राजपथ - जनपथ

19-Aug-2020 6:38 PM 7

संसदीय सचिव, तब और अब...

वैसे तो संसदीय सचिव न तो संबंधित विभाग के फाइलों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, और न ही विधानसभा में सवालों का जवाब दे सकते हैं।  कुछ सरकारी सुविधाओं को छोड़ दें, तो संसदीय सचिव एक तरह से अधिकारविहीन हैं। रमन सरकार में तो पूनम चंद्राकर जैसे कई संसदीय सचिवों की कोशिश रहती थी कि फाइलों पर हस्ताक्षर करने के अधिकार भले ही न हो, कम से कम अवलोकन करने के अधिकार मिल जाए। मगर उनकी हसरत पूरी नहीं हो पाई।

पिछली सरकार में संसदीय सचिवों को तो मंत्री, विभागीय बैठकों में भी नहीं बुलाते थे। आम विधायकों की तरह मंत्रियों से मिलने के लिए उन्हें इंतजार करना पड़ता था। ऐसे ही तुनकमिजाजी संसदीय सचिव  ने मंत्री से मुलाकात में देरी पर अपना गुस्सा उनके पीए पर निकाल दिया था। उन्होंने पीए की सबके सामने पिटाई कर दी थी। इसके बाद संसदीय सचिव ने मंत्री के बंगले में जाना भी छोड़ दिया था। मगर कांग्रेस सरकार में कुछ संसदीय सचिवों की स्थिति एकदम अलग है।

विकास उपाध्याय को ही लें, उनकी सक्रियता से विभागीय मंत्री के बंगले में हलचल मची हुई है। विकास उपाध्याय ने अफसरों की टीम ले जाकर एक्सप्रेस-वे सर्विस रोड खुलवा दिया। चर्चा है कि मंत्री तक को इसकी जानकारी नहीं थी। विकास को संसदीय सचिव बने कुछ ही दिन हुए हैं। पीडब्ल्यूडी और अन्य विभाग के अफसर उनके आगे-पीछे होते देखे जा सकते हैं। विकास की धमक को देखकर यह कहा जा सकता है कि संसदीय सचिवों को कोई लिखित अधिकार भले ही न हो, जुबानी जमा खर्च से काफी कुछ काम कराया जा सकता है।

मिजाजपुर्सी के दिन आये

भाजपा में असंतुष्ट नेताओं को मनाने की कवायद चल रही है। खुद सौदान सिंह इस मुहिम में जुटे हैं। असंतुष्टों की नाराजगी सौदान सिंह  की कार्यप्रणाली को लेकर ज्यादा रही है। वे पिछले दो दिनों में अब तक धमतरी-कांकेर और अन्य जिलों के नेताओं के साथ-साथ पूर्व विधायकों से फोन पर बात कर चुके हैं। सौदान सिंह का अंदाज बदला-बदला सा है। वे पार्टी गतिविधियों पर बिल्कुल भी चर्चा नहीं करते। वे पहले हालचाल पूछते हैं।

 परिवार के लोगों के स्वास्थ्य की जानकारी लेते हैं। फिर कहते हैं कि प्रदेश में कोरोना लगातार बढ़ रहा है। हमारे बड़े नेता भी इसकी चपेट में आ गए हैं। इससे बचने के लिए सामाजिक दूरी बनाकर रखें। सौदान से चर्चा करने वाले एक नेता ने अनुभव सुनाया कि 15 साल सत्ता में रहते किसी भी नेता ने हालचाल जानने की कोशिश नहीं की। अब जब नाराज लोगों का गुस्सा फूट रहा है, तो घर परिवार तक की सुध लेने लग गए हैं। दो दिन पहले सच्चिदानंद उपासने ने कहा था कि कार्यकर्ता पद नहीं, सम्मान के भूखे हैं। लगता है कि सौदान सिंह ने उपासने की बातों को गंभीरता से ले लिया है।


18-Aug-2020 6:48 PM 27

अब तक चीन से बचे पोला के बैल

कुछ देसी त्यौहार अभी तक चीन की पहुंच से बाहर हैं। जैसे बैलों की पूजा का पोला, अब तक हिन्दुस्तान के गांव-गांव में बच्चे इस दिन मिट्टी के बने हुए बैल मिट्टी के ही चक्कों पर रस्सी बांध खींचते हुए चलते हैं। कुछ लोगों के घरों में पीढिय़ों से लकड़ी के ऐसे बैल चले आ रहे हैं जिन्हें पहले चमकीले कागज चिपकाकर सजाया जाता था, और अगले बरस फिर नए कागज लगाए जाते थे।

पिछले कुछ महीने हिन्दुस्तान में सभी मजदूरों और कारीगरों के लिए तकलीफ के रहे, जिनमें कुम्हार भी शामिल थे। कारोबार, दफ्तर, सरकार सभी कुछ बंद रहे, तो पूरी गर्मी बिना घड़ों के निकल गई। सिर्फ घर के लिए लोगों ने घड़े लिए, लेकिन न प्याऊ खुले, और न ही दुकानों के बाहर घड़े रखे गए। छोटे-छोटे चाय ठेले भी जो घड़े रखते थे, उसकी भी संभावना पूरी गर्मी में खत्म हो गई। ऐसे में पोला के मौके पर मिट्टी के कुछ बैल बिके, और काम थोड़ा सा चला। जहां हिन्दुस्तानी त्यौहारों के अधिकतर सामान, और तो और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी चीन से बनकर आने लगी हैं, वहां पोला अब तक चीन से बचा हुआ है।

डरे-सहमे लोगों के लिए फोन

वैसे तो गोपनीय बातचीत की जरूरत वाले लोग मोबाइल फोन के सिम के बजाय वॉट्सऐप या दूसरे मैसेंजरों पर बात करने लगे हैं, लेकिन जिन्हें और ऊंचे दर्जे की बात करनी रहती है वे महंगे आईफोन पर ही उपलब्ध फेसटाईम पर ही बात करते हैं। प्रदेश में एक-दो कारोबार ऐसे हो गए हैं जिनमें दूसरे किसी फोन पर कोई बात ही नहीं होती। शायद बात करने वाले खुद भी इस पर रिकॉर्ड नहीं कर पाते, और सुना है कि खुफिया एजेंसियां भी आईफोन के इस एप्लीकेशन में घुसपैठ नहीं कर पा रही हैं।

लेकिन लोगों को यह याद रखना चाहिए कि इसी छत्तीसगढ़ में ऐसे स्टिंग ऑपरेशन होते आए हैं जिनमें लोगों ने वॉट्सऐप पर बात करते हुए उसकी स्क्रीन की रिकॉर्डिंग दूसरे फोन से की थी। ऐसा सुबूत अदालत में काम आए न आए, निजी और राजनीतिक जिंदगी में तो उसे हथियार बनाया ही जा सकता है। इसलिए सुरक्षित कुछ भी नहीं है, बुरी बातें अपने मन के भीतर-भीतर मार डालें, उसी में हिफाजत है।


17-Aug-2020 6:18 PM 6

उपेक्षित रोये तो रोये, उपासने भी !

छत्तीसगढ़ भाजपा प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने के उस बयान से पार्टी में हलचल मची हुई है, जिसमें उन्होंने कहा कि पार्टी में परिश्रम से ज्यादा परिक्रमा करने वालों को महत्व मिला, जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। उपासने का बयान ऐसे समय में जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत रायपुर में ही थे। उपासने के बयान के मायने निकाले जा रहे हैं। वैसे तो उपासने को 15 सालों में सब कुछ मिला, जिसकी हसरत आम कार्यकर्ताओं को रहती है। उन्हें मलाईदार ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन का चेयरमैन बनाया गया था।

विधानसभा हारने के बाद भी मेयर चुनाव की टिकट दी गई। हार के बाद भी उन्हें संगठन में अहम दायित्व मिला है। पार्टी के एक नेता याद दिलाते हैं कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद दोबारा विधानसभा की टिकट नहीं मिली, तो उपासने के भाई और कुछ करीबी लोगों ने एकात्म परिसर में जमकर हंगामा खड़ा किया था। वरिष्ठ नेताओं पर  टिकट बेचने का आरोप तक मढ़ दिया था। इतना सब-कुछ होने के बावजूद उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए पार्टी हमेशा उन पर मेहरबान रही है और वे संगठन में महत्वपूर्ण बने रहे हैं।

अब पार्टी प्रवक्ता जैसे अहम पद पर रहते उपासने की खुले तौर पर बयानबाजी को एक खेमा अनुशासनहीनता करार दे रहा है, तो उनके करीबी लोग मानते हैं कि उपासने जिन्हें कुछ नहीं मिला, उनके लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं। उपासने ने अपने बयान में किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन कुछ लोग अंदाजा लगा रहे हैं कि उनका निशाना सौदान सिंह की तरफ था। 

सुनते हैं कि विष्णुदेव साय के अध्यक्ष बनने के बाद से सौदान के खिलाफ संगठन में हाशिए पर चल रहे बड़े नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है। पार्टी के भीतर सौदान के खिलाफ मुहिम चल रही है। असंतुष्टों की नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि जिलाध्यक्षों के चयन में गुट विशेष के लोगों को ही महत्व दे रहे हैं।

एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि, जो कि लॉकडाउन के कठिन समय में सौदान के लिए रजनीगंधा का बंदोबस्त करते थे, वे भी चुपचाप दिल्ली में सौदान सिंह के खिलाफ अप्रत्यक्ष रूप से बड़े नेताओं के कान फूंककर आ गए। यह भी चर्चा है कि रायपुर और दुर्ग जिलाध्यक्ष पद को लेकर सौदान सिंह की अपनी पसंद है, जिसे पार्टी के दूसरे नेता पसंद नहीं कर रहे हैं। अगर सौदान की पसंद पर मुहर लगती है, तो पार्टी में असंतुष्टों का गुस्सा फूट सकता है। फिलहाल तो लोग नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।

बड़े नेता की बड़ी जिद...!

कांग्रेस में निगम-मंडलों की दूसरी सूची तैयार है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि राजीव गांधी जयंती के मौके पर सूची जारी हो सकती है। चर्चा है कि पार्टी के एक बड़े पदाधिकारी इस बात से खफा हैं कि उनकी राय को तवज्जो नहीं दी गई। सुनते हैं कि पदाधिकारी अपने करीबी को एक मलाईदार निगम का चेयरमैन बनाने के लिए अड़ गए थे। उन्हें मनाने के लिए काफी तर्क ढूंढने पड़े। पुराने उदाहरण भी दिए गए, तब कहीं जाकर थोड़े नरम पड़े। अब पदाधिकारी के करीबी को दूसरा पद दिया जा रहा है।

अफसर कम रह गए हैं इसलिए... !

प्रदेश के कई इलाकों में मूसलाधार बारिश हुई है। इस वजह से जगदलपुर और बिलासपुर में दो एनीकट टूट गए। स्वाभाविक है कि एनीकट टूटने पर जिम्मेदारी तय होती है और उस समय के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होती है। एनीकट के टूटने पर विभाग के अफसरों को आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि दोनों एनीकट की गुणवत्ता खराब थी। दोनों निर्माण कार्यों के एवज में इतना कुछ निचोड़ लिया गया था कि गुणवत्ता अच्छी होने का सवाल ही नहीं था। फिर भी, टूट-फूट पर कार्रवाई तो होनी है। विभाग के एक बड़े अफसर ने विभाग के मुखिया तक खबर भिजवाई कि सीनियर लेवल पर अफसर बेहद कम रह गए हैं, और निलंबन जैसी कार्रवाई से चालू परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। अफसर की सलाह के बाद अब कार्रवाई का दूसरा तरीका ढूंढा जा रहा है। ताकि कामकाज पर असर न पड़े।

 


16-Aug-2020 6:22 PM 41

सोशल मीडिया पर अफसरों की ताकत...

छत्तीसगढ़ के कई आईएएस और आईपीएस सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय हैं। इसमें से कई अफसर ऐसे हैं, जिन्हें फील्ड में या मंत्रालय में बड़ी जिम्मेदारी है। फिर भी उनकी सोशल मीडिया, खासतौर पर ट्वीटर पर सक्रियता देखते ही बनती है। अफसर न केवल अपने विभाग से जुड़ी जानकारियों को साझा करते हैं बल्कि सुविचार, जोक्स और व्यक्तिगत गतिविधियों के बारे में लिखते हैं और तस्वीरें शेयर करते हैं। उनकी पोस्ट पर लाइक्स और शेयर भी जमकर होते हैं। खैर, सोशल मीडिया का प्लेटफार्म चीज ही ऐसी है कि इसका नशा चढ़ जाए तो सिर चढक़र बोलता है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। अफसर हुए तो क्या सोशल मीडिया तो सभी के लिए है।

इस पर यहां पर चर्चा करने का कारण ये भी है कि अफसरों के इस शौक से सत्तारूढ़ नेताओं को तकलीफ हो रही है। उनको लगता है कि अफसरों का काम फाइल निपटाना और प्रशासन के कामकाज में ध्यान देने का है। सोशल मीडिया तो प्रचार-प्रसार का माध्यम है। इस पर तो सर्वाधिकार नेताओं का सुरक्षित है। कुछ माननीय तो इसके लिए गाइड लाइन बनाने के पक्ष में है। हालांकि पिछली सरकार में सोशल मीडिया में सक्रियता के कारण कई अफसरों को नुकसान भी उठाना पड़ा था, लकिन वह सोशल मीडिया की वजह से नहीं, उस पर राजनीतिक या विवादस्पद बातें लिखने की वजह से हुआ था । नई सरकार बनने के बाद अफसर कुछ ज्यादा वक्त सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। कोराना काल भी इसकी बड़ी वजह है। अफसर का मेल-जोल काफी कम हो गया है। लिहाजा वे बचे हुए समय का सोशल मीडिया में उपयोग कर रहे हैं। कुछ लोगों को यह बात भी खटकती है कि अफसर पूरे समय सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं तो काम कब करते हैं। इसका यह मतलब भी निकाला जा रहा है कि ऐसे अफसर काम पर ठीक से ध्यान नहीं दे रहे हैं। अब मामला कुछ भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि अफसरों की सक्रियता ने माननीयों की नींद में खलल डाल दी है।

हकीकत यह है कि बिलासपुर आईजी दीपांशु काबरा अपनी खुद की फिटनेस के बारे में तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करके पूरे अमले के सामने रोजाना ही फिटनेस का एक बड़ा चैलेंज पेश करते हैं, जिसकी पुलिस विभाग को बहुत जरूरत है. दूसरी तरफ उन्होंने लॉकडाउन के पूरे दौर में चारों तरफ लोगों की जितनी मदद की, उसकी वाहवाही तो सरकार को ही मिली. एक और अफसर सोनमणि बोरा भी दीपांशु की तरह देश भर के अफसरों से बात करके लौटते मजदूरों की मदद करते रहे. सरकार को सोशल मीडिया और अफसरों की ताकत का आगे भी इस्तेमाल करना चाहिए।

पैसा है तो वैक्सीन लगना शुरू?

कोरोना के इलाज के लिए बाजार में अब तक कोई कारगर दवा नहीं आ पाई है। अलबत्ता देश-विदेश में वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है। वैक्सीन को लेकर लोगों में काफी उत्सुकता है। लोगों को उम्मीद है कि अगले दो-तीन महीनों में कोई न कोई वैक्सीन लॉच हो जाएगी। इससे ही बीमारी से बचाव हो पाएगा। देश की तीन कंपनियों और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा कोरोना वैक्सीन विकसित की जा रही है। भारत में भी सरकारी मंजूरी से इसका चुनिंदा अस्पतालों में मानव परीक्षण चल रहा है। सुनते हैं कि रायपुर के एक बड़े अस्पताल के डॉक्टरों ने अघोषित रूप से वैक्सीन मंगवाकर लगा भी ली है। डॉक्टरों ने किस कंपनी की वैक्सीन लगवाई है, यह साफ नहीं हो पाया है। मगर बताते हैं कि 15 हजार रूपए में अनाधिकृत तौर पर वैक्सीन मिल भी रही है। कोरोना संक्रमण से बचने के लिए कई लोग वैक्सीन के जुगाड़ में लग गए हैं। अब वैक्सीन से फायदा होगा या नहीं, इसका तो अभी परीक्षण ही चल रहा है। लेकिन इससे नुकसान नहीं है यह मानकर लोग लगवाने की कोशिश कर रहे हैं।


13-Aug-2020 5:52 PM 34

छत्तीसगढ़ का भरोसा, और एमपी

वैसे तो प्रदेश में कोरोना का संक्रमण तेजी से फैल रहा है, लेकिन यहां अभी स्थिति नियंत्रण में है। छत्तीसगढ़ में सिर्फ सरकारी अस्पतालों के दम पर कोरोना को बेकाबू होने से रोका जा सका है। अभी कुछ दिनों से निजी अस्पतालों में भी कोरोना के इलाज की सुविधा उपलब्ध हो गई है। छत्तीसगढ़ के पड़ोसी मध्यप्रदेश की स्थिति अलग है। मध्यप्रदेश में  लोग सरकारी अस्पतालों के बजाए निजी अस्पतालों में इलाज कराना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान खुद कोरोना पीडि़त हैं और वे निजी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। जबकि भोपाल में एम्स जैसे उत्कृष्ट संस्थान हैं। रायपुर एम्स के डायरेक्टर डॉ. नितिन एम नागरकर, भोपाल एम्स के भी डायरेक्टर हैं। रायपुर एम्स के कोरोना इलाज को लेकर तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तारीफ हो रही है। छत्तीसगढ़  सरकार के सरकारी अस्पतालों में भी कोरोना अच्छे तरीके से इलाज हो रहा है, और बड़ी संख्या में लोग ठीक होकर लौट रहे हैं।

चूंकि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश से अलग होकर बना है। इसलिए दोनों राज्यों में मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं की तुलना होते रहती है और यहां के पूर्व और वर्तमान अफसर एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। मध्यप्रदेश सरकार के एक बड़े चिकित्सक ने छत्तीसगढ़ के एक रिटायर्ड आईएएस अफसर से कहा कि मध्यप्रदेश के कोरोना पीडि़त बड़े लोगों को सरकारी अस्पतालों पर भरोसा नहीं है। खुद सीएम निजी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था ठीक नहीं हो पा रही है। जबकि छत्तीसगढ़ में सरकारी अस्पतालों के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा है। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद भ्रष्टाचार को लेकर स्वास्थ्य विभाग-अस्पताल भले ही कुख्यात रहा है, लेकिन कोरोना ने कुछ हद तक पुरानी छवि को बदलने में मदद की है।

तबादला तो हुआ, पर जाएँ कैसे?

पिछले दिनों सरकार ने राजनांदगांव एसपी जितेन्द्र शुक्ला और ईओडब्ल्यू एसपी सदानंद कुमार को बदल तो दिया, लेकिन वे नया कार्यभार संभाल नहीं पा रहे हैं। शुक्ल को कवर्धा स्थित 17 वीं और कुमार को नारायणपुर के 4वीं बटालियन का कमाडेंट बनाया गया है। जहां पहले से ही दोनों बटालियन में सीडी टंडन और धर्मेंद्र सवाई बतौर कमाडेंट पदस्थ हैं, और इनका तबादला नहीं हुआ है । शुक्ला और कुमार इस तकनीकी पेंच के चलते चाहकर भी पदभार नहीं ले पा रहे हैं। यानी दोनों जगहों पर कुर्सी एक और अफसर दो वाली स्थिति बन गई है। फिलहाल दोनों अफसर इधर-उधर समय काट रहे हैं। सुनते हैं कि दोनों ने डीजीपी को तबादले को लेकर त्रुटि से अवगत भी कराया है। मगर अब तक त्रुटि को ठीक नहीं किया जा सका है। हल्ला तो यह भी है कि दोनों को कामकाज को लेकर नाराजगी के चलते हटाया गया था। और त्रुटि भी अनजाने में नहीं हुई है। ऐसे में इन त्रुटियों को ठीक करने में समय तो लगता है।

गोबर-गणित

छत्तीसगढ़ सरकार जब से गोबर खरीदना शुरू किया है। इसको लेकर तरह-तरह के गुणा-भाग सुनने को मिल रहे हैं। पिछले दिनों ने सरकार ने गोबर संग्राहकों को भुगतान किया। इसके बाद से तो गोबर का गणित अच्छे-अच्छों को पल्ले नहीं पड़ रहा है। दरअसल, भुगतान के बाद संग्राहकों की कहानी को सफलता की कहानी के लिहाज से सरकारी महकमे ने प्रचारित किया। उसमें गोबर से आमदनी से लेकर खरीद-बिक्री के आंकड़े दिए गए थे। ऐसे ही चंद्रखुरी और महासमुंद के संग्राहकों को जिक्र था चंद्रखुरी की एक महिला के बारे में बताया गया कि केवल 10 दिन का गोबर बेचकर 31 हजार कमा लिए। उसके पास 70 गायें है। सोशल मीडिया के विशेषज्ञों ने गुणा-भाग लगाया तो पता चला कि उसकी एक गाय रोजाना 22-23 किलो गोबर दे रहे है, लेकिन महासमुंद के संग्राहकों के गोबर से कमाई का जबकि जमाया गया तो गणित के रोचक आंकड़े सामने। इस संग्राहक ने 13 दिन में 221 क्विंटल गोबर 44 हजार से ज्यादा की कमाई की। जबकि उसके पास 25 गायें है। ऐसे में एक गाय का रोजाना का गोबर 59 किलो के आसपास का आ रहा है। इस तरह के आंकड़े से आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है। संभव है कि संग्राहकों ने काफी पहले से गोबर इक_ा करना शुरू कर दिया हो, लेकिन सरकारी आंकड़ों ने कुछ समय के लिए लोगों को उलझा जरुर दिया था। सोशल मीडिया में कई दिनों तक गोबर गणित को समझने और समझाने का खेल चलता रहा।


12-Aug-2020 6:20 PM 13

हवा देना जारी है, और...

पूर्व सीएम रमन सिंह को पनामा पेपर्स पर एक बार फिर सफाई देनी पड़ रही है। कांग्रेस के लोग रमन सिंह-परिवार की संपत्ति की जांच के लिए दबाव बना रहे हैं। वैसे तो ये आरोप कोई नए नहीं हैं। रमन सिंह सीएम थे, तब सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील प्रशांत भूषण ने पनामा पेपर्स के हवाले से रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह का विदेश में  खाता होने का आरोप लगाया था। पनामा पेपर्स में अभिषाक सिंह नाम है। खैर, रमन सिंह-अभिषेक इस पर कई बार सफाई भी दे चुके हैं।

रमन सिंह ने तो अपने खिलाफ आरोपों पर एक बार कानूनी कार्रवाई  की चेतावनी भी दी थी। बात पुरानी हो गई। उस समय चर्चा थी कि प्रशांत भूषण, रमन सिंह से इसलिए नाराज थे कि उनके सहयोगी जूनियर अधिवक्ताओं के खिलाफ बस्तर में पुलिस ने कार्रवाई कर दी थी। अब प्रशांत भूषण तो खामोश हैं, लेकिन कांग्रेस के लोग थोड़े-थोड़े दिनों में पुराने आरोपों को हवा देते रहते हैं। इससे पूर्व सीएम और भाजपा के लोगों का हलाकान होना स्वाभाविक है।

इससे ज्यादा रमन सिंह के विरोधी एक भाजपा नेता परेशान हैं। उनकी परेशानी की वजह यह है कि जब भी रमन सिंह पर आरोप लगते हैं, मीडिया वाले बाइट लेने उनके घर पहुंच जाते हैं। पार्टी के भीतर के समीकरण भले ही कुछ हो, लेकिन सार्वजनिक तौर पर बचाव करना ही पड़ता है। मीडियावालों के लिए सहूलियत यह रहती है कि भाजपा नेता का बंगला कांग्रेस भवन से कुछ ही दूरी पर है। ऐसे में प्रतिक्रिया के लिए भाजपा दफ्तर के बजाए नेताजी के घर पहुंचना ज्यादा आसान रहता है।

आवभगत में जुटे रहने वाले

कांग्रेस के निगम-मंडलों की दूसरी सूची में कई नामों का हल्ला है। सुनते हैं कि दूसरी सूची में प्रोटोकाल से जुड़े दूसरी पंक्ति के सभी नेताओं के नाम हैं। इनमें अजय साहू, सन्नी अग्रवाल, शिव सिंह ठाकुर और आरपी सिंह प्रमुख हैं। चर्चा है कि प्रोटोकाल से जुड़े नेताओं को पद देने की सिफारिश प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया ने की थी। और उनकी सिफारिश पर राष्ट्रीय नेताओं की आवभगत में जुटे रहने वाले सभी नेताओं का नाम जोड़ा गया है। अब सूची का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है।

दरबार से जुड़े लोग तैयार नहीं

शदाणी दरबार हॉटस्पाट बन गया है। दरबार और इससे सटी कॉलोनी में डेढ़ सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। शदाणी दरबार के प्रमुख संत युधिष्ठिरलाल और उनके परिवार के आधा दर्जन सदस्य भी कोरोना की चपेट में आ गए थे। सभी अब स्वस्थ हैं। युधिष्ठिरलाल चाहते हैं कि शदाणी दरबार को फिर से खोलने की अनुमति दे दी जाए।  चूंकि यह पूरा इलाका हॉटस्पाट बन चुका है। इसलिए प्रशासन ने यहां बैरिकेड्स लगाकर लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी है।

त्योहार का सीजन है, लिहाजा बैरिकेड्स हटाने के लिए कलेक्टर को आवेदन भेजा गया है। आवेदन लेकर खुद श्रीचंद सुंदरानी गए थे। सुनते हैं कि प्रशासन तो बैरिकेड्स हटाने के लिए तैयार है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इसके पक्ष में नहीं है। सीएमओ ने कह दिया कि वे दरबार और आसपास के लोगों की पूरी जांच कराएंगे। इसके बाद ही विभाग की तरफ से बैरिकेड्स हटाने की अनुमति दी जा सकती है। मगर दरबार से जुड़े लोग इसके लिए तैयार नहीं हैं। कुछ लोगों को शंका है कि एक साथ जांच होने पर कई और पॉजिटिव निकल  सकते हैं। इससे प्रशासनिक अफसर उलझन में हैं।


11-Aug-2020 6:24 PM 13

अगली लिस्ट तैयार...

छत्तीसगढ़ में निगम-मंडलों की दूसरी सूची फाइनल हो चुकी है और यह जल्द जारी हो सकती है। सुनते हैं कि सूची में नेताओं के अलावा सामाजिक संगठन के एक-दो लोगों के साथ ही एक रिटायर्ड आईएएस का भी नाम है। चर्चा है कि इस अफसर के नाम पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। पहली सूची में नाम भी था, लेकिन टाइपिंग की चूक की वजह से नाम छूट गया। साफ छवि के इस रिटायर्ड अफसर के अनुभवों का सरकार पूरा लाभ उठाना चाहती है। और उन्हें आयोग में अहम दायित्व सौंपा जा सकता है।

कल्लूरी के तमाम लोग स्थापित...

पुलिस महकमे के मौजूदा प्रशासनिक ढांचे में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में पावरफुल रही, बस्तर के तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी की टीम की फील्ड फिर से वापसी हो गई है। बस्तर में कल्लूरी के करीबी अफसर प्रदेश में कांग्रेस सरकार आने के बाद महीनों तक लूपलाईन में रहे। अब पौने दो साल बाद कल्लूरी की टीम फिर से मैदान में दिख रही है। आईजी रहते कल्लूरी ने अपनी पसंद के अफसरों के जरिए नक्सलियों के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया था, जिस पर उंगलियां भी उठी थी। कुछ मुठभेड़ की अभी भी जांच चल रही है। कल्लूरी के वक्त एसपी रहे डी. श्रवण, अभिषेक मीणा, आईके ऐलसेला, कमलोचन कश्यप और बीएल ध्रुव को फिर से पोस्टिंग मिल गई है। श्रवण और मीणा को तो राजनांदगांव और कोरबा जैसे बड़े जिलों की कप्तानी मिली है।

ऐलसेला की भले ही दोनों अफसरों की तुलना में बलौदाबाजार जैसे छोटे जिले तैनाती हुई लेकिन वह औद्योगिक नजरिए से तुलनात्मक रूप से बेहतर है। कमलोचन कश्यप की कल्लूरी की टीम में गिनती जरूर होती है, लेकिन वे उनके बाकी अफसरों की तुलना में ज्यादा विवादित नहीं रहे। कांग्रेस सरकार ने कश्यप को बीजापुर भेजकर उन पर भरोसा जताया है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस सरकार आने के कुछ दिनों बाद एसआरपी कल्लूरी को पहले ईओडब्ल्यू-एसीबी का चीफ बनाया गया था। बाद में उन्हें परिवहन विभाग में भेजा गया। अब वे पीएचक्यू में हैं, लेकिन पहले जैसे पॉवरफुल नहीं रह गए हैं। अलबत्ता, उनकी टीम के लोग अब सेट हो गए हैं।

चौधरी या जूदेव?

खबर है कि भाजपा में युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद के लिए काफी खींचतान चल रही है। भाजयुमो अध्यक्ष के लिए पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी का नाम प्रमुखता से उभरा है। चर्चा है कि पूर्व सीएम रमन सिंह, चौधरी को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में हैं। वैसे भी चौधरी को आईएएस छोडक़र भाजपा में लाने में उनकी भूमिका रही है। मगर रमन विरोधी खेमा दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के छोटे पुत्र प्रबल प्रताप सिंह को युवा मोर्चा की कमान सौंपने के पक्ष में है। प्रबल प्रताप ने अपने पिता के निधन के बाद ऑपरेशन घर वापसी कार्यक्रम को आगे बढ़ाया और पूरे प्रदेश के जूदेव परिवार से जुड़े लोगों के लगातार संपर्क में भी हैं। अब तक तो सभी नियुक्तियों में हाईकमान ने रमन सिंह की पसंद को तवज्जो दी है। देखना है कि युवा मोर्चा अध्यक्ष के लिए हाईकमान किसकी सुनता है।

लोग हॉटस्पॉट बनाकर ही मानेंगे...

रायपुर में कोरोना संक्रमण गंभीर रूप ले रहा है। आम लोगों की लापरवाही की वजह से यह तेजी से फैल रहा है। यहां एक पॉश कॉलोनी में कोरोना के चार पॉजिटिव मिले हैं। एसिम्टोमैटिक होने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती न कर होमआइसोलेशन के लिए कहा गया था। मगर कोरोना पीडि़त रोज सुबह-शाम वॉक पर निकल जा रहे हैं। उन्हें देखते ही कॉलोनी के बाकी लोग दहशत में घर के अंदर घुस जा रहे हैं।  कई बार कोरोना मरीजों को  समझाइश देने की कोशिश भी की गई, लेकिन वे मान नहीं रहे हैं। चारों की वजह से पूरी कॉलोनी में डर का माहौल है।  कुछ लोगों को आशंका है कि कोरोना मरीजों की लापरवाही रोकने के लिए प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए, तो कॉलोनी के हाटस्पॉट बनने में देर नहीं लगेगी।

कुछ कॉलोनियों में तो पॉजिटिव निकले लोग आस-पास के लोगों के बीच प्रवचनकर्ता का दजऱ्ा पा चुके हैं, लोग उनसे सुनते रहते हैं कि कैसा लगा था, क्या-क्या इलाज हुआ..! 

गुठली के दाम सरीखे, बीज के दाम

छत्तीसगढ़ में सरकार ने केन्द्र सरकार की कोशिशों से बहुत आगे बढक़र लोगों से वनोपज खरीदने का काम किया है। पहले तेंदूपत्ता ही सबसे अधिक कमाई जंगल के आदिवासियों को और वहां बसे हुए लोगों को देता था, लेकिन राज्य सरकार ने धीरे-धीरे इमली और दूसरे कई किस्म के लघु वनोपज कहे जाने वाले सामान इस लिस्ट में जोड़े, और देश में सबसे अधिक दाम पर सरकार इन्हें खरीद रही है। इनमें इमली भी शामिल है, इसे सरकार तो खरीदती ही है, लेकिन बस्तर में व्यापारी भी इमली में इतनी दिलचस्पी लेते हैं कि उनमें से एक तो वहां के इमली किंग कहलाते थे।

अब एक वैज्ञानिक खबर यह आई है कि इमली का बीज बहुत फायदेमंद होता है, और यह कैल्शियम और खनिजों से भरपूर होता है, हड्डियों को मजबूत करता है। इमली महिलाओं को अधिक पसंद रहती है, और उसका यह बीज भी महिलाओं की उम्र के साथ कमजोर होने वाली हड्डियों को मजबूती दे सकता है। इसके अलावा इमली के बीज से कमर का दर्द कम होता है, और यह वजन कम करने में भी मदद करता है।

अब सरकार अगर चाहे तो इमली के बीज के इन्हीं दो-तीन गुणों की वैज्ञानिक जानकारी जुटाकर बीज की मार्केटिंग भी कर सकती है, और आम के आम, गुठली के दाम की तरह इमली तो इमली, बीज से भी कमाई जैसी बात हो सकती है।


10-Aug-2020 7:03 PM 20

रमन का विधानसभा सीट पर मुकाम

राजनांदगांव के विधायक और पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह का राजनांदगांव में नया आशियाना तैयार हो गया है। अच्छा मुहुर्त देखकर अगले दो-तीन दिन में पूर्व सीएम शहर के मध्य स्थित बंगले के कार्यालय का उद्घाटन कर लोगों से मेल-मुलाकात का सिलसिला शुरू करेंगे। सुनते है कि डॉ. सिंह ने यह बंगला किराए पर लिया है। इससे पहले सीएम रहते उनका सरकारी निवास था, वह अब डीआईजी निवास बन चुका है। इसके बाद से रमन सिंह सर्वसुविधायुक्त बंगले की तलाश में थे। 

चर्चा है कि पूर्व सीएम को उनके करीबियों ने नांदगांव में एक स्थाई कार्यालय खोले जाने की सलाह दी थी। विधायक होने की वजह से उन पर नांदगांव में ही रहने का दबाव है। पार्टी के कुछ कारोबारी नेताओं ने पूर्व सीएम के लिए उपयुक्त बंगला ढूंढने में मदद की। हालांकि यह पहले जैसा आलीशान तो नहीं है, लेकिन सुविधाओं में कोई कमी नहीं है। इस बंगले के रंगरोगन के बाद इसे शानदार रूप दिया गया है। कोरोना संक्रमण निपटने के बाद पूर्व सीएम ज्यादातर समय यहां रहकर सरकार के खिलाफ व्यूह रचना तैयार करेंगे, साथ ही विधानसभा सीट भी देखेंगे. कई नेता बड़े होने के बाद चुनाव क्षेत्र को थोड़ा सा भूलते हैं, तो अगले चुनाव में वह हाथ से निकल जाता है।

याददाश्त का राज

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में पीयूष गोयल की इस बात की तारीफ होती है कि वे महापुरूषों-राजनेताओं को जन्मदिन की बधाई देना नहीं भूलते हैं। उनका बधाई संदेश  ट्विटर-फेसबुक पर देखा जा सकता है। कुछ लोग आश्चर्य करते हैं कि इतने लोगों का जन्मदिन उन्हें  कैसे याद रहता है। मगर इसमें अचरज वाली कोई बात नहीं है। विज्ञापन का डिजाइन तैयार करने वाले कई लोग इस काम में जुटे हुए हैं और उन्हें इस एवज में थोड़ी सी आमदनी भी हो रही है।

रायपुर में बधाई संदेश का डिजाइन तैयार करने का सालाना 15 हजार रूपए का पूरा पैकेज है। इसमें किसी नेता को अपनी पार्टी के बड़े नेताओं-महापुरूषों का जन्मदिन याद रखने की जरूरत नहीं है। डिजाइनर सुबह-सुबह बधाई संदेश वाला विज्ञापन तैयार कर आपको भेज देगा, जिसे आप फेसबुक- ट्विटर और इंस्टाग्राम व वॉटसएप में शेयर कर सकते हैं। रायपुर के कई भाजपा नेता इस तरह की सेवाएं ले रहे हैं। कुछ बड़े नेताओं ने तो अपना फेसबुक और ट्विटर एकाउंट हैंडल करने के लिए कर्मचारी तक नियुक्त कर रखा है।

आरएसी कन्फर्म करने की कोशिश

छत्तीसगढ़ में निगम-मंडलों में मनोनयन से हर कोई खुश हो, ऐसा नहीं है। कुछ लोग मनोनीत होने के बाद भी नाखुश हैं कि उन्हें उनके योगदान या उनके महत्व के मुताबिक कुर्सी नहीं मिली। ऐसे ही एक व्यक्ति ने अभी से एक दूसरी कुर्सी के लिए मुहिम छेड़ दी है, और उसका कहना है कि अभी मिली कुर्सी रेलवे की आरएसी जैसी है, बर्थ मिलने के पहले तक किसी और के साथ मिल-बांटकर बैठने के लिए मिली एक बर्थ। अब यह तो हाथ आ गई है, इसके बाद अब आरएसी को कन्फर्म करने को लेकर कोशिश जारी है।

नई जरूरत, नई फैशन, नई शब्दावली

समय के साथ-साथ भाषा में कुछ नए शब्द भी आ जाते हैं। अभी जिस बड़े पैमाने पर लोगों की जिंदगी में मास्क आ गया है, और पहले से खासकर महिलाएं जिस तरह स्कार्फ का इस्तेमाल करती थीं, तो अब फैशन की एक जरूरत आ गई कि इनको मिलाकर एक बनाया जाए। और जाहिर है कि जब कोई सामान नया बनता है, तो उसका नाम भी नया पड़ सकता है। मास्क और स्कार्फ मिलाकर कुछ ब्रांड मास्कार्फ बनाकर बाजार में उतार चुके हैं और कुछ दूसरी कंपनियों ने माफर््स नाम रखा है। चेहरा भी ढंक जाए, और गला भी।

हिन्दुस्तान में बहुत से फैशन ब्रांड अब मर्दों के शर्ट के साथ मिलते-जुलते या उसी कपड़े के मास्क देने लगे हैं, महिलाओं के कुर्तों के साथ तो मास्क तुरंत इसलिए भी आ गए कि उनमें सिलाई करते समय कतरनें बचती हैं, और कतरनों का इससे बेहतर और कोई इस्तेमाल नहीं हो सकता कि उनके मैचिंग मास्क बना दिए जाएं, और बिक्री बढ़ाने के लिए- मैचिंग मास्क फ्री, जैसा नारा लगा दिया जाए।

पश्चिम में अभी एक नई फैशन ऐसी चली है कि लोग टाई और मास्क एक ही कपड़े का पहनना शुरू कर रहे हैं ताकि अलग-अलग रंग और डिजाइन की मैचिंग का रोज का सरदर्द न रहे। हो सकता है कि इस जोड़े का नाम मास्क और टाई मिलाकर मास्टाई हो जाए, या टाई और मास्क मिलाकर टास्क हो जाए। आज किसी के पास इतना वक्त तो है नहीं कि सारे शब्दों को अलग-अलग लिखें, इसीलिए तो हिन्दुस्तान में एक नया शब्द मोशा शुरू हुआ है। जिन्हें न मालूम हों, उन्हें बता देना ठीक है कि यह मोदी और शाह को मिलाकर बनाया गया है।


09-Aug-2020 5:42 PM 76

सरकारी स्कूली किताब की गलत जानकारी

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग की पांचवीं कक्षा की हिंदी की किताब में हरिवंश राय बच्चन की एक कविता, हार नहीं होती, बड़ी प्रमुखता से छपी है। अब इसके साथ एक छोटी सी दिक्कत यह है कि यह कविता हरिवंश राय बच्चन की लिखी हुई नहीं है और यह एक दूसरे कवि सोहनलाल द्विवेदी की लिखी हुई है। भारतीय हिन्दी साहित्य की एक प्रमुख वेबसाईट कविताकोष में इस कविता के साथ यह साफ किया गया है कि इसे बहुत से लोग हरिवंश राय बच्चन की लिखी मानते हैं, लेकिन उनके बेटे अमिताभ बच्चन ने ही अपनी फेसबुक पोस्ट में यह साफ किया है कि यह कविता सोहनलाल द्विवेदी की है। द्विवेदीजी 1906 से 1988 तक रहे, और उन्होंने खूब साहित्य सृजन किया है। 

अमिताभ बच्चन ने कोई पांच बरस पहले, 4 दिसंबर 2015 को फेसबुक पर यह लिखा था- एक बात आज स्पष्ट हो गई, ये जो कविता है, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, ये कविता बाबूजी की लिखित नहीं है, इसके रचयिता हैं सोहनलाल द्विवेदी। कृपया इस कविता को बाबूजी, डॉ. हरिवंश राय बच्चन के नाम पर न दें, ये उन्होंने नहीं लिखी है। 

कुछ ऐसा ही अमिताभ बच्चन से अभी-अभी तीन दिन पहले हुआ, उन्होंने प्रसून जोशी की लिखी एक कविता अपने पिता के नाम से पोस्ट कर दी थी, और लोगों ने जब उनकी गलती पर टोका, तो फिर अमिताभ ने तुरंत ही इस पर माफी मांग ली। 

उम्मीद पे दुनिया कायम है... 

निगम-मंडलों की एक और सूची जल्द जारी हो सकती है। चर्चा है कि सभी प्रमुख नेता अपने समर्थकों को एडजस्ट कराने में जुटे रहे। सीएम भूपेश बघेल मंत्रियों से अनौपचारिक चर्चा कर उनसे राय ले चुके हैं। इसके अलावा पीसीसी से भी नाम लिए गए हैं। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया सिर्फ नियुक्तियों पर चर्चा के लिए ही आए थे। सुनते हैं कि उन्होंने अपनी तरफ से कुछ नाम जुड़वाए हैं। दूसरी सूची में टीएस सिंहदेव के कुछ और समर्थक जगह पा सकते हैं। हल्ला है कि दूसरे मंत्रियों की तुलना में उन्हें ज्यादा महत्व मिला है। 

पार्टी के एक और बड़े नेता ने तो अपनी तरफ से दो दर्जन से अधिक नामों की लिस्ट सौंपी है। ये अलग बात है कि ज्यादातर नामों को नजर अंदाज कर दिया गया है। पिछले दो दशक से सक्रिय राजनीति से बाहर रहे अरविंद नेताम भी अपने करीबियों को निगम-मंडल में जगह दिलाने के लिए मेहनत करते नजर आए। उनकी पुनिया से एकांत में मंत्रणा भी हुई है। चर्चा है कि दूसरी सूची में दो दर्जन से अधिक नेताओं के नाम होंगे। नए जिले गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के भी कुछ नेताओं को निगम-मंडलों में जगह मिल सकती है। इस बात के संकेत हैं कि सीएसआईडीसी, ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन, मार्कफेड और दुग्ध महासंघ जैसे मलाईदार संस्थानों में फिलहाल नियुक्तियां नहीं होंगी। इन संस्थानों में मरवाही उपचुनाव के बाद नियुक्तियांं होने की बात कही जा रही है।

कोरोना प्रसन्न भये... 

पीएल पुनिया के इस बार के  दौरे में सामाजिक दूरी की जमकर धज्जियां उड़ी। पुनिया वीआईपी रोड स्थित जिस होटल में ठहरे थे वहां रेलमपेल भीड़ रही। कार्यकर्ता पुनिया से मिलकर अपनी दावेदारी पेश करने की कोशिश करते देखे गए। कोरोना के खतरे के बीच कार्यकर्ताओं की भीड़ देखकर पुनिया का मूड बिगड़ गया। कुछ लोगों को उन्होंने फटकार भी लगाई। 

सांसदों की नाराजगी दिल्ली में निकली... 

विष्णुदेव साय की ताजपोशी के बाद भी भाजपा में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के दो सांसदों ने पिछले दिनों दिल्ली में संगठन की कार्यप्रणाली की हाईकमान से शिकायत की है। खास बात यह है कि दोनों ही सांसद पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से अलग-अलग मिले थे। 

एक का दुख यह था कि विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हारे एक नेता ने अपने जिले में पसंद की कार्यकारिणी पर मुहर लगवा ली। सांसद को पूछा तक नहीं गया। दूसरे सांसद की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि उनके जिले में अभी तक अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की गई है। कुछ बड़े नेता पार्टी छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन कोई चर्चा करने वाला नहीं है। उन्होंने इस पूरे मामले में हाईकमान से हस्तक्षेप का आग्रह किया है।

विधानसभा कोरोना रोकने कमर कस रही... 

कोरोना संक्रमण के बीच विधानसभा के मानसून सत्र की व्यवस्था को लेकर माथापच्ची चल रही है। इस सिलसिले में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत सीएम भूपेश बघेल और संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे के साथ बैठक कर चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक से भी पहले उनकी बात हो चुकी है। 

कौशिक जो कि मात्र चार दिन का सत्र रखने पर गुस्साए हुए थे। वे खुद कोरोना की चपेट में आ गए हैं और उनके सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने की संभावना नहीं है। इससे पहले कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू भी संक्रमित हुए थे। रायपुर में कोरोना के तेजी से फैलाव को देखते हुए सामाजिक दूरी का कठोरता से पालन करने का फैसला लिया गया है।

सुनते हैं कि इस बार दर्शक दीर्घा, अध्यक्षीय दीर्घा और पत्रकार दीर्घा पूरी तरह बंद रहेंगे। बैठक व्यवस्था कुछ इस तरह की जा रही है कि सभी सदस्य एक साथ सदन में मौजूद न रहें, यानी प्रश्नकाल में जिस सदस्य का सवाल हो चुका है, वे सदन की कार्रवाई में हिस्सा नहीं लेंगे।  जिनका ध्यानाकर्षण है, या अन्य विषयों पर चर्चा है वे प्रश्नकाल में अनुपस्थित रहेंगे। कुल मिलाकर सदन में सामाजिक दूरी का पालन हो , यह सुनिश्चित करने के लिए दिशा निर्देश जारी किए जाएंगे।  

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08-Aug-2020 7:40 PM 13

लाइन से तबादले...

तेजतर्रार आईपीएस अफसर जितेंद्र शुक्ला की चार महीने में ही बदली हो गई। उनका पन्द्रह महीने में चौथी बार तबादला हुआ है। सबसे पहले सुकमा में एसपी रहते मंत्री कवासी लखमा से विवाद के बाद हटाए गए थे। इसके बाद पीएचक्यू में पोस्टिंग हुई। फिर जल्द ही उन्हें महासमुंद एसपी बनाया गया। महासमुंद में उनके बेहतर काम को देखकर राजनांदगांव एसपी बनाया गया था। यहां भी अच्छा कर रहे थे कि दो टीआई के तबादले को लेकर सत्ताधीशों की नाराजगी मोल ले ली। चर्चा है कि एक टीआई के लिए तो एचएम के यहां से भी सिफारिश आई थी। पर शुक्ला मान नहीं रहे थे। आखिरकार उन्हें ही बदल दिया था। शुक्ला जी के चक्कर में पांच लोगों को इधर से उधर किया गया।

सैमसंग का ऐसा फोन जो बना ही नहीं...

इंटरनेट पर झूठे विज्ञापनों की भरमार रहती है। और जो वेबसाईटें ऐसी झूठी, धोखेबाज चीजों को दिखाने के लिए तैयार रहती हैं, शायद उन्हें इसका भुगतान भी अच्छा मिलता होगा। आप जिस शहर से इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, उस शहर के एक नौजवान की फोटो महंगी विदेशी कार के साथ दिखाई जाएगी जो कह रहा है कि पैसा कमाना मुश्किल भी नहीं है। न वह नौजवान उस शहर का रहता, न उस नाम का कोई उस शहर में रहता, और न ही पैसा कमाने की वह तरकीब सच रहती। वह पैसे लूटने की एक साजिश रहती है, और देश की बड़ी-बड़ी वेबसाईटें खुशी-खुशी ऐसे विज्ञापन दिखाने को तैयार हो जाती हैं। बड़े-बड़े अखबारों और टीवी चैनलों की वेबसाईटों पर ऐसे झांसे सजे रहते हैं, जिनमें शायद गूगल ही उन पर डालता है।

जिस फेसबुक को अपने एल्गोरिद्म पर इतना गर्व है कि वह फेसबुक की किसी तस्वीर से चेहरे पहचानकर उन पर नाम जोडऩे के लिए उकसाते रहता है, उस फेसबुक पर भी फर्जी इश्तहारों की बाढ़ रहती है। अब आज ही सुबह फेसबुक पर यह इश्तहार दिख रहा था जो सैमसंग की अब तक न बनाई हुई एक डिजाइन का फोन दिखाते हुए कह रहा था कि सैमसंग पर भारी बचत, सैमसंग के इन मॉडलों को देखे बिना कोई फोन न खरीदें। और जब इस अनोखी डिजाइन को देखने के लिए इस पर क्लिक किया गया, तो उस पर एलजी कंपनी के तमाम फोन दिखाए जा रहे थे। उस पर सैमसंग का कोई फोन नहीं था, और जो डिजाइन फोटो में दिख रही थी, उस डिजाइन का भी कोई फोन नहीं था। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि फेसबुक के माहिर कम्प्यूटर ऐसे झांसे और धोखाधड़ी वाले इश्तहार पकड़ न सकते हों। लेकिन एक वक्त लोगों को याद होगा जब हिन्दुस्तान की बड़ी लोकप्रिय पत्रिकाओं में भी तांत्रिक अंगूठियों के इश्तहार छपते थे। फेसबुक पर आज भी झांसे चल रहे हैं, बड़े से बड़े अखबार-चैनल की वेबसाइटों पर खुली धोखाधड़ी के इश्तहार चल रहे हैं।


06-Aug-2020 7:09 PM 8

जंगल के बाहर बहुत कम बचे...

सरकार बदलने के बाद ज्यादातर वन अफसरों को मूल विभाग में भेज दिया गया था। दो-तीन अफसर रह गए हैं, जिनकी पोस्टिंग पिछली सरकार ने की थी और मौजूदा सरकार ने उन्हें यथावत रहने दिया। अलबत्ता, वे पहले से ज्यादा पॉवरफुल हो गए हैं। इनमें सीएसआईडीसी के एमडी अरूण प्रसाद भी हैं, जो कि डीएफओ स्तर के अफसर हैं लेकिन उनके पास सीएसआईडीसी के साथ-साथ मंडी बोर्ड के एमडी का भी अतिरिक्त प्रभार है। डीएफओ स्तर के अफसर को इतना अहम दायित्व पहले कभी नहीं मिला था।

हालांकि वन अफसर आलोक कटियार की भी पोस्टिंग पिछली सरकार में हुई थी। मगर वे एडिशनल पीसीसीएफ स्तर के अफसर हैं।  वे प्रधानमंत्री सडक़ योजना के साथ-साथ क्रेडा के सीईओ की भी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। आलोक  कटियार जब हॉर्टिकल्चर मिशन में थे, तब उसके काम की राष्ट्रीय स्तर पर तारीफ हुई थी. जब वे प्रधानमंत्री सडक़ योजना में थे, वहां बहुत अच्छा काम हुआ था. इस बार भी उन्होंने इस दुबारा पोस्टिंग में सडक़-निर्माण तेज कर दिया है, और केंद्र सरकार में उसकी तारीफ हुई है।

सुनते हैं कि सीनियर लेवल पर अफसरों की कमी को देखते हुए कुछेक वन अफसरों की पदस्थापना का सुझाव दिया गया था, लेकिन सीएम ने साफ तौर पर मना कर दिया। उनका मानना था कि प्रदेश में 43 फीसदी वन क्षेत्र हैं, ऐसे में वन अफसरों की ज्यादा जरूरत वन विभाग को है।

कुंभ में बिछुड़े भाई, सोच एक...

हिन्दुस्तान में सदियों से कई ऐसी बातें चली आ रही हैं जिनके बारे में बुजुर्गों का सम्मान करने वाले लोग उन्हें समझदारी की और तजुर्बे की बात कहते हैं। अब ऐसी बातों का चलन यह कहकर भी बढ़ रहा है कि पुराने लोगों को विज्ञान की बहुत समझ थी, और जब उन्होंने ऐसा कहा था, तो जरूर उसके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक तर्क रहा होगा।

सच तो यह है कि वैज्ञानिक तर्क को एक बार छोड़ दिया जाए, तो अंधविश्वास और उसे बढ़ावा देने वाले कहावत-मुहावरे लोगों को वैसे ही बहाकर ले जाते हैं, जिस तरह बाढ़ की तूफानी नदी लकड़ी के मुर्दा टुकड़े को बहाकर ले जाती है।

अभी सोशल मीडिया पर पाकिस्तान से किसी ने वहां के लोगों के बीच मौजूद अंधविश्वास के बारे में लिखा तो लगा कि अरे पाकिस्तान तो हिन्दुस्तान का ही कुंभ के मेले में बिछुड़ा हुआ भाई है, और दोनों की रगों में खून तो एक ही है। उसने पाकिस्तान के अंधविश्वासों के बारे में लिखा- यहां के लोग यह तो नहीं मानेंगे कि कोरोना एक हकीकत है, लेकिन यह जरूर मानेंगे कि खून मीठा होता है, इसलिए मच्छर ज्यादा काटते हैं, यह मानेंगे कि दरख्त के नीचे बैठने से जिन्न और चुड़ैल चिमट जाते हैं, खाली कैंची चलाने से घर में लड़ाईयां होती हैं, हिचक आ रही हो तो उसका मतलब है कि कोई याद कर रहे होंगे।

अब अभी 70-75 बरस ही हुए हैं अलग हुए, दोनों के अंधविश्वास तो एक ही किस्म के होंगे। हिन्दुस्तान में भी सुबह और रात में पैदल घूमने निकले लोगों को देखें तो यही लगता है कि वे कोरोना को एक कल्पना की बात मानकर चल रहे हैं, और अपने आपको गोदरेज कंपनी की बनाई गई तिजोरी मान रहे हैं कि जिसे कोरोना तोड़ नहीं सकेगा। लेकिन अंधविश्वास के मामले में हिन्दुस्तानी पाकिस्तानियों से कहीं पीछे नहीं हैं। अब और किसी वैज्ञानिक वजह से न सही, कम से कम इसलिए हिन्दुस्तानियों को अंधविश्वास छोड़ देना चाहिए कि इस वजह से लोग पाकिस्तानियों से उनकी तुलना करते हैं।


05-Aug-2020 6:44 PM 40

कौशल्या मंदिर तालाब एक नहीं छह

आज जब अयोध्या में राम मंदिर का भूमिपूजन हुआ है, तब लोगों को छत्तीसगढ़ में भी राम से जुड़ी कई बातें याद आईं। रायपुर के एक फोटोग्राफर नरेन्द्र बंगाले ने शहर से लगे हुए आरंग विधानसभा क्षेत्र के चंदखुरी गांव के कौशल्या मंदिर की यह फोटो भेजी है जो उन्होंने 2013 में शायद किसी हेलीकाप्टर से ली थी। इन सात बरसों में वहां आसपास कुछ निर्माण चाहे हो गए हों, लेकिन मोटेतौर पर कौशल्या मंदिर का यह तालाब आज भी चारों तरफ से खुला हुआ है। तालाब के बीच एक टापू पर मंदिर है, और वहां तक जाने के लिए एक पुल बना हुआ है। लेकिन ध्यान से देखें तो एक दिलचस्प बात यह है कि एक बड़े तालाब के इर्द-गिर्द पांच और तालाब बिल्कुल लगे हुए हैं, और खूब हरियाली है, चारों तरफ पेड़ हैं। इस जगह पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अभी कुछ दिन पहले ही पूजा की है, और इस पूरे मंदिर-तालाब के विकास की एक बड़ी योजना घोषित की है। ऐसी कोई भी योजना इन आधा दर्जन तालाबों की खूबसूरती को बरकरार रखने वाली होनी चाहिए।

एमएमआई दिग्गज सेठों का अखाड़ा...

रायपुर के बड़े अस्पतालों में से एक एमएमआई अस्पताल ट्रस्ट में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। शहर के बड़े धन्ना सेठों के दबदबे वाले इस ट्रस्ट में सरकारी-अदालती आदेश के बाद किसी तरह चुनाव हुए और लूनकरण जैन-महेन्द्र धाड़ीवाल के गुट ने ट्रस्ट पर कब्जा कर लिया। हालांकि चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ सुरेश गोयल का धड़ा हाईकोर्ट गया है।

एमएमआई अस्पताल की स्थापना और ऊंचाईयों तक पहुंचाने के योगदान को लेकर दोनों धड़ों के अपने-अपने दावे हैं। यह भी प्रचारित हो रहा है कि ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों ने शहर में बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने अपना काफी कुछ न्यौछावर किया था। इस अस्पताल का नाम एमएमआई रखने के पीछे जाहिर तौर पर वजह थी इसके प्रमुख संस्थापक महेंद्र धाडीवाल की कपडा-फर्म  का नाम एम एम धाडीवाल होना. कपड़ा बाजार में इस फर्म  को एमएम नाम से ही बुलाया जाता था।

 ट्रस्ट के 11 संस्थापक सदस्यों ने अस्पताल की स्थापना वर्ष-1991-92 में कुल पौने दो लाख रूपए की पूंजी लगाई।  बाद में अस्पताल के निर्माण के लिए 6 करोड़ रूपए ऋण लिए गए। यही नहीं, शहर के अनेक दानदाताओं ने उदारतापूर्वक सहयोग किया। तब कहीं जाकर अस्पताल अस्तित्व में आया।

शुरूआत में तो सबकुछ ठीक ठाक चलते रहा और फिर धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति चरमराने लगी। लोन नहीं अदा किया जा सका और फिर एनपीए हो गया। बाद में वन टाइम सेटलमेंट के बाद तीन करोड़ रूपए भुगतान कर अस्पताल को कर्ज मुक्त कराया गया। कुछ लोगों का दावा है कि अस्पताल का ऋण चुकाने में सुरेश गोयल की अहम भूमिका रही है। मगर महेन्द्र धाड़ीवाल से जुड़े लोग इसको नकारते हैं। गोयल वर्ष-2007 से अध्यक्ष रहे। अस्पताल चलाना काफी खर्चीला हो रहा था, तब पूरा नियंत्रण बैंग्लोर के एक बड़े अस्पताल ग्रुप को दे दिया गया। तब से अब तक यह ग्रुप अस्पताल संचालन कर रहा है। ट्रस्ट का हस्तक्षेप सिर्फ इतना ही रहता है कि कुछ रोगियों को इलाज में छूट दिला सकता है। साथ ही ट्रस्ट के संचालन के लिए मुनाफे में से कुल ढाई फीसदी की राशि मिलती है।

अस्पताल का संचालन बैंग्लोर के ग्रुप को देने के बाद ट्रस्ट में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई और सुरेश गोयल विरोधी खेमा उन्हें हटाने की कोशिश में जुट गया । पहले 11 सदस्यों के अलावा कई नए सदस्य बनाए गए थे। सुरेश गोयल का खेमा चाहता था कि नए सदस्यों को भी मतदान का अधिकार दिया जाए। मगर विरोधी खेमा इसके पक्ष में नहीं था। बाद में रजिस्ट्रार फर्म एण्ड सोसायटी के नियमों के अनुसार हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रमुख सचिव मनोज पिंगुआ ने सुनवाई की और संस्थापक सदस्यों को ही वोट के अधिकार दिए गए। अब संस्थापक सदस्यों में से ज्यादातर महेन्द्र धाड़ीवाल के साथ थे, लिहाजा उनके खेमे की जीत हो गई। अब सुरेश गोयल के खेमे ने चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ हाईकोर्ट याचिका दायर की है। कोर्ट का आदेश चाहे कुछ भी हो, लेकिन धन्ना सेठों के आपसी झगड़े से अस्पताल की प्रतिष्ठा पर आंच आई है, धन्ना सेठों की साख पर आंच आयी या नहीं पता नहीं।

 

 


04-Aug-2020 6:59 PM 12

चारों तरफ राम-नाम!

छत्तीसगढ़ सरकार पिछले एक हफ्ते में जिस रफ्तार से राम के रास्ते चल रही है, उससे अयोध्या में मोदी और योगी सरकारें भी पिछड़ती हुई दिख रही हैं। मोदी-योगी को रामजन्म पर मंदिर का भूमिपूजन करने जा रहे हैं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सपत्नीक चंदखुरी में माता कौशल्या के मंदिर का भव्य कायाकल्प करने की पूजा की। अब बाकी देश रामजन्म तक पहुंचा है, छत्तीसगढ़ सरकार कौशल्या की स्मृति को स्थापित कर रही है। आज भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ में रामकथा की जगहों की शिनाख्त पोस्ट की है कि कहां-कहां राम वनपथ गमन विकसित होने जा रहा है।

ऐसे में राजभवन के सचिव, राज्य के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा पर दोहरी जिम्मेदारी आ जाती है। वे केन्द्र सरकार द्वारा मनोनीत और भाजपा से आई हुई राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके के सचिव भी हैं, और राज्य सरकार के भी। ऐसे में आज दोपहर उन्होंने अपनी कई तस्वीरें पोस्ट की हैं जिनमें वे पत्तियों पर शायद केसर-चंदन से राम-राम लिखकर, समारोह के लायक कपड़ों में सजकर बैठे हैं। जब केन्द्र सरकार और राज्य सरकार दोनों ही अलग-अलग राम और राम की मां की पूजा में जुटी हुई हैं, तो इन दोनों सरकारों की मिलीजुली सेवा कर रहे सोनमणि बोरा भी राम-नाम लिखने में लगे हैं।

फेसबुक पर परसेप्शन मैनेजमेंट

सोशल मीडिया बड़ा दिलचस्प मेला रहता है। कोई वहां डमरू बजाते रहता है, तो कोई कांटों पर सोया हुआ कुछ सिक्कों की उम्मीद करता हुआ। कुंभ के मेले में जितनी वेरायटी रहती है, कुछ वैसी ही फेसबुक पर देखने मिलती है। यहां पर तकरीबन सब कुछ सामने रहता है, लेकिन फिर भी लोग यहां परसेप्शन मैनेजमेंट का मौका निकाल ही लेते हैं।

अभी एक औसत दर्जे का कार्टूनिस्ट फेसबुक पर दिखा, लेकिन उसके कार्टून पर होने वाले कमेंट दो-दो मीटर लंबे चल रहे थे। सैकड़ों कमेंट देखकर हैरानी हुई कि ऐसे कार्टून पर इतने कमेंट! फिर ध्यान से देखना शुरू किया तो समझ आया कि एक कमेंट के नीचे उस कमेंट पर तरह-तरह के हॅंसने, लोटपोट होने के दर्जनों इमोजी खुद कार्टूनिस्ट ने पोस्ट किए थे। खुद ही का कार्टून, और खुद ही उस पर लोटपोट हो रहा! फिर यह लोटपोट होने के लिए अलग-अलग कई किस्म के हिलने-डुलने वाले, फर्श पर गिरकर लोटपोट होने वाले इमोजी! तरकीब अच्छी है, पहली नजर में लोगों को यह झांसा हो सकता है कि कार्टून पर सैकड़ों लोग लोटपोट हो रहे हैं, बाद में बारीकी से कोई देखे तो समझ आएगा  कि दो-चार लोग मुस्कुराए भर हैं, और उस पर लोटपोट कार्टूनिस्ट खुद ही हो रहा है। लोगों का हौसला भी गजब का है!


03-Aug-2020 6:18 PM 57

कोरोना को दुहने वाले

खबर है कि सरकार निजी अस्पतालों को कोरोना के इलाज के लिए  फीस निर्धारित कर पाने में विफल रही है। स्वास्थ्य विभाग चाहता था कि कोरोना के इलाज के लिए ज्यादा फीस न हो, इसके लिए अस्पताल प्रबंधनों से चर्चा भी हुई थी, लेकिन बात नहीं बन पाई। हाल यह है कि निजी अस्पताल एक दिन के इलाज के नाम पर प्रति मरीज 25 हजार रूपए तक वसूल रहे हैं।

दूसरी तरफ, एम्स जैसे संस्थान में बिना कोई शुल्क लिए कोरोना मरीजों का बेहतर इलाज हो रहा है। बाकी सरकारी अस्पतालों में भी मुफ्त इलाज हो रहा है। एम्स में भर्ती एक मरीज ने नर्सिंग स्टॉफ की तारीफ करते हुए  बताया कि सेवाभावी छोटे कर्मचारियों को वे अपनी तरफ से कुछ राशि देना चाह रहे थे, लेकिन उन्होंने लेने से साफ तौर पर मना कर दिया। हाल यह है कि एम्स के कोरोना वार्ड भर चुके हैं। बावजूद मरीजों को और भर्ती करने के लिए प्रबंधन पर काफी दबाव रहता है। प्रदेश और देश के बड़े नेताओं के फोन घनघनाते रहते हैं। इससे प्रबंधन के लोग काफी परेशान देखे जा सकते हैं। 

बैस की हसरत बाकी ही है

भाजपाध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद विक्रम उसेंडी की नाराजगी दूर करने की कोशिश हो रही है। उसेंडी की पसंद पर उनके गृह जिले कांकेर में सतीश लाठिया को अध्यक्ष बनाया गया। दिलचस्प बात यह है कि उसेंडी खुद प्रदेश अध्यक्ष रहते अपनी पसंद का अध्यक्ष नहीं बनवा पा रहे थे। उनके करीबी सतीश लाठिया का विरोध इतना ज्यादा था कि जिलाध्यक्ष के चुनाव को ही टालना पड़ा। लाठिया की नियुक्ति को उसेंडी को खुश करने की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है।

भाजपा के संगठन में हावी बड़े नेता अपने जिलेों में अपनी पसंद का अध्यक्ष बनवाने में कामयाब रहे हैं। जशपुर जिले में प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय की अनुशंसा पर रोहित साय की नियुक्ति की गई। गौरीशंकर अग्रवाल की पसंद पर बलौदाबाजार जिले में सनम जांगड़े की नियुक्ति की गई थी। ऐसे में अब दुर्ग और भिलाई जिलाध्यक्ष पद पर सुश्री सरोज पाण्डेय की पसंद को महत्व मिलने के आसार हैं।

रायपुर शहर और ग्रामीण अध्यक्ष पद के लिए सबसे ज्यादा किचकिच हो रही है। यहां सांसद सुनील सोनी, बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत की अपनी-अपनी पसंद है। यही नहीं, त्रिपुरा के राज्यपाल रमेश बैस भी दिलचस्पी ले रहे हैं। बैसजी चाहते हैं कि कम से कम ग्रामीण अध्यक्ष पद पर उनकी पसंद को महत्व मिले। संगठन के कर्ता-धर्ता उनकी राय को नजरअंदाज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। भाजपा के एक नेता ने कहा, बैसजी की हसरत का कोई अंत नहीं है. और सारी हसरतें कुनबे के लिए हैं।

यह पुलिस की समझदारी नहीं है...

राखी के मौके पर छत्तीसगढ़ के कम से कम एक जिले राजनांदगांव की सडक़ों पर महिला पुलिस अधिकारी या कर्मचारी उन लोगों को राखी बांधते नजर आईं जो मास्क लगाए बिना सडक़ों पर थे। यह मामला कुछ गड़बड़ था। राखी का रिवाज तो बांधने वाली की अपनी हिफाजत के लिए रहता है कि बंधवाने वाला उसकी रक्षा करेगा। अब यहां जिसने खुद ही मास्क नहीं पहना है, वो खुद लापरवाह है, खतरे में है, वह भला राखी बांधने वाली की क्या हिफाजत करेगा?

यह बात एक दूसरे पैमाने पर भी गलत है कि कोई सामाजिक संदेश देने के लिए सरकारी कर्मचारियों का ऐसा इस्तेमाल किया जाए जो उन्हें खतरे में डाले। डब्ल्यूएचओ और भारत सरकार सहित दर्जनों संस्थाएं ऐसे चार्ट ट्वीट कर रही हैं कि एक व्यक्ति मास्क लगाए, और एक न लगाए, तो उन दोनों के बीच संक्रमण का खतरा कितना है। पुलिस कर्मचारियों को ऐसे संक्रमण के खतरे में डालना किसी तरह ठीक नहीं है। पुलिस छत्तीसगढ़ में अतिउत्साह में ऐसे बहुत से काम कर रही है। कुछ हफ्ते पहले हमने बस्तर में नक्सल मोर्चे पर 7 महीने के गर्भ वाली सुरक्षा कर्मचारी के बंदूक लिए जंगलों में ड्यूटी करने की ‘बहादुरी की कहानियों’ के खिलाफ लिखा था कि यह पुलिस के बड़े अफसरों की गलती है। अब राजनांदगांव, या कुछ और जिलों में भी अगर पुलिस ने ऐसा किया है, तो यह निहायत गलत बात है कि गैर जिम्मेदार लोगों को दो फीट की दूरी से राखी बांधना, और अपने को खतरे में डालना पुलिस का समझदारी का काम नहीं है। पुलिस की नीयत अच्छी हो सकती है, उसकी पहल तारीफ के लायक है, लेकिन यह काम नासमझी और गैरजिम्मेदारी का है।


02-Aug-2020 6:06 PM 9

एक पॉजिटिव, तो सोच नेगेटिव...

उद्योग विभाग के एक अफसर परिवार समेत कोरोना के चपेट में आ गए हैं। अफसर का दफ्तर तो शहर में ही है। जिस कॉम्पलेक्स में अफसर का दफ्तर है, वहां कई और सरकारी निगमों के दफ्तर भी हैं। लॉकडाउन के चलते बाकी दफ्तर तो बंद है, लेकिन कॉम्पलेक्स में निगमों के एक-दो दफ्तरों में काम चल रहा था। यहां एसीएस और प्रमुख सचिव स्तर के अफसरों का आना-जाना लगा रहता है। शहर के भीतर सरकारी कामकाज के लिए यहां का दफ्तर उपयुक्त है।

एक प्रमुख सचिव ने तो अस्थाई तौर पर एमडी के कक्ष में बैठकर फाइलें निपटाना भी शुरू कर दिया था। अब उद्योग अफसर और परिवार के कोरोनाग्रस्त होने की खबर आई, तो पूरे कॉम्पलेक्स में हडक़ंप मचा हुआ है। उद्योग अफसर भी काफी सक्रिय रहे हैं और लगातार बैठकों में उपस्थित रहते थे। अब जब उनके कोरोनाग्रस्त होने की खबर आई है, तो कुछ चिंतित अफसर अपना कोरोना टेस्ट कराने की सोच रहे हैं। फिलहाल तो दफ्तर आना छोड़ घर से काम निपटा रहे हैं।

इन्हें भजिये की तरह तला जा सके

चार दिन पहले छत्तीसगढ़ में वॉट्सऐप पर एक वीडियो तेजी से फैला जिसमें किसी एक अस्पताल-वार्ड में लेटे, खड़े, और घूमते हुए लोग दिख रहे थे जिनके पास शिकायतें ही शिकायतें थीं। जाहिर तौर पर वे कोरोना पॉजिटिव लोग दिख रहे थे, लेकिन उनमें कोई गंभीर मरीज नहीं थे, सारे पुरूष थे। इस वीडियो को यह लिखकर चारों तरफ फैलाया गया कि यह एम्स रायपुर का वीडियो है और वहां की यह बदहाली है। दो दिन के भीतर ही एम्स ने इस वायरल किए गए वीडियो को अपने अस्पताल का न होना बताया, और इससे एम्स का नाम जोडऩा एक फर्जी काम कहा। वैसे भी समझदार लोग इस वार्ड की हालत देखकर समझ सकते थे कि यह एम्स का नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि वॉट्सऐप कारोबार में समझदारी का चलन थोड़ा कम है, और लोग घटिया से घटिया अफवाह को तेजी से फैलाने का काम करते हैं। ऐसे में एम्स को बदनाम करना छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए एक किस्म से नमकहरामी भी है। इसके इंतजाम से इस राज्य में कोरोना की मौतें होना शुरू नहीं हुआ, और जिसने राज्य सरकार का इंतजाम हो जाने तक जांच से लेकर इलाज तक का, और राज्य के स्वास्थ्य अधिकारियों, कर्मचारियों, और डॉक्टरों के प्रशिक्षण तक का जिम्मा अकेले उठाया, उसे गैरजिम्मेदारी से बदनाम तो कोई नमकहराम ही कर सकते हैं। एम्स ने ट्वीट करके इस वीडियो के साथ अपना नाम जोडऩा फर्जीवाड़ा कहा, लेकिन एम्स के ट्वीट की बहुत छोटी सी पहुंच है, उसके नाम पर फैलाए गए फर्जी वीडियो की पहुंच उससे लाखों गुना हो चुकी होगी, लेकिन यह अकेले एम्स का मामला नहीं है, यह तो वॉट्सऐप पर फैलने वाली हर अफवाह का मामला है कि सच जब तक जूते के फीते बांध पाता है, तब तक झूठ पूरे शहर का फेरा लगा आता है। खैर, सुना है कि नर्क और दोजख में एक कढ़ाही में गर्म तेल ऐसे ही नमकहराम लोगों के लिए खौलाते हुए रखा जाता है ताकि इनके वहां पहुंचते ही इन्हें भजिये की तरह तला जा सके।


01-Aug-2020 7:15 PM 7

मास्क न पहनना भारी पड़ा

प्रदेश में कोरोना तेजी से पांव पसार रहा है। पुलिस मास्क नहीं पहनने पर सख्ती दिखा रही है, लेकिन कई पढ़े-लिखे लोग भी कोरोना संक्रमण से सुरक्षा को लेकर बेपरवाह दिख रहे हैं। ऐसे ही बिना मास्क के मुलाकात करने आए एक उद्योगपति को केन्द्रीय कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी की फटकार भी सहनी पड़ी।

हुआ यूं कि नया रायपुर के एक बड़े होटल में केन्द्रीय कोयला मंत्री, उद्योगपतियों से रूबरू हुए और उनकी समस्याओं का मौके पर ही निराकरण कर रहे थे। इसी बीच सिलतरा के एक उद्योगपति बिना मास्क लगाए ज्ञापन देने के लिए स्टेज पर चढ़ गए। उन्हें अपने करीब आता देख जोशी भडक़ गए और उन्हें तुरंत मंच से नीचे उतर जाने कहा। मास्क नहीं लगाने पर जमकर खरी-खोटी भी सुनाई। जोशी इतने नाराज थे कि उद्योगपति की बात भी नहीं सुनी।

सुनील सोनी मददगार

प्रदेश भाजपा के बड़े नेताओं को उम्मीद थी कि प्रहलाद जोशी राज्य सरकार के खिलाफ कुछ कहेंगे। एक दिन पहले जोशी को पार्टी की तरफ से कुछ फीडबैक भी दिया गया था। मगर जोशी ने सरकार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा बल्कि सीएम के साथ अपनी बैठक को सकारात्मक करार दिया। प्रहलाद जोशी के दौरे का विशेषकर राज्य के उद्योगपति काफी समय से इंतजार कर रहे थे। जोशी पूरे कोयला मंत्रालय को लेकर यहां आए थे और उनकी ज्यादातर समस्याओं का मौके पर ही निराकरण किया।

केन्द्रीय कोयला मंत्री ने सांसद सुनील सोनी को खास महत्व दिया।  सोनी सभी बैठकों में जोशी के साथ रहे। जोशी ने उद्योगपतियों को यहां तक कहा कि यदि कोई बात हो, तो वे सुनील सोनी को बता सकते हैं, सोनीजी उनके संपर्क में रहते हैं। भाजपा के एक सीनियर विधायक ने भी प्रहलाद जोशी को कोयले से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा की तो उन्हें भी इसी तरह का जवाब मिला। कुल मिलाकर यह नजर आया कि कोयला मंत्रालय से जुड़ी समस्याओं के निराकरण में सुनील सोनी मददगार हो सकते हैं।

चाय पीकर निकल गए

भाजपा के एक नेता को पार्टी के लोग आपसी चर्चा में नारद कहकर पुकारते हैं। वैसे तो नेताजी संगठन में हावी नेताओं के बेहद करीबी हैं, लेकिन वे पार्टी के भीतर हाशिए पर चल रहे नेताओं के बंगले में भी अक्सर आते-जाते रहते हैं। एक-दूसरे के बंगले की गतिविधियों को शेयर भी करते हैं। नेताजी(नारद) पिछले दिनों पार्टी के एक सीनियर आदिवासी नेता का हाल जानने उनके घर पहुंचे।

आदिवासी नेता ने नारद को देखकर बुरा सा मुंह बनाया लेकिन शिष्टाचारवश उन्हें बैठने के लिए कहा। नारद ने जैसे ही प्रदेश में पार्टी के दो सबसे बड़े नेताओं का नाम लेकर संगठन की गतिविधियों पर बातचीत शुरू ही की थी कि आदिवासी नेता बुरी तरह भडक़ गए और दोनों बड़े नेताओं का नाम लेकर गालियों की बौछार शुरू कर दी। आदिवासी नेता ने यहां तक कह दिया  कि पार्टी की दुर्दशा के लिए दोनों ही जिम्मेदार हैं। आदिवासी नेता के तेवर इतने गरम थे कि नारद चुप रहे और किसी तरह चाय पीकर निकल गए।


31-Jul-2020 6:28 PM 40

बधाई इतनी भारी पड़ी !

भाजपा की दो महिला नेत्री शैलेंद्री परगनिया और मीनल चौबे, राज्य महिला आयोग की नवनियुक्त अध्यक्ष किरणमयी नायक को बधाई देकर फंस गई हैं। भाजपा के वॉटसएप ग्रुप में इसकी कड़ी आलोचना हो रही है। एक भाजपा नेता ने मैसेज पोस्ट किया कि किरणमयी नायक ने भाजपा के नेताओं के खिलाफ रात के 1 बजे तक लिखित शिकायत की थी। हाईकोर्ट में भाजपा नेताओं के खिलाफ भी याचिका लगाई है। ऐसी महिला के सम्मान के लिए पार्टी की महिला मोर्चा के पदाधिकारियों को जाना कहां तक उचित है।

इस नेता ने तो शैलेंद्री और मीनल के खिलाफ कार्रवाई तक की मांग कर दी है। दोनों महिला पदाधिकारियों को नई कार्यकारिणी में भी जगह मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। मीनल का नाम तो नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के लिए भी प्रमुखता से उभरा है। पूर्व मंत्री राजेश मूणत इसके लिए अड़े हैं, मगर सुनील सोनी इससे सहमत नहीं है। कुल मिलाकर दोनों बड़े नेताओं के बीच टकराव के कारण नेता प्रतिपक्ष नियुक्ति नहीं हो पा रही है। अब मीनल के किरणमयी को बधाई देने पर जिस तरह पार्टी नेताओं की भृकुटी तनी है, उससे मीनल के नेता प्रतिपक्ष बनने का दावा कमजोर होता दिख रहा है।

क्रिकेट से नोट तक, लार वालों के लिए...

वैसे तो कोरोना से जुड़ी हुई कोई भी और बात लिखने का अब दिल नहीं करता, लेकिन लोगों की जान बचाने के लिए फिर भी कुछ लिखना जरूरी लगता है। जिन लोगों को दिन भर नोट गिनने की जरूरत पड़ती है, और जिनके पास इतने भी नोट नहीं रहते कि मशीन लगा लें, वे लोग आमतौर पर थूक से काम चलाते हैं। जो लोग अधिक आधुनिक हो गए हैं वे लोग प्लास्टिक की एक डिब्बी में स्पंज का एक टुकड़ा रखते हैं, और उसमें पानी रखकर गीले स्पंज पर उंगलियां नम करके उससे नोट गिनते हैं।

अब आज कोरोना के खतरे में इन दोनों में से कौन सा तरीका अधिक खतरनाक है, यह समझना मुश्किल है। कोई दुकानदार अपने नोटों को बैंक ले जाने के पहले थूक लगाकर गिने, और बैंक में कोई उसे थूक लगाकर गिने, तो दूरदर्शन के एक मशहूर गाने की तरह, मिले थूक मेरा तुम्हारा..., जैसा हो जाएगा। खैर, बैंक में तो अब मशीन से नोट गिनते हैं, लेकिन मशीनविहीन छोटे लोग अब भी हाथों से गिनते हैं, अब भी बहुत से लोग थूक लगाते हैं, या फिर डिब्बी का स्पंज टेबिल के चारों तरफ बैठे कोई भी लोग इस्तेमाल करते हैं। कोरोना को यह नजारा बहुत सुहाता है।

लेकिन खबरों में ये छोटी-छोटी बातें नहीं आतीं, और बड़ी-बड़ी खबरों में भी केवल क्रिकेट गेंदबाज का थूक आता है कि लार लगाए बिना गेंद कैसे की जाए? गेंदबाजों की लार से खबरें ऐसी गीली हैं कि अखबारों के पन्ने गीले हो जाएं, या टीवी पर खेल की खबरें देखते हुए मॉनीटर से लार टपकने लगे। जो भी हो लोगों को अपनी लार काबू में रखनी चाहिए क्योंकि अब तक तो लापरवाह लार लोगों के कपड़े ही गीले कर सकती थी, अब तो वह जान ले सकती है। इसलिए किताबें पढ़ते हुए या अखबार के पन्ने पलटते हुए अपनी लार पर काबू रखें, क्योंकि हो सकता है जरा ही देर पहले किसी और ने ही उसे पलटा हो या जरा देर बाद कोई और उन्हें पलटे। ऐसे में साथ पढ़ेंगे साथ मरेंगे जैसा साथ ठीक नहीं है।

सुरक्षा इंतजाम और आशंका

सत्ता या विपक्ष के बड़े नेता जिन्हें उनके सुरक्षा दर्जे की वजह से बहुत से सिपाहियों और जवानों के घेरे में रहना पड़ता है, वे एक अलग किस्म के तनाव से गुजर रहे हैं। रोज अखबारों में देखते हैं कि किस थाने या बटालियन के, किस सुरक्षा बल के जवान कोरोना पॉजिटिव निकले हैं, और उन जगहों के दूसरे लोग उनके साथ तो तैनात नहीं हैं?

इसी तरह ये सुरक्षा कर्मचारी भी लगातार तनाव में रहते हैं, और रोज खबरों में देखते हैं कि कौन-कौन से नेता कोरोना पॉजिटिव निकले हैं, और अपने ऊपर मंडराते खतरे को लेकर सहमे रहते हैं।

सुरक्षा इंतजाम परस्पर विश्वास पर भी टिका होता है, और आज कोरोना ने लोगों के मन में एक-दूसरे के लिए खासा शक पैदा कर दिया है कि कहीं दूसरे लोग कोरोना पॉजिटिव न हों। खासकर एक वजह से यह शक बढ़ते चल रहा है कि हिन्दुस्तान में एक बड़ी आबादी कोरोना पॉजिटिव होकर उससे उबर भी जा रही है, और उनमें से किसी तरह के लक्षण नहीं दिखते, इसलिए जांच भी नहीं होती। अगर जांच हुई होती, तो आसपास के लोग सावधान भी हुए होते, लेकिन न जांच न आसपास के लोगों के सावधान होने की कोई जरूरत। यह समझने की जरूरत है कि आप उतने ही सुरक्षित हैं जितने आपके आसपास के लोग सुरक्षित हैं। इसलिए महज अपना खयाल रखना काफी नहीं है, आसपास सबको चौकन्ना रखना जरूरी है।


30-Jul-2020 6:59 PM 13

नेताजी भांजा न बचा पा रहे..

पिछली सरकार में एक संस्थान के मुखिया रहे नेता के भांजे को कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस पकडक़र ले गई। नेताजी ने भांजे को हिरासत से बचाने की भरपूर कोशिश की और भाजपा के बड़े नेताओं से मदद भी मांगी। किंतु कुछ नहीं हुआ।

सुनते हैं कि नेताजी के भांजे का हवाला का कारोबार है। एक व्यापारी जो कि चीन से सामान मंगाते हैं, उन्होंने कुछ भुगतान हवाला के जरिए किया था। हाल के दिनों में चीन के साथ संबंध तनावपूर्ण हैं। ऐसे में चीन से आयातित सामानों की काफी जांच-पड़ताल हो रही है। अब जांच का दायरा बढ़ गया है, तो नेताजी के भांजे भी हत्थे चढ़ गए। नेताजी को दुख इस बात का है कि पार्टी के लोग भी मुसीबत में साथ नहीं दे रहे और छिटक गए हैं।

कुछ तेज संसदीय सचिव

सरकार ने संसदीय सचिवों की नियुक्ति तो कर दी है। मगर ज्यादातर को अपने विभाग के प्रमुख अफसरों से मेल-मुलाकात का मौका तक नहीं मिल पाया है। दो संसदीय सचिव काफी तेज निकले। आदिवासी इलाके के एक संसदीय सचिव ने तो लॉकडाउन के बीच एक निगम के दफ्तर में अपने लिए कमरा तैयार करवा लिया है।

लॉकडाउन के चलते मंत्रालय-सचिवालय और निगम के दफ्तर भले ही बंद हैं, लेकिन संसदीय सचिव नियमित अपने कक्ष में बैठते हैं। वे अफसरों की मीटिंग भी लेते हैं। संसदीय सचिव राजनीति में आने से पहले ठेकेदार थे। वे निर्माण कार्यों की बारीकियों से परिचित हैं। भले ही संसदीय सचिवों को फाइल पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं है, लेकिन उनके विभाग के मंत्री ने उन्हें फ्री हैंड दे रखा है। यही वजह है कि अनिच्छा के बावजूद अफसरों को संसदीय सचिव को फाइल का अवलोकन कराना पड़ रहा है।

दूसरे संसदीय सचिव को तो राज्य बनने के बाद से पिछली और वर्तमान सरकार में नियुक्त सभी संसदीय सचिवों से ज्यादा तेज माना जा रहा है। उनका रूतबा ऐसा है कि पहले दिन ही विभाग के सीनियर अफसर उनके आगे-पीछे होते देखे गए। संसदीय सचिव की सक्रियता से मंत्री के स्टाफ के लोग असहज दिख रहे हैं।


29-Jul-2020 6:44 PM 9

अध्यक्ष के क्वारंटीन पर जाने से...

मोहन मरकाम होम क्वारेंटीन पर हैं। उन्हें 14 दिन मुलाकातियों से दूर रहना पड़ेगा। मरकाम के क्वारेंटीन पर रहने से कांग्रेस के वे नेता टेंशन में है, जो कि निगम मंडलों की दौड़ में थे। उनकी गैरमौजूदगी में  नाम तय करने के लिए बैठक होने की संभावना कम है। वैसे एक बैठक हो चुकी है। इसमें कुछ नाम तय भी किए गए हैं। बाकी नाम तय होने के बाद वे सूची लेकर दिल्ली जाने वाले थे, लेकिन अब नहीं जा पाएंगे।  प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया का भी दौरा कुछ समय के लिए टल गया है। ऐसे में निगम मंडलों की दूसरी सूची जारी होने में विलंब हो सकता है। ऐसे में पिछले 18 महीने से निगम मंडलों में जगह पाने की उम्मीद पाले नेताओं में मायूसी स्वाभाविक है। 

महासमुंद पुलिस की मेहनत

छत्तीसगढ़ का ओडिशा के रास्ते गांजा आने-जाने का पता नहीं क्या चक्कर है कि आए दिन महासमुंद जिले में गाड़ी घुसते ही पकड़ में आ जाती है। ओडिशा सरहद का यह जिला कभी उस रास्ते कार में छुपाकर लाई गई दसियों लाख की नगदी जब्त करता है, तो कभी मिनी ट्रक भरकर गांजा। अभी नकली नोट छापने या चलाने वालों को जिस तरह से महासमुंद पुलिस ने गिरफ्तार किया है, और 21 लाख रूपए के नकली नोट बरामद किए हैं, वह भी एक बड़ा भांडाफोड़ रहा। पहली बार एसपी बने प्रफुल्ल ठाकुर जिला मिलने के बाद खासी मेहनत करते दिख रहे हैं।

गांजे का इतिहास हजारों बरस पुराना

लेकिन गांजा एक दिलचस्प चीज है। कुछ बरस पहले तक गांजा कानूनी था, और आबकारी विभाग दारू की दुकानों की तरह गांजा-भांग की दुकानें भी नीलाम करता था। बाद में गांजा गैरकानूनी कर दिया गया तो बिक्री बंद हो गई, लेकिन हिन्दुस्तान में सदियों से चली आ रही गांजे की परंपरा कानून की वजह से खत्म नहीं हो पाई है। यहां तो मंदिरों में साधुओं के अलावा आम लोग भी बैठकर चिलम भरकर गांजा पी लेते हैं, और इसे धार्मिक रिवाज से जोड़ दिया गया है, सन्यास से जोड़ दिया गया है। अब इतना गांजा कहां से आता है, कहां जाता है, और इतने थोक में पकड़ाने के बाद गिरफ्तारियों और गाडिय़ां जब्त होने के बाद भी यह धड़ल्ले से कैसे चल रहा है, यह हैरानी की बात है। क्या इतनी गिरफ्तारियां भी इस धंधे में लगे लोगों के मुकाबले बहुत कम हैं?  

 


28-Jul-2020 5:59 PM 7

एम्स में इलाज के लिए केन्द्रीय मंत्री का फोन

रायपुर में एकाएक कोरोना का प्रकोप बढ़ गया है। एम्स और अंबेडकर अस्पताल तकरीबन फुल हो गए हैं। ज्यादातर मरीज एम्स में ही भर्ती होना चाहते हैं। इसके चलते प्रबंधन पर काफी दबाव रहता है। ऐसे ही एक हाई प्रोफाइल संत-परिवार के पांच सदस्य कोरोना के चपेट में आ गए हैं। स्वास्थ्य विभाग ने सभी को अंबेडकर अस्पताल ले जाने की तैयारी कर ली थी। मगर संत-परिवार के लोग नहीं माने।

ये एम्स छोडक़र कहीं और नहीं जाना चाहते थे। एम्स प्रबंधन ने बेड नहीं होने का कारण बताकर भर्ती करने में असमर्थता जताई। इसके बाद संत ने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन को फोन लगा दिया। इसके बाद केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने एम्स प्रबंधन को फोन किया तब कहीं जाकर एम्स प्रबंधन ने संत-परिवार के लिए किसी तरह बेड का इंतजाम कर भर्ती किया।

संत खुद कोरोना संक्रमित हैं। उनके कोरोना के चपेट में आने की कहानी कम दिलचस्प नहीं है। सुनते हैं कि संतजी के एक-दो अनुयायी सबसे पहले कोरोना संक्रमित हुए। ये लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए संतजी के पास गए और आशीर्वाद लिया। फिर क्या था, संतजी भी कोरोना के चपेट में आ गए।

लोग प्रतिबंध को इलाज समझते हैं

सरकारों में शहर और जिले के स्तर के छोटे-छोटे बहुत से फैसले अफसर खुद लेते हैं। और सत्ता चलाने वाले निर्वाचित नेता भी अक्सर उनकी बात मान लेते हैं। अफसरों को सबसे आसान तरीका प्रतिबंध का लगता है। बहुत सारी चीजों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए, तो उन्हें यह भी लगता है कि उनके हाथ कई तरह के अधिकार हैं, और उन्हें ताकत महसूस होती है। अभी छत्तीसगढ़ में लॉकडाऊन का एक और दौर चल रहा है। अधिकतर काम बंद कर दिए गए हैं, बाजार भी बंद कर दिए गए हैं। बकरीद और राखी, दो बड़े त्यौहार एक साथ आ रहे हैं, इसलिए नेताओं की मांग पर अफसरों ने बाजारों को कुछ घंटे खोलने की छूट दे दी है। नतीजा यह होने जा रहा है कि इन तमाम दुकानों पर अंधाधुंध भीड़ लगेगी, लोगों में धक्का-मुक्की होगी, और लॉकडाऊन का मकसद मारा जाएगा। जिस कोरोना-संक्रमण को कम करने के लिए लॉकडाऊन बढ़ाया जा रहा है, उसका बढऩा ऐसे सीमित घंटों की वजह से तय है। जिन चीजों की दुकानों को खुलने देना है, उन्हें अधिक से अधिक घंटों के लिए, या कम से कम काफी घंटों के लिए खुलने देना चाहिए, ताकि वहां पर धक्का-मुक्की की भीड़ न हो।

कोरोना को शिकार मिल रहे एक साथ

आज छत्तीसगढ़ के जिन शहरों में लॉकडाऊन के तहत बाजार बंद करवाए गए हैं, और दारू दुकानें भी बंद हैं, उन शहरों की सीमा से लगकर जो शराब दुकानें खुली हैं, उन शराब दुकानों पर भीड़ की हालत देखें तो लगता है कि वहां कोरोना को भी ओवरटाईम करना पड़ रहा होगा। यह लगता है कि कोरोना को शराब दुकानों से परे और कहीं जाने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि वहां उसे उसकी क्षमता से अधिक शिकार आसानी से हासिल हैं। यह पूरा खतरनाक सिलसिला बाकी लोगों को भी खतरे में डाल रहा है क्योंकि जिस शराब के मोह में नशेड़ी-भीड़ कोरोना से बेपरवाह होकर धक्का-मुक्की कर रही है, वह पीने के बाद क्या नहीं करेगी। इसलिए कोरोना से बचाव और दारू, इन दोनों का साथ-साथ चलना मुमकिन नहीं है। दिक्कत यह है कि 15 बरस की भाजपा सरकार ने भी दारू के धंधे को ऐसी फौलादी पकड़ में जकड़ रखा था कि पत्थर से भी तेल निकाला जा रहा था। इसलिए अब कांग्रेस सरकार को कुछ कहने का मुंह भाजपा के बहुत से लोगों का तो रह भी नहीं गया है। कुल मिलाकर जहां प्रतिबंध नहीं रहनी चाहिए, वहां जरूरी सामानों की दुकानें खुलने पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, और जिस दारू पर प्रतिबंध लगना चाहिए, उस दारू पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाए गए हैं। इस कॉम्बिनेशन को कोरोना बहुत पसंद कर रहा है।