राजपथ - जनपथ

24-May-2021 6:04 PM (343)

मुसीबत में काम आने वाले आलोक शुक्ला 

भले ही नान केस की वजह से प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला का प्रशासनिक कैरियर लडखड़़ा गया। वे प्रमोट होने से रह गए, और शीर्ष प्रशासनिक पद तक नहीं पहुंच पाए, लेकिन प्रशासन में कई मौके पर संकट मोचक के तौर पर उभरे हैं। मसलन, डेढ़ साल पहले स्कूल शिक्षा विभाग में खरीदी-ट्रांसफर के चलते विभागीय मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह बुरी तरह उलझ गए थे। उस समय तो 30 से ज्यादा विधायकों ने प्रेमसाय सिंह के खिलाफ सीएम को शिकायत कर दी थी। स्कूल शिक्षा महकमा सरकार के लिए सिरदर्द बन गया था। तब गौरव द्विवेदी की जगह डॉ. आलोक शुक्ला को लाया गया, और देखते ही देखते सबकुछ ठीक हो गया।

अब तो स्कूल शिक्षा विभाग की वाहवाही होने लगी है। कोरोना काल में पढ़ाई तुंहर दुआर योजना की तो राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई है। प्रचार-प्रसार से दूर रहकर काम करने का अंदाज सरकार को काफी भा रहा है। और जब कोरोना काल में स्थिति एक बार फिर अनियंत्रित होती दिख रही थी, तब सीएम खुद व्यवस्था की मॉनिटरिंग करने लगे। इस मौके पर डॉ. आलोक शुक्ला ही सलाहकार के रूप में उभरे।

रेणु पिल्ले के छुट्टी पर जानेे के बाद डॉ. आलोक शुक्ला को पहले प्रभार दिया गया, और फिर पूरी तरह स्वास्थ्य महकमा डॉ. आलोक शुक्ला के हवाले कर दिया गया। ये अलग बात है कि इस बदलाव से टीएस सिंहदेव संतुष्ट नहीं थे। मगर यह भी सच है कि आलोक शुक्ला के स्वास्थ्य महकमा संभालते ही कोरोना का ग्राफ लगातार गिरने लगा है, और प्रदेश की स्थिति सामान्य होती दिख रही है। आलोक शुक्ला की कार्यप्रणाली को नजदीक से जानने वाले केन्द्र सरकार में भी काम कर चुके राज्य के एक पूर्व मुख्य सचिव का मानना है कि आलोक जीनियस है। विशेषकर संकटकाल में स्वास्थ्य जैसा महत्वपूर्ण महकमे के लिए आलोक सबसे उपयुक्त है।

अब कैसे पालन होगा लॉकडाउन का?

सूरजपुर के पिटाई मामले पर लिए गए एक्शन ने कई दबी हुई आवाजों को मुखर कर दिया। आईएएस रणवीर सिंह पर कार्रवाई होते ही तुरंत लोगों का ध्यान भैयाथान के एसडीएम प्रकाश राजपूत की तरफ चला गया और वीडियो के साथ प्रमाण दिया गया कि उन्होंने भी सडक़ पर निकलने वाले युवकों को थप्पड़ लगाई। यह बात अलग है कि इस लाइन के लिखे जाने तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। पर लोग साहस बटोर कर शिकायतें सामने ला रहे हैं। कांकेर के कुछ युवकों ने 10 दिन पुरानी घटना का जिक्र सोशल मीडिया पर किया है। फेसबुक पोस्ट पर युवक ने लिखा है कि 13 मई की शाम 5:30 बजे बिजली बंद थी। वह अपने तीन-चार दोस्तों के साथ सडक़ पर टहल रहे थे। उसी समय काम कर के डिप्टी कलेक्टर विश्वास कुमार और दो-तीन बोलेरो जीप में पुलिस वाले पहुंचे। पहले उन्होंने शब्दों से फिर डंडे से बौछारें कीं। मना करने पर भी नहीं रुके। जबकि हमने मास्क पहना हुआ था और दूरी बनाकर चल रहे थे। मेरे हाथ में अब तक सूजन है, जो इस बात का सबूत है।

पोस्ट के मुताबिक सूरजपुर का मामला सामने आने के बाद उनमें यह बात बताने की हिम्मत आई। मामले में डिप्टी कलेक्टर की सफाई भी आ गई है कि इन लोगों को कोई गलतफहमी हुई होगी। मैंने तो पिटाई किसी की नहीं की। वैसे युवकों के पोस्ट से यह पता नहीं चलता है कि वह इस मामले में कोई कार्रवाई चाहते हैं या नहीं। या फिर किसी अधिकारी से इसकी शिकायत भी की है।

मगर यह तो तय हो गया है कि अब लॉक डाउन का उल्लंघन करने वालों को रोकने के लिए कुछ नए उपायों पर प्रशासन व पुलिस को विचार करना पड़ेगा। कहीं ऐसा ना हो की खौफ और रौब खत्म हो जाए और लॉकडाउन की कोई परवाह ही न करे।

क्रेज घटने लगा वेबीनार का

कोरोना के चलते कितनी ही छोटी-छोटी गोष्ठियों, सभाओं पर विराम लगा हुआ है। वीडियो कांफ्रेंस के जरिए पहले सरकारी अधिकारी नेता बैठकें लेते थे लेकिन अब यह घर-घर की बात हो गई है। दादी-दादी और गृहणियों ने भी इसे सीख लिया है। शुरू-शुरू में वेबीनार या ऑनलाइन मीटिंग में घर पर बैठे-बैठे शामिल होना रोमांच लाता था और लोग बड़ी जिज्ञासा के साथ इनमें भाग लिया करते थे। पर, अब ऐसा नहीं है। लोगों के पास इतने अधिक लिंक आने लग गए हैं कि उनमें शामिल होने के लिए सोचना पड़ता है। और, लोगों को याद आ रहा है कि प्रत्यक्ष किसी सभा में शामिल होने का अनुभव कुछ अलग है। वेबीनार में सामने कई चेहरे तो होते हैं लेकिन आपस में सहज संवाद नहीं हो पाता। लोगों को प्रतीक्षा तो कोरोना की लहर खत्म होने की प्रतीक्षा है जब भौतिक उपस्थिति के साथ आमने-सामने होने वाली बैठकों में काना-फूसी, चुगली, आलोचना भी हो सके।

ऐसे ही सलाह मांगते रहना चाहिये...

केंद्रीय शिक्षा बोर्ड सीबीएसई, आईसीएसई और कई राज्यों की बारहवीं बोर्ड परीक्षा कोरोना संक्रमण के चलते अब तक नहीं हो पाई है, या यूं कहें कि तारीख भी तय नहीं हो पाई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ इन संस्थाओं के अधिकारियों की बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला। अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने सभी राज्य सरकारों से आग्रह किया है कि अपना सुझाव दें। यह बताएं की परीक्षा में किस तरह का प्रश्न पत्र हो, कितनी देर की हो, आदि-आदि।

शिक्षा और 12वीं बोर्ड की परीक्षा वास्तव में बहुत गंभीर मसला है जिस पर राज्यों से सुझाव मांगना बहुत अच्छी बात है लेकिन कई लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह केवल इसी एक मुद्दे पर सुझाव लेना चाहिए? ज्यादातर मामलों में तो केंद्र सरकार ने किसी मसले पर राज्यों से कुछ पूछा ही नहीं। जैसे कि 18 प्लस के लोगों को 1 मई से वैक्सीन लगाने का फैसला। बोर्ड परीक्षा के मामले में भी दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के शुरुआती सुझाव आ ही गये हैं। वे कह रहे हैं कि परीक्षा लेने से पहले छात्र-छात्राओं को वैक्सीन लगाई जाए। देखना है की इस सुझाव को तवज्जो दी जाती है या नहीं।

वैक्सीनेशन से ज्यादा कठिन दाखिला

स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम उत्कृष्ट विद्यालयों में दाखिला लेने के लिये जबरदस्त आकर्षण है। ऑनलाइन और ऑफलाइन आवेदन के लिये अंतिम तिथि 10 जून तय की गई है। पर अभी से अधिकांश शालाओं में उपलब्ध सीटों से ड्योढ़े, दुगने आवेदन आ गये हैं। राज्य भर में 6 हजार सीटें हैं पर 9 हजार से अधिक आवेदन अब तक आ चुके हैं। हो भी क्यों नहीं। जो लोग पब्लिक स्कूलों के नाम पर निजी संस्थानों की मोटी फीस और पढ़ाई की गुणवत्ता को लेकर तंग आ चुके हैं, उन्हें अच्छा विकल्प मिला है। सरकारी हिन्दी मीडियम स्कूलों में तो थोड़ी-बहुत फीस भी है, पर इन अंग्रेजी स्कूल में एडमिशन फीस, परीक्षा फीस, ट्यूशन फीस सब माफ है। किताबें और यूनिफॉर्म भी नि:शुल्क मिलेंगे।

आवेदनों की बड़ी संख्या को देखते हुए तय किया गया है कि लॉटरी निकालकर प्रवेश दिया जाये। पर यह इतना आसान भी नहीं है। लॉटरी निकालते समय भी कई श्रेणियों का ध्यान रखना होगा। जैसे, कुल मे से आधी सीटें बालिकाओं के लिये आरक्षित की जायेंगी। 25 प्रतिशत आरटीई के दायरे में आने वाले गरीब परिवारों के बच्चों के लिये रिजर्व रखा जायेगा। इस बार एक और मापदंड जोड़ा गया है, उन बच्चों को प्राथमिकता से प्रवेश दिया जायेगा जिनके माता-पिता को कोरोना ने छीन लिया।

संकेत यही मिलता है कि आने वाले दिनों में स्वामी आत्मानन्द दर्जे के स्कूलों की संख्या बढ़ानी बढ़ानी पड़ सकती है। स्कूली शिक्षा पर बजट बढ़ाना पड़ सकता है। पर, सरकारी स्कूलों के बारे में लोगों की धारणा भी तो बदलेगी। वैसे अभी स्कूलों के रंग-रोगन और फर्नीचर की सुविधा का ही ज्यादा आकर्षण है। अब तक कोरोना के चलते कक्षायें ठीक तरह से लग नहीं पाई हैं। पढ़ाई की गुणवत्ता को परखा जाना अभी बाकी है।


23-May-2021 5:03 PM (386)

बुरे सम्बन्ध ऐसे ही वक्त

सूरजपुर कलेक्टर रणबीर शर्मा ने दवाई खरीदने जा रहे युवक पर हाथ छोड़ा, तो सोशल मीडिया में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई, और देशभर से कलेक्टर के खिलाफ कार्रवाई की आवाजें उठने लगी। सरकार ने भी बिना देरी किए कलेक्टर को हटाकर मामले को शांत करने की कोशिश की है।

कलेक्टर ने माफी भी मांगी है, और सफाई भी दी कि पीडि़त किशोर नाबालिग नहीं था, और 22-23 साल का है। फिर भी सार्वजनिक तौर पर पिटाई करने पर विशेष तौर पर स्थानीय लोग काफी खफा हैं। बताते हैं कि कुछ दिन पहले भी कलेक्टर ने एक युवक पर हाथ छोड़ दिया था, लेकिन तब किसी ने कुछ नहीं कहा। सूरजपुर नया जिला जरूर है,  खनिज-संपदा से भरपूर होने की वजह से काफी संपन्न माना जाता है।

आदिवासी बाहुल्य सूरजपुर में वैश्य तबके के लोगों का काफी दबदबा है। सुनते हंै कि जिला प्रशासन की तरफ से रेडक्रास सोसायटी में पैसा देने के लिए व्यापारियों पर काफी दबाव भी था। यही नहीं, एक अभियान चलाकर डेढ़ दर्जन से अधिक क्रेशर बंद कर दिए गए थे। इन सब वजहों से व्यापार जगत में कलेक्टर के खिलाफ माहौल था, और जब युवक की पिटाई का मामला सामने आया, तो सब कलेक्टर के खिलाफ एकजुट हो गए, और फिर अपने-अपने ढंग से हिसाब चुकता किया।

 रमन सिंह का थाने जाना टल गया

पूर्व सीएम रमन सिंह के खिलाफ टूलकिट मामले में केस दर्ज होने के बाद सियासी घमासान चल रहा है। पहले रमन सिंह अकेले गिरफ्तारी देना चाहते थे, लेकिन प्रदेश प्रभारी पुरंदेश्वरी ने उन्हें मना कर दिया। प्रदेश प्रभारी इस केस के जरिए सारे नेताओं को एक मंच में लाना चाहती थीं। इसी बीच पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर का सुझाव आया कि सभी जिले में पांच-पांच प्रमुख नेता थाने जाकर गिरफ्तारी दें।

अजय का सुझाव सबने पसंद किया, और फिर सभी जिलों में गिरफ्तारी देने वाले पांच बड़े नेताओं की सूची तैयार की गई। इसके बाद सभी नेता अपने-अपने जिले के थाने में जाकर धरने पर बैठे। किसी भी जिले में गिरफ्तारी नहीं हुई। वजह यह थी कि टूलकिट केस में उनके खिलाफ कोई नामजद रिपोर्ट नहीं थी। खैर, सभी नेता थाने में दो घंटे धरने पर बैठने के बाद लौट आए।

दूसरी तरफ, रमन सिंह भी सिविल लाइन थाने जाने वाले थे, लेकिन एक रात पहले ही उन्हें थाने से नोटिस मिल गई कि पुलिस अमला खुद 24 तारीख को उनके घर जाकर पूछताछ करेगा। अंदर की खबर यह है कि  पूर्व सीएम के सुरक्षा अधिकारी भी कोरोना के बीच उनके थाने जाने के पक्ष में नहीं थे। फिर क्या था आईजी से बात हुई, और आनन-फानन में नोटिस टाइप किया गया। इसके बाद फिर रमन सिंह का थाने जाना टल गया।

कांग्रेस चुनावी मोड में?

सरकार के कार्यकाल को ढाई साल बचे हैं, और कांग्रेस अभी से चुनावी मोड में आ गई है। दाऊजी खुद दो बार संचार विभाग की बैठक ले चुके हैं। दो दिन पहले हुई बैठक में दाऊजी के साथ चार मंत्री भी थे। बैठक का लब्बोलुआब यह रहा कि कांग्रेस आने वाले दिनों में मोदी सरकार-भाजपा पर हमले तेज करेगी।

बैठक में लालबत्तीधारी एक नेता ने नसीहत दे दी कि सबको नम्रता से अपनी बात रखनी है। इस पर दाऊजी ने उन्हें कहा कि नम्रता का लबादा आप ओढ़े रहिए, युवा अपनी बात पूरी आक्रामकता से रखेंगे। एक अन्य सदस्य ने सुझाव दिया कि यूपीए सरकार के कार्यों को जनता के सामने रखना चाहिए। इसकी सभी ने सराहना की। एक युवा सदस्य ने शिकायती लहजे में विभाग से जुड़ी कुछ समस्याओं का जिक्र किया, तो दाऊजी ने उन्हें टोका, और सलाह दी कि वे सबसे छोटे हैं, और उन्हें सबसे सीखना चाहिए।

राजीव पुण्यतिथि फीकी

राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर सरकार ने न्याय योजना की एक किश्त जारी कर किसानों को बड़ी सौगात दी। मगर हाईकमान के निर्देश के बाद भी संगठन का  पुण्यतिथि का कार्यक्रम एकदम फीका रहा। ले देकर राजीव गांधी पुण्यतिथि के मौके पर श्रद्धांजलि देने कुल 13 लोग ही पीसीसी दफ्तर पहुंचे थे। जबकि मंत्री-विधायक समेत रायपुर के ही एक दर्जन से अधिक लालबत्तीधारी नेता हैं। बड़े नेताओं में एकमात्र किरणमयी नायक ने ही उपस्थिति दर्ज कराई। बाकी नेता गायब रहे। आम तौर पर पीसीसी में राजीव गांधी की जयंती, और पुण्यतिथि के मौके पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम होते हैं। इस बार पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम अपने क्षेत्र में थे। बाकियों ने संगठन के बजाय सरकार के कार्यक्रम में वर्चुअल मौजूद रहना बेहतर समझा।

छत्तीसगढ़ में भी नकली रेमडेसिविर!

मध्यप्रदेश में रेमडेसिविर  इंजेक्शन की कालाबाजारी की खबरें आने के बाद आशंका तो थी कि छत्तीसगढ़ में भी इसे खपाया गया होगा, पर अब स्वास्थ्य विभाग में ही संलग्न संसदीय सचिव विनोद चंद्राकर ने खुलकर आरोप ही लगा दिया है। वे कह रहे हैं कि खाद्य एवं औषधि विभाग के अधिकारियों के संरक्षण में अप्रैल महीने के आखिरी हफ्ते तक, जब तक एमपी में रेड नहीं पड़ी थी यहां हजारों नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन खपा दिये गये। रायपुर से जिस एजेंसी ने रेमडेसिविर की सप्लाई के लिए सूरत की कंपनी को ऑर्डर किया था, वह वही है जिसके तार मध्यप्रदेश के रैकेट से जुड़े हैं। एमपी की जांच एजेंसियों को छत्तीसगढ़ में सप्लाई का पता नहीं चला है पर चंद्राकर का दावा है कि एक मई को मामला उजागर होने से पहले तक अधिकारियों की मिलीभगत से निजी अस्पतालों के जरिए नकली रेमडेसिविर खपाये गये ।

आरोप विपक्ष की ओर से नहीं है। सत्तारूढ़ दल के विधायक का है। उनका, जो स्वास्थ्य विभाग से ही जुड़े हैं। मामला महामारी का भी है। सप्लाई का जो समय बताया जा रहा है उस दौरान रेमडेसिविर की भारी मांग थी। कई लोग कालाबाजारी करते हुए पकड़े भी गये। इसी दौरान कोरोना पीडि़त मरीजों की एक के बाद एक मौतें भी हुईं। आरोपों को गंभीरता से लेने की जरूरत तो है।

सोशल मीडिया की ताकत..

सूरजपुर में कलेक्टरी का ताप दिखाने के बाद हटाए गए आईएएस रणबीर शर्मा के बुरे बर्ताव की आईएएस एसोसिएशन ने कड़ी निंदा की है। संगठन ने एक ट्वीट में कहा कि यह व्यवहार सेवा और सभ्यता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और अस्वीकार्य है। सिविल सेवकों को नागरिकों से सहानुभूति रखनी चाहिए और हर समय समाज को एक उपचारात्मक स्पर्श प्रदान करना चाहिए। खासकर, महामारी के इस कठिन समय में...।

भला हो उस हिम्मती युवक का जिसने एक के मोबाइल को पटकते देखते हुए भी शूट करना नहीं छोड़ा। सोशल मीडिया की ताकत भी दिख गई। देशभर में वीडियो इस तरह से फैला कि आईएएस के पास बचाव का कोई रास्ता ही नहीं रहा। माफी भी लीपा-पोती की तरह ली गई। एसोसियेशन को भी सामने आना पड़ा। वरना, कांकेर की घटना याद आती है, जब रिश्वत मामले में एसीबी ने कार्रवाई की थी तो इसे आईएएस और आईपीएस के बीच की लड़ाई ठहराने की कोशिश की गई थी। प्रशासनिक अधिकारियों में एसडीएम को हिरासत में लिये जाने से नाराजगी थी। कुछ 20-25 दिन पहले पश्चिमी त्रिपुरा के एक डीएम शैलेश कुमार यादव की एक विवाह समारोह में की गई इसी तरह की दबंगई भी सोशल मीडिया के जरिये देशभर में फैली थी। इस घटना में डीएम को न केवल पद से हटाया गया बल्कि सस्पेंड भी किया गया। छत्तीसगढ़ में डीएम को हटाकर तत्परता तो दिखाई गई है, लेकिन मांग इनके भी निलंबन की उठ रही है। सूरजपुर की इसी घटना में एक और अधिकारी, वहां के एसडीएम ने भी हाथ चलाया है। आईएएस का शोर इतना मचा कि अभी वे बचे हुए हैं। उन पर किसी का ध्यान नहीं गया है। 


22-May-2021 5:29 PM (241)

खुद के वेतन में कटौती का सुझाव....

आमतौर पर मंत्रियों-विधायकों की ओर से खुद अपने वेतन भत्तों की बढ़ोतरी कर ली जाती है यह इकलौता ऐसा प्रस्ताव सदन में होता है जिस पर पक्ष और विपक्ष के लोगों में कोई मतभेद नहीं होता। ऐसी स्थिति में यदि कोई विधायक वेतन भत्तों को कम करने की बात करें तो?

जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर का कहना है कि सभी मंत्रियों, संसदीय सचिव और विधायकों के वेतन भत्ते में 50 प्रतिशत तक कटौती की जाये। जनसंपर्क निधि को भी एक साल के लिए स्थगित कर दिया जाये। छत्तीसगढ़ इस समय कोरोना की दूसरी लहर पर काबू पाने में लगा हुआ है और तीसरी लहर आने की आशंका दिखाई दे रही है। ऐसी स्थिति में वेतन भत्तों की कटौती से मिलने वाली पूरी राशि स्वास्थ्य की व्यवस्था मजबूत करने में लगाई जाये। अभी तक धर्मजीत सिंह के विचार का किसी विधायक, मंत्री ने समर्थन नहीं किया है। कोई करेगा, ऐसी उम्मीद भी कम है।

वैक्सीनेशन में सामाजिक सद्भाव

वैक्सीनेशन पर भ्रांतियों, अफवाहों को हवा मिलती है जब इसे धर्म, समुदायों की अस्मिता के साथ जोड़ दिया जाये। कोरबा के एक इलाके में बीते दिनों मुस्लिम समाज के बीच कुछ इसी तरह भांति फैलाने की कोशिश की गई। वहां से लोग टीके के लिये नहीं निकल रहे थे। कुछ समझदार लोगों ने जिला प्रशासन से बात की और टीकाकरण कराने में मदद करने की बात कही। इसके बाद वहां के एक मस्जिद में ही टीकाकरण केन्द्र खोल दिया गया। अब सोशल मीडिया पर इस पोस्ट होने लगे, मस्जिद में ही टीकाकरण क्यों?  वैसे भी सरकार इस समय टीकाकरण का वर्गीकरण को लेकर हाईकोर्ट को जवाब देने के नाम पर परेशान दिखाई दे रही है। फिलहाल सोशल मीडिया पोस्ट के जवाब में आयोजन करने वालों ने बाकी मस्जिदों से भी सम्पर्क किया। सभी में एक ही दिन एक साथ टीका। साथ ही यह घोषणा भी की गई कि किसी एक समाज के लिये यह टीकाकरण केन्द्र नहीं खोला गया है, टीका सबको लगेगा। और ऐसा हुआ भी। सभी वर्गों से लोग पहुंचे और उन्होंने टीका लगवाया।

बहुगुणा ने लड़ाई को दिशा दी..

पंडित सुंदरलाल, बहुगुणा पद्म विभूषण पर्यावरणविद और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। जल जंगल और जमीन को बचाने के लिए उनसे प्रेरणा लेने वाले छत्तीसगढ़ में भी बहुत से लोग हैं। यह लड़ाई कोई सडक़ से लड़ रहा है तो कोई अदालतों के जरिए। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव सन 2012 में दिल्ली में उनसे मिले। वे वहां हिमालय बचाओ अभियान के एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। सुदीप श्रीवास्तव ने उनको बताया कि हसदेव नदी पर बनाए गए बांध के कारण 11 हजार हेक्टेयर जंगल पहले ही डुबान क्षेत्र में आ चुका है। अब उसके ऊपर पांच छह कोयला खदानों को मंजूरी दे दी गई है। इससे बड़ी संख्या में पेड़ों का विनाश होगा। बहुगुणा इससे चिंतित दिखे और कहा कि आप लोगों को इसे लेकर लडऩा चाहिए। सुदीप ने बताया लड़ाई चल रही है। इन खदानों को खोलने के खिलाफ एडवोकेट सुधीर श्रीवास्तव की याचिका पर एनजीटी ने खदानों के आबंटन पर रोक लगाई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से एनजीटी के आदेश पर स्थगन हो गया। अभी भी जो खदानें खुली हैं, सुप्रीम कोर्ट के स्थगन के आदेश पर ही है। सुदीप कहते हैं कि बहुगुणा से मिलने के पहले उन्हें लगता था कि इतने पत्राचार करने, मुकदमे लडऩे के कारण मुझे विकास विरोधी, बांध विरोधी कहा जाएगा। लड़ाई लडऩी चाहिए या नहीं, सोचा करता था। उनसे मिलने के बाद लगा कि उसकी दिशा सही है। उन्होंने सारे भ्रम दूर किये। आज भी वे पर्यावरण के मसलों पर दर्जनों लड़ाइयां लड़ रहे हैं। अदालत में भी और बाहर भी। इसके पीछे बहुगुणा का परामर्श उनके बहुत काम आता है।

कठिन सवाल, और शानदार ईनाम

किसी फिल्म को हिट करने के लिए तो पता नहीं क्या-क्या किया जाता है, लेकिन किसी फिल्म को फ्लॉप साबित करने के लिए लोग इतने किस्म के लतीफे बनाते हैं कि जिसकी हद नहीं।

अभी सोशल मीडिया पर एक किस्सा घूम रहा है कि एक ऑनलाइन कंपनी ने एक इनामी मुकाबला शुरू किया। उसमें दाखिल होने के लिए किसी कंपनी को फोन करना था। एक आदमी ने फोन किया तो उसे बताया गया कि आपसे एक सवाल किया जाएगा और अगर आपने उसका सही जवाब दिया तो आपके लिए एक बहुत शानदार इनाम रखा गया है।

खुश होकर उस आदमी ने पूछा कि सवाल क्या है? तो उसे बताया गया कि सवाल गणित का है।

वह आदमी और खुश हो गया उसने कहा कि वह तो 30 बरस से स्कूल में गणित ही पढा रहा है और वह उसका पसंदीदा विषय भी है।

उसने पूछा कि ईनाम क्या है? तो उसे बताया गया कि सलमान खान की फिल्म ‘राधे’ की 4 टिकटें।

इसके पहले कि वह फोन रख सके उससे सवाल पूछा गया कि 2 में 2 जोड़े तो कितना होगा?

उस आदमी ने छुटकारा पाने के लिए जवाब दिया 7, और उसने सोचा कि अब कम से कम इस फिल्म की टिकट लेने से बच जाएगा।

लेकिन सामने से उस कंपनी के आदमी ने खुश होते हुए कहा कि सुबह से जवाब तो कई लोग दे रहे थे लेकिन आपका जवाब सही जवाब के सबसे करीब है, इसलिए आपके पते पर फिल्म ‘राधे’  की 4 टिकटें भेजी जा रही हैं।


21-May-2021 6:43 PM (314)

तथ्य से कोसों दूर कलेक्टर का जवाब

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से संवाद के लिये प्रदेश से पांच कलेक्टर जरूर बैठे थे लेकिन तय था कि वे सभी से बात नहीं करने वाले थे। आखिर देशभर से 60 से अधिक कलेक्टर उनकी इस वर्चुअल मीटिंग में जुड़े थे। छत्तीसगढ़ में मौका जांजगीर-चाम्पा के कलेक्टर यशवंत कुमार को मिला। बड़ा सरल सा सवाल था पर हड़बड़ी में जो जवाब कलेक्टर ने दिया वह सच के आसपास भी नहीं था। उन्होंने 1400 गांव बता दिये जबकि वास्तविक संख्या 915 है। यह उम्मीद करना भी स्वाभाविक है कि वह महामारी से मुक्त हो चुके या अप्रभावित रहे गांवों की संख्या की जानकारी तो कलेक्टर को हो, पर इसका जवाब भी वे नहीं दे पाये। इस शोर में हुआ यह कि प्रधानमंत्री ने कोरोना से निपटने के लिये छत्तीसगढ़ में हुए प्रयासों की जो सराहना की, वह खबर पीछे रह गई। जांजगीर कलेक्टर ने भी अधोसंरचना, कोविड केयर सेंटर, वैक्सीनेशन, पॉजिविटी रेट गिरने जैसी कई उपलब्धियों की जानकारी दी पर उनकी ओर भी किसी का ध्यान नहीं गया। अब दूसरे कलेक्टर्स कह रहे हैं कि हमने तो पूरी तैयारी कर रखी थी, हमें मौका मिला नहीं। खैर, मोदी ने सलाह दी है कि एक दूसरे से अपनी बातें शेयर करनी चाहिये, अब आगे न हो। एक कलेक्टर दूसरे से चर्चा कर लें कि क्या-क्या पूछा जा सकता है और क्या जवाब दिया जा सकता है।

चर्चा में फिर खेतान का ट्वीट

आईएएस चितरंजन खेतान की एक ट्वीट कल से चर्चा में है। उन्होंने आईपीएस दीपांशु काबरा और आर के विज के बारे में लिखा है- कभी-कभी सोचता हूं कि उनको इतना ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ- सरकार से या और कहीं से? मेरी बुद्धि तो नहीं चलती। उनको सलाम।

लिखने के बाद खेतान को लगा, कुछ कमी रह गई है तो इसमें उन्होंने आईएएस सोनमणि बोरा का नाम भी जोड़ दिया और कहा कि पड़ोसी होने के कारण उनका जिक्र नहीं कर पाये थे।

यह किस संदर्भ में उन्होंने कहा यह साफ नहीं लेकिन यह जरूर है कि सोशल मीडिया खासकर ट्विटर पर ये अधिकारी बेहद सक्रिय हैं।

ट्वीट की प्रतिक्रिया में कुछ लोगों ने पूछा है कि यह इन अफसरों की तारीफ है या तंज?

इस ट्वीट से करीब 8 माह पहले की गई उनकी ट्वीट याद आ गई जब खेतान ने कलेक्टर्स के प्रति हमदर्दी दिखाई थी। उन्होंने कहा था कलेक्टर पर ही सारी जिम्मेदारी और उसी से सबकी नाराजगी। नेताओं के काम वो बनाये और डांट भी खाये। क्या करें, क्या न करें, बोल मेरे भाई।

इस बार नेताओं का जिक्र नहीं है इसलिये नहीं लगता कि पिछली बार की तरह कांग्रेस-भाजपा उनके इस ट्वीट पर आपस में उलझेंगे।

बिना तकलीफ उठाये आंदोलन..

राजनैतिक दलों के लिये उनके अस्तित्व से जुड़ी जरूरत है कि वह विरोधियों के खिलाफ मुद्दा गरम रखे और सडक़ पर निकले। लेकिन इन दिनों लॉकडाउन के कारण घरों से निकलने पर रोक लगी हुई है। इसके बावजूद कांग्रेस-भाजपा दोनों ने ही अपने आंदोलनजीवी होने का धर्म नहीं छोड़ा है। भाजपा को हाल ही में पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ, टूलकिट और महासमुंद में महिला बाल विकास अधिकारी के आरोपों का मुद्दा मिला। कांग्रेस को भी टूल किट के फर्जी होने, रासायनिक खाद के दाम बढऩे को लेकर केन्द्र सरकार को निशाने पर लेना जरूरी था।

महामारी के इस दौर ने आंदोलन और विरोध प्रदर्शन का एक सहूलियत भरा ट्रेंड शुरू कर दिया है। घर में कुर्सी लगाकर बैठने का और तस्वीर खिंचाने का। घर के सामने कोई घंटों बैठकर करेगा भी क्या, लॉकडाउन के कारण कोई देखने भी तो नहीं आने वाला है। इसीलिये तरीका यही निकाला गया कि बैनर और तख्ती के साथ कुर्सी पर बैठकर तस्वीर खिंचवा लीजिये। तुरंत फोटो और बयान जारी कर दीजिये। सैकड़ों न्यूज पोर्टल हैं जो इस खबर को तुरंत छत्तीसगढ़ के कोने-कोने तक सर्कुलेट करने के लिये तैयार मिलेंगे। टूल किट कौन बना हुआ है?


20-May-2021 6:10 PM (242)

97 फीसदी फस्र्ट क्लास की दिक्कतें...

10वीं बोर्ड एग्जाम हर एक दौर में घबराहट का सटीक उदाहरण रहा है। बचपन में मां-बाप ने इसी कक्षा के नतीजे पर या तो मोहल्ले भर में मिठाई बांटी या फिर जबरदस्त ठुकाई की। इधर कोविड ने समाज पर जो प्रलयंकारी असर बच्चों को जबरदस्त ‘लर्निंग लॉस’ के रूप में सामने आया है। कल जब 97 प्रतिशत बच्चे दसवीं बोर्ड में फर्स्ट डिवीजन में पास घोषित किये गये इसी नुकसान का प्रमाण पत्र भी साथ-साथ छप गया।

शायद कभी नहीं हुआ होगा कि प्रथम श्रेणी में पास होने के बावजूद बच्चों और अभिभावकों में जश्न मनाने की इच्छा नहीं हो रही हो। और जो बच्चे अब तक नीचे की कक्षाओं में टॉपर रहे होंगे, उनको इस नतीजे का कितना मलाल होगा? अपने राज्य में वैसे भी स्कूली शिक्षा की बहुत अच्छी स्थिति नहीं रही है। बहुत से प्रयोगों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर की सर्वे टीमों ने पाया है कि पांचवी, आठवीं, दसवीं के बच्चों के शिक्षा का स्तर उनकी क्लास से तीन चार साल पीछे का है। अंग्रेजी की वर्णमाला, दस तक का पहाड़ा तक मिडिल स्कूल के बच्चे नहीं बता पाते। अब जब कोरोना की तीसरी लहर में सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पडऩे की आशंका जताई जा रही है, कितना नुकसान हुआ है हम अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसे तो पास हर साल किया नहीं जा सकता। पढ़ाई चलती रहे इसका क्या विकल्प हो सकता है। बीते सत्र में मोहल्ला क्लास, पढ़ई तुहर द्वारा, बुल्टू के गोठ जैसे कुछ वैकल्पिक तरीके अपनाये गये थे पर क्या संक्रमण के नये खतरों के बीच अगले सत्र में भी वह हो सकेगा? अब जरूरत है कि न केवल पढ़ाई बल्कि पूरे शारीरिक, मानसिक विकास पर कोरोना महामारी के चलते हो रहे नुकसान पर गंभीर चर्चा छिड़े।

हलवाई इंग्लैंड चला गया...

60 प्लस और फिर 45 प्लस वालों को जब टीके लगवाने की मंजूरी दी गई तो टीकाकरण केन्द्र खाली चल रहे थे। जैसे ही एक मई से 18 साल से 44 साल के लोगों को टीका लगाने का आह्वान प्रधानमंत्री ने किया ख़बरें चलने लगीं कि टीके हैं कहां? जिस टीके को मुफ्त में लगाने के लिये लोगों को समझाना-बुझाना पड़ रहा था, आज उसके लिये मारामारी मची है। इसी को लेकर एक लतीफा वाट्सएप और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चल रहा है। आप भी पढ़ लीजिये-

अभी 45+ वालों की पंगत जीम ही रही थी कि 18+ वालों को लाकर बिठा दिया गया। 60+ वाले फूफाजी अलग नाराज हैं। उनको पत्तल में एक बार ही परोसा गया था, और लेना अभी बाकी है। इधर, पूड़ी निकल नहीं रही है, हलवाई इंग्लैड चला गया है...।

नदियां तो ये भी पवित्र हैं...

अपने देश में धार्मिक आस्थायें लचीली और व्यावहारिक हैं। पीढिय़ों से हिन्दू धर्म में परम्परा बनी हुई है कि पवित्र नदियों में अस्थियों के विसर्जन की और वहीं पिंड दान करने की। छत्तीसगढ़ में ज्यादातर लोग बनारस और प्रयागराज जाकर अस्थियां विसर्जित करते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है वे भी यात्रा का प्रबंध करते हैं और प्रयास होता है कि अंतिम क्रिया वहीं पर पूरी की जाये। पर इस इन दिनों छत्तीसगढ़ की नदियों का महत्व बढ़ गया है। पवित्रता को लेकर तो पहले भी किसी को संदेह नहीं था पर उनका उसके महत्व के अनुसार प्रयोग भी हो रहा है। कोरोना के चलते यात्राओं में काफी बाधा है। लोग इलाहाबाद या बनारस नहीं जा पा रहे हैं तब नर्मदा नदी, महानदी, शिवनाथ आदि नदियों में लोग अस्थियां विसर्जित कर रहे हैं। अमरकंटक, शिवरीनारायण, राजिम में पिंडदान के लिये पंडित भी मिल रहे हैं। कई मामले ऐसे भी हैं जिनमें दशगात्र और तेरहवीं के लिये 10-12 दिन की प्रतीक्षा नहीं की जा रही है बल्कि तीन चार दिन में ही ऐसी क्रियायें पूरी कर ली जा रही हैं। मृत्यु भोज तो पूरी तरह बंद ही है। अब उम्मीद करनी करनी चाहिये कि इन नदियों को स्वच्छ रखने, प्रवाहमान बनाये रखने के लिये लोगों की चिंता कुछ बढ़ेगी।


19-May-2021 5:30 PM (357)

सहूलियत की तकनीकी दिक्कत

दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय पिछले ढाई साल से एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि विधानसभा में 50 से 15 सीटों पर कैसे आए? पर  पार्टी के रणनीतिकार इससे कन्नी काटते रहे हैं। पिछले दिनों सरगुजा संभाग के नेताओं के साथ प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने वर्चुअल बैठक की थी। बैठक में प्रदेश प्रभारी ने कोरोना से प्रभावित लोगों के लिए पार्टी नेताओं द्वारा की जा रही मदद पर चर्चा की। स्थानीय नेता बता रहे थे कि दीनदयाल रसोई से जरूरतमंदों को खाना पहुंचाया जा रहा है।

कुछ बता रहे थे कि उन्होंने सूखा राशन बंटवाया है। पीडि़तों के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था भी की थी। इससे लोगों में अच्छा संदेश जा रहा है। इन चर्चाओं के बीच साय ने फिर एक बार पुराना सवाल उछाल दिया कि विधानसभा में बुरी हार की समीक्षा कब होगी?  इस पर पुरंदेश्वरी को जवाब देते नहीं बना, लेकिन इस तरह की बैठकों की खासियत यह रहती है कि तुरंत तकनीकी समस्या आ जाती है, और विषय आगे बढ़ जाता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ, और साय का सवाल अनुत्तरित रह गया।

एक अफसर ने हिला कर रख दिया

महासमुंद के महिला बाल विकास अफसर सुधाकर बोदले अपने विभाग के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की मांग को लेकर अनशन पर बैठे, तो शासन-प्रशासन हिल गया। पहले तो हिरासत में लेने की कोशिश की गई, लेकिन स्थानीय लोगों का दबाव इतना पड़ा कि पुलिस को सफाई देनी पड़ी। यह बात किसी से छिपी नहीं है, कि मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना और रेडी टू ईट योजना में बरसों से भ्रष्टाचार होता रहा है।

महासमुंद में दिक्कत यह थी कि बोदले उपहार खरीदी, और रेडी टू ईट योजना में गड़बड़ी की जांच चाह रहे थे। जिसके लिए बाकी साथी अफसर तैयार नहीं थे। कन्या विवाह योजना में सरकार की तरफ से नवदंपत्ति को उपहार दिया जाता है। इसकी खरीदी में अनियमितता के मामले कई बार सामने आ चुके हैं। महासमुंद में भी यही हुआ। सात हजार की सामग्री का 14 हजार बिल बना दिया गया। इसके बाद जांच के लिए बोदले को अनशन पर बैठना पड़ा, और हड़बड़ायी सरकार ने उच्च स्तरीय जांच कमेटी बनाकर मामले को शांत करने की कोशिश की है।

विभाग के लोग बताते हैं कि इस योजना में  गड़बड़ी से शिकायत पर चर्चा के दौरान एक बार तो निचले स्तर के अफसर ने सुझाव दे दिया था कि क्यों न उपहार की रकम हितग्राहियों के खाते में जमा करा दी जाए, उस समय बड़े अफसर ने ऐसी आंख तरेरी कि सुझाव धरी की धरी रह गई। कई बार तो शादीशुदा जोड़े ही दोबारा शादी करने पहुंच जाते हैं। सरकारी मंडप में बैठने का उपहार भी मिल जाता है। इसमें विभाग के लोगों की हिस्सेदारी रहती है। अब जब बोदले ने हिम्मत दिखाई है, तो योजना में खरीदी की भी समीक्षा हो रही है।

एसडीएम से त्रस्त पटवारी, तहसीलदार

कोरोना काल में सबकी कमाई पर असर पड़ा है। ऐसे में जशपुर जिले के 30 से ज्यादा तहसीलदार और पटवारियों ने एसडीएम के खिलाफ मोर्चा खोलकर एक नई मिसाल पेश कर दी है। इसमें यह संदेश दिया गया है कि राजस्व विभाग में सब भ्रष्ट नहीं हैं। उस सीमा तक तो बिल्कुल नहीं हैं, जितना एसडीएम ने समझ रखा है। कुछ आम लोगों के कलेजे में इस बात से ठंडक पहुंच सकती है कि जो अधिकारी कर्मचारी उन्हें सताते हैं, उनका भी अपना दुखड़ा सामने आया है।

शिकायत करने वाले राजस्व अधिकारी, कर्मचारियों ने कबूल किया है कि वे एसडीएम द्वारा दिये गये वसूली के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाये। वसूली की बात तो खुद से ही मान ली है। जाहिर है, एसडीएम को वे घर से या वेतन से पैसा निकालकर नहीं दे रहे थे। किसी मजबूर आदमी से ही वसूल किया गया होगा। तखतपुर की घटना भी याद आ गई होगी इन अधिकारियों को, जहां एक किसान ने पटवारी द्वारा परेशान किये जाने के कारण आत्महत्या की थी। इस तरह से, पूरी दाल काली दिखाई दे रही है।

बीते साल अप्रैल मई के ही दिनों में एसडीएम पर वाड्रफनगर में रहते हुए एक रेस्ट हाउस में रुके एसडीओपी व उसके परिवार के साथ दुर्व्यवहार की घटना सामने आई थी। इसके कुछ दिन बाद मनरेगा में 14 लाख रुपये के गबन की शिकायत पर कार्रवाई कर उन्हें सस्पेंड भी किया गया था। साल भर बाद फिर वह एसडीएम जैसे जिम्मेदार पद पर वापस हैं, यानि ऊपर तक कड़ी मजबूत हैं। शिकायत पर यकीन किया जाये तो एसडीएम, कलेक्टर के नाम से पैसा मांग रही थी। सच्चाई जांच होगी तो सामने आयेगी। फिलहाल तो किनारे खड़े होकर इस मामले को लोग देख रहे हैं। पता चलेगा दो दर्जन से ज्यादा तहसीलदार और पटवारी भारी पड़ेंगे या एसडीएम की ऊपर तक पहुंच अच्छी है।

कागज में खोल दिया कोविड सेंटर

तीन दिन पहले जांजगीर जिले के नवागढ़ में मुख्यमंत्री ने एक कोविड केयर सेंटर का वर्चुअल उद्घाटन किया। यहां के नगर पंचायत अध्यक्ष भुनेश्वर केशरवानी इस अब इस सेंटर को दीया लेकर ढूंढ रहे हैं। खास बात यह है कि केशरवानी खुद कांग्रेस से हैं।

16 मई को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा प्रदेश के विभिन्न स्थानों में बनाये गये 500 से अधिक कोविड सेंटर्स बेड का वर्चुअल उद्घाटन किया गया, जिनमें 10 बिस्तर का एक कोविड सेंटर नवागढ़ में होना भी बताया गया। इस कोविड सेंटर का पता करने जब केशरवानी और कुछ दूसरे कांग्रेस नेता निकले तो पता चला कि यहां न तो स्टाफ है न ही कोविड के इलाज का कोई भी सेटअप, बस कुछ पलंग पड़े हुए हैं। यानि उद्घाटन मुख्यमंत्री को अंधेरे में रखकर करा लिया गया। अब सीएम से उद्घाटन कराने से पहले कलेक्टर ने इस कथित कोविड केयर सेंटर का निरीक्षण किया था या नहीं यह पता नहीं, पर प्रशासन की किरकिरी तो  हो ही रही है। विपक्षी दल भाजपा ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार की खिंचाई शुरू कर दी है।

धान के बदले पेड़ उगाने के पीछे का फंडा

पौधारोपण के एवज में किसानों को तीन साल तक दस-दस हजार रुपये प्रोत्साहन राशि देने की नई योजना की दूसरे प्रदेशों में शायद उसी तरह से चर्चा हो जैसा गोबर खरीदने के निर्णय की हुई थी। पेड़ लगाने की योजना को लाने के कई कारण हो सकते हैं। धान कैश क्राफ्ट है। लघु, सीमांत किसान इसे तुरंत बाजार में निकाल कर नगद राशि हासिल कर सकते हैं। बड़े किसान इसे कोठियों में जमा कर रख सकते हैं और जब जरूरत हो निकाल सकते हैं। सरकारी प्रोत्साहन के कारण धान की पैदावार प्रदेश में बढ़ती ही जा रही है और खपत हो नहीं रही। हर साल करोड़ों के धान सड़ रहे हैं। खरीदी और परिवहन की कीमत भी सरकार नहीं निकाल पा रही है। आने वाले वर्षों में यही ट्रेंड बना रहा तो सरकार का राजस्व घाटा बढ़ता जायेगा। नई योजना उन किसानों के लिये अच्छा विकल्प है जिन्हें धान की पूरी उपज तत्काल बेचने की जरूरत नहीं है। पेड़ लगाने से वे तीन से पांच साल में एक अच्छी रकम हासिल कर पायेंगे। सरकार पर धान पर दिये जाने वाले प्रोत्साहन की राशि और न्याय योजना में दी जाने वाली रकम पर भी कुछ खर्च में कमी आयेगी। फिर पर्यावरण को संभालना भी जरूरी है। जंगलों में जो कटाई हो रही है वह एक तरफ, सडक़, पुल, बांध, खदान, फैक्ट्रियों के लिये मैदानी क्षेत्रों में पेड़ काट तो दिये जाते हैं पर उसकी भरपाई नहीं हो पाती। किसान अपने खेतों में लगे पौधों की सहेजेंगे। फलदार पेड़ हर साल आमदनी देंगे और इमारती लकड़ी बेचने से एकमुश्त लाभ देगा। अभी योजना का पूरा खाका सामने आने पर पता चलेगा कि किसान इस नई स्कीम की ओर इतनी रुचि दिखाते हैं।


18-May-2021 6:02 PM (307)

संगति का असर नहीं पड़ा

रायपुर में पले-बढ़े तमिलनाडु कैडर के 92 बैच के आईएएस राजेश लखानी तमिलनाडु विद्युत बोर्ड के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक बनाए गए हैं। राजेश ने गवर्नमेंट स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की, और रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से बीई की डिग्री हासिल की। पूर्व आईजी राजकुमार देवांगन भी राजेश के सहपाठी रहे हैं, और एक साथ ही यूपीएससी में चयनित हुए।

राजेश आईएएस, तो राजकुमार आईपीएस में आ गए। राजेश के पिता टेक्नीकल स्कूल में प्रिंसिपल रहे हैं। अपने प्रशासनिक कैरियर में राजेश  के नाम कई उपलब्धियां हैं। उन्हें तमिलनाडु म्युनिसिपल कमिश्नर रहते बेहतर काम के लिए प्रधानमंत्री अवॉर्ड मिल चुका है। पहले उन्हें तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन का प्रधान सचिव बनाए जाने की अटकलें लगाई जा रही थी, लेकिन उन्हें विद्युत बोर्ड का अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक की अहम जिम्मेदारी दी गई है। इससे परे राजकुमार देवांगन को पिछली सरकार मेें जबरिया रिटायर कर दिया गया था। संगति का असर दोनों का एक-दूसरे पर नहीं पड़ा !

कोरोना हँस रहा है

कोरोना केस तेजी से घटे हैं, लेकिन मरने वालों की संख्या कम नहीं हो रही है। केरल में मृत्युदर 0.25 फीसदी है, तो छत्तीसगढ़ में 8 गुना ज्यादा 2 फीसदी है। यानी 8 गुना ज्यादा। रायपुर में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोरोना से करीब 3 हजार लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन वास्तविक संख्या इससे बहुत ज्यादा है। पूरे देश के हर प्रदेश के बारे में यह कहा जा रहा है कि सरकारें आंकड़ों को पूरा नहीं बता रही हैं. कांटेक्ट ट्रेसिंग ही इस तरह की जा रही है कि जहां बहुत पॉजिटिव मिलने की उम्मीद है, वहां हाथ ही मत डालो. छत्तीसगढ़ से 6 गुना आबादी के उत्तर प्रदेश में आंकड़े देखकर कोरोना हँस रहा है. वही हाल बिहार का है।

रायपुर से सटे गांव धनेली में कोरोना से 9 लोगों की मृत्यु हुई है, लेकिन गांव में पिछले 3 महीने में 22 लोगों की जान जा चुकी है। धनेली में तो ग्रामवासियों ने स्वास्थ्य कर्मियों का रास्ता रोक दिया था। जनप्रतिनिधि बताते हैं कि धनेली और सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र के आसपास सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है। ज्यादातर लोगों ने अस्पतालों में इलाज के लिए जाना छोड़ दिया था, और झोलाछाप डॉक्टरों से दवाई लेकर इलाज करा रहे थे।

नया रायपुर के दो बड़े गांव पौंता, चेरिया में 15 लोगों की कोरोना से मृत्यु हुई है। गांव के पूर्व सरपंच बताते हैं कि सिर्फ दो लोगों की कोरोना से मौत का जिक्र है। लोगों ने अस्पतालों की भीड़ देखकर इलाज के लिए जाना छोड़ दिया था, और इस वजह से मृत्यु हुई। बलौदाबाजार, जांजगीर-चांपा, रायगढ़ और सूरजपुर में बड़ी संख्या में मौतें हुई है, जिनका भी सरकारी आंकड़ों में जिक्र नहीं है। सरकार कोरोना नियंत्रण के लिए तेजी से काम करती दिख रही है। खुद सीएम भूपेश बघेल रोज समीक्षा कर रहे हैं। डॉ. आलोक शुक्ला को स्वास्थ्य महकमा का प्रभार  देने के पीछे एक प्रमुख वजह यही है। आलोक से काफी उम्मीदें भी हैं। देखते हैं वे इसमें कितना सफल हो पाते हैं।

कोरोना माता ने जन्म लिया....

जब भी किसी अदृश्य शक्ति से भय होता है तब प्रार्थना की जाती है। इन दिनों कोरोना महामारी ने देश दुनिया में जिस तरह से दहशत फैलाई है कोई आश्चर्य नहीं कि अध्यात्म, तंत्र-मंत्र, यज्ञ, हवन, पर पूजा-पाठ पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है। पर यह यह प्रार्थना अंधविश्वास की घेरे में कब प्रवेश कर जाये यह राजनांदगांव की घटना से मालूम होता है। कुछ महिलाओं ने कोरोना माता का सृजन कर लिया और एक काली मंदिर में जाकर पूजा पाठ करने लगीं। अच्छी भीड़ जमा हो गई। सोशल डिस्टेंस का तो खैर ध्यान रखा ही नहीं गया, कई लोगों ने मास्क लगाना भी जरूरी नहीं समझा। बहुत से लोगों ने उपवास भी रखा और इस नई देवी से प्रार्थना की कि वे जल्द से जल्द हमें इस आपदा से उन्हें मुक्ति दिलायें।

एक ओर दुनिया भर में वैज्ञानिक कोरोना से मुक्त करने के लिये नई वैक्सीन, नई दवायें तैयार करने में दिन-रात एक किये हुए हैं, और लगातार सफलता मिल भी रही है, दूसरी ओर अवैज्ञानिक दृष्टि को बढ़ावा देने वाली घटनायें भी दिखाई दे रही हैं। शुक्र है, इस घटना पर किसी राजनैतिक दल का हाथ होने की बात अभी नहीं आई है। अब प्रशासन और समाजसेवियों के सामने एक चुनौती यह भी है कि ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देने वालों को भी अपनी कार्रवाई के दायरे में ले।

टेस्टिंग लैब का होना भी जरूरी

छत्तीसगढ़ में संक्रमण के मामलों में गिरावट को लेकर हर कोई राहत महसूस कर रहा है। बीते डेढ़ दो माह बड़ी मुश्किल में बीते हैं और आने वाले दिनों में भी यही ऊर्जा बनाये रखने की जरूरत है। दुनिया भर के वैज्ञानिक, शोध कर्ता और अन्य जानकार लोग यह सुझाव दे रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग की जाये। छत्तीसगढ़ में भी जो आंकड़े सामने आ रहे हैं टेस्टिंग में कमी नहीं है। पर यह भी सही है कि जितनी तेजी से ऑक्सीजन बेड, सामान्य बेड, आइसोलेशन सेंटर, कोविड केयर सेंटर बनाने पर प्रदेश में काम हुआ उतनी फुर्ती से टेस्टिंग लैब नहीं बनाये जा सके। आज भी ज्यादातर टेस्ट रिपोर्ट मेडिकल कॉलेजों में ही तैयार हो रहे हैं। छोटे जिलों में तो टेस्टिंग की सुविधा है ही नहीं। ऐसे में जांजगीर-चाम्पा जिले के सीएमएचओ ने आदेश दिया है कि एक परिवार से एक ही व्यक्ति का टेस्ट रिपोर्ट पर्याप्त है। रायगढ़ मेडिकल कॉलेज में उसे ही जांच के लिये भेजेंगे। सबका टेस्ट लिया जाना जरूरी नहीं है। सीएमएचओ का कहना है कि रायगढ़ लैब की ओर से उन्हें बताया गया है कि उनकी भी रिपोर्ट तैयार करने की एक क्षमता, सीमा है। इससे ज्यादा नहीं कर पायेंगे...। क्या जरूरी नहीं कि हर जिले में तेजी से टेस्टिंग लैब भी शुरू करने के लिये काम हो, क्योंकि टेस्टिंग की जरूरत तो आने वाले कई महीनों तक पड़ेगी।

दो डोज के बीच का अंतराल..

45 प्लस के जिन लोगों ने कोविड की दोनों खुराक ले ली है वे अपने आपको खुशकिस्मत मान रहे होंगे। पर जिन्होंने नहीं ली है वे दिक्कत मे पड़ गये हैं। जिन्हें पता नहीं, उन्हें टीकाकरण केन्द्रों से लौटना पड़ रहा है।  जब पहली खुराक ली थी तो उन्हें डेढ़ दो माह बाद दूसरा डोज लेना था, पर अब नई गाइडलाइन के मुताबिक अब उन्हें 82 दिन बाद दूसरा डोज लेना है। इसी से झल्लाये एक शख्स ने सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास कुछ इस तरह निकाली है- जनवरी में कहा गया, दो डोज चार हफ्त में लेना है। फरवरी में बताया गया 4 से 6 हफ्ते में लेना है। मार्च में नई स्टडी आ गई 6 से आठ हफ्ते के बीच लेना है। अप्रैल में कोई नई स्टडी नहीं आई। मई में कहा गया कि दो डोज के बीच 12 से 16 हफ्तों का अंतराल होना चाहिये। क्या पता, अब जुलाई में कोई नया शोध हो कहा जाये, आपने जो एक डोज लिया है वह काफी है, दूसरा डोज लेने की जरूरत नहीं। और, सितम्बर में कहा जायेगा कि वैक्सीन का एक भी डोज अब तक नही लिया। वाह, आप तो अजेय हैं, आप अपना प्लाज्मा डोनेट करिये।


17-May-2021 6:09 PM (254)

सरकारी मुलाजिम की बगावत...

मामूली से घोटाले के लिए अनशन पर बैठ जाना ठीक बात नहीं। सरकारी अफसर के लिए तो यह बिल्कुल शोभा नहीं देता। छवि घोटाले से और उसकी जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं होने से नहीं बिगड़ती, बिगड़ती तब है जब ऐसे मामलों का हवाला देकर कोई नीचे का अफसर अपने से बड़े को चुनौती दे जाये। इसीलिए अधिकारी की गिरफ्तारी के जायज कारण ढूंढ लिये गये हैं, जैसे लॉकडाउन में अनशन करना मना है। सर्विस रूल में तो और भी कंडिकायें इसके समर्थन में मिल जायेंगीं।

जिस मुद्दे को महासमुंद के जिला महिला बाल विकास अधिकारी उठा रहे हैं उसमें कोई नयापन है ही नहींशिष्टाचार के साथ सप्लाई का काम आखिर किस विभाग में नहीं चलता? पता नहीं इस अफसर की कितने दिनों की नौकरी है। पता नहीं कितनी बार उनको अपने आसपास ऐसे मामले पहले भी दिखे होंगे, खामोशी ओढ़ ली होगी। पर, शायद उन्हें लग रहा हो कि अब पानी सिर से ऊपर चला गया है। सिस्टम से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिये कि कोई जांच रिपोर्ट तैयार हो गई है तो उस पर कार्रवाई भी तुरंत हो जायेगी। ऐसी कितनी ही फाइलें धूल खाती पड़ी रहती हैं। प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है एक्शन लेने के लिये। दूसरी ओर, लॉकडाउन में अनशन की मनाही है तो है। इसका कोई उल्लंघन करे तो कार्रवाई के लिये किसी लम्बी चौड़ी प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती है। गश्त करने वाले तो कई फैसले ऑन द स्पॉट भी कर रहे हैं। वैसे भी सिस्टम अभी कोरोना के बोझ में कराह रहा है। दूसरे विभागों में कुछ काला-पीला हो रहा भी हो इसे ध्यान देने की जरूरत क्या है?

ऐसे मौके पर यहीं के एक जज और जेलर का किस्सा याद आता है। एक को नौकरी ही गंवानी पड़ गई, दूसरे को अपनी वाजिब जगह हासिल करने के लिये लम्बी लड़ाई लडऩी पड़ रही है।

रामबाण नकली इंजेक्शन...

मध्यप्रदेश में नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन बेचने का बड़ा रैकेट सामने आया है। इनका नेटवर्क गुजरात से शुरू होकर भोपाल, इंदौर, जबलपुर आदि जगहों पर फैला था। सैकड़ों नकली इंजेक्शन इन्होंने अस्पतालों में खफा भी दिए। इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। किसी मरीज को पता नहीं होता कि वह नकली दवा, इंजेक्शन लगवा रहा है या असली। प्राण बचाने का सवाल हो तो सब भगवान और डॉक्टरों के भरोसे छोड़ दिया जाता है।

कोविड महामारी के दूसरे चरण में जिन लोगों ने लूट खसोट का रास्ता चुना है उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि मरीज की जान बचेगी या नहीं। पर, इस केस में उल्टा हो गया। भोपाल पुलिस ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि जिन लोगों को नकली रेमडेसिविर लगे उनमें से 90 फीसदी लोगों की जान बच गई। यह प्रतिशत असली इंजेक्शन लगवाने वालों से भी अधिक है। आरोपी बता रहे हैं कि उन्होंने तो ग्लूकोज और नमक का घोल बेचा, जान कैसे बच गई डॉक्टर ही बतायेंगे।

ऐसे में विशेषज्ञों और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के उस बयान की ओर सहज ही ध्यान चला गया है कि रेमडेसिविर इंजेक्शन कोरोना से बचने के लिये रामबाण दवा नहीं है। ऑक्सीजन लेवल एक खास स्तर से ऊपर हो तो यह कारगर भी नहीं है। पर चूंकि डॉक्टर और मरीज के परिजन जान बचाने के लिये कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते, वे रेमडेसिविर के पीछे भागते हैं। छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, खासकर निजी में भी रेमडेसिविर की अचानक बहुत मांग बढ़ी। यह तब थी जब इसकी आपूर्ति कम थी। जमकर कालाबाजारी हुई, कई लोग गिरफ्तार भी हुए। अब स्थिति लगभग सामान्य हो चुकी है। यहां भी हिसाब लगना चाहिये कि रेमडेसिविर इंजेक्शन लगने के बावजूद कितने लोगों की जान नहीं बच पाई। आंकड़ा बता देगा कि कहीं यहां भी तो नकली नहीं खपाये गये?

लोगों का ध्यान भटकाया जाना जरूरी

कोविड-19 से निपटने में केन्द्र सरकार की विफलता को लेकर रोज उठने वाले सवालों के जवाब में सकारात्मक होने की अपील, या कह लें नसीहत दी जा रही है। इन दिनों प्रदेश का एक बड़ा शैक्षणिक संस्थान कोविड महामारी से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, युवाओं के भविष्य जैसे गंभीर विषयों पर वर्चुअल सेमिनार कर रहा है। गहराई में जाने पर पता चला कि यह भी असल समस्या से ध्यान हटाकर सकारात्मकता लाने की मुहिम है। पर सोशल मीडिया में सक्रिय एक खास समूह सीधे-सीधे बताने पर आमादा है कि इस समय भी कोविड महामारी से निपटना जरूरी नहीं, कुछ दूसरे मुद्दों पर भी सोचना होगा। जैसे, अम्बिकापुर में रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने का मुद्दा। ऐसे संदेश छत्तीसगढ़ के अनेक वाट्सएप ग्रुपों में वायरल हो रहे थे। लोगों की सहज जिज्ञासा बढ़ गई कि क्या यह हो रहा है? इस तरह के संदेश वायरल करने वाले जानते हैं कि लोगों का माइंड सेट बिगडऩे नहीं देना है। महामारी तो आज आई है कल गुजर जायेगी। पर लोगों की सोच बदली तो फिर से उनको रास्ते पर लाना मुश्किल होगा। बहरहाल, कांग्रेस की आईटी सेल ने छानबीन की है। दावा किया गया है कि यह खबर फेक है और इस बात को उसने ट्विटर तथा दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा भी कर दिया है।      


16-May-2021 5:07 PM (271)

संजय शुक्ल और हुडको

पीसीसीएफ स्तर के अफसर संजय शुक्ला केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जा सकते हैं। राज्य सरकार की सहमति के बाद उन्होंने हुडको चेयरमैन के लिए आवेदन दिया है। 87 बैच के आईएफएस अफसर संजय शुक्ला हाऊसिंग बोर्ड के 4 साल कमिश्नर रहे हैं। वे लंबे समय तक आवास-पर्यावरण विभाग के सचिव भी रहे। कुल मिलाकर संजय हुडको चेयरमैन के लिए सारी जरूरी योग्यता को पूरी करते हैं। हुडको चेयरमैन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आवेदन बुलाए गए थे।

अब संजय हुडको चेयरमैन बन पाएंगे अथवा नहीं, इस पर प्रशासनिक हल्कों में चर्चा हो रही है। दरअसल, कुछ साल पहले यूपीए सरकार में पी जॉय उम्मेन ने सीएस रहते हुडको चेयरमैन के लिए आवेदन किया था। वे एनआरडीए के चेयरमैन भी थे। सारे समीकरण उनके पक्ष में थे। उस वक्त यूपीए सरकार की ब्यूरोक्रेसी में केरल लाबी का दबदबा भी था। कहा जाता है कि तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी ने भी उम्मेन को हुडको चेयरमैन बनाने की सिफारिश भी की थी। उनका नाम पैनल में भी था।

बावजूद इसके वे हुडको चेयरमैन नहीं बन सके। पिछले सालों के अनुभवों को देखकर यह जरूर कहा जा सकता है कि संजय के लिए हुडको चेयरमैन की राह आसान नहीं है। मगर मुश्किल भी नहीं है। मोदी सरकार ने तो चीफ इलेक्शन कमिश्नर पद पर इतिहास में पहली बार आईआरएस अफसर सुशील चंद्रा की नियुक्ति की है। ऐसे में हुडको चेयरमैन पद पर आईएफएस अफसर की नियुक्ति हो जाती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

 भाजपा और भूपेश

कोरोना वैक्सीनेशन पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णुदेव साय के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने सीएम से रू ब रू बातचीत के लिए समय मांगा, तो सीएम ने उन्हें वर्चुअल बैठक के लिए समय दिया। इसके लिए भाजपा नेता तैयार नहीं हुए, और उन्होंने सीएम के साथ वर्चुअल बैठक करने का प्रस्ताव अमान्य कर दिया। भाजपा के कुछ नेता साय से इस बात को लेकर खिन्न थे कि उन्होंने सीएम से चर्चा के लिए समय ही क्यों मांगा?

अंदर की खबर यह है कि साय ने पार्टी हाईकमान के कहने पर ही सीएम से मिलने का समय मांगा था। चर्चा है कि राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष ने प्रदेश के नेताओं के साथ कोरोना संक्रमण-वैक्सीनेशन पर चर्चा की थी, और उन्होंने कहा था कि पार्टी के प्रतिनिधि मंडल को सीएम से मिलना चाहिए, और वैक्सीनेशन बेहतर ढंग से हो सके, इसको लेकर पार्टी की तरफ से सुझाव देना चाहिए। अब रू ब रू बैठक नहीं हुई, तो पार्टी नेताओं ने मीडिया के माध्यम से खीझ निकालते हुए कुछ सुझाव दे दिए।

देबू की जमीन हमें भी लौटा दो....

देश में जब आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ, तब बहुत सी विदेशी कंपनियों ने यहां निवेश किया। कोरबा जिले के रिस्दी ग्राम में दक्षिण कोरियाई कंपनी देबू ने पॉवर प्लांट लगाने के लिए जमीन खरीदी। यह सन् 1998 की बात है। उसके बाद समय का चक्र कुछ ऐसा फिरा की देबू के मालिक किम वू चोंग दिवालिया हो गए। 18 महीने जेल में बिताये। एक वक्त अरबों के मालिक रहे चोंग को एक छोटे कमरे में सीलिंग फैन व एक पलंग के सहारे सजा काटते हुए तस्वीर भी उस वक्त खूब छपी थी। बाद में वहां के राष्ट्रपति ने उन्हें क्षमा याचना दी। फिर दो साल पहले उनकी मौत भी हो चुकी है। देबू की परियोजनाओं में देश की कई कंपनियों ने पैसे लगाये। बैंकों का कई हजार करोड़ कर्ज भी रह गया। देश के कई भागों में कम्पनी की जमीन नीलाम करने की प्रक्रिया भी या तो पूरी हो गई है या फिर चल रही है।

उपरोक्त परिस्थितियों के बीच बीते 23 साल में रिस्दी गांव में पॉवर प्लांट की एक ईंट भी नहीं रखी जा सकी। लोगों ने अपनी जमीन पर फिर काबिज होना, खेती करना मकान बनाना शुरू किया। अब वह जमीन के पुराने मालिकों से फिर आबाद हो गई है। पर, दो दिनों से यहां बड़ी हलचल हो रही है। राजस्व अधिकारियों ने अचानक यहां पहुंचकर जमीन की नाप-जोख शुरू कर दी है। ग्रामीण घबराये हुए हैं कहीं उन्हें बेदखल तो नहीं किया जा रहा है? राजस्व अधिकारी कह रहे हैं कि देबू की जमीन के अलावा कुछ सरकारी जमीन भी यहां है शिकायत मिली है कि देबू की आड़ में उस पर भी कब्जा कर लिया गया है। सच यही है या फिर किसी नीलामी की तैयारी हो रही है?

रिस्दी के ग्रामीणों का कहना है कि बस्तर में पांच साल तक प्लांट शुरू नहीं करने वालों की जमीन भूपेश सरकार ने वापस दिलाई है। यह चुनावी वादा भी था। फिर कोरबा जिले में सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती? वैसे भी कंपनी ने पक्की नौकरी, पक्का मकान और मुआवजा देने का अपना वादा पूरा नहीं किया। 

कोरोना को भगाने अस्पताल में हवन

अपने धर्मपरायण देश में यज्ञ हवन से लाभ के वैज्ञानिक तर्क दिये जाते हैं। हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय यज्ञ दिवस पर कई आध्यात्मिक, धार्मिक संगठनों ने यज्ञ कुंड बनाकर हवन का आयोजन किया। लॉकडाउन के दौरान, दावा है इससे कोरोना वायरस को भगाने में मदद मिलेगी। कुछ लोगों ने इसे यज्ञोपैथी नाम भी दिया है। यह नया नाम लग रहा है। हवन के धुएं से प्रकृति और वातावरण को किसी तरह का लाभ होता है या नहीं, इस पर तो शोध करने वाले लोग ही बता सकेंगे, लेकिन किसी डॉक्टर को तो अपनी उसी पद्धति पर विश्वास रखना चाहिये जिस पर उनकी पढ़ाई हुई है। पर कांकेर जिले के एक ग्राम पंचायत में सरकारी आयुर्वेदिक डॉक्टर की अगुवाई में अस्पताल के भीतर ही हवन का आयोजन किया गया। गांव के लोग इसमें कथित रूप से सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए शामिल हुए। बाद में डॉक्टर ने इसका ‘महत्व’ भी मीडिया को बताया। लोगों में कोरोना का भय व्याप्त है। किसी भी चिकित्सा पद्धति में अब तक इसका रामबाण इलाज नहीं आने के कारण लोगों का विश्वास वैसे भी डगमगा रहा है। ऐसी स्थिति में क्या यह यह डॉक्टर ठीक कर रहे हैं, कह रहे हैं?

गांवों में डॉक्टरों की कमी का हल

कोरोना संक्रमण के दौर में  चिकित्सा सेवा के लिए मानव संसाधन की बड़ी कमी महसूस की जा रही है। इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर टीकाकरण की गति भी धीमी है। शिक्षक, पंचायत प्रतिनिधि, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, मितानिन के ऊपर नीम हकीम और झाड़-फूंक करने वाले भारी पड़ रहे हैं। सर्दी बुखार के मरीजों को वे अपने हिसाब से दवाएं दे रहे हैं। इससे ग्रामीणों की जान जोखिम में तो है ही, महामारी के सही सही आंकड़े भी सामने नहीं आ पा रहे हैं।

राज्य के पहले मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने ग्रामीण क्षेत्रों की आम बीमारियों को ध्यान में रखते हुए सहायक चिकित्सकों का एक तीन साल का पाठ्यक्रम शुरू किया था। इसका एक बैच निकला ही था कि डॉक्टरों का संगठन इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चला गया। इस पर रोक लग गई। तब छत्तीसगढ़ में इस पाठ्यक्रम के लिए खोले गए कॉलेज भी बंद हो गये। उसके बाद केंद्र सरकार ने एक नया मिलता-जुलता पाठ्यक्रम बैचलर ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन तैयार किया। इस डिग्री के धारक गांव में दवाएं देने, इंजेक्शन लगाने और थोड़ी बहुत चीर-फाड़ कर सकत हैं, भले ही उन्हें डॉक्टर नहीं कहा जायेगा।

यह कोर्स छत्तीसगढ़ में दुबारा न तो भाजपा के समय शुरू हो पाया न ही अब। एक वर्ग का मानना है कि गांवों की आम बीमारियों को ठीक करने में ये बैचलर डिग्री होल्डर बहुत काम आ सकते हैं। इससे गांवों में एमबीबीएस डॉक्टरों की कमी काफी हद तक दूर की जा सकेगी। जटिल बीमारियों में तो मरीज को शहर या सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र भेजा ही जायेगा। इसका लाभ यह भी होगा कि लोग झोलाछाप डॉक्टरों या दवा दुकानदारों के सुझाए हुए दवाओं से बचेंगे। भविष्य के टीकाकरण जैसे अभियानों में ग्रेजुएट की मदद मिलेगी। अब तक के एकमात्र बैच में निकले सहायक चिकित्सक अलग-अलग जिलों के गांवों में रहकर काम कर भी रहे हैं। यह विषय इसलिये फिर चर्चा में है कि महामारी के संदर्भ में विधायक डॉ. रेणु जोगी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को पत्र लिखकरर यह पाठ्यक्रम शुरू करने की मांग की है। हो सकता है कि इस पाठ्यक्रम में कुछ कमियां हों, जैसा कि एमबीबीएस डॉक्टर्स बताते हैं, पर मौजूदा परिस्थितियों ऐसी है कि इस विषय पर विचार तो करना ही चाहिये।


15-May-2021 5:52 PM (332)

इतना आसान इस बार 10वीं पास होना..

पिछले साल खबर आई थी कि हैदराबाद के एक शख्स नूरूद्दीन ने 33 साल बाद दसवीं की परीक्षा पास कर ली, महामारी की मेहरबानी से। अपने यहां भी घरों से परीक्षा दिलाने की छूट मिलने की वजह से बहुत से लोग ग्रेजुएट पोस्ट ग्रेजुएट यहां तक कि इंजीनियरिंग की परीक्षाएं बीते साल से पास हो रहे हैं। सीबीएसई और कई दूसरे राज्यों ने दसवीं की परीक्षा रद्द कर दी है। सीबीएसई से बारहवीं की परीक्षा रद्द करने की मांग की जा रही है। जून पहले हफ्ते में इस पर फैसला लेने की बात सीबीएसई मैनेजमेंट की ओर से कही गई है। इधर छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल ने भी 10वीं बोर्ड की परीक्षा रद्द कर दी है। नियमित छात्रों को असाइनमेंट दिए गए थे, जो उन्हें घर से ही पूरा करना था। इसी के आधार पर उनका मार्कशीट तैयार होगा। लेकिन कोरोना में व्यवस्था ऐसी गड़बड़ाई कि माध्यमिक शिक्षा मंडल स्वाध्यायी छात्रों को असाइनमेंट देना ही भूल गया। अब जब असाइनमेंट ही नहीं दिया गया तो उनको किस आधार पर नंबर दिये जायें? इसे देखते हुए माशिमं ने सबको औसत नंबर देने का निर्णय लिया है। यानि सभी स्वाध्यायी छात्र इस बार भी पास हो जायेंगे। फर्क इतना है कि पिछली बार मूल्यांकन के लिये कुछ मापदंड उपलब्ध थे, इस बार वह नहीं है।

महामारी ने हर किसी को भयभीत कर रखा है। बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी घरों में घुसे होने, स्कूल की गतिविधियों में भाग नहीं ले पाने के कारण बुरा असर पड़ा है। ऐसे में अगर परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिये कोई जटिल प्रक्रिया अपनाई गई तो उनके लिये ही नहीं अभिभावकों के लिये भी परिस्थितियां कठिन हो जायेंगीं। देखने की बात यही होगी कि उच्च शिक्षा में प्रवेश और रोजगार में चयन के लिये इस दौर में उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों को कैसा अवसर मिल पाता है।

अक्षय तृतीया की गिनी-चुनी शादियां

छत्तीसगढ़ से कई प्रदेशों में अक्षय तृतीया के दिन शादियों की परंपरा है। इसके आगे जाकर सच्चाई स्वीकार करें तो बड़ी संख्या में बाल विवाह हो जाते हैं। वैसे, बीते कुछ सालों से इसे लेकर जागरूकता आई है। खासकर गांवों में महिला स्व सहायता समूहों के बनने और पंचायतों की व्यवस्था में महिलाओं को 50 प्रतिशत भागीदारी दिये जाने के बाद। बीते साल भी कोरोना का कहर था पर थोड़ी छूट थी। 20-25 लोगों की मौजूदगी में सामाजिक भवनों, होटलों में शादी कराई जा रही थी। इस बार पाबंदी कड़ी है। घर पर ही शादी हो सकती है, 10 से ज्यादा लोगों की मौजूदगी नहीं होगी और सबका कोरोना टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव भी होनी चाहिये। अक्षय तृतीया के दिन इसीलिये महिला बाल विकास विभाग, समाज कल्याण विभाग की टीम के साथ-साथ पुलिस भी मुस्तैद थी। गांवों में ढूंढे गये कि कहीं नियम टूट तो नहीं रहे हैं। एक जगह पर पुलिस पहुंची तो शादी सोशल डिस्टेंस के साथ घर के आंगन में होती मिली। शादी करने वाले नाबालिग नहीं थे। पुलिस का कहना है कि तस्वीर में तो भीड़ नहीं दिख रही है पर बहुत लोग बुलाये गये थे। वे आकर चले गये। इसलिये महामारी एक्ट के उल्लंघन का केस तो बना ही दिया गया है।

कोरोना ड्यूटी में कृषि वैज्ञानिक

शिक्षक संगठनों का कहना है कि बिना वैक्सीनेशन, बिना किट उनकी ड्यूटी कोरोना में लगाई गई इसके चलते उनके करीब 400 साथियों की अब तक मौत हो चुकी है। इसकी सूची भी पदाधिकारियों ने जारी की है। शासन ने उनकी मांगों की सुनवाई नहीं की है। वे मुआवजा और अनुकम्पा नियुक्ति, अपने परिवार सहित सभी के वैक्सीनेशन की मांग कर रहे हैं। अब जशपुर में हुई एक मौत का विवाद तूल पकड़ रहा है। रायगढ़ के कृषि महाविद्यालय के एक वैज्ञानिक डॉ. सुशांत पैकरा की कोरोना से मौत हो गई। उनकी ड्यूटी जिला प्रशासन ने वायरोलॉजी लैब में लगा दी। प्राध्यापकों ने विरोध भी किया कि एग्रिकल्चर के डॉक्टर का वायरोलॉजी लैब में क्या काम? न तो वे पैथॉलॉजी के डॉक्टर हैं न ही लैब की मशीनों के तकनीकी जानकार। पर राज्य सरकार के आदेश का हवाला देते हुए उन्हें वहां से नहीं हटाया गया। वहीं वे संक्रमित हुए और इलाज के दौरान मौत हुई। डॉ. पैकरा जशपुर के आसपास के ही रहने वाले हैं। समाज के लोगों में गुस्सा है कि जिले के अधिकारियों की हठधर्मिता के कारण जान चली गई। अनुसूचित जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष नंदकुमार साय ने तो वैज्ञानिक की वायरोलॉजी लैब में ड्यूटी लगाने वाले अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की है। 

क्या ऐसा नहीं होना चाहिये कि जो लोग स्वास्थ्य विभाग के कामकाज के जानकार नहीं है उन्हें ऐसी ड्यूटी देने से बचा जाये। ड्यूटी भी दी जाये तो पहले थोड़ा प्रशिक्षित करें और कोरोना से उनकी सुरक्षा के जरूरी बंदोबस्त किये जायें।


14-May-2021 5:32 PM (341)

कोरोना भगाने के लिये पूजा-पाठ

वाट्स अप पर मिले इस न्यौते में लोगों को काम पर निकलने से, खेतों में जाने से रोका जा रहा है। इसलिये नहीं कि एक जगह इक_ा होने से कोरोना फैलने का भय है। रोका जा रहा है ताकि गांव के लोग पूजा-पाठ में शामिल हो सकें। यह संदेश तब फैलाया जा रहा है, जब लॉकडाउन लगा हुआ है और किसी भी तरह के धार्मिक आयोजन पर रोक लगी हुई है। थाने से यह गांव ज्यादा दूर नहीं है पर पुलिस का ही इंतजार क्यों किया जाये? क्या गांव में कुछ ऐसे समझदार लोग नहीं हैं जो इस तरह के आयोजन का विरोध करें। कोरोना महामारी का फैलाव इन दिनों गांवों में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में पुलिस या प्रशासन का दबाव नहीं बल्कि लोगों की अपनी जागरूकता और संयम ही मायने रखता है। किसी भी बहाने से लोग इक_े हो रहे हैं तो उन्हें रोकने के लिये भी गांव के ही समझदार लोग आगे आयेंगे तब बात बनेगी।

नया रायपुर पर फिर ग्रहण

बीस साल हो गये राज्य को बने और इससे कुछ कम साल हुए नया रायपुर को तैयार करते हुए। हजारों करोड़ के निवेश के बावजूद अब तक यह प्रदेश की नई राजधानी का शक्ल नहीं ले सका है। अतीत में जमीनों के आबंटन में नियमों से परे जाकर आबंटन, पुराने रायपुर के बजट के हस्तांतरण के बावजूद अब भी आम लोगों की पहुंच से यह दूर ही है। नई सरकार बनने के बाद कुछ नये काम यहां शुरू हुए थे। सीएम हाउस, स्पीकर हाउस, नया विधानसभा भवन आदि कई परियोजनाओं पर या तो काम हो रहा है या फिर शुरू होने वाला है। पर, कोविड महामारी में संसाधन जुटाने के लिये एक हजार करोड़ की इन परियोजनाओं को रोकने का आदेश दे दिया गया है। यह फैसला हालांकि विपक्ष को यह जवाब देने के लिये काफी है जो सवाल कर रहा था कि जब विधानसभा का नया भवन बन रहा हो तो छत्तीसगढ़ के नेता सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का विरोध क्यों कर रहे हैं। चलिये कांग्रेस सरकार ने जवाब तो दे दिया, पर एक सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर नया रायपुर, अटल नगर आबाद कब होगा। क्या वर्तमान पीढ़ी उसे एक व्यस्त नई राजधानी के रूप में देख पायेगी?

कोरोनाकाल में अदालती रिपोर्टिंग

छत्तीसगढ सहित देश भर की अदालतों में रिपोर्टिंग के लिए या तो सुनवाई के दौरान पत्रकारों को खुद वहां मौजूद रहना पड़ता है या फिर केस से जुड़े वकीलों पर निर्भर। सूचनाएं पहले पहुंचाने की होड़ में कई बार आधी-अधूरी जानकारी लोगों तक पहुंचा दी जाती है, गलत रिपोर्टिंग भी हो जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि सूचना देने वाले वकील की निजी रूचि की वजह से तथ्य बदल जाते हैं। चूंकि हाईकोर्ट के निर्देश और फैसले बहुत से आगे के मामलों के लिए नजीर बन सकते हैं इस वजह से मीडिया की कोशिश होती है कि खबर जल्दी तो पहुंचे पर तथ्यात्मक भी हो। फूलप्रुफ खबर तभी दी जा सकती है, जब ऑर्डर शीट हाथ में आ जाए। अब तकनीक के विस्तार के चलते कुछ घंटों में यह हासिल हो जाता है। पहले इसके मिलने में दो-तीन दिन लग जाते थे। तब गलत रिपोर्टिंग करने के चलते हाईकोर्ट में रिपोर्टरों को जजों ने कई बार बुलाकर अपने अंदाज में समझाया और आगाह भी किया है। कई बार यह समझ में नहीं आता कि ऐसा फैसला जज ने क्यों लिख दिया है? जब तक बहस में आई बातों का सार नहीं मिलेगा, पाठकों तक भी पूरी जानकारी नहीं पहुंच पाती।

लंबे समय से पत्रकार मांग करते आ रहे हैं कि महत्वपूर्ण फैसलों की प्रेस रिलीज अदालतों की ओर से जारी की जाये। इस बात को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में भी पूर्व में पत्रकारों ने उठाया था। मगर व्यवहार में यह संभव इसलिए नहीं हो पाया, क्योंकि जब नियमित हाईकोर्ट में हर दिन 500 या उससे अधिक फैसले हो जाते हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट से खबर आई है। प्रधान न्यायाधीश ने मीडिया कर्मियों के लिए वर्चुअल सुनवाई का लिंक देने की सुविधा शुरू की है अब मीडिया के लिए सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई को घर से देख सकेंगे। सीजेआई अदालतों की कार्रवाई का लाइव प्रसारण करने के पक्ष में भी हैं। उनका कहना है कि कोर्ट की कार्रवाई और आदेश देश के लोगों को बड़े हद तक प्रभावित करता है। मीडिया को सूचना हासिल करने के लिये वकील पर निर्भर भी नहीं होना चाहिये। खबरों में यह बात भी आई है कि सीजेआई कुछ समय तक पत्रकारिता कर चुके हैं। शायद इसीलिये यह शुरूआत हो सकी है। उम्मीद करनी चाहिए कि जो सिलसिला सुप्रीम कोर्ट ने शुरू किया है वह धीरे से नीचे की अदालतों तक भी पहुंचेगा।


13-May-2021 5:34 PM (365)

अंत्येष्टि में जाने के लिये तैयार रहें..

विभिन्न जिलों में लॉकडाउन को लेकर जो सरकारी आदेश जारी होते हैं उसे वैसे पढऩे की जरूरत नहीं पड़ती है। मोटी-मोटी बातें तो पहले से ही फ्लैश हो जाती हैं। पर अगर आप फुर्सत में हैं और पूरा आदेश पढऩे लग जाएं तो सिर घूम सकता है और जिन बाबुओं ने आदेश बनाया उनको दाद दे सकते हैं। अब कोरबा जिले से जारी इसी आदेश को देखिए। इसमें लिखा है कि अंत्येष्टि के कार्यक्रम में 10 से अधिक लोगों की उपस्थिति प्रतिबंधित रहेगी। और, इसमें शामिल होने वाले व्यक्ति को दो दिन पहले का आरटीपीसीआर कोरोनावायरस टेस्ट निगेटिव सर्टिफिकेट प्राप्त करना होगा।

विवाह समारोह तो चलिए दो-चार दिन पहले मालूम हो सकता है, लेकिन किसकी अंत्येष्टि में जाना है इस आदेश के मुताबिक वह भी आपको 2 दिन पहले मालूम होना चाहिये। दूसरा रास्ता यह है कि अंत्येष्टि में आप जाने के लिए आमादा ही हैं, तो अंतिम यात्रा दो दिन बाद निकालनी होगी।

आपदा में एक ऐसा भी अवसर

शराब दुकान में होने वाली बिक्री की रकम जमा करने की जिम्मेदारी आबकारी विभाग ने प्राइवेट एजेंसियों को दे रखी है। एजेंसियां सुपरवाइजर के माध्यम से बैंकों में राशि जमा कराती हैं, शराब बिकती रहती है, पैसे आते रहते हैं, बैंकों में जमा होता रहता है। बीच-बीच में हिसाब हो जाता है। सब रूटीन में चलता रहता है। लेकिन, अभी लॉकडाउन में जब दुकानें बंद हो गई और ऑनलाइन बिक्री की तैयारी शुरू हुई तो खैरागढ़ की दुकान से घपला निकल गया। हिसाब लगाया गया तो पता चला कि बैंक में 32 लाख  रूपये कम जमा हुए हैं। कंपनी के एक कर्मचारी ने रुपये तो दुकान से उठा लिए, पर उसे बैंक में जमा करने के बजाए ब्याज पर लोगों को दे दिया। अब वह रकम ब्याज में घूम रही है। रकम लौटाने के नाम पर उसने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। अलबत्ता ब्याज पर रकम चढ़ाने वाले कर्मचारी के खिलाफ खैरागढ़ की पुलिस ने एफ आई आर दर्ज कर ली है। आबकारी विभाग निश्चिन्त है क्योंकि उसे पैसा तो एजेंसी से लेना है। आपस में निपटें कर्मचारी और एजेंसी वाले।

लॉकडाउन की खरीदारी

किराना दुकानों को खोलने के लिए इजाजत लॉकडाउन में सिर्फ इतने के लिए है कि दुकानदार फोन से आर्डर लेकर होम डिलीवरी का सामान बाहर निकाल सकें। लेकिन यह व्यवहार में अमल में लाया जा सकता है या नहीं, इस सिपाही की तस्वीर को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं। हो सकता है उसे घर के लिये जरूरी सामान लेकर जाना हो। राशन खत्म हो गया हो। हो सकता है कुछ तलब ही लग गई हो। इतनी छूट देने में हर्ज क्या है। आखिर, दुकान में भीड़ नहीं है, मास्क भी पहन रखा है। सब ऐसे अनुशासित खरीदी करें तो लॉकडाउन की जरूरत ही क्यों पड़े? (फोटो-सुनील शर्मा/फेसबुक)

खाद के बढ़े दाम की भरपाई के लिये

महामारी की तकलीफ भुलाने के लिये आरएसएस-भाजपा ने सकारात्मक कैम्पेन चलाने की योजना बनाई है। इसका एक तरीका यह भी है कि कोई दूसरी बड़ा बोझ आपके सिर पर आ जाये। पेट्रोल के दाम में जिस तरह एकाएक दुबारा तेजी आई है वह आपको कोरोना से हटकर सोचने पर मजबूर कर सकता है। कृषि पर निर्भर छत्तीसगढ़ में किसान खाद के दाम डेढ़ गुना बढ़ जाने से ज्यादा चिंतित हो गये हैं। इंडियन फार्मर फर्टिलाइजर कारपोरेशन इफ्को ने उर्वरक और खाद के दाम 58 फीसदी बढ़ा दिये। जो डीएपी 12 सौ में एक बैग मिल जाता था वह 19 सौ रुपये पहुंच गया। इसी तरह से कृभको, एनसीएफएल, जुआरी, प्रदीप फास्फेट्स, चंबल फर्टिलाइजर, आदि सभी पॉपुलर फर्टिलाइजर कंपनियों ने खाद के दाम बेतहाशा बढ़ा दिये हैं। लॉकडाउन में फंसे हैं इसलिये आप सडक़ पर उतर नहीं सकते, हालांकि पहले के अनुभवों से कहा जा सकता है कि उतरने से भी कुछ फर्क नहीं पडऩे वाला है। अब किसान मांग कर रहे हैं कि दिल्ली सरकार कम से कम किसान सम्मान निधि की रकम उनके खाते में डाल दे, खाद और डीजल की बढ़ी कीमत की थोड़ी भरपाई तो हो जायेगी। ऐसा नहीं होना चाहिये कि खाद, डीजल से वसूली आज हो, सम्मान निधि के नाम पर रकम कल लौटाई जाये।


12-May-2021 5:34 PM (210)

संचार विभाग की सम्भावना

वैसे तो कोरोना संक्रमण की वजह से निगम-मंडलों में नियुक्तियों पर कोई बात नहीं कर रहा है। फिर भी कांग्रेस हल्कों में यह चर्चा है कि संचार विभाग से शायद ही अब किसी को लालबत्ती मिले। वर्तमान में संचार विभाग से शैलेष नितिन त्रिवेदी, राजेन्द्र तिवारी, किरणमयी नायक, सुरेन्द्र शर्मा, महेन्द्र छाबड़ा लालबत्तीधारी हैं।

संचार विभाग के सदस्य रमेश वल्र्यानी, सुशील आनंद शुक्ला, आर पी सिंह, और घनश्याम राजू तिवारी सहित कई और नेता निगम-मंडल में पद की आस में हैं। इन सभी को अगली सूची का इंतजार है। मगर इन सबकी इच्छा पूरी हो पाएगी, इसमें कुछ लोग संदेह जता रहे हैं। संदेह की वजह यह है कि पिछले दिनों सीएम भूपेश बघेल, संचार विभाग के सदस्यों के साथ वर्चुअल बैठक की, इसमें उन्होंने कोरोना को लेकर हमलावर हो रही भाजपा का पुख्ता जवाब देने की सलाह दी।

चर्चा के दौरान कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कुछ दिक्कतें भी गिना दी, और यह भी कहा कि उन्हें सरकार से समय पर आंकड़े नहीं मिल पा रहे हैं। एक ने तो आगे बढक़र कोरोना प्रबंधन में सरकारी प्रयासों की सराहना की, और सीएम से क्षमायाचना कर विपक्ष का पुरजोर तरीके से जवाब देने का भरोसा दिलाया। सब कुछ बढिय़ा चल रहा था कि एक ने मौका पाकर प्रवक्ताओं के लिए लैपटॉप की मांग कर दी, ताकि कामकाज बेहतर ढंग से हो सके।

इस पर सीएम ने भी तुरंत हामी भर दी, और शैलेष को सभी प्रवक्ताओं को लैपटॉप उपलब्ध कराने के लिए कह दिया। अब लालबत्ती की लाइन में लगे प्रवक्ताओं को संदेह है कि लैपटॉप की मांग पूरी होने के बाद लालबत्ती शायद ही मिलेगी। बाकी लोग संचार विभाग के सदस्य को कोस रहे हैं, जिसने लैपटॉप की मांग की थी। नाराज सदस्यों का कहना था कि निगम-मंडल पद मिल जाता, तो दूसरे को लैपटॉप गिफ्ट कर सकते थे। अब लैपटॉप मांग पूरी हो गई है, तो पद की गुंजाइश कम हो जाती है।

वन ग्रामों तक पहुंचा कोरोना

कोरोना संक्रण अब वन ग्रामों तक पहुंच गया है। बारनवापारा अभ्यारण्य के कर्मचारी और ग्रामवासियों समेत कुल 70 लोगों के पॉजिटिव होने की खबर है। यही नहीं, सीतानदी अभ्यारण्य के गांव देवपुर, जहां 20-25 घर हैं। गांव में रहने वाला हरेक व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव है।

दंतेवाड़ा, और सुकमा के नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर नक्सली भी पॉजिटिव हो गए हैं। इनमें से कई की मृत्यु भी हो चुकी है। कोरोना से नक्सल पस्त हो रहे हैं। सुरक्षाबलों के लिए राहत की खबर तो है, लेकिन गांव वाले भी संक्रमित हो रहे हैं। यह चिंता का विषय बना हुआ है।

एकदम से बदले सुर

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के संचार विभाग में आपसी खींचतान किसी से छिपी नहीं है। पार्टी के कई नेता एक व्यक्ति एक पद का राग अलाप रहे हैं। हालांकि वरिष्ठ नेताओं पर इसका कोई असर होता नहीं दिख रहा है, फिर कांग्रेस कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती को मूल मंत्र मानकर प्रयास कर रहे हैं। संचार विभाग के कुछ सदस्य अच्छे-बुरे दोनों वक्त में कोशिश करने से पीछे नहीं हटते। अब देखिए जब संचार विभाग के एक वरिष्ठ सदस्य और बड़े निगम के पदाधिकारी कोरोना से संक्रमित हुए तो दूसरे एक सदस्य ने उनकी तारीफों के पुल बांधना शुरु कर दिया। इतना ही नहीं लंबा-चौड़ा प्रेस नोट तक जारी कर दिया कि संक्रमित होने के बावजूद वे दो-दो लड़ाई एक साथ लड़ रहे हैं। कोरोना के साथ-साथ केन्द्र सरकार और राज्य के विपक्षी नेताओं के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि यह बात जगजाहिर है कि इन दोनों नेताओं की आपस में पटती नहीं। दोनों एक-दूसरे की शिकायतें भी करते रहते हैं। ऐसे में इस जूनियर सदस्य ने मोर्चा खोलने का नया तरीका निकाल लिया है। जिसमें वे वरिष्ठ सदस्य की खूब तारीफ करते हैं और बकायदा मीडिया को बयान भी जारी करते हैं। ऐसा करने के पीछे उनकी रणनीति है कि कोई कह नहीं सकेगा कि वरिष्ठ सदस्य से मतभेद हैं। कांग्रेस के संचार विभाग में यह रणनीति कितनी काम आती है यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन कांग्रेसी आपस में ही काना-फूसी करते हैं कि जूनियर सदस्य के सुर एकदम से बदल गए हैं।

हम तो उसमें मगन जिसमें लगी है लगन

छत्तीसगढ़ में कोराना के बाद शराब दूसरा हॉट टॉपिक बना हुआ है। शराब की ऑनलाइन बिक्री शुरु होने के बाद विपक्ष को राज्य सरकार को घेरने का मौका मिल गया। शराब के मुद्दे पर विपक्षी दल इस कारण भी सरकार के खिलाफ मुखर रहते है, क्योंकि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में शराबबंदी का वादा किया था। ऐसे में लॉकडाउन में शराब बिक्री  गाहे-बगाहे सरकार के खिलाफ आक्रमक हथियार के रुप में इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा नहीं है कि शराब केवल छत्तीसगढ़ में ही बिक रही है। दूसरे राज्यों में भी बिक्री शुरु हो गई है। कई राज्यों ने बकायदा दुकानें खोल दी गई है, लेकिन वहां विपक्ष के लिए उतना बड़ा मुद्दा नहीं हो पाता, जितना बड़ा यहां है। जबकि हर बार यहां ऑनलाइन बिक्री से शराब की बिक्री होती है, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो। यहां तक दूसरे राज्यों में शराब दुकानों की भीड़ की तस्वीरें देखने को मिलती है, पर वहां पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं होने के आरोप लगते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेताओं ने दूसरे और खासतौर पर बीजेपी शासित राज्यों की शराब दुकानों में लगने वाली भीड़ को विपक्ष को जवाब देने के लिए हथियार बनाने का फैसला लिया है। इसी कड़ी में राज्य कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में शराब दुकानों में भीड़ को सोशल मीडिया पर साझा कर राज्य और केन्द्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा है। कुल मिलाकर मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप के लिए दोनों पार्टियों के पास पर्याप्त दलीलें है। यह भी साफ दिखाई पड़ रहा है कि फिलहाल राज्य में शराबबंदी के कोई आसार नहीं है, क्योंकि शराब को लेकर सरकारों के मोह के बारे में किसी से कुछ छिपा नहीं है। राजनीति से जुड़े कुछ लोग तो वो दौर को भी याद करते हैं, जब पिछले विधानसभा चुनाव के समय रमन सरकार ने शराबबंदी की ओर कदम बढ़ाने की कोशिश की थी और चुनाव आते-आते शराबबंदी करने का बड़ा फैसला लेने की तैयारी में थी, लेकिन लॉबी-ब्यूरोक्रेसी के दबाव में यह फैसला टल गया। ऐसे में यह बात में समझ लेनी चाहिए कि चुनावी वायदे सरकार बनने और बनाने तक ज्यादा जोर-शोर से उठते हैं, उसके बाद उस पर फैसला इतना आसान नहीं होता। खैर, इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच उन मदिरा प्रेमियों को तो राहत मिल गई जो इसके इंतजार में बैठे थे। उन्हें सियासी दांव-पेंच से कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि उनकी चिंता उस समय बढ़ गई थी, जब साइट क्रैश होने की वजह से ऑर्डर नहीं कर पा रहे थे। इसलिए तो कहा जाता है कि कोई काहु में मगन, हम तो उसमें मगन जिसमें लगी है लगन। 

आबकारी पोर्टल ने जवाब क्यों दे दिया?

जिस जोर शोर से शराब की ऑनलाइन बुकिंग शुरू हुई और बड़े पैमाने पर आर्डर किए गए उससे स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन का पोर्टल ही बैठ गया। शराब के शौकीनों की बड़ी बदनामी हुई। इतने उतावले थे कि ऑर्डर पर ऑर्डर करते गये, सब्र नहीं था, थोड़ा रुक जाते। पर इस ट्रैफिक जाम में बेचारे पीने वालों की अकेले गलती नहीं थी। खबर आई है कि आबकारी के कर्मचारियों, सेल्स मैन, सुपरवाइजर आदि ने भी मोर्चा संभाल लिया था। उन्होंने मीडियम रेंज की पापुलर ब्रांड, जिसकी ज्यादा मांग होती है, फटाफट उसकी बुकिंग कर डाली। अलग-अलग नामों और दुकानों से। एक बार में पांच लीटर तक की सप्लाई हो सकती है इसलिये अच्छा खासा माल इक_ा हो गया। और जब दोपहर बाद पोर्टल में स्टाक खत्म बताया जाने लगा तब उनका अपना खेल शुरू हुआ। सीधे दुकान के आसपास ज्यादा कीमत पर हाथों-हाथ शराब बेची गई। बता रहे हैं कि कमाई का यह सिलसिला कम से कम एक हफ्ते तक तो बंद नहीं होने वाला है।

आप चाहें तो उन्हें लताड़ सकते हैं पर जब जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे लोगों के लिये रेमडेसिविर और ऑक्सीजन सिलेंडर की कालाबाजारी करने से लोग बाज नहीं आ रहे हों तो सोचिये, इन्होंने क्या उनसे ज्यादा बुरा किया?

कोरोना की चपेट में नक्सली

पालनार के जंगलों में बस्तर पुलिस को एक मुठभेड़ के दौरान मिली एक चि_ी से पता चलता है कि कुछ नक्सली कैंपों में कोरोना फैला हुआ है। कुछ की मौत हो गई और दर्जनों संक्रमित हैं। इसके चलते बहुत से लोग दस्ते को छोडक़र भी जा रहे हैं। पुलिस अधिकारियों ने ऑफर दिया है कि नक्सली हथियार डालकर सामने आयें। उन्हें डॉक्टर व चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जायेगी। मानवीय आधार पर पुलिस का प्रस्ताव तो ठीक है पर क्या नक्सली इसके लिये राजी होंगे?  आमने-सामने मुठभेड़ के दौरान एक झटके में गोलियां खाकर ढेर होना एक बात है और महामारी की वेदना सहते हुए धीरे-धीरे मौत के मुंह में जाना अलग बात। पर सवाल यह है कि शहरों से, सीमाओं से परे सारे साधन, सुविधायें नक्सलियों तक पहुंच जाती हैं। क्या कोरोना से बचने की दवाईयां और मेडिकल उपकरण भी उन तक भी पहुंच पाएंगे?  ऐसा लगता है कि पुलिस और सरकार से मदद लेने की बात तो वे जल्दी नहीं सोचेंगे।

झोलाछाप डॉक्टरों की अहमियत...

मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र से आने वाले विधायक विपिन वानखेड़े ने वहां के कलेक्टर को लिखी चि_ी में कहा है कि झोलाछाप डॉक्टरों को कोरोना बीमारी के इलाज के लिए प्रशिक्षण दिया जाए। तर्क दिया है कि गांवों में कोरोना के इलाज को लेकर काफी दहशत है। डर के कारण ग्रामीण जिला अस्पताल नहीं पहुंच रहे हैं। झोलाछाप डॉक्टरों ही ग्रामीओं को भरोसा है। इनको कोरोना के इलाज की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। इनके साथ पटवारी, पंचायत सचिव या दूसरे कर्मचारियों की ड्यूटी लगा दें।

इधर अपने छत्तीसगढ़ में भी झोलाछाप डॉक्टरों की अहमियत मध्यप्रदेश से कम नहीं है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो लोग टीका लगवाने से मना कर रहे हैं वे कह रहे हैं कि कोरोना पकड़ेगा तो झोलाछाप डॉक्टर से दवा, इंजेक्शन ले लेंगे। टीका लगवाने के लिये ग्रामीणों को तैयार करना अफसरों के लिये मुश्किल होता जा रहा है। अफवाहें गांवों में फैलती जा रही है। कई गांवों में लोग न पुलिस की सुन रहे, न तहसीलदार, न ही कलेक्टर की। इस स्थिति से निपटने के लिये मालवा के विधायक के सुझाव में क्या अपने यहां भी कोई संभावना दिख रही है?  


11-May-2021 5:49 PM (371)

जाकी रही भावना जैसी !

सोशल मीडिया लोगों को किस तरह एक दूसरे के करीब लाता है इसको देखना हो तो भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच बने हुए बहुत से फेसबुक ग्रुप देखे जा सकते हैं। जिन लोगों की दिलचस्पी साझा विरासत में हैं, दोनों देशों के रिश्ते ठीक करने में हैं, कला और संस्कृति की बातों को लेने देने में हैं, ऐसे बहुत से लोग ऐसे ग्रुप के सदस्य हैं। अब कल ही ऐसे एक फेसबुक इंडिया-पाकिस्तान हेरीटेज क्लब में हिंदुस्तान के जगमोहन गुजराल ने अपने दादा का एक विजिटिंग कार्ड पोस्ट किया जिसमें उनके नाम के साथ तहसील और जिले का जिक्र था।

उन्होंने ग्रुप के लोगों से पूछा कि क्या कोई बता सकते हैं कि यह पता कहां है।

कुछ घंटों के भीतर ही पाकिस्तान के अशवाक अहमद ने लिखा- हां मैं इस पते को जानता हूं, यह मेरे पुरखों का गांव है और इस जगह को अब साहीवाल कहा जाता है। उसने आगे लिखा- आप यहां आने का प्लान बनाइए और सरदारजी, मैं आपका मेजबान रहूंगा।

अब कहां कोई हिंदुस्तानी अपने दादा के गांव का पता पूछ रहा है और कहां कुछ घंटों के भीतर ही उसे वहां एक मेजबान ही मिल जा रहा है, सोशल मीडिया आज पूरे हिंदुस्तान में कहीं किसी को ऑक्सीजन दिला रहा है, कहीं दवाइयां दिला रहा है, कहीं एंबुलेंस और कहीं अंतिम संस्कार में मदद। सोशल मीडिया का जो उसका बेहतर इस्तेमाल जानते हैं, उन्हें उसके बेहतर नतीजे भी मिलते हैं। जाकी रही भावना जैसी, फेसबुक दोस्ती मिलें वैसी !

कोरोना और शादियां

इस अखबार में दो ही दिन पहले कोरोना के ऐसे खतरे के बीच शादियां ना करने की नसीहत दी गई थी, और कुछ वैसी ही नसीहत शादी, और बच्चे पैदा करने के खिलाफ पिछले बरस भी दी गई थी। परसों वह संपादकीय छपा, और अगले ही दिन छत्तीसगढ़ के सबसे नए जिले जीपीएम से खबर आई कि एक शादी में शामिल 70 लोगों में से 69 लोग कोरोनाग्रस्त निकले और दुल्हन के बाप को गिरफ्तार कर लिया गया।

लेकिन शादियों को लेकर हिंदुस्तान में किस कदर पाखंड चलता है इसकी मिसालें लोग अभी फेसबुक पर लिख रहे हैं। एक महिला गीता यथार्थ ने लिखा कि कैसे-कैसे मां-बाप के अस्पताल में गुजर जाने पर भी बच्चों को बताए बिना उनकी शादी करवा दी जाती है. उन्होंने ऐसी कुछ एक मिसालें भी दीं। और इसके नीचे लोगों ने अपने जो तजुर्बे लिखे वह भी भयानक है। एक ने लिखा मैंने ऐसी कई शादियां देखी हैं जिनमें एक तरफ कमरे में लाश रखी है और दूसरी तरफ शादी हो रही है, बारात विदा करने या लौटने के बाद अंतिम संस्कार किया गया है। एक और ने लिखा कि उनके रिश्तेदारी में एक पिता ने कोरोना के डर से अपनी चार बेटियों की शादी एक साथ ही तय कर दी, लेकिन शादी के 8 घंटे पहले ही उस पिता की मौत हो गई। फेरों के वक्त जब बेटियों ने पिता के बारे में पूछा तो उन्हें कहा गया कि वह लॉकडाउन में फंस गए हैं और विदा करने को मौसा तो है ना. इसके बाद उन्हें विदा कर दिया गया और वे आखिरी बार अपने पिता का चेहरा भी नहीं देख पाईं। शादी का खर्च हो चुका था और कहीं रिश्ता ना टूट जाए इसलिए आनन-फानन शादी की गई और फिर विदाई के बाद अंतिम संस्कार।

लंगोटी संभालने की चिंता

छत्तीसगढ़ में कोरोना के कारण सरकारी कामकाज और लोगों की दिनचर्या तो अस्त-व्यस्त हुई है। सरकार में पद पाने के इच्छुक दावेदार भी घोर निराशा के दौर से जूझ रहे हैं। सरकार को ढाई साल का कार्यकाल पूरा हो गया है ऐसे में उन्हें तो साल-डेढ़ साल का कार्यकाल मिलने के लाले पड़े हुए हैं, क्योंकि आखिरी साल में तो चुनाव आचार संहिता के कारण सुख-सुविधा छीन जाएगी। तो लोगों को लगता है कि भागते भूत की लंगोटी से ही काम चला लेंगे, लेकिन इस संक्रमण काल में अब तो अधिकांश दावेदारों ने लंगोटी की भी उम्मीद छोड़ दी है। कुछ तो इस जुगत में हैं कि अब तो पद के बजाए आने वाले चुनाव में टिकट का फार्मूला सही होगा। साल डेढ़ साल के लिए सरकारी पद मिलने से कुछ खास फायदा तो होगा नहीं, उलटे समर्थकों की उम्मीद जरुर बढ़ जाएगी और वे खरे नहीं उतर पाए तो लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। सरकार की एंटी इनकम्बेंसी का नुकसान हो सकता है। ऐसे लोगों ने पार्टी नेताओं को बोलना शुरु कर दिया है कि उन्हें लाल बत्ती का मोह नहीं है, वे संगठन को मजबूत करने के लिए काम करेंगे। अब देखिए उनका यह फार्मूला काम आता की नहीं। नहीं तो लंगोटी तो संभालना ही पड़ेगा।

अपना टाइम आएगा

छत्तीसगढ़ में कोरोना के कारण लोग अस्पताल और दवा दुकानों के चक्कर से खासे परेशान हो गए हैं। मध्यवर्गीय लोगों की बड़ी चिंता ये हैं कि बीमारी के कारण थोड़ी बहुत जमा पूंजी भी खत्म हो गई है और ऊपर से कामकाज बंद है तो आमदनी नहीं हो रही है, लेकिन मेडिकल फील्ड से जुड़े लोगों के लिए मुफीद समय चल रहा है। खैर, समय एक जैसा नहीं होता,इसलिए वे भी हिन्दी फिल्म गली ब्यॉय का गाना अपना टाइम आएगा...गाकर अपनी अपने आप को तसल्ली दे रहे हैं। अब उनको कब तक गाने से तसल्ली मिलेगी, यह कहना तो मुश्किल है, लेकिन एक कवि ने इस पर टिप्पणी कि ऐसा सोचने वालों को वो दिन याद करना चाहिए, जब वे अच्छे दिन आएंगे के लालच फंस गए थे। हालांकि कहा जाता है कि ये पब्लिक है जो सब जानती है, लेकिन यह बात भी उतनी ही सही कि पब्लिक को नए और लुभावनी बातों के बल पर उलझाया भी जा सकता है।

दारू सेंट्रल विस्टा की तरह नशा...

आमतौर पर राज्य के मुद्दों पर केंद्र के मंत्रियों का बयान कम ही आता है। मगर छत्तीसगढ़ सरकार का शराब की होम डिलीवरी का फैसला शायद देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कुछ अखबारों के साथ ट्वीट किया है कि ऐसे समय में जब हम लोगों की जिंदगी बचाने के लिए युद्ध लड़ रहे हैं। ऑक्सीजन सिलेंडर, मेडिकल उपकरण, बेड, दवाइयों को प्राथमिकता दे रहे हैं, छत्तीसगढ़ सरकार घरों में शराब पहुंचाने को प्राथमिकता दे रही है।

जवाब में ढेर सारी प्रतिक्रियाएं आई हैं जिनमें पुरी की बातों से सहमति है। लेकिन कुछ ने पलटवार भी कर दिया है। जैसे नितेश गोयल ट्विटर हैंडल से 26 अप्रैल की आईएएनएस की खबर चस्पा की है जिसमें बताया गया है कि भाजपा शासित कर्नाटक में भी शराब की होम डिलीवरी को अनुमति दी गई है।

अंश नाम के एक हैंडल से कहा गया है कि कोई आश्चर्य की इस दौर में कोई शासन नहीं है। हर कोई ट्विटर मंत्री बनने की कोशिश में बहुत व्यस्त है। एक अन्य ट्विटर हैंडल विक्रमादित्य ने कहा है कि राजनीति में कौन अच्छा है कौन बुरा, पता नहीं चलता। कल ही जिन्होंने कहा था कि सेंट्रल विस्टा परियोजना और टीकाकरण को एक साथ जोडक़र नहीं देखा जा सकता वही आज लॉकडाउन और शराब वितरण को एक दूसरे से जोड़ रहे हैं।

विवेक शर्मा कहते हैं कि जब सेंट्रल विस्टा परियोजना अत्यावश्यक सेवा हो सकती है तो दारू क्यों नहीं? दोनों में नशा है जी! सेंट्रल विस्टा एक आदमी का नशा और दारू बहुतों का। एक और हैंडल मिस विनी ने लिखा है- थोड़ी और मेहनत कीजिए, कोई बड़ी बुराई ढूंढने में। काम तो आप नूं वैसे ही नहीं होना है।

अवैध भट्ठी किसके सिर पर फोड़ें?

गांव में  कच्ची, महुआ और देसी दारु का कारोबार बंद हो जाएगा ऐसा दावा भाजपा के समय से किया जा रहा था जब ठेके सरकार ने अपने हाथ ले लिये। मगर कोचियों को इस पृथ्वी लोक से बाहर नहीं जाना था, नहीं गये। पहले उनसे काम अपना-अपना इलाका बांटकर शराब ठेकेदार कराते थे, अब आबकारी और पुलिस वाले। पुलिस और आबकारी विभाग के बीच कहीं-कहीं ट्यूनिंग बैठी रहती है तो कहीं-कहीं टकराव भी होता रहता है।

अब इस चैटिंग पर ही नजर डालिये। एक बंदा कोविड 19 की सूचनाओं के लिए बनाए गए एक व्हाट्सएप ग्रुप में थानेदार से शिकायत कर रहा है कि उसके इलाके में अवैध शराब और गांजा बिक रहा है। निवेदन किया कि दिन में कम से कम एक बार 112 वाली गाड़ी को घुमा दिया करें। जवाब शायद थानेदार दे रहे हैं कि यह ग्रुप इस बात के लिए नहीं बनाया गया है। आप अपनी शिकायत आबकारी वालों को करिए। हर बात का ठेका, ठीकरा पुलिस पर फोडऩा बंद करें। अब यह चैटिंग चूंकि पब्लिकली हो रही थी, थानेदार को लगा होगा कि कुछ गड़बड़ हो सकती है। तुरंत लिखते हैं कि ठीक है, मेरे पर्सनल नंबर पर उनका नाम डालो, कार्रवाई करता हूं।

इसमें संदेह नहीं कि अवैध शराब पकडऩे में पुलिस आबकारी विभाग से कहीं आगे है। अब इस वाट्सएप ग्रुप में आबकारी वालों और कोचियों के शुभचिंतक नहीं जुड़े होंगे तब तो रेड सही-सही पड़ जाएगी, वरना जब तक पुलिस पहुंचेगी- माल गायब हो चुका होगा।


10-May-2021 5:41 PM (328)

जांच अभी जारी रहेगी

मदनवाड़ा जांच आयोग का कार्यकाल तीन माह बढ़ा दिया है। आयोग के अध्यक्ष पूर्व प्रमुख लोकायुक्त जस्टिस शंभूनाथ श्रीवास्तव हैं। जस्टिस श्रीवास्तव ने ही प्रमुख लोकायुक्त रहते रमन सरकार में बेहद प्रभावशाली पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के प्रकरण पर कार्रवाई की अनुशंसा  की थी। हालांकि मुकेश गुप्ता को कोर्ट से राहत मिली हुई है।

इलाहाबाद के रहवासी जस्टिस श्रीवास्तव मदनवाड़ा नक्सल हमले की जांच के लिए नहीं आ पा रहे हैं। कोरोना ने उनका रास्ता रोका हुआ है। इलाहाबाद में कोरोना संक्रमण काफी फैला हुआ है, और कहा जा रहा है कि जस्टिस श्रीवास्तव के पैतृक गांव में भी कोरोना से 50 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इन सब बाधाओं की वजह से जस्टिस श्रीवास्तव मदनवाड़ा नक्सल हमले की जांच पूरी नहीं कर पाए हैं। ऐसे में आयोग का कार्यकाल बढऩा ही था।

डॉ. आलोक शुक्ला बने रहेंगे?

सीएम भूपेश बघेल खुद कोरोना संक्रमण के रोकथाम के प्रयासों की  रोज मॉनिटरिंग कर रहे हैं। दो-तीन जिलों में संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। यहां कुछ जिला और स्वास्थ्य अमले की लापरवाही भी सामने आ रही है। इन सब वजहों से जल्द ही छोटा सा प्रशासनिक फेरबदल हो सकता है।

मंत्रालय में एसीएस रेणु पिल्ले की जगह स्वास्थ्य विभाग की कमान संभालने वाले डॉ. आलोक शुक्ला ने थोड़े समय में कोरोना रोकथाम के लिए काफी कुछ काम किया है। डॉ. शुक्ला खुद सर्जन रह चुके हैं, और पहले भी दो बार स्वास्थ्य महकमा संभाल चुके हैं। ऐसे में इसी हफ्ते रेणु के लौटने के बाद भी डॉ. शुक्ला के पास स्वास्थ्य विभाग का प्रभार रह सकता है। रेणु को कोई और जिम्मेदारी दी जा सकती है।

कोरोना वारियर्स को ऐसे किया सेल्यूट

बिना थके, बिना रुके, हफ्तों-महीनों से बहुत से लोग कोरोना से इंसान और इंसानियत को बचाने के लिए जूझ रहे हैं। अब शोक और मायूसी का इतना ज्यादा फैलाव हो चुका है कि इनका आभार जताने के लिए ताली, थाली, शंख बजाना अटपटा लगेगा। इसलिये लोरमी के युवा उनके प्रति मौन रहकर तख्तियां लिये सडक़ पर कड़े होकर कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। ये युवा खुद भी कोरोना से मौत के बाद श्मशान गृह लाए जाने वाले शवों का अंतिम संस्कार करते हैं। जरूरतमंदों को ये युवा सूखा राशन पहुंचाने, मरीजों को अस्पताल ले जाने घरों में दवाइयां पहुंचाने और पुलिस के साथ लॉकडाउन तथा कंटेनमेंट जोन में नियमों का पालन कराने में भी लगे रहते हैं। वे अपने काम को बहुत बड़ा नहीं मानते, बल्कि उन सबकी सराहना करना चाहते हैं जो अपनी अपनी क्षमता से अपने क्षेत्र में सेवा कर रहे हैं। वे इन तख्तियों के जरिये अपेक्षा करते हैं कि लोग भी इन सबका सम्मान करिए, जो महामारी से लडऩे में किसी न किसी रूप में आपके बीच उपस्थित हैं। यह जरूर है कि इस तख्ती में कुछ वर्ग छूट गए हैं जिन्हें कल राज्य सरकार की जारी सूची में कोरोना वारियर्स का दर्जा दिया गया। तस्वीर इस घोषणा के पहले की है।

क्या लॉकडाउन ने कमाल किया?

बीते तीन चार हफ्तों से जो दृश्य दिखाई दे रहा था, वह कुछ बदल रहा है। प्रदेश में संक्रमण के  नये मामले तेजी से घट रहे हैं। रविवार को सबसे ज्यादा केस 687 रायगढ़ से मिले। अभी अभी कम से कम आठ, दस जिले ऐसे थे जहां हजार से ऊपर मामले हर रोज आ रहे थे। पहली नजर में तो यही समझ में आता है कि लॉकडाउन को लंबा खींचने का सरकार का फैसला काम कर गया है और असर अब दिखाई देने लगा है। खासकर दूसरे राज्यों से पहुंचने वालों पर न केवल सडक़, बल्कि हवाई और रेल के मार्ग पर भी कड़ाई बरती गई।

मगर एक दूसरा संकेत भी मिल रहा है। ग्रामीण इलाकों में संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। कई जगहों से शिकायत आ रही है कि उन्हें टेस्टिंग किट नहीं होने के कारण अपना सैंपल देने का मौका नहीं मिल रहा है। लोग टेस्टिंग मायूस लौट रहे हैं। पीएचसी और सीएचसी में मांग के मुताबिक किट नहीं भेजे जा रहे हैं। हालांकि राज्य स्तर पर टेस्टिंग की संख्या कम नहीं है पर अब टेस्टिंग क्षमता और बढ़ाने की जरूरत है। यदि ऐसी स्थिति बनी रही तो आंकड़े कम तो नजर आएंगे मगर महामारी से निपटना और बड़ी समस्या हो जायेगी। वैसे भी गांव में जागरूकता की कमी की बात भी आती है।

शराब की घर पहुंच सेवा

वैसे तो आबकारी मंत्री की चिंता यह बताती है कि लोग शराब नहीं मिलने के कारण स्प्रिट और जहर पीकर मर रहे हैं इसलिए ऑनलाइन बिक्री शुरू की गई है, पर हर किसी को पता है कि यह निर्णय राजस्व से भी जुड़ा हुआ है। पोर्टल और ऐप के जरिए शराब मंगाने की मिली अनुमति के बाद अब उन लोगों को जो देसी कच्ची और सस्ती शराब पीते थे, स्मार्टफोन रखना होगा। नेट कनेक्टिविटी के साथ और ऐप को इस्तेमाल और ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर करना भी सीखना होगा। वरना वे शराब मंगा कैसे पाएंगे? ऑनलाइन सेल में अद्धी पौवा नहीं मंगाया जा सकेगा। बोतल दो बोतल का ऑर्डर करना होगा। साथ ही सेवा शुल्क अलग से देना होगा। मजदूर और मिस्त्री सरकार की सेवा लेने के लिये इतनी व्यवस्था कर पायेंगे, इसमें संदेह हैं। अब इस ऑनलाइन बिक्री के बाद भी कोई सिरप या स्प्रिट पीकर मरेगा तो?

बीजेपी के एक नेता का कहना है कि कि जो लोग जहर पीकर मरे उन को तो फायदा मिले ना मिले जो खाते पीते लोग लॉकडाउन में मन मसोसकर घरों में बैठे महंगी शराब के बगैर तड़प रहे थे उनको जरूर सुविधा मिल गई। शराब दुकानें लगभग एक माह से बंद है। जहरीला नशा करने के चलते कितने लोगों को जान गंवानी पड़ी यह पता किया जाये, फिर उसके एक माह पहले का आंकड़ा लिया जाये जब शराब पीने के कारण हुई वारदातों में लोगों की जान चली गई। स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो जायेगी।

हो सकता है कि एक वक्त के एसटीडी पीसीओ की तरह मोहल्लों के लडक़ों को एक काम मिल जाये की वे अपने स्मार्टफोन पर दारू आर्डर कर दें, भुगतान कर दें, और सर्विस चार्ज ले लें !


09-May-2021 5:56 PM (247)

आधे शटर में दुकानदारी

मोहल्ले के दुकानदारों से आम तौर पर ऐसा रिश्ता होता है कि आते-जाते सामान उठा लिये और लिख लेना, भी कह देते हैं। एक साथ महीने का सामान लेने वाले लोगों को पहले के लॉकडाउन में किराना सामानों की होम डिलिवरी शॉपिंग मॉल, सुपर मार्केट और ऐप से मिल जाती थी। पर इस बार आदेश निकालने के बाद उसे वापस ले लिया गया। इसके चलते मोहल्ले की दुकानें ही बची हैं जिनसे चिल्हर सामान लेने वालों को खासी परेशानी हो रही है।

खासकर वह तबका जो बहुत कम मात्रा में तेल, साबुन लेने की हैसियत रखता है। दुकानदारों को शटर उठाकर सामान देने की इजाजत नहीं है। वे फोन पर ऑर्डर लेकर सिर्फ होम डिलिवरी कर सकते हैं। पर मोहल्ले के दुकानदारों के साथ सहज संवाद ऐसा रहता है कि कभी फोन नंबर पूछा ही नहीं गया। और, फोन नंबर लेकर ऑर्डर दे भी दिया तो 25-50 रुपये का सामान छोडऩे के लिये दुकानदार कितने घरों में जायेंगे? इतने डिलिवरी बॉय उनके पास नहीं होते हैं। कई दुकानों में तो मालिक के अलावा कोई कर्मचारी भी नहीं होता है। ऐसे में पुलिस के खौफ के बीच दुकानदार नियम तोड़ रहे हैं और पुलिस की नजर से बचाकर सामान ङ्घह्म् बेच रहे हैं। पकड़े गये तो 15 दिन के लिये दुकान सील, डंडे अलग से पड़ेंगे। खरीदने वाला खर्च कर रहा है, बेचने वाला नगद पा रहा है पर दोनों को ऐसा लगता है, मानो चोरी कर रहे हैं। वैसे यह नौबत ग्राहकों और दुकानदारों ने ही लाई है। पहले के लॉकडाउन में जब उन्हें सोशल डिस्टेंस का पालन करने कहा गया तो दुकान के बाहर गोल घेरे बनाये गये, रस्सी बांधी गई। चार से ज्यादा लोगों को एक साथ दुकान में नहीं घुसने की हिदायत दी दई थी। पर कुछ ही दिनों में सभी दायरे टूटते गये। नतीजा सामने है। 

कोरोना से बचने की ऐसी नसीहत...

इन दिनों आप साबुन बेच रहे हों या सरिया, हर एक विज्ञापन में सोशल डिस्टेंस, सैनेटाइजर, मास्क का संदेश जोडक़र सामाजिक सरोकार प्रदर्शित किया जा रहा है। मेडिकल सर्विस के विज्ञापनों का तो यह जरूरी हिस्सा है। कोरोना खत्म करने के लिये अब तक कोई दवा अब तक आ नहीं पाई है इसलिये हर एक पद्धति को लोग आजमा रहे हैं। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का काम भी इसके चलते बढ़ा है। ऐसे ही एक चिकित्सालय का पोस्टर अपनी ओर ध्यान खींच रहा है। कोरोना से बचाव के लिये कौन-कौन से उपाय जरूरी हैं, यह विज्ञापन में बताया गया है। तस्वीर खिंचाने वालों ने भी, जो शायद चिकित्सालय के स्टाफ हैं, मास्क तो पहना है पर  सोशल डिस्टेंस का पालन करना भूल गये हैं। शायद न भी भूले हों, हो सकता है कि फोटोग्रॉफी के समय कोरोना का खतरा कम हो जाता हो?

अब ऑनलाइन पिंडदान

बढ़ते कोरोना संकट के चलते हर कोई दहशत में है। पूजा पाठ कराने वाले पुरोहित पंडित भी। इस महामारी में कारोबार बैठ जाने के बावजूद वे सावधान हैं। इसी का असर मृत्यु के बाद होने वाले कर्मकांडों पर भी दिखाई दे रहा है। शादी-विवाह पर तो रोक लग गई। तीज-त्यौहार भी सम्पन्न होते जा रहे हैं। पर अंतिम सत्य, मृत्यु के संस्कारों को पूरा करने के लिये क्या किया जाये?

कोरोना के बिना होने वाली सामान्य मौतों में भी श्मशान घाट चलने के लिये पंडितों की तलाश करनी पड़ रही है। मृतात्मा की शांति के लिये रिवाज बना हुआ है, पिंडदान और ब्राह्मण भोज की। इसके लिये भी महराज नहीं मिल रहे हैं। नई परिस्थितियों में कुछ प्रयोग इस समस्या के समाधान के लिये किये जा रहे हैं। वीडियो काल के जरिये पंडित अपने जजमानों से जुड़ रहे हैं और उन्हें पिंडदान विधि-विधान से करा रहे हैं। ब्राह्मण भोज और दक्षिणा पर खर्च होने वाली मुद्रा का हस्तांतरण भी ऑनलाइन कर दिया जा रहा है। अब शोक-पत्र भी डिजिटली ही भेजे जा रहे हैं। इसमें अनुरोध किया जा रहा है कि मृतात्मा की शांति के लिये अपने घरों से ही प्रार्थना करें।

शुक्र है कि इस महामारी के दौर में लोग प्रतीकात्मक और वैकल्पिक तरीके से ही सही अपने पूर्वजों के प्रति आदर भाव दिखा रहे हैं। वरना हाल ही में तो अपने प्रदेश में ऐसे कई मामले सामने आ गये हैं जिनमें बुजुर्ग की सामान्य मौत होने पर उन्हें कोई कांधा नहीं देने पहुंचा। यह भी हो चुका है कि बाप के मरने की खबर इंदौर में बैठे बेटे को दे दी तो उसने अपने मोबाइल फोन का स्विच ही बंद कर दिया।


08-May-2021 5:39 PM (459)

भाजपा में मनमुटाव, और घरों में सुरक्षित

खबर है कि बीजेपी प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी पार्टी नेताओं की आपसी खींचतान से खफा हैं। राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष की शुक्रवार की वर्चुअल बैठक में तो उन्होंने अपनी नाराजगी का इजहार भी कर दिया। उन्होंने शिकायती लहजे में कहा कि यहां के नेताओं में काफी मनमुटाव है। चूंकि बैठक में प्रदेश के सभी बड़े नेता जुड़े हुए थे। लिहाजा, बीएल संतोष ने उन्हें टोकते हुए कहा कि अभी इस विषय पर बात करने का समय नहीं है। कोरोना की समस्या बड़ी है, और उस पर ध्यान देना होगा।

बैठक में संतोष प्रदेश के नेताओं को इशारों-इशारों में काफी कुछ कह गए। उन्होंने कहा कि सिर्फ सीएम या कांग्रेस के खिलाफ बयानबाजी से कुछ नहीं होगा। गांव-गांव में कोरोना से जूझ रहे लोगों की मदद के लिए पहल करनी होगी। दरअसल, संतोष इस बात से नाराज हैं कि कोरोना संक्रमण बढ़ते ही प्रदेश के सभी नेताओं ने खुद को घर में कैद कर रखा है, और सिर्फ कोरी बयानबाजी कर रहे हैं। सुनील सोनी जैसे इक्का-दुक्का ही नेता हैं, जो कि कोरोना काल में अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं, और लोगों की समस्याएं सुनकर निराकरण की कोशिश कर रहे हैं।

अजय चंद्राकर अलग-थलग ?

पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर को प्रदेश भाजपा महामंत्री भूपेन्द्र सिंह सवन्नी से पंगा लेना भारी पड़ रहा है। सवन्नी रायपुर संभाग के प्रभारी हैं, और उनकी संगठन में गहरी पैठ है। वे धरमलाल कौशिक के अति प्रिय हैं, तो पूर्व सीएम रमन सिंह भी सवन्नी को काफी तवज्जो देते हैं। संगठन में पदाधिकारियों की नियुक्तियों में भी सवन्नी की काफी दखल रहती है।

पिछले दिनों मिशन-2023 के लिए विभिन्न विभागों के प्रमुखों और सदस्यों की सूची जारी की गई, उसमें चंद्राकर को पर्याप्त महत्व नहीं मिला। उन्हें राजनीतिक प्रतिपुष्टि और प्रतिक्रिया विभाग में शिवरतन शर्मा के साथ सदस्य के रूप में रखा गया है। इस विभाग के प्रभारी शिवरतन हैं। पार्टी ने बृजमोहन, प्रेमप्रकाश, नारायण चंदेल जैसे अन्य प्रमुख नेताओं को विभाग प्रभारी बनाया गया है। अजय पार्टी के मुख्य प्रवक्ता हैं, लेकिन किसी विभाग का प्रभार नहीं दिया गया है।

दो दिन पहले बंगाल में हिंसा के विरोध में पार्टी नेताओं ने अपने घर में धरना दिया। पूर्व सीएम रमन सिंह के निवास पर अगल-बगल में रहने वाले रामविचार नेताम, और राजेश मूणत को बुलाया गया था, और तीनों साथ धरने पर बैठे थे, लेकिन रमन निवास से कुछ दूरी पर रहने वाले अजय चंद्राकर को वहां नहीं बुलाया गया। अजय ने अकेले अपने घर में धरना दिया। जो लोग अजय को करीब से जानते हैं कि वे इन सब चीजों की परवाह नहीं करते हैं। वे विधायक दल के मुखिया नहीं है, लेकिन विधानसभा में अक्सर विपक्ष का नेतृत्व करते हुए नजर आते हैं।  संगठन को भले ही उनकी जरूरत नहीं दिखती, लेकिन विपक्ष की आवाज बुलंद करने में वे सबसे आगे दिखते हैं।

सिर्फ सर्कुलर निकालने से बात बनेगी नहीं..

कोरोना पीडि़त मरीज के परिवार से गुरुग्राम से लुधियाना जाने के लिए एक लाख 20 हजार रुपये एंबुलेंस किराया लेने वाले को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मगर छत्तीसगढ़ में ऐसी शिकायतों पर सिर्फ सरकारी सर्कुलर निकालकर खानापूर्ति की जा रही है। लगातार शिकायतें आ रही हैं कि 5-10 किलोमीटर की दूरी के लिए भी एंबुलेंस चालक चार-पांच हज़ार रुपये से नीचे बात नहीं कर रहे हैं। शहर के बाहर लाने ले जाने के लिए तो 20 से 25 हजार में सौदा कर रहे हैं। शिकायतों के बाद जिला प्रशासन और परिवहन विभाग ने एक ही काम किया कि किराया कितना लेना है इसके लिए एक सर्कुलर जारी कर दिया। ठीक उसी तरह से जैसा कि निजी अस्पतालों का खर्च तय कर दिया गया है। जब पीडि़त परिवार इसकी शिकायत संबंधित अधिकारियों से करते हैं तो जांच की बात कही जाती लेकिन जांच क्या हुई और कार्रवाई किस पर हुई एक दो मामलों को छोडक़र या अभी तक सामने नहीं आया है। अधिकारी शायद यह समझते हैं कि इस विषम परिस्थिति में डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों पर कार्रवाई करके उन्हें हतोत्साहित नहीं किया जाए। पर सच्चाई यह है कि अभी बहुत से निजी चिकित्सालय संचालक मरीजों की परिस्थितियों को समझते हुए ठीक बिल बना रहे हैं। इसी तरह से कई एंबुलेंस संचालक मानवता के नाते सही-सही किराया भी ले रहे हैं। मशीनरी की ढिलाई के चलते दूसरों को जब लूटते देखेंगे तो क्या पता इनकी भी नीयत बदल जाए। इसलिए जहां गड़बड़ी हो रही है वहां पर सख्ती तो बरती जानी ही चाहिए। महामारी के नाम पर कुछ भी करने की छूट क्यों दी जानी चाहिए? राजधानी के एक अस्पताल से हाल ही में शिकायत आई थी कि समाज सेवी संस्थाएं वहां फ्री में एंबुलेंस भेजने के लिए तैयार बैठे हैं। अस्पतालों को अपना फोन नंबर भी दे रखा है पर कर्मचारियों की मिलीभगत की वजह से पीडि़त परिवार फ्री एंबुलेंस सेवा तक का लाभ उठा ही नहीं पाते और वे उन्हें किराये का एम्बुलेंस लेने के लिये विवश करते हैं।

मेहमानों पर लगाम नहीं लगाने का नतीजा

15-17 मई तक लॉकडाउन को बढ़ाने का आदेश जिस दिन जारी किया गया उसमें विवाह समारोह पर पाबंदी लगाने का निर्णय ज्यादातर जिलों ने नहीं लिया था। पर अब शादी के लिए पूर्व में दी गई सभी अनुमतियों को निरस्त कर दिया गया है। इस बीच बहुत से शुभ मुहूर्त हैं पर प्रशासन ने कोई नरमी नहीं दिखाई। दरअसल देखने में आया कि 10-20 लोगों के लिए अनुमति ली जाती है लेकिन मेहमानों की संख्या पर कोई नियंत्रण नहीं रहता है। अब इसी तस्वीर को देखिए। जैसे ही यहां छापा पड़ा प्रीति भोज का आनंद उठा रहे लोग पता नहीं कहां खिसक गए। आयोजक तर्क देते रह गए कि हम तो यहां पर चार-पांच लोग हैं। हमसे ज्यादा संख्या में तो आप लोग पहुंचे हैं। मगर राजस्व व पुलिस विभाग के अधिकारियों ने उन्हें बख्शा नहीं। उन्होंने कार्रवाई की और इसका आधार बना वहां सजाया गया डिनर का टेबल। वहां बड़े बड़े कटोरे रखे थे और कम से कम 200 लोगों का खाना तैयार था।

बाद में आयोजकों ने स्वीकार किया कि आप लोगों के पहुंचने की खबर गांव के बाहर से ही मिली और हमारे मेहमान तितर-बितर हो गए...। शादी ब्याह बड़ा संवेदनशील मामला है पर महामारी से नहीं बचेंगे तो शादी विवाह करके भी कुनबे कहां बचने वाले हैं।

अब आंध्रप्रदेश का खतरनाक वायरस

दूसरे चरण की शुरुआत में राज्य सरकार ने दावा किया कि महाराष्ट्र और उड़ीसा से आने-जाने वाले लोगों के कारण फैला। अब देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में मजदूर लौट रहे हैं कोई ट्रेन से तो कोई सडक़ के रास्ते से। इन्हें राज्य की सीमा पर, स्टेशन या बस स्टैंड पर ही अपना कोरोना टेस्ट कराना है। पर यह आदेश निकलने में देर हुई। तब तक हजारों मजदूर लौटकर गांव में अपने घर पहुंच चुके थे। इसी वजह से शहरी क्षेत्रों की बराबरी में ही  ग्रामीण क्षेत्रों से भी कोरोना मामले रोजाना आ रहे हैं। अब एक नई सूचना ने छत्तीसगढ़ की चिंता बढ़ा दी है। वह है बस्तर के रास्ते से आंध्रप्रदेश के नये वेरियेंट का छत्तीसगढ़ में प्रवेश करना। बीते बुधवार को आंध्रप्रदेश के एक मजदूर की कोरोना से मौत हो गई। इतनी तेजी से उसकी तबियत बिगड़ी कि लोगों ने इसे आंध्रप्रदेश का वेरियेंट बताया। हालांकि कलेक्टर ने इसका खंडन किया। आंध्रप्रदेश के नये स्ट्रेन से लोग इसीलिये घबरा रहे हैं कि इसे मौजूदा वायरस से 15 गुना ज्यादा घातक बताया जा रहा है। इसे इसे एन 440 के नाम दिया गया है। 

बस्तर के अधिकांश जिलों में छत्तीसगढ़ के बाकी हिस्सों की तरह लॉकडाउन लगा हुआ है लेकिन दूरदराज के ऐसे गांव जिन की सीमाएं आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को छूती भी हैं वहां से बसों का भी संचालन नहीं रोका जा सका है। हाल ही में सवारियों को अवैध रूप से ढोते हुए बस्तर पुलिस ने एक बस को पकड़ा था। यहां सीमाएं दूर-दूर तक बिना किसी चौकसी के फैली हुई है। ऐसे में जिला प्रशासन के लिये आंध्र और तेलंगाना से आने वालों पर सख्त निगरानी रखना जरूरी हो गया है।

लॉकडाउन में पेट्रोलियम का भाव बढऩा

जैसा कि लोगों ने अनुमान लगाया था पेट्रोल डीजल के दाम बंगाल सहित पांच राज्यों के चुनाव खत्म होने के बाद फिर बढऩे लगेंगे, ठीक वैसा ही हो रहा है। 27 फरवरी के बाद मई में लगातार तीन दिन से दाम बढ़ रहे हैं। यह तब हो रहा है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड आयल के दाम घटे हैं, जाहिर है चुनाव के दिनों में जो मुनाफा पेट्रोलियम कम्पनियां नहीं कमा सकीं, उसकी अब वे भरपाई कर रही हैं। वैसे पूरे प्रदेश में इस समय लॉकडाउन लगा हुआ है। लोग घरों से निकल नहीं हैं। गाडिय़ों में पेट्रोल भरवाने की जरूरत नहीं पड़ रही है, पर मालवाहक तो चल रहे हैं। डीजल के दाम जो बढ़े हैं उसके चलते महंगाई तो बढ़ेगी ही।


07-May-2021 5:23 PM (310)

जैसा बाप, वैसी बेटी...

बहुत से माता-पिता ऐसे रहते हैं जिनके कामों से उनके बच्चों का सम्मान बढ़ता है। बहुत से बच्चे ऐसे रहते हैं जिनके कामों से उनके मां-बाप का सम्मान बढ़ता है। लेकिन एक तीसरी दुर्लभ किस्म और रहती है जिसमें बच्चों का सम्मान बढ़ाने वाले मां बाप को बच्चों की वजह से भी सम्मान मिलता है । दोनों के काम ऐसे रहते हैं कि दोनों पीढिय़ों के सम्मान में बढ़ोतरी होती रहती है। कोरोना से गुजरे प्रोफेसर दर्शन सिंह बल एक उसी किस्म के इंजीनियरिंग प्राध्यापक थे जिनका खूब सम्मान था। उन्होंने खूब काम किया था बहुत अच्छा काम किया था और नाम भी खूब कमाया था। अब उनके बच्चे अलग नाम कमा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में उनकी बेटी मनजीत कौर बल लगातार सामाजिक क्षेत्र में काम करते हुए परिवार का नाम भी रोशन कर रही है। इन दोनों ही पीढिय़ों की वजह से एक दूसरे के सम्मान में बढ़ोतरी हुई है। यह परिवार एक ऐसा दुर्लभ परिवार है जिसमें बेटी अगर सडक़ की लड़ाई से लेकर अदालत की लड़ाई तक लड़ रही है, तो भाई और माता-पिता कमर कसकर उसके साथ खड़े रहे कि वह इंसाफ की लड़ाई लड़ रही है, अपने स्वार्थ के लिए नहीं, दूसरों के लिए लड़ रही है। इंसाफ के लिए लडऩे वाले ऐसे परिवार बहुत कम देखने मिलेंगे जिनमें दोनों पीढ़ी सार्वजनिक मुद्दों को लेकर एक दूसरे के साथ इस हद तक खड़ी दिखती है। दर्शन सिंह बल और उनकी बेटी मनजीत कौर बल इसी किस्म के रहे। दर्शन सिंह बल के पढ़ाए हुए हजारों इंजीनियर छत्तीसगढ़ और देश भर में काम कर रहे हैं और उनके मन में बल सर के लिए जो इज्जत दिखती है वह बिल्कुल ही अनोखी है। मनजीत उन्हीं के सम्मान को आगे बढ़ा रही हैं।

बड़ी शादियां बड़ी सादगी से

कोरोनाकाल में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत की बेटी की तरह हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स राकेश चतुर्वेदी की बेटी की शादी भी बेहद सादगी से हुई। इसमें कोरोना नियमों का पूरी तरह पालन किया गया। चतुर्वेदी की पुत्री सौम्या, प्रतिष्ठित वकील हैं, और विवेकानंद फाउंडेशन से जुड़ी हैं। जबकि दामाद जयराज पंड्या पार्लियामेंट में रिसर्च स्कॉलर हैं, और गुजरात के कांग्रेस नेता के परिवार से हैं। जयराज के दादा माधव सिंह सोलंकी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं। कोरोना के खतरे को देखते हुए दोनों परिवार से सिर्फ 11-11 लोग शामिल हुए। शादी से पहले परिवार के सभी सदस्यों का कोरोना टेस्ट हुआ, और सभी की रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद धार्मिक व सामाजिक रीति रिवाजों के मुताबिक शादी हुई। कोरोना काल में प्रभावशाली लोगों के यहां सादगी के साथ विवाह से संदेश भी गया है।

शादी में शामिल ज्यादातर कोरोना की चपेट में

कोरोना के फैलाव के चलते शादी-विवाह में अतिरिक्त सतर्कता बरतना बेहद जरूरी है। शादी-ब्याह में इसको नजर अंदाज करना भारी भी पड़ रहा है। ऐसे ही कोंडागांव से सटे एक गांव में पिछले दिनों एक शादी समारोह में सामाजिक दूरी का पालन न करना, और बिना मास्क के घूमना लोगों के लिए मुसीबत बन गया। और शादी में शामिल होने वाले गांव के ज्यादातर लोग कोरोना की चपेट में आ गए हैं। आदिवासी इलाकों में वैसे भी चिकित्सा सुविधा की बेहद कमी है। ऐसे में अब कोरोना संक्रमण के चलते आदिवासी इलाकों में बड़ी संख्या में मौतें भी हो रही हैं।

महासमुंद का राज क्या है?

वैसे तो छत्तीसगढ़ अड़ोस-पड़ोस के आधा दर्जन दूसरे राज्यों से घिरा हुआ है, और इनमें से हर राज्य से छत्तीसगढ़ की सडक़ें जुड़ी हुई है. ओडीशा जैसे राज्य ऐसे भी हैं जहां से छत्तीसगढ़ के कई-कई जिलों में आना जाना होता है। लेकिन ऐसे में महासमुंद जिला अकेला ऐसा है जहां पर पिछले साल-दो साल से औसतन हर हफ्ते एक या अधिक बार गांजे से भरी हुई गाडिय़ां पकड़ आती हैं, और नगदी नोटों से भरी हुई गाडिय़ां भी। इतनी बड़ी-बड़ी नगद रकम से लदी हुई गाडिय़ां सिर्फ इसी एक जिले में कैसे पकड़ आती हैं यह हैरानी की बात है, या फिर इस बात पर हैरानी की जाए कि बाकी जिलों में ऐसी गाडिय़ां पकड़ में क्यों नहीं आती हैं? क्योंकि महासमुंद जिला ओडिशा से जुड़ा हुआ तो है लेकिन छत्तीसगढ़ के एक दर्जन से ज्यादा जिले दूसरे प्रदेशों के जिलों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में सिर्फ महासमुंद में इतना गांजा पकड़ाना और इतनी नगद पकड़ाना, वहां की पुलिस के सक्रिय होने का एक सबूत तो है। अब जांच का मुद्दा यह हो सकता है कि क्या बाकी जिलों में पड़ोस के राज्यों से तस्करी नहीं होती है, कम होती है, या उन जिलों के सरहद पार के जिलों से तस्करी का कोई धंधा चलता नहीं है?

कारखाने में टीकाकरण का फायदा

हाईकोर्ट के आदेश के बाद 18 प्लस के लोगों को वैक्सीन लगने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि वैक्सीन को लेकर ग्रामीण इलाकों में काफी हिचक भी है। मगर कोरोना से बचने के लिए यही उपाय है। कई निजी उद्योगों ने अपने कर्मचारियों को स्वयं के खर्च पर वैक्सीन लगाना शुरू कर दिया है। एक बड़े उद्योग में वैक्सीनेशन से काफी फायदा भी हुआ है।

सिलतरा के एक बड़े स्टील उद्योग में पिछले कुछ महीनों में कोरोना से कई कर्मचारियों की मौत हो गई थी। इसके बाद उद्योग समूह ने सभी कर्मचारियों के लिए वैक्सीन अनिवार्य कर दिया। करीब ढाई हजार कर्मचारियों का वैक्सीनेशन हो चुका है। वैक्सीनेशन के बाद यह बात सामने आई है कि जिन डेढ़ हजार कर्मचारियों को पहला डोज लगा है, उनमें से कुछ संक्रमित जरूर हुए, लेकिन जान का जोखिम नहीं था। जिन एक हजार कर्मचारियों को दूसरा डोज लग चुका है, उनमें से कोई भी संक्रमित नहीं है। कुल मिलाकर वैक्सीनेशन ही कोरोना से बचाव का उपाय है।

को वैक्सीन लगी या कोविशील्ड

कोई भी ऐसी बात जो वैक्सीनेशन के प्रति लोगों में झिझक पैदा करे उजागर करना ठीक नहीं लगता। सोशल मीडिया पर वैसे भी बहुत सी नकारात्मक बातें लगातार आ रही हैं। पर कुछ तथ्य सामने हों तो कैसे रुका जा सकता है। इस समय राज्य में दो तरह की वैक्सीन उपलब्ध है। को वैक्सीन और कोविशील्ड। विशेषज्ञों का कहना है कि पहला डोज और दूसरा डोज समान वैक्सीन ली जाये। पर जगदलपुर के एक स्कूल में टीका लगवाकर लौटे लोग तब चिंता में पड़ गये जब उन्होंने अपने मोबाइल पर मैसेज देखा कि कोविशील्ड का डोज आपने सफलतापूर्वक लगवा लिया। दरअसल, इस सेंटर में कोवैक्सीन लगाई जा रही थी। कुछ समझदार लोगों ने तो देख लिया कि उन्हें को-वैक्सीन लगाई  जा रही है। टीकाकरण अधिकारी से उन्होंने सवाल-जवाब भी किया कि ऐसा क्यों हो रहा है? अधिकारी ने कहा कि ऐप में तकनीकी दिक्कत के कारण हो गया आप दूसरी डोज भी को वैक्सीन की ले सकते हैं। पर चिंता में वे लोग हैं जिन्होंने यह नहीं देखा कि कौन सी वैक्सीन लगाई गई है।

कोरोना से लड़ें, आपस में नहीं

कोरोना महामारी के लम्बी आपदा में डॉक्टर और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी, कर्मचारी लगातार बिना थके, रुके काम कर रहे हैं। कम उपकरण व मानव संसाधन के बीच अधिक से अधिक मरीजों को देखें, बेहतर इलाज हो, ज्यादा से ज्यादा लोगों का टेस्ट हो जाये उनकी कोशिश चल रही है। कई डॉक्टर बता रहे हैं उन्होंने महीनों से छुट्टी नहीं ली। एक दिन में 12 घंटे, 14 घंटे काम करना पड़ रहा है। पीपीई किट में लदे होने के बावजूद कई लोग संक्रमित होते जा रहे हैं, कुछ की मौत भी हो रही है।

कुछ ऐसी ही निरंतर ड्यूटी प्रशासनिक सेवा से जुड़े अधिकारी और उनके अधीनस्थ कर रहे हैं। काम का दबाव, तनाव इतना है कि काम तो सभी कर रहे हैं पर एक दूसरे से उलझ भी जाते हैं और स्थिति अप्रिय हो जाती है। रायपुर में हाल ही में ऐसी घटनायें हो चुकी हैं। मुंगेली में एक एसडीएम ने स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को थप्पड़ मारने की धमकी तक दे डाली। वैक्सीनेशन के लिये नहीं निकलने पर धमकाते हुए पुलिस का वीडियो बीते माह तो सामने आ ही चुका है।

मध्यप्रदेश के इंदौर में तो डॉक्टरों ने वहां के कलेक्टर के खिलाफ काम बंद आंदोलन ही शुरू कर दिया है। वे कलेक्टर पर दुर्व्यवहार का आरोप लगा रहे हैं और उनको हटाने की मांग पर अड़े हैं। दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट का भी ध्यान इस ओर गया कि लगातार कोविड महामारी से बचाव से जुड़े लोगों की मानसिक दशा क्या हो रही है। कोर्ट ने कहा कि वे थक भी सकते हैं। कहा- उनकी जगह पर दूसरे खाली बैठे डॉक्टरों और नर्सों को तैयार क्यों नहीं रखा जाता? सरकार का पूरा जोर अभी वैक्सीनेशन पर और ऑक्सीजन बेड बढ़ाने पर ही है। जो स्टाफ लगातार ड्यूटी कर रहे हैं, उनकी सेहत कैसे ठीक रहे। उन पर किस सीमा तक बोझ डाला जाये इस पर भी गंभीरता से विचार करना जरूरी दिखाई दे रहा है। प्राय: हर बड़े सरकारी अस्पताल के अधीक्षक, डीन बता रहे हैं कि उनके यहां स्टाफ की कमी है। नई पदस्थापना और नियुक्तियां तेजी से नहीं की जा रही है। आसार तो यही दिखाई दे रहे हैं कि कोरोना पीडि़तों से अस्पताल जल्दी खाली नहीं होने वाले हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि अब एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के छात्रों को कोविड ड्यूटी में लगाया जायेगा। महामारी से निपटने के अभियान में लगे लोगों को थोड़ा विश्राम, थोड़ी राहत बीच-बीच में मिलती रहे तो नतीजे ज्यादा बेहतर मिल सकते हैं।


06-May-2021 5:57 PM (194)

नेतागिरी के लिए बेलने पड़ रहे पापड़

कोरोना लॉकडाउन के कारण तमाम गतिविधियां बंद हैं। लिहाजा राजनीतिक गतिविधियां भी बयानबाजी तक सीमित हो गई है। विशेष मौकों पर राजनीतिक दल के लोग घर से विरोध- प्रदर्शन कर रहे हैं। घर से धरना-प्रदर्शन करना कई मामलों में आसान है तो कई मामलों में चुनौतीपूर्ण भी है। क्योंकि तख्ती, बैनर-पोस्टर और झंडों का जुगाड़ करना पड़ता है। इसके अलावा तखत, गद्दा-तकिया और कुर्सी टेबल का इंतजाम करना होता है। पिछले तकरीबन एक साल से ऐसी स्थिति तो है तो बड़े नेताओं ने तो ये व्यवस्था कर ली है, लेकिन समस्या उस वक्त आती है, जब धरना-प्रदर्शन के लिए पोस्टर लिखना होता है। चूंकि दुकानें बंद है, तो फ्लैक्स या पोस्टर तैयार नहीं हो पाते।  संसाधन और धन-बल से परिपूर्ण बड़े नेताओं ने तमाम साजो-सामान की परमानेंट व्यवस्था कर ली है, दिक्कत उनके लिए ज्यादा है, जिन्होंने नेतागिरी में नया-नया कैरियर शुरु किया है। ऐसे लोगों के पास बजट की भी कमी रहती है, लिहाजा वे बड़े नेताओं की परमानेंट व्यवस्था भी नहीं कर सकते। नेतागिरी में चमकना है तो धरना-प्रदर्शन भी जरूरी है। ऐसे लोग सीमित संसाधनों में काम चलाते हैं। कोई बैनर-पोस्टर की जगह खुद की लिखी तख्तियों से काम चलाते हैं, तो कोई घर के स्कूली बच्चों के ब्लैक बोर्ड या स्लेट पर नारे लिखकर धरना-प्रदर्शन करते हैं। ऐसे कार्यक्रमों की तस्वीर आती है तो पता चलता है कि नए-नवेले और कम संसाधन वाले कार्यकर्ता नेता बनने के लिए कितने पापड़ बेल रहे हैं। इतना ही नहीं, तस्वीरें और भी कई बातों को उजागर कर देती हैं। मसलन कोई बरमुड़ा पहन के धरना दे रहे हैं, तो कोई घर के छत पर प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं। कुल मिलाकर कोविड के इस दौर ने चुनौतियों के साथ उससे निपटने के तरीके भी सिखा दिए हैं। इसलिए तो कहा जाता है कि संघर्ष के दिन पाठशाला होती है।

पत्रकारों की नाउम्मीदी

छत्तीसगढ़ में कोरोना टीके को लेकर विवाद बना हुआ है। राज्य सरकार के 18 प्लस के टीकाकरण के लिए अति गरीबों को प्राथमिकता देने के नियम को कोर्ट से झटका लगा है। हालांकि विपक्ष ने इस नियम के कारण सरकार को घेरने की कोशिश की थी। कहा जा सकता है कि कोर्ट के आदेश के बाद सरकार विरोधियों को एक तरह से सफलता मिली है। कुल मिलाकर ऐसे में राज्य में टीकाकरण अभियान का प्रभावित होना तय है। इसका असर यह होगा कि राज्य में कोरोना को रोकने की कोशिशों को भी झटका लग सकता है। खैर, सियासी और कोर्ट से परे टीकाकरण को लेकर छत्तीसगढ़ के मीडियाकर्मी भी नाराज है। सोशल मीडिया पर मीडियाकर्मियों की नाराजगी साफ देखी जा सकती है। दरअसल, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और पंजाब जैसे कई राज्यों ने मीडियाकर्मियों को फ्रंटलाइन वर्कर मानते हुए टीका में प्राथमिकता देने का ऐलान कर दिया है। ऐसे में यहां के पत्रकारों को भी उम्मीद थी कि छत्तीसगढ़ सरकार भी ऐसा कुछ फैसला ले सकती है, क्योंकि छत्तीसगढ़ सरकार में पत्रकार बिरादरी को अच्छा-खासा प्रतिनिधित्व मिला है। इसके बावजूद पत्रकार हित में ऐसा कोई फैसला अब नहीं लिया जा सका है। लिहाजा पत्रकारों की उम्मीद को भी झटका लगा है। जबकि इसके लिए पत्रकार संघ की तरफ से पहल की गई और मुख्यमंत्री से पत्राचार किया गया। पत्रकारों को टीका में प्राथमिकता मिलने की संभावना उस वक्त और क्षीण होती दिखाई दे गई, जब कुछ उत्साही पत्रकारों ने इसके लिए विपक्ष से समर्थन की मांग कर डाली और पूर्व सीएम से सरकार को पत्र लिखवा दिया कि पत्रकारों को फ्रंट लाइन वर्कर का दर्जा दिया जाए। अब तो वे पत्रकार भी निराश हो गए हैं, जो सरकार से बातचीत कर रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे थे, क्योंकि विपक्ष की बात को सरकार मानेगी, इसकी संभावना कम ही दिखाई पड़ती है।

गलतफहमी झोलाछाप डॉक्टर करें दूर?

प्रदेश एक तरफ तो टीकाकरण अभियान में वैक्सीन की कमी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, मितानिनों को जोखिम उठाना पड़ रहा है। कुछ दिन पहले गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में एक मितानिन पर लाठियों से हमला कर दिया गया था। कुछ गांवों में वैक्सीनेशन करने गई टीम को गांव वालों ने भीड़ इक_ी कर भगा दिया। अंबिकापुर से भी सोमवार को खबर आई कि टीके के लिए प्रेरित करने गए हेल्थ वर्कर्स के साथ मारपीट की गई और उनसे किट छीन लिया गया। बिलासपुर जिले के गनियारी से भी कल खबर आई है कि वहां वैक्सीनेशन टीम को महिलाओं ने गाली गलौज करके भगा दिया।

ऐसी ही घटनाएं कुछ अन्य जिलों में भी हो रही हैं। ज्यादातर स्थानों से ग्रामीणों के विरोध की वजह भी सामने आ रही है। उन्हें गलतफहमी या डर है कि टीका लगवाने से वे बीमार पड़ सकते हैं और जान भी जा सकती है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की टीम यह बात नहीं छुपा रही है कि टीका लगवाने के बाद बुखार आता है पर वे साथ ही यह भी बता रहे हैं कि इसका 24 घंटे तक ही असर रहता है। दरअसल वे स्वास्थ्य के लिए काम करने वाले सरकारी महकमे पर भरोसा ही नहीं कर रहे हैं। गांवों में झोलाछाप डॉक्टरों और झाड़-फूंक करने वालों की पैठ बनी हुई है। क्या अब ग्रामीणों को समझाने के लिये इन्हीं लोगों को लगा दिया जाये?

रिपोर्ट में देरी, इलाज में देरी, और फिर मौत

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोविड महामारी से संबंधित स्वत: संज्ञान याचिका पर सुनवाई शुरू की तो बहुत सी हस्तक्षेप याचिकाएं भी दायर हो गईं। इस वक्त चर्चा सिर्फ तीसरे चरण के वैक्सीनेशन को लेकर है जिसमें 18 साल से 44 साल के लोगों को टीका लगाया जाना है। इस पर क्या दिशा निर्देश मिलता है यह अगली सुनवाई के बाद ही पता चलेगा। इधर कोर्ट ने पिछली सुनवाई में कुछ और जरूरी निर्देश सरकार को दिए थे। एक महत्वपूर्ण आदेश यह भी था की आरटी पीसीआर जांच की रिपोर्ट तत्काल टेस्ट कराने वाले को दी जाए ताकि समय पर उपचार मिल सके। अभी स्थिति यह है कि एंटीजन जांच रिपोर्ट तो तुरंत मिल जाती है लेकिन आरटीपीसीआर के लिए कहा जाता है कि मोबाइल फोन पर मैसेज आएगा। अमूमन 4 से 5 दिन तो इस रिपोर्ट में लग ही रहे हैं। कई संदिग्धों को दस-दस दिन तक रिपोर्ट नहीं मिलती। ऐसे केस भी आए हैं जिनमें मरीज संक्रमित होने के बाद स्वस्थ हो चुका पर उसके बाद रिपोर्ट मिली। पीडि़त बताते हैं कि कई मौतें जांच रिपोर्ट की देरी के चलते भी हो रही हैं क्योंकि इलाज भी देर से शुरू किया गया। उनका कहना है कि जिस तरह से अस्पतालों में बेड और कोविड केयर सेंटर बनाने के लिए कवायद की जा रही है, उसी तरह से ज्यादा से ज्यादा आरटीपीसीआर  जांच के लिए लैब और स्टाफ बढ़ाना चाहिए। अभी एक बड़े जिले पर कई छोटे जिलों का बोझ है। 

शराब दुकान खुलने से ही मानेंगे?

बीते साल भी लॉकडाउन में रायपुर में शराब की जगह जहर पी लेने के कारण 3  लोगों की मौत हो गई थी। पिछले दिनों फिर स्प्रिट पी लेने की वजह से दो की मौत हो गई और एक गंभीर हालत में पहुंच गया। अब बिलासपुर जिले से इनसे भी बड़ी घटना सामने आई है। यहां महुआ शराब में अल्कोहलयुक्त होम्योपैथी सिरप मिलाकर पीने से चार लोग अपनी जान गवां बैठे। दो लोग गंभीर बीमार है, जिनका इलाज चल रहा है। पिछले लॉकडाउन में कुछ रियायत थी। सरकार ने इस बार कम से कम यह मान तो लिया है कि शराब दुकानों में भीड़ की वजह से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ता है। लेकिन इन मौतों की आड़ में मदिरा प्रेमी सरकार पर दबाव भी बढ़ा सकते हैं। अवैध शराब का जुगाड़ करने में काफी खर्च भी हो रहा है और जान का खतरा भी बना हुआ है। लॉकडाउन उनकी उम्मीद से ज्यादा लंबा खिंचता जा रहा है, इसलिए थोड़ा रहम करें।


05-May-2021 5:51 PM (222)

कुत्तों की तरह गाडिय़ों को भी टहलाने का काम

कोरोना लॉकडाउन के चलते हुए कई अलग किस्म की दिक्कतें सामने आ रही हैं। लोग खुद को सुरक्षित रखने घरों में कैद हैं, तो उनकी गाडिय़ां भी घर में धूल खा रही है। जिसके कारण गाडिय़ों की बैटरी डाउन हो रही है और बैटरी चार्ज करने वाली दुकानें भी बंद है। ऐसे में लोगों के सामने खुद को और गाडिय़ों को भी सुरक्षित रखने की चुनौती है। कुछ लोग समझदारी दिखाते हैं, जो रोज सुबह कुत्ता टहलाने के अंदाज में गाडिय़ों को टहलाने निकलते हैं। 2-4 किलोमीटर का एक चक्कर लगा रहे हैं। ऐसा करने से जैसे कुत्ते की सेहत ठीक रहती है वैसे ही गाडिय़ां भी दुरूस्त रहती है। ऐसा करने वालों अपनी गाडिय़ों को दूसरे संभावित खतरे से बचा रहे हैं, क्योंकि लॉकडाउन के कारण चाय ठेले और छोटे होटल भी पूरी तरह से बंद हैं, जिसके कारण वहां की जूठन से पलने वाले चूहों की बड़ी फौज रिहायशी इलाकों में खाने की तलाश में भटक रहे हैं। कई जगहों पर चूहों ने कार और दूसरी गाडिय़ों को अपना ठिकाना बना लिया है और वे गाडिय़ों के तार और सीटों को कुतर रहे हैं। इसलिए उनकी गाडिय़ों की सेहत तो ठीक है जो रोज टहलाने निकल रहे हैं या फिर गाडिय़ों को हिला-डुला रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं करने वाले जब गाड़ी का उपयोग शुरु करेंगे तो जरूर उनके सामने कई तरह की चुनौती होगी।

दवाइयों की महंगी कीमत से गरीब की आह

करोना महामारी के चलते अस्पतालों या बड़े डॉक्टरों के खिलाफ बहुत से लोगों की नाराजगी देखने को मिल रही है। दरअसल, वे कई ऐसी दवाइयां लिख रहे हैं, जो केवल उन्ही के अस्पताल के मेडिकल स्टोर में मिल रहे हैं। जबकि दूसरे ब्रांड की वही दवाइयां बाजार में सस्ते दामों में उपलब्ध है, लेकिन मरीज की मजबूरी होती है कि वे वही कंपनियों के दवाइ ले जो डॉक्टर ने लिखी है। इसी तरह महामारी के इस दौर में ऑक्सीमीटर, थर्मामीटर के दाम भी आसमान छू रहे हैं, क्योंकि उनकी भारी डिमांड है। मेडिकल स्टोर वाले भी ऐसे सामानों को रखने में अधिक दिलचस्पी दिखाते हैं, जिनकी कीमत ज्यादा हो, ताकि वो ज्यादा मुनाफा कमा सकें। लेकिन आज जब बाजार चारों तरफ बंद है और सामान कम बिक रहे हैं, उस हालत में भी दवाइयों की बिक्री पहले से कई गुना बढ़ चुकी है और अधिकतम बिक्री मूल्य किसी भी तरह से कम नहीं हुआ है। इसलिए गरीबों के लिए दवाइयां पहुंच से बाहर हो रही हैं और उनके दिल से बड़े अस्पतालों में बड़े डॉक्टरों या महंगी दवाइयों के खिलाफ आह निकल रही है।

मुफ्त राशन और वैक्सीनेशन

हाईकोर्ट ने 18 प्लस वालों को वैक्सीनेशन के मामले में राज्य सरकार को नई पॉलिसी बनाने के लिए कह दिया है। वरना कोरबा जिले के कई सोसायटियों से अंत्योदय राशन कार्ड धारकों को राशन ही नहीं मिल पाता। हुआ यह कि बालको नगर इलाके के लालपाट में अंत्योदय टीकाकरण केंद्र का उद्घाटन था। मगर इस ऑनलाइन कार्यक्रम में कोई पहुंचा ही नहीं। नाराज फूड विभाग ने राशन दुकानदारों के लिए फरमान जारी कर दिया कि जो वैक्सीन लगवाएगा,  उसी को राशन मिलेगा। मई और जून महीने का पीडीएस राशन बीपीएल परिवारों को मुफ्त दिया जाना है। पर उन्हें पहले वैक्सीन लगवाने कहा गया। कोरबा शहर और कुछ ग्रामीण इलाकों से ऐसी शिकायत आ रही थी।

इसी जिले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने एक अजीबोगरीब फरमान जारी कर दिया। उन्होंने आदेश दिया कि कोरोना के इलाज के लिए दूसरे जिले से आने वाले मरीजों को बिना कलेक्टर के आदेश के किसी अस्पताल में भर्ती नहीं किया जाएगा। नजदीकी जांजगीर-चांपा जिले में कोरबा के मुकाबले स्वास्थ्य सुविधाएं बहुत कम है। सीएमएचओ के इस फरमान से इस जिले के मरीजों को बड़ी परेशानी होने लगी। विधायक सौरभ सिंह इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट चले आए। अब हाईकोर्ट ने भी इस फरमान को गलत बताया और सीएमएचओ को फटकार लगाई। अब वहां अन्त्योदय कार्डधारकों के मुफ्त राशन का संकट भी नहीं और न ही दूसरे जिले के मरीजों को भर्ती होने से रोका जा सकेगा।

यह सही है कि टीकाकरण और कोविड मरीजों के इलाज को लेकर प्रशासन और विशेषकर स्वास्थ विभाग काफी दबाव में है। इसके बावजूद आदेश तो कानून के दायरे में रहकर ही निकालना होगा?

लॉकडाउन का शपथ समारोह

यह अलग तरह का समारोह था, जिसमें कोई टेंट-पंडाल, स्वल्पाहारा नहीं था। न अतिथि थे, न भीड़ थी। छत्तीसगढ़ शासन ने पेंड्रा नगर पंचायत में ओमप्रकाश बंका को एल्डरमैन बनाया है। कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन के चलते किसी तरह का समारोह वर्जित है लेकिन उनका शपथ लेना भी जरूरी था। शपथ दिलाने वाले अधिकारी हर वक्त टीकाकरण और मरीजों के इलाज से जुड़े काम में व्यस्त हैं। तब गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के एसडीएम ने बंका को ड्यूटी के दौरान ही रास्ते में रुक कर शपथ दिला दी। नगर पंचायत अध्यक्ष सहित चार लोगों की सोशल डिस्टेंस के साथ उपस्थिति में। खास बात यह भी रही कि बंका ने पद और गोपनीयता के अलावा कोविड टीकाकरण के लिए लोगों के बीच जागरूकता लाने का भी  प्रण लिया है।

एक ही दिन में 7 हजार केस!

कोरोना संक्रमित मरीजों का आंकड़ा वैसे तो लगातार अपडेट किया जाना है पर ज्यादातर जिलों में ऐसा हो नहीं रहा है। सुविधानुसार आगे-पीछे की तारीखों में जोड़ लिये जाते हैं। संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित जिलों में एक दुर्ग में ऐसी ही एक घटना सामने आई है । 2 मई को जहां सक्रिय मरीजों की संख्या करीब 4 हजार थी तो एक ही दिन बाद 3 मई को यह बढक़र 11 हजार से अधिक हो गई। एक ही दिन में अचानक 7 हजार नये मामले आने की पड़ताल की गई तो पता चला कि निजी अस्पतालों का डेटा कई-कई दिन तक अपलोड नहीं किया जा रहा था, खास करके आरटी पीसीआर टेस्ट का डेटा। मालूम तो यह भी हुआ है कि जब एक दिन में दुर्ग में  संक्रमण के मामले दो हजार के आसपास जाने लगे तो निजी लैब और अस्पतालों से मिलने वाले आंकड़ों को दर्ज करना बंद कर दिया गया था। कोशिश ये थी कि आने वाले दिनों में जब मरीज कम होंगे, तब यह समायोजित कर दिया जाएगा। पर ऐसा हो नहीं रहा। और आखिरकार रुकी हुई नामों को भी सूची में दिखाना पड़ा।