राजपथ - जनपथ

Date : 30-Mar-2019

दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के मंझले पुत्र पूर्व संसदीय सचिव युद्धवीर सिंह सोशल मीडिया में ही ज्यादा सक्रिय हैं। उनकी अपने पिता की तरह जशपुर इलाके में अच्छी पकड़ है, लेकिन पार्टी से नाराजगी की वजह से खुद को एक तरह से किनारे कर लिया है। वे विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़े थे। उन्होंने अपनी जगह पत्नी को चुनाव लड़ाया। सुनते हैं कि उनकी नाराजगी का एक बड़ा कारण यह था कि डॉ. रमन सिंह ने उन्हें मंत्री नहीं बनाया, जबकि इलाके के साथ-साथ आरएसएस के लोग भी उन्हें मंत्री के रूप में चाहते थे। खैर, अब वे ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, तो पार्टी को विशेषकर रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र में नुकसान का अंदेशा जताया जा रहा है। 

कहा तो यह भी जाता है कि दिलीप सिंह जूदेव यदि गोरखनाथ पीठ के प्रमुख महंत अवैद्यनाथ का सलाह मानते, तो योगी आदित्यनाथ की जगह युद्धवीर ही वहां के महंत होते। बात 90 के दशक की है। जूदेव, एक बार महंत अवैद्यनाथ से मिलने गोरखपुर गए। चर्चा के बीच महंत अवैद्यनाथ ने जूदेव से उनके परिवार का हाल-चाल पूछा। जूदेव ने उन्हें बताया कि उनके तीन बेटे हैं और वे स्कूल की पढ़ाई कर रहे हैं। इस पर महंत ने मंझले पुत्र युद्धवीर को पीठ में छोडऩे के लिए कहा ताकि यहां शिक्षा-दीक्षा लेकर आगे उन्हें तैयार किया जा सके। मगर, युद्धवीर पूरे परिवार के लाड़ले हैं और इस वजह से जूदेव, महंत का प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सके। बाद में अजय सिंह बिष्ट नाम के युवक को महंत ने शिक्षा-दीक्षा देकर तैयार किया जो कि आज योगी आदित्यनाथ के नाम से चर्चित हंै और गोरखपीठ के सर्वेसर्वा होने के साथ-साथ उत्तरप्रदेश के सीएम भी हैं। 

डीकेएस में इतने घपले कैसे हुए?
डीकेएस सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल के घोटाले में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता फंस गए हैं। पुलिस यहां-वहां उन्हें खोज रही है। अस्पताल के सर्वेसर्वा रहे डॉ. गुप्ता के खिलाफ ढेरों शिकायतें रही है। चूंकि पिछली सरकार में ससुरजी सीएम थे तो कोई आंख उठाकर अस्पताल की तरफ नहीं देखता था। पहले राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री से अस्पताल के उद्घाटन का प्रस्ताव था, लेकिन वहां से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। इसके बाद केन्द्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा से उद्घाटन कराने की तैयारी की गई, वे तैयार भी हो गए थे, उन्होंने समय भी दे दिया था। लेकिन चर्चा है कि किसी ने अस्पताल में गड़बड़ी की खबर उन तक पहुंचा दी और वे पीछे हट गए। फिर किसी तरह डॉ. रमन सिंह और स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने उद्घाटन कर किसी तरह अस्पताल शुरू करवाया। सरकार बदलने के बाद जांच-पड़ताल भी आसान नहीं थी। क्योंकि कांग्रेस में भी डॉ. गुप्ता के अच्छे संपर्क हैं। अस्पताल में घपले-घोटाले का मामला लगातार उठा रहे डॉ. राकेश गुप्ता जब प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के पास पहुंचे तो कहीं जाकर जांच शुरू हो पाई। कुछ जानकार लोगों का यह मानना है कि रमन सिंह के स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने जानबूझकर डीकेएस अस्पताल में अंधाधुंध और लापरवाही से सौ-दो सौ करोड़ खर्च करने का पूरा अधिकार गैरकानूनी तरीके से डॉ. पुनीत गुप्ता को दे दिया था जिससे उनके किए गलत काम दिखाकर अजय चंद्राकर डॉ. रमन सिंह को चुप रख सकें, और पंचायत-स्वास्थ्य जैसे मंत्रालय अपनी मर्जी से चला सकें।
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Date : 29-Mar-2019

प्रदेश के सारे भाजपा सांसदों की टिकट क्यों कटी, इसको लेकर पार्टी के भीतर कई तरह की चर्चा है। पार्टी के शीर्षस्थ नेता प्रदेश के नेताओं से काफी नाखुश बताए जा रहे हैं। सुनते हैं कि पीएम मोदी ने एक जगह सवालिया अंदाज में यह तक कहा कि छत्तीसगढ़ में कैसी सरकार चल रही थी कि चुनाव में बुरी हार से पार्टी कार्यकर्ता खुश हैं। जबकि मध्यप्रदेश और राजस्थान के कार्यकर्ता बहुमत नहीं मिल पाने से काफी दुखी हैं। 

प्रदेश के कई भाजपा सांसद रमन सरकार की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कैमरे पर अपनी नाराजगी का भी इजहार किया था, लेकिन पार्टी हाईकमान का सोचना था कि उन्होंने (सांसदों) ने भी अपनी जिम्मेदारी का ठीक से निर्वहन नहीं किया। ज्यादातर सांसद अपने लोकसभा क्षेत्र में पार्टी को बढ़त नहीं दिला पाए। उनकी परफार्मेंस रिपोर्ट भी अच्छी नहीं रही है। पीएम के बार-बार निर्देश के बाद भी रमेश बैस जैसे कई सांसद फेसबुक-ट्विटर से नहीं जुड़े थे। इसके बाद पार्टी हाईकमान ने जो फैसला लिया, वह अपने आप में अनोखा है। हाईकमान ने चुनावी हार-जीत की परवाह किए बिना सभी सांसदों की टिकट काट दी और भविष्य की राजनीति के लिए नई टीम तैयार करने के अपने इरादे भी साफ कर दिए हैं। 

पार्टी के भीतर एक चर्चा यह है कि पहले अभिषेक सिंह की टिकट कटना तय हुआ तो फिर पार्टी के दूसरे खेमे ने दिल्ली में कोशिश करके रमेश बैस की टिकट भी कटवा दी। फिर जब बृजमोहन अग्रवाल को रायपुर से टिकट मिलने की बात आई, तो रमन सिंह को भी नांदगांव से टिकट मिलने की चर्चा थी। इन दोनों को एक साथ रोकने के लिए दिल्ली में फिर एक पैमाना बना दिया गया कि किसी जीते-हारे विधानसभा उम्मीदवार को टिकट नहीं दी जाएगी, किसी रिश्तेदार को टिकट नहीं दी जाएगी, किसी मौजूदा सांसद को टिकट नहीं दी जाएगी। कुल मिलाकर हर खेमे की कोशिश यही रही कि पैमाने ऐसे बन जाएं कि अकेले उन्हीं की बेइज्जती न हो, पैमाने के तहत ऐसा हुआ है यह कहने का बहाना रहे।

कमल अभी कसावट से दूर
भाजपा ने सभी सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं, लेकिन  कुछ प्रत्याशियों को अपने ही हाल पर छोड़ दिया गया है। मसलन, राजनांदगांव प्रत्याशी संतोष पाण्डेय का प्रचार तंत्र पूरी तरह बिखरा हुआ है। संतोष की छवि साफ सुथरे नेता की है और वे आरएसएस के पसंदीदा हैं। वे अच्छे वक्ता और संगठनकर्ता भी माने जाते हैं, लेकिन उन्हें पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के समर्थकों  का साथ नहीं मिल रहा है। 

वैसे तो, रमन सिंह के सांसद पुत्र अभिषेक सिंह उनके चुनाव संचालक हैं। पर टिकट कटने से वे दुखी बताए जा रहे हैं। चर्चा हैं कि अभिषेक को टिकट देने के लिए कवर्धा और राजनांदगांव जिले के पदाधिकारी गुपचुप हस्ताक्षर अभियान चला रहे थे, लेकिन सोशल मीडिया में लीक हो जाने के बाद अभियान बंद करना पड़ा। 

सुनते हैं कि रमन सिंह समर्थकों और संघ के लोगों के बीच शह-मात का खेल भी चल रहा है। चर्चा है कि पीएम मोदी की सभा सबसे पहले राजनांदगांव लोकसभा के डोंगरगढ़ में तय हुई थी। यह सभा सात तारीख को होने वाली थी, लेकिन कुछ प्रभावशाली नेताओं के कहने पर सभा स्थल राजनांदगांव के बजाए बालोद तय कर दिया गया। पार्टी के कुछ लोग इसको संतोष पाण्डेय को कमजोर करने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 28-Mar-2019

चर्चित मॉडल आंचल यादव की हत्या के आरोपियों का सुराग नहीं मिल पाया है, लेकिन घटना से विशेषकर फारेस्ट के कई अफसर  सहम गए हैं। सुनते हैं कि आंचल बीमा एजेंट भी थीं और एक साल में ही उसने करोड़ों का बिजनेस किया था। इसमें अफसरों-नेताओं ने भरपूर मदद की थी। हल्ला तो यह भी है कि मॉडल के चक्कर में एक आईएफएस अफसर गृहकलह से घिर गया था। बाद में किसी तरह उसने मॉडल से संबंध विच्छेद कर गृहकलह शांत किया। बारनवापारा के देव-हिल्स रिसार्ट में भी मॉडल को कई बार फारेस्ट के लोगों के साथ देखा गया। एक रेंजर ने जब मॉडल के खिलाफ ब्लैकमेलिंग की रिपोर्ट लिखाई, तो वह सुर्खियों में आई। चर्चा तो यह भी है कि प्रदेश के एक दिग्गज नेता के पुत्र से भी मॉडल के करीबी रिश्ते रहे हैं। हल्ला तो यह भी है कि नेता पुत्र दो-तीन साल पहले मॉडल के साथ गोवा ट्रिप पर भी जा चुके हैं। खैर, मॉडल के बीमा ग्राहकों की सूची सामने आती है, तो कई चौंकाने वाले नाम सामने आ सकते हैं। वैसे इस मॉडल की मौत के बाद उसका फेसबुक पेज बंद करने वाले भी कोई नहीं हैं, इसलिए उस पर सैकड़ों तस्वीरों और वीडियो में लोग उसके साथ किसी पब या बार में नाचते-गाते दिख रहे हैं, और जांच के लिए ये सारे सुबूत पुलिस के हाथ आसानी से लगे हुए हैं जिन्हें अब कोई मिटा भी नहीं सकता। उसने खुद अपने-आपको एक सोशल बटरफ्लाई लिखा है, और साथ ही लिखा है कि वह खतरों की कगार पर बिना किसी मलाल जीती है। 
बहुत से लोगों के साथ उसकी तस्वीरें और वीडियो हैं, और अब लोग उसके पेज पर उसके कत्ल की खबरों की कतरनें भी पोस्ट करते चल रहे हैं। एक वीडियो में वह रात की सुनसान सड़क पर किसी गाड़ी की रौशनी में एक दूसरी लड़की के साथ डांस करते दिख रही है। अगर कातिल जल्द नहीं पकड़े गए तो पुलिस के सामने पूछताछ के लिए बड़ी लंबी लिस्ट रहने वाली है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 27-Mar-2019

पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के बेटे नितिन ने बलौदाबाजार विधानसभा क्षेत्र का चुनाव संचालक बनने की इच्छा जताई है। नितिन के प्रस्ताव से भाजपा के रणनीतिकार उलझन में हैं, क्योंकि नितिन ने कसडोल में अपने पिता के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी और वहां गौरीशंकर को रिकॉर्ड 52 हजार वोट से हार का सामना करना पड़ा। 
सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद नितिन कसडोल के बजाए बलौदाबाजार में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते हैं। कसडोल से सटे होने के कारण बलौदाबाजार उन्हें अनुकूल लग रहा है, मगर, पार्टी के लोग उन पर भरोसा नहीं जता पा रहे हैं। वजह यह है कि कसडोल के लोगों की नाराजगी अब तक खत्म नहीं हुई है और बलौदाबाजार में नितिन को प्रचार की कमान सौंपने से नुकसान भी हो सकता है। 
चूंकि नितिन को सौदान सिंह के पीए गौरव तिवारी का बेहद करीबी माना जाता है और पार्टी हल्कों में यह चर्चा है कि दोनों के बीच कारोबारी रिश्ते भी हैं। गौरव भाजयुमो के राष्ट्रीय पदाधिकारी भी हैं, ऐसे में नितिन की पार्टी के भीतर ताकत को देखकर उन्हें चुनाव संचालन के लिए मना करना मुश्किल भी हो रहा है। 

स्टार प्रचारकों की लिस्ट से गायब !
भाजपा ने अपने स्टार प्रचारकों की सूची जारी की है। प्रचारकों में  पीएम मोदी, अमित शाह से लेकर भीमा मण्डावी तक कुल 40 नाम हैं। प्रचारकों में पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर और प्रेमप्रकाश पाण्डेय के नाम या तो छूट गए हैं या फिर जानबूझकर छोड़ा गया है। कंवर ने विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और धरमलाल कौशिक की जोड़ी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। 
उन्होंने प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन से मिलकर दोनों के खिलाफ लंबी चौड़ी शिकायत भी की है। दूसरी तरफ कांगे्रसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मिलकर ननकीराम कंवर लगातार रमन सिंह के सबसे करीबी रहे अफसरों के खिलाफ तरह-तरह के जुर्म के आरोप लगाकर शिकायतें कर रहे हैं, और उनकी शिकायतों पर भूपेश बघेल इस रफ्तार से पुलिस जांच के आदेश दे रहे हैं जैसी रफ्तार ननकीराम कंवर ने कभी भाजपा सरकार ने भी नहीं देखी थी। हकीकत तो यह है कि ननकीराम की तमाम शिकायतें उन्हीं की पार्टी की सरकार में सिर्फ कचरे की टोकरी की शोभा बढ़ा पाई थीं। ऐसे में इस दिग्गज आदिवासी नेता का स्टार प्रचारकों की सूची से नाम गायब होना स्वाभाविक था। जबकि प्रेमप्रकाश पाण्डेय अभी भी संगठन के पसंदीदा नहीं बन पाए हैं। प्रचारकों में सुभाष राव का नाम है, जिन्हें कभी किसी ने चुनाव प्रचार करते नहीं देखा। उन पर कार्यालय में रहकर प्रबंधन की अहम जिम्मेदारी रहती है। खैर, मौजूदा हालत में प्रचारकों की सर्वमान्य सूची तैयार करना भी कठिन है। 

पार्टी में नहीं, पर समझ पूरी
एक वक्त भाजपा के महत्वपूर्ण पदाधिकारी रहे विरेंद्र पाण्डेय बरसों पहले पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने रायपुर के ताकतवर मंत्री राजेश मूणत के खिलाफ बागी उम्मीदवार होकर चुनाव लड़ा था। इसके बाद वे लगातार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में रमन सरकार को घेरते रहे, और कई तरह की जनहित याचिकाएं भी लगाते रहे। इन दिनों वे गोविंदाचार्य के बनाए एक राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं और खबरों से कुछ परे हैं। अभी एक समाचार चैनल, आईएनएच, ने एक बहस में उन्हें बुलाया कि भाजपा ने राज्य में 11 के 11 बल्ब जिस अंदाज में बदले हैं, उस पर उनका क्या कहना है? वे लंबे समय तक भाजपा में रहे और फिर विरोधी रहते हुए भी भाजपा को बारीकी से देखते रहे। इसलिए तमाम 11 लोकसभा सीटों पर उनका बारीकी से अंदाज भी सामने आया, और हर सीट, हर उम्मीदवार की संभावना पर उन्होंने बात रखी। घंटे भर से अधिक के इस कार्यक्रम के बाद समझ आया कि वे भाजपा से बाहर चाहे हों, वे भाजपा के बारे में जानकारी और समझ खूब रखते हैं, और किसी भी पार्टी को अपने विरोधियों की समझ का इस्तेमाल करने का भी कोई रास्ता निकालना चाहिए। भाजपा और विरेन्द्र पाण्डेय के सीधे बातचीत के रिश्ते नहीं रह गए हैं, लेकिन उम्मीदवारी घोषित होने के बाद इस चैनल ने जैसी जानकारी उनसे निकलवाई है, वैसा भाजपा के कोई रणनीतिकार पहले भी कर सकते थे। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 26-Mar-2019


लोकसभा टिकट की घोषणा के बाद भाजपा अंदरूनी कलह शांत करने की कोशिश में जुटी है। सरगुजा, कांकेर, रायगढ़ में प्रत्याशियों को दिक्कत भी हो रही है। सरगुजा में तेज तर्रार नेत्री रेणुका सिंह प्रत्याशी हैं, लेकिन पार्टी ने रामप्रताप सिंह को प्रभारी और भीमसेन अग्रवाल को चुनाव संचालक बना दिया है। हाल यह है कि भीमसेन की रेणुका सिंह से बोलचाल तक नहीं है। रामप्रताप सिंह पहले ही रेणुका के खिलाफ रहे हैं। अब बड़े नेताओं ने कुछ पहल की, तो मध्यस्थ के जरिए सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है।

कांकेर में भाजपा प्रत्याशी मोहन मंडावी के खिलाफ पूर्व विधायक सुमित्रा मारकोले ने मोर्चा खोल दिया है। उनके साथ पार्टी के असंतुष्ट नेता जुट रहे हैं। सुमित्रा को पार्टी छोड़ चुके पूर्व सांसद सोहन पोटाई समर्थन हासिल है। ऐसे में उन्हें समझाने में दिक्कत हो रही है। रायगढ़ का हाल भी कोई अच्छा नहीं है। रायगढ़ में पार्टी ने पहले गणेश राम भगत को चुनाव लडऩे के लिए तैयार रहने का संकेत दे दिया था, लेकिन जूदेव परिवार के विरोध के चलते उन्हें टिकट नहीं दिया गया। इससे उनके समर्थकों में नाराजगी है। भगत अभी तक मुंह फुलाए हैं और उन्हें समझाने की कोशिश हो रही है। फिर भी, पार्टी के लोगों को भरोसा है कि यहां रमन सिंह चुनाव नहीं लड़ रहे हैं और मोदी के नाम पर कुछ दिनों में सबकुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। 

बृजमोहन की वजह से भरोसा
रायपुर से सुनील सोनी की उम्मीदवारी से भाजपा के बृजमोहन अग्रवाल के खेमे में खुशी की लहर है। बृजमोहन ने उन्हें जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। सभी का मानना है कि अब जब बृजमोहन चुनाव संचालक हो गए हैं, तो साधन-संसाधन की कमी नहीं रहेगी। सुनते हैं कि बृजमोहन के चुनाव प्रचार की कमान संभालने से भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के लोग भी खुश हैं। बृजमोहन अपने विरोधियों का पूरा ख्याल रखते हैं। उनके लोगों ने कांग्रेस उम्मीदवार से असंतुष्ट-मददगार कांग्रेसियों की सूची बनानी भी शुरू कर दी है। इस बार सूची लंबी हो रही है, क्योंकि सभी 9 विधानसभा के लोग रहेंगे। लिहाजा, खर्च भी ज्यादा होगा। ये अलग बात है कि कुछ नेताओं ने सुनील सोनी को पहले ही चुनावी खर्च को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं। श्रीचंद सुंदरानी ने उन्हें कह दिया है कि तन-मन से पूरा साथ रहेगा। चूंकि वे खुद विधानसभा चुनाव में काफी कुछ खर्च कर चुके हैं, इसलिए वे धन नहीं उपलब्ध करा सकते हैं। खैर, सुनील सोनी चिंतित नहीं है, क्योंकि बृजमोहन वार्ड चुनाव में भी विधानसभा जितना खर्च करने की इच्छा रखते हैं और इसके लिए व्यवस्था भी खुद करते हैं। 
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Date : 25-Mar-2019

खबर है कि भाजपा के प्रत्याशी चयन में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह की राय को महत्व नहीं दिया गया है। पहले फॉर्मूला बनाकर उनके सांसद पुत्र अभिषेक का पत्ता साफ कर दिया गया। वे खुद चुनाव लडऩा चाह रहे थे, लेकिन पार्टी हाईकमान ने उन्हें महत्व नहीं दिया। और तो और उनकी इच्छा के खिलाफ संतोष पाण्डेय को चुनाव मैदान में उतारा गया। जबकि वे रजिन्दरपाल सिंह भाटिया को प्रत्याशी बनवाना चाहते थे। विधानसभा चुनाव में बुरी हार से खफा हाईकमान ने सारे दिग्गजों को किनारे लगा दिया।

प्रत्याशी चयन में न सिर्फ डॉ. रमन सिंह बल्कि पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय की भी नहीं चली। सरोज गुंडरदेही के पूर्व विधायक विरेन्द्र साहू को दुर्ग सीट से टिकट दिलवाना चाह रही थीं, लेकिन पार्टी ने उनके धुर विरोधी विजय बघेल को टिकट दे दी।  बस्तर में बरसों बाद कश्यप परिवार से बाहर प्रत्याशी तय किए गए। इसी तरह दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के भतीजे राज्यसभा सदस्य रणविजय सिंह और छोटे पुत्र प्रबल प्रताप सिंह, दोनों ही कोरबा से टिकट चाह रहे थे। 

रणविजय सिंह की राज्यसभा सदस्यता का कार्यकाल एक साल से भी कम बाकी है। भाजपा विधायकों की संख्या इतनी कम है कि यहां से एक भी नेता को राज्यसभा में नहीं भेजा जा सकता। यह देखकर रणविजय और प्रबल प्रताप, दोनों ने ही कोरबा टिकट के लिए ताकत झोंक दी थी, लेकिन पार्टी ने उन्हें महत्व नहीं दिया। विधानसभा चुनाव में जशपुर जिले की तीनों सीटों में हार के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया गया। बिलासपुर सीट से पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल भी टिकट की आस में थे। वे अरूण जेटली सहित कई बड़े नेताओं से मिल भी आए थे। उन्हें टिकट देना तो दूर, उनका नाम पैनल में भी नहीं रखा गया। पार्टी ने संतोष पाण्डेय और सुनील सोनी जैसे चेहरों को आगे किया गया जो कि संगठन के लिए खूब मेहनत करते हैं। संकेत साफ है कि पार्टी यहां दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे लाना चाहती है। 

एक स्कूल कमाल की

रायपुर की कालीबाड़ी स्कूल के कई पूर्व छात्र इन दिनों प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं और लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। रायपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी महापौर प्रमोद दुबे और भाजपा प्रत्याशी पूर्व महापौर सुनील सोनी, दोनों ही कालीबाड़ी स्कूल से पढ़े हैं। यही नहीं, दुर्ग लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल भी रायुपर की कालीबाड़ी स्कूल के विद्यार्थी रहे हैं। लोकसभा के इन तीनों प्रत्याशियों से परे सरकार के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग और राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा ने भी कालीबाड़ी स्कूल से पढ़ाई की है। भाजपा के एक नौजवान मुखर नेता राजीव चक्रवर्ती ने भी स्कूल की पढ़ाई कालीबाड़ी स्कूल से की है, जबकि उनके पिता एएम चक्रवर्ती घोर वामपंथी हैं। अब राजीव चक्रवर्ती अपनी स्कूल का गौरवगान करने में लगे हुए हैं।
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Date : 24-Mar-2019

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में राज्य सरकार, उसकी जांच एजेंसियों, और जांच में फंसे हुए पिछली सरकार के कुछ अफसरों के बीच चल रही मुकदमेबाजी खासी खर्चीली है। दिल्ली से महंगे वकील विशेष विमानों में आ-जा रहे हैं, और अब अनायास सबकी दिलचस्पी इसमें अधिक हो गई है कि बिलासपुर में जल्द से जल्द हवाई अड्डा शुरू हो जाए। एक जानकार ने यह भी कहा कि ऐसे अफसरों के पास वकीलों की सुविधा सरकार से कहीं अधिक दिख रही है, और कुछ ऐसा ही हाल उनमें से कुछ अफसरों के बचने का भी दिख रहा है। हाईकोर्ट के जजों का रूख भी राज्य सरकार के लिए किसी रहमदिली का दिख नहीं रहा है, और जानकारों का कहना है कि आने वाले दिन भी कई वजहों से कुछ ऐसे ही रहने वाले हैं। मतलब यह कि सरकार को अपने हर फैसले और हर काम के लिए बारीक नुक्ताचीनी का सामना करना पड़ेगा, और जवाबदेह रहना पड़ेगा। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोगों का यह भी कहना है कि पिछली सरकार के ऐसे कुछ चर्चित अफसर गिरफ्तारी की नौबत से बचने के लिए फिलहाल अघोषित रूप से कहीं-कहीं रह रहे हैं क्योंकि गिरफ्तारी होने पर जमानत पाने में भी कुछ दिन लग सकते हैं। फिलहाल राज्य की एक बड़ी जांच एजेंसी इस बात को बड़ी कामयाबी मान रही है कि पिछली सरकार के वक्त की जासूस-महिला अधिकारी की खबर लग गई है, और अब वह लगातार निगरानी में है।

रमन सिंह के आसपास
कुर्सी से हटते ही डॉ. रमन सिंह के इर्द-गिर्द मंडराने वाली अफसरों की टोली स्वाभाविक रूप से छंट गई है। कुछ पुराने लोग अभी भी साथ देखे जा सकते हैं। इनमें पूर्व खेल सलाहकार विक्रम सिसोदिया, ओपी गुप्ता हैं। पत्रकारों की सीडी मामले में उलझे अरूण बिसेन भी पूर्व सीएम के आगे-पीछे होते देखे जा सकते हैं। बिसेन ऑफिशियल तौर पर साथ नहीं हैं। सरकार बदलने के बाद जनसंपर्क विभाग में अनियमितता की जांच-पड़ताल चल रही है। 
कुछ लोगों का अंदाजा है कि देर-सवेर अरूण बिसेन भी इसके लपेटे में आ सकते हैं। इन चर्चित चेहरों के बीच एक और ठाकुर की इंट्री हुई है। नाम-डॉ. एसएस गहरवार। रायपुर दुग्ध महासंघ के पूर्व एमडी डॉ. एसएस गहरवार भी पूर्व सीएम के निवास में सक्रिय हो गए हैं। उनके जिम्मे पूर्व सीएम से लोगों को मिलाने-जुलाने का काम है। गहरवार पशु चिकित्सक के पद से एमडी तक पहुंचे। इसमें पूर्व सीएम की भी भूमिका अहम रही है। रिटायर होने के बाद उन्हें संविदा पर भी रखा गया था। अब ऐसे में बिना कोई पारिश्रमिक लिए गहरवार सेवा दे रहे हैं।

भाजपा में सब उम्मीद से
सांसदों को टिकट नहीं देने के फैसले के बाद भाजपा में दावेदारों की फौज खड़ी हो गई है। हाल यह है कि पंचायत स्तर के नेता भी लोकसभा की टिकट मांग रहे हैं। ऐसे ही आरंग इलाके का एक सरपंच अपने कुछ साथियों के साथ पिछले दिनों पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह से मिलने गया। सरपंच ने पूर्व सीएम को धन्यवाद दिया और कहा कि सांसदों को टिकट नहीं देने के फैसले के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में वातावरण बन रहा है। उन्होंने अपना बायोडाटा देते हुए कहा कि उनके जैसे को टिकट दी जाएगी, तो पार्टी की जीत सुनिश्चित है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पूर्व सीएम के निवास पर लोगों की आवाजाही बेहद कम हो गई थी, लेकिन जैसे ही यह संदेश गया कि लोकसभा चुनाव में पार्टी नए चेहरे को आगे लाएगी, टिकट के दावेदार उनके आसपास देखे जाने लगे हैं। 

जाकी रही भावना जैसी...
चुनाव में उम्मीदवार कैसे हों, यह सबके अपने-अपने नजरिए से तय होता है। जाति के आधार पर राजनीति करने वाले लोग खुद की उम्मीदवारी न होने पर अपनी जाति का उम्मीदवार ढूंढते हैं, ताकि जाति के भीतर दबदबा बना रहे, और आगे मौका आने पर लोगों को याद रहे कि नेताजी ने अपनी जाति को मौका दिलवाया था। दूसरी तरफ जिन लोगों को मुख्यमंत्री बनने की चाह रहती है, वे ऐसे उम्मीदवार चाहते हैं जो पार्टी के भीतर शक्ति परीक्षण होने की नौबत आने पर उनके साथ टिके रहें। फिर चाहे ऐसे उम्मीदवारों की जीत की संभावना थोड़ी कम ही क्यों न हो, वे उन्हें टिकट दिलाना चाहते हैं क्योंकि हर उम्मीदवार जीतता तो है नहीं, कम से कम जीते तो साथ रहे। अखबारों के रिपोर्टरों से पूछें तो वे ऐसे नेता की उम्मीदवारी की सिफारिश करते हैं जो मीडिया के साथ उठने-बैठने और अच्छे रिश्ते रखने में भरोसा रखते हैं। दूसरी तरफ मीडिया मालिकों से अगर बात करें, तो वे ऐसे उम्मीदवारों के नाम सुझाते हैं जिनके नाम के साथ चुनाव में अच्छे पैकेज की उम्मीद रहती है। मीडिया मालिकों की चले, तो वे हर पार्टी से हर सीट पर बड़े-बड़े पैकेज वालों के नाम सुझा दें क्योंकि चुनाव के वक्त महीनों तक आचार संहिता के चलते विज्ञापनों का जो सूखा छाया रहता है, उससे उबरने का भी कोई रास्ता तो होना चाहिए। फिलहाल एक संपादक ने एक अनौपचारिक दावत में एक गंभीर किस्म का मजाक करते हुए कहा- निन्यानबे फीसदी मीडिया मालिकों के चक्कर में एक फीसदी मीडिया मालिक नाहक ही बदनाम होते हैं!
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Date : 23-Mar-2019

जब कभी हिन्दुस्तान के सरकारी बैंकों की बात होती है तो लोग तरह-तरह से मखौल उड़ाने लगते हैं। एसबीआई के बारे में अनगिनत मजाक चलते हैं कि वहां जब जाएं, लंच ही चलते रहता है। अब इस अखबार के दफ्तर से इंटरनेट बैंकिंग से 20 मार्च की दोपहर कई लोगों के नाम रकम ट्रांसफर करने के लिए जोड़े गए। ऐसे में बैंक का कम्प्यूटर एक निर्धारित फोन पर ऐसे नाम जोडऩे के समय के साथ तुरंत ही एसएमएस भेजता है कि अगर यह नाम अकाऊंट चलाने वाले व्यक्ति ने नहीं जोड़ा है तो बैंक के होम पेज पर तुरंत ही अपने अकाऊंट को लॉक कर दें, और बैंक को तुरंत ही खबर करें। बीस तारीख की दोपहर दो बजे से तीन बजे के बीच जोड़े गए ऐसे कई नामों के एसएमएस आज 23 मार्च को दोपहर 12 बजे के बाद लगातार पहुंच रहे हैं। अब तीन दिन बाद कोई क्या तो अकाऊंट को लॉक कर दे, और क्या तो बैंक को खबर करे? 

पहले कटी, फिर मिली
जांजगीर-चांपा से गुहाराम अजगले को टिकट देने का फैसला आसान नहीं था। पहले उनकी टिकट सिर्फ इसलिए काटी गई कि परिसीमन के बाद उनका क्षेत्र (सारंगढ़) रायगढ़ लोकसभा में जुड़ गया है। यानी वे जांजगीर-चांपा लोकसभा के लिए बाहरी हो गए हैं। अब जब मौजूदा सांसद कमला पाटले की टिकट कटी, तो उन्हें इसलिए उम्मीदवार बनाया गया कि लोकसभा क्षेत्र के ज्यादातर हिस्सों के लोग उन्हें जानते हैं। 
गुहाराम अजगले यूपीए-वन यानी 2004 से 2009 तक सांसद रहे। गुहाराम यह खुलासा करने में संकोच नहीं करते कि उन्हें 22 जुलाई 2008 को यूपीए की तरफ से लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान सदन में अनुपस्थित रहने के लिए करोड़ों रुपये की पेशकश की गई थी। यह सब उस समय हुआ जब उनका गृह गांव परिसीमन के चलते जांजगीर-चांपा लोकसभा से बाहर हो गया था। ऐसे में उन्हें टिकट मिलने की संभावना कम थी। फिर भी वे प्रलोभन में नहीं आए और सदन में उपस्थित रहकर यूपीए सरकार के खिलाफ मतदान किया। ये अलग बात है कि यूपीए सरकार फिर भी बच गई। वे मानते हैं कि पार्टी अनुशासन में रहकर काम करते रहने के कारण उन्हें प्रत्याशी बनाया गया। 

जूदेव का खतरा देखकर
भाजपा में मौजूदा सांसदों को टिकट नहीं देने के फैसले के बाद नए प्रत्याशी तय करने में पार्टी नेताओं को काफी मशक्कत करनी पड़ी। रायगढ़ सीट से पहले केंद्रीय मंत्री विष्णुदेव साय की जगह पूर्व मंत्री गणेशराम भगत का नाम तय किया गया था, लेकिन जशपुर राजघराने के युवराज युद्धवीर सिंह ने आंखें तरेरीं तो पार्टी नेताओं को फैसला बदलना पड़ा। युद्धवीर की पसंद पर पार्टी ने गोमती साय को टिकट दी। 
विधानसभा चुनाव में जशपुर की सीटों पर युद्धवीर को महत्व न देकर  उनके चचेरे भाई राज्यसभा सदस्य रणविजय सिंह के सुझाव पर प्रत्याशी तय किया गया था। फिर क्या था युद्धवीर ने बागी उम्मीदवार खड़े कर दिए। तीनों सीटों पर पार्टी को हार का मुख देखना पड़ा। भाजपा नेताओं को यह साफ हो गया कि जशपुर में दिलीप सिंह जूदेव के बाद युद्धवीर की ही पकड़ है। ऐसे में उनकी राय को अनदेखा करना जोखिम भरा था। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 20-Mar-2019

पंद्रह साल राईस मिल एसोसिएशन का चेयरमैन रहने के बाद योगेश अग्रवाल ने अपना पद छोड़ दिया। योगेश की भाजपा सरकार में तूती बोलती थी। वे भाजपा के ताकतवर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई हैं। वैसे तो उनके खाद्य मंत्री मोहम्मद अकबर से भी उनकी पुरानी जान-पहचान है। योगेश, अकबर को खाद्य विभाग मिलते ही बड़ा गुलदस्ता लेकर बधाई देने गए थे। अब सरकार नहीं रही, तो कारोबार पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। कारोबारी हितों के लिए नए सिरे से जुगाड़ बिठाना जरूरी है। ऐसे में योगेश ने कारोबारी नेतागिरी से थोड़ा ब्रेक ले लिया, तो गलत नहीं कहा जा सकता। दूसरी तरफ चेंबर हो या कोई दूसरा उद्योग-व्यापार संगठन, ऐसा माना जाता है कि सत्ता के साथ संबंध ठीक न हों तो सिर्फ पदाधिकारियों का नहीं, सभी का बड़ा नुकसान होता है, और कारोबार के हित में सरकार की नीतियां नहीं बनवाई जा सकतीं। आज की पीढ़ी को याद नहीं होगा कि एक वक्त कांगे्रस के सबसे करीबी रहने वाले चावल कारोबारी संगठन के नेता नेमीचंद श्रीश्रीमाल प्रदेश के राईस किंग कहे जाते थे, और मुख्यमंत्री जब भोपाल से पहली बार रायपुर आते थे तो रामसागर पारा में नेमीचंद के घर चांदी की थालियों में उनकी दावत होती थी, और प्रदेश सरकार की चावल नीति बनवाने में सेठजी कहे जाने वाले नेमीचंद श्रीश्रीमाल का खासा दखल रहता था। वैसे दबदबे और पहुंच-असर वाला कोई दूसरा व्यापारी-नेता बाद में हुआ ही नहीं।

ऐसों के राज में राष्ट्रीय खेल?
रायपुर में राष्ट्रीय खेल का आयोजन होना है, लेकिन खेल विभाग फिलहाल इसके लिए तैयार नहीं दिख रहा है। खेल संघों के प्रतिनिधि  विभाग के कई लोगों के काम से संतुष्ट नहीं हैं। विशेषकर दो आला अफसरों के खिलाफ तो अलग-अलग स्तरों पर शिकायतें भी हुई है। सुनते हैं कि शिकायतों पर दोनों का तबादला भी हुआ था, लेकिन वेे रूकवाने में सफल रहे। ये दोनों अफसर पिछली सरकार में भी बेहद पावरफुल रहे। चूंकि तत्कालीन सीएम खुद खेल संघों से जुड़े थे।  खेलकूद आयोजनों के चलते इन दोनों की सीएम हाऊस में भी पूछ परख होती थी। दोनों ने इसका जमकर फायदा भी उठाया। सरकार बदलने के बाद दोनों पर नकेल कसने की कोशिश भी हुई, लेकिन जल्द ही वे अपने संपर्कों के जरिए पुरानी हैसियत में आ गए। चर्चा है कि खेल संघों से जुड़े लोग दोनों के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा सीएम को देने वाले हैं। इन लोगों की चिंता इस बात को लेकर है कि राष्ट्रीय खेलों का आयोजन होना है और विभाग में साफ-सुथरी छवि के लोगों को महत्व नहीं मिलेगा, तो इसका सीधा असर आयोजनों पर पड़ सकता है। 
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Date : 19-Mar-2019

सत्ता खोने के बाद विपक्ष के दमदार नेता भी किसी न किसी बहाने नई सरकार के करीब होने की जुगत में हैं। इन्हीं में से एक पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी भी हैं, जो पिछले दिनों सीएम भूपेश बघेल से चेट्रीचंड महोत्सव में आमंत्रण के बहाने गुपचुप मिल आए। सुंदरानी भाजपा के मुख्य प्रवक्ता हैं और वे टीवी चैनलों में अक्सर भूपेश सरकार के खिलाफ आग उगलते देखे-सुने जा सकते हैं। अब जब सुंदरानी की सीएम से मेल-मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हुई है, तो भाजपा से जुड़े लोग इस पर तीखी प्रतिक्रिया भी जता रहे हैं। 

सुंदरानी से पहले एक अन्य भाजपा प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास ने सीएम से अकेले में मुलाकात की कोशिश की थी, तो उन्हें कड़ी फटकार सहनी पड़ी। चर्चा है कि सुंदरानी ने पिछले दिनों सिंधी समाज के मंच से सीएम के स्वागत की इच्छा भी जताई थी, लेकिन आयोजकों ने उन्हें आगे आने नहीं दिया। दिग्गज भाजपा नेताओं की सरकार से करीब रहने की इच्छा के पीछे कारोबारी वजह भी है।
 सुनते हैं कि श्रीचंद का परिवार मोबाइल कारोबार से जुड़ा है। माइक्रोमैक्स मोबाइल के वितरक भी हैं। पिछली सरकार ने माइक्रोमैक्स मोबाइल मुफ्त बांटी थी। श्रीचंद अप्रत्यक्ष रूप से मुफ्त मोबाइल वितरण योजना से जुड़े रहे हैं। सरकार बदलते ही इस पूरी योजना में अनियमितता को लेकर जांच बिठा दी गई है। श्रीचंद के परिवार पर सीधे आंच भले न आए, लेकिन कंपनी मुश्किल में पड़ गई है। इस तरह के विवाद बिना सरकार के सहयोग के नहीं निपट पाएंगे। ऐसे में श्रीचंद के सीएम से मेल-मुलाकात को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। 

होली भी सुविधानुसार
शहरों में कामकाजी दंपत्ति अब अपने बच्चों का जन्मदिन या शादी की सालगिरह जैसा आयोजन रविवार को करने लगे हैं। क्योंकि दोनों की छुट्टी होती है, अलग से छुट्टी नहीं लेनी पड़ती फिर आमंत्रित कामकाजी परिचितों-रिश्तेदारों को भी इस दिन आने में सहूलियत होती है, यानी सहूलियत को देखकर आयोजन। आज की इस भागमभाग में यह एक तरह से अच्छा भी है, लेकिन गांव-देहातों में होली जैसा पर्व भी सहूलियत से मनाया जाने लगा है इसकी जानकारी शायद बहुत कम को होगी।
बसना-सरायपाली के गांवों में होली कल बुधवार को मनाई जा रही है। आज रात को होलिका दहन होगा। एक दिन पहले मनाने का कारण भी दिलचस्प है। दरअसल होली गुरुवार को है और इस दिन कई हिंदू परिवार दारू-मुर्गा, मटन-मछली नहीं खाते हैं। गांवों में इस दिन बकरा कट नहीं सकता,  शराब भी नहीं पी सकते। इसलिए यहां के गांवों में अक्सर फुसपुन्नी भी गुरुवार को नहीं मनाया जाता, इसके आगे या फिर पीछे मनाया जाता है। इस बार होली भी गुरुवार की चपेट में आ गया लिहाजा इसे एक दिन आगे मनाया जा रहा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 18-Mar-2019

पूर्व सीएम अजीत जोगी कोरबा से चुनाव मैदान में उतरेंगे। यह घोषणा उनके बेटे और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने की है। पर वाकई अजीत जोगी चुनाव लड़ेंगे, इसमें संदेह जाहिर किया जा रहा है। क्योंकि पहले भी वे चुनाव लडऩे की घोषणा कर पलट चुके हैं। विधानसभा चुनाव में रमन सिंह के खिलाफ चुनाव लडऩे की घोषणा भी की थी। अपनी बहू ऋचा जोगी को चुनाव संचालक भी बना दिया था, पर बाद में वे पीछे हट गए। इसी तरह कसडोल से चुनाव लडऩे की घोषणा कर गौरीशंकर अग्रवाल को भी डरा चुके हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद से जोगी की हैसियत घटी है।
हाल यह है कि कांग्रेस के नेता कोरबा से चुनाव लडऩे की घोषणा को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं और न ही उनसे किसी तरह की दोस्ती रखना चाहते हैं। इसके उलट जोगी के तीन विधायक तो पार्टी छोडऩे के लिए तैयार बैठे हैं। यानी जोगी पार्टी को कांग्रेस से किसी तरह मोल-भाव की गुंजाइश नहीं दिख रही है। अलबत्ता, उनके करीबी लोग चाहते हैं कि जोगी चुनाव न लड़कर धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट होने का हवाला देकर कांग्रेस को ही समर्थन दे दें। जनता कांग्रेस विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह को बिलासपुर से चुनाव लडऩे के लिए कहा गया है, लेकिन वे असमंजस में हैं क्योंकि उनकी जीत की संभावना नहीं है। ऐसे में अंतिम क्षणों में जोगी-धर्मजीत चुनाव मैदान से हट जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। जोगी के कई शुभचिंतकों का मानना है कि कांग्रेस के साथ आगे किसी भी तरह के तालमेल का रास्ता झुककर ही तय किया जा सकता है, कांगे्रस को नुकसान पहुंचाकर नहीं।

रमन सिंह सुनते सबकी हैं पर...
भाजपा के अंदरखाने में पार्टी के कई प्रभावशाली नेता पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय को टिकट दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर इसकी अगुवाई कर रहे हैं। सुनते हैं कि पिछले दिनों पार्टी दफ्तर में वे पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह का हाथ पकड़कर अलग कमरे में ले गए। वहां पहले से ही बृजमोहन अग्रवाल, धरमलाल कौशिक, नारायण चंदेल, शिवरतन शर्मा मौजूद थे। सबने एक सुर में प्रेमप्रकाश की टिकट के लिए रमन सिंह का समर्थन मांगा। सब दिग्गजों को साथ देखकर उन्होंने तुरंत इसके लिए हामी भर दी। पर कई लोगों को रमन सिंह की भूमिका पर अभी भी शंका है। 
वे पिछले 15 साल में कईयों को छका चुके हैं। सुनते हैं कि नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान अजय चंद्राकर से लेकर ननकीराम तक सबको समर्थन करने का वादा किया था, लेकिन चयन की बारी आई, तो वे पार्टी हाईकमान के कान में धरमलाल कौशिक का नाम फूंककर आ गए। कौशिक के नाम का जब ऐलान हुआ तो कई विधायकों ने रमन सिंह को भी खरी-खोटी सुनाई। अब लोकसभा प्रत्याशी चयन में उनका रूख किस तरह का होता है, यह देखना है। 

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Date : 17-Mar-2019

जोगी पार्टी के अधिकांश नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं और वे इसके लिए जी-तोड़ मेहनत भी कर रहे हैं। मगर, कांग्रेस के नेता गंभीर नहीं है और उन्हें मजाक में ले रहे हैं। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी लंबे समय तक जोगी के साथ रहे हैं। स्वाभाविक तौर पर जोगी पार्टी के ज्यादातर नेता उन्हीं के संपर्क में बताए जाते हैं। 
सुनते हैं कि पिछले दिनों जोगी पार्टी के पदाधिकारियों ने कांग्रेस प्रवेश की इच्छा जताई, तो उन्होंने अजीब सुझाव दे दिया। शैलेष ने कहा बताते हैं, आप लोग नई पार्टी का गठन कर लो। चुनाव में अच्छा प्रदर्शन रहा, तो सम्मानजनक ढंग से कांग्रेस में विलय हो जाएगा। इससे कांग्रेस में उन्हें महत्व भी मिलेगा। शैलेष की बातें सुनकर जोगी पार्टी के नेता मायूस हो गए। 
कुछ इसी तरह का वाक्या जोगी पार्टी के कुछ नेताओं के साथ हुआ जब ये नेता, मंत्री मोहम्मद अकबर से मिलने गए। उन्होंने अकबर से कहा कि वे आना चाहते हैं। बताते हैं कि अकबर ने मजाकिए लहजे में उनसे कहा कहां आना चाहते हैं। कहां से कहां, किसका तबादला चाहते हैं? नेताओं ने कहा कि वे तबादले के लिए नहीं, कांग्रेस में शामिल होने आए हैं। इस पर अकबर ने गंभीर मुद्रा में कहा कि अभी नहीं, कांग्रेस में वैसे ही ओवर-फ्लो है। कुछ समय इंतजार कीजिए, अपनी जमीन मजबूत कीजिए तब कांग्रेस में शामिल किया जाएगा। 

कश्यप बंधुओं की आर्थिक ताकत
बस्तर भाजपा में दिवंगत बलीराम कश्यप का दबदबा रहा है। बलीराम के गुजरने के बाद भी उनके परिवार की हैसियत में कोई कमी नहीं आई। उनके एक बेटे दिनेश सांसद हैं और केदार 15 साल मंत्री रहे, लेकिन विधानसभा चुनाव में हार के बाद कश्यप परिवार की ताकत पार्टी के भीतर घटी है। कम से कम प्रत्याशी चयन प्रक्रिया के दौरान जिस तरह कश्यप बंधुओं के खिलाफ विरोध के स्वर सुनाई दिए, उससे ऐसा ही लगता है। 
सुनते हैं कि बस्तर लोकसभा अंतर्गत सात जिलों के अध्यक्षों ने दिनेश या फिर केदार की जगह किसी नये चेहरे को टिकट देने की वकालत की है। इनमें से एक जिला अध्यक्ष ने तो खुद को योग्य प्रत्याशी बताया है। ऐसे में बस्तर में किसी एक के नाम पर सहमति बनाना पार्टी के रणनीतिकारों के लिए कठिन हो चला है। आरएसएस ने पूर्व मंत्री महेश गागड़ा का नाम आगे किया है, तो संगठन में हावी खेमा लता उसेंडी को प्रत्याशी बनाना चाहता है। इन सबके बावजूद कश्यप बंधु एक बड़ी आर्थिक ताकत भी हैं। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। 
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Date : 16-Mar-2019

आमतौर पर जनहित याचिकाओं में जांच की मांग होती है। राज्य बनने के बाद विपक्ष के नेता रहे क्रमश: नंदकुमार साय, महेंद्र कर्मा, टीएस सिंहदेव भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के प्रकरणों पर कार्रवाई न होने अदालत की शरण में गए थे। साय ने तत्कालीन सीएम अजीत जोगी पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर चुनाव लडऩे का आरोप लगाया था और इसको लेकर अभी तक अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। 
कर्मा तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ पुष्पस्टील को नियम विरूद्ध खदान आबंटन पर जांच की मांग को लेकर अदालत गए थे। सिंहदेव भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा अगुस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद में अनियमितता पर जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ाई लड़ी। प्रदेश में सत्ता गंवाने के बाद विपक्षी भाजपा भी सरकार के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ रही है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक भी हाईकोर्ट गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार की जांच नहीं, बल्कि रोकने गए हैं। कौशिक ने नान घोटाले की एसआईटी जांच को ही गलत ठहराया है। पिछले दिनों कौशिक की याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई भी हुई।
 कौशिक चाहते थे कि जांच रोकी जाए, लेकिन सरकार की पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदम्बरम ने कौशिक की याचिका पर तंज कसा, कि पहली बार जनहित याचिका देख रहे हैं, जिसमें भ्रष्टाचार की जांच रोकने की मांग की गई है। जबकि जनहित याचिकाओं में जांच की मांग होती है। चिदम्बरम की तर्कों का प्रतिफल यह रहा कि नान घोटाले की जांच रोकने की तमाम कोशिशें सफल नहीं हो पाई। 29 अप्रैल को अगली सुनवाई होगी।  

अब दूसरे अस्पताल की बारी
सरकार बदलते ही सत्ता प्रतिष्ठानों में भी बदलाव हुआ। कई बदले गए और कुछ प्रक्रियाधीन है। सीएस, डीजीपी और पीसीसीएफ के बाद निचले क्रम में कई अहम पदों पर नई पदस्थापना हुई है। इससे परे सुपरस्पेशलिटी डीकेएस अस्पताल अधीक्षक पद से पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता को हटाया गया। अब मेकाहारा के अधीक्षक डॉ. विवेक चौधरी को बदलने की चर्चा चल रही है। 
वैसे डॉ. चौधरी बेहद काबिल डॉक्टर माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ के आसपास के प्रदेशों में भी उनके जैसा कैंसर विशेषज्ञ दूसरा नहीं है। बावजूद उनके खिलाफ यह शिकायत चर्चा में है कि वे पीते हैं। सुनते हैं कि डॉ. चौधरी को हटाने का प्रस्ताव तैयार भी हो गया था। स्वतंत्रता सेनानी डॉ. महादेव पांडेय के पुत्र डॉ. राजीव पांडेय को अधीक्षक बनने का प्रस्ताव भी तैयार हो गया। फाइल आगे बढ़ी, तभी उनका सीआर खंगाला गया। डॉ. पांडेय का 11 साल का सीआर ही नहीं मिला। वे पहले रमेश बैस के केंद्रीय मंत्री रहते उनके निजी चिकित्सक थे। इसके बाद अलग-अलग जगहों पर पदस्थ रहे। अब सीआर नहीं था तो आगे की प्रक्रिया रूक गई। डॉ. चौधरी की जगह नए अधीक्षक के लिए फाइल दौड़ रही है। इसमें डॉ. फुलझेले का नाम सबसे ऊपर बताया जा रहा है। फिर भी कुछ लोग लगे हैं कि डॉ. चौधरी को ही रहने दिया जाए। चुनाव आचार संहिता हटने के बाद इसको लेकर फैसले की उम्मीद है। 

अब किस मुंह से मना करें?

कांग्रेस ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के बेटे को बाराबंकी सीट से प्रत्याशी बनाया है। अब पुनिया को उन नेताओं को टिकट देने से मना करना मुश्किल हो गया है, जो कि अपने बेटे-रिश्तेदारों के लिए टिकट मांग रहे थे। इनमें कैबिनेट मंत्री ताम्रध्वज साहू अपने दुर्ग लोकसभा क्षेत्र से अपने बेटे के लिए टिकट चाह रहे हैं। पूर्व मंत्री अमितेश शुक्ला अपने पुत्र भवानीशंकर और धनेंद्र साहू अपने पुत्र प्रवीण की टिकट के लिए प्रयासरत हैं। इसी तरह  पूर्व विधायक देवती कर्मा भी अपने पुत्र छविंद्र या दीपक के लिए टिकट चाहती हैं। सुनते हैं कि पुनिया ने फिलहाल सभी को आश्वासन देकर शांत करने की कोशिश की है, लेकिन वे अपने बेटे की तरह दूसरों के लिए कितना कुछ कर पाते हैं, यह देखना है। 

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Date : 15-Mar-2019


सरकार बदलते ही आधा दर्जन से अधिक आईएफएस अफसर अपने मूल विभाग में भेज दिए गए। यह फैसला कोई गलत भी नहीं था।  सरकार ने वन विभाग की बेहतरी के लिए ऐसा किया। वन विभाग में लौटने वालों में वर्ष-90 बैच के आईएफएस अफसर संजय ओझा भी हैं, जो कि दिल्ली में आवासीय आयुक्त पद पर थे। वैसे तो आवासीय आयुक्त का पद आईएएस के कैडर का है, लेकिन ओझा की पदस्थापना करते समय इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया था। 
खैर, ओझा एपीसीसीएफ स्तर के अफसर हैं। भाजपा सरकार आने के बाद सीनियर आईएएस डॉ. कल्याण चक्रवर्ती केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए, तो ओझा को भी प्रतिनियुक्ति पर साथ ले गए थे। संजय ओझा ने लंबे समय तक केन्द्र सरकार में काम किया। केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से वापस लौटे, तो ओझा के आग्रह पर पिछली सरकार ने उन्हें दिल्ली में ही रहने दिया। दरअसल, उनकी माता बीमार रहती हैं और उनका दिल्ली के अस्पताल में इलाज चल रहा है। यहां लौटने पर वन मुख्यालय में पोस्टिंग हो गई। वे केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव पद के लिए सूचीबद्ध तो हो चुके थे, जल्द ही उनकी पोस्टिंग भी तय हो गई। केन्द्र सरकार ने संजय ओझा को रिलीव करने के लिए राज्य सरकार को पत्र भेजा। 
सुनते हैं कि सीएम भूपेश बघेल को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने बाकायदा नोटशीट पर इसके लिए अनुमति दे दी। अब विभाग को मात्र रिलीव करना था, लेकिन रिलीविंग की फाइल अफसरों के बीच घूमती रही। संजय ओझा मिन्नतें करते रहे कि उनकी माता बहुत बीमार है और उनकी देखरेख करने के लिए दिल्ली में रहना जरूरी है। वे यहां-वहां रिलीविंग के लिए घूमते रहे। रिलीव न होने पर दो दिन पहले केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति निरस्त हो गई।
यह अफसरशाही का अनोखा नमूना है जिसमें सीएम-मिनिस्टर से लेकर सीएस तक उन्हें केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की अनुमति देना चाह रहे थे, पर उन्हें रिलीव नहीं किया गया। जबकि हाल यह है कि कई सीनियर आईएफएस अफसरों के पास कोई काम नहीं है। अरण्य भवन में कई आला अफसर दो महीने से खाली बैठे हैं।  

पार्ट-2
कुछ दिन पहले रिटायर हुए आईएफएस अफसर पीसी मिश्रा को ग्रामीण विकास का जानकार माना जाता है। वर्ष-85 बैच के अफसर मिश्रा केन्द्रीय ग्रामीण विकास विभाग में काम कर चुके हैं। उन्होंने केन्द्र सरकार में रहते छत्तीसगढ़ के लिए कई योजनाओं को मंजूरी दिलाई। मिश्रा जब प्रतिनियुक्ति से लौटे, तो उनकी पोस्टिंग पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में की गई। वे हर मर्ज की दवा थे। कलेक्टर हो या जिला पंचायत सीईओ, मिश्रा हर किसी को मार्गदर्शन देते थे। वे सबसे ज्यादा लंबे समय तक ग्रामीण विकास विभाग में काम करने वाले अफसर रहे। विभाग में कई घपले-घोटाले भी हुए, लेकिन मिश्रा के दामन पर कभी दाग नहीं लगे। 
सरकार बदलने पर वे विभाग में लौटे तो उन्हें पीसीसीएफ पद पर पदोन्नत होने की उम्मीद थी क्योंकि उनके बैच के राकेश चतुर्वेदी, कौशलेन्द्र सिंह पीसीसीएफ हो चुके थे। अगले तीन महीने में पीसीसीएफ स्तर के चार अफसर रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में उन्हें एपीसीसीएफ से पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नत करने में कोई तकनीकी अड़चन भी नहीं थी। पर विभाग ने ऐसी उदारता नहीं दिखाई। पिछले दिनों उनके रिटायरमेंट पर विभाग के अफसरों ने फेयरवेल पार्टी दी, तो मिश्रा का दर्द झलक उठा। 
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Date : 14-Mar-2019

छोटे जोगी के बर्ताव से जोगी पार्टी में भारी नाराजगी है। एक-एक कर कई नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। पिछले दिनों पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में एक सदस्य ने निष्ठावान कार्यकर्ताओं के पार्टी छोडऩे पर चिंता जताई। उन्होंने छोटे जोगी के बर्ताव पर नाराजगी जताते हुए कहा बताते हैं कि हम किसी के साथ सम्मानजनक ढंग से पेश नहीं आएंगे, तो कोई हमारे साथ क्यों रहेगा? आखिर में छोटे जोगी के बोलने की बारी आई। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि जैसे हम हैं, वैसे ही रहेंगे। हमारा व्यवहार नहीं बदलेगा। जिसे पार्टी में रहना है रहे अन्यथा छोड़कर चले जाए। छोटे जोगी के तेवर के बाद पार्टी से पलायन और तेज होने के आसार दिख रहे हैं। फिलहाल विधान मिश्रा जैसे कुछ नेता हैं जो पुराने दोस्त धरमजीत सिंह के फेर में अब तक जोगी कांगे्रस में तो हैं, लेकिन वहां जाना-आना बंद कर चुके हैं, और कांगे्रस में सम्मानजनक वापिसी तक घर बैठे हैं।

कल आए, आज घोड़ी पर चढऩे...
कांग्रेस में टिकट के दावेदार काफी सक्रिय हैं। प्रभारी मंत्रियों के यहां भी दावेदारों की भीड़ देखी जा सकती है। पिछले दिनों नांदगांव सीट से चुनाव लडऩे के इच्छुक कई नेता रायपुर पहुंचे और वे सीधे प्रभारी मंत्री मोहम्मद अकबर के घर गए। अकबर नांदगांव और कवर्धा के सारे नेताओं को एक साथ देखकर कुछ देर चुप रहे, फिर सबको साथ बिठाकर आने का कारण पूछा। इनमें पूर्व विधायक योगीराज सिंह और हाल ही में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए नरेश डाकलिया भी थे। टिकट के दावेदार अकेले में चर्चा करना चाह रहे थे, लेकिन अकबर ने बताते हैं कि उन्हें कहा घर की बात है, सबके सामने अपनी बात रख सकते हैं। 

योगीराज-डाकलिया और अन्य ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छा जताई और पार्टी का टिकट दिलाने में अकबर का सहयोग मांगा। फिर क्या था, अकबर ने साफ शब्दों में कह दिया कि टिकट के लिए उन्हें प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और सीएम भूपेश बघेल से मिलना होगा। टिकट वे ही तय करेंगे। मेरी कोई भूमिका नहीं होगी। फिर बातों-बातों में हंसी मजाक के बीच उन्होंने कह दिया कि 68 सीट का कमाल है कि लोकसभा में टिकट मांगने वालों की संख्या बढ़ गई है। उनका इशारा डाकलिया की तरफ था, जो कि कुछ दिन पहले ही कांग्रेस में आए हैं और लोकसभा टिकट की दौड़ में शामिल हो गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिन्हें (भोलाराम साहू) टिकट का मजबूत दावेदार माना जा रहा है वे ज्यादा किसी से मेल-मुलाकात नहीं कर रहे हैं और चुपचाप जनसंपर्क में जुटे हैं।
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Date : 13-Mar-2019

भूपेश बघेल सीएम बनने के बाद सम्मान समारोह में शिरकत कर रहे हैं। तकरीबन हर समाज के लोग उनका सम्मान कर चुके हैं। व्यस्तता के बावजूद लोगों से मेल-मुलाकात के लिए समय निकाल रहे हैं। इन सबके बीच पिछले दिनों रायपुर दक्षिण के पराजित कांग्रेस प्रत्याशी कन्हैया अग्रवाल ने सीएम भूपेश बघेल के सम्मान का कार्यक्रम रखा, तो सीएम वहां नहीं गए। जबकि सीएम दिनभर रायपुर में ही थे। वे कांग्रेस नेता अरूण भद्रा के निवास पर भी गए और कुछ अन्य प्रमुख लोगों के साथ बैठक की। ऐसे में कन्हैया के कार्यक्रम में सीएम के नहीं पहुंचने की जमकर चर्चा रही। 
कार्यक्रम में न सिर्फ सीएम बल्कि मंत्रियों का भी सम्मान होना था, लेकिन कोई भी मंत्री वहां नहीं पहुंचा। सिर्फ लोकसभा टिकट के दावेदार प्रमोद दुबे, किरणमयी नायक और अन्य लोगों ने ही उपस्थिति दर्ज कराई। सुनते हैं कि सीएम, कन्हैया अग्रवाल से खासे नाराज हैं। कन्हैया ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और टीएस सिंहदेव को साधकर टिकट तो हासिल कर ली थी, लेकिन प्रचार ठीक से नहीं किया। यही नहीं, टिकट तय होने से पहले कन्हैया रामसागरपारा स्थित एक होटल में भाजपा प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल के कुछ करीबी लोगों के साथ बैठक में देखे गए। हाल यह रहा कि प्रदेश में अनुकूल माहौल न होने के बावजूद बृजमोहन का राह आसान रही। यह सब जानकर भूपेश बघेल का कन्हैया के कार्यक्रम में नहीं जाना स्वाभाविक था। 

लोकसभा चुनाव के लिए 
समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार
पापा मैनपुरी से
बेटा आजमगढ़ से
बीवी कन्नौज से
चचेरा भाई बदायूं से
चाचा बहराइच से
मामा इटावा से
साली खेरी से
साला अकबरपुर से
छोटा भाई फिरोजाबाद से
(सोशल मीडिया से)
  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 12-Mar-2019

आखिरकार दिल्ली में छत्तीसगढ़ भवन के संयुक्त आवासीय आयुक्त संजय अवस्थी को निलंबित कर दिया गया। पिछली सरकार में अवस्थी बेहद पॉवरफुल रहे। वे सीएसआईडीसी में उद्योग निरीक्षक के पद पर थे और फर्नीचर घोटाले के भी आरोपी रहे, लेकिन सरकार में उनकी पकड़ का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि वे एक के बाद एक प्रमोशन पाते गए और संयुक्त आवासीय आयुक्त पद पर पहुंच गए। 
सुनते हैं कि वे छत्तीसगढ़ भवन में रूकने वाले मंत्री-अफसरों के मेल-मुलाकात पर भी नजर रखते थे और इसकी सूचना यहां-वहां पहुंचाते रहे हैं। उनके खिलाफ ढेरों शिकायतें रही, लेकिन बाल-बांका नहीं हुआ। उन्होंने नौकरी के साथ-साथ ट्रेवल्स का भी कारोबार जमा लिया था। सरकार बदली तो दुर्दिन शुरू हो गए। उनकी कई अनियमितताएं पकड़ी गईं। फिर क्या था, उन्हें निलंबित कर जगदलपुर में अटैच कर दिया गया। 

हर बार खबरों में रहते हैं...
रायपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस टिकट के लिए राजेन्द्र तिवारी और पारस चोपड़ा का नाम भी चर्चा में है। दोनों नेता पार्टी के अहम पदों पर रहे हैं। दोनों राज्य बनने से पहले विधानसभा का चुनाव लड़े थे, लेकिन उन्हें बुरी हार का सामना करना पड़ा। हर चुनाव में दोनों नेता टिकट की दावेदारी करते रहे हैं। विधानसभा चुनावों में राजेन्द्र तिवारी धरसींवा से लेकर भाटापारा और बलौदाबाजार तक की सीट से टिकट मांग चुके हैं। कुछ यही हाल पारस चोपड़ा का भी है। चर्चा तो यह भी है कि विधानसभा चुनाव के पहले पारस ने पार्टी छोडऩे का मन बना लिया था। पिछली सरकार के एक ताकतवर मंत्री से उनकी चर्चा हो चुकी थी, लेकिन वे ठिठक गए। 
मीडिया में दोनों नेताओं का नाम आया तो पार्टी के रणनीतिकारों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। राजेन्द्र तिवारी अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से मीडिया प्रबंधन देखते रहे हैं। मीडिया के लोगों से उनकी मित्रता जगजाहिर है। वे व्यवहार कुशल नेता माने जाते हैं और पत्रकारों से मेल मुलाकात पर हमेशा रबड़ी-मीठे से स्वागत के लिए तत्पर रहते हैं। पारस भी मिलनसार हैं। ऐसे में टिकट की अधिकृत घोषणा से पहले दोनों नेताओं का नाम दावेदारों के रूप में मीडिया में चर्चा में रहता है, तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 11-Mar-2019

सरकार ने चुनाव आचार संहिता लगने से पहले आनन-फानन में कुछ अफसरों के तबादले भी किए। आईपीएस अफसर अजातशत्रु सिंह को जगदलपुर और शशिमोहन सिंह को सेनानी छसबल दंतेवाड़ा भेजा गया। ये दोनों अफसर राज्य पुलिस सेवा से पदोन्नत हुए थे। दोनों पिछली सरकार में बेहद पावरफुल रहे। उनकी हैसियत किसी आईजी-एसपी से ज्यादा रही है। अजातशत्रु सेक्स-सीडी प्रकरण की जांच से भी जुड़े रहे। हाल यह रहा कि एसपी तो दूर, उस समय के दुर्ग, रायपुर आईजी तक को मालूम नहीं था कि जांच किस दिशा में चल रही है। 
आईपीएस अवॉर्ड होने के बाद अजातशत्रु को मानवाधिकार आयोग में एसपी और शशिमोहन को एसपी पुलिस अकादमी बनाकर भेजा गया। वैसे तो, ये पद अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण माने जाते हैं, लेकिन चुनाव के वक्त दोनों अफसरों की भूमिका अहम रही है। हल्ला यह है कि दोनों पॉलिटिकल इंटेलीजेंस का काम देखते थे। दोनों की खासियत यह रही है कि सत्ता के बेहद करीब होने के बावजूद तत्कालीन सीएम के बाकी करीबी अफसरों की तरह धौंसबाजी नहीं दिखाई, बल्कि प्रेम-व्यवहार से अपना काम कराते रहे। सरकार बदलने के बाद भी दोनों के खिलाफ कोई खास नाराजगी नहीं थी। फिर भी उन्हें नक्सल प्रभावित बस्तर और दंतेवाड़ा में भेजा गया, जहां पहले कभी उनकी पोस्टिंग नहीं हुई थी। 
आखिर कोई न कोई तो बस्तर में तैनात ही किया जाएगा, और हर अफसर को कभी न कभी तो बस्तर में जाना ही पड़ता है, लेकिन आज के माहौल में इन दोनों की वहां रवानगी के कई मायने निकाले जा रहे हैं। शशिमोहन के दुर्ग में तैनात रहते हुए फिल्मों में काम करने से लेकर छात्राओं के फ्लैट पर छापा मारने तक बहुत से विवाद खड़े हुए। इसी तरह अजातशत्रु ने सेक्स-सीडी कांड में कानूनी संभावनाओं से एकदम बाहर जाते हुए कार्रवाई की, जिसका नतीजा यह निकला कि शुरू में पुलिस द्वारा लगाई गई धाराएं बाद में सीबीआई ने हटा लीं। यह अलग बात है कि अजातशत्रु ने इस सरकार के लोगों को पिछली सरकार के सबसे ताकतवर लोगों द्वारा सामने बैठाकर, बांह मरोड़कर कार्रवाई करवाने की जानकारी दे दी थी। फिर भी कार्रवाई की तो उन्होंने ही थी।

इनका टाईम आ गया....
अभी चार-छह दिन पहले राजधानी रायपुर के सबसे व्यस्त बाजार में दूकानों के बाहर फैलाकर रखे गए सामान जब हटाने के लिए पुलिस ने कहा, तो दूकानदार ने भारी बदसलूकी की, गालियां दीं, धमकियां दीं, और अपने साथ के लोगों को भड़काया कि पुलिस कुछ करे तो उस पर हमला कर दें। पूरे वक्त पुलिस दबी रही क्योंकि गुंडागर्दी कर रहे दूकानदार सत्तारूढ़ कांगे्रस पार्टी के एक स्थानीय नेता के रिश्तेदार थे। पुलिस मां-बहन की गालियां खाकर लौट आई, और उसका वीडियो कई लोगों ने बनाया। इसके बाद जब यह वीडियो चारों तरफ फैला और पुलिस के ऐसे डरने पर लोगों ने पुलिस को धिक्कारा, तब जाकर दूकानदार गिरफ्तार किया गया। इसी वीडियो का नतीजा यह हुआ कि कल भिलाई में जब सुपेला में सड़क पर गाडिय़ां सजाकर बेचने वाले लोगों की गाडिय़ां पुलिस ने जब्त कीं, तो दूकानदारों ने पुलिस को खूब गालियां देते हुए पुलिस की क्रेन-ट्रक से अपनी गाडिय़ां बलपूर्वक उतार लीं, और पुलिस भीड़ के सामने कुछ भी नहीं कर पाई। कुछ हफ्ते पहले पिथौरा में भी ऐसा ही हुआ था। आज तकरीबन पूरे प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के ही विधायक हैं। ऐसे में हर गुंडा-मवाली किसी विधायक का नाम लेकर, किसी मंत्री का नाम लेकर पुलिस पर धौंस दिखाने में लगा हुआ है। यह सरकार को सोचना है कि सत्तारूढ़ पार्टी के करीबी लोगों के गुंडे अगर पुलिस की इतनी बेहाली करते हैं, और वह अगर वीडियो कैमरे पर दर्ज भी हो जाती है, तो उसका क्या नतीजा होगा? एक दूसरी दिक्कत यह है कि इन तीनों ही मामलों में एक धर्म-समुदाय के लोग ही  थे जो पुलिस पर गालियों से हमला कर रहे थे। ऐसी कई घटनाओं का एक नतीजा यह भी निकलने वाला है कि कांगे्रस के सत्ता में आने के बाद एक समुदाय के लोगों की गुंडागर्दी बढऩे की जनधारणा मजबूत होती जाएगी। देश में कुछ पार्टियां जनधारणा का ऐसा ही धु्रवीकरण चाहती भी हैं। अभी सोशल मीडिया पर ऐसी टिप्पणियों के साथ ये वीडियो तैरने भी लगे हैं, और आबादी का खासा बड़ा हिस्सा ऐसा है जो किसी एक धर्म को मुजरिम साबित करने के लिए इसे बढ़ाते भी चल रहा है। ऐस वीडियो के साथ यह टिप्पणी भी चल रही है कि अपना टाईम आ गया...। हो सकता है कि सत्तारूढ़ पार्टी विधानसभा चुनाव के ताजा नतीजों के बाद अब तक कोई खतरा महसूस नहीं कर पा रही हो, लेकिन इसका नुकसान छोटा नहीं होगा।

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Date : 10-Mar-2019

रमन सिंह ने ट्वीट किया कि कांग्रेस सरकार कर्ज लेकर घी पियो, की नीति पर चल रही है। हमने 15 साल में जितना कर्जा नहीं लिया, उतना कांग्रेस सरकार ने दो महीने में ले लिया। रमन के ट्वीट को लेकर भाजपा के अंदरखाने में बहस चल रही है। विरोधी इसके लिए खुद रमन सिंह को जिम्मेदार ठहराते हैं। 
विरोधियों का तर्क है कि कैबिनेट में मंत्रियों की राय के खिलाफ जाकर रमन सिंह ने मोबाइल बांटने का फैसला लिया था। करीब 22 सौ करोड़ की इस योजना से भाजपा को कोई फायदा नहीं हुआ, उल्टे प्रदेश में भाजपा की गांव-गरीब और किसान विरोधी छवि बन गई। मोबाइल योजना कांग्रेस सरकार ने बंद कर दी है, लेकिन इसका भुगतान सरकार के गले की हड्डी बन गया है। रमन सरकार ने 27 लाख मुफ्त मोबाइल बांटे थे। अब इसका भुगतान नई सरकार पर छोड़ दिया गया है। कुल मिलाकर 1027 करोड़ रूपए कंपनी को देने हैं, जिसमें से सिर्फ 179 करोड़ पिछली सरकार ने दिए हैं। मोबाइल तो बंट चुके हैं, बकाया भुगतान की जिम्मेदारी नई सरकार पर है। यानी इसके लिए कर्ज तो लेना ही पड़ेगा। 
कमीशनखोरी को लेकर भी हल्ला है। भाजपा के लोग मानते हैं कि जब पूरा भुगतान हुआ ही नहीं है, तो कमीशन कैसा। यानी वे अपने को पाक साफ बता रहे हैं, लेकिन अंदरखाने की खबर यह है कि योजना शुरू होने से पहले जियो रिलायंस कंपनी का कनेक्शन पूरे प्रदेश में मात्र 14 हजार था, जो कि दो महीने के भीतर बढ़कर 10 लाख से अधिक हो गया। अब कंपनी को बैठे बिठाए इतना फायदा हुआ है, तो काम देने वालों का कुछ हक तो बनता ही है। आज जब कांगे्रस सरकार पता लगा रही है तो सामने आ रहा है कि किस तरह इस एक अकेली कंपनी को तमाम गांव-जंगल में टॉवर लगाने के लिए अफसरों ने खड़े-खड़े इजाजत दी थी।

पंचायतें इस वजह से खफा थीं...
एक दूसरा मामला उस समय भी सामने आ गया था जब मोबाइल कंपनी को टॉवर लगाने के लिए रमन सरकार 6सौ करोड़ से अधिक की रकम देने जा रही थी। और इस रकम का इंतजाम उस वक्त पंचायत विभाग के एसीएस रहे एमके राऊत ने एक रास्ता निकालकर कर दिया था। उन्होंने पंचायतों की मूलभूत की राशि को वापिस बुलवाकर राज्य सरकार को टॉवर के लिए देने का हुक्म निकाल दिया था। इसके पीछे यह तर्क ढूंढ लिया गया था कि यह रकम पंचायत के आधारभूत ढांचे के विकास के लिए रहती है, और हर पंचायत की तरफ से यह मान लिया गया था कि उसे अपना मोबाइल नेटवर्क ही विकसित करना है। इसके लिए सैकड़ों करोड़ रुपये पंचायतों से चिप्स के खाते में आ भी गए थे, लेकिन समय रहते तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह को लोगों ने सावधान किया, और इस फैसले को रोक दिया गया था। लेकिन तब तक प्रदेश के पौने दो लाख पंच-सरपंच अपनी पंचायत के हिस्से की रकम राज्य सरकार द्वारा लूट लेने के फैसले से खफा हो चुके थे, और वह नाराजगी चुनाव में भी इसलिए हावी रही कि यह सरकार लौटेगी तो फिर पंचायत की रकम खा जाएगी। नतीजा यह हुआ कि अफसरों के इस फैसले की वजह से भाजपा निपट गई। लेकिन ताकतवर अफसरों के सामने पार्टी में किसी की कोई जुबान थी नहीं, और इसलिए वोटरों ने मौका मिलते ही ऐसी सरकार को ही निपटा दिया। ऐसी तमाम बातें किसी भी सरकार के लिए एक सबक हो सकती हैं।(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 09-Mar-2019

आईएएस अफसर चंदन कुमार जब तक नांदगांव जिला पंचायत सीईओ रहे, उनकी कांग्रेस के सदस्यों से नहीं बनी। कांग्रेस के जिला पंचायत सदस्य उन पर भाजपाईयों को महत्व देने का आरोप लगाते रहे, लेकिन सरकार बदलते ही उन्हें कलेक्टरी का मौका मिल गया। वे सुकमा कलेक्टर बनाकर भेजे गए। सुनते हैं कि स्थानीय कांग्रेस नेता भले ही उनके विरोधी रहे, लेकिन प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिव चंदन  यादव का उन्हें भरपूर साथ मिला। 
दोनों चंदन बिहार के रहने वाले हैं और पुरानी जान-पहचान भी है। चुनाव से पहले चंदन यादव, चंदन कुमार से जिले में कांग्रेस की स्थिति को लेकर फीडबैक लेते रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि कांग्रेस ने जब खुज्जी से छन्नी साहू और डोंगरगढ़ से भुनेश्वर बघेल को टिकट देना तय किया था तो चंदन यादव ने चंदन कुमार से भी राय ली थी। दोनों ही जिला पंचायत के सदस्य रहे हैं। कुल मिलाकर चंदन कुमार को कांग्रेस की सरकार में दिक्कत नहीं रहेगी। 

नेताजी का बीज सप्लायर
पिछली सरकार में भाजपा के प्रदेश स्तर के सबसे बड़े नेता के दबदबे के चलते वन विभाग पर यह दबाव बने रहता था कि उनके सबसे करीबी एक आदमी से ही बांस के बीज खरीदने हैं। बेलगहना के रहने वाले इस आदमी का रूतबा ऐसा था कि वह बड़े-बड़े वन संरक्षकों के दफ्तर में बैठकर तय करता था कि कौन सा अफसर कहां पर रहेगा। कई गुना दाम पर बांस के बीज लेने में भी वैसे तो कोई बड़ी दिक्कत नहीं थी क्योंकि सरकारी खरीदी तो होती ही कई गुना दाम पर है, लेकिन बीज ऐसे घटिया क्वालिटी के मिलते थे कि उनमें से 10 फीसदी भी अंकुरित नहीं हो पाते थे। नतीजा यह होता था कि वन विभाग का बांस लगाने का सारा खर्च ही बेकार हो जाता था। 
अब ऐसे लोग नेताजी के लिए एक-एक घर बनवाते चलते थे। नेताजी के खुद के तो कई घर बन गए, लेकिन उनकी पार्टी का घर ठीक वैसा ही उजड़ गया जैसा कि बांस का जंगल जो कि उगने के पहले ही उजड़ गया। एक जंगल अफसर ने कहा कि उन्होंने नेताजी को यह सुझाया था कि उन्हें बीज देहरादून से भारत सरकार की नर्सरी से लेने दें, वे बेलगहना के सप्लायर को घर बैठे कमीशन दे देंगे, कम से कम बांस तो उगेगा। लेकिन काली कमाई का मोह ऐसा था कि नेताजी ने पार्टी का जिम्मेदार रहते हुए भी पार्टी को बांस पर लिटाकर दम लिया।

स्टेडियम खाली रहना भारी पड़ा
खबर है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह प्रदेश के बड़े नेताओं से खफा हैं। शाह इंडोर स्टेडियम में कार्यकर्ता सम्मेलन के बाद विधायक-सांसदों की बैठक लेने वाले थे, लेकिन स्टेडियम खाली देखकर उनका मूड उखड़ गया। चार लोकसभा क्षेत्र के इस सम्मेलन में ले-देकर तीन-चार हजार लोग ही जुट पाए। जबकि करीब 38 हजार कार्यकर्ताओं को न्यौता भेजा गया था। हाल यह रहा कि खुद महामंत्री (संगठन) पवन साय युवा मोर्चा के पदाधिकारियों को शाह के स्टेडियम पहुंचने पर पटाखा फोडऩे का आग्रह करते देखे गए। 
शाह सम्मेलन के बाद विधायक-सांसदों की बैठक लेने के बजाय अपनी गाड़ी में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह व सौदान सिंह को बिठाकर सीधे एयरपोर्ट के लिए निकल गए। सुनते हैं कि रास्ते में शाह ने इस फीके सम्मेलन के लिए दोनों नेताओं के समक्ष नाराजगी भी जाहिर की।  इस सम्मेलन के बाद से धरमलाल कौशिक का अध्यक्ष पद से हटना तय हो गया था। जबकि उन्हें पहले लोकसभा चुनाव तक पद पर बने रहने के संकेत दे दिए गए थे। (rajpathjanpath@gmail.com)