राजपथ - जनपथ
अनुराग को एक्सटेंशन, अमिताभ का क्या?
छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश, दोनों ही पड़ोसी राज्यों के सीएस एक्सटेंशन पर हैं। छत्तीसगढ़ के सीएस अमिताभ जैन को तीन माह का एक्सटेंशन मिला हुआ है। अब उन्हीं के बैचमेट मध्यप्रदेश के सीएस अनुराग जैन को एक साल का एक्सटेंशन मिल गया है।
आईएएस के 89 बैच के अफसर अनुराग जैन, अविभाजित मध्यप्रदेश में कांकेर के एडिशनल कलेक्टर रह चुके हैं। अनुराग जैन, तीन जिलों के कलेक्टर और पीएमओ में भी ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर काम कर चुके हैं। अमिताभ जैन और अनुराग, दोनों के बीच निजी संबंध काफी अच्छे हैं। इधर, अमिताभ जैन के एक्सटेंशन की अवधि 30 सितंबर को खत्म हो रही है। ऐसे में उनके एक्सटेंशन की अवधि बढ़ाई जाएगी या नहीं, इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं।
खास बात ये है कि अमिताभ जैन के रिटायरमेंट के दिन राज्यपाल ने उन्हें स्मृति चिन्ह देकर बिदाई भी दे दी थी। कैबिनेट में उन्हें बिदाई दी जा रही थी, तभी दिल्ली से उन्हें तीन माह का एक्सटेंशन मिलने की सूचना आई। इसके बाद आनन-फानन में विधिवत प्रस्ताव केन्द्र को भेजा गया, और फिर शाम तक एक्सटेंशन ऑर्डर निकला।
अमिताभ जैन प्रदेश में सबसे लंबे समय तक सीएस के पद पर रहने वाले अफसर हैं। चर्चा है कि वो खुद भी एक्सटेंशन के लिए प्रयासरत नहीं थे, बल्कि सीआईएस (मुख्य सूचना आयुक्त) पद पर काम करने के इच्छुक थे। उन्होंने इसके लिए इंटरव्यू भी दिया था। चूंकि उन्हें एक्सटेंशन मिल गया, इसलिए सीआईएस के पद पर नियुक्ति का मामला टल गया। अब आगे क्या होगा, यह तो अगले कुछ दिनों में पता चलेगा।
ताकतवर होंगे जिलाध्यक्ष

कांग्रेस में जिलाध्यक्षों को ताकत दी जा रही है। यानी पार्टी के कार्यक्रमों से लेकर प्रत्याशी चयन में जिलाध्यक्षों की राय को अहमियत दी जाएगी। कुल मिलाकर जिलाध्यक्ष पहले की तुलना में ज्यादा पॉवरफुल होंगे। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने साफ कर दिया है कि जिले का कितना भी बड़ा नेता हो, उसे जिलाध्यक्ष की बात माननी होगी।
हालांकि पार्टी ने जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया भी निर्धारित की है जिसमें दावेदारों को इंटरव्यू देना होगा। छत्तीसगढ़ में अगले महीने से जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होगी। करीब डेढ़ दर्जन जिलों में अध्यक्षों का चयन होना है। इसके लिए अभी से दावेदार सक्रिय हैं। देखना है किसको मौका मिलता है।
बीवीआर को बड़ी भूमिका ?

बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम को जल्द ही एक हाई प्रोफाइल और बड़े पूंजीगत खर्च वाली सरकारी परियोजना सौंपी जा सकती है, जिसका उद्देश्य अनुसंधान और विकास (रिसर्च एंड डेवलपमेंट) में सुधार लाना है। इसे भारत के नीति परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।
यह देखना है कि क्या यह जि़म्मेदारी उनकी मौजूदा भूमिका के अतिरिक्त होगी। सुब्रमण्यम इस समय नीति आयोग के सीईओ हैं। बीवीआर, मोदी सरकार के विश्वस्त अफसरों में गिने जाते हैं। रमन 3.0 में एसीएस गृह रहे बीवीआर को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर लेकर पहले जम्मू-कश्मीर का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। उसके बाद केंद्रीय उद्योग व्यापार विभाग में सचिव फिर रिटायरमेंट के बाद नीति आयोग में पदस्थ किए गए।
हालाँकि, इस घटनाक्रम को लेकर यहां जो चर्चा हो रही है, वह उनके सफल प्रशासनिक ट्रैक रिकॉर्ड पर सरकार के भरोसे को दर्शाती है। छत्तीसगढ़ कैडर के 1987 बैच के आईएएस अधिकारी, सुब्रह्मण्यम को लंबे समय से भारत के विकास एजेंडे के प्रमुख निर्माताओं में से एक माना जाता रहा है। वे छत्तीसगढ़ गठन के शुरूआती दौर में प्रतिनियुक्ति पर विश्व बैंक में भी पदस्थ रहे हैं।
सोशल मीडिया में तस्वीरों का खेल

सोशल मीडिया पर तैरती तस्वीरों का सच अक्सर वैसा नहीं होता जैसा दिखता है। कई एडिटेड और फर्जी होती हैं। कई असली भी, लेकिन साथ लिखी गई कहानी अलग। कभी पूरी तरह भ्रामक, तो कभी आधा-अधूरा सच।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की हाल की पुण्यतिथि के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए एक तस्वीर वायरल हुई। इसमें केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और कुछ अन्य नेत्रियां दिखाई दे रही हैं। तस्वीर के साथ तरह-तरह के कमेंट किए गए, जैसे, अपनी इस दुनिया में सबको इतना खुश देख अटलजी से भी नहीं रहा गया, वे भी खिलखिलाने लगे। जांच करने पर पता चल रहा है कि यह कोई ताजा तस्वीर नहीं थी। सर्च इंजन का पीछा करने पर यह पोस्ट कांग्रेस नेता और मध्यप्रदेश प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के 25 अगस्त 2018 के ट्विटर (अब एक्स) अकाउंट से मिली। उनकी पोस्ट में सिर्फ यही नहीं, बल्कि ऐसी तीन और तस्वीरें भी थीं। पहली तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अस्पताल के भीतर मेडिकल स्टाफ से हंसते हुए बात कर रहे हैं। पटवारी ने दावा किया था कि यह अटलजी की मृत्यु के दिन की तस्वीर है। दूसरी तस्वीर वही है, जिसमें चौहान और भाजपा नेत्रियां दिख रही हैं। पटवारी ने लिखा कि यह अटल जी की मौत के सातवें दिन की तस्वीर है। तीसरी, अटलजी के चित्र के सामने दीप जलाने की है, जिसमें दोनों ओर खड़े कुछ नेता ठहाके लगाते नजर आ रहे हैं। पटवारी का दावा था कि ये भाजपा के सांसद-विधायक हैं। चौथी तस्वीर में छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल और अजय चंद्राकर दिखाई देते हैं। उस समय दोनों छत्तीसगढ़ मंत्रिपरिषद के सदस्य थे। इस पर पटवारी ने टिप्पणी की है-अस्थिकलश के साथ ठहाके लगाते मंत्री। पटवारी ने इसके बाद और भी बातें लिखीं, जिन्हें यहां दोहराना जरूरी नहीं।
उस वक्त भाजपा की ओर से तत्काल प्रतिक्रिया आई थी। भाजपा ने कहा कि चौहान की जो तस्वीर अटलजी की मौत के सातवें दिन की जा रही है, वह असल में कमल शक्ति संवाद कार्यक्रम की है, जहां दीप प्रज्ज्वलन हुआ था। इसी तरह पहली तस्वीर, जिसमें प्रधानमंत्री अस्पताल में दिखाई दे रहे हैं, उसे भी भाजपा नेताओं ने कहा कि यह अटलजी के निधन से संबंधित नहीं, बल्कि किसी अन्य मौके की है। कहा- कांग्रेस का मकसद केवल बदनाम करना है।
दरअसल, सोशल मीडिया को भाजपा की आईटी सेल ने 2014 चुनाव के पहले से संगठित और आक्रामक ढंग से इस्तेमाल किया, जिसने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। मगर, अब कांग्रेस भी उसी खेल में उतर चुकी है। नतीजा यह कि दोनों तरफ से तस्वीरों और पोस्ट के गोला-बारूद चल रहे हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री पर बने कार्टून और वायरल पोस्ट इसी खेल की ताजा झलक हैं। सोशल मीडिया अब केवल संवाद का जरिया नहीं, बल्कि राजनीति का हर समय व्यस्त अखाड़ा है।
नक्सली और पुलिस के बीच पिसते युवा
सुकमा जिले के मंडीमरका गांव में बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षा दूत लक्ष्मण बारसे की हत्या नक्सलियों ने पुलिस की मुखबिरी के आरोप में कर दी। बस्तर से आ रही रिपोर्ट बताती है कि इस घटना के बाद वहां के शिक्षा दूतों में गहरी दहशत फैल गई है। लक्ष्मण बारसे सचमुच पुलिस का मुखबिर था या नहीं, यह तय करने का नक्सलियों का मानदंड शायद इतना भर है कि कोई व्यक्ति किसी सरकारी योजना में हाथ बंटा रहा हो।
15 अगस्त को कांकेर जिले के बनीगुंडा गांव में भी ऐसा ही हुआ। नक्सली स्मारक पर तिरंगा पहनाने वाले युवक मनेश नरेटी को जन अदालत लगाकर सरेआम मार डाला गया। नक्सलियों ने उसे भी पुलिस का सहयोगी बताया। बस्तर पुलिस ने झंडा फहराने का वीडियो जारी कर इसे शांति की ओर बढ़ते कदम के रूप में पेश किया, लेकिन इस युवक को सुरक्षा देना जरूरी नहीं समझा गया।
पीछे लौटें तो घटनाओं की एक और कड़ी मिलती है। 10 जून को बस्तर पुलिस ने प्रेस नोट जारी कर इंद्रावती टाइगर रिजर्व में 7 माओवादियों के मारे जाने की बात कही थी। इनमें से एक महेश कुडिय़ाम भी था। महेश सरकारी स्कूल में रसोईया था और उसके सात छोटे-छोटे बच्चे हैं। हर महीने उसके खाते में सरकारी भुगतान भी आता था, लेकिन पुलिस का दावा रहा कि वह नक्सलियों का सहयोगी था।
यहां तस्वीर उलट दिखती है। जिस तरह शिक्षा दूत लक्ष्मण को नक्सलियों ने मुखबिर समझा, उसी तरह महेश को पुलिस ने माओवादी मान लिया। मनेश नरेटी का मामला और भी विचलित करने वाला है। हत्या के कुछ दिन पहले सामने आए एक वीडियो में वह रिपोर्टरों से गांव की समस्याओं पर बात कर रहा था। राशन, अस्पताल, सडक़ और पानी जैसी बुनियादी दिक्कतों को उठाते हुए उसने सरकार की आलोचना भी की थी। पढ़ाई-लिखाई में अच्छा, नवोदय विद्यालय से 12वीं तक पढ़ा मनेश अपने गांव का जागरूक और जिम्मेदार युवक दिखता था। बावजूद इसके नक्सलियों ने उसे तिरंगा फहराने की वजह से सरकार का सहयोगी ठहराया और जन अदालत में उसकी हत्या कर दी।
ये तीनों घटनाएं एक ही सच्चाई सामने रखती हैं, वह है बस्तर के युवाओं पर अविश्वास। जो भी शिक्षा देने की कोशिश करेगा, जो भी देशभक्ति जताएगा, जो भी अपनी आवाज उठाएगा, सामने दिख जाएगा- वह नक्सलियों और पुलिस, दोनों की नजर में शक के घेरे में आ जाएगा। यहां युवा किसी भी ओर खड़े हों, अपनी जान को दांव पर लगाना उनकी नियति बन गई है।
ट्रंप का टैरिफ और वेतन आयोग
वर्ष 25 शुरू होते ही केंद्र सरकार ने 19 जनवरी को 8वें वेतन आयोग के गठन की घोषणा कर खूब वाहवाही बटोरी थी लेकिन उसके बाद से इन आठ महीनों में आयोग के अध्यक्ष, सदस्य, सचिव की नियुक्ति नहीं हो पाई है। इसका इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है। यह प्रक्रिया अब तक अटकती नजर आ रही है। दिल्ली से संपर्क में रहने वाले केंद्रीय कर्मचारी संगठनों के नेताओं की मानें तो आयोग की घोषणा में तीन प्रमुख वजहें हैं, जिनकी वजह से सारा मामला खिंचता चला जा रहा है। इनमें पहला आयोग के कामकाज और सिफारिश के लिए नियम शर्तें, कार्य-परिधि यानी (टर्म्स आफ रिफरेंस) तैयार करना है। सरकार अभी तक इसे को अंतिम रूप नहीं दे पाई है। दूसरा,वेतन आयोग की सिफारिशें सरकार की आर्थिक नीति और राजकोषीय संतुलन पर बड़ा असर डालती हैं। 7वें वेतन आयोग के बाद भी सरकारी खजाने पर हज़ारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा था। अब जब देश की अर्थव्यवस्था ट्रंप के टैरिफ जैसे बड़ी चुनौतियों से निपटने के रास्ते तलाश रही है, ऐसे में फिलहाल कोई ऐसा बड़ा कदम उठाने से बच रही है, जिससे वित्तीय स्थिति पर और दबाव आए। यही कारण है कि 8वें वेतन आयोग की दिशा में ठोस बजटीय प्रावधान अभी नहीं किए गए हैं।
तीसरा और सबसे अहम कारण मौजूदा वेतन संरचना का अध्ययन करके नया स्ट्रक्चर तैयार करना। इसमें बेसिक पे, ग्रेड पे, भत्ते और पेंशन सिस्टम तक में बदलाव करना पड़ता है। अलग-अलग वर्गों, विभागों के कर्मचारियों की मांगों को ध्यान में रखकर एक ऐसा मॉडल तैयार करना जो व्यवहारिक भी हो और राजकोष पर ज़्यादा बोझ भी न डाले, आसान काम नहीं है। मौजूदा हालात देखकर लगता है कि यह प्रक्रिया और लंबी खिंच सकती है।
पार्षदों में निराशा
नगरीय निकायों में बड़ी जीत के बाद विकास कार्यों की रफ्तार तेज होने की उम्मीद जताई जा रही थी। कम से कम रायपुर नगर निगम के पार्षद तो ऐसा ही सोचते थे। मगर अब भाजपा के कई पार्षद निजी चर्चा में विकास कार्य नहीं होने की बात कह रहे हैं।
दरअसल, सरकार ने सभी निकायों को नगरीय विकास योजना के अंतर्गत वार्डों का सर्वे कर प्रस्ताव भेजने के लिए कहा है। पिछले चार महीने से सर्वे ही चल रहा है, और अब तक प्रस्ताव नहीं भेजा जा सका है। स्वाभाविक है कि प्रस्ताव नहीं जाएगा तो राशि का आबंटन भी नहीं होगा। इन सब वजहों से विकास कार्य ठप्प पड़े हैं। बारिश के बाद काम तेज होने की उम्मीद जताई जा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
महिला अफसरों का प्रमोशन

राज्य पुलिस सेवा के वर्ष-2002 बैच के 7 अफसरों को मंगलवार को आईपीएस अवार्ड हुआ। इनमें तीन महिला अफसर हैं। खास बात ये है कि ये अफसर प्रमोशन के मामले में अपने बैच के राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की तुलना में छह साल पीछे रह गए।
राज्य प्रशासनिक सेवा के वर्ष-2008 बैच तक के अफसरों को आईएएस अवार्ड हो चुका है। दोनों सेवा के अफसरों के प्रमोशन में गैप हाल के वर्षों में हुआ है। राज्य बनने के पहले तो रापुसे के अफसरों को पहले आईपीएस अवार्ड हो जाता था।रापुसे के अफसर आईपीएस अवार्ड होने के बाद रिटायरमेन्ट तक एडीजी तक पहुंच जाते थे। राजीव श्रीवास्तव तो रिटायरमेंट के अंतिम दिन डीजी के पद प्रमोट हो गए थे।
बाद में परिस्थितियां बदली, और राज्य बनने के बाद आईएएस का कैडर रिवीजन हुआ। पदों की संख्या बढऩे से थोक में राप्रसे के अफसरों आईएएस अवार्ड होने लगा, और वो अपने बैच के रापुसे के अफसरों से आगे निकल गए।
आईपीएस अवार्ड होने वाली दो महिला अफसर भावना पांडेय, और श्वेता श्रीवास्तव सिन्हा के पति भी आल इंडिया सर्विस के अफसर हैं। भावना के पति विजय पांडेय जांजगीर-चांपा जिले के एसपी हैं। उन्हें पहले ही आईपीएस अवार्ड हो चुका है। जबकि श्वेता के पति तारण प्रकाश सिन्हा आईएएस अफसर हैं। वो डायरेक्टर पंचायत हैं, और पहले जांजगीर-चांपा, रायगढ़ व राजनांदगांव जिला कलेक्टर रह चुके हैं।
चाकूबाजी पर अमेजऩ इंडिया को नोटिस
छत्तीसगढ़ में चाकूबाजी की घटनाओं का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है। इन वारदातों के पीछे नशेड़ी अपराधी तो हैं ही, लेकिन असल में आग में घी डालने का काम कर रही हैं ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियां। बार-बार चेतावनी और रोक लगाने के निर्देशों के बावजूद ये प्लेटफॉर्म आज भी खुलेआम प्रतिबंधित चाकू की बिक्री कर रहे हैं। सवाल यह है कि किसके बल पर ये कंपनियां कानून को धता बताने का साहस जुटा रही हैं?
अब पहली बार छत्तीसगढ़ की पुलिस ने एक ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म पर कुछ कड़ा शिकंजा कसने का इदारा दिखाया है। सक्ती जिले की पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा ने अमेजऩ इंडिया को सह-अभियुक्त बनाने की नोटिस दी है। इसमें कहा गया है कि शस्त्र अधिनियम 1959 की धारा 2 और 5 बेहद साफ हैं। लाइसेंस के बिना किसी भी प्रतिबंधित शस्त्र की बिक्री, भंडारण और सप्लाई अपराध है। जब्त किए गए चाकू इस निषेध की परिधि में आते हैं। फिर भी अमेजऩ इंडिया इन हथियारों की ऑनलाइन बिक्री और डिलीवरी कर कानून और जनता, दोनों से खिलवाड़ कर रही है। इन चाकुओं का इस्तेमाल लूट, धमकी और हत्याओं में हो रहा है। निर्दोष लोग खून से लथपथ हो रहे हैं और ई कॉमर्स कंपनियां मुनाफे की गद्दी पर बैठी आंख मूंदे हुए हैं। हम सिर्फ बिचौलिये हैं, कहकर पल्ला झाड़ लेने की कोशिश करती हैं। मगर, शस्त्र अधिनियम में भंडारण भी तो अपराध है। बिना भंडारण के चाहे वह सामान भेजने के प्वाइंट पर हो या पहुंचने के प्वाइंट पर क्राइम तो ये कंपनियां भी कर रही हैं। इसी बात को सक्ती एसपी ने पकड़ा है।
वैसे यह केवल छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं, पूरे देश की है। ई-कॉमर्स कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रभावशाली कारोबारी हैं। सरकार की कारोबारी नीतियों पर इनका दखल हो सकता है। छत्तीसगढ़ के एक जिले का कोई पुलिस अफसर यदि नोटिस भेज भी दे तो उनके पास बड़े-बड़े वकील भी होते हैं। ऐसे में इस नोटिस से उनकी सेहत पर कोई असर पड़ेगा कहना मुश्किल है। अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रदेशभर में बढ़ती चाकूबाजी पर चिंता जताते हुए पुलिस अफसरों को नोटिस जारी की है। पुलिस अफसरों को जवाब में बता देना चाहिए कि हम तो जैसे ही पता चलता है, जब्ती करते हैं, पर ई- कॉमर्स कंपनियां हमारे विरोध के बावजूद सप्लाई कर रही हैं। तब शायद हाईकोर्ट इन कंपनियों को भी नोटिस जारी कर दे।
भगत को लेकर पार्टी गंभीर
डीएमएफ के मसले पर वित्त मंत्री ओपी चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोलने पर भाजयुमो नेता रवि भगत को पार्टी से निष्कासन की नोटिस तो थमा दी गई है लेकिन पार्टी उनके खिलाफ कार्रवाई के मूड में नहीं है। अलबत्ता, पार्टी उन्हें पुचकार भी रही है। इसका अंदाजा उस वक्त लगा, जब नए भाजयुमो अध्यक्ष राहुल टिकरिया का पदभार कार्यक्रम था। कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में हुए कार्यक्रम में रवि भगत मंच पर थे।
रवि भगत ने न सिर्फ अपने उत्तराधिकारी का स्वागत किया बल्कि उन्होंने भाषण भी दिया। उस वक्त मंच पर महामंत्री (संगठन) पवन साय भी थे। इसके बाद भगत ने रायगढ़ के प्रभारी मंत्री रामविचार नेताम को चि_ी भी लिखी है। इसमें उन्होंने डीएमएफ की राशि प्रभावित इलाके में खर्च करने का सुझाव दिया है। चर्चा है कि पार्टी भगत के सुझावों को गंभीरता से ले रही है।
कलेक्टर का पत्र और नाराजगी

कबीरधाम कलेक्टर गोपाल वर्मा की एसपी को लिखी एक चि_ी सोशल मीडिया मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें उन्होंने कलेक्टर बंगले के पास आधी रात को धरना-प्रदर्शन पर नाराजगी जताई है। उन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। खास बात ये है कि कलेक्टर और एसपी का बंगला अगल बगल है। बावजूद इसके उन्हें चि_ी लिखना पड़ गया।
कांग्रेस के नेता, कलेक्टर की चि_ी को लेकर राज्य सरकार को आड़े हाथों ले रहे हैं। साथ पुलिस और प्रशासन के बीच तालमेल पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कलेक्टर गोपाल वर्मा पहले भी सुर्खियों में रहे हैं। उन्होंने विलंब से दफ्तर आने वाले कर्मचारियों को उठक बैठक करवाई थी इसके बाद प्रदेश भर के कर्मचारी आंदोलित हो गए थे बाद कलेक्टर को खेद प्रकट करना पड़ा।

कवर्धा डिप्टी सीएम विजय शर्मा का गृह जिला है और गोपाल वर्मा की पोस्टिंग में डिप्टी सीएम की अहम भूमिका रही है। गोपाल वर्मा, डिप्टी सीएम के विश्वविद्यालय के दिनों के साथी रहे हैं। हालांकि गोपाल वर्मा को आईएएस अवार्ड दिलाने में तत्कालीन सीएम भूपेश बघेल की भूमिका रही है। अब जब पत्र वायरल हुआ है, तो सरकार में नाराजगी है। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
गोह के शिकारियों की नजर मोहनभाठा पर

कोटा ब्लॉक के मोहनभाठा का अपने आप तैयार जंगल दुर्लभ वन्य जीवों, प्रवासी पक्षियों का अद्भुत ठिकाना है। यहां बीते दिनों गोह का शिकार करने वाले दो गिरोह रंगे हाथ पकड़े गए। ये लोग लंबे समय से गोह को पकडक़र उसकी गर्दन पूंछ से बांध ले जाते थे। इसके बावजूद यह सुकून की बात है कि गोह आज भी यहां दिखाई देती है। हां, संख्या पहले जैसी नहीं रही, लेकिन उम्मीद है कि यह अपनी अगली पीढिय़ों को बढ़ा रही है।
मोहनभाठा के सागौन प्लांटेशन में वन्यजीव प्रेमी पत्रकार प्राण चड्ढा के कैमरे में कैद हुई यह मजबूत और शानदार गोह इसकी जीवटता की कहानी कहती है। तंदरुस्त बदन, लंबाई और रौबदार चाल देखकर लगता है कि यह अब भी अपनी दुनिया को संभाले हुए है। गोह का वैज्ञानिक नाम से मॉनिटर लिजर्ड़ है। बड़ी छिपकली प्रजातियों में गिनी जाती है। उम्र लगभग 15 से 20 साल तक होती है। लंबाई 1 से 1.8 मीटर और वजऩ 7 से 20 किलो तक हो सकता है। इसकी दो-शाखाओं वाली जीभ सांप जैसी दिखती है, लेकिन यह विषैली नहीं होती। मज़बूत नाखून और लंबी पूंछ इसे और भी खास बनाते हैं।
गोह अक्सर जंगल, खेत, नदी किनारे और यहां तक कि गांवों के आसपास भी देखी जा सकती है। ये बेहतरीन तैराक होते हैं और पानी के पास रहना पसंद करते हैं। इनका आहार पूरी तरह मांसाहारी है, जिसमें छिपकलियां, मेंढक, सांप, पक्षियों के अंडे, चूहे और छोटे जीव शामिल हैं।
भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची-एक में गोह को विशेष सुरक्षा प्राप्त है। इसका शिकार या व्यापार पूरी तरह प्रतिबंधित है। मगर बात वही है कि शिकारी इन पर नजर गड़ाए रहते हैं।
सब दिग्गज प्रदेशबदर
चर्चित कोयला घोटाले के सभी प्रमुख आरोपियों की रिहाई हो गई है। प्रमुख आरोपी सूर्यकांत तिवारी, सौम्या चौरसिया, निलंबित आईएएस रानू साहू, और समीर विश्नोई करीब ढाई साल से अधिक समय जेल में रहे, और फिर उन्हें सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत मिली। सभी आरोपियों को जमानत अवधि में प्रदेश से बाहर रहने की शर्त है, और ये सभी प्रदेश छोड़ चुके हैं।
सबसे आखिरी में कुछ दिन पहले सूर्यकांत तिवारी की रिहाई हुई। उन्होंने भी प्रदेश छोड़ दिया है। वो दिल्ली में शिफ्ट हो चुके हैं। तिवारी ने दो दिन पहले ही जिला अदालत को इसकी सूचना दे दी है। इससे परे सौम्या बेंगलुरू, समीर विश्नोई जबलपुर, रानू साहू भोपाल में निवासरत हैं। इन सभी को पेशी में रायपुर की विशेष अदालत में महीने में एक बार हाजिर होना पड़ता है।
बताते हैं कि ईडी, और ईओडब्ल्यू-एसीबी ने आरोपियों के रिहा होने के बाद भी जांच में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। विशेषकर दोनों प्रमुख आरोपी रानू साहू, और सौम्या के खिलाफ सबूत जुटाए जा रहे हैं। चूंकि दोनों सरकारी अफसर हैं, इसलिए आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की जानकारी सामने आई है। इसको लेकर कई पुख्ता दस्तावेज भी मिल चुके हैं। अब अदालत में ये आरोप कितना टिक पाता है, यह देखना है।
डिस्टिलरी मालिकों से रियायत!
शराब घोटाला केस की भी जांच चल रही है। घोटाले के प्रमुख आरोपी अनवर ढेबर, और अन्य सभी लोग जेल में हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिल पाई है। इसी बीच एक खबर आई है कि घोटाले के एक प्रमुख आरोपी सिद्धार्थ सिंघानिया को झारखंड की विशेष अदालत से रिहा कर दिया गया है।
सिद्धार्थ शराब दुकानों को मैनपॉवर उपलब्ध कराने वाली कंपनी के संचालक हैं। सिद्धार्थ के खिलाफ छत्तीसगढ़ और झारखंड में केस दर्ज है। सिद्धार्थ झारखंड जेल में थे। उनके खिलाफ जांच एजेंसी चालान पेश नहीं कर पाई है। उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया है। चर्चा है कि सिद्धार्थ को ईओडब्ल्यू-एसीबी पूछताछ के लिए बुला सकती है।
दूसरी तरफ, शराब घोटाला प्रकरण में प्रमुख आरोपियों की शिकायत यह है कि जांच एजेंसी पक्षपात कर रही है। वजह यह है कि जिन डिस्टलरी में गड़बड़ी कर घोटाले का प्रकरण दर्ज किया गया है, वहां के मालिकों को आरोपी नहीं बनाया गया है। प्रमुख आरोपी अनवर ढेबर की तरफ से एक याचिका लगाई जा चुकी है कि डिस्टलरी के मालिकों को भी आरोपी बनाया जाए। डिस्टलरी मालिकों को नोटिस भी जारी हुई है। मगर ये सभी अदालत में हाजिर नहीं हुए हैं। कुल मिलाकर डिस्टलरी मालिक बचे हुए हैं। उन पर भी खिलाफ कार्रवाई के लिए आरोपियों की तरफ से दबाव बनाया गया है।
शराब घोटाला केस में पूर्व मंत्री कवासी लखमा के साथ ही पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य भी जेल में है, और उनके करीबी विजय भाटिया व अन्य की भी जमानत अलग-अलग अदालतों में खारिज हो चुकी है। इन प्रमुख लोगों के जेल में जाने के बाद मामला और बढ़ सकता है। कुल मिलाकर शराब प्रकरण को लेकर आने वाले दिनों में राजनीतिक उठापटक तेज हो सकती है।
गड्ढेदार वर्ल्ड क्लास
छत्तीसगढ़ सरकार के आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय के विभागीय मंत्री-अफसरों के साथ ही आरडीए के पदाधिकारी सिंगापुर, मलेशिया,हॉन्ग कांग, और शंघाई (चीन) का दौरा कर राजधानी में विश्व स्तरीय सेटेलाइट टाउन बनाने कमल विहार का कांसेप्ट लाए थे।
राजधानी रायपुर सहित प्रदेश की जनता को ब्रोशर के माध्यम से बताया गया कि यह एक दमदार प्रोजेक्ट है और यहां के निवासी जो यहां प्लाट लेंगे वह अपने आप को उपरोक्त देश के नागरिक की तरह पूरी सुविधा का आनंद ले सकेंगे? यह ड्रीम प्रोजेक्ट यह भले स्वरूप न ले पाया हो लेकिन नाम जरूर बदलता रहा।अब वर्तमान में माता कौशल्या विहार पड़ गया है।
अब इस तस्वीर को देखकर कर आंखें चौंधिया जाएंगी। यह माता कौशल्या विहार के मेन गेट से अंदर जाने का रास्ता यह है। जहां सडक़ कम गड्ढे अधिक हैं। इलाके में अपराधी सक्रिय हैं सूखे नशे का अड्डा बन गया है यह ड्रीम प्रोजेक्ट। सरकार ने पुलिस थाना खोलने का निर्णय ले लिया लेकिन पता नहीं किसी अदृश्य शक्ति के दबाव में पुलिस थाना नहीं खोला जा रहा है यहां के निवासी परेशान हो चुके हैं।
चैम्बर विवाद जारी

तीन माह पहले छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े व्यापारी संगठन चैम्बर ऑफ कॉमर्स के पदाधिकारियों का निर्विरोध चुनाव हुआ था। मगर अब पदाधिकारियों के बीच विवाद बढ़ गया है। हाल ये है कि चैम्बर के चुनाव प्रक्रिया को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, जिस पर जल्द सुनवाई होगी।
चैम्बर में सतीश थौरानी अध्यक्ष, और महासचिव पद पर भिलाई के अजय भसीन निर्विरोध चुने गए थे। चैम्बर के पूर्व अध्यक्ष अमर पारवानी ने अपनी दावेदारी वापस लेकर पदाधिकारियों के निर्विरोध निर्वाचन में अहम भूमिका निभाई थी। मगर अब उनसे जुड़े लोग हाईकोर्ट चले गए हैं।
चर्चा यह है कि चैम्बर के पदाधिकारियों के बीच आपस में विवाद चल रहा है। एक प्रमुख पदाधिकारी ने पद छोडऩे का मन बनाया है। चैम्बर से जुड़े कई व्यापारी नेता एक अन्य संगठन कैट की सदस्यता ले रहे हैं। पारवानी कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। व्यापारियों के विवाद पर भाजपा संगठन के नेताओं की भी नजर है। भाजपा संगठन के दो प्रमुख पदाधिकारियों को व्यापारियों के बीच समन्वय बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। मगर वे अब तक एकजुटता बनाए रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। देखना है व्यापारियों का झगड़ा आगे क्या रूख लेता है।
संस्कृत से लेकर उर्दू तक...

अब तक भारत सरकार के रिजर्व बैंक के छापे गए नोटों में कई भाषाओं में कोई बात कही जाती थी। लेकिन अब राजधानी रायपुर के एक सबसे महंगे स्कूल के प्राचार्य ने बच्चों के बारे में एक नोटिस मां-बाप को ऐसा भेजा है जो अलग-अलग चार भाषाओं में बनाया गया है। अंग्रेजी और हिन्दी तो ठीक है, इसे संस्कृत और शायद फारसी में भी लिखा गया है। एन.एच.गोयल वल्र्ड स्कूल के प्राचार्य डॉ.अविनाश पांडेय ने किसी मां-बाप के बच निकलने की गुंजाइश नहीं छोड़ी है, संस्कृत से लेकर उर्दू तक जो भी भाषा वे समझें, इस नोटिस को तो समझना ही होगा, हिन्दी और इंग्लिश में तो है ही। अगला नोटिस ये प्रिंसिपल नोटों पर छपने वाली तमाम भाषाओं में भी बना सकते हैं।
हेलमेट खरीदना अलग बात, पहनना दूसरी बात

तमाम आंकड़े बताते हैं कि सडक़ दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा मौतें बाइक सवारों की होती हैं, और इसकी बड़ी वजह हेलमेट न पहनना है। रायपुर जिले में पिछले सात महीनों में 190 से अधिक बाइक सवारों की जान जा चुकी है। तीन सवारी चलना और नशे की हालत में वाहन चलाना भी वजहें हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या हेलमेट का इस्तेमाल न करना ही पाया गया है।
इसी अवधि में पुलिस ने 20 हजार से ज्यादा बिना हेलमेट वाले बाइक सवारों पर जुर्माना लगाया। कभी गुलाब देकर तो कभी हेलमेट बांटकर लोगों को जागरूक भी किया गया, लेकिन इसका भी खास असर दिखाई नहीं दे रहा है। अधिकतर लोग अपनी जान की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि पुलिस के चालान से बचने के लिए ही हेलमेट पहन रहे हैं।
अब रायपुर पुलिस ने एक अतिरिक्त कदम उठाते हुए शहर के दोपहिया वाहन डीलर्स को निर्देश दिया है कि वे बाइक के साथ हेलमेट देना अनिवार्य करें। नियम का पालन नहीं करने पर शोरूम संचालकों पर मोटरयान अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी। पुलिस की मंशा भले ही नेक है, मगर सवाल यह है कि जब कोई व्यक्ति एक लाख की बाइक खरीद सकता है, तो क्या वह छह-सात सौ रुपये का हेलमेट खुद नहीं खरीद पाएगा, यदि उसे अपनी सुरक्षित यात्रा की चिंता हो?
असल में इससे डीलर्स का व्यवसाय तो बढ़ जाएगा, लेकिन यह गारंटी नहीं है कि लोग खरीदा हुआ हेलमेट पहनेंगे भी। कई लोग हेलमेट घर में रखकर ही दफ्तर या काम के लिए निकल जाते हैं। यदि किसी ने पहले से हेलमेट खरीद रखा हो, तब क्या डीलर्स से उसे जबरदस्ती दूसरा हेलमेट लेना पड़ेगा? यह तो सडक़ पर पुलिस की ही जिम्मेदारी है कि बिना हेलमेट बाइक चलाने वालों को पकड़े।
यही स्थिति कुछ दिन पहले बिलासपुर में भी देखने को मिली थी। वहां एसपी ने पेट्रोल पंप डीलर्स की बैठक बुलाकर निर्देश दिया था कि बिना हेलमेट वाले बाइक सवारों को पेट्रोल न दिया जाए। डीलर्स ने सहमति जताई भी, लेकिन आदेश दो-चार दिन से ज्यादा टिक नहीं पाया। व्यावहारिक ही नहीं था आदेश।
दो कारण साफ नजर आते हैं कि पुलिस अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभा पा रही है। पहला, उसके पास चौराहों पर लगातार चेकिंग के लिए पर्याप्त बल नहीं है। दूसरा, जैसे ही पुलिस थोड़ी सख्ती दिखाती है, विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल विरोध प्रदर्शन शुरू कर देते हैं। हाल ही में भाजपा नेताओं और सांसदों ने जगह-जगह तिरंगा यात्राएं निकालीं। हजारों लोग बाइक पर कई-कई किलोमीटर तक चले, लेकिन इस मौके पर भी वे यह संदेश देने से चूक गए कि अपनी सुरक्षा के लिए हेलमेट जरूर पहनें।
उपेक्षित भी उम्मीद से हैं
सत्ता, और संगठन में जगह नहीं मिलने से भाजपा के कई नेता-विधायक नाखुश हैं। इनमें से कुछ तो दिल्ली भी गए हैं। नाराज नेता मौका पाकर अपनी बात रख भी रहे हैं।
भाजपा संगठन की धुरी रहे शिवरतन शर्मा, लाभचंद बाफना, और श्रीचंद सुंदरानी दिल्ली में थे। ये सभी व्यापारी संगठन के एक कार्यक्रम में शिरकत करने गए थे। इन सभी की स्पीकर डॉ. रमन सिंह से चर्चा हुई है। डॉ. रमन सिंह भी दिल्ली में हैं। तीनों नेताओं को संगठन में जगह नहीं मिली है।
कहा जा रहा है कि तीनों ने डॉ. रमन सिंह से अपनी उपेक्षा पर चर्चा की है। चर्चा है कि डॉ. रमन सिंह की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से प्रदेश के विषयों पर बात हो सकती है। कुछ विधायक भी दिल्ली गए थे। मगर पार्टी के नेता उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर व्यस्त हैं। इसलिए ज्यादा कोई बात नहीं हो पाई है।
असंतुष्ट नेताओं को उम्मीद है कि उपराष्ट्रपति चुनाव निपटने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव होंगे, और फिर कार्यकारिणी का गठन होगा। ऐसी चर्चा है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है, और सीनियर नेताओं को जगह मिल सकती है। देखना है आगे क्या होता है।
राजेश अग्रवाल, नई चुनौतियां
अंबिकापुर विधायक राजेश अग्रवाल के मंत्री बनने के बाद सरगुजा भाजपा में खेमेबंदी शुरू हो गई है। यहां अखिलेश सोनी को प्रदेश महामंत्री बनाया गया है। सरगुजा के पुराने नेता, और स्थानीय संगठन के पदाधिकारी अखिलेश के साथ हैं। मगर राजेश अग्रवाल के मंत्री बनने से पार्टी के उन कार्यकर्ताओं को तवज्जो मिलने की उम्मीद है, जो अब तक अलग-थलग रहे हैं।
राजेश अग्रवाल पहले कांग्रेस में थे, और वर्ष-2018 में भाजपा में आए। पार्टी ने उनकी पकड़ को देखकर स्थानीय क्षत्रपों की दावेदारी को नजर अंदाज कर टिकट दे दी। अग्रवाल, दिग्गज नेता डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव को पटखनी देने में कामयाब रहे। और अब मंत्री बने हैं, तो चर्चा है कि स्थानीय पुराने नेता अब भी उनके साथ नहीं हैं। मगर राजेश अग्रवाल, और उनकी टीम ने लंबित निर्माण कार्यों को पूरा करने, और जन समस्याओं को हल करने के लिए योजना बना रहे हैं।
खास बात ये है कि सिंहदेव, डिप्टी सीएम रहते भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाए थे। इसकी वजह थी कि सीएम भूपेश बघेल से उनके रिश्ते मधुर नहीं रहे। सरगुजा में सिंहदेव के बजाए तत्कालीन खाद्य मंत्री अमरजीत भगत की तूती बोलती थी। अब राजेश अग्रवाल के लोग मंत्री पद को एक अवसर के रूप में देख रहे हैं, और निर्माण कार्य तेज कर जनता के बीच पकड़ मजबूत करने की रणनीति है। देखना है कि वो इसमें कितना सफल हो पाते हैं।
जाति और राजनीति
प्रदेश में समाज के चुनाव में भी अब राजनीतिक दखल होने लगा है। पिछड़ा वर्ग की सबसे बड़ी आबादी के साहू समाज के चुनाव में तो हमेशा से कांग्रेस-भाजपा नेताओं की दिलचस्पी रही है। मगर पिछले दिनों रविवार को प्रदेश साहू संघ के चुनाव हुए, तो समाज के प्रमुख नेताओं ने बंद कमरे में बैठक कर सर्वसम्मति से पदाधिकारियों का निर्वाचन किया। राजनांदगांव के डॉ. निरेन्द्र साहू, साहू समाज के अध्यक्ष बने हैं। ये अलग बात है कि वो भी भाजपा से जुड़े हैं, और डोंगरगांव सीट से टिकट के दावेदार रहे हैं।
बताते हैं कि पदाधिकारियों के निर्वाचन से पहले डिप्टी सीएम अरूण साव, पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू, पूर्व मंत्री धनेन्द्र साहू, पूर्व मंत्री रमशीला साहू, संदीप साहू, डॉ. सियाराम साहू, और पूर्व विधायक द्वय चुन्नीलाल साहू, व दयाराम साहू की बंद कमरे में बैठक हुई। बैठक में इन नेताओं के बीच समाज के चुनाव को राजनीति से दूर रखने, और पदाधिकारियों के विशुद्ध रूप से सामाजिक गतिविधियों तक ही सीमित रहने पर चर्चा हुई।
आपसी चर्चा में आरोप-प्रत्यारोप भी हुए। कहा जाता है कि समाज के पदाधिकारियों के पिछले चुनाव में तो भूपेश सरकार के कुछ प्रभावशाली लोगों ने सरकारी तंत्र का प्रयोग किया था, और मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए धन-बल का प्रयोग किया था। इससे चुनाव काफी हद तक विवादित भी रहा। ऐसी स्थिति दोबारा न आए, इस पर मंत्रणा हुई।
अध्यक्ष पद के तीन प्रमुख दावेदार थे जिनमें डॉ. निरेन्द्र साहू, दीपक ताराचंद साहू, और शांतनु साहू थे। अध्यक्ष के तीनों दावेदार भाजपा से जुड़े हैं। आखिरकार डॉ. निरेन्द्र को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुन लिया गया। डॉ.निरेन्द्र समाज के मुखिया बनने के बाद राजनीति में सक्रिय रहेंगे या नहीं, यह देखना है।
महिला आयोग में युवतियों की शिकायत...
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर की उन तीन युवतियों ने राज्य महिला आयोग से शिकायत कर दी है, जिन्हें केरल के ननों के साथ आगरा जाना था, मगर जबरदस्ती रोक दी गईं और ननों को गिरफ्तार कर लिया गया। युवतियों का आरोप है कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और सरकारी रेलवे पुलिस ने न केवल उन्हें रोका बल्कि गाली-गलौज, मारपीट और सामूहिक दुष्कर्म की धमकी भी दी। वे अपनी मर्जी से केरल की ननों के साथ आगरा जा रही थीं, जहां उन्हें काम मिलना था। उनका धर्म परिवर्तन वर्षों पहले हो चुका है और वे ननों के साथ स्वेच्छा से यात्रा कर रही थीं। आयोग से उन्होंने कहा है कि, ऐसे में उन्हें रोकना और अपमानित करना उनके संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
एनआईए कोर्ट द्वारा ननों को दी गई जमानत इस तथ्य की ओर इशारा करती है कि मानव तस्करी और जबरन धर्मांतरण के आरोप प्रारंभिक तौर पर टिकते नहीं दिखे। ऐसे में पीडि़त महिलाओं की गवाही और शिकायत और भी मायने रखती है। महिला आयोग ने सीसीटीवी फुटेज और विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। पहली सुनवाई में आयोग के पास वह कोई नहीं पहुंचा। अब आयोग का कहना है कि उन्हें बुलाने के लिए पुलिस की मदद ली जाएगी।
इधर केरल की ननों ने अपने ऊपर दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए अलग दबाव बनाना शुरू किया है। इतनी मुखर आवाज बहुत दिनों बाद दिखाई दे रही है। शायद यह प्रतिकार आगे जोर-जबरदस्ती पर कुछ रोक लगा सके।
मंत्री विभाग छोडक़र खुश!
कैबिनेट विस्तार के बाद मंत्रियों के विभागों में परिवर्तन हुआ है। खास बात ये है कि नए मंत्रियों के आने के बाद सिर्फ विजय शर्मा को ही फर्क पड़ा है। डिप्टी सीएम विजय शर्मा के पास गृह, पंचायत-ग्रामीण विकास और कौशल उन्नयन-रोजगार, और तकनीकी शिक्षा विभाग भी था। मगर उनसे कौशल उन्नयन, रोजगार, तकनीकी शिक्षा लेकर नए मंत्री गुरू खुशवंत साहेब को दे दिया गया है।
वैसे तो डिप्टी सीएम अरूण साव से विधि-विधायी विभाग लिया गया है, लेकिन बदले में उन्हें खेल-युवा कल्याण जैसा अपेक्षाकृत बड़ा विभाग दे दिया गया है। टंकराम वर्मा से खेल लेकर उच्च शिक्षा जैसा बड़ा विभाग दिया गया है। इसी तरह केदार के पास जल संसाधन विभाग का भी प्रभार था जिसे सीएम ने खुद रखा है, और मलाईदार माने जाने वाला परिवहन विभाग केदार के जिम्मे छोड़ दिया गया है।
चर्चा है कि केदार कश्यप जल संसाधन विभाग छोडऩे के लिए आसानी से तैयार हो गए। वजह यह है कि सरकार बस्तर की बोधघाट परियोजना पर काम शुरू करने की कोशिश कर रही है। केदार बोधघाट परियोजना को लेकर असहज थे। परियोजना के चलते विस्थापन से होने वाली नाराजगी उन्हें ही झेलनी पड़ती। वो बोधघाट के मसले पर चुप्पी साधे हुए हैं। अब सीएम ने खुद जल संसाधन विभाग को अपने हाथों में लिया है। जिससे बोधघाट पर काम प्राथमिकता से शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
नाराज सीनियर दूर रहे
साय कैबिनेट में पहली बार के तीन विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली है। इससे सीनियर विधायकों में नाराजगी देखी जा रही है। ये अलग बात है कि सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहने से बच रहे हैं। शपथ ग्रहण के दौरान सभी विधायकों को मौजूद रहने के लिए कहा गया था। मगर डेढ़ दर्जन विधायक शपथ ग्रहण समारोह से दूर रहे।
पार्टी हाईकमान को भी सीनियर नेताओं की नाराजगी का अंदाजा हो गया है। उन्होंने तमाम जानकारियां बुलाई भी है। चर्चा है कि सीनियर नेताओं को एडजस्ट करने पर विचार भी हो रहा है। सीनियर नेताओं की नाराजगी दूर होती है या नहीं, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
वन अधिकार के लिए दिल्ली में लड़ाई
दिल्ली के जंतर मंतर पर हाल ही में बिलासपुर के कोटा इलाके के आदिवासी बड़ी संख्या में इक_ा हुए। वे अपने हक की लड़ाई लडऩे दिल्ली पहुंचे थे। उनका कहना था कि बार-बार दावे जमा करने के बावजूद वन अधिकार कानून (एफआरए) के तहत उनके आवेदन खारिज कर दिए गए, उनके घर तोड़े गए और परिवारों को परेशान किया गया। जिन अधिकारों की रक्षा के लिए यह कानून बना था, वही अब उनके लिए मुसीबत बन गया है।
दरअसल, साल 2006 में जब एफआरए लागू हुआ था, तो इसे आदिवासियों की जिंदगी बदलने वाला ऐतिहासिक कानून बताया गया। वादा किया गया कि जंगल की जमीन पर उनका हक सुरक्षित होगा, वे बिना कागज दिखाए भी खेती कर सकेंगे और किसी तरह का उत्पीडऩ नहीं होगा। लेकिन करीब 19 साल बाद भी यह वादा अधूरा है।
संसद में सरकार ने चौंकाने वाली जानकारी दी थी कि 31 मई 2025 तक पूरे देश में एफआरए के तहत करीब 51 लाख दावे दाखिल हुए। इनमें से 23 लाख व्यक्तिगत अधिकार और 1,21,705 सामुदायिक अधिकार मंजूर किए गए। लेकिन 18 लाख दावे खारिज कर दिए गए और 7 लाख अभी भी लंबित हैं। यह आंकड़े भले ही उपलब्धि के तौर पर पेश किए जाते हों, लेकिन हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में आदिवासी अब भी अपने हक से वंचित हैं।
अकेले छत्तीसगढ़ में ऐसा नहीं हो रहा है। जैसे, असम के डिमा हसाओ जिले में सरकार ने एक निजी कंपनी को सीमेंट फैक्ट्री बनाने के लिए करीब 990 एकड़ जमीन दे दी। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इस फैसले पर सवाल उठाए, क्योंकि यह इलाका छठी अनुसूची में आता है जहां स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों को सबसे ऊपर माना जाता है। कोर्ट ने माना कि विकास के नाम पर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
दिल्ली के जंतर-मंतर में रोजाना दर्जनों धरना-प्रदर्शन होते हैं। पता नहीं, इनकी आवाज दिल्ली में सरकार तक पहुंची भी या नहीं।
अपनी जात के ही मंत्री

सरकार ने अनुसूचित जनजाति, जाति, और पिछड़ा वर्ग कल्याण के अलग-अलग मंत्रालय बना दिया है। तीनों मंत्रालय की जिम्मेदारी उसी वर्ग के मंत्रियों को दी गई है। ऐसी व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। एक विभाग के अधीन सभी आरक्षित वर्ग के विकास का जिम्मा था।
हालांकि अनुसूचित जनजाति, जाति और पिछड़ा वर्ग के विकास योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए अलग-अलग मंत्रालय बनाने की मांग बरसों से रही है। भूपेश सरकार ने पिछड़ा वर्ग कल्याण के लिए अलग विभाग बनाया था लेकिन पृथक संचालनालय नहीं बना। अब पिछड़ा और अल्पसंख्यक विकास के लिए अलग मंत्रालय बनाकर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को प्रभार दिया गया है। जबकि अनुसूचित जाति विकास विभाग का जिम्मा गुरू खुशवंत साहेब को दिया गया है, जो कि इसी वर्ग से आते हैं। सीनियर मंत्री रामविचार नेताम के पास आदिम जाति विकास विभाग का जिम्मा है।
इधर, कहा जा रहा है कि पिछड़ा वर्ग कल्याण की कई योजनाएं, जो फाईलों में दबकर रह गई थी, अलग विभाग बनने से इन योजनाओं के क्रियान्वयन होने की उम्मीद है। मसलन, पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों को पात्रता में संशोधन के बाद भी बढ़ी हुई छात्रवृत्ति नहीं मिल पा रही थी, जो अब मिल सकती है। इन सबके के बीच मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के जोरदार स्वागत की तैयारी चल रही है। देखना है कि तीनों मंत्री अपने समाज की बेहतरी के क्या कुछ कर पाते हैं।
राजेश के सामने पहाड़ सी चुनौती
अंबिकापुर के विधायक राजेश अग्रवाल मंत्रिमंडल में जगह बनाने में कामयाब रहे हैं। उनके मंत्री बनने पर इलाके में जश्न भी खूब मना। मगर उनके सामने एक ऐसी समस्या आ खड़ी हुई है जिससे पार पाना आसान नहीं होगा। दरअसल, अंबिकापुर के बाहरी इलाके में ऐतिहासिक रामगढ़ पहाड़ी के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है।
रामगढ़ की पहाड़ी छत्तीसगढ़ ऐतिहासिक, धार्मिक, और सांस्कृतिक धरोहर है। मान्यता है कि भगवान राम ने वनवास के बीच कुछ दिन रामगढ़ के गुफा में ठहरे थे। यहां मंदिर है, और हर साल मेला भी लगता है। समस्या ये है कि रामगढ़ की पहाड़ी से 10 किमी दूर अडानी का कोयला खदान है। यहां खनन के लिए ब्लास्ट होने से रामगढ़ की पहाड़ी में क्रेक आ सकता है। स्थानीय लोग खनन के विरोध में आंदोलित हैं। राजेश अग्रवाल के पास पर्यटन-संस्कृति, और धर्मस्व विभाग का जिम्मा है। कई लोग उन पर अडानी समूह से संबंधों को लेकर सोशल मीडिया में छींटाकशी करते रहे हैं। उन पर खदान से पहाड़ी के संरक्षण की जिम्मेदारी भी विभागीय मंत्री के रूप में है।
राजेश अग्रवाल के प्रतिद्वंदी पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने फेसबुक पर उन्हें मंत्री बनने की बधाई दी, और उम्मीद जताई कि धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग के दायित्वों का निर्वहन करते हुए सरगुजा का ऐतिहासिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर, रामगढ़ पहाड़ी को बचाने की मुहिम में राजेश अग्रवाल का भी सहयोग मिलेगा। फिलहाल तो राजेश अग्रवाल ने चुप्पी साध रखी है, और वो समर्थकों के बीच मंत्री पद के जश्न में व्यस्त हैं। इस मसले पर उनका क्या रुख रहता है, इस पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं।
जस्टिस सुदर्शन रेड्डी और छत्तीसगढ़
इंडिया गठबंधन के उपराष्ट्रपति प्रत्याशी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी छत्तीसगढ़ से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। जस्टिस रेड्डी की बैंच ने ही सरकार पोषित नक्सलियों के खिलाफ संचालित सलवा जुडूम को असंवैधानिक करार दिया था।
जस्टिस रेड्डी ने तत्कालीन रमन सिंह सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि राज्य की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकों की रक्षा करे, न कि उन्हें हिंसा में झोंके। खास बात ये है कि रिटायरमेंट के आखिरी दिन जस्टिस रेड्डी ने छत्तीसगढ़ सरकार को बड़ा झटका दिया था, और सुकमा जिले में वर्ष-2011 में आदिवासी गांवों में आगजनी, और हिंसा के मामले की सीबीआई जांच की आदेश दिए थे। इस घटना में सुरक्षा बलों की कार्रवाई से कई लोग घायल हुए थे। मानवाधिकार कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने घटना को लेकर तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे। कल्लूरी के खिलाफ अब भी जांच चल रही है।
अब बतौर उपराष्ट्रपति प्रत्याशी जस्टिस सुदर्शन रेड्डी को छत्तीसगढ़ से समर्थन की बात करें, तो वो संख्याबल के आधार पर यहां से पीछे रह सकते हैं। उन्हें कांग्रेस के पांच सांसदों का समर्थन मिलने की उम्मीद है। उपराष्ट्रपति चुनाव में केवल लोकसभा, और राज्यसभा के सदस्य को वोटिंग की पात्रता होती है। छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में कांग्रेस के चार सदस्य हैं, और लोकसभा में एक सदस्य हैं। जबकि भाजपा के 10 लोकसभा सदस्यों के वोट जस्टिस सुदर्शन के खिलाफ जा सकते हैं। एनडीए ने बी राधाकृष्णन को प्रत्याशी बनाया है। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ से एनडीए प्रत्याशी राधाकृष्णन, एनडीए गठबंधन सुदर्शन रेड्डी पर भारी पड़ेंगे।
ब्रह्मकुमारी आश्रम
पीएम नरेंद्र मोदी का राज्य स्थापना दिवस समारोह के मौके पर आगमन तय हो गया है। मोदी ने नवा रायपुर में नए विधानसभा भवन के लोकार्पण के लिए सहमति दे दी है। लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला करेंगे। अब नवा रायपुर में एक और कार्यक्रम जुड़ गया है। पीएम, और लोकसभा स्पीकर नवा रायपुर में प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी विश्वविद्यालय का भी उद्घाटन करेंगे।
नवा रायपुर में कई आध्यात्मिक संस्थाओं को जमीन आबंटित की गई है। इनमें प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी विश्वविद्यालय भी हैं। यह विश्वविद्यालय बनकर तैयार हो गया है। करीब 66 हजार वर्गफीट क्षेत्र में फैले पांच मंजिला विवि भवन में ध्यान केन्द्र, और सेमीनार हॉल आदि है। यहां चरित्र निर्माण के साथ-साथ नशामुक्ति की ट्रेनिंग भी दी जाएगी।
विवि से जुड़े बाहर से आने वाले के सौ लोगों के ठहरने के लिए कक्ष का निर्माण किया गया है। विवि के प्रबंधन से जुड़े लोगों ने पीएम से चर्चा की थी। स्पीकर डॉ. रमन सिंह ने भी पीएम नरेंद्र मोदी से चर्चा की। मोदी ने उद्घाटन करने के लिए सहमति दे दी है। मोदी पहले भी प्रजापिता ब्रम्हाकुमारी के कार्यक्रमों में शामिल होते रहे हैं।
बृजमोहन ने संसद में वह कहा, जो आम तौर नहीं बोला जाता
रायपुर के सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल ने हाल ही में लोकसभा में छत्तीसगढ़ में बढ़ते प्रदूषण का मुद्दा उठाया है। यह एक ऐसा विषय है, जिस पर राजनेता अक्सर चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन अग्रवाल ने न केवल इस समस्या को संसद के पटल पर रखा, बल्कि इसके समाधान के लिए ठोस और त्वरित कार्रवाई की मांग भी की। छत्तीसगढ़ जैसे औद्योगिक रूप से विकसित होते राज्य में प्रदूषण का यह मसला न केवल पर्यावरण, बल्कि जनस्वास्थ्य और आजीविका के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है।
अग्रवाल ने अपने संबोधन में रायपुर, कोरबा और भिलाई को उन 131 शहरों में शामिल बताया, जो राष्ट्रीय प्रदूषण मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। रायगढ़ और जांजगीर-चांपा की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। रायपुर के बाहरी इलाकों जैसे, सिलतरा और उरला में औद्योगिक गतिविधियों के कारण हवा और पानी का प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। यह स्थिति न केवल स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि उनकी आजीविका पर भी प्रतिकूल असर डाल रही है।
यह भी बता दें कि अग्रवाल ने नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) द्वारा रायपुर के 142 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में किए गए व्यापक अध्ययन का जिक्र किया है और इसकी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है। हैरानी हो सकती है कि एक सत्तारूढ़ दल के सांसद को अपने ही इलाके की प्रदूषण से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिए संसद में आवाज उठानी पड़ रही है।
बृजमोहन अग्रवाल ने संसद में यह मांग भी की, कि पूरे राज्य में पर्यावरणीय मूल्यांकन के लिए एक नई और व्यापक स्टडी होनी चाहिए, जो 2025 तक प्रदूषण के स्तर और पर्यावरणीय मानकों को स्पष्ट रूप से मैप कर सके। यह सुझाव दूरदर्शी है, क्योंकि इसके बिना दीर्घकालिक समाधान की दिशा में कदम उठाना मुश्किल होगा।
पता नहीं, किसी विशेषज्ञ से पूछकर यह बात की, या खुद अध्ययन किया लेकिन बृजमोहन अग्रवाल ने बड़े-बड़े तथ्य रखे। उन्होंने जैव विविधता पुनर्स्थापन की बात की, पौधारोपण पर जोर दिया। कृषि को इको फ्रैंडली बनाने की बात की, बागवानी पर जोर दिया।
हालांकि, यह सवाल उठता है कि क्या केंद्र और राज्य सरकारें इस मांग को गंभीरता से लेंगी? नीरी की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाएगा? बृजमोहन अग्रवाल का यह कदम छत्तीसगढ़ के लोगों की आवाज को राष्ट्रीय मंच पर ले जाने का एक साहसिक प्रयास तो है, मगर पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुंचाने वाली उनकी ही सरकार की नीति का क्या, जिसमें घने जंगल कोयला निकालने के लिए बर्बाद किए जा रहे हैं।
सरगुजा के मंत्रियों का इतिहास
साय कैबिनेट में विस्तार के साथ सरगुजा संभाग से सीएम मिलाकर पांच मंत्री हो गए हैं। सरगुजा संभाग में 14 विधानसभा सीटें हैं, लेकिन कैबिनेट में संभाग को इतना बड़ा प्रतिनिधित्व पहले कभी नहीं मिला। पहली बार सरगुजा संभाग से विष्णुदेव साय सीएम बने। साय कैबिनेट में रामविचार नेताम, श्याम बिहारी जायसवाल, लक्ष्मी राजवाड़े पहले से थे, और अब अंबिकापुर के विधायक राजेश अग्रवाल मंत्री बन गए हैं। यही नहीं, निगम-मंडलों में भी सरगुजा इलाके का दबदबा है।
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद सरगुजा संभाग से कांग्रेस की जोगी सरकार में दिवंगत डॉ. रामचंद्र सिंहदेव, डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम मंत्री बने। बाद में जशपुर के भाजपा विधायक विक्रम भगत को दल बदलकर कांग्रेस में शामिल होने का इनाम मिला, और उन्हें अजीत जोगी कैबिनेट में राज्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। इसके बाद भाजपा की रमन सिंह सरकार में गणेश राम भगत, रामविचार नेताम, रेणुका सिंह मंत्री बने। इसके बाद भैयालाल राजवाड़े, और रामसेवक पैकरा भी मंत्री रहे। सबसे ज्यादा रामविचार 10 साल मंत्री रहे। भगत वर्ष-2008 के चुनाव में हार गए, और उन्हें दोबारा मौका नहीं मिला। रेणुका सिंह तीन साल में मंत्री रहीं। बाद में उन्हें हटाकर लता उसेंडी को मंत्री बनाया गया।
रामसेवक पैकरा पहले संसदीय सचिव रहे, और फिर बाद में पांच साल गृहमंत्री रहे। भूपेश बघेल सरकार में सरगुजा से टीएस सिंहदेव डिप्टी सीएम, अमरजीत भगत, और डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम को मंत्री बनाया गया। टेकाम आखिरी के तीन महीने कैबिनेट से बाहर हो गए थे। उन्हें राज्य योजना आयोग का चेयरमैन बनाया गया था। भूपेश बघेल सरकार के बाद भाजपा के सत्ता में आते ही सरगुजा को खास महत्व दिया गया। इसकी बड़ी वजह यह थी कि भाजपा सभी 14 सीटें जीतने में कामयाब रही।
विष्णुदेव साय ने सीएम की कुर्सी संभाली, तो रामविचार नेताम, श्याम बिहारी, और लक्ष्मी राजवाड़े को मंत्री बनने का मौका मिला। सरगुजा इलाके में लालबत्ती खूब बंटी है। आधा दर्जन से अधिक नेताओं को लाल बत्ती दी गई है। मसलन, युवा आयोग के अध्यक्ष विश्व विजय सिंह तोमर सरगुजा के ही हैं। इसके अलावा गृह निर्माण मंडल के अध्यक्ष अनुराग सिंहदेव, वन विकास के अध्यक्ष रामसेवक पैकरा, कुंभकार कल्याण बोर्ड के चेयरमैन शंभू चक्रवर्ती, अंत्यावसायी निगम के चेयरमैन सुरेन्द्र सिंह बेसरा, और सरगुजा विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष गोमती साय के अलावा कृषि सलाहकार धीरेन्द्र तिवारी भी सरगुजा के अलग-अलग जगहों से आते हैं। कुल मिलाकर सरगुजा में इतने ‘लाल बत्ती’ धारी पहले कभी नहीं रहे।
किसकी सिफारिश से कौन?
भाजपा में कैबिनेट विस्तार को लेकर पिछले कई महीनों से माथापच्ची चल रही थी। आखिरकार तीन पहली बार के विधायक गजेन्द्र यादव, राजेश अग्रवाल, और गुरु खुशवंत साहेब को मंत्री बनने का मौका मिला। गजेन्द्र यादव को मंत्री बनाने की राह में कोई रोड़ा नहीं था। वो आरएसएस पृष्ठभूमि के हैं। उनके पिता बिसरा राम यादव आरएसएस के प्रांत प्रमुख रह चुके हैं। यही नहीं, वो पिछड़ा वर्ग की दूसरी सबसे बड़ी आबादी यादव बिरादरी से आते हैं। इन सब वजहों से यादव का मंत्री पद तय माना जा रहा था। मगर सारी उलझन राजेश अग्रवाल, और खुशवंत साहेब को लेकर थी। हल्ला है कि राजेश अग्रवाल, और खुशवंत साहेब को मंत्री बनाने के लिए सिक्किम के राज्यपाल ओम माथुर ने भी सिफारिश की थी।
अंबिकापुर विधायक राजेश अग्रवाल, खुशवंत साहेब कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आए। राजेश तो 2018 में आ गए थे, लेकिन खुशवंत साहेब 2023 में भाजपा में शामिल हुए। दोनों को ही टिकट दिलवाने में तत्कालीन प्रदेश भाजपा प्रभारी ओम माथुर की भूमिका रही है। और जब मंत्री बनाने की बारी आई, तो पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश ने भी एक मंत्री अनुसूचित जाति वर्ग से लेने की सिफारिश की।
अनुसूचित जाति वर्ग से अहिवारा के विधायक डोमन लाल कोर्सेवाड़ा को मंत्री बनाने पर विचार हुआ। डोमन लाल पहले भी विधायक रह चुके हैं। मगर दुर्ग जिले से गजेन्द्र यादव को मंत्री बनाने का निर्णय लिया जा चुका था। इसके बाद रायपुर जिले से खुशवंत साहेब के नाम विचार हुआ। पार्टी के अंदर खाने में उनको लेकर अलग-अलग राय थी। मगर सतनामी समाज में उनकी पकड़ को देखते हुए खुशवंत साहेब को मंत्री बनाने का फैसला लिया गया।
पार्टी के भीतर आम राय थी कि बृजमोहन अग्रवाल के मंत्री पद से हटने के बाद वैश्य समाज से मंत्री बनाया जाना चाहिए। इसके लिए अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, संपत व राजेश अग्रवाल के नामों पर विचार हुआ। अमर, और राजेश मूणत पहले मंत्री रह चुके हैं। ऐसे में नए को मौका देने का फैसला लिया गया, और राजेश अग्रवाल की लॉटरी निकल गई।
अब रेल यात्रा में फ्लाइट का आनंद लें
भारतीय रेलवे ने अब हवाई जहाज की तर्ज पर यात्रियों के सामान का वजन तौलना और उस पर शुल्क वसूलने का निर्णय लिया है। इसके मुताबिक एसी फर्स्ट क्लास में 70 किलो, स्लीपर में 40 किलो और जनरल डिब्बों में 35 किलो तक सामान मुफ्त ले जाया जा सकता है। लेकिन इससे अधिक वजन पर अतिरिक्त शुल्क या जुर्माना लगेगा। शुरूआत प्रयागराज, कानपुर, अलीगढ़, मिर्जापुर जैसे बड़े स्टेशनों से हो चुकी है और धीरे-धीरे यह व्यवस्था देशभर में लागू की जाएगी।
अब सवाल उठता है कि रेलवे किस मुंह से यात्रियों पर यह नया बोझ डाल रहा है? हवाई जहाज़ की तरह शुल्क तो वसूले जा रहे हैं, पर क्या ट्रेनें कभी हवाई जहाज़ जैसी सुविधा देंगी? आम आदमी रोज देखता है—जनरल डिब्बों में यात्री ठूंसे जा रहे हैं, धक्के खाते हैं, बैठने की जगह तक नहीं होती। एसी कोच से लेकर सेकंड क्लास और जनरल तक, हर जगह गंदगी पसरी रहती है। ट्रेनों की समयबद्धता की हालत यह है कि घंटों लेट होना आम बात है। ट्रेनें अचानक रद्द कर दी जाती हैं, लेकिन यात्रियों को कोई मुआवज़ा नहीं मिलता। जबकि हवाई जहाज़ रद्द होने पर कंपनियां यात्रियों को राहत राशि या वैकल्पिक सुविधा देती हैं।
रेलवे करोड़ों रुपये अमृत भारत स्टेशनों को ‘एयरपोर्ट जैसा’ बनाने पर खर्च कर रही है। एसी लाउंज, फूड कोर्ट और चमचमाती इमारतें तो बन रही हैं, लेकिन असल सेवा, साफ डिब्बे, समय पर चलती ट्रेनें, यात्रियों की सुरक्षा और आराम वहीं की वहीं है। ऐसे में यह नया ‘वजन शुल्क’ यात्रियों की जेब पर एक और बोझ डालने जैसा है।
गोवंश से जुड़े कारोबार की दिक्कतें..
छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में गाय और गोवंश किसानों की अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त सहारा देते हैं। दूध, खाद और खेती-बाड़ी में इनके उपयोग से किसानों की आय बढ़ती है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब ये पशु बूढ़े या बीमार होकर काम के नहीं रहते। आस्था और परंपरा से बंधे किसान अपनी हैसियत के अनुसार उनकी देखभाल तो करते हैं, मगर यह हमेशा संभव नहीं हो पाता।
कानून भी किसानों के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। गाय और कृषि पशुओं का वध तो अपराध है ही, उनका बिना अनुमति परिवहन भी गैरकानूनी है। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ कृषि पशु संरक्षण अधिनियम 2004 के तहत परिवहन और वध पर पाबंदी है। एक में तीन साल तो दूसरे में सात साल की सजा है। इधर गौरक्षक इस बात की परवाह किए बिना वाहनों का पीछा करते हैं कि परिवहन वैध है या अवैध। कई बार इनकी कार्रवाइयां हिंसक हो जाती हैं। बीते साल छत्तीसगढ़ के आरंग इलाके में यूपी के तीन युवक ऐसी ही जांच के दौरान नदी में कूद गए थे। दो की मौके पर मौत हो गई और तीसरे ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। रामानुजगंज में भी दो युवकों की हत्या दर्ज हो चुकी है। अन्य राज्यों में इनसे भी ज्यादा बड़े हादसे दर्ज हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 2016 में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में और 2017 में संसद के भीतर कह चुके हैं कि गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी हो रही है और राज्यों को इस पर सख्त निगरानी के लिए डोजियर बनाना चाहिए।
इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए क्योंकि, हाल ही में महाराष्ट्र में यह मुद्दा गरमा गया है। वहां भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में एनसीपी (अजित पवार गुट) भी शामिल है। कुरैशी समुदाय, जो मांस और पशु व्यापार से जुड़ा है, पवार का बड़ा समर्थक माना जाता है। पवार ने पुलिस को निर्देश दिया है कि कोई भी अनधिकृत व्यक्ति वाहनों की जांच न करे और इस संबंध में सभी थानों को सर्कुलर जारी किया जाए। लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत का कहना है कि आदेश अधूरा है, क्योंकि इसमें यह साफ नहीं है कि यदि कोई जबरन गाडिय़ों को रोकता है तो पुलिस कार्रवाई क्या करेगी।
इस बहस में भाजपा के अपने नेता भी सरकार से सहमत नहीं हैं। पार्टी के एमएलसी और किसान नेता सदाभाऊ खोत ने 2015 में बने उस कानून पर ही सवाल खड़ा किया है, जिसमें गाय, बैल और सांड के वध पर रोक है। उनका तर्क है कि यह कानून किसानों के खिलाफ है। दूध न देने वाले अनुत्पादक पशुओं की देखभाल का खर्च किसानों पर अतिरिक्त बोझ बन गया है। साथ ही, गौरक्षकों के डर से अन्य राज्यों से अच्छी नस्ल की गायें लाने का रास्ता बंद हो गया है। खोत का कहना है कि इस कानून से न तो किसानों को लाभ हुआ और न ही देसी गायों का भला हुआ। उनका आशय यह है किगोरक्षा के नाम पर बने कानून और गौरक्षक समूह दोनों ही किसानों और पशु व्यापार से जुड़े समुदायों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की चेतावनी और दिशा-निर्देशों के बावजूद राज्यों ने अब तक कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनाई है। छत्तीसगढ़ में गौधाम योजना से संकेत हैं कि अनुत्पादक गायों का पुनर्वास हो जाएगा, जो प्रचलित गौशालाओं से अच्छी होगी, पर क्या डेयरी व्यवसाय और खेती में काम लेने के लिए गोवंशों का परिवहन यहां आसान है, या स्थिति महाराष्ट्र की तरह ही गंभीर है?
किसी की लॉटरी भी निकलेगी?
विष्णुदेव साय कैबिनेट में पहली बार के तीन विधायकों को मंत्री के रूप में जगह मिल सकती है। राजभवन में शपथ ग्रहण की तैयारी भी चल रही है। चर्चा है कि दिल्ली से लेकर रायपुर तक भाजपा के सीनियर विधायकों को किसी तरह एडजस्ट करने पर मंथन चलता रहा।
बताते हैं कि पूर्व मंत्री, और प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके विक्रम उसेंडी को विधानसभा उपाध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। मगर उसेंडी ने अनिच्छा जाहिर कर दी है। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, राजेश मूणत, और अमर अग्रवाल भी इसके लिए सहमत होंगे, इसकी संभावना कम जताई जा रही है। ये सभी अनौपचारिक चर्चा में अलग-अलग जगहों पर कह चुके हैं कि अगर उन्हें मंत्री नहीं बनाया जाता, तो अपनी विधायकी से ही संतुष्ट हैं। वे किसी संवैधानिक पद पर काम नहीं करना चाहते हैं।
पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि पूर्व मंत्रियों के विधानसभा उपाध्यक्ष पद संभालने से इंकार करने के बाद पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष धर्मजीत सिंह की लॉटरी निकल सकती है। धर्मजीत, जोगी कांग्रेस से भाजपा में आए, और तखतपुर से विधायक बने। धर्मजीत सिंह कांग्रेस की जोगी सरकार में विधानसभा के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। हालांकि इसमें समय है, और विधानसभा के शीतकालीन सत्र में उपाध्यक्ष का चुनाव होने के आसार हैं। देखना है आगे क्या होता है।
नयों और पुरानों का समीकरण
चर्चा है कि पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल को कैबिनेट में जगह मिलने की प्रबल संभावना जताई जा रही थी। कहा जा रहा है कि खुद सीएम विष्णुदेव साय, अमर के नाम पर सहमत थे। मगर सोमवार को उन्हें सूचना दे दी गई कि उनकी जगह नए लोगों को मौका दिया जा रहा है।
अमर को मंत्री नहीं बनाने के पीछे पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक को बड़ी वजह माना जा रहा है। अमर अग्रवाल, और कौशिक बिलासपुर से आते हैं। पार्टी के अंदरखाने में दोनों में प्रतिद्वंदिता रही है। ऐसे में अमर को मंत्री बनाने से दूसरे मजबूत दावेदार कौशिक की नाराजगी का खतरा था।
कौशिक, प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष भी रहे हैं। वो संगठन के पसंदीदा माने जाते हैं। चूंकि सामाजिक, और स्थानीय समीकरण को देखते हुए दोनों के लिए कैबिनेट में जगह नहीं बन पा रही थी इसलिए पार्टी के रणनीतिकारों ने दोनों को ही बाहर रखना उचित समझा। अब कहा जा रहा है कि कौशिक-अमर के समर्थकों में मायूसी जरूर है, लेकिन नाराजगी नहीं है। वाकई ऐसा है, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
नई लिस्ट और पुरानों की उदासी
सत्ता, और संगठन में सीनियर नेताओं को दरकिनार किए जाने का असर देखने को मिल रहा है। भाजपा के सीनियर नेता पहले जैसी सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। इससे पार्टी कार्यक्रमों पर भी फर्क पड़ा है। पिछले दिनों भाजपा ने तिरंगा यात्रा निकाली। सभी जिलों, और ब्लॉकों में यह यात्रा निकली।
राजधानी रायपुर में 13 तारीख को तिरंगा यात्रा में मौजूद भीड़ चर्चा का विषय रही। चूंकि संगठन पदाधिकारियों की सूची सुबह जारी हो गई थी। इसलिए पदाधिकारी बनने से रह गए सीनियर नेताओं ने तिरंगा यात्रा के आयोजन में वैसी भागीदारी नहीं निभाई जिसके लिए वो जाने जाते रहे हैं। कुल मिलाकर कई जगहों पर आयोजन फीका रहा। नए पदाधिकारी, सीनियर नेताओं की जगह ले पाएंगे, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।
लोग उम्मीद से, हर हलचल पे नजर
कैबिनेट विस्तार की अटकलों के बीच स्पीकर डॉ. रमन सिंह मंगलवार को दिल्ली जा रहे हैं। वैसे तो डॉ. सिंह के दिल्ली विधानसभा के कार्यक्रम में शामिल होंगे, लेकिन उनकी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, और कई प्रमुख नेताओं से मुलाकात भी हो सकती है। ऐसे मौके पर जब कैबिनेट विस्तार के मसले पर पार्टी के अंदरखाने में खींचतान मची हुई है, रमन सिंह के दिल्ली दौरे पर भी पार्टी नेताओं की नजरें हैं।
कुछ लोग मानते हैं कि रमन सिंह पार्टी हाईकमान को कैबिनेट विस्तार के मसले पर सुझाव दे सकते हैं। पार्टी के क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल भी दिल्ली में थे, और उनकी भी राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) शिव प्रकाश के साथ बैठक हुई है। इसके बाद जामवाल असम चले गए। प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन के रायपुर आने का अभी कोई कार्यक्रम नहीं है।
अंदाजा लगाया जा रहा है कि कैबिनेट विस्तार पर फिलहाल कुछ नहीं हो रहा है। चूंकि सीएम विष्णुदेव साय कह चुके हैं कि कैबिनेट का विस्तार जल्द होगा। ऐसे में उनके विदेश दौरे से लौटने के बाद ही कुछ होने के आसार हैं। पार्टी के कई लोगों का अनुमान है कि पितृपक्ष के पहले कुछ हो सकता है। पितृपक्ष सात सितंबर से शुरू हो रहा है। इससे पहले सीएम 31 तारीख को विदेश से लौटेंगे। तब तक अटकलों का बाजार गरम रहेगा।
प्रवक्ताओं को टिप्स
प्रदेश भाजपा के मीडिया विभाग के नवनियुक्त पदाधिकारियों में एक को छोड़ सभी ने रविवार को पद संभाल लिया। पार्टी नेतृत्व ने गुरुवार को ही बस्तर से सरगुजा तक के एक दर्जन नेताओं को प्रवक्ता नियुक्त किया था। सभी ने काम संभालने के बाद संगठन महामंत्री और वरिष्ठ नेताओं से भी मार्गदर्शन लिया है। इसके बाद मुख्य प्रवक्ता सांसद संतोष पांडेय ने सभी प्रवक्ताओं की बैठक की। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रवक्ता बयान या चैनलों को बाइट देने में जल्दबाजी न करें।
किसी भी विषय पर बाइट या बयान के लिए विषय वस्तु को लेकर मीडिया प्रभारी और मुख्य प्रवक्ता से रायशुमारी करें। न्यूज चैनलों के डिबेट में जाने से पहले चर्चा के विषय पर भी अनुमति ली जाए। विषय वस्तु का फीडबैक मीडिया प्रभारी से लिया जाए। तत्काल बाइट मांगने वाले न्यूज चैनलों को बाइट देने में जल्दबाजी न करें। कोई भी बयान में वेग में न दिया जाए।
अब एफआईआर रद्द कराने की मांग

केरल के अंगमाली जिले के इलावूर की सिस्टर प्रीति मैरी और कन्नूर जिले के उदयगिरी की सिस्टर वंदना फ्रांसिस का मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। इन दोनों ननों को मानव तस्करी और धर्मांतरण के आरोप में 26 जुलाई को दुर्ग से गिरफ्तार किया गया था। उनके साथ नारायणपुर की तीन लड़कियां और उनमें से एक का रिश्तेदार भी मौजूद था। रिश्तेदार को भी गिरफ्तार किया गया, जबकि लड़कियों को बाद में घर भेज दिया गया।
सिस्टर्स की ओर से यह कहा गया कि वे इन लड़कियों को नर्सिंग ट्रेनिंग देकर किसी अस्पताल में रोजगार दिलाने वाली थीं। लेकिन गिरफ्तारी के बाद छत्तीसगढ़ सरकार दुविधा में पड़ गई। दरअसल, राज्य में धर्मांतरण का मुद्दा पहले से ही गरमाया हुआ है और इस मामले में हिंदुत्ववादी संगठनों को राजनीतिक संरक्षण भी मिला हुआ है।
दूसरी ओर, केरल भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने इन ननों पर दर्ज मुकदमे को फर्जी करार दिया और उन्हें छुड़ाने के प्रयास में रायपुर भी पहुंचे। अंतत: ननों को जमानत तो मिल गई, लेकिन उनके खिलाफ दर्ज गंभीर अपराधों की सुनवाई आगे जारी रहेगी। ट्रायल शुरू होने के बाद उन्हें बार-बार छत्तीसगढ़ आना पड़ेगा, जो उनके लिए बड़ी परेशानी साबित होगी।
अब इन ननों की मांग है कि दर्ज एफआईआर को पूरी तरह रद्द किया जाए। बीते शनिवार को उन्होंने दिल्ली में एक बार फिर राजीव चंद्रशेखर से मुलाकात कर अपनी बात रखी। खबर है कि चंद्रशेखर ने आगे भी मदद का आश्वासन दिया है। चूंकि केरल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, भाजपा की राज्य इकाई हर हाल में ईसाई समुदाय को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। जमानत दिलाने का श्रेय पहले ही भाजपा को मिल चुका है, अब मुकदमों से पूरी राहत की मांग उठ रही है।
यह भी मुमकिन है कि आने वाले दिनों में भाजपा की केरल इकाई छत्तीसगढ़ सरकार इस बारे में सिफारिश करे। मगर, एफआईआर को सीधे-सीधे और तुरंत वापस ले लिया गया तो इसके राजनीतिक और प्रशासनिक असर भी होंगे। विपक्ष इसे अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ का सबूत बताएगा और पुलिस पर यह आरोप लग सकता है कि उसने बजरंग दल कार्यकर्ताओं के दबाव में कार्रवाई की थी।
संभावना यही है कि कोई बीच का रास्ता तलाशा जाएगा। मामले को अभी ठंडा रखा जाए और चुनाव नजदीक आते-आते ननों को खामोशी से राहत मिल जाए।
तारीख पर तारीख
हाल फिलहाल में कैबिनेट विस्तार होगा या नहीं, यह साफ नहीं है। मगर इस मसले पर भाजपा में हलचल मची है। दरअसल, सीएम विष्णु देव साय ने शनिवार को मीडिया से चर्चा में कह दिया था कि कैबिनेट विस्तार जल्द होगा। वो 21 तारीख को दस दिन के विदेश दौरे पर जाने वाले हैं।
सीएम के बयान के बाद नए मंत्रियों के नामों को लेकर कयास लगाए जाने लगा। और जब सीएम शनिवार को राज्यपाल से मिलने पहुंचे, तो कैबिनेट विस्तार की संभावित तिथि को लेकर अटकलें लगाई जाने लगी। भाजपा के कुछ विधायकों के घर में मजमा लगना शुरू हो गया। कुछ उत्साही कार्यकर्ताओं ने तो सरगुजा के एक युवा विधायक को रायपुर बुलवा लिया। उन्हें संभावित मंत्री बताए जाने लगा।
रायपुर जिले के एक युवा विधायक पर तो समर्थक शपथ ग्रहण के लिए सूट सिलवाने के लिए दबाव बनाने लगे। इससेे पुराने विधायकों में भी बेचैनी देखने को मिली। जिन दो सीनियर विधायकों को काफी समय से मंत्री बनने की चर्चा रही है, उन्हें दौड़ से बाहर बताया जाने लगा। इसके बाद भाजपा के छोटे-बड़े नेता, कैबिनेट विस्तार के मसले पर सीएम हाउस और राजभवन के अपने संपर्कों को टटोलने लगे। हल्ला यह है कि प्रदेश के एक बड़े नेता ने हाईकमान से संपर्क कर नए नामों को लेकर आपत्ति जताई है। इसके बाद शनिवार देर रात खबर उड़ी कि कैबिनेट विस्तार टल सकता है। यह सब अब सीएम के विदेश से लौटने के बाद होगा।
इन चर्चाओं के बीच एक खबर यह है कि पार्टी संगठन के एक प्रमुख नेता दिल्ली में हैं। कहा जा रहा है कि कैबिनेट फेरबदल, और अन्य विषयों पर पार्टी हाईकमान से चर्चा चल रही है। इस बैठक के बाद ही सही तस्वीर सामने आने की अटकलें लगाई जा रही है। कुल मिलाकर कैबिनेट विस्तार के मसले पर कोई साफ-साफ कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। यानी तारीख पर तारीख।
सैरगाह में एक खुला आशियाना

राजधानी रायपुर का तेलीबांधा इलाका रोज़ाना बड़ी संख्या में सैर करने वालों से गुलजार रहता है। लेकिन जरा इस तस्वीर को देखिए। गेट के बिल्कुल पास ढेर सारा कचरा जमा है। यह कचरा यहां आने-जाने वालों का नहीं है, बल्कि यहां बसे एक परिवार का है, जिसने लंबे समय से यहीं डेरा डाल रखा है। यह परिवार पार्क में रोजाना फेंके जाने वाले कचरे इक_ा करता है। दिनभर शहर में भी घूम-घूमकर कचरा बीनता है और शाम को वापस यहीं लौट आता है। रात भी इन्हें इसी जगह गुजारनी पड़ती है।
दिलचस्प बात यह है कि यहां रक्तदान शिविर, गीत-संगीत की महफिल जैसे कार्यक्रम अक्सर होते रहते हैं। प्रशासनिक अधिकारी और स्थानीय नेता भी यहां आते हैं। पास में पुलिस सहायता केंद्र भी मौजूद है। बावजूद इसके, शायद ही किसी की निगाह अब तक इस परिवार पर पड़ी हो। शायद उन्हें लगता हो कि इस परिवार को यहीं पड़ा रहने दें, क्या फर्क पड़ता है, साफ-सफाई करके नगर-निगम का काम थोड़ा हल्का ही कर रहे हैं। मगर, दूसरा सवाल यह भी है कि गर्मी, बरसात, ठंड हर मौसम में यही फुटपाथ इनका ठिकाना होता है। क्या अफसरों, नेताओं को नहीं लगता कि इनके लिए छत की कोई व्यवस्था कर दी जाए? कचरा तो फैलता रहेगा, उसकी सफाई भी होती रहेगी।
शादी हुई, मोहब्बत गई
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हिन्दुस्तान में शादीशुदा जिंदगी में रोमांस बड़ी तेजी से बाहर हो जाता है। घर में बच्चे आते हैं, और उनके माँ-बाप के बीच मोहब्बत को मानो घरनिकाला मिल जाता है। अभी सोशल मीडिया, एक्स पर महिलाओं की एक किटी पार्टी का एक वीडियो खिलखिलाते हुए घूम रहा है जिसमें मौजूद तमाम महिलाओं से कहा जा रहा है कि वे अपने पति को फोन लगाएं, और आई लव यू कहें, और जिसे जवाब में आई लव यू नहीं मिलेगा, उसे खेल के बाहर कर दिया जाएगा। इसके बाद एक-एक महिला अपने पति को फोन लगाती है, और आई लव यू कहती है। जवाब में पतियों की जैसी हक्का-बक्का प्रतिक्रिया सुनने मिलती है, उससे लगता है कि पतियों को यह समझ ही नहीं पड़ता कि उनकी पत्नियों का दिमाग क्यों चल गया है! मोहब्बत शादी के बाद इस तरह छोडक़र चली जाती है, है कि नहीं?
ओपी-विरोधी गया, शर्मा-समर्थक को मौका
प्रदेश भाजपा पदाधिकारियों की लिस्ट में भाजयुमो अध्यक्ष रवि भगत का नाम नहीं है। उनकी जगह राहुल टिकरिया को युवा मोर्चा की कमान सौंपी गई है। डीएमएफ के मसले पर वित्त मंत्री ओपी चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोलना भगत को भारी पड़ गया। उन पर निष्कासन की तलवार लटकी है।
हालांकि पार्टी के कुछ बता रहे हैं कि रवि भगत के जवाब के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित करने का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। भगत वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े रहे हैं, और बाद में वो भाजपा में आए। उन्हें रायगढ़ इलाके में हिंदुत्व का चेहरा माना जाता है। संघ परिवार उनके खिलाफ किसी तरह कार्रवाई के पक्ष में नहीं है। इससे परे नए भाजयुमो अध्यक्ष राहुल टिकरिया बेमेतरा जिला पंचायत के दूसरी बार सदस्य हैं।
टिकरिया विधानसभा चुनाव में भी टिकट के दावेदार थे, लेकिन आखिरी क्षणों में उनकी जगह गोपेश साहू को टिकट मिल गई। चर्चा है कि राहुल टिकरिया को भाजयुमो अध्यक्ष बनवाने में डिप्टी सीएम विजय शर्मा की अहम भूमिका रही है। टिकरिया, विजय शर्मा की टीम में काम कर चुके हैं। वो युवा मोर्चा अध्यक्ष का रोल किस तरह निभाते हैं, यह देखना है।
वन अधिकार पत्रों की ‘चोरी’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ से जुड़े एक गंभीर मामले पर सोशल मीडिया एक्स पर टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा है- कागज मिटाओ, अधिकार चुराओ- भाजपा का नया हथियार।
दरअसल, इस टिप्पणी के साथ उन्होंने एक अखबार ‘द हिंदू’ की कटिंग चस्पा की है। इस रिपोर्ट में आरटीआई के हवाले से कुछ खुलासे किए गए हैं। इसके मुताबिक छत्तीसगढ़ के कई जिलों में वन अधिकार पत्रों की संख्या कम हो चुकी है। कुछ उदाहरण भी दिए गए हैं, जैसे- बस्तर जिले में जनवरी 2024 में व्यक्तिगत वन अधिकार पत्रों की संख्या 37,958 थी, जो मई 2025 तक घटकर 35,180 रह गई। यानी 2,778 पत्र गायब हो गए। इसके अलावा, आईएफआर, यानि व्यक्तिगत दावों की संख्या भी 51,303 से घटकर लगभग 48,000 हो गई। राजनांदगांव जिले में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (सीएफआरआर) पत्रों की संख्या पिछले साल एक महीने के भीतर 40 से घटकर 20 हो गई, यानी आधी संख्या गायब। ऐसे ही बीजापुर जिले में मार्च 2024 तक 299 सीएफआरआर पत्र वितरित किए गए थे, जो अप्रैल 2024 तक घटकर 297 रह गए। दावा किया गया है कि राज्य सरकार की मासिक प्रगति रिपोर्टों में ये आंकड़े दर्ज किए गए हैं। केंद्र सरकार के एफआरए प्रोग्रेस डेटा में केवल राज्य-स्तरीय जानकारी होती है, जो इस तरह की विसंगतियों को उजागर नहीं करती। मई 2025 तक, छत्तीसगढ़ में 30 जिलों में 4.82 लाख आईएफआर और 4,396 सीएफआरआर पत्र वितरित किए गए थे, जो देश के कुल एफआरए वन क्षेत्र का 43त्न से अधिक है। एफआरए प्रदेश के केवल रायपुर, दुर्ग और बेमेतरा जिलों में नहीं होता है। फॉरेस्ट राइट एक्ट के तहत मिलने वाले पट्टे हस्तांतरित नहीं हो सकते न ही बेचे जा सकते। केवल उत्तराधिकारी के नाम पर बाद में दर्ज किया जा सकता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अफसरों ने यह गड़बड़ी मानी तो है लेकिन कहा है कि इसे सुधार लिया गया है। ग्राम सभा, राजस्व अनुभाग और जिला स्तर के अफसरों के बीच गलत कम्युनिकेशन की वजह से यह गड़बड़ी हुई थी। मगर, यह सवाल बचा हुआ है एक बार दिया गया वन अधिकार पत्र वापस लेने का नियम सिर्फ तब है जब ग्राम सभा इसमें सहमति दे।
चूंकि जानकारी आरटीआई से निकाली गई है, इसलिए इसके गलत होने की गुंजाइश भी कम है। हैरानी इस बात पर हो सकती है कि कांग्रेस का जमीनी स्तर पर सूचना तंत्र कमजोर है। यह गड़बड़ी पिछले 17 महीनों के भीतर हुई है लेकिन कांग्रेस के किसी नेता ने यह मुद्दा नहीं उठाया। सीधे राहुल गांधी ने मुद्दा उठाया है, वह भी अखबार में रिपोर्ट आने के बाद।
यही तो है स्वतंत्रता...
कबीरधाम जिले के मुख्यालय कवर्धा में स्वतंत्रता दिवस के दिन आजादी का बेखौफ प्रदर्शन। सांसद संतोष पांडेय थोड़ी देर में ध्वज फहराने वाले ही थे कि एक लडक़े को अचानक तीन लडक़ों ने एक कुर्सी से उठाकर पीटना शुरू किया। लात-घूंसे बेल्ट चलने लगे। सामने की कतार में बैठी छात्राएं घबराकर इधर-उधर भागने लगीं। पुलिस बल तो वहां मौजूद था। मामला समझ में आते ही जवान दौड़े और उनको अलग कराया। पता यह चला है कि सभी लडक़े एक स्थानीय स्कूल में कक्षा नवमीं के छात्र हैं। सामने की कुर्सी पर कौन बैठे, इस बात पर विवाद हो गया था। इसके बाद जो जानकारी पुलिस ने दी है वह ज्यादा चिंताजनक है। पुलिस के मुताबिक ये सभी बच्चे सूखा नशा के आदी हैं। सूखा नशा यानि, नशीली दवा, इंजेक्शन, सिरप, गांजा- कुछ भी हो सकता है। घटना के वक्त भी उन्होंने नशा किया हुआ था। सभी बच्चे नाबालिग हैं। यानि अभी युवा भी नहीं हुए हैं और वे नशे की चपेट में आ चुके हैं।
पुलिस कमिश्नरी ने चौंका दिया

सीएम विष्णुदेव साय ने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में राजधानी रायपुर में कानून व्यवस्था को और बेहतर करने के लिए पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की घोषणा की, तो नौकरशाह भी चौंक गए। डीजीपी अरुण देव गौतम, एडीजी विवेकानंद की तरफ देखकर मुस्कुरा दिए। बताते हैं कि गृह विभाग के आला अफसरों को भी सीएम की इस घोषणा का अंदाजा नहीं था। हालांकि साय के सीएम बनने के बाद से पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की बात होती रही है। मगर इस दिशा में कोई कागजी कार्रवाई नहीं हुई। पिछली भूपेश सरकार में भी इसको लेकर काफी बातें हुई थी।
पुलिस कमिश्नर को मजिस्ट्रियल पॉवर होते हैं। एडीजी या आईजी रैंक के अफसर पुलिस कमिश्नर के पद पर बिठाए जाते हैं। ऐसे में एसपी की भूमिका सीमित होती है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के सीएम रहते पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू की गई थी। मध्यप्रदेश में पुलिस कमिश्नर लागू करने के लिए एक से अधिक कमेटियों का गठन भी किया गया था। एक कमेटी रिटायर्ड डीजी संजय राणा की अध्यक्षता में बनी थी। संजय राणा, अविभाजित मध्यप्रदेश में रायपुर के एसपी रह चुके हैं। संजय राणा ने पुलिस कमिश्नर प्रणाली की रूपरेखा तैयार के लिए महाराष्ट्र, कर्नाटक सहित कई राज्यों का दौरा किया था। उनकी रिपोर्ट के आधार पर ही मध्यप्रदेश में भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, और जबलपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू किए गए।
सीएम के घोषणा के बाद गृह विभाग की सक्रियता बढ़ी है, और मध्य प्रदेश से जानकारी बुलाई जा रही है। अंदाजा लगाया जा रहा है कि 1 नवंबर से रायपुर में पुलिस कमिश्नर की पोस्टिंग हो जाएगी। देखना है आगे क्या होता है।
ठुकराने का हौसला
सरकार के निगम-मंडलों के पदाधिकारियों की एक और सूची जारी होने वाली है। इसमें 50 से अधिक नाम हैं। भाजपा संगठन में जगह पाने से रह गए नेताओं को निगम-मंडलों में एडजस्ट किया जा रहा है।
इन नेताओं को निगम-मंडलों के उपाध्यक्ष और सदस्य के पद पर नियुक्त किया जाएगा। खास बात यह है कि ज्यादातर निगम-मंडलों की माली हालत खराब है। कुछ नेताओं ने निगम-मंडलों में नियुक्ति के संकेत के बाद संभावित पद के बारे में जानकारी जुटाई, तो वे मायूस हो गए। एक मंडल में उपाध्यक्ष का प्रावधान तो है। मगर सुविधाएं नहीं के बराबर है।
नामों पर गलतफहमी
आखिरकार भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों की बहुप्रतीक्षित सूची बुधवार को जारी हो गई। सूची को लेकर पार्टी के अंदरखाने में सकारात्मक प्रतिक्रिया है। हालांकि पार्टी के सीनियर नेता मायूस बताए जा रहे हैं। एक-दो नामों को लेकर कन्फ्यूजन भी पैदा हो गई है। मसलन, पूर्व विधायक चुन्नीलाल साहू को प्रदेश प्रकोष्ठ का सहसंयोजक बनाया गया है।
भाजपा में दो चुन्नीलाल साहू हैं, दोनों ही विधायक रह चुके हैं। एक चुन्नीलाल साहू खल्लारी सीट से विधायक रहे हैं। वो महासमुंद के सांसद भी रहे। मगर 2023 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दी, और उनकी जगह रूपकुमारी चौधरी को प्रत्याशी बना दिया।
खल्लारी के चुन्नीलाल साहू ने टिकट कटने के बाद पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार किया, और रूपकुमारी चौधरी की जीत सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई। एक अन्य चुन्नीलाल साहू अकलतरा सीट से विधायक रहे हैं। वो कांग्रेस में थे, और लोकसभा चुनाव के ठीक पहले भाजपा में शामिल हो गए। अब दोनों पूर्व विधायकों में से किसे पदाधिकारी बनाया गया है, इसको लेकर असमंजस की स्थिति रही। बाद में पार्टी दफ्तर से साफ किया गया कि खल्लारी के चुन्नीलाल साहू को सहसंयोजक बनाया गया है।
जिले से अब प्रदेश कोषाध्यक्ष
भाजपा में राम गर्ग को प्रदेश कोषाध्यक्ष बनाया गया है। राम गर्ग की नियुक्ति को लेकर पार्टी के भीतर कानाफूसी हो रही है। वजह ये है कि ज्यादातर लोग उनसे परिचित नहीं हैं। गर्ग मुख्यमंत्री के गृह जिला जशपुर के कांसाबेल इलाके के रहने वाले हैं। वो पहले भी दो बार जिले के कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। राम गर्ग को सीएम विष्णुदेव साय के साथ-साथ महामंत्री (संगठन) पवन साय का भी भरोसा हासिल है। इससे पहले तक पार्टी का कोष पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल संभालते रहे हैं। कुछ समय के लिए पाठ्य पुस्तक निगम के पूर्व अध्यक्ष भीमसेन अग्रवाल को कोषाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया था।
बाद में फिर गौरीशंकर को जिम्मेदारी दे दी गई। अरुण साव के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद नंदन जैन को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। नंदन को अब प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया गया है। उनकी जगह राम गर्ग पार्टी के कोष का लेखा-जोखा रखेंगे।
सूचना देने के लिए रिसर्च की जरूरत

सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आम लोगों को एक बड़ा हथियार मिला है-सूचना का अधिकार अधिनियम। कुछ दिनों के बाद इसे देश में लागू हुए 20 साल हो जाएंगे। जिन 29 राज्यों में सूचना का अधिकार कानून लागू है, उनमें से 7 ऐसे राज्य हैं जहां अक्सर या तो मुख्य चुनाव आयुक्त या सूचना आयुक्तों के पद खाली रहे हैं। इनमें छत्तीसगढ़ भी शामिल है। इसे लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के सामान्य प्रशासन विभाग से भी सवाल जवाब शुरू किया। जवाब देने से पहले साक्षात्कार की प्रक्रिया शुरू की गई, ऐसा लगा कि खाली पद अब भर ही जाएंगे, मगर कुछ आवेदकों ने हाईकोर्ट में याचिका लगा दी। इसके बाद से नियुक्ति की प्रक्रिया स्थगित हो गई है। प्रदेशभर में बैठे अफसरों को, खासकर जो जन सूचना अधिकारी या अपीलीय अधिकारी हैं, उनके लिए यह बड़ी सुविधाजनक स्थिति है। उन्हें पता है कि केवल एक सूचना आयुक्त को पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है। बस्तर से लेकर जशपुर तक। ऐसे में यदि वे आरटीआई के आवेदनों को रद्दी में भी डाल दें तो उस पर सुनवाई होने में लंबा वक्त लग जाएगा। राज्य सूचना आयोग के पास अपीलों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी है। सारे पदों पर यदि आज नियुक्ति हो भी जाए तो उनके निपटारे में, बहुत तेजी से काम करने के बावजूद डेढ़ दो साल तो लग ही जाएंगे। ऐसे में उल्टे सीधे जवाब देने से क्या फर्क पडऩे वाला है?
ऐसा ही एक मामला देखने को मिला है बिलासपुर के राजेंद्र नगर में स्थित हायर सेकेंडरी स्कूल का। आवेदन लगाया गया कि कला संकाय में कितने रिक्त पद हैं, कितने कार्यरत हैं और कितने स्वीकृत हैं। सूचना अधिकारी ने जवाब दिया, आपने जो जानकारी चाही है, वह अनुसंधान की प्रकृति का है, इसलिए प्रदाय किया जाना संभव नहीं है। जानकारी नहीं देने का यह बहाना चौंकाने वाला और हास्यास्पद है। सूचना अधिकारी से पूछा जा सकता है कि एक स्कूल में खाली पद, भरे हुए पद की जानकारी देने में किस तरह के अनुसंधान की जरूरत है? इसके लिए विज्ञान की प्रयोगशाला में घुसना होगा या फिर किसी पीएचडी के गाइड से मदद लेनी होगी? यह एक्ट आम लोगों के प्रति तंत्र की जवाबदेही के लिए है लेकिन इस एक्ट से हर एक अफसर बचना चाहता है। जो बहाने दिए जाते हैं, उनमें अनुसंधान का उल्लेख अपने आप में नायाब है। ऐसा जवाब लिखने वाले सूचना अधिकारी को पता ही होगा कि भ्रामक जवाब देने, टालमटोल करने पर भी दंड का प्रावधान है। मगर, सूचना आयोग के पंशु होने की बात भी उनको मालूम होगी। इसीलिए बिना किसी खौफ के बेसिर-पैर का तर्क देकर सूचना देने से मना किया जा रहा है।
कुछ को कुछ मिलना बाकी

प्रदेश भाजपा की सूची में जगह नहीं मिलने से पार्टी के कई नेता निराश हैं। इन नेताओं ने देर रात तक प्रदेश प्रभारी नितिन नबीन, पवन साय, और क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जामवाल से संपर्क कर अपनी मायूसी का इजहार करते रहे। पार्टी के रणनीतिकारों ने उन्हें आश्वस्त किया है कि निगम मंडलों, और कार्यकारिणी की सूची आने वाली है जिसका इंतजार करना चाहिए। कुछ को तो भरोसा है, मगर कई ऐसे हैं जिन्हें उम्मीद की किरण कम दिख रही है।
पूर्व विधायक रजनीश सिंह को महामंत्री बनाए जाने की चर्चा थी। अब कहा जा रहा है कि उन्हें बिलासपुर जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष या कोई निगम मंडल में अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। पूर्व सीएम डॉ.रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह अब तक प्रदेश उपाध्यक्ष पद पर थे, लेकिन उन्हें जगह नहीं मिली। हल्ला है कि उन्हें मार्कफेड चेयरमेन बनाया जा सकता है। भाजपा के रणनीतिकार अपने फैसलों को लेकर चौंकाते रहे हैं। सूची जारी होने के बाद ही पता चलेगा कि किसको क्या मिलता है।
राज्य से रिश्ता
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। इनमें से एक सदस्य मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएम श्रीवास्तव हैं। जस्टिस एमएम श्रीवास्तव का छत्तीसगढ़ से नाता रहा है। वे बिलासपुर हाईकोर्ट में वकील, और फिर जज भी बने।
जस्टिस एमएम श्रीवास्तव, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस रहे। फिर वो राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस रहे। वर्तमान में मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं। जस्टिस श्रीवास्तव, छत्तीसगढ़ के पहले एडवोकेट जनरल रविन्द्र श्रीवास्तव के चचेरे भाई हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वकील रहते जस्टिस एमएम श्रीवास्तव ने बस्तर में टाटा, और एस्सार स्टील प्लांट के खिलाफ दायर जनहित याचिका की भी पैरवी की थी।
जस्टिस श्रीवास्तव, सुप्रीम कोर्ट के जज अरविंद कुमार, और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य के साथ जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की पड़ताल करेंगे। कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग लाने के प्रस्ताव पर विचार होगा।
क्या करे डॉग बाइट से निपटने के लिए?
आवारा कुत्तों को पकडक़र डॉग शेल्टरों में शिफ्ट करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पशुप्रेमियों का एक बड़ा वर्ग बेहद कठोर मान रहा है। मगर, कुछ ने खुलकर स्वागत किया है। एक प्रतिक्रिया जगदलपुर के मेयर संजय पांडेय का आया है। उनका कहना है कि शहर के कई वार्डों से रोजाना डॉग बाइट के मामले आ रहे हैं। स्कूली बच्चे, बुजुर्ग, और राहगीर दहशत में हैं। समय-समय पर टीकाकरण और नसबंदी अभियान चलाने के बाद भी समस्या दूरनहीं हुई है। नगर निगम के पास संसाधन पर्याप्त है, पर कानूनी बाधाओं के चलते नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश केवल दिल्ली-एनसीआर में नहीं, बस्तर तक लागू होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ मानवाधिकार आयोग के हवाले से पिछले साल अगस्त 2024 में जानकारी आई थी कि पिछले एक साल के भीतर छत्तीसगढ़ में 1 लाख 19 हजार 928 डॉग बाइट के मामले सामने आए। फरवरी 2025 में विधायक सुनील सोनी के सवाल पर मुख्यमंत्री ने विधानसभा में बताया था कि सन् 2022 से लेकर जनवरी 2025 तक 51 हजार 730 डॉग बाइट के केस आए।
इसी तरह के आंकड़े राज्य के दूसरे जिलों से हैं। कई घटनाएं बेहद खौफनाक भी रही हैं। हाल ही में बलौदाबाजार जिले की वह घटना तो हमारे सामने ही है, जब 78 बच्चों को रेबीज टीका इसलिये लगवाना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने कुत्तों का जूठा किया हुआ मध्यान्ह भोजन कर लिया था। अभी 10 दिन पहले रायपुर में एक व्यक्ति की मौत हो गई। 7-8 माह पहले उसे कुत्ते ने काटा था, मगर उसने रेबीज के टीके नहीं लगवाए थे। पिछले साल दिसंबर में जशपुर में एक 12 साल के बच्चे की मौत हो गई। उसका भी टीकाकरण नहीं हो पाया था। कुछ राज्यों में छत्तीसगढ़ से ज्यादा खराब हालत है। जैसे कर्नाटक से रिपोर्ट है कि इस साल की पहली छमाही, यानि जून 2025 तक डॉग बाइट के करीब 2.80 लाख केस आए, इनमें से 25 की मौत हो गई। केरल में पिछले 5 सालों के भीतर डॉग बाइट के मामले दोगुने हो गए हैं। सन् 2024 में यहां 26 मौते हुईं। कुत्तों के काटने के 3 लाख से अधिक मामले आए।
यह गौर करने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुओ मोटो आधार पर आदेश दिया है। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश को छत्तीसगढ़ में भी लागू करने की बात हो रही हो तो जनप्रतिनिधियों, नागरिकों की डॉग बाइट के बढ़ते मामलों की चिंता जरूर दिखती है पर उसके पहले क्या वे उपाय किये जा चुके हैं, जो कुत्तों की दहशत और हमलों को कम करने में मददगार हो सकें?
रायपुर में इस समय एक स्टरलाइजेशन सेंटर बैरन बाजार में है, जहां 15-20 कुत्तों की हर दिन औसतन नसबंदी हो रही है, जबकि लक्ष्य हर दिन 30 कुत्तों का है। रायपुर के जोन 8 के तहत आने वाले सोनडोंगरी में एक शेल्टर युक्त स्टरलाइजेशन सेंटर का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है, पर अभी तक वह शुरू नहीं किया गया है। इसकी क्षमता 168 कुत्तों की प्रतिदिन नसबंदी करने की है। बाकी शहरों में इस तरह का कोई इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं किया गया है। कोविड-19 के दौरान बिलासपुर में 10 हजार कुत्तों की नसबंदी का कांट्रेक्ट एक संस्था को सौंपा गया, मगर उसका आंकड़ा 2000 से ऊपर नहीं पहुंचा।
जशपुर जैसी जगह पर बच्चे की मौत एंटी रैबीज टीके के नहीं होने के कारण हो गई तो रायपुर जैसी जगह पर जन-जागरूकता का अभाव है। यहां जिसकी मौत हुई, उसने टीके लगवाने की जरूरत ही नहीं समझी। डॉग बाइट से पीडि़त लोगों के लिए कोई हेल्पलाइन नहीं है कि उन्हें तत्काल सहायता मिल सके। रेबीज में देरी खतरनाक होती है। शायद ही बच्चों और आम लोगों को पता होगा कि कुत्तों के काटने के बाद उस जगह को तुरंत धोकर साफ करना चाहिए और टीके लगवाने के लिए अस्पताल पहुंचना चाहिए। छत्तीसगढ़ ने हाल ही में साफ सफाई को लेकर अवार्ड जरूर हासिल कर लिये हैं, पर कुत्तों को पनपने का वहीं मौका मिलता है जहां खुले में खाना फेंक दिया जाए, या जानबूझकर उनके लिए खाना डाला जाए। बलौदाबाजार के स्कूल की घटना को इससे जोड़ सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू कराने की मंशा भावनात्मक जरूर है, मगर कुत्तों के हमले से बचाव के लिए जो बाकी उपायों को आजमाने के लिए सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं।
प्रदीप गांधी कामयाब

आखिरकार राजनांदगांव के पूर्व सांसद प्रदीप गांधी दिल्ली के प्रतिष्ठित कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव जीतने में कामयाब रहे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी क्लब के अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं। संसद सत्र के बीच कांस्टीट्यूशन क्लब के चुनाव को लेकर मंगलवार को काफी गहमागहमी रही। चुनाव में केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी सहित अन्य प्रमुख नेताओं ने भी वोट डाले।
कांस्टीट्यूशन क्लब में सांसद, और पूर्व सांसदों के अलावा चुनिंदा नौकरशाह ही सदस्य हैं। मगर वोट डालने का अधिकार सांसदों, और पूर्व सांसदों को ही है। छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य राजीव शुक्ला पहले ही खेल सचिव के पद पर निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं। जबकि पूर्व सांसद प्रदीप गांधी क्लब की कार्यकारिणी के लिए चुनाव मैदान में थेे। उन्हें सबसे ज्यादा 507 वोट हासिल हुए। प्रदीप गांधी, और उद्योगपति सांसद नवीन जिंदल समेत कुल 11 कार्यकारिणी सदस्य बने हैं।
संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के आरोप में बर्खास्त सांसद प्रदीप गांधी को भाजपा ने भी पार्टी से निकाल दिया था। बाद में उनकी वापसी हो गई। वो भले ही अब तक पार्टी की मुख्य धारा में नहीं आए हैं, लेकिन सांसदों, और पूर्व सांसदों का उन्हें भरपूर समर्थन मिला है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव जीतने के बाद प्रदीप गांधी की पार्टी में भी हैसियत बढ़ सकती है। देखना है कि प्रदीप गांधी को क्या फायदा होता है।
रांची जेल में ही खुश हैं हम

छत्तीसगढ़ में हुए शराब घोटाले की नब्ज रांची में दबी हुई है। झारखंड शराब घोटाले के दो घोटालेबाज इन दिनों रांची जेल में बंद हैं। दोनों छत्तीसगढ़ के ही कारोबारी हैं। एक दुर्ग जिले का शराब उत्पादक और बॉटलिंग प्लांट का मालिक है तो दूसरा सप्लायर।
दोनों ने छत्तीसगढ़ में एफएल 10 ए का लाइसेंस लिया था। इसी श्रेणी में ही बड़ा घोटाला हुआ। इस श्रेणी में दो और लाइसेंसी हैं एक भोपाल के डिस्टिलर और दूसरे छत्तीसगढ़ के। मगर आरोपियों की सूची में इन चार में से दो ही हैं ।बहरहाल ईओडब्ल्यू अब इस घोटाले में एक बड़ी गिरफ्तारी का मास्टर स्ट्रोक मारना चाहती है। इसके लिए केंद्रीय कारागार रांची में बंद दोनों कारोबारियों की मदद आवश्यक है।
एजेंसी चाहती है कि दोनों जमानत ले ले और फिर गिरफ्तार कर यहां उनसे पूछताछ कर अपना लक्ष्य साध लिया जाए। पर दोनों ही इसके लिए तैयार नहीं हैं। यहां तक कि रांची कोर्ट ने दोनों की गिरफ्तारी का औचित्य पूछकर वहां की एजेंसी की कार्रवाई पर प्रश्न खड़ा कर रखा है। इसका आशय यह है कि दोनों जमानत याचिका दायर करते हैं तो रिहाई में देर नहीं लगेगी। पर दोनों जमानत लेने तैयार नहीं। जेल में ही खुश हैं। अब उनके रुख पर ही छत्तीसगढ़ में जांच एजेंसी की आगे की रणनीति बनेगी या काम करेगी।
अब आईटीआर रिफंड के नाम पर ठगी
ईडी, सीबीआई के नाम पर डिजिटल अरेस्ट करने ठगों ने इनकम टैक्स रिटर्न जमा करने के इन दिनों में आपके खाते खाली करने का एक नया पैंतरा निकाला है। इसलिए रिटर्न फाइल करने में जल्दबाजी न बरतें। ठगों और हैकर्स द्वारा आनलाइन भेजे ऐसे कथित नोटिस को गंभीरता से देखें पढ़े। वैसे आपको बता दें कि एक शब्द की स्पेलिंग मिस्टेक को पकड़ लेंगे तो ठगी से बचा जा सकता है। खासकर जिन लोगों ने आयकर रिटर्न दाखिल कर दिया है। उन्हें एक ई-मेल भेज कहा जा है कि आपके कर की गणना में त्रुटि हुई है और आपको रिफंड जारी किया जाना है, कृपया इसे अनदेखा न करें।
यह हैकर्स द्वारा फैलाया गया है। जैसे ही आप इस लिंक पर क्लिक करेंगे, यह आपको नेट बैंकिंग लॉगिन पेज पर ले जाएगा और जैसे ही आप इसमें लॉग इन करेंगे, आपका बैंक खाता हैक हो जाएगा।
सच्चाई यह है कि ऐसे ईमेल को अनदेखा करें। आयकर विभाग आपको रिफंड/देय राशि के बारे में एक उचित नोटिस के माध्यम से सूचना भेजेगा।
भाजपा की टीम
भाजपा में टीम किरण देव की सूची को लेकर ऊहापोह की स्थिति है। प्रदेश अध्यक्ष नियुक्ति के बाद से किरण देव जल्द से जल्द सूची जारी कराने के लिए प्रयासरत हैं। पिछले सप्ताह रायपुर से दूर दिल्ली में बैठक कर बड़े नेताओं ने सूची को अंतिम रूप दे दिया था। और फिर राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष, के जरिए राष्ट्रीय अध्यक्ष से अनुमोदन के लिए भेजी गई। उम्मीद और दावा जताया जा रहा था कि रविवार को घोषणा कर दी जाएगी। लेकिन खबर है कि सूची फिर वेटिंग में डाल दी गई है। इस बार तीन में से एक महामंत्री को लेकर अटक गई है।
राजनांदगांव कोटे के यह महामंत्री हाईकमान की भी पसंद बताए जा रहे हैं। प्रदेश नेतृत्व ने ‘ना’ कह दिया है। दरअसल, प्रदेश नेतृत्व नहीं चाहता है कि एक ही जाति के दो महामंत्री हो जाए। और तो और इसी वर्ग से अध्यक्ष स्वयं हैं हीं। बस इसी एडजस्टमेंट की वजह से पूरी सूची रूक गई है।
खबर तो यह भी है कि निगम मंडल में नियुक्त दो महामंत्री, दोहरे प्रभार में बने रहने भी जोर लगा रहे हैं। नई टीम में कार्यालय प्रभारी से लेकर मीडिया प्रकोष्ठ, प्रवक्ता भी बदले जा रहें। पार्टी के लिए कानूनी लड़ाई लडऩे वाले एक प्रभारी को प्रवक्ता बनाया जा रहा है। यानी वे अब खुलकर सब कुछ बोल- बता सकेंगे। अब सूची आने के बाद ही खुलासा हो पाएगा। ठाकरे परिसर के निकटवर्तियों का कहना है कि सूची 15 अगस्त की पूर्व संध्या पर आ सकती है।
मूलनिवासी, वनवासी, या आदिवासी?

प्रदेश की भाजपा सरकार ने विश्व आदिवासी दिवस (9-10 अगस्त) पर कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं किया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि आरएसएस के आदेश के चलते इस दिन की उपेक्षा की गई है। यह आरोप नया नहीं है। पिछले साल भी यही आरोप था। 2024 में मुख्यमंत्री को कुछ संगठनों ने कार्यक्रमों में आमंत्रित किया था, लेकिन उसमें वे शामिल नहीं हुए। उस दिन वे डिप्टी सीएम अरुण साव की बहन के यहां, उनके बेटे के आकस्मिक निधन पर संवेदना प्रकट करने गए थे। दरअसल, यहां विचारधारा और दृष्टिकोण का प्रश्न आ गया है, जिसके ऐतिहासिक संदर्भ वैश्विक स्तर पर जुड़े हैं।
9 अगस्त 1982 को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उप-समिति के अधीन यूएन वर्किंग ग्रुप ऑन इंडिजिनस पॉपुलेशंस की पहली बैठक हुई थी। इस बैठक की स्मृति में 1994 में, संयुक्त राष्ट्र ने 9 अगस्त को वर्ल्ड इंडिजेनस डे के रूप में मनाने की घोषणा की। उद्देश्य था-आदिवासियों के भूमि और सांस्कृतिक अधिकारों का संरक्षण, उनकी मौलिक स्वतंत्रता और पहचान बनाए रखना, भेदभाव समाप्त करना तथा शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार लाना। इसकी पृष्ठभूमि उन ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी है, जब ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका जैसे देशों में औपनिवेशिक ताकतों ने मूल निवासियों पर हमले किए, नरसंहार किया, उनकी जमीन और संसाधनों पर कब्जा कर लिया और उनके अस्तित्व को संकट में डाल दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उसका सहयोगी संगठन वनवासी कल्याण आश्रम इस दिन को भारत के लिए अप्रासंगिक मानता है। उनका तर्क है कि भारत के सभी लोग, जिनमें वनवासी भी शामिल हैं- मूल निवासी हैं और सभी हिंदू हैं। यह दिवस पश्चिमी देशों के औपनिवेशिक अपराध बोध से जुड़ा मामला है, जिसका भारत से कोई संबंध नहीं। उनके अनुसार भारत में आदिवासी (आरएसएस के शब्दों में वनवासी) हमेशा मुख्यधारा का हिस्सा रहे हैं, इसलिए किसी अलग विश्व आदिवासी दिवस की आवश्यकता नहीं।
आरएसएस की विचारधारा में आदिवासी शब्द को अलगाववादी मानकर नकारा गया है। 2020-21 में आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में प्रकाशित लेखों में कहा गया कि यह दिवस उनकी मूल मान्यता, आदिवासियों को वनवासी मानने और उन्हें हिंदू समाज का अभिन्न अंग मानना- के विपरीत है। 2024 में वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सतीश कुमार ने तो 9 अगस्त के आयोजनों को ईसाई मिशनरियों की साजिश करार दिया और कहा कि यह धर्मांतरण को बढ़ावा देता है।
विश्व आदिवासी दिवस के विकल्प के रूप में आरएसएस, भाजपा और सहयोगी संगठन बिरसा मुंडा की जयंती (15 नवंबर) पर जनजातीय गौरव दिवस मनाते हैं। मोदी सरकार ने इसे 2021 में आधिकारिक रूप से घोषित किया था।
इस प्रकार, कांग्रेस के आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन 9 अगस्त की अनदेखी आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की विचारधारा और हिंदुत्व के दृष्टिकोण से जुड़ा मामला है।
बहस इस पर जरूर हो सकती है कि क्या जनजातीय गौरव दिवस, 9 अगस्त का विकल्प है? गौरव दिवस भारतीय इतिहास व स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदाय के योगदान को याद करने के लिए है। विश्व आदिवासी दिवस, उनकी पहचान, अस्तित्व और संसाधनों को बचाए रखने के लिए है। दोनों ही दिन एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं। पर राजनीति ऐसा होने नहीं देगी।
डैमेज कंट्रोल की कोशिश में केरल भाजपा
केरल में इस साल के आखिर में स्थानीय निकाय चुनाव और अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भाजपा लंबे समय से हिंदी बेल्ट से बाहर, खासकर दक्षिण और पूर्वोत्तर में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। जहां धार्मिक ध्रुवीकरण और धर्मांतरण जैसे मुद्दे असर नहीं करते, वहां भाजपा बहुलवादी रणनीति अपनाती है। नॉर्थ-ईस्ट में सरकारें बनाना और पश्चिम बंगाल में दूसरे नंबर पर आना इसी रणनीति से संभव हुआ है।
केरल में ईसाई समुदाय करीब 18 प्रतिशत है और राजनीति में उनकी भूमिका काफी अहम मानी जाती है। यहां भाजपा का अब तक असर सीमित रहा, लेकिन पिछली लोकसभा में पार्टी ने त्रिसूर सीट जीतकर इतिहास रच दिया और वोट शेयर 16.68त्न तक पहुंच गया। पार्टी यहां मेहनत कर ही रही थी कि छत्तीसगढ़ में एक घटना ने मुश्किल खड़ी कर दी। केरल की दो नन, वंदना फ्रांसिस और प्रीति मेरी, को धर्मांतरण और मानव तस्करी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
गिरफ्तारी के बाद अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिली। छत्तीसगढ़ के भाजपा सांसद इस मुद्दे को शून्यकाल में उठाकर धर्मांतरण और मानव तस्करी से जोड़ते दिखे तो केरल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि दोनों नन निर्दोष हैं। वे खुद दौड़े-दौड़े छत्तीसगढ़ पहुंच गए। चर्चा तो यह भी है कि इस मसले में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीधे दखल दिया। जमानत तो मिल गई, लेकिन 9 दिन जेल में रहने से केरल के ईसाई समुदाय में नाराजगी फैल गई।
केरल की मीडिया पर नजर डालें तो पता चलता है कि वहां इस मामले को बड़े पैमाने पर कवर किया गया। जैसे ही गिरफ्तारी हुई, मुस्लिम संगठनों जैसे एसडीपीआई और जमात-ए-इस्लामी ने भाजपा को अल्पसंख्यक विरोधी बताकर माहौल बनाने की कोशिश की। जवाब में भाजपा ने कहा कि ये संगठन ईसाई आंदोलन में घुसपैठ कर रहे हैं और राजनीतिक इस्लाम से चर्चों को खतरा है। भाजपा को डर है कि ईसाई-मुस्लिम गठजोड़ उसके किए कराये पर पानी न फेर दे।
केरल की राजनीति में चर्चों का बड़ा प्रभाव है। ननों की रिहाई के बाद कई बिशप और गैर-कैथोलिक संप्रदायों के पादरी भाजपा मुख्यालय पहुंचे और आभार जताया। पार्टी भी वहां पर ईसाई पादरियों से मिलकर राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका को सकारात्मक बता रही है। भाजपा नेता चर्चों को बता रहे हैं कि केवल भाजपा ने ननों की जमानत के लिए ईमानदार कोशिश की। मतलब यह कि सीपीआई (एम) के नेता यहां आए जरूर पर ननों को छुड़ाना उनसे संभव नहीं हुआ। केरल में एक आर्कबिशप जोसेफ पंप्लानी ने भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की सराहना की, जबकि एक दूसरे बिशप पॉली कन्नूक्कादन ने केंद्र और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों की आलोचना की। इस बीच, भाजपा ने अपनी कोर कमेटी में फेरबदल कर कई ईसाई नेताओं को जगह दी, जिनमें मध्यप्रदेश से भेजे गए राज्यसभा सदस्य और केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन भी शामिल हैं। साथ ही, ईसाई समुदाय से जुडऩे के लिए चल रहे स्नेह यात्रा अभियान को तेज करने का फैसला किया गया।
कुल मिलाकर, यह एक दिलचस्प वाकया है कि एक राज्य की स्थानीय राजनीति ने राष्ट्रीय स्तर की रणनीति को कैसे हिला दिया। अगर भाजपा इस डैमेज कंट्रोल में सफल रही, तो केरल में उसकी संभावनाएं बढ़ेंगी, वरना आगामी चुनावों में नुकसान झेलना पड़ सकता है।
महादेव का प्रकोप जारी है...
सीबीआई महादेव ऑनलाइन सट्टा केस की पड़ताल कर रही है। चर्चा है कि करीब 50 से अधिक लोगों को सीबीआई ने नोटिस भी जारी किया है। सभी से एक-एक कर बयान लिए जा रहे हैं।
दुर्ग के एक ज्वेलर्स संचालक को भी पूछताछ के लिए तलब किया गया है। ऐसी चर्चा है कि सट्टेबाजी का पैसा ज्वेलर्स संचालक के माध्यम से राजनेताओं, कारोबारियों, और पुलिस अफसरों तक पहुंचा है। पांच आईपीएस अफसरों के नाम चर्चा में रहे हैं। सभी के यहां जांच-पड़ताल भी हुई थी। मगर ‘महादेव’ से कोई साक्ष्य मिलने की बात सामने नहीं आई है।
सीबीआई ने ईडी, और ईओडब्ल्यू-एसीबी की अब तक की कार्रवाई के आधार पर आगे बढ़ रही है। चर्चा है कि सीबीआई ने उन्हीं लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया है, जिनके यहां पहले भी कार्रवाई हो चुकी है।
बताते हैं कि ‘महादेव’ का पैसा म्यूल अकाउंट के जरिए प्रभावशाली लोगों तक पहुंचा है। इस दौरान रायपुर, और दुर्ग में काफी प्रापर्टी के सौदे हुए हैं। सारे रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। हल्ला है कि आने वाले दिनों में सीबीआई कुछ प्रभावशाली लोगों को दबोच सकती है। देखना है क्या कुछ होता है।
गौवंश की मौतें, दोषियों को फिक्र नहीं
हाईवे पर भारी वाहनों की टक्कर से गौवंश की लगातार हो रही मौतों ने सरकार से लेकर आम नागरिक तक, सभी को विचलित कर दिया है। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब ये मूक पशु सडक़ों पर अपनी जान न गंवा रहे हों। कई बार तो यह मौतें समूह में हो रही हैं।
यदि बिलासपुर जिले की बात करें तो मात्र एक महीने में 100 से अधिक मवेशी अपनी जान गंवा चुके हैं। केवल 15 दिनों में हुई तीन-चार बड़ी दुर्घटनाओं में 80 से ज्यादा मवेशियों की मौत हुई। इन घटनाओं ने हाईकोर्ट का भी ध्यान खींचा, जिसके बाद अदालत ने राज्य सरकार और सभी जिलों के कलेक्टरों को कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए।
लगभग सभी जिलों में कलेक्टरों ने इस विषय पर बैठक की और विभिन्न उपाय शुरू किए। इनमें सडक़ों से पशुओं को खदेडऩा, कांजी हाउस में बंद करना, उनके मालिकों की पहचान कर कार्रवाई करना भी शामिल है। कुछ पशुपालकों की पहचान गांववालों की मदद से हुई और उनकी गिरफ्तारी भी हुई। लेकिन, हुआ यह कि सभी आरोपी थाने से ही मुचलके पर रिहा कर दिए गए। क्यो?
दरअसल, कलेक्टरों ने तो बीएनएस की धारा 325 (पशु क्रूरता अधिनियम) के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, लेकिन पुलिस कुछ तकनीकी कारणों से ऐसा नहीं कर पा रही है। इस धारा के तहत यह साबित करना आवश्यक है कि पशु के मालिक ने उसके साथ क्रूरता की है। शारीरिक चोट पहुंचाई है या हिंसक व्यवहार किया है। जबकि सडक़ पर छोड़े गए मवेशियों के मामले में मालिक की गलती मुख्यत: लापरवाही ही है। यदि सडक़ पर घूमते-फिरते मवेशी वाहनों की चपेट में आकर मारे जाते हैं, तो इसके लिए वाहन चालक ही जिम्मेदार है, जबकि मालिक पर केवल लापरवाही, बीएनएस की धारा 291 का मामला बनता है। इस धारा में अधिकतम छह महीने की कैद और 5,000 रुपये जुर्माने का प्रावधान है, और मुचलके पर थाने से ही रिहाई हो जाती है। इसलिए, मवेशी मालिकों की गिरफ्तारी की खबर सुनने पर भले ही लगे कि कोई ठोस कदम उठाया जा रहा है, लेकिन हकीकत में इसका उन पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा।
अब बात करते हैं, इन मवेशियों को कुचलकर भागने वाले चालकों की। ये दुर्घटनाएं अधिकतर रात में होती हैं, और भारी वाहनों का पता ही नहीं चलता। हाल ही में मनेंद्रगढ़ में एक ट्रेलर को जब्त किया गया और उसका चालक अनूपपुर से गिरफ्तार हुआ। चाहे मामला मवेशी को कुचलने का हो या इंसान को—कानून एक ही है। बीएनएस के तहत, यदि चालक दुर्घटना के बाद बिना सूचना दिए भाग जाए, तो धारा 106(2) के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। इसमें 10 साल की कठोर कैद और 7 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन इस धारा के खिलाफ देशभर के ट्रांसपोर्टरों ने हड़ताल की, जिसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री ने घोषणा की कि इसे फिलहाल लागू नहीं किया जाएगा। इस कारण, यह प्रावधान देशभर में स्थगित है। फिलहाल ऐसे मामलों में धारा 106(1) के तहत कार्रवाई की जा रही है, जो पहले की आईपीसी की तरह अपेक्षाकृत नरम है। पांच साल की कैद और कुछ हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान, साथ ही निचली अदालत से आसानी से जमानत मिल जाती है। भारी वाहन चालकों के लिए यह कोई नई बात नहीं है।
कहने का तात्पर्य यह है कि केवल कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देकर न तो मवेशियों को सडक़ों से हटाया जा सकता है और न ही उनकी जान बचाई जा सकती है। इसके लिए लोगों में ही जागरूकता लाना जरूरी है। इसी क्रम में, छत्तीसगढ़ सरकार ने कल गौधाम योजना शुरू की है। यह योजना पिछली सरकार की योजना से अलग है और विशेष रूप से ऐसे ही घुमंतू मवेशियों पर केंद्रित है। उम्मीद है कि इसके बाद सडक़ पर गौवंश की संख्या कम होगी और उनकी जान बच सकेगी।
ऐसी शिक्षा मिल रही अंग्रेजी की
प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक शालाओं में बच्चों को अंग्रेजी की आरंभिक शिक्षा दी जाती है और उनको सामान्य ज्ञान भी पढ़ाया जाता है। मगर, जो शिक्षक इस काम के लिए पढ़ा रहे हैं उनकी योग्यता क्या है? बलरामपुर जिले के कुसमी ब्लॉक के घोड़ासोत स्कूल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब चल रहा है। एक ब्लैक बोर्ड दिख रहा है जिसमें शिक्षक बड़े आत्मविश्वास के साथ 11, 18 और 19 की अंग्रेजी में गलत स्पेलिंग लिख रहे हैं। यहां के हेडमास्टर को बलरामपुर जिले के कलेक्टर, एसपी यहां तक कि जिला शिक्षा अधिकारी का नाम नहीं मालूम है। मुख्यमंत्री का नाम भी उनको नहीं मालूम। ऐसी शिक्षा बच्चों की हो रही है, तब सवाल उठता है कि गलत पढ़ाना जरूरी है या कुछ भी नहीं पढ़ाना। ऐसे शिक्षकों ने पता नहीं कैसे इन्होंने सरकारी नौकरी की कठिन परीक्षा पास कर ली, जबकि उनका सामान्य ज्ञान ही औसत से कमजोर है। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में बार-बार छत्तीसगढ़ की प्रारंभिक शिक्षा की रैंकिंग ऐसे ही नीचे नहीं आती है। यहां कई बार परखा जा चुका है कि पहाड़ा, गिनती तक बच्चों को नहीं आता। बच्चों का मजाक, ऐसे शिक्षकों की वजह से बन रहा है। शालाओं में क्या हो रहा है यह जानने के लिए संकुल, ब्लॉक से लेकर हर स्तर पर मॉनिटर करने वाले अधिकारी नियुक्त हैं, पर इस वायरल वीडियो को देखने से साफ पता चलता है कि दूरदराज के आदिवासी इलाकों में जो स्कूल बने हैं, उनमें क्या हो रहा है, यह झांकने-देखने के लिए कोई नहीं पहुंचता। सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर प्रतिक्रिया आई है, जिनमें कुछ लोगों ने तो मांग की है कि ऐसे शिक्षकों की ढूंढ-ढूंढ कर परीक्षा ली जाए और अध्यापन में विफल पाए जाते हैं तो उनको सेवा से बाहर कर दिया जाए। इन्हें जो मोटी-मोटी तनख्वाह दी गई है, उसे भी वसूल किया जाए।
विधायकों के घर बढऩे लगी भीड़

भाजपा के कुछ नए-नवेले विधायकों के यहां एकाएक भीड़ बढ़ गई है। दरअसल, पार्टी के अंदरखाने में चर्चा है कि कैबिनेट की रिक्त दो सीटों पर नए चेहरों को जगह मिल सकती है। सोशल मीडिया में कुछ विधायकों के नाम संभावित मंत्री के रूप में चलाए भी गए हैं। इसके बाद से दावेदार विधायकों के निवास पर पार्टी कार्यकर्ताओं का मजमा लगना शुरू हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि एक विधायक को लेकर अभी से यह धारणा बन गई है कि उनकी टिकट काटकर पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में किसी नए को प्रत्याशी बनाएगी। इस विधायक के यहां क्षेत्र के लोगों ने भी आना-जाना कम कर दिया है। मगर, मंत्री पद के लिए जाति समीकरण में उक्त विधायक को फिट माना गया है, और पिछले दस दिनों से विधायक की पूछपरख काफी बढ़ गई है।
कैबिनेट का विस्तार कब होगा, यह अभी तय नहीं है। मगर, एक बात तय मानी जा रही है कि एक मंत्री बस्तर से बनाए जाएंगे। पार्टी के कुछ लोग 15 अगस्त के बाद कैबिनेट विस्तार का अंदाजा लगा रहे हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जो कि ये दावा कर रहे हैं राज्योत्सव के आसपास ही कैबिनेट विस्तार होगा। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
राखी पर शराब, एक के साथ एक पैग फ्री

एक तरफ प्रदेश भर की बहनें अपने भाइयों की स्वस्थ और लंबी उम्र के लिए शराबबंदी की मांग कर रही हैं। वहीं शराब की कंपनियां और बार रेस्टोरेंट वाले राखी पर भी बिजनेस करने से बाज नहीं आ रहे। हालांकि शराब भ_ी और बार वाले पहले भी ऐसे आफर देते रहे हैं लेकिन वह पर्वों पर नहीं, मार्च अंत में अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए । उसमें भी शराब के साथ चखना फ्री रहता था।
नवा रायपुर के एक बार संचालक के ऐसे ही बिजनेस आफर से बवाल मचा हुआ है। आईपी क्लब ने आस्था और संस्कार के पर्व राखी के मौके पर एक पैग खरीदने पर दूसरा फ्री (बाय वन गेट वन फ्री) का आफर दिया है। इस आफर पर बार संचालक ने कहा कि शराब पीकर,भाई बहन अपने प्यार के पावर को डबल कर सकते हैं। यह आफर शराब के साथ सभी तरह के पेय पर दिया है। यह आफर देकर बार संचालक ने नैतिकता खोने के साथ भीड़ के विरोध को भी मोल ले लिया है। इस आफर पर क्लब में आज रात कार्यक्रम भी आयोजित किया है।
इस कार्यक्रम के पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल होते ही विवाद खड़ा हो गया है। बजरंग दल ने बार संचालक और प्रशासन को आयोजन रद्द न करने पर बड़े विरोध के लिए तैयार रहने कहा है। वैसे यह क्लब पहले भी विवादों में रहा है। नवंबर 21 में यहां फायरिंग हो चुकी है। तो अभी अप्रैल में ही पुलिस ने आधी रात इस क्लब में लड़कियों को पकड़ा था।
बृजमोहन तो बृजमोहन है
भाजपा में सर्वाधिक 8 बार के विधायक रहे रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल दिल्ली की राजनीति में रम गए हैं। उनकी लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला, और कई केन्द्रीय मंत्रियों से नजदीकियां हैं। यद्यपि वो पहली बार सांसद बने हैं, लेकिन उन्हें दिल्ली के लाजपत नगर में बड़ा बंगला आबंटित हुआ है। बृजमोहन भी दिल्ली में उसी तरह पहचान बनाने में लगे हैं, जो कभी दिवंगत विद्याचरण शुक्ल की रही है।
दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल जब पॉवर में थे, तो छत्तीसगढ़ वासियों के लिए दिल्ली में उनका बंगला हमेशा खुला रहता था। वो बिना किसी भेदभाव के यथासंभव मदद किया करते थे। बृजमोहन के यहां भी प्रदेश के अलग-अलग इलाकों से लोग पहुंच रहे हैं, और दिल्ली में उनकी टीम यथासंभव मदद भी कर रही है। उनके बंगले में किचन 24 घंटे खुला रहता है। खुद बृजमोहन व्यक्तिगत तौर पर सत्कार करने में पीछे नहीं रहते हैं।
पिछले दिनों प्रदेश युवा मोर्चा के पदाधिकारी दिल्ली पहुंचे, तो वो प्रदेश के एक सीनियर सांसद के यहां भी गए। सांसद महोदय के यहां खाने के लिए थोड़ी खिचड़ी मिली, क्योंकि सांसद महोदय डाइटिंग पर हैं। मगर बाद में ये पदाधिकारी बृजमोहन के यहां गए, तो उनके लिए शानदार खाना तैयार था। पदाधिकारियों के लिए विशेष मिठाई मंगाई गई थी। खुद बृजमोहन खाने की टेबल पर उनसे बतियाते रहे। बृजमोहन के आतिथ्य सत्कार से युवा मोर्चा के पदाधिकारी काफी प्रभावित रहे, और वो पार्टी के भीतर बृजमोहन का गुणगान करने में थक नहीं रहे हैं।
बृजमोहन की केन्द्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से काफी बेहतर संबंध हैं। वैष्णव, बृजमोहन की अनुशंसाओं को खास तवज्जो देते हैं। उनकी अनुशंसा पर जबलपुर के लिए नई ट्रेन शुरू हुई है। चर्चा है कि आने वाले दिनों में रायपुर को विश्व स्तरीय रेलवे स्टेशन बनाने सहित कई और कार्यों को मंजूरी मिल सकती है। मगर रायपुर विशेषकर के लोग मंत्री नहीं रहने से मायूस हैं। इसकी वजह यह है कि सरकार के तमाम मंत्री नवा रायपुर शिफ्ट हो गए हैं। वो बृजमोहन जैसे सुलभ नहीं रह गए हैं। ऐसे में उनकी कमी तो महसूस हो ही रही है।
संगठन तक पहुंची पार्षदों की बात

रायपुर नगर निगम के नए नवेले कई भाजपा पार्षदों के खिलाफ शिकायतें पार्टी संगठन को पहुंची है। एक महिला पार्षद के खिलाफ शिकायत यह है कि उनके पति कॉलोनी में सब्जी बेचने वालों तक से उगाही कर रहे हैं।
दो-तीन पार्षदों के खिलाफ शिकायत आई है कि वो अपने वार्ड में हो रहे निजी निर्माण कार्यों पर हस्तक्षेप करते हैं, और मालिकों को निगम से नोटिस भिजवा देते हैं। फिर उनसे वसूली करते हैं। वार्डों में सफाई-बिजली का बुरा हाल है। पिछले दिनों रायपुर के विधायकों, और शहर जिले के पदाधिकारियों की एक बैठक में पार्षदों के कार्यप्रणाली की खूब आलोचना हुई।
विधायकों की मौजूदगी में शहर जिले के एक बड़े पदाधिकारी ने कहा बताते हैं कि पार्षदों ने सफाई ठेकेदारों पर दबाव बना लिया है, और अपने लिए राशि फिक्स कर रखी है। इसका नतीजा यह है कि ज्यादातर वार्डों में गिनती के ही सफाई कर्मी काम कर रहे हैं। एक-दो पार्षदों को बुलाकर चेताया भी गया है, लेकिन इसका कोई असर नहीं दिख रहा है।
तकनीकी सोसायटी में कुछ भी ठीक नहीं
सरकार के बजट से चलने वाले राज्य के एक तकनीकी प्रोद्योगिकी सोसायटी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा। सब कुछ अधिकारियों की मनमर्जी पर चल रहा है। सरकार के दिशा निर्देश पर चलने के लिए 14 मंत्रियों की सहभागिता वाली भारी भरकर समिति का प्रावधान है। और नीतिगत निर्णयों के लिए 14 सदस्यों की गवर्निंग काउंसिल और दैनंदिन कार्यों के लिए कार्यपालिक मंडल बनाया गया है। बाईलाज अनुसार गवर्निंग काउंसिल की एक वर्ष में कम से कम तीन और कार्यपालिक मंडल 4 बैठक अनिवार्य है।
हकीकत यह है कि कांग्रेस सरकार आने और विदा होने के बाद गवर्निंग काउंसिल की बैठक 2018 और कार्यपालिक मंडल की बैठक 2020 के बाद से नहीं हुई है। इतना ही नहीं सोसायटी में कार्यपालक समिति भी 2020 से आज तक गठित नहीं की जा सकी है। इस दौरान सोसायटी ने सैकड़ों करोड़ के तकनीकी काम मंजूर किए। इनमें से कुछ हुए कुछ भविष्य के गर्भ में जा चुके हैं। कब पूरे होंगे पता नहीं। इसी तरह से भर्तियां भी साहबों के अपने बनाए नियमों से मनमाने तरीके से बदस्तूर जारी है।
समस्त भर्ती 2016 में बनाए गए सेटअप और भर्ती नियमों और तय किए गए अहर्ता के अनुसार होनी थी? पर पिछले 8 महीनों में जितनी भी भर्ती हुई है उनमें इस भर्ती नियम और अहर्ता को बदल दिया गया है। इन्हें बिना वित्त विभाग की स्वीकृति, गवर्निंग काउंसिल और कार्यपालिक मंडल के अनुमोदन के नहीं बदला जा सकता।
2018 में कांग्रेस सरकार आने के बाद अधिकारियों द्वारा जानबूझकर गवर्निंग काउंसिल की एक भी बैठक नहीं होने से सारा कार्य अधिकारियों की मनमर्जी चल रही है। मंत्रिस्तरीय संचालन समिति भी अफसरों की करतूतों से अवगत नहीं हो पा रही है और अधिकारियों के हिसाब से ही अनीतिगत निर्णय भी लिए जा रहे हैं। फलस्वरूप मानव संसाधन की भर्ती, वित्तीय व्यय की स्वीकृति, परियोजनाओं की प्रगति संबंधी कार्यवाही और अन्य सभी दैनंदिनी कार्य भी कार्यपालक समिति में रखे बगैर सीधे किए जा रहे हैं। इससे सोसायटी में अनेक अनियमितताओं की खबरें आ रही है।
विकास की राह में छलांग- स्टाप डेम बना पुल

कांकेर जिले के बांसकुंड और उसके आश्रित तीन गांव- ऊपर तोनका, नीचे तोनका और चलाचूर का यह मामला छत्तीसगढ़ के सैकड़ों गांवों की हकीकत सामने लाती है, जहां विकास अब भी छलांग लगाकर ही पहुंचता है।
मानसून आते ही जब चिनार नदी उफान पर होती है, तब इन गांवों के लोग, चाहे वे स्कूल जाते बच्चे हों या राशन लेने वाले बुजुर्ग, जान जोखिम में डालकर स्टापडेम के 16 पिलरों पर कूदते-फांदते नदी पार करते हैं। पुल है नहीं, तो स्टाप डेम के पिलरों पर ही छलांग लगाकर नदी पार की जा रही है। वैसे कई स्टाप डेम छत्तीसगढ़ में दिख जाएंगे, जिनके ऊपर ग्रामीणों की सुविधा के लिए कम भार वाले पुल बनाए गए हैं। मगर, पता नहीं यहां इसकी जरूरत क्यों नहीं समझी गई। यहां के ग्रामीणों के लिए ये पिलर जिंदगी की बाधाओं को दूर करने के काम आ रहे हैं। स्कूली बच्चे बस्ता पीठ पर टांगे पिलरों पर उचकते हुए स्कूल जाते हैं। दो गांवों में सिर्फ प्राथमिक स्कूल हैं। छोटे बच्चों को नदी के उस तरफ पढऩे का मौका मिल जाता है, जबकि मिडिल स्कूल और राशन दुकान तक पहुंचने के लिए नदी पार करना अनिवार्य है। जनप्रतिनिधियों ने ध्यान नहीं दिया, शायद अब दें क्योंकि इसका वीडियो पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर तैर रहा है।
शिक्षक नहीं दे पाने की सजा प्राचार्यों को
छत्तीसगढ़ में वर्षों से शिक्षकों की भारी कमी है। स्कूलों में गणित, विज्ञान, अंग्रेज़ी जैसे विषयों के शिक्षक नहीं हैं, पर सरकार अब तक इस मूल समस्या को हल नहीं कर पाई है। युक्तियुक्तकरण से इतना जरूर हुआ कि 56 हजार रिक्त पदों की संख्या को घटाकर 26 हजार तक लाने में सफलता मिल गई है। बेमेतरा जिले में हाल ही में शिक्षकों की मांग को लेकर छात्र-छात्राओं ने प्रदर्शन किया। सडक़ भी जाम किया और शिक्षा विभाग के जिला व ब्लॉक दफ्तरों को घेरा। अब इसका इलाज यही था कि यथासंभव शिक्षकों की नियुक्ति के प्रयास किए जाते। लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी ने आंदोलन को रोकने का नायाब तरीका निकाला है। उन्होंने ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों, प्राचार्यों को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि ऐसे आंदोलन हुए तो उनका वेतन कटेगा। छात्रों को आंदोलन से रोकें, शासन के स्तर पर खाली पदों पर नियुक्ति का प्रयास किया जा रहा है। क्या पता जिला शिक्षा अधिकारी पर भी ऊपर के अफसरों का दबाव होगा, क्योंकि शिक्षा विभाग से जुड़ा एक एक अधिकारी समझ रहा है कि बच्चों को अपने विषय के शिक्षक नहीं मिलने के कारण अपनी पढ़ाई की कितनी चिंता हो रही है। प्रायमरी और मिडिल स्कूल के स्तर पर तो एक शिक्षक को कई-कई विषयों की पढ़ाई कराने की जिम्मेदारी दे दी गई है पर उससे ऊपर की कक्षाओं में तो उस विषय के ही शिक्षक पढ़ा सकेंगे। छात्र-छात्राओं के सडक़ों पर आ जाने से, स्कूलों में ताला लगा देने से कोई संदेह नहीं व्यवस्था बिगड़ती है, पर समस्या का हल निकालने की जगह उस पर पर्दा डालने का यह नायाब तरीका है। यदि प्राचार्य के कहने के बावजूद यदि छात्र और अभिभावक सडक़ पर उतरते हैं तो? वेतन कटने के डर से क्या प्राचार्य इन बच्चों को स्कूल से निकाल देंगे, या फिर पुलिस को बुला लेंगे?
दिल्ली में प्रतिष्ठित चुनाव और छत्तीसगढ़
दिल्ली के प्रतिष्ठित कांस्टीट्यूशन क्लब के चुनाव को लेकर भाजपा के अंदर खाने में काफी हलचल है। क्लब के सचिव पद के लिए पार्टी के ही दो पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी, और संजीव बालियान आमने-सामने हैं। खास बात ये है कि छत्तीसगढ़ के पूर्व सांसद प्रदीप गांधी भी चुनाव मैदान में कूद गए हैं, और कार्यकारिणी सदस्य के लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं।
कांस्टीट्यूशन क्लब के पदेन अध्यक्ष लोकसभा स्पीकर होते हैं। यह देश की सबसे पुरानी संस्थाओं में से एक है। पीएम, केन्द्रीय मंत्रियों व सांसद, और पूर्व सांसद के अलावा केन्द्र सरकार के सचिव स्तर के अफसर क्लब के सदस्य होते हैं। लिहाजा, यहां का सदस्य होना ही काफी प्रतिष्ठापूर्ण माना जाता है। क्लब के कुल सदस्यों की संख्या 12 सौ के आसपास है। मगर सिर्फ सांसदों, और सदस्य पूर्व सांसदों को ही वोट डालने का अधिकार है। पहले सचिव, और अन्य पदों पर पदाधिकारी निर्विरोध चुने जाते रहे हैं, लेकिन इस बार बकायदा चुनाव हो रहे हैं।
सचिव, और अन्य पदों के लिए 12 अगस्त को वोटिंग होगी। चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य राजीव शुक्ला खेल सचिव के पद पर निर्विरोध चुने जा चुके हैं। मगर सचिव, और कार्यकारिणी सदस्य के 11 पद के लिए खींचतान चल रही है। सचिव पद के लिए भाजपा के ही दो दिग्गज नेता रूडी, और संजीव बालियान के बीच मुकाबला है। चर्चा है कि राजीव प्रताप रूडी को कई भाजपा सांसदों के अलावा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का भी समर्थन है। जबकि संजीव बालियान को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समर्थक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।
प्रत्याशी, सांसदों के बीच समर्थन जुटाने के लिए काफी मेहनत भी कर रहे हैं। इन सबके बीच राजनांदगांव के पूर्व सांसद प्रदीप गांधी भी सांसदों से संपर्क कर अपने लिए समर्थन मांग रहे हैं। गांधी के लिए छत्तीसगढ़ के विशेषकर भाजपा सांसद प्रचार कर रहे हैं। वैसे तो गांधी वर्ष-2004 में सांसद बने थे, लेकिन वो दो साल के भीतर ही संसद में सवाल पूछने के नाम पर पैसे लेने के आरोप में बर्खास्त भी हो गए थे। उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था।
प्रदीप गांधी की किसी तरह भाजपा में वापसी तो हो गई, लेकिन पार्टी की मुख्य धारा में नहीं आ पाए। ये अलग बात यह है कि पूर्व सांसद होने के नाते संसद भवन के सेंट्रल हॉल तक आने-जाने में रोक नहीं है। वो हमेशा सत्र के दौरान संसद भवन में रहते हैं। काफी सांसदों से उनका परिचय है। इन सबके चलते उन्हें चुनाव जीतने का भरोसा है।
प्रदीप गांधी के अलावा पूर्व सांसद असलम शेरखान, और उद्योगपति नवीन जिंदल भी सदस्य का चुनाव लड़ रहे हैं, और वो प्रदीप गांधी के मुकाबले में हैं। चुनाव में क्या होगा, यह तो 12 तारीख को ही पता चलेगा। मगर क्लब के चुनाव को भाजपा के गुटीय नजरिए से भी देखा जा रहा है।
अपराधी वाहन चालक ही क्यों ?

यह व्हाट्सएप पोस्ट हमें हमारे एक परिचित ने रिसेंड किया है। उन्हें यह मैसेज किसी ग्रुप में पढऩे को मिला था। हमारे परिचित का कहना है कि वे निम्नांकित 8 जुर्माने में से छह यानी 1,2,3,6,7 और 8 के शिकार हो चुके थे। कभी अनजाने तो कभी भूलवश गलती कर बैठते। लेकिन अहम बात यह है कि ट्रैफिक पुलिस, नगर निगम, पशुपालन विभाग जैसे सरकारी तंत्र पर उसकी अपनी ढिलाई अनदेखी पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती। ऐसा लगता है जनता ही एकमात्र अपराधी है, और केवल उसी पर जुर्माना लगता है। उन पर कोई नियम लागू नहीं होते, ऐसी लापरवाही के लिए कभी जवाबदेह नहीं होते।
क्या उन्हें भी जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए? नागरिकों को कड़ी मेहनत करनी चाहिए, कष्ट सहने चाहिए, टैक्स चुकाने चाहिए, जुर्माना भरना चाहिए, सरकारी खजाना भरना चाहिए। अपनी पीड़ा को जाहिर करते हुए आम जनों से अनुरोध किया कि इस मैसेज को जितना संभव हो उतना व्यापक रूप से साझा करें, ताकि जिन्होंने ये नियम बनाए हैं, वे भी इस सच्चाई से अवगत हों।
ऐसी वसूली
हेलमेट नहीं... जुर्माना 1,000/-
नो-पार्किंग जोन में पार्किंग... जुर्माना 3,000/-
बीमा नहीं... जुर्माना 1,000/-
नशे में गाड़ी चलाना... जुर्माना 10,000/-
नो-एंट्री जोन में गाड़ी चलाना... जुर्माना 5,000/-
गाड़ी चलाते समय मोबाइल पर बात करना... जुर्माना 2,000/-
प्रदूषण प्रमाणपत्र नहीं... जुर्माना 1,100/-
तीन सवारी बैठाना (ट्रिपल सीट राइडिंग)... जुर्माना 2,000/-
परन्तु
खराब यातायात संकेत... कोई जिम्मेदार नहीं!
सडक़ों पर गड्ढे... कोई जिम्मेदार नहीं!
अतिक्रमित फुटपाथ... कोई जिम्मेदार नहीं!
स्ट्रीट लाइटिंग नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं!
गलियों में कचरा बिखरा हुआ... कोई जिम्मेदार नहीं!
सडक़ों पर स्ट्रीट लाइट पोल नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं!
सडक़ें खोदकर बिना मरम्मत के छोड़ दी गईं... कोई जिम्मेदार नहीं!
अगर आप गड्ढे में गिर जाए और चोट लग जाए... कोई जिम्मेदार नहीं!
अगर आवारा गाय या जानवर आपकी गाड़ी से टकरा जाएं या कुत्ता काट ले... कोई जिम्मेदार नहीं!
सडक़ पर सीवेज का पानी बह रहा है... कोई जिम्मेदार नहीं!
दोपहिया चालकों की सर्जरी, पर उड़ते ट्रक अछूते
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प्रदेश की यातायात पुलिस इन दिनों पूरे जोश से सडक़ों पर सक्रिय है। पर ध्यान बस एक ही दिशा में लगा है-दोपहिया चालकों की चेकिंग। कहीं हेलमेट की कमी है, कहीं बीमा की कॉपी नहीं है, कहीं नंबर प्लेट पर क्यूआर कोड नहीं दिखा, तो कहीं आरसी गायब। लगता है जैसे दुपहिया चालकों की सर्जरी के लिए ही विभाग ने कमर कस रखी है। शहर की सीमा पार करते ही दृश्य बदल जाता है। सडक़ किनारे आरटीओ की चमचमाती गाडिय़ां खड़ी दिखती हैं। यह जांच चौकी किसी अस्थायी दुकान की तरह सजी होती है, पर उनका ध्यान भी सिर्फ दुपहिया पर टिका होता है।
वहीं ट्रक जो तेज रफ्तार में दौड़ते हैं। जैसे सडक़ उनकी निजी रेसिंग ट्रैक हो। जिनके पास न आगे नंबर प्लेट है, न पीछे। पर ये पुलिस और आरटीओ के रेडार में आते ही नहीं। ये ट्रक आम आदमी के नहीं, बल्कि धनकुबेरों, रसूखदारों और सिस्टम से नजदीकी रखने वालों के हैं। जांच की लक्ष्मण रेखा यहां दुपहिया चालकों तक खींची हुई होती है।
कांकेर जाते समय पुराने धमतरी रोड पर दर्जनों ट्रकें बिना नंबर प्लेट के सरपट दौड़ते देख सकते हैं। ये पुराना रोड प्रेम समझदारी से भरा है। इस रास्ते से निकलने पर टोल टैक्स नहीं देना पड़ता। यानी, बिना नंबर, बिना ज़म्मेदारी और बिना जवाबदेही, ये ट्रकें खुलेआम कानून का मजाक बना रहे हैं। कानून शायद नींद की गोली खाकर सो गया है।
अब सवाल ये नहीं कि जांच हो रही है या नहीं। ये है कि क्या ये जांच सबके लिए बराबर हो रही है?
शहर की ट्रैफिक पुलिस के आला अफसरों को समझना होगा कि व्यवस्था तब सुधरेगी जब दोपहिया चालकों से आगे बढक़र उन रफ्तारबाज ट्रकों पर भी कार्रवाई की जाए, जो कानून को ताक पर रख सडक़ को अपनी जागीर समझ बैठे हैं।
( तस्वीर एवं विवरण- गोकुल सोनी)
छठे आयोग की तरह आठवें की देरी
आज की तारीख में 8 वें वेतन आयोग को लेकर दिल्ली में जो कुछ भी प्रक्रियागत उहापोह चल रही है, वह हूबहू छठे वेतन आयोग जैसी ही है। इस बार केवल गठन समय से पहले कर दिया गया। हालांकि अभी अध्यक्ष सदस्यों की नियुक्ति सात महीने से नहीं हो पाई है। इसे गठन को भी देरी में गिना जा सकता है। इसलिए सब कुछ वैसा ही है। 6वां वेतन आयोग 1 जनवरी, 2006 से लागू होना था। लेकिन गठन हुआ जुलाई 2006 में।
इसकी वजह से आयोग को रिपोर्ट तैयार करने में लगभग डेढ़ साल का समय लगा और इसे मार्च 2008 में सरकार को सौंपा। इसे लागू करने सरकार ने 14 अगस्त, 2008 को मंजूरी दी। हालांकि, इसे दो साल पहले की डेट 1 जनवरी 2006 से लागू किया गया। इसका फायदा कर्मचारियों को मिला। उनके हर कर्मचारी के हाथ में 32 महीने का एरियर आया। उस समय कहावत चलती थी हर कोई बोरा भर भरकर ले गया।
बहरहाल अब 8वां वेतन आयोग 1 जनवरी, 2026 से लागू होना है। सरकार ने इसके गठन को तो मंजूरी 16 जनवरी 2025 में ही दे दी, लेकिन अभी तक अध्यक्ष सदस्यों की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। चर्चा है कि साल के अंत तक इनकी नियुक्ति हो सकती है। अगर आयोग 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत में भी बनता है, तो उसे रिपोर्ट देने में डेढ़ साल लग सकते हैं, यानी मार्च 2027 तक तो सिर्फ सिफारिशें आएंगी। तब सरकार को 30-32 महीने का एरियर देना पड़ सकता है। और वह समय भी आम चुनाव का होगा।
शायद सरकार को उम्मीद हो कि अच्छा वेतन पैकेज वोट में तब्दील हो। वैसे वेतन आयोग की रिपोर्ट तैयार करना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें स्वाभाविक रूप से 2-3 साल का समय लगता है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, किसी भी ठोस घोषणा के लिए 2025 के अंत या 2026 की शुरुआत तक इंतजार करना पड़ सकता है।
सरकारी छोड़ निजी नौकरी में
आईएफएस के वर्ष-2006 बैच के आईएफएस अफसर अरुण प्रसाद पी अपने पद से इस्तीफे के बाद मद्रास की एक मल्टीनेशनल कंपनी जॉइन करने वाले हैं। सीसीएफ स्तर के अफसर अरुण प्रसाद पर्यावरण संरक्षण मंडल के सदस्य सचिव थे। पिछले महीने ही केन्द्र सरकार ने प्रसाद का इस्तीफा मंजूर किया था।
प्रसाद आईएफएस के पहले अफसर हैं, जो कि ऑल इंडिया सर्विस से इस्तीफे के बाद निजी कंपनी में सेवाएं देने जा रहे हैं। हालांकि आईएएस के दो अफसर शैलेश पाठक, और राजकमल ने भी नौकरी छोडक़र निजी कंपनी जॉइन की थी। आईएएस के वर्ष-88 बैच के अफसर शैलेश पाठक ने भी राज्यपाल के सचिव रहते नौकरी छोड़ दी थी, और वो बहुराष्ट्रीय कंपनी में चले गए थे। इसी तरह 94 बैच के अफसर राजकमल भी कोरबा कलेक्टर थे, और फिर बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। वे वर्तमान में दुबई में मैकेंजी कंपनी में सेवाएं दे रहे हैं। उनकी पत्नी रिचा शर्मा एसीएस हैं। फिर भी प्रसाद के इस्तीफे की काफी चर्चा है। वजह यह है कि उनकी सेवा मात्र 19 साल की ही रही। ये अलग बात है कि वो हमेशा मलाईदार पदों पर रहे हैं। प्रसाद को लेकर यह कहा जा रहा है कि वो निजी कारणों से अपने गृह राज्य तमिलनाडु में रहना चाहते हैं।
परंपरा, आस्था हो तो पशु प्रेम..?

कोल्हापुर के नंदनी गांव में जैन मठ की वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा रही 36 वर्षीय हथिनी महादेवी वहां के लोगों के लिए केवल एक पशु नहीं थी। वह पूजनीय थी, परिवार जैसी थी। गांववासियों ने उसे अपने पर्वों, अनुष्ठानों और जीवन के हर महत्वपूर्ण क्षण में शामिल किया था। ऐसे में जब बॉम्बे हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने उसके स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए उसे जामनगर के वंतारा पुनर्वास केंद्र भेजने का आदेश दिया, तो यह फैसला गांव के लोगों के लिए गहरा भावनात्मक आघात बन गया।
महादेवी गठिया, नाखूनों की बीमारी, पैरों में संक्रमण और मानसिक तनाव से पीडि़त थी। ‘पेटा’ संस्था ने लगातार यह बात उठाई कि वह बीमार और दुखी है। संस्था का कहना था कि महादेवी को बेहतर इलाज, खुला वातावरण और अन्य हाथियों का साथ मिलना चाहिए ,जो वंतारा जैसे आधुनिक पुनर्वास केंद्र में संभव है।
स्पेशल एंबुलेंस से उसे जामनगर के वंतारा केंद्र पहुंचा दिया गया। इस फैसले के विरोध में हजारों लोगों ने मौन पदयात्रा निकाली। वंतारा अभयारण्य अंबानी समूह द्वारा संचालित है। स्थानीय लोगों को यह महसूस हुआ कि जिस देवी हथिनी से उनकी आस्था जुड़ी है, उस पर अब एक कॉरपोरेट का हस्तक्षेप हो रहा है। नाराजगी के चलते लोगों ने जियो सिम का बहिष्कार शुरू कर दिया। सोशल मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 1.5 लाख लोगों ने जियो सिम पोर्ट कराने के लिए आवेदन कर दिया है।
विवाद बढ़ता देख वंतारा प्रबंधन ने महादेवी की देखभाल का वीडियो जारी किया और सफाई दी कि उन्होंने महादेवी को नहीं मांगा था, बल्कि वे केवल अदालत के आदेश का पालन कर रहे हैं। जनभावनाओं के दबाव में महाराष्ट्र सरकार भी हरकत में आ गई। मंत्रिपरिषद की आपात बैठक हुई, जिसमें निर्णय लिया गया कि सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की जाएगी। साथ ही यह भी आश्वासन दिया गया कि यदि महादेवी को नंदनी मठ में वापस लाया गया, तो वहां वंतारा जैसी चिकित्सा और देखभाल की व्यवस्था की जाएगी।
फिलहाल महादेवी जामनगर में है और इलाज जारी है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कुछ जरूरी सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या हम किसी पशु को तभी प्रेम करते हैं जब वह हमारी धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हो? और जब उसकी स्वतंत्रता, स्वास्थ्य और सुरक्षा की बात आती है, तो क्या करते हैं? छत्तीसगढ़ की तरफ भी एक नजर डालिए। यहां हाईवे पर दम तोड़ते बेसहारा गायों और जंगलों में सुकून के लिए जख्मी हालत में भटकते, करंट से मारे जाते, हाथियों की दशा देखकर हम कितने भावुक होते हैं? क्या हमारा पशु प्रेम और हमारी आस्था, वास्तव में पशुओं के हित के लिए कुछ कर पाने लायक है?
लमसेना और देवता बनने की कहानी

क्या आप जानते हैं कि छत्तीसगढ़ की धरती पर एक अनोखी परंपरा है-लमसेना।
आमतौर पर इसका अर्थ होता है-घरजमाई। लेकिन कांकेर और नगरी जैसे अंचलों में यह शब्द सिर्फ एक सामाजिक भूमिका नहीं, बल्कि सम्मान और आस्था की मिसाल है। परंपरा ये है कि जिनके पास बेटा नहीं होता, वे किसी मेहनती और ईमानदार युवक को अपने घर में रहने की जगह देते हैं। वह युवक परिवार के साथ रहकर खेत-खलिहान संभालता है, घर की जि़म्मेदारियां निभाता है। यह एक तरह की परीक्षा होती है, जिसे वहां खटना कहा जाता है। सालों की परीक्षा के बाद जब परिवार को लगता है कि यह युवक सच्चा, कर्मठ और भरोसेमंद है, तब उसे बेटी से विवाह की अनुमति दी जाती है। तब वह युवक लमसेना कहलाता है। उसे जो संपत्ति दी जाती है, वह सिर्फ उसी की होती है। न उसमें किसी बहन-भाई का हिस्सा होता है, न कोई झगड़े का सवाल उठता है।
लमसेना को खुद पर गर्व होता है। वह कहता है-मैं यहां खटा हूं, पसीना बहाया है, भरोसा कमाया है। तभी इस परिवार का हिस्सा बना हूं।
अब सोचिए, इस सामाजिक परंपरा को देवत्व मिल जाए तो? कांकेर जिले में, दुधावा बांध से विश्रामपुरी की ओर जाने वाले रास्ते में एक तिराहा है। वहां लमसेना डोकरा देवता खुले आकाश के नीचे विराजमान हैं। न मंदिर, न छत। फिर भी ऐसी गहराई से बसी हुई आस्था कि हर गुजरता मुसाफिर सिर झुकाता है। लोग नारियल चढ़ाते हैं, मन्नत मांगते हैं, और पूरी होने पर आकर कृतज्ञता जताते हैं। यह रास्ता अब भारतमाला परियोजना के तहत चौड़ी सडक़ में बदल रहा है। आगे केशकाल का पहाड़ी इलाका है, जहां सुरंग निर्माण जारी है। सुरक्षा कारणों से अभी प्रवेश सीमित है, लेकिन जल्द ही यह पूरा क्षेत्र पर्यटन और विकास का बड़ा केंद्र बनने वाला है। सोचिए, क्या आपने कभी ऐसा देवता देखा है, जो मेहनत, ईमानदारी और अपनेपन का प्रतीक हो? ( फोटो व टिप्पणी- गोकुल सोनी)
मदद से ज्यादा, प्रचार की तस्वीर
छत्तीसगढ़ की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े एक बार फिर चर्चा में हैं। वजह वही, तस्वीर और सोशल मीडिया। कुछ वक्त पहले उनकी एक फोटो वायरल हुई थी, जिसमें वे कुर्सी पर बैठकर कीचड़ भरे खेत में धान की रोपाई करती दिखी थीं। लोगों ने खूब कहा, भाई, कुर्सी पर बैठकर खेत में काम कौन करता है? तब कई लोगों ने इसे किसान वाली छवि का दिखावा बताया।
अब जो तस्वीर वायरल हो रही है, उसमें वे घायलों की मदद करती दिख रही हैं। मामला कटघोरा के पास सुतर्रा मोड़ का है, जहां बाइक सवार कुछ युवक सडक़ हादसे में घायल हो गए। मंत्री राजवाड़े का काफिला वहीं से गुजर रहा था। उन्होंने गाड़ी रुकवाई, घायलों को अपनी एसयूवी में बिठाया और कटघोरा अस्पताल भिजवाया। डॉक्टरों को इलाज में कोताही न बरतने की हिदायत दी और सोशल मीडिया पर खुद इसकी जानकारी दी।
इस बार सोशल मीडिया पर लोग बंटे हुए हैं। कुछ कह रहे हैं- इंसानियत जिंदा है, मंत्रीजी ने मिसाल पेश की है। खासकर तब, जब आम लोग घायलों की मदद करने से डरते हैं, और सरकार को इसके लिए इनाम योजना तक शुरू करनी पड़ी है। मंत्री की पहल से प्रेरणा मिलनी चाहिए—ऐसी उम्मीद की जा रही है।

लेकिन कुछ लोग सवाल भी उठा रहे है कि अगर वाकई मदद करनी थी तो चुपचाप करतीं। आपके पास गाड़ी है, प्रशासन है, गन मैन हैं। इतना कर दिया तो कौन सी बड़ी बात हो गई? वीडियो, फोटो और सोशल मीडिया पोस्ट क्यों? ये तो पब्लिसिटी है... ढिंढोरा पीटने जैसा। कुछ ने तंज कसते हुए कहा—सिर्फ घायलों को अस्पताल भेजने से काम नहीं चलेगा। रोड टैक्स तो हम हर साल देते हैं, पर सडक़ें कब बनेंगी? हादसे कम तभी होंगे। मंत्री हैं, सडक़ बनवाएं-सरकार से कहकर।
सच तो यह है कि कोरबा-कटघोरा-अंबिकापुर हाईवे पर दुर्घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। कुछ ही दिन पहले एक स्कूल बस हादसे में दो शिक्षिकाओं की मौत हो गई थी। ताजा मामले में बाइक सवार युवकों की जान तो बच गई, लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि उन्होंने हेलमेट नहीं पहना था।
अगर मंत्री सडक़ पर घायलों की मदद करती हैं तो यह सराहनीय है। लेकिन, सडक़ें सुधारने, हेलमेट जागरूकता फैलाने और ट्रैफिक नियम सख्ती से लागू करवाने की जिम्मेदारी भी उसी गंभीरता से निभानी चाहिए। वरना तस्वीरें तो आती-जाती रहेंगी... हादसे होते रहेंगे... और सवाल उठते रहेंगे।
रायपुर जेल इतनी VIP कब थी?
रायपुर सेंट्रल जेल में इन दिनों वीवीआईपी मुलाकातियों की आवाजाही बढ़ गई है। पूर्व मंत्री कवासी लखमा तो जेल में हैं ही। अब पूर्व सीएम भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य भी पहुंच गए हैं। शराब घोटाला केस में चैतन्य 18 अगस्त तक न्यायिक रिमांड पर हैं।
चैतन्य से मिलने पिछले दिनों प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट रायपुर आए थे। उन्होंने सेंट्रल जेल में चैतन्य, और कवासी लखमा से अलग-अलग मुलाकात की। रोज वकीलों के साथ-साथ परिवार के लोग भी चैतन्य, और कवासी लखमा से मिलने पहुंच रहे हैं। सभी की जमानत याचिका हाईकोर्ट, या सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
घोटाले में फंसे अनवर ढेबर, और पूर्व आईएएस अनिल टूटेजा सहित अन्य सभी को चैतन्य, और कवासी लखमा व सूर्यकांत तिवारी के साथ एक ही बैरक में रखा गया है। सभी हाई प्रोफाइल राजनीतिक, और पूर्व अफसरों पर जेल प्रशासन की पैनी नजर है। पिछले दिनों एक टीम ने बैरक में जाकर सूर्यकांत तिवारी की जांच पड़ताल भी की थी।
बताते हैं कि बाकियों की तुलना में कवासी लखमा ज्यादा परेशान हैं। वो मेल मुलाकात के दौरान भावुक हो जाते हैं। सचिन पायलट भी कवासी से मिलकर असहज हो गए थे। उन्होंने जेल प्रशासन पर आरोप लगाए थे कि कवासी को समय पर दवाईयां नहीं मिल पा रही है। हालांकि इसका ज्यादा कोई असर नहीं पड़ा। ये सभी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। रिहाई कब तक होगी, यह किसी को नहीं पता।
पाकिस्तान और भाजपा-कांग्रेस

पिछले दिनों लंदन में पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शाहिद अफरीदी के साथ स्टेडियम में क्रिकेट मैच देखते तस्वीर वायरल हुई।
इस तस्वीर को पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने एक्स पर शेयर कर कटाक्ष भी किया। सोमवार को संसद भवन में पूर्व सांसद, और विधायक सुनील सोनी की ठाकुर से मुलाकात हुई, तो उन्होंने तस्वीर के बारे में पूछ लिया।
ठाकुर बीसीसीआई के अध्यक्ष रह चुके हैं। वो मैच देख रहे थे, तो अफरीदी वहां पहुंचे, और उनके बगल में बैठ गए। बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष ठाकुर को तो विदेशी क्रिकेटर भी जानते पहचानते हैं। चूंकि अफरीदी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीयों, और सेना के खिलाफ काफी कुछ कहा था। इसलिए वो भारतीयों की नजर में खलनायक बने हुए हैं, और अनुराग ठाकुर से चर्चा करते तस्वीर वायरल हुई, तो ठाकुर को मैदान के बाहर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ गई।
ये अलग बात है कि बीसीसीआई के मौजूदा चेयरमैन राजीव शुक्ला छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य हैं, और सितंबर में एशिया कप में भारत-पाकिस्तान का मुकाबला होने जा रहा है। इस पर भी काफी कुछ कहा जा रहा है।
ओडिशा में बेचैनी
दिल्ली से खबर आई है कि पड़ोसी राज्य ओडिशा के डेढ़ दर्जन भाजपा विधायकों ने पार्टी हाईकमान से मुलाकात की है। ये विधायक सीएम मोहन मांझी की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं है, और वो उन्हें बदलना चाहते हैं।
ओडिशा में पहली बार भाजपा की सरकार बनी है। कोण्डागांव की विधायक सुश्री लता उसेंडी ओडिशा भाजपा की सह प्रभारी हैं। भाजपा विधायकों की नाराजगी सीएम के खिलाफ किसी भ्रष्टाचार या अन्य मामले को लेकर नहीं है। बल्कि विधायक इस बात से नाराज हैं कि प्रदेश में नौकरशाही हावी हो गई है। वो सीएम की अनुभवहीनता का फायदा उठा रहे हैं। इससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ रहा है। असंतुष्ट विधायकों ने पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से मुलाकात की।
असंतुष्ट विधायकों ने पार्टी हाईकमान को याद दिलाया कि नौकरशाही हावी होने की वजह से बीजू जनता दल सरकार चली गई थी। उस समय नवीन पटनायक के बजाय उनके करीबी आईएएस अफसर वी.के.पांडियन का सरकार में दबदबा था। कुछ ऐसी ही परिस्थिति भाजपा सरकार में भी बन रही है। हालांकि पार्टी हाईकमान ने विधायकों को तो समझा-बुझाकर भेज दिया। लेकिन प्रदेश संगठन के प्रभारियों को इस तरह की शिकायतों पर बारीक नजर रखने की हिदायत दी गई है। इन सब वजहों से प्रभारियों का काम थोड़ा बढ़ गया है।
बृजमोहन और कांग्रेस

रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने दो दिन पहले केन्द्रीय सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से मुलाकात की, और कुम्हारी टोल प्लाजा को बंद करने की मांग की।
बृजमोहन ने ट्वीट कर कहा कि कुम्हारी टोल प्लाजा की मियाद खत्म होने के बावजूद इसका अवैध संचालन बरसों से हो रहा है, और इससे जनता परेशान है। टोल प्लाजा पर वसूली तत्काल बंद करने की मांग रखी गई है।
यह साफ हो चुका है कि दो साल पहले ही टोल प्लाजा की मियाद खत्म हो चुकी है। बावजूद इसके अवैध रूप से टोल टैक्स लिया जा रहा है। बृजमोहन के ट्वीट पर कांग्रेस को हमला करने का मौका मिल गया है। प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता धनंजय ठाकुर ने सवाल उठाया है कि खुद कुम्हारी टोल प्लाजा को बृजमोहन अग्रवाल जी ने अवैध बताया है, और गडकरी से बंद करने की मांग की है।
कांग्रेस प्रवक्ता ने पूछ लिया कि बरसों से टैक्स वसूली किसके संरक्षण में हो रहा है। उन्होंने इसे बड़ा टैक्स घोटाला करार दिया है। कांग्रेस ने इस घोटाले की जांच होनी चाहिए। सत्ताधारी दल के लोग ही मान रहे हैं कि अवैध वसूली हो रही है, तो जांच की मांग गैरवाजिब नहीं है। देखना है इस मामले पर गडकरी क्या कुछ करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट पर नजरें
आखिरकार सीनियर आईएफएस अफसर सुधीर अग्रवाल इस महीने के आखिरी में रिटायर हो रहे हैं। आईएफएस के 88 बैच के अफसर अग्रवाल ऑल इंडिया सर्विस के प्रदेश के सबसे सीनियर अफसर हैं।
अग्रवाल के बाद सीएस अमिताभ जैन का नंबर आता है, जो कि 89 बैच के अफसर हैं। आईएफएस में सबसे सीनियर होने के बावजूद सुधीर अग्रवाल हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनने से रह गए। अग्रवाल और चार अन्य अफसरों की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर वी.श्रीनिवास राव को पिछली भूपेश सरकार ने हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बना दिया था। तब से अब तक वो पद पर जमे हुए हैं।
अग्रवाल ने इसके खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ी। मगर, कैट और फिर हाईकोर्ट में उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब भी मांगा है। प्रकरण पर सुनवाई होना बाकी है। मगर कोई राहत मिलती इससे पहले ही सुधीर अग्रवाल रिटायर हो रहे हैं। फिर भी आईएफएस लॉबी की नजर सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई है, जिन्हें लगता है कि कोर्ट का फैसला भविष्य के लिए नजीर बन सकता है। वाकई ऐसा होगा, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा।


