते पूरी दुनिया में पेट्रोलियम संकट गहरा गया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहां भी विशेषकर गैस की किल्लत हो रही है। कमर्शियल सिलेंडर के दाम बढ़ चुके हैं, और रसोई गैस की समस्या पैदा हो गई है।
जाने-माने डिप्लोमेट और विदेश मंत्री जयशंकर इन समस्याओं से निपटने में अहम रोल अदा कर रहे हैं। वीआईपी लाउंज में विधायक सुनील सोनी और पुरंदर मिश्रा ने उनसे अनौपचारिक चर्चा भी की। सुनील सोनी से जयशंकर पहले से ही परिचित हैं।
सोनी सांसद थे तब पासपोर्ट और अन्य विषयों को लेकर जयशंकर से पहले भी मिल चुके हैं। मिश्रा खुद वित्तीय मामलों के गहरे जानकार हैं, मगर वो भी जयशंकर से खोदकर कुछ निकलवाने में असफल रहे। हल्के-फुल्के अंदाज में जयशंकर ने उनसे सिर्फ इतना ही कहा कि तमाम परिस्थितियों से निपटने की तैयारी पूरी है, और किसी तरह की कोई समस्या नहीं आएगी।
घर के भीतर मतभेद
पंडरी स्थित कृषि उपज मंडी की जमीन पर जेम्स-ज्वेलरी पार्क की स्थापना की तैयारी चल रही है। वैसे तो यह पिछली भूपेश बघेल सरकार का प्रपोजल था, और इस दिशा में काफी कुछ कार्रवाई हो चुकी थी। अब विष्णु देव साय सरकार ने पुराने प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है। हालांकि पूर्व मंडी अध्यक्ष, और धरसीवां से तीन बार विधायक रह चुके देवजी पटेल इसकी खिलाफत कर रहे हैं, और इसको लेकर फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए कानूनी सलाह ले रहे हैं। ये बात अलग है कि कोर्ट पहले भी उनकी याचिका खारिज कर चुकी है।
सरकार का तर्क है कि मंडी अब तुलसी-बाराडेरा में शिफ्ट हो चुकी है। ऐसे में खाली जमीन पर व्यावसायिक परियोजना गलत नहीं है। सरकार को उम्मीद है कि जेम्स-ज्वेलरी पार्क की स्थापना से न सिर्फ रोजगार के नए अवसर होंगे, बल्कि ज्वेलरी कारोबार का बड़ा केन्द्र स्थापित होगा।
देवजी जिन बिंदुओं को लेकर कोर्ट जाने की सोच रहे थे, उसका समाधान पहले ही हो चुका है। पिछली सरकार ने एक दिन में ही जमीन का लैंड यूज बदल दिया था, और जमीन उद्योग विभाग के हवाले कर दी थी। ऐसे में परियोजना में रोक के लिए कानूनी विकल्प सीमित रह गए हैं। चूंकि यह कांग्रेस सरकार के समय की परियोजना थी, इसलिए कांग्रेस के लोग स्वाभाविक रूप से इसके पक्ष में हैं। भाजपा सरकार योजना को आगे बढ़ा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
टिड्डा नीलकंठ की चोंच में
जीवो जीवस्य भोजनम्, यह प्रकृति का शाश्वत सत्य है। सृष्टि में हर एक जीवन का एक चक्र है, जहां एक जीव दूसरे का आहार बनकर संतुलन बनाए रखता है। श्रीमद्भागवत में भी इसे जीवो जीवस्य जीवनम् भी कहा गया है। यानि एक जीव का जीवन दूसरे जीव के जीवन पर आधारित है।
नीलकंठ की चोंच में फंसा यह टिड्डा एक शिकार ही नहीं, बल्कि प्रकृति के उसी अनिवार्य संतुलन का प्रतीक है। विनाश ही नए सृजन का मार्ग बनाता है, और एक का अंत अनेक के अस्तित्व की शुरूआत है। टिड्डा फसलों के लिए हानिकारक हैं और नीलकंठ जैसे कई पक्षियों का आहार है। (तस्वीर प्राण चड्ढा)
खेतों का विलेन थाली का सुपर हीरो
छत्तीसगढ़ के किसान हों या राजस्थान के, ‘टिड्डी दल’ का नाम सुनते ही माथे पर पसीना आ जाता है। फसलों को चट कर जाने वाला यह ‘दुश्मन’ अब दुनिया के दूसरे कोनों में एक बिल्कुल अलग पहचान बना रहा है। जिस टिड्डे को हम खेतों से खदेडऩे के लिए थालियां पीटते थे, दुनिया अब उसे अपनी ‘खाने की थाली’ में बड़े चाव से सजा रही है। और बात सिर्फ भूनकर खाने तक सीमित नहीं है, अब तो बाकायदा इसका ‘प्रोटीन पाउडर’ बनाकर डिब्बों में बेचा जा रहा है।
मेक्सिको से इजरायल तक का सफर दुनिया में टिड्डा खाने का शौक कोई नया नहीं है। मेक्सिको में इसे ‘चैपुलिन्स’ (ष्टद्धड्डश्चह्वद्यद्बठ्ठद्गह्य) कहा जाता है और वहां यह मूंगफली की तरह स्नैक्स के रूप में बिकता है। थाईलैंड के नाइट मार्केट्स में इसे डीप-फ्राई करके सोया सॉस के साथ परोसा जाता है। लेकिन असली क्रांति आई है इजरायल और यूरोप में। वहां '॥ड्डह्म्द्दशद्य स्नशशस्रञ्जद्गष्द्ध' जैसी हाई-टेक कंपनियां अब टिड्डों की बाकायदा खेती कर रही हैं। उनका तर्क है कि गाय या भैंस पालने के मुकाबले टिड्डों को पालना पर्यावरण के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद है। ये कम पानी पीते हैं, कम जगह घेरते हैं और प्रदूषण भी नहीं फैलाते।
डिब्बे में बंद ‘पावरफुल’ पाउडर अब सबसे दिलचस्प मोड़, टिड्डे का प्रोटीन पाउडर। जिम जाने वाले शौकीनों के लिए यह नया ‘सुपरफूड’ बनकर उभरा है। वैज्ञानिकों का दावा है कि टिड्डे के पाउडर में 60 से 70 प्रतिशत तक प्रोटीन होता है, जो चिकन या मटन से कहीं ज्यादा है। इसका स्वाद भी कोई बुरा नहीं होता, बल्कि हल्का ‘नटी’ (अखरोट जैसा) होता है। इसे आटे में मिलाकर ‘प्रोटीन ब्रेड’ बनाई जा रही है और चॉकलेट शेक में घोलकर पिया जा रहा है। यानी जो टिड्डा कभी फसलों का काल था, वह अब ‘मसल बिल्डिंग’ का सबसे बड़ा जरिया बनता जा रहा है।
सावधानी भी है जरूरी लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप खेत में उड़ते किसी भी टिड्डे को पकडक़र आजमाने लगें। असल में, खेतों में टिड्डों को मारने के लिए भारी मात्रा में कीटनाशकों का छिडक़ाव किया जाता है, जो उन्हें जहरीला बना देता है। खाने और पाउडर बनाने के लिए जो टिड्डे इस्तेमाल होते हैं, उन्हें खास लैब या नियंत्रित ‘फार्म’ में उगाया जाता है।
निष्कर्ष भारत में शायद ही कोई जल्द ही ‘टिड्डा करी’ या ‘टिड्डा शेक’का आर्डर दे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की हलचल बता रही है कि भविष्य की ‘फूड सिक्योरिटी’ इन्हीं छोटे-छोटे उडऩे वाले जीवों में छिपी है। तो अगली बार जब आप टीवी पर टिड्डी दल का हमला देखें, तो बस इतना सोचिएगा कि दुनिया के किसी कोने में कोई जिम का शौकीन शायद इसे ‘प्रोटीन पाउडर’ के रूप में अपनी डाइट में शामिल करने की तैयारी कर रहा होगा। खेतों का ‘विलेन’ वाकई अब ग्लोबल मार्केट का ‘सुपर हीरो’ बन चुका है!
खेल मैदान बचाने की मुहिम
राजधानी रायपुर में सरकारी और निजी आवासीय-व्यावसायिक परियोजनाओं की बाढ़ सी आ गई है। इसकी वजह से खेल के लिए मैदान कम होते जा रहे हैं। इन सबको लेकर खिलाडिय़ों और जनप्रतिनिधियों में चिंता है। ये सभी खेल मैदान बचाने के लिए आगे आ रहे हैं। इन्हीं में से देवेन्द्र नगर टिंबर मार्केट के पास खाली जमीन को खेल मैदान के लिए सुरक्षित रखने के लिए मुहिम भी छेड़ दी गई है।
देवेन्द्र नगर इलाके की जमीन कृषि उपज मंडी के आधिपत्य में है। आसपास की जमीन अस्पताल और अन्य प्रयोजन के लिए आवंटित हो चुकी हैं। अस्पताल के आसपास करीब 5 एकड़ जमीन पर भी बिल्डरों की नजर है। उक्त जमीन खेल मैदान के रूप में उपयोग में आ रही है। अब इस जमीन को खेल मैदान के रूप में आरक्षित करने के लिए जनप्रतिनिधियों ने गुहार लगाई है। खिलाडिय़ों के साथ इस मुहिम में रायपुर उत्तर के विधायक पुरंदर मिश्रा भी शामिल हैं।
मिश्रा ने पिछले दिनों पूर्व जिला भाजपा अध्यक्ष जयंती पटेल और स्थानीय पार्षद व खेल संघ के पदाधिकारियों के साथ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मुलाकात की।
मुख्यमंत्री को बताया गया कि रेलवे स्टेशन से आगे देवेन्द्र नगर, शंकर नगर और फाफाडीह के आसपास एक भी खेल मैदान नहीं बचा है। शंकर नगर बीटीआई ग्राउंड में भी आवासीय-व्यावसायिक परियोजना का प्रस्ताव है। ऐसे में पहले से खाली जमीन का किसी अन्य प्रयोजन में उपयोग करना उचित नहीं होगा।
मुख्यमंत्री ने उनकी बातें गंभीरता से सुनीं और भरोसा दिलाया कि मंडी की उक्त खाली जमीन का उपयोग किसी अन्य प्रयोजन के लिए नहीं किया जाएगा। उन्होंने खेल मैदान के लिए जमीन आरक्षित रखने पर मौखिक सहमति दी है। खिलाड़ी अब इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए अन्य संगठनों का सहयोग लेने की कोशिश कर रहे हैं।
केरलम् चुनाव में छत्तीसगढ़ के मुद्दे
जैसा कि राजनीतिक विश्लेषकों ने पहले ही संकेत दिए थे, छत्तीसगढ़ में ननों के साथ कथित दुर्व्यवहार और ईसाई समुदाय पर हुए हमलों के मुद्दे अब केरलम् की चुनावी बहस का हिस्सा बन चुके हैं। केरलम् के मुख्?यमंत्री पी. विजयन ने हाल ही में इन घटनाओं को लेकर कांग्रेस की भूमिका और उसकी ‘राजनीतिक ईमानदारी’ पर सवाल खड़े किए।
शनिवार को सोशल मीडिया के जरिए दिए गए बयान में विजयन ने कहा कि छत्तीसगढ़ में ननों पर हमले की खबर सामने आते ही राष्ट्रीय व राज्य स्तर के वामपंथी नेताओं ने तुरंत पीडि़तों की मदद के लिए कदम उठाए। केरलम् से कुछ कांग्रेस नेता भी वहां पहुंचे, लेकिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राज्य इकाई की ओर से अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखी। उनके अनुसार, यह संवेदनशील मुद्दों पर कांग्रेस के अस्पष्ट और विरोधाभासी रवैया है।
दरअसल, यह बयान ऐसे समय आया है जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि केरलम् सरकार छत्तीसगढ़ में ननों पर हमला करने वालों के प्रति नरम रुख अपना रही है। इसके जवाब में विजयन ने 2022-23 के दौरान आदिवासी ईसाइयों को कथित रूप से क्रिसमस और नए साल के समारोहों से बेदखल किए जाने का मुद्दा उठाया और पूछा कि उस समय कांग्रेस नेतृत्व क्या कर रहा था, जबकि राज्य में उसकी सरकार थी।
विजयन ने हाल ही में छत्तीसगढ़ में पारित धार्मिक स्वतंत्रता कानून को लेकर भी कांग्रेस को घेरा। उनका कहना है कि यह कानून मध्यप्रदेश के समान प्रावधानों वाला है, जिसे कांग्रेस ने वहां सत्ता में आने के बावजूद समाप्त नहीं किया। संभवत: वे कमलनाथ सरकार की बात कर रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीपीआई(एम) अपने घोषणा पत्र में ऐसे कड़े कानूनों को समाप्त करने की बात कर चुकी है।
हालांकि, इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच यह भी महत्वपूर्ण है कि जिन घटनाओं का उल्लेख किया जा रहा है, उनके संदर्भ और प्रकृति को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं। कुछ घटनाएं स्थानीय विवादों से जुड़ी थीं, जिन्हें सीधे तौर पर धार्मिक उत्पीडऩ से जोडऩा विवादास्पद माना गया था। कुछ संगठनों ने पिछले नववर्ष और क्रिसमस पर भी हमले किए थे, मगर उनका जिक्र विजयन ने नहीं किया है।
राजनीतिक दृष्टि से यह भी स्पष्ट है कि केरलम् में भारतीय जनता पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में वामपंथी दल कांग्रेस को मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करने की रणनीति अपनाते नजर आते हैं। यही कारण है कि कई मुद्दों पर, जहां भाजपा की आलोचना भी संभव है, वहां कांग्रेस को ही केंद्र में रखकर निशाना साधा जा रहा है।
कर्ज की नई योजना, बैंक के दरवाजे बंद
राज्य सरकार ने अपने पांच लाख अधिकारी कर्मचारियों के लिए वेतन के विरुद्ध अल्पावधि ऋण सुविधा 1 अप्रैल से शुरू कर दी है। इसके साथ ही अब इन्हें 5 लाख या अधिक कर्ज के लिए माडगेज, बीसियों दस्तावेज और उस पर बैंकों के आगे चिरौरी करने की झंझट से मुक्ति मिल जाएगी। यानी राज्य के अमले से बैंकों को बिजनेस मिलने के दरवाजे बंद हो जाएंगे। इस नई सुविधा में बस अधिकारी कर्मचारियों के पे एकाउंट और सेवावधि का आंकलन वह भी ऑनलाइन चेक करने के बाद मिनटों ही नहीं 30 सेकंड से 1 मिनट में लोन ट्रांसफर हो जाएगा।
बिल्कुल एटीएम कार्ड की तरह की सुविधा का दावा। क्योंकि यह इसका एप सरकार के ई कोष और कर्मचारी के सैलरी अकाउंट से कनेक्ट है। जहां तक ब्याज की दर का सवाल है तो वह भी वित्तीय बाजार दर से एक से सवाल डेढ़ प्रतिशत कम पर। आपका सिबिल स्कोर रेटिंग जितना मजबूत होगा लोन राशि उतनी अधिक होगी। यह स्कोर 7.50 प्वाइंट होने पर यानी कर्मचारी चाहे तो 5 लाख या अधिक तक का लोन ले सकते हैं। लोन अमाउंट , सेवावधि (लेंथ ऑफ सर्विस) पर तय होगी। इस पर ब्याज कुछ अधिक होगा लेकिन बैंकों से सवा डेढ़ प्रतिशत कम ही पड़ेगा। वेतन से किस्त कटौती पर ब्याज जीरो परसेंट अलग।
वैसे बैंक वाले किसी भी पर्सनल लोन 12 प्रतिशत से कम दे नहीं रहे। और बैंक शादी, बिमारी के लिए लोन कहाँ देते हैं। वहीं इस सुविधा में लोन बीमारी के इलाज, कार मकान, शादी जैसी जरूरत के लिए लोन एनी टाइम उपलब्ध है। और आने वाले दिनों में एजुकेशन और होम-लोन को भी शामिल करने की तैयारी की जा रही है। यह व्यवस्था असम, राजस्थान गोवा जैसे राज्यों में सफलता से लागू है। राजस्थान का अमला तो छत्तीसगढ़ से ढाई लाख अधिक है।
यह तो रही गुडी-गुडी बातें। अब इस पर कर्मचारियों के वाट्सएप ग्रुप में उठाए जा रहे सवालों पर। पहला यह कि सर्वाधिक अमले वाले मप्र ने क्यों लागू नहीं किया? किसी ने कहा-इसके लिए आपरेट किए जा रहे रिफाइन ऐप से लोन लेने पर ब्याज प्रतिशत ज्यादा है? एक ने सुझाव दिया कि- शासन इसके साथ व्यक्तिगत/होम लोन लेने पर बैंक को गारंटी दे तो इंटरेस्ट में एक प्रतिशत की कमी हो जाएगी।
एक अन्य ने कहा-एक माह के लिए सैलरी के बदले ठीक है। जरूरत तो यह है कि सरकारों द्वारा 81 माह का डकारा गया डीए दे दे, और अब समय पर महंगाई भत्ता,एरियर ,300 दिन अर्जित अवकाश जैसी सुविधा दे दे, तो किसी भी लोन योजना की जरूरत ही नहीं है। चौथे ने कहा-अरे ये भी सरकार की राजस्व प्राप्ति बढ़ाने की योजना है। ज्यादा खुश होने का नहीं है।
उसे जवाब मिला कि-जो हुआ उसका स्वागत करना चाहिए। बाक़ी के लिए प्रयास करें। जो कर्मचारी केवल वेतन से ही घर चला रहे हैं,उनसे पूछ लो तो अच्छा होगा। क्योंकि सरकारी कर्मचारी का जीवन लोन पे ही चलता है और लोन पे ही चलता रहेगा। अंत में एक सवाल से चर्चा खत्म हुई कि -इस योजना में 300 दिवस का ऋण ले सकते है क्या?
चुनाव ड्यूटी नहीं फिर भी रखवाली नहीं हो रही
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण-एनजीटी ने असम सरकार या कहें, राज्य निवार्चन पदाधिकारी के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें 1600 वन कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी पर लगा दिया गया था। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह समाचार इसलिये खास है क्योंकि यहां के बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वन कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती रही है, वन कर्मचारी संगठनों के विरोध और अदालती आदेशों के बावजूद। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद से अब तक हुए लगभग सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वन विभाग के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में लगाया गया है। चुनाव आयोग के नियमानुसार, सरकारी कर्मचारियों की कमी होने पर वन विभाग के मैदानी और कार्यालयीन स्टाफ का उपयोग मतदान दल और सुरक्षा व्यवस्था में किया जा सकता है।
2023 के विधानसभा चुनाव में सैकड़ों वनरक्षक, वनपाल और लिपकीय स्टाफ को पीठासीन या मतदान अधिकारी के तौर पर ड्यूटी दी गई थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ड्यूटी लगाई गई। विशेषकर बस्तर और सरगुजा जैसे दुर्गम क्षेत्रों में, जहां वन विभाग के कर्मचारियों को भौगोलिक स्थिति की बेहतर समझ होती है, उन्हें अक्सर गाइड या मतदान दल के सदस्य के रूप में शामिल किया जाता रहा है। हालांकि इनकी सटीक संख्या उपलब्ध नहीं है। बस्तर और सरगुजा संभाग के बड़े हिस्से में जंगल हैं और रास्ते दुर्गम हैं, इसलिए कई वन कर्मचारियों को रास्ता बताने के लिए गाइड के रूप में शामिल किया गया।
पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में स्टेट फॉरेस्ट रेंजर्स एसोसिएशन इसी बात को लेकर हाईकोर्ट चला गया था कि उनकी ड्यूटी चुनाव में लगाई जा रही है। एसोसिएशन का तर्क था कि क्षेत्रीय अमला न होने की वजह से वन क्षेत्र में चोरियां बढ़ेंगी। साथ ही गर्मी के दिनों में वनों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं. ऐसे में अगर वन विभाग का क्षेत्रीय अमला चुनाव ड्यूटी में लगा रहता है तो फिर इन घटनाओं पर रोक लगाना नामुमकिन हो जाएगा। तब चुनाव आयोग ने अडरटेकिंग दी कि वन कर्मचारी ड्यूटी पर नहीं लगाए जाएंगे।
फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पॉवर्ड कमेटी ने भी 2024 में सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर वन कर्मियों को ड्यूटी से छूट देने का मशविरा दिया था। इन आदेशों बाद भारत निर्वाचन आयोग ने भी कम से कम दो बार पत्र लिखकर राज्यों से कहा कि कुछ श्रेणियों के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी से बाहर रखा जाए।
छत्तीसगढ़ में भी कर्मचारी संगठन इसी तरह की मांग उठाते रहे हैं। पर इनकी मांग पूरी तरह नहीं मानी गई है। बस्तर संभाग में ही 1200 से अधिक वन कर्मचारी ड्यूटी पर बीते विधानसभा चुनाव के दौरान लगाए गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सरगुजा के जिला निर्वाचन अधिकारी को 800 से अधिक वन कर्मचारियों की सूची भेजी गई थी। वैसे इनमें से अधिकांश को रिजर्व मतदान दल के रूप में रखा गया था, पर चुनाव में सक्रिय भागीदारी तो हो ही गई। वे फील्ड पर नहीं थे।
वैसे राष्ट्रीय उद्यानों, चिडिय़ाघरों, वन्यजीव अभयारण्यों और टाइगर रिजर्व में तैनात कर्मचारियों को तथा उनके वाहनों को चुनाव ड्यूटी पर नहीं भेजा जाता है। माना जाता है कि इन स्थानों पर ड्यूटी की निरंतरता जरूरी होती है, अवरोध खड़ा नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ के साथ एक विशिष्ट परिस्थिति यह भी है कि यहां कई जिले हाथी प्रभावित हैं। इनके मूवमेंट पर लगातार निगरानी रखनी पड़ती है। वहीं, बीते कई लोकसभा चुनाव गर्मियों के दिनों में हुए। इस मौसम में जंगलों में आग लगने, शिकार व चोरी की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
वैसे छत्तीसगढ़ में वनों से चोरी और शिकार का कोई मौसम नहीं है। बीते दो हफ्ते के भीतर ही करंट लगाकर जानवरों के शिकार की घटनाएं हुई हैं। शिकार के बाद मांस पकाते लोग पकड़े गए हैं। इलेक्शन अर्जेंट नहीं होने के बाद भी वन्यप्राणियों और वन संपदा की हिफाजत छत्तीसगढ़ में चुनौतीपूर्ण ही है। असम की परिस्थितियों के बारे में कुछ कह नहीं सकते, लेकिन यहां तो वन विभाग क्या, दूसरे कई और विभागों के अधिकारी कर्मचारी हैं, जो चुनाव ड्यूटी से बचने का कोई न कोई रास्ता ढूंढते रहते हैं।
पेट्रोल फिर महंगा, सौ के पार कीमत
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध की वजह से पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के बीच आम उपभोक्ताओं पर भी असर दिखने लगा है। हाल ही में केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर राहत के संकेत दिए थे। इसके बाद भाजपा नेताओं ने सरकार के इस फैसले की जमकर सराहना भी की थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि कीमतों में स्थिरता बनी रहेगी।
लेकिन ताजा घटनाक्रम में राज्य सरकार ने पेट्रोल की कीमत में एक रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमत अब 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गई है। नई दरें 1 अप्रैल से प्रभावी हो चुकी हैं। खास बात ये है कि पेट्रोल-डीजल राज्य सरकार के वैट के दायरे में आते हैं। पहले इन पर 25 प्रतिशत वैट और 1 प्रतिशत सेस लगाया जाता था, जिसे अब बढ़ाकर 2 प्रतिशत कर दिया गया है। इस फैसले के बाद उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है।
केंद्र सरकार ने पहले ही कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी कर दी है। मगर रसोई गैस सिलेंडर की दरें यथावत हैं। हालांकि इसकी किल्लत चल रही है। संभावना जताई जा रही है कि अप्रैल के आखिरी में रसोई गैस सिलेंडर महंगी हो सकती है। तब तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव निपट चुके होंगे।
पश्चिम एशिया संकट और डीए
केंद्रीय विभागों के ऑफिसर्स और कर्मचारी संघों की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रायपुर के नेताओं की मानें, तो केंद्र सरकार जनवरी 2026 में केंद्रीय कर्मचारियों को मिलने वाली डीए की अगली किस्त और पेंशनभोगियों को मिलने वाली डीआर की किस्त को शायद रोक सकती है। पहले सरकार इसकी घोषणा मार्च महीने में करती थी, लेकिन इस बार अभी तक इसकी घोषणा नहीं की गई है। जिससे यह शक और बढ़ गया है। वैसे ये नेता बताते हैं कि पूर्व के वर्षों में नए वेतन आयोग की गठन के बाद सरकार डीए नहीं देती है। बंद करती रही है। ऐसा होता रहा है। इन सूत्रों का कहना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी सरकार ने डीए और डीआर से जुड़ी कोई राहत नहीं दी थी।
इस बार कारण पड़ोस में हो रहा युद्ध संकट है। पश्चिम एशिया संकट की वजह से पैदा हुआ आर्थिक दबाव बताया जा रहा है।
केंद्र के इस कदम का छत्तीसगढ़ में कोई फर्क नहीं पडऩा है। क्योंकि यहां के कर्मचारी अधिकारी वैसे भी डीए, डीआर के डेफिसिट काम करने के आदि हो चुके हैं। इन्हें 2017-18 से जुलाई 25 तक 81 महीने से अधिक का बकाया नहीं दिया जा रहा है। यहां साल में एक ही किश्त मिल रही है। यह बकाया रकम देनी पड़ी तो सरकार का अपना बजट भी कम पड़ जाए। वैसे बकाया रकम लेने राज्यों के कर्मचारी संघ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने लगे हैं। हाल में जस्टिस दीपक मिश्रा ने डीए को कर्मचारियों का हक घोषित करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार को भुगतान करने का आदेश दिया है। इस दृष्टांत (साइटेशन) मानकर छत्तीसगढ़ पेंशनर महासंघ और कर्मचारी फेडरेशन ने भी बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। कोर्ट ने राज्य सरकार को 4 सप्ताह का समय दिया है। इस पर अगले सप्ताह सुनवाई होगी। देखना होगा कि सरकार क्या रुख अपनाती है, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हाईकोर्ट का रुख सभी जानते हैं।
नियुक्ति से पहले दिलचस्प चर्चा
सरकार के एक बोर्ड में अध्यक्ष और संचालकों की नियुक्ति को लेकर खासी हलचल है। नाम लगभग तय हो चुके हैं, लेकिन आधिकारिक आदेश अब तक जारी नहीं हो पाए हैं। वजह भी कम दिलचस्प नहीं है। बताते हैं कि आदेश जारी होने से पहले ही संभावित पदाधिकारियों की सूची लीक हो गई।
सूची सामने आते ही जिन नेताओं को पद नहीं मिला, उन्होंने मोर्चा खोल दिया। मामला सीधे पार्टी हाईकमान तक पहुंचा और नियुक्तियों में कथित लेनदेन के आरोप भी लगाए गए। शिकायतों के बाद हाईकमान ने स्थानीय स्तर के प्रमुख नेताओं से चर्चा की। जांच-पड़ताल में आरोपों को निराधार बताया गया और यह भी स्पष्ट हुआ कि असंतोष उन्हीं लोगों में है, जिन्हें पद नहीं मिल पाया।
दिलचस्प यह है कि अफवाहों को हवा देने वालों में पार्टी के कुछ बड़े चेहरे भी शामिल बताए जा रहे हैं, जिससे अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। संकेत साफ हैं कि तय नामों में बदलाव की संभावना नहीं है।
हालांकि विरोधी खेमे ने फिलहाल आदेश जारी होने की प्रक्रिया को धीमा जरूर कर दिया है, लेकिन यह अड़चन ज्यादा समय तक टिकती नहीं दिख रही। माना जा रहा है कि जल्द ही अध्यक्ष और संचालकों की सूची औपचारिक रूप से जारी कर दी जाएगी।
देखना है कि सूची जारी होने के बाद यह असंतोष शांत होता है या फिर पार्टी के भीतर की यह खींचतान और गहराती है।
हिंदी की औपचारिक इज्जत करती संकेत पट्टिकाएं
देश में हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है। मंत्रालयों, सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों में राजभाषा के नाम पर बाकायदा अधिकारी नियुक्त हैं। मगर, वे हिंदी की इज्जत बढ़ाते हैं या अपने ज्ञान का मजाक उड़ाते हैं, समझ से परे है।
संलग्न तस्वीरें इसी विडंबना की गवाही देती हैं। जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट वर्तनी तक सही नहीं लिखी गई, तो दूसरी ओर नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसे बड़े और नए हवाईअड्डे पर ‘अंतरराष्ट्रीय’ शब्द को ‘अंतर्राष्ट्रीय’ लिख दिया गयाहै। सवाल यह है कि क्या करोड़ों के बजट वाले विभागों में बुनियादी भाषिक शुद्धता भी सुनिश्चित नहीं की जा सकती? अंग्रेज़ीजो इस देश की मूल भाषा नहीं है, उसमें इस तरह की लापरवाही शायद ही कभी दिखती है। यानी जो भाषा ओढ़ी गई है, उसके प्रति सावधानी अधिक है, और जो अपनी है, उसके साथ उपेक्षा।
यह चूक उन राज्यों में हो रही है, जहां हिंदी न केवल बोली जाती है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। इसके विपरीत, दक्षिण भारत के कई राज्यों में लोग प्रयासपूर्वक हिंदी लिखते-बोलते हैं। वहां छोटी-मोटी गलतियां दिख जाएं तो हिंदीभाषी लोग ही उनका मजाक उड़ाते हैं।
रोजमर्रा के प्रदर्शन से परेशानी
कांग्रेस ने प्रदेश में दो-चार जिलों को छोडक़र लगभग सभी जिला अध्यक्षों को बदल दिया है। नए जिलाध्यक्षों ने जिम्मेदारी संभालते ही कामकाज शुरू कर दिया है और कुछ का प्रदर्शन खासा बेहतर माना जा रहा है। इनमें रायपुर शहर अध्यक्ष श्रीकुमार मेनन और दुर्ग ग्रामीण जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर खासे चर्चा में हैं। दोनों की सक्रियता इतनी ज्यादा है कि स्थानीय स्तर पर ही इसे लेकर अलग तरह की प्रतिक्रिया सामने आने लगी है।
रायपुर शहर अध्यक्ष श्रीकुमार मेनन तीन बार पार्षद रह चुके हैं और अविभाजित मध्यप्रदेश के समय शहर युवक कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके नेतृत्व में राजधानी में विभिन्न मुद्दों को लेकर कांग्रेस द्वारा लगभग रोज धरना-प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
कुछ ऐसा ही हाल दुर्ग ग्रामीण अध्यक्ष राकेश ठाकुर का भी है। वे भी लगातार अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं और संगठन को सक्रिय बनाए हुए हैं।
हालांकि, इन लगातार हो रहे कार्यक्रमों से कार्यकर्ताओं में थकान की चर्चा भी सामने आ रही है। बताते हैं कि दुर्ग ग्रामीण के एक वरिष्ठ नेता इस मुद्दे को लेकर पूर्व सीएम भूपेश बघेल तक पहुंच गए। उन्होंने जहां राकेश ठाकुर की सक्रियता की सराहना की, वहीं यह भी कहा कि रोजाना के धरना-प्रदर्शन से कार्यकर्ता थक रहे हैं। नेता ने सुझाव दिया कि चुनाव में अभी समय है, ऐसे में कार्यक्रमों की संख्या को सीमित किया जाना चाहिए। अब देखना होगा कि इस सलाह के बाद धरना-प्रदर्शनों की रफ्तार में कोई कमी आती है या नहीं।
कॉफी हाउस में छांछ पे चर्चा ...

भाजपा के पुराने नेताओं का ग्रुप एक बार फिर सिविल लाइन काफी हाउस में जुटा। सरगुजा से बस्तर के निवासी ये नेता इससे पहले वे होली के दो दिन पहले मिले थे। इनकी पिछले विचारों से सहमत इस बार कुछ नए नेता भी आ पहुंचे। 1 अप्रैल को बुलाया गया तो लगा अप्रैल फूल बना रहे होंगे लेकिन बैठक शुरू हुई तो सब कुछ साफ हो गया कि मन की बात हो रही। बैठक दोपहर की थी तो चाय-काफी मना किया कि चाय अब पच नहीं रही है और इसलिए गर्मी के मौसम में छांछ मंगाया गया और छांछ के सेवन के साथ चर्चा आगे बढी। पिछली बैठक की तरह सर्वानुमति यह बनी कि किसी का नाम सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। एक ने कहा कि अब तो मंडल से लेकर जिला होते हुए, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर पद वितरित करने की उम्र तय कर दी गई है, यह अलग बात है कि जिन्होंने उम्र तय की है उनकी उम्र 60 वर्ष से लेकर 75 वर्ष की हो चुकी है, लेकिन निचले स्तर पर नियम लागू है।
एक नेता जो पितृ संस्था से भी काफी नजदीकी रखते हैं ने कहा कि अब कहीं पर भी किसी भी बात की सुनवाई नहीं है, सिर्फ एक ही बात है हमें हर हालत में राज्य और केंद्र में सरकार चाहिए और अब उत्तर भारत से होते हुए हमें दक्षिण भारत में परचम लहराना है और जो चुनाव जीत सकते हैं। उनका कितना भी विरोध करिए, लेकिन आज वह चुनाव जीतने में सफल हैं। पितृ संस्था ने यह आंतरिक निर्णय ले लिया है।
और हां अब 2028 के विधानसभा चुनाव हो या 2029 के लोकसभा चुनाव सभी में 35 वर्ष से लेकर 55 वर्ष के उम्र के प्रत्याशियों का ही चयन होगा, चाहे वह किसी भी दूसरे पार्टी से क्यों ना आया हो और वह अगर चुनाव जीत सकते हैं, तो उन्हें टिकट मिलेगा, जिन्हें विरोध करना है वो करते रहें। यह निर्णय भी आंतरिक रूप से लिया जा चुका है।
तभी तीसरे नेता ने कहा कि अब तो जिला स्तर पर मार्गदर्शक मंडल कार्यालय खुलने चाहिए, क्योंकि पहले विदाई के समय शॉल और श्रीफल दिया जाता था, अब तो सिर्फ संकेत दिया जा रहा है कि आपकी उम्र हो चुकी है, अपनी पार्टी में 30 से 40 वर्ष तक सेवा दे चुके हैं आपकी सेवा का ही परिणाम है कि राज्यों में और केंद्र में भाजपा की सरकार और एनडीए की सरकार बन रही है और भविष्य में भी बने। बाकी जिसने संकेत समझ लिया, तो अपने घर पर विश्राम करना प्रारंभ कर दे। इन्होंने बताया कि भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा, जो असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद होगी, उसमें 35 वर्ष से 55 वर्ष तक के उम्र के लोगों को संगठन में महत्व दिया जाएगा, सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत पुराने लोगों को जिन्हें आवश्यक समझा जाएगा, उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जाएगा। यह भी बताया कि मंडल स्तर और जिला स्तर पर जारी प्रशिक्षण वर्ग में तीसरी आंख लगी हुई है और उसमें चेहरे भी चिन्हित किया जा रहे हैं, 2028 के विधानसभा और 2029 लोकसभा चुनाव के लिए। क्योंकि लगभग तय है कि प्रत्याशियों के चेहरे बदले जाएंगे। वह भी बड़ी संख्या में चाहे छत्तीसगढ़ हो या चाहे देश या अन्य राज्य हो, सभी जगह यह नियम लागू किया जाएगा।
इसी बीच पितृ संस्था से जुड़े और भाजपा में भी सक्रिय रहे नेता ने कहा कि संघ ने भी अब प्रांत की योजना को समाप्त कर दिया और संभाग स्तर पर अपना संगठन को मजबूती देने के लिए कदम आगे बढ़ा चुकी है।
तब अंत में छाछ का आनंद लेते हुए एक नेता ने कहा कि अब तो घर बैठना ही उचित है। अंत में उठते-उठते एक मार्गदर्शक मंडल के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहे, नेताजी ने कहा कि उपरोक्त सभी स्लोगन, जो 1980 में दिए गए थे उसे 2014 के बाद विलोपित कर दिए गए हैं। अंत में सभी ने कहा कि सही दिशा, स्पष्ट नीति घोषित तो नहीं की गई है लेकिन सभी के लिए पार्टी में संकेत लगभग यही है।
विकास की कीमत चुकाता मगरमच्छ

दंतेवाड़ा जिले के बारसूर में एक तालाब को सुंदर बनाने और जिपलाइन प्रोजेक्ट के लिए खाली किया जा रहा है। पानी घटते ही करीब 10 फीट लंबा एक मगरमच्छ अपने प्राकृतिक घर से बेघर होकर बाहर निकल आया। भूख और पानी की तलाश में भटकने लगा। स्थानीय लोगों में भय व्याप्त हो गया।
सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम पहुंची और जाल बिछाकर उसे पकड़ा। उसे सुरक्षित इंद्रावती नदी में छोड़ दिया गया। तत्काल तो समस्या टल गई लेकिन चिंता बनी हुई है। तालाब में थोड़ा-सा पानी बचा है। प्रोजेक्ट अभी अधूरा है और इस गर्मी में तालाब के फिर से भरने की संभावना भी नहीं दिखती। ऐसे में वहां वर्षों से रह रहे और कई मगरमच्छों का क्या होगा? स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तालाब में पिछले 50 साल से मगरमच्छ रह रहे हैं। बावजूद इसके, पानी निकालने से पहले उनके पुनर्वास की कोई योजना नहीं बनाई गई। शायद इस घटना के बाद बचे हुए मगरमच्छों के प्रति संवेदना जागे।
गिड़गिड़ाएं नहीं, सुविधाएं दीजिए
सूरजपुर जिला मुख्यालय के अस्पताल में गंभीर हालत में पहुंची एक महिला के गर्भस्थ शिशु की जान प्रदेश की महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की गुहार के बाद भी नहीं बचाई जा सकी। गुहार लगाने से बचना भी नहीं था। कथित तौर पर राजवाड़े कह रही थीं कि मेरा ही खून निकाल लो, मगर शिशु की जान बचा लो..। उनके पहुंचने से पहले से पहले परिजन विनती कर रहे थे कि डॉक्टर साहब कुछ करो। कथित तौर पर डॉक्टर ने कहा कि विधायक या मंत्री, चाहे जिसे बुला लो, कुछ नहीं होगा। स्थिति शर्मनाक ही कही जाएगी कि मंत्री जी पहुंच गईं, पर शिशु की जान नहीं बचाई जा सकी। अस्पताल परिसर में गंदगी, बदबू और अव्यवस्था फैली थी। डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों ने संवेदनहीनता दिखाई या नहीं, यह अलग मसला है लेकिन मोटे तौर पर मौत का कारण तो यही सामने आया है कि वहां ब्लड बैंक की सुविधा ही नहीं थी।
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर नजर डालें तो यह अचरज में डालने वाली घटना है ही नहीं। मंत्री की मौजूदगी हो, जिला मुख्यालय का अस्पताल हो तब भी। तस्वीर चिंताजनक है, हालात बदतर। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्यु दर अभी भी 38 से 44, प्रति हजार जीवित जन्म के बीच है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। आदिवासी बहुल सरगुजा और बस्तर क्षेत्रों में यह दर और भी ऊंची पाई गई है। केरल जैसे राज्य से तुलना करें तो वहां एक हजार में केवल 5 शिशुओं की मौत होती है। यानी छत्तीसगढ़ के बच्चों के लिए जीवन का जोखिम सात से आठ गुना अधिक है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टरों की भर्ती केवल 28 प्रतिशत हो पाई है। मतलब 72 प्रतिशत पद खाली हैं। असिस्टेंट प्रोफेसरों के 51 प्रतिशत पद खाली हैं, लगभग आधा। यह आम शिकायत है कि आदिवासी जिलों में डॉक्टरों की तैनाती की जाती है, मगर वे वहां कभी-कभार जाते हैं या फिर जाते ही नहीं। नर्स और स्टाफ भी ताला बंद कर गायब रहती हैं। ऐसे मामलों में भी नवजातों और प्रसूताओं की मौत की घटनाएं सरगुजा में हो चुकी हैं। मोबाइल मेडिकल यूनिट्स, जिसे लेकर दावा है कि यह प्रदेश के 2100 से अधिक गांवों में पहुंच रही हैं, कितने काम की हो सकती हैं, अंदाजा लगाया जा सकता है। जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं, जांच बिठाई जाती है, कभी-कभी कुछ लोग सस्पेंड कर दिए जाते हैं, पर जिला अस्पतालों में जांच उपकरण, ब्लड बैंक और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति, तैनाती सुनिश्चित करना प्राथमिकता में नहीं है। फिर स्टाफ को चेतावनी दीजिए और सख्त कार्रवाई करिये।
...तो पार्टी में कद बढ़ेगा
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता असम और पश्चिम बंगाल में प्रचार के लिए गए हैं। पश्चिम बंगाल की 56 विधानसभा सीटों के बूथ प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रदेश भाजपा महामंत्री (संगठन) पवन साय संभाल रहे हैं।
खास बात यह है कि पश्चिम बंगाल में न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देशभर के भाजपा कार्यकर्ता जुटे हुए हैं। सरकार के आधा दर्जन निगम-मंडल के चेयरमैन फरवरी से ही वहां डटे हुए हैं। अब एक-एक कर कुछ विधायक और पूर्व विधायकों को भी बंगाल बुलाया गया है।
पूर्व मंत्री राजेश मूणत और शिवरतन शर्मा पहले से ही प्रचार में सक्रिय हैं। उनके साथ महासमुंद के विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा, दुर्ग ग्रामीण के ललित चंद्राकर, पूर्व विधायक रजनीश सिंह, मोतीराम चंद्रवंशी सहित दर्जनभर से अधिक विधायक-पूर्व विधायक बंगाल पहुंच चुके हैं।
पार्टी की रणनीति हर मतदाता तक पहुंच बनाने और उन्हें मतदान के लिए प्रेरित करने की है। हालांकि अभी प्रचार शुरू ही हुआ है। पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा की घटनाएं काफी होती हैं, जिसे देखते हुए निर्वाचन आयोग नजर बनाए हुए है।
भाजपा के कार्यकर्ता भी सतर्क हैं और एक-दूसरे के संपर्क में बने हुए हैं। चुनाव प्रचार में लगे कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि यदि चुनाव परिणाम अनुकूल आते हैं, तो पार्टी के भीतर उनका कद भी बढ़ेगा। देखना है आगे क्या होता है।
20 महीने का एरियर्स
8 वें केंद्रीय वेतन आयोग ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों से 30 अप्रैल तक नए वेतन-भत्तों को लेकर प्रस्ताव सुझाव मांगे हैं। सभी केंद्रीय व राज्य संगठनों के नेता आयोग की वेबसाइट पर फीडबैक देने में जुट गए हैं। इसी सिलसिले में वेतन भत्तों पर नए फिटमेंट फैक्टर को लेकर केंद्रीय अमले का जो आंकलन है उसके अनुसार, जिन कर्मचारियों का मूल वेतन 50,000 रुपये से कम है, उन्हें सबसे ज़्यादा फ़ायदा हो सकता है; उन्हें लगभग 20 महीनों का बकाया (एरियर्स) और अलग-अलग फि़टमेंट फ़ैक्टर मिल सकते हैं। शुरुआती स्तर पर, लेवल 1 (18,000 रुपये) के कर्मचारियों को 3.6 लाख रुपये से 5.65 लाख रुपये के बीच भुगतान मिल सकता है, जबकि लेवल 8 (47,600 रुपए) के कर्मचारियों को 9.52 लाख रुपए से लेकर लगभग 14.94 लाख रुपए तक मिल सकते हैं।
फिटमेंट प्रस्तावित वेतन संशोधन में यह फैक्टर ही मुख्य आधार बना हुआ है। जहाँ 7वें वेतन आयोग ने इसे 2.57 पर तय किया था, वहीं समझा जा रहा है कि सरकार 2.0 और 2.57 के बीच के विकल्पों पर विचार कर रही है।
हालाँकि, कर्मचारी यूनियन 3.0 से 3.25 के ऊँचे दायरे की माँग कर रही हैं - एक ऐसा कदम जिससे न्यूनतम मूल वेतन 18,000 रुपये से बढक़र लगभग 54,000 रुपये तक पहुँच सकता है। वेतन आयोग के 10-वर्षीय चक्र के अनुसार, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी, 2026 से लागू होने की संभावना है। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले इस आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है।
जीत का ऐलान, मगर जंग अभी बाकी
देश और विशेषकर छत्तीसगढ़ के लिए आज का दिन ऐतिहासिक है। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा नक्सलवाद के पूरी तरह खत्म होने की कल की गई घोषणा के बाद 31 मार्च की सुबह उम्मीद की नई रोशनी लेकर आई है। लेकिन इस तस्वीर में दिखते चेहरे एक अलग ही सच्चाई को बयान कर रहे हैं। जंग बंदूक की खत्म हो गई हो पर भूख, मजबूरी और बुनियादी सुविधाओं की बाकी है।
सोशल मीडिया पर आई यह तस्वीर बीजापुर जिले के जगरगुंडा की है। यह जगह कभी नक्सलियों की अघोषित राजधानी थी। नीली टीन की दीवार के सहारे बैठे और खड़े ये ग्रामीण सुबह 4 बजे अपने गांव करकेगुड़ा से निकले, सरकारी राशन 30 किलो चावल, 1 किलो नमक और थोड़ा सा गुड़ पाने के लिए। ये लोग अब तक इंतजार कर रहे हैं। इस कतार के लिए किसी ने दिनभर की मजदूरी छोड़ी, तो किसी ने उधार लेकर वाहन में सफर किया। यह इंतजार उनके जीवन की कठिनाई का आईना है। नक्सलवाद का खात्मा एक बड़ी कामयाबी है, मगर एक और जंग बाकी है। भूख के खिलाफ, गरीबी, अशिक्षा के खिलाफ, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के खिलाफ।
बीरगांव अब भी ‘गांव’
प्रदेश में गैस की किल्लत चल रही है। सरकार ने रसोई गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नए फरमान जारी किए हैं। इसमें शहरी इलाके में 25 दिन, और गांवों में बुकिंग के बाद 45 दिन में रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध होगा। नई व्यवस्था तुरंत लागू भी हो गई है। मगर बीरगांव में एक नया विवाद शुरू हो गया है।
बीरगांव नगर निगम क्षेत्र के रहवासियों को सिलेंडर के लिए 45 दिन का इंतजार करने के लिए कहा गया है। इसको लेकर पिछले दो-तीन दिनों से बीरगांव इलाके के गैस एजेंसी के संचालकों, और उपभोक्ताओं के बीच विवाद चल रहा है। गैस एजेंसी संचालकों ने जिला प्रशासन, और स्थानीय गैस कंपनियों के प्रतिनिधियों से चर्चा की।
गैस कंपनियां बीरगांव को अब भी ग्रामीण क्षेत्र मान रही है। जबकि बीरगांव नगर पालिका से नगर निगम में तब्दील हो चुका है। यहां आबादी भी काफी बढ़ गई है। मगर सहुलियत अब भी ग्रामीण स्तर की है। जबकि बीरगांव नगर निगम के अधीन उरला और सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र भी आते हैं। आर्थिक रूप से बीरगांव कई और नगर निगम की तुलना में बेहतर स्थिति में है। मगर गैस कंपनियां मानने के लिए तैयार नहीं है, और उन्हें रसोई गैस के लिए शहर के बजाए ग्रामीण क्षेत्र के लिए तय किए गए नियम मान्य होंगे। यानी सिलेंडर के लिए उन्हें 45 दिन इंतजार करना होगा।
अंबिकापुर से नई विमान सेवा

पिछले दिनों अंबिकापुर से एक नई विमान सेवा की शुरुआत हुई। अंबिकापुर से बिलासपुर, और दिल्ली के अलावा कोलकाता के लिए भी विमान शुरू हुई है। सीएम विष्णुदेव साय ने एलाइंस एयर की नई विमान सेवा का वर्चुअल उद्घाटन किया। सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज दिल्ली, और कोलकाता के लिए शुरू हुई विमान सेवा को अपनी प्रमुख उपलब्धि मान रहे हैं। वो खुद विमान से दिल्ली गए, और यात्रियों को मिठाई भी खिलाई।
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव भी अंबिकापुर से विमान सेवा के लिए प्रयासरत रहे हैं। करीब सालभर पहले रायपुर-बिलासपुर-अंबिकापुर विमान सेवा शुरू हुई थी। फ्लाई बिग एयर लाइन कंपनी की ये विमान सेवा बमुश्किल तीन महीने ही चली, और फिर बाद में बंद हो गई। अब नए सिरे से रूट तय कर नई कंपनी ने विमान सेवा शुरू की है, लेकिन ये भी लंबे समय तक चलेगी इसको लेकर कुछ लोगों को शंका है। अंबिकापुर-दिल्ली विमान सेवा को लेकर मीडिया में काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया आई थी। पहले दिन ही 72 सीटर विमान फुल नहीं हो पाई। कुल 46 लोग ही दिल्ली के लिए उड़ान भरी। इसमें से 16 यात्री बिलासपुर से आए थे। अंबिकापुर से 30 लोग बैठे। इन सबको देखकर जानकार लोग मान रहे हैं कि ये सेवा भी लंबे समय तक नहीं चल पाएगी। वैसे भी निजी विमानन कंपनियां मुनाफे के आधार पर चलती है। अंबिकापुर से दिल्ली और कोलकाता के लिए रायपुर की तरह पैसेंजर मिलना मुश्किल है। रायपुर से तो दिल्ली के लिए आठ फ्लाइट चलती है, और सभी फुल रहती है। वैसा पेसेंजर रायपुर या बिलासपुर से मिलना मुश्किल है।
कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि बनारस और रांची को जोड़ा जाना चाहिए। तभी अंबिकापुर से विमान सेवा फायदेमंद रहेगी, और लोगों को भी सहुलियत होगी। अंबिकापुर से बनारस और रांची जाने वाली की संख्या काफी अधिक है। देखना है नई सेवा कितने दिन चलती है।
हार्न की जगह, ढेंचू-ढेंचू

दुनिया भर में मंडराते ईंधन संकट ने लोगों की चिंता तो बढ़ा रखी ही है, पर सोशल मीडिया पर ऐसे मौके भी गुदगुदाने, मुस्कान लाने वाले रचनात्मक काम जारी है। ऐसी ही एक तस्वीर फेसबुक में मिली है। एक गधा, जिसकी पीठ पर बाइक की सीट है, हेडलाइट और हैंडल तक फिट कर दिया गया है। सवारी तो गधे की होगी लेकिन फीलिंग बाइक चलाने की मिलेगी। तस्वीर देखकर लोग हिसाब लगाने लगे हैं कि क्या आने वाले दिनों में बाइक की जगह डंकी को दौड़ाना सस्ता पड़ेगा? माइलेज का अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि यह गधे के मूड और चारे की क्वालिटी पर निर्भर करता है। कुछ लोग इसे गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नया आविष्कार भी बता रहे हैं। वही यूनिवर्सिटी, जिसने हाल ही में नई दिल्ली के एक एआई सम्मेलन में चीनी रोबोट को अपना बताकर प्रदर्शित कर दिया था।
महिला कांग्रेस की गतिविधियां शून्य
कांग्रेस में कोई फैसले में काफी विलंब होता है। इससे पार्टी नेता और कार्यकर्ता निराश भी रहते हैं। ताजा मामला प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति से जुड़ा है।
राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम के इस्तीफे के बाद से महिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद खाली है। प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए पार्टी हाईकमान ने प्रक्रिया शुरू की, और पांच महिला नेत्रियों को शॉर्टलिस्ट कर इंटरव्यू के लिए आमंत्रित किया।
इंटरव्यू की जिम्मेदारी महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा को दी गई थी। जिन नेत्रियों का इंटरव्यू हुआ था उनमें पूर्व विधायक श्रीमती छन्नी साहू, संजारी-बालोद की विधायक संगीता सिन्हा, सिहावा की पूर्व विधायक श्रीमती डॉ. लक्ष्मी ध्रुव, और अन्य दो थे। इन सभी का जनवरी के पहले हफ्ते में इंटरव्यू हुआ था। मगर आज तक अध्यक्ष के नाम घोषित नहीं हो पाए हैं।
चर्चा है कि प्रदेश के बड़े नेताओं ने अध्यक्ष पद के लिए अलग-अलग नामों की सिफारिश की है। पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने छन्नी साहू को अध्यक्ष बनाने की सिफारिश की है, तो पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने संगीता सिन्हा का नाम आगे बढ़ाया है। कहा जा रहा है कि बड़े नेता किसी एक नाम पर सहमत नहीं होने के कारण भी नियुक्ति में विलंब हो रहा है।
पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि किसी एक नाम पर सहमति बनाना काफी कठिन होता है। ऐसे में हाईकमान को दखल देकर सीधे नियुक्ति आदेश जारी करना चाहिए। मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसका प्रतिफल यह है कि महिला कांग्रेस की तमाम गतिविधियां ठप पड़ गई है जबकि महिलाओं से जुड़े रसोई गैस किल्लत जैसे मुद्दों पर पार्टी बड़ा माहौल नहीं बना पा रही है।
हिसाब अभी बाकी है...
अगर पुराना हिसाब-किताब बाकी है, तो आगे उसी व्यक्ति या संस्थान से दोबारा कारोबार करने में दिक्कत होना स्वाभाविक है, यह व्यापार का एक सामान्य नियम है। कुछ ऐसी ही स्थिति से सरकार के एक मंत्री को दो-चार होना पड़ा है।
चर्चा है कि मंत्रीजी अपने करीबियों को प्रदेश के एक पर्यटन स्थल पर घुमाने ले जाने की तैयारी में हैं। वहां कई रिसॉर्ट और होटल मौजूद हैं। मंत्रीजी के कार्यालय से जब बुकिंग के लिए फोन किया गया, तो होटल और रिसॉर्ट संचालकों ने अपने यहां पहले से कमरे उपलब्ध नहीं होने की बात कह दी।
मंत्रीजी के लिए तो सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरने का इंतजाम हो गया, लेकिन करीबियों के लिए व्यवस्था नहीं होने पर उन्हें एक सरकारी स्कूल में ठहराने का बंदोबस्त करना पड़ा।
अब सवाल उठता है कि कमरे खाली होने के बाद भी होटल और रिसॉर्ट संचालक आनाकानी क्यों कर रहे हैं। इसकी वजह भी दिलचस्प बताई जा रही है। बताते हैं कि कुछ महीने पहले इसी पर्यटन केंद्र में भाजपा का एक बड़ा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में वीवीआईपी पहुंचे थे। उस दौरान सभी होटल और रिसॉर्ट बुक किए गए थे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब भुगतान की बारी आई, तो आयोजक पूरा हिसाब चुकाए बिना ही निकल गए। इससे संचालक नाखुश रहे। अब जब मंत्रीजी के करीबियों को ठहराने की बारी आई, तो होटल और रिसॉर्ट संचालकों ने इस बार एक सुर में मना कर दिया।
..तो छत्तीसगढ़ से तरबूज नहीं

खाड़ी देशों से हमारी कार बाइक को रफ्तार देने वाले पेट्रोल डीजल की आवक कम हुई है तो वहां के लोगों के गले को तर करने वाले तरबूज( कलिंदर )की जावक थम गई है। ईरान इजरायल युद्ध की वजह से इसका निर्यात पूरी तरह से बंद हो गया है। इस बार तो सीधे रायपुर एयरपोर्ट के कार्गो प्लेन से निर्यात की भी तैयारी थी। उत्पादन अच्छा होने के बाद भी निर्यात नहीं हो पा रहा है। हालांकि इसका फायदा स्थानीय बाजार को होगा। आम लोगों के लिए दाम अलग गिरेंगे। थोक सब्जी बाजार के अध्यक्ष श्रीनिवास रेड्डी की मानें तो पिछले सीजन में 20-25 हजार रुपए टन बिकने वाला तरबूज इस बार 10 हजार रुपए टन से कम पर आ गया है। रेड्डी के मुताबिक किसानों ने इस बार 10 हजार एकड़ में तरबूज बोया था। जहां प्रति एकड़ 35-38 टन का औसत उत्पादन आंका जाता है। यानी सीजन में कुल 6 लाख टन के आसपास होता। इसकी कीमत 300 करोड़ होती। लेकिन किसानों की मेहनत पर पेट्रोल छिडक़ दिया गया। यह सही है कि देश का बाजार 100 करोड़ लोगों का है लेकिन गिरे हुए भाव में बेचना होगा। उसके लिए भी अन्नदाता किसान को कारोबारियों की चिरौरी करनी पड़ रही है जो आपदा को अवसर बना कर औने पौने दाम में बेचने मजबूर कर रहे हैं। तरबूज उत्पादक किसानों का कहना है कि फरवरी के पहले सप्ताह 17 हजार रुपए के ऊंचे भाव में 100 ट्रक माल निर्यात हुआ था। उसके बाद से इतनी बड़ी खेप अब तक बुक नहीं हुई है, और तो और अधिक मांग वाले मुंबई, पुणे नासिक से भी आर्डर कम हो गया है। जबकि गर्मी अब अपने उच्चतम तापमान की ओर बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ के तरबूज उत्पादकों को अब स्थानीय बाजार का ही सहारा है। यही वजह है कि मुख्य बाजार के साथ शहरों के आवासीय कालोनी, हाइवे के किनारे तरबूज भरे छोटा हाथी, तूफान, ट्रेक्स,मेटाडोर देखे जा सकते हैं।
छुट्टियों पर राजनीति जरूर होती है...
सरकारी दफ्तरों में पांच दिवसीय सप्ताह के बीच सोमवार और शुक्रवार को पडऩे वाली छुट्टियों का बड़ा महत्व हो जाता है। कर्मचारियों के लिए ये राहत और निजी जीवन के संतुलन का अवसर होते हैं। शुक्रवार को अवकाश मिल जाए तो तीन दिन का लंबा वीकेंड, और सोमवार को छुट्टी हो तो चार दिन का। इस महीने के आखिरी दिनों में दो बड़े पर्व राम नवमी और महावीर जयंती ऐसे अवसर लेकर आए थे, जो कर्मचारियों को लंबा अवकाश दे सकते थे। लेकिन राज्य स्तर पर छुट्टियों का निर्धारण कुछ अलग तरह से हो गया।
राम नवमी की छुट्टी गुरुवार को घोषित की गई, जबकि कई कर्मचारी संगठनों का तर्क था कि वास्तविक उत्सव शुक्रवार को मनाया जा रहा है। इसी तरह महावीर जयंती का अवकाश मंगलवार को तय हुआ। परिणाम यह हुआ कि छुट्टियां बिखरी-बिखरी रहीं और कर्मचारियों को लगातार अवकाश का लाभ नहीं मिल पाया।
हालांकि कई कर्मचारी व्यवस्था के बीच रास्ता निकालने में माहिर होते हैं। उन्होंने दो दिन का वैयक्तिक अवकाश लेकर पांच दिन की छुट्टी का इंतजाम कर लिया। लेकिन यह जुगाड़ हर किसी के लिए संभव नहीं होता। खासकर उन कर्मचारियों के लिए, जिनकी छुट्टियां सीमित हैं या काम का दबाव अधिक है।
उधर पड़ोसी मध्यप्रदेश सरकार ने अपेक्षाकृत लचीला रुख अपनाया। वहां राम नवमी की छुट्टी को गुरुवार से बदलकर शुक्रवार कर दिया गया। महावीर जयंती का अवकाश भी मंगलवार से खिसकाकर सोमवार कर दिया गया।
छत्तीसगढ़ में कर्मचारी संगठनों ने अपने स्तर पर ज्ञापन सौंपे, लेकिन उनकी मांगों का असर नहीं दिखा। मगर, मध्यप्रदेश में कर्मचारियों ने राजनीतिक हस्तक्षेप का महत्व समझा। वहां के विधायकों ने छुट्टियों को बदलने के लिए मुख्यमंत्री को चि_ी लिखी। वहां मुख्यमंत्री ने सहमति दे दी। कर्मचारियों को कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के विधायकों का साथ मिला।
वैसे छुट्टियों पर चर्चा करते हुए एक और बहस का एक और पक्ष हमेशा खुल जाता है। आम जनता अक्सर यह सवाल उठाती है कि सरकारी कर्मचारियों को आखिर इतनी छुट्टियां क्यों? राज्य बनने के बाद से कई ऐसे सार्वजनिक अवकाश घोषित किए जा चुके हैं, जिसका मकसद राजनीतिक फायदा उठाना है।

विजयपत सिंघानिया का छत्तीसगढ़ कनेक्शन
रेमंड ग्रुप के पूर्व चेयरमैन और पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. विजयपत सिंघानिया के निधन की खबर ने उन लोगों को भी दुखी किया, जो छत्तीसगढ़ से उनके जुड़ाव को जानते हैं।
पुराने बिलासपुर जिले के गोपालपुर में, जो अब जांजगीर-चांपा जिले में शामिल हुआ है, उन्होंने रेमंड सीमेंट संयंत्र की स्थापना की थी। वे उन चुनिंदा उद्योगपतियों में थे, जिन्होंने निवेश के साथ छत्तीसगढ़ के साथ लगाव रखा। उनका हेलीकॉप्टर उतरता था, तो खुद ही कई बार पायलट होते थे। कुछ घंटों का प्रवास होता था, कभी-कभी एक दो दिन के लिए रुकते भी थे। उनके संयंत्र से स्थानीय लोगों को रोजगार मिला और कई व्यवसायियों को भी काम मिला। वे यहां के राजनीतिक और प्रबुद्ध लोगों से भी मिलने के लिए वक्त निकाल लिया करते थे। मजदूरों और संयंत्र के आसपास के जमीन मालिकों के साथ कई बार विवाद भी हुआ। खासकर खेती की जमीन को लाइम स्टोन के खनन से होने के नुकसान के चलते। पर, उन्हें सुलझा लिया गया। प्रशासन तब भी उनके पक्ष में होता था, लेकिन आज की तरह एकतरफा नहीं। तब प्रशासन ग्रामीणों की शिकायतें सुनता भी था और सिंघानिया अथवा फैक्ट्री प्रबंधन को बाध्य भी करता था, समाधान के लिए। हर बार समाधान निकल भी जाता था। रेमंड के कपड़े महंगे होते थे। मगर, अपने कर्मचारियों के लिए वे हर साल एक बार सेल लगवाया करते थे। यह सेल फैक्ट्री एरिया में लगा करती थी। रेमंड के कपड़ों का क्रेज आज भी है, पर उस वक्त ज्यादा ही था। शहर से भी लोग जाकर उस सेल में खरीदारी करते थे। बाद में उन्होंने यह फैक्ट्री लाफार्ज को बेच दी। इसी बीच उन्होंने गौ संवर्धन की एक योजना को हाथ में लिया। ग्रामीणों को अच्छे नस्ल की गायों को वितरित किया गया। एक मॉडल गौशाला भी फैक्ट्री परिसर में तैयार किया गया। पर, धीरे-धीरे विजयपत सिंघानिया का बिलासपुर आना बंद हो गया। बाद में उनका अपने बेटे, बहुओं से विवाद की खबरें यहां पहुंचने लगी। उन्हें परिवार से लगभग बेदखल कर एक फ्लैट में कैद करके रख दिया गया था। जो लोग उनसे मिला-जुला करते थे, उन्हें इन सूचनाओं ने पीड़ा पहुंचाई। आज जब उनके निधन की खबर आई है, छत्तीसगढ़ में जो लोग कभी उनसे मिल चुके हैं या उनकी वजह से नौकरी और व्यापार में सफल हो चुके हैं- उनको भी दुख हुआ है।
एक दिन में आया सिलेंडर
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इन दोनों पर्चियों की तारीख पर गौर जरूर करें। 26 फरवरी को बुकिंग और 27 फरवरी को घर पर आ गया सिलेंडर। ग्राहक कह रहे हैं कि कुछ ही गैस कंपनियों की डिलीवरी फास्ट है। लेकिन ऐसा तो हो नहीं सकता कि उनके पास स्टॉक ज्यादा है और बाकी के पास कम। ये दोनों पर्चियां उन लोगों को चिढ़ा रही होंगी जो गैस कंपनी दफ्तरों के बाहर सुबह से कतार में खड़े हो रहे हैं, या तो उनके घर के सिलेंडर खत्म हो गए हैं, या जंग खत्म न होने की आशंका में वे आनन-फानन सिलेंडर लेने पहुंच रहे हैं। लेकिन सवाल ये भी है कि जब घरेलू गैस की बुकिंग 25 दिन के अंतराल में हो रही है तो क्या खपत इतनी बढ़ गई है कि लोगों के सिलेंडर पहले खाली हो रहे हैं, या फिर इसमें भी कहीं कोई गड़बड़झाला है! क्योंकि गैस की किल्लत की खबरों के बीच घरेलू सिलेंडरों के व्यावसायिक उपयोग के खुलासे धड़ल्ले से हो रहे हैं और कार्रवाई भी।
भारत सरकार ने कहा है कि देश के पास 60 दिनों का गैस भंडार है, लेकिन न तो कोई किल्लत की स्थिति है और न ही लॉकडाउन जैसी। केंद्र के निर्देशों के मुताबिक राज्य सरकार ने भी औपचारिक बैठक में सभी जिले के कलेक्टर्स को गैस सिलेंडर की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने जनता से कहा है कि गैस सिलेंडर की कोई कमी नहीं है, लोगों को अफवाह पर ध्यान नहीं देना चाहिए। बता दें कि गैस सिलेंडर की जमाखोरी पर कार्रवाई भी चल रही है, सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पखवाड़े भर में जमाखोरी के मामले में करीब 4 हजार सिलेंडर जब्त हुए, और करीब 100 एफआईआर।
गैस का ब्लैक मार्केट तो छलांगे मार रहा है, सोशल मीडिया पर कमेंट बताते हैं कि लोगों को 4-4 हजार में सिलेंडर मिल रहा है। ये वो लोग हो सकते हैं जिन्होंने कंपनी से कनेक्शन नहीं लिया होगा, या उनके घर पर एक सिलेंडर 25 दिन भी नहीं चलता होगा। हालात कह रहे हैं कि कटौती करनी होगी, जैसे पहले जंग के सबसे मुश्किल शुरुआती दौर में सरकार ने सिलेंडर सप्लाई के कोटे में कटौती की ताकि मारामारी न हो। सरकार को हालात काबू में दिखे तो अब कोटा बढ़ा दिया गया है। लेकिन लोगों को भी जंग के ऐसे मुश्किल हालातों में समझदारी दिखानी जरूरी है, न कि हड़बड़ी।
‘घर’ के बाहर भी जंग
असम चुनाव में छत्तीसगढ़ के नेताओं की भी परीक्षा है। यहां केन्द्रीय मंत्री तोखन साहू के अलावा डिप्टी सीएम अरुण साव, और वित्त मंत्री ओपी चौधरी डेरा डाले हुए हैं। जबकि कांग्रेस प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार की कमान पूर्व सीएम भूपेश बघेल संभाल रहे हैं। खास बात ये है कि चुनाव प्रचार के दौरान छत्तीसगढ़ के कांग्रेस-भाजपा नेताओं के बीच जुबानी जंग भी चल रही है।
भूपेश ने असम के सीएम हिमंता बिस्वा शर्मा को ‘नकली कांग्रेसी’ बताकर माहौल गरम करने की कोशिश की है। हिमंता कांग्रेस में रह चुके हैं। भूपेश बघेल चुनावी सभाओं में हिमंता पर निशाना साधते हुए कह रहे हैं कि असम में कांग्रेस का मुकाबला ‘नकली कांग्रेसी’ से है और भाजपा मुकाबले में नहीं है। इस पर भाजपा नेता जवाबी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं। और जब एक्साइज ड्यूटी घटाने के मामले पर पूर्व सीएम ने जब केंद्र की सरकार को घेरने की कोशिश की, तो वित्त मंत्री ओपी चौधरी जवाब देने के लिए आगे आ गए।
भूपेश ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि एक्साइज ड्यूटी में कटौती तेल कंपनियों के लिए राहत दी गई, और चाटुकारिता के लिए जनता को लाभ मिलने की अफवाह फैला रहे हैं। इस पर ओपी चौधरी ने एक्स पर लिखा कि कोविड जैसी आपदा के समय जब पूरी दुनिया संकट से जूझ रही थी, और लोग आर्थिक मुश्किलों में थे तब आपने पेट्रोल पर वैट बढ़ाकर आपदा को अवसर बनाकर वसूली की थी। उन्होंने आखिरी में लिखा कि साफ है कि आपके समय में आपदा वसूली का अवसर थी, मोदी जी के नेतृत्व में संकट में भी जनता को राहत देने का संकल्प है।
चुनावी माहौल है, तो प्रदेश के नेता बाहर जाकर भी लड़ रहे हैं।
एल्डरमैन की नियुक्ति जल्द
मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने म्युनिसिपलों में एल्डरमैनों की नियुक्ति कर दी है। मप्र के 123 म्युनिसिपल ने 429 एल्डरमैन नियुक्त हुए हैं। मप्र की नियुक्ति के बाद यहां भी हलचल शुरू हो गई है। हालांकि प्रदेश के बड़े नेता पांच राज्यों के चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं, लेकिन पद के इच्छुक नेता मंत्रियों के संपर्क में हैं। कुछ ने तो पार्टी दफ्तर में बायोडाटा भी दे दिया है।
छत्तीसगढ़ में 667 एल्डरमैनों की नियुक्ति होनी है। पहले चर्चा यह भी थी कि एल्डरमैनों की नियुक्ति नहीं होगी। मगर मप्र में नियुक्ति होने के बाद यहां भी नियुक्ति की संभावना जताई जा रही है। साय सरकार आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है। म्युनिसिपलों का भी एक साल का कार्यकाल पूरा हो चुका है। ऐसे में जल्द से जल्द नियुक्ति के लिए दबाव बन रहा है। चर्चा है कि सबकुछ ठीक रहा तो मई में एल्डरमैनों की लिस्ट जारी हो सकती है। वजह यह है कि चार मई तक चुनावी व्यस्तता है, और इसके बाद फिर नियुक्तियों पर फैसला होगा। एल्डरमैनों के साथ ही निगम मंडलों के उपाध्यक्ष और सदस्यों की भी नियुक्ति के आसार हैं। देखना है आगे क्या होता है।
ब्लैक में सिलेंडर, पार्षद और विधायक
खाड़ी में चल रहे युद्ध के बीच पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की संभावित किल्लत को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें सतर्क हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार की रात राज्यों के सीएम के साथ वर्चुअल बैठक में जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। बैठक में सीएम विष्णु देव साय यहां मंत्रालय से जुड़े थे। इसके बाद राज्य में समीक्षा शुरू हो गई है।
हालांकि, विशेषकर रसोई गैस की किल्लत के कारण कालाबाजारी पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल हो रहा है। इस बीच राजधानी रायपुर में खेलो इंडिया नेशनल ट्राइबल गेम्स का आयोजन चल रहा है, जिसमें देशभर से करीब 4 हजार खिलाड़ी पहुंचे हैं।
खिलाडिय़ों के खाने-पीने की व्यवस्था शहर के कई होटलों में की गई है। मैन्यू भी आयोजन समिति के अधिकारी तय कर रहे हैं, जिसमें एक समय चिकन परोसना अनिवार्य रखा गया है। लेकिन होटल समूह गैस की समस्या से जूझ रहे हैं। कई जगह चूल्हे और तंदूर का इस्तेमाल किया जा रहा है।
वहीं, लकड़ी और कोयले के दाम भी दोगुने से अधिक हो गए हैं। चिकन पकाने में ज्यादा समय लग रहा है जिससे होटल संचालकों की लागत बढ़ गई है। इस बड़े आयोजन से अच्छे मुनाफे की उम्मीद लगाए बैठे होटल व्यवसायियों को अब निराशा हाथ लग रही है। इससे परे रायपुर के एक पार्षद, जो होटल व्यवसाय से जुड़े हैं , वो गैस की समस्या को लेकर विधायक के पास पहुंचे। पार्षद ने उन्हें बताया कि कमर्शियल गैस सिलेंडर की उपलब्धता नहीं है, वो खुद ब्लैक में सिलेंडर लेने के लिए मजबूर हैं। विधायक ने तुरंत कालाबाजारी करने वालों कार्रवाई के लिए कहा, तो पार्षद ने टोक दिया। उन्होंने कहा कि यदि कार्रवाई हुई, तो ब्लैक में भी सिलेंडर मिलना बंद हो जाएगा। किसी तरह कार्रवाई के बजाय आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में प्रयास किया जाए, इससे ब्लैक मार्केटिंग रुक जाएगी। मगर कार्रवाई करना आसान है, लेकिन गैस उपलब्ध कराना कठिन हो गया है।
सुपरफूड की बंपर पैदावार फिर भी किसान लाचार

छत्तीसगढ़ के ज्यादातर शहर इन दिनों मुनगा या सहजन की हरियाली से सराबोर है। मंडियों में रोज छोटे बड़े मालवाहकों में हरे-भरे मुनगा पहुंच रहे हैं।
मगर, बिलासपुर-जिसे सबसे अधिक मुनगा पैदा करने वाला जिला माना जाता है, की तिफरा थोक सब्जी मंडी में रोजाना 20 से 25 टन मुनगा आ रहा है, जबकि स्थानीय खपत मुश्किल से 10 से 15 टन तक ही सीमित है। नतीजा यह कि थोक भाव गिरकर 8 से 10 रुपये किलो रह गया है। शहर की दुकानों में 15 से 20 रुपये किलो में ही बिक पा रहा है। मजबूरी में उन्हें अपनी उपज बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में भेजनी पड़ रही है। रोजाना 20-30 टन मुनगा बाहर जा रहा है, लेकिन वहां भी असली फायदा बिचौलियों की जेब में ही जा रहा है।
मुनगा साधारण फसल नहीं, बल्कि विशुद्ध छत्तीसगढ़ की आहार संस्कृति में शामिल सब्जी है और पोषण का खजाना है। इसे सुपरफूड यूं ही नहीं कहा जाता है। इसके पत्ते, फल, फूल और बीज सब उपयोगी हैं। इसमें दूध से कई गुना ज्यादा कैल्शियम, पालक से ज्यादा आयरन और संतरे से ज्यादा विटामिन सी पाया जाता है। यह इम्यूनिटी बढ़ाने, जोड़ों के दर्द में राहत और ब्लड शुगर नियंत्रित करने में भी मददगार है। इतनी उपयोगी चीज को उगाने वाले किसानों को उनकी मेहनत की कीमत नहीं रही है।
शहरों में मुनगा का उपयोग सीमित है। अगर इसे सरकारी पोषण योजनाओं, आंगनबाड़ी और मिड-डे मील में शामिल किया जाए, तो स्थानीय स्तर पर ही खपत बढ़ सकती है। अपने यहां कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स की भी भारी कमी है। अगर मुनगा से पाउडर, तेल, सूप या कैप्सूल बनाने के उद्योग स्थानीय स्तर पर लगें, तो यही फसल किसानों के लिए सोना बन सकती है।
एक और बड़ी समस्या विपणन व्यवस्था की है। स्थानीय किसानों के सामने परिवहन लागत उठाना मुश्किल हो जाता है और बाजार तक पहुंच घट जाती है। व्यापारी, ट्रक बुक कर दूसरे राज्यों में माल भेजते हैं, जिसकी लागत का हवाला देकर किसानों को पूरी कीमत नहीं दी जाती। थोक और चिल्हर कीमतों के बीच का बड़ा अंतर भी रहता है। इस चैनल पर किसान और उपभोक्ता दोनों ठगे जाते हैं।
छत्तीसगढ़ में धान के अलावा अनेक तिलहन-दहलन उत्पादों को एमएसपी में शामिल किया जा चुका है। क्या सब्जियों और फलों के लिए भी कोई सुरक्षा तंत्र नहीं होना चाहिए? केंद्र सरकार ने कई साल पहले ई-नाम जैसा प्लेटफॉर्म बनाया था ताकि देश की किसी भी मंडी में सही कीमत पर उत्पाद बेच सकें, पर छत्तीसगढ़ के आम किसान इस सेवा का लाभ कैसे उठाना है, यही नहीं जानता। रेलवे भी किसान एक्सप्रेस ट्रेन चलाती है, पर यह कई महीने में एकाध बार ही चलती है।
बंपर उत्पादन से यह तो तय हो जाता है कि छत्तीसगढ़ की जलवायु मुनगा उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल है। मगर, सरकार की नीतियां और बाजार की कमियां मुनगा किसानों की जेब नहीं भर रही है।
सलमान-कटरीना की पसंदीदा दुकान

छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ न्यूज़ फोटोग्राफर गोकुल सोनी ने फेसबुक पर एक दिलचस्प फोटो पोस्ट करते हुए लिखा है- ऑनलाइन शॉपिंग का ऐसा देसी वजऱ्न आपने कहीं नहीं देखा होगा। यहां DKR Collection में ON LINE Booking भी है। बस फर्क इतना है कि नेट नहीं, नेटवर्क वाला पड़ोसी चाहिए। Amazon, Flipkart वाले भी सोच में पड़ जाएं। भाई, ये ‘स्टार्टअप’ किस लेवल का जुगाड़ है। कुकरी तालाब गुढिय़ारी के इस शाप में सलमान और कटरीना भी कपड़े खरीदने की सोच रहे हैं।
मंडी से मंदिर तक आस्था और राजनीति
रायपुर की पंडरी स्थित कृषि उपज मंडी भले ही अब तुलसी-बाराडेरा शिफ्ट हो चुकी हो, लेकिन पुराने परिसर की पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। गेट के बाहर स्थित राम-जानकी मंदिर आज भी श्रद्धा का बड़ा केंद्र बना हुआ है। 90 के दशक में बने इस मंदिर की खासियत यह है कि इसका निर्माण उस दौर में हुआ, जब देश में राम मंदिर, बाबरी मस्जिद विवाद चरम पर था। उस समय मंडी अध्यक्ष रहे मोहम्मद अकबर ने मंदिर का निर्माण कराया था।
आज भी परंपरा जारी है। नवरात्र में ज्योति कलश स्थापना के दौरान सबसे पहला नाम अकबर का ही लिया जाता है। उनके बाद के पदाधिकारियों में देवजी पटेल, सुरेखा महेश शर्मा और अनिता योगेंद्र शर्मा जैसे नाम भी इस परंपरा से जुड़े हैं। व्यापारी और किसान भी पीछे नहीं हैं। वे भी आस्था के इस सिलसिले में बराबर सहभागी हैं। रामनवमी के अवसर पर यहां विशेष पूजा-अर्चना हो रही है, जिससे साफ है कि मंडी भले खाली हो गई हो, लेकिन आस्था अब भी आबाद है।
दूसरी ओर, इस खाली पड़ी जमीन पर जेम-ज्वेलरी पार्क बनाने का प्रस्ताव है, जिस पर सियासत गर्म है। मंडी से राजनीति की शुरुआत करने वाले कई नेताओं ने इसका विरोध किया है। देवजी पटेल इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट तक जा चुके हैं, और अब फिर से कानूनी लड़ाई की तैयारी में हैं। हालांकि पिछली सरकार ने पहले आपत्ति खारिज कर दी थी। वर्तमान में उनकी अपनी पार्टी सरकार ने भी देवजी की आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया है। सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि मंडी शिफ्ट हो चुकी है, ऐसे में खाली जमीन का अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग करना गलत नहीं है। मगर देवजी भाई पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में आगे क्या होगा, इस पर सबकी नजर है।
फोटो असली हो या नकली, सलाह खरी
एआई और फोटो-वीडियो एडिटिंग के दूसरे मामूली औजारों के इस वक्त में यह अंदाज लगाना बड़ा मुश्किल रहता है कि असली क्या है और नकली क्या है? ऐसे में सोशल मीडिया पर बड़ी चर्चित एक लोक गायिका नेहा सिंह राठौड़ ने आज अपनी तस्वीर के साथ एक पेट्रोल पंप पर लगे एक बैनर की फोटो पोस्ट की है । बारीकी से देखने पर, डिजिटल औजारों से परखने पर ऐसा लगता है कि यह बैनर कहीं और से लाकर इस फोटो पर जोड़ दिया गया है। जो भी हो बैनर असली हो या नकली, सलाह तो खरी है, और इस पर अमल में समझदारी भी है।
ईंधन संकट की आहट...
खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात का असर अब स्थानीय बाजार तक महसूस होने लगा है। ईंधन और रसोई गैस को लेकर संकट की चर्चाएं तेज हैं, और इसके साथ ही कालाबाजारी भी सिर उठाने लगी है।
प्रदेश में लगातार छापेमारी हो रही है, लेकिन हालात यह है कि कमर्शियल गैस सिलेंडर जहां तय कीमत करीब 1800 रुपये है, वहीं बाजार में 7 हजार रुपये तक बिकने की खबरें हैं। सरकार द्वारा होटल-रेस्टोरेंट को सीमित मात्रा (करीब 20 फीसदी) में ही कमर्शियल सिलेंडर देने के फैसले के बाद परेशानी और बढ़ गई है। इसका सीधा असर होटल और रेस्टोरेंट कारोबार पर पड़ रहा है। विकल्प के तौर पर डीजल चूल्हों की मांग बढ़ी है, लेकिन अब इनमें बने खाने में डीजल की गंध आने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं, जो नई चिंता का विषय बन गया है।
जिला प्रशासन ने पेट्रोल पंप संचालकों को ड्रम और जेरिकेन में पेट्रोल-डीजल देने पर सख्ती बरतने के निर्देश दिए हैं, यहां तक कि उल्लंघन पर पंप सील करने की चेतावनी भी दी गई है।
सरकार भले ही ईंधन और गैस की कोई कमी नहीं होने का दावा कर रही हो, लेकिन जमीनी खबरें अलग कहानी कह रही हैं। पड़ोसी राज्यों के फैसले भी चिंता बढ़ा रहे हैं, महाराष्ट्र में ट्रक चालकों के लिए डीजल की सीमा तय की गई है, वहीं ओडिशा में रेस्टोरेंट्स को गैस की जगह पारंपरिक चूल्हे इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। अब देखना यह है कि यह संकट अफवाहों तक सीमित रहता है या वाकई बड़े असर के साथ सामने आता है।
शीर्ष फैसले का छत्तीसगढ़ पर असर..
छत्तीसगढ़ में वर्षों से प्रार्थना सभाओं पर संगठित हमले होते रहे हैं। पास्टरों पर लाठी-डंडों का प्रहार, महिलाओं-बच्चों की गरिमा का अपमान और सामाजिक बहिष्कार। ऐसे में 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का आया फैसला राज्य के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। इस फैसले के मुताबिक एक बार ईसाई या इस्लाम जैसे धर्म में सार्वजनिक रूप से प्रवेश कर लेने पर जन्म-आधारित जाति का लाभ तत्काल और पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
छत्तीसगढ़ के न केवल आदिवासी-बहुल क्षेत्रों में बल्कि मैदानी इलाकों में भी धर्मांतरण के आरोप पर प्रार्थना सभाएं बाधित होती रही हैं। बस्तर के छिंदवाड़ गांव में एक दलित ईसाई परिवार के परिजन का शव तीन सप्ताह तक चीरघर में पड़ा रहा। ग्राम सभा के पारंपरिक रिवाज और पेसा कानून का हवाला देकर गांववालों ने शव दफनाने का विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट के विभाजित फैसले में अंतत: शव को गांव के बाहर एक ईसाई कब्रिस्तान में दफनाने का आदेश हुआ। कुछ क्षेत्रों में दफनाए गए शव को निकालने के मामले भी आ चुके हैं। पादरियों के गांवों में प्रवेश को रोकने के ग्राम सभाओं के फैसलों को भी अदालत सही ठहरा चुकी है।
हाल ही में विधानसभा ने धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक पारित किया है, जो 1968 के पुराने कानून को बदल देता है। यह कानून जबरन, लालच, विवाह या धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण पर रोक लगाता है, जिसमें सामूहिक धर्मांतरण के लिए आजीवन कारावास और अन्य अवैध मामलों में 10-20 साल की कैद के साथ भारी जुर्माने का प्रावधान है। पुराने कानून में केवल एक साल की सजा और 5 हजार रुपये का जुर्माना था।
दिलचस्प यह है कि पुराने कानून में भी सजा की दर बेहद कम रही या नगण्य रही है। वास्तव में लालच या धोखाधड़ी की बात को न तो धर्म परिवर्तन करने वाला स्वीकार करता है और न ही धर्मांतरित कराने वाला। इसलिये कानून कठोर बना देने का मतलब ऐसे मामलों में सजा की दर बढ़ जाएगी यह मान लेना सही नहीं होगा। दूसरी तरफ, शीर्ष अदालत ने आंध्रप्रदेश के जिस मामले को सुनकर यह फैसला दिया है वह अनुसूचित जाति से संबंधित है, जनजाति से नहीं। छत्तीसगढ़ में मत और धर्म बदलने वाले दोनों ही तरह के लोग हैं। मैदानी इलाकों में ओबीसी और एससी वर्ग के लोग तो आदिवासी बहुल इलाकों में एसटी वर्ग के। जिस केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, वह प्रार्थना सभा में हमले का मामला था। इस मामले में एससी अत्याचार अधिनियम के तहत आरोपियों पर कार्रवाई की मांग थी। मगर, अब साफ हो गया है कि प्रार्थना सभा में मौजूद लोग यदि अनुसूचित जाति के हैं और वे पुख्ता तौर पर धर्म बदल चुके हैं तो वे हमले की स्थिति में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर नहीं करा सकेंगे। मगर, बीएनएस में मौजूद सुरक्षा मिलती रहेगी।
काश! अपनी बाड़ी से डीजल उगा लेते
आज जब ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच तनाव ने पूरी दुनिया की सांसें अटका दी हैं, तब छत्तीसगढ़ में एक वक्त का पुराना नारा याद आता है- डीजल नहीं अब खाड़ी से, मिलेगा अपनी बाड़ी से। यह नारा कभी उम्मीदों का एक बड़ा गुब्बारा था। किसान मालामाल होने वाले थे मगर, ऐसा गुब्बारा निकला जो उडऩे से पहले ही फुस्स हो गया।
योजना क्या थी? छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाई गई। 2005 में तब के 16 जिलों में 16 करोड़ रतनजोत के पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया। 1.65 लाख हेक्टेयर बंजर और वेस्टलैंड पर खेती का लक्ष्य था। 2015 तक राज्य को बायोडीजल में आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा गया। 2010 के बाद हर साल 40 अरब रुपये की कमाई बीज बेचकर होने वाली थी। राज्य के सरकारी वाहनों को 2007 तक रतनजोत डीजल पर चलाने का ऐलान किया गया था। भारतीय ऑयल के साथ क्रेडा बायोफ्यूल्स कंपनी बनाई गई। बंजर जमीन, वन विभाग की भूमि और यहां तक कि किसानों की खेती वाली जमीन पर भी पौधे लगाए गए। मनरेगा और बीज विकास निगम के जरिए लाखों पौधे मुफ्त बांटे गए। 7 नवंबर 2006 को सुंदरखेड़ा गांव में तब के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने खुद रतनजोत का पौधा लगाया।
प्रचार चरम पर था। राज्य सरकार ने अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 350 करोड़ रुपये लगाए। केंद्र सरकार ने 2013 में ही नर्सरी के लिए 13.5 करोड़ रुपये दिए। 2005 में तो केंद्र से 15,000 करोड़ रुपये का निवेश मांगा गया था। हालांकि वह राशि मिली नहीं। तब की रमन सिंह सरकार ने बड़े उत्साह के साथ रतनजोत की खेती को बढ़ावा दिया था, सीएम ने अपनी सरकारी गाड़ी इसी डीजल से चलाकर दिखाई।
दावा किया गया था कि इससे बायोडीजल बनेगा और छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भर हो जाएगा। गांव-गांव में पौधे लगे थे, लेकिन न डीजल निकला, न किसानों को फायदा मिला। रतनजोत के पौधे आज भी कई जगह सूखे खड़े मिल जाएंगे, किसी अधूरे वादे की याद दिलाते हुए।
मंत्रिमंडल की चर्चा!!
पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच सत्ता और संगठन—दोनों ही स्तर पर हलचल तेज हो गई है। चार मई को नतीजे आने के बाद कई राज्यों में सरकारों के भीतर बड़े फेरबदल की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। संकेत साफ हैं कि सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि भाजपा शासित उत्तर प्रदेश और ओडिशा में भी कैबिनेट में बदलाव संभव है।
छत्तीसगढ़ की बात करें तो भाजपा सरकार करीब ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से मिड-टर्म रिव्यू की स्थिति बन रही है। पार्टी पहले भी गुजरात मॉडल पर बड़े प्रयोग कर चुकी है, जहां आधे कार्यकाल में पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया गया था। इसी फार्मूले की झलक लोकसभा चुनाव में भी दिखी थी, जब अधिकांश मौजूदा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों पर दांव खेला गया और नतीजे पार्टी के पक्ष में आए।
प्रदेश में भी इसी तरह के प्रयोग को लेकर अटकलें तेज हैं। अंदरखाने की खबर है कि मंत्रियों के प्रदर्शन का आकलन लगातार किया जा रहा है। संगठन और वैचारिक स्तर पर भी समीक्षाएं जारी हैं, और प्रमुख नेताओं के साथ लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। कुछ मंत्रियों का प्रदर्शन औसत माना जा रहा है, जिससे बदलाव की संभावना को और बल मिल रहा है।
इसी बीच एक और चर्चा यह है कि अनुभवी विधायकों को फिर से कैबिनेट में मौका दिया जा सकता है। इनमें अजय चंद्राकर, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, लता उसेंडी, विक्रम उसेंडी और पुन्नूलाल मोहिले जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। इसके अलावा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक भी संभावित दावेदारों में गिने जा रहे हैं।
हालांकि समीकरण सिर्फ मंत्रिमंडल तक सीमित नहीं हैं। यह लगभग तय माना जा रहा है कि किसी वरिष्ठ विधायक को विधानसभा उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जाएगी। लेकिन दिलचस्प यह है कि जो नेता पहले मंत्री रह चुके हैं, वे इस पद को लेकर खास उत्साहित नजर नहीं आ रहे।
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, अटकलबाजियों का दौर जारी है। लेकिन इतना तय है कि जैसे ही चुनावी प्रक्रिया खत्म होगी, सत्ता के गलियारों में हलचल और तेज होगी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि पार्टी क्या वाकई गुजरात फार्मूला अपनाती है या फिर कोई नया राजनीतिक समीकरण सामने आता है।
बनवास का दर्द और अफसरों की कहानी
प्रदेश भाजपा में इस बार कार्यकारिणी गठन के बाद एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, नरेशचंद्र गुप्ता। संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले गुप्ता को नई कार्यकारिणी में जगह नहीं मिल पाई। जबकि वो प्रदेश भाजपा के कार्यालय मंत्री रह चुके हैं। उनकी पहचान उन नेताओं में रही है, जो चुनावी मौसम में विरोधियों के खिलाफ पुख्ता शिकायतें तैयार कर चुनाव आयोग तक पहुंचाते थे।
गुप्ता की सक्रियता सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव अमिताभ जैन, डीजीपी अशोक जुनेजा और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डॉ. आनंद छाबड़ा सहित कई बड़े अफसरों के खिलाफ शिकायतों की झड़ी लगा दी थी। मामला पीएमओ तक पहुंचा और लंबे समय तक इन शिकायतों की चर्चा होती रही।
लेकिन, घटनाक्रम ने अलग ही मोड़ लिया। जिन अफसरों पर गुप्ता ने सवाल उठाए, वे बाद में और मजबूत स्थिति में नजर आए। अशोक जुनेजा को रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन मिला और उन्होंने सम्मानजनक तरीके से कार्यकाल पूरा किया। अमिताभ जैन रिटायरमेंट के बाद सीआईसी बन गए, जबकि डॉ. आनंद छाबड़ा प्रमोशन पाकर एडीजी बन गए।
यही वह बिंदु था, जहां से गुप्ता की अति सक्रियता पार्टी के भीतर असहजता का कारण बनने लगी। संगठन में यह संदेश गया कि लगातार शिकायतों की राजनीति उलटी भी पड़ सकती है। नतीजा, पहले कार्यालय मंत्री पद से हटे और अब कार्यकारिणी से भी बाहर हो गए।
हालांकि, राजनीति में संभावनाएं खत्म नहीं होतीं। निगम-मंडलों में नियुक्तियां बाकी हैं, जहां उनके लिए अभी भी गुंजाइश मानी जा रही है। लेकिन, उनके फेसबुक पोस्ट ने अंदरूनी पीड़ा उजागर कर दी, बनवास केवल जगह से नहीं होताज् अपनों के बीच अजनबी बनकर जीना भी बनवास है।
पेट्रोल-डीजल में अभी जेब ढीली नहीं होगी
खाड़ी देशों से कच्चे तेल की सप्लाई में दिक्कतें हैं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम ऊपर जा रहे हैं, लेकिन देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें थमी हुई हैं। प्रीमियर वेरियेंट के ईंधन और रसोई गैस के दाम में हुई थोड़ी बढ़ोतरी के साथ-साथ लोगों के भीतर यह सवाल घूम रहा है कि पेट्रोल-डीजल में राहत वैसे कब तक रहेगी। पिछले अनुभव बताते हैं कि यह सहूलियत स्थायी नहीं है। इस समय असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल व केंद्र शासित पुडुचेरी में विधानसभा के चुनाव हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि बाकी राज्यों में कीमतें बढ़ा दी जाएं और इन राज्यों को छोड़ दिया जाए।
कुछ पुराने दिनों को याद कर लें। 2019 लोकसभा चुनाव के लिए मतदान चल रहा था तो कीमतें नहीं बढ़ीं। अंतिम चरण 19 मई को खत्म होते ही 20 मई से रोजाना बढ़ोतरी शुरू हो गई। अगले 9 दिनों में पेट्रोल 83 पैसे और डीजल 73 पैसे प्रति लीटर महंगा हो गया। 2022 के पांच राज्यों यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव हुए। पूरे 137 दिनों तक कीमतें पूरी तरह फ्रीज रहीं। चुनाव खत्म होते ही 22 मार्च 2022 से 80 पैसे प्रति लीटर बढ़ोतरी हुई और उसके बाद लगातार कई बार बढ़ाई गईं। ऐसा ही 2018 में कर्नाटक चुनाव और 2017 में गुजरात चुनाव के दौरान भी कीमतें अचानक स्थिर हो गई थीं और वोटिंग के बाद तेजी से बढ़ी।
जब क्रूड ऑयल के दाम निचले स्तर पर आ गए थे तब भी पेट्रोलियम पदार्थों के दाम कम नहीं किए गए थे। अब जब इसकी कीमत 60 से 70 प्रतिशत अधिक हो चुकी है तो जाहिर है हम- आप बढ़ी हुई कीमत का सामना करने से बचेंगे नहीं। पांच चुनावी राज्यों के मतदाताओं का हमें शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनकी नाराजगी से बचने के लिए सरकार ने हमें भी थोड़े दिन के लिए सही राहत दी है और पुरानी कीमत पर पेट्रोल-डीजल खरीदने का मौका मिल रहा है। सबसे अंत में मतदान 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में होने जा रहा है। तब तक कोई टेंशन नहीं लेना है।
परीक्षा की शुचिता कठघरे में..
2019 से 2024 तक 19 राज्यों में कम से कम 65 बड़े पेपर लीक हुए, जिनसे 1.7 करोड़ से अधिक युवा प्रभावित हुए। राजस्थान अकेला पेपर लीक की राजधानी बन चुका है, जहां 2015-2023 के बीच 14 से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। छत्तीसगढ़ भी अब ऐसे राज्यों की सूची में शामिल हो गया है। 14 मार्च को छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की कक्षा 12वीं हिंदी परीक्षा हुई। लेकिन परीक्षा से महज कुछ घंटे पहले ही प्रश्न-पत्र के कुछ प्रश्न व्हाट्सएप ग्रुप्स और सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। 23 तारीख को हुई परीक्षा समिति की बैठक में सबूतों की समीक्षा के बाद परीक्षा को निरस्त घोषित कर दिया गया है। अब पुनर्परीक्षा 10 अप्रैल को होगी। हजारों छात्र-छात्राएं, जिन्होंने महीनों की मेहनत से तैयारी की थी, साजिश का शिकार हो गए।
सीजीपीएससी परीक्षाओं में भ्रष्टाचार के अनेक मामलों के बाद ताजा घटना छत्तीसगढ़ में परीक्षा प्रणाली में गिरावट की ताजा कड़ी है। इसमें शामिल है प्रशासनिक लापरवाही, रिश्वतखोरी का जाल और नकल माफिया का संगठित नेटवर्क। अक्सर यह देखा गया है कि परीक्षा केंद्रों, प्रिंटिंग प्रेस या शिक्षा विभाग के निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ मिलकर कोचिंग संस्थानों और माफियाओं का एक गठजोड़ काम करता है। सोशल मीडिया के जरिए पेपर का वायरल होना और सख्त निगरानी की कमी, परीक्षा प्रणाली को खोखला कर रहे हैं। एआई और सूचना प्रौद्योगिकी के युग में जहां हर चीज डिजिटल है, इसका फायदा नकल और पेपर लीक करने वाले गिरोह तो उठा रहे हैं पर इन परीक्षाओं को आयोजित करने वाली संस्थाएं नहीं उठा पा रहीं।
पेपर लीक पर एक समान कानून पूरे देश के लिए अब तक नहीं बना है। कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर कानून बनाए हैं। छत्तीसगढ़ ने तो हाल ही में परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम विधेयक 2026 पारित किया है, जिसमें 10 वर्ष तक की सजा और एक करोड़ तक जुर्माने का कठोर प्रावधान है। लेकिन कानून को कागज से निकलकर जमीन तक पहुंचने में अभी समय है। दोषियों को सजा दिलाने में ये नए प्रावधान कितने कारगर साबित होंगे यह भी बाद में पता चलेगा। क्या इस लीक की जांच निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी होगी? क्या बिना दबाव दोषियों को सजा मिल सकेगी?
जब आस्था शिखर छू लेती है

नवरात्रि को लेकर इन दिनों छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में मां के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना हो रही है, लेकिन कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां पहुंचना ही अपने आप में एक तपस्या बन जाता है।
ऐसा ही है, कोरबा जिले के गढक़टरा गांव से करीब 2 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित कंचन पहाड़। गांव के लोगों की श्रद्धा इतनी गहरी है कि हर शुभ कार्य से पहले वे यहां आकर माथा टेकते हैं, मन्नत मांगते हैं।
इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां तक पहुंचने का कोई सीधा रास्ता नहीं है। एक खड़ी, लगभग सीधी चट्टान और उस पर जीवनरेखा बनी बरगद की लटकती जड़ें। इन्हीं जड़ों को थामकर, पत्थरों की छोटी-छोटी दरारों में पैर टिकाते हुए ऊपर चढऩा पड़ता है। हर कदम पर जोखिम, हर पकड़ में सावधानी। जरा सी चूक और नीचे सीधे गहरी खाई। ऊपर पहुंचकर जो दृश्य दिखता है, वह अभिभूत कर देता है। दूर-दूर तक फैली पहाडिय़ों की श्रृंखला, शांत वातावरण और एक अलौकिक ऊर्जा का एहसास।
तबादलों की आहट
प्रदेश में जल्द ही बड़े प्रशासनिक फेरबदल की सुगबुगाहट है। आईएएस और आईपीएस अफसरों की तबादला सूची कभी भी जारी हो सकती है। माना जा रहा है कि जिन अफसरों को एक ही विभाग में दो साल से ज्यादा हो चुके हैं, उन्हें बदला जाएगा।
जनसंपर्क विभाग में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। मौजूदा आयुक्त रवि मित्तल की पीएमओ में उपसचिव के पद पर नियुक्ति हुई है। जिसके बाद इस पद पर नई नियुक्ति होगी।
वहीं, आईपीएस महकमे में भी हलचल है। 2020 बैच के एक युवा अधिकारी अध्ययन अवकाश पर जा रहे हैं, जबकि एक जिले की महिला एसपी लंबी छुट्टी पर रहेंगी। ऐसे में उनके स्थान पर नई पोस्टिंग तय है। चर्चा है कि आधा दर्जन से ज्यादा आईपीएस अफसरों के प्रभार में बदलाव हो सकता है।
‘बिहार दिवस’ पर चुप्पी
इस साल 22 मार्च को बिहार दिवस प्रदेश में लगभग खामोशी के साथ गुजर गया। न कोई बड़ा आयोजन हुआ, न ही औपचारिक राजनीतिक सक्रियता दिखी। खासकर भाजपा ने इस बार दूरी बनाकर रखी, जबकि पिछले साल इसी मौके पर कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, और उसी को लेकर विवाद भी खड़ा हुआ था।
दरअसल, पिछली बार बिहार दिवस मनाने के फैसले पर स्थानीय संगठनों, खासकर छत्तीसगढ़ क्रांति सेना ने कड़ा विरोध जताया था। उनका सीधा सवाल था—क्या बिहार में कभी छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस मनाया जाता है? इस बहस ने छत्तीसगढिय़ा बनाम बाहरी जैसे संवेदनशील मुद्दे को भी हवा दी।
सोशल मीडिया में भी भाजपा को आलोचना झेलनी पड़ी। यहां तक आरोप लगे कि यह आयोजन बिहार प्रभारी नितिन नबीन को खुश करने के लिए किया गया था।
असल वजह राजनीतिक थी। उस समय बिहार में विधानसभा चुनाव का माहौल था और भाजपा वहां सक्रिय प्रचार में जुटी थी। इसलिए छत्तीसगढ़ में भी ‘बिहार कनेक्ट’ दिखाने की कोशिश की गई।
अब हालात बदल चुके हैं—बिहार में चुनाव खत्म हो चुके हैं और भाजपा गठबंधन की सरकार बन चुकी है। ऐसे में इस बार कोई राजनीतिक आवश्यकता नहीं दिखी। साथ ही, पिछली बार जैसे विवाद की पुनरावृत्ति से बचने के लिए भी इस मुद्दे से दूरी बनाना ही बेहतर समझा गया।
‘एआई’ बना नया बचाव कवच..
अब सियासत में एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है—विवादित वीडियो और ऑडियो को ‘एआई जनरेटेड’ बताकर खारिज करना। हाल के घटनाक्रम इसे और स्पष्ट करते हैं।
पिछले दिनों रिकेश सेन का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते नजर आ रहे थे। बताया गया कि यह वीडियो भिलाई के एक मॉल का है और पुराना (क्रिसमस के समय का) है। वीडियो सामने आते ही उन्होंने तुरंत पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजते हुए इसे एआई से बनाया गया फर्जी वीडियो बताया और कार्रवाई की मांग की। फिलहाल पुलिस इसकी जांच में जुटी है।
मामला यहीं नहीं थमा। पिछले दिनों विधानसभा में भी इस पर चुटकी ली गई। जब रिकेश सेन सवाल पूछने खड़े हुए, तो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वायरल वीडियो का जिक्र कर तंज कस दिया। रिकेश सेन ने जवाब में फिर यही कहा कि वीडियो एआई जनरेटेड है और इस पर एफआईआर दर्ज कराई जा रही है।
भूपेश बघेल ने पुराने एक और वीडियो का जिक्र छेड़ दिया, जो विधानसभा चुनाव से पहले सोशल मीडिया में खूब चर्चा में था। उस वीडियो में कथित तौर पर प्रेम प्रकाश पाण्डेय के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग दिखाया गया था। इस पर भी रिकेश सेन ने फर्जी और एआई से तैयार करार दिया।
यह ट्रेंड सिर्फ एक दल तक सीमित नहीं है। कुछ महीने पहले कांग्रेस की महिला विधायक शेषराज हरबंश का भी एक ऑडियो वायरल हुआ था, जिसमें रेत के अवैध खनन को लेकर कथित बातचीत सामने आई। हालांकि उन्होंने इसे एआई जनरेटेड बताने के बजाय सीधे तौर पर खारिज किया और अपनी संलिप्तता से इनकार किया। साफ है कि अब एआई सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है।
एक तरफ यह ‘फेक कंटेंट’ से बचाव का हथियार है तो दूसरी तरफ असली-नकली की पहचान करना बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
अफसर को अनिवार्य सेवानिवृत्ति
रेल मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ यानि दपूमरे बिलासपुर जोन के अंतर्गत वरिष्ठ प्रशासनिक श्रेणी के एक अधिकारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर घर बिठा दिया है। वे देश भर के 6 वरिष्ठ अधिकारियों में एक है। इनमें उत्तर रेलवे के मुख्यालय में तैनात ष्टरूश्व (प्रोजेक्ट), दक्षिण पश्चिम रेलवे के हृस्न-॥्रत्र अधिकारी, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के स््रत्र अधिकारी, और पूर्वी रेलवे के ढ्ढक्रस्स्श्व अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा रेलवे बोर्ड सचिवालय सेवा (क्रक्चस्स्) के अंडर सेक्रेटरी/डिप्टी डायरेक्टर स्तर के अधिकारी हैं। यह कड़ी कार्रवाई भारतीय रेल स्थापना संहिता (ढ्ढक्रश्वष्ट) के नियम 1802(क) के तहत की है। यह नियम प्रशासन को यह विशेष अधिकार देता है कि वह जनहित को ध्यान में रखते हुए किसी भी ऐसे अधिकारी को समय से पहले रिटायर कर सकता है, जिसका प्रदर्शन मानक के अनुरूप नहीं है। सरल शब्दों में कहें तो, अगर कोई अधिकारी सरकारी कामकाज में बाधा बन रहा है या उसकी काम करने की क्षमता खत्म हो गई है, तो सरकार उसे पेंशन देकर रिटायर कर सकती है।
यह कार्रवाई उन सभी के लिए एक कड़ा सबक है जो सरकारी नौकरी को केवल सुरक्षित ठिकाना मानकर अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह रहते हैं। इस कदम ने जोन और मंडल मुख्यालय के अफसरों में हडक़ंप मचा दिया है।
वैसे यह व्यवस्था मनमोहन सरकार ने 20 वर्ष की सेवा और 50 वर्ष की आयु पूरी करने वाले दागी और काम में असमर्थ केन्द्रीय अधिकारी कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति की योजना बनाई थी। इसे मोदी सरकार भी जारी रखे हुए है। जो छत्तीसगढ़ में भी लागू हैं लेकिन दो दशकों में केवल तीन आईपीएस, 2 आईएएस को घर का रास्ता दिखाया जा सका है। हालांकि इस दौरान कई आईएएस, आईपीएस आईएफएस अफसरों को शार्ट लिस्ट किया गया था। लेकिन सभी को सरकारों का वरदहस्त मिलता रहा। कुछ आईपीएस तो जेल भी होकर आ गए हैं। लेकिन ऐसे सभी महानुभाव अब तक सेवा पर बने हुए हैं। हर साल सीआर के पिछले पन्ने पलट दिए जा रहे हैं। देखना होगा मुख्यधारा की सेवा वाले इन अफसरों का नंबर कब आएगा।
मौत का जोखिम उठाकर पर्यटन?
खल्लारी माता मंदिर 1100 फीट की ऊंचाई पर है। यहां की घुमावदार 900 सीढिय़ां चढऩा मुश्किल लगता है, इसलिए पांच साल पहले शुरू हुई यहां की रोप वे सेवा हजारों श्रद्धालुओं की पहली पसंद है। नवरात्रि जैसे मौकों पर भीड़ तो बढ़ती है, लेकिन सुरक्षा मानक ढीले रह जाते हैं।
ठीक एक साल पहले डोंगरगढ़ में बम्लेश्वरी देवी मंदिर की रोप वे में बीजेपी नेता समेत चार श्रद्धालु घायल हुए थे। उस समय भी केबल टूटने और ट्रॉली गिरने की बात सामने आई थी। इससे पहले 2021 में एक मजदूर की मौत हुई थी। यहीं पर तत्कालीन कलेक्टर संजय अग्रवाल 1 अप्रैल 2024 को चैत्र नवरात्रि की तैयारी देखने के लिए गए थे। बिजली बंद हो जाने के कारण वे रोप वे में काफी देर तक हवा में लटके रह गए।
देशभर के दूसरे स्थानों में भी यही तस्वीर है। बीते साल 2025 में गुजरात के पावागढ़ हिल पर कार्गो रोप वे के केबल टूटने से छह लोग मारे गए। 2022 में झारखंड के त्रिकुट रोप वे में दो केबल कारों की टक्कर से दो मौतें हुईं और दर्जनों श्रद्धालु घंटों फंसे रहे।
अपने राज्य के देवी मंदिरों में नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या एकाएक बढ़ जाती है। रोप वे से जाने के लिए भी लंबी कतारें लगती हैं और इनमें ओवरलोडिंग भी होती है। रविवार की घटना में 28 वर्षीया आयुषी की मौत हो गई। उनके पति ऋ षभ सहित 16 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।
सरकार ने घटना के प्रति शोक जताते हुए जांच कराने की बात की है। पर मोटे तौर पर कुछ सवाल खड़े होते हैं। क्या नवरात्रि के पहले सेफ्टी ऑडिट कराई गई? केबल, ब्रेक, सेंसर और मोटर किसी भी रोप वे के संवेदनशील हिस्से होते हैं, उन्हें क्या जांचा परखा गया?
रोप वे का संचालन निजी कंपनी या मंदिर ट्रस्ट करती हैं। अक्सर लागत को बचाने के चक्कर में पुराने या कालातीत हो चुके पार्ट्स से काम चलाया जाता है। इसलिए ऑडिट का काम, संचालन करने वाली टीम से अलग होना चाहिए। इसे एनडीआरएफ, एसडीआरएफ या सरकार से मान्यता प्राप्त विशेषज्ञों की टीम के जरिये कराया जा सकता है। कल की घटना में दूसरी ट्राली को तो सुरक्षित वापस लाया गया लेकिन पूरी रोप वे में कई ट्रॉलियां फंस जाती तो क्या होता?
मौजूदा सरकार पर्यटन विकास और खासकर मंदिरों में पर्यटन सुविधाओं के विस्तार पर खूब जोर दे रही है। बम्लेश्वरी, खल्लारी जैसे स्थल तीर्थ तो हैं ही, पर्यटन के लिहाज से भी पसंदीदा डेस्टिनेशंस हैं। यहां सुविधाएं किस तरह की है, सुरक्षा की व्यवस्था कैसी है- यह हमारे राज्य की पर्यटन संभावनाओं को प्रतिबिंबित करती हैं। पर्यटक किसी भी पर्यटन स्थल पर मौत का जोखिम उठाकर नहीं पहुंचना चाहेगा।
सभी के निशाने पर राजस्व विभाग
विधानसभा के बजट सत्र में इस बार टंकराम वर्मा सबसे ज्यादा निशाने पर रहे। खास बात यह रही कि उन्हें सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के सदस्यों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी।
सत्र के दौरान जब मंत्री वर्मा ने नसीहत भरे अंदाज में जल संसाधन और अन्य विभागों को अपनी जमीन की रक्षा करने की बात कही, तो पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दूसरे विभाग अपनी जमीन की रक्षा करेंगे, तो फिर राजस्व विभाग की भूमिका क्या रह जाएगी।वहीं भाजपा विधायक रिकेश सेन भी विभाग की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट नजर आए। उन्होंने सदन में कहा कि लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में भू-माफिया सक्रिय हैं, लेकिन राजस्व अमला निष्क्रिय बना हुआ है। उन्होंने सीधे तौर पर अमले पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए।
दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू ने विभाग में अफसरशाही का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि एक विवादित अधिकारी को हटाने के लिए वे स्वयं मंत्री से मिले थे और मंत्री ने भी सहमति जताई थी, लेकिन जब तबादला सूची जारी हुई, तो स्थिति जस की तस बनी रही।
इसके साथ ही राजस्व मामलों के निपटारे के लिए लगाए जाने वाले शिविर भी बंद होने की बात सामने आई। इन तमाम मुद्दों के चलते सदन में राजस्व मंत्री के प्रति असंतोष खुलकर दिखाई दिया, जो इस सत्र की प्रमुख राजनीतिक चर्चाओं में शामिल रहा।
इंटरनेट बंद, फिर भी पूरा बिल!
इंटरनेट की सेवा बिजली पानी की तरह जरूरी हो गई हो गई है। केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया को एक मिशन के रूप में अपना रखा है। ऑनलाइन पढ़ाई, वर्क फ्रॉम होम, यूपीआई लेन-देन तो इस सेवा पर टिका ही है आजकल दफ्तरों में हाजिरी और दूरदराज के गांवों से डेटा हासिल करने के लिए भी सरकार को इसकी जरूरत पड़ती है। ऐसे में लोकसभा में सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कंपनियों पर जवाबदेही बढ़ाने के लिए आवाज उठाई जो एक बड़ी पहल है। 2024-25 में भारत में प्रति व्यक्ति मासिक डेटा उपयोग 27.5 से 36 जीबी तक पहुंच चुका है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। यह आंकड़ा और बढ़ सकता है मगर, ग्रामीण और छोटे शहरों में तो स्थिति बदतर है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग जैसे शहरों से लेकर दूरदराज के गांवों तक उपभोक्ता हर महीने सैकड़ों रुपये फूंक रहे हैं। राशन के खर्च की तरह इंटरनेट की बिलिंग का भुगतान भी जरूरी हो चुका है। मगर टेलीकॉम कंपनियां जवाबदेह नहीं। सेवाएं ठप होने के बावजूद पूरा बिल वसूल करती हैं। बिजली-पानी की बिलिंग तो मीटर चलने के हिसाब से होती है, मगर इंटरनेट की नहीं। सांसद अग्रवाल ने ट्राई के सेवा गुणवत्ता विनियम, 2024 में संशोधन की मांग की है ताकि ब्रॉडबैंड बिलिंग बिजली मीटरिंग की तरह लागू हो। बिजली कटौती के समय मीटर रुक जाता है, चाहे कटौती एक मिनट की हो या पूरे दिन की। ऐसा इंटरनेट पर लागू क्यों नहीं होता? दुनिया के कई देशों जैसे सिंगापुर, यूके, कुछ यूरोपीय राष्ट्रों में स्वचालित क्रेडिट का प्रावधान पहले से मौजूद है, मगर भारत में यह लागू नहीं है। दरअसल, टेलीकॉम दिग्गजों का एकाधिकार इतना मजबूत है कि उपभोक्ता की शिकायतों पर ट्राई सख्ती से कार्रवाई नहीं करता। बीते साल मोबाइल प्री-पेड सेवा का शुल्क पहले जियो ने बढ़ाया, फिर एक के बाद एक दूसरी कंपनियों ने बढ़ा दिया। उपभोक्ता सवाल करते रहे कि अचानक कौन सा खर्च बढ़ गया? ट्राई भी खामोशी से देखता रहा, जबकि शुल्क को नियंत्रित करने का अधिकार उसके पास है। इधर, ब्रॉड बैंड सेवा ठप होने पर आप कॉल करते रहिये, तकनीशियन जब मर्जी आकर सुधारेंगे। व्यवधान के बदले में कोई मुआवजा नहीं, जुर्माना नहीं, कोई जवाबदेही नहीं।और अब तो 5जी के दावा किया जाता है, पर ग्राउंड रियलिटी यह है कि बुनियादी 3जी, 4जी कवरेज भी कई जगहों पर खराब है।आज इंटरनेट कोई शौक नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरत बन चुका है। बड़ी समस्या यह है कि जब इंटरनेट चलता नहीं, तब भी उसका पूरा बिल क्यों भरा जाए। सही सुझाव है कि बिजली जाती है तो मीटर रुक जाता है, वैसे ही इंटरनेट बंद होने पर बिल भी रुकना चाहिए।
बहुत कठिन है डगर तीरथ की...
स्कूलों की परीक्षाएं खत्म होते ही तीर्थ और पर्यटन स्थलों पर भीड़ उमड़ पड़ी है। लेकिन इस बार यात्रियों को राहत कम और परेशानियों का सामना ज्यादा करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत दो हैं, ट्रेनों की लगातार लेट लतीफी और गैस सिलेंडर की किल्लत।
रेल मार्ग पर यदि कोयला या आयरन ओर की खदानें पड़ती हैं, तो यात्रियों को देरी झेलना लगभग तय है। रेलवे की प्राथमिकता यात्री ट्रेनों से ज्यादा मालगाडिय़ों को समय पर पहुंचाना बन गई है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ से जगन्नाथ पुरी धाम जाने वाले यात्रियों को खासा इंतजार करना पड़ रहा है। आस्था के इस प्रमुख केंद्र के साथ-साथ यहां का समुद्र भी पर्यटकों को आकर्षित करता है, जिससे सीजन में भीड़ और बढ़ जाती है। दुर्ग-पुरी रेल मार्ग पर कई कोयला और लौह अयस्क खदानें होने के कारण यात्री ट्रेनों को बार-बार रोका जाता है, ताकि मालगाडिय़ों को रास्ता दिया जा सके। नतीजतन, दुर्ग-पुरी जैसी तेज रफ्तार ट्रेनें भी 2 से 4 घंटे की देरी से चल रही हैं।
दूसरी ओर, पुरी में ठहरना भी महंगा होता जा रहा है। होटलों के किराए बढ़ गए हैं, जिसकी एक बड़ी वजह कमर्शियल गैस की कमी बताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान-अमेरिका-इजराइल तनाव के चलते गैस सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसका असर स्थानीय बाजार तक पहुंच रहा है। होटल संचालकों को पर्याप्त गैस नहीं मिल पा रही, जिससे वे लकड़ी के चूल्हे या इंडक्शन पर निर्भर हो गए हैं। इन तमाम परिस्थितियों ने यात्रा को न सिर्फ थकाऊ बना दिया है, बल्कि खर्च भी काफी बढ़ा दिया है। यात्रियों के लिए इस बार की तीर्थयात्रा आस्था से ज्यादा धैर्य की परीक्षा बनती दिख रही है। इसलिए तो कहा जाता है कि तीर्थ यात्रा कठिन होती है।
हरियाली का शॉर्टकट, सेहत पर संकट
छत्तीसगढ़ विधानसभा में कल एक ऐसा मुद्दा उठा जो पर्यावरण और स्वास्थ्य पर सीधे असर करता है। प्राय: ऐसे विषय सदन के शोर में दब जाते हैं। मगर, इस बार रायपुर पश्चिम के भाजपा विधायक सुनील सोनी ने छातिम वृक्ष जिसे सप्तवर्णी या अल्स्टोनिया स्कॉलरिस कहते हैं, के रायपुर में बड़े पैमाने पर रोपे जाने पर सवाल उठाया।
रायपुर में छातिम के पेड़ साइंस कॉलेज से रोहिणीपुरम चौक तक की सडक़, हाईवे और डिवाइडरों पर लगाए गए थे। नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत हजारों पौधे रोपे गए। शहरों को स्मार्ट बनाने के नाम पर आसान रास्ता अपनाया गया। खूबसूरत सफेद फूल वाले, तेजी से बढऩे वाले और घनी छाया देने वाले पेड़। प्रदूषण नियंत्रण का दावा भी किया गया। लेकिन अफसरों ने अन्य राज्यों के अध्ययनों की ओर ध्यान नहीं दिया। वैसे यह पेड़ प्रदूषण सहन करने में सक्षम है, लेकिन इसके फूलों से निकलने वाला परागकण और तेज गंध अस्थमा, साइनस, श्वसन संक्रमण और एलर्जी का बड़ा कारण बन गया है। कोलकाता, नोएडा और मध्य प्रदेश के कई शहरों में यही अनुभव रहा। पश्चिम बंगाल में यह राज्य वृक्ष है, फिर भी नगर निगम ने नया रोपण बंद कर दिया है। वहां लाखों पौधे रोपे गए थे। कुछ साल पहले एक चक्रवात आया तो पराग साफ होने पर लोगों को राहत मिली। नोएडा के कई सेक्टरों में निवासियों ने इतनी शिकायतें कीं कि रोपण पर रोक लगानी पड़ी। मध्य प्रदेश ने तो पूरे राज्य में छातिम और एक अन्य वृक्ष कोनोकार्पस पर प्रतिबंध लगा रखा है।
इधर, पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी का जवाब अफसरों से तैयार किया गया लगा। जवाब में अन्य राज्यों में पड़े प्रभावों की जानकारी नहीं दी गई या अधूरी रखी गई। जबकि इस पर कई वैज्ञानिक शोध मौजूद हैं। इसके पराग से चूहों के मॉडल में अस्थमा जैसी सूजन होती है, कोलकाता के अध्ययन में 28 प्रतिशत एलर्जिक मरीजों में पॉजिटिव रिएक्शन देखने को मिला।
बेशक, औषधि की दृष्टि से यह पेड़ उत्कृष्ट है। इसकी छाल और पत्तियों में एंटी-अस्थमा, मलेरिया-रोधी गुण हैं। लेकिन शहर के बीचों-बीच हजारों की संख्या में लगाना और जगह-जगह फूल खिलाना अलग बात है। कहां लगाएं, कितनी संख्या में लगाएं, यह देखना जरूरी हो जाता है।
रायपुर को देश के सबसे प्रदूषित शहरों में गिना जाता रहा है। धूल के स्तर ने स्वास्थ्य को पहले ही चुनौती दी हुई है। ऐसे में एक और एलर्जी का कारक जोडऩा गलती है। स्मार्ट सिटी के अफसरों को लगता था कि तेज बढऩे वाला पेड़ तुरंत हरियाली ला देगा। अब जब विधानसभा में मुद्दा उठा है तो मंत्री ने भविष्य में छातिम पौधे नहीं लगाने का संकेत दिया है। पर विकल्प क्या होगा, इस पर भी बात होनी चाहिए। नीम, पीपल, बरगद, अमलतास, अर्जुन और जामुन जैसे पेड़ एपीटीआई यानि एयर पॉल्यूशन टॉरलेंस इंडेक्स में ऊंचा स्थान रखते हैं। ये प्रदूषण सोखते हैं, धूल पकड़ते हैं, छाया देते हैं और एलर्जी नहीं फैलाते। छत्तीसगढ़ की जलवायु में ये स्वाभाविक रूप से फलते-फूलते हैं। नीम तो कीट-नाशक भी है। पीपल ऑक्सीजन का खजाना है। छातिम हटाकर ये लगाए जाएं तो सिर्फ स्वास्थ्य नहीं सुधरेगा, बल्कि देर से सही हरियाली भी आएगी।
आंदोलनों को बड़ी चुनौती
नवा रायपुर में विधानसभा शिफ्ट होने के बाद उसके घेराव की परंपरा लगभग खत्म होती नजर आ रही है। पहले शहर के करीब स्थित पुराने विधानसभा भवन के कारण सत्र के दौरान राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों द्वारा लगातार प्रदर्शन और घेराव होते थे। इन आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
नया विधानसभा भवन शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है, जिससे वहां तक पहुंचकर धरना-प्रदर्शन करना आसान नहीं रह गया है। हाल ही में कांग्रेस ने अफीम कांड, गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों सहित कई मुद्दों पर विधानसभा घेराव का ऐलान किया था, लेकिन कार्यकर्ता शहर की सीमा से बाहर ही नहीं निकल पाए और प्रदर्शन शांति नगर के भारत माता चौक तक सिमट कर रह गया।
इसके उलट, पिछली सरकार के दौरान पुराने विधानसभा के पास भीम आर्मी के कार्यकर्ता निर्वस्त्र प्रदर्शन तक कर चुके थे, जिससे आंदोलनों की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं, हाल में तूता में अनशन कर रहे डीएड अभ्यर्थियों ने भी अवकाश के दिन विधानसभा घेराव की घोषणा की थी, लेकिन वे भी विधानसभा परिसर के आसपास तक नहीं पहुंच सके।
दरअसल, नवा रायपुर की भौगोलिक स्थिति भी आंदोलनों के लिए चुनौतीपूर्ण है। विधानसभा के आसपास कई किलोमीटर तक सुनसान सडक़ें हैं और चाय-पानी या ठहरने की सुविधाएं भी दूर-दूर तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों के लिए वहां जुटना और टिकना मुश्किल हो जाता है, जबकि पुलिस के लिए उन्हें नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया।
नवा रायपुर में विधानसभा शिफ्ट होने के बाद उसके घेराव की परंपरा लगभग खत्म होती नजर आ रही है। पहले शहर के करीब स्थित पुराने विधानसभा भवन के कारण सत्र के दौरान राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों द्वारा लगातार प्रदर्शन और घेराव होते थे। इन आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
नया विधानसभा भवन शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है, जिससे वहां तक पहुंचकर धरना-प्रदर्शन करना आसान नहीं रह गया है। हाल ही में कांग्रेस ने अफीम कांड, गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों सहित कई मुद्दों पर विधानसभा घेराव का ऐलान किया था, लेकिन कार्यकर्ता शहर की सीमा से बाहर ही नहीं निकल पाए और प्रदर्शन शांति नगर के भारत माता चौक तक सिमट कर रह गया।
इसके उलट, पिछली सरकार के दौरान पुराने विधानसभा के पास भीम आर्मी के कार्यकर्ता निर्वस्त्र प्रदर्शन तक कर चुके थे, जिससे आंदोलनों की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं, हाल में तूता में अनशन कर रहे डीएड अभ्यर्थियों ने भी अवकाश के दिन विधानसभा घेराव की घोषणा की थी, लेकिन वे भी विधानसभा परिसर के आसपास तक नहीं पहुंच सके।
दरअसल, नवा रायपुर की भौगोलिक स्थिति भी आंदोलनों के लिए चुनौतीपूर्ण है। विधानसभा के आसपास कई किलोमीटर तक सुनसान सडक़ें हैं और चाय-पानी या ठहरने की सुविधाएं भी दूर-दूर तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों के लिए वहां जुटना और टिकना मुश्किल हो जाता है, जबकि पुलिस के लिए उन्हें नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया।एक आईजी की प्रतिनियुक्ति बढ़ी,
दूसरे जाने की तैयारी में
छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर अभिषेक पाठक की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति एक वर्ष के लिए बढ़ा दी गई है। 2004 बैच के अफसर पाठक, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में आईजी पदस्थ हैं। उनके कार्यकाल में 10 मार्च 26 या आगामी आदेश तक वृद्धि की गई है। यहां बता दें कि इन्हें मिलाकर छत्तीसगढ़ कैडर के आठ आईपीएस केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। राज्य का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति कोटा 31 अफसरों का है। यानी अभी और अफसरों के दिल्ली जाने के अवसर हैं।
वैसे हाल में डीआईजी संतोष कुमार सिंह की भी प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी किए गए हैं। और आने वाले अप्रैल में एक और आईजी के जाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में हैं। उनके केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो आईबी में जाने की चर्चा है। वे कुछ वर्ष पहले ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे हैं।
विधानसभा में प्रदर्शन
विधानसभा के बजट सत्र का शुक्रवार को समापन हो गया। विभागों की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान विपक्ष के पास सरकार को घेरने और अपनी बात मजबूती से रखने का अच्छा अवसर था, लेकिन वह इसका पूरा लाभ नहीं उठा सका। स्थिति यह रही कि मुख्यमंत्री के विभागों की अनुदान मांगें विपक्ष की गैरमौजूदगी में ही पारित हो गईं।
सत्र के दौरान सत्ता पक्ष के सुशांत शुक्ला और विपक्ष की चातुरी नंद का प्रदर्शन वरिष्ठ सदस्यों की तुलना में अधिक प्रभावी रहा। दोनों ही पहली बार विधायक बनकर सदन में पहुंचे हैं, लेकिन उनकी सक्रियता ने खासा ध्यान खींचा।
सुशांत शुक्ला सत्ता पक्ष के 'ओपनर बल्लेबाज' की तरह नजर आए। उन्होंने विपक्ष के हमलों का जवाब उसी अंदाज में दिया और कई मौकों पर अपनी ही सरकार के मंत्रियों को घेरकर मुद्दों पर निर्णय कराने में सफल रहे।
वहीं, कांग्रेस की महिला विधायक चातुरी नंद ने गोदावरी पावर को सोलर प्लांट के लिए दो सौ एकड़ से अधिक जमीन कौडिय़ों के दाम पर आवंटित करने के मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उनके सवालों के बाद सरकार ने कलेक्टर से जांच कर रिपोर्ट मांगी है। अनुसूचित जाति वर्ग के गाड़ा समाज से आने वाली चातुरी नंद अपने क्षेत्र सरायपाली में अवैध शराब के खिलाफ मुखर रहीं और इसी सक्रियता के दम पर विधानसभा तक पहुंचीं। उन्हें उत्कृष्ट विधायक का सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा पहली बार के विधायक ओमकार साहू, भाजपा की शकुंतला पोर्ते, कविता प्राण लहरे और अनुज शर्मा का प्रदर्शन भी सराहनीय रहा।
दिल्ली में हाई प्रोफाइल छत्तीसगढ़
केंद्र सरकार ने कल प्रतिनियुक्ति पर एक अहम पोस्टिंग की। छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस डॉ. रवि मित्तल को देश चलाने वाले प्रधानमंत्री कार्यालय में उप सचिव नियुक्त किया है। रजत जयंती वर्ष मना रहे छत्तीसगढ़ के अब तक के प्रशासनिक इतिहास में वे तीसरे अफसर हैं जो पीएमओ में सेवा देंगे। सबसे पहले रिटायर्ड आईएएस बीवीआर सुब्रमण्यम रहे। उनके साथ एक रिकार्ड यह भी रहा कि पीएमओ में लंबे समय तक रहे। बीवीआर ने दो दो प्रधानमंत्री पहले मनमोहन सिंह ,फिर नरेंद्र मोदी के साथ काम किया। वे धारा 370 हटने के बाद बने पृथक जम्मू कश्मीर के पहले मुख्य सचिव भी रहे।उनके बाद डा रोहित यादव पदस्थ रहे। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति खत्म कर यादव पीएमओ से ही छत्तीसगढ़ लौटे थे। इनके बाद अब डा मित्तल पीएमओ जा रहे। वैसे यहां यह बताना भी उचित होगा कि इस ढाई दशक में छत्तीसगढ़ के कई वरिष्ठ आईएएस अफसरों ने केंद्र में कई अहम विभागों में काम किया। सुनील कुमार, दिवंगत अर्जुन सिंह के साथ केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय, शिवराज सिंह पेट्रोलियम मंत्रालय एन बैजेंद्र कुमार एम्स दिल्ली और संयुक्त सचिव सूचना प्रसारण मंत्रालय, निधि छिब्बर पहले रक्षा मंत्रालय फिर सीबीएसई अध्यक्ष अब नीति आयोग में, अमित अग्रवाल सीईओ आधार प्राधिकरण में हैं। गौरव द्विवेदी प्रसार भारती में सीईओ हैं। ऋचा शर्मा एडिशनल सेक्रेटरी, सुबोध सिंह प्रतियोगी परीक्षा कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के महानिदेशक पद से लौटे।
नीरज बंसोड़ गृहमंत्री अमित शाह के प्राइवेट सेक्रेटरी के पद पर हैं। निधि, अमित और ऋचा तो केंद्र में सचिव बनने की कतार में हैं। यदि आईपीएस अफसरों की ऐसी ही राष्ट्रीय हाईप्रोफाइल पोस्टिंग पर देखें तो रवि सिन्हा दो दशक तक रॉ में रहे और इस सबसे बड़ी सुरक्षा एजेंसी के चीफ पद से रिटायर हुए। इनसे पहले हाल में दिवंगत विश्वरंजन भी केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी में संयुक्त निदेशक रहने के बाद छत्तीसगढ़ में डीजीपी के पद पर लौटे। वहीं स्वागत दास भी केंद्रीय गृह मंत्रालय में आंतरिक सुरक्षा सचिव रहे। राज्य गठन के बाद से ही वे दिल्ली में रहे और रिटायर हुए। तो अमित कुमार भी 10 वर्ष तक सीबीआई में रहे और स्पेशल डायरेक्टर पद से लौटे।
वहीं तीसरे अभा सेवा वाले आईएफएस कैडर में ऐसी राष्ट्रीय पोस्टिंग के अफसर एक भी नहीं है। संजय ओझा केन्द्र सरकार में रहे लेकिन डायरेक्टर तक ही पहुंच पाए।
बिना होली मिलन के निपट गया सत्र
विधानसभा के बजट सत्र के बीच पडऩे वाले होली पर्व की रौनक इस बार फीकी रही। परंपरा के अनुसार होली अवकाश से पहले विधानसभा परिसर में विधायक क्लब का रंगारंग होली मिलन समारोह आयोजित होता था, जहां सत्ता और विपक्ष के सदस्य रंग-गुलाल के साथ एक-दूसरे से मिलते थे। लेकिन इस बार ऐसा कोई आयोजन नहीं हो सका।
बताया जाता है कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह को स्पाइन सर्जरी के लिए कोयम्बतूर जाना पड़ा, जिसके चलते कार्यक्रम को टाल दिया गया। बाद में यह सहमति बनी कि उनके लौटने के बाद रंग पंचमी के आसपास आयोजन किया जाएगा। संस्कृति संचालनालय ने इसके इंतजाम भी कर रखे थे। तिथियों में कई बार बदलाव हुआ और 17-18 मार्च से बढ़ाकर 19 मार्च तक विचार किया गया,लेकिन 19 मार्च को चैत्र नवरात्र की शुरुआत होने के कारण अंतत: होली मिलन समारोह निरस्त कर दिया गया।
इधर, रमजान पर राजनीतिक इफ्तार पार्टियों की भी इस बार कमी रही। आमतौर पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता मुस्लिम समाज के लिए इफ्तार का आयोजन करते रहे हैं, लेकिन इस बार केवल अमित जोगी ने ही इफ्तार पार्टी दी। वक्फ बोर्ड के चेयरमैन डॉ. सलीम राज भी इस बार आयोजन से दूर रहे। भाजपा शासन काल में वे ही मुख्य आयोजक होते हैं। इफ्तार के लिए आधे घंटे पहले दफ्तरों से छुट्टी के विवाद में फंसने की वजह से आयोजन से दूर रहना मुनासिब समझा।
इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को भी एक कारण माना जा रहा है। अयातुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु की खबरों के चलते शिया समुदाय में शोक का माहौल बताया जा रहा है, जिसका असर स्थानीय स्तर पर भी पड़ा। हालांकि, मुस्लिम संगठन 'हुसैनी सेना’ द्वारा सुभाष स्टेडियम में एक इफ्तार पार्टी आयोजित की गई, जिसमें कांग्रेस और भाजपा के कई नेताओं ने शिरकत की।
सोशल मीडिया पर जुगाड़ चूल्हे की चर्चा
देशभर में एलपीजी सिलेंडर की कमी से जहां छोटे कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ी हैं, वहीं कुछ लोगों ने हार मानने के बजाय रास्ता खुद बना लिया है। जगदलपुर के एक रेस्टोरेंट संचालक ने ऐसा ही देसी जुगाड़ तैयार किया है, जिसकी सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है।
तस्वीर में दिख रहा यह खास चूल्हा पूरी तरह स्थानीय संसाधनों से तैयार किया गया है। इसमें बीच में कोयला डालने की व्यवस्था है, जबकि नीचे बने दो अलग-अलग होल में लकड़ी के टुकड़े जलाए जाते हैं। इस डिजाइन की खासियत यह है कि एक साथ दो काम किए जा सकते हैं। एक तरफ डोसा तैयार होगा, तो दूसरी तरफ बड़ा।
गैस मिले या न मिले, लेकिन रोजी-रोटी नहीं रुकनी चाहिए। यह सोच इस इनोवेशन के पीछे झलक रही है।
टरकाना या भरमाना?
विधानसभा में इन दिनों मंत्रियों के जवाबों की शैली खुद चर्चा का विषय बनी हुई है। कई मौकों पर ऐसे जवाब सामने आते हैं, जिन्हें सदस्य ‘टरकाने वाला’ मानते हैं। खास तौर पर ‘दिखवा लेंगे’ या दिखवा लेंगे अलग से उपलब्ध करा देंगे जैसे जवाबों ने सदन की गंभीरता पर सवाल खड़े किए हैं।
‘दिखवा लेंगे’ वाला जुमला कोई नया नहीं है। विधानसभा के पहले कार्यकाल में तत्कालीन पंचायत मंत्री अमितेश शुक्ल अक्सर इसका इस्तेमाल किया करते थे। किसी मामले में सीधे जांच के आदेश देने से बचते हुए वे इस तरह के जवाब देकर स्थिति संभालने की कोशिश करते थे। एक बार भाजपा सदस्य चोवा दास खांडेकर ने जब गड़बड़ी की जांच की मांग की, तो ‘दिखवा लेंगे’ कहकर बात टालने की कोशिश की गई। इस पर सदस्य नाराज हो गए और उन्होंने साफ पूछा कि इसका मतलब क्या है—जांच होगी या नहीं? मामला बढ़ता देख तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ल को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने स्पष्ट कराया कि प्रकरण की जांच कराई जाएगी।
समय के साथ यह जुमला कम जरूर हुआ, लेकिन अब उसकी जगह एक नया तरीका देखने को मिल रहा है—अलग से दस्तावेज उपलब्ध करा देंगे। मौजूदा सत्र में कई मंत्री अधूरे जवाबों के साथ यही आश्वासन देते नजर आए हैं।
इस पर सत्ता पक्ष के ही वरिष्ठ सदस्य अजय चंद्राकर ने सवाल खड़े करते हुए कहा कि मंत्री लिखित जानकारी देने की बात तो करते हैं, लेकिन हकीकत में बाद में दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाते। विपक्ष ने भी इस पर सहमति जताई और कई जवाबों को गलत या अधूरा बताया।
कुल मिलाकर, इस सत्र में ज्यादातर मंत्रियों के जवाबों का स्तर संतोषजनक नहीं माना जा रहा। सदन के भीतर यह धारणा बनती दिख रही है कि जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो संसदीय परंपराओं के लिहाज से चिंता का विषय है।
देवी दरबारों में एलपीजी संकट

देशभर में आज से चैत्र नवरात्रि का महापर्व शुरू हो गया है। देवी मंदिरों में नौ शक्तियों की आराधना हो रही है। हवन-पूजन के साथ-साथ इनके लिए ईंधन की भारी मात्रा जरूरी होती है। प्राय: सभी मंदिरों में भंडारा खोले जाते हैं, जिनमें हजारों-लाखों लोगों के लिए भोजन, खिचड़ी, हलवा, पूरी सब्जी तैयार किए जाते हैं। ईरान-अमेरिका (इजरायल) के बीच चल रहे महायुद्ध का देशभर के देवी मंदिरों में असर दिख रहा है। एलपीजी सिलेंडर का दाम 60 से 115 रुपये तक युद्ध के शुरुआती दिनों में ही बढ़ गया था। मगर, युद्ध लंबा खिंचने के कारण इसकी आपूर्ति भी बाधित हो गई है। देश के कुछ बड़े मंदिरों में इसका क्या असर हुआ है, इसकी जानकारी जुटाने से दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। टीटीडी, यानि तिरुमाला देवस्थानम् में रोजाना 6 टन एलपीजी की खपत होती है। युद्ध के पहले ही यहां इतना रिजर्व रख लिया गया कि आने वाले दिनों में भंडारा बिना रुकावट चालू रहे। श्री माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड ने भी लंगर सेवा जारी रखने के लिए स्टाक बढ़ाया। बोर्ड की ओर से बयान दिया गया कि भंडारा तैयार करने के लिए व्यवस्था मजबूत कर ली गई है। मगर, पंचकुला स्थित मनसा देवी मंदिर में एलपीजी की किल्लत के चलते भंडारे का रोटी बनाना बंद कर दिया गया है। कहा गया है कि व्यवस्था दुबारा पहले जैसी करने का प्रयास किया जा रहा है। अयोध्या की राम रसोई में भंडारे का समय सीमित कर दिया गया है। यहां इंडक्शन स्टोव, इलेक्ट्रिक कुकर और स्टीम बेस्ड कुकिंग की जा रही है। कुछ अन्य देवी मंदिरों में कामाख्या, कालीघाट, विंध्यवासिनी आदि में भी भंडारे की मात्रा या वितरण के समय में कटौती की गई है।
अब छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध देवी मंदिरों का हाल भी जान लें। रतनपुर स्थित महामाया मंदिर प्रबंधन की ओर से कहा गया है कि प्रसाद और भंडारा जारी रहेगा लेकिन एलपीजी संकट को देखते हुए रोटी-सब्जी की जगह सादी खिचड़ी या फल-मिठाई पर फोकस किया जाएगा। डोंगरगढ़ का भंडारा भी ईंधन संकट से प्रभावित है। यहां भी इंडक्शन-इलेक्ट्रिक कुकर तथा बायोगैस का उपयोग बढ़ाया गया है। दंतेश्वरी मंदिर में भंडारे की व्यवस्था सुचारू रखने के लिए लकड़ी कोयला और डीजल का विकल्प अपनाया है। चंद्रहासिनी देवी मंदिर में भी भंडारे का समय कम किया गया और प्रसाद की मात्रा घटाई गई है।
मंत्रालय में अब-अन्ना, एक प्लेट इडली नहीं...
1 अप्रैल से छत्तीसगढ़ मंत्रालय के गलियारों में अन्ना एक मसाला डोसा,एक प्लेट इडली, के साथ एक स्ट्रांग या फिल्टर काफी की गूंज सुनाई नहीं देगा।
इंडियन कॉफी हाउस का सांबर बड़ा, उपमा, उत्तपम,नहीं मिलेगा। हम अभी से अप्रैल फूल वाली खबर नहीं, सही खबर दे रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि काफी हाउस वाले , ये बनाना या सर्व करना बंद कर रहे हैं,बल्कि वहां अब काफी हाउस ही नहीं रहेगा।
सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्रालय अधीक्षण शाखा ने नए रेस्टोरेंट के लिए टेंडर जारी कर दिया है जिसकी चयन प्रक्रिया अंतिम चरण में है। 1 अप्रैल से किसी नए होटल समूह को कैंटीन संचालन का ठेका मिल जाएगा। हालांकि ऐसा पहले भी हो चुका था। राज्य गठन के बाद से डीकेएस मंत्रालय भवन में इंडियन कॉफी हाउस का कैंटीन संचालित होता रहा। लेकिन महानदी भवन शुरू होते ही काफी हाउस के बजाय अन्य होटल संचालक को दिया। जहां न केवल महंगे बल्कि व्यंजन स्वादानुसार न परोसने की शिकायतें आम रहीं । 2012 में मुख्य सचिव रहे सुनील कुमार की पहल पर पुन: केरल की कॉफी की चुस्की मिलने लगी। इंडियन काफी हाउस एक सहकारी समिति द्वारा संचालित रेस्टोरेंट समूह है, जो रियायती दरों में सेवा प्रदाता है। अब तक इसे लेकर कोई शिकायत नहीं सुनाई देती। कॉफी हाउस मतलब स्वाद और ताजा होने की गारंटी भी, देश में भर दी जा रही गारंटियों से कहीं अधिक विश्वसनीय।
बहरहाल महानदी भवन में कॉफी हाउस की विदाई की खबर बताने और सुनने वाले यह भी कह रहे जल्द वापस भी आएगा। जैसे विधानसभा में हुआ। जहां बड़े प्रॉफिट की उम्मीद से खुला रेस्टोरेंट बढ़ती लागत से बंद हो गया। सो जो होगा अच्छा होगा।
दल-बदल वालों का समायोजन
प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी सूची कई मायनों में राजनीतिक संदेश देती नजर आ रही है। इस जंबो सूची में न सिर्फ पार्टी के पुराने चेहरों को जगह मिली है, बल्कि कांग्रेस से आए नेताओं और रिटायर्ड अफसरों को भी संगठन में अहम जिम्मेदारी देकर संतुलन साधने की कोशिश की गई है। सबसे चौंकाने वाला नाम पूर्व राज्यपाल रमेश बैस का है, जिन्हें प्रदेश कार्यसमिति में स्थान दिया गया है।
सूची में पूर्व महापौर वाणी राव, पूर्व मंत्री विधान मिश्रा, चंद्रशेखर शुक्ला और बसपा से आई पूर्व विधायक कामदा जोल्हे जैसे नेताओं को स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। ये सभी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए थे, जिससे साफ है कि पार्टी दल-बदल कर आए नेताओं को भी संगठन में समायोजित करने की रणनीति पर काम कर रही है।
इसी कड़ी में पूर्व आईएएस अफसर आरपीएस त्यागी और पूर्व आईएफएस एसएसडी बडग़ैय्या को भी प्रदेश कार्यकारिणी में जगह दी गई है। त्यागी पहले कांग्रेस से भी जुड़े रहे, लेकिन वहां अपेक्षित भूमिका न मिलने के बाद भाजपा में आ गए और अब संगठन में उन्हें स्थान मिल गया है। वहीं बडग़ैय्या रिटायरमेंट के बाद भाजपा में सक्रिय रहे। लोरमी से टिकट की दावेदारी के बावजूद मौका नहीं मिला, लेकिन संगठन में उनकी सक्रियता का लाभ अब उन्हें कार्यकारिणी में जगह के रूप में मिला है। कुल मिलाकर, भाजपा की यह कार्यकारिणी सूची राजनीतिक संतुलन, विस्तार और नए-पुराने चेहरों के समन्वय की रणनीति को दर्शाती है।
धान का कटोरे में अफीम का जाल
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहते हैं , लेकिन दुर्ग और बलरामपुर जैसे जिलों में हुई छापेमारी से पता चलता है कि यहां धान के मुकाबले हजारों गुना अधिक मुनाफा देने वाले अफीम की भी चोरी-छिपे खेती हो रही है। लेकिन इस छापेमारी के बाद एक नई बहस फिर सामने आ गई है। क्या अफीम की खेती को वैध कर देना चाहिए? ऐसा किया गया तो किसानों को आमदनी का नया स्रोत मिलेगा और अवैध कारोबार पर लगाम लगेगी। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में नियंत्रित लाइसेंस के तहत अफीम की खेती होती भी है, जिससे दवा उद्योग को कच्चा माल मिलता है। देश में करीब 22 जिले हैं जहां अफीम की खेती की जाती है पर लाइसेंस जारी करने के बाद ही यह छूट मिलती है। माना जाता है कि वैध खेती से भी अफीम का एक हिस्सा काले बाजार में पहुंच जाता है। सीमित लाइसेंस के बाद भी अन्य राज्यों में सरकार पूरी तरह निगरानी नहीं रख पा रही है। छत्तीसगढ़ में भी ऐसी ही समस्या सामने आ सकती है। पहले से ही शराब की घोर बिक्री और गांजे की भरपूर तस्करी वाले राज्य में नशे का एक नया कारोबार शुरू हो जाएगा। नशे के कारण होने वाले अपराध भी और बढ़ जाएंगे।
अफीम अपने मूल स्वरूप में थोड़ी सस्ती है पर उससे बनने वाली हेरोइन बेहद महंगे और खतरनाक हैं। अमेरिका जैसे देश ओपिओइड संकट से जूझ रहे हैं और लाखों लोग लत के शिकार हो रहे हैं। अपने यहां एक कटु सत्य की चर्चा होती है कि सरकारी राशन, खासकर चावल को बेचकर कुछ लोग शराब की तलब पूरी कर रहे हैं। मगर, अफीम से यह मुमकिन नहीं होगा। दवाओं के नाम मिलने वाले लाइसेंस का दुरुपयोग जरूर कुछ लोगों को मालामाल बना देगा।
पार्षद बनने का इंतजार
सरकारी उपक्रमों और संगठन के सभी मोर्चा प्रकोष्ठों में सभी तरह की नियुक्तियां हो चुकी हैं। इनमें नियुक्ति से बचे देवतुल्य कार्यकर्ता अब राजनीति की पहली सीढ़ी कहे जाने वाले मनोनीत पार्षद पद पर नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ नगर निगम/पालिका अधिनियम 1956 की धारा-9 के तहत नगरीय निकायों में एल्डरमैन और दिव्यांग मनोनीत सदस्य नियुक्त किए जाते है। निगमों में आठ, पालिकाओं में पांच और नगर पंचायतों में तीन एल्डरमैन नियुक्त किए जाते हैं। ये भले चुनकर न सही, मनोनीत होकर भी पार्षद के रूप में कथित जनसेवा कर सकते हैं। प्रदेश के 10 निगमों में 80, 49 पालिकाओं में 245 और 114 नगर पंचायतों 342 एल्डरमैनों की नियुक्ति की जानी है। इस प्रकार प्रदेश में कुल 667 कार्यकर्ता एल्डरमैन बन सकते हैं। अब देखना होगा कि सरकार इनकी नियुक्ति कब तक होती है।
वैसे सभी निर्वाचित निकायों का एक साल हो गया है। और कई में तो उपचुनाव की भी तैयारी है। यानी स्पष्ट है कि उप चुनाव तक तो इंतजार करना होगा। सरकार में और सरकार के निगम-मंडल, आयोग- प्राधिकरणों में जमीन पर संघर्षशील नहीं लेकिन संगठन के बड़े नेताओं, मंत्रियों की परिक्रमा करने वाले पद पाने में सफल रहे । देवतुल्य कार्यकर्ता को अब तक सिर्फ इंतजार कर रहे हैं।
वैसे बता दें कि पिछली सरकार ने भी दो वर्ष बाद में नियुक्ति की थी। संभव हो परंपरा बनी रही।
स्वागत के तरीके में बदलाव की कोशिश
2019 बैच की महाराष्ट्र कैडर की आईएएस अधिकारी मीनल करनवाल ने जिला पंचायत नांदेड़ के सीईओ पद का कार्यभार संभालने के दौरान स्वागत की संस्कृति में बदलाव की कोशिश की। जहां आमतौर पर अधिकारियों को गुलदस्ते और बुके भेंट किए जाते हैं, वहीं उन्होंने कहा कि मुझे रजिस्टर, कॉपियां, पेन, पेंसिल, स्केच पेन और जियोमेट्री बॉक्स जैसे सामान भेंट करें। करनवाल ने इन उपहारों को जिले के सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचा दिया।
किस-किस ने फव्वारे पर उन बच्चों की मूर्ति देखी है?
छत्तीसगढ़ के एक सबसे पुराने न्यूज-फोटोग्राफर, गोकुल सोनी जो आज भी सक्रिय हैं, उन्होंने रायपुर को ‘खूबसूरत’ं बनाने के सरकारी नज़रिए के बारे में लिखा है. आज उन्होंने फेसबुक पर दो तस्वीरें पोस्ट की हैं, और कहा है- साथियो, आज जो आप ये दो तस्वीरें देख रहे हैं, उनके पीछे सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे शहर की यादों, इतिहास और लापरवाही का पूरा किस्सा छिपा हुआ है।
पहली तस्वीर आजादी से पहले की है—कोतवाली चौक के पास की। उस समय वहाँ एक बड़ी गोल पानी की टंकी हुआ करती थी, जिसके बीचों-बीच एक खूबसूरत फव्वारा लगा था। और उस फव्वारे के केंद्र में थी दो बच्चों की बेहद प्यारी मूर्ति। जब फव्वारा चलता था, तो ऐसा लगता था मानो वे दोनों बच्चे खुशी-खुशी पानी में नहा रहे हों—जैसे बचपन खुद मुस्कुरा रहा हो। समय बदला और किसी कारणवश वह फव्वारा वहाँ से हटा दिया गया। लेकिन उन बच्चों की मूर्ति को बचाकर मोतीबाग में स्थापित कर दिया गया (दूसरी तस्वीर)। हम जैसे कई लोगों का बचपन उन मूर्तियों को पानी में नहाते हुए देखते-देखते बीता है।
फिर आया शहर को सुंदर बनाने का दौर, और यहीं से असली कहानी शुरू होती है। शहर सजाने की जिम्मेदारी जिनके हाथों में थी, उन्होंने शायद ‘सुंदरता’ं का मतलब कुछ ज्यादा ही आधुनिक तरीके से समझ लिया। धीरे-धीरे पुरानी धरोहरें हटती गईं और उनकी जगह ले ली ‘मीना बाजार’ जैसी सजावट ने। और उसी क्रम में, उन दो मासूम बच्चों की ऐतिहासिक मूर्ति भी ‘सजावट के बोझ’ में कहीं गायब हो गई। कहाँ गई? किसी को नहीं पता। शायद किसी कोने में या फिर कचरे में!
जहाँ इतिहास को संभालकर रखा जाना चाहिए था, वहाँ उसे अनावश्यक सामान समझकर हटा दिया गया। आज शायद ही कोई फेसबुक मित्र होगा जिसने कोतवाली चौक का वह पुराना फव्वारा देखा हो—क्योंकि बात आजादी से पहले की है। जिनसे मैंने यह तस्वीर प्राप्त की, वे प्रदेश के बहुत पुराने फोटोग्राफर गोडबोले जी थे। यह तस्वीर उनके पिताजी ने खींची थी। कभी-कभी लगता है कि हमारे शहर के कुछ जिम्मेदार लोग इतिहास को संभालने नहीं, बल्कि साफ करने के मिशन पर थे—जैसे पुरानी चीजें नहीं, कोई फालतू फाइलें हों जिन्हें हटाकर जगह खाली करनी हो।
खैर यह सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसी न जाने कितनी धरोहरें चुपचाप हमसे छिन गईं, और हमें पता भी नहीं चला। आपमें से किस-किस ने मोतीबाग वाले फव्वारे पर उन बच्चों की मूर्ति को देखा है? अपनी यादें जरूर साझा करें...
माओवाद के अंत में सिर्फ 13 दिन बाकी?
आज 17 मार्च है। बस्तर से माओवाद के खात्मे के लिए तय डेडलाइन 31 मार्च में अब सिर्फ 13 दिन बाकी रह गए हैं। बस्तर माओवादियों के रेड कॉरिडोर की सबसे मजबूत कड़ी था। अब यह निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। पहली बार केंद्र सरकार ने माओवादी हिंसा को पूरी तरह खत्म करने के लिए समयसीमा तय की और उसी के अनुरूप सुरक्षा बलों ने रणनीति, संसाधन और ऑपरेशन के स्तर पर तालमेल दिखाया है।
फरवरी 2025 में गृह मंत्री अमित शाह ने यह डेडलाइन घोषित की थी। इसके बाद सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ तेलंगाना की स्पेशल इंटेलिजेंस यूनिट ने मिलकर बस्तर के सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और दंतेवाड़ा के ऐसे कठिन इलाकों में घुसकर वह काम किया, जो दशकों तक संभव नहीं हो पाया था। अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस स्थापित भी किया गया।
इसके अलावा आधुनिक हथियार मोर्टार, यूबीजीएल, एके-47, ड्रोन, थर्मल इमेजर के साथ इंटेलिजेंस नेटवर्क को मजबूत किया गया। इसके चलते ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को अधिक नुकसान नहीं उठाना पड़ा। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट ने माओवादियों को उनके सुरक्षित ठिकानों से बाहर निकलने और सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया। अब हजारों की संख्या में माओवादी हथियार डाल चुके हैं।
इसी दौरान कई दुर्गम इलाकों में सडक़ें बनीं, मोबाइल टावर पहुंचे। जिन गांवों में पहले शासन का कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा था, वहां अब लोगों की समस्याओं को सुना जा रहा है। इससे स्थानीय युवाओं का सरकार पर भरोसा बढ़ा और माओवादी भर्ती पर असर पड़ा। डेडलाइन की घोषणा के बाद हिंसा की घटनाओं और मौतों में 80-85 प्रतिशत तक गिरावट बताई जा रही है। संगठन का शीर्ष नेतृत्व या तो खत्म हो चुका है या लगातार भाग रहा है।
अब सवाल सिर्फ इतना है कि क्या अगले 13 दिनों में यह अभियान पूरी तरह अपने लक्ष्य तक पहुंच पाएगा। पूरी तरह खत्म हो न हो, यह तो कहा जा सकता है कि माओवादी आंदोलन अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।
चुनाव पर्यवेक्षक यानी ‘वर्किंग टूर’ भी
पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ प्रशासनिक हलचल भी तेज हो गई है। नेताओं के साथ अब अफसर भी चुनावी जिम्मेदारियों के लिए मैदान में उतर रहे हैं। प्रदेश के 30 आईएएस और आईपीएस अफसरों को हाल ही में ट्रेनिंग दी गई थी, जिनमें 5 आईपीएस शामिल थे।
ताजा स्थिति यह है कि 12 आईएएस और 3 आईपीएस अफसरों को चुनाव पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। आईपीएस अफसरों में डॉ. अजय यादव, बद्रीनारायण मीणा और अंकित गर्ग को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। सभी अफसर अपने-अपने प्रभार वाले राज्यों के लिए रवाना हो रहे हैं।
जिन अफसरों की ड्यूटी नहीं लगी है, वे फिलहाल राहत महसूस कर रहे हैं। आमतौर पर चुनाव ड्यूटी को काफी चुनौतीपूर्ण और बोझिल माना जाता है, खासकर पश्चिम बंगाल जैसे संवेदनशील राज्यों में। यही वजह रही कि कुछ अफसरों ने ड्यूटी से बचने की कोशिश भी की।
हालांकि, चुनाव आयुक्त ने ट्रेनिंग के दौरान स्पष्ट किया था कि चयन पूरी तरह योग्यता और कार्यक्षमता के आधार पर किया गया है। इसके बावजूद कई अफसर पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आए।
दिलचस्प बात यह है कि सभी अफसर चुनाव ड्यूटी से बचना नहीं चाहते। कुछ ऐसे भी रहे हैं जो खुद इस जिम्मेदारी के लिए उत्सुक रहते थे। पूर्व आईएएस एस.एल. रात्रे का नाम भी ऐसे ही अधिकारियों में लिया जाता है, जो चुनाव पर्यवेक्षक बनने में खास रुचि रखते थे। उनके बारे में यह भी चर्चा रही कि जहां भी उनकी ड्यूटी लगी, वहां स्थानीय प्रशासन ने उनका विशेष स्वागत-सत्कार किया।
वहीं, इस बार भी कुछ अफसरों में उत्साह देखा जा रहा है, खासकर उन लोगों में जिन्हें केरल जैसे खूबसूरत राज्य में पर्यवेक्षक बनने का मौका मिला है। उनके लिए यह जिम्मेदारी के साथ-साथ एक तरह का ‘वर्किंग टूर’ भी बन गया।
फ्लाईओवर की मुखालफत..

रायपुर में तात्यापारा से शारदा चौक तक प्रस्तावित फ्लाईओवर को लेकर राजनीतिक और व्यावसायिक हलकों में विरोध के स्वर तेज होते दिख रहे हैं। सरकार ने भले ही इस महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी दे दी हो, लेकिन जमीन पर इसे लागू करना आसान नहीं नजर आ रहा। वर्तमान में शारदा चौक के आगे स्काईवॉक का निर्माण कार्य जारी है, जिसकी वजह से इलाके में लगातार जाम की स्थिति बनी रहती है। इसी के चलते स्थानीय व्यापारी संगठनों में नाराजगी बढ़ रही है और वे फ्लाईओवर योजना का विरोध कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़ा आंदोलन खड़ा होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक स्तर पर भी स्थिति सहज नहीं है। बृजमोहन अग्रवाल इस योजना से असहमत बताए जा रहे हैं, हालांकि उन्होंने अब तक सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है। कहा जा रहा है कि वे इस मसले पर सीएम विष्णु देव साय और डिप्टी सीएम अरुण साव से चर्चा कर सकते हैं।
अब देखना होगा कि सरकार विरोध के बीच इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए क्या रणनीति अपनाती है, या फिर स्थानीय दबाव के चलते इसमें कोई बदलाव किया जाता है।
ट्रेन आने की भ्रामक घोषणा

गोंदिया रेलवे स्टेशन की तस्वीर है। देर रात शिवनाथ एक्सप्रेस का इंतजार करते हुए एक यात्री ने सोशल मीडिया पर यह पोस्ट शेयर की है। डिस्पले में दिखाया जा रहा है कि ट्रेन 1 बजकर 48 मिनट पर पहुंचेगी। वह समय कब का बीत चुका। प्लेटफॉर्म पर लगी घड़ी बता रही है कि समय रात के 2 बजकर 6 मिनट हो चुके हैं। 1.48 बजे ट्रेन पहुंची ही नहीं, काफी देर बाद प्लेटफॉर्म आई। पर रेलवे का इलेक्ट्रॉनिक नोटिस बोर्ड उसी पर अटका रहा।
नाम और ओहदा
सत्ता चाहे बड़ी हो, चाहे छोटी, वह बददिमागी ला ही देती है। छोटे-छोटे से राजनीतिक ओहदों पर बैठे हुए लोग अपनी गाडिय़ों पर पदनाम की बड़ी-बड़ी सुनहरी तख्तियां जब तक लगवा नहीं लेते, वे उस गाड़ी की सीट पर टिक नहीं पाते। अब अभी छत्तीसगढ़ के राज्य उर्दू अकादमी बोर्ड के एक सदस्य की गाड़ी दिखी, जिस पर नियमों को तोड़ते हुए नंबर प्लेट के अक्षर तो चींटी के आकार के रखे गए हैं, लेकिन पदनाम की तख्ती पर सदस्य शब्द हाथी के आकार का लिखा गया है। जब तक कोई नीचे छोटे अक्षरों में लिखा राज्य उर्दू अकादमी पढ़े, तब तक यही लगेगा कि यह शायद संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य की गाड़ी है। नंबर प्लेट के नियम तोडऩे के पहले लोगों को कम से कम उस पदनाम का सम्मान तो करना चाहिए जिसकी बड़े-बड़े सुनहरे अक्षरों में नुमाइश की गई है।
मंत्री-नेता असम, बंगाल की ओर...
पांच राज्यों के चुनाव की घोषणा के बाद छत्तीसगढ़ भाजपा में हलचल तेज हो गई है। पार्टी के प्रमुख नेता अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए रवाना हो रहे हैं।
उप मुख्यमंत्री अरूण साव असम पहुंच चुके हैं, जहां वे अपने प्रभार की नौ विधानसभा सीटों के पदाधिकारियों की बैठक ले रहे हैं। वे मंगलवार को रायपुर लौटेंगे और विधानसभा सत्र निपटने के बाद फिर चुनावी अभियान के लिए रवाना हो जाएंगे।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी भी असम में दस विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। चुनाव की घोषणा होते ही उन्होंने वहां के पार्टी नेताओं से फोन पर चर्चा कर रणनीति पर काम शुरू कर दिया।
इधर सरकार से जुड़े कई निगम-मंडलों के चेयरमैन और पदाधिकारी पश्चिम बंगाल में डेरा डाले हुए हैं। इन पदाधिकारियों ने 14 मार्च को हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली थी, जिसे पार्टी काफी सफल मान रही है।
बंगाल में सक्रिय पदाधिकारियों में क्रेडा चेयरमैन भूपेंद्र सिंह सवन्नी, नीलू शर्मा, अनुराग सिंहदेव, विश्व विजय सिंह तोमर सहित अन्य नेता शामिल हैं। सत्र निपटने के बाद सरकार के मंत्री, और विधायकों के साथ ही साथ संगठन के पदाधिकारी राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए निकल जाएंगे।
अफीम कांड पर सियासी पारा चढ़ा
प्रदेश में चर्चित अफीम कांड को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ा हुआ है। भाजपा नेता विनायक ताम्रकार की गिरफ्तारी के बाद से विपक्षी दल कांग्रेस सरकार पर हमलावर है और ताम्रकार के बड़े नेताओं से कथित संबंधों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है।
मामला सामने आते ही भाजपा ने त्वरित कार्रवाई करते हुए विनायक ताम्रकार को पार्टी से निलंबित कर दिया। अब तक की जानकारी में भाजपा के किसी बड़े नेता से उनकी घनिष्ठता जैसी बात स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है। हालांकि, चर्चा यह जरूर है कि उनकी रिश्तेदारी कांग्रेस के एक विधायक से जुड़ी बताई जा रही है।
सियासी गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि ताम्रकार के दुर्ग के एक पूर्व मंत्री से उनके मधुर संबंध रहे हैं। लेकिन अफीम कांड सामने आने के बाद से उस पूर्व मंत्री ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस के कई स्थानीय नेता आरोपी विनायक ताम्रकार के खेत तक पहुंच गए, मगर पूर्व मंत्री दूरी बनाए रहे। विधानसभा में भी इस प्रसंग का उल्लेख पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर द्वारा किया जा चुका है।
इधर, मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। कहा जा रहा है कि छापेमारी से पहले अफीम के फल-पौधों से भरे चार कंटेनर बाहर भेज दिए गए थे। हालांकि पुलिस जांच में अभी तक इस तरह की किसी बात की पुष्टि नहीं हुई है।
पुलिस के मुताबिक दो अन्य संदिग्धों की तलाश में टीम राजस्थान गई हुई है। माना जा रहा है कि उनकी गिरफ्तारी के बाद इस पूरे मामले में कुछ नए खुलासे हो सकते हैं। तब तक अफीम कांड को लेकर प्रदेश की राजनीति गर्म बनी रहने के आसार हैं।
गैस की कतार और बढ़ती बेचैनी
ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत के बाजारों में भी दिखने लगा है। पेट्रोलियम आपूर्ति को लेकर आशंकाओं के बीच कई शहरों में रसोई गैस को लेकर हलचल बढ़ गई है। जगह-जगह सिलेंडर लेने के लिए कतारें लग रही हैं, जिससे लोगों में संकट की आशंका और गहरी हो रही है।
हालांकि प्रदेश के खाद्य विभाग का कहना है कि प्रदेश में रसोई गैस सिलेंडरों की कोई वास्तविक कमी नहीं है। विभाग का दावा है कि आपूर्ति सामान्य है, लेकिन एहतियात के तौर पर अब उपभोक्ताओं को 25 दिन में एक ही सिलेंडर दिया जा रहा है।
दूसरी ओर होटल और रेस्टोरेंट व्यवसाय सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आ रहा है। होटल-रेस्टोरेंट संचालकों का कहना है कि पिछले लगभग पांच दिनों से उन्हें एक भी कमर्शियल सिलेंडर जारी नहीं किया गया। ऐसे में कई होटल और रेस्टोरेंट ने मजबूरी में इंडक्शन चूल्हों का सहारा लेना शुरू कर दिया है।
होटल-रेस्टोरेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष मिक्की दत्ता ने ‘छत्तीसगढ़’ से कहा कि इंडक्शन चूल्हों से काम चलाना आसान नहीं है। उनके मुताबिक इससे बिजली मीटर तेजी से चलता है, बिजली बिल बढ़ता है और लगातार उपयोग करने पर सुरक्षा का खतरा भी बना रहता है।
कहा जा रहा है कि कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति फिलहाल उद्योगों को प्राथमिकता के आधार पर दी जा रही है, जिसके कारण होटल-रेस्टोरेंट को सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं। उधर कुछ होटल संचालकों ने काम चलाने के लिए घरेलू सिलेंडर का उपयोग शुरू किया, तो उस पर प्रशासन ने कार्रवाई भी शुरू कर दी।
होटल संचालकों का कहना है कि यदि अगले दो-तीन दिनों में कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति शुरू नहीं हुई, तो कई होटल और रेस्टोरेंट को ताला लगाने की नौबत आ सकती है। इससे न केवल कारोबार प्रभावित होगा, बल्कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों की रोजी-रोटी पर भी असर पड़ सकता है।
मास्टर प्लान की जांच का पता नहीं
रायपुर के मास्टर प्लान में कथित अनियमितताओं का मामला एक बार फिर सियासी चर्चा में है। पूर्व मंत्री राजेश मूणत इस मुद्दे पर लगातार कार्रवाई की मांग कर रहे हैं और सरकार पर जांच पूरी कराने के लिए दबाव बनाए हुए हैं।
दरअसल, सरकार ने करीब दो साल पहले मामले की जांच के लिए एक समिति गठित की थी, लेकिन अब तक जांच पूरी नहीं हो पाई है। इसे लेकर सियासी हलकों में चर्चा है कि मूणत समेत भाजपा के कई नेता जांच में हो रही देरी से नाराज हैं। यही वजह है कि विधानसभा के लगभग हर सत्र में किसी न किसी रूप में यह मुद्दा उठता रहा है।
सरकार की ओर से अब तक यही जवाब आता रहा है कि जांच प्रक्रियाधीन है और इसके लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। हालांकि हालिया लिखित जवाब में थोड़ा बदलाव देखने को मिला है। सरकार ने कहा है कि जांच को शीघ्र पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है और जांच समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद उसके आधार पर समुचित कार्रवाई की जाएगी।
अब नजर इस बात पर है कि जांच कब तक पूरी होती है और रिपोर्ट सामने आने के बाद सरकार किस तरह की कार्रवाई करती है। फिलहाल, यह मुद्दा आने वाले समय में भी राजनीतिक बहस का विषय बना रह सकता है।


