राजपथ - जनपथ
20 साल बाद खुला स्कूल
पीएससी परीक्षा का सेंटर बनाए जाने की वजह से रायपुर सहित कई शहरों के स्कूल बंद रहे, और प्रवेशोत्सव नहीं मना। रायपुर के तीन स्कूलों को पीएससी परीक्षा का सेंटर बनाया गया था। मगर धुर नक्सल जिला बीजापुर के दूर-दूर के कई स्कूल खुल गए। ये स्कूल करीब 20-22 साल बाद खुले हैं, और वहां बकायदा प्रवेशोत्सव भी मना।
बीजापुर कलेक्टर अनुराग पाण्डेय, और पुलिस अमला मुख्यालय से करीब 33 किमी दूर उसरनार गांव के स्कूल पहुंचे। यह स्कूल एक तरह से टेंट में संचालित हो रहा है। प्रधान पाठक के अलावा यहां अस्थाई शिक्षक ही हैं। लेकिन बच्चों की संख्या भी अच्छी खासी रही। बच्चों का मिठाई खिलाकर स्वागत किया गया। उनकी खुशी देखने लायक थी। वहां सेल्फी जोन बनाया गया था, जिसमें बच्चों की सेल्फी ली गई।
उसरनार सहित दूर दराज के कई गांव हैं जहां भले ही स्कूल की छत नहीं है। टेंट में स्कूल शुरू हो गए हैं। इन स्कूलों के निर्माण के लिए प्रशासन ने पहल की है। मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है। कुल मिलाकर धुर नक्सल इलाके में शिक्षा का सूरज दिखाई दे रहा है।
लता की वाहवाही

ओडिशा में पहली बार भाजपा की सरकार बनने पर भाजपा के रणनीतिकार खुश हैं। पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, और ओडिशा की प्रभारी पूर्व मंत्री लता उसेंडी को वाहवाही मिल रही है। यह देखने में आया है कि सीमावर्ती इलाकों के नेता अपने पड़ोस के राज्यों की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति से वाकिफ होने की वजह से सफलता दिलाने में कामयाब रहे हैं।
छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका ओडिशा से सटा हुआ है। यही वजह है कि कोंडागांव की विधायक लता उसेंडी को ओडिशा में संगठन की जिम्मेदारी दी गई थी, और उन्होंने बेहतर ढंग से निभाया भी। इससे परे कांग्रेस में भी 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद ओडिशा के नेता भक्तचरण दास को कांग्रेस ने प्रदेश संगठन का प्रभारी सचिव बनाया था। दास ज्यादातर समय बस्तर में काम करते रहे। भक्तचरण दास की सिफारिश पर कांग्रेस ने बस्तर की सीटों पर प्रत्याशी तय किए थे। और 2013 में कांग्रेस को अच्छी सफलता मिली। ये अलग बात है कि मैदानी इलाकों में पिछडऩे की वजह से कांग्रेस, प्रदेश में उस वक्त सरकार बनाने से रह गई। बस्तर के प्रदर्शन को कांग्रेस ने 2018 के चुनाव में भी दोहराया। कांग्रेस ने दंतेवाड़ा को छोडक़र सभी सीटों पर कब्जा जमाया। और सरकार बनाने में कामयाब रही।
दूसरी तरफ, भाजपा ने छत्तीसगढ़ के 67 नेताओं को वहां प्रचार के लिए भेजा था। लता प्रभारी थीं इसलिए सबकी ड्यूटी व्यवस्थित तरीके से स्थानीय समीकरण को ध्यान में रखकर लगाई गई। इसका फायदा भी मिला। चूंकि ओडिशा में भाजपा का बेहतर प्रदर्शन रहा है ऐसे में स्वाभाविक तौर पर लता की पूछ परख बढ़ गई है।
लाल बत्ती जल्द संभव
लोकसभा चुनाव के बाद सबसे ज्यादा चर्चा मंत्रिमंडल के दो सदस्यों की नियुक्ति को लेकर है, लेकिन नेता-कार्यकर्ताओं की इसमें रुचि कम है। उनकी रुचि निगम, मंडल और आयोगों में होने वाली नियुक्तियों पर है। बीच बीच में ऐसा हवा उड़ जाती है कि निगम मंडल में नियुक्तियां होने वाली हैं, लेकिन पुराने नेता जानते हैं कि ज्यादातर नियुक्तियां नगर निगम और पंचायत चुनाव के बाद ही होती हैं। इस साल के अंत तक निगम चुनाव होंगे। इसके बाद 6 महीने में पंचायत के चुनाव होंगे। तब जाकर नियुक्तियां शुरू होंगी। इससे पहले चर्चाओं में ही लॉलीपॉप थमाया जाएगा। वैसे यह भी पुख्ता खबर है कि सरकार और संगठन ने मिलकर पहली सूची तैयार कर ली है। देखना है कि यह कब जारी होती है ।
कांग्रेस संगठन कोरबा सरगुजा से चलेगा
कांग्रेस संगठन में भी आने वाले समय में बदलाव होना है। पिछले कार्यकाल में जिस गुट को ज्यादा भाव मिला था, इस बार उनके बजाय कुछ नए चेहरे जुड़ सकते हैं। कुछ स्थानीय नेताओं को राष्ट्रीय टीम में भी जिम्मेदारी मिल सकती है। काफी कुछ बदलाव की चर्चा है। इसके लिए पुराने कुछ साथियों के एक होने की बात सामने आ रही है, जो सरकार होने के बाद भी खुद को कमजोर और ठगा सा महसूस कर रहे थे। इस बार कोरबा और सरगुजा के दिग्गजों की तूती बोलने वाली है। लोकसभा चुनाव परिणाम का भी असर बदलाव में दिखाई दे सकता है।
बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला

जो अपनी आलोचना खुद करे, उससे बड़ा साहसी कोई हो नहीं सकता । ट्रकों के पीछे हमें कई दार्शनिक संदेश लिखे मिल जाते हैं। इस दिलेर ट्रक ड्राइवर ने लिखकर बताया है कि ट्रक चलाने वालों से शादी क्यों नहीं करनी चाहिए। हालांकि कोई-कोई ही ट्रक चालक होगा, जो उसकी बात से सहमत होगा। ट्रक चालकों का परिवार भी खुशहाल ही होगा। पर इसने आगाह कर दिया है। कुछ बुरा अनुभव रहा होगा उसका। लगे हाथ कुछ और स्लोगन याद दिला दें- बुरी नजर वाले, तेरा मुंह काला और देखे मगर प्यार से, तो सदाबहार और सुपरहिट हैं। 30 का फूल 80 की माला, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। जलो मत, बराबरी करो। और ये देखिये- नीयत तेरी अच्छी है तो किस्मत तेरी दासी है। कर्म तेरे अच्छे हैं तो घर में मथुरा काशी है। यह भी बढिय़ा है- फानूस बनकर जिसकी हिफाजत हवा करे, वो शमां क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे। मार्मिक संदेश भी मिलेंगे- रात होगी, अंधेरा होगा और नदी का किनारा होगा, हाथ में स्टेयरिंग होगा, बस मां का सहारा होगा। यह भी मार्मिक है- हमें जमाने से क्या लेना-देना, हमारी गाड़ी ही हमारा वतन होगा- दम तोड़ देंगे स्टेयरिंग पर, तिरपाल ही हमारा कफन होगा।
सुनने में बुरा लगे तो लगे लेकिन बात व्यावहारिक है- दोस्ती पक्की, खर्चा अपना-अपना। और, मांगना है तो खुदा से मांग बंदे से नहीं- दोस्ती हमसे करो, धंधे से नहीं। और यह भी- नेकी कर जूते खा, मैंने खाए तू भी खा। मतलब की है दुनिया, कहां किसी से प्यार होता है- धोखा वही देते हैं, जिन पर ऐतबार होता है।
गाड़ी चलाने वालों को हिदायत भी दी जाती है- पीकर जो चलाएगा-परलोक चला जाएगा। चलाएगा होश में तो जिंदगी भर साथ दूंगी-पीकर चलाएगा तो परलोक पहुंचा दूंगी। बच्चे इंतजार में हैं, पापा वापस जरूर आना- दूर के मुसाफिर, नशे में गाड़ी मत चलाना। सूची लंबी है, पर फिर कभी।
कांग्रेस नेताओं को फैक्ट पता नहीं?
छत्तीसगढ़ में विधानसभा और उसके बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार का कारण तलाशने के लिए वरिष्ठ कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली के नेतृत्व में एक टीम पूरे पांच दिन दौरा कर संभागीय मुख्यालयों में कार्यकर्ताओं के साथ संवाद करने जा रही है। पहली बार ऐसा हुआ है कि इसे फैक्ट फाइंडिंग टीम बताया गया है। लोकसभा चुनाव में संसद में विपक्ष के रूप में कांग्रेस मजबूत होकर पहुंची, लेकिन छत्तीसगढ़ में उसे केवल एक सीट कोरबा की मिल पाई। कांकेर सीट जीतने के कगार पर थी, पर किस्मत ने साथ नहीं दिया। कांग्रेस यदि पिछले कुछ महीनों की मीडिया रिपोर्ट्स की ही छानबीन कर ले तो बहुत से कारण सामने आ जाएंगे। कैसे विधानसभा में जीतने के बाद भाजपा ने महतारी वंदन और धान बोनस को जमीन पर लागू किया। राम मंदिर बाहर से आने वाले प्रत्येक स्टार प्रचारक के भाषण के केंद्र में रहा। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने जिलों का दौरा करना जरूरी नहीं समझा और खुद चुनाव लडक़र एक बड़ी महत्वाकांक्षा पूरी करने के फेर में पड़ गए। राजनांदगांव में मंच पर अपने सीएम और अफसरों पर गुस्सा उतारने वाले कार्यकर्ता को पार्टी से बाहर कर दिया गया। बिरनपुर मसले पर उनके मंत्रियों का कैसा शुतुरमुर्ग जैसा रवैया रहा। सीएम की कुर्सी पकडऩे और खिसकाने की ढाई साल तक कसरत होती रही। ऐसी ही दर्जनों और बातें मीडिया पर आती रही है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस की जो टीम आ रही है, उसे पता तो सब होगा पर उन्हें लगता है कि बात करने से कार्यकर्ताओं का गुबार बाहर निकलेगा। कुछ उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले नगरीय चुनावों में साख बचाने में इससे मदद मिल जाएगी। ([email protected])
बलौदाबाजार के बाद दलित राजनीति की दिशा
बलौदाबाजार हिंसा को लेकर बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती का बयान घटना के 15 दिन बीत जाने के बाद आया है। बलौदाबाजार और उससे आगे जाने पर मिलने वाले कसडोल, चंद्रपुर, पामगढ़, जैजैपुर, अकलतरा, जांजगीर, वे विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां बहुजन समाज पार्टी का खासा असर है। ये ही वे इलाके हैं, जिनमें से उनके विधायक चुनकर आते हैं। इस बार जरूर कोई जीत नहीं सका लेकिन कांग्रेस या भाजपा प्रत्याशियों की हार-जीत में उनके उम्मीदवारों की मौजूदगी एक कारक रही।
इसके विपरीत घटना के एक सप्ताह बाद भीम आर्मी के प्रमुख, सांसद चंद्रशेखर आजाद का बयान आ गया था, जो यूपी में मायावती के प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहे हैं। छत्तीसगढ़ पर उनका बयान इस लिहाज से भी जरूरी था क्योंकि पुलिस ने बलौदाबाजार हिंसा में उनके संगठन से जुड़े कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है।
यह गौर करने की बात है कि मायावती की प्रतिक्रिया बहुत संयमित है, जबकि आजाद ने अपने समर्थकों की गिरफ्तारी पर रोष अधिक दिखाया था। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि लोग मानकर चलते हैं कि भाजपा के प्रति मायावती उदार रहती हैं। मायावती ने बलौदाबाजार की कंपोजिट बिल्डिंग में हुई हिंसा की निंदा करते हुए जिम्मेदार असामाजिक तत्वों पर कार्रवाई की बात भी कही है। भीम आर्मी प्रमुख आजाद ने इसकी चर्चा भी अपने बयान में नहीं की। मायावती और आजाद दोनों ने ही बेकसूर लोगों को प्रताडि़त करने का सवाल उठाया है।
मायावती ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए छत्तीसगढ़ में केवल अनुसूचित जाति पर व्यूह केंद्रित नहीं किया। ओबीसी को भी उन्होंने टिकट दी। इस बार चंद्रपुर सीट से हार गए पूर्व विधायक केशव चंद्रा ओबीसी से आते हैं। मगर, आजाद ने अपनी राजनीतिक गतिविधि सिर्फ अनुसूचित जाति पर केंद्रित रखी है। बसपा ने भी पहले ऐसा ही किया था, वह बाद में उदार हुई।
यह कहा जा रहा है कि भाजपा की ओर रुझान के चलते छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति के पारंपरिक मतदाता बसपा से विमुख हुए हैं। इसका असर 2023 के विधानसभा चुनाव में दिखा, जब उसे एक भी सीट नहीं मिली। बसपा ओबीसी मतदाताओं में पैठ रखने के बावजूद अपने प्रभाव वाली सीटों पर नाकाम रही। दूसरी ओर भीम आर्मी की, बलौदाबाजार घटना के बहाने दस्तक हो गई है, जिसका फोकस सिर्फ अनुसूचित जाति के मतदाताओं पर है। आने वाले दिनों में अनुसूचित जाति पर राजनीति करने वाले दलों की भूमिका बदलनी तय दिखाई दे रही है। यह अधिक बिखराब के रूप में भी हो सकता है और एकजुटता के रूप में भी।
पूर्व सीएस अजय सिंह चर्चा में आए

मुंगेली जिले के एक छोटे से गांव पथरिया, जो अब नगर पंचायत है, के धोती-कुर्ता धारी एक वकील फतेह सिंह चंदेल ने तय किया कि वे अपना सारा परिश्रम बच्चों को ऊंचे मुकाम पर पहुंचाने में लगाएंगे। वे परिवार सहित बिलासपुर शिफ्ट हो गए। यहीं वकालत करने लग गए और बच्चों को अच्छी शिक्षा दी। उनके बेटे अजय सिंह पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के दौर में मुख्य सचिव हुआ करते थे। छत्तीसगढिय़ावाद को बहुत आगे बढ़ाने का दावा करने वाले भूपेश बघेल को ये छत्तीसढिय़ा जमे नहीं। दिसंबर 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के 15 दिन बाद वे प्रमुख सचिव पद से हटा दिए गए। खैर, हर सीएम को अधिकार है कि वे अपनी पसंद का सीएस रखें। इस बीच अजय सिंह राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे, फिर 2020 में रिटायर हो गए। इसके बाद वे क्या कर रहे थे, इसकी कोई चर्चा नहीं हुई। सरकार के ताजा आदेश के मुताबिक अब वे राज्य निर्वाचन आयुक्त की जिम्मेदारी संभालेंगे। इनका पहला काम नगरीय निकायों का चुनाव कराना होगा, जो इस साल के नवंबर में होने जा रहा है। उसके बाद पंचायतों की बारी भी आएगी।
अजय सिंह की पत्नी आभा एक काबिल चिकित्सक हैं। उनके एक भाई भी डॉक्टर हैं और एक भाई अरविंद सिंह चंदेल हाईकोर्ट में जज हैं।
मंत्री-विधायकों के परफॉर्मेंस की जांच

लोकसभा चुनाव में भाजपा ने भले ही 10 सीटें जीती हैं, लेकिन सभी मंत्री-विधायकों के परफॉर्मेंस से भाजपा खुश नहीं है। पिछले दिनों हुई एक वर्चुअल बैठक में प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय ने विधानसभावार खराब परफॉर्मेंस की रिपोर्ट बनाने के लिए कहा है। इसमें यह देखा जाएगा कि जहां-जहां भाजपा के विधायक हैं, उन सीटों पर लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा प्रत्याशी को कितने वोट मिले हैं। यदि कम मिले हैं तो क्या कारण हैं?
दरअसल, 10 सीटें जीतकर भाजपा ने अपनी प्रतिष्ठा भले ही वापस पा ली, लेकिन परफॉर्मेंस के हिसाब से देखें तो कुछ महीने पहले जीती हुई 11 विधानसभा सीटों पर लोकसभा चुनाव में भाजपा पीछे रही। कोरबा सीट भाजपा के हाथ से निकल गई, जबकि यहां संगठन ने पूरी ताकत लगाई थी। स्थानीय स्तर पर कुछ नेताओं द्वारा भितरघात करने की बातें आ रही हैं। पूरी रिपोर्ट बनने के बाद संभवत: जिम्मेदारों से जवाब-तलब किया जा सकता है। आने वाली नियुक्तियों में भी इसका असर पड़ सकता है।
पुराने मंत्रियों के साथ क्या होगा?
मंत्रिमंडल की दो खाली सीट पर किसे नियुक्ति दी जाएगी, किसे नहीं, इससे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि जो पुराने नेता हैं, उनका क्या होगा? दरअसल, पिछले बजट सत्र में सब लोगों ने देखा कि धरमलाल कौशिक और अजय चंद्राकर समेत कई पुराने नेताओं ने किस तरह विधानसभा में अपनी ही सरकार के सामने असहज स्थिति पैदा कर दी थी।
सवाल तो पुरानी सरकार के कामकाज पर पूछे गए थे, लेकिन नए नवेले मंत्रियों के लिए जवाब देना आसान नहीं था। कुल मिलाकर संदेश यह गया कि विधायकों ने अपनी ही सरकार को घेरा। मंत्रिमंडल के दो पदों पर इतने सारे पुराने नेताओं को तो एडजस्ट नहीं किया जा सकता। यदि ये नेता विधानसभा में सवाल पूछने लगे तो भी सरकार के लिए असहज होने की स्थिति बनती रहेगी। ([email protected])
मंत्रालय में ऐसा दूसरी बार
छत्तीसगढ़ में बदलती सरकारों के साथ प्रशासन में भी बदलाव होते रहे हैं । यह सरकार नहीं करती, सरकार के करीबी रहे अफसर ही करवाते रहे। सीएस के समकक्ष को राजस्व मंडल, प्रशासन अकादमी भेजना तो परंपरा बन चुकी है। वहीं एमडी मार्कफेड, एमडी शराब निगम जैसे आईएएस के कैडर पदों पर आईपीएस या राप्रसे तो दूर अन्य कैडर के अफसरों को बिठाने की व्यवस्था छत्तीसगढ़ में ही शुरू हुई। इसे लेकर कई बार आईएएस एसोसिएशन सरकार से मिलकर असहमति जता चुका है। इस बार तो एक नई परंपरा शुरू की गई है।
वह यह कि अवर सचिव का पद ज्वाइंट कलेक्टर के समकक्ष है, और यहां आईएएस वासु जैन पदस्थ किए गए । ऐसा 24 वर्ष में दूसरी बार हुआ, जब आईएएस की पोस्टिंग हुई है। इससे पहले स्कूल शिक्षा विभाग में अपर सचिव के पद पर रणवीर शर्मा की पोस्टिंग हुई थी। वैसे अब तक अधिकतम राप्रसे अफसर बनाए जाते रहे हैं।
तीन दिन पहले वासु जैन के जारी इस आदेश पर महानदी भवन में चर्चाएँ चल पड़ी है। आईएएस कह रहे अक्षम्य नाराजगी जैसी बात है तो बिना विभाग के मंत्रालय में अटैच रख देते।यह परंपरा भी तो यहीं स्थापित हुई है। इस बार की पोस्टिंग ऑर्डर से लॉबी खुश नहीं है, जल्द ही सीएम के साथ डिनर होने वाला है। उसमें एसोसिएशन क्या करता है देखने वाली बात होगी। सदस्यों को बचाने की जिम्मेदारी उसकी ही है।
जल्द हो सकती है पारी खत्म

राज्य की पुलिसिंग में बड़े बदलाव के संकेत हैं। एक झटके में बलौदाबाजार एसपी को निलंबित कर सरकार ने तेवर दिखा दिए हैं। बड़े जिलों में भी बदलाव की तैयारी चल रही है। इसमें सबसे बड़ी वजह लॉ एंड आर्डर है। यह चुनाव में भी मुख्य मुद्दा था, जिसके दम पर भाजपा, कांग्रेस से सत्ता छीनने में कामयाब हो गए।
कानून व्यवस्था जहां ठीक है, वहां विधायक, स्थानीय नेता कप्तान से नाराज है कि उनकी बात नहीं सुनते। सरकार और संगठन से उनकी सुनने वाले कप्तान की पोस्टिंग की मांग हो रही है। एक आईजी के डेपुटेशन पर जाने को देखते कुछ रेंज के आईजी बदल सकते है। रायपुर में पूर्णकालीन आईजी की पोस्टिंग हो सकती है। क्योंकि रायपुर में मॉब लीचिंग, बलौदाबाजार हिंसा और थानों में ब्लेड चलना, सिपाहियों पर हमले जैसी बड़ी चूक मानी जा रही है। इसलिए नई पोस्टिंग हो सकती है। सरगुजा और दुर्ग आईजी भी बदल सकते हैं।
संस्कृत से लेकर बृजमोहन तक
छत्तीसगढ़ के नवनिर्वाचित सांसदों ने सोमवार को शपथ ली। सरगुजा के सांसद चिंतामणि महाराज को छोडक़र बाकियों ने हिन्दी में शपथ ली। चिंतामणि महाराज, उन तीन सांसदों में थे जिन्होंने संस्कृत में शपथ ली। चिंतामणि महाराज की तरह दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज की बेटी दिल्ली की सांसद बांसुरी ने भी संस्कृत में शपथ ली।
पहली बार के सांसद चिंतामणि महाराज के संस्कृत में शपथ लेने पर नवनिर्वाचित सांसदों ने सबसे ज्यादा मेज थपथपाकर स्वागत किया। चिंतामणि महाराज के बादं बृजमोहन अग्रवाल के शपथ लेने पर सांसदों ने स्वागत किया। शपथ लेने के बाद केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव ने बृजमोहन को संसद भवन स्थित अपने कक्ष में नाश्ते पर आमंत्रित किया।
बृजमोहन ने ओडिशा के चार लोकसभा संबलपुर, सुंदरगढ़, बरगढ़, और भुवनेश्वर के प्रभारी थे। यहां पार्टी को जीत मिली है। भूपेन्द्र यादव ओडिशा के चुनाव प्रभारी थे। तब भी उस समय बृजमोहन की भूमिका की सराहना की थी। और अब जब बृजमोहन सांसद बनकर पहुंचे हैं, तो उनकी काफी पूछ परख होती दिख रही है।
जल जीवन मिशन के पाक-साफ अफसर
जल जीवन मिशन के काम को लेकर पिछली सरकार के कार्यकाल में बेतहाशा शिकायतें मिली थी। कई ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया गया, वसूली का आदेश निकला और अधिकारी सस्पेंड भी किए गए। इस गर्मी में प्रदेश के अनेक शहरों और गांवों से रिपोर्ट आती रही कि किस तरह पाइपलाइन आधी अधूरी बिछाई गई हैं। पानी टंकी तैयार है लेकिन सप्लाई नहीं हो रही है। जो काम हो रहे हैं उनमें गुणवत्ता का भारी अभाव है। कल ही भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अनुराग सिंहदेव ने डिप्टी सीएम अरुण साव को ज्ञापन सौंप कर कहा कि सरगुजा, बलरामपुर और सूरजपुर जिले में जल जीवन मिशन के काम में भारी भ्रष्टाचार हुआ है, जांच कराएं।
मगर राजनांदगांव जिले में शिकायतों की जांच के बाद अफसरों को ठेकेदारों से ईमानदारी का सर्टिफिकेट मिल गया है। बीते अप्रैल में राजनांदगांव कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन के लेटर हेड पर मिशन संचालक को शिकायत मिली थी कि वह अफसर की कमीशन खोरी से त्रस्त हैं। चंदे के नाम पर 10 प्रतिशत कमीशन मांगा जा रहा है और भुगतान नहीं करने पर बिलों में दस्तखत नहीं किए जा रहे हैं। शिकायत संगठन की तरफ से थी, इसलिए तुरंत दुर्ग के एक अधिकारी को जांच के लिए भेजा गया। जब अधिकारी पहुंचे तो कोई बयान देने के लिए पहुंचा ही नहीं। जब जांच अधिकारी के सामने कोई आया नहीं, तब उन्होंने मान लिया कि शिकायत फर्जी है। शिकायत करने वाले किसी अज्ञात कारण से पीछे हट गए। अब जांच अधिकारी ने मान लिया है कि शिकायत फर्जी है। सब ठीक चल रहा है। यह रिपोर्ट तैयार हो गई, पेश कर दी गई। अब जिनकी शिकायत हुई वे डंके की चोट पर कह सकते हैं कि हम कमीशन नहीं खाते।
अतिरिक्त समय ही दे देना था...
यूजी-नीट की परीक्षा में ग्रेस मार्क पाने वाले 1563 छात्रों को दोबारा टेस्ट देने का मौका मिला, जिनमें से सिर्फ 813 शामिल हुए। चंडीगढ़ के दो छात्रों को मौका था, पर दोनों शामिल नहीं हुए। इसके बाद छत्तीसगढ़ में मौजूदगी सबसे कम रही, यहां के बालोद केंद्र में 185 पात्र परीक्षार्थियों में से 115 ने भाग लिया और दंतेवाड़ा केंद्र में तो 417 में से 176 ने ही लिया। भाग नहीं लेने वाले परीक्षार्थियों का कहना है कि जून के पहले सप्ताह में रिजल्ट आने के बाद से इस पर देशभर में जो विवाद चल रहा है, उसके चलते वे तनाव में हैं। वे दोबारा खुद को परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं कर पाए। हमने ग्रेस मार्क के लिए नहीं कहा था। हमें गलत पेपर बांट दिया गया था। सही पेपर देर से मिला। अतिरिक्त समय की मांग हमने उसी समय की थी।
शायद स्थानीय अफसर इस मांग पर फैसला इसलिये नहीं ले पाए क्योंकि उन्हें कोई अधिकार ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने नहीं दिया था। अब एजेंसी को विचार करना चाहिए कि देशभर में एग्जाम एक साथ होते हैं तो अलग-अलग अनचाही परिस्थितियां खड़ी हो सकती हैं। स्थानीय अधिकारियों को ऐसे में जरूरत के अनुसार फैसले लेने की छूट मिलनी चाहिए।
नांदघाट का फल बाजार..

रायपुर-बिलासपुर हाईवे के बीच शिवनाथ नदी के पुल पर फलों का बाजार लगता है। बड़ी भीड़ होती है। यात्री यहां रुकते हैं और कुछ खरीद कर आगे बढ़ते हैं। छत्तीसगढ़ के दूसरे हाट-बाजारों की तरह यहां भी मौसमी फल मीठे जामुन बिकने के लिए आए हैं। सामरी की विधायक सिद्धेश्वरी पैकरा रायपुर से अंबिकापुर जाते हुए रुकीं और उन्होंने भी अपने लिए खरीद लिए। ([email protected])
संविदा नियुक्ति की चर्चा से हलचल
मंडी बोर्ड के प्रभारी एमडी महेन्द्र सिंह सवन्नी रिटायर हो रहे हैं। मंडी इंस्पेक्टर से प्रभारी एमडी तक सफर तय करने वाले सवन्नी को संविदा नियुक्ति मिलने की चर्चा मात्र से बोर्ड काफी हलचल है। कई अफसरों ने सवन्नी के खिलाफ पीएमओ तक शिकायत की है, और किसी भी दशा में उन्हें संविदा नियुक्ति नहीं देने की गुजारिश भी की है।
शिकायत में मंडी बोर्ड के कई घपले-घोटाले का भी जिक्र है, और इसमें सवन्नी की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। सरकार चाहे कोई भी हो, सवन्नी का मंडी बोर्ड में दबदबा रहा है। जोगी सरकार में तत्कालीन कृषि मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम और राज्य मंत्री विधान मिश्रा के करीबी रहे हैं। भाजपा सरकार में उन्हें कोई दिक्कत थी ही नहीं, उनके सगे भाई भूपेन्द्र सिंह सवन्नी प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष हैं, और रमन सरकार में हाउसिंग बोर्ड के चेयरमैन रहे हैं।
कांग्रेस सरकार के आने के बाद महेन्द्र सिंह सवन्नी का रुतबा कम नहीं हुआ, और वो कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे के करीबी हो गए। अब जब संविदा नियुक्ति की फाइल चली है, तो मंडी बोर्ड में सवन्नी विरोधी खेमे में नाराजगी देखी जा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
तारीफ तो बनती है...
राज्य बनने के बाद दो लोकसभा सीट महासमुंद, और कांकेर में दो हजार से कम वोटों पर जीत हार का फैसला हुआ है। दोनों बार भाजपा को फतह हासिल हुई है। खास बात यह है कि दोनों सीटों पर भाजपा के चुनाव प्रभारी पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर थे।
कांकेर में भाजपा प्रत्याशी भोजराज नाग को मात्र 1884 वोटों से जीत हासिल हुई है। यह मुकाबला कांटे का था। भाजपा तो इस सीट को काफी कठिन मानकर चल रही थी। मगर अजय चंद्राकर अकेले थे, जो पार्टी के हर फोरम में कांकेर से जीत का दावा कर रहे थे।
कुछ इसी तरह का मुकाबला वर्ष-2014 में महासमुंद सीट पर हुआ। उस वक्त कांग्रेस से दिग्गज पूर्व सीएम अजीत जोगी मुकाबले में थे। भाजपा प्रत्याशी चंदूलाल साहू ने करीब 12 सौ वोटों से अजीत जोगी को मात दी थी। तब भी भाजपा के रणनीतिकारों में अकेले अजय चंद्राकर को छोडक़र कोई भी चंदूलाल साहू की जीत का भरोसा नहीं कर पा रहा था।
कांकेर में इस बार कड़े मुकाबले में भाजपा की जीत के लिए अजय चंद्राकर की भूमिका को सराहा जा रहा है। अजय बस्तर, कांकेर और महासमुंद क्लस्टर के प्रभारी थे। तीनों सीट पर भाजपा जीत हासिल की है।

राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में ट्रेनिंग के लिए गए बड़े पुलिस अफसरों में से बहुत से वहाँ टाई पहनने के नियम को अनदेखा करते हैं। इसलिए चेतावनी दी गई है कि जो लोग टाई नहीं पहने होंगे, उन्हें चाय के साथ समोसा नहीं दिया जाएगा।
दो आईपीएस की दिल्ली की राह

बस्तर आईजी सुंदरराज पी और पीएचक्यू में डीआईजी डी श्रवण, केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। सुंदरराज की पोस्टिंग हैदराबाद पुलिस अकादमी में हो सकती है। सुंदरराज करीब 7 साल से अधिक समय से बस्तर इलाके में पोस्टेड हैं। इससे पहले वो कांकेर में डीआईजी, और फिर बस्तर में आईजी बनाए गए।
सुंदरराज बस्तर में सबसे ज्यादा समय तक काम करने वाले अफसर हैं। उनके प्रयासों से बस्तर में नक्सल गतिविधियों में भारी कमी आई है। राज्य पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षाबलों के बीच तालमेल बेहतर हुआ। उनकी काबिलियत को देखकर ही चुनाव आयोग ने उन्हें वहां बनाए रखने पर सहमति दी थी। जबकि एक ही जगह पर 3 साल से अधिक समय से जमे अफसरों को हटाने का आदेश दिया गया था।
इसी तरह पीएचक्यू में पोस्टेड डीआईजी डी श्रवण की प्रतिनियुक्ति को राज्य सरकार ने मंजूर कर लिया है। आईपीएस के 2008 बैच के अफसर श्रवण की पोस्टिंग आईबी में हो सकती है। इन सब वजहों से आईजी और एसपी स्तर के कुछ अफसरों को इधर से उधर किया जा सकता है।
24 वर्ष में पांच अवर सचिव

छत्तीसगढ़ राज्य को बने 24 वर्ष हो गए। इस दौरान पांच मुख्य मंत्री, पांच गृह मंत्री, आधा दर्जन से अधिक मुख्य सचिव, एक दर्जन से अधिक एसीएस, पीएस गृह सचिव हुए, आधा दर्जन से अधिक डीजीपी बने। ये हम इसलिए गिना रहे कि सभी बड़े पदों पर बदलाव होता रहा। लेकिन नहीं बदले तो गृह विभाग में अवर सचिव। इन 24 वर्ष में मात्र पांच ही अवर सचिव हुए हैं। जो भी रहे अधिकांश रिटायर होकर ही निकले। यह कुर्सी का महत्तम है या बैठने वाले की सेटिंग। एक बार बैठ गए तो उठे नहीं। इनमें एक रिटायर होने के कुछ पहले ही हटाये गए। तो दूसरे का तबादला किया गया लेकिन जिन हाथों से हुआ उन्ही ने निरस्त भी किया। इन अवर सचिव ने बने रहने एड़ी चोटी लगा दी। सफल रहे और अब कम से कम बारह वर्ष बाद 30 जून को रिटायर होने जा रहे हैं। ग्रेड वन से एसओ और अवर सचिव तक गृह विभाग में ही जमे रहे।अब इस कुर्सी के लिए नए दावेदार जोर लगा रहे। इसके विपरीत जीएडी के आईएएस सेक्शन में अवर सचिव बदलते ही रहे।
नॉर्थ ब्लॉक की लॉबी और छोटे राज्य

सेंट्रल डेपुटेशन में नार्थ, साउथ ब्लाक, शास्त्री भवन में टिके रहना छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के अफसरों के लिए आसान नहीं। जो टिक गया वो दशक डेढ़ दशक रह जाता और नहीं तो वापसी की तैयारी करने लगता है। उत्तर और दक्षिण भारत के अफसरों की लॉबी, छोटे राज्यों के अफसरों की बड़ी पोस्टिंग पसंद नहीं करते। वे अड़ंगे लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। उन्हें तो, अपने मातहत, संयुक्त सचिव, डायरेक्टर जैसे पदों पर असिस्टेंट चाहिए होते हैं । इसी सोच की वजह से नीट का मामला उजागर हुआ। एनटीए के डीजी सुबोध सिंह की वापसी नहीं तो, वहां से कल देर रात हटा दिए गए।
उनकी सेवाएं डीओपीटी को लौटा दी गई है। इससे पहले निधि छिब्बर के साथ भी लॉबी ने किया। वार्षिक परीक्षाओं से ठीक पहले मैडम को सीबीएसई के चेयरमैन नीति आयोग में शिफ्ट कर दी गई। छिब्बर , पहले रक्षा विभाग फिर सीबीएसई चेयरमेन नियुक्त हुईं। चेयरमैन के पद पर तो सबसे कम अवधि रहीं।
जेसीसी में जान कौन फूंकेगा?
पूर्व विधायक अमित जोगी और उनकी पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की एक बार फिर चर्चा निकल पड़ी है। एक सोशल मीडिया पोस्ट में अमित जोगी ने कहा है कि लोग यह भ्रम न पालें कि जोगी परिवार भाजपा सरकार का कृपा पात्र होगा। रायपुर का सागौन बंगला और बिलासपुर का मरवाही सदन दोनों ही खाली कर दिए गए हैं।
जोगी के निधन के बाद हुए मरवाही उप चुनाव में परिस्थितियां ऐसी बनीं कि जेसीसी ने भाजपा प्रत्याशी को समर्थन दे दिया। वे नहीं जीत पाए लेकिन उसके बाद 2023 के विधानसभा चुनाव में मरवाही में पार्टी की मौजूदगी का असर ऐसा रहा कि राज्य बनने के बाद पहली बार वहां से भाजपा के हाथ में सीट आ गई। लोकसभा चुनाव से पहले जब अमित जोगी केंद्रीय गृह मंत्री से ‘सौजन्य मुलाकात’ करके लौटे तब चर्चा थी कि भाजपा उनके जनाधार का कुछ फायदा उठाएगी, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस पोस्ट के बाद अब भाजपा से दूरी अधिक स्पष्ट हो गई है।
पोस्ट में कांग्रेस के प्रति थोड़ा झुकाव भी दिख रहा है। उन्होंने अपनी लड़ाई को कांग्रेस नहीं, इसे ‘प्राइवेट फर्म बनाने वाले नेता’ के खिलाफ बताया है। कहा है कि सांप्रदायिकता और खनिज संसाधनों को बेचने के विरोध में वे दोनों राष्ट्रीय दलों के खिलाफ 5 साल तक लड़ेंगे।
पार्टी के अधिकांश संस्थापक, सदस्य विधायक और पूर्व विधायक, स्व. जोगी के बाद एक-एक करके पार्टी छोड़ चुके हैं। इनमें से कुछ लोगों ने अमित जोगी के व्यवहार को पार्टी छोडऩे का कारण बताया। विधानसभा चुनाव से पहले एक चर्चा यह थी कांग्रेस और जोगी कांग्रेस के बीच कुछ मध्यस्थता कराई जा रही है। मगर, बात तब नहीं बनी, जब अमित जोगी को लेने पर कई लोगों ने ऐतराज जताया। बीते विधानसभा चुनाव में यह तय हो गया कि पार्टी का जनाधार तेजी से घट चुका है। पाटन सीट से अमित जोगी ने प्रत्याशी बदल दिया और खुद मैदान में उतरे। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को हराने के लिए, लेकिन अमित जोगी उम्मीद से काफी कम वोट ले पाए। सन् 2018 में बेहद कम मार्जिन से हारने वालीं ऋचा जोगी को भी 2023 में निराशा हाथ लगी।
ऐसी स्थिति में अमित जोगी ने घोषणा कर दी है कि वे पार्टी अध्यक्ष नहीं रहेंगे। जोगी परिवार से बाहर का कोई अध्यक्ष बनेगा। कई लोग इस कदम को जिम्मेदारी से बच निकलने का एक सुविधाजनक रास्ता मान सकते हैं, पर हो सकता है कि पार्टी फिर खड़ी हो जाए। तब उन्हें कांग्रेस और बीजेपी वाले एक दूसरे की ‘बी’ टीम बताना बंद कर देंगे।
फसल और मौसम का अनुमान

धान बोने की शुरुआत हो रही है। ऐसे में आप किसी-किसी आंगन में ऐसी तैयारी देख सकते हैं। किसान अच्छी फसल और मौसम का अनुमान लगाने के लिए तीन दिनों के लिए गोबर से पांच गोल कटोरे की आकृतियां बनाते हैं, जिसे ढाबा कहते हैं। इनमें से तीन को पानी और दो को बीज से भरा जाता है। पानी से भरे कटोरे आषाढ़, सावन, भादों के प्रतीक होते हैं। ताकि आने वाले तीन माह खेतों मे वर्षा अधिक हो और फसलों को पानी मिल सके। अगर इन तीनों कटोरे मे से किसी भी एक कटोरे मे इन तीन दिनों में पानी कम होता है तो यह माना जाता है के उस माह में पानी कम गिरेगा। बाकी दो कटोरे बीज से भरे होते हैं, जिन्हें कोठी का प्रतीक माना जाता है। कहीं-कहीं मिट्टी के नए घड़े में पानी भरकर उसे मिट्टी के ढेले पर भी रख दिया जाता है। ([email protected])
कांग्रेस अब तक उबरी नहीं
विधानसभा, और लोकसभा चुनाव में बुरी हार से कांग्रेस अब तक उबर नहीं पाई है। कई नेता तो लोकसभा चुनाव से पहले ही पार्टी छोड़ चुके हैं। कुछ बड़े नेताओं ने पार्टी की गतिविधियों में हिस्सा लेना बंद कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ कि शुक्रवार को नीट परीक्षा में धांधली के विरोध में प्रदेश स्तरीय धरना-प्रदर्शन में कुल सवा सौ लोग ही जुट पाए।
इन सबके बीच चर्चा यह है कि चुनाव के बीच में ही कांग्रेस के एक बड़े नेता ने पार्टी छोडऩे का मन बना लिया था। कहा जा रहा है कि वो भाजपा सरकार के मुखिया के संपर्क में भी थे। मगर भाजपा के रणनीतिकारों ने नफा-नुकसान का आंकलन कर आगे बात नहीं बढ़ाई और नेताजी का भाजपा प्रवेश रह गया। कुछ इसी तरह विधानसभा लड़ चुके एक व्यक्ति को भी भाजपा में लाने की तैयारी थी लेकिन भाजपा के अंदर खाने में इस पर सहमति नहीं बन पाई। हालांकि कुछ लोगों का अंदाज है कि नगरीय निकाय चुनाव के पहले कांग्रेस में तोडफ़ोड़ हो सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
दो कि़स्म के त्रिकोण
भाजपा के तीन नेताओं की दोस्ती और तीन अन्य के बीच मनमुटाव की चर्चाएं पार्टी हलकों में चटखारे के साथ होने लगी हैं। हैं भी मजेदार । पहले बात दोस्ती की कर लें।इन तीन में से एक नेता दक्षिणी छोर,दूसरे मध्य क्षेत्र और तीसरे मध्य उत्तर-इलाके से आते हैं। तीनों नेता जब राजधानी में होते हैं तो रोजाना रात, किसी न किसी के घर जुटते हैं। किसी के घर के लॉन में साफ्ट बॉल से तीनों क्रिकेट खेलते हैं। अगले दिन दूसरे के घर जाने पर हल्के से म्यूजिक के साथ सिर पर प्याला रख बैलेंसिंग डांस कॉम्पिटिशन करते हैं ।
अब बात मनमुटाव वाले नेताओं की । ये लोग एक दूसरे पर शक करते हुए एक दूसरे की पोल खोलने में लगे रहते हैं। इनमें एक राजधानी के, दो पड़ोसी जिले के रहवासी हैं। एक ने दूसरे के स्कार्पियो पर उंगली उठाई तो ये, पहले वाले के रेत से तेल निकालने के कारोबार को प्रचारित करने कोई कसर नहीं छोड़ रहे। छ माह के भीतर ही हो रहे ऐसे किस्सों से भाई साहब लोग हतप्रभ और परेशान हैं। देखना है कि क्या रास्ता निकालते हैं।
एसडीएम तक पहुंची एसीबी
एंटी करप्शन ब्यूरो ने सरगुजा जिले के उदयपुर में जिन चार लोगों को घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार किया है, उनमें एसडीएम भागीरथी खांडे भी शामिल हैं। खांडे ने रिश्वत अपने हाथ में नहीं ली थी, एक को लेने कहा, जब उसने ले लिया तो दूसरे को रख लेने के लिए कहा। इस घटना ने 9 साल पुरानी एक घटना की याद दिला दी है। आईएएस रणबीर शर्मा को नौकरी में आए महज तीन साल हुए थे। उन्हें भानुप्रतापपुर में एसडीएम का पद सौंपा गया था। वहां उनके लिए स्टाफ ने 40 हजार रुपये रिश्वत ली। तब एसडीएम को सिर्फ तबादले की सजा मिली। एसीबी उनको कानूनी घेरे से बचा ले गई थी। वैसे ये अफसर तब भी बचा ले गए थे जब एसडीएम ही रहते मरवाही में भालू पर गोली चलवा दी थी और कोविड महामारी के दौरान सूरजपुर में कलेक्टर रहते एक बच्चे की बीच सडक़ में पिटाई कर दी थी।
बहरहाल, राजस्व, पुलिस और दूसरे विभागों में जो भी रिश्वत ली जाती है, उसमें लेने वाले बताते हैं कि अफसरों का भी इसमें हिस्सा जुड़ा हुआ है। पर, उन अधिकारियों तक एसीबी के हाथ नहीं पहुंचते। राजस्व विभाग में सिर्फ नीचे के कर्मचारियों पर कार्रवाई होने के कारण कार्यालय प्रमुख पाक-साफ नजर आते हैं। वे अपने हाथ में घूस की रकम सीधे नहीं लेते। एसीबी ने एसडीएम पर कार्रवाई कर बता दिया है कि हाथ रंगे न हों, मगर इस बात का सबूत मिलेगा कि उनका हिस्सा है तो अफसर के गिरेबान को भी पकड़ा जा सकता है। दो चार ऐसी और कार्रवाई रेवन्यू में फैले बेतहाशा भ्रष्टाचार को कम कर सकती है।
एक एसडीएम ने रेत बेच दी?
राजनांदगांव जिले में डोंगरगढ़ के एसडीएम भी दो दिन से चर्चा में हैं। इन पर जब्त रेत बेच देने का आरोप है। दरअसल, डोंगरगढ़ के मुड़पार इलाके में रेत का अवैध भंडार पकड़ा गया। करीब 800 हाईवा रेत एसडीएम उमेश पटेल ने जब्त कर ली। अब वह जब्त रेत गायब हो गई है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली है। वे कह रहे हैं कि भाजपा के दो तीन ठेकेदारों को एसडीएम ने रेत बेच दी और रातों-रात रेत गायब हो गई। खनिज विभाग को पता ही नहीं रेत कहां चली गई। बहरहाल, कलेक्टर ने एक एडीएम को जांच की जिम्मेदारी दी है। शायद सच सामने आ जाए। पर, इस घटना से पता चल रहा है कि बारिश से पहले रेत की कितनी मारामारी हो रही है। जो लोग अपना मकान बना रहे हैं, उनकी क्या हालत हो रही होगी।
हर दिन मदर्स डे

पिछले महीने मई में मदर्स डे मनाया गया, फिर जून में फादर्स डे आया। इस बात का पता इस तस्वीर में दिखाई गई मां को पता होगा, न उसके बच्चे को। छोटा सा बालक अपनी मां को लगेज सहित घर से दूसरे गांव ले जाते हुए। साइकिल की सीट ऊंची है, इसलिये वह कैंची चला रहा है। जितनी खुशी बच्चे को हो रही है, उससे ज्यादा खुश मां दिखाई दे रही है। यह तस्वीर बस्तर जिले के कल्चा गांव की है। ([email protected])
रमेश बैस के जिम्मे अब क्या?
क्या महाराष्ट्र के राज्यपाल रमेश बैस छत्तीसगढ़ की राजनीति में सक्रिय होंगे, यह सवाल राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय है। दरअसल, बैस का राज्यपाल के रूप में कार्यकाल अगले महीने खत्म हो रहा है। ऐसे में उनके राजनीति में लौटने की अटकलें लगाई जा रही है।
बैस सात बार रायपुर के सांसद और एक बार मंदिर हसौद से विधायक रहे हैं। वो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे। साथ ही भाजपा के कोर ग्रुप के सदस्य भी रहे हैं। इन सबके बीच बीते गुरुवार को बैस की केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात हुई है। महाराष्ट्र में अगले 3 महीने में विधानसभा के चुनाव भी होने वाले हैं। ऐसे में बैस की शाह से चर्चा अहम रही होगी। कार्यकाल खत्म होने के बाद नई नियुक्ति होने तक बैस पद पर बने रह सकते हैं।
जानकारों का मानना है कि बैस को एक और कार्यकाल दिया जा सकता है। वैसे भी यहां भाजपा की राजनीति में कुर्मी समाज से कई प्रभावशाली नेता हैं। इनमें विजय बघेल, अजय चंद्राकर, और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक हैं। ऐसे में फिलहाल पार्टी को बैस के जरूरत छत्तीसगढ़ की राजनीति में महसूस नहीं हो रही होगी। देखना है पार्टी बैस के मसले पर क्या कुछ फैसला लेती है।
पोस्टिंग का लंबा इंतजार
छत्तीसगढ़ के शुरूआती दौर में एक वक्त ऐसा भी था कि विभाग अधिक, अफसर कम। मप्र से बंटवारे में मिले कई अफ़सर आना ही नहीं चाहते थे। कमी पूरी करने केरल, तमिलनाडु, हिमाचल, महाराष्ट्र, बंगाल जैसे राज्यों से डेपुटेशन पर बुलाए जाते रहे। और अब अफसर पूरे हैं तो उन्हें पोस्टिंग के लिए 15 से 25 दिनों तक वेटिंग में रहना पड़ता है। मानो विभाग नहीं हैं। जबकि बहुत से अफसर दो या अधिक विभाग के बोझ लेकर चल रहे हैं।
यह बात हम इसलिए कह रहे हैं कि बैच की अफसर रितु सेन पहले केंद्रीय प्रतिनियुक्ति और फिर एक वर्ष के अध्ययन अवकाश से लौट आई हैं। 1 जून को महानदी भवन में जॉइनिंग भी दे दी है। लेकिन पोस्टिंग के लिए वेटिंग लिस्ट में है। उम्मीद थी कि कैबिनेट के बाद हो जाएगा, लेकिन नहीं। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। पहले भी सोनमणि बोरा, रिचा शर्मा को भी इंतजार करना पड़ा था। हालांकि इस दौरान कुछ हाई प्रोफाइल अफसर अच्छे विभाग को लेकर मंत्रियों से पुराने संबंध के आधार पर प्रयास करते हैं। उधर आईपीएस में यह दिक्कत नहीं रहती,उन्हें आने से पहले या आते ही पोस्टिंग आर्डर हाथ में दे दिया जा रहा है। सार यह कि इस मामले में आईएएस पर आईपीएस लॉबी भारी पड़ रही है।
शैलेश पाठक अब फिक्की में
छत्तीसगढ़ कैडर के पूर्व आईएएस शैलेष पाठक देश के सबसे बड़े उद्योग-व्यापार संगठन (फिक्की) के जनरल सेकेट्री बनाए गए हैं। आईएएस के 88 बैच के अफसर शैलेष पाठक महासमुंद कलेक्टर रहे हैं। इसके अलावा राज्यपाल के सचिव, आयुक्त जनसंपर्क और पीडब्ल्यूडी सचिव के रूप में काम कर चुके हैं। वे 2007 में अवकाश लेकर निजी क्षेत्र में चले गए थे। बाद में उन्होंने सेवा से त्याग पत्र दे दिया।
शैलेष पाठक आईएलएफएस, एलएनटी, आईडीपीएल सहित कई प्रमुख संस्थानों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। पाठक फिक्की में अधोसंरचना, शहरी विकास, वैश्विक पेंशन फंड के निवेश आदि का काम देखेंगे।
योग दिवस के अतिथि गण
किसी सरकारी आयोजन में मंत्री, सांसद, विधायक का नाम निमंत्रण पत्र में या शिलालेख में है या नहीं यह बहुत मायने रखता है। रायपुर में योगा के मुख्य समारोह के लिए जारी निमंत्रण पत्र पर हंगामा मचा ही है। इसमें जिले के सभी विधायकों के नाम हैं लेकिन नवनिर्वाचित सांसद बृजमोहन अग्रवाल का नाम छोड़ दिया गया है। यह इसलिये भी गंभीर मसला हो गया क्योंकि उनके समर्थक केंद्रीय मंत्रिमंडल में नाम नहीं आने से मायूस चल रहे हैं, फिर राज्य मंत्रिमंडल से भी तुरत-फुरत इस्तीफा हो गया, इसके बावजूद कि वे इस पद पर 6 माह तक बने रहने की इच्छा जता चुके थे।
इधर बिलासपुर में भी लोग असमंजस में पड़ गए कि यहां योग दिवस के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि कौन हैं? राज्य सरकार की ओर से 20 जून को बताया गया कि मुख्य अतिथि डिप्टी सीएम अरुण साव होंगे, लेकिन बिलासपुर जिला प्रशासन ने केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू को मुख्य अतिथि बनाया। डिप्टी सीएम का नाम विशिष्ट अतिथि की सूची में रखा गया। हालांकि मामले ने तूल इसलिये नहीं पकड़ा क्योंकि दोनों अभी राज्य और केंद्र सरकार के गुड बुक में हैं और तोखन साहू का तो साव से अलग कोई खेमा भी नहीं है। उनके समर्थक आपस में घुले-मिले हैं।
अब परीक्षा मंत्री की दरकार
नीट में राज्य के भी हजारों बच्चों ने अपने भविष्य को बेहतर बनाने की उम्मीद से परीक्षा दी थी। बालोद जिले में एक गड़बड़ी परीक्षा के दौरान देखने को मिली थी, जब उन्हें गलत प्रश्न पत्र बांट दिया गया और इसकी भरपाई के लिए अतिरिक्त समय नहीं दिया गया। इसके बावजूद बड़ी संख्या में ऐसे प्रतिभागी हैं जिन्हें न तो ग्रेस मार्क का लाभ मिला है और न ही पेपर लीक का फायदा, फिर भी अच्छा स्कोर लेकर आए हैं। उन्हें मेडिकल में दाखिले की उम्मीद है। पर पेंच सुप्रीम कोर्ट और अलग-अलग हाईकोर्ट में दायर मामलों के चलते काउंसलिंग की प्रक्रिया रुक गई है। परीक्षा कैंसिल हो जाने का डर भी सता रहा है। नीट क्लियर करने के लिए उन्होंने दिन-रात पढ़ाई की। परीक्षा रद्द होने की दशा में दोबारा उतना ही जोश कैसे लाएंगे, यह सोच कर चिंता से घिर गए हैं।
यह विवाद चल ही रहा है कि नेट-यूजीसी पात्रता परीक्षा भी रद्द कर दी गई। इसमें भी छत्तीसगढ़ के हजारों युवाओं ने भाग लिया है। वे भी सदमे में हैं। यह परीक्षा कॉलेजों में सहायक प्राध्यापकों की भर्ती के लिए पात्र बनाती है। परीक्षा लिए जाने के एक दिन बाद तक कोई शोरगुल नहीं था कि इसमें कहीं गड़बड़ी हुई है। पर, अचानक रद्द कर दी गई और सीबीआई जांच की घोषणा कर दी गई। उनकी मेहनत का कोई मुआवजा नहीं, फिर परीक्षा देने के लिए हौसला जुटाना है। ऐसे में खिन्न अभिभावकों की ओर से राय आ रही है कि देश को इस समय शिक्षा मंत्री की जरूरत नहीं है, परीक्षा मंत्री की है। जो कम से कम पूरा ध्यान परीक्षाओं के ठीक-ठीक आयोजित कराने में लगाए।
वन्यजीवों का योग

मनुष्यों ने जीवन शैली बदलकर आरामतलबी अपना ली तो उन्हें स्वस्थ रहने के लिये योग जरूरी लगने लगा। पर, वन्यप्राणियों को अपने आहार की व्यवस्था करने के लिए दिन-रात भाग दौड़, उछलकूद करनी पड़ती है। कभी-कभी जान बचाने के लिए पूरी ताकत से भागना भी पड़ता है। इसमें जो मानसिक और शारीरिक श्रम लगाना पड़ता है, उसके सामने योग के आसान कहीं नहीं लगते। (फोटो-प्राण चड्ढा) ([email protected])
मानसून सत्र की उहापोह
विधानसभा के मानसून सत्र की घोषणा हुए करीब सप्ताह भर हो गया है। सत्र की घोषणा स्वयं स्पीकर ने की थी। ऐसे में समझा जाता है कि सरकार ने सत्रावधि को अंतिम रूप देकर सहमति दी है। इस समझ के पीछे कारण भी कि स्पीकर ने सीएम हाउस में हुई बैठक के बाद यह घोषणा की। लेकिन अब तक अधिसूचना जारी नहीं की जा सकी है। इसे लेकर विधानसभा सचिवालय में बड़ी बेचैनी है। वैसे स्पीकर द्वारा घोषणा भी पहली बार हुई है। यह भी कहा जा रहा है कि क्या घोषित सत्रावधि सरकार के अनुकूल नहीं है। यदि नहीं तो क्या सरकार बदलाव करना चाह रही है। ऐसा करना भी विशेषाधिकार का मामला बन सकता है। उम्मीद की जा रही है कि कल कैबिनेट की बैठक में तिथियों को अंतिम रूप देकर अधिसूचना संबंधी फाइल विधानसभा भेज दी गई होगी, लेकिन नहीं। फाइल आने के बाद ,अधिसूचना जारी करने तक कई औपचारिकताएं करनी होती है। इसमें पूरा एक दिन लगता है। सरकार का संसदीय कार्य विभाग प्रस्ताव भेजता है, और उसे विधानसभा सचिवालय, राजभवन को। राज्यपाल की अनुमति के बाद अधिसूचना जारी की जाती है। वैसे विधानसभा सचिवालय ने प्रस्ताव आने की स्थिति में एक घंटे में अधिसूचना जारी करने की तैयारी कर रखी है, भले फाइल आधी रात को आए।
मोइली क्या निकालेंगे?
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार हुई है। यह पहला मौका है जब हारे हुए नेताओं ने किसी पर दोषारोपण नहीं किया। और खामोशी से हार को स्वीकार कर लिया। अलबत्ता, पखवाड़े भर बाद ताम्रध्वज साहू ने चुप्पी तोड़ी, और उन्हें कोई नहीं मिला, तो हार के लिए ईवीएम पर दोषारोपण कर दिया। अब एआईसीसी ने छत्तीसगढ़ में पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए कर्नाटक के पूर्व सीएम वीरप्पा मोइली, और राजस्थान के नेता हरीश चौधरी को जांच कर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। एआईसीसी से जुड़े लोगों का मानना है कि लोकसभा चुनाव में कोई लहर नहीं थी। अलबत्ता, संविधान बचाओ-आरक्षण बचाओ की मुहिम के चलते कांग्रेस के पक्ष में अनुकूल माहौल था। और कम से कम चार सीटों पर जीत की उम्मीद थी। मगर ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस सिर्फ कोरबा सीट जीतने में कामयाब रही। यानी पिछले लोकसभा चुनाव से भी खराब प्रदर्शन रहा। जबकि यहां के बड़े नेता जीत को लेकर बढ़ चढक़र दावे कर रहे थे। स्थानीय कुछ नेताओं का दावा है कि साधन संपन्न नेताओं को उतारने की पार्टी रणनीति भारी पड़ गई। भूपेश बघेल, ताम्रध्वज साहू, देवेन्द्र यादव, और डॉ. शिवकुमार डहरिया के खिलाफ बाहरी का मुद्दा भारी पड़ गया। स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ही अपनी पार्टी प्रत्याशियों का साथ नहीं दिया। लिहाजा, ये सभी बुरी तरह हार गए। देखना है कि मोइली कमेटी क्या कुछ करती है।
निगम-मण्डल ?
कल हुई कैबिनेट से पहले एक खबर आई कि निगम मंडलों में अध्यक्ष नियुक्ति की पहली सूची जारी हो सकती है । और इस पहली सूची में 13-14 नाम होने की भी चर्चा आम हुई। उम्मीद से बैठे भाजपा नेताओं में हलचल बढ़ गई। सभी टीवी न्यूज चैनल, पोर्टल के स्क्रीन पर नजरें लगाए बैठे रहे। इस दौरान कुछेक नाम भी सामने आए। एक पूर्व सांसद, एक पूर्व विधायक आदि आदि।
कहते हैं कि पूर्व सांसद ने मना कर दिया। पूर्व विधायक उत्कृष्ट रह चुके हैं लेकिन उनकी विधानसभा में भाटापारा वाले युवा पंडित की घुसपैठ से इस बार टिकट नहीं मिली। शुरुआती नाराजगी के बाद पहले विस, फिर लोस में जमकर मेहनत की। और अब लालबत्ती की दहलीज पर हैं। इसी तरह से पहले 2018 फिर 23 में टिकट खो चुके एक और नेता भी निगम अध्यक्ष बनने जुटे हुए हैं। कभी चार स्तंभ में से एक के मुखिया रहे हैं। इस पर हाई और लो प्रोफाइल का प्रश्न उठाने वालों को बता दे कि भाजपा में मुख्यमंत्री, बाद में मंत्री (स्व. बाबूलाल गौर) भी रह चुका है। वैसे ये नेता उसी निगम का अध्यक्ष बनना चाहते हैं जिसके वो पूर्व में एक बार रह चुके हैं। देखना यह है कि सूची से किसकी लॉटरी निकलती है।
निगम-मंडलों में नियुक्ति अभी दूर
लोकसभा चुनाव के बाद हुई पहली कैबिनेट बैठक में प्रदेश के जिन पांच प्राधिकरणों का स्वरूप तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल में बदल दिया गया था, उसे फिर से उसी ढांचे में लाने का निर्णय लिया गया, जैसे पहले की भाजपा सरकार के समय थी। इन प्राधिकरणों का जो कार्यक्षेत्र हैं, वहां के कुछ विधायकों को प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिलेगा। पर बाकी निगम- मंडलों में नियुक्तियों का कोई प्रस्ताव नहीं आया, न ही इस पर चर्चा हुई। विधानसभा चुनाव को 6 माह बीत चुके, इस दौरान लोकसभा चुनाव पार हो गया। दोनों ही चुनावों में भाजपा को बड़ी जीत मिली। अब कार्यकर्ताओं को इंतजार है सत्ता के साथ जुडऩे के मौके का। मगर, ऐसा लगता है कि कुछ इंतजार और करना पड़ सकता है। नगरीय निकायों के चुनाव हो जाने तक भी खिंच सकता है। आयोग, निगम-मंडलों में राजनीतिक नियुक्तियां होने से सरकार का खर्च बढ़ेगा। एक यह तर्क भी दिया जा रहा है कि विधानसभा चुनावों में की गई घोषणाओं के चलते सरकार वित्तीय दबाव में है। इसे पहले ठीक किया जाएगा, फिर सोचा जाएगा, कब लें, किस मापदंड से लें। जीते-हारे विधायकों को लेना है या नहीं, भाजपा में हाल के चुनावों के समय कांग्रेस या दूसरे दलों से आए लोगों को लेना है या नहीं, जैसे कई सवाल हैं। पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में तो नियुक्तियों का सिलसिला तो दो साल बाद ही शुरू हो सका था और आखिरी पांचवे साल तक चलता रहा। इसलिये अभी समय धैर्य रखने का है।
शिक्षकों के बिना प्रवेशोत्सव
विधानसभा में इस साल मार्च महीने में लोक शिक्षण संचालनालय की ओर से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के स्कूलों में 33 हजार से अधिक शिक्षकों की कमी है। स्थिति यह है कि लगभग 5500 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं वहीं 600 से अधिक स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं है। एक शिक्षक वाले स्कूल बस्तर और कोंडागांव जिले में अधिक हैं। दूसरी ओर रायपुर और महासमुंद जैसे जिले हैं, जहां 800-800 शिक्षक स्वीकृत पद से अधिक संख्या में तैनात हैं। सरकार ने 33 हजार शिक्षकों की नियुक्तियों के लिए सहमति तो दे दी है, पर अब तक आवश्यक वित्तीय स्वीकृति नहीं मिल सकी है। बुधवार को शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने मंत्री के रूप में जो अंतिम समीक्षा बैठक ली उसमें भी यह बात साफ हुई। विज्ञापन वित्त विभाग की स्वीकृति के बाद ही जारी हो सकेंगे। उसके बाद कई चरणों में नियुक्ति की प्रक्रिया चलेगी। प्रक्रिया बिना व्यवधान के आगे बढ़ भी गया तो शिक्षकों की ज्वाइनिंग जब तक होगी, सत्र आधा बीत चुका होगा। फिलहाल, 26 जून को स्कूल खुलते ही प्रवेशोत्सव मनाने की तैयारी चल रही है।
मंदिर में भालू का आना-जाना

वन्य जीवों और मनुष्यों के बीच अच्छी समझ बन जाती है तो वे एक दूसरे का ख्याल रखने लगते हैं, हमले का डर खत्म हो जाता है। एमसीबी जिले के भरतपुर ब्लॉक के भगवानपुर स्थित एक मंदिर में एक भालू नियमित रूप से पहुंचता है। उसे जो भोग प्रसाद मिल जाए, खा लेता है और कुछ देर घूमने के बाद वापस भी लौट जाता है। मंदिर में आने-जाने का वह इतना अभ्यस्त हो गया है कि वह मौजूद लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। लोग भी उसका ख्याल रखते हैं कि जंगल से मंदिर तक आने जाने के दौरान कोई उसे तंग न करे। भालू की इस मौजूदगी ने इस मंदिर को चर्चा में ला दिया है। और मंदिर प्रबंधन सहित गांव के लोग खयाल रखते हैं कि जंगल से मंदिर के बीच उसे कोई तकलीफ न हो। ([email protected])
जानी-पहचानी अपनी पुरंदेश्वरी
लोकसभा स्पीकर के लिए जिन नामों की प्रमुखता से चर्चा चल रही है, उनमें प्रदेश भाजपा की पूर्व प्रभारी डी पुरंदेश्वरी शामिल हैं। डी पुरंदेश्वरी राजमुंदरी सीट से सांसद बनी है। पुरंदेश्वरी को सीनियर होने के बाद भी मोदी कैबिनेट में जगह नहीं मिली, लेकिन उन्हें अहम जिम्मेदारी मिलने की चर्चा है।
पुरंदेश्वरी भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। इससे परे लोकसभा स्पीकर के लिए आम सहमति बनाने की कोशिश हो रही है। इसमें पुरंदेश्वरी को फिट माना जा रहा है। वजह यह है कि पुरंदेश्वरी पहले कांग्रेस में थी, और डॉ.मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रही हैं। कांग्रेस नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं। यही नहीं, एनडीए के घटक दल टीडीपी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू उनके बहनोई हैं। ऐसे में कई लोगों का मानना है कि पुरंदेश्वरी के लिए सहमति बनाने में ज्यादा कोई दिक्कत नहीं आएगी।
पुरंदेश्वरी का नाम की चर्चा से छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता काफी खुश हैं। पुरंदेश्वरी करीब दो साल के कार्यकाल में निचले स्तर के कार्यकर्ताओं तक अपनी पहुंच बना ली थी। प्रदेश के कई नेता अब भी उनके संपर्क में रहते हैं। ऐसे में पुरंदेश्वरी स्पीकर बनती हैं, तो संसद भवन में आना जाना आसान हो जाएगा। देखना है आगे क्या होता है।
दोनों का विभाग एक !
केन्द्रीय मंत्रिमंडल में तोखन साहू को जगह मिलने से राज्य को काफी उम्मीदें हैं। वैसे केंद्र में राज्यमंत्री के पास ज्यादा फाइलें नहीं आती है, और ज्यादा प्रभावशाली नहीं रह पाते। आम तौर पर कई कैबिनेट मंत्री विभाग अपने पास रखते हैं, और कार्य विभाजन नहीं करते हैं। इसके कारण कई राज्य मंत्रियों के लिए यह पद एक तरह से झुनझुना रह जाता है। मगर तोखन साहू का मामला अलग है।
तोखन के पास आवास एवं शहरी मामलों का मंत्रालय है। हरियाणा के पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर उनके कैबिनेट मंत्री हैं। खट्टर बहुत अच्छे व्यक्ति माने जाते हैं। वो संगठन के काम से कई बार यहां आ चुके हैं। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि मंत्री के रूप में तोखन साहू को पूरे अधिकार मिलेंगे, और राज्य के लिए काफी कुछ प्रोजेक्ट ला सकते हैं।
इससे परे लोकसभा चुनाव के दौरान अरूण साव पूरे प्रदेश के दौरे पर रहे पर बिलासपुर सीट पर उनकी सक्रियता कम रही। इसे लेकर संगठन के स्तर पर कई नेताओं ने शिकायती लहजे में उठाया भी था। यह भी एक वजह मानी जा रही है।
तोखन साहू को केंद्रीय राज्यमंत्री बनाकर भाजपा संगठन ने नया समीकरण बना दिया है। लोरमी सीट से जीतकर अरुण साव डिप्टी सीएम बने। उसी लोरमी के रहने वाले तोखन केंद्र में राज्य मंत्री बनाए गए हैं। दोनों के विभाग के एक ही हैं। अब राज्य के नगरीय विकास के प्रोजेक्ट लेकर अरुण साव दिल्ली जाएँगे, तो पहले तोखन साहू के साथ बैठेंगे, फिर दोनों कैबिनेट मंत्री मनोहरलाल के पास जाएँगे।
रायपुर से एक मंत्री पक्का
बृजमोहन अग्रवाल का विधानसभा की सदस्यता से दिया इस्तीफा मंजूर हो गया है। आज-कल में मंत्री पद भी छोड़ देंगे। कैबिनेट में एक सीट खाली होगी तो रायपुर से एक सीट मिलनी तय है। दूसरी सीट दुर्ग जाएगी। रायपुर में जो चर्चा है, उसके मुताबिक ओडिय़ा समाज के पुरंदर मिश्रा का नाम राजभवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक है। दरअसल, यह नाम इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि डिप्टी सीएम और केंद्रीय राज्यमंत्री का पद साहू समाज को मिल चुका है। ऐसी स्थिति में मोतीलाल साहू का समीकरण कमजोर हुआ है। संगठन ने वर्तमान में जो क्राइटेरिया तय किया है, उसमें राजेश मूणत को लेकर ऊहापोह चल रहा है । एक और खाली सीट आरएसएस और ओबीसी के कोटे से दुर्ग संभाग में जाने के संकेत है। वहीं कुर्मी समाज के कोटे को लेकर मंथन खत्म नहीं हो रहा। इस कोटे से अजय चंद्राकर और धरमलाल कौशिक दावेदारी है।
पुलिस की भाषा कैसी हो?
उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा ने अफसरों को पत्र लिखकर कहा है कि राज्य पुलिस ऐसे शब्दों को अपने डिक्शनरी से हटाए जो आम लोगों की समझ से नहीं आता। इनकी जगह पर हिंदी के सरल शब्द प्रयोग में लाए जाएं। सन् 1861 में जब अंग्रेजों का कानून लागू हुआ था, तब कोर्ट-कचहरी और पुलिस के दस्तावेजों में उर्दू और फारसी शब्द बहुतायत से शामिल किए गए। आम बोलचाल में बहुत से शब्द शुद्ध हिंदी से कहीं अधिक प्रभावी हैं। जैसे- न्यायालय को कोर्ट या कचहरी कहना ज्यादा आसान लगता है। अधिवक्ता को तो हर कोई वकील ही कहता है। निरीक्षक, थानेदार और प्रधान आरक्षक, हवलदार कहे जाते हैं। अपराधी को मुजरिम कहा जाता है। व्यक्तिगत बंध पत्र को मुचलका, आधिपत्य को कब्जा, बिना मंशा के, को गैर इरादतन। हत्यारे को कातिल, अभिरक्षा को हिरासत, प्रत्यक्षदर्शी को चश्मदीद , दैनिक डायरी को रोजनामचा और प्रथम सूचना रिपोर्ट को एफआईआर।
मगर बहुत से शब्द ऐसे भी हैं जो आम लोगों की समझ से बाहर हैं या फिर समझने में जोर लगाना पड़ता है- जैसे इस्तगासा, मसरूका, नकबजनी। और इसी तरह के अनेक।
मंत्री ने हिंदी का इस्तेमाल करने कहा है तो उम्मीद करनी चाहिए कि बदलाव करने वाले अफसर उनकी मंशा को समझेंगे। ऐसा नहीं हो कि हिंदी में ऐसे शब्दों का चयन किया जाए जो चलन में न हो। शासकीय कार्यालयों, खासकर केंद्रीय कार्यालयों की हिंदी में ऐसा देखा गया है।
लोगों का यह भी मानना है कि लिखने की भाषा से ज्यादा जरूरी है, पुलिस को बोलने की भाषा में सुधार लाने के लिए कहा जाए।
वैसे भी एक जुलाई से नई न्याय संहिता लागू होने जा रही है। लिखा-पढ़ी के बहुत से बदलाव इसके आने के बाद अपने आप ही आ जाएंगे।
पानी सहेजने पहाड़ काटे

प्रदेश के दूसरे कई जिलों की तरह राजनांदगांव भी पेयजल संकट से जूझ रहा है। यहां के गांवों में व्याप्त पेयजल और निस्तारी की समस्या पर तो हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर कर दी गई है। पर, राजनांदगांव में जल स्तर दुरुस्त करने के लिए एक बड़ी पहल भी इस गर्मी में की गई। यहां के 42 पंचायतों ने बारिश का पानी जमा करने के लिए 2.25 लाख छोटे-छोटे गड्ढे बनाए हैं। जिले की 111 पहाडिय़ों पर यह काम हुआ है, जिसमें 11 लाख श्रम दिवस मजदूरों की जरूरत पड़ी। जिला पंचायत ने मनरेगा के तहत जल रक्षा अभियान चलाया है। पहाडिय़ों का पानी ठहरता नहीं, नदी-नालों के रास्ते से बह जाता है। कोशिश यह की गई है कि इन गड्ढों के बन जाने से पानी रुकेगा, मिट्टी रिचार्ज होगी और भू जल स्तर सुधारने में मदद मिलेगी। यह प्रयोग सफल है या नहीं इस बार बारिश में पता चलेगा। ([email protected])
बृजमोहन ने खड़े किए सवाल
सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने सोमवार को पार्टी के विधायकों के संग जाकर स्पीकर डॉ. रमन सिंह को विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा तो दे दिया है, लेकिन मंत्री पद नहीं छोडऩे से राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है। पूर्व महाधिवक्ता, और संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी ने फेसबुक पर लिखा कि इसमें कोई शक नहीं बृजमोहन अग्रवाल ने मंत्री पद से इस्तीफा को लेकर नई संवैधानिक चुनौती पेश की है। पार्टी मुख्यमंत्री और संविधान के लिए।
संसदीय मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि तकनीकी तौर पर बृजमोहन छह महीने तक मंत्री पद पर रह सकते हैं। इसमें कोई अड़चन नहीं है। भाजपा के अंदर खाने में भी इस मसले पर चर्चा हुई है। हल्ला है कि बृजमोहन को स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने सुझाव दिया है कि जुलाई में होने वाले मानसून सत्र तक उन्हें मंत्री बने रहना चाहिए।
दूसरी तरफ, बृजमोहन के मसले पर कांग्रेस की राय बटी हुई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने बृजमोहन की बर्खास्तगी की मांग कर दी है। जबकि पूर्व मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया उन्हें कांग्रेस में शामिल होने तक न्योता दिया है। वो एक कदम आगे जाकर कह रहे हैं कि बृजमोहन कांग्रेस में जो चाहेंगे, मिलेगा। इन चर्चाओं के बीच कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि लोकसभा की सदस्यता लेने से पहले बृजमोहन मंत्री पद छोड़ सकते हैं। इससे परे कुछ लोग इस मसले पर पीआईएल भी दायर करने की सोच रहे हैं। चाहे कुछ भी हो, बृजमोहन ने एक बहस छेड़ दी है। और वो मंत्री बने रहने तक सुर्खियों में रहेंगे।
सीएम का बढ़ा रुतबा
लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद पार्टी के भीतर सीएम विष्णुदेव साय का कद बढ़ा है। और वो जिस कार्यक्रम में जा रहे हैं, वहां पार्टी के नेता, और कार्यकर्ता उत्साह से स्वागत भी कर रहे हैं। साय कार्यकर्ताओं को पूरा सम्मान भी दे रहे हैं। ऐसे ही पड़ोस के जिले में पार्टी के जिलाध्यक्ष ने सीएम के साथ हेलीकॉप्टर यात्रा करने की इच्छा जताई।
जिलाध्यक्ष ने इस सिलसिले में स्थानीय सांसद से बात की। सांसद ने जिलाध्यक्ष की भावनाओं को सीएम तक पहुंचाया। सीएम ने तुरंत उन्हें बुलवाया, और अपने साथ हेलीकॉप्टर से रायपुर ले आए। जिलाध्यक्ष की हेलीकॉप्टर में घूमने की इच्छा पूरी की। इसके बाद जिलाध्यक्ष खुशी-खुशी बस से वापस अपने घर पहुंचे। कुछ ऐसा ही अंदाज मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे डीपी घृतलहरे का भी था।
दिग्विजय सिंह सरकार में घृतलहरे विमानन मंत्री थे। उस वक्त वो हेलीकॉप्टर लेकर अपने विधानसभा क्षेत्र मारो पहुंचे। और कुछ कार्यकर्ताओं की हेलीकॉप्टर से घूमने की इच्छा पूरी की। घृतलहरे काफी लोकप्रिय भी थे। और जब उन्हें टिकट नहीं मिली, तो वो 1998 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय मैदान में कूद गए। और कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत जब्त करवा दी। बाद में राज्य बनने के बाद जोगी सरकार में मंत्री भी रहे।
दिल्ली के लिए किसका रास्ता खुलेगा
मोदी 3.0 में तोखन साहू को जगह मिलने के साथ ही छत्तीसगढ़ का कोटा क्लोज हो चुका है। अब सबकी निगाह संगठन चुनाव की ओर है। जेपी नड्डा केंद्र में मंत्री बनाए गए हैं। 24 जून तक उनका कार्यकाल खत्म होना है। इससे पहले नए राष्ट्रीय अध्यक्ष और महामंत्री जैसे प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति हो सकती है । जाहिर है कि छत्तीसगढ़ से भी कुछ नेताओं को मौका मिल सकता है। संभवत: आठ बार के विधायक और रिकॉर्ड मतों से जीतने वाले बृजमोहन अग्रवाल को केंद्रीय संगठन में जगह मिल जाए। उन्हें चुनाव प्रबंधन में माहिर माना जाता है। वे राजनाथ सिंह के लिए पहले गाजियाबाद और फिर लखनऊ में कमान संभाल चुके हैं। प्रदेश में भी कई उपचुनाव जिताने में मुख्य रणनीतिकार रहे हैं। ऐसा होता है तो भी वे मोदी, शाह से निकटता हासिल कर सकेंगे। वहीं सरोज पांडेय को भी संगठन में मौका मिल सकता है। इसके अलावा संतोष पांडे, विजय बघेल को भी संगठन में एडजस्ट किया जा सकता है। और भी कुछ नाम हो सकते हैं, जिन्हें केंद्र या राज्य के मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। इनमें धरम लाल कौशिक, अजय चंद्राकर, अमर अग्रवाल हो सकते हैं।
कलेक्टर-एसपी के तबादले सत्र के पहले
विधानसभा के मानसून सत्र से पहले सरकार कुछ जिलों में कलेक्टर एसपी के तबादले कर सकती है। बलौदा बाजार की घटना के बाद सरकार ने कलेक्टर-एसपी को हटाने के साथ ही दूसरे जिलों में पड़ताल शुरू कर दी है। ऐसा माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन वाले जिलों के कलेक्टर-एसपी बदले जा सकते हैं। कुछ जगहों पर कार्यकर्ताओं की भी अफसरों को लेकर शिकायतें हैं। तबादले में इन्हें भी ध्यान में रखा जाएगा। वैसे करीब तीन महीने बाद कैबिनेट की बैठक होने वाली है। इसमें से भी कुछ संकेत बाहर निकलेंगे।
पूर्व मंत्री जयसिंह अकेले नहीं..
लोकसभा चुनाव में कोरबा विधानसभा सीट से कांग्रेस पीछे रह गई। बाकी सीटों पर उसने लीड ली। भाजपा की विधानसभा में जीत वाली सीटों से भी अंतर पाट दिया। अब नतीजा आने के करीब 12-13 दिन बाद पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल का बयान आया है। उनका कहना है कि विधानसभा चुनाव के पहले उन्होंने कुछ बातें उठाई थी, यदि सुन ली गई होती तो हार नहीं होती। पर उन्हें इस बात की तसल्ली होनी चाहिए कि उस चुनाव में हारने वाले वे अकेले मंत्री नहीं थे। 9 मंत्री हार गए थे। डिप्टी सीएम भी और तत्कालीन मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले मंत्रीगण भी। इसलिये सुनने बताने का कोई फर्क पडऩे वाला नहीं था। बस, मुश्किल यही रही कि लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने गलतियां नहीं सुधारी और नतीजा विपरीत आया। कोरबा की ही तरह अधिकांश हारे हुए मंत्रियों के इलाके में लोकसभा चुनाव में भी हार का अंतर नहीं पाटा जा सका। जो लड़े वे हार गए।
नदी पार कराएगा रोपवे

बस्तर में दर्जनों गांव ऐसे हैं जिनका संपर्क बारिश के दिनों में स्कूल, अस्पताल और बाजार से कट जाता है। हर साल कई हादसे उफनती नदी-नालों को पार करने के दौरान होते हैं। इसी बस्तर में आईटीबीपी के सहयोग से सीआरपीएफ ने एक पहल की है। बीजापुर के चिंतावागु नदी पर उन्होंने एक 200 मीटर लंबा रोप वे बनाया है। इसे बनाने के लिए 22 इंजीनियरों ने करीब दो माह कड़ी मेहनत की। कुछ दिन पहले इसे शुरू कर दिया गया है। अब इस बारिश में आसपास के कई गांवों के ग्रामीण अपनी जरूरत में इसका इस्तेमाल कर सकेंगे। ([email protected])
कुछ मंत्रियों से काम जल्दी करवा लें
छत्तीसगढ़ में छह माह पुराने मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार, दोनों की ही चर्चा चल पड़ी है। इस बदलाव के साथ विभागों में भी उलटफेर होना है। इस खबर के मिलते ही सारे लोग अपने सारी कामकाज तेजी से कराने में जुट गए हैं। पता नहीं कौन कब तक रहे,तुरंत करवा लिया जाए। इतना ही नहीं मुंबई से भी एक नेता ने अपने लोगों से कहा है कि इन मंत्रियों से अपने लंबित, अटके काम करवा लें। नेताजी ने तो कुछ मंत्रियों के नाम भी गिनाए हैं और फेरबदल की संभावित डेट भी दे दी है। समर्थकों के मुताबिक यह फेरबदल पखवाड़े भर में होना है। कैबिनेट में इस समय एक पद खाली हैं, दूसरा भी खाली होने जा रहा है। कुल दो पद भरे जाने हैं। दो नए मंत्री शामिल होंगे और एक,दो बदले जाने की चर्चा महानदी भवन से ठाकरे परिसर तक फैली हुई है।
विधानसभा सत्र की गर्मी
विधानसभा का मानसून सत्र 22 जुलाई से शुरू हो सकता है। खबर है कि मानसून सत्र के मसले पर सीएम विष्णुदेव साय, और स्पीकर डॉ. रमन सिंह के बीच चर्चा हो चुकी है। मानसून सत्र में अधिकतम 7 बैठकें होंगी। इस सिलसिले में अधिसूचना जल्द जारी होगी।
बलौदाबाजार में आगजनी की घटना के बाद से सरकार बैकफुट पर आ गई है। विपक्ष हमलावर है, और इसको लेकर सदन में सरकार को घेरने में कोई कसर बाकी नहीं रखने वाली है। न सिर्फ बलौदाबाजार बल्कि नक्सल मुठभेड़ के मसले पर भी सरकार को घेरने की कोशिश हो
सकती है।
हालांकि नक्सल मोर्चे पर सरकार को काफी सफलता भी मिली है। छह महीने में धुर नक्सल इलाकों में विकास कार्यों की रफ्तार तेज हुई है। मगर एक-दो जगहों पर निर्दोष आदिवासियों की मौत का भी आरोप लग रहा है। कांग्रेस ने इसके लिए जांच कमेटी बनाई थी। कुल मिलाकर मानसून सत्र में कानून व्यवस्था का मुद्दा काफी गरम रहेगा।
कौन बनेंगे मंत्री?
मानसून सत्र से पहले साय कैबिनेट में फेरबदल की चर्चा है। संसदीय कार्य मंत्री बृजमोहन अग्रवाल सांसद बन चुके हैं, और आज-कल में विधानसभा की सदस्यता भी छोड़ देंगे। मगर मंत्री पद कुछ दिन और रख सकते हैं।
पार्टी नेताओं का मानना है कि रथयात्रा के पहले यानी 7 जुलाई के आसपास कैबिनेट में फेरबदल हो सकता है। कैबिनेट में एक पद पहले से ही खाली है, और अब बृजमोहन की जगह भी एक और विधायक को कैबिनेट में जगह मिल सकती है।
संसदीय कार्यमंत्री के लिए अजय चंद्राकर और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के नाम की चर्चा है। अजय पहले भी करीब 10 साल संसदीय कार्य विभाग बेहतर ढंग से संभाल चुके हैं।
संसदीय कार्यमंत्री का रोल विधानसभा में अहम होता है। चंद्राकर से परे राजेश मूणत, और अमर अग्रवाल भी मंत्री पद के दावेदारों में प्रमुखता से लिया जा रहा है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि तोखन साहू की तरह बस्तर से एक नया नाम देकर चौंकाया जा सकता है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
ओडि़शा से रिश्ते बहुत गहरे
ओडिशा में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्रदेश के कई नेताओं की वहां दखल रह सकती है। ओडिशा के सीएम मोहन मांझी को केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का करीबी माना जाता है। धर्मेन्द्र लंबे समय तक छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रहे हैं। यही नहीं, रायपुर उत्तर के विधायक पुरंदर मिश्रा की भी वहां पूछ परख रहेगी।
पुरंदर ओडिशा चुनाव में पार्टी के लिए काफी काम किया। पुरंदर के करीबी पृथ्वीराज हरिचंदन, जो कि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन के बेटे हैं, ओडिशा सरकार ने मंत्री बन गए हैं। पृथ्वीराज को आबकारी और विधि विधायी जैसा अहम विभाग दिया गया है। पुरंदर के ओडिशा सीएम, और कई मंत्रियों से अच्छे संबंध हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि पुरंदर का ओडिशा में भी महत्व रहेगा, छत्तीसगढ़ में तो बहुत बड़ी ओडिया आबादी की वजह से महत्व है ही। ।
खाता-बही की दिक्कतें
लोकसभा चुनाव लडऩे वाले दलीय और निर्दलीय प्रत्याशियों के खर्च का हिसाब जमा करने का समय नजदीक आ रहा है। 28 जून लास्ट डेट है। आयोग के नियमानुसार प्रत्याशी 95 लाख खर्च कर सकता है । निर्दलियों को तो दिक्कत नहीं। उनकी स्थिति नहाए क्या निचोड़े क्या जैसी रही। बात दलीय प्रत्याशियों की है। उन्होंने न केवल अपनी जेब का लगाया बल्कि पार्टी ने भी बोझ उठाया। अंतिम हिसाब से पहले खर्च के मिलान के लिए भाजपा के दिल्ली कार्यालय से आए एकाउंटेंट व सीए की टीम ने परसों खर्च का मिलान किया। इसके लिए प्रत्याशी या उनका खजाना देख रहे व्यक्ति को ठाकरे परिसर बुलाया गया था ।
भाजपा के 11 में से एक प्रत्याशी का हिसाब किताब बड़ा गड़बड़ निकला। हालांकि खर्च तो आयोग के दायरे में ही किया था। बल्कि उससे 20 लाख कम ही किया। लेकिन खर्च तो चेक पेमेंट का ही माना जाएगा और उसमें उन्होंने पांच लाख के ही चेक काटे, शेष 70 लाख कैश पेमेंट रहे। अब दिल्ली से आए एकाउंटेंट पसोपेश में हैं कि खर्च किस मद में दिखाए। नियम तो 10 हजार से अधिक के पेमेंट चेक से करने का था। प्रत्याशी के खजांची ने कहा सब उधारी में है। चुनाव बाद देने का वादा था। यह मानने वाले कम ही होंगे क्योंकि लोगों का चुनाव बाद पेमेंट के अनुभव ठीक नहीं रहे हैं ।
सो सभी तुरतदान महाकल्याण वाले हो गए हैं। और इसे आयोग मानने से रहा। उसे तो आन पेपर, गिव एंड टेक चाहिए?। ऐसे में अब एक ही विकल्प-या तो दोबारा चेक पेमेंट किया जाए, या छ वर्ष के लिए कोई चुनाव लडऩे के अयोग्य घोषित हुआ जाए। अब देखना होगा कि अगले दस दिनों में क्या रास्ता निकलता है?
बसपा का विकल्प भीम आर्मी?

यूपी के हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का कोई उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। राज्य बनने के बाद यह पहला मौका है जब छत्तीसगढ़ विधानसभा में बसपा का कोई विधायक नहीं है। बसपा सुप्रीमो मायावती को लेकर अनेक राजनीतिक विश्लेषक राय दे चुके हैं कि वे भाजपा के खिलाफ सख्ती से नहीं लडऩा चाहतीं। इंडिया गठबंधन में भी उन्होंने शामिल होने से मना कर दिया था। ऐसी स्थिति में उनके जनाधार वाले क्षेत्रों में चंद्रशेखर आजाद को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने यूपी की नगीना सीट भाजपा-सपा के उम्मीदवारों को हराकर जीत ली है। उनके संगठन का नाम भीम आर्मी है। छत्तीसगढ़ में इस संगठन की वाल पेंटिंग विधानसभा चुनाव के समय से दिखाई दे रही हैं। बलौदाबाजार में 10 जून को हुई आगजनी और हिंसा की घटनाओं में गिरफ्तार कुछ लोगों के बारे में पुलिस ने कहा है कि वे इसी भीम आर्मी के सदस्य हैं। अब चंद्रशेखर आजाद ने सोशल मीडिया एक्स पर बलौदाबाजार की घटना को लेकर प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ करने वाले अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के ‘बर्बरतापूर्वक दमन’ तथा जैतखाम को ध्वस्त करने की निंदा की है। आजाद ने कहा है कि वे जल्द पीडि़त परिवारों से मिलने के लिए रायपुर आएंगे। एक्स में उनकी पोस्ट के जवाब में बहुत से प्रतिक्रियाएं आई हैं। इससे अंदाजा लगता है कि अनुसूचित जाति वर्ग को अपने लिए छत्तीसगढ़ में एक नेता की जरूरत महसूस हो रही है। अनेक लोगों ने बताया है कि जो लोग वहां मौजूद नहीं थे, राज्य से बाहर थे, उनको भी जबरन मारपीट कर जेल में डाला जा रहा है। पूरा समाज डरा हुआ है। बच्चों और महिलाओं के मोबाइल फोन भी जबरदस्ती पुलिस वाले लेकर जा रहे हैं...। वह अपनी वर्दी का पूरा फायदा उठा रही है...। समाज के लोगों पर अन्याय हो रहा है। आपको आने की जरूरत है।
भीम आर्मी चीफ ने कलेक्टोरेट में हुई आगजनी और नुकसान पर प्रतिक्रिया नहीं दी है। जब तक पुलिस जांच चल रही है, यह कहना मुमकिन नहीं है कि उनके लोग सचमुच इस हिंसा में शामिल थे। पर अपने सदस्यों की गिरफ्तारी से संगठन चर्चा में जरूर आ गया है। अब चंद्रशेखर ने छत्तीसगढ़ आने का ऐलान भी कर दिया है। क्या बलौदाबाजार की घटना भीम आर्मी को बसपा का विकल्प बनने में मदद करेगी? गौर की बात है कि चंद्रशेखर बसपा सुप्रीमो मायावती का विरोध भी नहीं करते, बल्कि उन्हें अपना प्रेरणा स्त्रोत बताते हैं।
गांव के स्कूल में जापानी पाठ
नया सत्र शुरू होने वाला है तब स्कूलों से कई तरह की खबरें आ रही है। जर्जर भवनों की, शिक्षकों की कमी की, बड़ी संख्या में बच्चों के ड्रॉप आउट हो जाने की। ऐसे में एक अनोखी खबर बेमेतरा जिले से मिल रही है। यहां के बेरला ब्लॉक के कोंडरका मिडिल स्कूल के 20 बच्चे जापानी भाषा सीख रहे हैं। और इन्हें सिखा रही हैं, इसी स्कूल की शिक्षिका केंवरा सेन। उन्होंने पहले खुद सीखा, फिर बच्चों को सिखाना शुरू किया। हाल ही में उनकी एक किताब-किहोन तेकि ना निहोंगों, ( बेसिक जापानी व्याकरण) का विमोचन भी महाराष्ट्र के राज्यपाल रमेश बैस ने लोनावाला में किया।
गांव के बच्चे जापानी सीख भी लेंगे तो क्या काम आएगा? जब इंटरनेट ने दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने की दूरियां समाप्त कर दी हों तो इस सवाल का अधिक महत्व नहीं है। पिछले साल नागपुर के रामटेक से खबर आई थी कि 10-12 साल के गोंड आदिवासी बच्चे जापानी सीखने में बड़ी दिलचस्पी ले रहे हैं। इनमें से कुछ लोग तो राजधानी दिल्ली या अन्य महानगरों में काम करना चाहते हैं। कुछ जापान जाना चाहते हैं, कुछ लोग पर्यटन के क्षेत्र में सेवा देने का अवसर चाहते हैं। कुछ लोग ऑनलाइन रोजगार का अवसर देख रहे हैं। नई शिक्षा नीति में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि स्कूली शिक्षा के दौरान बच्चे दूसरी भाषाएं, जो उनके आसपास की भाषाओं से अलग हो उसे सीखने की कोशिश करें। ([email protected])
देखें आगे क्या होता है
सीधे सरल और लो-प्रोफाइल में रहने वाले तोखन साहू का नाम केन्द्रीय मंत्री बनने वालों की सूची में आया, तो प्रदेश भाजपा के तमाम छोटे-बड़े नेता चौंक गए थे। इसकी पर्याप्त वजह भी थी। पहली यह कि तोखन पहली बार सांसद बने हैं। जबकि मंत्री पद की दौड़ में सीनियर नेता और अनुभवी बृजमोहन अग्रवाल, विजय बघेल और संतोष पाण्डेय शामिल थे।
बृजमोहन के कुछ उत्साही समर्थकों ने तो आतिशबाजी की तैयारी कर रखी थी। बताते हैं कि छत्तीसगढ़ सदन, और छत्तीसगढ़ भवन में रूके तमाम सांसद एक-दूसरे के संपर्क में थे। और उनके करीबी लोग शपथ ग्रहण के एक दिन पहले तक पीएमओ से फोन आने का इंतजार कर रहे थे।
चर्चा है कि शपथ ग्रहण के दिन सुबह दो सांसद सीएम विष्णुदेव साय से मिलने पहुंचे। सीएम ने उनसे पूछ लिया कि क्या किसी के पास शपथ के लिए फोन आया है? उस समय तक किसी के पास फोन नहीं आया था। तब साय ने सांसदों से अनौपचारिक चर्चा में संभावना जता दी थी कि हाईकमान कोई नया नाम आगे लाकर चौंका सकती है। सीएम का कथन बाद में सही साबित भी हुआ।
एक चर्चा यह भी है कि हाईकमान ने पहले जांजगीर-चांपा की महिला सांसद कमलेश जांगड़े के नाम पर भी विचार किया गया था। मगर बाद में तोखन के नाम पर मुहर लग गई। बृजमोहन, संतोष और विजय बघेल को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने की एक और वजह सामने आई है, उसके मुताबिक सदन में अकेले भाजपा को बहुमत नहीं मिल पाया है। इस बार विपक्ष काफी ताकतवर है।
ऐसे में सदन के भीतर विपक्ष के हमले का जवाब देने के लिए तेज तर्रार सांसदों का होना जरूरी है। बृजमोहन, संतोष और विजय इसमें फिट बैठते हैं। पिछले कार्यकाल में झारखंड के सांसद निशिकांत दुबे लोकसभा में सत्ता पक्ष की तरफ से अकेले मोर्चा संभाले हुए थे। इस बार बृजमोहन और संतोष व विजय की आवाज भी सुनाई देगी। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
इनको कौन लेकर आया?
भाजपा के रणनीतिकार कुछ भूतपूर्व कांग्रेस नेताओं से परेशान हैं। विशेषकर बलौदाबाजार में आगजनी की घटना के बाद से परेशानी और बढ़ गई है। भाजपा में आने के बाद कुछ भूतपूर्व कांग्रेसियों के हौसले बुलंद हैं, और वो काफी पावरफुल भी हो चुके हैं। इनकी गतिविधियों को लेकर कई शिकायतें प्रदेश भाजपा के प्रमुख लोगों तक पहुंच चुकी है, लेकिन इस पर अंकुश नहीं लग पाया है।
अब भाजपा के अंदरखाने में यह पूछा जाने लगा है कि इन विवादित कांग्रेसियों को पार्टी में किसने शामिल कराया? एक मंत्री तो पार्टी के प्रमुख नेताओं से मिलकर दो-तीन भूतपूर्व कांग्रेसियों का नाम लेकर पूछताछ भी की। पदाधिकारियों ने विवादित नेताओं को भाजपा में शामिल कराने का ठीकरा पूर्व प्रभारी पर फोड़ दिया। चाहे कुछ भी हो, भूतपूर्व कांग्रेसियों की मौज हो गई है, और इस पर लगाम लगाने में पार्टी के रणनीतिकार फिलहाल असफल दिख रहे हैं।
सबसे मजबूत उम्मीदवार
यूं तो एक व्यक्ति के जीवन में भाग्य की अहम भूमिका मानी गई है। राजनीति में तो यह शत प्रतिशत फिट बैठती है। कब कौन कितने बड़े पद पर चुन लिया जाए, बिठा दिया जाए पता नहीं चलता। कर्मचारी से मंत्री तक बना दिए जाते हैं। हर बार की तरह ऐसा इस बार ऐसा हुआ और होने जा रहा है। प्रदेश के एक मंत्री कभी एक कर्मचारी के नाते पूर्व सांसद के निज सहायक रहे हैं। और अब चर्चा है कि एक और निज सहायक, मंत्री नहीं तो विधायक हो सकते हैं।
हालांकि राजधानी की इस सीट से 40 दावेदार हैं। इनमें मंत्री जी के सगे भाई भी शामिल हैं। लेकिन उन्हें बी फार्म नहीं मिलेगा यह भी तय ही है। बचे 38 में संघर्ष शुरू हो चुका है। मंत्री जी, जिसे चाहेंगे उसकी ही टिकट पक्की। अब तक की हलचल में निज सहायक प्रमुख दावेदार, पसंदीदा बनकर उभरे हैं। इलाके के 14 पार्षदों का समर्थन पत्र भी तैयार है। इतना ही नहीं कुछ दावेदार,उनके लिए बैठने को भी तैयार हैं। अब देखना यह है कि भाई साहब लोग क्या चाहेंगे।
दहशत का दूसरा दौर..
बलौदाबाजार हिंसा-आगजनी में अब तक 130 से अधिक लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं, जिन्हें भीम आर्मी और उससे मिलते-जुलते संगठनों का बताया जा रहा है। कहा गया है कि मोबाइल फोन पर ली गई तस्वीरों, वीडियो व सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण से इनकी पहचान हुई। जब से मोबाइल और सीसीटीवी आए हैं, किसी भीड़ में शामिल लोगों की पहचान आसान हो गई है। कानून तोडऩे वालों को शिकंजे में लेना आसान हो गया है। कुछ दशक पीछे जाएं तो ऐसी घटनाओं के बाद पूरे इलाके में पुलिस की दहशत फैल जाती थी। लोग फंसाये जाने के डर से अपने ठिकाने से फरार हो जाते थे। जिन्हें फंसाया जाता था वे बच निकलने का रास्ता ढूंढते थे। ऐसा नहीं है कि वह दौर पूरी तरह खत्म हो गया। बलौदाबाजार हिंसा के जिम्मेदार लोगों पर सख्ती बरतने का सरकार से आदेश हो चुका है। 10 जून की सभा में पूरे प्रदेश से लोग आए थे। इसलिए तलाशी बलौदाबाजार के बाहर भी हो रही है। अब यह आरोप लग रहा है कि दोषियों को पकडऩे के नाम पर बेकसूर लोगों को प्रताडि़त किया जा रहा है। जिनका घटना से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं, उनको हिरासत में लिया जा रहा है। महासमुंद से इसके विरोध में आवाज उठी है। यहां की सतनामी महिला प्रकोष्ठ का कहना है कि पुलिस गांव-गांव घूमकर निर्दोष लोगों को पकड़ रही है। इससे समाज में भय का माहौल बना हुआ है, साथ ही समाज की छवि भी खराब हो रही है। महिला पदाधिकारियों ने निर्दोष लोगों की तुरंत रिहाई की मांग भी की है। लेकिन क्या यह इन महिलाओं की अकेली शिकायत है? बलौदाबाजार और प्रदेश के दूसरे जिलों में भी तो ऐसा नहीं हो रहा है?

करतब नहीं, विवशता है...
कांकेर के वन विभाग के ट्रैप कैमरे में एक तेंदुआ भागता हुआ कैद हुआ है, जिसने बाल्टी को मुंह में दबा रखा है। इस तेंदुए के बारे में कहा गया है कि कुछ दिन पहले उसने एक झोपड़ी का दरवाजा तोड़ दिया था और 75 साल की वृद्ध महिला को उठाकर ले गया था। अगले दिन महिला की क्षत-विक्षत लाश मिली थी। बीते मई महीने में एक पालतू कुत्ते का शिकार करने के लिए दौड़ते समय तेंदुआ एक कुंए में जा गिरा था। वन विभाग ने उसका रेस्क्यू किया। इसके करीब 3 माह पहले एक तेंदुआ खलिहान में सोती हुई महिला को उठाकर ले गया था। इन घटनाओं की वजह बताई जा रही है कि इन्हें जंगल में अपने लिए भोजन और पानी दोनों की कमी का सामना करना पड़ रहा है और वे मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं।
राज्य कांग्रेस में फेरबदल की चर्चा
लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस संगठन में बदलाव की चर्चा है। इन चर्चाओं को उस वक्त बल मिला जब पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश के एक दिग्गज नेता पार्टी की प्रमुख आदिवासी महिला नेत्री के साथ राष्ट्रीय नेताओं से मुलाकात की। महिला नेत्री संगठन में कई अहम पदों पर काम कर चुकी हैं, और उन्हें पार्टी का एक खेमा प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपने के लिए दबाव बनाए हुए हैं।
हालांकि ये बदलाव आसान नहीं है। जानकारों का मानना है कि हाईकमान किसी भी बदलाव से पहले नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत, और पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस.सिंहदेव की राय जरूर लेगा। डॉ.महंत पार्टी के अकेले नेता हैं जिन्होंने पहले विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव में खुद को साबित किया है। चर्चा यह भी है कि प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट भी अभी फिलहाल किसी तरह के बदलाव के पक्ष में नहीं हैं। देखना है कि दिग्गज नेता की मुहिम क्या रंग लाती है।
क्या करेंगे बृजमोहन
सांसद बनने के बाद सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल कितने दिनों तक मंत्री पद पर रहेंगे, इसको लेकर काफी चर्चा हो रही है। दो सदनों के सदस्य हो जाने के बाद किसी एक से 14 दिनों के भीतर इस्तीफा देना होता है। बृजमोहन संभवत: 23 या 24 जून को लोकसभा की सदस्यता लेंगे। साथ ही साथ विधानसभा से त्यागपत्र भी दे देंगे। मगर मंत्री पद को लेकर कोई बाध्यता नहीं है। वो 6 महीने तक मंत्री पद पर रह सकते हैं। ये बात वो खुद सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं। बृजमोहन ने यह भी साफ कर दिया है कि सीएम जब कहेंगे, वो मंत्री पद छोड़ देंगे।
केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह पाने से वंचित बृजमोहन के बयान की राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा है, और उनकी इस बयान को हाईकमान के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करने की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है। इससे परे उत्तरप्रदेश की योगी सरकार के मंत्री जितिन प्रसाद ने सांसद बनने के बाद पद छोड़ दिया है। ये अलग बात है कि जितिन प्रसाद को मोदी सरकार में राज्यमंत्री बनाया गया है।
छत्तीसगढ़ में पूर्व सीएम डॉ.रमन सिंह जब सीएम बने थे, तब वो सांसद थे। सीएम पद के शपथ लेने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी थी। पहले सीएम अजीत जोगी जब सीएम बने, तब वो किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में जोगी, भाजपा विधायक रामदयाल उइके से मरवाही विधानसभा सीट खाली करवाकर उपचुनाव लड़े, और विधानसभा के सदस्य बने। सांसद निर्वाचित होने के बाद 6 महीने तक मंत्री के रूप में काम करने में तकनीकी तौर पर कोई अड़चन नहीं है। मगर ऐसा होता है तो इसे परंपरा के खिलाफ माना जाएगा। क्योंकि इतने लंबे समय तक मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कोई भी सांसद मंत्री पद पर नहीं रहा। कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि बृजमोहन हफ्ते-दस दिन के भीतर मंत्री पद छोड़ देंगे। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
कानून व्यवस्था पर सवाल...
ऐसा कम ही होता है कि सरकार अपनी कमजोरी को स्वीकार कर ले, मगर डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने कल मीडिया से बात करते हुए मान लिया कि बलौदाबाजार की घटना के बाद प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। उन्होंने कहा कि यह बात वे गृह मंत्री होने के बावजूद कह रहे हैं। पुलिस के लिए एसओपी ( स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर ) निर्धारित किया जाएगा, ताकि फिर ऐसी घटना न हो।
बात यह है कि मंत्री ने कानून व्यवस्था के सवाल को सिर्फ बलौदा बाजार से जोड़ा। कांग्रेस सरकार के दौरान कानून-व्यवस्था बहुत अच्छी नहीं थी। भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया था और कहा था कि सरकार आने पर प्रदेश में अपराधों पर लगाम लगाई जाएगी। मगर, आम लोगों के नजरिये से देखा जाए तो कांग्रेस और भाजपा सरकार के कार्यकाल में लोगों को कोई फर्क दिखाई नहीं दे रहा है। नक्सली हिंसा एक विशिष्ट विषय हो सकता है पर बाकी प्रदेश में भी लूटपाट, चाकूबाजी, अपरहण, गैंगरेप और हत्या की घटनाएं कम नहीं हो रही है। बीते दिनों खरोरा में दिन दहाड़े 27 लाख रुपये की लूट हो गई। दुर्ग में एक बच्ची के गले में ब्लेड मारकर हत्या कर दी गई। बलरामपुर में तो बजरंग दल के नेता और उसके साथ एक महिला की मौत के असली कातिल को पकडऩे की मांग पर खुद भाजपा से जुड़े लोग आंदोलन कर रहे हैं। खुद गृह मंत्री के इलाके में एक राह चलते व्यक्ति को मार डाला गया था। पिछले महीने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने बताया था कि सरकार के पांच महीने में हत्या की 36 वारदातें हो गईं। इन वारदातों में कुछ बच्चे भी शिकार हुए हैं। राजधानी रायपुर और दूसरे सबसे बड़े शहर बिलासपुर में चाकूबाजी की घटनाएं लगातार हो रही हैं। लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वे जल्द से जल्द कांग्रेस सरकार से बेहतर कानून व्यवस्था महसूस करें।
भीड़ के मुकाबले पुलिस ज्यादा

शांतिपूर्वक धरना, रैली, प्रदर्शन की अनुमति विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक संगठन प्रशासन से मांगते रहते हैं और वह मिल जाती है। जब तक कोई विशेष परिस्थिति न हो, बहुत ज्यादा पुलिस बल भी ऐसे कार्यक्रमों में लगाने की जरूरत महसूस नहीं की जाती। मगर बलौदाबाजार की घटना ने प्रशासन को सतर्क कर दिया है। इसका उदाहरण मानपुर में देखा गया, जो अंबागढ़ चौकी-मोहला-मानपुर जिले का एक प्रमुख स्थान है। संभवत: बलौदाबाजार के बाद प्रदेश का पहला जमावड़ा यहीं हुआ। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री अरविंद नेताम के नेतृत्व वाले सर्व आदिवासी समाज ने यहां एक प्रदर्शन आयोजित किया था। इसमें जेल भरो आंदोलन भी शामिल था। यह आंदोलन धार्मिक उन्माद फैलाने और नक्सलियों से संबंध होने के आरोप में आदिवासी नेताओं, विशेषकर सरजू नेताम को गिरफ्तार करने को लेकर था। आदिवासी बाहुल्य इलाका है, आदिवासी नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन है, फिर ताजा-ताजा बलौदाबाजार में हुई हिंसा। इन सबने पुलिस प्रशासन को चिंता में डाल रखा था। कार्यक्रम स्थल पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात था। हालांकि लोग जुटे थे पर इतने नहीं कि इनके लिए 1000 जवानों की तैनाती करनी पड़े। भीड़ कम पहुंचने की वजह यह बताई गई कि स्थानीय आदिवासी नेताओं के एक वर्ग ने इस प्रदर्शन का विरोध किया था। मोहला और पानाबरस के आदिवासी नेताओं ने आंदोलन में भाग नहीं लेने का निर्णय ले लिया था। सब कुछ शांति से निपट जाने पर पुलिस और प्रशासन ने राहत की सांस ली। ([email protected])
अब निकल सकती है नई वैकेंसी
चुनाव आचार संहिता हटने के बाद सरकार एक्शन में आ गई है। समीक्षा बैठकें शुरू हो गई हैं, जनदर्शन भी लगने लगा है। अलग-अलग कारणों से दो कलेक्टर और एक एसपी को हटाया जा चुका है। यानि सरकार फुल फॉर्म में काम कर रही है।
सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले किसानों और महिलाओं को किए गए कई वादे पूरे किए गए। अपने छह माह के कार्यकाल में युवाओं को उद्योग लगाने पर 50 प्रतिशत सब्सिडी की घोषणा की। नौकरियों में स्थानीय युवाओं को उम्र में 5 साल की छूट देने का ऐलान भी हो चुका है। पर भर्तियों का विज्ञापन अब तक नहीं निकला। चुनाव के पहले करीब 10 हजार शिक्षकों की भर्ती की तैयारी कर ली गई थी। लोक सेवा आयोग के जरिये 595 प्रोफेसरों की भर्ती की प्रक्रिया तो तीन साल से चल रही थी, जो अलग-अलग कारणों से चुनाव आचार संहिता लागू होने तक पूरी नहीं हो पाई। आदिवासी विकास विभाग में छात्रावास अधीक्षक के 500 रिक्त पदों पर भर्ती के लिए व्यापमं विज्ञापन निकाला था, जो बाद में निरस्त कर दिया गया था। आचार संहिता के कारण अगला विज्ञापन नहीं निकला। कई दूसरे विभागों में भर्तियां रुकी हुई हैं, जिनमें चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर द्वितीय श्रेणी राजपत्रित अधिकारी तक के पद हैं। ऐसे पदों की संख्या 25 हजार के आसपास बताई जा रही है। बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में नौकरियों के विज्ञापन निकलने लगेंगे।
भव्य भवन सुरक्षित कितने?

बलौदाबाजार में 10 जून को जब हिंसक भीड़ ने धावा बोला। वायरल वीडियो से पता चलता है कि आग बहुत तेजी से भडक़ी और देखते ही देखते संयुक्त जिला कार्यालय नीचे से ऊपर तक धूं-धूं कर जलने लगा। इस समय पूरे छत्तीसगढ़ में भीषण गर्मी है, जो आग तेजी से फैलने का एक कारण बना, लेकिन जानकारों का कहना है कि इसकी दूसरी वजह भवन की दीवारों पर लगाए गए एसीपी की परत है। एसीपी यानि एल्युनिमियम कंपोजिट पैनल किसी भी इमारत की खूबसूरती कई गुना बढ़ा देते हैं। पहले व्यावसायिक परिसरों में इसका चलन अधिक था लेकिन सरकारी भवनों में भी इसका इस्तेमाल होने लगा है। विभिन्न जिलों के कार्यालय, यहां तक कि मंत्रालय और सचिवालय के भवनों में भी बाहरी दीवारों पर इसकी साज-सज्जा दिखाई देती है। भवन निर्माण से जुड़े कुछ इंजीनियरों का कहना है कि भवनों की संरचना के मुताबिक एसीपी लगाने और उसकी क्वालिटी को मेंटेन करने के कुछ नियम हैं, जिनका पालन नहीं करने पर आगजनी के दौरान जोखिम बढ़ जाता है। जिन भवनों में एसीपी लगा होता है उसकी दीवारें गर्मी के दिनों में और अधिक गर्म होती हैं। आग के संपर्क में आने के बाद पैनल तेजी से पिघलने लगता है। इस वजह से ऐसा भी हो सकता है कि आग ऊपर की मंजिल में लगी हो और नीचे फैलने लगे। बलौदा बाजार में आग तेजी से फैलने की क्या यह भी वजह थी, शायद आगे जांच से साफ हो। ([email protected])
तबादले और कर्मचारी नेता
तबादलों को लेकर सरकार इस बार कोई रियायत बरतने के मूड में नहीं नजर आ रही है। उसके इस मूड को कर्मचारी संगठन के नेता भांप चुके हैं । सरकार ने मंत्रालय में किए तबादलों से इसका कड़ा संदेश दिया है। मंत्रालय के कई मठाधीशों की कुर्सी दशक, डेढ़ दशक बाद बदली गई है। सबसे अच्छी बात है यह है कि तबादलों की पहल उनके अपने ही नेता ने की थी। वे चाहते हैं कि कोई भी कुर्सी किसी का विशेषाधिकार न रहे। सबको को काम करने का अवसर मिले। बस उसी आधार पर सीएम के सचिवों ने आचार संहिता के दिनों में एक एक की पड़ताल कर सूची बनाई और जारी करना शुरू कर दिया है।
आने वाले दिनों में कुछ और तबादला सूचियाँ आएंगी। इसके बाद मैदानी अमले की बारी है। वहां भी सीएम सचिवालय एक-एक की स्क्रूटनी कर रहा है। इसे देखते हुए कर्मचारियों ने तबादलों से बचने जुगाड़ शुरू कर दिया। कर्मचारी नेता, संगठन के अपने पदों पर मिलने वाली रियायत के पन्ने, पुराने आदेश की तलाश में जुट गए हैं। ताकि उस बिना पर बच जाए लेकिन इस बार शायद न बचे।
सबको मालूम है पार्षद की हकीकत...
नगरीय निकाय यानी पार्षद चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है। इसके साथ ही दावेदार शुरू हो गए हैं। दलीय, निर्दलीय दोनों। दलीय से ज्यादा निर्दलीय सक्रिय हो रहे हैं। वे सभी वर्तमान पार्षद पर निष्क्रिय होने, वार्ड में न विकास होने न सडक़ नाली पानी, सफाई होने जैसे मुद्दों को लेकर बयानबाजी करने लगे हैं। साथ ही त्यौहारी बधाई के प्लैक्स,पोस्टर, होर्डिंग भी तनने लगे हैं। यह सक्रियता और तेज होगी। कलेक्टोरेट, थाने, निगम के जोन और मुख्यालय में धरने-प्रदर्शन भी बढ़ेंगे। स्वयं को सच्चा जनसेवक बताने के लिए।
दरअसल होता ऐसा नहीं है। सभी की नजर में पार्षद के रूप में वेतन, लाखों की पार्षद निधि, ठेके पर कमीशन या भाई साले को ठेकेदार बनाने, नल कनेक्शन, नक्शा पास कराने के नाम पर होने वाली आय पर रहती है। सबसे बड़ी आय, दलों को बहुमत न मिलने पर जो महापौर के दावेदार से समर्थन के एक वोट के बदले मिलने वाला खर्च ।और एमआईसी पद का मोलभाव। सबसे बड़ी बात सदा के लिए माली हालत सुधर जाती है। इसलिए आगे देखते जाइए हर मोहल्ले से नारे गुंजेंगे—हमारा पार्षद कैसा हो ....।।
एमपी में एयर टैक्सी, और यहां?

छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों को आपस में और महानगरों से जोडऩे के लिए हवाई सेवा का विस्तार कछुआ चाल से हो रहा है। जगदलपुर और बिलासपुर ऐसे हवाई अड्डे हैं, जो कई दशकों से उड़ानों के लिए तैयार थे, लेकिन कई साल से गिनी-चुनी उड़ानें ही हैं। मार्च महीने में जारी शेड्यूल के बाद इन दोनों हवाई अड्डों से चार-पांच उड़ानें शुरू हुई हैं, जो अक्टूबर तक प्रभावी रहेगा। जगदलपुर से रायपुर, हैदराबाद, जबलपुर और दिल्ली से जोड़ा गया है। बिलासपुर जगदलपुर से सीधे जुड़ गया है। सप्ताह मे एक दिन प्रस्थान और दो दिन आगमन की सेवा दी जा रही है। इसके अलावा दिल्ली, जबलपुर, कोलकाता और प्रयागराज के लिए उड़ानें मिली हैं। इन दोनों ही हवाईअड्डों के पास इतनी जमीन है कि बड़े विमानों की सेवाएं भी शुरू हो सकती हैं। कुछ तकनीकी संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाकर। पर नाइट लैंडिंग जैसी सेवाएं भी नहीं मिल पाई हैं। बिलासपुर में सुविधाओं का मौजूदा विस्तार तो हाईकोर्ट की लगातार दखल और जन आंदोलनों के कारण ही हो पाया है। दूसरी ओर कोरबा और अंबिकापुर से भी लंबे समय से उड़ानें शुरू करने की मांग हो रही है। अंबिकापुर में तो छह महीने पहले लैंडिंग और टेक ऑफ का ट्रायल भी हो चुका है। अभी खबर आई है कि यहां के लिए तैयारी शुरू की जा रही है।
दूसरी ओर पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में आज एक साथ 8 शहरों के लिए एयर टैक्सी शुरू हो गई । भोपाल, जबलपुर, इंदौर, रीवा, सिंगरौली, उज्जैन, खजुराहो और ग्वालियर इसमें शामिल है। यह पीएमश्री पर्यटन वायुसेवा योजना के तहत है, जिसमें कुछ फ्लाइट्स का किराया तो वंदेभारत एक्सप्रेस के आसपास ही है। राज्य सरकार अपनी ओर से भी एक महीने के लिए 50 प्रतिशत रियायत टिकटों पर देने जा रही है।
छत्तीसगढ़ के एयरपोर्ट अभी उड़े देश का आम नागरिक (उड़ान) योजना की ही राह देख रहे हैं, दूसरी ओर मध्यप्रदेश कई कदम आगे बढ़ चुका है। बावजूद इसके कि बस्तर से लेकर सरगुजा तक पर्यटन में विस्तार की संभावना और भौगोलिक विषमता के कारण काम तेजी से होना चाहिए।
कांग्रेस प्रत्याशी का विश्वास
लोकसभा चुनाव में कांकेर सीट को कांग्रेस महज 1800 वोटों से हार गई। मतगणना के दिन शुरू के कई राउंड ऐसे थे जिसमें प्रत्याशी बीरेश ठाकुर आगे चल रहे थे। 16वें राउंड के बाद फाइट नैक टू नैक हो गई और फिर अंतिम परिणाम भाजपा प्रत्याशी भोजराज नाग के पक्ष में गया। बीरेश ठाकुर सन् 2019 में भी यहीं से प्रत्याशी थे। तब सिर्फ 6900 वोटों से भाजपा उम्मीदवार मोहन मंडावी से हार गए। लोग कह सकते हैं कि किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया लेकिन बीरेश मानते हैं कि इस बार गड़बड़ी से परिणाम बदला गया। वे यह बात गंभीरता से कर रहे थे। इसीलिये अब उन्होंने 4 ईवीएम मशीनों को खुलवाकर दोबारा गिनती कराने का आवेदन दिया है। और इसके लिए 1.60 लाख रुपये प्लस जीएसटी भी जमा की है। उनका यह भी कहना है कि आरओ के मोबाइल फोन की जांच कराई जाए कि गणना के अंतिम दौर में उनके पास किस-किस के फोन आए। ठाकुर का कहना है कि उन्होंने ईवीएम मशीनों के नंबर बदल जाने की शिकायत की थी, जिस पर सुनवाई नहीं हुई। अब ईवीएम के खुलने पर ही पता चलेगा कि क्या वाकई परिणाम में कोई हेराफेरी हुई। जो भी हो, भोजराज नाग के सितारे तो मजबूत हैं। सन् 2014 में परिस्थितियां ऐसी बनी कि अंतागढ़ सीट से वे निर्विरोध ही विधायक बन गए थे। वहीं इस बार के लोकसभा चुनाव में थोड़े से वोटों से सही, जीत गए।
पास के लिए खूब लगवाए चक्कर
सच्चाई से हर खास ओ आम का सामना होता है । राजनीति में हो तो नजर आ ही जाता है ।
विधायक रहे दो चर्चित भाजपा नेताओं को एक अदद पास के लिए दिल्ली में चक्कर काटने पड़े। कभी उनके पीछे घूमने वाले,नए नवेले महामंत्री ने रायसीना हिल्स के शपथ समारोह के एंट्री पास के लिए दिन भर नई दिल्ली के चक्कर कटवाए। बेचारे सुबह 6.30 से कभी छत्तीसगढ़ भवन,तो कभी राष्ट्रीय मुख्यालय घुमाए जाते रहे। जब-जब महामंत्री ने बुलाया,जाना पड़ा ।
महामंत्री हर बार कहते पास नहीं आए हैं, जबकि उनकी जेब में थे। छत्तीसगढ़ के नाम 200 पास दिए गए थे। लेकिन वहां पहुंच थे 266 नेता । अब 66 अतिरिक्त में किसी न किसी की कुर्बानी देनी ही थी। महामंत्री ऐसे ही नेताओं को काटते चले गए। लेकिन उन्हें क्या पता था कि दोनों पूर्व विधायक हैं जुगाड़ तो कर ही लेंगे। हुआ ऐसा ही। दोनों को राष्ट्रपति भवन प्रांगण में देखते ही महामंत्री भौंचक रह गए। दरअसल दोनों ने हिमाचल भवन के रास्ते एंट्री पा ली। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सौदान सिंह से संपर्क करते ही हो गई इनकी बल्ले-बल्ले।
वैसे किरण सिंह देव की टीम में महामंत्री बने इन नेताजी को कुछ ही महीने हुए हैं। पहले ये 77 किमी दूर पड़ोस के जिलाध्यक्ष हुआ करते थे। और तब से इनके कृतित्व की चर्चा चहुंओर है। वन विभाग ने कैंपा मद से इनके लिए स्कार्पियो गिफ्ट किया है। बहरहाल दोनों पूर्व विधायकों को पलटवार के मौक़े का इंतजार है। ऐसे ही नेताओं के लिए कहा गया है कि सब दिन होत न एक समान।
ब्राह्मण अब किंग मेकर बने
पिछले तीन चुनाव अंचल के ब्राह्मण नेताओं के अनुकूल नहीं रहे। ये कभी साहू,कभी कुर्मी नेताओं से हारते रहे हैं। यह देख 13,18,24 के नतीजों साथ एक स्वतंत्र लेखक, एक पराजित ब्राह्मण नेता से बतिया रहे थे । लेखक ने तपाक से कह दिया भैया अब आप लोगों को चुनाव नहीं लडऩा चाहिए। क्योंकि छत्तीसगढ़ अब अगड़ों खासकर ब्राह्मणों के लिए सुरक्षित नहीं रहा। बल्कि मैं तो कहता हूं दावेदारी भी नहीं करनी चाहिए। तीन नतीजे देखें आप स्वयं विधानसभा, लोकसभा हारे। आप से पहले बाद में सत्यनारायण शर्मा, फिर विकास उपाध्याय पंकज शर्मा।
दुर्ग और आसपास में सरोज पांडेय, प्रेम प्रकाश पांडे, शिवरतन शर्मा, रविंद्र चौबे, अमितेश शुक्ल, शैलेष नितिन त्रिवेदी और अन्य । जीते तो दो-तीन ही जो इनमें नहीं, और वह भी मोदी लहर में। इसलिए अब ब्राह्मणों को संगठन में काम करना चाहिए। आप लोग किंगमेकर बनें। छत्तीसगढ़ अब आदिवासी, और पिछड़ों का हो गया है। तोखन साहू के केंद्र में मंत्री बनने से मुहर लग गई। इतना सुनकर, लेखक के आगे के विश्लेषण को यह कहते हुए रोका कि रहने दो कुछ भी कहते हो। उसके बाद नि:संदेह, नेताजी विश्लेषण तो कर ही रहे होंगे।
एक और राज्य से आदिवासी सीएम
छत्तीसगढ़ से सटे ओडिशा में एक समान बात होने जा रही है। दिसंबर 2023 में विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने आदिवासी वर्ग के विष्णुदेव साय को प्रदेश का नेतृत्व सौंपा। हालांकि कई वरिष्ठ नेता विधायक चुने गए थे और उन्होंने भी उम्मीद पाल रखी थी। अब ओडिशा में भी ऐसा ही हुआ। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सहित ओडिशा के कई पुराने दिग्गजों के समर्थक सोचकर चल रहे थे कि उनके नेता को मौका मिलेगा। पर केंद्रीय पर्यवेक्षक राजनाथ सिंह ने मोहन मांझी को नेतृत्व सौंपने की घोषणा की। जिस तरह छत्तीसगढ़ में दो उप-मुख्यमंत्री ओबीसी और सामान्य वर्ग से लिए गए, उसी तरह ओडिशा में भी प्रवती परिदा और केवी सिंह देव को लिया गया है। क्षेत्रीय व जातीय समीकरण का छत्तीसगढ़ की तरह ओडिशा में भी ध्यान रखा गया।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों ही माइनिंग स्टेट हैं। क्योंझर, जहां से मोहन मांझी विधायक हैं, वहां तो बॉक्साइट का विशाल भंडार है। एक तथ्य यह है कि खनिज उत्खनन से राज्य के राजस्व में वृद्धि होती है और विकास को गति मिलती है। दूसरी तरफ आदिवासी समुदाय अपनी जमीन छिन जाने, बेदखल हो जाने को लेकर चिंतित रहता है। यह माहौल छत्तीसगढ़ और ओडिशा में एक जैसा है। भाजपा जो इस समय तीसरी बार केंद्र में एनडीए गठबंधन के साथ लौटी है, उसका यह मानना हो सकता है कि आदिवासी मुख्यमंत्री खनन प्रभावित ग्रामीणों के साथ अच्छा तालमेल बिठा सकते हैं और उनकी जरूरतों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। पर्यावरण, विस्थापन और आजीविका की समस्या को समझ सकते हैं।
इसके राजनीतिक कारणों का अनुमान भी लगाया जा सकता है। झारखंड में इसी साल 2024 के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। वहां इस समय झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन की सरकार है। यहां हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर जेल जाना पड़ा। इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में दिल्ली की तरह फैसला भाजपा के पक्ष में नहीं आया, जहां केजरीवाल को कोर्ट ने प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी थी लेकिन भाजपा ने सभी 7 सीटों पर जीत हासिल कर ली। लोकसभा में भाजपा ने झारखंड में तीन सीटें गंवाई। पहले 11 थी, अब 8 रह गई। गंवाई हुई तीन सीटें झामुमो, कांग्रेस और ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन में बंट गई। उसके सामने अब विधानसभा में बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है।
जिस तरह जशपुर झारखंड से सटा हुआ है, ओडिशा में मुख्यमंत्री बन रहे मोहन मांझी का क्षेत्र क्योंझर भी झारखंड की सीमा में ही है। आदिवासी बाहुल्य झारखंड के बगल के दो राज्यों में आदिवासी मुख्यमंत्री देकर भाजपा अब विधानसभा चुनाव में शायद झामुमो-कांग्रेस को बेदखल कर दे। लोकसभा चुनाव के दौरान छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री साय ने झारखंड में कई चुनावी सभाएं ली थीं। ओडिशा में सीएम देने के बाद, झारखंड के मतदाताओं पर भाजपा की छवि एक आदिवासी हितैषी दल की बन सकती है। वहां के लिए अगले चुनाव में दो –दो आदिवासी सीएम स्टार प्रचारक होंगे।
वर्मी खाद में लुटने से बचे किसान
मानसून करीब आते ही सहकारी समिति के गोदामों में खाद पहुंच चुका है। किसान इसे अपनी जरूरत के हिसाब से उठाने लगे हैं। पिछले तीन-चार से किसान खाद की कीमत बढ़ जाने की वजह से परेशान थे। ऊपर से उनको वर्मी खाद खरीदने के लिए बाध्य किया जाता था। किसानों पर यह दोहरा बोझ था। रासायनिक खाद की कीमतों में जो बढ़ोतरी पिछले सालों में हुई वह यथावत है लेकिन इस बार वे वर्मी खाद खरीदने की बाध्यता से मुक्त हो चुके हैं। रासायनिक खाद खरीदने के दौरान जबरदस्ती वर्मी खाद का पैकेट थमाया जाता था। तत्कालीन सरकार की महत्वाकांक्षी योजना किसानों की जेब ढीली करके सफल बनाई जा रही थी, जो वैसे भी कृषि की लागत बढ़ जाने के कारण परेशान हैं। जब से भाजपा की सरकार आई, अधिकांश गौठानों में गोबर की खरीदी बंद हो गई। वर्मी खाद इसी से तैयार होता है। ऐसा नहीं है कि किसानों को जैविक खाद से कोई परहेज था। इसका वे सब्जी भाजी में उपयोग कर लेते, मगर ज्यादातर दुकानों में जो वर्मी खाद थमाई जाती थी, उसकी गुणवत्ता को लेकर शिकायत थी। कई किसानों ने पाया कि इसमें मिट्टी, कंकड़, गिट्टी के अलावा कुछ नहीं है। भाजपा सरकार ने गौठानों को आत्मनिर्भर बनाने की घोषणा की है। गौठानों से अलग गौ-अभयारण्य बनाने की घोषणा कर रखी है। देखना होगा, इसमें वर्मी खाद के निर्माण व बिक्री से संबंधित क्या योजना लाई जाती है।

सरई के फूल..
छत्तीसगढ़ के कई वन क्षेत्र सघन सरई या साल के पेड़ों से आच्छादित है। भीषण गर्मी में भी इसकी हरियाली खत्म नहीं होती। सौ साल टिके रहते हैं। मजबूत इतने कि जब तक धातु की रेल पांत नहीं बनी, इसी से पटरियां तैयार होती थी। मानसून के पहले इन साल वृक्षों पर फूलों की बहार है। ये सडक़ों पर भी बिछी हुई हैं। कबीरधाम जिले के पंडरिया की एक सडक़ पर बिखरे कुछ फूल।
स्मार्ट सिटी की चमक बढ़ेगी?
गांव के पंच से राजनीति शुरू करने वाले सांसद तोखन साहू को शहरी मामलों का मंत्रालय मिला है। इनके विभाग में कई ऐसे कार्यक्रम और योजनाएं हैं जिनसे छत्तीसगढ़ की सूरत बदल सकती है। सबसे बड़ी योजना तो स्मार्ट सिटी ही है। प्रदेश के तीन शहर बिलासपुर, रायपुर और नवा रायपुर इसमें शामिल है। कुछ क्षेत्रों में सडक़ों, उद्यानों, भवनों का जीर्णोद्धार हुआ, पार्किंग स्पेस बने, यातायात दुरुस्त करने के लिए खर्च हुए लेकिन आम तौर पर दिखाई यही देता है कि इन शहरों को खर्च के अनुरूप व्यवस्थित सुविधाएं नहीं मिल पाई। पूरा फंड स्मार्ट सिटी लिमिटेड कंपनी के पास है। योजना और बजट बनाने में जन प्रतिनिधियों की कोई भूमिका नहीं है। इस पर बड़ा विवाद भी रहा है। हाईकोर्ट में इसे लेकर याचिका भी दायर की गई थी। हालांकि स्मार्ट सिटी लिमिटेड के तर्कों को ठीक मानते हुए याचिका खारिज कर दी गई थी। देखना होगा कि क्या तोखन साहू तीनों स्मार्ट सिटी की सूरत बदल पाएंगे। शहरी परिवहन, अमृत मिशन, राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन जैसी करीब दर्जन भर बड़े काम इस मंत्रालय की योजनाओं में शामिल हैं। साहू राज्य मंत्री हैं, जिनके ऊपर केबिनेट मंत्री मनोहर लाल खट्टर होंगे। अमूमन राज्य मंत्रियों को शिकायत रही है कि विभाग पर सारा नियंत्रण केबिनेट मंत्री ही करते हैं। राज्य मंत्रियों के पास तो फाइलें बिल्कुल नहीं आती, या कम महत्व की फाइलें आती हैं। ऐसे में तोखन साहू को अपने हाथों में कुछ अधिकार प्राप्त करने के लिए जूझना भी पड़ सकता है।
बूंद-बूंद पानी पर टिका जीवन

पानी सबकी जरूरत है। सार्वजनिक नलों में, हैंडपंपों में जो पानी की बूंदें रिसती रहती हैं, नन्हीं चिडिय़ा उनसे अपना प्यास बुझा लेती है। सोशल मीडिया पर डाली गई बस्तर की एक तस्वीर है यह।
स्टील की जगह शराब की फैक्ट्री
बस्तर में टाटा स्टील प्लांट नहीं लगा तो पिछली कांग्रेस सरकार ने वादा पूरा करते हुए उससे जमीन लेकर किसानों को वापस कर दी। पर इसमें से कुछ जमीन अब भी उद्योग विभाग के पास बची रह गई है। अब स्टील प्लांट की जगह यहां पर स्कूल अस्पताल नहीं बल्कि ऐसी पहली फैक्ट्री लगाई जा रही है, जहां शराब महुआ से बनाई जाएगी। धुरागांव, जहां यह फैक्ट्री लग रही है के ग्रामीणों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है, जबकि फैक्ट्री के प्रतिनिधि कहते हैं कि ग्राम सभा में फैक्ट्री के लिए मंजूरी मिल गई थी। ग्रामीणों का कहना है कि हमें सरकारी फैक्ट्री बताकर बरगलाया गया है। फैक्ट्री तो किसी प्राइवेट कंपनी के नाम पर खुल रही है। फैक्ट्री के मालिक का कहना है हम बस्तर के महुआ को देश-विदेश में प्रसिद्ध करने वाले हैं। देखना होगा कि ग्रामीणों का विरोध असर कहता है या उद्योगपति की पहुंच मायने रखती है।

रायपुर का बाजार सांप्रदायिकता से परे हैं। चावल के दो ब्रांड, ‘अब्बा हुज़ूर’ और ‘जय श्री राम’ चैन से अगल-बगल बैठे ग्राहक का इंतजार कर रहे हैं। (फोटो रुचिर गर्ग ने फेसबुक पर पोस्ट की है।)
तबादले, नक्सल मोर्चा और मजबूत होगा
चुनाव निपटते ही कांकेर कलेक्टर को एक झटके में बदलकर सरकार ने सामान्य प्रशासन को लेकर अपने तेवर दिखा दिए हैं। और कानून व्यवस्था को लेकर भी यही नजरिया होगा। क्योंकि थानों की बोलियां लगने की खबरें आ रहीं हैं।
इसकी पृष्ठभूमि में पुलिस महकमे में बड़ी सर्जरी की तैयारी चल रही है। पीएचक्यू में आधा दर्जन एडीजी, आईजी, एसपी रैंक के अधिकारी खाली बैठे हुए हैं। उन्हें नई जिम्मेदारी दी जाएगी। उन्हें सीआईडी, प्रशासन, नक्सल ऑपरेशन, तकनीकी सेवा से लेकर अन्य शाखाओं में पदस्थ किया जाएगा।
पुलिस हाउसिंग कार्पोरेशन और एसएसबी में भी फेरबदल किया जाएगा। सरकार नक्सल मोर्चे पर बड़ी लड़ाई की तैयारी कर रही है। इसलिए नक्सल ऑपरेशन और उससे जुड़े विंग को मजबूत किया जाएगा बस्तर, दुर्ग , राजनांदगांव रेंज आईजी से लेकर जिलों में भी कई कप्तान को बदलने की तैयारी है। इसमें राजनांदगांव, कवर्धा से लेकर कोरबा, गरियाबंद, महासमुंद, बलरामपुर की चर्चा है। और पिछली सरकार में ब्लूआइड रहे अफसरों ने पांच महीने में अपनी स्थिति सुधार ली है। इन्हें भी फ्रंट रनर माना जा रहा है ।
अब नई प्लानिंग
राजनीति में यदि आपने संघर्ष के साथ शीर्ष हासिल करने बाद यदि उसे विनम्रता, गुटबाजी रहित और कार्यकर्ताओं को सम्मान देकर सहेज लिया तो ठीक वर्ना करियर में नेपथ्य तय है। इसी नेपथ्य से भाजपा के एक नेता जूझ रहे हैं। नेताजी कभी पार्टी के कुबेर माने जाते रहे हैं। इसी के बूते लोकतंत्र के एक स्तंभ के शीर्ष पर भी रहे। उसके बाद से परावर्तन का दौर शुरू हुआ। सरकार के साथ पार्टी के भी पदों से हटा दिए गए । अब वे भाई साहबों से संगठन का काम मांग रहे हैं। चुनाव में एक संसदीय क्षेत्र के क्लस्टर का काम मिला। मैडम के लिए जुट गए तन मन धन और पुत्र के साथ । आदिवासी वोटरों के लिए गांधीजी को साथ लेकर डटे रहे। इस उम्मीद और प्लानिंग से कि मैडम जीती तो, उनके जरिए रायपुर दक्षिण से सदन में प्रवेश कर लिया जाए। लेकिन उम्मीदें हर बार सफलीभूत नहीं होतीं। इसीलिए कहा गया है माया मिली न राम । अब नए सिरे नई प्लानिंग करनी होगी ।
नीट के नतीजे और लॉबी
नीट के नतीजों ने एक बेदाग अफसर के कामकाज पर उंगली उठाने का अवसर दे दिया है । सफाई देनी पड़ी है। एनटीए के डीजी छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस सुबोध सिंह ने गड़बड़ी के सारे लूप होल्स बंद करने की योजना बनाई थी, अमल भी किया। इसमें सबसे बड़ा अहम था पेपर लीक। यह तो नहीं हो पाया।दिल्ली में सक्रिय कोचिंग सेंटर्स गिरोह चारों खाने चित्त रहा। लेकिन क्वेश्चन पेपर की सेंटर्स तक डिलीवरी लेट करवा कर बदला ले लिया गया। इस गिरोह में कोचिंग वालों के साथ निजी मेडिकल कॉलेज संचालक, केंद्रीय उच्च शिक्षा विभाग के अफसरों का रिंग शामिल है।
दरअसल मेडिकल के एनआरआई, मैनेजमेंट, पूर्व सैनिक,स्वतंत्रता सेनानी कोटे की सीटें इसी गिरोह के हाथों में है। लीक करने से चुके गिरोह ने योजना बनाई कुछ सेंटर्स में पेपर बंडल लेट भेजा जाए। ताकि बच्चों का साल्विंग टाइम कम हो और ये बच्चे पिछड़ जाएं। हुआ भी ऐसा ही । देरी की वजह से एनटीए को ग्रेस नंबर देने पड़े। ऊपर से एसआईटी जांच बिठानी पड़ी । दरअसल ये पूरा खेल दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, चंडीगढ़, पंजाब और कर्नाटक के आईएएस लॉबी की बताई गई है। एनटीए डीजी (सुबोध सिंह, छत्तीसगढ़ कैडर के, केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर )से लेकर उच्च शिक्षा सचिव (संजय के मूर्ति) में शीर्ष पदों पर इन कैडर के लोग नहीं हैं। कोचिंग लॉबी की दाल नहीं गल रही थी। सो बच्चों के भविष्य के साथ यह षड्यंत्र रचा गया ।
गोद लेने के खतरे भी जान लीजिए...

कबीरधाम जिले के कुरदुर के पास बाहपानी में एक भीषण सडक़ हादसे में 19 आदिवासियों की पिछले महीने मौत हो गई थी। इसके साथ ही मृतकों पर आश्रित 24 बच्चों के सामने अंधेरा छा गया। विधायक भावना बोहरा पीडि़त परिवारों से मिलने गईं और वहां घोषणा की कि वे इन बच्चों की आगे की पढ़ाई, रोजगार और विवाह पर आने वाला खर्च अपने सामाजिक संस्था के माध्यम से वहन करेंगी, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके। इसका मतलब कुल मिलाकर यह था कि वे इन बच्चों को गोद लेंगीं। अब पूर्व मंत्री व इलाके के पूर्व विधायक मोहम्मद अकबर ने गोद से संबंधित कानूनी पक्ष की याद दिलाई है। उनका बयान आया है कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम-1959 के तहत बच्चों को गोद लेने वाले की संपत्ति पर अधिकार मिलता है। 15 साल से अधिक उम्र के बच्चों को गोद नहीं ले सकते। गोद लेने वाले और बच्चे की उम्र में कम से कम 21 साल का फर्क हो, आदि।
विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों ने अपनी संपत्ति की घोषणा की थी, जिससे पता चला कि बोहरा सबसे अमीर उम्मीदवार हैं। क्या इसलिये उनको गोद लेने के खतरे के बारे में याद दिलाया जा रहा है? हो सकता है कि बोहरा के इस फैसले के पीछे राजनीति हो, पर इससे बच्चों का भला ही होगा। जिस कानून की मो. अकबर याद दिला रहे हैं वह तब लागू होगा, जब गोद लेने के लिए लंबी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए। इसमें इश्तहार छपवाना भी शामिल है, जिसमें गोद लेने पर आपत्ति की जा सकती है। यह सब तो हुआ है नहीं। विधायक बोहरा की नैतिक जिम्मेदारी जरूर है कि सार्वजनिक घोषणा कर देने के बाद बच्चों के साथ उन्होंने जो वादा किया है, पूरा करें। अकबर चुनाव में तो बुरी तरह निपट गए, एक मानवीय मामले में भावना वोहरा की भावना को कुचलने के लिए वे क़ानून की अपनी सतही जानकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं। जब प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति किसी आदिवासी जाति को, या सांसद किसी गाँव को गोद लेते हैं, तो उसका मतलब क़ानूनी दत्तक संतान बनाना नहीं होता। जिस इलाक़े ने अकबर को 2018 के चुनाव में प्रदेश में सबसे अधिक लीड से जिताया था, वहाँ इतनी मौतों पर अकबर ने अपनी एक दिन की कमाई भी भेजी? झांकने गए?
लगे हाथ उन गांवों की दशा भी देख लेनी चाहिए, जो सिर्फ प्रचार के लिए कभी प्रधानमंत्री, कभी मुख्यमंत्री तो कभी सांसद-विधायक के नाम पर गोद ले लिए जाते हैं। इसमें जनप्रतिनिधियों को अपनी जेब भी ढीली नहीं करनी पड़ती, सरकारी फंड का सही इस्तेमाल ही करना होता है। फिर भी गोद लिए गांव विकास के लिए तरसते हैं।
बस जांच ही चलती रहेगी..?
पूर्ववर्ती सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेम साय सिंह टेकाम को हटाने से पहले एक बड़ा भ्रष्टाचार हुआ था। प्रदेशभर के शिक्षकों की पदोन्नति के बाद पोस्टिंग में मनमाना संशोधन किया गया था। 2000 से अधिक शिक्षकों को मनचाही जगह देने के एक-एक केस में लाखों रुपयों का वारा-न्यारा होने की शिकायत आई थी। हाईकोर्ट में दूर भेज दिये जाने से प्रभावित शिक्षकों की याचिका लगी थी। तब सरकार ने माना था पोस्टिंग के नियमों का पालन नहीं हुआ। तत्कालीन संयुक्त संचालक, जिला शिक्षा अधिकारी से लेकर बाबू तक इसमें लिप्त पाये गए थे। कई का निलंबन किया गया। टेकाम के बाद स्कूल शिक्षा विभाग संभालने वाले मंत्री रविंद्र चौबे ने दोषी अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया था। पर यह चर्चा में ही रह गई। कोई आदेश नहीं हुआ, उसके बाद चुनाव आ गया। अब आचार संहिता हटने बाद शिक्षा विभाग के एक अतिरिक्त संचालक को फिर जांच अधिकारी बना दिया गया है। शिक्षा विभाग में जांच के लिए नोटिस जारी करना, जवाब मांगना एक बड़ा खेल है। प्राचार्य कोई खरीदी करते हों तब, शिक्षक गायब रहते हों तब, शिकायत होती है और जांच होती है। कार्रवाई क्या होगी, यह जांच अधिकारी पर निर्भर होता है। क्लीन चिट भी दी जा सकती है। पिछली सरकार इस बात से संतुष्ट थी कि एफआईआर होनी चाहिए। पर, नई सरकार नए सिरे से जांच करा रही है। ([email protected])
10-1 की एक ही वजह
लोकसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में भाजपा एक बार फिर 11-0 का स्कोर खड़ा ही नहीं कर पाई। अटलजी के इतने बड़े वादे के वक्त भी छत्तीसगढ़ कृतार्थ नहीं हुआ था। उसके बाद से पांच चुनाव हो चुके हैं और नतीजे 9-2,10-1 के ही आते रहे। 10-1 दो बार। दोनों ही बार एक ही वजह- सरोज पांडे । पहले दुर्ग से हारीं, और अब कोरबा से। दुर्ग में साहू समाज को नाराज किया और कोरबा में बाहरी कहलाईं। हालांकि इस चुनाव में कांग्रेस के चार और बाहरी रहे। लेकिन कोरबा में कहावत चल गई कि मायावी महंत के आगे नहीं चलने वाली। हुआ यही। उन्होंने भाजपा के भी वोट बैंक में सेंधमारी की ।
हमने प्रचार अभियान के दौरान पहले ही कहा था कि न केवल प्रत्याशी बल्कि कार्यकर्ता भी महाराष्ट्र, हरियाणा दुर्ग के गए थे कोरबा। उपर से मैडम ने स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका पर नजर रखने अपनी बैक अप टीम छोड़ रखी थी। बस फिर लोकल ने अपना काम कर दिया। वैसे भी कोरबा के भाजपा नेता यह नहीं चाहते थे कि उनकी राजनीति दुर्ग से चले। और भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भी नहीं चाहता था कि छत्तीसगढ़ सरोज के इशारे पर चले।
मारपीट की रिपोर्ट के भी पैसे लगेंगे
पिछली सरकार में पुलिसिंग का जो स्तर गिरा है। वह उठ नहीं पाया है। अब भी वही परंपराएं चल रही हैं। इलाके में जुआ, सट्टा, कबाड़ की खुली छूट है। मारपीट की रिपोर्ट करने वालों से भी पैसा लेना है। हर मामलों की भी कीमत तय हैं। दरअसल जिलों में हर थाने की बोली होने लगी है। हर थाने की कीमत तय कर दी है। हर माह उतना देना ही है। उस आधार पर टीआई की पोस्टिंग हो रही है। टीआई भी दुकानदार हो गए हैं, कितना जिले के गुल्लक में डालना है, कितना घर ले जाना है यह फिक्स कर दिया है। सुबह अगरबत्ती जलाकर थाना की कार्रवाई शुरू करते हैं। जैसे दुकानदार। चर्चा है कि छोटे-छोटे जिलों में भी बड़ी बोली लगने लगी है। एक छोटे जिले में शहरी थाने का 3 लाख फिक्स कर रखा है। जो उतना देगा वह थाना प्रभारी बनेगा। इसी तरह अन्य थाना का 50 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपए फिक्स किया हुआ है।
वीकली ऑफ भर्ती के बाद
सरकार बनने के बाद डिप्टी सीएम ने बैठक में बोल दिया कि पुलिसकर्मियों को वीकली ऑफ दिया जाए। अब अफसर परेशान हैं कि वीकली ऑफ कैसे शुरू करें। देने की स्थिति रहती तो पिछली सरकार में ही दे देते। तब कांग्रेस की सरकार की प्राथमिकता में वीकली ऑफ देना भी था। कांग्रेस सरकार का फोकस भी ऐसी कोशिशों में था जिसमें पैसे खर्च न हों। पर जब थानों के स्टाफ को हर हफ्ते एक दिन छुट्टी देने की बात आई, तब यह संभव नहीं हुआ, क्योंकि इतने पुलिस वाले ही नहीं हैं कि वीकली ऑफ दिया जा सके। अब नए सिरे से मंथन शुरू हो चुका है कि किस तरह इसे पूरा किया जा सके। वैसे पिछले दिनों गृहमंत्री कह चुके हैं कि वीकली ऑफ के लिए सभी उपाय कर रहे हैं। इसमें स्टाफ की कमी दूर करने 4 हजार सिपाही की भर्ती करने जा रहे हैं। यानी इनकी भर्ती तक इंतजार करना होगा। कहीं ऐसा न हो फिर से यह वादा अगली सरकार के पाले न चला जाए ।
नई गुलेल का अविष्कार

बस्तर में रथयात्रा या गोंचा पर्व उमंगों से मनाया जाता है। आषाढ़ में जिस दिन गोंचा पर्व प्रारंभ होता है उस दिनसे लेकर अंतिम दिन तक पूजा अर्चना होती है। इस बार यह पर्व 7 जुलाई से 17 जुलाई के मनाया जाएगा। इस मौके पर युवा अपनी तरह-तरह की कलाकारी का प्रदर्शन करते हैं। इसी मौके के लिए तैयार किया गया है- पेंग या तुपकी का नया अवतार। सोशल मीडिया पर इसके वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें दिखाया गया है कि कैसे लकड़ी की छोटी-छोटी गोलियां एक साथ लोड की जा सकती है, जो लक्ष्य को भेद सकती है। यह कुछ-कुछ गुलेल के बड़े रूप की तरह है। वैसे बस्तर के कई इलाकों में आदिवासी तीर-कमान का त्याग कर चुके हैं। शिकार प्रतिबंधित है ही। इसलिए इस तरह के उपकरण मनोरंजन और प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए तैयार किए जाते हैं।
दिल्ली में कैद प्रदेश के बच्चे..
बचपन बचाओ आंदोलन संगठन की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने दिल्ली की दो प्लेसमेंट एजेंसियों के ठिकानों पर पुलिस की मदद से छापा मारकर पॉश कॉलोनियों में काम पर लगाए गए 21 किशोरों को मुक्त कराया है। इनमें 14 लड़कियां हैं। जिन राज्यों के बच्चे यहां कैद मिले, उनमें छत्तीसगढ़ से हैं। झारखंड और उससे लगे जशपुर जिले में मानव तस्करी की समस्या लंबे समय से है। यहां कई प्लेसमेंट एजेंसियों के एजेंट घूमते हैं और गरीब परिवारों को बेहतर वेतन और अच्छी रहन-सहन की सुविधा देने का लालच देते हैं। फिर बच्चों को अमीर घरों में लगभग कैद करके रख लिया जाता है। उनका हर तरह से शोषण होता है। जबरिया विवाह कर दिया जाता है, छोड़ दिए जाते हैं। कई लापता हो चुकी हैं। संदिग्ध परिस्थितियों में मौत भी हो जाती है। गरीबी और महानगरों में काम करने का आकर्षण यह है कि कई रिश्तेदार ही बच्चों की खरीदी बिक्री में शामिल पाए गए हैं। बीते अप्रैल महीने में एक महिला ने अपने रिश्तेदार के तीन अनाथ बच्चों को दिल्ली ले जाने की कोशिश की। पुलिस का दबाव पडऩे पर उन्हें अंबिकापुर वापस लाकर छोड़ा गया। एक अन्य रिश्तेदार 16 साल की उम्र में एक लडक़ी को बहला-फुसलाकर दिल्ली ले गई। वर्षों वहां वह कैद रही। 24 साल की उम्र में वह किसी तरह बचकर हाल ही में वापस लौट पाई। यहां के नारायणपुर थाने में उसकी गुमशुदगी की एफआईआर दर्ज थी। बहुत से लोग दिल्ली ही नहीं, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश भी ले जाए गए हैं। फरवरी माह से अब तक 4 महीनों में जशपुर पुलिस ऐसे 120 नाबालिगों को कैद से छुड़ा कर ला चुकी है। बहुत बार यह पाया गया है कि पुनर्वास ठीक नहीं होने के कारण छुड़ाकर लाए गए बच्चे फिर वापस लौट जाते हैं। कानून व्यवस्था के अलावा यह समस्या सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों से भी जुड़ी है।
हसदेव पर मंत्री का जवाब
हसदेव में पेड़ों की कटाई रोकने और कोल ब्लॉक आवंटन निरस्त करने के लिए राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन को नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत ने पत्र लिखा है। इस पर सरकार के एक मंत्री टंकराम वर्मा का बयान आया है कि कांग्रेस के समय पेड़ों को काटने की मंजूरी दी जा चुकी थी, अब विरोध क्यों किया जा रहा है। यह बात सही है कि कांग्रेस सरकार के दौरान पेड़ों को काटने की शुरुआत हो गई थी। पर कांग्रेस के कई नेता इसके खिलाफ हो गए। उनके ही दबाव में विधानसभा में संकल्प भी पारित किया गया कि अब हसदेव में कोई नया कोल ब्लॉक नहीं, पेड़ों की कोई कटाई नहीं होगी। मगर, हुआ यह कि प्रदेश में सरकार बदलते ही बिना नए मंत्रिमंडल के गठन हुए ही पेड़ों को काटना फिर शुरू कर दिया था। हसदेव अरण्य के हरिहरपुर इलाके में आंदोलन जारी है। इधर अडानी की कंपनी शायद इंतजार कर रही थी कि आचार संहिता खत्म होने के बाद सरकार से मंजूरी हासिल कर ले, लेकिन इसी बीच डॉ. महंत के पत्र से स्पीड ब्रेकर लग गया है।
चुनाव रिज़ल्ट और मंत्री पद
लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस-भाजपा में समीक्षा का दौर चल रहा है। प्रदेश में भाजपा को 10 सीटें लाने के लिए सीएम विष्णुदेव साय को बधाईयां मिल रही है। इससे परे दो पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, और राजेश मूणत का भी पार्टी के भीतर कद बढ़ा है।
मूणत ने राजनांदगांव सीट में एक तरह से चुनाव प्रबंधन संभाला हुआ था और वो पूरे चुनाव राजनांदगांव में ही डटे रहे। यहां कांग्रेस प्रत्याशी पूर्व सीएम भूपेश बघेल से उनकी व्यक्तिगत नाराजगी भी रही है। इस वजह से उन्होंने यहां खूब मेहनत की, और पार्टी प्रत्याशी संतोष पाण्डेय को जिताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। ऐसे में बड़ी जीत पर संतोष के साथ मूणत की भी सराहना हो रही है।
दूसरी तरफ, अजय चंद्राकर ने कांकेर में विशेष ध्यान दिया था। यहां कांटे की टक्कर में भाजपा प्रत्याशी भोजराज नाग सीट निकालने में कामयाब रहे। अब देर सबेर मंत्रिमंडल का विस्तार होना है ऐसे में ये दोनों नेता अपने काम के बूते पर स्वाभाविक दावेदार नजर आ रहे हैं।
छत्तीसगढ़ से दो, एक, या एक भी नहीं ?
मोदी 3.0 सरकार के गठन को लेकर दिल्ली से रायपुर तक भाजपा खेमे में हलचल बढ़ गई है। प्रदेश के सभी सांसद दिल्ली पहुंच चुके हैं। कल सभी संसदीय दल के नेता नरेंद्र मोदी से लेकर सभी बड़े नेताओं को जयश्री राम बोल चुके हैं । कारण सभी जानते हैं, कैबिनेट में कुर्सी। हाईकमान के, मंत्री चयन का फार्मूला तय करने की खबर है। इसके मुताबिक छत्तीसगढ़ से दो को लाल बत्ती मिल सकती है। पार्टी ने 4 सांसदों पर एक मंत्री बनाने का फैसला किया है। यानी छत्तीसगढ़ को 10 मेें दो मंत्री बनाए जा सकते हैं। लेकिन पिछली सरकारों के नजरिए से एक भी हो सकते हैं । फिर पार्टी की प्राथमिकता गठबंधन दलों को खुश करने की भी है। इसलिए अपनों को नाराज करने से परहेज नहीं किया जाएगा। छत्तीसगढ़ से किसे लिया जाए, इस यक्ष प्रश्न को लेकर कई पैमाने गिनाए जा रहे हैं। पहला जाति समीकरण, दूसरा अनुभव, और तीसरा संगठन का रूख। बड़ी लीड और रिकार्ड सबसे आखिरी में। पहले तीन मापदंड पर तो दो ही नजर आ रहे हैं। इसमें से किसकी लॉटरी लगती है कल शाम ही पता चलेगा। वैसे सब कुछ वर्किंग स्टाइल ऑफ़ मोदी पर निर्भर है ।
शैलजा तो फिर भी जीत गई...
भाजपा में शामिल हुए पूर्व कांग्रेस के संगठन मंत्री चंद्रशेखर शुक्ला, पूर्व विधायक शिशुपाल शोरी, पूर्व विधायक प्रमोद शर्मा, पूर्व महापौर वाणी राव, महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रही अनीता रावटे, पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष तुलसी साहू, उषा पटेल, पूर्व प्रदेश ओबीसी कांग्रेस अध्यक्ष चौलेश्वर चंद्राकर, आलोक पांडे, अजय बंसल और बिलासपुर के जिला पंचायत अध्यक्ष अरुण सिंह चौहान ने सिरसा, हरियाणा जाकर कांग्रेस प्रत्याशी कुमारी शैलजा के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस ली। इसमें आरोप लगाया गया कि विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण में प्रदेश की प्रभारी महासचिव रहते हुए उन्होंने भाई-भतीजावाद अपनाया, पैसों के लिए योग्यता को किनारे किया तथा शराब और कोयला घोटाले को संरक्षण दिया। छत्तीसगढ़ से इन नेताओं को सिरसा भेजने की रणनीति काम नहीं आई और कुमारी शैलजा को 2 लाख 68 हजार 497 मतों के भारी अंतर से मतदाताओं ने जिता दिया। न केवल उनकी सीट बल्कि कुल 5 सीट भाजपा से कांग्रेस ने छीन ली। वह पिछली बार शून्य पर थी।
प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगाए जाने के बाद शैलजा ने अपने वकील के जरिये इन नेताओं को नोटिस भेजी और कहा कि दो दिन के भीतर वे सार्वजनिक रूप से माफी मांगे वरना लीगल एक्शन के लिए तैयार रहें। माफी किसी नेता ने नहीं मांगी, बल्कि भाजपा ने पूछा कि भूपेश बघेल ने अरुण सिसोदिया को भी ऐसी ही नोटिस दी थी, उसका क्या हुआ? माफीनामा नहीं मिलने के बाद कुमारी शैलजा ने इस मामले को आगे बढ़ाया या नहीं, इसकी कोई खबर फिलहाल नहीं है। मगर, दशकों तक कांग्रेस की सेवा करने के बाद भाजपा में जाते ही इन्होंने अनुशासित सिपाही की तरह सिरसा जाकर भाजपा के पक्ष में काम किया। अब लोग इंतजार कर रहे हैं कि कब संगठन और सत्ता में इन्हें कोई वजनदार ओहदा मिलेगा।
हार का श्रेय भी लिया जा सकता है...

राजनीति में दो और दो हमेशा चार नहीं होते। एक राय हो सकती है कि इस लोकसभा चुनाव में राजनांदगांव की सीट कांग्रेस के लिए बहुत मुश्किल नहीं थी। पांच साल तक भारी बहुमत से राज्य की सरकार चला चुके पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मैदान में थे और आठ में से 5 विधानसभा सीटों पर दिसंबर 23 के चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। मगर एक दूसरा आंकड़ा भी है। कांग्रेस की जीती हुई पांच सीटों पर कांग्रेस की भाजपा पर कुल बढ़त 80 हजार 457 थी। जबकि शेष तीन सीटों पर ही भाजपा की लीड 1 लाख 11 हजार 754 रही। इनमें राजनांदगांव से मिली 45 हजार से अधिक और कवर्धा से मिली 39 हजार से अधिक की लीड शामिल है। इस तरह से विधानसभा में सीटों की संख्या तो कांग्रेस के पास अधिक थी, मगर भाजपा की कुल बढ़त 30 हजार वोटों से अधिक थी। मोहला मानपुर की 31 हजार 900 की लीड लोकसभा में बढक़र 39 हजार से अधिक चली गई। मगर खुज्जी जैसी सीट पर 26 हजार की विधानसभा में जो लीड थी वह घटकर 15 हजार रह गई। राजनांदगांव में विधानसभा के मुकाबले बढ़त 45 हजार से बढक़र 52 हजार हो गई। पंडरिया विधानसभा सीट भाजपा के खाते में गई लेकिन यहां कांग्रेस को करीब 3400 की लीड मिल गई। डिप्टी सीएम विजय शर्मा की कवर्धा सीट पर भी विधानसभा के मुकाबले भाजपा की लीड 39 हजार से घट कर 10 हजार से कुछ अधिक रह गई। खुज्जी, पंडरिया और मोहला-मानपुर में मिली कांग्रेस को लीड मिली। पर राजनांदगांव और कुछ हद तक कवर्धा की लीड ने भाजपा की जीत निश्चित कर दी।
भाजपा के पक्ष में राजनांदगांव में बड़ी लीड से जीतने वाले डॉ. रमन सिंह और विजय शर्मा तो थे ही, मोदी को फिर से लाने का माहौल और साय सरकार की महतारी वंदन जैसी योजना का असर भी था। बघेल के खिलाफ कई बातें थीं। एक तो पिछली सरकार के प्रति नाराजगी का बना रहना, बाहरी होना, कवर्धा जैसे इलाकों में एजाज ढेबर और मोहम्मद अकबर की मतदाताओं को याद दिलाना।
इधर बघेल की हार से सबसे ज्यादा खुशी वहां के पूर्व कांग्रेस नेता सुरेंद्र दाऊ को हुई । ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, वे पोस्टर लगाकर खुद ही बता रहे हैं। उन्होंने राजनांदगांव में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचने पर बघेल को मंच से ही कई बातें सुना दी थी, जिसके बाद उन्हें कांग्रेस ने पार्टी से निकाल दिया था, फिर वे बघेल के प्रचार में खुलकर आ गए थे। जब उन्होंने धमकी मिलने की बात कही थी तो भाजपा सरकार ने उनकी सुरक्षा भी बढ़ा दी थी। ([email protected])
कोरबा ने क्लीन स्वीप से बचाया
छत्तीसगढ़ के दिसंबर 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को भाजपा ने अप्रत्याशित रूप से करारी शिकस्त दी थी। उस चुनाव में भूपेश मंत्रिमंडल के अधिकांश सदस्य चुनाव हार गए। तब के स्पीकर डॉ. चरण दास महंत ने न केवल अपनी सक्ती की सीट बचाई बल्कि आसपास की सारी सीटें भी कांग्रेस के पास आ गईं। लोकसभा चुनाव 2019 में भी ऐसा ही हुआ था। जब देश में मोदी लहर चरम पर थी, बस्तर के अलावा कोरबा सीट ही ऐसी सीट थी जहां कांग्रेस को जीत मिल पाई। इस बार 2024 में भाजपा ने 400 पार का नारा दिया तो लहर कुछ कम-ज्यादा 2019 की तरह ही उसके पक्ष में, कम से कम छत्तीसगढ़ में दिखाई दे रहा था। यहां भाजपा की कोशिश सभी 11 सीटें जीतने की थी। कोरबा में मतदान तीसरे चरण में हुआ। वोटिंग के कुछ दिन पहले ही महतारी वंदन योजना की दूसरी किश्त महिलाओं के खाते में पहुंच गई थी। 2019 में सांसद महंत पहली बार चुनी गईं, लेकिन इस बार तो मतदाता उनके परफार्मेंस को भी तौलने जा रहे थे। लोकसभा के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक था। कोरबा शहर से ही कद्दावर जयसिंह अग्रवाल की हार हो गई। मरवाही में राज्य बनने के बाद पहली बार भाजपा को जीत मिली। तानाखार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के पास है। कांग्रेस के कई पुराने कार्यकर्ता भाजपा में चले गए। इस तरह की तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच महंत दंपत्ति मैदान में उतरे। कई लोगों का कहना है कि कुछ लोगों का कांग्रेस छोडक़र जाना ठीक रहा, इसके चलते कई समर्पित कार्यकर्ताओं को आगे आने का मौका मिला। तानाखार और मरवाही के विधानसभा में फिसले वोट दोबारा कांग्रेस के पास आ गए। इधर भाजपा में स्थानीय स्तर टिकट वितरण को लेकर असंतोष था। भाजपा के प्रचार अभियान में यह दिखाई दे रहा था। इन सब ने नतीजा दिया और मध्यप्रदेश जैसी नौबत नहीं आई, जहां कांग्रेस 29 में से एक सीट के लिए तरस गई।
पत्नी की जीत से चरणदास महंत का भी राजनीतिक वजन बढ़ा है, और अब वे छत्तीसगढ़-एमपी में सबसे कामयाब कांग्रेस नेता हो गए हैं। ज्योत्सना महंत अविभाजित एमपी की 40 सीटों पर अकेली कांग्रेस सांसद हैं।
जाने-पहचाने पड़ोसी

पड़ोसी राज्य ओडिशा में कई ऐसे प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है, जिनका छत्तीसगढ़ से नाता रहा है। मसलन, प्रदेश भाजपा के प्रभारी रहे धर्मेन्द्र प्रधान संबलपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीतने में सफल रहे हैं। प्रदेश के कई नेताओं ने प्रधान के प्रचार के लिए संबलपुर में डेरा डाले हुए थे। इसी तरह राज्यपाल विश्वभूषण हरिचंदन के बेटे भाजपा नेता पृथ्वीराज हरिचंदन ने चिलिका विधानसभा सीट से बड़ी जीत दर्ज की है। पृथ्वीराज के प्रचार के लिए रायपुर उत्तर के विधायक पुरंदर मिश्रा लंबे समय तक चिलिका विधानसभा क्षेत्र में डटे रहे।
यही नहीं, छत्तीसगढ़ सरकार के हेलीकॉप्टर पायलट रहे कैप्टन डीएस मिश्रा ने ओडिशा की जूनागढ़ सीट से बीजू जनता दल की टिकट पर तीसरी बार जीत हासिल की है। मिश्रा नवीन-पटनायक सरकार में गृह और ऊर्जा मंत्री रह चुके हैं। इससे परे, छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिव रहे भक्त चरणदास खुद तो विधानसभा चुनाव हार गए, लेकिन उनके बेटे सागर चरणदास भवानी पटना सीट से चुनाव जीत गए। भक्त चरणदास ने अपने कार्यकाल में बस्तर इलाके में कांग्रेस को मजबूत किया था।
यहाँ की एक और प्रभारी
छत्तीसगढ़ भाजपा की प्रभारी डी पुरंदेश्वरी आंध्रप्रदेश की राजमहेन्द्री लोकसभा सीट से चुनाव जीत गई। डी पुरंदेश्वरी की जीत से यहां प्रदेश भाजपा में खुशी का माहौल है, और कई नेताओं ने उन्हें फोन कर जीत की बधाई दी।
डी पुरंदेश्वरी ने विधानसभा चुनाव में हार के बाद से प्रदेश भाजपा संगठन को संवारा, और उनकी कार्यशैली की प्रदेश भाजपा के नेता तारीफ करते नहीं थकते हैं। यही नहीं, वो ओडिशा भाजपा की प्रभारी भी थीं। जहां पार्टी सरकार बनाने में कामयाब रही है। डी पुरंदेश्वरी, आंध्र प्रदेश के बड़े नेता दिवंगत एनटी रामाराव की पुत्री हैं, और तेलगुदेशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू उनके जीजा हैं। डी पुरंदेश्वरी का केन्द्र में मंत्री बनना तय माना जा रहा है।
मैं फलाना के साला बोलथ हववं
चुनाव निपट गए, आचार संहिता हट गई। अब सरकारी कामकाज रफ्तार पकड़ेगा। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है तबादले। पहले आईएएस, आईपीएस, आईएफएस फिर राप्रसे, रापुसे रावसे के अधिकारियों की बारी आएगी। और फिर सरकार निगम चुनाव से पहले अन्य संवर्ग के तबादलों पर लगी रोक भी हटा सकती है। इसे देखते हुए लोग अपने बचाव का जुगाड़ करने लगे हैं। खासकर राजधानी और आसपास पोस्टेड लोग। ऐसे अधिकारी, कर्मचारी, प्रोफेसर अभी से नेताओं की रिश्तेदारी बताने लगे हैं। एक ऐसे ही प्रोफेसर और संचालनालय में पदस्थ को यदि आपने कॉल किया तो वे स्वयं प्रोफेसर कहना पसंद नहीं करते। वे कहते हैं कि हेलो मैं फलाने ... का सग साला बोल रहा हूं। और अपना नाम बाद बताते हैं । यह इसलिए कि विभाग के साहब लोग समझ जाए। सूची बनाते समय उनका नाम याद रखें। यही वजह है कि डेढ़ दशक पहले हुए एक बड़े घोटाले में आरोपित होने के बाद भी वे आज तक राजधानी में ही पदस्थ हैं। इसलिए कहा गया है कि सारी खुदाई......।
छत्तीसगढ़ को मंत्री मिलेंगे?
अगले दो-तीन दिन के भीतर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार केंद्र सरकार बनने जा रही है। सन् 2014 और 2019 में छत्तीसगढ़ में भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया था। तब उसने कांग्रेस को क्रमश: एक और दो सीट पर सिमटने के लिए मजबूर कर दिया। इस बार फिर 2014 की स्थिति बन गई है और 11 में 10 सीटों पर भाजपा है। दोनों ही बार छत्तीसगढ़ को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिला। सन् 2014 में विष्णुदेव साय को तो सन् 2019 में रेणुका सिंह के जरिये। पर इस बार परिस्थिति अलग है। भाजपा इस बार अकेले पूर्ण बहुमत में नहीं है। एनडीए के सहयोगी दल खासकर नीतिश कुमार और एन. चंद्राबाबू नायडू ज्यादा से ज्यादा मंत्री पद और महत्वपूर्ण विभाग हासिल करने की कोशिश में हैं। फिर एक दो सीट वाले सांसद हैं। जीतनराम मांझी अकेले चुने गए हैं, वे भी मंत्री पद मांग रहे हैं।
दूसरी तरफ भाजपा को आने वाले चुनावों में अपना प्रदर्शन सुधारना है। महाराष्ट्र में तो इसी साल विधानसभा चुनाव है, जहां भाजपा का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा। जनवरी 2025 में झारखंड में चुनाव है। यहां उसने लोकसभा 2019 में मिली 11 में से तीन सीट गंवा डाली है। अगले साल फरवरी में दिल्ली में चुनाव होना है, जहां सभी 7 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की। आम आदमी पार्टी का दिल्ली में खराब प्रदर्शन रहा। भाजपा अब दिल्ली विधानसभा में बहुमत तक पहुंचने की कोशिश करेगी। जनवरी 2026 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव है। लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने यहां भाजपा को तगड़ा झटका दिया। वह 18 से 12 पर आ गई। पार्टी की स्थिति को मजबूत करने के लिए जरूरी होगा कि इन राज्यों से केंद्रीय मंत्रिमंडल में ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व मिले। छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और अब ओडिशा ही ऐसे राज्य हैं, जहां 2027 या उसके बाद विधानसभा चुनाव होंगे। मगर, 21 सीटों वाली ओडिशा में पहली बार भाजपा को 20 सीटें मिली है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान व माधवराव सिंधिया जैसे नेताओं को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। वहां छिंदवाड़ा सहित सभी 29 सीटें भाजपा की झोली में आ गई हैं। छत्तीसगढ़ में भी विशाल अंतर से जीतने वाले बृजमोहन अग्रवाल और लगातार दूसरी बार सांसद बने विजय बघेल और संतोष पांडेय दावेदारी रखते हैं। छत्तीसगढ़ को पहले भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में, चाहे व कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, कम ही प्रतिनिधित्व मिला है। मोदी-शाह ने तो फॉर्मूला यह बनाया है कि चार सांसदों पर एक मंत्री पद दिया जाएगा। ऐसे में तो छत्तीसगढ़ से 2 या 3 मंत्री बनने चाहिए। मगर, ऐसा होगा?
यात्रियों पर कोयले की धूल

स्वच्छता पर जोर देने की बात करने वाली रेलवे ने इस ओर से आंखें मूंद रखी है कि प्लेटफॉर्म के नजदीक बनाई गई साइडिंग से कितना प्रदूषण होता है। बिलासपुर-रायपुर मार्ग के दाधापारा रेलवे स्टेशन में जिस पटरी पर लोकल गाडिय़ां रोकी जाती है, साइडिंग वहां से लगी हुई है। प्लेटफॉर्म कोयले से पटा हुआ है। लोकल गाडिय़ां कई बार एक्सप्रेस ट्रेनों और मालगाडिय़ों को रास्ता देने के लिए यहां देर-देर तक रोकी जाती है। साइडिंग की धूल लोडिंग-अनलोडिंग के दौरान यात्रियों तक भी पहुंचता है। एक यात्री ने इस तस्वीर के साथ रायपुर रेल मंडल के डीआरएम और अन्य अधिकारियों से की है। ([email protected])
वे ही नहीं चाहते थे
परसों ठाकरे परिसर में संगठन के बड़े नेता और भाई साहब लोग नतीजों पर नजर रखने बैठे थे। पल पल फ्लैश होते ब्रेकिंग खबरों से कभी उत्साहित तो कभी हल्की मायूसी। खासकर यूपी के आंकड़े परेशान कर रहे थे। हर ब्रेकिंग पर टिप्पणियों का भी होती रहीं। शाम 4 बजते ही जब पिक्चर क्लीयर हुई तो यूपी की विफलता के कारण बाहर आए। भाई साहबों ने कहा यूपी में 18 फीसदी ब्राह्मणों ने पार्टी का तिरस्कार किया। इनमें अखाड़े, मठ और शंकराचार्यों के समर्पित भक्त शामिल हैं।
एक भाई साहब ने कहा कि पहली नाराजगी तो अपूर्ण मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा और उद्घाटन को इन ब्राह्मणों ने अनुचित माना। पूजन के समय पहुंची एक ब्राह्मण दंपत्ति को शो पीस बनाकर रखना। यूपी की सभाओं में अजा, ओबीसी का पैर पूजना, पार्टी की ब्राह्मणों से दूरी। बिष्ठ ठाकुर से योगी बने आदित्यनाथ का ठाकुर प्रेम। यह सब देख 2014,19, से 24 तक 16 से 18 फीसदी हुए ब्राह्मणों ने हाथ उठा दिया। और रामलला की जन्मभूमि में भी 550 वर्ष के इंतजार का फायदा नहीं मिला। और इतना ही नहीं ठाकरे परिसर में एक भाई साहब ने कहा योगी जी ही नहीं चाहते थे।
नाराजगी नहीं नाखुशी का मामला..
कल भंग की गई लोकसभा के मंत्रिपरिषद् की आखिरी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि लोगों में सरकार नहीं, उम्मीदवार विशेष को लेकर नाराजगी थी। 1 लाख 64 हजार मतों के विशाल अंतर से जीतने वाले बिलासपुर संसदीय सीट के उम्मीदवार तोखन साहू के संदर्भ में मोदी की बात तौली जा सकती है। तोखन साहू लोरमी के रहने वाले हैं और यहीं से उपमुख्यमंत्री अरुण साव भी विधानसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं। यह वह जगह थी जहां से सबसे ज्यादा बढ़त भाजपा को मिल सकती थी। पर सिर्फ 464 मतों से तोखन साहू को बढ़त हासिल हुई, जो अन्य किसी भी विधानसभा में कांग्रेस भाजपा के बीच वोटों का सबसे कम अंतर है। अरुण साव कह सकते हैं कि डिप्टी सीएम होने के चलते वे अकेले लोरमी नहीं, पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर प्रचार करते रहे। मगर, तोखन साहू तो लोरमी के लिए जाने-पहचाने चेहरे हैं। वे 2013 में विधानसभा जीतकर संसदीय सचिव बने थे, 2018 में धर्मजीत सिंह ठाकुर से हार गए थे। लोरमी की जनता के पास एक उपमुख्यमंत्री पहले से था, फिर एक सांसद भी मिलने वाला था, फिर वोट तोखन साहू के पक्ष में खटाखट क्यों नहीं गिरे? इलाके में इसके दो तीन कारण बताए जा रहे हैं। एक पक्ष कह रहा है कि तोखन को लेकर कोई नाराजगी नहीं थी, बल्कि उनका और भाजपा का लोरमी के लिए बेफिक्र हो जाना बड़ा कारण था। फिर एक दूसरी बात यह थी कि ओबीसी यादव समाज के मतदाता बड़ी संख्या में लोरमी में हैं। उन्हें देवेंद्र यादव का साथ मिला। वे साहू-साहू वर्चस्व को लेकर आशंकित तथा नाखुश थे। तीसरी यह वजह आई कि तोखन साहू लोरमी के लिए नया चेहरा नहीं थे। बाकी विधानसभा सीटों के लिए वे नए थे। मोदी मैजिक और महतारी वंदन ने बाकी सीटों पर तो काम किया पर लोरमी में उनकी विधायकी के परफार्मेंस पर लोगों ने ध्यान दिया। शायद इसीलिये 2018 में हराया भी था। इन सबके बावजूद तोखन साहू की जीत 2019 में बिलासपुर सीट से मिली जीत से बड़ी है।
सीएम व उनकी टीम हुई मजबूत
भाजपा की प्रदेश की सत्ता में वापसी के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ विधायक मंत्रिपरिषद् में जगह पाने से वंचित रह गए। विष्णु देव साय मंत्रिमंडल के कई सहयोगी बिल्कुल नए हैं, पर कुछ अनुभवी भी हैं। मंत्रिपरिषद् में बृजमोहन अग्रवाल, केदार कश्यप, रामविचार नेताम और दयाल दास बघेल को पहले से मंत्री पद पर काम करने का मौका मिल चुका था। लखन लाल देवांगन संसदीय सचिव रह चुके थे। जबकि दोनों डिप्टी सीएम अरुण साव और विजय शर्मा पहली बार विधानसभा पहुंचे थे। मंत्री ओपी चौधरी, लक्ष्मी राजवाड़े और टंकराम वर्मा भी पहली बार विधानसभा पहुंचे और मंत्री बनाए गए। टिकट बंटवारे में जब वरिष्ठ दावेदारों को मौका तो दिया गया था लेकिन मंत्रिमंडल में उन्हें नहीं लिया गया। इनमें अजय चंद्राकर, अमर अग्रवाल, धरम लाल कौशिक, रेणुका सिंह, राजेश मूणत आदि शामिल हैं। जब बृजमोहन अग्रवाल को लोकसभा की टिकट दे दी गई, तब यह लगभग यह तय हो गया कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व नई टीम के जरिये पार्टी को आगे ले जाना चाहती थी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 400 पार के नारे के साथ प्रदेश की सभी 11 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा और नारा दिया। इनमें से 10 सीटें आ ही गईं। यह 2019 से अच्छी स्थिति है जब केंद्र में भाजपा ने 2014 से बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन छत्तीसगढ़ से दो सीटें कांग्रेस के पास चली गई थी। इस बार जब केंद्र में भाजपा के लिए एक-एक सीट कीमती है तब 10 सीटों पर जीत काफी महत्व रखता है। नतीजों के बाद महाराष्ट्र में उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस ने अपने इस्तीफे की पेशकश की है। राजस्थान में भी भाजपा ने सीटें गंवाई। वहां पहली बार के विधायक मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा का भविष्य दांव पर लगा है। एक मंत्री ने वहां भी इस्तीफे की पेशकश कर दी है। सबसे अप्रत्याशित नतीजा उत्तरप्रदेश का रहा, जहां योगी आदित्यनाथ की कुर्सी पर संकट मंडरा रहा है। फडऩवीस की पेशकश ने उन पर दबाव बढ़ा दिया है। ऐसी चर्चा है कि सीएम योगी भी इस्तीफे की पेशकश कर सकते हैं। मगर, छत्तीसगढ़ में परिणाम अपेक्षा के अनुरूप आने के कारण मुख्यमंत्री और उनका मंत्रिमंडल नई टीम के साथ मजबूत दिखाई दे रहा है। उनके सिर्फ एक मंत्री लखन लाल देवांगन के क्षेत्र में कांग्रेस की हार हुई।
बारिश से पहले घोंसले की तैयारी

मानसून आने के पहले ये कैटल इग्रेट आपको पेड़ों पर घोंसला बनाते हुए दिखाई दे सकते हैं। यह बगुला परिवार का पक्षी है, जो कॉलोनियों में खुली जगह देखकर अपना बसेरा बनाते हैं। बगुले की दूसरी प्रजातियों से अलग ये सूखी जगहों पर रहना ज्यादा पसंद करते हैं। यह तस्वीर बिलासपुर के वन्यजीव प्रेमी प्राण चड्ढा ने ली है। ([email protected])
दहशत में सत्ता
छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के छह महीने बाद लोकसभा के चुनाव होते हैं, और उसके छह महीने बाद पंचायत और म्युनिसिपलों के। नतीजा यह होता है कि विधानसभा चुनाव के पहले जिसकी सरकार रहती है वे आखिरी छह महीने जनता पर किसी भी तरह की जनकल्याण की कड़ाई बरतना भी बंद कर देते हैं। शहरी अराजकता पर कोई कार्रवाई नहीं होती क्योंकि अवैध कब्जा, अवैध निर्माण करने वाले वोटर नाराज न हो जाएं। सरकारें एक किस्म से लकवाग्रस्त सी हो जाती हैं। यह राज्य उन राज्यों में से है जहां ये तीनों चुनाव छह-छह महीने के फासले पर होते हैं, नतीजा यह होता है कि पहले चुनाव के छह महीने पहले से आखिरी चुनाव के छह महीने बाद तक राजनीतिक दल दिल कड़ा नहीं कर पाते, और लोग इस पूरे दौर में मनमानी कर लेते हैं।
दरअसल शहरी जिंदगी में जब कोई व्यक्ति सडक़ किनारे अवैध कब्जा करने से लेकर कोई अवैध निर्माण करने तक, जो भी गलत काम करते हैं, उससे बाकी नियम-पसंद जनता के हक भी कुचले जाते हैं। और अवैध कब्जों, अवैध निर्माणों की नीयत संक्रामक रोग की तरह एक से दूसरे में फैलती है, और लोगों को गलत काम न करने पर अपना हक कुचला जाना महसूस होता है।
डरे-सहमे राजनीतिक दलों को यह समझ नहीं पड़ता कि 90 फीसदी जनता तो इतनी कमजोर रहती हैं कि वह अपने दायरे तक सीमित रहती है, और अपनी चादर से बाहर पैर नहीं निकालती। जो 10 फीसदी जनता अराजकता करती है, उस पर अगर कड़ी कार्रवाई हो, तो उसका सत्तारूढ़ पार्टी को फायदे के सिवाय कुछ नहीं होता। लेकिन ऐसी सहज बुद्धि भी सत्तारूढ़ लोगों से दूर चली जाती है। कड़ाई से किसी शहर को सुधारकर वहां के मतदाताओं के सबसे बड़े तबकों का समर्थन कितना पाया जा सकता है, इसका अंदाज भी सत्तारूढ़ लोगों को नहीं रह जाता। नतीजा यह है कि ट्रैफिक के चालान होने पर भी सत्ता हड़बड़ाकर अपने अफसरों पर लगाम कसने लगती हैं।
जीत यूपी बिहार में, जश्न रायपुर में
है न मजेदार। हालांकि पार्टियां देश भर में जीत का जश्न मनाती ही हैं। लेकिन कोई व्यक्तिगत जीत पर पटाखे फोड़े, मिठाई बांटे तो बात मजेदार ही होगी। बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय पप्पू यादव चुनाव जीत गए। वे निर्दलीय लड़े और कांग्रेस ने उनके समर्थन में अपना प्रत्याशी नहीं उतार था। उसके लिए पूर्णिया फ्रेंडली कंटेस्ट की सीट रही। और सफलता भी मिली। दरअसल पप्पू, छत्तीसगढ़ से राज्य सभा सांसद रंजीत रंजन के पति हैं। तो पूर्णिया वाले बहनोई की जीत छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों के लिए खास होनी ही थी। तो सालों ने दीदी को बधाई के साथ साथ आतिशबाजी, मिठाई वितरण के फोटो सेंड करने के साथ वीडियो कॉल भी दिखाए।
इसी तरह दोनों पूर्व प्रभारियों के लिए भी नतीजे उल्लास वाले रहे। सिरसा से कु.सैलजा पौन लाख के अंतर से जीतीं। उनके लिए आरोपों के कांटे बिछाने छत्तीसगढ़ से पूर्व कांग्रेसी भेजे थे भाजपा ने। वो जीत गईं और अब इन्हें मानहानि का केस झेलना पड़ेगा। और बाराबंकी से अंतत: पीएल पुनिया के पुत्र तनुज पुनिया लोकसभा पहुंचने में सफल रहे। तनुज ने हार के तीन स्वाद चखे थे लेकिन डटे रहे। पहले विस उप चुनाव,फिर विस आम चुनाव, फिर 19 लोकसभा और अब जाकर जीत मिली। इनके हर चुनाव में छत्तीसगढ़ के कांग्रेसयों ने तन और धन से काम किया था। पिता प्रभारी जो रहे।
नतीजों से क्या-क्या निकला?
इस लोकसभा चुनाव में कई नतीजे दिलचस्प रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बार करीब एक लाख 52 हजार मतों से जीत मिली। अपने आप में यह जीत छोटी नहीं है, मगर 2019 में जीत का अंतर 4 लाख 79505 वोटों का था और उसके पहले 2014 में 3 लाथ 71 हजार 784 वोटों से जीत मिली थी। दोनों बार उनकी जीत को भाजपा ने रिकॉर्ड बताया था। इस बार मोदी से अधिक अंतर की जीत वाले छत्तीसगढ़ में ही कई प्रत्याशी हैं। इस लोकसभा सीट से मोदी के खिलाफ लडऩे की मंशा रखने वाले 33 लोगों के नामांकन निरस्त कर दिए गए थे। कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी को छोड़ जो दूसरे उम्मीदवार थे, उनको नोटा से भी कम वोट मिले। नोटा पर 8478 लोगों ने मतदान किया।
राम मंदिर निर्माण के जिस मुद्दे को भाजपा ने पूरे लोकसभा चुनाव के दौरान भुनाया, वहां की लोकसभा सीट फैजाबाद से समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद को जीत मिली।
इंदौर में कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय कांति बम ने अपना पर्चा वापस ले लिया। इसके बाद भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी के लिए वाक ओवर की स्थिति थी। ऐसा हुआ भी। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार को 11 लाख 75 हजार 92 मतों से हराया। मगर दिलचस्प यह है कि नोटा को यहां से 2 लाख 18 हजार 674 वोट मिले, जबकि निकटतम प्रतिद्वंदी बसपा उम्मीदवार को 51हजार 659 मत ही मिले। कांग्रेस ने यहां नोटा के लिए प्रचार किया था जिसकी शिकायत चुनाव आयोग से भी भाजपा ने की थी।
छत्तीसगढ़ की कोरबा सीट और उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट में एक बात समान है। दोनों राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धुआंधार प्रचार किया। पर इन दोनों सीटों पर नहीं गए। कोरबा के करीब उन्होंने जांजगीर में सभा ली थी। दोनों ही जगह पर भाजपा के प्रत्याशियों को पराजय का सामना करना पड़ा।
रायपुर से बृजमोहन अग्रवाल की टिकट फाइनल होते ही यह चर्चा नहीं थी कि वे जीतेंगे या हारेंगे। चर्चा यह थी कि उनकी लीड कितनी होगी। 5 लाख 75 हजार 285 वोटों के अंतर से जीतकर उन्होंने इतिहास रच दिया। सन् 2019 में सुनील सोनी ने 3 लाख 48 हजार 238 मतों से जीत हासिल की थी। दिसंबर 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में भी अग्रवाल ने जीत का रिकॉर्ड बनाया था। तब वे 67 हजार से अधिक मतों के अंतर से जीते। कांग्रेस प्रत्याशी महंत रामसुंदर दास को इस पर पराजय ने इतना दुखी किया कि उन्होंने राजनीति से संन्यास लेने की ही घोषणा कर दी। विकास उपाध्याय युवा हैं, निश्चित ही वे इस भारी पराजय को बर्दाश्त कर लेंगे और अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखेंगे।
बाहरी को नकारा मतदाताओं ने
इस लोकसभा चुनाव में चार उम्मीदवारों पर बाहरी होने का तमगा लगा। भूपेश बघेल, ताम्रध्वज साहू, सरोज पांडे और देवेंद्र यादव। संयोगवश सभी दुर्ग जिले से ही बाहर जाकर चुनाव लड़े। इनमें से किसी को जीत नहीं मिली। पहले से ही यह चर्चा थी कि अगर कोई एक सीट कांग्रेस के पास आएगी तो वह कोरबा ही होगी। इसके बावजूद कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने दमदारी से चुनाव लड़ा और उसे 48 हजार से अधिक वोट मिले। कांग्रेस की ज्योत्सना महंत ने पिछली बार से अधिक मतों से जीत दर्ज की।

वहां गैंडे बढ़ रहे, यहां घट रहे तेंदुए
असम के अभयारण्यों को गैंडों से अलग पहचान मिलती है। विशाल काया किंतु सौम्य इस वन्य जीव का एक दशक के भीतर इतना अवैध शिकार हुआ कि इनकी संख्या दहाई में आ गई थी। मगर पिछले तीन सालों से वन विभाग ने पुलिस और सशस्त्र बलों की मदद लेकर शिकार को शून्य कर दिया है। हाल ही में गिनती की गई तो उनकी संख्या 2 हजार 885 पाई गई। सबसे अधिक गैंडे करीब 26 सौ काजीरंगा नेशनल पार्क में हैं। छत्तीसगढ़ में टाइगर की संख्या जरूर कम है लेकिन बड़ी संख्या में तेंदुए मौजूद हैं। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्य जीव संस्थान की एक रिपोर्ट पिछले फरवरी महीने में आई थी। इसमें बताया गया था कि छत्तीसगढ़ में तेंदुओं की संख्या 722 है जबकि 2018 में 852 थी। इस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि तेंदुओं की संख्या में गिरावट का प्रमुख कारण इनका अवैध शिकार होना है। रिपोर्ट आने के बाद वन विभाग में तेंदुओं को शिकारियों से बचाने के लिए क्या कदम उठाए, इसकी कोई जानकारी नहीं है। शिकार के मामले जरूर लगातार आ रहे हैं। (([email protected]))
राहुल पर बदले विचार
बात विधानसभा चुनाव की है। यूपी के एक ब्राम्हण नेता छत्तीसगढ़ में कांग्रेस संगठन को सहयोग करने आए थे। नेताजी यहां अपने कुछ करीबियों से चर्चा में राहुल गांधी की कार्यशैली की आलोचना करते नहीं थक रहे थे। वो यह तक कह गए, कि राहुल के रहते उनका कांग्रेस में लंबे समय तक रह पाना संभव नहीं है।
हालांकि पार्टी ब्राम्हण नेता को काफी महत्व देती रही है। उन्हें और उनके परिवार के सदस्य को क्रमश: संसद और विधानसभा में भी पहुंचाया। मगर लोकसभा चुनाव नतीजों में जैसे ही कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर होता दिखा, ब्राम्हण नेता के सुर बदल गए। वो सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। एआईसीसी मुख्यालय के बाहर टीवी बाइट मेंं वे कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के लिए राहुल की मेहनत को काफी सराह रहे थे। इस पर टीवी पर नजर गड़ाए छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेता, ब्राम्हण नेता के बदले सुर पर मुस्कुराए बिना नहीं रह पाए।
नतीजे और रेलवे
मंगलवार को नतीजों के राउंड जैसे जैसे आगे बढ़ते रहे,वैसे वैसे प्रशासन खासकर केंद्रीय विभाग भी ट्रेडं बदलते रहे। स्थानीय स्तर पर एक ही दिन पहले लिए गए कुछ फैसलों को लेकर बैक फुट पर आने लगे। जैसे चक्रधरपुर रेल मंडल ने 4-5 जून को कांसबहाल राजगंगपुर सेक्शन में गर्डर लांचिंग के लिए ब्लॉक लेकर कुछ ट्रेनों को रद्द किया था।
और आज चार राउंड के बाद सभी ट्रेने बहाल कर दी गई। रेलवे ने ब्लॉक कार्य को ही रद्द कर दिया गया। इस कार्य के कारण रद्द की गई और प्रभावित होने वाली सभी गाडिय़ों को रिस्टोर कर दिया गया है। सभी गाडिय़ां अपने निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार चलेगी। यहां आपको बता दें कि चक्रधरपुर रेल मंडल बंगाल का हिस्सा है। जहां टीएमसी, ममता दीदी को भारी फायदा मिल रहा है।
जहां बाजार, वहां सेवाएं...

उड़ान- उड़े देश का आम नागरिक। इस योजना में छत्तीसगढ़ को शामिल कर लेने के बावजूद हवाई सुविधाओं का विस्तार तब किया गया जब नागरिकों ने आंदोलन किया। मगर, जगदलपुर से रायपुर, हैदराबाद और विशाखापट्टनम की सेवाएं अनियमित रूप से चल रही हैं। बिलासपुर से दिल्ली, प्रयागराज, जबलपुर और कोलकाता के लिए उड़ानें शुरू की गई हैं, पर वह भी रेगुलर नहीं है। दूसरे बड़े शहरों के लिए भी मांग लगातार की जा रही है, पूरी नहीं हो रही है। अंबिकापुर में करीब 6 माह पहले से हवाईअड्डे का उड़ानों के लिए परीक्षण हो चुका है, पर यहां से कोई भी फ्लाइट अब तक शुरू नहीं हो पाई है। बिलासपुर का छोटे रनवे की लंबाई बढ़ाने तथा नाइट लैंडिंग की सुविधाएं शुरू करने के लिए तीन साल से अधिक समय से नागरिकों का धरना चल रहा है।
हाईकोर्ट में भी लगी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। दूसरी ओर बड़े शहरों के बीच एयरटैक्सी सुविधा देने पर केंद्र का उड्डयन मंत्रालय काम कर रहा है। कहा जा रहा है कि 2026 तक दिल्ली-गुडग़ांव के बीच ये सेवा शुरू कर दी जाएगी। बाद में बेंगलूरु, चेन्नई, हैदराबाद आदि शहरों को भी इसमें शामिल किया जाएगा। सफर सिर्फ 7 से 12 मिनट में पूरा हो जाएगा और किराया ओला, उबर टैक्सियों से डेढ़ या दोगुना होगा। यह कुछ-कुछ वंदेभारत ट्रेनों जैसा है। आम यात्रियों के लिए उनके बजट के भीतर जो ट्रेन और फ्लाइट मिल रही है उनके रेगुलर होने और समय पर पहुंचाने की गारंटी नहीं है। पर यदि आप यदि खर्च ज्यादा करने की स्थिति में हैं तो सुविधाएं मौजूद हैं।
शिक्षा विभाग में हलचल तेज
अब जबकि प्रदेश के शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का विधानसभा से इस्तीफा देकर लोकसभा जाना निश्चित हो चुका है, शिक्षा विभाग में हलचल तेज हो गई है। पिछली सरकार के समय पोस्टिंग, ट्रांसफर और अनुकंपा नियुक्ति में बड़ी-बड़ी गड़बडिय़ां हुई थीं। कांग्रेस को जब मंत्रिमंडल में बदलाव की जरूरत महसूस हुई तो स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय टेकाम की ही कुर्सी सरकाई गई थी। उनका विभाग संभालने वाले मंत्री रविंद्र चौबे ने पोस्टिंग घोटाले में शामिल अफसरों को सस्पेंड तो किया लेकिन ज्यादातर लोग अपनी जगह पर वापस लौट चुके हैं। इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का ऐलान भी चौबे ने किया था लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों की लॉबी ज्यादा ताकतवर निकली और एफआईआर नहीं हो पाई।
शिक्षा विभाग खाली हो जाने के बाद उसका प्रभार किसी मंत्री को दिया जाएगा या फिर कतार में लगे किसी भाजपा विधायक को मौका मिलेगा, अभी यह तय नहीं है। इसका इंतजार जितनी बेसब्री से मंत्री पद से वंचित रह गए दावेदारों को तो होगा, पर ट्रांसफर पोस्टिंग का कारोबार चलाने वाली लॉबी को भी कम इंतजार नहीं है। जून का महीना वैसे भी शिक्षा विभाग में फेरबदल का ही होता है। ([email protected])
मुन्नी बदनाम होगी
आम चुनाव के नतीजों से पहले ही सोशल मीडिया पर काफी कुछ कहा जा रहा है। बिलासपुर के कांग्रेस प्रत्याशी देवेन्द्र यादव ने तो मतगणना से पहले ही ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगा दिया है। हालांकि चुनाव आयोग ने देवेन्द्र के आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
इन सबके बीच सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के निज सचिव मनोज शुक्ला के फेसबुक पोस्ट की खूब चर्चा हो रही है। मनोज ने ईवीएम की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि मुन्नी बदनाम होगी 4 जून को दोपहर से। बदनामी सहने के लिए तैयार हो जा पगली, सारा इल्जाम तुझ पर ही आने वाला है।
रिटायर्ड का नफा-नुकसान
चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा-कांग्रेस के पांच सांसद भूतपूूर्व हो जाएंगे। इनमें सुनील सोनी, चुन्नीलाल साहू, गुहाराम अजगल्ले, मोहन मंडावी, और कांग्रेस सांसद दीपक बैज हैं। इनमें गुहाराम को छोडक़र बाकी सब पहली बार सांसद बने थे। जबकि गुहाराम दूसरी बार के सांसद हैं।
दिलचस्प बात यह है कि भूतपूर्व सांसदों का पेंशन, पूर्व विधायकों की तुलना में काफी कम है। पूर्व सांसदों को 25 हजार रूपए मासिक पेंशन और सुविधाओं के नाम पर यात्रा भत्ता भी मिलता है। जबकि छत्तीसगढ़ के पहली बार के पूर्व विधायकों को करीब 94 हजार रूपए पेंशन के साथ-साथ यात्रा भत्ता मिलता है। भूतपूर्व विधायकों को सीनियरटी के हिसाब से पेंशन बढ़ता है। इन सब मामले में दीपक बैज थोड़े फायदे में रहेंगे। उन्हें विधायक के साथ-साथ पूर्व सांसद का भी पेंशन मिलेगा।
जनता का राजा..

हम जिन्हें लोकसभा विधानसभा में चुनकर भेजते हैं वे हमारे सेवक कहे जाते हैं। पर व्यवहार में ऐसा नहीं होता। कई बार विधायक,सांसद और जनता के बीच रिश्ता राजा और प्रजा जैसा लगता है। राजस्थान के मंत्री किरोड़ी लाल मीणा टेबल पर पैर ताने हुए अपने क्षेत्र के लोगों से अपने दरबार में मिल रहे हैं। जनता जमीन पर बैठी है। एक जो नहीं खड़ा है, वह किसी बात पर हाथ जोड़ गिड़गिड़ा रहा है।
बस्तर से फिर पलायन..
बस्तर में नक्सल उन्मूलन की कार्रवाई तेज होने के बाद एक दूसरी खबर यह भी निकल रही है कि यहां के आदिवासियों का कुछ महीनों के भीतर यहाँ से छोडक़र बाहर जाना हो रहा है। जनवरी से यह सिलसिला चल रहा है। अब तक कोई ठीक आंकड़ा नहीं लेकिन कहा जा रहा है कि इनकी संख्या 4 हजार या उससे अधिक हो सकती है। जनवरी में जो गए वे रोजगार की तलाश में थे। बस्तर में मनरेगा के तहत काम तो मिल रहे हैं, मगर भुगतान समय पर नहीं हो रहा है। नगद भी नहीं मिलता। पर अब जो जा रहे हैं, उसके पीछे नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव से उपजा भय कहा जा रहा है। वैसे, सलवा जुड़ूम के बाद से ही बस्तर से जाने का सिलसिला कम, ज्यादा चल रहा है। अकेले तेलंगाना में ही एक अनुमान के मुताबिक 50 हजार लोगों ने अपना नया बसेरा बना लिया है। तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश भी लोग जा रहे हैं। पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान तत्कालीन विधायक लखेश्वर बघेल ने विधानसभा में यह मामला उठाया था, तब गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने सदन में बताया था कि उनके पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है। इस जवाब पर बघेल ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर ऐतराज भी जताया था। अभी भी जा रहे लोगों पर श्रम विभाग कोई आंकड़ा तैयार कर रहा होगा, ऐसा नहीं लगता।
आकाशीय बिजली से बचिये..

नवतपा गुजर चुका। छत्तीसगढ़ में लू लगने से 10 से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। ज्यादातर लोग श्रमिक थे, जिन्हें हर मौसम में काम के लिए निकलना पड़ता है। नवतपा के आखिरी दिन कहीं-कहीं बारिश भी हुई और ओले भी गिरे। तापमान में थोड़ा उतार दिखाई दे रहा है। केरल में मानसून प्रवेश कर चुका है, जिसके छत्तीसगढ़ आने में आठ दस दिन लग सकते हैं। बारिश के दिनों में भी वज्रपात से मौतें होती हैं, मवेशी भी मारे जाते हैं। इस स्थिति से बचाव में दामिनी ऐप मददगार है। पिछले साल यह ऐप लांच हो चुका है। उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान से जुड़े पुणे के वैज्ञानिकों ने मिलकर इसे बनाया है। यह ऐप समय रहते आपको मैसेज भेजकर बता देगा कि 40 किलोमीटर के दायरे में आज क्या कहीं बिजली गिरने वाली है। पंचायत, थाना, स्कूल और आम लोगों के मोबाइल फोन पर यदि यह ऐप हो तो आकाशीय बिजली गिरने से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने में मदद मिल सकती है। ([email protected])


