राजपथ - जनपथ
दिवाली गिफ्ट
छत्तीसगढ़ में इस साल दिवाली के साथ-साथ लोकतंत्र का महापर्व यानी विधानसभा चुनाव की भी धूम है। ऐसे में पत्रकारों की दिवाली पर चर्चा छिड़ी। कुछ का कहना है कि चुनाव आचार संहिता के कारण दिवाली गिफ्ट पर असर पड़ेगा। इस पर दूसरे का कहना था कि चुनाव आयोग एक-एक गिफ्ट तो नजऱ रखेगी नहीं और नजऱ रखती भी है तो किसी कारोबारी की गाड़ी से गिफ्ट भिजवाया जा सकता है और गिफ्ट देते समय नेताओं के कार्ड लगाए जा सकते है। अब नेताओं को समझ लेना चाहिए कि आचार संहिता का बहाना काम नहीं आएगा।
दिवाली गिफ्ट टू
छत्तीसगढ़ में दो चरणों में चुनाव हो रहे हैं। पहले चरण के लिए वोटिंग दिवाली से पहले और दूसरे चरण के लिए वोटिंग दिवाली के बाद होगी। ऐसे में पहले चरण के मतदान के बाद लोगों को दिवाली में गिफ्ट की उम्मीद हो सकती है, लेकिन दूसरे चरण की सीट में मतदान होने के बाद कोई उम्मीद नहीं होगी।
कहीं टेंशन कहीं राहत
विधानसभा के पहले चरण की सीटों के लिए नामांकन खत्म होने के बाद कांग्रेस ने जहां राहत की सांस ली है, तो दूसरी तरफ भाजपा की उम्मीदों को झटका लगा है। कांग्रेस के लिए संतोषजनक बात यह रही कि अंतागढ़ से अनूप नाग को छोडकऱ कोई और बड़ा नेता बागी नहीं हुआ। जबकि भाजपा के रणनीतिकारों को कांग्रेस में बगावत से फायदे की उम्मीद दिख रही थी।
कांग्रेस ने पहले चरण की 20 सीटों के लिए उम्मीदवार घोषित किए, तो कई जगह असंतोष दिख रहा था। चार मौजूदा विधायक अनूप नाग, शिशुपाल सोरी, भुनेश्वर बघेल, और छन्नी साहू को टिकट नहीं दी। इससे वो खासे नाराज थे। मगर अनूप नाग को छोडकऱ बाकी तीनों खामोश हो गए। पार्टी उन्हें मनाने में कामयाब रही।
चर्चा है कि जिन विधायकों की टिकट कटी थी, उन्हें चुनाव लडऩे के लिए जोगी पार्टी, आम आदमी पार्टी और हमर राज पार्टी से ऑफर था। इन पार्टियों के नेताओं ने टिकट से वंचित विधायकों से संपर्क भी साधा था लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ करने से मना कर दिया। विधायकों को मनाने में सीएम भूपेश बघेल, और डिप्टी सीएम टी.एस.सिंहदेव की भूमिका रही।
बताते हैं कि सिंहदेव ने छन्नी साहू के लिए हाईकमान से बात की थी। उनके नाम पर पुनर्विचार भी हुआ, लेकिन वो छन्नी को टिकट नहीं दिलवा पाए। अलबत्ता, उन्हें बागी होने से रोकने में कामयाब रहे। अनूप नाग को बागी होने से रोकने की कोशिश की गई, लेकिन वो नहीं माने। फिर भी कांग्रेस के नेता इस बात संतुष्ट हैं कि पार्टी में और कोई बागी नहीं हुआ।
भाजपा के रणनीतिकार मान रहे थे कि कांग्रेस में कई बड़े नेता बागी होंगे, और इसका उन्हें फायदा मिलेगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हो पाया। इससे पहले चरण की लड़ाई भाजपा के लिए कठिन हो गई है।
उत्तर सीट का आसार
रायपुर उत्तर की सीट पर कांग्रेस में पेंच फंसा हुआ है। चर्चा है कि पार्टी के तीन प्रमुख नेता सीएम भूपेश बघेल, टी.एस.सिंहदेव, और डॉ.चरणदास महंत व दीपक बैज की राय मौजूदा विधायक कुलदीप जुनेजा और चिकित्सक डॉ. राकेश गुप्ता पर बंटी हुई है। कहा जा रहा है कि चारों से परे प्रदेश प्रभारी सैलजा ने पार्षद अजीत कुकरेजा का नाम आगे बढ़ाया है।
चर्चा है कि कुकरेजा के लिए दिल्ली के कुछ बड़े नेताओं का भी काफी दबाव है। इन सबके बीच सीएम ने शुक्रवार को अजीत को बुलाकर चुनाव को लेकर उनकी तैयारियों के बारे में पूछताछ की है। माना जा रहा है कि दो बार के विधायक जुनेजा और स्थानीय प्रमुख नेताओं के कड़े विरोध के बाद भी कुकरेजा का नाम फाइनल किया जा सकता है। देखना है आगे क्या होता है, लेकिन लोग हैरान हैं कि राकेश गुप्ता जैसे भले उम्मीदवार के रहते हुए...
रक़म नहीं तो निर्दलीय नहीं
चुनाव आयोग की सख्ती से भाजपा के लोग काफी परेशान हैं। चर्चा है कि आयोग के डर से प्रत्याशियों तक फंड नहीं पहुंच पा रहे हैं, और जिन्हें जिम्मेदारी दी जा रही है वो आनाकानी कर रहे हैं। अब तक दो करोड़ से अधिक राशि जब्त हो चुकी है। सीमाओं पर पुलिस का तगड़े पहरा है।
चर्चा तो यह भी है कि पार्टी के कुछ लोगों ने कई दूसरी पार्टी, और निर्दलियों को मदद का भरोसा दिलाया था। मगर उन तक मदद नहीं पहुंच पाई। हल्ला है कि कुछ ने तो नाम वापस लेने की धमकी तक दे दी है। देखना है आगे क्या होता है।
नाराजग़ी की वजह
बात गुरूवार की है। राजधानी के दो भाजपा नेताओं को एक दमदार समाज के कार्यक्रम से उल्टे पैर लौटना पड़ा। इनमें से एक नेता तो चुनाव मैदान में हैं। ये दोनों परसों देवेंद्र नगर के भवन गए थे। वहां समाज के लोग पंजड़ी,छकड़ी खेल रहे थे। दोनों दस्तूर, मौका समझ कर भवन गए। वैसे यह समाज, पार्टी का बड़ा वोट बैंक है। इसी आशा विश्वास से लबरेज थे नेता ।लेकिन यह पता नहीं था कि वापस लौटना होगा। पंडाल पहुंचे तो पहले किसी ने स्वागत वागत नहीं किया। दो चार लोगों की नजर पड़ी तो उन तक पहुंचे और शेक हैंड किया। जब बड़े नेता ने छोटे का परिचय कराया तो समाज के मुखिया ने राजनीतिक चर्चा से रोका । जनसंपर्क भी नहीं करने दिया। वे सभी नाराज थे। कारण पार्टी ने उनके समाज के नेता को इस बार टिकट नहीं दी। और वे इसी इलाके के रहे हैं। पहले तो उनकी टिकट कटने को लेकर नाराजगी जताई और कहा गया कि पहले पटेल जी को लेकर आएं। बताया जा रहा है कि माइक में भी एनाउंस किया गया ।दरअसल एक नेताजी आठ विधानसभा सीटों के संयुक्त नेता हैं। समाज का रूख देखकर लौटना ही बेहतर समझा गया।
हाथियों को भगाने वाली मशीन

हाथियों से जान-माल की हानि से परेशान किसानों को एक समाधान इंटरनेट पर ऑनलाइन सर्च करने पर मिला है। एक मशीन देश के कई हिस्सों में किसान इस्तेमाल कर रहे हैं, जो न केवल हाथी बल्कि सुअर, कुत्ते तथा दूसरे जानवरों से बचाने में काम आ रहा है। कटघोरा वनमंडल में सितंबर से लेकर अब तक पांच लोगों की हाथियों के हमले से जान जा चुकी है। यहां एक किसान ने बैटरी और सोलर पावर से चलने वाले इस मशीन को ऑनलाइन ऑर्डर कर मंगाया। यह 12 वोल्ट का करंट प्रवाहित करता है जिसे घर या खेत के बाड़ से जोड़ दिया जाता है। इसके संपर्क में आने वाले जानवरों को झटका तो लगता है लेकिन इससे कोई नुकसान नहीं होता। मशीन की कीमत 15 हजार से 20 हजार रुपये के बीच है। इस मशीन का प्रयोग वैसे तो किसानों को खुद के लिए लाभदायक महसूस हो रहा है लेकिन हाथियों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक विचरण में बाधक तो नहीं है, इस पर वन विभाग के अधिकारियों ने विचार नहीं किया है। विभाग ने 40 मशीनों का ऑर्डर खुद भी दे दिया है।
पहाड़ी कोरवा वोट नहीं डालेंगे

आदिवासी वर्ग के हितों की बात करने में कोई दल पीछे नहीं रहता, पर जमीनी हकीकत की पोल ऐसे बैनर-पोस्टर खोल देते हैं। कोरबा जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर रामपुर विधानसभा क्षेत्र के केरा कछार ग्राम पंचायत में रहने वाले अधिकांश लोग पहाड़ी कोरवा समुदाय से हैं, जिन्हें राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र भी कहा जाता है। गांव के लोगों को बिजली नसीब नहीं है। खुद खोदे हुए गड्ढे का पानी साफ करके पीना पड़ता है क्योंकि नलकूप नहीं है। मुख्य मार्ग तक पहुंचने का रास्ता जर्जर है। बारिश में पगडंडियों से होकर मुख्य मार्ग तक पहुंच पाते हैं। जनप्रतिनिधियों और सरकार पर इनका भरोसा नहीं रहा। इसलिये गांव की सरहद पर उन्होंने नेताओं को आगाह कर दिया है कि वे प्रचार के लिए नहीं आएं, उन्होंने चुनाव बहिष्कार का फैसला लिया है। ([email protected])
कुछ बातें चुनिंदा उम्मीदवारों की
भाजपा हाईकमान प्रदेश के कुछ युवा प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी तो इस लिस्ट में सबसे ऊपर हैं। इसी तरह पूर्व मंत्री महेश गागड़ा के लिए भी मेहनत हो रही है।
केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर सिर्फ गागड़ा के नामांकन दाखिले के लिए बीजापुर पहुंचे हैं। अनुराग जब युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तब गागड़ा उनकी कार्यकारिणी में थे। दोनों के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं। पिछला चुनाव हार चुके गागड़ा को इस बार जिताने के लिए खास रणनीति पर काम हो रहा है।
इसी तरह ओपी चौधरी के खिलाफ सारे असंतोष को दबाने में पार्टी को सफलता मिलती दिख रही है। रायगढ़ परम्परागत रूप से अग्रवाल समाज की सीट मानी जाती रही है। कई विधायक अग्रवाल समाज से ही रहे हैं। मगर पार्टी ने पूर्व विधायक विजय अग्रवाल की मजबूत दावेदारी को नजरअंदाज कर ओपी चौधरी को प्रत्याशी बनाया।
अग्रवाल के निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने की उम्मीद थी। उन्होंने पिछले चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 43 हजार वोट बटोरकर भाजपा प्रत्याशी रोशन लाल अग्रवाल की हार सुनिश्चित कर दी थी। मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। चर्चा है कि विजय, कोल कारोबार से जुड़े हैं। ऐसे में निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता था।
बाहरी राज्यसभा सदस्य बाहर
विधानसभा चुनाव का प्रचार चल रहा है, लेकिन कांग्रेस के तीन राज्यसभा सदस्य रंजीत रंजन, राजीव शुक्ला, और केटीएस तुलसी पूरे परिदृश्य से बाहर हैं। रंजीत रंजन को पार्टी ने राजस्थान में समन्वयक की जिम्मेदारी दे दी है। जबकि वल्र्ड कप क्रिकेट मैच चल रहा है। ऐसे में राजीव शुक्ला के आने की उम्मीद नहीं है। वो क्रिकेट मैच का लुफ्त उठाते स्टेडियम में देखे जा सकते हैं। केटीएस तुलसी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं, और वो कोर्ट-कचहरी में ही व्यस्त हैं। वैसे भी प्रदेश के नेताओं को इन सबसे उम्मीद भी नहीं है।
दिल्ली की दखल हुई कम
भाजपा ने जब अगस्त में प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की थी, तब के माहौल का अंदाजा लगाइये। गृहमंत्री अमित शाह लगातार छत्तीसगढ़ दौरा कर रहे थे। उनके दौरे में सभा नहीं होती थी, केवल बैठकें होती थी। एयरपोर्ट से सीधे रात में ही बैठक लेने पहुंच जाते थे। ओम माथुर की टीम का दबदबा था। हर विधानसभा में दूसरे राज्यों के विधायक डेरा डाल चुके थे।
कुल मिलाकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि इस बार भाजपा छत्तीसगढ़ को लेकर अतिरिक्त गंभीरता बरत रही है। गुजरात दिल्ली वाले प्रयोग यहां किये जा रहे हैं। पुराने नेताओं को टिकट नहीं मिलेगी, सारे नए चेहरे होंगे। इस आभामंडल का नतीजा यह हुआ था कि प्रदेश के सारे बड़े नेताओं को सांप सूंघ गया था। खासकर पिछली सरकार के मंत्रियों की टिकट को लेकर भारी संशय था। राजधानी के कद्दावर नेता के सुर बदल गए थे, पांच साल चुप रहने वाले पूर्व मंत्री और विधायक गायों की मौत से लेकर गंगाजल तक के मुद्दों पर लगातार मुखर होकर बोलने लगे थे ताकि टिकट पक्की हो जाए। एक पूर्व मंत्री तो टिकट को लेकर इतने भयभीत हो गए थे कि मानों गायब ही हो गए थे। जब उन्हें टिकट की हरी झंडी मिली तब वे निकले।
लेकिन दो महीने पहले दिल्ली का टेरर अब खत्म हो गया है। कार्यकर्ताओं कह रहे हैं कि भाजपा की पहली सूची जितनी कड़ाई से बांटी गई थी, दूसरी सूची उतनी ही निराशाजनक रही है। कईयों को तो इससे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं दिख रही है। चुनाव के एक प्रमुख रणनीतिकार के अचानक परिदृश्य से गायब होने पर काफी चर्चा हो रही है।
कितने वोट घर से डाले जाएंगे?
चुनाव आयोग हर बार कुछ नये प्रयोग करता है जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को वोट देने का अवसर मिल सके। इस बार 80 वर्ष से अधिक उम्र वाले मतदाता, 40 प्रतिशत से अधिक विकलांगता और कोविड 19 अथवा किसी संक्रमित बीमारी से ग्रस्त मतदाताओं की सुविधा के लिए विशेष मतदान दल बनाए जाएंगे। यदि ऐसे मतदाता बूथ तक आकर वोट नहीं डालना चाहें, तो विशेष मतदान दल सुरक्षा इंतजामों के साथ उस मतदाता के घर जाएगा और गोपनीयता के साथ उनका मत प्राप्त करेगा। विशेष दल के दौरे और रूट की जानकारी सभी प्रत्याशियों को भी दी जाएगी ताकि वे देख सकें कि गोपनीयता बरती जा रही है या नहीं। दिव्यांग और संक्रामक बीमारी से ग्रस्त मतदाता का अलग से ब्यौरा आयोग ने नहीं दिया है पर अभी की स्थिति में 80 वर्ष से अधिक मतदाताओं की संख्या 1 लाख 86 हजार 215 है।
प्राय: देखा गया है कि अशक्त हो चुके बुजुर्गों को परिवार के सदस्य अपने साथ मतदान केंद्र लेकर आ जाते हैं। बहुत से अशक्त बुजुर्ग घर से बाहर निकलने का मौका तथा अपने बच्चों की सेवा पाकर खुश भी होते हैं। दिक्कत उन्हें होती है जो वृद्ध अकेले हैं और बूथ तक लेकर जाने वाला कोई नहीं होता।
ऐसे कई वृद्ध मतदाता जो परिवार के सदस्यों के प्रयासों के बावजूद बिस्तर से उठने में असमर्थ हैं, वे भी अब की बार वोट डाल सकेंगे।
ऐसा नहीं लगता कि ज्यादा वृद्ध मतदाता या उनके परिजनों को पता है कि घर पर वोट डालने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए चुनाव अधिसूचना जारी होने के पांच दिन के भीतर क्षेत्र के संबंधित रिटर्निंग अधिकारी के पास आवेदन लगाना जरूरी है। यानि उन्हें मतदान की सुविधा भले ही घर बैठे मिले पर एक बार रिटर्निंग ऑफिसर के पास जाना ही है। शायद वे अपना आवेदन अपने किसी प्रतिनिधि के जरिये भी दे सकते हैं, पर इस बारे में आयोग ने स्पष्ट नहीं लिखा है। प्रथम चरण की अधिसूचना का प्रकाशन 13 अक्टूबर को हुआ था। इसका मतलब जिन वृद्ध मतदाताओं ने 17 अक्टूबर तक आवेदन दिया हो, वे ही इस सुविधा का लाभ ले सकेंगे। दूसरे चरण के मतदाताओं के लिए अभी समय है। बीते चुनावों से चुनाव आयोग ने मतदान केंद्रों में मतदाता- मित्रों की सेवाएं शुरू की है, लेकिन यह सिर्फ बूथ पर है। इनकी सेवा मतदान केंद्र पहुंचने वाले बुजुर्ग ही ले पाएंगे।
मतदान से कोई वंचित न रहे इसलिये यह एक और नया प्रयोग है, पर इसमें कितने प्रतिशत सफलता मिलेगी, अभी कुछ नहीं कह सकते। हो सकता है इस बार जो खामियां दिखेंगी, उन्हें अगले चुनावों में दूर किया जाए।
लंबी पारी खेलने के लिए...

कांग्रेस और भाजपा दोनों में ही टिकट कटने के बाद बगावत की खबरें फूट-फूट कर आ रही है। बहुत से लोगों ने ऐलान कर दिया है कि वे निर्दलीय या फिर किसी तीसरे दल से चुनाव लडऩे जा रहे हैं। जिन लोगों ने सीधे बगावत नहीं की वे चुपचाप घर बैठ गए हैं या फिर पर्यटन के लिये राज्य से बाहर चले गए हैं। पर कुछ दावेदारों की रणनीति अलग है।
भाजपा ने पिछली बार तखतपुर से हर्षिता पांडेय को टिकट दी थी जो त्रिकोणीय संघर्ष में जीत से करीब 7 हजार वोटों से पिछड़ गई। इस बार यहां से धर्मजीत सिंह ठाकुर को जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ से भाजपा प्रवेश कराया गया और मैदान में लाया गया। पांडेय टिकट कटने के बावजूद अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने लगी हैं। हर्षिता को भाजपा शासनकाल में राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। वे जनसंघ के एक प्रभावशाली नेता रहे स्व. मनहरण लाल पांडेय की बेटी हैं। शायद इस विरासत को समझते हुए उन्हें लगा हो कि बगावत ठीक नहीं। पार्टी उसे फिर कभी किसी जगह पर मौका दे देगी।
दो चार वोटर वाले बूथ...
कोरिया जिले का भरतपुर-सोनहत मतदान केंद्र सबसे प्रदेश में सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला इलाका है। यहां एक मतदान केंद्र शेराडांड ग्राम में खोला जाएगा, जहां केवल पांच मतदाता हैं। 15 साल पहले यहां सिर्फ दो मतदाता पति-पत्नी थे, तब भी बूथ खोला गया। अब यहां इस परिवार के पांच लोग वोट डालने के लायक हो चुके हैं। चार सदस्यीय मतदान दल ट्रैक्टर में बैठकर यहां पहुंचेगा और यहां एक अस्थायी बूथ बनाकर वोटिंग की प्रक्रिया पूरी करायेगा। इस दूरस्थ ग्राम तक पहुंचने के लिए गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व का काफी हिस्सा पार करना पड़ता है। वैसे इस विधानसभा क्षेत्र में कई मतदान केंद्र ऐसे हैं जहां 12-15 मतदाता ही हैं। जैसे मतदान केंद्र कांटो में 12 मतदाता हैं, रेवला में 23।
वैसे, इस बात की गुंजाइश कम है कि इतने कम वोटों वाले गांवों में कोई दल चुनाव प्रचार के लिए भी जाता होगा। इन मतदाताओं को प्रत्याशियों का नाम और उनके चुनाव चिन्ह पता है भी या नहीं। शायद मतदान दलों को यह काम भी वहां करना पड़े।
डॉ. प्रेमसाय का पत्ता क्यों कटा?
डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम अकेले ऐसे विधायक हैं, जो भूपेश सरकार में मंत्री रहे और टिकट काट दी गई। मंत्रिमंडल से जुलाई महीने में उनका इस्तीफा ले लिया गया था, हालांकि इसके कुछ दिन बाद कैबिनेट मंत्री दर्जा बरकरार रखते हुए उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बना दिया गया। डॉ. साय का कार्यकाल बहुत विवादित रहा। मंत्री बनने के तुरंत बाद पत्नी डॉ. रमा सिंह को उन्होंने अपना विशेष सहायक नियुक्त कर लिया था। विवाद बढऩे के बाद मुख्यमंत्री ने आदेश रद्द कराया।
दो साल पहले डीपीआई के डिप्टी डायरेक्टर आशुतोष चावरे का एक शिकायती पत्र वायरल हुआ था, जिसमें डायरी के पन्नों का हवाला देते हुए शिक्षकों की पदस्थापना में 366 करोड़ के लेन-देन की बात कही गई थी। चावरे ने रायपुर के राखी थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी कि उनके फर्जी दस्तखत और सील से मनगढ़ंत शिकायत की गई। इस मामले में दो तरह की जांच होनी थी। एक तो कि क्या चावरे का दस्तखत फर्जी था, दूसरा ट्रांसफर पोस्टिंग में 366 करोड़ के लेनदेन की शिकायत क्या सही थी? जानकर हैरानी हो सकती है कि दोनों ही जांच अब तक अंजाम तक नहीं पहुंची हैं।
स्कूल शिक्षा में छत्तीसगढ़ की रैंकिंग पूरे देश में बेहद खराब है लेकिन ऐसा कभी नहीं लगा कि सुशिक्षित डॉ. प्रेमसाय इस मसले पर चिंतित हैं। इनके लगभग 4 साल के कार्यकाल में रैंकिंग सुधरी नहीं।
उनके इस्तीफे के कुछ पहले 4500 से अधिक पदोन्नत शिक्षकों की पोस्टिंग में करोड़ों के रिश्वतखोरी के आरोप से विभाग घिर गया। विभाग को रविंद्र चौबे ने संभाला। डॉ. साय के हटते ही इस मामले में कई बड़े अधिकारी सस्पेंड कर दिये गए। हालांकि इनके विरुद्ध एफआईआर के आदेश का पालन नहीं हुआ है।
रायपुर में आरटीई की प्रतिपूर्ति के नाम पर 76 लाख रुपये संदिग्ध खाते में भेजे गए थे। इसकी जांच की फाइल स्कूल शिक्षा मंत्री के बंगले में साल भर पड़ी रही। उनके दफ्तर से निकलने के बाद भी जांच अधूरी है।
अक्टूबर 2021 में विधायक बृहस्पत सिंह और चंद्रदेव राय ने ट्रांसफर पोस्टिंग में लाखों का लेन-देन का आरोप लगाकर उनका बंगला घेरा। शायद ही पहले ऐसा हुआ हो कि 35 कांग्रेस विधायकों ने अपने ही किसी मंत्री की मुख्यमंत्री से शिकायत की हो। इनका कहना था कि मंत्री मनमानी कर रहे हैं, सारा दफ्तर उनके चहेते पीए और दूसरे भ्रष्ट अफसर चला रहे हैं। उनसे इस्तीफा लेने की मांग की गई। डॉ. साय के समर्थकों ने कहा कि यह सब उनके टीएस सिंहदेव खेमे से होने के कारण किया जा रहा है। सिंहदेव ने यह कहते हुए मंत्री का बचाव किया था कि विवाद सार्वजनिक करने से विपक्ष को लाभ मिलता है।
इन सब तथ्यों के बावजूद यह निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है कि डॉ. साय सिर्फ इन्हीं कारणों से टिकट से वंचित हुए। प्रदेश के शीर्ष नेता सहमत हो गए होंगे कि दो टिकट हमारे कटेंगे, दो आपके। दो हमारी सिफारिश से मिलेगी, दो आपकी।
हाथ का साथ रास आया साय को?

भाजपा में करीब 40 साल की राजनीतिक यात्रा के बाद कांग्रेस में अचानक शामिल हुए नंदकुमार साय ने लैलूंगा, कुनकुरी या पत्थलगांव से टिकट मांगी थी। लैलूंगा रायगढ़ तो बाकी दो जशपुर जिले में हैं। 77 वर्षीय साय इस इलाके से तीन बार विधायक रह चुके हैं, छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा,राज्य सभा सदस्य, अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष होने के साथ-साथ कई महत्व के पदों पर रहे।
कांग्रेस में शामिल होने के बाद केबिनेट मंत्री दर्जा के साथ सीएसआईडीसी के अध्यक्ष बनाए गए साय ने जिन तीन सीटों से टिकट मांगी, उन सभी पर कांग्रेस का कब्जा था। इनमें से कुनकुरी और पत्थलगांव सीट पर मौजूदा कांग्रेस विधायकों की टिकट नहीं काटी गई लेकिन लैलूंगा में एक विकल्प था। यहां से विधायक चक्रधर प्रसाद सिदार ने भाजपा को 2018 में भाजपा को 24 हजार से अधिक वोटों से हराया था, जिनकी टिकट काटकर विद्यावती सिदार को प्रत्याशी बनाया गया है। अपनी टिकट कटने की चर्चा के बीच विधायक चक्रधर सिदार अपनी पुत्रवधू यशोमति सिदार का नाम आगे कर चुके थे, पर पूर्व विधायक प्रेम सिंह सिदार की पुत्रवधू विद्यावती सिदार पर कांग्रेस ने भरोसा जताया। वे इस समय जिला कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी हैं। जिन तीन सीटों पर साय ने लडऩे की इच्छा जाहिर की थी, उनमें से यही एक सीट है- जहां पर कांग्रेस ने फेरबदल किया।
साय की महत्वाकांक्षा ऊंची रही है। उनका बयान आ चुका है कि राजनाथ सिंह और डॉ. रमन सिंह की सांठगांठ के चलते वे प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से वंचित रह गए। प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग वे हमेशा करते हैं।
जब वे कांग्रेस में शामिल हुए तो भाजपा ने गिनाया था कि पार्टी ने उन्हें क्या-क्या दिया। अब कांग्रेस ने टिकट को लेकर उनकी दावेदारी को नकार दिया है। अब, पता नहीं साय खुद को कांग्रेस में ज्यादा उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, या बीजेपी में करते थे। मालूम होगा तब होगा, जब वे अपने इन इलाकों में हाथ के निशान को वोट देने के लिए निकलेंगे।

कन्हैया की जगह राम
रायपुर दक्षिण से पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ काफी माथापच्ची के बाद कांग्रेस ने दूधाधारी मठ के महंत रामसुंदर दास के नाम पर मुहर लगाई। बताते हैं कि महंत जी खुद जांजगीर-चांपा से टिकट चाह रहे थे। वो एक बार पामगढ़ से विधायक रहे हैं। लेकिन चर्चा है कि रायपुर दक्षिण से बृजमोहन के खिलाफ लडऩे के अनिच्छुक रहे हैं।
दूसरी तरफ, पूर्व पराजित प्रत्याशी कन्हैया अग्रवाल ने अपनी टिकट के लिए खूब कोशिश की। डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव उनके समर्थन में थे। कहा जा रहा है कि इस बात की खबर मिलने पर कन्हैया, महंत जी से मिलने मठ भी गए। और उनसे टीएस सिंहदेव की बात कराई। कन्हैया ने महंत जी से कहलवाया कि पार्टी चाहे तो उनकी जगह कन्हैया को प्रत्याशी बना सकती है। सिंहदेव ने हाथ खड़े कर दिए, इसके बाद प्रदेश प्रभारी सैलजा से चर्चा की कोशिश की गई, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया। और कन्हैया प्रत्याशी बनने से रह गए।
दो नेताओं के सींग उलझे
प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। एक बड़े नेता ठाकरे परिसर से मानो खो कर दिए गए हैं। चुनाव सिर पर न होता तो नेताजी ठाकरे परिसर से ही नहीं पद से भी हाथ धोना पड़ जाता। हालांकि वे टिकट हासिल करने में सफल रहे। ठाकरे परिसर की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखने वालों का कहना है कि इन दिनों दो नेताओं के बीच बोलचाल ही बंद है। न तो फोन पर बात हो रही न वन टू वन मुलाकात में। इसे संगठन के महामंत्री भी समझ रहे हैं। इसके पीछे एक कारण यह बताया जा रहा है कि एक सह प्रभारी, न्यायधानी की एक टिकट भाजयुमो नेता को दिलाना चाहते हैं और नेताजी नहीं चाहते। इससे बड़ी चर्चा है कि नेताजी के किसी लेनदेन फंस गए हैं और हाईकमान को पता चल गया है। उसके ही कहने पर नेताजी साइड लाइन किए जा रहे हैं।
जंगल से मोहब्बत और नफरत
भाजपा में एक वन अफसर को लेकर बड़ी खींचतान चल रही है। 2018 जुलाई तक जो अफसर मानो लख्ते जिगर था । उसकी अब परछाई भी पसंद नहीं है। जो लोग विरोध कर रहे हैं उन्होंने ही कभी इन अफसर को आरा मिल घोटाले से पाक साफ किया था। हालांकि इसके लिए अफसर ने नीचे से लेकर ऊपर तक खूब गांधीजी को खूब इस्तेमाल किया था। अब उनसे ऐसी चिढ़ समझ से परे है। हर दूसरे दिन लोग आयोग में जाने बड़े नेताओं पर दबाव बनाए रहते हैं। वो तो भला हो भाई साहबों का कि ये एक घर छोडक़र चलने के स्टैंडिंग आर्डर दे रखे हैं।
राज्योत्सव मैदान में विकास या विनाश

साइंस कालेज का मैदान काफी प्रसिद्ध रहा है। कई प्रधानमंत्री से लेकर दिग्गज नेताओं की सभाएं यहां कई दशकों से होती आ रही हैं। लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं रही। राज्य गठन के पहले मैदान जितना विशाल था, आज आधे का भी आधा रह गया है। राजधानी बनने के बाद यहां राज्योत्सव का आयोजन हुआ तो यह राज्योत्सव मैदान कहलाने लगा। शहर से लगा और आम लोगों की आसान पहुंच वाला राजधानी में इतना बड़ा मैदान और कहीं नहीं था। यहां रोजाना सुबह-शाम क्रिकेट खेलने वाले दर्जनों टीम दिखती है। लेकिन इस मैदान को तथाकथित विकास करने वालों ने निगल लिया है। चुनावी का मौसम है तो एक पार्टी के कद्दावर नेता अपने विकास कार्यों की फेहरिस्त में इस मैदान में बने ढांचों को उपलब्धियों के रूप में गिनाते नहीं थकते। पर आम लोगों का कहना है कि इस मैदान में हॉकी के दो स्टेडियम बनाए गए हैं, जिसमें केवल अंतरराष्ट्रीय मैच होते हैं। वह भी कई सालों में कभी-कभार, जबकि रोज खेलने वाले बच्चों के लिए मैदान ही नहीं है।
इस मैदान में ही खेल विभाग का बड़ा सा कार्यालय बन गया है। एक हिस्से में युवा आयोग है तो दूसरे हिस्से में छात्रावास बन गया है। लेकिन यह कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन सका कि आम लोगों की सुविधाओं में कैसे कटौती हो रही है। रोजाना खेलने वाले बच्चों के लिए शहर के नजदीक ही मैदान होना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर के मैच तो कभी-कभी होते हैं, वो शहर से बाहर हो सकते हैं। अब दूसरी पार्टी की सरकार बनी तो इस मैदान को मानों जीवनदान मिला। यहां राज्योत्सव आयोजित होने से मैदान की जान लौट गई, लेकिन छोटा होने के कारण अव्यवस्थित लगता है। पर इस सरकार ने भी विकास के नाम पर एक तो चौपाटी बना दी, दूसरी ओर छात्रावास के सामने एक लंबी दीवार खड़ी कर दी है। कुल मिलाकर मैदान सिकुड़ते जा रहा है। खिलाडिय़ों का भी दोष है कि उन्होंने कभी इसके खिलाफ आवाज भी नहीं उठाई, नहीं तो कम से कम चुनाव में मुद्दा तो जरूर बन जाता।
बाहर का मतलब सोनिया गांधी
केंद्रीय राज्य मंत्री रेणुका सिंह नामांकन दाखिले के लिए भरतपुर-सोनहत पहुंचीं तो बाहरी प्रत्याशी कहे जाने को लेकर पूछे गए सवाल से विचलित हो गईं। उन्होंने कहा कि पहले सोनिया गांधी को धक्के मारकर इटली भेजें, फिर मुझसे क्वेश्चन करें। इधर, यही सवाल भाजपा प्रत्याशी प्रबल प्रताप सिंह से किया गया, जो बिलासपुर जिले के कोटा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा- कांग्रेस के जो लोग मुझे बाहरी कह रहे हैं, उन्हें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और बताना चाहिए कि सोनिया गांधी कहां की हैं? इटली की है न? राहुल गांधी चुनाव कहां से लड़ते हैं?
कोटा प्रत्याशी का बयान कुछ शालीन है, वहीं रेणुका सिंह का सोनिया गांधी को धक्के मारने, जैसा बयान कुछ लोगों को अशोभनीय लग सकता है और विधानसभा चुनाव के संदर्भ में ऐसा उदाहरण बेतुका भी। पर एक साथ दोनों ही प्रत्याशी सोनिया गांधी को याद कर रहे हैं। यह अटकल आप लगाएं कि क्या यह संयोग है। या फिर भाजपा ने तय कर रखा है कि सोनिया गांधी को छत्तीसगढ़ के चुनाव में किसी बहाने चर्चा में लाया जाए?
विधायक का वायरल ऑडियो
दूसरी सूची के लिए दिल्ली में हुई कांग्रेस की बैठक के पहले कई विधायकों को इसका आभास भी हो चुका था कि उनकी टिकट खतरे में है। यह एक दिलचस्प मोड़ है। लोगों ने नजर गड़ा रखी है कि टिकट से वंचित विधायक पार्टी के आदेश को मानकर खामोश बैठ जाएंगे या फिर बगावत करेंगे। एक दो दिन में सब साफ होने वाला है। ऐसे में एक ऑडियो वायरल हुआ है जो कथित तौर पर मनेंद्रगढ़ विधायक डॉ. विनय जायसवाल और एक कार्यकर्ता के बीच की बातचीत है। इसमें विधायक कह रहे हैं कि उन्हें टिकट नहीं मिल रही है। डॉ. जायसवाल कार्यकर्ता से गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की टिकट पर चुनाव लडऩे के बारे में सलाह ले रहे हैं और कार्यकर्ता उन्हें वोटों का गणित समझा कर बता रहा है कि वे किस तरह से गोंडवाना की टिकट पर जीत सकते हैं। ऑडियो वायरल होने पर डॉ. जायसवाल ने सफाई दी है कि यह फर्जी है। जिस वक्त उनकी प्रतिक्रिया आई है, कांग्रेस की सूची जारी नहीं हुई है। उनका कहना है कि अभी तो टिकट फाइनल नहीं हुई। आगे जो कुछ भी होता है, मीडिया के माध्यम से मैं सार्वजनिक करूंगा। हालांकि विधायक ने यह नहीं कहा कि पार्टी का जो निर्णय होगा मानेंगे और टिकट कट जाने पर भी कांग्रेस के लिए काम करेंगे।
जीएसटी गंगाजल की डिलीवरी पर

छत्तीसगढ़ में जब कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि हिंदुओं के लिए पवित्र गंगाजल को केंद्र की भाजपा सरकार ने कमाई का साधन बना लिया है और इस पर जीएसटी लगाया जा रहा है, तो भाजपा ने कांग्रेस पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स एंड कस्टम (सीबीआईसी) की ओर से सोशल मीडिया पर बयान जारी कर कहा गया कि गंगाजल सहित किसी भी पूजा सामग्री में टैक्स नहीं लगता। पहले से ही इस पर जीएसटी कौंसिल की बैठक में निर्णय लिया जा चुका है।
गंगाजल की देशभर में आपूर्ति का काम डाक विभाग ने बीते वर्षों से शुरू किया है। जिन लोगों ने डाक से कभी गंगाजल मंगाया नहीं, उनको यह समझ में नहीं आ रहा कि कांग्रेस सही है या केंद्र सरकार। कांग्रेस नेत्री अलका लांबा की पोस्ट से यह साफ होता है कि गंगाजल पर तो कोई टैक्स नहीं है पर पोस्टल चार्ज पर 18 प्रतिशत जीएसटी देना होता है, यह चार्ज डाक विभाग की ओर से किया जाता है। इसका मतलब यह है कि डाक खर्च और गंगाजल के कुल खर्च में जीएसटी का एक हिस्सा जुड़ा तो है, पर वह कांग्रेस की मानें तो गंगाजल पर है, भाजपा की मानें तो डिलीवरी पर।
चुनाव के बीच संगठन में बदलाव
चुनाव के बीच भाजपा ने धमतरी जिला संगठन में छोटा सा बदलाव किया है। जिला महामंत्री कविन्द्र जैन को महामंत्री पद से हटाकर उपाध्यक्ष बनाया है। अविनाश दुबे को महामंत्री का दायित्व सौंपा गया है। चर्चा है कि पार्टी के दिग्गज नेता पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर की नाराजगी के चलते बदलाव हुआ है।
सुनते हैं कि जिला संगठन ने टिकट वितरण से पहले प्रदेश प्रभारी ओम माथुर, और अन्य प्रमुख पदाधिकारियों को सुझाव दिया था कि कुरूद से साहू समाज से प्रत्याशी उतारा जाना चाहिए। पार्टी चाहे तो धमतरी विधायक रंजना साहू को कुरूद शिफ्ट कर सकती है। साथ ही यह भी सुझाया था कि धमतरी से सामान्य वर्ग से प्रत्याशी तय कर सकती है।
दिग्गज नेता अजय चंद्राकर के लिए सुझाव यह था कि उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ाया जा सकता है। जिले के प्रस्ताव पर पार्टी नेताओं ने विमर्श भी किया था, लेकिन बात छनकर अजय, और रंजना तक पहुंची, तो दोनों नाराज हो गए। अजय और रंजना को प्रत्याशी बनाने की घोषणा के बाद महामंत्री कविन्द्र जैन को बदल दिया गया। चुनाव का समय है इसलिए महामंत्री पद पर चंद्राकर की पसंद से नई नियुक्ति की गई, और जैन को उपाध्यक्ष बनाकर संतुष्ट किया गया।
चुनाव आयोग की किफायत
वैसे से चुनाव कराना बहुत ही कठिन कार्य है। इसमें निष्पक्ष होने के साथ पारदर्शिता भी आवश्यक है। प्रत्याशियों की पाई-पाई के खर्च का ब्यौरा पूछने वाला चुनाव आयोग अपने खर्चे पर कैसे पारदर्शिता रखता होगा। चुनाव कराने के लिए निर्वाचन आयोग को करोड़ों रुपए का बजट मिलता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के मानदेय पर देना होता है, लेकिन उसके पहले कई आवश्यक खर्चे होते हैं जैसे वाहन, वीडियोग्राफी, सीसीटीवी कैमरा, पंडाल इत्यादि। चुनाव में इनका ठेका लेने वाले जानते हैं कि चुनाव का पैसा कब मिलेगा, इसका भगवान ही मालिक होते हैं। लिहाजा वे बिल तीन-चार गुना बनाते हैं।
लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में आयोग ने ये सारे ठेके सेंट्रलाइज्ड करवा दिये थे। राजधानी से ठेकेदार तय किये गए थे, उन्हें जिले में जाकर काम करना था।
अब नए अधिकारी के जिम्मे यह कार्य है। उनकी तासीर अलग तरह की है। उन्होंने एकमुश्त ठेका देने के बजाय जिला कलेक्टरों को बजट का आबंटन कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ कि जिस वीडियोग्राफी के लिए पिछली बार हर विधानसभा में 20 लाख खर्च हुए थे, वह काम अब महज चार लाख रुपए में हो रहा है। सीसीटीवी का ठेका सेंट्रलाइज्ड करने पर एक जिले में दो करोड़ में दिया गया था, वह इस बार केवल 24 लाख रुपए में पूरा हो जा रहा है। निर्वाचन आयोग की खर्च में पारदर्शिता से उम्मीद की जा रही है कि चुनाव में भी पारदर्शिता बनी रहेगी।
पीएससी विवाद अब घर के भीतर
पीएससी और विवाद दोनों एक दूसरे के पर्याय हो गए हैं कहना संस्था को अपमानित करना नहीं होगा। पीएससी में भर्ती तो चल ही रहा था, कि अब एक नया पदभार विवाद भी सामने आया है। विवादास्पद अध्यक्ष के बाद सरकार ने एक वर्तमान सदस्य को अध्यक्ष का अधिकार दिया गया है । और उनके साथ एक सदस्य को नियुक्त किया गया है। दोनों ने नियुक्ति के अगले ही दिन अपनी अपनी कुर्सी संभाल ली। और एक सदस्य ने तो बकायदा पोस्टिंग,प्रमोशन कमेटी की बैठक कर ली। कुछ फैसले भी ले लिए। अब ये फैसले पाक साफ हैं या विवादास्पद, यह तो वक्त बताएगा।
बात यहीं खत्म नहीं हो रही। दरअसल पीएससी परिसर में चर्चा है कि सरकार के आदेश से पहले दोनों ने पदभार लिया या इनके पदभार लेने के बाद सरकार ने नियुक्ति की। अध्यक्ष, सदस्य ने सात अक्टूबर को पदभार लिया और सामान्य प्रशासन विभाग ने इनकी नियुक्ति का आदेश पांच दिन बाद 12 अक्टूबर को आदेश जारी किया। अब देखना यह है कि किसी ने यदि चुनौती दे दी तो सरकार और पीएससी इसे जस्टिफाई कैसे करेगा।
फिर बगावत, भितरघात की राह पर ?
अब से सात-आठ माह पहले जब कांग्रेस ने अपने विधायकों के कामकाज की समीक्षा की तो यह जाहिर किया कि दो चार को छोडक़र शेष की रिपोर्ट ठीक-ठाक है। समय नजदीक आते-आते यह साफ हो गया कि असल सर्वे रिपोर्ट कुछ अलग है, जिसके अनुसार कुछ मंत्रियों सहित 30-35 विधायकों की टिकट काटी जाएगी। पहली सूची में 30 में से 8 विधायकों को टिकट नहीं दी गई। हालांकि इनमें से एक सीट दंतेवाड़ा है, जहां से देवती कर्मा की जगह उनके बेटे को मैदान में उतारा गया है।
मौजूदा विधायकों, सांसदों की टिकट काटने जैसा ‘साहसिक’ फैसला पहले से भाजपा लेती रही है। गुजरात, उत्तरप्रदेश और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में उसने यह प्रयोग किया था, जो कर्नाटक छोडक़र बाकी दोनों राज्यों में सफल रहा। सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ से उसने सभी प्रत्याशी नये दिए, यह भी सफल रहा। इस चुनाव में भाजपा ने यहां वैसा निर्मम फैसला नहीं लिया। सन् 2018 के चुनाव में जिन मंत्रियों को हार की वजह मानकर कार्यकर्ता चल रहे थे उन्हें भी उदारता के साथ टिकट दी है। टिकट वितरण का भाजपा में विरोध कम नहीं हो रहा है। जशपुर से रायमुणि भगत को टिकट देने के विरोध में तो पूर्व मंत्री गणेशराम भगत के समर्थक राजधानी आकर पार्टी कार्यालय के सामने राशन पानी लेकर धरने में बैठ गए। करीब दर्जन भर सीटों पर कार्यकर्ता सडक़ों पर आये।
वहीं कांग्रेस में जिनकी टिकट कटने की आशंका थी, उनमें तीन से चार मंत्री भी थे। यह जानते हुए भी सीट खतरे में आ सकती है, पार्टी ने किसी की टिकट नहीं काटी। एक मंत्री गुरु रुद्र कुमार की सिर्फ सीट बदली। कुछ लोगों को लग रहा है कि विधायकों की टिकट काटने का फैसला सुविधा के अनुसार लिया गया। टिकट फाइनल करने वाले सदस्यों की निजी राय का असर इसमें दिख रहा है। सन् 2018 के चुनाव में 27 हजार से अधिक मतों से जीत हासिल करने वाली खुज्जी विधायक छन्नी साहू की टिकट काटी गई है, जबकि 26 सौ वोट से जीतने वाले चंदन कश्यप की टिकट बरकरार रखी गई है। करीब 18 हजार मतों से जीतने वाले राजमन बेंजाम की भी टिकट बीजापुर से कट गई है। यहां से प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज मैदान में उतारे गए हैं।
2003, 2008 और 2013 के चुनावों में भितरघात और बागी उम्मीदवारों की वजह से नुकसान नहीं होता, तो वह शायद पहले ही सत्ता में वापस आ चुकी होती। सन् 2018 में एंटी इनकमबेंसी के अलावा कांग्रेस की यह बात भी खूब प्रचारित हुई थी कि जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे), भाजपा की ‘बी’ टीम है। पूरी कांग्रेस किसी सूरत में सत्ता में वापस के लिए सन् 2018 में एकजुट थी।
मगर, 2023 में वह एक बार फिर बगावत और भितरघात का सामना कर सकती है। इसकी शुरूआत भी हो चुकी है। चित्रकोट विधायक राजमन बेंजाम के समर्थक टिकट कटने से नाराज हैं। बेंजाम ने भी कह दिया है कि समर्थकों की जिद के आगे उन्हें लडऩे के लिए मजबूर होना पड़ेगा। पहले चरण की कुछ सीटों पर असंतुष्टों ने फार्म खरीद रखे हैं। नामांकन के लिए अभी तीन दिन बाकी है। नाम वापसी के लिए भी वक्त मिलेगा। इस बीच काफी उठापटक, समझाने, मनाने का सिलसिला नजर आ सकता है।
किसको नुकसान पहुंचाएंगे वेदराम
आरंग विधानसभा क्षेत्र में इस बार दिलचस्प तस्वीर बन रही है। दो माह पहले कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आए सतनामी समाज के धर्मगुरु बालदास के बेटे खुशवंत साहेब को भाजपा ने उम्मीदवार घोषित कर दिया है। यहां पर उनका मुकाबला मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया से होने वाला है। मगर, इसी सीट पर वेदराम मनहरे भी भाजपा की टिकट चाहते थे। सन् 2018 के चुनाव में खुशवंत साहेब और वेदराम मनहरे ने कांग्रेस प्रत्याशी डहरिया का साथ दिया था। करीब 25 हजार मतों से डहरिया की जीत हुई थी। कांग्रेस में रहते हुए ही वेदराम दो बार तिल्दा से जनपद अध्यक्ष पद संभाल चुके हैं। सतनामी समाज के संरक्षक भी हैं। उन्हें उम्मीद थी कि डहरिया की जीत में जी जान से मेहनत करने का पार्टी उन्हें कोई पुरस्कार देगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दो साल पहले सितंबर 2021 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा की सदस्यता ले ली। पार्टी में प्रवेश तत्कालीन प्रदेश प्रभारी डी. पुरंदेश्वरी ने खुद कराया था। कुछ दिन बाद उन्हें दिल्ली बुलाया गया और राष्ट्रीय नशा मुक्ति आंदोलन का छत्तीसगढ़ प्रभारी बनाया गया। प्रदेश के सतनामी समाज में गुरु बालदास के प्रभाव को देखते हुए उनके बेटे खुशवंत साहेब को भाजपा ने आरंग से टिकट दी है। पर वेदराम ने अपने समर्थकों के साथ बगावत कर दी है। कुछ दिन पहले काफी संख्या में कार्यकर्ता पैदल रायपुर पहुंचे थे। भाजपा कार्यालय में उन्होंने वेदराम को ही प्रत्याशी बनाने की मांग की। मगर भाजपा ने एक भी प्रत्याशी नहीं बदला है। अब वेदराम ने निर्दलीय लडऩे का ऐलान कर दिया है। वे जगह-जगह सभायें ले रहे हैं, जिनमें भीड़ भी आ रही है। जानकार बता रहे हैं कि वेदराम आरंग में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति पैदा कर सकते हैं। हालांकि यह कोई यह बताने की स्थिति में नहीं है कि वे किसका वोट काटेंगे। बरसों कांग्रेस में रहे, पिछले चुनाव में डहरिया को उनसे मदद मिली है और इधर दो साल के भीतर उन्होंने भाजपा में भी जगह बना ली थी।

यह तस्वीर पंडरी रोड शराब दुकान की है। जहां के सेल्समेन कहना है कि शराबी काउंटर में आते ही जेबकटी की शिकायत करने लगते हैं। पूछने पर बताया कि पैसे कम पडऩे पर शराबी ही एक दूसरे का जेब साफ कर रहे।
पत्ते फूल से बागी !
भाजपा में टिकट की घोषणा के बाद असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद यहां आए, तो एक पूर्व आईएएस, और टिकट के दावेदार रहे नेताओं ने उनसे मिलकर प्रत्याशी चयन पर नाराजगी जताई। टिकट नहीं मिलने पर एक प्रभावशाली नेता के समर्थकों ने बकायदा ऑडियो संदेश तैयार करवा लिया है, और अपने समाज के लोगों को भाजपा के खिलाफ वोट करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। एक चर्चा यह भी है कि समाज विशेष के करीब दो हजार लोग चुनाव के बीच में धार्मिक पर्यटन पर निकल रहे हैं। टिकट कन्फर्म होने का दावा किया जा रहा है। इससे चुनाव नतीजों पर क्या फर्क पड़ेगा, इस पर भी चर्चा चल रही है। देखना है आगे क्या होता है।
पंजे की उंगलियाँ झाड़ू थामने की ओर
कांग्रेस की पहली सूची में 8 विधायकों का पत्ता साफ हो गया है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि करीब 18-20 विधायकों की टिकट कट सकती है। टिकट को लेकर सशंकित कुछ विधायक दिल्ली में जमे हुए हैं, और एक-दो तो आम आदमी पार्टी, और अन्य दल के संपर्क में भी आ चुके हैं।
संभावना जताई जा रही है कि जिन विधायकों की टिकट कट चुकी है अथवा कटने जा रही है, उनमें से कई पार्टी से बगावत कर चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। जिन आठ विधायकों की टिकट कटी है, उनमें से एक ने तो पार्टी छोडक़र चुनाव मैदान में उतरने का मन बना लिया है। एक अन्य ने तो समर्थकों को चुनाव प्रचार से जुट जाने के लिए कह दिया है। ये विधायक पहले भी निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरकर अपना दम दिखा चुके हैं। इस बार तैयारी पहले से ज्यादा है। कितने विधायक बागी होते हैं, यह तो नाम वापसी के बाद पता चलेगा।
आप, जोगी और नेताम की नजर
प्रथम चरण की सीटों के लिए नामांकन दाखिल हो रहे हैं। इस बीच पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविंद नेताम, आम आदमी पार्टी, और जोगी पार्टी की नजर कांग्रेस व भाजपा के असंतुष्ट नेताओं पर है। नेताम ने तो अपने दल के प्रत्याशियों की सूची सिर्फ इसलिए जारी नहीं की है कि कांग्रेस से निराश वजनदार नेता साथ आ सकते हैं। ऐसे मजबूत नेताओं को वो प्रत्याशी बनाने की सोच रहे हैं।
आम आदमी पार्टी ने दो सूची जारी कर दी है, लेकिन कई सीटों पर नाम घोषित नहीं किए हैं। उनकी भाजपा, और कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं पर नजर है। जबकि जोगी पार्टी के मुखिया अमित जोगी तो कह चुके हैं कि दोनों ही पार्टी के कई प्रमुख नेता उनके संपर्क में हैं। यानी असंतुष्टों के लिए दूकानें खुली हुई है।
फर्जीवाड़ा और चुनाव ड्यूटी
ऐसे कर्मचारी जिनके खिलाफ नौकरी हासिल करने के लिए फर्जीवाड़ा करने का आरोप है, वे चुनाव ड्यूटी क्या निष्पक्ष तरीके से करेंगे? यह सवाल उठा है धमतरी जिले के मगरलोड से। करीब 12 साल पहले यहां शिक्षाकर्मी भर्ती में फर्जीवाड़ा की शिकायत हुई थी। मामला उजागर होने के बाद एफआईआर दर्ज की गई थी, तत्कालीन एक जनपद सीईओ को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था। पर उसके बाद किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। न तो पुलिस जांच बढ़ी. न विभाग ने रुचि ली। स्थिति यह है कि जिन 102 शिक्षाकर्मियों पर फर्जी दस्तावेजों के जरिये नौकरी हासिल करने का आरोप है, वे अब भी सेवा दे रहे हैं, शासन से वेतन ले रहे हैं। कुछ का तो प्रमोशन भी हो गया है। यह जानकारी सामने आई है कि अभी के चुनाव में उन्हें फिर ड्यूटी पर लिया गया है, 2018 में भी लिया गया था। जिस आरटीआई कार्यकर्ता ने इस फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ किया था, उसने जिला निर्वाचन अधिकारी और एसपी से मांग की है कि 12 साल में जांच तो पूरी हुई नहीं, कम से कम इन्हें चुनाव से अलग रखा जाये, वरना अपनी नौकरी बचाने के लिए वे दबाव में काम कर सकते हैं। देखें, प्रशासन इस पर क्या निर्णय लेता है।
सीएम के दावेदार सांसद चेहरे
सांसदों का विधानसभा चुनाव लडऩा, मोर्चे पर सेनापतियों का खुद युद्ध में कूद जाने जैसा है। भाजपा ने मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा तय नहीं किया, लेकिन मतदाताओं को खुशफहमी में रखने का पूरा मौका दिया है। अन्य पिछड़ा वर्ग में छत्तीसगढ़ के दो समाज, कुर्मी और साहू वजन रखते हैं। कुर्मी समाज को लग सकता है कि पाटन में विजय बघेल मुख्यमंत्री को हरा देंगे तो फिर सीएम पद के वे ही दावेदार होंगे। इधर साहू समाज से अरुण साव भी लोरमी से मैदान में हैं। यदि भाजपा की ज्यादा सीटें आईं तो साहू समाज उनको मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहेगा। यह जरूर माना जा सकता है कि बीते कई चुनावों में चुनौती बनती आई पत्थलगांव सीट से सांसद गोमती साय को टिकट इसलिए दी गई हो कि वह कांग्रेस को मजबूती से टक्कर दे सके, लेकिन कोरिया जिले की भरतपुर-सोनहत सीट से केंद्रीय राज्य मंत्री रेणुका सिंह को टिकट देने का संदेश यह माना जा सकता है कि बहुमत मिलने पर आदिवासी मुख्यमंत्री भी भाजपा तय कर सकती है। इन सबको लेकर कोई सहमति नहीं बनती है तो फिर डॉ. रमन सिंह तो मैदान में हैं ही।
कांग्रेस ने अपने दो में से एक सांसद दीपक बैज को मैदान में उतारा है। वे सीएम के रेस में शायद न रहें, पर उतरने की वजह बैज खुद बता चुके हैं- मेरे लडऩे से आसपास की तीन-चार सीटों पर फायदा मिलेगा। वैसे लोगों का कहना है कि बैज की महत्वाकांक्षाएँ ख़ासी बड़ी हैं।
अपील की जमीनी हकीकत..

जिलों में प्रशासन चुनाव की तैयारियों के साथ-साथ मतदाताओं को वोट देने के लिए जागरूक करने का अभियान भी चला रहा है। वोट किस बात पर देना है, किस पर नहीं-यह भी समझाया जा रहा है। अब इसे देखिये, धमतरी में चलाए गए स्वीप अभियान के तहत राह चलते मतदाताओं को तख्तियां पकड़ाकर फोटो खींची गई है। एक तख्ती पर लिखा है-जाति पर न धर्म पर, बटन दबेगा कर्म पर। अब मतदाता इस सीख पर अमल करना चाहे तो वह कर्म वाला प्रत्याशी ढूंढता रह जाएगा। जिन दलों के बीच मुख्य मुकाबला है, उन्होंने उम्मीदवार तय करते समय जाति को तो बड़ा आधार बनाया ही है, कई सीटों पर धर्म ने भी भूमिका निभाई है। जिला प्रशासन जाने-अनजाने तीसरे दलों को या नोटा में वोट देने की अपील तो नहीं कर रहा? ([email protected])
पार्टी में नाराज का क्या इलाज?
भाजपा के वरिष्ठ नेता, यहां तक कि प्रदेश प्रभारी भी इन दिनों परंपरागत समस्या से जूझ रहे हैं। अब काम करना है तो सुनना ही पड़ेगा। यह समस्या 85 की सूची जारी होने के बाद से बढ़ गई है। टिकट से चुके जिस दावेदार को चुनावी कार्य के सिलसिले में ठाकरे परिसर या एकात्म परिसर बुलाओ,पहले तो वह दो घंटे बाद आएगा। और आया तो दो घंटे का लेक्चर पिलाएगा। यह कहते हुए कि जिसे टिकट दी गई वो कितना सक्रिय रहा, मैं कितना, यह देख से। 20-30-40 से संगठन में सक्रिय हूं पार्टी ने मुझे क्या दिया। पार्षद की टिकट भी नहीं दी आदि-आदि। बड़े नेताओं को सुनना पड़ता है। मन रखने बोल भी देते हैं मैने तो पैनल में रखा था, लेकिन डॉ.साहब,प्रदेश अध्यक्ष, संगठन के फलां,ढिंका नहीं चाहते थे। बहुत मुश्किल से ऐसे लोगों का मन एकात्म हो पाता। ठीक है भाई साब,आप कह रहे हैं तो काम करता हूं वर्ना...! इसके बाद कार्यालय से जो निकले फिर नहीं आते। ऐसी ही समस्या या तोड़ कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय ने निकाला है। कुछ हद तक पीसीसी ने भी अपनाया है। यानी पार्टी दफ्तर में वैतनिक कर्मचारी (पेड एंप्लाई) नियुक्त हैं। भाजपा को भी अनुसरण करना चाहिए।
शेर के सामने सोच समझकर बकरी
लगता है भाजपा इस चुनाव को हिंदुत्व के मुद्दे पर लडऩा चाहती है। तभी तो कांग्रेस सरकार के कद्दावर मंत्री के सामने बहुत सामान्य प्रत्याशी ईश्वर साहू को उतार दिया है, जिसका कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है। उसकी पहचान इतनी ही है कि वह बिरनपुर घटना में मारे गए भुनेश्वर साहू का पिता है।
ऐसे में कहा जा रहा है शेर के सामने बकरी को बांध दिया है। जब चैनलों के पत्रकारों ने प्रत्याशी ईश्वर साहू से यह सवाल पूछा तो उसने बड़ी सहजता से पत्रकारों को ही निरुत्तर कर दिया। उसने कहा कि शेर के सामने बकरी को चरवाहा तभी बांधता है, जब उसे पिंजरे में पकडऩा होता है। चरवाहा चतुर होता है, कमजोर देखकर शेर लालच में आ जाता है। हमारे चरवाहा ने भी रणनीति बनाई है।
घोषणा पत्र में अपने भविष्य का ख्याल
बात 2013 के चुनाव की है। झीरम घाटी की घटना के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का संकट था, तब घोषणा पत्र बनाने की जिम्मेदारी एक कद्दावर नेता की मिली थी, जो अल्पसंख्यक हैं। जब सारे देश में ध्रुवीकरण का माहौल बन रहा था, तब उन्हें अपनी हार का आभास हो गया था। लिहाजा भविष्य में मंत्री पद पाने के लिये बैकडोर एंट्री का इंतजाम एमएलसी के रूप में कर लिया था।
उस समय उन्होंने एक घोषणा शामिल की थी, प्रदेश में विधान परिषद बनाने का। यह मुद्दा जनता की ओर से नहीं आया था और न ही इसकी कभी आवाज उठी थी। नेताजी ने इसे प्रमुखता से शामिल करा लिया। कुछ बड़े नेता इससे नाखुश थे, पर कुछ नहीं कर पाए। खैर कांग्रेस की सरकार ही नहीं बनी और विधान परिषद भी नहीं।
अगली बार राजा साहब को घोषणा पत्र बनाने की जिम्मेदारी मिली, उन्होंने विधान परिषद को घोषणा पत्र में कोई महत्व नहीं दिया। अब इस बार का चुनाव आ गया है और अल्पसंख्यक नेता पावरफुल मंत्री हैं, उन्हें फिर से घोषणा पत्र बनाने का जिम्मा दे दिया गया है। अब फिर से बिना किसी मांग के विधान परिषद घोषणा पत्र में शामिल हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
सरकारें अलग, आरोप एक जैसे...
राज्य में भू-माफिया, शराब माफिया, रेत माफिया, यहां तक कि शिक्षा माफिया को पनपने दिया जा रहा है। परीक्षाएं समय पर नहीं होती हैं, परिणामों में देरी होती है, अनगिनत घोटाले हो रहे हैं। व्यापमं, शिक्षक, पुलिस, नर्सिंग, पटवारी, कांस्टेबल के पद 8 लाख से 15 लाख रुपये में बेचे गए हैं।
उपरोक्त पंक्तियों से हमें लगेगा कि यह भाजपा का छत्तीसगढ़ सरकार के खिलाफ आरोप है। मगर, यह कांग्रेस का आरोप है, मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार पर। वहां कांग्रेस की प्रवक्ता शोभा ओझा ने भर्तियों में गड़बड़ी और बेरोजगारों से छलावे के कई गंभीर आरोप एक प्रेस कांफ्रेंस में लगाए।
छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों ही जगह पर कांग्रेस और भाजपा हमेशा की तरह आमने-सामने हैं। मगर, दोनों के खिलाफ आरोप एक जैसे हैं। कहने का मतलब यह है कि भ्रष्टाचार विपक्ष में रहते हुए ही दिखाई देता है। सरकार में बने रहने पर आरोप निराधार लगते हैं।
बस्तर की एक पारंपरिक बाड़

इसका चलन अब कम हो गया है। नाम है- अडग़ेड़ा। अड़ यानी कि आड़ा और गेड़ा यानी कि मोटा डंडा। जोहार एथनिक रिसोर्ट कोण्डागांव में इसे प्रदर्शित किया गया है, जहां से तस्वीर ली है अशोक कुमार नेताम ने। इसे अब भी कुछ मुरिया जनजाति के घरों के आंगन पर देखा जा सकता है। दोनों खंभों में बराबर ऊंचाई पर लगभग 5 से.मी. व्यास के गोल छेद बने होते हैं। छेद की संख्या 5 या 6 होती है। दोनों खंभों के मध्य गेड़ा यानी कि मोटा डंडा फंसाकर गेट बंद किया जाता है। गेट खोलते समय गेड़ा को किनारे सरका दिया जाता है। बस्तर के छेरछेरा पर्व में इससे संबंधित एक गीत भी गया जाता है।
छठ पूजा और मतदान
राज्य के कई जिलों में भोजपुरी समाज के लोग बड़ी संख्या में हैं। इनमें से कई परिवारों का पैतृक निवास बिहार और यूपी के गांवों में है। छत्तीसगढ़ से इस मौके पर बिहार-यूपी जाने वालों की संख्या इतनी अधिक है कि रेलवे को स्पेशल ट्रेन भी चलानी पड़ती है। जो लोग नहीं जाते, वे यहां खरना के दिन से उपवास शुरू करते हैं, जो करीब 36 घंटे चलता है। इस बार खरना 17 नवंबर को है और इसी दिन राज्य में दूसरे चरण का मतदान भी होना है। ऐसे में भोजपुरी समाज की ओर से मतदान की तिथि बदलने की मांग उठने लगी है। बिलासपुर के अरपा नदी में एक बड़ा छठ घाट है, जहां हजारों भोजपुरी समाज के लोग त्यौहार मनाने के लिए एकत्र होते हैं। भिलाई, रायगढ़, खरसिया, अंबिकापुर, कोरिया आदि के औद्योगिक क्षेत्रों में भी ये बड़ी संख्या में निवासरत हैं। अब इन्हें चिंता सता रही है कि उपवास रहते हुए वे पूजा-पाठ करें या मतदान के लिए कतार में लगें। उनकी ओर से मांग उठ रही है कि मतदान की तारीख बदली जाये।
23 नवंबर को एकादशी है। इस दिन राजस्थान में बड़ी तादात में विवाह होते हैं। इसे देखते हुए वहां मतदान की तारीख चुनाव आयोग ने दो दिन आगे बढ़ाकर 25 नवंबर कर दी है। एक बार चुनाव की तारीखें घोषित होने के बाद आयोग प्राय: उसमें फेरबदल नहीं करता। पर राजस्थान के मामले में उसे रिपोर्ट मिली कि विवाह के कारण प्रशासन को वाहनों और कर्मचारियों की व्यवस्था करने में भी दिक्कत आ सकती है। छत्तीसगढ़ में देखना होगा कि आयोग क्या निर्णय लेता है।

भाजपा प्रत्याशियों के बाद अब तक का बड़ा प्रदर्शन ठाकरे परिसर में देखने को मिला है। जशपुर से रायमुनी भगत को बदलने पूर्व मंत्री गणेश राम भगत के समर्थन में राशन पानी लेकर कार्यकर्ता डेरा जमा चुके हैं। गणेश राम इतने व्यथित हैं कि रायमुनी का नाम घोषित होते ही अपने आंसु नहीं रोक पाए।
बाफना राजस्थान निकल गए
टिकट वितरण के बाद बागियों को मनाने में भाजपा के दिग्गज नेताओं को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। प्रदेश प्रभारी ओम माथुर, और नितिन नबीन दो दिन पार्टी दफ्तर में डटे रहे, और सुबह से शाम तक टिकट कटने से नाराज नेताओं को मनाने की कोशिश करते रहे। उन्हें थोड़ी बहुत सफलता भी मिली है, लेकिन ज्यादातर नेता अब भी नाराज बताए जा रहे हैं।
जगदलपुर के पूर्व विधायक संतोष बाफना को माथुर ने बुलाया, और अधिकृत प्रत्याशी किरण देव के पक्ष में काम करने की समझाइश दी। मगर बाफना ने साफ तौर पर कह दिया कि वो किसी भी दशा में जगदलपुर में काम नहीं करेंगे। उन्होंने कहा बताते हैं कि वो राजस्थान जा रहे हैं, और लौटने के बाद अगर पार्टी चाहे तो किसी दूसरी सीट पर प्रचार का जिम्मा दे सकती है।
माथुर ज्यादा कुछ जोर नहीं दे सके, और फिर बाफना राजस्थान निकल गए। मगर दंतेवाड़ा से दिवंगत भीमा मंडावी की पत्नी ओजस्वी मंडावी को मनाने में माथुर सफल रहे, लेकिन आरंग, बालोद, और रायपुर की सीटों पर प्रत्याशी की घोषणा के बाद जो असंतोष फैला है, वह कम होने का नाम नहीं ले रहा है। यह साफ है कि बागी नहीं माने, तो चुनाव में दिक्कत हो सकती है।
सिंधी-गुजराती समाज
भाजपा में सिंधी, और गुजराती समाज से प्रत्याशी तय नहीं हुए हैं। कांग्रेस में तो वैसे भी दोनों समाजों के लिए गुंजाइश काफी कम दिख रही है। इन चर्चाओं के बीच एक खबर यह है कि दोनों समाज के प्रमुख नेता, रायपुर की चारों में से एक सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रहे हैं। दोनों समाज के लोग आर्थिक रूप से सक्षम भी हैं, और एक पूर्व विधायक को इसके लिए तैयार करने की कोशिश हो रही है। पूर्व विधायक ने तो फिलहाल मना कर दिया है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस टिकट की अधिकृत घोषणा के बाद दोनों समाज मिलकर कोई ठोस फैसला ले सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।
बाबा के खिलाफ कौन?
डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव इस बार कड़े मुकाबले में फंस सकते हैं। इसके लिए भाजपा रणनीति बना रही है। इससे पहले भाजपा अंबिकापुर को लेकर ज्यादा सीरियस नहीं रही है। भाजयुमो के प्रभारी अनुराग सिंहदेव ने पहली बार तो टीएस को कड़ी टक्कर दी थी। बाद में उनकी खुद की स्थिति खराब हो गई। इसके बाद के चुनाव में उनके हार का अंतर बढ़ गया।
पिछले चुनाव में विरोध के बाद भी अनुराग को फिर टिकट दे दी गई, और टीएस रिकॉर्ड वोटों से जीत गए। पार्टी के कई लोग टिकट तय करने वाली कोर टीम के सदस्यों पर टीएस से मिलीभगत के आरोप भी लगाते रहे हैं। मगर इस बार आरोपों से बचने के लिए ऐसे प्रत्याशी की तलाश हो रही है, जो सिंहदेव को कड़ी टक्कर दे सके।
कोर टीम के साथ दिक्कत यह है कि अंबिकापुर शहर के ज्यादातर नेताओं के टीएस से घनिष्ठता है। ऐसे में कांग्रेस से आए दो प्रमुख नेता आलोक दुबे, और राजेश अग्रवाल पर नजरें टिकी है। आलोक, टीएस की जमीन के मामले पर शिकायतकर्ता हैं, और लड़ाई लड़ रहे हैं। इन सबको देखकर पार्टी उन्हें उम्मीदवार बना सकती है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
हटाए गए अफसरों का नुकसान
यूं तो लोकतंत्र के सबसे बड़े त्यौहार चुनाव में वोट डालना बड़े गर्व कारी माना जाता है आजकल तो वोट डालने को इवेंट की तरह प्रचारित भी किया जा रहा है। उसमें किसी अधिकारी कर्मचारी को चुना कराने का अवसर बीएलओ, सेक्टर प्रभारी, एआरओ और डीआरओ के रूप में मिले तो वह शान से कह सकता है कि इस सरकार या मंत्री, मुख्यमंत्री, विधायक के निर्वाचन में मेरी भूमिका रही है।
यह भूमिका इसलिए कि आयोग ने जिन प्रशासनिक और पुलिस अफसरों को हटाया है वे अब कभी चुनाव संबंधी काम नहीं कर जाएंगे। आयोग उनकी ड्यूटी नहीं लगाएगा। हालांकि प्रशासनिक अफसर हमेशा कलेक्टर नहीं रहेंगे। वे पदोन्नत होकर महानदी, इंद्रावती भवन में बैठेंगे। सो सचिवों की ड्यूटी तो लगती नहीं। लेकिन उन्हें दीगर राज्यों में पर्यवेक्षक भी नहीं बनाया जाता है। और कभी राज्य के सीईओ बनाने का अवसर आया तो आयोग के पैनल भी नाम नहीं होगा। सबसे बड़ा नुकसान पुलिस अफसरों को होगा। वे किसी भी चुनावी कार्य में कभी तैनात नहीं किए जाएंगे। बस मन को तसल्ली होगी कि चलो बचे रहे चुनाव ड्यूटी नहीं लगी।
क्या फिर बगावत करेंगे चोपड़ा?
महासमुंद से सन् 2013 में निर्दलीय विधायक चुने गए डॉ. विमल चोपड़ा बाद में अपनी पार्टी भाजपा में वापस आ गए थे। सन् 2018 में भी वे निर्दलीय लड़े, लेकिन केवल 21 हजार वोट हासिल कर पाए। कांग्रेस प्रत्याशी विनोद चंद्राकर ने भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार को 23 हजार से अधिक वोटों से हराया। चुनाव 2023 में भाजपा ने पार्टी के जिला उपाध्यक्ष योगेश्वर राजू सिन्हा को मैदान में उतारा है। डॉ. चोपड़ा के समर्थक पार्टी के इस फैसले से निराश हैं। उन्होंने चोपड़ा से मिलकर उनसे निर्दलीय चुनाव लडऩे का आग्रह किया है। चोपड़ा ने कोई निर्णय नहीं लिया है। सन् 2018 के आंकड़ों से पता चलता है कि यदि चोपड़ा के वोट भाजपा को मिल जाते तो कांग्रेस उम्मीदवार को शिकस्त देने की स्थिति बन जाती। यदि वे इस बार फिर निर्दलीय उतरते हैं तो भाजपा को यह सीट हासिल करने के लिए काफी मेहनत करनी होगी। वैसे यह कोई कारण नहीं हो सकता कि चोपड़ा ने पिछली बार भाजपा को नुकसान पहुंचाया, इसलिए उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। बगल की बसना सीट से सन् 2018 में निर्दलीय लडऩे वाले संपत अग्रवाल को तो भाजपा ने इस बार अपनी टिकट से उतार ही दिया है। फर्क इतना है कि संपत अग्रवाल को करीब 50 हजार वोट मिले थे और निर्दलीय लडक़र उन्होंने भाजपा को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था। जबकि चोपड़ा पांचवे नंबर थे। भाजपा, जेसीसी प्रत्याशी और एक निर्दलीय मनोज साहू को उनसे अधिक वोट मिले थे।
मिलते-जुलते नाम वाला दल
मिलते-जुलते नाम वाले प्रत्याशी ही नहीं, इस बार पार्टियां भी मैदान में दिखने वाली हैं। जनता कांग्रेस पार्टी की ओर से कल 32 उम्मीदवारों की सूची जारी की गई तो लोगों को लगा कि यह स्व. अजीत जोगी की पार्टी के हैं। पर थोड़ी ही देर में प्रदेश अध्यक्ष पूर्व विधायक अमित जोगी का बयान आ गया कि उनकी कोई सूची जारी नहीं की गई है। जो सूची बताई जा रही है, वह फर्जी है। दरअसल, यह सही है कि यह जेसीसी की सूची नहीं है, पर फर्जी होने की बात में पेंच है। इस दल, जनता कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष संतोष सोनवानी का दावा है कि उनकी अलग पार्टी है। दस राज्यों में उनका संगठन है और डॉ. मेहताब रॉय इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। चुनाव आयोग में दल का पंजीयन भी है।
पूर्व मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने जब दल का नाम जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जोगी) रखते हुए इसका ऐलान किया, तभी स्पष्ट किया था कि उन्हें आशंका है कि कुछ मिलते-जुलते नाम वाले दल मैदान में आ जाएंगे, इससे भ्रम होगा। इसलिए उन्होंने खास तौर पर अपने दल के नाम के साथ जोगी और छत्तीसगढ़ को जोड़ा है। फिलहाल दूसरी, तीसरी पार्टियों की तरह जेसीसी के किसी उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई है।
तीसरे दलों को कांग्रेस का इंतजार
भाजपा में कांग्रेस के मुकाबले बागी उम्मीदवार कम निकलते हैं। प्रदेश में पांच को छोडक़र बाकी सारी सीटों पर उम्मीदवार तय कर देने के बाद असंतोष तो देखने को मिला लेकिन किसी ने अब तक बगावत कर मैदान में उतरने की घोषणा नहीं की है। आगे हो सकता है। इधर कांग्रेस की सूची जारी नहीं हुई है। कल 15 अक्टूबर को एक साथ ज्यादातर सीटों के नाम आने की बात कही जा रही है। पर, कांग्रेस को छोड़ दें, आम आदमी पार्टी, सर्व आदिवासी समाज और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) ने भी नाम रोक रखे हैं। चर्चा यही है कि इन तीनों दलों को उम्मीद है कि कांग्रेस में टिकट की घोषणा होने के बाद बगावत कर मैदान में उतरने वाले कई लोग सामने आएंगे। इन असंतुष्टों पर तीसरे दलों की निगाह है। इनमें भी अगर कोई मौजूदा विधायक किसी तीसरे दल के हाथ लग जाए तो फिर तो बात जम जाएगी ! सुनने में तो यह भी आया है कि आम आदमी पार्टी ने भाजपा के टिकट वितरण के बाद कुछ दावेदारों को अपने चुनाव-चिन्ह पर उतरने का ऑफर दिया था, लेकिन बात नहीं बनी। जेसीसी (जे) के बारे में भी कहा जा रहा है कि वहां भी कांग्रेस की सूची का इंतजार हो रहा है। बसपा को परवाह नहीं रही, उसने अपनी उन सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं, जहां से उसे लडऩा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कल छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। संभवत: वे कल सूची भी जारी करें। पूर्व के चुनावों में सपा ने कांग्रेस के कुछ बागियों को टिकट दी थी।
एक तस्वीर अपने शहर की

सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को पोस्ट करते हुए एक आईपीएस ने लिखा- यह न्यूयार्क नहीं, अपना रायपुर शहर है। लोगों ने जवाब दिया, हमें न्यूयार्क लग भी नहीं रहा है। दूसरे ने कहा कि सर पर गमछा बांधकर बाइक चलाने वाले तो अपने रायपुर में ही मिलेंगे।
भारत जोड़ो से खुला रास्ता
चर्चा है कि कांग्रेस की तीन महिला नेत्रियों की टिकट के लिए हाईकमान रुचि ले रहा है। ये नेत्रियां राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में साथ थीं। और उनके साथ कन्याकुमारी से कश्मीर तक पैदल चलीं। इनमें से एक शशि सिंह प्रेमनगर से जिला पंचायत की सदस्य हैं। शशि, दिवंगत पूर्व मंत्री तुलेश्वर सिंह की पुत्री हैं। खास बात यह है कि वो प्रेम नगर विधानसभा के मौजूदा भाजपा प्रत्याशी भुवन सिंह मरावी को हराकर ही जिला पंचायत की सदस्य चुनी गई हैं। जबकि दो अन्य कांति बंजारे, और आशिका कुजूर भी अपने इलाके में अच्छा प्रभाव रखती हैं।
कांति बंजारे जिला पंचायत की सदस्य रह चुकी हैं, और वो डोंगरगढ़ सीट से टिकट चाहती हैं। इसी तरह आशिका कुजूर का नाम जशपुर सीट से चर्चा में है। मगर दिक्कत यह है कि तीनों सीट पर पार्टी के ही विधायक हैं। प्रेमनगर से खेलसाय सिंह काफी सीनियर विधायक हैं। ऐसे में उनकी जगह शशि सिंह को एडजेस्ट करने में दिक्कत है। इसी तरह वो डोंगरगढ़ से भुवनेश्वर बघेल और जशपुर से विनय भगत विधायक हैं, और उनकी पुख्ता दावेदारी है। ऐसे में उनकी टिकट काटना आसान नहीं है। फिर भी सर्वे रिपोर्ट का अवलोकन किया जा रहा है, और तीनों महिलाओं के लिए रास्ता बनाने की कोशिश भी हो रही है। देखना है आगे क्या होता है।
कटघरे के विधायकों का क्या होगा?
चर्चा है कि कोल स्कैम में फंसे विधायक देवेन्द्र यादव, और चंद्रदेव राय की टिकट को लेकर कांग्रेस असमंजस में है। यादव और चंद्रदेव राय के खिलाफ ईडी ने चालान पेश कर दिया था, और उन्हें 25 अक्टूबर को ईडी की विशेष अदालत में पेश होना है। इससे पहले उन्हें जमानत भी लेनी होगी।
कहा जा रहा है कि दोनों विधायकों की टिकट को लेकर काफी चर्चा हुई है, और दोनों के मसले पर कानूनी राय ली गई है। एक चर्चा यह भी है कि देवेन्द्र की जगह उनकी पत्नी को पार्टी चुनाव मैदान में उतार सकती है। जबकि चंद्रदेव राय की जगह किसी अन्य दावेदार के नाम पर विचार हो सकता है। देखना है कि इस पूरे मामले में पार्टी क्या कुछ फैसला लेती है।
कभी खुशी कभी गम
खबर है कि कांग्रेस पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के खिलाफ जिला कांग्रेस अध्यक्ष भागवत साहू को प्रत्याशी बना सकती है। भागवत का नाम आते ही रमन सिंह समर्थक खुश हैं, और मान रहे हैं कि उन्हें बड़ी जीत हासिल होगी। भाजपा के रणनीतिकार रमन सिंह के खिलाफ करूणा शुक्ला जैसी कोई मजबूत प्रत्याशी की उम्मीद पाले हुए थे। जिन्होंने 2018 के चुनाव में रमन सिंह की राह काफी कठिन कर दी थी।
दूसरी तरफ, कांग्रेस के लोग भागवत साहू को मजबूत मान रहे हैं, और कहा जा रहा है कि इससे राजनांदगांव के ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस को अच्छा समर्थन मिलेगा। हालांकि कुलबीर छाबड़ा जैसे कई और दावेदार चर्चा में हैं। देखना है कि कांग्रेस 15 तारीख को किसके नाम पर मुहर लगाती है।
पुलिस हाईकोर्ट को दे देनी चाहिए

हाईकोर्ट की लगातार निगरानी की वजह से छत्तीसगढ़ के एक-दो बड़े शहरों में पुलिस दिखावे के लिए सडक़ों पर डीजे, लाउडस्पीकर, और शोर करने वाली मोटरसाइकिलों पर दिखावे की कुछ कार्रवाई कर रही है। लेकिन अदालत के आदेश के बावजूद ऐसे लोगों पर अदालत की अवमानना का कोई मामला नहीं बनाया जा रहा है। नतीजा यह होता है कि मामूली जुर्माना देकर लोग छूट जाते हैं, और दुबारा वैसी हरकत करने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती। क्या पुलिस को नियमों के तहत कार्रवाई न करने की कोई छूट हो सकती है क्या? जितने नियम तोड़े जा रहे हैं, और सोच-समझकर तोड़े जा रहे हैं, उन पर जुर्माने और सजा के सारे प्रावधान लागू क्यों नहीं किए जाते?
कल बिलासपुर के एक वरिष्ठ भूतपूर्व पत्रकार प्राण चड्ढा ने बिलासपुर कोटा रोड पर मोबाइल से फोचो खींची है जिसमें कोई दर्जन भर स्कूली बच्चे एक ऑटोरिक्शा में खतरनाक तरीके से लादकर ले जाए जा रहे हैं। इन पर तो बच्चों की जान खतरे में डालने का जुर्म भी लगाना चाहिए, लेकिन सबको मालूम है कि पुलिस, आरटीओ के साथ कारोबारी गाडिय़ों का कैसा रिश्ता रहता है, और क्यों रहता है, इसलिए लोगों की जान बिक्री इसी तरह चलती रहती है, सडक़ों पर रोज मौतें होते रहती हैं। कई बार ऐसा लगता है कि पुलिस महकमा हाईकोर्ट के ही हाथ दे देना चाहिए, तो शायद इसकी जवाबदेही कुछ तय हो सके।
भला हुआ चुनाव आ गया...
आचार संहिता लागू होने के चलते जांच और कार्रवाई की दहशत से गुजर रहे कई लोगों को फिलहाल राहत मिल गई है। चुनाव के बाद जब नई सरकार बनेगी तो उसकी प्राथमिकता में ये मामले रहेंगे, यह आज दावे से नहीं कहा जा सकता। दिव्यांगों के एक संगठन ने 56 लोगों के खिलाफ दस्तावेजों के साथ शिकायत की थी कि ये फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी कर रहे हैं। उनकी शिकायत दो साल से शासन के पास पड़ी थी, पर अगस्त सितंबर में जब इन्होंने आंदोलन किया, तब जांच आगे बढ़ाई गई। पर अब तक इनमें से सिर्फ एक पर कार्रवाई हुई है। महासमुंद की कृषि विभाग में सहायक संचालक ऋचा दुबे को बर्खास्त किया गया। मेडिकल बोर्ड ने पाया कि श्रवण बाधित होने का उसका प्रमाण पत्र फर्जी है। मुंगेली और बिलासपुर के दो डॉक्टरों पर ऊंगली उठी है कि ये फर्जी प्रमाण पत्र उन्होंने ही जारी किए, पर न तो फिलहाल इन डॉक्टरों पर कोई कार्रवाई होने की उम्मीद है और न ही शेष 55 लोगों के प्रमाण पत्रों की जांच होने की संभावना दिख रही है। इसी तरह, बीते जुलाई माह में विधानसभा सत्र के दौरान अनुसूचित जाति के युवाओं ने सडक़ पर नग्न प्रदर्शन किया था। इनका आरोप है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर 267 लोग नौकरियों पर कब्जा करके बैठे हैं। इनकी बर्खास्तगी का आदेश 3 साल पहले दिया जा चुका है पर वे अपने पदों पर बैठे हैं। नग्न प्रदर्शन करने वाले गिरफ्तार कर लिए गए। करीब दो माह बाद जमानत पर छूट गए। नग्न प्रदर्शन से हड़बड़ाकर सरकार ने उच्च-स्तरीय जाति छानबीन समिति को प्रकरणों पर जल्द फैसला लेने कहा, लेकिन कुछ दिनों में मामला ठंडा पड़ गया।
इसी साल स्कूल शिक्षा विभाग में करीब 10 हजार शिक्षकों का प्रमोशन हुआ। इनमें से 4 हजार शिक्षकों को गलत तरीके से काउंसलिंग के बिना ही मनचाही पोस्टिंग दी गई। एक एक पोस्टिंग पर डेढ़ से दो लाख रुपये की वसूली की शिकायत आई। इस बीच स्कूल शिक्षा मंत्री का प्रभार रविंद्र चौबे को मिला। उन्होंने पोस्टिंग को तो रद्द करने का आदेश दिया, लेकिन जिन संयुक्त संचालकों और लिपिकों को निलंबित किया गया, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई। एफआईआर का केवल ऐलान किया गया था। इन पर भी अब कोई कार्रवाई होने की उम्मीद निकट भविष्य में नहीं है।
टमाटर सडक़ पर..

कुछ माह पहले टमाटर 150-200 रुपये किलो पहुंच गया तब हाहाकार मच गया था। पर अब स्थिति ठीक उल्टी हो गई है। रायगढ़, सरगुजा और जशपुर इलाके में बड़े पैमाने पर टमाटर की खेती की जाती है। छत्तीसगढ़ के अलावा पड़ोसी राज्यों में इसकी बड़ी डिमांड होती है। पर इस बार उत्पादन के मुकाबले मांग फिर घट गई है। किसानों का कहना है कि इस बार उनकी लागत भी नहीं निकल रही है। यह तस्वीर झारखंड से सटे छत्तीसगढ़ के रामानुजगंज जिले की है, जहां किसानों ने व्यापारियों को तीन रुपये किलो में बेचने से बेहतर यह समझा कि इसे सडक़ों पर फेंक दिया जाए। जरूरतमंद लोग टमाटर उठाकर ले जा रहे हैं। बाकी सब्जियों के दाम वैसे भी चढ़े हुए हैं। मवेशियों को भी आहार मिल रहा है।
अफ़सरों का हटना बाक़ी है ?
आचार संहिता लगते ही चुनाव आयोग ने एक झटके में दो कलेक्टर, 3 एसपी समेत कुल 8 अफसरों को फील्ड से हटा दिया। चर्चा है कि पूरी कार्रवाई भाजपा की शिकायत पर की गई है। दो माह पहले आयोग की टीम आई थी तब बकायदा इन अफसरों के नाम दिए गए थे।
कहा जा रहा है कि कुछ और अफसरों के नाम भी हैं जिन्हें अभी हटाया नहीं गया है। देर सबेर उन्हें भी हटाया जा सकता है। चर्चा है कि पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी और अन्य प्रमुख नेताओं ने इन अफसरों की सूची तैयार की थी। और फिर पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और सांसद सुनील सोनी की अगुवाई में पार्टी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार से मिलकर शिकायती पत्र सौंपा था। हल्ला है कि एक लिस्ट और आ सकती है जिसमें कुछ एसपी और कलेक्टर भी हो सकते हैं। देखना है आगे क्या होता है।
बैठक का वीडियो
कांग्रेस की बैठक के बीच सीएम भूपेश बघेल के मोबाइल पर कैंडी क्रश खेलने का मसला सुर्खियों में रहा। इस पर सीएम बघेल और पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के बीच ट्वीटर पर काफी कुछ कहा गया। सीएम ने साफगोई से कह भी दिया कि कैंडी क्रश मेरा फेवरेट है। लेवल भी ठीक-ठाक है आगे भी खेलता रहूंगा।
बावजूद इसके कांग्रेस के अंदर खाने में इस तरह की वीडियो जारी करने पर विवाद हो रहा है। यह बात छनकर आई है कि जिस वक्त सीएम कैंडी क्रश खेल रहे थे उस समय प्रत्याशी चयन के लिए बैठक शुरू भी नहीं हुई थी। स्क्रीनिंग कमेटी की इस बैठक में चेयरमैन अजय माकन और अन्य सदस्य ऑनलाइन जुड़ रहे थे।
इधर, राजीव भवन में बैठक के लिए प्रभारी सैलजा, सीएम और विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत, डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव के आने का इंतजार कर रहे थे। तब तक फुर्सत के क्षणों में सीएम कैंडी क्रश खेलने लग गए। इसी बीच संचार विभाग के नेताओं पर मीडिया का जल्द से जल्द फोटो और वीडियो जारी करने का दबाव था और फिर बैठक शुरू होने से पहले आईटी सेल के एक पदाधिकारी ने वीडियो और फोटो जारी कर दिया। बैठक में क्या हुआ इससे ज्यादा कैंडी क्रश को लेकर बहस शुरू हो गई। जिसे नेशनल मीडिया ने भी हाथों हाथ ले लिया।
ईश्वर को टिकट तो दुर्गेश को क्यों नहीं
भाजपा के प्रत्याशी चयन को लेकर कार्यकर्ताओं में भारी खीज दिख रही है। कार्यकर्ता कह रहे हैं कि अगर हिंदुत्व का ही झंडा बुलंद करना है तो फिर कवर्धा से दुर्गेश देवांगन को टिकट क्यों नहीं दी गई। कवर्धा में हिंदुत्व की असली लड़ाई तो दुर्गेश देवांगन ने ही लड़ी थी। तब खूब प्रचारित किया गया कि अपनी जान की बाजी लगाकर हिंदु दुर्गेश ने भगवा ध्वज का सम्मान किया। उसे घेरकर पीटा गया, लेकिन दुर्गेश नहीं झुका। इस मुद्दे पर दो साल पहले जमकर राजनीति भांजी गई। जब बीरनपुर की घटना के पीडि़त ईश्वर साहू को टिकट दी जा सकती है, जिसने हिंदुत्व के लिए कुछ नहीं किया है तो फिर दुर्गेश की टिकट क्यों विजय शर्मा ले उड़े।
राजनीति में अपने-अपने दावे
चुनाव का बिगुल फूंका जा चुका है। अब प्रत्याशियों के अपने अपने दावे हैं। ऐसा ही एक दावा राजपरिवार की बहूरानी ने किया है। उन्होंने मीडिया में कहा कि उन्होंने ढाई साल में 50 हजार किलोमीटर की पदयात्रा की है। जनता के बीच रही हैं तो जनता का समर्थन मिलना तय है। उन्हें जिस सीट से भाजपा ने टिकट दी है, उस सीट पर उनके पति दो बार विधायक रह चुके हैं। पिछली बार बहूरानी को मौका मिला था लेकिन चुनाव हार गईं। यह भी सही है कि उनके पति के निधन के बाद वे अपना राजघराना छोडक़र विधानसभा क्षेत्र में ही निवास करने लगीं। लेकिन उनके इस दावे पर कार्यकर्ता ही सवाल खड़े कर रहे हैं कि ढाई साल यानी लगभग 900 से 1000 दिन में 50 हजार किलोमीटर की पदयात्रा कैसे हो सकती है। इसके लिए तो रोज 50 किमी चलना पड़ेगा। इतनी तो सडक़ ही उस विधानसभा में नहीं है। खैर दावे तो दावे हैं मतदाता थोड़े ही टेप लेकर नापने जाएंगे।
ज्यादा इंटेलिजेंट कौन- सरकार या सट्टेबाज
जिनके पास संवैधानिक ताकत होती है। शासन-प्रशासन का पूरा तंत्र रहता है। वो ज्यादा इंटेलिजेंट है या फिर 12वीं पास महादेव एप वाला सौरभ चंद्राकर। एक छोटे से गांव से निकलकर महादेव जूस सेंटर चलाने वाला तीन-चार साल में ही करोड़ों का मालिक बन जाता है। सट्टा एप चलाकर इतनी अकूत संपत्ति बना लेता है कि दुबई में जाकर बस जाता है। अरबपतियों जैसी शादी करता है। इस शाही शादी के प्रदर्शन में छत्तीसगढ़ के लोगों को मेहमान बनाकर चार्टर्ड प्लेन में ले जाता है। आश्चर्य की बात है कि तब तक न तो केंद्रीय एजेंसियों को इसकी भनक थी और न ही राज्य सरकार के इंटेलिजेंस विभाग को। केंद्र सरकार के पास विदेशों तक की खुफिया खबर रखने वाला बहुत बड़ा तंत्र होता है। कौन कहां से कैसे करोड़ों का लेन-देन कर रहा है। इसकी जानकारी जुटाना डिजिटल युग में बहुत कठिन नहीं है। लेकिन आखिर 12वीं पास सौरभ चंद्राकर के इस कारोबार की खबर किसी को कैसे नहीं हुई। लोग कहने लगे है कि सीबीआई और ईडी को तो विपक्ष के नेताओं के चिल्हर पकडऩे में लगा दिया गया है तो फिर उन्हें इतनी फुरसत कहां कि जूस सेंटर वाले के कारोबार की ओर नजर डालें। ऐसा ही स्थानीय एजेंसियों का हाल है।
तोहमत से बचने के लिए...
भारतीय जनता पार्टी के टिकट वितरण से जिन इलाकों में असंतोष है, उनमें जगदलपुर विधानसभा भी शामिल है। यहां से पूर्व विधायक संतोष बाफना पिछली बार 27 हजार के भारी अंतर से रेखचंद जैन से चुनाव हार गए थे। इस बार भाजपा ने पूर्व महापौर किरण देव पर दांव लगाया है। चूंकि हार जीत का फासला ज्यादा था, इसलिये प्रत्याशी बदलने के फैसले ने कार्यकर्ताओं को चौंकाया नहीं। पर बाफना की संगठन में अच्छी पकड़ रही है। किरण देव को भी उन्होंने एक वक्त राजनीति में आगे बढ़ाया। टिकट कटने से निराश बाफना के समर्थकों ने उनके घर पहुंचकर उनके समर्थन में नारेबाजी की और संगठन के सामने टिकट कटने का विरोध जताने का निर्णय लिया। पर बाफना ने कुछ अलग सोच रखा है। वे अपनी तरफ से कोई शिकायत नहीं करने जा रहे हैं। उन्होंने अपने समर्थकों को पार्टी प्रत्याशी के लिए काम करने कहा है। खुद को लेकर संगठन को संदेश पहुंचा दिया है कि वे चुनाव प्रचार तो करेंगे, मगर जगदलपुर में नहीं। इस सीट को छोडक़र बाकी 89 में से किसी भी जगह भेज दें काम कर लेंगे। नाहक, भितरघात का आरोप लगेगा। फिलहाल तो वे राजस्थान निकल गए हैं।
लडऩे व जीतने का रिकॉर्ड इनके नाम...
इस बार विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसे उम्मीदवार हैं, जिनका पूरा जीवन ही चुनाव लड़ते-लड़ते बीता है और अधिकांश बार उन्हें जीत भी हासिल हुई है। मसलन, रामपुर के विधायक ननकीराम कंवर 12वीं बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। अब तक वे 6 बार चुनाव जीत चुके हैं। इस सीट से प्यारेलाल कंवर भी पांच बार जीते। अधिकांश मौकों पर दोनों के बीच ही मुकाबला होता रहा। अब तक यहां 14 विधानसभा चुनाव हुए। कोरबा जिले के बोधराम कंवर भी बार-बार चुनाव लडऩे और जीतने वाले नेता हैं। कांग्रेस ने उन्हें टिकट देना तब बंद किया जब उन्होंने खुद लडऩे से मना किया। सात बार वे कटघोरा से तो एक बार पाली-तानाखार से, कुल 8 बार चुनाव लड़े। सन् 2013 में एक बार वे लखन लाल देवांगन से हारे, बाकी 7 बार उन्हें जीत मिली। पत्थलगांव से विधायक रामपुकार सिंह अब तक 10 बार चुनाव लड़ चुके हैं। दो बार हारे, आठ बार जीत चुके हैं। 2023 की कांग्रेस टिकट अभी फाइनल नहीं हुई है, पर रेस में वे इस बार भी शामिल हैं। मुंगेली विधायक व भाजपा शासन में मंत्री रहे पुन्नूलाल मोहले 6 बार विधायक और चार बार सांसद रह चुके हैं। लोकसभा और विधानसभा दोनों में ही जीत का ऐसा रिकॉर्ड शायद ही किसी दूसरे नेता के पास छत्तीसगढ़ में हो। वे केवल एक बार अपना पहला चुनाव जरहागांव विधानसभा से हारे थे। उसके बाद जब भी लड़े, जीतते गए। भाजपा की टिकट से वे 12 वीं बार मुंगेली विधानसभा से उतर गए हैं।
दुश्मनी भारी पड़ रही है
तेज तर्रार विधायक बृहस्पति सिंह को डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव से अदावत भारी पड़ती दिख रही है। दो बार के विधायक बृहस्पति सिंह पिछले दिनों दिल्ली में थे, और पार्टी के प्रमुख नेताओं से चर्चा कर अपनी टिकट पक्की कराने में जुटे थे। मगर उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला।
दूसरी तरफ, सिंहदेव बृहस्पति सिंह की जगह पूर्व मेयर डॉ. अजय तिर्की को टिकट देने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। इससे बृहस्पति सिंह के समर्थकों के सब्र का बांध टूटता दिख रहा है। दो दिन पहले बृहस्पति सिंह सिंह के समर्थकों ने बलरामपुर में सभा बुलाई थी। इसमें करीब 5 हजार लोग जुटे। सभा में साफ तौर पर कहा गया कि बृहस्पति सिंह के अलावा कोई और प्रत्याशी मंजूर नहीं होगा। यही नहीं, बृहस्पति सिंह के कुछ उत्साही समर्थकों ने टीएस के खिलाफ नारेबाजी भी की।
जानकार बताते हैं कि यदि बृहस्पति सिंह को टिकट नहीं मिली, तो वो खामोश बैठने वालों में नहीं है। वो निर्दलीय चुनाव मैदान में कूद जाएंगे। ऐसा वो एक दफा कर भी चुके हैं। हालांकि उन्हें, और समर्थकों को सीएम भूपेश बघेल पर भरोसा है। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है। मगर कांग्रेस में विवाद से विशेषकर बृहस्पति सिंह के प्रतिद्वंदी भाजपा प्रत्याशी रामविचार नेताम खुश दिख रहे हैं।
गौरीशंकर को जिम्मा
चर्चा है कि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। कसडोल में पिछले चुनाव अनजान चेहरे से बुरी हार के बाद पार्टी उनकी जगह किसी और नाम पर विचार कर रही है। कसडोल में प्रत्याशी की अधिकृत घोषणा नहीं की गई, लेकिन चर्चा है कि इस मसले पर गौरीशंकर की राय ली गई है।
बताते हैं कि गौरीशंकर अग्रवाल के उन्हें कोई और जिम्मेदारी देने जा रही है। इस सिलसिले में प्रदेश प्रभारी ओम माथुर ने पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह, और अन्य नेताओं से चर्चा की। चूंकि प्रदेश अध्यक्ष, तीनों महामंत्रियों, और पूर्व सीएम व तमाम दिग्गजों के चुनाव मैदान में उतर गए हैं। ऐसे में चुनाव मैनेजमेंट की कमान गौरीशंकर को दी जा सकती है। गौरीशंकर पहले भी पार्टी का चुनाव प्रबंधन देखते रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।
सत्ता की सहूलियत
चुनाव में सरकार होने का फायदा तो फील्ड में मिलता ही है। क्योंकि सरकारी विभागों से राजनीतिक दलों, नेताओं प्रत्याशियों को कई तरह की कागजी अनुमति,एनओसी लेनी होती है। इसके एवज में विभाग केवल नो, नहीं दी जा सकती, नहीं दी जाती है भर लिखवाना, लिखना होता है बस। जब विभाग से लाल चिडिय़ा बैठे तो आयोग भी कुछ नहीं कर पाता। आने वाले दिनों में ऐसी समस्या से सभी विपक्षी प्रत्याशी जूझने वाले हैं। कुछ तो जूझने भी लगे हैं। खबर है कि भाजपा ने पीएम की वर्चुअल सभाओं के लिए सभी 90 सीटों पर एलईडी स्क्रीन वैन की अनुमति आयोग से मांगी है।
आयोग ने आरटीओ से एन ओ सी तलब किया है। आरटीओ अभी चुनाव कार्य में व्यस्त हैं। दफ्तर में मिलते ही नहीं । एक सप्ताह से एजेंसी और पार्टी के लोग चक्कर काट रहे हैं। और आखिरी में जब मिलेंगे तब आरटीओ कहेंगे, इतने की अनुमति नहीं दी जा सकती । और भी दल, प्रत्याशी हैं। आपको दस की ही अनुमति दी जाती है । ऐसे विपक्ष को सबसे बड़ी दिक्कत दारू को लेकर होने वाली है। विभाग ने ऐसी किलेबंदी कर रखी है कि विपक्ष एक एक घूंट देने तरस जाएगा।
कप्तान की चेतावनी
उत्तर छत्तीसगढ़ के एक प्रत्याशी और जिलाध्यक्ष पूर्व मंत्री भी रहे हैं। वे वोटर्स के कुछ फ्रीबीज का इंतजाम कर रहे थे। कप्तान साब ने मैसेज भिजवाया कि न करें नहीं तो रासुका लगा दूंगा। देखे यह चेतावनी ही रहती है या लगती है ।
भाजपा नेताओं को ‘बेटी’ की फटकार...

भाजपा की दूसरी सूची ने ऐसे दावेदारों को भावुक कर दिया है। सन् 2018 में बिंद्रानवागढ़ के विधायक डमरूधर पुजारी ने करीब 10 हजार वोटों से कांग्रेस के संजय नेताम को हराया था। इस बार उनकी जगह गोवर्धन राम मांझी को टिकट दी है। पुजारी सदमे में हैं और उन्होंने मीडिया के सामने दुख भी जताया है। पूछ रहे हैं गलती क्या हुई, जो टिकट काटी गई। कह रहे हैं- होना कुछ नहीं है, फिर भी संगठन से बात करेंगे। इधर सोशल मीडिया पर दूसरा दर्द छलका है, स्व. भीमा मंडावी की बेटी दीपा मंडावी का। स्व मंडावी ने कड़े मुकाबले में कांग्रेस लहर के बीच देवती कर्मा को करीब 2100 वोटों से हराया था। सन् 2019 में नक्सलियों ने उनकी हत्या कर दी। इसके बाद हुए उप-चुनाव में स्व. भीमा मंडावी की पत्नी ओजस्वी को भाजपा ने खड़ा किया, जबकि देवती कर्मा फिर चुनाव लड़ी। ओजस्वी करीब 11 हजार वोटों से हार गईं। हालांकि इस चुनाव में ओजस्वी को 37 हजार के करीब वोट मिले जो भीमा मंडावी को जीत में मिले 35 हजार वोटों से अधिक था।
अब ट्विटर (एक्स) पर ओजस्वी-भीमा की बेटी दीपा ने सीधे आरोप लगाया है कि उनकी मां ओजस्वी की टिकट काटकर पिता के बलिदान को बेइज्जत किया गया है। उनका कहना है कि –मेरे पापा ने पार्टी के लिए अपनी जान दी, उनके जाने के बाद हमें अपने कल का पता नहीं था, फिर भी मम्मी ने हमें संभाला और पापा की जगह ली। क्या मेरे पापा के बलिदान की कोई कीमत नहीं है? पापा को यहां की जनता अब भी चाहती है, मेरी मां ने उनके अधूरे कामों को पूरा करने के लिए ही राजनीति में कदम रखा था। पार्टी से जवाब चाहिए।
अभी 5 सीटों पर टिकट की घोषणा बाकी है। इनमें बेलतरा सीट भी है, जहां के विधायक रजनीश सिंह ठाकुर ने त्रिकोणीय संघर्ष में सन् 2018 में भाजपा के लिए जीत हासिल की थी। डॉ. रमन सिंह, सौरभ सिंह, प्रबल प्रताप सिंह, संयोगिता सिंह, धर्मजीत सिंह और एक दो और नाम ठाकुर या राजपूत समाज से प्रत्याशी तय हो चुके हैं। ऐसे में रजनीश सिंह की टिकट को खतरे में माना जा रहा है। वे अभी खामोश हैं, उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। इसकी वजह यह भी हो सकती है कि बेलतरा से कोई नाम अभी घोषित नहीं किया गया है।
कांग्रेस का धार्मिक विश्वास बड़ा
भारतीय जनता पार्टी ने 85 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है लेकिन अब तक कांग्रेस की एक भी सूची नहीं आई है। पहले कहा जा रहा था कि कर्नाटक के फॉर्मूले पर काम करते हुए कुछ उम्मीदवारों के नाम सितंबर के पहले सप्ताह में घोषित कर दिए जाएंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। कांग्रेस की बैठकें लगातार हो रही हैं, यह भी बात बाहर फैलाई जा रही है कि अधिकांश सीटों पर सिंगल नाम तय हो चुके हैं, पर जिस तरह की देरी हो रही है, उससे कयास लगाये जा रहे हैं कि आम सहमति नहीं बन पा रही है। चर्चा यह है कि मौजूदा विधायकों में किसकी टिकट बरकरार रखी जाए, किसकी काट दें- यह तय नहीं हो पा रहा है। दूसरी तरफ टिकटों की घोषणा रोकने का एक पवित्र कारण भी प्रचारित किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि शुभ काम पितृ पक्ष में नहीं किये जाते, इसलिये घोषणा रुकी है। 15 अक्टूबर से नवरात्र शुरू हो रहा है, उसके साथ ही घोषणा का सिलसिला शुरू होगा। ऐसा करके कांग्रेस एक बार फिर प्रचारित कर सकेगी धार्मिक मान्यताओं की उसे भाजपा से कहीं अधिक परवाह है।
टिकट फाइनल, अब वीडियो का वक्त
भाजपा में प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद से असंतुष्ट नेता अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। दुर्ग जिले की सीटों के प्रत्याशियों के नामों की घोषणा के बाद से नाराज नेता, वरिष्ठ नेताओं से मिलकर अपना विरोध जता रहे हैं। इन सबके बीच एक भाजपा प्रत्याशी का वीडियो वायरल हुआ है। जिसमें वो अपने यहां के म्युनिसिपल में कमीशनखोरी पर बेबाकी से चर्चा करते नजर आ रहे हैं।
भाजपा प्रत्याशी यह कहते दिख रहे हैं कि भाजपा शासनकाल में म्युनिसिपल में निर्माण कार्यों पर 8 फीसदी तक कमीशन लेते-देते रहे हैं। तत्कालीन महापौर से लेकर स्थानीय विधायक को कितना कमीशन मिलता रहा है, इसका विस्तार से जिक्र करते दिख रहे हैं। प्रत्याशी के खिलाफ पहले ही पार्टी में भारी विरोध हो रहा था, और अब वीडियो वायरल होने के बाद पार्टी के रणनीतिकार हलाकान हैं। कुछ लोगों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस तरह के कई और वीडियो सामने आ सकते हैं। इस तरह के वीडियो का जवाब ढूंढने में पार्टी नेताओं को कठिनाई हो रही है।
ईश्वर को चेक देने की कोशिश
भाजपा ने बिरनपुर सांप्रदायिक हमले में मारे गए भुवनेश्वर साहू के पिता ईश्वर साहू को साजा से ताकतवर मंत्री रविन्द्र चौबे के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारकर एक बड़ा दांव खेला है। स्वाभाविक है कि भुवनेश्वर की मौत के बाद इलाके में ईश्वर-साहू परिवार के प्रति सहानुभूति है।
साजा, और उसके आसपास की विधानसभा सीटों पर साहू मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में ईश्वर के भाजपा प्रत्याशी बनने के कांग्रेस के नेता असहज भी दिख रहे हैं। इसका अंदाजा उस वक्त लगा जब ईश्वर साहू को प्रत्याशी बनाए जाने की चर्चाओं के बाद पिछले दिनों बेमेतरा के एक राजस्व अफसर, ईश्वर साहू से मिलने गए, और उनसे सहायता राशि 10 लाख का चेक लेने का आग्रह किया।
दरअसल, सीएम भूपेश बघेल ने भुवनेश्वर साहू की हत्या के बाद परिजनों को 10 लाख रुपए सहायता राशि, और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी। मगर भुवनेश्वर के पिता ने सहायता राशि लेने से मना कर दिया था। इसके बाद से जिला प्रशासन के लोग उनसे राशि लेने का आग्रह करते रहे। शुरुआत में मना होने के बाद प्रशासन के लोग तकरीबन प्रकरण को ठंडे बस्ते में डाल दिया था, लेकिन जब ईश्वर साहू के राजनीति में आने की चर्चा शुरू हुई, तो प्रशासन ने फिर बिरनपुर की ओर रुख किया।
इस बार भी वो सहायता राशि लेने के लिए राजी करने में नाकाम रहे। भाजपा घटना के कुछ दिनों बाद 11 लाख की सहायता राशि उपलब्ध साहू परिवार को साध चुकी है। अब ईश्वर साहू खुद चुनाव मैदान में उतर चुके हैं, तो बिरनपुर प्रकरण को लेकर जंग तेज होने के आसार है। इसका कांग्रेस, और रविन्द्र चौबे किस तरह सामना करते हैं, यह देखना है।
करोड़ों खर्च, पर टिकट न मिली
भाजपा की सूची जारी होने के बाद से तकरीबन हर जिले में बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं। पार्टी के कुछ लोग इसके लिए संगठन के नेताओं को भी जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। बताते हैं कि संगठन के नेताओं ने कई जगहों पर आर्थिक रूप से ताकतवर नेताओं को चुनाव लड़ाने की योजना बनाई थी। ये दावेदार, पदाधिकारियों के इशारे पर दिल खोलकर खर्च करते रहे। मगर उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया गया।
ऐसे ही रायपुर की सीमा से सटे विधानसभा क्षेत्र में तो एक जनपद के पूर्व पदाधिकारी को सरकार के मंत्री के खिलाफ लड़ाने के संकेत दिए थे। पार्टी का इशारा पाकर पदाधिकारी ने खूब खर्च किए। कुछ लोग बताते हैं कि वो टिकट से पहले ही करोड़ों खर्च कर चुके हैं। मगर ऐन वक्त में पार्टी ने किसी दूसरे को उम्मीदवार बना दिया। अब इतना खर्च कर चुके नेता का चुप रहना अस्वाभाविक है। चर्चा है कि कुछ दावेदार तो थोड़ा और खर्च कर अपने प्रत्याशी को निपटाने की सोच रहे हैं। देखना है कि पार्टी बगावती तेवर वाले इन नेताओं को कैसे समझाती है।
2024 में कितने उप-चुनाव होंगे?
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 में भारतीय जनता पार्टी ने वह हर एक सुराख बंद करने की कोशिश की है जिससे जीत की संभावना पर असर हो। अपने चार सांसदों रेणुका सिंह, गोमती साय, अरुण साव और विजय बघेल को एक साथ मैदान में उतारने से बड़ा दांव इसीलिये खेला गया है। इन सभी को उन सीटों से टिकट दी गई है जहां भाजपा की लोकसभा में जीत का अंतर ठीक-ठाक था। साव लोरमी से मैदान में उतर चुके हैं। यह उनका गृह जिला है। वे लोरमी में कम समय दें तो भी काम चल सकता है क्योंकि आखिर उन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभालनी है।
चुनाव परिणामों के बाद बनने वाली कुछ तस्वीरों के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। एक, भाजपा को बहुमत मिल गया और चारों सांसद जीत जाते हैं, तो क्या होगा? इनमें से दो, विजय बघेल और अरुण साव मुख्यमंत्री पद की रेस में होंगे। रेणुका सिंह और गोमती साय को भी मंत्रिमंडल में लेना होगा।
वहीं, यदि ये चारों अपना चुनाव तो जीत जाएं लेकिन विधानसभा में विपक्ष में बैठना होगा, तब? इनमें से कोई एक तो नेता प्रतिपक्ष बन दिए जाएंगे, पर बाकी क्या विधायक के रूप में काम करना चाहेंगे? यद्यपि लोकसभा में उनका कार्यकाल भी कुछ माह बाद समाप्त होने वाला है, पर वे दोबारा लोकसभा क्यों नहीं पहुंचना चाहेंगे? फिर क्या विधानसभा की सदस्यता से ये सांसद इस्तीफा देंगे। यदि ऐसा हुआ तो 2024 में विधानसभा उप-चुनाव भी जरूर होंगे।
सन् 2003 में राज्यसभा सदस्य रहते हुए (स्व.) रामाधार कश्यप को तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अकलतरा से विधानसभा की टिकट दी थी। कश्यप ने लगातार दो बार के विधायक छतराम देवांगन को हरा दिया। पर जोगी की सरकार नहीं बनी और कश्यप ने विधायक की सीट छोड़ दी। वहां उप-चुनाव हुआ, छत राम देवांगन फिर से लड़े और जीतकर विधानसभा चुनाव पहुंच गए।
एक अनुमान इससे भी बुरा लगाया जा सकता है। मान लें कि इनमें से कुछ या सभी सांसद विधानसभा चुनाव ही हार गए तब क्या होगा? क्या उन्हें फिर से लोकसभा की टिकट मिलेगी? या फिर किनारे कर दिए जाएंगे।
जोखिम वाली सीटें तो बढ़ गईं...
कांग्रेस ने अपने बीते 57-58 महीने के कार्यकाल में यह बात बार-बार दोहराई कि माओवादी हिंसा पर उसने काफी हद तक काबू पा लिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी अपने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान कहा है कि नक्सली नियंत्रण में हैं और 2024 लोकसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ से उनका सफाया हो जाएगा। पर ये सब बातें राजनीतिक हैं। चुनाव आयोग को खतरा पिछली बार से कुछ कम नहीं दिखाई देता, बल्कि अधिक ही दिख रहा है। सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में पहले चरण का मतदान 12 नवंबर को कराया गया था। इसमें बस्तर की सभी 12 सीटों के अलावा राजनांदगांव जिले की 6 सीटें शामिल थीं। यानि कुल 18 संवेदनशील विधानसभा सीटें थीं। इस बार 2023 में प्रथम चरण में 20 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। 12 सीटें तो यथावत बस्तर संभाग की हैं, 8 दुर्ग संभाग से शामिल हैं, जिनमें राजनांदगांव की सीटें भी हैं। यानि पहले चरण में इस बार पिछली बार से दो सीटें अधिक हैं। माना जा सकता है कि नक्सल वारदातों में कुछ कमी आने के बावजूद चुनाव आयोग ने शांतिपूर्ण चुनाव पुख्ता तरीके से निपटाने के लिए ही ऐसा किया होगा। वैसे अभी तो चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा ही हुई है। नामांकन से लेकर मतदान और मतगणना की लंबी प्रक्रिया अगले 55 दिनों तक चलने वाली है। यह ध्यान रखना होगा कि सन् 2018 में पहले चरण के मतदान के 15 दिन पहले से नक्सली हिंसा शुरू हुई थी। अलग-अलग घटनाओं में 5 ग्रामीणों की मौत भी हो गई थी। इसके बावजूद मतदान का प्रतिशत 74 से अधिक था।
हाईवे पर छात्राओं का चक्का जाम

गीदम, बस्तर के जवांगा ग्राम में पुरानी स्कूल बिल्डिंग का रंग-रोगन करके स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल तो खोल दिया गया लेकिन यहां शिक्षकों की व्यवस्था नहीं की गई। जुलाई से अब तक स्थिति यही बनी हुई है। कलेक्टर, शिक्षा अधिकारियों और प्राचार्य के सामने यहां की छात्राओं ने कई बार मांग उठाई, लेकिन समस्या हल करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। मजबूरन छात्राएं नेशनल हाईवे पर ही सडक़ जाम करके बैठ गईं। आसपास में यह पहला मौका था, जब छात्राओं ने नेशनल हाईवे पर उतरकर चक्काजाम किया। एक बार फिर अधिकारियों ने आश्वासन देकर उनका आंदोलन खत्म करा दिया। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के नाम पर खोले गए आत्मानंद स्कूलों का यह हाल है।
जिसके राज खोलने हों, उम्मीदवार बना दो
भाजपा प्रत्याशियों की सूची लीक होने के बाद करीब दर्जनभर से अधिक क्षेत्रों में प्रदर्शन हो रहा है, और प्रत्याशी बदलने की मांग हो रही है। बालोद जिले के पदाधिकारी तो सोमवार को सुबह-सुबह रायपुर पहुंच गए, और उन्होंने प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय से मिलकर राकेश यादव के खिलाफ दर्ज अपराधिक प्रकरणों की जानकारी देकर उन्हें बदलने की मांग की। इस सिलसिले में पदाधिकारियों ने दस्तावेज भी दिए हैं।
पार्टी ने पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष राकेश यादव को बालोद से प्रत्याशी बना रही है। इसका अधिकृत ऐलान होना बाकी है। ऐसे में पार्टी के भीतर राकेश के विरोधी उन्हें बदलने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। चुनाव आयोग के नियम के मुताबिक जिन प्रत्याशियों के खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज हैं, उन्हें अखबारों में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित कर इसकी जानकारी देनी होगी।
पदाधिकारियों का कहना था कि यादव को टिकट देने से चुनाव में पार्टी के असुविधाजनक स्थिति पैदा होगी। चर्चा है कि साय ने पूरी बात सुनी, लेकिन टिकट बदलने का कोई आश्वासन नहीं दिया। यही नहीं, दो दिन पहले प्रदेश अध्यक्ष ने प्रत्याशी बदलने की मुहिम में जुटे एक पूर्व विधायक को बुलाकर साफ तौर पर बता दिया कि लीक हुई सूची में कोई बदलाव नहीं होगा। ऐसे में विरोध-प्रदर्शन का कोई मतलब नहीं है।
चुनाव और चार्जशीट
चुनाव आचार संहिता प्रभावशील होने के साथ पुलिस, और पूरा प्रशासनिक अमला चुनाव आयोग के अधीन आ गया है। इन सबके बीच रायपुर पुलिस एक अलग ही टेंशन में हैं। इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक घोटाला केस में जिला अदालत ने मौखिक रूप से प्रकरण की जांच कर जल्द चालान पेश करने कहा था।
चर्चा है कि बाद की सुनवाई में पुलिस की तरफ से कहा गया कि इस सिलसिले में लिखित आदेश की जरूरत होगी। फिर क्या था, अदालत ने आदेश भी दे दिए, और 20 तारीख को चालान पेश करने के लिए तिथि तय कर दी।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इंदिरा बैंक केस में भाजपा के दिग्गज नेताओं का नाम है, और ये सभी चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। ऐसे में पुलिस की टेंशन बढ़ गई है कि चार्जशीट का क्या किया जाए। चर्चा है कि पिछले दिनों जिला अदालत के बाद रायपुर पुलिस के सीनियर अफसरों ने इसको लेकर बैठक भी की। अब पुलिस का रुख क्या होता है, ये आने वाले दिनों में पता चलेगा।
टिकट के दावेदार डॉक्टर का गुस्सा

बस्तर में स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त संचालक डॉ. बीआर पुजारी को लेकर पिछले एक साल से चर्चा थी कि वे भाजपा की टिकट पर बीजापुर सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। जैसा कि उनका खुद दावा है कि भाजपा के सर्वे में उनका नाम सबसे ऊपर आया था। टिकट का आश्वासन मिलने पर कुछ माह पहले उन्होंने वीआरएस का आवेदन विभाग में लगा दिया था। उस आवेदन पर विचार तो हुआ नहीं उल्टे उनका कम महत्व के पद पर जिला चिकित्सालय जगदलपुर में स्थानांतरित कर दिया गया। बीजापुर सीट से पूर्व मंत्री महेश गागड़ा भी चुनाव लडऩा चाहते हैं। इसलिये यह स्पष्ट नहीं है कि उनके वीआरएस की मंजूरी को रोकने और बीजापुर से हटाने में कांग्रेसियों का हाथ है या भाजपाईयों का। पर डॉ. पुजारी ने अपने एक वाट्सएप ग्रुप में प्रतिक्रिया जरूर दी है। उन्होंने बीजापुर में 20 साल लंबी अपनी सेवा को याद करते हुए कहा है कि सर्वे में मेरा नाम आने से ही कुछ लोगों की हालत खराब हो गई है, जबकि टिकट किसे मिलेगी यह तय नहीं है। मुझे बुलाकर बोल देते, वीआरएस नहीं लगाता-चुनाव भी नहीं लड़ता। मेरा डिमोशन कर दिया गया है। मेरे संवैधानिक, मौलिक अधिकार को दबाने का प्रयास हो रहा है। मेरे साथ साजिश रची गई, समय आने पर सबकी पोल खोलूंगा।
फिलहाल लोग कयास लगा रहे हैं कि क्या डॉ. पुजारी को वीआरएस मिल पाएगा? यदि नहीं मिल पाया तो इस कितना फायदा गागड़ा को, और मौजूदा कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी को मिलेगा?
ट्रैफिक संभालने वाले की बुद्धि
सडक़ यातायात संभालना आसान नहीं होता है। इसके लिए बड़ा अमला सडक़ से लेकर मुख्यालय तक में तैनात रहता है। लेकिन राजधानी के प्रवेश द्वार टाटीबंध चौक में ट्रैफिक व्यवस्था तय करने वालों की बुद्धि को देखकर हर कोई खीज जाता है। आम राहगीर भी समझ जाते हैं कि कैसे वहां के ट्रैफिक जाम को स्मूथ किया जा सकता है। पहले तो फ्लाईओवर बनने के इंतजार में लोग ट्रैफिक जाम को झेलते रहे। अब फ्लाईओवर बन गया है तो भाठागांव से बिलासपुर जाने वाले वाहनों के लिये नीचे का रास्ता बंद कर दिया गया है और फ्लाईओवर के नीचे उतरते ही मुख्य सडक़ पर कट दे दिया गया है। इसके कारण रोज लंबा जाम लग रहा है। लंबा इंतजार करने वाले लोगों के मुंह से निकल ही जाता है कि ट्रैफिक वालों को इतनी बुद्धि नहीं है क्या?
आखिरी दम तक उम्मीद
अब जब आचार संहिता लागू हो चुकी, कांग्रेस उम्मीदवारों की कोई सूची जारी नहीं हो पाई है। भाजपा की भी अधिकारिक रूप से एक ही सूची जारी हुई है। जो दूसरी सूची वायरल हुई उसे अधिकारिक होने से पार्टी ने इंकार कर दिया। जब तक सूची रुकी हुई है, दावेदारों में उम्मीद बनी हुई है। रायगढ़ जिले में हाल ही में दो कोशिशें हुई हैं। लैलूंगा की ईसाई आदिवासी महासभा ने कांग्रेस नेताओं को पत्र लिखकर मांग की है कि वर्तमान विधायक चक्रधर सिदार को कदापि रिपीट नहीं किया जाए। समाज की बैठक इस बारे में हो चुकी है। उन्होंने सिदार को टिकट मिलने पर उनका विरोध करने का निर्णय लिया है। इनके अनुसार सिदार निष्क्रिय हैं और ईसाई समाज से किये गए वायदों को उन्होंने पूरा नहीं किया। इधर रायगढ़ में कोलता समाज की ओर से भाजपा के प्रभारी ओम माथुर को पत्र लिखा गया है। इसमें मांग की गई है कि रायगढ़ सीट से समाज का प्रत्याशी खड़ा किया जाए। उनके 65 हजार वोट हैं। लगभग चेतावनी के अंदाज में यह भी पत्र में बताया गया है कि पिछले कुछ चुनावों में कोलता समाज को टिकट नहीं देने की वजह से किस तरह निर्दलीय उम्मीदवारों ने खड़े होकर भाजपा का खेल बिगाड़ा था।
ये दोनों पत्र कांग्रेस और भाजपा के नेताओं तक पहुंचे या नहीं, यह तो पता नहीं- मगर मीडिया के पास समय पर पहुंच गए। वैसे अब प्रत्याशियों की सूची को जब दोनों ही दल अंतिम रूप देने लगे हैं। ऐसी स्थिति में मीडिया के माध्यम से आ रहे इन दबावों का टिकट तय करने पर कितना असर होगा, देखना होगा।
नदी के उस पार स्कूल...

बस्तर में बच्चों को अपना भविष्य गढऩे के लिए किस तरह उफनती नदियों को बांस की बल्लियां लगाकर पार करना पड़ता है, इस पर तस्वीरें पहले आ चुकी हैं। हाईकोर्ट में पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने जवाब दिया है कि वहां पुल बनाने के लिए टेंडर हो चुका है। पर ऐसी हालत जगह-जगह दिखाई देती है। प्रशासन क्या कर रहा है, विकास इन तक अब तक क्यों नहीं पहुंचा, यह सवाल बार-बार खड़ा हो रहा है। यह तस्वीर कोंडागांव जिले के कोनगुड नदी का है, जिसे पार कर नवमीं, दसवीं और 11वीं के बच्चे पढऩे के लिए स्कूल तक पहुंच पाते हैं।
तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूँ
कांग्रेस की राजनीति में सीएम भूपेश बघेल, और दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी के रिश्तों में तल्खी रही है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि जोगी जब सीएम थे तब भूपेश कई मर्तबा कैबिनेट की बैठक में नहीं जाते थे। वो अपने कक्ष में ही रहते थे। और जब अंतागढ़ टेपकांड उजागर हुआ, तो जोगी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने में भूपेश की बड़ी भूमिका रही है।
आप सोच रहे होंगे कि यहां भूपेश और अजीत जोगी के रिश्तों का जिक्र क्यों किया जा रहा है। दरअसल, राजनांदगांव जिले की सीटों के पूर्व विधानसभा प्रत्याशियों ने पिछले दिनों कांग्रेस का दामन थामा। उन्होंने अपने कांग्रेस प्रवेश का जो कारण गिनाया, वो लाजवाब था। इन नेताओं में से एक ने तो यहां तक कहा कि भूपेश बघेल में अजीत जोगी की छवि दिखाई देती है, इसलिए वो कांग्रेस में शामिल हुए हैं। यह सुनकर वहां मौजूद कांग्रेस नेता, सवालिया अंदाज से एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।
स्वागत की लिस्ट और बग़ावत

बीते 29 सितंबर को पीएम मोदी के स्वागत में जो कुछ रायपुर एयरपोर्ट पर हुआ । कहीं वह भाजपा में परंपरा तो नहीं बन रहा । क्या है न देखा देखी जल्दी सीखा जाता है। अबकी बार यह जगदलपुर में हुआ। इससे पार्टी के फील्ड वर्कर इतने नाराज हैं कि केंद्रीय मंत्री विश्वेश्वर टुडु की बैठक का ही अघोषित बहिष्कार कर दिया । उन्होंने शनिवार को शक्ति केंद्रों के प्रभारियों की बैठक बुलाई थी। बहिष्कार की वजह 3 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान उनके स्वागत, मुलाकात वाली सूची में वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की उपेक्षा ।
मुलाकातियों की जो सूची बनाई गई उसमें दिग्गज नेताओं के परिजन और ऐसे लोगों के नाम थे जो किसी नेता की परिक्रमा करते हो अथवा करीबी है । इससे ही नाराज 15 में से एक भी शक्ति केंद्र प्रभारी बैठक में नहीं पहुंचे ।
नाराज कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव में झंडा बांधने से लेकर दरी बिछाने तक का काम हमसे करवाते हैं जब शीर्ष नेताओं से मुलाकात का समय आता है,तो हमारी उपेक्षा कर चापलूसों को आगे बढ़ा देते हैं । कुछ नेताओं के परिजनों को एयरपोर्ट से लेकर लाल बाग की आम सभा तक का पास उपलब्ध कराया गया। एक ही परिवार के दो से तीन लोगों को पास देकर प्रधानमंत्री से मिलने का अवसर दिया । वहां तो ठीक है, रायपुर में तो नेताजी की पत्नी की किटी पार्टी की मेंबर्स को भी पास दे दिया गया था।
नए आए और आगे निकल गए
शनिवार को ठाकरे परिसर में हंगामा रहा। लीक हुई सूची शामिल प्रत्याशियों के विरोध में नारे बुलंद होते रहे। ये दोनों ही दावेदार नवप्रवेशी भाजपाई हैं। इनमें से एक पांच वर्ष पूर्व और एक पांच माह पूर्व भगवा दुपट्टा पहना था। पिछले चुनाव में एक जीते तो दूसरे भाजपा को जीतने नहीं देने वालों में रहे।अब बात करें इनके विरोध का। तो असफल दावेदार ,नेता ही करा रहे। दो बार के विधायक का विरोध एक पूर्व मंत्री और एक नेताजी करवा रहे। इन. दोनों पहले भी न्यायधानी से लगे ओबीसी बहुल क्षेत्र में ठाकुर विरोधी कार्यक्रम कर चुके हैं। और अब विरोध का झंडा थामे लोगों को राजधानी तक ले आए। दरअसल नेताजी की इलाके में पकड़ कमजोर हो रही। इमेज, इंंटेलिजेंस के मामले में ठाकुर बहुत आगे निकल गए हैं। दूसरे प्रत्याशी को कोलता समाज नहीं चाहता। क्योंकि अब तक भाजपा से इसी वर्ग के लोगों को अवसर मिलता रहा है,और नवप्रवेशी दावेदार वैश्य समाज से हैं।
ख़ुशबू के नाम पर भ्रष्टाचार की बदबू
छत्तीसगढ़ वैसे तो धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन एक अधिकारी ऐसे हैं जो इसे सुगंधित हर्बल उत्पाद के लिए प्रसिद्ध करना चाहते हैं। वन विभाग के इन अधिकारी को 2006 में उद्यानिकी विभाग की जिम्मेदारी मिली थी, तो खूब प्रचार-प्रसार के साथ जामारोजा, पामारोजा, यूकेलिप्टस सहित दर्जन हर्बल पौधे लगवाए। करोड़ों रूपए खर्च करके सुगंधित तेल निकालने का संयंत्र लगाया गया। किसानों को करोड़ों रूपए के पौधे मुफ्त में बांटे गए। क्लस्टर एप्रोच जैसे नई शब्दों का मोहजाल बुना गया और सरकार ने भी खूब साथ दिया। दक्षिण भारत से आने वाले ये आईएफएफ आफिसर जब उद्यानिकी से हटे, तब पता चला कि जिन हर्बल खेती से ये किसानों को मालामाल करना चाहते थे, उसके पौधों की सप्लाई इनके परिचितों ने की थी। तकरीबन 8-10 साल बाद फिर से ये आईएफएस अफसर अपने फुलफार्म में नजर आ रहे हैं। इस बार इनके पास वन विभाग का एक बोर्ड है। अब वही पुरानी योजना का सब्जबाग दिखा रहे हैं और राष्ट्रीय चैनलों के कार्यक्रमों में दावा कर रहे हैं कि यहां के किसान ने एक एकड़ में डेढ़ लाख सुगंधित तेल बेचकर कमाए। किसान भी भौचक हैं कि उन्होंने तो कमाएं नहीं, हो सकता है इसके पौधे बेचने वाले दूसरे राज्यों के किसानों की आय अधिकारी बता रहे होंगे।
मंत्री बदले तो काम भी अटक गए
सूबे के एक कद्दावर मंत्री ने अपने विभाग के एक बोर्ड से अपने क्षेत्र में ऐसा काम करवाया, जैसा आज तक नहीं हुआ था। अनाज वाले इस बोर्ड में टैक्स का काफी पैसा इक_ा होता है, मंत्री जी ने अपने क्षेत्र के हर गांव में उस टैक्स के पैसे से सीसी रोड बनवाना शुरु किया। फिर गांव गांव में किसान सदन बनवाये। इनमें वोट बैंक का ऐसा ख्याल रखा गया कि किसान सदन भी समाज के नाम से बनाए गए। जैसे किसान सदन लोधी समाज, किसान सदन धनगर समाज। वैसे तो यह बोर्ड पूरे प्रदेश का टैक्स संग्रह करता है लेकिन काम मंत्री जी ने केवल अपने क्षेत्र में ही करवाये।
दो महीने पहले मंत्री जी का प्रभार बदल गया, उनकी जगह उनके पुराने न चाहने वाले मंत्री को प्रभार दे दिया गया। तब होना क्या था नए मंत्री ने जितने काम बचे हुए थे, उनकी टेंडर निरस्त कर दिया और अपने क्षेत्र के लिये सीसी रोड बनाने का पिटारा खोल दिया।
ठाकरे परिसर में भीड़, नाराज मांडविया
भाजपा प्रत्याशियों की सूची लीक होने के बाद कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को प्रदेश भाजपा के सह चुनाव प्रभारी डॉ मनसुख मांडविया ठाकरे परिसर पहुंचे, तो प्रदर्शनकारियों की भीड़ देखकर खफा हो गए।
उन्होंने सह चुनाव प्रभारी नितिन नबीन, और केदार कश्यप से पूछ लिया कि सूची जारी नहीं हुई, यह सार्वजनिक रूप से बता दिया गया है। बावजूद प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के प्रदर्शन से सारी मेहनत पर पानी फिरता जा रहा है। मगर जिस अंदाज में सूची लीक हुई है,उससे कार्यकर्ताओं समझाना मुश्किल हो गया है कि सूची असली नहीं है।
माथुर कोप भवन में?
चर्चा है कि प्रदेश भाजपा के चुनाव प्रभारी ओम माथुर विधानसभा प्रत्याशियों की सूची लीक होने के बाद से कोप भवन में चले गए। माथुर प्रत्याशियों की सूची लीक होने के बाद से दिल्ली में हैं, और वो राजस्थान चले गए। माथुर प्रधानमंत्री की जगदलपुर की सभा में भी नहीं थे। कहा तो यह भी जा रहा है वो शायद ही छत्तीसगढ़ आए। चर्चा यह भी है कि उन्होंने यहां के नेताओं का फोन तक उठाना बंद कर दिया है। हालांकि पार्टी नेता कह रहे हैं कि माथुर जल्द रायपुर आएंगे, और प्रदेश का दौरा करेंगे। देखना है कि आगे क्या होता है।
कांग्रेस में चरम गुटबाजी

कांग्रेस जब सत्ता में होती है तो इनके नेताओं के बीच वर्चस्व की होड़ मच जाती है। यही फिर बाद में उसकी हार का कारण बनता है। अंतागढ़ विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों जो कुछ हो रहा है वह दिलचस्प है। बीते चार साल से नगर पंचायत पखांजूर के अध्यक्ष बप्पा गांगुली और विधायक अनूप नाग को यहां के कार्यकर्ता आपस में भिड़ते देख रहे हैं। इसका चरम हाल ही में देखने को मिला। नगर पंचायत के अधोसंरचना मद से करीब 8 करोड़ के विकास कार्यों का लोकार्पण और शिलान्यास कराये गए। इसके लिए 80 शिलालेख तैयार किए गए। किसी में भी कांग्रेस के नगर पंचायत अध्यक्ष ने कांग्रेस विधायक का नाम लिखाना जरूरी नहीं समझा। निमंत्रण पत्रों से भी विधायक का नाम गायब है। बताते हैं कि विधायक अनूप नाग भी करोड़ों के कार्य मंजूर करते हैं पर किसी भी काम के लिए नगर पंचायत को एजेंसी नहीं बनाते। अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर है, कांग्रेस इस गुटबाजी से कैसे निपटती है, देखना होगा।
टिकट तो नहीं, डांट मिली
भूपेश बघेल अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं। टिकट के कई दावेदारों को तो वो यह कहकर उल्टे पांव लौटा चुके हैं कि उनके लिए कोई गुंजाइश नहीं है। जबकि बाबा, और दीपक बैज दावेदारों का बायोडाटा ले लेते हैं, और टिकट तय न होने के बावजूद दावेदारों का मन रखने के लिए उन्हें चुनाव तैयारियों में जुटने के लिए कह भी देते हैं।
कांग्रेस में कई को तो इशारा भी किया जा चुका है। इससे परे कई दावेदार नेता, बाकियों के मुकाबले सीएम के इशारे का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। ऐसे ही रायपुर की एक सीट से टिकट के दावेदार ने एक कार्यक्रम के बाद मौका पाकर सीएम से अकेले में मुलाकात की, और उनसे अपनी टिकट के लिए आशीर्वाद मांगा।
भूपेश बघेल ने उन्हें डपट दिया, और कह दिया कि उन्हें किसी भी दशा में आशीर्वाद नहीं मिल सकता। उनकी आवाज इतनी तेज थी कि कई लोगों को सुनाई पड़ गई। इसके बाद पार्टी फोरम में बात फैल गई। दरअसल, वे इस बात से खिन्न रहे कि दावेदार को पिछले चुनाव में तैयार रहने के लिए कहा गया था लेकिन वो ऐनवक्त में पीछे हट गए। यह साफ हो चला है कि चुनाव तैयारियों में काफी कुछ फूंकने के बावजूद दावेदार नेता टिकट की दौड़ से बाहर हो गए हैं।
मायके से टिकट
केन्द्रीय मंत्री रेणुका सिंह कोरिया जिले के भरतपुर-सोनहत सीट से चुनाव लडऩा चाहती हैं। पार्टी ने भी इसके लिए सहमति दे दी है। भरतपुर-सोनहत में रेणुका सिंह का मायका है। यह उनके संसदीय क्षेत्र का भी हिस्सा है। चुनाव तैयारियों में जुटने से पहले तक रेणुका सिंह ने भरतपुर-सोनहत के लिए कुछ विशेष नहीं किया। और अब जब उनकी टिकट पक्की हो गई है तो उन्होंने केन्द्रीय रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव से मिलकर रायपुर-अंबिकापुर, और एक अन्य ट्रेन का स्टॉपेज उदलपुर, और नागपुरा में देने की मांग की है। दोनों ही स्टेशन भरतपुर-सोनहत विधानसभा का हिस्सा है। अब चुनाव में इसका कितना फायदा मिलता है यह देखना होगा।
पोलिंग बूथ आपके द्वार
चुनाव आयोग ने 80 बरस पार के बुजुर्ग और दिव्यांगों को घर बैठकर मतदान करने की सुविधा प्रदान की है। मतदान दल ऐसे लोगों के घर जाकर बैलेट पेपर से मतदान करवाएगा। मगर यह सब कुछ आसान नहीं है। इससे मतदान दलों को परेशानी उठानी पड़ सकती है।
विधानसभा उपचुनावों में भी इस तरह की सुविधा दी गई थी। खैरागढ़ में तो कई असमर्थ लोगों को मत डालने में सहयोग करने पर राजनीतिक पार्टी के लोगों में आपस में विवाद भी हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि वर्ष-2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, भाजपा से कुल 96 हजार वोट से पीछे रह गई थी, और कुछ सीटें मामूली वोट से हार गई थी। कांग्रेस की सरकार बनते-बनते रह गई। बैलेट पेपर से वोटिंग के पात्र बुजुर्ग और दिव्यांगों की संख्या लाखों में है। अब जब ऐसे में इन वोटों के लिए जगह-जगह खींचतान होने के आसार भी दिख रहे हैं।
दारू केस आगे बढ़ेगा?
शराब घोटाला केस में शराब कारोबारी-अफसरों के खिलाफ ईडी कार्रवाई तेज कर सकती है। हाईकोर्ट ने कारोबारी अनवर ढेबर समेत चार लोगों की जमानत याचिका खारिज कर दी। इनमें से कुछ को मेडिकल ग्राउंड पर जमानत मिली हुई थी। खास बात यह है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने रायगढ़ और जगदलपुर में अपने भाषण में प्रदेश में शराब घोटाले का प्रमुखता से जिक्र किया था। प्रधानमंत्री के भाषण के बाद अंदाजा लगाया जा रहा है कि शराब केस में कार्रवाई तेज हो सकती है। और अब जब जमानत खारिज हुई है तो इन चर्चाओं को बल भी मिला है। देखना है आगे क्या होता है।

राजधानी से लगे एक अस्पताल में स्वास्थ्य सेवा । ([email protected])
लीक हुई सूची, और तैयारी
भाजपा में प्रत्याशियों की सूची लीक होने के बाद भले ही नए सिरे से नामों को लेकर मंथन चल रहा है, लेकिन कुछ जगहों पर तो प्रभावशाली नेताओं ने ताकत दिखाने का मन बना लिया है।
प्रदेश अध्यक्ष अरूण साव कह चुके हैं कि पार्टी ने अधिकृत तौर पर कोई सूची जारी नहीं की है। लीक हुई सूची के नामों को भी उन्होंने खारिज किया है। बावजूद इसके पार्टी दफ्तर में प्रदर्शन के लिए रोजाना सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ता पहुंच रहे हैं। ये कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों से प्रत्याशी बदलने की मांग कर रहे हैं। अब तक एक दर्जन से अधिक क्षेत्रों में बवाल मचा हुआ है।
दूसरी तरफ, कई प्रभावशाली नेता सूची देखकर इतने ज्यादा नाराज हैं कि उन्होंने निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने का मन बना लिया है। राजनांदगांव जिले के एक पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष ने बकायदा अपने समर्थकों की बैठक ली, और उसमें निर्दलीय चुनाव लडऩे की रणनीति पर चर्चा की। पार्टी के कई नेता मानते हैं कि दर्जन भर क्षेत्रों में कई स्थानीय नेता पार्टी छोडकऱ निर्दलीय चुनाव मैदान में कूद सकते हैं। पार्टी बागियों को मनाने के लिए क्या कुछ करती है, यह यह देखना होगा।
पीएससी और राजनीति

चर्चा है कि पीएससी में चेयरमैन पद पर सचिव स्तर की अफसर रीता शांडिल्य को बिठाने पर विचार किया गया है। रीता पहले भी पीएससी में रह चुकी हैं, और उनकी साख अच्छी है। मगर राजनीतिक समीकरण को देखकर डॉ.प्रवीण वर्मा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है।
डॉ. वर्मा बेमेतरा के रहने वाले हैं, और उनके पिता डॉ.चेतन वर्मा तीन बार बेमेतरा के विधायक रह चुके हैं। डॉ.प्रवीण वर्मा खुद टिकट के दावेदार थे मगर पार्टी ने मौजूदा विधायक आशीष छाबड़ा को रिपीट करने का मन बनाया है। ऐसे में वर्मा से जुड़े लोगों को साधने की नीयत से उन्हें पीएससी की कमान सौंपी गई है। डॉ. वर्मा पीएससी में सदस्य के पद पर थे। इसका चुनाव में क्या कुछ असर होता है, यह देखना है।
अनुपम और हबीब की याद
पिछले साल की बात है, गांधी जयंती पर सरकार ने कई आयोजन किए थे। इसमें गांधीवादी नेताओं को भी याद किया गया। ऐसे ही गांधी शांति प्रतिष्ठान के अनुपम मिश्र, जिनकी अनमोल कृति आज भी खरे हैं तालाब है। राज्य सरकार भी नरवा मिशन के माध्यम से जल संरक्षण का अभियान चला रही है। ऐसे में सरकार ने घोषणा कर दी कि अनुपम मिश्र के नाम पर जल संरक्षण का कार्य करने वालों को पुरस्कृत किया जाएगा। इसी तरह रंगकर्मी हबीब तनवीर के नाम पर भी पुरस्कार की घोषणा कर दी गई। इसे इस साल 2 अक्टूबर को प्रदान किया जाना था लेकिन इसकी याद नहीं आई, न तो संस्कृति विभाग के अधिकारी और न नेता को। आखिर गांधी जयंती पर श्रद्धासुमन भेंट करके औपचारिकता निभा ली गई।
कॉलेज और जन्मदिन

शहर के एक नामचीन शिक्षा महाविद्यालय में बर्थ डे सेलिब्रेशन की धूम रही। सुबह कॉलेज शुरू होने से दोपहर तक हैप्पी बर्थडे मैम, हैप्पी बर्थडे मैम गूंजता रहा। और मैडम को बुके देकर मुंह मीठा कराया जाता रहा। बुके की साइज और उसमें जड़े फूलों की वेरायटियां यह जता रहीं थीं कि कौन कितना करीब है मैडम के। वैसे आयोजन ही करीबियों ने रखा था। वे तो चाहते थे कि सेलिब्रेशन सेमीनार हॉल में हो। लेकिन मैडम तैयार नहीं हुई और उनके ही कक्ष में मना। मैडम को सरप्राइज देने कक्ष को कल शाम से ही सजाया जाने लगा। और आज सुबह केक कटिंग के साथ पेपर शॉट भी फोड़ा गया। मैडम के साथ सेल्फी से लेकर ग्रुप फोटो सेशन भी चले। कॉलेज में मैडम का तीसरा हैप्पी बर्थडे है। हर साल आयोजन एक पायदान उपर ही बढ़ता रहा है। जब तक आयोजन चला, शिक्षक और कक्षा के बीच दूरी बनी रही। छात्राएं भी टीचर का इंतजार करतीं रहीं ।
परेशानी का सामान
कांग्रेस और भाजपा के साथ एक सहूलियत और दिक्कत यह है कि दोनों के झंडों के रंग में बस सफेद रंग का फर्क है। बाकी दोनों रंग, केसरिया और हरा दोनों पार्टियों के झंडों में है, और शांति का प्रतीक सफेद रंग भाजपा के झंडे में नहीं है। ऐसे में अब चुनाव करीब है, तो महिला वोटरों में बांटने के लिए जो तोहफे आ रहे हैं, उनमें कुछ तो ऐसे हैं जो इन दोनों ही पार्टियों के काम के हैं। जैसे यह साड़ी, जो कि सफेद रंग के कपड़े पर केसरिया और हरे रंग के छापे वाली है, और इसे दोनों ही पार्टियां इस्तेमाल कर सकती हैं। और महज राजनीतिक दल ही नहीं, स्वतंत्रता दिवस के समारोह वगैरह में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है क्योंकि तिरंगे झंडे के रंगों के साथ-साथ इसमें तो राष्ट्रीयध्वज वाला नीला चक्र भी छपा हुआ है। फिलहाल राजधानी रायपुर के एक कार्यक्रम में बांटी गई यह साड़ी किसी भी पार्टी या नेता के नाम के साथ जोडक़र उसके लिए परेशानी खड़ी की जा सकती है।
अब कहां गायब हो गया?

जैसे-जैसे देश में अलोकतांत्रिक घटनाएं होने लगती हैं, कई किस्म के बड़े भ्रष्टाचार सामने आते हैं, या महाराष्ट्र में सरकारी अस्पतालों में थोक में मौतें होती हैं, तो सोशल मीडिया पर लोग अन्ना हजारे नाम के उस आदमी को याद करते हैं जो खादी और गांधी टोपी पहनकर रामलीला मैदान पर अनशन पर बैठे रहता था, और जिसने यूपीए सरकार को बदनाम कर-करके हटाकर ही सांस ली थी। लोग अब इसे याद करते हैं कि खादी की खाल ओढ़ा हुआ यह तथाकथित समाजसेवी और समाज सुधारक अब कहां सोया हुआ है।
भूपेश सरकार का आखिऱी मनोनयन?
दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी की जाति के मसले पर लंबी लड़ाई लडऩे वाले आदिवासी नेता संतकुमार नेताम को सरकार ने तोहफा दिया है। उन्हें पीएससी सदस्य नियुक्त किया है। नेताम वही शख्स हैं, जिनकी शिकायत के आधार पर राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने अजीत जोगी के सीएम रहते उन्हें आदिवासी नहीं माना था।
नेताम गौरेला-पेंड्रा के रहने वाले हैं। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। वो भाजपा के आदिवासी मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यालय मंत्री रहे हैं। प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद उन्हें निगम-मंडलों जगह पाने की उम्मीद थी। कई बड़े नेताओं ने उनकी पैरवी भी की थी। मगर रमन सरकार ने उन्हें अनदेखा किया।
जोगी पिता-पुत्र के खिलाफ जाति के मुद्दे पर कानूनी लड़ाई लड़ते रहे। फिर भूपेश बघेल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद वो कांग्रेस में शामिल हो गए। नेताम, नंदकुमार साय के सहयोगी रहे हैं। आखिरकार सरकार की सिफारिश पर उन्हें पीएससी में सदस्य नियुक्त किया है। उनका कार्यकाल पांच साल रहेगा। अब किसी भी दिन आचार संहिता लगने जा रही है।
लिस्ट और विरोध

भाजपा में अधिकृत तौर पर प्रत्याशियों की सूची भले ही जारी नहीं की गई है लेकिन जो नाम लीक हुए हैं उससे पार्टी के भीतर विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। सूची में एक नाम सीतापुर सीट से पूर्व सैनिक रामकुमार टोप्पो का भी है। टोप्पो का नाम सामने आते ही पार्टी के ही कुछ लोगों ने उनकी जाति प्रमाण पत्र पर ही सवाल खड़े कर दिए थे।
चर्चा है कि महामंत्री (संगठन) पवन साय ने इस सिलसिले में पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी से राय ली लेकिन वो भी विवाद को लेकर कोई संतोषजनक हल नहीं निकाल पा रहे थे। इसके बाद साय व अन्य नेताओं ने स्थानीय वकील से चर्चा की जो कि जाति प्रमाण पत्र से जुड़े विवाद को निपटाने में माहिर माने जाते हैं। वकील की सलाह के बाद साय और अन्य प्रमुख नेताओं ने संतुष्टि जाहिर की और फिर टोप्पो को प्रचार में जुटने के लिए कहा गया।
दूसरी तरफ, रायपुर जिले की दो सीटों को लेकर ज्यादा विवाद चल रहा है। एक सीट में तो चारों मंडल अध्यक्ष ने साफ तौर पर कह दिया कि वो काम नहीं करेंगे। मगर प्रत्याशी सक्रिय हुए तो दो अध्यक्ष टूट गए और उनके साथ प्रचार की रणनीति बनाने में जुट गए। प्रत्याशी ने पार्टी के सभी स्थानीय पदाधिकारियों के लिए भोज रखा है। टिकट के दावेदार असमंजस में हैं कि वो भोज में जाएं अथवा नहीं। इन सबके बावजूद कहा जा रहा है कि विरोध को देखते हुए सूची में कुछ बदलाव जरूर किया जाएगा।
भाजपा की लिस्ट से कांग्रेस खुश
कांग्रेस में दो दर्जन से अधिक विधायकों की टिकट काटने की चर्चा थी लेकिन अब कहा जा रहा है कि ज्यादातर विधायकों को फिर से लड़ाया जा सकता है। वजह यह है कि भाजपा से जो नाम सामने आए हैं, उससे कांग्रेस के रणनीतिकार खुश हैं, और मानकर चल रहे हैं कि विधायकों की एंटी इंकमबेंसी का कोई ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। बालोद जिले के तो तीनों विधायकों को चुनाव तैयारियों में जुट जाने के लिए कह दिया गया है। कांग्रेस की सूची पितृपक्ष के बाद जारी हो सकती है।
विभीषण की तलाश जारी
लीक हुई सूची को लेकर भाजपा विभीषण को ढूंढने में जुट गई है। इसमें हाईकमान ने इंटेलिजेंस विंग को भी लगा दिया है। इंटेलिजेंस ने अब तक जो इनपुट जुटाया है उसके मुताबिक लीक दिल्ली से ही लीक हुई। एक-दो नाम सामने आये हैं। कह रहे हैं कि ये अपने लोगों की टिकट क्लीयर करवा लेने की सफलता से इतने उत्साहित थे कि एक एक को नाम बताते गए। सूची में अधिकांश नाम पूर्व सीएम के खेमे के रहे तो कुछ वरिष्ठतम विधायक के खेमे में भी आए। नुकसान में रहीं तो मैडम। वो अपनी सीट भी हासिल नहीं कर पाईं। यह बात जब मोटा भाई को पता चली तो उन्होंने सूची फाइनल होकर वायरल होने के बाद इलाज किया। और पूरी सूची को वेंटिलेटर पर भिजवाने में सफल रहे। अब देखना यह है कि कितने नाम बदलते हैं।
बेमिसाल श्रीनिवास राव
सीएम, और डीजीपी के समकक्ष हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के पद पर नियम विरुद्ध पदोन्नति का मामला सुर्खियों में है। कुछ दिन पहले ही सबसे जूनियर पीसीसीएफ वी.श्रीनिवास राव को हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाया गया था। अब इससे जुड़ी नई खबर यह है कि कांग्रेस शासित तीन राज्य हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, और हाल ही में कर्नाटक में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स के पद पर पदोन्नति हुई। छत्तीसगढ़ से परे तीनों राज्यों में सीनियरटी को ही तरजीह दी गई।
हिमाचल प्रदेश में 88 बैच के राजीव कुमार हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स हैं, तो राजस्थान में मुनीश गर्ग और कर्नाटक में बृजेश कुमार दीक्षित को हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाया गया है। दीक्षित 88 बैच के आईएफएस हैं, और उन्हें फॉरेस्ट के शीर्ष पद पर कल ही पदोन्नति दी गई है। जबकि छत्तीसगढ़ में उनके बैचमेट सुधीर अग्रवाल पदोन्नति से रह गए।
सबसे जूनियर पीसीसीएफ को हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाने के बाद आईएफएस अफसरों में नाराजगी झलक रही है। बताते हैं कि कुछ दिन पहले कैडर रिव्यू के लिए सीनियर आईएफएस अफसरों की कमेटी बनाई गई थी। दो सीनियर अफसरों ने कमेटी में रहने से साफ तौर पर मना कर दिया। आने वाले दिनों में पदोन्नति से जुड़ा विवाद अदालत तक जा सकता है। वैसे श्रीनिवास राव की कुछ खूबियाँ हैं, जिनका मुक़ाबला और कोई नहीं कर सकते।
13 में से 11 मंत्री सूची में, लेकिन खटाई में
भाजपा की दूसरी सूची जारी होने से पहले लीक हो गई और फिर रूक भी गई। अशोक रोड में टाइप होने से पहले वाट्सएप पर आ गई। उसके बाद तो एक एक नाम पर बधाई,और आपत्तियों का सिलसिला चल निकला । यह सिलसिला इतना मजबूती से चला की सूची ही रोकनी पड़ी। सूची के विश्लेषकों के मुताबिक पिछले पांच वर्षों से ना,ना कर रहे संगठन ने उन्ही नेताओं को टिकट दे दिया जो सरकार की हैट्रिक के बाद चौका लगाने का अवसर न मिलने का कारण बने। यानी 2013-18 के पूरे मंत्रिमंडल को ही दोबारा मैदान में उतारने का फैसला किया । इनमें सीएम रमन सिंह, कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, राजस्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडे, लोनि मंत्री राजेश मूणत, नगरीय प्रशासन मंत्री अमर अग्रवाल, उद्योग मंत्री दयालदास बघेल, सहकारिता मंत्री ननकीराम कंवर, शिक्षा मंत्री केदार कश्यप, उच्च शिक्षा मंत्री अजय चंद्राकर, वन मंत्री महेश गागड़ा, श्रम मंत्री भैयालाल राजवाड़े।
बस बेचारी रमशीला साहू, महिला बाल विकास मंत्री और गृह मंत्री रामसेवक पैकरा को छोड़ कर। और यही मंत्रिमंडल, सूची अटकने का भी कारण बना है।
लिस्ट और तैयारी
भाजपा प्रत्याशियों की सूची लीक होने के बाद पार्टी में बवाल मचा है। हालांकि पार्टी ने साफ कर दिया है कि सूची जारी नहीं हुई है, और इसमें हफ्ते भर का समय लग सकता है।
बावजूद इसके कई जगहों पर विरोध जारी है।
दूसरी तरफ, सूची में नाम आने के बाद कई नेता बेफिक्र हो गए हैं। पुरंदर मिश्रा तो चुनाव तैयारियों में जुट गए हैं। उन्होंने प्रचार के लिए नई इनोवा भी खरीद ली है। अब अधिकृत सूची में उनका नाम रहता है या नहीं यह देखना है।
वक्त-वक्त की बात
राजनीति में वक्त वक्त की बात रहती है नंदकुमार साय ने भाजपा की टिकट पर रायगढ़ से लोकसभा जाने की कोशिश की और दो बार उन्हें पुष्पा देवी सिंह ने हराया। साय लोकसभा पहुंचे जरूर लेकिन सरगुजा से। बुधवार को रायगढ़ में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े के कार्यक्रम में रायगढ़ की अकेली भूतपूर्व कांग्रेसी सांसद पुष्पा देवी दूसरी कतार में बैठीं और नंदकुमार साय पहली कतार में। वैसे साय रायगढ़ से भी एक बार जीत चुके हैं।
सिंधी समाज खफ़़ा
सिंधी समाज से एक भी नेता को प्रत्याशी नहीं बनाने की चर्चा के बाद से नाराजगी देखी जा रही है। चर्चा है कि पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी ने तो पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को खरी-खोटी सुनाई है। वो अपनी टिकट कटने के लिए बृजमोहन को जिम्मेदार मान रहे हैं।
कई नेता सुंदरानी को मनाने में लगे रहे। बाद में सुंदरानी का बयान भी आ गया कि वो पार्टी के आदेशों का पालन करेंगे। बावजूद इसके उनके समर्थकों में नाराजगी देखी गई।
बताते हैं कि सिंधु भवन में समाज के लोगों की बैठक बुलाई गई थी। बड़ी संख्या में लोग आने के लिए तैयार भी थे, मगर बाहर सुंदरानी के विरोधी खड़े हो गए, और उन्होंने ज्यादातर लोगों को गेट से ही रवाना कर दिया।
बैठक में चुनिंदा लोग ही रह गए। हालांकि यह भी चर्चा है कि सिंधी समाज से एक टिकट देने पर गंभीरता से विचार चल रहा है। देखना है आगे क्या होता है।
परिवारवाद ??
चुनाव में भाजपा परिवारवाद के आरोपों से घिर सकती है। पूर्व सीएम डॉ.रमन सिंह, और उनके भांजे विक्रांत सिंह राजनांदगांव, और बगल की सीट खैरागढ़ से चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। इस मसले पर सीएम भूपेश बघेल के आरोप पर पूर्व सीएम को यह कहकर सफाई भी देनी पड़ी कि परिवार और रिश्तेदार में फर्क होता है। मगर दूसरी सूची में भी कुछ इसी तरह की झलक देखने को मिल सकती है।
खबर है कि दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के बेटे प्रबल प्रताप सिंह, और बहू संयोगिता सिंह जूदेव का नाम क्रमश: कोटा और चंद्रपुर सीट से है। संयोगिता, प्रबल के बड़े भाई दिवंगत संसदीय सचिव युद्धवीर सिंह की पत्नी है। युद्धवीर दो बार चन्द्रपुर से विधायक रहे हैं। संयोगिता पिछली बार चुनाव मैदान में थी लेकिन वो तीसरे नंबर पर चली गई। अब चर्चा है कि भाजपा के खिलाफ परिवारवाद का आरोप बुलंद हो सकता है। देखना है कि आगे क्या होता है।
उल्लू का मतलब ?

अंबिकापुर के भाजपा कार्यालय में तीन दिन पहले उल्लू बैठा मिला। पार्टी के एक प्रमुख पदाधिकारी ने उल्लू को कैमरे में कैद कर फेसबुक पर पोस्ट किया। इसके बाद से चुनावी माहौल के बीच पार्टी के अंदरखाने में शुभ-अशुभ को लेकर बहस छिड़ी हुई है।
उल्लू को देवी लक्ष्मी का वाहन माना जाता है। और इसको लेकर धार्मिक मान्यताएं भी हैं। उल्लू का रंग सफेद था, और सफेद उल्लू को देखना सकारात्मक समाचारों का सूचक माना जाता है। मगर उल्लू घर आ जाए तो हानिकारक माना जाता है। इससे घर की उन्नति रुक जाती है।
पार्टी के भीतर चर्चा यह है कि अंबिकापुर सीट जब से सामान्य हुई भाजपा प्रत्याशी के हार का अंतर लगातार बढ़ता रहा है। स्थानीय स्तर पर टिकट को लेकर काफी घमासान मचा हुआ है। पार्टी की जो सूची लीक हुई है, उसमें अंबिकापुर को होल्ड पर रखा गया है। और अब तो उल्लू भी आ गया है। देखना है आगे क्या होता है।
लिस्ट आई, नाराजगी लाई
भाजपा की सूची लीक होते ही असंतुष्ट नेताओं का गुस्सा फट पड़ा है। रायपुर की एक सीट से टिकट के दावेदार पूर्व विधायक ने तो एक प्रमुख नेता के घर जाकर धमका भी दिया है।
पूर्व विधायक ने साफ तौर पर कह दिया है कि टिकट चेंज नहीं किया गया तो 22 सीटों पर पार्टी को नुकसान उठाना पड़ेगा। पूर्व विधायक के तेवर देखकर नेताजी भी तैश में आ गए। उन्होंने पूर्व विधायक को यह कह दिया कि जो चाहे करें, मैं इस मामले में बिल्कुल भी हस्तक्षेप नहीं करूंगा।
पूर्व विधायक के समर्थकों ने आगे की रणनीति तैयार करने के लिए बैठक बुलाई है। उन पर निर्दलीय चुनाव लडऩे के लिए दबाव भी है। देखना है आगे क्या होता है।
बाबा की चेतावनी का क्या होगा?
कांग्रेस में टिकट को लेकर हड़बड़ी नहीं है। संकेत है कि नवरात्र के पहले दिन सभी 90 नाम घोषित किए जा सकते हैं। जिनकी टिकट तय हो गई, उन्हें बता भी दिया गया है। कई विधायक, जिनकी टिकट खतरे में बताई जा रही थी उनमें से कुछ का नाम तकरीबन तय माना जा रहा है।
बालोद जिले के तीनों सीट से मौजूदा विधायकों को रिपीट किया जा रहा है। उन्हें बता भी दिया गया है। इसी तरह सरगुजा के तेज तर्रार नेता को बाबा के विरोध के बावजूद आश्वस्त कर चुनाव तैयारी में जुट जाने के लिए कहा गया है। कांग्रेस में कुछ जगहों पर दिग्गज नेता एकमतेन नहीं है। देखना है कि आगे क्या होता है।
रिजेक्टेड अब एक्सेप्ट कैसे होंगे?

भाजपा के संभावित प्रत्याशियों की कल लीक हुई सूची यदि अंतिम है तो उन नामों को लेकर प्रदेश मुख्यालय से लेकर मंडल इकाई तक नाराजगी, मायूसी फैल गई है। कल सुबह तक जो हलचल थी वह तूफान के बाद की शांति जैसे खामोश हो गई है। इन संभावित नामों को लेकर छिद्रान्वेषण ज़ोरों पर है। संगठन के लिए काम कर रहे महामंत्रियों, प्रभारियों के कुछ करीबियों ने ठाकरे परिसर में एकजुट होकर चिंतन, मनन नहीं चिंता व्यक्त की। उनके बीच पहली लाइन थी- जिनके कारण 67 सीटें हारे, जो रिजेक्ट किए गए वे फिर कैसे एक्सेप्ट होंगे।
दूसरा सूची के नजरिए से इस बार भी हासिल 2018 ही होगा। तीसरा कि यह सूची सिंह, दो-वेदी , चार-वेदी ,जैसे राजनीतिक एजेंट की है। जो कोई काम फ्री में नहीं करते। चौथा यह कि प्रभारी जहां जहां प्रभार में रहे वहां के नतीजे यहां रिपीट होंगे। पांचवा यह कि सरकार से गोपनीय समझौते की सूची है। छटवां यह कि अब काम करवा लें कार्यकर्ताओं से। सातवाँ यह कि जब एक दिन सूची रूक गई है तो बदलाव होना ही चाहिए।
बंसल पर हुए निवेश का क्या होगा?
एआईसीसी में बदलाव से स्थानीय हितों पर भी असर पड़ा है। पवन बंसल की जगह अजय माकन को एआईसीसी का कोष संभालने का जिम्मा दिया गया है। सुनते हैं कि रायपुर के एक नेता ने टिकट की आस में पवन बंसल की अच्छी खातिरदारी की थी। कोषाध्यक्ष की सिफारिशों को महत्व दिया जाता है। मगर अब बंसल कोषाध्यक्ष नहीं रह गए हैं। नए कोषाध्यक्ष तक नेताजी की पहुंच नहीं है। ऐसे में नेताजी की उम्मीदों पर झटका लगा है। फिर भी नेताजी को बंसल से उम्मीद है। देखना है कि बंसल जी पद से हटने के बाद नेताजी के लिए क्या कुछ करते हैं।
समाज और उम्मीदवारी
चर्चा है कि भाजपा में रायपुर की एक सीट से समाज विशेष के नेता को टिकट देने को लेकर काफी माथापच्ची हुई। पार्टी के रणनीतिकार समाज विशेष के जिस व्यापारी नेता को टिकट देना चाहते थे वो चुनाव लडऩे के लिए तैयार नहीं हुए। बाकी दावेदारों को कमजोर आंका जा रहा था।
बावजूद इसके समाज विशेष को प्रतिनिधित्व देने के लिए विचार मंथन चल रहा था कि उसी समाज के दो प्रमुख पदाधिकारियों ने पार्टी के रणनीतिकारों को भरोसा दिला दिया कि उनके समाज से टिकट नहीं देने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। टिकट नहीं देने के बावजूद समाज के लोग पार्टी को ही टिकट देंगे। दो प्रमुख पदाधिकारियों की गारंटी मिली, तो फिर पार्टी के रणनीतिकारों ने एक झटके में दूसरा नाम तय कर दिया।
दूसरी तरफ, समाज विशेष के लोग कांग्रेस से टिकट की आस में हैं। कांग्रेस के एक बड़े नेता तो पहले ही कह चुके हैं कि जितने लोग कांग्रेस से जुड़े हैं उतने ही वोट हमें मिलते हैं। ऐसे में टिकट देने का कोई फायदा नहीं है। अब समाज के लोगों के पास विकल्प है कि आम आदमी पार्टी या किसी और पार्टी से संभावना तलाशे।
संघ का भूपेश प्रेम
यह सर्वज्ञ है कि संघ और कांग्रेस एक दूसरे के धुर विरोधी हैं। लेकिन व्यक्तिगत रूप से संघ, कांग्रेस के कुछ नेताओं को पसंद नहीं करता और कांग्रेस के ये नेता भी संघ को।
हालांकि संघ कभी कभी कांग्रेस के कार्यों की तारीफ करने से नहीं चूकता । जैसे बघेल सरकार की गौठान, गोबर खरीदी योजना। इसकी तारीफ करने से संघ के शीर्ष नेतृत्व ने भी गुरेज नहीं किया। संघ को गोबर से जैविक खाद, वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने की योजना पसंद आई। और योजना की सही मॉनिटरिंग हो तो गौठान में गौ संपदा की सुरक्षा के लिए कारगर कहा। बस फिर क्या था। भाजपा से जुड़े एक शिक्षाविद भी इन दिनों सीएम बघेल की तारीफ में कमी करने में पीछे नहीं है। इनका फेसबुक वॉल इससे भरा पड़ा है।
कॉलेज में पढ़ाते पढ़ाते अब ये संघ विचारक कहलाने लगे हैं। यह खांटी संघियों को नागवार गुजर रहा है । इससे परिजन भी परेशान हैं। हर जगह उलाहना जो सुननी जो पड़ती है। वो भी कितना कहें कि कितना कहें उनके व्यक्तिगत विचार हैं। बात भाजपा नेताओं तक तो पहुंचा दी गई है। कुछ लोग जागृति मंडल को भी सचेत करने की तैयारी में। देखें आगे क्या होगा।
आदिवासी ईमानदारी
इसीलिए कहा जाता है कि आदिवासी भोले, ईमानदार होते हैं। चाहे वह कितने ही बड़े पद पर हो। कितने ही साल हो जाएं अपना कमिटमेंट पूरा ही करते हैं। कर्ज चुकाना भी उसी कमिटमेंट का अहम हिस्सा है। क्योंकि आपने उधारी लेकर चुकाने का वादा किया है। ऐसे ही छत्तीसगढ़ के एक मंत्री भी हैं। अपनी सादगी अल्हड़पन के लिए हमेशा चर्चा मेंं रहते हैं। इस बार उनकी चर्चा 30 वर्ष बाद चुकाए कर्ज को लेकर हो रही है। कवासी लखमा ने पिता से लिए कर्ज की भरपाई तीस साल बाद बेटे को चुका कर कमिटमेंट पूरा किया। वैसे लोग कहेंगे कि कर्ज चुकाने में 15 वर्ष ज्यादा ही लिए। क्योंकि कवासी तो विधायक पहले ही बन गए थे। बहरहाल वाट्सएप पर एक वीडियो वायरल है। इसमें मंत्री कवासी लखमा एक ग्रामीण को पैसे देते हुए नजर आ रहे हैं। कवासी लखमा जब राजनीति में नहीं आए थे तो वनोपज खरीदी का काम करते थे। 30 साल पहले जो व्यापारी कवासी लखमा थे उन्होंने गांव के एक ग्रामीण से 6000 रुपए उधार लिए थे, लेकिन सिर्फ 3000 रुपए ही लौटा पाए थे।
वहीं, इन दिनों जब कवासी लखमा अपने गृह जिले के प्रवास पर थे तो जिस शख्स ने उधार दिए थे उनका बेटे से मुलाकात हो गई। उन्हे देखते ही मंत्री लखमा को पुराना कर्ज याद आ गया और उन्होंने मौके पर ही उधार देने वाले शख्स के बेटे को 3000 रुपए लौटाए। इतना ही नहीं उन्होंने 500 रुपए अधिक भी दिए ये बोलकर कि ये ब्याज है। ब्याज वाली बात पर वहां जुटी भीड़ हंस पड़ी। ([email protected])
नोटों वाले विधायक का विकल्प
जनता कांग्रेस की नेत्री गीतांजलि पटेल कांग्रेस का दामन थाम सकती है। गीतांजलि ने चंद्रपुर सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ा था। वो जनता कांग्रेस, और बसपा गठबंधन की प्रत्याशी थीं। गीतांजलि कांग्रेस प्रत्याशी रामकुमार यादव से करीब 5 हजार मतों से हार गई। यहां भाजपा तीसरे स्थान पर थी।
गीतांजलि के जनाधार को देखकर कांग्रेस के कई नेता उन्हें अपनी पार्टी में लाना चाहते हैं। चर्चा है कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत भी इससे सहमत है। इधर, रामकुमार यादव के नोटो के बंडल के साथ कैमरे में कैद होने के बाद टिकट को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि गीतांजलि, रामकुमार यादव का विकल्प हो सकती हैं। अगले कुछ दिनों में कांग्रेस में दूसरे दलों के नेता आ सकते हैं। देखना है कि गीतांजलि जैसों का क्या होता है।
राजधानी में धार्मिक ध्रुवीकरण
विधानसभा चुनाव में भाजपा धार्मिक कार्ड भी खेल सकती है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी ने सभी जिलों को एक नारा प्रमुखता से प्रचारित करने के लिए तैयार किया है। नारा यह है-ढेबर, अकबर, और भूपेश की सरकार नहीं चलेगी।
ढेबर तो रायपुर के मेयर हैं। सरकार का हिस्सा नहीं है। मगर शराब केस में उनके यहां ईडी की छापेमारी के बाद वो भाजपा के निशाने पर है। यही नहीं, कवर्धा में सांप्रदायिक हिंसा के बाद सरकार के मंत्री मोहम्मद अकबर भाजपा के निशाने पर रहे हैं।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अकबर के कई भाजपा नेता, और आरएसएस के नेताओं से मधुर संबंध हैं। बावजूद भाजपा ने उन्हें प्रदेशभर में निशाने पर ले रही है। दिलचस्प बात यह है कि नारे में दो मुस्लिम नेताओं के बाद सीएम का नाम है। यानी भाजपा का एजेंडा साफ दिख रहा है। चुनाव में यह नारा लोगों को कितना प्रभावित करता है, यह देखना है।
लाठी खाने वाली महिलाएँ किनारे

प्रधानमंत्री मोदी का दौरा राजनीतिक रूप से विपक्ष और भाजपा के लिए भी सफल रहा। लेकिन अंदरखाने बवाल मचा हुआ है। यह बवाल वाट्सएप पर रात डेढ़ बजे से शुरू हुआ और अब तक जारी है। इसमें एक नेता चक्रव्यूह में फंसे हुए है। सारा विवाद महिलाओं में मोदी के स्वागतकर्ताओं को लेकर चल रहा है। पार्टी ने पीएमओ से एयरपोर्ट पर स्वागत के लिए अधिकाधिक लोगों के लिए अनुमति ली। वहां से ओके होने के बाद 68 लोगों की सूची भेजकर एन ओ सी ली गई । इसमें 1 से 41 तक पार्टी के पुरुष नेता और उसके बाद जो 27 नाम थे, उन्हें देखकर महिला मोर्चा, भाजपा नेताओं की भृकुटी तन गई। ये सभी, सूची बनाने वाले नेताजी की कॉलोनी के आस-पड़ोस की भाभियां, बहनें आदि थीं। इन्हें भाजपा नेत्री बताकर स्वागत का मौका दिया गया। यह सूची भाजपा नेताओं के बीच पहुंची तो बवाल मच गया। महिला कार्यकर्ता वाट्सएप पर भड़ास निकल रही है। कहा जा रहा है कि धूप में धरना मोर्चा दे, लाठी खाए, दरी बिछाए, आरती उतारें महिला मोर्चा की महिलाएं और पीएम को बुके कॉलोनी की भाभियां दे। ये खेला नहीं चलेगा। सभी नये नये सरनेम देखकर हतप्रभ हैं। नेतृत्व को निकम्मा, टुकड़ा गैंग और पार्टी को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी कहा गया । कुछ ने तो इसे पीएम की सुरक्षा में चूक से जोडक़र एजेंसियों को शिकायत की बात कह रहे हैं। यह चक्रव्यूह यही टूटता है या नेताजी भंवर में फंसते हैं देखना होगा ।
कुछ अफसरों को सजा मिले तो...
बिलासपुर हाईकोर्ट ने सडक़ों पर होने वाले धार्मिक और दूसरे जुलूसों के शोर-शराबे पर जो कड़ा रूख दिखाया है, उसके बाद भी अगर राज्य सरकार के नेताओं और अफसरों को शर्म नहीं आती है, तो लोगों के सामने मतदान के दिन नोटा का विकल्प तो रहेगा ही। आज जब लाउडस्पीकरों से लोगों के मरने की नौबत आ रही है, हाईकोर्ट के जज माथा पकडक़र बैठे हैं, तब भी प्रदेश के अफसरों के कान पर जूं न रेेंगना हैरान करता है कि क्या यही हिन्दुस्तान की चर्चित नौकरशाही है? नेताओं को जिन वोटरों के जुर्म रोकने से डर लगता है, उन्हें छूने से भी अफसर डरते हैं, यह बात अदालत को भी समझ आ जानी चाहिए।
अदालत के ऐसे रूख के बीच एक आरटीआई एक्टिविस्ट अनिल अग्रवाल ने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया है कि हल्की-फुल्की सवारी ढोने के लिए बने ई-रिक्शा पर किस तरह बड़ा सा पानी का टैंक और लंबे पाईपों के मोटे ग_े लादकर ले जाए जा रहे हैं। उन्होंने इसके साथ में लिखा है कि डीजे पर तो बाद में कार्रवाई करना, पहले इस पर तो कार्रवाई कर लो।
छत्तीसगढ़ के शहरों में सबसे अधिक फेरे लगाने वाले ऑटोरिक्शा जिस तरह से ओवरलोड चलते हैं, और हर नियम को तोड़ते हैं, उससे यह जाहिर है कि वे पुलिस को रिश्वत देकर ही इतना हौसल दिखा सकते हैं। अब अदालत क्या-क्या सुधारे, वह चौराहों पर लाठी देकर तो जजों को खड़ा नहीं कर सकती। लेकिन इतना तो कर ही सकती है कि सोच-समझकर अदालतों की अनदेखी करने वाले अफसरों को अदालत उठने तक की सजा देकर वहां बिठाकर रखे। इससे कम में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की बात भी कोई सुनते हुए नहीं दिखते।
घटिया चुनावी साड़ी

चुनाव आचार संहिता लगने से पहले कुछ ताकतवर नेताओं ने मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए गिफ्ट, और साड़ी बंटवाना शुरू भी कर दिया है। इसका वीडियो भी वायरल हो चुका है। अब इससे जुड़ी नई खबर यह है कि सरगुजा इलाके में एक-दो जगहों पर साड़ी और गिफ्ट की घटिया क्वालिटी पर नाराजगी भी सामने आ रही है।
एक पूर्व विधायक ने गिफ्ट बंटवाने वाले सत्ताधारी दल के नेता पर नाराजगी जताते हुए बयान जारी किया है कि वो अपने परिवार के सदस्यों को सौ-दो सौ रुपए की साड़ी पहनाएगें, तो कैसा लगेगा। उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि खुलेआम साड़ी, अन्य सामान बंटवाए जा रहे हैं। मगर भाजपा के नेता खामोश हैं। चर्चा है कि आचार संहिता लगने के बाद सप्रमाण चुनाव आयोग से शिकायत की तैयारी है। देखना है कि आगे क्या होता है।
सिंहदेव को अदालती राहत
विधानसभा चुनाव मैदान में उतरने से पहले सरगुजा राजघराने के मुखिया, और डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव को जमीन विवाद प्रकरण पर बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने अंबिकापुर में तालाब की करीब 21 एकड़ जमीन डायवर्सन कराने के खिलाफ दायर याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है।
जमीन विवाद के चलते सिंहदेव बैकफुट पर थे। सिंहदेव के खिलाफ याचिका अंबिकापुर की तरूनीर संस्था ने लगाई थी। इस संस्था के कर्ताधर्ता स्थानीय भाजपा नेता कैलाश मिश्रा हैं। मिश्रा के साथ-साथ पार्षद आलोक दुबे भी सिंहदेव के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। ये अलग बात है कि दोनों भाजपा नेताओं की मुहिम पार्टी का समर्थन नहीं था। पार्टी के स्थानीय नेता इससे दूरी बनाए हुए थे।
कहा जा रहा है कि एनजीटी में भी जमीन विवाद की शिकायत हुई थी। और जब हाईकोर्ट में मिश्रा ने याचिका दायर की तो चर्चा है कि उनके लिए काफी महंगा साबित हुआ। उन्हें अपनी संस्था का ऑडिट और अन्य कागजात दुरूस्त कराना पड़ा। इस पर लाखों खर्च हुए। पहले दो पेशी में महंगे वकीलों की सेवाएं ली, लेकिन बाद में वकीलों की भारी-भरकम फीस के चलते वो पस्त पड़ गए। हाईकोर्ट ने प्रकरण को आधारहीन और सही तथ्यों को छिपाकर प्रस्तुत करना बताते हुए निरस्त कर दिया। फिलहाल सिंहदेव को बड़ी जीत मिली है। भाजपा के दोनों नेता आगे लड़ाई जारी रखेंगे अथवा नहीं, इस पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं।

यह रायपुर एयरपोर्ट की तस्वीर है । पिछले दिनों किसी ने रात के वक्त ऐसा वीडियो बनाया है जिसमें ढेर सारे जानवर वहां घूम रहे हैं। एक बछड़े को छोटू और गाय को महतारी कहते हुए उनसे बातचीत का नाटक कर वायरल किया गया है । दरअसल यह वीडियो प्रशासन को आईना दिखाने के लिए शूटकर वायरल किया गया है। हाल में प्रशासन ने हाईकोर्ट के निर्देश पर इन आवारा मवेशियों को पकडऩे अभियान चलाया था।
वक्त कम बाकी है
आचार संहिता लगने में कुछ दिन बाकी रह गए हैं। लेकिन कुछ मंत्रियों की शिकायत कम होने का नाम नहीं ले रही है। एक मंत्री ने तो मल्लिकार्जुन खरगे के स्वागत के लिए माना एयरपोर्ट पर जुटे सीनियर नेताओं के बीच यह कहते सुने गए कि उनकी सिफारिशों का कोई महत्व नहीं रह गया है। उनके कहे तबादले नहीं हो रहे हैं। चर्चा है कि प्रदेश प्रभारी सैलजा ने उनकी शिकायतों को दूर करने का भरोसा दिलाया है लेकिन समय कम रह गया है । देखना है कि शिकायतें दूर होती है या नहीं।
बदले-बदले से मेरे खरगे नजर आए
मल्लिकार्जुन खरगे बलौदाबाजार की सभा को लेकर खुश नजर आए। पिछली तीन सभाओं में लोग उनके भाषण के बीच उठकर जाने लगे थे, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। लोगों ने खरगे के भाषण को पूरा सुना।
खरगे भी अपनी पूरी लय में थे। वो भूपेश सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे, इस दौरान सीएम और प्रदेश अध्यक्ष आपस में चर्चा कर रहे थे। खरगे ने मंच से ही दोनों को डपट दिया, और कहा कि बातचीत बाद में करना, पहले मेरी बातों की तरफ ध्यान दें।
खरगे ने हरित क्रांति के जनक डॉ.एम.एस. स्वामीनाथन के निधन पर शोक जताया और उनके कहने पर सभा में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि भी दी गई। खरगे ने डॉ.स्वामीनाथन को याद करते हुए बताया कि वो (खरगे) 26 साल के थे उस समय डॉ.स्वामीनाथन ने उन्हें कृषि विश्वविद्यालय की समिति का सदस्य बनाया था। कुल मिलाकर खरगे का अंदाज इस बार बदला हुआ था।
इन सांसदों का यहाँ से लेना-देना नहीं
प्रदेश से कांग्रेस के दो राज्यसभा सदस्य राजीव शुक्ला, और के.टी.एस.तुलसी का तो यहां के विकास कार्यों से कोई लेना-देना नहीं है। कम से कम सांसद निधि के खर्चों देखकर को तो यही कहा जा सकता है। राजीव शुक्ला ने तो अब तक निधि से एक रुपए भी जारी नहीं किए हैं।
कुछ ऐसा ही हाल के.टी.एस. तुलसी का है। अलबत्ता, सरकार ने उन्हें रायपुर में एक बंगला आबंटित किया है। हालांकि इसका उपयोग पूर्व राज्यसभा सदस्य छाया वर्मा करती हैं। इससे परे कांग्रेस की दो महिला राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम और रंजीत रंजन जरूर सांसद निधि के मद से होने वाले कामों को लेकर रुचि ले रही हैं।
सरकार सब समेट रही
मंत्रालय में सरकारी काम समेटने की कवायद शुरू हो गई है। आचार संहिता लगने से पहले इस कार्यकाल के सभी पेंडिंग फाइल, घोषणाओं पर आदेश जारी होने लगे हैं। और इन अंतिम दिनों में ही कई खबरें बाहर भी आएंगी। इस बार आचार संहिता 7 अक्टूबर के बाद किसी भी दिन लग सकती है । ऐसे में मंत्रिमंडल की एक और बैठक होने के संकेत हैं । चुनावों को देखते हुए सभी मंत्रियों ने अपने सचिवों से कह दिया है कि लंबित फाइलें पुशअप करें।
साथ ही चर्चा के लिए रोके गए प्रस्ताव, आदेश, डीई पर अंतिम अनुशंसा ले लें। इसे देखते हुए जांच से जूझ रहे अधिकारी, मंत्री, सचिव के इर्द गिर्द कदमताल करने लगे हैं। इस बार मंत्री, 2018 में भाजपा के मंत्रियों की तरह फाइल क्लीयरेंस में चुनावी नतीजों का इंतजार नहीं करना चाहते। पिछली सरकार में तो चुनाव निपटने के बाद एक मंत्री के बंगले से कई फाइलें जली हुई मिली थीं। इसको लेकर काफी बवाल भी हुआ था। बहरहाल मंत्रालय के कई विभागों में नोटशीट चल गई है कि आचार संहिता लगने तक किसी भी कर्मचारी, अधिकारी को छुट्टी नहीं मिलेगी। और शासकीय छुट्टी के दिन राजधानी न छोड़ें।
दो-ढाई करोड़ का तोहफा!
चुनावी टिकट का मौसम कई किस्म की रिश्वत और भ्रष्टाचार का भी होता है। अब दो दिनों से एक चर्चा बहुत तेज है कि एक महत्वाकांक्षी नौजवान नेता ने पार्टी में एक लीडर को दो-ढाई करोड़ की कार का तोहफा दिया है। अब इसके बाद टिकट की उम्मीद करना तो उसका हक बनता है। लेकिन अगर टिकट पाने का ऐसा रेट चल रहा है, तो फिर वोट पाने का कैसा रेट होगा? और अगर ऐसे अरबपति उम्मीदवारों से जनता नोट भी ले ले, और वोट अपनी मर्जी से दे, तो क्या उसे भी वोट बेचना कहेंगे? वोट बेचना तो तब होगा जब भुगतान के बाद उसके एवज में वोट दिया जाए। अगर कुछ दिया न जाए, और भ्रष्टाचार की कमाई में से जनता अपना हिस्सा ले ले, तो फिर उसमें जनता का भ्रष्टाचार कैसा? चुनाव आयोग के नियम कुछ अलग बात कह सकते हैं, लेकिन भ्रष्ट लोगों को नोचकर उनसे कुछ खरोंच लेना, और फिर अपनी मर्जी से वोट देना एक सामाजिक न्याय की बात हो सकती है।
ईडी संपत्ति ऐसे भी जब्त करती है...

ऐसे उम्मीदवार खारिज करें...
पांच राज्यों के चुनावों के बीच राजस्थान से खबर है कि वहां कई जनसंगठनों और राजनीतिक दलों ने मिलकर एक दलित घोषणापत्र जारी किया है। इसमें कहा गया है कि ऐसे किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं दिया जाएगा जिसके खिलाफ दलित प्रताडऩा का कोई आरोप हो। यह तरीका ठीक है, ऐसे अलग-अलग घोषणापत्र बनने चाहिए, महिलाओं को भी दलीय निष्ठा से परे ऐसा घोषणापत्र लाना चाहिए कि जिसके खिलाफ महिला प्रताडऩा, महिला शोषण के आरोप लगे हुए हों, उसका बहिष्कार किया जाएगा। वरना उसके बिना हालत यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक छोटे से कांग्रेस नेता के गुजर जाने के बाद उसके नाम पर एक सडक़ का नाम रखा गया है, और उसकी अपनी बहू ने उस पर प्रताडऩा की रिपोर्ट लिखाई हुई थी। लोगों को उम्मीदवारों और उनकी पार्टियों के बहिष्कार के ऐसे कड़े फैसले लेने चाहिए।
समाज के कुछ जागरूक लोगों को यह तय करना चाहिए कि राजनीति में आने के बाद भ्रष्टाचार के लिए बदनाम लोगों को वे वोट नहीं देंगे, इसी तरह यह भी तय करना चाहिए कि वे कुनबापरस्ती को वोट नहीं देंगे, देश-प्रदेश में सारी कुनबापरस्ती को तो वे नहीं रोक सकते, लेकिन अपने विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में अगर वे एक ही परिवार के अगले उम्मीदवार को वोट न देना तय कर लें, इसके लिए जागरूकता अभियान चलाएं, तो हो सकता है कि पार्टियां ही उन्हें टिकट देने में बिदक जाएं। एक परिवार के दो लोगों को टिकट देने के खिलाफ साफ-साफ अभियान चलना चाहिए।
नागरिकों के अलग-अलग जागरूकता समूह अपना एजेंडा खुद तय कर सकते हैं, और आज के वॉट्सऐप-जमाने में वे बिना अधिक खर्च के भी अपनी बात फैला सकते हैं। हम किसी को वोट नहीं देने के लिए सुझाव नहीं दे रहे, बल्कि यह कह रहे हैं कि ऐसी खामियों से परे के कोई भी उम्मीदवार न हों, तो लोगों को नोटा को वोट देना चाहिए। इससे भी यह बात जाहिर होगी कि हर उम्मीदवार में कोई न कोई खामी थी, और वोटर ने इन सबको खारिज कर दिया।
छींका टूटेगा या नहीं?
पंजाब में कांग्रेस के एक विधायक को आम आदमी पार्टी की सरकार ने नशे के एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया, तो दोनों पार्टियां सींग टकराकर लड़ रही हैं। और इस लड़ाई को देखकर छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी ने उम्मीद की एक लहर दौड़ रही है कि इंडिया-गठबंधन के ये दो दल अगर टकराएंगे, और छत्तीसगढ़ में भी आमने-सामने खड़े हो जाएंगे, तो यह कांग्रेस के लिए नुकसान का रहेगा, और भाजपा के लिए फायदे का रहेगा। अब दिल्ली की हसरत से छींका टूटता है या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन छत्तीसगढ़ में बिखरे हुए आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता यह चाह नहीं रहे हैं कि सत्तारूढ़ कांग्रेस से कोई समझौता हो। वे तकरीबन पांच बरस से कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते आए हैं, और राज्य सरकार पर हमले से परे तो उनके हाथ कोई बड़े मुद्दे बचेंगे नहीं। एक जानकार का यह भी कहना है कि कांग्रेस से आप के किसी भी चुनावी तालमेल से आप टूट जाएगी। देखें आगे क्या होता है।
यात्रा में राजधानी में कहीं खुशी कहीं गम
रायपुर में परिवर्तन यात्रा भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए काफी परेशानी की वजह रही। अपेक्षाकृत भीड़ नहीं जुटी, सो अलग। इसकी बड़ी वजह यह रही कि यात्रा 6 घंटे विलंब से पहुंची। रायपुर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में तो यात्रा का बुरा हाल रहा। कई जगहों पर तो पंडाल में दो-चार कार्यकर्ता ही नजर आए।
यात्रा के स्वागत के लिए कई जगहों पर जोरदार इंतजाम किए गए थे। एक जगह पर तो 11 पंडित शंख लेकर खड़े थे। गणेश उत्सव चल रहा है। पंडितों को और जगहों पर पूजा के लिए जाना था। चूंकि यात्रा के पहुंचने में देरी थी इसलिए सारे पंडित इंतजार किए बिना दक्षिणा लेकर निकल गए।
यही नहीं, एक जगह तो भारी भरकम माला पहनाने के लिए क्रेन का इंतजाम किया था। क्रेन का घंटे के हिसाब से किराया तय था मगर देरी को देखते हुए क्रेन को भुगतान कर लौटाना पड़ा। रायपुर पश्चिम में दावेदारों के बीच पोस्टर वार के बावजूद कई जगहों पर यात्रा का अच्छा स्वागत हुआ। रायपुर दक्षिण में भी ठीक ठाक भीड़ जुट गई। फिर भी राजधानी के हिसाब से जैसा माहौल बनना था वैसा नहीं बन पाया।
सरगुजा अब भी शांत नहीं
कांग्रेस में सरगुजा की कुछ सीटों पर प्रत्याशियों के नाम पर विवाद की स्थिति बन गई है। पिछले विधानसभा चुनाव में सरगुजा की 14 सीटों के लिए टीएस सिंहदेव को फ्री हैंड दिया गया था। सिंहदेव ने डॉ. चरणदास महंत की सहमति लेकर सभी सीटों पर प्रत्याशी तय किए थे। इस बार परिस्थिति काफी बदल गई है। चर्चा है कि वो तीन सीटों पर मौजूदा विधायक की जगह नए चेहरे को टिकट दिलाना चाहते हैं, लेकिन वैसी परिस्थिति नहीं बन पा रही है। मौजूदा विधायकों को दूसरे खेमे का समर्थन प्राप्त है। देखना है कि केंद्रीय चुनाव समिति इस तरह के विवादों का निपटारा कैसे करती है।
विश्वविद्यालय तोडऩा भारी पड़ा
वो तो समय रहते सरकार ने अपनी गलती सुधार ली,वर्ना खैरागढ़ में मुश्किल हो जाती। एशिया के एक मात्र संगीत विश्वविद्यालय का राजधानी में अध्ययन केंद्र खोलकर 4 दिनों में फिर बंद कर दिया। शनिवार को उद्घाटित केंद्र को लेकर राजनीति तो इतवार से शुरू हो गई थी। विरोध स्वरूप खैरागढ़ बंद शतप्रतिशत सफल रहा। पान ठेले से लेकर शो रूम तक बंद रहे। क्योंकि बात खैरागढ़ की पहचान से जुड़ी थी।
आरोप लगे कि राजधानी में रहने वाली कुलपति अपनी सुविधा के लिए 2014 के पारित प्रस्ताव को अमल में लाने खैरागढ़ से मंत्रालय, दौड़भाग करके एक कर दिया था। आदेश हुआ, केंद्र का उद्घाटन भी हुआ। लेकिन वोटों की राजनीति भारी पड़ गई। सीएम का संभवत: यह पहला फैसला होगा जिसे वापस लिया हो। यही नहीं, किसी पद्मश्री कलाकार के हाथों उद्घाटित कला केंद्र चार दिन बाद ही बंद हो गया। अब समस्या केंद्र के लिए भवन के किराए की होगी।
हर माह का अनुबंध होगा तो ठीक है और यदि साल दो साल की एकमुश्त पेशगी दे दी गई होगी तो वह एक अलग विवाद होगा। इन सारी बातों के बीच सबसे अहम यह भी है कि शैलेन्द्र नगर का यह नार्थ फेसिंग भवन ही ‘विवादहीन’ नहीं है। पहले पापुनि था जो विवादों में रहा। फिर एक निजी कंपनी ने लिया, वह भी निकल गई।
सोनवानी से परे भी जिम्मेदार हंै
छत्तीसगढ़ पीएससी के भयानक घोटाले के किस्से थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। इसकी पहली खबर इसी कॉलम में छपी थी और उसके बाद से भाजपा के गौरीशंकर श्रीवास ने लगातार इसे उठाया। उन्होंने ट्विटर पर इस कॉलम की एक कतरन से यह लड़ाई शुरू की थी, जो कि अब हाईकोर्ट के एक हुक्म तक पहुंच चुकी है।
इस पूरे मामले में पीएससी के चेयरमैन रहे टामन सिंह सोनवानी का किया हुआ भयानक घोटाला तो उजागर होते ही चल रहा है, और हाईकोर्ट में सुनवाई के जीवंत प्रसारण में यह देखने मिला कि किस तरह पीएससी घोटाले पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपने साथी जज के साथ हैरान हो रहे थे। लेकिन इस पूरे मामले में एक दूसरे नाम की चर्चा अभी पीछे रह गई है। पीएससी का कोई भी घोटाला परीक्षा नियंत्रक के बिना नहीं हो सकता था। चेयरमैन तो हाथ झाड़ भी सकते हैं, लेकिन जिसके हाथ रंगे हुए हैं, उस परीक्षा नियंत्रक आरती वासनिक की चर्चा अब तक कम है। इनके खिलाफ भी बहुत सी जानकारी लेकर पीएससी के निराश लोग इस स्तंभकार तक पहुंचे हैं।
ट्रेनें रद्द, एयरपोर्ट पर गुंडागर्दी
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एयरपोर्ट पर भूतपूर्व पार्किंग ठेकेदार से लेकर टैक्सी सर्विस की महिला कर्मचारियों तक की जो गुंडागर्दी आए दिन सामने आती है वह भयानक है। इनके बीच अलग-अलग चल रही हिंसा के वीडियो तैरते रहते हैं, और मानो सरकारी और संपन्न तबकों, ताकतवर नेताओं और अफसरों के इस्तेमाल वाले एयरपोर्ट के गुंडे भी ताकतवर रहते हैं, इसलिए वहां पर कोई कार्रवाई होते नहीं दिखती है। कल ही की खबर थी कि एयरपोर्ट पर पिछले ठेकेदार प्रवेश दुबे, सुभाष मिश्रा, और विनय दुबे ठेका खत्म होने के ढाई महीने बाद भी वहां वसूली करते हैं, और टैक्सी सर्विस वालों से उनके हिंसक झगड़े चलते रहते हैं। जिस एयरपोर्ट पर पहले विमान के घंटे भर पहले से आखिरी विमान के आधे घंटे बाद तक मंत्री-मुख्यमंत्री, सांसद-विधायक, आईएएस-आईपीएस बने ही रहते हैं, वहां पर गुंडागर्दी के ऐसे धंधे बताते हैं कि स्थानीय पुलिस-प्रशासन की इसमें भागीदारी है। अगर ऐसा नहीं होता तो इनमें से हर कोई हर दिन गिरफ्तार होते, और यह गुंडागर्दी खत्म होती। दूसरी तरफ यह राजधानी रायपुर जिस भाजपा सांसद सुनील सोनी के संसदीय क्षेत्र में है, उनको भी इस बात से कोई परवाह नहीं दिखती है कि उनकी सरकार के मातहत चलने वाले इस एयरपोर्ट पर लगातार किस तरह की गुंडागर्दी चल रही है, और मुसाफिरों को कितने लोग लूट रहे हैं। ऐसा लगता है कि सांसद खुद सुरक्षित रहते हैं, और बाकी लोगों से उनका कोई लेना-देना नहीं रहता। ऐसा तो हो नहीं सकता कि इस राजधानी में दो बार महापौर रहे हुए वर्तमान सांसद को यहां के अखबारों में तकरीबन रोजाना ही छपने वाली एयरपोर्ट-गुंडागर्दी की खबरें न दिखती हों। यह भी लगता है कि एयरपोर्ट डायरेक्टर जैसे ओहदे पर बैठाए गए अफसर को भी उनके इलाके में ऐसी संगठित गुंडागर्दी और वसूली-उगाही से कोई परहेज नहीं है। और जब किसी अफसर को ऐसा परहेज नहीं होता है, तो यह जाहिर होता है कि वह क्यों नहीं होता है।
दूसरे देश-प्रदेश से यहां पहुंचने वाले लोगों को, चाहे वे पर्यटक हों, या संभावित पूंजीनिवेशक, उनको पहला नजारा गुंडागर्दी का देखने मिलता है, और राज्य सरकार को भी इस बात की परवाह नहीं लगती है कि इस नौबत को सुधारा जाए। इसी राजधानी में प्रदेश के सबसे बड़े पुलिस अफसर रोजाना ही ऐसी खबरें देखते हैं, ऐसे वीडियो देखते हैं, और रोज यह गुंडागर्दी जारी है। दरअसल एयरपोर्ट पर सत्ता की ताकत से लैस लोगों की गाडिय़ों के लिए एक अलग इंतजाम रहता है, और इसलिए वे आम जनता पर हो रहे जुल्म और उनके खिलाफ हो रहे जुर्म से बेखबर और बेअसर भी रहते हैं।
ट्रेनों के मुसाफिर हजारों मुसाफिर रेलगाडिय़ों के रद्द होने की तकलीफ झेल रहे हैं, और एयरपोर्ट के मुसाफिर एक अलग किस्म की गुंडागर्दी झेल रहे हैं। आने वाले चुनाव में देखते हैं कि ट्रेन और प्लेन पर काबू करने वाली भाजपा की केन्द्र सरकार के साथ वोटर कैसा सुलूक करते हैं।
टिकट के लिए संत की सिफारिश
टिकट के लिए कई नेता साधु-संतों की शरण चले जाते हैं। कांग्रेस हो या भाजपा, प्रभावशाली साधु-संतों की सिफारिश को तवज्जो भी देती है। सुनते हैं कि भाजपा में टिकट के दो दावेदार के लिए देश के एक नामी संत की सिफारिश आई है।
संतजी विश्वविद्यालय भी संचालित करते हैं, और चर्चा है कि पीएम भी उन्हें काफी मानते हैं। बताते हैं कि दावेदारों में से एक तो पूर्व में विधायक भी रह चुके हैं। इससे परे एक अन्य दावेदार ने कार्यक्रमों में काफी कुछ खर्च किया था, और पार्टी के रणनीतिकारों ने उन्हें प्रॉमिस भी किया था। मगर पिछले दिनों एक प्रभावशाली नेता के पार्टी में प्रवेश के बाद उन्हें अपनी दावेदारी कमजोर लगने लगी है। इसके बाद वो भी संतजी के शरण में चले गए।
कहा जा रहा है कि संतजी का फोन आया, तो यहां रणनीतिकार हड़बड़ा गए हैं। उनकी सिफारिश को नजरअंदाज करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। देखना है कि पार्टी क्या रास्ता निकलता है।
नोट को खोट माने या नहीं?
नोटों के बंडल के साथ कैमरे में कैद होने के बाद चंद्रपुर के कांग्रेस विधायक रामकुमार यादव की टिकट को लेकर उलझन पैदा हो गई है। पार्टी का प्रभावशाली खेमा उन्हें फिर टिकट देने के लिए दबाव बनाए हुए है। रामकुमार ने अपने खिलाफ षडय़ंत्र का आरोप लगाकर थाने में रिपोर्ट भी लिखाई है। बावजूद इसके पार्टी संगठन के प्रमुख नेता उनसे सहमत नहीं हो पा रहे हैं।
चर्चा है कि प्रदेश प्रभारी सुश्री सैलजा ने नोट प्रकरण की पूरी जानकारी ली है। कुछ नेताओं का मानना है कि रामकुमार को टिकट देने से खराब मैसेज जाएगा। जीत की संभावना कमजोर हो सकती है। चाहे कुछ भी हो, रामकुमार की टिकट को लेकर पार्टी के दो खेमा आमने-सामने आ गया है। देखना है आगे क्या होता है।
रमन सिंह वायदा करते भी तो कैसे?
सिंधी समाज के कई नेता, पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह से नाखुश हैं। ये नेता मंगलवार को पूर्व सीएम से मिलने गए थे। शंकर नगर सिंधी पंचायत के ये सदस्य पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी को टिकट देने की वकालत कर रहे हैं। मगर पूर्व सीएम की तरफ से कोई आश्वासन नहीं मिला। इस पर सिंधी पंचायत के एक सदस्य ने फेसबुक पर अपना दुख बयां किया। उसने लिखा कि समाज के अग्रणी मुखीगण, और महिलाओं के साथ 70 लोग पूर्व सीएम के बंगले पहुंचे थे।
पूर्व सीएम से मिलने के लिए करीब 1 घंटा इंतजार करना पड़ा। किसी ने पानी तक नहीं पूछा। फिर भी डॉ. रमन सिंह का फूल माला पहनाकर स्वागत किया गया। मगर पूर्व सीएम ने विचार का भी आश्वासन नहीं दिया। इससे समाज के लोग अपमानित महसूस कर रहे हैं। हालांकि पार्टी के कई नेता मानते हैं कि पार्टी में कोई भी नेता टिकट को लेकर ठोस आश्वासन देने की स्थिति में नहीं है। हाईकमान सर्वे रिपोर्ट, और अन्य समीकरण को देखकर टिकट तय कर रही है। ऐसे में किसी एक नेता को टारगेट करना उचित नहीं है।
भाजपा का चर्च पर्यटन
भाजपा इस चुनाव में सर्व समाज के लिए सर्वस्पर्शी होना चाह रही है। मोदी मित्र जहां मुस्लिम जमात में सक्रिय कर दिए गए हैं तो मसीही समाज को भी बेहतर तरीके से साधने की ओर कदम बढ़ा लिया है। पहले सरगुजा में मसीही समाज के अपने बड़े चेहरे प्रबोध मिंज को पिछले कार्यकाल में महापौर बनाया तो इस बार उन्हें लुंड्रा से बी- फार्म दिया जा रहा है। भाजपा को लगता है कि सरगुजा का मसीही समाज सध गया। अब बात राजधानी और आसपास की करें तो ईसाई समुदाय के एक प्रमुख नेता नितिन लारेंस को भी ऑफर दिया गया है । चर्चा है कि नितिन जल्द ही भाजपा प्रवेश कर सकते हैं। नितिन को दिल्ली बुलावा भी आया है।
नितिन अभी मसीही समाज की प्रदेश स्तरीय धार्मिक सामाजिक संगठन रायपुर डायसिस के सचिव हैं। युवा हैं, समाज में अच्छी छवि है। हालांकि कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं है। लेकिन नितिन का संघ के बड़े भाईसाहबों से संपर्क है। जबलपुर के मॉडरेटर पीसी सिंह और पुत्र की गड़बडिय़ों को उजागर करने में उनकी अहम भूमिका रही। भाजपा में आते हैं तो पार्टी की क्रिश्चियन विरोधी छवि सुधरकर आकर्षण बढ़ेगा। अब बात सरकार बनने पर नितिन के ओहदे पर करें तो युवा आयोग, अल्पसंख्यक आयोग आदि आदि तो हैं ही। वैसे भाजपा पहले भी डॉ. दीपक क्लाडियस को पहले सदस्य और फिर कार्यवाहक अध्यक्ष बना चुकी है। नितिन को लेकर समाज में भी चर्चाएं चल रही है। कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में कह सुन रहा है।
मेहमान चले गए, कचरा रह गया

सफाई के लिए आम लोगों से यूजर चार्ज, समय समय पर अर्थदंड वसूलने वाले निगम से भला कौन वसूले। इस कचरे को साफ करने में ढिलाई के लिए। जी-20 सम्मेलन के मेहमानों को सहभागिता दिखाने ऐसे होर्डिंग शहर में जगह जगह लगाए गए । इसमें निगम, स्मार्ट सिटी कंपनी ने बड़ी रकम खर्च की। ये अलग बात है कि सम्मेलन के प्रतिनिधि इन्हें देखने आए ही नहीं। उन्हें किसी यह बताया भी नहीं होगा कि आपके स्वागत में शहर सजाया गया है। वे सभी आलीशान रिजॉर्ट से ही वापस लौट गए। और 10 दिन बाद भी ये होर्डिंग तालाब से मरीन ड्राइव के नामधारी तेलीबांधा तालाब के किनारे पड़े हुए हैं। यह हाल निगम की उस मशीनरी का है जहां से रोजाना सैकड़ों सफाई वैन मोर रायपुर, स्वच्छ रायपुर का गाना बजाते निकलते हैं।
बैठे-ठाले की गप्पबाजी
छत्तीसगढ़ चुनावी दौर से गुजर रहा है। आम लोग ऑटोरिक्शा में बैठते ही चुनाव सर्वे के काम में लग जाते हैं, और ड्राइवर से चुनावी हाल पूछने लगते हैं कि कौन सी पार्टी जीतेगी। कुछ किलोमीटर बाद जब वे उतरते हैं, तब तक वे अपने को राजनीतिक विश्लेषक भी मान लेते हैं। जाहिर है कि ऐसे माहौल में सरकारी अमले से लोग जानना चाहते हैं कि कौन सी पार्टी अगली सरकार बनाएगी।
सरकारी अमले के कुछ पुराने और जानकार लोगों का कहना है कि जब चुनाव दूर रहता है, तब तो उनके पास यह कहने की गुंजाइश रहती है कि अभी तो चुनाव दूर है, अभी तो उम्मीदवारों के नाम भी नहीं आए हैं। लेकिन बाद में उन्हें कुछ न कुछ अंदाज लोगों को बताना पड़ता है, और जैसे-जैसे चुनाव करीब आता है, पहले तो वे सत्तारूढ़ पार्टी को जिताते रहते हैं, फिर और करीब आता है तो वे टक्कर की बात कहने लगते हैं, और मतदान के बाद मतगणना के पहले तक वे विपक्ष की सरकार बनने का आसार बताने लगते हैं।
बाहर से आने वाले, और प्रदेश के भीतर के पत्रकार भी अनायास मिले लोगों से पूछकर चुनावी भविष्यवाणी के विशेषज्ञ बन जाते हैं, और कुछ गिने-चुने लोगों की कही हुई बातों से वे बड़े-बड़े नतीजे निकाल लेते हैं। इन सबमें सर्वे की बुनियादी तकनीक का ख्याल रखना तो मुमकिन होता नहीं है जिसके मुताबिक किस तरह के कितने लोगों से किस तरह के सवाल करने पर मिलने वाले जवाबों से कोई नतीजा निकाला जा सकता है।
इसलिए खाली बैठे हुए गप्प मारने के लिए तो इस तरह की बातें ठीक हैं, लेकिन इन बातों से कोई नतीजा नहीं निकालना चाहिए।


