राजपथ - जनपथ

10-Jun-2020 6:29 PM

कारतूस बाकी हैं?

नक्सलियों को कारतूस सप्लाई के प्रकरण में कुछ और खुलासे होना बाकी है। इस पूरे मामले में दो पुलिस कर्मियों को हिरासत में लेकर पूछताछ चल रही है। कांकेर में जो नक्सलियों को कारतूस की खेप पहुंचाई जानी थी, वह सुकमा पुलिस के शस्त्रागार से निकली थी। सुनते हैं कि पुलिस की टीम ने 11 सौ से अधिक कारतूस जब्त किए, मगर 695 कारतूस की ही बरामदगी दिखाई है। ये कारतूस सुकमा के शस्त्रागार के निकले थे। चर्चा है कि कुछ और लोगों की धरपकड़ होना बाकी है, इसके बाद बाकी बचे कारतूस की बरामदगी दिखाई जाएगी। कुल मिलाकर नक्सलियों को कारतूस सप्लाई के मामले को लेकर पुलिस महकमा काफी गंभीर है, और इससे जुड़े हुए किसी भी व्यक्ति के खिलाफ प्रकरण कमजोर न हो, इसका पुख्ता बंदोबस्त किया जा रहा है। देखना है कि कितने और लोगों के खिलाफ कार्रवाई होती है।  आखिर सवाल पुलिस की अपनी जिंदगी का है जो कि इन्हीं कारतूसों से जा सकती थी.

पुराना सुलझा केस, अब जुर्म दर्ज..

दुर्ग-भिलाई इलाके में एक बुजुर्ग के करीब पौन करोड़ के शेयरों की जालसाजी हुई, और उन्हें जयपुर-मुम्बई के दलालों ने उनकी जानकारी के बिना बेचने की कोशिश की। यह मामला सालभर के और पहले दुर्ग पुलिस की जानकारी में आया, और उस वक्त वहां एडिशन एसपी चिटफंड के पद पर ऋचा मिश्रा के सामने पहुंचा। सीनियर अफसरों की जुबानी हुक्म के बाद उन्होंने जयपुर, अहमदाबाद, और मुम्बई चारों तरफ जांच की, टेलीफोन पर, और उन प्रदेशों में  अपने परिचित अफसरों की मदद से। पूरा केस सुलझा लिया, लेकिन उस वक्त पुलिस ने उसे थाने में दर्ज करने से मना कर दिया था, और सुलझा हुआ केस तमाम सुबूतों के साथ पड़े रह गया। अब अफसरों ने इस केस पर एफआईआर करवाई है, और जो लोग साल भर पहले गिरफ्तार हो सकते थे, हो सकता है कि उनके जेल जाने की बारी अब आए।

अंग्रेजी तो अंग्रेजी, हिन्दी का हाल...

अंग्रेजी भाषा की गलतियां होने पर लोग मजाक उड़ाते हैं कि अंग्रेज चले गए अंग्रेजी छोड़ गए। अब छोड़ी गई चीज तो टूटी-फूटी होगी ही। लेकिन जो अंग्रेज न लाए थे, और न छोड़ गए, उस पर क्या कहा जाए? खासकर हिन्दी इलाके में हिन्दी की गलतियों पर?

रायपुर के एक पत्रकार अनिरुद्ध दुबे को अभी एक दफ्तर में हिन्दी में बना हुआ एक नोटिस मिला, जिसकी हिन्दी पढऩे के बाद यह कहना मुश्किल है कि इसे राष्ट्रभाषा बताते हुए लोग एक वक्त अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चलाते थे। और तो और शहर में जो बड़े-बड़े सरकारी बोर्ड लगे हैं, उन पर देशभक्ति के बड़े विख्यात शेर लिखे हैं, या कविताओं के कुछ शब्द लिखे हैं, और वे भी गलत है। बाग-बगीचों में लगे हुए नोटिस की हिन्दी भी चौपट है। अब म्युनिसिपल और सरकार की स्कूलों में इस शहर में हजार-पांच सौ टीचर होंगे, हिन्दी के सैकड़ों टीचर में से भी किसी को यह नहीं लगता कि इसे सुधरवाया जाए।


09-Jun-2020 6:13 PM

बीजेपी का नौजवान नेता कौन?

विष्णुदेव साय की भाजपाध्यक्ष पद पर ताजपोशी के बाद युवा मोर्चा के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर हलचल तेज हो गई है। भाजपा संगठन में युवा मोर्चा का अध्यक्ष पद, दूसरा सबसे बड़ा पद है और इसमें नियुक्ति को लेकर पार्टी के कर्ता-धर्ता काफी मंथन कर रहे हैं। आम तौर पर 35 से कम उम्र के युवा नेता को अध्यक्ष की कमान सौंपी जाती रही है, लेकिन पिछले कुछ सालों से यह परम्परा टूट गईं। पार्टी अधेड़ को भी युवा मोर्चा की कमान सौंपने परहेज नहीं करने लगी। मौजूदा युवा मोर्चा के मुखिया विजय शर्मा तो 50 वर्ष के हो चले हैं।

खैर, युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद के लिए जिन नामों की चर्चा है उनमें पूर्व आईएएस ओपी चौधरी का नाम सबसे ऊपर है। चौधरी को पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह का समर्थन हासिल है। पार्टी हाईकमान ने अब तक की नियुक्तियों में सौदान सिंह और रमन सिंह की पसंद को तरजीह दी है। ऐसे में माना जा रहा है कि दोनों की पसंद पर ही युवा मोर्चा के अध्यक्ष की भी नियुक्ति होगी। चौधरी के साथ-साथ दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के छोटे पुत्र प्रबल प्रताप सिंह का नाम भी चर्चा में है।

प्रबल काफी सक्रिय भी हैं। चूंकि विष्णुदेव साय भी जशपुर के रहने वाले हैं। ऐसे में एक ही इलाके के होने के कारण प्रबल की दावेदारी थोड़ी कमजोर दिख रही है। हालांकि प्रबल भी सौदान-रमन के पसंदीदा माने जाते हैं। इससे परे मौजूदा महामंत्री संजूनारायण सिंह ठाकुर का नाम भी चर्चा में है। उनके पास युवा मोर्चा कार्यकताओं की अच्छी खासी फौज भी है। मगर उनके साथ दिक्कत यह है कि उन पर पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के करीबी होने का लेबल है। इस वजह से भी उनकी दावेदारी स्वाभाविक रूप से कमजोर दिख रही है। पार्टी के भीतर कुछ लोग हंसी मजाक में कहते भी हैं कि बृजमोहन समर्थक होना पद न मिलने की गारंटी भी है। संजूनारायण के अलावा राज्य भण्डार गृह निगम के पूर्व अध्यक्ष नीलू शर्मा और मौजूदा जिला पंचायत उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह का नाम भी चर्चा में है।

कुछ लोग आरंग के पूर्व विधायक नवीन मारकंडेय का नाम भी सुझा रहे हैं। नवीन युवा मोर्चा में काम कर चुके हैं और अनुसूचित जाति वर्ग से भी हैं। वे भी संगठन में हावी नेताओं के करीबी माने जाते हैं। इसके अलावा सौरभ कोठारी और भावेश बैद का नाम भी चर्चा में है। ये दोनों पूर्व सांसद अभिषेक सिंह के करीबी माने जाते हैं। देखना है कि सौदान-रमन की जोड़ी किस युवा-अधेड़ पर हाथ धरते हैं।

ऐसे में कैसे करें दोस्ती?

सोशल मीडिया पर लोग इन दिनों बहुत सावधान होकर चलने लगे हैं क्योंकि किसी के फेसबुक अकाऊंट से तस्वीर लेकर लोग उस नाम का दूसरा अकाऊंट भी बना लेते हैं और लोगों को धोखा भी देने लगते हैं, लोगों के दोस्तों को संदेश भेजकर उनसे कर्ज भी मांगने लगते हैं। कई बार कोई अश्लील वीडियो भेजने लगते हैं। इसलिए लोग तरह-तरह से सावधानी बरतने लगे हैं।

लेकिन इसमें एक दिक्कत भी आ रही है। लोग दूसरों को फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजते हैं, और जब लोग देखना चाहते हैं कि वे किस किस्म के हैं, उनकी विचारधारा क्या है, उनका मिजाज कैसा है, तो उनका फेसबुक खाता दोस्तों के लिए ही खुला रहता है, बाकी लोग उस पर कुछ भी नहीं देख सकते। यानी लोग खुद तो दूसरों के दोस्त बनना चाहते हैं, लेकिन वे अपने खाते को लॉक करके रखते हैं ताकि कोई झांक न सके, वे लोग भी न झांक सकें जिनको उन्होंने दोस्ती का अनुरोध भेजा है। अब ऐसे में कोई दोस्ती करे तो भी कैसे करे?


08-Jun-2020 6:36 PM

पीएससी से जारी लड़ाई अब यूपीएससी तक...

पीएससी-2003 भर्ती घोटाले का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकलने के फेर में है। वजह यह है कि इस बैच के डिप्टी कलेक्टर संवर्ग के अफसरों को आईएएस अवॉर्ड के लिए फाइल चल रही है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने भर्ती में घोटाले को माना था और मानव विज्ञान के पेपर की फिर से जांच कर नए सिरे से चयन सूची तैयार करने के आदेश दिए थे। यद्यपि हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है। इस पर सुनवाई होनी है। 

यह घोटाला इस दर्जे का है कि पीएससी-प्री में असफल कई अभ्यार्थी तो मेंस और फिर इंटरव्यू निकालकर आज अच्छी खासी नौकरी कर रहे हैं। नए सिरे से चयन सूची तैयार होने की दशा में कुछ डिप्टी कलेक्टर डिमोट हो सकते हैं। कई की नौकरी भी जा सकती है। घोटाले को लेकर वर्षा डोंगरे, रविन्द्र सिंह और चमन सिन्हा ने हाईकोर्ट मेें याचिका दायर की थी। बाद में हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, तो वहां सिर्फ वर्षा डोंगरे और उनके पति संतोष कुंजाम ही लड़ाई लड़ रहे हैं। वर्षा अभी सरगुजा में जेलर हैं और चर्चा है कि उन्हें हाईकोर्ट में प्रकरण वापस लेने के एवज में डीएसपी का पद ऑफर किया गया था। मगर उन्होंने ठुकरा दिया। कानूनी लड़ाई में भागीदार रहे संतोष के साथ बिलासपुर हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद परिणय सूत्र में बंध गई। अब पति-पत्नी बन चुके वर्षा और संतोष की लड़ाई अब भी जारी है।

वर्ष-2003 बैच के डिप्टी कलेक्टर संवर्ग के अफसरों में से वर्तमान में कई अलग-अलग विभागों में ऊंचे पदों पर हैं। इन सभी ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनकी पैरवी देश के एक सबसे महंगे वकील हरीश साल्वे ने की थी और उन्हें फिलहाल राहत भी मिली हुई है। याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे और संतोष कुंजाम के पक्ष में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण पैरवी कर रहे हैं।

ताकतवर हो चुके लोगों के खिलाफ लड़ाई लडऩा आसान नहीं होता है। कदम-कदम पर मुश्किलें आती हैं। इस  का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि सभी को व्यक्तिगत रूप से नोटिस तामिल होनी थी, लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग ने संतोष कुंजाम का एड्रेस उपलब्ध कराने से मना कर दिया। बाद में कोर्ट के आदेश पर अखबारों में सूचना प्रकाशित कराकर तामिल कराई गई। अब जब डिप्टी कलेक्टर संवर्ग के अफसरों को आईएएस अवॉर्ड प्रमोशन होना है, तो घोटाले के खिलाफ लड़ाई तेज हो सकती है। क्योंकि इस बार पदोन्नति की प्रक्रिया में न सिर्फ राज्य सरकार बल्कि यूपीएससी और डीओपीटी भी भागीदार रहेंगे, ऐसे में उनके समक्ष यह प्रकरण आता है, तो उनका रूख क्या होगा यह भी देखना है। मगर बरसों से लड़ाई लड़ रहे संतोष कुंजाम इस प्रकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाने की तैयारी कर रहे हैं।

पीएससी से जारी लड़ाई अब यूपीएससी तक पहुंच गयी है, जो कि इस सिलेक्शन में शामिल रहेगा।

अब असली मोर्चा खुला

छत्तीसगढ़ में कोरोना का विस्फोटक रुप दिखने लगा है। रोजाना रिकॉर्ड टूट रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से सौ के आसपास कोरोना पॉजिटिव मरीजों की पहचान हो रही है। अब कुल पॉजिटिव मरीजों की संख्या हजार के पार हो गई है। राजधानी रायपुर में एक दिन 35 पॉजिटिव केसेस ने सभी की नींद उड़ा दी है। कहा जा रहा है कि प्रवासी कामगारों के दूसरे राज्यों से लौटने के कारण राज्य में नए केसेस बढ़ रहे हैं। जो नए मामले आ रहे हैं, वो ज्यादातर उन्हीं के हैं या फिर उन कामगारों को उनके ठिकानों तक पहुंचाने वाले अमले के लोग संक्रमित हुए हैं। ऐसी स्थिति में सामुदायिक संक्रमण का खतरा बढ़ गया है। दूसरी तरफ डॉक्टर्स और मेडिकल स्टॉफ के संक्रमित होने की खबरें भी लगातार मिल रही है। जाहिर है कि अब स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी असर पड़ेगा। ऐसे में लोगों को ज्यादा चौकस रहने की जरुरत है। क्योंकि हमारे कोरोना वॉरियर्स भी संक्रमण से अछूते नहीं है। जबकि मार्च-अप्रैल का वो समय भी था, जब राज्य में कोरोना पॉजिटिव की संख्या दहाई के अंक के आसपास थी। इस दौरान कहा जा रहा था कि राज्य ने कोरोना से निपटने के लिए माकूल उपाय किए हैं और खासतौर पर हमारे 13 कोरोना योद्धा दिन-रात इस जंग में फ्रंटफुट पर तैनात हैं। इतना ही नहीं इसे पूरे देश के सामने नजीर के रुप में पेश करने की कोशिश की गई, हालांकि इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन अब जब मामले बढ़ रहे हैं तो ये कोरोना योद्धा गायब हैं। सोशल मीडिया में इन योद्धाओं की तलाश भी शुरू हो गई है।


07-Jun-2020 6:13 PM

सप्रे मैदान के लिए जिद

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सबसे पुराने सप्रे स्कूल मैदान को छोटा करने का विरोध हो रहा है। इसके बावजूद शहर के मेयर एजाज ढेबर इसको पूरा करने में खासी दिलचस्पी दिखा रहे हैं, इससे कई तरह के सवाल भी खड़े हो रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि वे इस मुद्दे पर किसी को विश्वास में लेने के पक्ष में भी दिखाई नहीं देते। इस मसले पर एक टीवी चैनल को दिया गया इंटरव्यू तो यही साबित कर रहा है। उनके इंटरव्यू का एक हिस्सा सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें वे यह कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि वे इस वार्ड के पार्षद हैं और उन्हें नहीं लगता कि इस विषय में किसी से कुछ भी पूछने की जरुरत है। लेकिन वे शायद भूल रहे हैं कि उन्हें पार्षद तो जनता ने ही बनाया है और वार्ड की जनता को विश्वास में लेना उनका पहला दायित्व है। खैर, यह तो सियासत की रीति है कि चुनाव के समय जनता ही जनार्दन होती है लेकिन चुनाव जीतने के बाद पांच साल के लिए जनार्दन का अता-पता नहीं होता। लगता है कि रायपुर के मेयर भी जनता जनार्दन को भूल गए हैं, तभी तो वे कह रहे हैं कि उन्हें किसी से पूछने की जरुरत नहीं। यह उनका अभिमत हो सकता है, लेकिन दानी स्कूल, डिग्री कॉलेज और सप्रे स्कूल राजधानी रायपुर की पहचान है। इसमें कोई शक नहीं कि शहर के बीचों-बीच स्थित इस मैदान पर हर किसी की नजर है। जब भी कोई सत्ता में काबिज होता है, तो सबसे पहला प्रोजेक्ट यही होता है। इस बार भी लोगों को आशंका है कि इसके व्यवसायिक उपयोग के लिए मैदान को छोटा किया जा रहा है। सिविल सोसायटी और खेल संगठन इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन मेयर का रुख देखकर तो लगता नहीं कि वे समझौता करने के मूड में है। कुछ लोग इसके ऐतिहासिक महत्व के आधार पर मैदान को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि यहां देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की सभा हुई थी। यहीं पर आपातकाल के बाद विजयलक्ष्मी पंडित की ऐतिहासिक सभा हुए थी. यहीं से अटल बिहारी वाजपेयी ने अलग छत्तीसगढ़ राज्य की घोषणा की थी। ऐसे तमाम कारण गिनवाए जा रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही दूसरे कारण भी है, जिसके कारण खेल मैदान को बचाना जरुरी है। अब देखना यह है कि प्रशासन ऐतिहासिक और व्यवहारिक बातों को महत्व देता है या फिर व्यवसायिक कारणों को। लेकिन कई सियासतदारों का अनुभव है कि ये पब्लिक है, जो सब जानती है और पांच साल बाद पूरा हिसाब चुकता जरुर करती है। ऐसे में जनता जनार्दन को भूलना भारी भी पड़ सकता है।

कितने पास कितने दूर

कोरोना के खौफ के बीच विष्णुदेव साय ने शनिवार को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दायित्व संभाल लिया। मगर उनके पास सभी को साथ लेकर चलने की चुनौती है। इसका नजारा उस वक्त देखने को भी मिला, जब अध्यक्ष पद के दावेदार रहे रामविचार नेताम, अजय चंद्राकर और नारायण चंद्राकर, साय के शपथ ग्रहण समारोह से दूर रहे। हालांकि साय खुद अध्यक्ष बनने के इच्छुक नहीं थे। पार्टी का एक बड़ा खेमा इस बात से भी खफा है कि साय की अनिच्छा के बावजूद उन्हें मुखिया बना दिया गया।

सुनते हैं कि पार्टी के असंतुष्ट नेताओं ने अब खुद को अलग-थलग करने की रणनीति बनाई है। रायपुर-दुर्ग सहित कई जिलों के अध्यक्षों के साथ-साथ प्रदेश पदाधिकारियों की नियुक्ति होनी है। असंतुष्ट नेताओं ने तय किया है कि पदाधिकारियों की नियुक्ति को लेकर अपनी तरफ से कोई राय नहीं देंगे। पार्टी जिसे चाहे, नियुक्त करें। रायपुर और दुर्ग जिले में अध्यक्ष की नियुक्ति असंतुष्ट नेताओं के अडऩे के कारण अटक गई थी।

अब तय हो गया है कि नियुक्तियों में संगठन में हावी धड़ा जो चाहेगा वह होगा। देखना यह है कि सरकार के खिलाफ सडक़ की लड़ाई में असंतुष्ट नेता पूरी क्षमता से साथ देते हैं अथवा नहीं। मगर यह साफ है कि विष्णुदेव साय के लिए वर्ष-2008 के मुकाबले काफी कठिन है। उस समय भाजपा की सरकार थी, तब सबका साथ मिल रहा है। लेकिन इस बार विपक्ष में होने के बावजूद अपने दूर होते जा रहे हैं।


06-Jun-2020 6:31 PM

केंद्र ने छत्तीसगढ़ से मांगा न्याय !

भाजपा भले ही सरकार की राजीव गांधी न्याय योजना की आलोचना कर रही है, और यह बताने की कोशिश में लगी है कि किसानों को कोई खास फायदा नहीं हो रहा है। मगर केन्द्र की भाजपा की नेतृत्व वाली सरकार की सोच ठीक इसके उलट है। तभी तो केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने राज्य सरकार से योजना का पूरा ड्राफ्ट मांगा है। राज्य ने योजना से जुड़ी सारी जानकारियां भेज भी दी है।

कोरोना संक्रमण के बीच आर्थिक संकट झेल रही प्रदेश की सरकार ने राजीव गांधी न्याय योजना के जरिए किसानों को आर्थिक मदद पहुंचाई है। इसका व्यापक असर हुआ है। इस योजना के शुरू होने से किसान आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं। इससे प्रदेश में व्यापार को फायदे की उम्मीद है। जानकारों का मानना है कि जिस तरह केन्द्र सरकार न्याय योजना में दिलचस्पी दिखा रही है, उससे ऐसा लग रहा है कि केन्द्र भी आने वाले समय में किसानों को राहत पहुंचाने के लिए कोई नई योजना शुरू कर सकता है। फिलहाल तो जिस तरह न्याय योजना प्रदेश के बाहर भी सराहा जा रहा है, उससे राज्य सरकार के लोग खुश हैं।

मीडिया अब बद्दुआ का सामान

दिल्ली में कल विख्यात और वरिष्ठ पत्रकार, विनोद दुआ के खिलाफ भाजपा के लोगों की शिकायत पर एफआईआर दर्ज किया गया है। उनके अलावा आकार पटेल नामक सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज हुई है जो कि मानव अधिकार के लिए काम करने वाली संस्था एम्नेस्टी इंटरनेशनल के अध्यक्ष रह चुके हैं। विनोद दुआ पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करने को सार्वजनिक रूप से गड़बड़ी फैलाना बताते हुए शिकायत की गई थी, और एफआईआर में कहा गया है कि दुआ ने गलत मंशा से झूठी खबर फैलाकर देश में शांति भंग करने की कोशिश की है। उसके पहले एक दूसरे वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ उत्तरप्रदेश पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की थी, और उन्हें पेश होने का समन भेजा था।

आज की ही एक दूसरी खबर बताती है कि देश में किस-किस अखबार और मीडिया संस्थान ने कितने लोगों को नौकरी से निकाला है, और कितनों ने तनख्वाह घटा दी है।

इन दोनों बातों को देखें तो समझ आता है कि आने वाले वक्त में अगर किसी पेशे में जाने की सबसे कम मांग रहेगी, तो वह अखबारनवीसी और बाकी मीडिया में। जिस धंधे में झूठी शिकायतों पर कोर्ट-कचहरी का खतरा हो, और नौकरी का कोई ठिकाना न हो, तनख्वाह का कोई ठिकाना न हो, उस धंधे में कोई जाना क्यों चाहेंगे? अब तो ऐसा लगता है कि जब कोई किसी को बद्दुआ देना चाहेंगे, तो कहेंगे कि जा तेरी औलाद मीडिया में जाकर भूखी मरे, और जेल जाए!

मीडिया से पोर्टल की ओर

कोरोना संक्रमण के चलते भारी आर्थिक मंदी के चलते मीडिया घरानों ने बड़े पैमाने पर रिपोर्टरों की छंटनी करना शुरू कर दिया है। हालांकि सरकारी स्तर पर ऐसा नहीं करने के लिए राज्य सरकार की तरफ से पहल भी की गई थी। अब चूंकि छंटनी का क्रम शुरू हो चुका है, तो वेब पोर्टल की बाढ़ आ गई है। कई रिपोर्टर वेब पोर्टल से जुड़ गए हैं।

सुनते हैं कि तकरीबन तीन सौ से अधिक नए न्यूज पोर्टल ने विज्ञापन देने के लिए जनसंपर्क विभाग में आवेदन किया है। हालांकि न्यूज पोर्टल को विज्ञापन देने के लिए सरकार की नीति बहुत ही स्पष्ट है। मगर नए पोर्टल को विज्ञापन देने के लिए काफी दबाव भी है। सत्ता पक्ष के ज्यादातर विधायक और सरकार के प्रभावशाली मंत्रियों ने  नीति में संशोधन कर नए न्यूज पोर्टल को विज्ञापन देने के लिए सिफारिश भी की है। देखना है कि विभाग नीति में कोई परिवर्तन करता है अथवा नहीं।


05-Jun-2020 5:49 PM

औरत तो पौराणिक कथाओं से ही शक में...

जब कोई महिला किसी आदमी के खिलाफ देह शोषण की रिपोर्ट लिखाती है, तो लोगों की प्रतिक्रिया देखने-सुनने लायक रहती है। अगर वह आदमी किसी ऊंचे ओहदे पर है, पैसे वाला है, मशहूर है, तो पहली आम प्रतिक्रिया होती है कि औरत ने ब्लैकमेल करने के लिए ऐसा किया होगा। दूसरी प्रतिक्रिया यह होती है कि अगर उसका चाल-चलन अच्छा था, तो वह किसी आदमी के कमरे में मरने के लिए गई क्यों थी? एक प्रतिक्रिया यह रहती है कि सब कुछ मर्जी और सहमति से होता है, लेकिन बाद में सौदा नहीं जमता, तो सहमति रेप में बदल दी जाती है, और पुलिस में रिपोर्ट कर दी जाती है।  एक प्रतिक्रिया यह होती है कि रेप के बाद इतने समय इंतजार क्यों कर रही थी, मांग पूरी नहीं हुई होगी इसलिए मामला पुलिस तक ले गई।

हिन्दुस्तान में एक ताकतवर मर्द के मुकाबले एक कमजोर औरत न तो बलात्कार के पहले इंसाफ पा सकती, और न ही बलात्कार के बाद ही। हिन्दुस्तान की पौराणिक कथाओं में सीता जैसी महिला के चरित्र पर भी लांछन लगाने की शर्मनाक परंपरा है, और लोकतंत्र आने के बाद, संविधान बन जाने के बाद भी महिला के चाल-चलन को लेकर हिन्दुस्तान में बहुत ही कम फर्क आया है, और जो सामाजिक-राजनीतिक रूप से जागरूक लोग हैं, वे आबादी के किसी फीसदी में नहीं आते, वे उंगलियों पर गिने जाने वाले लोग हैं जो कि महिला की नीयत पर शक न करें। और तो और अधिकतर महिलाओं का भी ऐसी महिलाओं के बारे में खराब नजरिया रहता है जो किसी ताकतवर पुरूष के खिलाफ देह शोषण की शिकायत लेकर पुलिस तक जाती हैं। लोगों को याद होगा कि जब पंजाब में एक आईएएस महिला ने उस वक्त के देश के सबसे ताकतवर पुलिस अफसर केपीएस गिल के खिलाफ शिकायत की थी, तो देश की एक चर्चित पत्रकार तवलीन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस के अपने कॉलम में इस महिला की आलोचना करते हुए लिखा था कि जिस अफसर ने पंजाब और देश को आतंक से मुक्ति दिलाई, उसकी जरा सी हरकत इस महिला को बर्दाश्त कर लेनी थी, और उसके खिलाफ शिकायत नहीं करनी थी। आखिर लंबी अदालती लड़ाई के बाद केपीएस गिल को अदालत उठने तक की सजा हुई थी।

छत्तीसगढ़ में अभी एक कलेक्टर ने देश में एक नया रिकॉर्ड कायम किया, कलेक्ट्रेट में अपने दफ्तर में ही एक महिला को धमकाकर, और काम देने का लालच देकर उससे बलात्कार किया। यह एक अलग बात है कि खुद छत्तीसगढ़ में पहले भी ऐसे बलात्कार या देह संबंध सरकारी दफ्तरों में होते आए हैं, और जानकारों को कुछ और जिलों के कलेक्टरों की ऐसी खबर है, लेकिन शिकायत न होने से बात आई-गई हो गई। अभी भी छत्तीसगढ़ के एक जिले में जिला छोड़ चुके कलेक्टर का एक महिला से मोह खत्म नहीं हो रहा है, और वे तबादले के दो दिनों के भीतर ही फिर पिछले जिले में उसी घर पहुंचे जिसके सामने उनकी गाड़ी स्थाई रूप से दिखते आई है।

सभी बेवफा हो गए कोरोना युग में

कोरोना काल में सब कुछ इतना बदल गया है कि शायद ही किसी ने ऐसी स्थिति की कल्पना की होगी। अब देखिए ना नकद या चेक लेते-देते समय लोग ऐसी सावधानी रखते हैं, जैसे वो पैसा नहीं बल्कि कोई वायरस मोल ले रहे हैं। हालांकि इसमें कोई बुराई भी नहीं है। इस समय में सावधानी ही सुरक्षा है। लेकिन एक दौर वो भी था, जब लोग पैसों के साथ-साथ देने वाले को भी हाथों-हाथ लेते थे, पर अब कोरोना ने सब कुछ उलटा-पुलटा कर दिया है। हालांकि पीक समय में कारोबार और लेन-देन बंद होने के कारण उतनी समस्या नहीं हुई और आज के तकनीकी युग में ऑनलाइन ट्रांसफर की भी सुविधा है। जिसके कारण कारोबारियों के धंधे पर असर पड़ा पर लेन-देन में उतना फर्क नहीं पड़ा। इस दौर में कारोबारियों से ज्यादा पब्लिक फिगर और नेता ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। दरअसल, उन्हें कोरोना संक्रमण से निपटने सरकारी खजाने के लिए दान की राशि भी जुटानी पड़ रही है। जाहिर है कि जब सामाजिक संगठन दान पुण्य करते हैं, उनका पूरा कुनबा इसमें शरीक होता है और बकायदा फोटोग्राफी करवाई जाती है। ऐसे समय में न तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो पाता और न ही पैसे या चेक की ट्रैवल हिस्ट्री की जानकारी होती है। फोटोग्राफी करना भी जरुरी होता है, ताकि एक दूसरे को देखकर लोग दान के लिए आगे आएं। ऐसे में चेक या नकद लेन-देन की तस्वीर काफी रोचक होती है। पिछले कई दिनों से हम ऐसी कई सरकारी तस्वीरें देख रहे हैं जिसमें लेने वाले चेक को बड़े बेमन से पकड़ते हैं, जो भले ही स्वाभाविक और सावधानी के लिए जरुरी है, लेकिन देखने में अटपटा लगता है। कुल मिलाकर कोरोना युग में सब कुछ बेवफा जैसे हो गए हैं। जिसको देखकर बीते दिनों का रफी साहब का गाया गीत... क्या से क्या हो गया... बेवफा...तेरे प्यार में...चाहा क्या... क्या मिला...बेवफ़ा...तेरे प्यार में... चलो सुहाना भरम तो टूटा... जाना के हुस्न क्या है...फिट बैठता है।

पुलिस तबादलों पर चर्चा

छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों के तबादले के बाद अब एसपी के ट्रांसफर का इंतजार है। सोशल मीडिया में संभावित तबादले की सूची भी तैर रही है। हालांकि उसकी पुष्टि नहीं पाई है, लेकिन फिर भी अफसर अपने-अपने तरीके से उसकी समीक्षा कर रहे हैं। तैरती चर्चा के मुताबिक इस फेरबदल में रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जैसे बड़े जिलों के एसपी भी प्रभावित हो रहे हैं। सोशल मीडिया में वायरल हो रही इस सूची की एक खास बात भी है, क्योंकि इस लिस्ट के साथ बकायदा डिस्क्लेमर भी है, जिसमें लिखा गया है कि अंतिम समय में सूची के कुछ नाम इधर से उधर हो सकते हैं। इस डिस्क्लेमर से वे अफसर तो राहत की सांस ले सकते हैं, जिनका नाम सोशल मीडिया वाली लिस्ट में नहीं है। और जिनका नाम है वे भी उम्मीद रख सकते हैं कि आखिरी समय में उनका नाम कट सकता है। खैर सोशल मीडिया के इस दौर में खबरें भी मिनटों में वायरल हो जाती है, लेकिन उसकी सत्यता पर ज्यादातर संदेह रहता है। ऐसे में इस तरह के डिस्क्लेमर से उसकी विश्वसनीयता तो और खतरे में पड़ सकती है। दूसरी तरफ एसपी के ट्रांसफर तो संभावित है। अब देखना है कि यह सूची सही होती है या नहीं। क्योंकि एक दो नाम ऐसे हैं, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि फिलहाल उनके ट्रांसफर की संभावना कम है, क्योंकि वे फिलहाल सरकार के गुड बुक में है। इसके उलट पुलिस मुख्यालय में इस बात से खलबली है कि फिलहाल कुछ भी कयास नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि पुलिस में अप्रत्याशित तबादले हुए हैं। कई दिग्गज अफसरों की बेरुखी से विदाई हुई है। जबकि उनके बारे में भी कहा जा रहा था कि उनकी कुर्सी पर कोई खतरा नहीं है। पीएचक्यू के बड़े अफसर भी इस वक्त भारी और अप्रत्याशित बदलाव की अटकलों पर हामी भर रहे हैं।


04-Jun-2020 5:58 PM

कलेक्टर की ताकत, और कमरे

एक जिले के कलेक्टर रहे अफसर को उसी जिले में बलात्कार के आरोप का सामना करना पड़े, यह एक भयानक नौबत है। कलेक्टर महज एक अफसर नहीं होते हैं, वे सरकारी ढांचे के भीतर एक संस्था कहे जाते हैं। बहुत सारे लोग यह बात कहते और लिखते हैं कि सरकारी ढांचे में तीन एम काम के होते हैं, बाकी केवल उनका साथ देने के लिए रहते हैं, पीएम, सीएम, और डीएम। उत्तर भारत के कुछ प्रदेशों में कलेक्टर शब्द का इस्तेमाल कम होता है, और वहां डीएम शब्द ही चलता है, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट। ऐसे में इस कुर्सी के साथ इतनी अधिक ताकत जुड़ जाती है कि उस पर बैठकर दिमाग को काबू में रखना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है। कई लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है कि कलेक्टर रहते हुए वे ईश्वर के सीधे प्रतिनिधि हो गए हैं, और ईश्वर की सारी ताकत का मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके बाद जिला खनिज निधि आ जाने से छोटे से छोटे जिलों के कलेक्टर भी करोड़ों रूपए मनमानी खर्च करने की ताकत रखने लगे हैं, और ऐसे में जाहिर है कि इनके आसपास तरह-तरह के एनजीओ के लोग मंडराने लगें। भोपाल में पिछले बरस जो भयानक हनी ट्रैप सामने आया था, उसमें ढेर सारे आईएएस और आईपीएस अधिकारी थे जो कि एनजीओ को करोड़ों रूपए देने के एवज में महिलाओं की देह पाते थे। मानो उसी अविभाजित मध्यप्रदेश से प्रेरणा पाकर जगत प्रकाश पाठक ने जांजगीर जिले में कलेक्टर रहते हुए जिस तरह एक महिला पर डोरे डाले, और महिला की लिखाई रिपोर्ट के मुताबिक जिस तरह उसके सरकारी कर्मचारी पति पर कार्रवाई की धमकी दी, वह सब कुछ कलेक्टर की कुर्सी पर बैठकर आई बददिमागी थी। अलग-अलग लोग इस ताकत से जमीनें, दौलत, राजनीतिक जोड़तोड़, और बदन, जैसी हसरत हो वैसा पाने की कोशिश करते हैं। इस अफसर ने जितने बेहूदे और अश्लील तरीके से इस महिला को पाने के लिए फोन पर खुले संदेश भेजे, वह इस कुर्सी पर बैठाए जाने वाले अफसरों के स्तर पर बड़े सवाल खड़े करता है।

गनीमत यह है कि यह शिकायत आने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कुछ दिनों की ही जांच के बाद जुर्म दर्ज करने और निलंबित करने के आदेश दे दिए। वरना पिछली सरकार में मातहत कर्मचारी के सेक्स-शोषण के आरोपों के बाद बड़े अफसर न सिर्फ प्रमोशन पाते रहे, बल्कि सरकार अपनी पूरी ताकत से राष्ट्रीय महिला आयोग, अदालत, सभी को झांसा देने की कोशिश करती रही, और उस वक्त के मामले को आज की सरकार ने भी छुआ नहीं है। लेकिन इस मामले में हुई कार्रवाई से हो सकता है कि बाकी पीडि़त महिलाओं को भी इंसाफ मिलने की सच्ची या झूठी उम्मीद बंध जाए। उनके वकील एक बार फिर कोशिश कर सकते हैं।

दूसरी बात यह कि सरकारी दफ्तरों में दरवाजों को भीतर से बंद करने का इंतजाम खत्म ही कर देना चाहिए। सिर्फ शौचालय का दरवाजा भीतर से बंद हो, बाकी को बंद किया भी क्यों जाना चाहिए? अगर कमरों के भीतर की सिटकनी की व्यवस्था खत्म हो जाए, तो कम से कम दफ्तरों में तो इस दर्जे के बलात्कार नहीं हो पाएंगे? राष्ट्रीय महिला आयोग को चाहिए कि देश भर के सभी सरकारी दफ्तरों में शौचालय छोड़ बाकी तमाम कमरों और हॉल के भीतर की सिटकनी हटवाने का काम करे।

छत्तीसगढ़ में कम से कम एक अफसर ऐसे हैं जो अपने कमरे में अपने टेबिल पर फोकस कैमरा लगवाकर रखते हैं, और उससे कमरे का नजारा बाहर टीवी स्क्रीन पर सबको दिखता है। प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना के सीईओ आलोक कटियार पहले भी ऐसा करते आए हैं, और आज भी उनका कमरा दो कमरे बाहर से टीवी स्क्रीन पर दिखते रहता है।

इस ताजा नया जांजगीर सेक्सकांड ने अफसरशाही को करीब से जानने वाले लोगों के बीच में एक बार फिर सनसनीखेज चर्चाओं को शुरू कर दिया है कि इसके पहले किस-किस सरकारी दफ्तर में ऐसे कांड हुए थे, और सरकारी दफ्तरों के बाहर भी इन जगहों पर कौन-कौन से अफसर कैसे सेक्सकांड में फंसे थे। यह सब कुछ देखें, और मध्यप्रदेश के हनी ट्रैप को भी देखें तो लगता है कि जिन अफसरों को केन्द्र और राज्य सरकारें बहुत काबिल और माहिर मानकर उन्हें लाखों-करोड़ों जनता का जिम्मा दे देती हैं, उनमें से कुछ किस परले दर्जे के मूर्ख रहते हैं।

जानकार पुलिस अफसरों के मुताबिक पाठक नाम के इस अफसर ने जैसे घटिया संदेश इस महिला को भेजे, उसके बदन की तस्वीरें मंगवाईं, और अपने बदन की तस्वीरें भेजीं, वे सब निलंबन नहीं, बर्खास्तगी के लायक है क्योंकि नौकरी की सेवा शर्तों में एक बड़ी विस्तृत असर वाली शर्त भी रहती है जिसके तहत किसी को भी बर्खास्त किया जा सकता है, और वह शर्त है अनबिकमिंग ऑफ एन ऑफिसर।

सब दुखी हैं...

प्रदेश भाजपा पद से हटाए जाने से विक्रम उसेंडी आहत हैं। उन्होंने पार्टी द्वारा दी गई इनोवा कार लौटा दी। हालांकि सौदान सिंह और पवन साय, उनसे कहते रहे कि अभी गाड़ी को लौटाने की जरूरत नहीं है। मगर उसेंडी नहीं माने। उसेंडी का दर्द यह था कि उन्हें ठीक से काम करने का मौका ही नहीं दिया गया। उसेंडी की मन:स्थिति भांपते हुए सौदान सिंह और पवन साय ने उन्हें समझाने की कोशिश कि उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी दी जाएगी। थोड़ी देर दोनों नेताओं को सुनने के बाद उसेंडी चले गए। न सिर्फ उसेंडी बल्कि अध्यक्ष पद के बाकी दावेदार रामविचार नेताम, नारायण चंदेल और अन्य नेता भी दुखी हैं। और तो और खुद नए अध्यक्ष विष्णुदेव साय भी दुखी हैं। वे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनना चाहते थे। अनौपचारिक चर्चाओं में अध्यक्ष पद के दावेदार रहे नेताओं के समर्थक रमन और सौदान सिंह की जोड़ी को कोस रहे हैं। ऐसे में नए अध्यक्ष विष्णुदेव साय के लिए सबको साथ लेकर चलना कठिन चुनौती हो गई है।


03-Jun-2020 6:18 PM

ऐसा रूख पहली बार...

छत्तीसगढ़ के पुलिस मुख्यालय में जिस तरह से एक-एक करके कई अफसर इक_ा हो गए हैं, और इनमें से कई के पास कोई काम भी नहीं है, तो पुलिस मुख्यालय की बातचीत में यह राय सामने आई कि वहां एक कैरम क्लब, एक बिलियर्ड्स रूम, और एक टी-क्लब शुरू कर दिया जाए जिसमें लोग बैठ सकें। एक अफसर ने कहा कि अब इतने आईपीएस पीएचक्यू से बाहर हो चुके हैं कि वहां काम करने वाले कम पडऩे लगेंगे, तो दूसरे ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कई बरस पहले की तत्कालीन सीएम रमन सिंह को दी गई सलाह याद दिलाई कि बड़े अफसर जितने कम हों, काम उतना ही अच्छा होता है। डीजीपी डी.एम. अवस्थी को भी ऐसा नहीं लग रहा है कि काम करने वाले अफसर कम हैं। अब जिस तरह से तीन एडीजी एकमुश्त खाली हैं, उससे बाकी प्रदेश में भी अफसरों को यह समझ आ गया है कि वे तभी तक अपनी जगह सुरक्षित हैं जब तक सरकार चाहती है। इससे एक बात तो यह हुई है कि जिस तरह कई अफसर अपने आपको भगवान समझते थे, उनका वह दंभ खत्म हो गया है। इस सरकार ने आते ही जिस तरह मुख्य सचिव के लिए निर्धारित बंगले को खाली कराकर उसे बाकी अफसरों की तरह का एक अफसर, और किसी भी मंत्री से कम महत्वपूर्ण अफसर बता दिया था, तभी से अफसरों को सरकार के रूख का फर्क दिख गया था। अब बड़े-बड़े अफसर भी यह समझ गए हैं कि उनमें और छोटे कर्मचारियों की सुरक्षा में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। जिस तरह वर्दीधारी बड़े अफसर किसी छोटे सिपाही से नाराज होने पर उसे राजधानी से उठाकर सीधे बस्तर फेंकते थे, वैसा सुलूक बड़े अफसरों के साथ भी हो सकता है यह पहली बार दिख रहा है।

आखिरकार जीत रमन की...

आखिरकार काफी खींचतान के बाद पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय को प्रदेश भाजपा की कमान सौंप दी गई है। चर्चा तो यह है कि विष्णुदेव खुद अध्यक्ष बनना नहीं चाहते थे। उनकी इच्छा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के चेयरमैन बनने की थी। चेयरमैन का पद अभी भी खाली है। लॉकडाउन के पहले से अध्यक्ष पद के लिए काफी उठा-पटक चल रही थी। अजय चंद्राकर की अगुवाई में चार सीनियर विधायक राष्ट्रीय अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा से मिल आए थे। प्रदेश के सांसदों ने भी अपनी भावनाओं से राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष को अवगत करा दिया था। इन सभी को उम्मीद थी कि किसी नए चेहरे अथवा तेज तर्रार नेता को प्रदेश की कमान सौंपी जाएगी।

बृजमोहन अग्रवाल खेमे से राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम और शिवरतन शर्मा का नाम चर्चा में था। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर भी दौड़ में थे। लॉकडाउन के बाद पिछले कुछ दिनों से पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय के बंगले में रोजाना दर्जनभर नेताओं की बैठक हो रही थी। पार्टी की इन गतिविधियों पर संगठन में हावी खेमे की पूरी नजर थी। अंत में सौदान सिंह और रमन सिंह खेमा रामविचार-शिवरतन को झटका देकर विष्णुदेव साय की नियुक्ति कराने में सफल रहा।

पिछले कुछ समय से पार्टी हल्कों में चर्चा थी कि रमन सिंह की पार्टी संगठन में पकड़ कमजोर हो रही है। जिस तरीके से रमन सिंह, नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति में विधायक दल की राय को नजरअंदाज कर धरमलाल कौशिक की नियुक्ति कराने में सफल हुए थे, वैसा शायद अब न हो पाए। मगर विष्णुदेव साय की नियुक्ति से सारे अटकलों पर विराम लग गया। विष्णुदेव की नियुक्ति पर सौदान सिंह और रमन सिंह के विरोधी काफी खफा हैं। बृजमोहन अग्रवाल के लंबे समय तक प्रवक्ता रहे देवेन्द्र गुप्ता ने फेसबुक पर बृजमोहन खेमे के नेताओं की बैठकों पर तीखा तंज कसा और लिखा कि ये चर्चा करते रहे उधर... बनवा लिया अपना प्रदेश अध्यक्ष। ऐसे में असंतुष्ट नेताओं को साधना विष्णुदेव साय के लिए चुनौती रहेगी।

लम्बे समय तक बृजमोहन अग्रवाल के प्रवक्ता रहे देवेंद्र गुप्ता ने भूपेश बघेल को बधाई देते हुए साय-रमन की फोटो पोस्ट की है-भूपेश जी आपको और आपकी सरकार को बधाई हो...आपकी राह आसान कर रहे हैं रमन सिंह जी...


02-Jun-2020 6:46 PM

पत्रकारिता विवि को भारी पड़ा वेबीनार

छत्तीसगढ़ का एकमात्र पत्रकारिता विवि लगातार विवादों के कारण सुर्खियों में रहता है। नया विवाद एक कार्यक्रम को लेकर है। राज्य के पहले सीएम अजीत जोगी के निधन के बाद राज्य सरकार ने तीन दिनों का राजकीय शोक घोषित किया था। राजकीय शोक में शासकीय कार्यक्रमों, सेमीनार पर रोक होती है, लेकिन इन सब से बेखबर विवि प्रबंधन ने राजकीय शोक के दौरान वेबीनार का आयोजन किया। कार्यक्रम की खबर छात्र कांग्रेसियों को लग गई, तो बैठे-बिठाए उनको मुद्दा मिल गया। विवि में संघ की पृष्ठभूमि वाले कुलपति की नियुक्ति के कारण कांग्रेसी पहले से खार खाए बैठे हैं। ऐसे में इस मुद्दे को हवा देने के लिए एक छात्र नेता ऑनलाइन वेबीनार में शामिल हो गए और हंगामा शुरु कर दिया। जैसे ही आयोजकों और विवि रजिस्ट्रार को माजरा समझ आया उन्होंने तुरंत तकनीकी कारण बताकर वेबीनार को स्थगित कर दिया। विवि का प्रबंधन इस बात से राहत महसूस कर रहा है कि वेबीनार में कुलपति नहीं जुड़े पाए थे, वरना फजीहत और ज्यादा होती। हालांकि कुलपति लगातार ऐसे कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं। वे फिलहाल दिल्ली से लौटने के बाद 14 दिन का क्वारंटाइन पीरियड काट रहे हैं। दूसरी तरफ छात्र कांग्रेसियों ने इस पूरे मामले की शिकायत सरकार में बैठे प्रमुख लोगों से की है। इसके पहले कुलपति के एबीवीपी के फेसबुक पर लाइव करने की भी शिकायत हुई थी, लेकिन छात्र कांग्रेसियों की दिक्कत यह है कि उनकी कोई सुनवाई हो नहीं रही है। वे लगातार नेतागिरी का धर्म तो निभा रहे हैं, लेकिन सरकार में बैठे लोग दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। छात्र कांग्रेसियों को उम्मीद है कि एक ना एक दिन तो उनकी सुनवाई होगी। चलिए उम्मीद पालने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि सरकार में आने से पहले छोटी-छोटी गड़बडिय़ों पर हल्ला बोलने वाले अचानक कहां गायब हो गए हैं, जिन्हें अपने ही कार्यकर्ताओं की शिकायत सुनाई नहीं दे रही है। 

सोचना जरा आराम से ?

मान लीजिए कि मैंने पीएम/सीएम राहत कोष में 2000 रुपये दान किए। दूसरी ओर, मेरे एक भाई ने 2000 रुपये की व्हिस्की खरीदी।

अब सवाल यह है कि किसने अधिक योगदान दिया?

1. मेरे द्वारा दान किए गए 2000 रुपये पर मुझे 30 प्रतिशत कर छूट मिली। इसलिए, मंैने वास्तव में 600 रुपये वापस कमाए। दूसरे शब्दों में 2000 रुपये का दान करके मैंने सिर्फ 1400 रुपये का शुद्ध योगदान दिया।

2. शराब पर, कुल करों (उत्पाद शुल्क और जीएसटी) ने लगभग 72 प्रतिशत एमआरपी तक जोड़ा। इसलिए जब मेरे भाई ने 2000 रुपये का भुगतान किया, तो 1440 रुपये सरकारी खजाने में गए। और 750 एमएल व्हिस्की की बोतल से 12 पेग का सुख उसे मिला। इसलिए, न केवल उसने अधिक योगदान दिया, उसने डिस्टिलरी में नौकरियों का निर्माण किया, उनके आपूर्तिकर्ताओं के लेबल, बोतलें, ढक्कन, मशीनरी आदि, मार्केटिंग कंपनी में नौकरियां, वाइन शॉप पर नौकरियां और इसके अलावा वह उच्च आत्माओं में था, जबकि मुझे यह भी पता नहीं है कि मेरा दान का पैसा कहां गया?

-सतवीर सिंह मालवी (सोशल मीडिया पर)

क्या से क्या हो गया...

छत्तीसगढ़ में थोक में आईएएस अफसरों के तबादलों के बाद आईपीएस का भी छोटा फेरबदल हुआ था। यह बदलाव अपेक्षाकृत छोटा था, लेकिन इसकी भी बड़ी चर्चा हो रही है। सबसे पहले खुफिया चीफ हटाए गए। हालांकि उनकी नियुक्ति पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। वे पिछले सरकार में बस्तर के आईजी थे, उस समय दुर्भाग्य से सबसे बड़ा नक्सल अटैक झीरम हुआ था। इस हमले में कांग्रेस के बड़े नेताओं की जान गई थी। तब कांग्रेस ने इस हमले के लिए पुलिस और खुफिया तंत्र की विफलता को जिम्मेदार माना था। उसके बाद भी गुप्ता बस्तर से दुर्ग रेंज के आईजी के रुप में पदस्थ किए गए। यह रेंज इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण थी कि यह सीएम और एचएम का गृह जिला है। उसके बाद गुप्ता खुफिया विभाग के प्रमुख बनाए गए। खुफिया विभाग सीधे मुख्यमंत्री से जुड़ा रहता है और इंटेलीजेंस प्रमुख ही एकमात्र ऐसा अफसर होता है, जो बिना रोक-टोक के सीएम से कभी भी मिल सकता है। कुल मिलाकर उनकी नियुक्ति को देखें तो लगता है कि सरकार की खास पसंद रहे होंगे। ऐसे में रातों-रात क्या हो गया जिसकी वजह से उन्हें खुफिया चीफ के पद से छोटे से कार्यकाल के बाद विदा कर दिया गया? इसी तरह ईओडब्ल्यू और एसीबी चीफ जीपी सिंह के तबादले के भी मायने निकाले जा रहे हैं। हाल ही में लॉकडाउन के दौरान उन्होंने कई बड़े मामलों में जांच शुरु की थी। माना जा रहा था कि सरकार से उन्हें फ्री हैंड दिया गया था।

इस फेरबदल से एक और खास संयोग सामने आया है। हिमांशु गुप्ता और जीपी सिंह को बिना किसी दायित्व के पीएचक्यू भेजा गया है। इसके पहले एसआरपी कल्लूरी भी बिना कामकाज पीएचक्यू में है। कल्लूरी 94 बैच के आईपीएस हैं। हिमांशु गुप्ता और जीपी सिंह भी 94 बैच के ही हैं। इस तरह 94 बैच के तीन अफसर पीएचक्यू में बिना प्रभार के पदस्थ किए गए हैं। इस संयोग को देखकर तो यही कहा जा सकता है कि 94 बैच के अफसरों की ग्रह दशा ठीक नहीं चल रही है।

दुआओं का असर...

कोरोना को कोसने वाले तो अरबों हैं, लेकिन डॉक्टरों की खूब मेहनत के बावजूद कोरोना मर क्यों नहीं रहा है? वह रात-दिन लोगों को मार रहा है, हर मिनट एक मौत हो रही है, फिर भी वह जिंदा है, मस्ती से घूम रहा है, और लोगों को यमराज के मुकाबले अधिक रफ्तार से मार रहा है। वैज्ञानिक दुनिया भर में लगे हुए हैं, लेकिन उससे बचाव का टीका नहीं बन पा रहा है। तो दुनिया की कौन सी ऐसी ताकत है जो कोरोना को ताकत दे रही है?

इस बारे में इस अखबारनवीस ने खासी जांच-पड़ताल की तो पता लगा कि कोरोना के शुरू होने के बाद से लगातार लोग शाकाहारी हुए चल रहे हैं। बहुत से देश-प्रदेश में तो सरकारों ने ही मांस-मछली-मुर्गी की बिक्री रोक दी थी, और बाकी जगहों पर भी लोग अपनी दहशत में हाथ खींच चुके थे। बाहर की मुर्गी के बजाय लोगों को घर की दाल ज्यादा अच्छी लगने लगी थी। अब इन दो-तीन महीनों में दुनिया में कई अरब प्राणियों की जान बच गई है। जिन मुर्गों ने जिंदगी का तीसवां दिन नहीं देखा था, वे अब कई महीनों के होकर घूम रहे हैं। बकरों का हाल यह है कि कल ही हमने तस्वीर छापी थी कि बिलासपुर में पीने के पानी के एक टैंकर की धार से बकरे का मालिक उसे साबुन-शैम्पू के झाग से नहला रहा था। इन तमाम प्राणियों की दुआएं इंसानों के बजाय कोरोना के साथ है। और फिर इंसानों का जंगलों में घुसना कम हुआ है, खुद शहरों में इंसान कम निकले हैं, इसलिए जंगली जानवरों को भी घूमने के लिए जंगल भी खूब मिले, और शहर की सडक़ों पर भी वे दुनिया में जगह-जगह देखे गए। इन सबकी दुआ कोरोना को मिली है। फिर आसमान में एक बड़ा सा छेद ओजोनलेयर में बन गया था जिससे पूरी धरती खतरे में आ रही थी, और पिछले महीनों में प्रदूषण जमीन पर औंधेमुंह आ गिरा है, उसका भी नतीजा है कि धरती की दुआ भी कोरोना को मिल रही है। कुछ लोगों से बातचीत में धरती ने कहा भी है कि उसके लिए तो इंसानों से बेहतर कोरोना है, जो कि धरती का कुछ भी नहीं बिगाड़ रहा है। इन्हीं सब दुआओं का नतीजा है कि कोरोना को मारना आसान नहीं हो रहा है, बल्कि तमाम धर्मों के ईश्वर भी उसे कोई चेतावनी दिए बिना अपने-अपने कपाट बंद करके बैठे हुए हैं।


01-Jun-2020 5:56 PM

विधानसभा कैसे चलेगी?

कोरोना संक्रमण के बीच विधानसभा की कार्रवाई किस तरह संचालित की जाए, इसको लेकर मंथन चल रहा है। विधानसभा का मानसून सत्र जुलाई में प्रस्तावित है, लेकिन अब यह अगस्त में हो सकता है। सुनते हैं कि प्रस्तावित सत्र के संचालन की रूपरेखा तैयार की जा रही है। पहले यह चर्चा थी कि वेबीनार से सदन की कार्रवाई चलाई जा सकती है, मगर यह संभव होता नहीं दिख रहा है, क्योंकि इसमें कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतें हैं।

दूसरी तरफ, संसद के सत्र को लेकर भी दिल्ली में विचार मंथन का दौर चल रहा है। चूंकि दिल्ली हॉटस्पॉट बन गया है। ऐसे में संसद की कार्रवाई मुश्किल दिख रही है। पिछले दिनों दिल्ली में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी जिसमें संसद की कार्रवाई को लेकर फार्मूला तैयार किया गया था। इस पर छत्तीसगढ़ विधानसभा की निगाहें हैं। फार्मूले के मुताबिक सामाजिक और शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए सीमित संख्या में सदस्यों को सदन में प्रवेश की अनुमति देने पर विचार किया गया। अर्थात जिस सांसद का सवाल होगा, वे ही सदन में मौजूद रहेंगे। मंत्रियों और अफसरों की संख्या भी सीमित रहेगी। दर्शकदीर्घा पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी।

कुछ इसी तरह का फैसला छत्तीसगढ़ विधानसभा के संचालन को लेकर भी लिया जा सकता है। विभागवार सवाल-जवाब के दिन तय रहते हैं। जिस दिन जिस विभाग का सवाल होगा, उस दिन संबंधित विभाग के मंत्री और सवाल पूछने वाले विधायक सदन में आएंगे। इससे सामाजिक दूरी बनी रहेगी। माना जा रहा है कि विधानसभा के कार्य संचालन को लेकर अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत जल्द ही बैठक ले सकते हैं। इसमें सदन की कार्रवाई को लेकर कोई रूपरेखा तैयार की जा सकती है।

कोरोना, लॉकडाऊन, और कुछ बातें

मजदूरों को लेकर देश के लोगों के बीच मिलीजुली प्रतिक्रिया है। शहरी लोगों को यह भी लग रहा है कि आज केन्द्र सरकार की बदइंतजामी की वजह से लॉकडाऊन में बेरोजगार हुए करोड़ों मजदूर बेघर हुए, बुरी तरह से तकलीफ पा रहे हैं, लेकिन दुबारा चुनाव में वोट देने का मौका आएगा तो ये लोग कुछ सौ रूपए लेकर फिर इसी सरकार को चुन लेंगे। उनका मानना है कि मजदूरों की बहुतायत ही किसी सरकार को चुनने के लिए जिम्मेदार होती है, और यह बहुतायत चुनाव के वक्त बिकने को तैयार रहती है। दारू और नगदी, बस इसके बाद वे देश को डुबाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

मजदूरों से परे दिल्ली का एक बुरा तजुर्बा सुनने मिला। देश की राजधानी कोरोना पॉजिटिव और मौतों के बोझ से दबी हुई है। ऐसे में वहां एक रिहायशी इमारत में जब पड़ोस की एक महिला को अस्पताल ले जाया गया, तो बगल के फ्लैट के लोगों ने घर में रह गए एक किशोर और एक बच्चे से उनके खाने-पीने के इंतजाम के बारे में पूछा। पड़ोस की जिम्मेदारी मानकर उन्होंने हर दिन इन बच्चों से पूछना जारी रखा कि कोई जरूरत तो नहीं है। एक दिन इन बच्चों ने जवाब दिया कि उन्होंने अपनी मां को बताया है कि पड़ोस के लोग रोज पूछ रहे हैं कि कोई जरूरत तो नहीं है, तो उनकी मां ने फोन पर कहा है कि तुरंत पुलिस में रिपोर्ट करो कि ये लोग हमें परेशान कर रहे हैं!

कोरोना-लॉकडाऊन का एक और तजुर्बा यह है कि जो लोग कोरोना से बचाव के लिए सरकार ओहदों पर जिम्मेदार लोग हैं, उनमें से बहुत से लोग इस खतरे और समस्या के बारे में तो कुछ नहीं कह रहे, वे लगातार अपनी खुद की अलग-अलग तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं, इसे अंग्रेजी में कहते हैं बिजिनेस एज युजुअल।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मजदूरों के मोर्चे पर रात-दिन सडक़ चौराहों पर काम करने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता मंजीत कौर बल ने उनके साथ काम कर रही उनकी टीम को लेकर एक दिलचस्प बात फेसबुक पर पोस्ट की है। उन्होंने लिखा है कि आपदा के दौरान दो माह से बिना आराम किए काम करने वाले वालंटियर्स को आपदाओं में काम करने की इतनी आदत हो गई है कि अब बोल रहे हैं- टिड्डी दल पर काम करने चलें क्या?

इस पर कुछ लोगों ने मजा लेते हुए लिखा कि आपके साथियों को फूड पैकेट बांटने की इतनी आदत हो गई है कि टिड्डियों को भी खाना देने लगेंगे।

पहेलियां सुलझ नहीं पा रहीं...

छत्तीसगढ़ में हफ्ते भर में जितने बड़े-बड़े तबादले हुए हैं, उसने लोगों को हक्का-बक्का कर दिया है, खासकर सरकार में ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए आला अफसरों को। कई लोगों के लिए ये तबादले ऐसी पहेली हैं जिसे वे सुलझा नहीं पा रहे हैं। बड़े अफसरों के टेलीफोन अब सिमकार्ड से वॉट्सऐप पर चले गए हैं, और वॉट्सऐप से सिग्नल या टेलीग्राम पर। जिस तरह लोगों को यह भरोसा नहीं है कि सामने वाले को कोरोना है या नहीं है, उसी तरह यह भरोसा भी नहीं है कि उसके टेलीफोन कॉल कोई सुन रहे हैं या नहीं। नतीजा यह है कि तबादलों की पहेली सुलझाने के लिए भी लोगों को बातचीत करनी है तो लोग सिमकार्ड को भूल ही गए हैं। कुछ अधिक संपन्न और सावधान लोग ऐसे हैं जो एप्पल के आईफोन की किसी मैसेंजर सर्विस पर ही भरोसा कर रहे हैं, जो कि दूसरे किसी फोन पर चलती नहीं है, और खुद एप्पल ने जिसका तोड़ नहीं निकाला है। बहुत से लोगों को राज्य सरकार के विभागों पर शक है कि वहां से उनके फोन टैप हो रहे हैं, और बहुत से लोगों को केन्द्र सरकार की एजेंसियों पर शक है कि वे उनके फोन टैप करवा सकती हैं। कुल मिलाकर चारों तरफ से खतरा ऐसा है कि कोरोना और इंटरसेप्शन के बीच कड़ा मुकाबला है, दोनों ही अदृश्य हैं, और दोनों खतरनाक हैं।

जानवरों जैसी मेहनत का फल...

इस बीच बहुत मेहनत करने वाले एक ईमानदार, और काबिल आला अफसर का नाम कतार में है कि आज शायद उसका भी तबादला हो जाए। यह अफसर जानवरों की तरह मेहनत करने वाला और सरकारी चारे को न छूने वाले इस अफसर का तबादला कुछ दिनों से जानकारों की जानकारी में था, और अब मामला एकदम कगार पर पहुंच गया है। इस एक तबादले से विभाग के बाकी लोगों में भी यह संदेश चले जाएगा कि चारे की चौकीदारी करने के बजाय नांद में खाने और खिलाने के लिए तैयार रहना चाहिए। देखें तबादला आदेश आज आता है, या कल।


31-May-2020 5:45 PM

जब जोगी ने एक फिल्म में काम किया..

छत्तीसगढ़ के एक सबसे वरिष्ठ अखबारी-फोटोग्राफर गोकुल सोनी  फेसबुक पर पुरानी यादगार तस्वीरों के साथ अपने संस्मरण लिखते भी रहते हैं। अभी भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के गुजरने के बाद उन्होंने एक पुरानी याद ताजा की है, और लिखा है-

साथियों, अजीत जोगीजी को हम किस रूप में देखते हैं-एक इंजीनियर, अच्छा प्रोफेसर, वकील, पुलिस ऑफिसर, कलेक्टर, मुख्यमंत्री, सांसद, लेखक, कुशल प्रवक्ता, प्रखर वक्ता, हाजिर जवाब और जिंदादिल इंसान... क्या आप यह जानते हैं कि वे कुशल अभिनेता भी थे?

जी हां, उन्होंने अपनी तमाम व्यस्तता के बीच एक छत्तीसगढ़ी फिल्म में अभिनय भी किया था। दरअसल रायपुर में कला दर्पण संस्था के बैनर तले मधुकर कदमजी एक छत्तीसगढ़ी फिल्म बना रहे थे। फिल्म का नाम था ‘मोर सपना के राजा’ फिल्म की कहानी के अनुसार मुख्य पात्र मोहन (आकाश कदम) पढऩे शहर जाता है। परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होकर जब वह पूरे प्रदेश में अव्वल आता है तो मुख्यमंत्री उन्हें सम्मानित करते हैं। मधुकर कदमजी इस दृश्य को फिल्माने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे थे जो अजीत जोगी जैसा दिखता हो। (उस समय जोगीजी नए छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री थे) काफी खोजबीन के बाद ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिला। उन्होंने सोचा कि क्यों न जोगीजी को ही फिल्म में रोल करने कहा जाए। जोगीजी फिल्म में अभिनय करने के लिए तैयार भी हो गए लेकिन अपनी व्यस्तता के कारण समय नहीं दे पा रहे थे। काफी सोच-विचार के बाद 21 दिसम्बर 2000 गुरूवार को सुबह करीब 10.30 बजे मुख्यमंत्री निवास में ही सेट तैयार किया गया। मंच बनाया गया, कैमरे, लाइट सहित पूरी तैयारी हो गई। जोगीजी सेट पर आए। वहां उनका हल्का मेकअप किया गया। मेकअप शिक्षक आनंद वर्माजी ने किया। अपने मजाकिया स्वभाव के लिए विख्यात जोगीजी ने छत्तीसगढ़ी में कहा- करिया आदमी ला अऊ कत्तक गोरिया करबे गुरुजी? खैर उसी समय उन्हें स्क्रिप्ट दिया गया। स्क्रिप्ट देखकर उन्होंने रख दिया। सबको लगा कि स्क्रिप्ट उन्हें पसंद नहीं आई। जोगीजी ने मुधकर कदमजी को अपने पास बुलाकर फिल्म की कहानी पूछी। फिर उन्होंने कैमरा, लाइट ऑन करने कहा और खुद अपने मन से पूरा का पूरा डायलॉग बोल दिए जो स्क्रिप्ट पर लिखा था। सबको बड़ा आश्चर्य हुआ कि बिना पढ़े कैसे बोल दिए ? उनसे जब पूछा गया तो उन्होंने छत्तीसगढ़ी में ही कहा कि ये तो हमर रोज के काम आय। बने पढ़इया लइका के तारीफ करना हे न सार्वजनिक रूप से। मोरो घलो कभू अइसनेच्च तारीफ होय। फिर उन्हें बताया गया कि कैमरे का एंगल बदलकर फिर उसी डायलॉग को बोलना है। जोगीजी ने हू-ब-हू फिर दूसरे एंगल पर खड़े होकर डॉयलाग दोहरा दिया। मैं बताना चाहता हूं कि हर इंसान में ऐसी प्रतिभा नहीं होती कि वह एक ही बात को चार बार कहे तो उसके शब्द न बदलें। ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी अजीत जोगी को मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। अंत में बताना चाहूंगा कि इस फिल्म कि स्टिल फोटोग्राफी मैंने की थी।

 उम्र की परवाह नहीं

पूर्व सीएम रमन सिंह इन दिनों काफी बेचैन दिख रहे हैं। केन्द्र सरकार ने कोरोना फैलाव को रोकने के लिए नसीहत दी है कि 65 साल से अधिक आयु के लोग घर से न निकले। मगर 67 के हो चुके रमन सिंह केन्द्र सरकार की एडवाइजरी को ध्यान नहीं दे रहे हैं। वे अपने समर्थकों के साथ मजदूरों का हाल देखने राजनांदगांव जिले की सीमा तक हो आए।

यही नहीं, प्रदेश कांग्रेस के सामाजिक और शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए वीडियो कॉफ्रेंस के जरिए पत्रकारवार्ता ले रहे हैं, तो रमन सिंह पार्टी दफ्तर में तमाम सुविधाएं होने के बावजूद प्रेस कॉफ्रेंस लेने प्रदेश अध्यक्ष के साथ एकात्म परिसर पहुंच गए। चूंकि रमन सिंह भाजपा के सबसे बड़े नेता हैं, तो उनके पार्टी दफ्तर में होने पर सामाजिक दूरी का पालन हो पाना संभव नहीं है।

कार्यकर्ताओं-मीडिया की भीड़ तो जुट ही जाती है। आम तौर पर उनकी भाषा शैली संयमित रही है और पिछले 15 साल सीएम रहते लोगों ने उन्हें इसी रूप में पसंद किया  था। मगर अब वे तल्ख दिख रहे हैं। मौजूदा सीएम-सरकार के खिलाफ तो उनके तेवर काफी गरम रहते हैं। हालांकि रमन सिंह- परिवार के खिलाफ जांच को देखकर उनकी तल्खी बेवजह भी नहीं लगती है। मगर उनके जैसे अनुशासित माने जाने वाले नेता के केन्द्र की एडवाइजरी को नजरअंदाज करने की चर्चा जरूर है।

एक इस्तीफा

आयुष संचालक जीएस बदेशा ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन दे दिया है। बदेशा नियमित संचालक हैं और वे पिछले पांच साल से इस पद पर हैं। वैसे तो पिछली सरकार में उन्हें हटाने की कोशिशें भी हुई, मगर यह सफल नहीं हो पाया। उनके रिटायरमेंट में सालभर बाकी है। ऐसे में समय से पहले ही पद छोडऩे के उनके फैसले को लेकर कई तरह की चर्चा है।

सुनते हैं कि बदेशा आरएसएस के करीबी माने जाते हैं और चर्चा है कि पद से हटने के बाद उनकी केन्द्र सरकार के आयुष मंत्रालय में सलाहकार अथवा किसी अन्य पद पर नियुक्ति हो सकती है। वैसे भी केन्द्र सरकार ने सीसीआईएम बोर्ड में बदलाव कर पूर्व में निर्वाचित लोगों को हटा दिया है और उनकी जगह संघ के पसंदीदा विशेषज्ञ-चिकित्सकों का मनोनयन किया गया है। ऐसे में बदेशा को कोई महत्वपूर्ण दायित्व मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

कांग्रेस प्रभारी के दौरे की खबर से हलचल

छत्तीसगढ़ में कैबिनेट फेरबदल और निगम मंडल में नियुक्तियों की चर्चा जोर पकडऩे लगी है। चर्चा है कि कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी इसी सिलसिले में छत्तीसगढ़ के दौर पर आने वाले हैं। वे संभवत: कैबिनेट फेरबदल और निगम मंडल के संबंध में चर्चा कर सकते है.  कोरोना काल में इस तरह के बड़े फैसले होंगे, इसकी संभावना कम ही दिखाई पड़ती है, लेकिन दावेदारी की सक्रियता इन दिनों कुछ ज्यादा ही देखी जा रही है। जिसके आधार पर कहा जा रहा है कि इस मसले पर कुछ विचार हो सकता है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि मंत्रिमंडल और निगम-मंडल के दावेदारों की जिस तरह बेचैनी बढ़ती जा रही है, उसके कारण भी कई बार इस तरह की खबरें उड़ती हैं ताकि उनको शांत किया जा सके।

खैर, जो भी बात हो लेकिन मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए हाथ पैर मार रहे विधायकों को थोड़ी बहुत तो उम्मीद जगी है और उन्होंने सक्रियता तेज कर दी है। दूसरी तरफ मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा के कारण सरगुजा जिला टेंशन में है, क्योंकि इस जिले से तीन मंत्री है और फेरबदल होता है, तो यहां से किसी एक का पत्ता कट भी सकता है। नियमों की बाध्यता के कारण बिना किसी को हटाए फेरबदल संभव नहीं है। इसी तरह एक-दो मंत्रियों की गंभीर शिकायतें भी है। जिसके कारण भी फेरबदल की चर्चा को बल मिल रहा है। प्रदेश प्रभारी भी कह चुके हैं कि परफार्मेंस के आधार पर मंत्रियों को बदला जा सकता है। कैबिनेट में कुछ फेरबदल की संभावना तो एक बार बन भी सकती है, लेकिन निगम मंडल में नियुक्तियों के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। क्योंकि, जिस तरह कर्मचारियों के वेतन वृद्धि, प्रमोशन जैसे फैसले लेकर सरकार खर्च में कटौती कर रही है, तो निगम मंडल में नियुक्ति कर खर्च बढ़ाने का लॉजिक समझ में आता नहीं। कर्मचारियों के वेतन में 30 फीसदी कटौती तक का प्रस्ताव तैयार है। इस स्थिति में राजनीतिक नियुक्तियों करने से सरकार के इमेज पर भी विपरीत असर पडऩे का खतरा है। कुल मिलाकर निगम-मंडल के उम्मीदवारों को एक बार फिर झटका खाने के लिए तैयार रहना चाहिए। कैबिनेट में फेरबदल की अटकलों में सच्चाई है, तो जिनकी कुर्सी जाएगी, उनको जोर का झटका लग सकता है। प्रदेश प्रभारी के दौरे की खबर से हलचल तो बढ़ गई है। देखना यह है कि वे कौन सा फार्मूला लेकर आते हैं और विचार-विमर्श का निष्कर्ष क्या निकलता है। 


30-May-2020 5:36 PM

सिम्स की महिला डॉक्टर का जलवा

छत्तीसगढ़ में कोरोना का विकराल रुप दिखने के साथ ही सरकारी इंतजामों में लापरवाही दिखने लगी है। बिलासपुर के सिम्स अस्पताल में तो कोविड 19 के लिए जारी गाइडलाइंस की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है। जिससे वहां काम करने वाले मेडिकल स्टॉफ और डॉक्टर्स दहशत में है। पिछले दिनों वहां मुंगेली के क्वारंटाइन सेंटर से एक गर्भवती इलाज के लिए आई, उसे वहां दाखिल तो कर लिया गया। इस दौरान उसे अलग-अलग वार्डों में भेजा गया। उसका इलाज करने वाले मेडिकल स्टाफ ने बिना पीपीई किट और अन्य सुरक्षा उपकरण की जांच की। इसके बाद उसकी कोरोना जांच हुई तो रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। तब आनन-फानन में उसे एम्स रायपुर भेजा गया। इसी तरह एक और महिला मरीज को भर्ती कराया, जिसकी रिपोर्ट तो अभी नहीं मिली, लेकिन उसके पति की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। चूंकि वह पत्नी की देखभाल के लिए अस्पताल में था, उसका वहां के स्टाफ से लगातार मिलना जुलना होता था और चाय-पानी के लिए कैंटीन, लिफ्ट का भी लगातार उपयोग कर रहा था। ऐसे में अस्पताल के उस वार्ड में काम करने वाले दहशत में है। गर्भवती के संपर्क में आने वाले डॉक्टर्स और स्टाफ को क्वारंटाइन करने के लिए अस्पताल प्रबंधन ने दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। सभी को अपने-अपने घर जाने के लिए कह दिया गया। जब लोगों ने मना किया तो डॉक्टर्स को होटल भेजा और नर्स-वार्ड ब्वॉय को हॉस्टल में रखा गया। संबंधित लोगों ने जब इसकी शिकायत सिम्स की पीआरओ और कोरोना प्रभारी से की थी, तो उन्होंने अनसुना कर दिया। उन्होंने वहां काम कर रहे मेडिकल स्टाफ से यहां तक कह दिया कि चुपचाप करिए और किसी को कुछ भी बताने की जरुरत नहीं है। इस रवैए से परेशान कई लोग नौकरी छोडऩे और छुट्टी में जाने का मन बना रहे हैं। सिम्स की महिला पीआरओ और डॉक्टर का जलवा इतना है कि विधायक भी बोलने से कतराते हैं। पहले भी उनकी शिकायत की गई थी, तो एक मंत्री ने कह दिया था कि उनसे हाथ जोड़ लीजिए और काम करने दीजिए। इस बार भी एक विधायक को पूरे मामले की जानकारी दी गई तो उन्होंने कहा कि वे कलेक्टर से बात कर सकते हैं, लेकिन कोरोना की प्रभारी से नहीं। हालत यह है कि इस महिला डॉक्टर के जलवे के सामने अच्छे अच्छों की नहीं चलती।

जोगी के बाद क्या?

अजीत जोगी के गुजर जाने के बाद आगे क्या? यह सवाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। फिलहाल तो जनता कांग्रेस की कमान उनके पुत्र अमित जोगी संभाल रहे हैं। मगर विधानसभा चुनाव के बाद से पार्टी का ग्राफ लगातार गिरा है। जोगी के ज्यादातर करीबी समर्थक कांग्रेस में चले गए हैं। कुछेक समर्थक भाजपा में शामिल हुए हैं। ऐसे में अब पूर्व सीएम के जाने के बाद पार्टी के भविष्य  को लेकर अटकलें लगाई जा रही है।

सुनते हैं कि पिछले दिनों मंत्रियों की अनौपचारिक बैठक में पूर्व सीएम के गिरते स्वास्थ्य पर चर्चा हुई थी। पूर्व सीएम की हालत में थोड़ा सुधार होते ही परिजनों की सहमति से बेहतर इलाज के लिए दिल्ली ले जाने की संभावनाओं पर भी बात हुई थी। साथ ही जनता कांग्रेस के नेताओं को कांग्रेस में शामिल करने पर भी विचार विमर्श किया गया। चर्चा है कि डॉ. रेणु जोगी और देवव्रत सिंह को कांग्रेस में शामिल करने के लिए पार्टी नेता एक पैर पर तैयार हैं। दिक्कत अमित जोगी को लेकर है, इसके लिए फिलहाल कोई सहमत नहीं है। वजह यह है कि अमित ने पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की थी। इससे परे विधायक धर्मजीत सिंह और प्रमोद शर्मा, कांग्रेस में जाने के उत्सुक नहीं हैं।

धर्मजीत और प्रमोद शर्मा, भाजपा के ज्यादा करीब हो गए हैं। धर्मजीत सिंह की पिछले दिनों पूर्व सीएम रमन सिंह से बंद कमरे में गहरी मंत्रणा भी हुई थी। धर्मजीत के करीबी लोगों का मानना है कि पूर्व सीएम के नहीं रहने से पार्टी को एकजुट करना कठिन होगा।

भ्रष्ट्राचार से लडऩा दुधारी तलवार

गुजरे जमाने की सुपरहिट फिल्म जाने भी दो यारों में यह दिखाया गया है कि भ्रष्टाचार का खुलासा करना किस तरह दो फोटोग्राफरों को महंगा पड़ गया। भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों ने आपस में मिलकर फोटोग्राफरों को जेल भिजवा दिया। कुछ इसी तरह की स्थिति मौजूदा सरकार में भी बन रही है।  प्रदेश में सरकार बदलते ही एक जोशीले कांग्रेस नेता ने मलाईदार निगम के मुखिया के भ्रष्टाचार की शिकायतों कीे झड़ी लगा दी। सरकार भी नई-नई थी। इसलिए पिछली सरकार में प्रभावशाली लोगों के खिलाफ शिकायत पर तुरंत जांच आदेश भी हो गए। अब किसी संस्थान में भ्रष्टाचार होता है, तो उसके लिए अकेले मुखिया ही जिम्मेदार नहीं होता बल्कि उनके निर्देशों  पर अमल करने वाले भी बराबरी के दोषी होते हैं।

जांच के आदेश हुए, तो बचाने की कोशिशें भी शुरू हो गई। जिन लोगों ने शिकायतों को हवा दी थी, वे अब उन्हें बचाने में जुट गए। क्योंकि इसमें निगम अध्यक्ष के साथ-साथ प्रभावशाली अफसर के फंसने का भी अंदेशा था, जो नई सरकार में भी अच्छी खासी पैठ बना चुका है। सत्ता और विपक्ष के लोगों के बीच आपसी संबंध भी मधुर होते हैं। मुसीबत में एक-दूसरे का साथ भी निभाते हैं। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। निगम अध्यक्ष ने पद से हटने के बाद भ्रष्टाचार को लेकर किसी तरह की मुश्किलें न आए, इसके लिए सरकार में प्रभावशाली लोगों से संपर्क भी बनाए। इसका प्रतिफल यह रहा कि निगम के दो एमडी बदल चुके हैं। जांच रिपोर्ट हवा में हैं। कुछ दिन पहले कांग्रेस नेता ने हल्ला मचाया, तो जांच प्रतिवेदन सरकार को भेजी गई। मुख्य शिकायत विलोपित कर एक तरह से निगम के पदाधिकारी-अफसर को क्लीन चिट मिल गई है। अब कांग्रेस नेता को पलटवार का डर भी सता रहा है, जो जांच रिपोर्ट के सार्वजनिक होने पर हो सकता है।


29-May-2020 8:11 PM

कारोबार की बेइज्जती बुरी बात...

किसी देश-प्रदेश की सरकार कारोबारियों से मिले हुए टैक्स से भी चलती है। आमतौर पर अधिकतर सरकारें अपने को उद्योग-व्यापार की हिमायती साबित करती हैं, देश के दूसरे प्रदेशों में जाकर वहां से राज्य में पूंजीनिवेश लाने की कोशिश करती है, और इस पर खासा खर्च भी करती है। लेकिन लॉकडाऊन के चलते जिस तरह से उद्योग धंधों को बंद करवाया गया, उसने देश में एक ऐसा माहौल बनाया है जैसा पहले कभी देखने में नहीं मिला था। आज हालत यह हो गई है कि व्यापारी अपनी ही दुकान को खोलते हुए ऐसा महसूस कर रहा है कि मानो वह किसी दूसरे की दुकान चोरी करने के लिए खोल रहा है।

अभी छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ से व्यापारियों की एसडीएम और एसडीओपी को लिखी हुई  चि_ी इस अखबार को मिली है। जाहिर है कि वह दुकान खोलने के बारे में है, लेकिन उसकी भाषा, उसके शब्द अगर देखें, तो लगता है कि व्यापारी अपने ही घर-शहर में चोर सा महसूस कर रहा है। इस चि_ी में इन अधिकारियों को माननीय, महोदयजी, हर पैरा में लिखा गया है। इसके बाद निवेदन है, आपसे करबद्ध निवेदन है, अनुमति प्रदान करें, निवेदन को स्वीकार करते हुए दुकान खोलने की अनुमति प्रदान करें, आपके कार्यालय से निकलने वाली हर गाईड लाईन का पालन करने के लिए बाध्य रहेंगे, विश्वास है कि , इस निवेदन पर विचार कर, अनुमति प्रदान करेंगे, निवेदक... !

सरकार और कारोबार के बीच इस तरह का फासला खतरनाक है। प्रवासी मजदूरों का देश की सरकारों पर से विश्वास वैसे भी उठा हुआ है। इसके बाद अब अगर कारोबारियों का विश्वास भी देश और प्रदेश की सरकारों पर से खत्म हो जाएगा, तो क्या इस देश के धंधों को सिर्फ विदेशी कंपनियां चलाएंगी? इसी कॉलम में हमने कई बार पहले भी लिखा कि अफसरों को प्रतिबंध का तरीका ही आता है, और इसलिए उन्होंने बाजार पर अंधाधुंध प्रतिबंध लगाए। छत्तीसगढ़ में तो जब लॉकडाऊन में ढील दी गई तो पंक्चर बनाने वाले को सुबह 11 से दोपहर 1, महज दो घंटों की छूट दी गई थी, मानो उसकी दुकान पर कतार लगती हो, धक्का-मुक्की होती हो। सरकार को बाजार को बिना जरूरत हिकारत की नजर से नहीं देखना चाहिए, और एक सबडिविजन मुख्यालय के चेंबर को अफसरों से ऐसी भाषा में गिड़गिड़ाना पड़े, यह नौबत बहुत खराब है।

नए मियां सुभान अल्लाह

वो दिन बीत गए, जब ईमानदार-मेहनती अफसरों को जिले की कमान सौंपी जाती थी। देश की शीर्ष प्रशासनिक सेवा से आए ये अफसर इतने जमीनी भी होते थे कि ट्रांसफर होने पर जनता विरोध स्वरूप सडक़ों पर भी उतर आती थी। मगर प्रशासन में ऐसे अफसर नहीं के बराबर रह गए हैं। अब दागी-बागी टाइप के अफसरों की भरमार हो गई है। हाल यह है कि कई अफसरों के तबादले पर जनता-जनप्रतिनिधि धन्यवाद देने लगी  है। हुआ यूं कि दो दिन पहले डेढ़ दर्जन से अधिक कलेक्टरों के तबादले  हुए। कुछ के हटने पर स्थानीय लोगों में काफी खुशी देखी गई।

 ऐसे ही एक जिले के कलेक्टर के तबादले पर कुछ स्थानीय नेता, प्रभारी मंत्री के घर पहुंचे और उन्हें कलेक्टर को हटवाने के लिए धन्यवाद दिया। इन नेताओं ने कहा कि जो भी नए आए हैं, वे कम से कम पुराने से तो बेहतर ही रहेंगे। नेताओं के जाने के बाद वहां कुछ लोगों ने मंत्रीजी को बता दिया कि स्थानीय नेताओं की खुशी ज्यादा दिन नहीं रहने वाली है। क्योंकि नए कलेक्टर, पुराने से ज्यादा अव्यावहारिक है। नए आए कलेक्टर, इससे पहले जिस जिले में भी रहे हैं, वहां के नेता और तो और सहयोगी अधिकारी-कर्मचारी परेशान रहते थे। एक बार तो विदाई समारोह में ही उनकी जमकर खिंचाई हुई थी। अब सरकार के सामने दिक्कत यह है कि कलेक्टरों के तबादले तो जल्दी-जल्दी नहीं किए जा सकते।

मुंगेली नया हॉटस्पॉट

छत्तीसगढ़ में प्रवासी मजदूरों के आने से कोरोना का कहर बरपा है।  छोटे जिलों में से एक मुंगेली हॉट स्पॉट बन गया है। यहां अब तक 75 से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। इनमें से तकरीबन सभी क्वॉरंटीन सेंटरों में थे। मगर इतनी बड़ी संख्या में कोरोना पॉजिटिव प्रकरणों के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को भी जिम्मेदार माना जा रहा है।

सुनते हैं कि मुंगेली के बाहरी हिस्से में एक स्थान पर कई प्रवासी लोग क्वॉरंटीन पर थे। मगर कुछ नेताओं ने स्थानीय प्रशासनिक अफसरों से मिलकर 14 दिन पूरा होने से पहले ही उन्हें घर भिजवा दिया। इसके बाद कुछ लोग कोरोना पॉजिटिव निकले। इसके चलते एकाएक कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ गई। कुल मिलाकर क्वॉरंटीन सेंटरों में अव्यवस्था को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। चूंकि किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हो रही है, इसलिए व्यवस्था में सुधार भी नहीं हो रहा है।


28-May-2020 7:05 PM

बेचैनी कहें तो कैसे, किससे ?

वित्त विभाग के सरकारी खर्च में कटौती के आदेश से हडक़ंप मचा हुआ है। यह आदेश निगम-मंडलों में भी समान रूप से लागू होगा। कोरोना फैलाव के चलते खर्च में कटौती के आदेश के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि निगम-मंडलों में पदाधिकारियों की नियुक्ति कुछ समय के लिए टल सकती है। जबकि लालबत्ती के लिए अब तक प्रदेशभर से करीब 2 हजार से अधिक बॉयोडाटा सीएम-मंत्रियों और पार्टी संगठन तक पहुंच चुके हैं। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार को डेढ़ साल हो चुके हैं, और ऐसे में निगम-मंडलों में नियुक्ति नहीं होने से पद की चाह रखने वाले नेताओं-कार्यकर्ताओं में बेचैनी साफ देखी जा सकती है।

ऐसा नहीं है कि दाऊजी को कार्यकर्ताओं की बेचैनी का अंदाज नहीं है। यही वजह है कि लॉकडाउन के बीच रोजाना पार्टी नेताओं से अलग-अलग मिल रहे हैं। मेल-मुलाकात कराने की जिम्मेदारी गिरीश देवांगन पर है। कुछ लोग तो दाऊजी को व्यक्तिगत काम बताकर निकल जा रहे हैं। कई ऐसे भी हैं, जिन्हें उम्मीद है कि जल्द ही निगम-मंडलों में नियुक्ति होगी। ये व्यक्तिगत काम कराने के बजाय पार्टी संगठन और क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा कर निकल जा रहे हैं।

 पिछले दिनों रायपुर के चार-पांच पुराने नेताओं को बुलावा आया। इनमें से एक-दो तो रोजाना टीवी डिबेट में नजर आते हैं। अचानक बुलावे का वे कारण नहीं समझ पाए और चूंकि सभी एक साथ बैठे थे इसलिए दिल की बात दाऊजी को नहीं बता पाए।  दाऊजी मोबाइल पर गेम खेलते रहे और हालचाल पूछते रहे। इन सभी की अकेले में चर्चा करने की इच्छा थी, लेकिन वे दाऊजी के सामने व्यक्त नहीं कर पाए। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें हुई। और जब दाऊजी को लगा कि सब कुछ ठीक-ठाक है, तो सिर हिलाकर इशारा कर दिया। सभी निकल आए। अब कोई कुछ बोलेगा नहीं, तो दाऊजी को पता चलेगा भी तो कैसे? ऐसे में पद न मिले तो बुरा नहीं मानना चाहिए।

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत...

कल रायपुर कलेक्ट्रेट में मंदिरों के पुजारी पहुंचे थे कि उनके भूखों मरने की नौबत आ गई है, सरकार उनकी मदद करे। अब भला सरकारी अमले की क्या हस्ती हो सकती है कि वह ईश्वर की नुमाइंदों की मदद करे? लेकिन ईश्वर को छोडक़र पुजारी सरकार की शरण में हैं। मौका ईश्वर के बारे में भी सोचने का है, और उसके भक्तों के बारे में भी जो कि मंदिर-मस्जिद, चर्च-गुरूद्वारे लगातार जाते ही रहे हैं, और ईश्वर के ऐसे नुमाइंदों को जानते-पहचानते भी हैं। मंदिर-मस्जिद में भीड़ की मनाही है, लेकिन भक्तों को किसी ने रोका तो नहीं है कि आते-जाते वहां रूककर इन लोगों की कुछ मदद ही कर दें?

फिर यह भी सोचने का मौका है कि ईश्वर यह कर क्या रहा है? जिसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, जिसकी मर्जी के बिना किसी को एक सांस भी कम या ज्यादा नहीं मिलती, जो कण-कण में मौजूद है, जो सर्वव्यापी है, सर्वज्ञ है, जो मन की बातों को पढ़ लेता है, जो भविष्य तय कर लेता है, वह आज कहां हैं, और उसके भक्तों का यह हाल क्यों है? एक अकेला अनदेखा कोरोना किस तरह पूरी दुनिया पर राज कर रहा है, यह भी सोचने की बात है। आज तो तीनों लोकों में कोरोना ही विराजमान दिख रहा है, और वही दुनिया को चलाते दिख रहा है।

आस्थावानों के लिए आज पहेलियां ही पहेलियां हैं, सवाल ही सवाल हैं, दूसरी तरफ नास्तिकों के लिए कल तक विज्ञान था, और आज भी विज्ञान है। बदलते वक्त के साथ नास्तिकों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि विज्ञान हर सवाल का आखिरी जवाब है, और हर आस्थावान को बचने के लिए आखिर में विज्ञान के पास ही जाना पड़ रहा है। और तो और पिछले दो-तीन महीनों से गोमूत्र और गोबर की महिमा का गान भी गायब हो गया है, और लोग डॉक्टर-नर्स की आरती उतार रहे हैं। कोरोना चाहे जितनों को मारे, विज्ञान जितनों को बचा लेगा, वे कम से कम यह तो समझ ही जाएंगे कि ईश्वर की धारणा कुछ वैसी ही है, जैसी कि मियां गालिब ने लिखी थी- हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल के खुश रखने को गा़लिब ये खय़ाल अच्छा है...।


27-May-2020

प्रशासनिक फेरबदल-1

कोरोना महामारी के बीच थोक में कलेक्टरों के तबादले किए गए। राज्य बनने के बाद पहला मौका है, जब एक साथ 22 कलेक्टरों को बदला गया। वैसे तो, पहले जिलों की संख्या भी कम थी। मगर इतने बड़े पैमाने पर फेरबदल कभी नहीं हुआ। कुछ को अच्छे काम की वजह से बड़ा जिला मिला, तो दिग्गज नेताओं की सिफारिशों को भी महत्व दिया गया।

दंतेवाड़ा कलेक्टर टोपेश्वर वर्मा को राजनांदगांव भेजा गया। टोपेश्वर ने दंतेवाड़ा में बेहतर काम किया था। दंतेवाड़ा विधानसभा चुनाव में विपरीत परिस्थितियों में कांग्रेस को जीत मिली थी, तो इसका ईनाम मिलना ही था। सूरजपुर कलेक्टर दीपक सोनी को दंतेवाड़ा भेजा गया हैं। दंतेवाड़ा में 62 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं।  सरकार ने लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठाने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। दीपक का काम बेहतर रहा है, और उन पर इन कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है।

लंबे समय से लूप लाइन में रहे सत्यनारायण राठौर को आखिरकार कलेक्टरी का मौका मिल गया। उनके खिलाफ पूर्व में विभागीय जांच चल रही थी। वे जांजगीर-चांपा जिले के रहवासी हैं और चर्चा है कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत की पसंद पर उन्हें कोरिया कलेक्टर बनाया गया है। वैसे भी कोरिया, डॉ. महंत की पत्नी सांसद ज्योत्सना महंत के  संसदीय क्षेत्र का हिस्सा भी है। इसी तरह संचालक भू अभिलेख रमेश कुमार शर्मा को कवर्धा कलेक्टर का दायित्व सौंपा गया है।

रमेश मूलत: राजनांदगांव जिले के रहवासी हैं। उन्हें राजस्व अभिलेखों  के कम्प्यूटराईजेशन का श्रेय दिया जाता है। मगर पिछली सरकार में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं मिली थी। उन्हें कवर्धा कलेक्टरी का मौका मिला है और चर्चा है कि उनकी पोस्टिंग में परिवहन मंत्री मोहम्मद अकबर की भी भूमिका रही है। कवर्धा अकबर का विधानसभा क्षेत्र है। कुछ लोगों के खिलाफ पहले शिकायतें रही हैं, लेकिन मौजूदा सरकार ने उन्हें कलेक्टर बनाकर खुद को साबित करने का मौका भी दिया है। इनमें गरियाबंद के नए कलेक्टर छत्तर सिंह डेहरे और सूरजपुर कलेक्टर रणवीर शर्मा शामिल हैं।

महासमुंद और बलौदाबाजार-भाटापारा के कलेक्टरों की अदला-बदली की गई है। अब सुनील कुमार जैन औद्योगिक जिले बलौदाबाजार-भाटापारा पहुुंच गए हैं, तो कार्तिकेश गोयल के लिए संतोषजनक बात यह है कि वे पुराने जिले महासमुंद में काम करेंगे। एक चौंकाने वाली पोस्टिंग भूरे सर्वेश्वर नरेंद्र की रही है। उन्हें साल भर के भीतर मुंगेली से दुर्ग में पदस्थ किया गया। दुर्ग मुख्यमंत्री का गृहजिला भी है। यह राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से अहम जिला रहा है और इसकी पोस्टिंग को बहुत बेहतर माना जाता है। कोई बड़ी उपलब्धि न होने के बावजूद नरेंद्र ने लंबी छलांग लगाई है।

भीम सिंह, रजत बंसल और जयप्रकाश मौर्य, ऐसे अफसर हैं, जिनके खिलाफ स्थानीय स्तर पर शिकायतें भले ही हो, लेकिन सरकार के रणनीतिकारों के पसंदीदा रहे हैं। यही वजह है कि भीम सिंह को रायगढ़, बंसल को बस्तर और मौर्य को नांदगांव से धमतरी भेजा गया है। धमतरी अपेक्षाकृत छोटा जिला है, लेकिन कलेक्टरी का अपना अलग ही रूतबा है। मौर्य की पत्नी रानू साहू को बालोद कलेक्टर से हटाकर जीएसटी कमिश्नर बनाया गया है। खास बात यह है कि रानू साहू को हटाने के लिए कांग्रेस के आदिवासी विधायकों का एक प्रतिनिधि मंडल सीएम से मिला था। इसके बाद से उनका हटना तय माना जा रहा था। इससे परे पुष्पेंद्र कुमार मीणा को पहली बार कलेक्टरी का मौका मिला है। उन्हें नारायणपुर कलेक्टर बनाया गया है। मीणा के साथ-साथ रितेश कुमार अग्रवाल और जन्मेजय महोबे को पहली बार कलेक्टर बनने का मौका मिला है।

वैसे तो सारांश मित्तर, संजीव कुमार झा को अपेक्षाकृत बड़े जिले क्रमश: बिलासपुर और सरगुजा की कमान सांैपी गई है। दोनों को अहम दायित्व सौंपा गया है। शिखा राजपूत तिवारी को गौरेला-पेंड्रा-मरवाही नए जिले से हटाकर नियंत्रक नापतौल की जिम्मेदारी दी गई है। शिखा से स्थानीय प्रशासनिक अमला नाराज था। एसपी से भी उनकी नहीं बन रही थी। ऐसे में उनका हटना तय माना जा रहा था। राजेश सिंह राणा पिछली सरकार में मलाईदार पद पर  रहे हैं। उनके खिलाफ गंभीर शिकायतों को हमेशा अनदेखा किया गया। मगर सरकार बदलते ही उनकी शिकायतों पर गौर किया जाने लगा। उन्हें राज्य योजना आयोग का सदस्य सचिव बनाया गया।

फेरबदल-2

एसीएस अमिताभ जैन को वित्त के साथ-साथ जल संसाधन का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया है। उनके पास पीडब्ल्यूडी का प्रभार था। सिद्धार्थ कोमल परदेशी के पास स्वतंत्र रूप से पीडब्ल्यूडी का प्रभार रहेगा। एसीएस रेणु पिल्ले को चिकित्सा शिक्षा का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया है। चूंकि स्वास्थ्य सचिव निहारिक बारिक सिंह वर्तमान में कोरोना के खिलाफ लड़ाई की अगुवाई कर रही है। ऐसे मेें उनसे चिकित्सा शिक्षा का दायित्व इसलिए लिया गया है कि नए मेडिकल कॉलेज खोले जाने हैं और चिकित्सा शिक्षा में ध्यान देने की जरूरत है। एक तरह से निहारिका बारिक के बोझ को हल्का किया गया है।

डॉ. आलोक शुक्ला को स्कूल शिक्षा के साथ-साथ कौशल उन्नयन और व्यापम का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया है। डॉ. शुक्ला अगले कुछ दिनों में रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में उन्हें अतिरिक्त दायित्व देकर यह संकेत दिया गया है कि उन्हें एक्सटेंशन दिया जाएगा। भुवनेश यादव को दवा निगम के एमडी पद से हटाकर ग्रामोद्योग विभाग का विशेष सचिव बनाया गया है। चर्चा है कि स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव, यादव को निगम से हटाने के लिए काफी समय से प्रयासरत थे।

कुछ फेरबदल चौंकाने वाले रहे हैं।  मसलन, उद्यानिकी संचालक का दायित्व भारतीय वन सेवा के अफसर वी माथेश्वरन को दिया गया है। यह संचानालय भ्रष्टाचार को लेकर कुख्यात रहा है और यहां के अफसरों की कार्यप्रणाली को लेकर विभागीय मंत्री रविंद्र चौबे नाराज रहे हैं। इसी तरह  एस आलोक को दुर्ग जिला पंचायत का सीईओ बनाया गया है। आलोक पंचायत सेवा के हैं और उन्होंने दंतेवाड़ा में अच्छा काम किया था। इसके प्रतिफल अब तक जिस पद पर आईएएस अफसरों की पोस्टिंग होती रही है, वहां आलोक को जिम्मेदारी दी गई।

राज करेगा खालसा

भूपेश सरकार के 18 महीने के कार्यकाल में तीसरी बार इंटेलीजेंस चीफ बदले गए हैं। पहले संजय पिल्ले, फिर हिमांशु गुप्ता और अब रायपुर आईजी आनंद छाबड़ा को इंटेलीजेंस चीफ का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया है। मगर इस फेरबदल से अशोक जुनेजा पावरफुल हुए हैं।  जुनेजा पिछली सरकार में इंटेलीजेंस चीफ थे। वर्तमान में नक्सल इंटेलीजेंस का प्रभार भी उनके पास है। यानी जुनेजा, छाबड़ा और जीपी सिंह की तिकड़ी पीएचक्यू और बाहर भी पावरफुल हुई है। महकमे के भीतर हंसी मजाक में लोग कह रहे हैं, राज करेगा खालसा।

हवाई के लिए खास रियायतें !

सुप्रीम कोर्ट ने हवाई यात्रियों के बीच दूरी को दी गई छूट पर आपत्ति जाहिर की है और केन्द्र सरकार से सवाल किया है कि क्या कोरोना को यह मालूम है कि उसे हवाई यात्रियों को नहीं छूना है? अदालत ने एयर इंडिया को दस दिनों का समय दिया है कि  तीन सीटों की कतार में बीच की सीट खाली रखने का इंतजाम कर ले। दूसरी तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि दो मुसाफिरों के बीच एक मीटर की दूरी बनाए रखना जरूरी है। इन दोनों बातों से परे आज सुबह की खबर यह है कि कल दिल्ली से पंजाब की एक उड़ान ने एक मुसाफिर कोरोना पॉजिटिव निकला तो बाकी सभी 36 मुसाफिर और 4 कर्मचारी, 40 लोग क्वारंटीन में भेज दिए गए।

इधर कुछ लोग यह दिक्कत बता रहे हैं कि अगर किसी बच्चे या बूढ़े को लेने के लिए जाना पड़े, तो जिस शहर गए, 14 दिन वहां क्वारंटीन करना पड़ेगा, और फिर लोगों को लेकर वापिस आने पर अपने शहर में फिर 14 दिन क्वारंटीन, मतलब यह कि कुछ घंटे का सफर और एक महीना क्वारंटीन।

ऐसी तमाम दिक्कतों को देखते हुए अब लोगों को लग रहा है कि हवाई सफर किया भी जाए, या उसका इरादा छोड़ दिया जाए? जिस तरह की रियायत केन्द्र सरकार ने कोरोना प्रतिबंधों में हवाई मुसाफिरों के लिए दी है वह अपने आपमें खतरनाक है क्योंकि ट्रेन में जितनी दूरी पर दो मुसाफिरों को बिठाया जा रहा है, उतनी दूरी तो प्लेन में बीच की सीट खाली छोडऩे पर भी नहीं बन सकेगी। फिलहाल दिलचस्प बात यह है कि जो मीडिया कल तक रेलगाडिय़ों पर फोकस किए हुए था, अब ट्रेन से पहुंचते 10 हजार मुसाफिरों के बजाय उसकी दिलचस्पी और उसका फोकस सौ-दो सौ हवाई मुसाफिरों पर आ गया है।

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26-May-2020

कानून के रखवाले ही सवालों के घेरे में

लोकतंत्र में न्याय के लिए अदालतों से आखरी उम्मीद रहती है, लेकिन पिछले कुछ समय से यह उम्मीद भी धीरे-धीरे टूटती नजर आ रही है। इस आखरी उम्मीद को तोडऩे में ही कानून के उन रखवालों का बड़ा हाथ है, जो वकालत के पेशे से जुड़े हैं। ऐसा एक आडियो वायरल हो रहा है, जिसमें दो वकील किसी केस के सिलसिले में बात कर रहे हैं। कोरबा जिले के एक जूनियर वकील ने अपने किसी क्लाइंट की जमानत के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट के वकील से संपर्क किया और उन्हें केस दिलाया। सीनियर-जूनियर की बातचीत में फीस का विवाद तो है ही, साथ वकालत के पेशे के गलत इस्तेमाल का भी जिक्र आता है। जूनियर वकील का आरोप है कि सीनियर ने मामले को रफा-दफा करने के लिए पुलिस के अफसरों को रिश्वत देने के लिए मुवक्विल प्रेरित किया। जब जूनियर वकील ने इस पर सवाल उठाया तो सीनियर का कहना था कि वे कुछ भी कर सकते हैं। बातचीत के दौरान भद्दी-भद्दी गालियों का भी इस्तेमाल किया गया है। इस पूरे मामले की आडियो रिकार्डिंग के साथ कोरबा के एसपी से शिकायत भी की गई है। कार्रवाई के नतीजे के लिए फिलहाल इंतजार करना होगा, लेकिन एक जूनियर वकील ने साहस दिखाते हुए मामले को उजागर किया है। वरना इस तरह के कई किस्से सुनने और देखने को मिलते हैं और लगभग हर पेशे में इस तरह की गंदगी रहती है, लेकिन यह मामला कानून के रखवाले कहे जाने वाले वकीलों का है, इसलिए इस पर चर्चा तो होनी चाहिए। इसके साथ सीनियर वकील सत्ताधारी दल के पदाधिकारी रहे हैं। इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण जगहों पर रहे हैं। इसलिए यह मामला सामान्य नहीं है, बल्कि हाईकोर्ट के नामी-गिरामी वकीलों के अंदरुनी लड़ाई का भी बड़ा उदाहरण है। चर्चा तो यह भी है कि सीनियर वकील संवैधानिक पद पाने की कतार में है। इस वजह से भी वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके माहौल बना रहे हैं। हालांकि इस बार उनका दांव उलटा पड़ गया और रिकार्डिंग बाहर आ गई है। जो भी हो, लेकिन कानून के रखवाले ही न्याय के तराजू से अन्याय करेंगे तो आखिरी उम्मीद भी खतरे में पड़ जाएगी।

सोशल मीडिया पर किसी जगह की फोटो को किसी और जगह की बताकर साबित करना अधिक मुश्किल नहीं रहता। इसी तरह किसी वक्त की फोटो को किसी और वक्त की बताना भी मुश्किल नहीं रहता क्योंकि हर फोटो या वीडियो पर तारीख तो दर्ज होती नहीं। अब इस शराब दुकान की तस्वीर तो सही लग रही है, लेकिन यह छत्तीसगढ़ के नाम से इसलिए नहीं खप पाएगी कि इसमें दुकानदार या ठेकेदार का नाम लिखा है जो कि इस राज्य में बंद है, और दुकानें सरकारी हैं। इस तस्वीर में ऊपर के कोने में शाहजी इंदौर लिखा हुआ है जो कि कम्प्यूटर से निकाले गए अक्षर दिख रहे हैं, पेंट किए हुए नहीं। फिर एक छेडख़ानी इसमें लिखे गए साल में दिख रही है जो कि तस्वीर में बाद में जोड़ा गया है। इसके बाद जो एक मजेदार चेतावनी एक पूरे शटर पर लिखी हुई दिख रही है, वैसी चेतावनी कोई दुकान अपने धंधे को खत्म करने के लिए लिखती नहीं है, फिर चाहे वह दारू का धंधा ही क्यों न हो। खैर, तस्वीर किसी भी प्रदेश की हो, इस पर लिखी गई टिप्पणी तो सभी प्रदेशों पर लागू होती है। अगली बार सोशल मीडिया पर ऐसी कोई तस्वीर देखें, तो बारीक नजरों से उसमें छेड़छाड़ या उसके झूठ को जरूर पकड़ लें।

सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

अब कोरोना के साथ ही जीने के आसार जब दिख रहे हैं तो लोग सेनेटाइजर के बढ़े हुए खर्च से निपटने के रास्ते निकाल रहे हैं। सबसे आसान रास्ता तो यही है कि थोड़ा सा सेनेटाइजर खरीदकर उसमें पानी मिला दिया जाए, और चाहे वह कितना ही बेअसर हो, वह कम से कम दिमागी राहत तो देगा ही। दूसरा तरीका यह है कि सेनेटाइजर का जरा भी इस्तेमाल न हो, और हरे-नीले रंग का कोई पानी ही अल्कोहल जैसी गंध के साथ रख दिया जाए। कुछ ऐसा ही मास्क को लेकर भी हो रहा है कि तीन लेयर वाले मास्क की जगह अब एक लेयर वाले मास्क ही बाजार में दिखते हैं, और उनकी सफाई-धुलाई का भी कोई इंतजाम है या नहीं इसका ठिकाना नहीं है।

धीरे-धीरे लोगों में साफ-सफाई को लेकर, सावधानी को लेकर लापरवाही आने ही लगती है, और 20 सेकंड का हाथ धोना 15 से होते हुए 10 सेकंड पर पहुंचने लगा है। पान ठेले खुलने के बाद अब दांतों के बीच की खाई में फंसने वाले रेशों और सुपारी को निकालने के लिए नाखून से लेकर नोट तक, और टूथ पिक से लेकर प्लॉस तक हाथ से होते हुए मुंह तक जाने लगे हैं, और सावधानी खत्म हो रही है। इसे दुनिया के कई देशों में भुगता गया है जब लोग सफाई और सावधानी से थकने लगते हैं, हाइजीन-फटीक। लेकिन याद रखना चाहिए कि सडक़ों के किनारे कौन सी चेतावनी लिखी रहती है- सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।


25-May-2020

दांव उलटा पड़ गया

छत्तीसगढ़ सरकार ने विमान से आने वाले यात्रियों के लिए भी 14 दिन का क्वॉरंटीन अनिवार्य रखा है। हालांकि वे अपनी च्वॉइस से पब्लिक या पेड क्वॉरंटीन में रह सकते हैं, लेकिन कई मुसाफिरों की समस्या है कि वे एक राज्य से दूसरे राज्य परिवार के किसी सदस्य के फंसे होने के कारण उन्हें लाने के लिए आ जा रहे हैं। कुल मिलाकर इसमें एक दिन से ज्यादा का वक्त नहीं लगेगा, लेकिन नियमानुसार उन्हें दो बार 14-14 दिन का क्वॉरंटीन पीरियड बीतना पड़ेगा।  ऐसे ही एक मुसाफिर ने अपनी परेशानी छत्तीसगढ़ के एक सांसद महोदय को बताई। यात्री ने इस नियम से छूट दिलाने का आग्रह करते हुए कहा कि केवल अपनी पत्नी को लेकर अपने राज्य लौट जाएंगे। एयरपोर्ट में तमाम जांच-पड़ताल तो हो ही रही है और स्क्रीनिंग के बाद ही यात्रा करने की अनुमति दी जा रही है। सांसद महोदय को बात जच गई तो उन्होंने मीडिया के जरिए राज्य सरकार से छूट देने की मांग कर डाली। इसके बाद सत्ताधारी दल के नेताओं ने सांसद महोदय की जमकर खिंचाई की। क्योंकि नियम तो केन्द्र सरकार ने तय किए हैं और राज्य सरकार केवल उसका पालन कर रही है। कांग्रेस ने तो यह आरोप लगाया कि उन्हें केवल हवाई यात्री की चिंता हो रही है। रेल, बस और पैदल आने वाले लोगों के बारे में तो उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। बाद में सांसद महोदय को भी समझ आ गया कि उनका दांव उलटा पड़ गया, इसलिए चुप रहना ही बेहतर है।

वन अफसरों के प्रभार बदलेंगे

वन विभाग में जल्द ही सीनियर आईएफएस अफसरों के प्रमोशन के लिए डीपीसी होगी। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स मुदित कुमार सिंह सीजी कॉस्ट का डीजी बनाने के बाद वन विभाग से बाहर हो गए हैं। उनकी जगह पीसीसीएफ (प्रशासन) राकेश चतुर्वेदी को हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाया जा सकता है। केन्द्र सरकार ने हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की डीपीसी की इजाजत दे दी है। साथ ही साथ पीसीसीएफ के एक और पद को भी मंजूरी दी गई है।

वन अनुसंधान संस्थान के डायरेक्टर पद को पीसीसीएफ स्तर का पद घोषित किया गया है। पीसीसीएफ के इस अतिरिक्त पद के लिए सीनियर एपीसीसीएफ पीसी पाण्डेय को पदोन्नत करने का रास्ता साफ हो गया है। इसके अलावा चार एपीसीसीएफ की भी पदोन्नति होने की संभावना है। इसमें सीसीएफ स्तर के अफसर सुनील मिश्रा, प्रेमकुमार, विश्वास और ओपी यादव को एपीसीसीएफ के पद पर पदोन्नति दी जा सकती है।

अगले कुछ महीनों में सीनियर अफसर रिटायर हो रहे हैं। जुलाई में एपीसीसीएफ अनूप श्रीवास्तव रिटायर होंगे और अगस्त में वन विकास निगम के एमडी राजेश गोवर्धन का रिटायरमेंट है। गोवर्धन के रिटायर होने के बाद पीसीसीएफ के पद पर देवाशीष दास को पदोन्नत किया जा सकता है।

मंत्री की रिकॉर्डिंग-एक

वक्त ऐसा आ गया है कि जिससे बात करें वह रिकॉर्डिंग कर रहे हैं मानकर चलना चाहिए। कल शाम से एक ऐसा टेलीफोन कॉल हवा में तैर रहा है कि चेन्नई से एक मजदूर छत्तीसगढ़ के एक मंत्री से बात कर रहा है। वह बता रहा है कि 40-45 मजदूर वहां फंस गए हैं। यह सुनकर मंत्रीजी मोटी-मोटी गालियां देते सुनाई देते हैं कि वहां गए ही क्यों गए थे काम करने के लिए? क्या छत्तीसगढ़ में काम नहीं मिलता? इस पर वह मजदूर पूरे दमखम के तर्क से, लेकिन गिड़गिड़ाते हुए बताता है कि छत्तीसगढ़ में तो साल भर काम मिलता नहीं, बाहर तो जाना ही पड़ता है। और चेन्नई में साढ़े 3 सौ रुपये रोजी मिलती है।

अब एक मजदूर से बातचीत की इस कॉल को मंत्री तो रिकॉर्ड करेगा नहीं, जिसमें वह खुद गालियां दे रहा है, रिकॉर्ड तो मजदूर की तरफ से ही हुआ होगा। लोकतंत्र परिपक्व होते दिख रहा है कि एक मजदूर का इतना हौसला बढ़ गया है। अब सवाल यह है कि बातचीत में जिन लोगों को गालियां देने की आदत है, वे लोग अपनी आदत सुधार लें, वरना ऐसी कई रिकॉर्डिंग सामने आती रहेगी।

मंत्री की रिकॉर्डिंग-दो

एक दूसरे मंत्री की कई किस्म की रिकॉर्डिंग राजधानी तक पहुंची हैं जिनमें वे एक बड़े नेता के खिलाफ हिकारत भरी आवाज में अपमानजनक बातें कर रहे हैं। ऐसी बातें बोलना तो आसान होता है, लेकिन ऐसी बातों का जो नतीजा होता है, उन्हेें झेलना मुश्किल होता है। आज मंत्री के आसपास के बहुत से लोग सरकार से बचकर भागे-भागे फिर रहे हैं, और उनकी मुसीबतें बढ़ती चली जा रही हैं।


24-May-2020

सिंहदेव फंसे, और निकले

स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के उस बयान पर पार्टी में गदर मच गया जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रदेश में 30 लाख लोग कोरोना संक्रमित हो सकते हैं। टीवी चैनलों में स्वास्थ्य मंत्री के हवाले से 6 हजार लोगों की मौत की आशंका जताई गई। स्वास्थ्य मंत्री के बयान की तीखी प्रतिक्रिया हुई। उन पर सोशल मीडिया प्लेटफार्म में उन पर भय का वातावरण पैदा करने का आरोप भी लगे। पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने तो फेसबुक पर मैसेज पोस्ट कर इस पूरे मामले पर सरकार से सफाई भी मांगी। सिंहदेव के बयान से खफा कांग्रेस के कुछ नेताओं ने फोन कर प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया तक को इसकी जानकारी दी।

सिंहदेव के बयान की वीडियो क्लिप भी कांग्रेस हाईकमान को भेजी गई। फिर क्या था, पार्टी के सिंहदेव कैंप की तरफ से डैमेज कंट्रोल की कोशिश शुरू हुई। सिंहदेव ने पहले तो मीडिया रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज किया। और कह दिया कि उन्होंने कभी इस तरह की बातें नहीं की। उन्हें भाजपा के लोगों का आश्चर्यजनक साथ मिला। पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने अपना फेसबुक मैसेज डिलीट कर दिया।

रात तक मीडिया से सिंहदेव की कोरोना-आशंका पूरी तरह गायब हो गई। सिंहदेव का मीडिया प्रबंधन काबिले तारीफ था, तो भाजपा के रमन सिंह कैंप का सिंहदेव के लिए सहयोगात्मक रवैया भी चर्चा का विषय रहा। राजनीतिक गलियारों में रमन सिंह विरोधी समझे जाने वाले भाजपा विधायकों को सीएम भूपेश बघेल के सहयोगी के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो रमन सिंह समर्थक सिंहदेव के लिए कोई परेशानी खड़ा नहीं करना चाहते हैं। कम से कम इस पूरे घटनाक्रम से यह बात साबित भी हुई है। भाजपा की अंदरूनी खींचतान का बड़ा फायदा यह रहा कि कांग्रेस सरकार एक बड़ी आलोचना झेलने से बच गई। 

एक नशे से दूसरे को खतरा..

छत्तीसगढ़ के लोगों में तम्बाकू से बने हुए गुड़ाखू का चलन खूब है। किसी भी जगह मजदूरों को देखें तो काम के बीच वे किनारे होकर छोटी सी डिब्बी निकालकर मंजन की तरह दांतों पर गुड़ाखू घीसते दिखते हैं, और जैसा तम्बाकू का असर होता है वैसा हल्का नशा इससे आता है और लोग इसके आदी होते चलते हैं। अभी लगातार इसकी कमी चलती रही, और रायपुर में एक गुड़ाखू कारोबारी की दुकान से मुफ्त गुड़ाखू बंटने की अफवाह पर लोग वहां डेरा डाले दिखते थे। कई जिलों में लॉकडाऊन के बाद अभी किसी दुकान में गुड़ाखू बिकना शुरू हुआ, तो सौ-पचास लोगों की कतार लग गई। शराब के कुछ बड़े कारोबारियों को उसमें अपना नुकसान दिखता है। दरअसल कोई भी नशा दूसरे नशे के बाजार को कमजोर करता है, इसलिए किसी प्रदेश में अगर चरस या अफीम, या दूसरे किस्म के विदेशी नशे पैर नहीं जमा पाते, तो उसका श्रेय वहां के अफसरों को नहीं, शराब कारोबारियों को जाता है जो कि शराब के अलावा बाकी किस्म के नशों पर नजर रखते हैं, और उन्हें पकड़वाते हैं। इन दिनों शराब कारोबारियों की नजर गुड़ाखू पर है, और वे इसके खिलाफ तस्वीरें और वीडियो फैलाने में भी लगे हैं।


23-May-2020

सियासत की मैली गंगा

राजनीति में विपरीत विचारधारा के प्रवक्ताओं की नोंकझोंक और आरोप-प्रत्यारोप सामान्य बात है, लेकिन छत्तीसगढ़ में बीजेपी-कांग्रेस के प्रवक्ता एक दूसरे के खिलाफ ऐसे भिड़ते हैं, जैसे जानी-दुश्मन हों। दोनों एक दूसरे के खिलाफ हमला बोलने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। अखबारों से लेकर सोशल मीडिया में एक दूसरे के खिलाफ टिप्पणियां करने से नहीं चूकते। हाल ही में बीजेपी प्रवक्ता ने अपने फेसबुक पर लिखा कि शहर के बड़े अस्पताल में कांग्रेस के बड़बोला प्रवक्ता ने ब्लैकमेलिंग की कोशिश की। इस पोस्ट में पहले अस्पताल का नाम भी लिखा गया था। जिसे बाद में हटा दिया गया। चर्चा है कि अस्पताल प्रबंधन की ओर से कड़ी आपत्ति के बाद नाम हटा लिया गया। कहा जा रहा है कि अस्पताल प्रबंधन ने कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी थी। ब्लैकमेलिंग की कोशिश वाले इस पोस्ट में कांग्रेस प्रवक्ता का नाम तो नहीं लिखा गया है, लेकिन तमाम लोग समझ रहे हैं कि यह किसके लिए लिखा गया है। लेकिन फिर भी सत्ताधारी दल के किसी प्रवक्ता पर ऐसे आरोप लगे हैं, तो वो गंभीर मामला है। हालांकि जिसके खिलाफ आरोप की संभावना जताई जा रही है, उसने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और सरकार में बैठे लोगों को मामले से अवगत कराया है और मांग की है कि पार्टी को कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। बीजेपी प्रवक्ता पहले भी ऐसे सनसनीखेज पोस्ट के जरिए सुर्खियां बटोर चुके हैं। राजधानी के एक अपहरणकांड पर भी उन्होंने पोस्ट किया था, जिसमें उनके खिलाफ आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था, फिर बाद में उन्होंने माफी मांगते हुए पोस्ट को हटा लिया था। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सियासत में आरोप-प्रत्यारोप केवल जुबानीखर्च या छवि धूमिल करने का हथियार बन गया है। आरोप-प्रत्यारोप व्यक्तिगत लड़ाई और दुर्भावना तक पहुंच गए हैं, जिसके कारण उसकी गंभीरता भी कम हुई है। बीजेपी या कांग्रेस प्रवक्ता के पास कोई तथ्य हैं, तो उसे उजागर करना चाहिए, ताकि सियासत में अच्छे और साफ सुथरी छवि वाले लोग आएं, लेकिन यह सब बीते दिनों की बात हो गई। विपक्ष के साथ अपने भी आरोपों की बहती गंगा में हाथ धोने में लग जाते हैं। यहां भी कांग्रेस के ही कुछ लोग मामले को तूल देकर गंगा को मैली कर रहे हैं।

न्याय के खुलासे में अन्याय

भाजपा के नेता राजीव गांधी न्याय योजना को लेकर नुक्ताचीनी कर रहे थे कि कांग्रेस के लोगों ने एक सूची जारी कर दी। जिसमें खुलासा हुआ कि न्याय योजना के जरिए पूर्व सीएम रमन सिंह और उनके पुत्र अभिषेक सिंह के खाते में करीब 50 हजार रूपए जमा हुए। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक के खाते में 25 हजार जमा किए गए। कुछ इसी तरह अन्य भाजपाई पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर, पुन्नूलाल मोहिले, पूर्व सांसद दिनेश कश्यप, लच्छूराम कश्यप, बैदूराम कश्यप, लता उसेंडी, दयालदास बघेल और श्याम बिहारी जायसवाल के भी खाते में धान खरीद की अंतर राशि जमा हुई है।

चूंकि इन नेताओं का नाम किसान के रूप में प्राथमिक सोसायटियों में दर्ज है और सोसायटी के जरिए अपना धान बेचा है, तो न्याय योजना का  फायदा मिलना ही था, इसमें कुछ भी गलत नहीं है। कांग्रेस के किसान नेताओं को भी योजना का फायदा हुआ है और उनके खाते में भी राशि जमा हुई है। मगर सूची को लेकर भाजपा में हलचल ज्यादा है। वजह यह है कि रमन सिंह-संगठन में हावी खेमे के हितग्राही नेताओं की सूची जारी हुई है। सिर्फ ननकीराम कंवर और बस्तर के एक-दो नेताओं के नाम अपवाद स्वरूप सूची में जरूर हैं, लेकिन रमन विरोधी खेमे के नेताओं को न्याय योजना के जरिए कितनी राशि मिली है, इसका खुलासा नहीं किया गया। जबकि नारायण चंदेल, अजय चंद्राकर और शिवरतन शर्मा जैसे बड़े किसान हैं। कुल मिलाकर सूची के साथ न्याय नहीं किया गया।

किसानों को बेनिफिट- एक तीर से दो निशाना

राज्य सरकार ने कोरोना के संकट में किसानों के लिए न्याय योजना शुरु की है। किसानों के खातों में सीधे पैसे ट्रांसफर किए गए। योजना की लांचिंग के लिए कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत तमाम आला नेता जुड़े थे। तमाम नेताओं ने योजना की खूब तारीफ की। राहुल गांधी ने कहा कि कोरोना के संकट में छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के साथ न्याय किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री से भी आग्रह किया था कि किसानों और मजदूरों के खातों में सीधे पैसे ट्रांसफर किया जाएगा तो उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार की यह योजना पूरे देश के लिए रोल मॉडल है और देशभर में इसे लागू किया जाना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि योजना से किसानों का भला होगा और उनको बड़ी राहत मिली है, लेकिन कन्फ्यूजन यह है कि जब यह राशि कोरोना संकट के कारण दी जा रही है, जैसा कि राहुल गांधी ने कहा है, तो फिर धान के समर्थन मूल्य की बकाया राशि कब मिलेगी। हालांकि सरकार ने किसानों को समर्थन मूल्य की बकाया राशि देने के लिए 57 सौ करोड़ का प्रावधान बजट में कर दिया था और अभी जो पैसा दिया गया है, वो बकाया राशि का ही पैसा है। इस बीच कोरोना का संकट आ गया तो मुश्किल घड़ी में सरकारी मदद का नया एंगल आ गया। अब ऐसे में किसान इसे कोरोना रिलीफ मानें या 25 सौ रुपए समर्थन मूल्य की बकाया राशि, यह उनकी समस्या है, लेकिन सरकार ने तो एक तीर से दो निशाना साध दिया है।


22-May-2020

पीएम के फोन का फायदा

पीएम ने पिछले दिनों जनसंघ के जमाने के दो पुराने नेता रजनीताई उपासने और देवेश्वर सिंह से फोन पर बातचीत की। रजनीताई वर्ष-77 में रायपुर शहर से विधायक रही हैं। जबकि देवेश्वर सिंह वर्ष-67 में सरगुजा जिले की लखनपुर सीट से जनसंघ के विधायक रहे। दोनों की उम्र अब 90 के आसपास हो चली है। पीएम का फोन आते ही दोनों के परिवारों में खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पहले तो  खुद दोनों नेताओं को एकाएक पीएम से बातचीत का भरोसा नहीं हुआ।

खैर, पीएम का फोन आने के बाद भाजपा में दोनों परिवार के लोगों की पूछपरख बढ़ गई है। पीएम से फोन पर बातचीत की सूचना पाते ही केन्द्रीय मंत्री रेणुका सिंह तो अगले दिन लॉकडाउन तोडक़र देवेश्वर सिंह से मिलने पहुंच गईं। देवेश्वर सिंह बरसों से सरगुजा में रेल सुविधाओं के लिए लड़ते रहे हैं। पीएम से पांच मिनट की बातचीत में भी उन्होंने अंबिकापुर से दिल्ली तक नई ट्रेन शुरू करने की गुजारिश की। देवेश्वर के पुत्र मनीष सिंह भाजपा के पार्षद हैं और अब उन्हें काफी महत्व मिल रहा है।

कुछ इसी तरह का हाल रजनीताई के पुत्र सच्चिदानंद उपासने का भी है। हालांकि राज्य में भाजपा की सरकार रहते उन्हें सबकुछ दिया गया जिसकी चाह पार्टी कार्यकर्ताओं को रहती है। सच्चिदानंद को पार्षद, महापौर और विधायक की टिकट मिली, लेकिन वे कोई चुनाव नहीं जीत पाए। बावजूद इसके उन्हें मलाईदार दारू निगम का दायित्व सौंपा गया। इसके बाद भी उपासने की शिकायत रही है कि उन्हें टीबी डिबेट में मौका नहीं दिया जाता है, न ही उनके नाम से कोई बयान जारी होता है। इसको लेकर वे कई बार मीडिया विभाग के प्रमुख नलिनेश ठोकने से भिड़ चुके हैं। वरिष्ठ नेताओं से ठोकने की शिकायत भी कर चुके हैं। मगर पीएम के फोन के बाद अब उनकी स्थिति बदल गई है। वे प्रमुख टीवी चैनलों में अलग-अलग मुद्दों पर पार्टी का पक्ष रखते नजर आते हैं, तो अब नियमित रूप से उपासने के नाम से बयान भी जारी होने लगा है। पीएम के फोन का बड़ा फायदा हुआ है।

पत्रकारिता विवि, पत्रकारिता नहीं, राजनीति

मध्य प्रदेश में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में संजय द्विवेदी की कुलपति के रुप में ताजपोशी हो गई है। ताजपोशी, इसलिए क्योंकि मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के ठीक दो महीने के भीतर संजय द्विवेदी की नियुक्ति हो गई है। इन दो महीनों में उन्हें दो बार प्रमोशन की सौगात मिली है। पहले उन्हें रजिस्ट्रार बनाया गया फिर अब कुलपति। पत्रकारिता विवि में इस त्वरित नियुक्ति का महत्व इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि मध्यप्रदेश में कोरोना ने कोहराम मचाकर रखा है और सरकार का भी गठन नहीं हो पाया है। इसके बावजूद वहां धड़ाधड़ नियुक्तियां और विवादित फैसले से अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार की प्राथमिकता में पत्रकारिता विवि कितना ऊपर है, जबकि इसके उलट छत्तीसगढ़ में पूर्ण बहुमत वाली कांग्रेस सरकार में पत्रकारिता विवि में कुलपति की नियुक्ति भी सरकार की पसंद के खिलाफ हुई, पूरे एक साल तक तो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति ही तय नहीं हो पाए, जबकि सर्कार में कई भूतपूर्व पत्रकार बैठे हुए थे, और हैं. ।

मध्यप्रदेश में पत्रकारिता विवि को प्राथमिकता दिए जाने के पीछे कई तरह की कहानियां सामने आती हैं । कहा जाता है कि साल 2018 के विधानसभा चुनाव में विवि का अमला बीजेपी के पक्ष में काम करता रहा। विवि के प्रोफेसर्स से लेकर स्टॉफ के कर्मचारी-अधिकारियों ने मीडिया, सोशल मीडिया से लेकर प्रचार-प्रसार में खूब बढ़-चढक़र हिस्सा लिया था। जिसका इनाम लगातार संजय द्विवेदी को मिल रहा है। संजय द्विवेदी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को कड़वा खुला पत्र लिखकर भी चर्चा में आए थे। खैर, जो भी बात हो सभी सरकारों की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं होती हैं, जिसके मुताबिक वे काम करती हैं। लेकिन कई बार प्राथमिकताओं को नजर अंदाज करने से विरोधी हावी भी हो सकते हैं। यही स्थिति छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विवि की है, जहां सरकार विरोधी हावी होते दिखाई दे रहे हैं। विवि से जुड़े लोगों का मानना है कि पत्रकारिता विवि पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में वहां कट्टर हिन्दूवादी सोच वालों का ही राज चलेगा। उधर, कुछ लोगों को उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ सरकार एक्शन में आएगी और यहां के पत्रकारिता विवि का चिठ्ठी खुलेगा। इसी भरोसे में एक छत्तीसगढिय़ा और चंडीगढ़ के चितकारा विवि के प्राध्यापक आशुतोष मिश्रा ने राष्ट्रपति, यूजीसी, सीएम और राज्यपाल को ई-मेल के जरिए पत्र लिखा है, जिसमें संजय द्विवेदी की नियुक्ति रद्द करने की मांग की गई है। उन्होंने कहा है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों के पत्रकारिता विवि में ही उनकी नियुक्ति के खिलाफ हाईकोर्ट में मामले चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ में संजय द्विवेदी की नियुक्ति की जांच की गई तो दोनों राज्यों के विवि पर असर पड़ेगा। हालांकि भोपाल के विवि में किसी भी नियुक्ति का सीधा कनेक्शन छत्तीसगढ़ से नहीं है, लेकिन संजय द्विवेदी दोनों राज्यों में काम कर चुके हैं, इस लिहाज से यहां असर दिखाई पड़ता है। यही कराण है कि वहां के किसी भी धमाके का असर यहां भी होता है। लोग तो इस बात से घबराए हुए हैं कि भोपाल में धमाके से रायपुर में विस्फोट न हो जाए।