राजपथ - जनपथ
बनवास का दर्द और अफसरों की कहानी
प्रदेश भाजपा में इस बार कार्यकारिणी गठन के बाद एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, नरेशचंद्र गुप्ता। संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले गुप्ता को नई कार्यकारिणी में जगह नहीं मिल पाई। जबकि वो प्रदेश भाजपा के कार्यालय मंत्री रह चुके हैं। उनकी पहचान उन नेताओं में रही है, जो चुनावी मौसम में विरोधियों के खिलाफ पुख्ता शिकायतें तैयार कर चुनाव आयोग तक पहुंचाते थे।
गुप्ता की सक्रियता सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव अमिताभ जैन, डीजीपी अशोक जुनेजा और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डॉ. आनंद छाबड़ा सहित कई बड़े अफसरों के खिलाफ शिकायतों की झड़ी लगा दी थी। मामला पीएमओ तक पहुंचा और लंबे समय तक इन शिकायतों की चर्चा होती रही।
लेकिन, घटनाक्रम ने अलग ही मोड़ लिया। जिन अफसरों पर गुप्ता ने सवाल उठाए, वे बाद में और मजबूत स्थिति में नजर आए। अशोक जुनेजा को रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन मिला और उन्होंने सम्मानजनक तरीके से कार्यकाल पूरा किया। अमिताभ जैन रिटायरमेंट के बाद सीआईसी बन गए, जबकि डॉ. आनंद छाबड़ा प्रमोशन पाकर एडीजी बन गए।
यही वह बिंदु था, जहां से गुप्ता की अति सक्रियता पार्टी के भीतर असहजता का कारण बनने लगी। संगठन में यह संदेश गया कि लगातार शिकायतों की राजनीति उलटी भी पड़ सकती है। नतीजा, पहले कार्यालय मंत्री पद से हटे और अब कार्यकारिणी से भी बाहर हो गए।
हालांकि, राजनीति में संभावनाएं खत्म नहीं होतीं। निगम-मंडलों में नियुक्तियां बाकी हैं, जहां उनके लिए अभी भी गुंजाइश मानी जा रही है। लेकिन, उनके फेसबुक पोस्ट ने अंदरूनी पीड़ा उजागर कर दी, बनवास केवल जगह से नहीं होताज् अपनों के बीच अजनबी बनकर जीना भी बनवास है।
पेट्रोल-डीजल में अभी जेब ढीली नहीं होगी
खाड़ी देशों से कच्चे तेल की सप्लाई में दिक्कतें हैं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम ऊपर जा रहे हैं, लेकिन देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें थमी हुई हैं। प्रीमियर वेरियेंट के ईंधन और रसोई गैस के दाम में हुई थोड़ी बढ़ोतरी के साथ-साथ लोगों के भीतर यह सवाल घूम रहा है कि पेट्रोल-डीजल में राहत वैसे कब तक रहेगी। पिछले अनुभव बताते हैं कि यह सहूलियत स्थायी नहीं है। इस समय असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल व केंद्र शासित पुडुचेरी में विधानसभा के चुनाव हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि बाकी राज्यों में कीमतें बढ़ा दी जाएं और इन राज्यों को छोड़ दिया जाए।
कुछ पुराने दिनों को याद कर लें। 2019 लोकसभा चुनाव के लिए मतदान चल रहा था तो कीमतें नहीं बढ़ीं। अंतिम चरण 19 मई को खत्म होते ही 20 मई से रोजाना बढ़ोतरी शुरू हो गई। अगले 9 दिनों में पेट्रोल 83 पैसे और डीजल 73 पैसे प्रति लीटर महंगा हो गया। 2022 के पांच राज्यों यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव हुए। पूरे 137 दिनों तक कीमतें पूरी तरह फ्रीज रहीं। चुनाव खत्म होते ही 22 मार्च 2022 से 80 पैसे प्रति लीटर बढ़ोतरी हुई और उसके बाद लगातार कई बार बढ़ाई गईं। ऐसा ही 2018 में कर्नाटक चुनाव और 2017 में गुजरात चुनाव के दौरान भी कीमतें अचानक स्थिर हो गई थीं और वोटिंग के बाद तेजी से बढ़ी।
जब क्रूड ऑयल के दाम निचले स्तर पर आ गए थे तब भी पेट्रोलियम पदार्थों के दाम कम नहीं किए गए थे। अब जब इसकी कीमत 60 से 70 प्रतिशत अधिक हो चुकी है तो जाहिर है हम- आप बढ़ी हुई कीमत का सामना करने से बचेंगे नहीं। पांच चुनावी राज्यों के मतदाताओं का हमें शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनकी नाराजगी से बचने के लिए सरकार ने हमें भी थोड़े दिन के लिए सही राहत दी है और पुरानी कीमत पर पेट्रोल-डीजल खरीदने का मौका मिल रहा है। सबसे अंत में मतदान 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में होने जा रहा है। तब तक कोई टेंशन नहीं लेना है।
परीक्षा की शुचिता कठघरे में..
2019 से 2024 तक 19 राज्यों में कम से कम 65 बड़े पेपर लीक हुए, जिनसे 1.7 करोड़ से अधिक युवा प्रभावित हुए। राजस्थान अकेला पेपर लीक की राजधानी बन चुका है, जहां 2015-2023 के बीच 14 से ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। छत्तीसगढ़ भी अब ऐसे राज्यों की सूची में शामिल हो गया है। 14 मार्च को छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की कक्षा 12वीं हिंदी परीक्षा हुई। लेकिन परीक्षा से महज कुछ घंटे पहले ही प्रश्न-पत्र के कुछ प्रश्न व्हाट्सएप ग्रुप्स और सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। 23 तारीख को हुई परीक्षा समिति की बैठक में सबूतों की समीक्षा के बाद परीक्षा को निरस्त घोषित कर दिया गया है। अब पुनर्परीक्षा 10 अप्रैल को होगी। हजारों छात्र-छात्राएं, जिन्होंने महीनों की मेहनत से तैयारी की थी, साजिश का शिकार हो गए।
सीजीपीएससी परीक्षाओं में भ्रष्टाचार के अनेक मामलों के बाद ताजा घटना छत्तीसगढ़ में परीक्षा प्रणाली में गिरावट की ताजा कड़ी है। इसमें शामिल है प्रशासनिक लापरवाही, रिश्वतखोरी का जाल और नकल माफिया का संगठित नेटवर्क। अक्सर यह देखा गया है कि परीक्षा केंद्रों, प्रिंटिंग प्रेस या शिक्षा विभाग के निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ मिलकर कोचिंग संस्थानों और माफियाओं का एक गठजोड़ काम करता है। सोशल मीडिया के जरिए पेपर का वायरल होना और सख्त निगरानी की कमी, परीक्षा प्रणाली को खोखला कर रहे हैं। एआई और सूचना प्रौद्योगिकी के युग में जहां हर चीज डिजिटल है, इसका फायदा नकल और पेपर लीक करने वाले गिरोह तो उठा रहे हैं पर इन परीक्षाओं को आयोजित करने वाली संस्थाएं नहीं उठा पा रहीं।
पेपर लीक पर एक समान कानून पूरे देश के लिए अब तक नहीं बना है। कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर कानून बनाए हैं। छत्तीसगढ़ ने तो हाल ही में परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम विधेयक 2026 पारित किया है, जिसमें 10 वर्ष तक की सजा और एक करोड़ तक जुर्माने का कठोर प्रावधान है। लेकिन कानून को कागज से निकलकर जमीन तक पहुंचने में अभी समय है। दोषियों को सजा दिलाने में ये नए प्रावधान कितने कारगर साबित होंगे यह भी बाद में पता चलेगा। क्या इस लीक की जांच निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी होगी? क्या बिना दबाव दोषियों को सजा मिल सकेगी?
जब आस्था शिखर छू लेती है

नवरात्रि को लेकर इन दिनों छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में मां के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना हो रही है, लेकिन कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां पहुंचना ही अपने आप में एक तपस्या बन जाता है।
ऐसा ही है, कोरबा जिले के गढक़टरा गांव से करीब 2 किलोमीटर उत्तर दिशा में स्थित कंचन पहाड़। गांव के लोगों की श्रद्धा इतनी गहरी है कि हर शुभ कार्य से पहले वे यहां आकर माथा टेकते हैं, मन्नत मांगते हैं।
इस मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां तक पहुंचने का कोई सीधा रास्ता नहीं है। एक खड़ी, लगभग सीधी चट्टान और उस पर जीवनरेखा बनी बरगद की लटकती जड़ें। इन्हीं जड़ों को थामकर, पत्थरों की छोटी-छोटी दरारों में पैर टिकाते हुए ऊपर चढऩा पड़ता है। हर कदम पर जोखिम, हर पकड़ में सावधानी। जरा सी चूक और नीचे सीधे गहरी खाई। ऊपर पहुंचकर जो दृश्य दिखता है, वह अभिभूत कर देता है। दूर-दूर तक फैली पहाडिय़ों की श्रृंखला, शांत वातावरण और एक अलौकिक ऊर्जा का एहसास।
तबादलों की आहट
प्रदेश में जल्द ही बड़े प्रशासनिक फेरबदल की सुगबुगाहट है। आईएएस और आईपीएस अफसरों की तबादला सूची कभी भी जारी हो सकती है। माना जा रहा है कि जिन अफसरों को एक ही विभाग में दो साल से ज्यादा हो चुके हैं, उन्हें बदला जाएगा।
जनसंपर्क विभाग में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। मौजूदा आयुक्त रवि मित्तल की पीएमओ में उपसचिव के पद पर नियुक्ति हुई है। जिसके बाद इस पद पर नई नियुक्ति होगी।
वहीं, आईपीएस महकमे में भी हलचल है। 2020 बैच के एक युवा अधिकारी अध्ययन अवकाश पर जा रहे हैं, जबकि एक जिले की महिला एसपी लंबी छुट्टी पर रहेंगी। ऐसे में उनके स्थान पर नई पोस्टिंग तय है। चर्चा है कि आधा दर्जन से ज्यादा आईपीएस अफसरों के प्रभार में बदलाव हो सकता है।
‘बिहार दिवस’ पर चुप्पी
इस साल 22 मार्च को बिहार दिवस प्रदेश में लगभग खामोशी के साथ गुजर गया। न कोई बड़ा आयोजन हुआ, न ही औपचारिक राजनीतिक सक्रियता दिखी। खासकर भाजपा ने इस बार दूरी बनाकर रखी, जबकि पिछले साल इसी मौके पर कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, और उसी को लेकर विवाद भी खड़ा हुआ था।
दरअसल, पिछली बार बिहार दिवस मनाने के फैसले पर स्थानीय संगठनों, खासकर छत्तीसगढ़ क्रांति सेना ने कड़ा विरोध जताया था। उनका सीधा सवाल था—क्या बिहार में कभी छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस मनाया जाता है? इस बहस ने छत्तीसगढिय़ा बनाम बाहरी जैसे संवेदनशील मुद्दे को भी हवा दी।
सोशल मीडिया में भी भाजपा को आलोचना झेलनी पड़ी। यहां तक आरोप लगे कि यह आयोजन बिहार प्रभारी नितिन नबीन को खुश करने के लिए किया गया था।
असल वजह राजनीतिक थी। उस समय बिहार में विधानसभा चुनाव का माहौल था और भाजपा वहां सक्रिय प्रचार में जुटी थी। इसलिए छत्तीसगढ़ में भी ‘बिहार कनेक्ट’ दिखाने की कोशिश की गई।
अब हालात बदल चुके हैं—बिहार में चुनाव खत्म हो चुके हैं और भाजपा गठबंधन की सरकार बन चुकी है। ऐसे में इस बार कोई राजनीतिक आवश्यकता नहीं दिखी। साथ ही, पिछली बार जैसे विवाद की पुनरावृत्ति से बचने के लिए भी इस मुद्दे से दूरी बनाना ही बेहतर समझा गया।
‘एआई’ बना नया बचाव कवच..
अब सियासत में एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है—विवादित वीडियो और ऑडियो को ‘एआई जनरेटेड’ बताकर खारिज करना। हाल के घटनाक्रम इसे और स्पष्ट करते हैं।
पिछले दिनों रिकेश सेन का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते नजर आ रहे थे। बताया गया कि यह वीडियो भिलाई के एक मॉल का है और पुराना (क्रिसमस के समय का) है। वीडियो सामने आते ही उन्होंने तुरंत पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजते हुए इसे एआई से बनाया गया फर्जी वीडियो बताया और कार्रवाई की मांग की। फिलहाल पुलिस इसकी जांच में जुटी है।
मामला यहीं नहीं थमा। पिछले दिनों विधानसभा में भी इस पर चुटकी ली गई। जब रिकेश सेन सवाल पूछने खड़े हुए, तो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वायरल वीडियो का जिक्र कर तंज कस दिया। रिकेश सेन ने जवाब में फिर यही कहा कि वीडियो एआई जनरेटेड है और इस पर एफआईआर दर्ज कराई जा रही है।
भूपेश बघेल ने पुराने एक और वीडियो का जिक्र छेड़ दिया, जो विधानसभा चुनाव से पहले सोशल मीडिया में खूब चर्चा में था। उस वीडियो में कथित तौर पर प्रेम प्रकाश पाण्डेय के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग दिखाया गया था। इस पर भी रिकेश सेन ने फर्जी और एआई से तैयार करार दिया।
यह ट्रेंड सिर्फ एक दल तक सीमित नहीं है। कुछ महीने पहले कांग्रेस की महिला विधायक शेषराज हरबंश का भी एक ऑडियो वायरल हुआ था, जिसमें रेत के अवैध खनन को लेकर कथित बातचीत सामने आई। हालांकि उन्होंने इसे एआई जनरेटेड बताने के बजाय सीधे तौर पर खारिज किया और अपनी संलिप्तता से इनकार किया। साफ है कि अब एआई सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है।
एक तरफ यह ‘फेक कंटेंट’ से बचाव का हथियार है तो दूसरी तरफ असली-नकली की पहचान करना बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
अफसर को अनिवार्य सेवानिवृत्ति
रेल मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ यानि दपूमरे बिलासपुर जोन के अंतर्गत वरिष्ठ प्रशासनिक श्रेणी के एक अधिकारी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर घर बिठा दिया है। वे देश भर के 6 वरिष्ठ अधिकारियों में एक है। इनमें उत्तर रेलवे के मुख्यालय में तैनात ष्टरूश्व (प्रोजेक्ट), दक्षिण पश्चिम रेलवे के हृस्न-॥्रत्र अधिकारी, दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के स््रत्र अधिकारी, और पूर्वी रेलवे के ढ्ढक्रस्स्श्व अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा रेलवे बोर्ड सचिवालय सेवा (क्रक्चस्स्) के अंडर सेक्रेटरी/डिप्टी डायरेक्टर स्तर के अधिकारी हैं। यह कड़ी कार्रवाई भारतीय रेल स्थापना संहिता (ढ्ढक्रश्वष्ट) के नियम 1802(क) के तहत की है। यह नियम प्रशासन को यह विशेष अधिकार देता है कि वह जनहित को ध्यान में रखते हुए किसी भी ऐसे अधिकारी को समय से पहले रिटायर कर सकता है, जिसका प्रदर्शन मानक के अनुरूप नहीं है। सरल शब्दों में कहें तो, अगर कोई अधिकारी सरकारी कामकाज में बाधा बन रहा है या उसकी काम करने की क्षमता खत्म हो गई है, तो सरकार उसे पेंशन देकर रिटायर कर सकती है।
यह कार्रवाई उन सभी के लिए एक कड़ा सबक है जो सरकारी नौकरी को केवल सुरक्षित ठिकाना मानकर अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह रहते हैं। इस कदम ने जोन और मंडल मुख्यालय के अफसरों में हडक़ंप मचा दिया है।
वैसे यह व्यवस्था मनमोहन सरकार ने 20 वर्ष की सेवा और 50 वर्ष की आयु पूरी करने वाले दागी और काम में असमर्थ केन्द्रीय अधिकारी कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति की योजना बनाई थी। इसे मोदी सरकार भी जारी रखे हुए है। जो छत्तीसगढ़ में भी लागू हैं लेकिन दो दशकों में केवल तीन आईपीएस, 2 आईएएस को घर का रास्ता दिखाया जा सका है। हालांकि इस दौरान कई आईएएस, आईपीएस आईएफएस अफसरों को शार्ट लिस्ट किया गया था। लेकिन सभी को सरकारों का वरदहस्त मिलता रहा। कुछ आईपीएस तो जेल भी होकर आ गए हैं। लेकिन ऐसे सभी महानुभाव अब तक सेवा पर बने हुए हैं। हर साल सीआर के पिछले पन्ने पलट दिए जा रहे हैं। देखना होगा मुख्यधारा की सेवा वाले इन अफसरों का नंबर कब आएगा।
मौत का जोखिम उठाकर पर्यटन?
खल्लारी माता मंदिर 1100 फीट की ऊंचाई पर है। यहां की घुमावदार 900 सीढिय़ां चढऩा मुश्किल लगता है, इसलिए पांच साल पहले शुरू हुई यहां की रोप वे सेवा हजारों श्रद्धालुओं की पहली पसंद है। नवरात्रि जैसे मौकों पर भीड़ तो बढ़ती है, लेकिन सुरक्षा मानक ढीले रह जाते हैं।
ठीक एक साल पहले डोंगरगढ़ में बम्लेश्वरी देवी मंदिर की रोप वे में बीजेपी नेता समेत चार श्रद्धालु घायल हुए थे। उस समय भी केबल टूटने और ट्रॉली गिरने की बात सामने आई थी। इससे पहले 2021 में एक मजदूर की मौत हुई थी। यहीं पर तत्कालीन कलेक्टर संजय अग्रवाल 1 अप्रैल 2024 को चैत्र नवरात्रि की तैयारी देखने के लिए गए थे। बिजली बंद हो जाने के कारण वे रोप वे में काफी देर तक हवा में लटके रह गए।
देशभर के दूसरे स्थानों में भी यही तस्वीर है। बीते साल 2025 में गुजरात के पावागढ़ हिल पर कार्गो रोप वे के केबल टूटने से छह लोग मारे गए। 2022 में झारखंड के त्रिकुट रोप वे में दो केबल कारों की टक्कर से दो मौतें हुईं और दर्जनों श्रद्धालु घंटों फंसे रहे।
अपने राज्य के देवी मंदिरों में नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या एकाएक बढ़ जाती है। रोप वे से जाने के लिए भी लंबी कतारें लगती हैं और इनमें ओवरलोडिंग भी होती है। रविवार की घटना में 28 वर्षीया आयुषी की मौत हो गई। उनके पति ऋ षभ सहित 16 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।
सरकार ने घटना के प्रति शोक जताते हुए जांच कराने की बात की है। पर मोटे तौर पर कुछ सवाल खड़े होते हैं। क्या नवरात्रि के पहले सेफ्टी ऑडिट कराई गई? केबल, ब्रेक, सेंसर और मोटर किसी भी रोप वे के संवेदनशील हिस्से होते हैं, उन्हें क्या जांचा परखा गया?
रोप वे का संचालन निजी कंपनी या मंदिर ट्रस्ट करती हैं। अक्सर लागत को बचाने के चक्कर में पुराने या कालातीत हो चुके पार्ट्स से काम चलाया जाता है। इसलिए ऑडिट का काम, संचालन करने वाली टीम से अलग होना चाहिए। इसे एनडीआरएफ, एसडीआरएफ या सरकार से मान्यता प्राप्त विशेषज्ञों की टीम के जरिये कराया जा सकता है। कल की घटना में दूसरी ट्राली को तो सुरक्षित वापस लाया गया लेकिन पूरी रोप वे में कई ट्रॉलियां फंस जाती तो क्या होता?
मौजूदा सरकार पर्यटन विकास और खासकर मंदिरों में पर्यटन सुविधाओं के विस्तार पर खूब जोर दे रही है। बम्लेश्वरी, खल्लारी जैसे स्थल तीर्थ तो हैं ही, पर्यटन के लिहाज से भी पसंदीदा डेस्टिनेशंस हैं। यहां सुविधाएं किस तरह की है, सुरक्षा की व्यवस्था कैसी है- यह हमारे राज्य की पर्यटन संभावनाओं को प्रतिबिंबित करती हैं। पर्यटक किसी भी पर्यटन स्थल पर मौत का जोखिम उठाकर नहीं पहुंचना चाहेगा।
सभी के निशाने पर राजस्व विभाग
विधानसभा के बजट सत्र में इस बार टंकराम वर्मा सबसे ज्यादा निशाने पर रहे। खास बात यह रही कि उन्हें सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के सदस्यों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी।
सत्र के दौरान जब मंत्री वर्मा ने नसीहत भरे अंदाज में जल संसाधन और अन्य विभागों को अपनी जमीन की रक्षा करने की बात कही, तो पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दूसरे विभाग अपनी जमीन की रक्षा करेंगे, तो फिर राजस्व विभाग की भूमिका क्या रह जाएगी।वहीं भाजपा विधायक रिकेश सेन भी विभाग की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट नजर आए। उन्होंने सदन में कहा कि लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में भू-माफिया सक्रिय हैं, लेकिन राजस्व अमला निष्क्रिय बना हुआ है। उन्होंने सीधे तौर पर अमले पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए।
दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू ने विभाग में अफसरशाही का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि एक विवादित अधिकारी को हटाने के लिए वे स्वयं मंत्री से मिले थे और मंत्री ने भी सहमति जताई थी, लेकिन जब तबादला सूची जारी हुई, तो स्थिति जस की तस बनी रही।
इसके साथ ही राजस्व मामलों के निपटारे के लिए लगाए जाने वाले शिविर भी बंद होने की बात सामने आई। इन तमाम मुद्दों के चलते सदन में राजस्व मंत्री के प्रति असंतोष खुलकर दिखाई दिया, जो इस सत्र की प्रमुख राजनीतिक चर्चाओं में शामिल रहा।
इंटरनेट बंद, फिर भी पूरा बिल!
इंटरनेट की सेवा बिजली पानी की तरह जरूरी हो गई हो गई है। केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया को एक मिशन के रूप में अपना रखा है। ऑनलाइन पढ़ाई, वर्क फ्रॉम होम, यूपीआई लेन-देन तो इस सेवा पर टिका ही है आजकल दफ्तरों में हाजिरी और दूरदराज के गांवों से डेटा हासिल करने के लिए भी सरकार को इसकी जरूरत पड़ती है। ऐसे में लोकसभा में सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कंपनियों पर जवाबदेही बढ़ाने के लिए आवाज उठाई जो एक बड़ी पहल है। 2024-25 में भारत में प्रति व्यक्ति मासिक डेटा उपयोग 27.5 से 36 जीबी तक पहुंच चुका है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। यह आंकड़ा और बढ़ सकता है मगर, ग्रामीण और छोटे शहरों में तो स्थिति बदतर है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग जैसे शहरों से लेकर दूरदराज के गांवों तक उपभोक्ता हर महीने सैकड़ों रुपये फूंक रहे हैं। राशन के खर्च की तरह इंटरनेट की बिलिंग का भुगतान भी जरूरी हो चुका है। मगर टेलीकॉम कंपनियां जवाबदेह नहीं। सेवाएं ठप होने के बावजूद पूरा बिल वसूल करती हैं। बिजली-पानी की बिलिंग तो मीटर चलने के हिसाब से होती है, मगर इंटरनेट की नहीं। सांसद अग्रवाल ने ट्राई के सेवा गुणवत्ता विनियम, 2024 में संशोधन की मांग की है ताकि ब्रॉडबैंड बिलिंग बिजली मीटरिंग की तरह लागू हो। बिजली कटौती के समय मीटर रुक जाता है, चाहे कटौती एक मिनट की हो या पूरे दिन की। ऐसा इंटरनेट पर लागू क्यों नहीं होता? दुनिया के कई देशों जैसे सिंगापुर, यूके, कुछ यूरोपीय राष्ट्रों में स्वचालित क्रेडिट का प्रावधान पहले से मौजूद है, मगर भारत में यह लागू नहीं है। दरअसल, टेलीकॉम दिग्गजों का एकाधिकार इतना मजबूत है कि उपभोक्ता की शिकायतों पर ट्राई सख्ती से कार्रवाई नहीं करता। बीते साल मोबाइल प्री-पेड सेवा का शुल्क पहले जियो ने बढ़ाया, फिर एक के बाद एक दूसरी कंपनियों ने बढ़ा दिया। उपभोक्ता सवाल करते रहे कि अचानक कौन सा खर्च बढ़ गया? ट्राई भी खामोशी से देखता रहा, जबकि शुल्क को नियंत्रित करने का अधिकार उसके पास है। इधर, ब्रॉड बैंड सेवा ठप होने पर आप कॉल करते रहिये, तकनीशियन जब मर्जी आकर सुधारेंगे। व्यवधान के बदले में कोई मुआवजा नहीं, जुर्माना नहीं, कोई जवाबदेही नहीं।और अब तो 5जी के दावा किया जाता है, पर ग्राउंड रियलिटी यह है कि बुनियादी 3जी, 4जी कवरेज भी कई जगहों पर खराब है।आज इंटरनेट कोई शौक नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरत बन चुका है। बड़ी समस्या यह है कि जब इंटरनेट चलता नहीं, तब भी उसका पूरा बिल क्यों भरा जाए। सही सुझाव है कि बिजली जाती है तो मीटर रुक जाता है, वैसे ही इंटरनेट बंद होने पर बिल भी रुकना चाहिए।
बहुत कठिन है डगर तीरथ की...
स्कूलों की परीक्षाएं खत्म होते ही तीर्थ और पर्यटन स्थलों पर भीड़ उमड़ पड़ी है। लेकिन इस बार यात्रियों को राहत कम और परेशानियों का सामना ज्यादा करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत दो हैं, ट्रेनों की लगातार लेट लतीफी और गैस सिलेंडर की किल्लत।
रेल मार्ग पर यदि कोयला या आयरन ओर की खदानें पड़ती हैं, तो यात्रियों को देरी झेलना लगभग तय है। रेलवे की प्राथमिकता यात्री ट्रेनों से ज्यादा मालगाडिय़ों को समय पर पहुंचाना बन गई है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ से जगन्नाथ पुरी धाम जाने वाले यात्रियों को खासा इंतजार करना पड़ रहा है। आस्था के इस प्रमुख केंद्र के साथ-साथ यहां का समुद्र भी पर्यटकों को आकर्षित करता है, जिससे सीजन में भीड़ और बढ़ जाती है। दुर्ग-पुरी रेल मार्ग पर कई कोयला और लौह अयस्क खदानें होने के कारण यात्री ट्रेनों को बार-बार रोका जाता है, ताकि मालगाडिय़ों को रास्ता दिया जा सके। नतीजतन, दुर्ग-पुरी जैसी तेज रफ्तार ट्रेनें भी 2 से 4 घंटे की देरी से चल रही हैं।
दूसरी ओर, पुरी में ठहरना भी महंगा होता जा रहा है। होटलों के किराए बढ़ गए हैं, जिसकी एक बड़ी वजह कमर्शियल गैस की कमी बताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान-अमेरिका-इजराइल तनाव के चलते गैस सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसका असर स्थानीय बाजार तक पहुंच रहा है। होटल संचालकों को पर्याप्त गैस नहीं मिल पा रही, जिससे वे लकड़ी के चूल्हे या इंडक्शन पर निर्भर हो गए हैं। इन तमाम परिस्थितियों ने यात्रा को न सिर्फ थकाऊ बना दिया है, बल्कि खर्च भी काफी बढ़ा दिया है। यात्रियों के लिए इस बार की तीर्थयात्रा आस्था से ज्यादा धैर्य की परीक्षा बनती दिख रही है। इसलिए तो कहा जाता है कि तीर्थ यात्रा कठिन होती है।
हरियाली का शॉर्टकट, सेहत पर संकट
छत्तीसगढ़ विधानसभा में कल एक ऐसा मुद्दा उठा जो पर्यावरण और स्वास्थ्य पर सीधे असर करता है। प्राय: ऐसे विषय सदन के शोर में दब जाते हैं। मगर, इस बार रायपुर पश्चिम के भाजपा विधायक सुनील सोनी ने छातिम वृक्ष जिसे सप्तवर्णी या अल्स्टोनिया स्कॉलरिस कहते हैं, के रायपुर में बड़े पैमाने पर रोपे जाने पर सवाल उठाया।
रायपुर में छातिम के पेड़ साइंस कॉलेज से रोहिणीपुरम चौक तक की सडक़, हाईवे और डिवाइडरों पर लगाए गए थे। नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत हजारों पौधे रोपे गए। शहरों को स्मार्ट बनाने के नाम पर आसान रास्ता अपनाया गया। खूबसूरत सफेद फूल वाले, तेजी से बढऩे वाले और घनी छाया देने वाले पेड़। प्रदूषण नियंत्रण का दावा भी किया गया। लेकिन अफसरों ने अन्य राज्यों के अध्ययनों की ओर ध्यान नहीं दिया। वैसे यह पेड़ प्रदूषण सहन करने में सक्षम है, लेकिन इसके फूलों से निकलने वाला परागकण और तेज गंध अस्थमा, साइनस, श्वसन संक्रमण और एलर्जी का बड़ा कारण बन गया है। कोलकाता, नोएडा और मध्य प्रदेश के कई शहरों में यही अनुभव रहा। पश्चिम बंगाल में यह राज्य वृक्ष है, फिर भी नगर निगम ने नया रोपण बंद कर दिया है। वहां लाखों पौधे रोपे गए थे। कुछ साल पहले एक चक्रवात आया तो पराग साफ होने पर लोगों को राहत मिली। नोएडा के कई सेक्टरों में निवासियों ने इतनी शिकायतें कीं कि रोपण पर रोक लगानी पड़ी। मध्य प्रदेश ने तो पूरे राज्य में छातिम और एक अन्य वृक्ष कोनोकार्पस पर प्रतिबंध लगा रखा है।
इधर, पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी का जवाब अफसरों से तैयार किया गया लगा। जवाब में अन्य राज्यों में पड़े प्रभावों की जानकारी नहीं दी गई या अधूरी रखी गई। जबकि इस पर कई वैज्ञानिक शोध मौजूद हैं। इसके पराग से चूहों के मॉडल में अस्थमा जैसी सूजन होती है, कोलकाता के अध्ययन में 28 प्रतिशत एलर्जिक मरीजों में पॉजिटिव रिएक्शन देखने को मिला।
बेशक, औषधि की दृष्टि से यह पेड़ उत्कृष्ट है। इसकी छाल और पत्तियों में एंटी-अस्थमा, मलेरिया-रोधी गुण हैं। लेकिन शहर के बीचों-बीच हजारों की संख्या में लगाना और जगह-जगह फूल खिलाना अलग बात है। कहां लगाएं, कितनी संख्या में लगाएं, यह देखना जरूरी हो जाता है।
रायपुर को देश के सबसे प्रदूषित शहरों में गिना जाता रहा है। धूल के स्तर ने स्वास्थ्य को पहले ही चुनौती दी हुई है। ऐसे में एक और एलर्जी का कारक जोडऩा गलती है। स्मार्ट सिटी के अफसरों को लगता था कि तेज बढऩे वाला पेड़ तुरंत हरियाली ला देगा। अब जब विधानसभा में मुद्दा उठा है तो मंत्री ने भविष्य में छातिम पौधे नहीं लगाने का संकेत दिया है। पर विकल्प क्या होगा, इस पर भी बात होनी चाहिए। नीम, पीपल, बरगद, अमलतास, अर्जुन और जामुन जैसे पेड़ एपीटीआई यानि एयर पॉल्यूशन टॉरलेंस इंडेक्स में ऊंचा स्थान रखते हैं। ये प्रदूषण सोखते हैं, धूल पकड़ते हैं, छाया देते हैं और एलर्जी नहीं फैलाते। छत्तीसगढ़ की जलवायु में ये स्वाभाविक रूप से फलते-फूलते हैं। नीम तो कीट-नाशक भी है। पीपल ऑक्सीजन का खजाना है। छातिम हटाकर ये लगाए जाएं तो सिर्फ स्वास्थ्य नहीं सुधरेगा, बल्कि देर से सही हरियाली भी आएगी।
आंदोलनों को बड़ी चुनौती
नवा रायपुर में विधानसभा शिफ्ट होने के बाद उसके घेराव की परंपरा लगभग खत्म होती नजर आ रही है। पहले शहर के करीब स्थित पुराने विधानसभा भवन के कारण सत्र के दौरान राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों द्वारा लगातार प्रदर्शन और घेराव होते थे। इन आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
नया विधानसभा भवन शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है, जिससे वहां तक पहुंचकर धरना-प्रदर्शन करना आसान नहीं रह गया है। हाल ही में कांग्रेस ने अफीम कांड, गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों सहित कई मुद्दों पर विधानसभा घेराव का ऐलान किया था, लेकिन कार्यकर्ता शहर की सीमा से बाहर ही नहीं निकल पाए और प्रदर्शन शांति नगर के भारत माता चौक तक सिमट कर रह गया।
इसके उलट, पिछली सरकार के दौरान पुराने विधानसभा के पास भीम आर्मी के कार्यकर्ता निर्वस्त्र प्रदर्शन तक कर चुके थे, जिससे आंदोलनों की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं, हाल में तूता में अनशन कर रहे डीएड अभ्यर्थियों ने भी अवकाश के दिन विधानसभा घेराव की घोषणा की थी, लेकिन वे भी विधानसभा परिसर के आसपास तक नहीं पहुंच सके।
दरअसल, नवा रायपुर की भौगोलिक स्थिति भी आंदोलनों के लिए चुनौतीपूर्ण है। विधानसभा के आसपास कई किलोमीटर तक सुनसान सडक़ें हैं और चाय-पानी या ठहरने की सुविधाएं भी दूर-दूर तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों के लिए वहां जुटना और टिकना मुश्किल हो जाता है, जबकि पुलिस के लिए उन्हें नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया।
नवा रायपुर में विधानसभा शिफ्ट होने के बाद उसके घेराव की परंपरा लगभग खत्म होती नजर आ रही है। पहले शहर के करीब स्थित पुराने विधानसभा भवन के कारण सत्र के दौरान राजनीतिक दलों और विभिन्न संगठनों द्वारा लगातार प्रदर्शन और घेराव होते थे। इन आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस को भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
नया विधानसभा भवन शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित है, जिससे वहां तक पहुंचकर धरना-प्रदर्शन करना आसान नहीं रह गया है। हाल ही में कांग्रेस ने अफीम कांड, गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों सहित कई मुद्दों पर विधानसभा घेराव का ऐलान किया था, लेकिन कार्यकर्ता शहर की सीमा से बाहर ही नहीं निकल पाए और प्रदर्शन शांति नगर के भारत माता चौक तक सिमट कर रह गया।
इसके उलट, पिछली सरकार के दौरान पुराने विधानसभा के पास भीम आर्मी के कार्यकर्ता निर्वस्त्र प्रदर्शन तक कर चुके थे, जिससे आंदोलनों की तीव्रता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं, हाल में तूता में अनशन कर रहे डीएड अभ्यर्थियों ने भी अवकाश के दिन विधानसभा घेराव की घोषणा की थी, लेकिन वे भी विधानसभा परिसर के आसपास तक नहीं पहुंच सके।
दरअसल, नवा रायपुर की भौगोलिक स्थिति भी आंदोलनों के लिए चुनौतीपूर्ण है। विधानसभा के आसपास कई किलोमीटर तक सुनसान सडक़ें हैं और चाय-पानी या ठहरने की सुविधाएं भी दूर-दूर तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों के लिए वहां जुटना और टिकना मुश्किल हो जाता है, जबकि पुलिस के लिए उन्हें नियंत्रित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया।एक आईजी की प्रतिनियुक्ति बढ़ी,
दूसरे जाने की तैयारी में
छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर अभिषेक पाठक की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति एक वर्ष के लिए बढ़ा दी गई है। 2004 बैच के अफसर पाठक, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में आईजी पदस्थ हैं। उनके कार्यकाल में 10 मार्च 26 या आगामी आदेश तक वृद्धि की गई है। यहां बता दें कि इन्हें मिलाकर छत्तीसगढ़ कैडर के आठ आईपीएस केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। राज्य का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति कोटा 31 अफसरों का है। यानी अभी और अफसरों के दिल्ली जाने के अवसर हैं।
वैसे हाल में डीआईजी संतोष कुमार सिंह की भी प्रतिनियुक्ति के आदेश जारी किए गए हैं। और आने वाले अप्रैल में एक और आईजी के जाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में हैं। उनके केंद्रीय गुप्तचर ब्यूरो आईबी में जाने की चर्चा है। वे कुछ वर्ष पहले ही केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे हैं।
विधानसभा में प्रदर्शन
विधानसभा के बजट सत्र का शुक्रवार को समापन हो गया। विभागों की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान विपक्ष के पास सरकार को घेरने और अपनी बात मजबूती से रखने का अच्छा अवसर था, लेकिन वह इसका पूरा लाभ नहीं उठा सका। स्थिति यह रही कि मुख्यमंत्री के विभागों की अनुदान मांगें विपक्ष की गैरमौजूदगी में ही पारित हो गईं।
सत्र के दौरान सत्ता पक्ष के सुशांत शुक्ला और विपक्ष की चातुरी नंद का प्रदर्शन वरिष्ठ सदस्यों की तुलना में अधिक प्रभावी रहा। दोनों ही पहली बार विधायक बनकर सदन में पहुंचे हैं, लेकिन उनकी सक्रियता ने खासा ध्यान खींचा।
सुशांत शुक्ला सत्ता पक्ष के 'ओपनर बल्लेबाज' की तरह नजर आए। उन्होंने विपक्ष के हमलों का जवाब उसी अंदाज में दिया और कई मौकों पर अपनी ही सरकार के मंत्रियों को घेरकर मुद्दों पर निर्णय कराने में सफल रहे।
वहीं, कांग्रेस की महिला विधायक चातुरी नंद ने गोदावरी पावर को सोलर प्लांट के लिए दो सौ एकड़ से अधिक जमीन कौडिय़ों के दाम पर आवंटित करने के मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उनके सवालों के बाद सरकार ने कलेक्टर से जांच कर रिपोर्ट मांगी है। अनुसूचित जाति वर्ग के गाड़ा समाज से आने वाली चातुरी नंद अपने क्षेत्र सरायपाली में अवैध शराब के खिलाफ मुखर रहीं और इसी सक्रियता के दम पर विधानसभा तक पहुंचीं। उन्हें उत्कृष्ट विधायक का सम्मान भी मिल चुका है। इसके अलावा पहली बार के विधायक ओमकार साहू, भाजपा की शकुंतला पोर्ते, कविता प्राण लहरे और अनुज शर्मा का प्रदर्शन भी सराहनीय रहा।
दिल्ली में हाई प्रोफाइल छत्तीसगढ़
केंद्र सरकार ने कल प्रतिनियुक्ति पर एक अहम पोस्टिंग की। छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस डॉ. रवि मित्तल को देश चलाने वाले प्रधानमंत्री कार्यालय में उप सचिव नियुक्त किया है। रजत जयंती वर्ष मना रहे छत्तीसगढ़ के अब तक के प्रशासनिक इतिहास में वे तीसरे अफसर हैं जो पीएमओ में सेवा देंगे। सबसे पहले रिटायर्ड आईएएस बीवीआर सुब्रमण्यम रहे। उनके साथ एक रिकार्ड यह भी रहा कि पीएमओ में लंबे समय तक रहे। बीवीआर ने दो दो प्रधानमंत्री पहले मनमोहन सिंह ,फिर नरेंद्र मोदी के साथ काम किया। वे धारा 370 हटने के बाद बने पृथक जम्मू कश्मीर के पहले मुख्य सचिव भी रहे।उनके बाद डा रोहित यादव पदस्थ रहे। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति खत्म कर यादव पीएमओ से ही छत्तीसगढ़ लौटे थे। इनके बाद अब डा मित्तल पीएमओ जा रहे। वैसे यहां यह बताना भी उचित होगा कि इस ढाई दशक में छत्तीसगढ़ के कई वरिष्ठ आईएएस अफसरों ने केंद्र में कई अहम विभागों में काम किया। सुनील कुमार, दिवंगत अर्जुन सिंह के साथ केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय, शिवराज सिंह पेट्रोलियम मंत्रालय एन बैजेंद्र कुमार एम्स दिल्ली और संयुक्त सचिव सूचना प्रसारण मंत्रालय, निधि छिब्बर पहले रक्षा मंत्रालय फिर सीबीएसई अध्यक्ष अब नीति आयोग में, अमित अग्रवाल सीईओ आधार प्राधिकरण में हैं। गौरव द्विवेदी प्रसार भारती में सीईओ हैं। ऋचा शर्मा एडिशनल सेक्रेटरी, सुबोध सिंह प्रतियोगी परीक्षा कराने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के महानिदेशक पद से लौटे।
नीरज बंसोड़ गृहमंत्री अमित शाह के प्राइवेट सेक्रेटरी के पद पर हैं। निधि, अमित और ऋचा तो केंद्र में सचिव बनने की कतार में हैं। यदि आईपीएस अफसरों की ऐसी ही राष्ट्रीय हाईप्रोफाइल पोस्टिंग पर देखें तो रवि सिन्हा दो दशक तक रॉ में रहे और इस सबसे बड़ी सुरक्षा एजेंसी के चीफ पद से रिटायर हुए। इनसे पहले हाल में दिवंगत विश्वरंजन भी केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी में संयुक्त निदेशक रहने के बाद छत्तीसगढ़ में डीजीपी के पद पर लौटे। वहीं स्वागत दास भी केंद्रीय गृह मंत्रालय में आंतरिक सुरक्षा सचिव रहे। राज्य गठन के बाद से ही वे दिल्ली में रहे और रिटायर हुए। तो अमित कुमार भी 10 वर्ष तक सीबीआई में रहे और स्पेशल डायरेक्टर पद से लौटे।
वहीं तीसरे अभा सेवा वाले आईएफएस कैडर में ऐसी राष्ट्रीय पोस्टिंग के अफसर एक भी नहीं है। संजय ओझा केन्द्र सरकार में रहे लेकिन डायरेक्टर तक ही पहुंच पाए।
बिना होली मिलन के निपट गया सत्र
विधानसभा के बजट सत्र के बीच पडऩे वाले होली पर्व की रौनक इस बार फीकी रही। परंपरा के अनुसार होली अवकाश से पहले विधानसभा परिसर में विधायक क्लब का रंगारंग होली मिलन समारोह आयोजित होता था, जहां सत्ता और विपक्ष के सदस्य रंग-गुलाल के साथ एक-दूसरे से मिलते थे। लेकिन इस बार ऐसा कोई आयोजन नहीं हो सका।
बताया जाता है कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह को स्पाइन सर्जरी के लिए कोयम्बतूर जाना पड़ा, जिसके चलते कार्यक्रम को टाल दिया गया। बाद में यह सहमति बनी कि उनके लौटने के बाद रंग पंचमी के आसपास आयोजन किया जाएगा। संस्कृति संचालनालय ने इसके इंतजाम भी कर रखे थे। तिथियों में कई बार बदलाव हुआ और 17-18 मार्च से बढ़ाकर 19 मार्च तक विचार किया गया,लेकिन 19 मार्च को चैत्र नवरात्र की शुरुआत होने के कारण अंतत: होली मिलन समारोह निरस्त कर दिया गया।
इधर, रमजान पर राजनीतिक इफ्तार पार्टियों की भी इस बार कमी रही। आमतौर पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता मुस्लिम समाज के लिए इफ्तार का आयोजन करते रहे हैं, लेकिन इस बार केवल अमित जोगी ने ही इफ्तार पार्टी दी। वक्फ बोर्ड के चेयरमैन डॉ. सलीम राज भी इस बार आयोजन से दूर रहे। भाजपा शासन काल में वे ही मुख्य आयोजक होते हैं। इफ्तार के लिए आधे घंटे पहले दफ्तरों से छुट्टी के विवाद में फंसने की वजह से आयोजन से दूर रहना मुनासिब समझा।
इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को भी एक कारण माना जा रहा है। अयातुल्लाह अली खामेनेई की मृत्यु की खबरों के चलते शिया समुदाय में शोक का माहौल बताया जा रहा है, जिसका असर स्थानीय स्तर पर भी पड़ा। हालांकि, मुस्लिम संगठन 'हुसैनी सेना’ द्वारा सुभाष स्टेडियम में एक इफ्तार पार्टी आयोजित की गई, जिसमें कांग्रेस और भाजपा के कई नेताओं ने शिरकत की।
सोशल मीडिया पर जुगाड़ चूल्हे की चर्चा
देशभर में एलपीजी सिलेंडर की कमी से जहां छोटे कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ी हैं, वहीं कुछ लोगों ने हार मानने के बजाय रास्ता खुद बना लिया है। जगदलपुर के एक रेस्टोरेंट संचालक ने ऐसा ही देसी जुगाड़ तैयार किया है, जिसकी सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है।
तस्वीर में दिख रहा यह खास चूल्हा पूरी तरह स्थानीय संसाधनों से तैयार किया गया है। इसमें बीच में कोयला डालने की व्यवस्था है, जबकि नीचे बने दो अलग-अलग होल में लकड़ी के टुकड़े जलाए जाते हैं। इस डिजाइन की खासियत यह है कि एक साथ दो काम किए जा सकते हैं। एक तरफ डोसा तैयार होगा, तो दूसरी तरफ बड़ा।
गैस मिले या न मिले, लेकिन रोजी-रोटी नहीं रुकनी चाहिए। यह सोच इस इनोवेशन के पीछे झलक रही है।
टरकाना या भरमाना?
विधानसभा में इन दिनों मंत्रियों के जवाबों की शैली खुद चर्चा का विषय बनी हुई है। कई मौकों पर ऐसे जवाब सामने आते हैं, जिन्हें सदस्य ‘टरकाने वाला’ मानते हैं। खास तौर पर ‘दिखवा लेंगे’ या दिखवा लेंगे अलग से उपलब्ध करा देंगे जैसे जवाबों ने सदन की गंभीरता पर सवाल खड़े किए हैं।
‘दिखवा लेंगे’ वाला जुमला कोई नया नहीं है। विधानसभा के पहले कार्यकाल में तत्कालीन पंचायत मंत्री अमितेश शुक्ल अक्सर इसका इस्तेमाल किया करते थे। किसी मामले में सीधे जांच के आदेश देने से बचते हुए वे इस तरह के जवाब देकर स्थिति संभालने की कोशिश करते थे। एक बार भाजपा सदस्य चोवा दास खांडेकर ने जब गड़बड़ी की जांच की मांग की, तो ‘दिखवा लेंगे’ कहकर बात टालने की कोशिश की गई। इस पर सदस्य नाराज हो गए और उन्होंने साफ पूछा कि इसका मतलब क्या है—जांच होगी या नहीं? मामला बढ़ता देख तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ल को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने स्पष्ट कराया कि प्रकरण की जांच कराई जाएगी।
समय के साथ यह जुमला कम जरूर हुआ, लेकिन अब उसकी जगह एक नया तरीका देखने को मिल रहा है—अलग से दस्तावेज उपलब्ध करा देंगे। मौजूदा सत्र में कई मंत्री अधूरे जवाबों के साथ यही आश्वासन देते नजर आए हैं।
इस पर सत्ता पक्ष के ही वरिष्ठ सदस्य अजय चंद्राकर ने सवाल खड़े करते हुए कहा कि मंत्री लिखित जानकारी देने की बात तो करते हैं, लेकिन हकीकत में बाद में दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाते। विपक्ष ने भी इस पर सहमति जताई और कई जवाबों को गलत या अधूरा बताया।
कुल मिलाकर, इस सत्र में ज्यादातर मंत्रियों के जवाबों का स्तर संतोषजनक नहीं माना जा रहा। सदन के भीतर यह धारणा बनती दिख रही है कि जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो संसदीय परंपराओं के लिहाज से चिंता का विषय है।
देवी दरबारों में एलपीजी संकट

देशभर में आज से चैत्र नवरात्रि का महापर्व शुरू हो गया है। देवी मंदिरों में नौ शक्तियों की आराधना हो रही है। हवन-पूजन के साथ-साथ इनके लिए ईंधन की भारी मात्रा जरूरी होती है। प्राय: सभी मंदिरों में भंडारा खोले जाते हैं, जिनमें हजारों-लाखों लोगों के लिए भोजन, खिचड़ी, हलवा, पूरी सब्जी तैयार किए जाते हैं। ईरान-अमेरिका (इजरायल) के बीच चल रहे महायुद्ध का देशभर के देवी मंदिरों में असर दिख रहा है। एलपीजी सिलेंडर का दाम 60 से 115 रुपये तक युद्ध के शुरुआती दिनों में ही बढ़ गया था। मगर, युद्ध लंबा खिंचने के कारण इसकी आपूर्ति भी बाधित हो गई है। देश के कुछ बड़े मंदिरों में इसका क्या असर हुआ है, इसकी जानकारी जुटाने से दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। टीटीडी, यानि तिरुमाला देवस्थानम् में रोजाना 6 टन एलपीजी की खपत होती है। युद्ध के पहले ही यहां इतना रिजर्व रख लिया गया कि आने वाले दिनों में भंडारा बिना रुकावट चालू रहे। श्री माता वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड ने भी लंगर सेवा जारी रखने के लिए स्टाक बढ़ाया। बोर्ड की ओर से बयान दिया गया कि भंडारा तैयार करने के लिए व्यवस्था मजबूत कर ली गई है। मगर, पंचकुला स्थित मनसा देवी मंदिर में एलपीजी की किल्लत के चलते भंडारे का रोटी बनाना बंद कर दिया गया है। कहा गया है कि व्यवस्था दुबारा पहले जैसी करने का प्रयास किया जा रहा है। अयोध्या की राम रसोई में भंडारे का समय सीमित कर दिया गया है। यहां इंडक्शन स्टोव, इलेक्ट्रिक कुकर और स्टीम बेस्ड कुकिंग की जा रही है। कुछ अन्य देवी मंदिरों में कामाख्या, कालीघाट, विंध्यवासिनी आदि में भी भंडारे की मात्रा या वितरण के समय में कटौती की गई है।
अब छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध देवी मंदिरों का हाल भी जान लें। रतनपुर स्थित महामाया मंदिर प्रबंधन की ओर से कहा गया है कि प्रसाद और भंडारा जारी रहेगा लेकिन एलपीजी संकट को देखते हुए रोटी-सब्जी की जगह सादी खिचड़ी या फल-मिठाई पर फोकस किया जाएगा। डोंगरगढ़ का भंडारा भी ईंधन संकट से प्रभावित है। यहां भी इंडक्शन-इलेक्ट्रिक कुकर तथा बायोगैस का उपयोग बढ़ाया गया है। दंतेश्वरी मंदिर में भंडारे की व्यवस्था सुचारू रखने के लिए लकड़ी कोयला और डीजल का विकल्प अपनाया है। चंद्रहासिनी देवी मंदिर में भी भंडारे का समय कम किया गया और प्रसाद की मात्रा घटाई गई है।
मंत्रालय में अब-अन्ना, एक प्लेट इडली नहीं...
1 अप्रैल से छत्तीसगढ़ मंत्रालय के गलियारों में अन्ना एक मसाला डोसा,एक प्लेट इडली, के साथ एक स्ट्रांग या फिल्टर काफी की गूंज सुनाई नहीं देगा।
इंडियन कॉफी हाउस का सांबर बड़ा, उपमा, उत्तपम,नहीं मिलेगा। हम अभी से अप्रैल फूल वाली खबर नहीं, सही खबर दे रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि काफी हाउस वाले , ये बनाना या सर्व करना बंद कर रहे हैं,बल्कि वहां अब काफी हाउस ही नहीं रहेगा।
सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्रालय अधीक्षण शाखा ने नए रेस्टोरेंट के लिए टेंडर जारी कर दिया है जिसकी चयन प्रक्रिया अंतिम चरण में है। 1 अप्रैल से किसी नए होटल समूह को कैंटीन संचालन का ठेका मिल जाएगा। हालांकि ऐसा पहले भी हो चुका था। राज्य गठन के बाद से डीकेएस मंत्रालय भवन में इंडियन कॉफी हाउस का कैंटीन संचालित होता रहा। लेकिन महानदी भवन शुरू होते ही काफी हाउस के बजाय अन्य होटल संचालक को दिया। जहां न केवल महंगे बल्कि व्यंजन स्वादानुसार न परोसने की शिकायतें आम रहीं । 2012 में मुख्य सचिव रहे सुनील कुमार की पहल पर पुन: केरल की कॉफी की चुस्की मिलने लगी। इंडियन काफी हाउस एक सहकारी समिति द्वारा संचालित रेस्टोरेंट समूह है, जो रियायती दरों में सेवा प्रदाता है। अब तक इसे लेकर कोई शिकायत नहीं सुनाई देती। कॉफी हाउस मतलब स्वाद और ताजा होने की गारंटी भी, देश में भर दी जा रही गारंटियों से कहीं अधिक विश्वसनीय।
बहरहाल महानदी भवन में कॉफी हाउस की विदाई की खबर बताने और सुनने वाले यह भी कह रहे जल्द वापस भी आएगा। जैसे विधानसभा में हुआ। जहां बड़े प्रॉफिट की उम्मीद से खुला रेस्टोरेंट बढ़ती लागत से बंद हो गया। सो जो होगा अच्छा होगा।
दल-बदल वालों का समायोजन
प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी सूची कई मायनों में राजनीतिक संदेश देती नजर आ रही है। इस जंबो सूची में न सिर्फ पार्टी के पुराने चेहरों को जगह मिली है, बल्कि कांग्रेस से आए नेताओं और रिटायर्ड अफसरों को भी संगठन में अहम जिम्मेदारी देकर संतुलन साधने की कोशिश की गई है। सबसे चौंकाने वाला नाम पूर्व राज्यपाल रमेश बैस का है, जिन्हें प्रदेश कार्यसमिति में स्थान दिया गया है।
सूची में पूर्व महापौर वाणी राव, पूर्व मंत्री विधान मिश्रा, चंद्रशेखर शुक्ला और बसपा से आई पूर्व विधायक कामदा जोल्हे जैसे नेताओं को स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। ये सभी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में शामिल हुए थे, जिससे साफ है कि पार्टी दल-बदल कर आए नेताओं को भी संगठन में समायोजित करने की रणनीति पर काम कर रही है।
इसी कड़ी में पूर्व आईएएस अफसर आरपीएस त्यागी और पूर्व आईएफएस एसएसडी बडग़ैय्या को भी प्रदेश कार्यकारिणी में जगह दी गई है। त्यागी पहले कांग्रेस से भी जुड़े रहे, लेकिन वहां अपेक्षित भूमिका न मिलने के बाद भाजपा में आ गए और अब संगठन में उन्हें स्थान मिल गया है। वहीं बडग़ैय्या रिटायरमेंट के बाद भाजपा में सक्रिय रहे। लोरमी से टिकट की दावेदारी के बावजूद मौका नहीं मिला, लेकिन संगठन में उनकी सक्रियता का लाभ अब उन्हें कार्यकारिणी में जगह के रूप में मिला है। कुल मिलाकर, भाजपा की यह कार्यकारिणी सूची राजनीतिक संतुलन, विस्तार और नए-पुराने चेहरों के समन्वय की रणनीति को दर्शाती है।
धान का कटोरे में अफीम का जाल
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहते हैं , लेकिन दुर्ग और बलरामपुर जैसे जिलों में हुई छापेमारी से पता चलता है कि यहां धान के मुकाबले हजारों गुना अधिक मुनाफा देने वाले अफीम की भी चोरी-छिपे खेती हो रही है। लेकिन इस छापेमारी के बाद एक नई बहस फिर सामने आ गई है। क्या अफीम की खेती को वैध कर देना चाहिए? ऐसा किया गया तो किसानों को आमदनी का नया स्रोत मिलेगा और अवैध कारोबार पर लगाम लगेगी। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में नियंत्रित लाइसेंस के तहत अफीम की खेती होती भी है, जिससे दवा उद्योग को कच्चा माल मिलता है। देश में करीब 22 जिले हैं जहां अफीम की खेती की जाती है पर लाइसेंस जारी करने के बाद ही यह छूट मिलती है। माना जाता है कि वैध खेती से भी अफीम का एक हिस्सा काले बाजार में पहुंच जाता है। सीमित लाइसेंस के बाद भी अन्य राज्यों में सरकार पूरी तरह निगरानी नहीं रख पा रही है। छत्तीसगढ़ में भी ऐसी ही समस्या सामने आ सकती है। पहले से ही शराब की घोर बिक्री और गांजे की भरपूर तस्करी वाले राज्य में नशे का एक नया कारोबार शुरू हो जाएगा। नशे के कारण होने वाले अपराध भी और बढ़ जाएंगे।
अफीम अपने मूल स्वरूप में थोड़ी सस्ती है पर उससे बनने वाली हेरोइन बेहद महंगे और खतरनाक हैं। अमेरिका जैसे देश ओपिओइड संकट से जूझ रहे हैं और लाखों लोग लत के शिकार हो रहे हैं। अपने यहां एक कटु सत्य की चर्चा होती है कि सरकारी राशन, खासकर चावल को बेचकर कुछ लोग शराब की तलब पूरी कर रहे हैं। मगर, अफीम से यह मुमकिन नहीं होगा। दवाओं के नाम मिलने वाले लाइसेंस का दुरुपयोग जरूर कुछ लोगों को मालामाल बना देगा।
पार्षद बनने का इंतजार
सरकारी उपक्रमों और संगठन के सभी मोर्चा प्रकोष्ठों में सभी तरह की नियुक्तियां हो चुकी हैं। इनमें नियुक्ति से बचे देवतुल्य कार्यकर्ता अब राजनीति की पहली सीढ़ी कहे जाने वाले मनोनीत पार्षद पद पर नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ नगर निगम/पालिका अधिनियम 1956 की धारा-9 के तहत नगरीय निकायों में एल्डरमैन और दिव्यांग मनोनीत सदस्य नियुक्त किए जाते है। निगमों में आठ, पालिकाओं में पांच और नगर पंचायतों में तीन एल्डरमैन नियुक्त किए जाते हैं। ये भले चुनकर न सही, मनोनीत होकर भी पार्षद के रूप में कथित जनसेवा कर सकते हैं। प्रदेश के 10 निगमों में 80, 49 पालिकाओं में 245 और 114 नगर पंचायतों 342 एल्डरमैनों की नियुक्ति की जानी है। इस प्रकार प्रदेश में कुल 667 कार्यकर्ता एल्डरमैन बन सकते हैं। अब देखना होगा कि सरकार इनकी नियुक्ति कब तक होती है।
वैसे सभी निर्वाचित निकायों का एक साल हो गया है। और कई में तो उपचुनाव की भी तैयारी है। यानी स्पष्ट है कि उप चुनाव तक तो इंतजार करना होगा। सरकार में और सरकार के निगम-मंडल, आयोग- प्राधिकरणों में जमीन पर संघर्षशील नहीं लेकिन संगठन के बड़े नेताओं, मंत्रियों की परिक्रमा करने वाले पद पाने में सफल रहे । देवतुल्य कार्यकर्ता को अब तक सिर्फ इंतजार कर रहे हैं।
वैसे बता दें कि पिछली सरकार ने भी दो वर्ष बाद में नियुक्ति की थी। संभव हो परंपरा बनी रही।
स्वागत के तरीके में बदलाव की कोशिश
2019 बैच की महाराष्ट्र कैडर की आईएएस अधिकारी मीनल करनवाल ने जिला पंचायत नांदेड़ के सीईओ पद का कार्यभार संभालने के दौरान स्वागत की संस्कृति में बदलाव की कोशिश की। जहां आमतौर पर अधिकारियों को गुलदस्ते और बुके भेंट किए जाते हैं, वहीं उन्होंने कहा कि मुझे रजिस्टर, कॉपियां, पेन, पेंसिल, स्केच पेन और जियोमेट्री बॉक्स जैसे सामान भेंट करें। करनवाल ने इन उपहारों को जिले के सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचा दिया।
किस-किस ने फव्वारे पर उन बच्चों की मूर्ति देखी है?
छत्तीसगढ़ के एक सबसे पुराने न्यूज-फोटोग्राफर, गोकुल सोनी जो आज भी सक्रिय हैं, उन्होंने रायपुर को ‘खूबसूरत’ं बनाने के सरकारी नज़रिए के बारे में लिखा है. आज उन्होंने फेसबुक पर दो तस्वीरें पोस्ट की हैं, और कहा है- साथियो, आज जो आप ये दो तस्वीरें देख रहे हैं, उनके पीछे सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे शहर की यादों, इतिहास और लापरवाही का पूरा किस्सा छिपा हुआ है।
पहली तस्वीर आजादी से पहले की है—कोतवाली चौक के पास की। उस समय वहाँ एक बड़ी गोल पानी की टंकी हुआ करती थी, जिसके बीचों-बीच एक खूबसूरत फव्वारा लगा था। और उस फव्वारे के केंद्र में थी दो बच्चों की बेहद प्यारी मूर्ति। जब फव्वारा चलता था, तो ऐसा लगता था मानो वे दोनों बच्चे खुशी-खुशी पानी में नहा रहे हों—जैसे बचपन खुद मुस्कुरा रहा हो। समय बदला और किसी कारणवश वह फव्वारा वहाँ से हटा दिया गया। लेकिन उन बच्चों की मूर्ति को बचाकर मोतीबाग में स्थापित कर दिया गया (दूसरी तस्वीर)। हम जैसे कई लोगों का बचपन उन मूर्तियों को पानी में नहाते हुए देखते-देखते बीता है।
फिर आया शहर को सुंदर बनाने का दौर, और यहीं से असली कहानी शुरू होती है। शहर सजाने की जिम्मेदारी जिनके हाथों में थी, उन्होंने शायद ‘सुंदरता’ं का मतलब कुछ ज्यादा ही आधुनिक तरीके से समझ लिया। धीरे-धीरे पुरानी धरोहरें हटती गईं और उनकी जगह ले ली ‘मीना बाजार’ जैसी सजावट ने। और उसी क्रम में, उन दो मासूम बच्चों की ऐतिहासिक मूर्ति भी ‘सजावट के बोझ’ में कहीं गायब हो गई। कहाँ गई? किसी को नहीं पता। शायद किसी कोने में या फिर कचरे में!
जहाँ इतिहास को संभालकर रखा जाना चाहिए था, वहाँ उसे अनावश्यक सामान समझकर हटा दिया गया। आज शायद ही कोई फेसबुक मित्र होगा जिसने कोतवाली चौक का वह पुराना फव्वारा देखा हो—क्योंकि बात आजादी से पहले की है। जिनसे मैंने यह तस्वीर प्राप्त की, वे प्रदेश के बहुत पुराने फोटोग्राफर गोडबोले जी थे। यह तस्वीर उनके पिताजी ने खींची थी। कभी-कभी लगता है कि हमारे शहर के कुछ जिम्मेदार लोग इतिहास को संभालने नहीं, बल्कि साफ करने के मिशन पर थे—जैसे पुरानी चीजें नहीं, कोई फालतू फाइलें हों जिन्हें हटाकर जगह खाली करनी हो।
खैर यह सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसी न जाने कितनी धरोहरें चुपचाप हमसे छिन गईं, और हमें पता भी नहीं चला। आपमें से किस-किस ने मोतीबाग वाले फव्वारे पर उन बच्चों की मूर्ति को देखा है? अपनी यादें जरूर साझा करें...
माओवाद के अंत में सिर्फ 13 दिन बाकी?
आज 17 मार्च है। बस्तर से माओवाद के खात्मे के लिए तय डेडलाइन 31 मार्च में अब सिर्फ 13 दिन बाकी रह गए हैं। बस्तर माओवादियों के रेड कॉरिडोर की सबसे मजबूत कड़ी था। अब यह निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। पहली बार केंद्र सरकार ने माओवादी हिंसा को पूरी तरह खत्म करने के लिए समयसीमा तय की और उसी के अनुरूप सुरक्षा बलों ने रणनीति, संसाधन और ऑपरेशन के स्तर पर तालमेल दिखाया है।
फरवरी 2025 में गृह मंत्री अमित शाह ने यह डेडलाइन घोषित की थी। इसके बाद सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ तेलंगाना की स्पेशल इंटेलिजेंस यूनिट ने मिलकर बस्तर के सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और दंतेवाड़ा के ऐसे कठिन इलाकों में घुसकर वह काम किया, जो दशकों तक संभव नहीं हो पाया था। अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस स्थापित भी किया गया।
इसके अलावा आधुनिक हथियार मोर्टार, यूबीजीएल, एके-47, ड्रोन, थर्मल इमेजर के साथ इंटेलिजेंस नेटवर्क को मजबूत किया गया। इसके चलते ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को अधिक नुकसान नहीं उठाना पड़ा। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट ने माओवादियों को उनके सुरक्षित ठिकानों से बाहर निकलने और सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया। अब हजारों की संख्या में माओवादी हथियार डाल चुके हैं।
इसी दौरान कई दुर्गम इलाकों में सडक़ें बनीं, मोबाइल टावर पहुंचे। जिन गांवों में पहले शासन का कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा था, वहां अब लोगों की समस्याओं को सुना जा रहा है। इससे स्थानीय युवाओं का सरकार पर भरोसा बढ़ा और माओवादी भर्ती पर असर पड़ा। डेडलाइन की घोषणा के बाद हिंसा की घटनाओं और मौतों में 80-85 प्रतिशत तक गिरावट बताई जा रही है। संगठन का शीर्ष नेतृत्व या तो खत्म हो चुका है या लगातार भाग रहा है।
अब सवाल सिर्फ इतना है कि क्या अगले 13 दिनों में यह अभियान पूरी तरह अपने लक्ष्य तक पहुंच पाएगा। पूरी तरह खत्म हो न हो, यह तो कहा जा सकता है कि माओवादी आंदोलन अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।
चुनाव पर्यवेक्षक यानी ‘वर्किंग टूर’ भी
पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ प्रशासनिक हलचल भी तेज हो गई है। नेताओं के साथ अब अफसर भी चुनावी जिम्मेदारियों के लिए मैदान में उतर रहे हैं। प्रदेश के 30 आईएएस और आईपीएस अफसरों को हाल ही में ट्रेनिंग दी गई थी, जिनमें 5 आईपीएस शामिल थे।
ताजा स्थिति यह है कि 12 आईएएस और 3 आईपीएस अफसरों को चुनाव पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। आईपीएस अफसरों में डॉ. अजय यादव, बद्रीनारायण मीणा और अंकित गर्ग को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। सभी अफसर अपने-अपने प्रभार वाले राज्यों के लिए रवाना हो रहे हैं।
जिन अफसरों की ड्यूटी नहीं लगी है, वे फिलहाल राहत महसूस कर रहे हैं। आमतौर पर चुनाव ड्यूटी को काफी चुनौतीपूर्ण और बोझिल माना जाता है, खासकर पश्चिम बंगाल जैसे संवेदनशील राज्यों में। यही वजह रही कि कुछ अफसरों ने ड्यूटी से बचने की कोशिश भी की।
हालांकि, चुनाव आयुक्त ने ट्रेनिंग के दौरान स्पष्ट किया था कि चयन पूरी तरह योग्यता और कार्यक्षमता के आधार पर किया गया है। इसके बावजूद कई अफसर पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आए।
दिलचस्प बात यह है कि सभी अफसर चुनाव ड्यूटी से बचना नहीं चाहते। कुछ ऐसे भी रहे हैं जो खुद इस जिम्मेदारी के लिए उत्सुक रहते थे। पूर्व आईएएस एस.एल. रात्रे का नाम भी ऐसे ही अधिकारियों में लिया जाता है, जो चुनाव पर्यवेक्षक बनने में खास रुचि रखते थे। उनके बारे में यह भी चर्चा रही कि जहां भी उनकी ड्यूटी लगी, वहां स्थानीय प्रशासन ने उनका विशेष स्वागत-सत्कार किया।
वहीं, इस बार भी कुछ अफसरों में उत्साह देखा जा रहा है, खासकर उन लोगों में जिन्हें केरल जैसे खूबसूरत राज्य में पर्यवेक्षक बनने का मौका मिला है। उनके लिए यह जिम्मेदारी के साथ-साथ एक तरह का ‘वर्किंग टूर’ भी बन गया।
फ्लाईओवर की मुखालफत..

रायपुर में तात्यापारा से शारदा चौक तक प्रस्तावित फ्लाईओवर को लेकर राजनीतिक और व्यावसायिक हलकों में विरोध के स्वर तेज होते दिख रहे हैं। सरकार ने भले ही इस महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी दे दी हो, लेकिन जमीन पर इसे लागू करना आसान नहीं नजर आ रहा। वर्तमान में शारदा चौक के आगे स्काईवॉक का निर्माण कार्य जारी है, जिसकी वजह से इलाके में लगातार जाम की स्थिति बनी रहती है। इसी के चलते स्थानीय व्यापारी संगठनों में नाराजगी बढ़ रही है और वे फ्लाईओवर योजना का विरोध कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़ा आंदोलन खड़ा होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक स्तर पर भी स्थिति सहज नहीं है। बृजमोहन अग्रवाल इस योजना से असहमत बताए जा रहे हैं, हालांकि उन्होंने अब तक सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है। कहा जा रहा है कि वे इस मसले पर सीएम विष्णु देव साय और डिप्टी सीएम अरुण साव से चर्चा कर सकते हैं।
अब देखना होगा कि सरकार विरोध के बीच इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए क्या रणनीति अपनाती है, या फिर स्थानीय दबाव के चलते इसमें कोई बदलाव किया जाता है।
ट्रेन आने की भ्रामक घोषणा

गोंदिया रेलवे स्टेशन की तस्वीर है। देर रात शिवनाथ एक्सप्रेस का इंतजार करते हुए एक यात्री ने सोशल मीडिया पर यह पोस्ट शेयर की है। डिस्पले में दिखाया जा रहा है कि ट्रेन 1 बजकर 48 मिनट पर पहुंचेगी। वह समय कब का बीत चुका। प्लेटफॉर्म पर लगी घड़ी बता रही है कि समय रात के 2 बजकर 6 मिनट हो चुके हैं। 1.48 बजे ट्रेन पहुंची ही नहीं, काफी देर बाद प्लेटफॉर्म आई। पर रेलवे का इलेक्ट्रॉनिक नोटिस बोर्ड उसी पर अटका रहा।
नाम और ओहदा
सत्ता चाहे बड़ी हो, चाहे छोटी, वह बददिमागी ला ही देती है। छोटे-छोटे से राजनीतिक ओहदों पर बैठे हुए लोग अपनी गाडिय़ों पर पदनाम की बड़ी-बड़ी सुनहरी तख्तियां जब तक लगवा नहीं लेते, वे उस गाड़ी की सीट पर टिक नहीं पाते। अब अभी छत्तीसगढ़ के राज्य उर्दू अकादमी बोर्ड के एक सदस्य की गाड़ी दिखी, जिस पर नियमों को तोड़ते हुए नंबर प्लेट के अक्षर तो चींटी के आकार के रखे गए हैं, लेकिन पदनाम की तख्ती पर सदस्य शब्द हाथी के आकार का लिखा गया है। जब तक कोई नीचे छोटे अक्षरों में लिखा राज्य उर्दू अकादमी पढ़े, तब तक यही लगेगा कि यह शायद संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य की गाड़ी है। नंबर प्लेट के नियम तोडऩे के पहले लोगों को कम से कम उस पदनाम का सम्मान तो करना चाहिए जिसकी बड़े-बड़े सुनहरे अक्षरों में नुमाइश की गई है।
मंत्री-नेता असम, बंगाल की ओर...
पांच राज्यों के चुनाव की घोषणा के बाद छत्तीसगढ़ भाजपा में हलचल तेज हो गई है। पार्टी के प्रमुख नेता अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए रवाना हो रहे हैं।
उप मुख्यमंत्री अरूण साव असम पहुंच चुके हैं, जहां वे अपने प्रभार की नौ विधानसभा सीटों के पदाधिकारियों की बैठक ले रहे हैं। वे मंगलवार को रायपुर लौटेंगे और विधानसभा सत्र निपटने के बाद फिर चुनावी अभियान के लिए रवाना हो जाएंगे।
वित्त मंत्री ओपी चौधरी भी असम में दस विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। चुनाव की घोषणा होते ही उन्होंने वहां के पार्टी नेताओं से फोन पर चर्चा कर रणनीति पर काम शुरू कर दिया।
इधर सरकार से जुड़े कई निगम-मंडलों के चेयरमैन और पदाधिकारी पश्चिम बंगाल में डेरा डाले हुए हैं। इन पदाधिकारियों ने 14 मार्च को हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली थी, जिसे पार्टी काफी सफल मान रही है।
बंगाल में सक्रिय पदाधिकारियों में क्रेडा चेयरमैन भूपेंद्र सिंह सवन्नी, नीलू शर्मा, अनुराग सिंहदेव, विश्व विजय सिंह तोमर सहित अन्य नेता शामिल हैं। सत्र निपटने के बाद सरकार के मंत्री, और विधायकों के साथ ही साथ संगठन के पदाधिकारी राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए निकल जाएंगे।
अफीम कांड पर सियासी पारा चढ़ा
प्रदेश में चर्चित अफीम कांड को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ा हुआ है। भाजपा नेता विनायक ताम्रकार की गिरफ्तारी के बाद से विपक्षी दल कांग्रेस सरकार पर हमलावर है और ताम्रकार के बड़े नेताओं से कथित संबंधों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है।
मामला सामने आते ही भाजपा ने त्वरित कार्रवाई करते हुए विनायक ताम्रकार को पार्टी से निलंबित कर दिया। अब तक की जानकारी में भाजपा के किसी बड़े नेता से उनकी घनिष्ठता जैसी बात स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है। हालांकि, चर्चा यह जरूर है कि उनकी रिश्तेदारी कांग्रेस के एक विधायक से जुड़ी बताई जा रही है।
सियासी गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि ताम्रकार के दुर्ग के एक पूर्व मंत्री से उनके मधुर संबंध रहे हैं। लेकिन अफीम कांड सामने आने के बाद से उस पूर्व मंत्री ने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस के कई स्थानीय नेता आरोपी विनायक ताम्रकार के खेत तक पहुंच गए, मगर पूर्व मंत्री दूरी बनाए रहे। विधानसभा में भी इस प्रसंग का उल्लेख पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर द्वारा किया जा चुका है।
इधर, मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। कहा जा रहा है कि छापेमारी से पहले अफीम के फल-पौधों से भरे चार कंटेनर बाहर भेज दिए गए थे। हालांकि पुलिस जांच में अभी तक इस तरह की किसी बात की पुष्टि नहीं हुई है।
पुलिस के मुताबिक दो अन्य संदिग्धों की तलाश में टीम राजस्थान गई हुई है। माना जा रहा है कि उनकी गिरफ्तारी के बाद इस पूरे मामले में कुछ नए खुलासे हो सकते हैं। तब तक अफीम कांड को लेकर प्रदेश की राजनीति गर्म बनी रहने के आसार हैं।
गैस की कतार और बढ़ती बेचैनी
ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत के बाजारों में भी दिखने लगा है। पेट्रोलियम आपूर्ति को लेकर आशंकाओं के बीच कई शहरों में रसोई गैस को लेकर हलचल बढ़ गई है। जगह-जगह सिलेंडर लेने के लिए कतारें लग रही हैं, जिससे लोगों में संकट की आशंका और गहरी हो रही है।
हालांकि प्रदेश के खाद्य विभाग का कहना है कि प्रदेश में रसोई गैस सिलेंडरों की कोई वास्तविक कमी नहीं है। विभाग का दावा है कि आपूर्ति सामान्य है, लेकिन एहतियात के तौर पर अब उपभोक्ताओं को 25 दिन में एक ही सिलेंडर दिया जा रहा है।
दूसरी ओर होटल और रेस्टोरेंट व्यवसाय सबसे ज्यादा प्रभावित नजर आ रहा है। होटल-रेस्टोरेंट संचालकों का कहना है कि पिछले लगभग पांच दिनों से उन्हें एक भी कमर्शियल सिलेंडर जारी नहीं किया गया। ऐसे में कई होटल और रेस्टोरेंट ने मजबूरी में इंडक्शन चूल्हों का सहारा लेना शुरू कर दिया है।
होटल-रेस्टोरेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष मिक्की दत्ता ने ‘छत्तीसगढ़’ से कहा कि इंडक्शन चूल्हों से काम चलाना आसान नहीं है। उनके मुताबिक इससे बिजली मीटर तेजी से चलता है, बिजली बिल बढ़ता है और लगातार उपयोग करने पर सुरक्षा का खतरा भी बना रहता है।
कहा जा रहा है कि कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति फिलहाल उद्योगों को प्राथमिकता के आधार पर दी जा रही है, जिसके कारण होटल-रेस्टोरेंट को सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं। उधर कुछ होटल संचालकों ने काम चलाने के लिए घरेलू सिलेंडर का उपयोग शुरू किया, तो उस पर प्रशासन ने कार्रवाई भी शुरू कर दी।
होटल संचालकों का कहना है कि यदि अगले दो-तीन दिनों में कमर्शियल सिलेंडरों की आपूर्ति शुरू नहीं हुई, तो कई होटल और रेस्टोरेंट को ताला लगाने की नौबत आ सकती है। इससे न केवल कारोबार प्रभावित होगा, बल्कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों की रोजी-रोटी पर भी असर पड़ सकता है।
मास्टर प्लान की जांच का पता नहीं
रायपुर के मास्टर प्लान में कथित अनियमितताओं का मामला एक बार फिर सियासी चर्चा में है। पूर्व मंत्री राजेश मूणत इस मुद्दे पर लगातार कार्रवाई की मांग कर रहे हैं और सरकार पर जांच पूरी कराने के लिए दबाव बनाए हुए हैं।
दरअसल, सरकार ने करीब दो साल पहले मामले की जांच के लिए एक समिति गठित की थी, लेकिन अब तक जांच पूरी नहीं हो पाई है। इसे लेकर सियासी हलकों में चर्चा है कि मूणत समेत भाजपा के कई नेता जांच में हो रही देरी से नाराज हैं। यही वजह है कि विधानसभा के लगभग हर सत्र में किसी न किसी रूप में यह मुद्दा उठता रहा है।
सरकार की ओर से अब तक यही जवाब आता रहा है कि जांच प्रक्रियाधीन है और इसके लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। हालांकि हालिया लिखित जवाब में थोड़ा बदलाव देखने को मिला है। सरकार ने कहा है कि जांच को शीघ्र पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है और जांच समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद उसके आधार पर समुचित कार्रवाई की जाएगी।
अब नजर इस बात पर है कि जांच कब तक पूरी होती है और रिपोर्ट सामने आने के बाद सरकार किस तरह की कार्रवाई करती है। फिलहाल, यह मुद्दा आने वाले समय में भी राजनीतिक बहस का विषय बना रह सकता है।
‘शराब’ पर गरमाया माहौल
‘शराब’ अब ऐसा मुद्दा बन चुका है, जिस पर विपक्षी कांग्रेस अक्सर असहज नजर आती है। हाल ही में विधानसभा में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला। भाजपा विधायक शकुंतला पोर्ते ने अपने क्षेत्र प्रतापपुर में पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और झारखंड से अवैध शराब की आवक का मुद्दा उठाते हुए सरकार से पूछा कि इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
इस पर आबकारी मंत्री लखनलाल देवांगन के जवाब देने से पहले ही कांग्रेस विधायक रामकुमार यादव ने तपाक से कहा—शराब भट्टी खोलेंगे। इतना सुनते ही सदन में ठहाके गूंज उठे।
हालाँकि पहली बार विधायक बनीं शकुंतला पोर्ते ने तुरंत पलटवार करते हुए कहा—आप लोग तो 2 हजार करोड़ रुपये के शराब घोटाले में बैठे हैं। इस टिप्पणी के बाद विपक्षी कांग्रेस सदस्यों में हलचल मच गई।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी हस्तक्षेप करते हुए सरकार से पूछा कि शराब घोटाले में अब तक क्या कार्रवाई हुई और कितनी रिकवरी की गई है। जवाब में आबकारी मंत्री देवांगन ने बताया कि इस मामले में 22 अधिकारियों को निलंबित किया गया है।
लेकिन बघेल इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुए और रिकवरी का स्पष्ट आंकड़ा मांगने लगे। मंत्री ने जब कहा कि यह प्रश्न के दायरे में नहीं आता, तो बघेल नाराज हो गए और जवाब देने पर जोर देने लगे। बाद में स्पीकर के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हो सका।
मीडिया पर भी जताई नाराजगी
सदन की कार्यवाही के बाद पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने मीडिया पर भी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि अफीम कांड के आरोपी के किस भाजपा नेता, सांसद, विधायक या मंत्री से संबंध हैं, इस पर कोई खबर नहीं छप रही है। बघेल का कहना था कि हमारी सरकार के समय तो हर किसी को भूपेश का करीबी बताकर खबरें चला दी जाती थीं।
बहिष्कार का दांव पड़ा उल्टा
विधानसभा का बजट सत्र इन दिनों पूरे जोर पर है। विपक्ष अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन कई बार सदन से बहिर्गमन या बहिष्कार का दांव उल्टा भी पड़ जाता है। हाल ही में राजस्व विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान ऐसा ही देखने को मिला।
चर्चा की शुरुआत होते ही विपक्षी कांग्रेस सदस्यों ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया और बाहर निकल गए। विपक्ष का आरोप था कि अधिकारी दीर्घा में जिम्मेदार अफसर मौजूद नहीं हैं। इस पर सभापति ने स्पष्ट किया कि राजस्व विभाग के विशेष सचिव समेत अन्य अधिकारी मौजूद हैं, लेकिन विपक्ष ने राजस्व सचिव की अनुपस्थिति को मुद्दा बनाते हुए बहिष्कार का फैसला कायम रखा।
विपक्ष की गैरमौजूदगी में ही राजस्व विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा आगे बढ़ती रही। करीब पौने घंटे बाद विपक्षी सदस्य वापस सदन में लौटे, लेकिन तब तक चर्चा अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी। कई विपक्षी सदस्य राजस्व और उच्च शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखना चाहते थे, मगर समयाभाव के कारण स्पीकर ने अनुमति नहीं दी, क्योंकि आगे अन्य विभागों की अनुदान मांगों पर चर्चा होनी थी।
इस पर वरिष्ठ विधायक धर्मजीत सिंह ने विपक्ष के रवैये पर फटकार लगाते हुए कहा कि हर बार बहिष्कार करना समाधान नहीं है। उन्होंने टिप्पणी की—जब अपनी बात रखनी थी, तब सदन से बाहर चले गए—इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है।
दिलचस्प बात यह रही कि विपक्ष की ओर से द्वारकाधीश यादव और दलेश्वर साहू ऐसे सदस्य थे, जिन्होंने बहिष्कार खत्म होने से पहले ही सदन में लौटकर अपनी बात रख दी। बाकी विपक्षी सदस्य अवसर से चूक गए और उन्हें बोलने का मौका नहीं मिल पाया।
ढाई साल का हिसाब मांग रहे...
अधिक दिनों की बैठक वाले विधानसभा के बजट सत्र का पक्ष विपक्ष को हर साल इंतजार रहता है। इस बार दो सप्ताह की कार्यवाही शुक्रवार को पूरी हो गई। इन दो सप्ताह का सिंहावलोकन किया जाए तो ढाई साल के कार्यकाल का निचोड़ दिखता है। सदन में विपक्ष से अधिक सत्ता पक्ष के विधायक आक्रामक रहे। विपक्ष के लिए कहा जा सकता है कि उसका धर्म ही है विरोध करना।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समेत सत्ता पक्ष के विधायक मंत्री से दो टूक कहते रहे कि इस बार पिछली सरकार के कामकाज को छोड़ ढाई साल की स्थिति बताएं। चाहे किरण देव हों, चाहे पूर्व अध्यक्ष विक्रम उसेंडी या फिर बस्तर संभाग की प्रभावशाली राष्ट्रीय उपाध्यक्ष लता उसेंडी—सभी ने मंत्रियों को निरुत्तरित-सा रखा। अजय चंद्राकर, भाजपा में नए आए लेकिन अनुभवी धर्मजीत सिंह हो या पहली बार के प्रबोध मिंज, सुशांत शुक्ला, शकुंतला पोर्ते—सभी ने विकास कार्यों, फंड के दुरुपयोग को लेकर गंभीर तथ्य रखे। मंत्री ऐसे अपनों से घिरे रहे। कई मामलों में जांच की घोषणा करने को मजबूर हुए।
वहीं कांग्रेस से नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत, पूर्व सीएम भूपेश बघेल, पूर्व मंत्री उमेश पटेल, लखेश्वर बघेल, दो बार के विधायक कुंवर निषाद, संगीता सिन्हा ने भी सरकार को आईना दिखाया। विपक्ष ने डिप्टी सीएम के विभागों की अनुदान मांगों पर मतविभाजन कराकर सत्ता पक्ष के फ्लोर मैनेजमेंट को उजागर करने में सफलता हासिल की। पक्ष-विपक्ष के इन तेवरों को देखते हुए सोमवार से अंतिम दिनों की कार्यवाही को लेकर भी सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
डेप्युटेशन, सुप्रीम कोर्ट को केंद्र की चुनौती
केंद्रीय सुरक्षा बलों के मूल कैडर और उच्च पदों पर आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति पर चल रही खींचतान पर एक अहम निर्णायक मोड़ आया है। इस पर हम इसी कॉलम में लगातार जानकारी दे रहे थे। इसके मुताबिक मूल कैडर के अधिकारियों ने आईपीएस की प्रतिनियुक्ति से अपनी पदोन्नति रुकने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर कोर्ट ने केंद्र से इन प्रतिनियुक्तियों को शनै:-शनै: कम करने का निर्देश दिया था, जो तीन से पांच साल बाद रोक लग जाती। इस स्थिति को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को आंख दिखाते हुए प्रतिनियुक्ति जारी रखने के लिए सीधे विधेयक ही मंजूर किया है, जो संसद के इसी सत्र में पारित किया जाएगा। कैबिनेट ने सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) बिल के ड्राफ्ट को मंजूरी दे दी है। यह एक कानूनी दखल है, जिसका मकसद बलों में आईजी और डीआईजी लेवल पर आईपीएस के डेप्युटेशन का प्रावधान बनाए रखना है। यह पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बावजूद आया है, जिसमें इन बलों में ग्रुप ए अधिकारियों के लिए सभी मकसदों के लिए 'ऑर्गनाइज्ड सर्विसेज' स्टेटस कन्फर्म किया गया था और डेप्युटेशन पोस्टिंग को धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया गया था।
केंद्रीय सुरक्षा बलों के मौजूदा भर्ती नियमों के मुताबिक, डीआईजी लेवल पर 20त्न और आईजी लेवल पर 50त्न पोस्ट आईपीएस अधिकारियों के लिए डेप्युटेशन पोस्ट हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को बलों में लगभग 13,000 कैडर अधिकारियों के लिए करियर में एक पोटेंशियल बूस्ट के तौर पर देखा गया, जो आईपीएस अफसरों के आने की वजह से भेदभाव की शिकायत कर रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि केंद्र ने सोमवार को ही सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया था, जिसमें केंद्रीय बलों द्वारा मौजूदा ग्रुप ए कैडर के लिए एक पूरी समीक्षा पूरी करने और कोर्ट के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई के लिए सरकार को कैडर रिव्यू प्रस्ताव जमा करने के लिए एक साल का और समय मांगा गया था।
धंधेबाज तय करते हैं!
एक तरफ तो चारों तरफ गाडिय़ाँ बढ़ रही हैं, ट्रैफिक भी बढ़ रहा है, पार्किंग की जगह बुरी तरह कम पड़ रही है। ऐसे में राजधानी रायपुर की समता कॉलोनी की मुख्य सडक़ पर दोनों तरफ लगभग हर मकान एक दुकान या रेस्टोरेंट में बदल चुका है। ट्रैफिक जाम हमेशा रहता है। लोगों को किसी दुकान के सामने अपनी गाड़ी रोकने की जगह नहीं मिलती। और ऐसे में इस सडक़ पर एक धर्मशाला भवन के बाहर आधी सडक़ को घेरते हुए एक शामियाना भी लगा दिया गया, जिसमें खाने-पीने का इंतजाम था। सारा खाना-पीना सडक़ पर!
अब किराया भंडार वाले यह तय करते हैं कि शहर में कहाँ स्वागत द्वार लगेगा, किस त्योहार पर लगेगा और बाद में आने वाले कई महीनों तक वहाँ बना रहेगा, क्योंकि कुछ और त्योहार भी बाद में आते हैं, जिनसे किराया मिलेगा। पंडाल सडक़ पर कितना बड़ा लगेगा, कैसे लगेगा, कब लगेगा, यह भी किराया भंडार वाले तय करते हैं।
बड़ी दिलचस्प बात यह है कि सरकार के कंस्ट्रक्शन ठेकेदार तय करते हैं, स्कूलों को या दूसरे सरकारी विभागों को कौन-सा सामान खरीदना है, यह सप्लायर तय करते हैं। और सार्वजनिक जगहों पर जगह घेरकर पंडाल-शामियाने लगाने का फैसला किराया भंडार वालों के पास है। सरकार और समाज कई किस्म के फैसलों के बोझ से मुक्त हैं।
विधानसभा में 20-20?
छत्तीसगढ़ विधानसभा के नए भवन में पहला बजट सत्र अंतिम सत्र की ओर है। उससे पहले तीसरे सप्ताह के आज अंतिम दिन समय से पहले सत्रावसान की चर्चा होने लगी है। कल रात अचानक हुई भाजपा विधायक दल की बैठक के बाद से पक्ष और विपक्ष के खेमे में चर्चा है कि सत्र 20 मार्च के बजाय 17-18 को मानसून सत्र तक के लिए स्थगित किया जा सकता है। इसे देखते हुए विधानसभा सचिवालय भी सरकारी कामकाज निपटाने में जुट गया है। आज एकमुश्त 77 ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पेश किए जाने से भी इसकी प्रबल संभावना बढ़ गई हैं। ऐसा सत्र के अंतिम दिनों में ही होता है। सत्र 23 फरवरी से शुरू हुआ था। पहले सप्ताह अभिभाषण, बजट प्रस्तुति की कार्रवाई हुई। उसके बाद सप्ताह भर का होली अवकाश रहा। 9 मार्च से कार्यवाही 20-20 की तरह संचालित कर मंत्रियों के विभागों के बजट मांगे पारित कराईं गई। सोमवार को आधा दर्जन से अधिक विधेयक पेश कर पारित कराए जाने है। इनमें सरकार का महत्वाकांक्षी धर्मांतरण रोधी विधेयक भी शामिल हैं। अगले दिन विनियोग विधेयक पारित कर समापन किए जाने की चर्चा है। इस सत्र में पहली बार अस्वस्थता और आपरेशन की वजह स्पीकर शामिल नहीं हो सके। हालांकि उन्होंने बाहर से ही नजर रखा । इस दौरान सभापतियों धरम लाल कौशिक, धर्मजीत सिंह और प्रबोध मिंज ने बेहतर संचालन किया। श्री मिंज ने तो मतविभाजन भी हल किया। इस तरह से पिछले कई सत्रों की तरह यह बजट सत्र भी समय से पहले अवसान की ओर अग्रसर है।
सरकारी बोर्ड इश्तहार के लिए

किसी गैरजिम्मेदार समाज में किसी सरकारी नोटिस, किसी जगह का पता-ठिकाना बताने वाले बोर्ड पर भी लोग इश्तहार चिपका देते हैं। सडक़ों के बीच में डिवाइडरों के सिरे पर गाडिय़ों को सावधान करने के लिए लगाए गए रिफ्लेक्टरों को तो मानो सिनेमा के पोस्टर लगाने के लिए ही बनाया गया है। अब चूंकि यह राजधानी है, यहां राजनीतिक हलचल बहुत रहती है, स्थानीय म्युनिसिपल में भी बहुत नेता रहते हैं, इसलिए उनके राजनीतिक बैनर-पोस्टर के लिए जगह कम पड़ती है। सडक़ों पर जो बड़े-बड़े स्वागत द्वार जैसे गेट लगाए जाते हैं, वहां पर आगे की जगहों के नाम लिखे रहते हैं, ताकि दूसरे शहर से आए हुए लोग पता-ठिकाना जान सकें, उन पर भी राजनेताओं के बैनर और बोर्ड सज जाते हैं, जिन्हें पता जानना हो, वे जाएं भाड़ में। फिलहाल नेताओं पर तो किसी का बस चलता नहीं, अफसर कम से कम सरकारी बोर्ड पर लगाए जाने वाले दूसरे तरह के नोटिसों पर कार्रवाई तो कर सकते हैं?
धर्मांतरण कानून पर हलचल
छत्तीसगढ़ सरकार भी धर्मांतरण के खिलाफ नया कानून बनाने जा रही है। इस सिलसिले में कैबिनेट ने धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के प्रारूप को मंजूरी दे दी है। माना जा रहा है कि यह विधेयक विधानसभा सत्र के आखिरी दिन पेश किया जा सकता है। दिलचस्प यह है कि जहां राज्य में नया धर्मांतरण कानून लाने की तैयारी चल रही है, वहीं कानून बनने से पहले ही इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट से सरकारों को नोटिस जारी हो चुका है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ समेत करीब एक दर्जन राज्यों को नोटिस जारी किया है। इन राज्यों में पहले से धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं। कोर्ट ने सभी राज्यों से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। इस मामले की सुनवाई तीन जजों की पीठ इस माह के अंत में करेगी।
छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां अवैध धर्मांतरण के खिलाफ कानून अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से प्रभावी रहा है। राज्य बनने के बाद भी वही व्यवस्था जारी रही, लेकिन अब सरकार नया कानून लाने की तैयारी में है। चर्चा है कि प्रस्तावित कानून में अवैध धर्मांतरण के मामलों में एक से 10 साल तक की सजा का प्रावधान रखा जा सकता है।
अगर दूसरे राज्यों से तुलना करें तो उत्तर प्रदेश का धर्मांतरण कानून सबसे सख्त माना जाता है, जिसमें गंभीर मामलों में 20 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इन कानूनों को भेदभाव को बढ़ावा देने वाला बताया गया है। ऐसे में साफ है कि धर्मांतरण कानून का मुद्दा आने वाले दिनों में अदालत और राजनीति—दोनों जगह हलचल पैदा करता रहेगा।
डेपुटेशन पालिसी बदली, छत्तीसगढ़ ग्रुप 2 में
केंद्र ने आईएएस आईपीएस आईएफएस अधिकारियों के कैडर आबंटन और प्रतिनियुक्ति सिस्टम में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव किया है। यह बदलाव 2026 यूपीएससी बैच से लागू हो जाएगा। इसके जानकार अफसरों ने यहां बताया कि अब तक के पांच-ज़ोन सिस्टम को चार नए ग्रुप से बदल दिया गया है: (1) नॉर्थ (जेएंडके, हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड); (2) ईस्ट (यूपी, बिहार, वेस्ट बंगाल, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़); (3) वेस्ट और सेंट्रल (एमपी, महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा); और (4) साउथ और नॉर्थ-ईस्ट (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, और नॉर्थ-ईस्ट राज्य)। इसका मकसद कैडर की पसंद को बैलेंस करना और खाली जगहों को भरना है। दक्षिणी राज्य (कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, ओडिशा) अब ग्रुप 2 और 4 में आते हैं, जिससे इंटर-स्टेट डेप्युटेशन बढ़ सकते हैं। यह पॉलिसी 2026 बैच से पूरी तरह लागू होगी।
तैयारी के साथ उतरे गजेन्द्र...
स्कूल शिक्षा विभाग से जुड़े मामलों और कथित गड़बडिय़ों को लेकर विधानसभा में कई सवाल उठे, लेकिन मंत्री गजेन्द्र यादव ने अपेक्षाकृत मजबूती से उनका सामना किया। मंत्री बनने के बाद पहली बार वे इस तरह विस्तार से सदन में सवालों का जवाब दे रहे थे, और उन्होंने लगभग हर मुद्दे पर तथ्यात्मक जवाब देकर विपक्ष के हमलों को काफी हद तक निष्प्रभावी कर दिया।
जंबूरी कार्यक्रम के खर्च और टेंडर प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने उन्हें घेरने की कोशिश जरूर की। इस मुद्दे पर उनकी अपनी पार्टी के सांसद बृजमोहन अग्रवाल पहले से ही सवाल उठा चुके हैं और स्काउट्स एंड गाइड्स के चेयरमैन पद पर यादव की नियुक्ति को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं। ऐसे में सदन में यह मुद्दा उनके लिए असहज हो सकता था।
विपक्ष के पास घेरने का मौका भी था और सवाल भी खूब हुए, लेकिन गजेन्द्र यादव पूरी तैयारी के साथ आए थे। उन्होंने तथ्यों के साथ जवाब दिए और कई मामलों में पहले से ही जांच बैठाए जाने की जानकारी भी दी, खासकर समग्र शिक्षा मद से हुई खरीदी को लेकर।
हालांकि विपक्ष उनके जवाबों से संतुष्ट नहीं हुआ और अंतत: वाकआउट कर दिया, लेकिन सदन की कार्यवाही में गजेन्द्र यादव का प्रदर्शन अपेक्षाकृत मजबूत माना गया। कई वरिष्ठ मंत्रियों की तुलना में उन्होंने मुद्दों को अधिक व्यवस्थित ढंग से रखा और विपक्ष की घेराबंदी को काफी हद तक संभाल लिया।
बढ़ती महंगाई के साथ सात आयोग...
आठवें वेतन आयोग का काम जैसे जैसे गति पकड़ रहा है वैसे कर्मचारी और पेंशनरों की इसके लागू होने की तारीख पर नजर रखे हुए हैं। फिलहाल आयोग ने सभी स्टेक होल्डरों से 30 अप्रैल तक नए वेतन भत्तों को लेकर अपने मांगें और सुझाव अपनी वेबसाइट पर मांगा है।
ऐसे में अक्सर एनालाइज़ होने वाली खास बातों में से एक है किसी पे कमीशन में कर्मचारियों की मिनिमम और मैक्सिमम बेसिक पे के बीच का रेश्यो (औसत) क्या होगा। इसे कम्प्रेशन रेश्यो भी कहा जाता है, जोकेंद्र सरकार की सेवाओं में सबसे कम और सबसे ज़्यादा बेसिक सैलरी के बीच के अंतर को दिखाता है।
अब तक के सभी 7 आयोगों में सबसे कम और सबसे ज़्यादा बेसिक सैलरी में बढ़ती मंहगाई अनुसार वृद्धि होती रही है।
पहले सेंट्रल पे कमीशन (1946-47) के तहत, मिनिमम बेसिक पे रु. 55 प्रति महीना था, जबकि मैक्सिमम बेसिक सैलरी रु. 2,000 थी, जिससे कम्प्रेशन रेश्यो 1:36.4 हो गया।दूसरे सेंट्रल पे कमीशन (1957-59) के तहत, मिनिमम पे क्रह्य 80 प्रति महीना था, जबकि मैक्सिमम पे 3,000 रूपए प्रति महीना था, जिससे कम्प्रेशन रेश्यो 1:37.5 हो गया। यह सबसे ज़्यादा बेसिक पे और सबसे कम बेसिक पे के बीच अब तक का सबसे बड़ा गैप भी था।
तीसरे पे कमीशन (1972-73) में, मिनिमम पे 196 रुपये प्रति महीना और मैक्सिमम पे 3,500 रुपये प्रति महीना था, जिसका कम्प्रेशन रेशियो 1:17.9 था।
चौथे सेंट्रल पे कमीशन (1986) में, मिनिमम पे 750 रुपये प्रति महीना और मैक्सिमम पे 8,000 रुपये प्रति महीना था, जिससे कम्प्रेशन रेशियो 1:10.7 हो गया।पांचवें सेंट्रल पे कमीशन (1996) में, मिनिमम पे 2,550 रुपये और मैक्सिमम पे 26,000 रुपये था, जिससे कम्प्रेशन रेशियो 1:10.2 हो गया। यह किसी भी पे कमीशन में अब तक का सबसे कम कम्प्रेशन रेशियो भी था।
छठे आयोग ने (2006) में, मिनिमम सैलरी रु. 7,000 और मैक्सिमम सैलरी रु. 80,000 थी, जिससे कम्प्रेशन रेश्यो 1:11.4 हो गया। 7 वे आयोग ने मिनिमम सैलरी रु.18,000 और मैक्सिमम सैलरी रु. 2,50,000 है, जिससे कम्प्रेशन रेश्यो 1:13.9 किया। और आठवें आयोग से केंद्रीय कर्मचारी संघ खासकर नेशनल फेडरेशन ऑफ पोस्टल आर्गनाइजेशन ने सबसे कम और सबसे ज़्यादा बेसिक सैलरी के बीच के गैप को कम करने के लिए 1:8 के कम्प्रेशन रेश्यो की है। 18 महीने बाद आयोग की रिपोर्ट आने पर ही स्पष्ट हो पाएगा।
जीएसटी और पहेली
जीएसटी की जटिलताएं कम नहीं रहतीं। किसी कंपनी या कारोबार को उसके लिए खरीदे गए मोबाइल फोन पर जीएसटी रिफंड मिलना चाहिए या नहीं, इसके नियम खासे जटिल हैं। अगर उस फोन का जरा भी इस्तेमाल किसी निजी काम से हो रहा है, तो फिर बाकी कारोबारी काम की वजह से जीएसटी रिफंड का दावा नहीं किया जा सकता। ऐसा बहुत सारे सामानों के साथ है जिन्हें कारोबारी माना जाए, या निजी? कई लोग थोड़ा सा खतरा मोल लेकर रिफंड का दावा कर लेते हैं, और कोशिश करते हैं कि उनका दावा खप जाए।
अभी सोशल मीडिया पर लोगों ने जीएसटी को लेकर कुछ मजे लिए। एक सवाल रखा गया कि पनीर-बटर-मसाला पर कितना जीएसटी लगेगा? पनीर पर जीएसटी पांच फीसदी है, बटर पर बारह फीसदी, और मसाला पर फिर पांच फीसदी। तो पनीर-बटर-मसाला को किस दर्जे में गिना जाए? आप भी दिमाग लगाकर देखिए!
ऐसी गलती, गलती नहीं, गलत काम है
सरकारें विज्ञापन एजेंसियों को सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना का काम देती हैं, इसके बाद भी अगर कोई एजेंसी लापरवाही करती है, तो वह हैरानी की बात रहती है। खुद सरकार के अलग-अलग विभाग कई बार ऐसी चूक करते हैं, और पिछले कम से कम दस-बीस बरस से इंटरनेट रहने के बावजूद, उस पर चीजों को जांच-परख लेने की मुफ्त सहूलियत होने के बावजूद अगर बड़ी-बड़ी गलतियां सरकारी पोस्टर, कैलेंडर, और इश्तहारों में होती हैं, तो वे माफी के लायक नहीं रहतीं। ऐसा केन्द्र सरकार, और बहुत सी राज्य सरकारों के साथ होते आया है। ताजा मामला मध्यप्रदेश सरकार का है, जिसके इस बरस के कैलेंडर में प्रदेश के हिरण बताते हुए जो तस्वीर छापी गई है, वे हिरण-चीतल न होकर अफ्रीका में पाए जाने वाले इम्पाला हैं, और यह तस्वीर इस कैलेंडर के बहुत पहले से दुनिया के वन्यजीवन पर्यटन में जगह-जगह छपती रही है। यूगांडा के क्वीन एलिजाबेथ नेशनल पार्क में पर्यटकों को आमंत्रित करने वाला इश्तहार इस तस्वीर को काफी अरसे से इंटरनेट पर दिखा रहा है, और ये इम्पाला वहीं के हैं।
सरकारें विज्ञापन एजेंसियों को, डिजाइनरों और सलाहकारों को खासा पैसा देती हैं, और इस तरह की गलतियां जो करें, उन पर सरकार को कुछ तो करना चाहिए। पहले भी केन्द्र और राज्य सरकारों की योजनाओं की सफलता की कहानियों में किसी दूसरे प्रदेश के लोगों की तस्वीरें आती रही हैं, या कई मामलों में तो किसी दूसरे देश के फ्लाईओवर जैसे ढांचे भी हिन्दुस्तान के बताकर छापे जाते रहे हैं। इससे परले दर्जे की लापरवाही साबित होती है, जिसका भुगतान उसी को करना चाहिए जिसे इस काम का भुगतान मिल रहा है।
होली पर डांस, और पुलिस
होली के मौके पर रायपुर पुलिस कमिश्नरेट क्षेत्र कुल मिलाकर शांत रहा। पुलिस ने किसी भी तरह के हुड़दंग या अव्यवस्था पर नजर रखने के लिए ड्रोन से निगरानी की व्यवस्था कर रखी थी। कहीं-कहीं छिटपुट घटनाएं सामने आईं, लेकिन उन पर भी तुरंत कार्रवाई कर दी गई।
इसी बीच शहर के एक पुराने और प्रतिष्ठित क्लब की होली पार्टी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में एक व्यापारी नेता शर्ट उतारकर डांस करते नजर आ रहे थे। वीडियो पुलिस तक पहुंचा तो मामला जांच का विषय बन गया।
पुलिस ने यह पड़ताल शुरू की कि संबंधित क्लब के पास आबकारी विभाग से बार लाइसेंस है या नहीं। आबकारी विभाग ने पुलिस को बताया कि क्लब को बार लाइसेंस जारी नहीं किया गया है। इसके बाद सोमवार को पुलिस टीम क्लब पहुंची और वहां काफी देर तक जांच-पड़ताल की। हालांकि जांच में कोई आपत्तिजनक बात सामने नहीं आई, इसलिए पुलिस टीम वापस लौट गई। लेकिन क्लब के पदाधिकारियों को सख्त हिदायत दी गई है कि आगे इस तरह की कोई घटना सामने आई तो क्लब को सील करने के साथ ही कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।
दिल्ली का नया सियासी रास्ता
अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में छत्तीसगढ़ की राजनीति का रास्ता भोपाल होकर दिल्ली जाता था। सत्ता का समीकरण भी ऐसा ही था कि भोपाल की सीढ़ी चढ़े बिना दिल्ली के दरवाजे तक पहुंचना आसान नहीं होता था। समय बदला, छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया और भोपाल का सियासी बैरियर अपने आप खत्म हो गया। उसके बाद छत्तीसगढ़ के नेता सीधे दिल्ली की उड़ान भरने लगे। लेकिन अब लगता है कि राजनीति के नए समीकरण में दिल्ली का रास्ता शायद पटना होकर गुजर सकता है।
चौंकिए मत, यह किसी विमान सेवा का नया रूट मैप नहीं है, बल्कि राजनीति के बदलते गणित की कहानी है। दरअसल कुछ महीने पहले तक छत्तीसगढ़ बीजेपी के प्रभारी रहे नितिन नबीन अब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं। वे बिहार से आते हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि दिल्ली के साथ-साथ पटना भी अब राजनीतिक समीकरणों का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाए। नितिन नबीन का छत्तीसगढ़ के लगभग हर नेता से सीधा संवाद और समीकरण रहा है।
इसी बीच छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा को बिहार में राज्यसभा चुनाव के लिए ऑब्जर्वर बनाया गया। सामान्य तौर पर ऐसी नियुक्तियां संगठनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं, लेकिन राजनीति में सामान्य शब्द अक्सर असामान्य संकेत भी दे जाता है। खास बात यह है कि बिहार के जिस राज्यसभा चुनाव की जिम्मेदारी विजय शर्मा को दी गई है, उसमें खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी उम्मीदवार हैं। ऐसे में इस हाई-प्रोफाइल चुनाव में उन्हें जिम्मेदारी मिलना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय है।
सवाल यह है कि इतने नेताओं के बीच से ऑब्जर्वर के रूप में विजय शर्मा ही क्यों? विजय शर्मा पहली बार विधायक बने और सीधे उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। छत्तीसगढ़ की राजनीति में उन्हें भाजपा के मुखर हिंदुत्व चेहरे के तौर पर भी देखा जाता है। अब जब बिहार के चुनावी मैदान में उन्हें जिम्मेदारी दी गई है, तो विश्लेषक यह जोड़-घटाव भी कर रहे हैं कि क्या यह महज चुनावी ड्यूटी है या फिर नई राष्ट्रीय टीम की संभावित झलक? क्योंकि राजनीति में कई बार पद से ज्यादा भूमिका मायने रखती है और कई बार कोई जिम्मेदारी बड़े रास्ते की शुरुआत बन जाती है।
कहते हैं दिल्ली की राजनीति में पहुंचने के कई रास्ते होते हैं। कोई सीधे राजधानी से जाता है, कोई संगठन के रास्ते और कभी-कभी कोई रास्ता पटना होकर भी गुजर जाता है। अब देखना यह है कि उपमुख्यमंत्री का यह बिहार प्रवास सिर्फ एक चुनावी जिम्मेदारी बनकर रह जाता है या आने वाले दिनों में किसी बड़ी राजनीतिक पटकथा का पहला दृश्य साबित होता है।
ट्रांसजेंडर्स के लिए वाश रूम
छत्तीसगढ़ का नया विधानसभा भवन देश के सबसे आधुनिक और सुविधा संपन्न विधानसभाओं में गिना जा रहा है। संभवत: यह देश का ऐसा अनूठा विधानसभा भवन है, जहां हर तरह की सुविधाओं और नियमों का ध्यान रखते हुए इसे उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा उतारने की कोशिश की गई है। यह एक ग्रीन बिल्डिंग है, जो सौर ऊर्जा से संचालित होती है और वर्षा जल संचयन प्रणाली से भी सुसज्जित है। करीब 51 एकड़ क्षेत्र में फैले इस विधानसभा भवन के निर्माण पर लगभग 300 करोड़ रुपये की लागत आई है। अभी भी कुछ कार्य बाकी हैं, जिनके लिए बजट का प्रावधान किया गया है।
यह भवन अन्य राज्यों की विधानसभाओं की तुलना में इसलिए भी अलग माना जा रहा है, क्योंकि यहां कई ऐसी सुविधाएं उपलब्ध हैं जो अधिकांश जगहों पर नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर यहां पुरुषों, महिलाओं और दिव्यांगों के लिए अलग-अलग वाशरूम बनाए गए हैं। खास बात यह है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए भी अलग वाशरूम है। इससे पहले किसी विधानसभा भवन में ट्रांसजेंडरों के लिए ऐसी व्यवस्था सुनने में नहीं आई थी। सदन की कार्यवाही देखने आने वाले ट्रांसजेंडर दर्शकों को भी यहां सुविधा मिल सके, इसका विशेष ध्यान रखा गया है।
दिलचस्प बात यह भी है कि मंत्रालय और विभागाध्यक्ष भवनों में भी कई सुविधाएं ऐसी नहीं हैं, जैसी इस नए विधानसभा भवन में उपलब्ध हैं। इस भवन का निर्माण आने वाले लगभग सौ वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया गया है। हालांकि इतनी आधुनिक सुविधाओं के बावजूद कुछ लोग अब भी पुराने विधानसभा भवन को बेहतर मानते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि नए परिसर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक आना-जाना अपेक्षाकृत लंबा और थकाऊ हो जाता है। सत्र के दौरान यहां काफी चहल-पहल रहती है, लेकिन बाकी दिनों में परिसर अपेक्षाकृत शांत और सुनसान नजर आता है।
इस परिसर में आने वाले माननीय लोगों को यह जानकारी देना जरूरी है कि दुनिया में सेहत विशेषज्ञ कहते हैं कि हर किसी को हर दिन 10 हज़ार कदम पैदल चलना चाहिए। सत्र के दौरान इसकी आदत डालने का अच्छा मौका है। विधायकों के इलाज का खर्च भी इससे घट सकता है।
मुजरिमों से सहमी पार्टी
दुर्ग जिले के समोदा गांव में सामने आए अफीम खेती कांड ने सत्ताधारी भाजपा के भीतर हलचल बढ़ा दी है। मामले में आरोपी बनाए गए विनायक ताम्रकार की गिरफ्तारी के बाद पार्टी ने उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। विनायक ताम्रकार भाजपा के राइस मिल प्रकल्प सेल के जिला संयोजक थे।
अफीम की खेती के खुलासे के बाद भाजपा को राजनीतिक तौर पर काफी असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर आक्रामक है और प्रदेश के कई हिस्सों में भाजपा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन भी किए जा रहे हैं। हालांकि विनायक ताम्रकार ने अपनी सफाई में कहा है कि उन्होंने अपनी जमीन राजस्थान के कुछ लोगों को भुट्टे की खेती के लिए किराए पर दी थी और उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि वहां क्या उगाया जा रहा है।
मामले के सामने आने के बाद भाजपा के भीतर भी मंथन शुरू हो गया है। यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि विनायक ताम्रकार को संगठन में पद दिलाने की सिफारिश किसने की थी।
पार्टी के कुछ नेता तिल्दा की एक पुरानी घटना को भी याद कर रहे हैं। करीब दो साल पहले एक कारोबारी को भाजपा में शामिल कराया गया था और पार्टी के कई प्रमुख नेता उसके घर भी पहुंचे थे। बाद में वही कारोबारी सट्टा किंग के रूप में चर्चित हो गया। हालांकि उस मामले ने ज्यादा तूल नहीं पकड़ा, क्योंकि उसके कांग्रेस के नेताओं से भी संबंध बताए जाते रहे हैं और वह पहले पार्षद भी रह चुका है।
इधर भाजपा में विभिन्न मोर्चा-प्रकोष्ठों में पदाधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है। हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए पार्टी ने प्रदेश के संयोजकों को सतर्क रहने की सलाह दी है, ताकि किसी विवादित पृष्ठभूमि वाले चेहरे को संगठन में जिम्मेदारी न मिल जाए।
हेलीकॉप्टर का इंतजार
प्रदेशवासियों को अपने द्वार पर प्रशासन के आने का कुछ इंतजार करना होगा। सरकार का सुशासन तिहार इस वर्ष कुछ देर से होने के संकेत हैं। बीते दो वर्षों में यह अभियान बजट सत्र के बाद अप्रैल मध्य से लेकर मई में होते रहे हैं जब मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री विधायक और अफसर गांव-गांव जाकर जन समस्या सुलझाने के साथ उनकी मांग पर सडक़ बिजली, स्कूल कालेज की सौगात देते हैं। इस दौरान मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर को देखना भी ग्रामीणों के लिए अद्भुत अनुभव होता है। इस बार इसके लिए लोगों को पांच राज्यों के चुनाव खत्म होने का इंतजार करना पड़ेगा। क्योंकि इन चुनावों में प्रचार के लिए सीएम मंत्री विधायकों की ड्यूटी लगने जा रही है। जो प्रचार थमने के बाद ही वापस लौटेंगे। यह ड्यूटी कब से लगेगी इसका खुलासा 27-28 मार्च के आसपास होगा जब आयोग चुनाव घोषणा करेगा। उसके बाद ही इस बहुप्रतीक्षित अभियान की रूपरेखा सामने आएगी। वैसे इन चुनावों के लिए प्रदेश के 30 आईएएस आईपीएस अधिकारी भी पर्यवेक्षक के तौर पर जा रहे हैं। इनमें कई विभागों के सचिव भी शामिल हैं। उनकी आयोग में एक दौर की ट्रेनिंग भी हो चुकी है। बहरहाल भरी गर्मी में इस अभियान में काम के प्रति लापरवाह, ढिलाई बरतने वाले और जन असंतोष से निलंबन की गाज से झुलसने वालों को कुछ राहत मिल सकती है।

राज्यसभा के लिए लक्ष्मी वर्मा का चुनाव
राज्यसभा प्रत्याशी घोषित होते ही लक्ष्मी वर्मा ने राज्य महिला आयोग के सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया, और उनका इस्तीफा तत्काल प्रभाव से मंजूर भी कर लिया गया। लक्ष्मी वर्मा प्रदेश भाजपा की उपाध्यक्ष हैं और करीब 32 साल से संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाती रही हैं। खमतराई के एक वार्ड से पार्षद बनकर उन्होंने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत की थी और अब वे राज्यसभा पहुंचने जा रही हैं।
कुछ महीने पहले उन्होंने महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। लक्ष्मी वर्मा और उनके सहयोगी बाकी दो सदस्य आयोग की सुनवाई में हिस्सा नहीं ले रहे थे। उन्होंने राज्यपाल रामेन डेका से भी किरणमयी नायक की शिकायत की थी। करीब डेढ़-दो महीने तक लक्ष्मी और अन्य सदस्य आयोग की गतिविधियों से दूर रहे। उम्मीद थी कि किरणमयी नायक को अध्यक्ष पद से हटाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बाद में लक्ष्मी वर्मा और अन्य सदस्य फिर से सुनवाई में आने लगे।
चर्चा है कि आयोग में चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष किरण देव ने पहल की थी। बताया जाता है कि किरणमयी नायक ने भी विवाद सुलझाने के लिए उनसे मदद मांगी थी। किरणमयी नायक और किरण देव दोनों एक समय नगर निगम के मेयर रह चुके हैं। वर्ष 2009 में किरणमयी रायपुर और किरण देव जगदलपुर के मेयर निर्वाचित हुए थे। अलग-अलग दलों में रहने के बावजूद दोनों के बीच अच्छे संबंध बताए जाते हैं। किरण देव ने लक्ष्मी वर्मा और अन्य सदस्यों से चर्चा की, जिसके बाद मामला सुलझ गया।
लक्ष्मी वर्मा भाजपा के भीतर अनुशासित और सुलझी हुई नेत्री मानी जाती हैं। जब वे रायपुर की जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं, तब उनका नाम बलौदाबाजार विधानसभा सीट के पैनल में था, लेकिन उस समय पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश बैस के हस्तक्षेप से उनकी जगह लक्ष्मी बघेल को प्रत्याशी बनाया गया। इसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में भी उनकी टिकट कट गई। लोकसभा चुनाव में भी टिकट मिलते-मिलते रह गया और अंतिम समय में उनकी जगह बृजमोहन अग्रवाल को प्रत्याशी बना दिया गया। कई बार अवसर छूटने के बाद अब पार्टी ने उन्हें सीधे राज्यसभा भेजने का फैसला किया है। देर से ही सही, लक्ष्मी वर्मा को आखिरकार सदन में जाने का मौका मिल गया।
सूबे की सियासत में दो ‘लक्ष्मी’
छत्तीसगढ़ की सियासत में दो ‘लक्ष्मी’ की जमकर चर्चा हो रही है। राज्यसभा के लिए रायपुर की पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी वर्मा को उच्च सदन में भेजने के लिए नामांकित किया गया है। वहीं सरकार में मंत्रिमंडल की सदस्य लक्ष्मी राजवाड़े पहले से ही सत्ता के गलियारों में चर्चित नाम है। खास बात यह है कि भाजपा ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के खास और उत्साहित मौके पर लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा के लिए चुनकर महिलाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है। लक्ष्मी राजवाड़े महिला बाल विकास मंत्री के तौर पर काम कर रही है, हालांकि उनके क्षेत्र के लोगों में प्रशासनिक कामकाज में उनके पति की बढ़ती दखल की काफी चर्चा है। इससे परे कांग्रेस ने फूलोदेवी नेताम को दोबारा राज्यसभा भेजने का निर्णय लेकर भाजपा की महिलावादी पसंद को टक्कर दी है।
भाजपा में लक्ष्मी वर्मा और लक्ष्मी राजवाड़े भाजपा संगठन और सरकार के बीच चर्चा की केंद्र बिन्दु में रहेंगी।
निर्दलीय ने मचाया हडक़ंप
राज्यसभा चुनाव में नामांकन दाखिले के आखिरी दिन एक चौंकाने वाली खबर भी सामने आई। तेलंगाना निवासी के. सयन्ना ने चुपचाप नामांकन दाखिल कर दिया। सयन्ना हैदराबाद के पास मेडचल के निवासी बताए जाते हैं, लेकिन उन्होंने नामांकन फार्म अधूरा ही भर दिया था। प्रस्तावक और समर्थक के बिना ही फार्म जमा कर दिया गया था।
निर्वाचन अधिकारी ने जब फार्म की जांच की तो पाया कि न तो प्रस्तावक-समर्थक हैं और न ही अमानत राशि जमा की गई है। ऐसे में फार्म तुरंत निरस्त कर दिया गया। बताया जाता है कि सयन्ना ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सबसे पहले नामांकन दाखिल किया था, लेकिन तकनीकी खामियों के कारण वह मान्य नहीं हो सका।
सयन्ना कौन हैं और वे यहां नामांकन दाखिल करने क्यों पहुंचे थे, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है। फिलहाल भाजपा की लक्ष्मी वर्मा और कांग्रेस की फूलोदेवी नेताम के नामांकन सही पाए गए हैं। दोनों का निर्विरोध निर्वाचन तय माना जा रहा है और उन्हें जल्द ही निर्वाचन प्रमाण पत्र दिए जाने के संकेत हैं।
पुराने नेताओं का नया ठिकाना बन पाएगा
होली पर घर जाने से पहले पुराने भाजपाइयों का इंडियन कॉफी हाउस में जमावड़ा हुआ। इनमें रायपुर बस्तर, सरगुजा और कुछ राजनांदगांव के भी रहे। सभी ने अपनी पुरानी यादें ताजा की। इसी बीच काफी के चुस्कियों के साथ एक ही चर्चा की कि पार्टी बहुत बदल चुकी है। सीनियर लोगों को लगभग किनारे कर दिया गया है और जिन्होंने संघर्ष देखा ही नहीं, किया ही नहीं, वह निगम-मंडल, आयोग-प्राधिकरण और संगठन में प्रदेश से लेकर जिला स्तर तक काबिज हो चुके हैं। अब तो किनारे हो जाना ही ठीक है। वैसे तो किनारे कर ही दिए गए हैं।
राजनांदगांव के एक सीनियर नेता ने सुझाव दिया कि पूर्व स्पीकर गौरी शंकर अग्रवाल और प्रेम प्रकाश पांडे से मिला जाए। इसमें उनसे अनुरोध किया जाए कि मुफ्त में उन्हें दिया गया बंगले को कार्यालय बना दें। ताकि 33 जिलों से आने वाले सीनियर कार्यकर्ताओं के रूकने और आपसी मेल मिलाप के साथ चर्चा करने में सुविधा हो सके और आज की स्थितियों की चर्चा कर हल्का महसूस कर सके।
बस्तर और सरगुजा संभाग के नेताओं ने भी इसका समर्थन किया। इसी दौरान बताया गया कि सरकार ने कानून बना दिया कि पूर्व विधानसभा अध्यक्षों को मुफ्त में सरकारी बंगला, क्लर्क देगी और दोनों लोगों को राजधानी में बंगला मिल भी चुका है। चूंकि वह भी लगभग किनारे किए जा चुके हैं, इसलिए वे इनकी मन स्थिति को आसानी से समझ सकेंगे। उनके सहमत होते ही जनसंघ से लेकर भाजपा तक तन-मन-धन और समर्पण की भावना से संघर्ष कर केंद्र और राज्य में सरकार बनाने में सहयोग कर चुके नेता कार्यकर्ताओं को नया ठिकाना मिल जाएगा। जैसे की वामपंथी पार्टियों के सांसदों-विधायकों को राजधानियों में जो बंगले मिलते हैं, उनमें उन्हें एक-दो कमरे देकर पार्टी बाकी बंगले का पार्टी के लिए इस्तेमाल तय करती है।
बता दें कि ऐसे लोगों को पार्टी दिल्ली से लेकर रायपुर तक मार्गदर्शक मंडल में सूचीबद्ध कर चुकी है और साल में एक दिन भाजपा स्थापना दिवस पर शाल श्रीफल भेंट कर उनके संघर्षों को याद अवश्य करती है। अब यह चर्चा कब होगी, यह आने वाले समय पर ही पता चलेगा।
सामान बदलने के पहले पढ़ें
ओडिशा के पत्रकार प्रिय रंजन साहू ने फेसबुक पर एक दिलचस्प जानकारी पोस्ट की है, जो कि बिना जरूरत सामान बदलने वालों के लिए सीख हो सकती है।
‘कल्याण फार्मा, संबलपुर की सबसे पुरानी दवा की दुकानों में से एक, शहर की-शायद ओडिशा की-सबसे पुरानी फ्रिज का दावा कर सकती है। 1960 में संस्थापक स्वर्गीय चित्तरंजन पांडा ने खरीदी अल्विन प्रेस्टकोल्ड फ्रिज आज भी चालू है। मालिकों ने इसे नया क्यों नहीं बदला? ‘दो वजहें हैं,’ पांडा के बेटे आलोक पांडा कहते हैं। ‘पहली, इसने कभी एक बार भी हमें धोखा नहीं दिया।
ये बिना रखरखाव वाली है और नए फ्रिजों को आसानी से हरा सकती है। दूसरी, प्रेस्टकोल्ड रखना हमारे लिए सम्मान की बात है। लगता है जैसे हमने कोई विरासत खरीदी हो।’
महिला-आदिवासी संतुलन की राजनीति
प्रदेश से राज्यसभा के लिए फूलोदेवी नेताम को दोबारा मौका मिलने के पीछे केवल औपचारिक राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि कई तरह के समीकरण भी काम करते दिखाई दिए हैं। दिलचस्प बात यह है कि वे कांग्रेस की दूसरी ऐसी महिला नेत्री बन गई हैं जिन्हें राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ से दूसरी बार राज्यसभा जाने का अवसर मिल रहा है। इससे पहले मोहसिना किदवई प्रदेश से दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुकी हैं।
बताया जाता है कि इस बार प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेताओं—पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने मिलकर पार्टी नेतृत्व को यह समझाया कि राज्यसभा के लिए स्थानीय चेहरे को मौका दिया जाना चाहिए। दरअसल, कांग्रेस के तीन राज्यसभा सदस्य ऐसे हैं जो कि प्रदेश से बाहर के हैं इनमें से केटीएस तुलसी का कार्यकाल खत्म हुआ है। अभी भी रंजीत रंजन और राजीव शुक्ला प्रदेश से बाहर के हैं। इसलिए स्थानीय प्रतिनिधित्व का सवाल भी उठ रहा था।
जब प्रत्याशी तय करने की चर्चा आगे बढ़ी, तो एक और दिलचस्प पहलू सामने आया। राज्यसभा में कांग्रेस की महिला सांसदों की संख्या सीमित है। अभी पार्टी की ओर से पांच महिला सदस्य हैं—सोनिया गांधी, रंजीत रंजन, रजनी पाटिल, जेबी माथेर और फूलोदेवी नेताम। अगर फूलोदेवी का कार्यकाल खत्म हो जाता और उन्हें दोबारा मौका नहीं मिलता, तो यह संख्या घटकर चार रह जाती।
यहीं पर एक और राजनीतिक गणित सामने आया। राज्यसभा में कांग्रेस के कुल 27 सदस्य हैं, लेकिन आदिवासी समुदाय से सिर्फ दो सांसद थे—फूलोदेवी नेताम और गुजरात से नरेनभाई राठवा। दोनों का कार्यकाल लगभग साथ ही समाप्त हो रहा था। अगर दोनों को ही दोबारा मौका नहीं मिलता, तो राज्यसभा में कांग्रेस का कोई भी आदिवासी सांसद नहीं रह जाता।
चर्चा है कि पार्टी रणनीतिकारों ने इसी पहलू पर काफी विचार किया। आखिरकार फूलोदेवी नेताम के नाम पर सहमति बनी। इस फैसले से पार्टी एक साथ दो संदेश देने में सफल हो गई, महिला प्रतिनिधित्व भी बना रहा और आदिवासी चेहरा भी। चूंकि नरेनभाई राठवा को पार्टी ने दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया, इसलिए अब राज्यसभा में कांग्रेस की ओर से आदिवासी प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी अकेले फूलोदेवी नेताम के कंधों पर ही रहेगी।
दस सीटों पर ओपी की परीक्षा
छत्तीसगढ़ के वित्त मंत्री ओपी चौधरी लगातार असम में भाजपा के चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं। हिमंता बिस्वा सरमा के राज्य में ओपी को 10 सीटों की जिम्मेदारी दी गई है। हर दिन उन्हें दर्जनों लोग असमी-दुपट्टा पहनाकर उनका स्वागत करते रहते हैं, और कई दिनों से उनके फेसबुक पेज पर छत्तीसगढ़ की बजाय असम की ही तस्वीरें छाई हुई हैं। एक आईएएस अफसर रहे हुए ओपी चौधरी असम की इन 10 सीटों पर कैसा नतीजा लाते हैं, इस पर भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की भी नजरें टिकी हैं, और छत्तीसगढ़ के नेताओं की नजरें तो ओपी चौधरी पर टिकी ही रहती हैं, चाहे वे भाजपा नेता हों, चाहे कांग्रेस नेता। फिलहाल वे विधानसभा सत्र के लिए 10 तारीख को एक दिन के लिए आ रहे हैं। अगर उन्हें वहां 11 सीटों की जिम्मेदारी मिलतीं, तो क्या वे 11 को यहां आते?
रणनीति के बीच तय हुआ निर्विरोध
प्रदेश की दो राज्यसभा सीटों पर आखिरकार निर्विरोध चुनाव की तस्वीर साफ हो गई। भाजपा प्रत्याशी लक्ष्मी वर्मा और कांग्रेस प्रत्याशी फूलोदेवी नेताम का निर्विरोध निर्वाचन लगभग तय हो गया है। गुरुवार को नामांकन के आखिरी दिन इन दोनों के अलावा किसी और ने पर्चा दाखिल नहीं किया। हालांकि प्रदेश भाजपा महामंत्री नवीन मारकंडेय ने नामांकन फार्म जरूर खरीदा था, लेकिन उसे जमा नहीं किया। दिलचस्प यह रहा कि उनके सिर्फ फार्म लेने भर से ही कांग्रेस खेमे में हलचल मच गई।
भाजपा ने तो महिला आयोग की सदस्य लक्ष्मी वर्मा को पहले ही प्रत्याशी घोषित कर दिया था, लेकिन कांग्रेस में उम्मीदवार तय करने को लेकर काफी खींचतान चलती रही। बुधवार रात पीसीसी के वरिष्ठ नेताओं को यह संकेत मिल गया था कि फूलोदेवी नेताम का नाम तय हो चुका है, मगर औपचारिक घोषणा नामांकन के आखिरी दिन सुबह की गई।
दरअसल कांग्रेस के भीतर ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ का विवाद चल रहा था। भाजपा के रणनीतिकार कांग्रेस की हलचल पर पैनी नजर रखे हुए थे। रणनीति के तहत ही नवीन मारकंडेय को फार्म लेने के लिए कहा गया था। चर्चा है कि संसदीय कार्य मंत्री केदार कश्यप के साथ वे फार्म लेने पहुंचे थे। केदार कश्यप ने लक्ष्मी वर्मा के लिए और मारकंडेय ने अपने नाम से फार्म लिया।
रणनीति यह थी कि अगर कांग्रेस प्रदेश से बाहर के किसी नेता को उम्मीदवार बनाती, तो मारकंडेय मैदान में उतर सकते थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने फार्म लिया, कांग्रेस रणनीतिकार चौकन्ने हो गए। यह भी चर्चा रही कि अगर बाहरी प्रत्याशी उतारा जाता, तो कुछ कांग्रेस विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते थे।
नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत, और कुछ अन्य नेताओं ने यह पूरी रणनीति कांग्रेस हाईकमान तक पहुंचा दी। इसके बाद हाईकमान ने जोखिम लेने के बजाय स्थानीय भावनाओं को ध्यान में रखते हुए फूलोदेवी नेताम को फिर से मैदान में उतारने का फैसला लिया। फूलोदेवी नेताम के नामांकन के बाद भाजपा ने भी नवीन मारकंडेय को फार्म भरने से रोक दिया। इस तरह दोनों उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन तय हो गया।
दिल्ली में खींचतान, अंत में स्थानीय

कांग्रेस में राज्यसभा टिकट को लेकर दिल्ली तक खींचतान चली। एआईसीसी के कई बड़े नेता छत्तीसगढ़ से राज्यसभा जाने के इच्छुक बताए जा रहे थे। चर्चा है कि पार्टी के कुछ केंद्रीय नेता मीडिया विभाग के प्रभारी पवन खेड़ा को छत्तीसगढ़ से राज्यसभा भेजने के पक्ष में थे, लेकिन प्रदेश के कई नेताओं ने इसका विरोध किया।
अंतिम दौर में मामला दो नामों पर सिमट गया पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव और फूलोदेवी नेताम। चर्चा है कि सिंहदेव ने खुद राज्यसभा को लेकर अनिच्छा जताई थी। उनकी प्राथमिकता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की बताई जाती है, और पार्टी नेतृत्व भी इससे अवगत है।
ऐसे में अंतत: फूलोदेवी नेताम को दोबारा मौका देने का फैसला हुआ। हालांकि इस बीच पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेंद्र साहू, पूर्व मंत्री अमरजीत भगत और डॉ. शिवकुमार डहरिया भी दिल्ली में डेरा डालकर अपने-अपने स्तर पर कोशिशें करते रहे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की संभावनाओं को लेकर भी अटकलें थीं।
अंत में भाजपा द्वारा महिला प्रत्याशी उतारे जाने को देखते हुए कांग्रेस ने भी महिला चेहरा उतारने की रणनीति अपनाई और फूलोदेवी नेताम पर मुहर लगा दी।
नए नियम में बदला चुनाव फार्मूला
राज्यसभा चुनाव को लेकर इस बार विधानसभा में एक दिलचस्प प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला। चुनाव आयोग ने विधानसभा के संचालक मनीष शर्मा को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया है। आमतौर पर राज्यों में राज्यसभा चुनाव के लिए विधानसभा सचिव ही चुनाव अधिकारी बनाए जाते रहे हैं।
दरअसल चुनाव आयोग ने हाल के वर्षों में एक नया नियम लागू किया है। इसके अनुसार विधानसभा सचिव को तभी चुनाव अधिकारी बनाया जाएगा, जब उनकी सेवा में कम से कम दो वर्ष का समय शेष हो। यदि सचिव का रिटायरमेंट नजदीक हो, तो किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी को यह जिम्मेदारी दी जाती है।
छत्तीसगढ़ विधानसभा में सचिव दिनेश शर्मा पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं और उन्हें एक साल का एक्सटेंशन मिला हुआ है। ऐसे में चुनाव आयोग ने वरिष्ठ अधिकारी मनीष शर्मा को चुनाव अधिकारी नियुक्त किया है, जबकि दिनेश त्रिवेदी को सहायक चुनाव अधिकारी बनाया गया है।
दोनों अधिकारियों ने अब तक चुनाव की पूरी प्रक्रिया को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराया है। अब नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद औपचारिक रूप से निर्वाचन की घोषणा ही बाकी रह गई।
एक संत की जगह दूसरा संत!
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक घोटाला शांत भी नहीं होता कि दूसरा सामने आ खड़ा होता है। पिछली कांग्रेस सरकार के दौर में तो पीएससी पर लगे आरोपों ने राजनीतिक तापमान लगातार ऊँचा रखा। भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर सवाल उठे और आयोग की साख पर गहरी चोट पड़ी।
मगर समस्या की जड़ केवल आरोप नहीं है, व्यवस्था भी है। आयोग के सदस्यों की सेवा शर्तें ऐसी हैं कि वे अपना पूरा कार्यकाल पूरा करते हैं। सरकार बदल जाती है, सत्ता हाथ बदल लेती है, लेकिन आयोग की कुर्सियों पर बैठे लोग अपने पद पर बने रहते हैं। यही कारण है कि हर नई सरकार को पुराने फैसलों और पुराने चेहरों के साथ काम करना पड़ता है।
अब भाजपा के मुखर नेता गौरीशंकर श्रीवास ने पीएससी के एक ताजा कथित घोटाले का मुद्दा उठाते हुए उसके कांग्रेस-मनोनीत तीन सदस्यों को हटाने की मांग कर दी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि आयोग की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है।
लेकिन इस राजनीतिक हमले के बीच एक बड़ी चूक भी सामने आ गई। श्रीवास के बयान में पीएससी सदस्य संत कुमार नेताम की जगह गलती से संत कुमार पासवान का नाम लिख दिया गया। संत कुमार पासवान एक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं और रायपुर में रहते हैं। उनका पीएससी से कोई लेना-देना नहीं रहा है। नाम की इस गलती ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक पूर्व अधिकारी का नाम आ गया। अब हालत यह हैं कि लोग संत कुमार पासवान को फोन कर पूछ रहे हैं कि आखिर मामला क्या है, जबकि वे कभी पीएससी के सदस्य रहे ही नहीं।
फिलहाल पीएससी पर फिर से सियासी घमासान तेज हो चुका है। विपक्ष हमलावर है, सरकार पर दबाव बढ़ रहा है, और युवा अभ्यर्थी जवाब चाहते हैं कि आखिर आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों का समाधान कब और कैसे होगा।
मजे की बात यह है कि गौरीशंकर श्रीवास पीएससी के खिलाफ भूपेश-सरकार के वक़्त भी लड़ते रहे, आज भी लड़ रहे हैं, उस वक़्त उनके ख़िलाफ़ स्नढ्ढक्र भी हुई, लेकिन भाजपा सरकार आने के बाद भी उन्हें कुछ नहीं दिया गया।
महिला उत्पीडऩ, और जांच
राजनांदगांव से सटे नवगठित जिले में भाजपा के भीतर चल रही गुटबाजी अब खुलकर सामने आ गई है। मामला इतना बढ़ गया कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। चूंकि प्रकरण महिला उत्पीडऩ से जुड़ा है, इसलिए जांच के लिए महिला डीएसपी की अगुवाई में एक विशेष कमेटी गठित की गई है।
बताया जा रहा है कि जिले के एक प्रभावशाली भाजपा नेता और पूर्व विधायक के मोबाइल से कुछ व्हाट्सएप समूहों में एक महिला नेत्री के साथ उनकी फोटो वायरल हो गई। इससे नाराज महिला नेत्री ने पूर्व विधायक के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए थाने में शिकायत दर्ज करा दी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने पूर्व विधायक के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।
मामला दर्ज होते ही पार्टी के भीतर हलचल तेज हो गई। दबाव बढऩे के बाद पूर्व विधायक और महिला नेत्री के बीच सुलह-सफाई हो गई और प्रकरण को निपटा लिया गया। हालांकि विवाद यहीं नहीं थमा। महिला नेत्री ने चार अन्य लोगों के खिलाफ भी थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए उत्पीडऩ का आरोप लगाया है। जिन लोगों पर आरोप लगाए गए हैं, वे पूर्व विधायक के राजनीतिक विरोधी माने जाते हैं।
इस घटनाक्रम से पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान और गुटीय संघर्ष उजागर हो गया है। मामला पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंच चुका है। महिला नेत्री जिले में चल रहे एक आंदोलन का नेतृत्व भी कर रही हैं, जिससे प्रकरण की संवेदनशीलता और बढ़ गई है।
पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए महिला डीएसपी के नेतृत्व में जांच कमेटी गठित की है। राजनांदगांव रेंज के आईजी भी पूरे मामले पर नजर बनाए हुए हैं। फिलहाल सभी पक्ष जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह विवाद आगे और तूल पकड़ सकता है।
8वां वेतन, दिल्ली से यहां तक
8वाँ वेतन आयोग (जस्टिस रंजना देसाई) ने दिल्ली के जनपथ स्थित चंद्रलोक बिल्डिंग दफ्तर से काम शुरू कर दिया है। तो दबाव की राजनीति भी तेज हो गई है। बीते नवंबर में जारी आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस कर्मचारी संगठनों ने उनकी कई अहम मांगों को उसमें जगह नहीं देने की बात कही थी। वहीं राष्ट्रीय परामर्शदात्री संयुक्त समिति (स्टाफ साइड) की ड्राफ्टिंग कमेटी भी 25 फरवरी से सक्रिय हो गई है। इसमें करीब 1 करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स से जुड़ी मांगों को एक संयुक्त चार्टर के रूप में अंतिम रूप भी दिया जा रहा है। रायपुर के केंद्रीय कर्मचारी नेता भी अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के हवाले से वेतन भत्तों के फिटमेंट पर नजर रखे हुए हैं।
वेतन आयोग के तहत फिटमेंट फैक्टर वह मुख्य गुणांक (मल्टीप्लायर) है जो कर्मचारियों का नया मूल वेतन (बेसिक पे) को निर्धारित करेगा। वर्तमान में फिटमेंट फैक्टर को लेकर कई अनुमान और माँगें सामने आ रही हैं। यदि फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर 2.86 किया जाता है, तो कर्मचारियों का न्यूनतम मूल वेतन मौजूदा 18,000 से बढक़र 51,480 हो सकता है।
कर्मचारी यूनियन फिटमेंट फैक्टर को 3.25 करने और सालाना 7त्न वेतन वृद्धि की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार फिटमेंट फैक्टर 1.92 से 2.86 के बीच रह सकता है। इससे न्यूनतम वेतन 41,000 के करीब पहुँच सकता है। वेतन और पेंशन में 30 से 34 प्रतिशत तक की वृद्धि होने का अनुमान है।
नया मूल वेतन निकालने के लिए वर्तमान बेसिक पे को फिटमेंट फैक्टर से गुणा किया जाता है। इसका फार्मूला संशोधित मूल वेतन = वर्तमान मूल वेतन का फिटमेंट फैक्टर हो सकता है। नया वेतनमान लागू होने पर महंगाई भत्ता, शून्य कर दिया जाता है और इसे बेसिक- पे में मर्ज कर दिया जाता है। आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से ही प्रभावी मानी जाएंगी। चूंकि आयोग को अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है, इसलिए वास्तविक भुगतान में देरी हो सकती है।
साइबर धमकियों में एजेंसियां खाली हाथ
न्यायपालिका इन दिनों एक अदृश्य दुश्मन के निशाने पर है। बिलासपुर हाईकोर्ट समेत रायपुर, दुर्ग और कोरबा जैसी दर्जनों जिला अदालतों को लगातार मिल रही बम की धमकियों ने पूरे राज्य के सुरक्षा तंत्र को हिलाया है। देश के अन्य हिस्सों में भी संवैधानिक संस्थाओं पर इसी तरह की धमकियां दी गईं।
धमकी भरे ईमेल मिलने के एक महीने बाद भी हमारी जांच एजेंसियों के हाथ खाली हैं। पुलिस ने बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है और एनआईए से लेकर साइबर सेल तक सक्रिय हैं, लेकिन नतीजा सिफर है। हमलावर ने वीपीएन और टोर ब्राउजर के जरिए अपनी पहचान को छिपा रखा है। विदेशी कंपनियों से डेटा मिलने में महीनों की देरी होती है। इंटरपोल की लंबी कागजी प्रक्रिया भी है। शायद, इसलिये जांच प्रक्रिया रफ्तार नहीं पकड़ रही है। हमारे पास ऐसी कोई डिजिटल फॉरेंसिक लैब या स्पेशल रिस्पॉन्स टीम नहीं है, जो ऐसे अपराधियों को 24 घंटे के भीतर बेनकाब कर सके।
अदालतों के बाहर अतिरिक्त सुरक्षा घेरा, सघन चेकिंग और बैग स्कैनिंग के कारण आम नागरिक परेशान हुए हैं। मुवक्किलों और वकीलों के मन में भी असुरक्षा की भावना घर कर गई। शायद ई मेल भेजने वालों का मकसद ही अव्यवस्था फैलाना है। मगर हैरान करने वाली बात यह है कि विदेशी सर्वर के पीछे बैठकर हमारी न्यायिक व्यवस्था को कोई लगातार चुनौती दे रहा है और हमें उसका सुराग नहीं मिल रहा है। चूंकि घटना कुछ भी नहीं हुई है, सिर्फ धमकियां ही मिली हैं, इसलिये इसे सिर्फ डराने के लिए की गई शरारत के रूप में पेश करने की कोशिश जांच एजेंसियां कर रही हैं। पर, मामले की तह तक जाने की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गृह विभाग में साइबर एक्सपर्ट्स की नियुक्तियां नहीं होने को लेकर हाल ही में सुनवाई की थी। सरकार ने जवाब दिया था कि नियुक्तियां की जा रही हैं। धमकी की इन घटनाओं ने विशेषज्ञों की जरूरत की पुष्टि कर दी है।
सत्र स्थगित मंत्री चुनाव में बिजी
विधानसभा के बजट सत्र के बीच सियासत और संगठन दोनों मोर्चों पर सक्रियता तेज हो गई है। सत्र 9 तारीख तक स्थगित है, लेकिन इस बीच सरकार के कई मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता असम और पश्चिम बंगाल में चुनावी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। खाद्य मंत्री दयालदास बघेल बजट सत्र शुरू होने के बाद से ही पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रबंधन में जुटे हुए हैं। वे होली अवकाश के बाद 9 तारीख से सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेंगे।
डिप्टी सीएम अरुण साव तीन दिन असम में संगठनात्मक जिम्मेदारी निभाकर लौटे हैं। वहीं वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने बजट पेश करने और आय-व्यय पर सामान्य चर्चा के बाद चार दिन के लिए असम का दौरा किया। साव और चौधरी दोनों को विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
इस बीच भाजपा की वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री रेणुका सिंह भी सदन की कार्रवाई से दूर हैं। भरतपुर-सोनहत क्षेत्र में आयोजित शिव महापुराण कथा के दौरान उनका पैर फैक्चर हो गया, जिसके कारण वे बजट सत्र में शामिल नहीं हो पा रही हैं।
कहा जा रहा है कि बजट सत्र के बीच सत्ता पक्ष के कई चेहरे संगठनात्मक रणनीति में व्यस्त हैं, जिससे विपक्ष को सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने का भरपूर मौका मिल सकता है।
ड्रग्स तस्करी मामला फिर चर्चा में
विधानसभा में रायपुर के चर्चित ड्रग्स तस्करी कांड का मुद्दा उठा, लेकिन उस पर विस्तार से चर्चा नहीं हो सकी। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तथाकथित ‘ड्रग्स क्वीन’ नव्या मलिक को लेकर जानकारी मांगी थी।
पिछले सितंबर रायपुर में ड्रग्स रैकेट का खुलासा हुआ था। आरोपी हर्ष आहूजा समेत इंटीरियर डिजाइनर नव्या मलिक और विधि अग्रवाल को गिरफ्तार किया गया। पुलिस जांच में दिल्ली, मुंबई और पंजाब से जुड़े बड़े नेटवर्क की चर्चा सामने आई, हालांकि सीमित गिरफ्तारियों के कारण कार्रवाई पर सवाल भी उठ रहे हैं। चर्चाओं के अनुसार, कथित तौर पर सैकड़ों प्रभावशाली लोगों से पूछताछ हुई। विपक्ष का आरोप है कि कई प्रभावशाली नाम बच निकले। हालांकि पुलिस की ओर से आधिकारिक रूप से विस्तृत सूची सार्वजनिक नहीं की गई है।
मामले को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बनी हुई है और संकेत हैं कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा फिर विधानसभा में गूंज सकता है। अब देखना होगा कि बजट सत्र के शेष दिनों में सरकार संगठनात्मक व्यस्तताओं के साथ-साथ इन संवेदनशील मुद्दों पर क्या रुख अपनाती है।
अद्भुत समाज सेवा

राजधानी के सरोना संत रविदास वार्ड में विकास की अद्भुत त्रिमूर्ति खड़ी है—एक साथ बने तीन एक-कमरे वाले सामुदायिक भवन। पहले पर लिखा है सोनकर समाज सामुदायिक भवन, दूसरे पर विश्वकर्मा झरिया समाज, तीसरे पर झेरिया साहू समाज। देखने से लगता है जैसे एक ही सांचे में ढालकर तीनों को साथ-साथ खड़ा कर दिया गया हो—बस नाम बदल गए, आकार वही।
कमरे इतने विशाल हैं कि बैठक हो तो आधे लोग बाहर लोकतंत्र की धूप सेंकें। बारात रुकने की कल्पना भी साहस मांगती है—दूल्हा अंदर, बाराती सडक़ पर सामुदायिक समरसता का प्रदर्शन करें। उपयोगिता पूछना विकास की भावना पर प्रश्न उठाना माना जा सकता है। आखिर एक एक कमरे में कितना सामुदायिक समा सकता है?

कहने वाले कहते हैं, तीनों को मिलाकर एक बड़ा, सचमुच उपयोगी भवन बन जाता तो सभी समाज कार्यक्रम कर लेते। पर तब तीन शिलान्यास कैसे होते? तीन पट्टिकाएं कैसे चमकतीं? और सबसे महत्वपूर्ण—तीन बार हमने बनवाया कैसे कहा जाता या जाएगा?
दूरदर्शिता भी कम नहीं—आज कमरा, कल शेड, परसों बाउंड्री; भविष्य में विस्तार की संभावनाएं खुली हैं। जमीन भी सुरक्षित, पहचान भी , और उपलब्धि भी सुरक्षित। आखिर संदेश साफ है—हमने बनाया है, हम ही बाँटेंगे।
कांग्रेस की ‘अगली पीढ़ी’
प्रदेश की राजनीति में इन दिनों कांग्रेस के भीतर ‘अगली पीढ़ी’ की सक्रियता चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। कई वरिष्ठ नेताओं ने सीधे या संकेतों में अपनी राजनीतिक विरासत नई पीढ़ी को सौंपने की तैयारी शुरू कर दी है।
सबसे पहले बात करें तो पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा चुनावी राजनीति से लगभग संन्यास ले चुके हैं और उनके पुत्र पंकज शर्मा की सक्रियता बढ़ी है। वहीं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू भी अपने बेटों प्रवीण और यशवंत को आगे बढ़ा रहे हैं। यशवंत जिला पंचायत सदस्य बनकर औपचारिक राजनीतिक भूमिका में आ चुके हैं।
पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की सक्रियता भी लगातार चर्चा में है। शराब घोटाला प्रकरण में छह माह जेल में रहने के बाद उनकी राजनीतिक गतिविधियां तेज हुई हैं। वे पहले भी पाटन क्षेत्र में जनसमस्याओं के समाधान को लेकर सक्रिय रहे हैं। हाल ही में उनकी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात ने अटकलों को और हवा दी है कि वे भविष्य में औपचारिक रूप से चुनावी राजनीति में उतर सकते हैं।
इसी तरह नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत के बेटे सूरज महंत भी कोरबा लोकसभा और सक्ती विधानसभा क्षेत्र में कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय नजर आ रहे हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के रायपुर दौरे के दौरान चैतन्य और सूरज, दोनों से अलग-अलग मुलाकात की तस्वीरें वायरल हुईं। सूरज महंत के साथ दिग्विजय सिंह की 1996-97 की एक पुरानी तस्वीर भी सामने आई, जब वे अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और सूरज एक साल के थे। इस बार भी उनके प्रति स्नेह ने राजनीतिक गलियारों में संभावनाओं को और बल दिया है।
हालांकि विधानसभा चुनाव में अभी लगभग तीन वर्ष शेष हैं, लेकिन राजनीतिक जमीन तैयार करने की कवायद अभी से शुरू होती दिख रही है। देखना है कि ये युवा चेहरे संगठनात्मक भूमिका में सीमित रहते हैं या सीधे चुनावी अखाड़े में उतरते हैं।
नए विधायक की परेड
नई विधानसभा में पहले बजट सत्र के पहले सप्ताह परिसर में पक्ष विपक्ष के विधायकों के कृतित्व को लेकर कई बातें सुनने को मिलती रहीं। ऐसा ही एक वाक्या यह भी है -पहली बार बने विधायक को प्रदेश संगठन ने कोई काम करने का निर्देश दिया था। विधायक जी ने आदेश को नजर अंदाज कर दिया, जबकि पूरे प्रदेश में संगठन की बात या निर्देश गंभीरता से लिया जाता है। मगर इसकी गंभीरता को समझने में विधायक जी से चूक हुई या चलता है समझ लिया ये विधायक ही जानते हैं। दूसरी पार्टी से आए राजधानी जिले के ये नए विधायक जब संगठन मुख्यालय पहुंचे तो एक प्रमुख वरिष्ठ ने देखते ही जमकर लताड़ लगाई। विधायक की कार्यप्रणाली को जनाकांक्षाओं और संगठन के विपरीत बताने में देर न लगी। इतना ही नहीं उन्होंने जनसेवा की उम्मीद पर खरे न उतरने के वर्किंग परसेंटेज को लेकर एक रिपोर्ट के हवाले से आईना दिखा दिया । खासकर उनकी लेन-देन की प्रवृत्ति पर। फटकार इतने हाई पिच वाली थी कि चैम्बर के बाहर खड़े लोग भी सहम गए। वहां उपस्थित कई बार के विधायक पूर्व मंत्री ने हस्तक्षेप कर गुस्सा शांत कराया तब कहीं विधायक की सांस पर सांस लौटी। लेकिन अब अगले चुनाव को लेकर चिंता बढ़ गई है।
गिनती के गौधाम और सडक़ों पर दो लाख मवेशी
छत्तीसगढ़ में आवारा मवेशियों का सवाल एक बड़ा सामाजिक और प्रशासनिक संकट है। विधानसभा में आदिम जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम ने लिखित जवाब में बताया कि प्रदेश में 1,84,993 आवारा मवेशी हैं। यानि लगभग दो लाख पशु सडक़ों, खेतों और बस्तियों में खुले घूम रहे हैं।
लेकिन पशुधन विकास विभाग की गौधाम योजना के तहत सिर्फ 11 गौठानों को गौधाम के रूप में पंजीकृत किया गया है। इनकी कुल क्षमता मात्र 2,200 पशुओं की है। और हैरानी की बात यह कि इनमें से भी केवल तीन गौधाम चालू हैं, जहां अभी सिर्फ 620 पशु रखे गए हैं। यानी समस्या लाखों की और व्यवस्था गिनती के पशुओं की।
सरकारी विभागों के जवाब भी सवाल खड़े करते हैं। गृह विभाग का कहना है कि आवारा मवेशियों से सडक़ हादसों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। कृषि विभाग ने भी फसल नुकसान का कोई मामला सामने न आने की बात कही। जबकि गांवों में किसान रात-रात भर खेतों की रखवाली कर रहे हैं और शहरों में सडक़ पर अचानक सामने आ जाने वाले मवेशियों से दुर्घटनाएं आम हैं। कांग्रेस विधायक कुंवर सिंह निषाद ने सदन में इन जवाबों पर असंतोष जताया। उनका कहना था कि जब जमीन पर हालात इतने खराब हैं तो सरकारी आंकड़े इतनी सफाई क्यों दे रहे हैं? मगर, पिछली कांग्रेस सरकार ने गौठान योजना बड़े जोर-शोर से शुरू की थी। उद्देश्य अच्छा था, लेकिन आरोप लगे कि कई जगह गौठान सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए। बजट खर्च हुआ, मगर रखरखाव नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि पशु फिर सडक़ों पर लौट आए।
दिसंबर 2023 में सत्ता में आई भाजपा सरकार ने इसी मुद्दे को आधार बनाकर नई दिशा देने का दावा किया। गौठान योजना को नए नाम से गौ अभयारण्य योजना के रूप में पेश किया गया, लेकिन फरवरी 2026 तक उसकी ठोस प्रगति नजर नहीं आती।
इस बीच किसान अपनी फसल बचाने में परेशान हैं। सडक़ दुर्घटनाओं में लोग हताहत हो रहे हैं। और सबसे दुखद यह कि जिन पशुओं के संरक्षण की बात होती है, वही भूखे-प्यासे इधर-उधर भटक रहे हैं।
सेक्स सीडी कांड: नई कानूनी स्थिति
रायपुर की सीबीआई की विशेष अदालत में चर्चित सेक्स सीडी प्रकरण की सुनवाई जारी है। पहले निचली अदालत ने भूपेश बघेल को आरोपों से मुक्त कर दिया था, लेकिन सेशन कोर्ट ने उस फैसले को पलटते हुए उन्हें भी अन्य आरोपियों की तरह ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया।
23 फरवरी को पूर्व सीएम और अन्य आरोपियों की पेशी निर्धारित थी। सह-आरोपी कैलाश मुरारका अदालत में उपस्थित हुए, जबकि विधानसभा सत्र के कारण पूर्व सीएम उपस्थित नहीं हो सके। अब अगली सुनवाई 12 मार्च को तय की गई है। पूर्व सीएम की ओर से सेशन कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही गई है।
जब तक उच्च न्यायालय से राहत नहीं मिलती, यह मामला उनके लिए राजनीतिक और कानूनी—दोनों मोर्चों पर दबाव बनाए रख सकता है। आने वाले दिनों में अदालत की कार्यवाही और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं दोनों पर नजर रहेगी।
केंद्र में सचिव, यहां से एक भी नहीं
मोदी मंत्रिमंडल की नियुक्ति संबंधी समिति ने शनिवार रात केंद्रीय विभागों, में सचिव के लिए 28, अतिरिक्त सचिव या केंद्रीय उपक्रमों में समकक्ष पदों के लिए देशभर के 41 आईएएस अधिकारियों की इंपैनल सूची जारी कर दी है। इसमें 1990 से 2001 बैच तक के अफसरों को शामिल (कंसीडर)किया गया है। अब जैसे जैसे विभागों में रिक्तयां होंगी इन अफसरों की नियुक्ति होती जाएंगी। इसलिए इंपैनलमेंट की इतनी अहमियत होती है। आश्चर्य की बात है कि चाहे सचिव हो अतिरिक्त सचिव या समकक्ष पदों के लिए छत्तीसगढ़ के एक भी अधिकारी शामिल नहीं हैं।
बहरहाल हमारे यहां 1994 से लेकर 2001 तक के अधिकारी हैं जो सचिव, अतिरिक्त सचिव के लिए सभी मापदंड मानकों को पूरा करते हैं। इनमें सबसे अहम, पूर्व में संयुक्त सचिव पद पर केंद्र में काम करने का अनुभव । इनमें 1994 बैच के दो 2000 -01 बैच के भी अफसर हैं। ये एक और दो बार केंद्र में काम कर चुके हैं। ऐसे में इंपैनल न होना लॉबी में चर्चा का मुद्दा बन गया है।
यह भी बता दें कि केंद्र में इस समय छत्तीसगढ़ से अमित अग्रवाल 93 ,निधि छिब्बर 94 बैच सचिव के समकक्ष पद पर कार्यरत हैं और 95 बैच के मनिंदर कौर द्विवेदी, गौरव द्विवेदी भी अतिरिक्त सचिव। 97 बैच से सुबोध सिंह, निहारिका सिंह भी हैं दोनों पहले केंद्र में काम कर चुके हैं। इनसे भी वरिष्ठ रेणु पिल्ले 91, सुब्रत साहू 92 भी हैं। तो 2001 बैच से केवल एक शहला निगार हैं ये तीनों पूर्व में कभी केंद्र में पदस्थ नहीं रहे। वैसे इससे पहले, पिछले माह केंद्र में पहली प्रतिनियुक्ति वाले संयुक्त सचिव पद के लिए भी छत्तीसगढ़ से एक भी अफसर इंपैनल नहीं किए गए थे।
आज सुबह सुबह इन सूचियों की जानकारी देने वाले एक अफसर ने ही बताया कि मोदी 2.0 के अंतिम वर्षों में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति को लेकर एक संशोधन किया था कि केंद्र चाहे तो इंपैनलमेंट के इतर भी राज्यों से अफसर बुला सकता है। सो इन बैच के अफसरों के लिए सीधी एंट्री का अवसर अभी है। देखना होगा कि इस मापदंड में किस अफसर की लॉटरी लगती है।
राजनेता-कारोबारी के बीच लेन देन और गुरूजी
जब किसी राजनेता और कारोबारी के बीच लेन देन फंस जाता है तो गुरूजी को चेक क्लियर करवाना पड़ जाता है। चाहे पेमेंट आधा हो या पूरा। ऐसे ही एक कारोबारी शिष्य का गुरूजी ने हाल में पैसा वापस कराया है। गुरूजी छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के एक प्रसिद्ध धर्म गुरु हैं। उन्होंने एक पूर्व मंत्री के राजनैतिक गुरु को बोलकर अपने व्यापारी शिष्य का पेमेंट वापस कराई।जो दो साल से अटका हुआ था। अंचल के एक व्यवसायी ने पिछली सरकार के एक कद्दावर मंत्री को एक कार्य के एवज में एक खोखा भेंट किया था। इस शर्त पर थी कि कार्य अतिशीघ्र हो जाएगा। इसी बीच मंत्री जी का स्वास्थ्य खराब हुआ,फिर चुनाव आए। परिजनों,शुभचिंतकों ने भी चुनाव न लडऩे और किसी परिजन को लड़ाने की बात कही,लेकिन उन्हें लग रहा था कि वर्तमान मुख्यमंत्री विवादों में उलझ गये हैं तो सीएम की कुर्सी उन्हें ही मिलेगी।इसी भरोसे चुनावी मैदान में उतरे और विपक्षियों के बिछाए जाल में बुरी तरह फंसकर करारी हार झेलनी पड़ी। उसके बाद से व्यापारी का काम हुआ नहीं । न ही पैसे वापसी को लेकर रूचि दिखा रहे। चक्कर पे चक्कर के बाद अंत में व्यापारी ने अपने आध्यात्मिक गुरु के कानों तक बात पहुंचाई। गुरुजी ने मंत्री के राजनैतिक गुरु को पूरी जानकारी दी,फिर राजनीतिक गुरु ने पूर्व मंत्री की क्लास लगाई । तब कहीं जाकर उन्होंने व्यापारी को रकम वापस किया, वह भी हाफ। अब देखें शेष पचास फीसदी राशि शीघ्र वापस मिलेगी या गुरु से गुरु को फिर कहलाना पड़ेगा।
हक है तो वसूलिये, मगर समय पर
छत्तीसगढ़ बने 25 साल से ज्यादा हो चुके हैं। 1 नवंबर 2000 को जब मध्य प्रदेश से अलग होकर यह नया राज्य बना, तब इसे क्षेत्रीय सपनों और बेहतर प्रशासन की उम्मीदों का प्रतीक बताया गया था। लेकिन अब, रजत जयंती मना लेने के बाद अचानक एक पुराना हिसाब सामने आया है। वसूली मध्यप्रदेश से होनी है, इसलिये चर्चा वहां ज्यादा है।
27 फरवरी को भोपाल विधानसभा में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार के सवाल पर उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने एक अगस्त 2025 को यह राशि मांगी है। यह राशि पेंशन दायित्वों पर बढ़े बोझ की वजह से है।
मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम-2000 की धारा 49 और छठी अनुसूची के अनुसार, पेंशन की जिम्मेदारी दोनों राज्यों में जनसंख्या अनुपात के आधार पर बांटी जानी थी। यानी जो कर्मचारी विभाजन के बाद छत्तीसगढ़ में आए और यहीं रिटायर हुए, उनकी पेंशन का बोझ आनुपातिक रूप से दोनों राज्यों पर पडऩा था।
अब अगर ऑडिट में अतिरिक्त दायित्व सामने आया है, तो छत्तीसगढ़ का दावा न तो मांग है, न उपकार। यह सीधा-सीधा कानूनी और नैतिक हक है। पर सवाल यह है कि राशि की मांग करने में इतनी देर क्यों? मौजूदा छत्तीसगढ़ सरकार बनने के बाद अगस्त 2025 में, यानि करीब 8 माह पहले यह राशि मांगी गई थी, मगर भुगतान नहीं हुआ। सवाल एक यह भी उठता है कि 2024 तक दोनों ही पार्टियों की सरकारें थीं, राशि वसूल करने में लचीलापन क्यों दिखाया गया? कुछ मौके ऐसे आए जब दोनों राज्यों में अलग-अलग समय पर कांग्रेस और भाजपा की सरकारें रहीं। अभी दोनों जगह भाजपा सत्ता में है। तो क्या उम्मीद करनी चाहिए कि यह राशि मिल जाएगी। या फिर ऐसा हो जाएगा कि- आपस की बात है सोचकर न मांगने वाला जिद करे, न देने वाला परवाह करे। भुगतान के मुद्दे को हल करने के लिए 28 नवंबर 2025 को मध्यप्रदेश ने एक कमेटी बना दी थी लेकिन उसने अब तक भुगतान करने की सिफारिश नहीं की है। शायद सही समय पर भुगतान की मांग की जाती तो रुकी हुई राशि का भुगतान इतना जटिल भी नहीं होता। 10 हजार 133 करोड़ रुपये बहुत होते हैं। इसके मिलने पर राज्य के विकास सडक़, स्कूल, अस्पताल का हिस्सा, जो पेंशन भुगतान में जा रहा है, उससे बचा जा सकेगा।
राज्यसभा, एक व्यक्ति एक पद ?

भाजपा में राज्यसभा प्रत्याशी को लेकर सस्पेंस बरकरार है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी किसी युवा चेहरे पर दांव खेल सकती है। हाल ही में एक युवा नेता ने दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात भी की है और वे संगठन के पसंदीदा माने जाते हैं। हालांकि पेच यह है कि उक्त नेता विधानसभा चुनाव हार चुके हैं और वर्तमान में एक निगम के चेयरमैन भी हैं। ऐसे में उन्हें राज्यसभा भेजने पर एक व्यक्तिएक पद और संगठनात्मक संतुलन को लेकर असंतोष की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
रणनीतिकारों के बीच एक महिला नेत्री के नाम पर भी चर्चा बताई जा रही है। वे जिले की प्रमुख पदाधिकारी हैं और एक पूर्व मंत्री की पुत्री हैं। पार्टी महिला प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरण को साधने के लिहाज से इस विकल्प पर भी विचार कर सकती है।
इसी बीच दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के परिवार की ओर से भी लॉबिंग की चर्चा है। उनके भतीजे रणविजय सिंह जूदेव पहले राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं, हालांकि उनके कार्यकाल को लेकर पार्टी के भीतर मिश्रित राय बताई जाती है। जूदेव के पुत्र प्रबल प्रताप सिंह जूदेव और पुत्रवधु संयोगिता सिंह जूदेव को पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव में मैदान में उतारा था, लेकिन दोनों को हार का सामना करना पड़ा। परिवार की एक अन्य सदस्य महिला आयोग में भी हैं। ऐसे में संगठन के भीतर यह आकलन है कि फिलहाल जूदेव परिवार से किसी को राज्यसभा भेजे जाने की संभावना सीमित हो सकती है।
इन नामों के अलावा चार पूर्व विधायक भी दावेदारी जता चुके हैं। भाजपा अक्सर अंतिम क्षणों में चौंकाने वाला फैसला लेने के लिए जानी जाती है, इसलिए किसी बिल्कुल नए और अप्रत्याशित नाम के सामने आने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
साइकिल की अंतिम यात्रा
कभी करोड़ों रुपये खर्च कर जिन साइकिलों को नवा रायपुर स्मार्ट सिटी का सपना बताया गया था, आज वही एक ट्रक में लदी हुई ऐसे जा रही थी जैसे किसी योजना की अंतिम यात्रा निकल रही हो। शुरुआत बड़े शोर-शराबे, उद्घाटन और दावों के साथ हुई थी, लेकिन अंजाम खामोश है।
शहर को सच में बेहतर बनाने की जरूरत थी। सडक़, पानी, स्वास्थ्य, रोजग़ार जैसी बुनियादी चीज़ों की। मगर ध्यान दिखावे पर ज्यादा रहा। नतीजा यह कि योजनाएं कागजों और फोटो तक ही सीमित रह गई। यह तस्वीर स्मार्ट सिटी को लेकर अधूरी सोच और गलत प्राथमिकताओं की भी कहानी है। तस्वीर उचित शर्मा ने फेसबुक पर पोस्ट की है।
रेल कर्मियों को पेंशन बंद होने का झांसा
कल ही हमने इसी कालम में बताया था कि केंद्र ने अपने पेंशनर्स को एपीके फ़ाइल के जरिए साइबर ठगों से अलर्ट किया है। ठग, न?ए वेतन आयोग में नफे नुकसान का कैलकुलेशन पर एपीके फ़ाइल भेजकर बुजुर्गों की राशि उड़ा रहे हैं। और आज रेलवे बोर्ड और
मंत्रालय ने भी देश भर के लिए एक आधिकारिक एडवाइजरी जारी की है। रेल कर्मियों ने यहां बताया कि पेंशनभोगियों को साइबर धोखाधड़ी से सतर्क रहने को कहा गया है। ये जालसाज स्वयं को रेलवे डिवीजनल पर्सनल मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर बनकर पेंशनभोगियों को काल कर, एसएमएस या वॉट्सएप मैसेज कर रहे हैं। इसमें पेंशन पेमेंट ऑर्डर अपडेट करने के ,पेंशन खाते का केवाईसी दोबारा कराने, कोई अतिरिक्त पेंशन लाभ या बकाये का भुगतान देने का झांसा दे रहे। और जानकारी देने या मैसेज क्लिक करते ही राशि उड़ा ले रहे।
रेल मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि रेलवे कभी भी क्कक्कह्र या सर्विस रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए किसी भी तरह का लिंक नहीं भेजता है। रेलवे का कोई भी अधिकारी फोन कॉल, एसएमएस, वॉट्सएप या सोशल मीडिया के जरिए आपसे आपका बैंक अकाउंट नंबर, पासवर्ड, ओटीपी या कोई भी गोपनीय वित्तीय जानकारी नहीं मांगता है।किसी भी ऐसे लिंक पर क्लिक न करें जो आपको पेंशन अपडेट के नाम पर भेजा गया हो।
इसलिए किसी भी अनजान नंबर से आए कॉल पर अपनी बैंक डिटेल्स या पर्सनल जानकारी बिल्कुल शेयर न करें। कोई संदिग्ध कॉल या मैसेज आता है, तो तुरंत अपने स्थानीय पुलिस साइबर सेल 1930) पर कॉल करें और अपने संबंधित रेलवे प्रशासनिक कार्यालय को सूचित करें.
पेंशन या पे-कमीशन से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए केवल रेलवे की आधिकारिक वेबसाइट पर ही जाएं।
कमजोर नस पकड़ में आई
छत्तीसगढ़ की सियासत में अगर सवालों की धार की बात हो, तो अजय चंद्राकर का नाम सबसे पहले आता है। विधानसभा में उनके तीखे और तथ्यपरक सवाल अक्सर मंत्रियों को असहज कर देते हैं। जवाब देते कई मंत्री मुश्किलों में घिर जाते हैं।
मगर इस बार मंजर थोड़ा अलग दिखा। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने उसी तेवर में पलटवार किया, जिसके लिए अजय पहचाने जाते हैं। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक सवाल पर जवाब देते हुए जायसवाल ने मुस्कराते हुए याद दिलाया कि आप भी कभी इसी विभाग के मंत्री रह चुके हैं।
बस, फिर क्या था। सदन में हल्की खनक के साथ ठहाके भी सुनाई दिए। अजय ने जवाबी तेवर तो दिखाए, लेकिन एक पल के लिए असहजता साफ झलक गई। दर असल यह पूरा मामला पूर्व के वर्षों में मेकाहारा के लिए खरीदे गए पैट मशीन और गामा विकिरण मशीन के उपयोग से जुड़ा हुआ है। ये मशीनें अब तक शुरू नहीं हुई हैं। कांग्रेस सरकार ने भी इनकी पैकिंग नहीं खोला था। और अब दो साल में भी यह बंद है। जायसवाल ने जोर देकर कहा कि बिना वित्तीय स्वीकृति के 20 करोड़ से अधिक की खरीदी हुई और इसकी जांच चल रही है। इस पर अजय खामोश हो गए, और विपक्षी सदस्य ने यह पूछ किया कि किसके कार्यकाल में खरीदी हुई थी। इसके उत्तर से पहले प्रश्न काल समाप्त हो गया। लेकिन उसके बाद चर्चा यह हो रही है कि जायसवाल ने पूर्व मंत्री की कमजोर नस पकड़ लिया है। यही वजह है कि वो अजय पर भारी पड़ते दिखाई देते हैं।
सलाखों के पीछे भी तो इंसान ही हैं...
छत्तीसगढ़ विधानसभा में उठे हिरासत में मौतों के मुद्दे ने जेल व्यवस्था की हकीकत को सामने ला दिया है। बताया गया कि जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच 13 महीनों में 66 कैदियों की मौत हुई। इससे स्वाभाविक सवाल उठते हैं कि क्या जेलें सुरक्षित हैं? क्या बीमार कैदियों को समय पर इलाज मिल रहा है? और क्या हर मौत की निष्पक्ष जांच हो रही है?
गृह मंत्री ने यह भी बताया कि 66 में से 18 मामलों की मजिस्ट्रेट जांच पूरी हो चुकी है, जबकि 48 अब भी लंबित हैं। इतने अधिक मामलों की जांच लंबित रहना भी सवाल खड़े करता है। बड़े पैमाने पर लंबित प्रकरण पारदर्शिता पर भी संदेह पैदा करता है।
कल हुई बहस के केंद्र में आदिवासी नेता जीवन ठाकुर की मौत रही। उन्हें 12 अक्टूबर 2025 को कथित फर्जी प्रमाणपत्र रैकेट में गिरफ्तार किया गया था। वे मधुमेह से पीडि़त थे। कांकेर जेल में तबीयत बिगडऩे पर अदालत के आदेश से रायपुर भेजा गया। सरकार का कहना है कि वे चिकित्सकीय सलाह का पालन नहीं कर रहे थे, इसलिए अदालत को सूचित कर इलाज कराया गया। लेकिन विपक्ष, खासकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ने इसे राज्य प्रायोजित हत्या बताया और विधानसभा की समिति से जांच की मांग की। विरोध में विपक्ष ने वॉकआउट भी किया। पक्ष विपक्ष में टकराव अपनी जगह है पर असल मुद्दा तो जेलों में होने वाली मौतों की समस्या है, जो नई नहीं है। 2021-22 में भी राज्य में 93 हिरासत मौतें दर्ज हुई थीं। यानी यह एक लगातार चलता पैटर्न है।
दरअसल जेलों की हालत ही चिंताजनक है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जेल प्रशासन की ओर से जब जवाब दाखिल होता है तो कई तथ्य निकलते हैं। राज्य की 33 जेलों की क्षमता करीब 14,883 कैदियों की है, लेकिन 2025 में यहां 20,500 से ज्यादा बंदी हैं। 150 प्रतिशत से अधिक भीड़ का स्वास्थ्य, स्वच्छता और मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है। प्रत्यक्ष रूप से कोई कैदी प्रताडि़त नहीं भी किया जाए, तो माहौल ही उनके लिए जानलेवा साबित होता है।
संविधान हर व्यक्ति को जीवन और गरिमा का अधिकार देता है, चाहे वह कैदी ही क्यों न हो। जेलों में डॉक्टरों और नर्सों की संख्या पर्याप्त नहीं है। ओवरक्राउड घटाने के लिए जमानत और वैकल्पिक सजा के उपायों पर काम नहीं हो रहा है। सिर्फ एक खुली जेल बेमेतरा में खोलने की घोषणा की गई है।


