राजपथ - जनपथ

Date : 08-Mar-2019

विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा लोकसभा प्रत्याशी चयन में अतिरिक्त सतर्कता बरतती दिख रही है। आरएसएस के पुराने नेताओं से रायशुमारी की जा रही है। सुनते हैं कि केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पार्टी हाईकमान को पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल को रायपुर लोकसभा से टिकट देने का सुझाव दिया है। हालांकि बृजमोहन मौजूदा हालात में चुनाव नहीं लडऩा चाहते हैं। कम से कम उन्होंने अपने करीबियों को ऐसा ही संकेत दिया है। 
जिस तरह नेता प्रतिपक्ष के चयन में उनकी दावेदारी को नजरअंदाज किया गया, उसके बाद से वे पार्टी गतिविधियों में कोई खास रूचि लेते नहीं दिख रहे हैं। अमित शाह के कार्यक्रम के दौरान भी नजर नहीं आए। यह कहा गया कि वे एक शादी में शामिल होने पुरी गए हैं। खैर, तमाम अटकलों के बाद भी मौजूदा सांसद रमेश बैस की टिकट काटना आसान नहीं होगा। वे सात बार के सांसद हैं। कभी उन पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे। उन्होंने काम चाहे किसी का न किया हो, कभी किसी का अहित भी नहीं किया। हल्ला तो यह भी है कि रायपुर लोकसभा के प्रभारी पूर्व सांसद अशोक शर्मा ने तो पार्टी के रणनीतिकारों को कह दिया है कि बैस ही सबसे बेहतर प्रत्याशी होंगे। अब जब भूपेश बघेल के सीएम बनने के बाद छत्तिसढिय़ावाद हावी हुआ है, उससे तमाम अंतर्विरोधों के बाद भी पार्टी के रणनीतिकारों को भी बैस का कोई विकल्प नहीं दिख रहा। 

ट्रांसफर का रिकॉर्ड

आखिरकार आईएएस चंद्रकांत उइके को संस्कृति संचालक के प्रभार से मुक्त कर दिया गया। उनकी जगह आईएफएस अफसर अनिल साहू की पदस्थापना की गई। इस फेरबदल के पीछे मुक्ताकाशी मंच में ओड्री मागधी कार्यक्रम को लेकर विवाद मुख्य वजह रही है। पहले ओडिसी के प्रख्यात कलाकारों को बुलाया गया था। उन्हें भुगतान भी कर दिया गया। बाद में स्थानीय कलाकारों का कार्यक्रम कराने की बात कहकर ओडिसी का कार्यक्रम पहले स्थगित कर दिया गया। बाद में इसको लेकर विवाद बढ़ा, तो सीएम के हस्तक्षेप के बाद ओडिसी नृत्य का कार्यक्रम हो पाया। सुनते हैं कि इस पूरे आयोजन को लेकर इतनी अफरा-तफरी मची हुई थी कि बाहर से आए कलाकारों को प्रैक्टिस के लिए जगह भी ठीक से उपलब्ध नहीं कराई गई। उनके पैरों में फफोले पड़ गए। इस पूरे आयोजन में संस्कृति विभाग के अफसरों का गैर जिम्मेदाराना रूख सामने आया। इसके बाद उइके से संस्कृति संचालक का अतिरिक्त प्रभार ले लिया गया। उनकी जगह मंत्री की पसंद पर अनिल साहू की पदस्थापना की गई। हालांकि अनिल स्थानीय साहू न होकर ओडिशा के रहने वाले हैं। इस तरह चंद्रकांत उइके ने ट्रांसफर का एक नया रिकॉर्ड भी कायम किया, उनकी जितने बरस की नौकरी रही है, उतने बार ट्रांसफर हो चुका है।
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Date : 07-Mar-2019

भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की कर्जमाफी का फैसला तो कर लिया था, लेकिन इसका क्रियान्वयन आसान नहीं था। अपैक्स बैंक के कुछ अफसरों का रोड़ा तो था ही, बाकी बैंकर्स भी परेशानी खड़ी कर रहे थे। ऐसे में सीएम के पीएस गौरव द्विवेदी ने कर्जमाफी योजना के क्रियान्वयन का जिम्मा खुद अपने हाथों में लिया। सुनते हैं कि सबसे पहले उन्होंने अपैक्स बैंक के अफसरों को बुलाया और उनमें से एक को जमकर फटकार लगाई। 
गौरव खुद आईटी एक्सपर्ट हैं और केन्द्र सरकार की 'माईगवडॉटइन' (मेरी सरकार) परियोजना के मुख्य सूत्रधार रहे हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ में पीडीएस के कम्प्यूटराईजेशन का श्रेय दिया जाता है, इसके लिए उन्हें प्रधानमंत्री अवार्ड तक मिल चुका है। उन्होंने इस पूरी योजना की डे-टू-डे मॉनिटरिंग की और कर्जमाफी के काम में बैकिंग व्यवस्था में आ रही दिक्कतों को दूर करने ठोस पहल की। कर्जमाफी का क्रियान्वयन तीन चरणों में करने का फैसला लिया गया। पहले चरण में जिन किसानों से लिकिंग के लिए राशि ली गई थी उनकी राशि लौटाना था। यह काम सफलतापूर्वक हुआ, तो अगले चरण में किसानों की अल्पकालीन ऋण माफी की गई।
तीसरे चरण में 25 सौ रूपए क्विंटल समर्थन मूल्य देने के फैसले के बाद डिफरेंस की राशि किसानों के खाते में जमा की गई और वर्तमान में किसानों के द्वारा व्यावसायिक बैंकों से लिए गए कर्जा माफी की कार्रवाई चल रही है। यह सब काम बिना शोरगुल के हो गया, जबकि मध्यप्रदेश और राजस्थान में कर्जमाफी की घोषणा के बाद भी क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। मध्यप्रदेश में तो कर्जमाफी के लिए किसानों से फॉर्म जमा कराए जा रहे हैं, लेकिन यहां बिना किसी बाधा के किसानों की कर्जमाफी के लिए खुद राहुल गांधी, भूपेश बघेल की पीठ थपथपा चुके हैं। प्रचार-प्रसार से दूर रहकर चुपचाप काम करने की प्रवृत्ति गौरव द्विवेदी को दूसरों से अलग बनाती है। 

सीएम के तेवरों से हुआ काम
कहावत है 'भय में होत न प्रीत' यानी बिना डर के कोई काम नहीं होता। सीएम भूपेश बघेल को कई मौकों पर अपने तेवर दिखाने पड़े हैं। हुआ यूं कि सरकार ने छोटे भूखण्डों की रजिस्ट्री की इजाजत देने का फैसला ले लिया था। बिना किसी दिक्कत के डायवर्शन होना था, लेकिन पेचीदगियां इतनी थीं कि काम नहीं हो रहा था। इसकी शिकायत मिलने पर सीएम ने रिवेन्यू और रजिस्ट्रेशन के आला अफसरों को तलब किया। 
सुनते हैं कि अफसरों ने उन्हें दिक्कतें गिनानी शुरू कीं। सीएम ने उन्हें टोका और शाम तक ऑर्डर निकालने के निर्देश दिए। उन्होंने यह तक कह दिया कि यदि इसमें कोई कानूनी उलझन पैदा कर रोकने की कोशिश की गई, तो उन्हें हटा दिया जाएगा। सीएम के तेवर देख हड़बड़ाए अफसर तुरंत दिक्कतों को दूर करने में जुट गए। शाम तक ऑर्डर भी निकल गया। अब हाल यह है कि छोटे भूखण्डों की रजिस्ट्री तेजी से होने लगी है। एक जानकारी के मुताबिक प्रदेश में अब तक साढ़े 11 हजार रजिस्ट्रियां हो चुकी है और सरकार को करीब 4 सौ करोड़ राजस्व की प्राप्ति हुई है। पिछले कई बरसों से मंदा पड़ा जमीन का कारोबार अब चमक रहा है। लेकिन सरकार और बाजार की कमाई से परे सबसे बड़ी राहत उन छोटे भू-स्वामियों को हुई है जो परिवार की जरूरतों के लिए भी अपनी जमीन नहीं बेच पा रहे थे, पूरे प्रदेश के ऐसे लाखों लोगों की दुआ सरकार को मिल रही है। घर में शादी, इलाज, बच्चों की पढ़ाई, या मकान बनाने के लिए भी लोग अपनी खुद की जमीन नहीं बेच पा रहे थे।

चुनाव और एक नया धंधा
चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है, कई किस्म के कारोबार चल निकलेंगे। झंडा-डंडा तो परंपरागत पुराना धंधा हो गया है, अब छत्तीसगढ़ में इस चुनाव में एक संगठन ने एक नए किस्म की ट्रेनिंग देने का दावा किया है, और चुनाव में मदद करने का भी। इसने फेसबुक पर यह प्रचार किया है कि जो लोग सांसद, विधायक बनकर काम करना चाहते हैं, ऐसे लोगों को एक दिन का राजनीतिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए दो हजार रूपए देने होंगे, और इसके बाद छांटे हुए लोगों को चुनाव लडऩे के लिए फंड भी जुटाकर दिया जाएगा, दस हजार लोगों को भी साथ में जोड़ा जाएगा। इस संगठन ने अपने बारे में कोई जानकारी नहीं दी है, और फेसबुक पर इसका इश्तहार ही चल रहा है। आगे लोग अपनी समझदारी से फैसला करें।
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Date : 05-Mar-2019

अमित शाह गुरूवार को रायपुर में कार्यकर्ता सम्मेलन में शरीक होंगे। अब विधानसभा चुनाव में करारी हार का नतीजा यह रहा कि कार्यकर्ता अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष से मेल-मुलाकात के लिए उत्साहित नहीं दिख रहे हैं। यह नजारा सम्मेलन की तैयारी बैठक में देखने को मिला। इस बैठक में खुद प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक भी थे। 
सम्मेलन में व्यवस्था और फंड की बात आई, तो फंड मैनेजरों ने हाथ खड़े कर दिए। एक पूर्व मंत्री ने यह कह दिया, कि विधानसभा चुनाव निपटे दो माह ही हुए हैं। तब कौशिक ने कहा कि 15 साल प्रदेश में सरकार थी। सारी व्यवस्थाएं सरकार से हो जाती थी। कार्यकर्ता भी सरकारी हो गए थे। अब सरकार नहीं रह गई है, तो कार्यकर्ताओं को संसाधन जुटाकर व्यवस्था करनी होगी। ऐसा नहीं है कि सिर्फ फंड होने से ही भीड़ जुटती है। भाजपा के कई नेता ऐसे हैं जिनके व्यक्तिगत कार्यक्रम में हजारों की भीड़ जुटी है। 

कुर्सी पर न रहने पर भी...

सोमवार को महाशिवरात्रि के कार्यक्रम में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय के निवास पर हजारों की भीड़ जुटी। प्रेमप्रकाश पिछले 30 साल से अपने निवास पर महाशिवरात्रि की पूजा रखते आए हैं। इस बार भी उनके कार्यक्रम में न सिर्फ दुर्ग लोकसभा बल्कि अन्य जगहों से भी लोग आए। खास बात यह है कि उनका यह कार्यक्रम बिना आमंत्रण के होता है। यानी किसी को न्यौता नहीं दिया जाता। उनके समर्थक-विरोधी भी बिना बुलावे के उनके यहां पूजा में शामिल होने के बहाने मेल-मुलाकात के लिए पहुंचते हैं। प्रेमप्रकाश खुद किसी पद पर नहीं हैं, लेकिन उनके निवास पर जुटी भीड़ ने एहसास नहीं होने दिया। 
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Date : 04-Mar-2019

राजधानी रायपुर में सरकार की सबसे बड़ी योजना कमल विहार को लेकर अब यह सामने आ रहा है कि सैकड़ों करोड़ डुबा देने के बाद अब उस योजना को बंद किया जा रहा है। आरडीए के तहत बनी इस बड़ी कॉलोनी में लोगों को जमीनें बेची गईं, और यह बेचते समय आरडीए ने जो नक्शा लोगों को दिया, उसमें बहुत से बाग-बगीचे, बहुत से मैदान, और बहुत सी सार्वजनिक सुविधाएं भी थीं। लोगों ने इस भरोसे पर बाजार भाव से खासे महंगे प्लाट खरीदे, और जिन लोगों की जमीनें कमल विहार में गई थीं, उन लोगों को भी वहां पर 35 फीसदी जमीन दी गई थी। लेकिन आज एक कानूनी अड़चन यह खड़ी हो रही है कि अगर इस योजना के प्रकाशित और प्रचारित नक्शे में दिखाए गए हसीन सपने आरडीए पूरे नहीं करता है, तो क्या वह भी रेरा के घेरे में नहीं आ जाएगा? राज्य में एक भूतपूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड रेरा के चेयरमेन हैं, और वहां से बहुत से बिल्डरों, कॉलोनाइजरों को जुर्माना सुनाने, उनकी बिक्री रोकने की खबर आती है क्योंकि उन्होंने ग्राहकों से किए वायदे पूरे नहीं किए। अब आरडीए भी एक कॉलोनाइजर है, और वह अगर आमोद-प्रमोद की जगह का व्यवसायिक उपयोग करके कर्ज पटाना चाहता है, तो यह ग्राहकों के साथ वादाखिलाफी रहेगी, और इस धोखाधड़ी के खिलाफ उस पर बड़ा जुर्माना लग सकता है। जिस आरडीए के खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट तक गए हैं, उस आरडीए की कमल विहार की धोखाधड़ी को लोग छोड़ देंगे ऐसा लगता नहीं है। रेरा के दायरे में सिर्फ निजी कॉलोनियां और निजी हाऊसिंग-कारोबारी स्कीम नहीं आतीं, उसके दायरे में हाऊसिंग बोर्ड और आरडीए भी आते हैं। हाऊसिंग बोर्ड के बारे में घटिया निर्माण की खबरें रोज आ रही हैं, और किसी शिकायत पर उस पर भी रेरा की कार्रवाई हो सकती है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

खानपान की आजादी

खानपान को लेकर हिन्दुस्तान में अलग-अलग तबकों के बीच टकराव चलते ही रहते हैं। देश के एक सबसे अच्छे अखबार, द हिन्दू, के दफ्तर में तमिल ब्राम्हण मालिकों के मैनेजमेंट ने मांसाहारी टिफिन लाना बंद करवा दिया कि उससे शाकाहारी लोगों को दिक्कत होती है। यह अखबार देश में सहिष्णुता और सहअस्तित्व के सबसे बड़े हिमायतियों में से एक है, और ऐसे में उसका यह कायदा बहुत से लोगों को दकियानूसी, पाखंड लग रहा है। 
दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी देश में खानपान की आजादी की सबसे बड़ी वकालत करने वाली है, और इसके नेताओं के बीच एक अटपटी नौबत अभी कल सामने आ गई। रायपुर एयरपोर्ट पर मोतीलाल वोरा, पी.एल. पुनिया, और अखिल भारतीय कांग्रेस के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के सचिव हरनाम सिंह बैठे हुए थे। ऐसे में हरनाम सिंह जाकर चिकन खरीदकर ले आए, और खाने लगे। वहीं बैठे हुए मोतीलाल वोरा को यह अंदाज लगा कि यह चिकन है, तो वे कुछ विचलित हुए क्योंकि वे खाना भी प्याज-लहसून के बिना खाते हैं, और मांसाहार इतने करीब से देखने की उनकी आदत नहीं है। ऐसे में उनके भतीजे राजीव वोरा ने भी मीडिया से बयान में इन नेताओं के ऐसे बर्ताव पर कड़ी आपत्ति की, और कहा कि यह सामाजिक संस्कारों के भी खिलाफ है। 
अब दूसरी तरफ कुछ दूसरे मांसाहारी कांग्रेसियों ने अलग से इस बात पर मजाक उड़ाते हुए कहा कि जब वोराजी प्लेन के भीतर बैठते हैं, तो क्या उनके लिए अलग से शाकाहारी सीट रखी जाती है, या बगल की सीट पर बैठे हुए को मांसाहार करने से मना कर दिया जाता है? एक कांग्रेसी ने कुछ और आगे बढ़कर कहा कि मांसाहारियों की भावनाओं को भी शाकाहार से चोट लग सकती है। अब पता नहीं सोनिया-राहुल की जिन दावतों में वोराजी मौजूद रहते होंगे वहां पर मांसाहार रहता होगा या नहीं, या फिर मांसाहारी लोग शाकाहारियों से कुछ दूर बैठकर खाते होंगे? जो भी हो, हिन्दुस्तान में मांसाहार से परहेज करने वाले लोगों के लिए यह एक दिक्कत की बात तो होती ही है कि बगल या सामने चल रहे मांसाहार को देखते हुए वे चैन से बैठ सकें। 
कांग्रेस के कुछ पुराने लोगों को यह याद है कि एक वक्त मध्यप्रदेश में संवेदनशील मुख्यमंत्री कहे जाने वाले अर्जुन सिंह खाने की एक मेज पर मोतीलाल वोरा के साथ मौजूद थे, और उन्होंने अंडे के किसी व्यंजन के बारे में पूछा कि है क्या? बगल के किसी ने धीरे से याद दिलाया कि टेबिल पर ही वोराजी भी हैं, और अर्जुन सिंह ने हाथ के इशारे से अपनी मांग को खारिज कर दिया था। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 03-Mar-2019

छत्तीसगढ़ में इन दिनों पिछली भाजपा सरकार के कई अफसरों के खिलाफ कई तरह की जांच, नई कांग्रेस सरकार ने शुरू की है, जिसे लेकर भाजपा बदलापुर का नारा लगा रही है, और कांग्रेस इसे बदलावपुर कह रही है। लेकिन जितने किस्म की जांच आगे बढ़ रही है, उससे यह साफ हो रहा है कि घपले तो भरपेट हुए थे, और अगर भारी भ्रष्टाचार न हुआ होता, तो आज नई सरकार को इतनी जांच का मौका भी न मिला होता। खासकर निर्माण कार्यों वाले विभागों में जो गड़बडिय़ां पकड़ा रही हैं, वे बहुत से अफसरों की नौकरियां खाने वाली हैं। गांव-गांव तक सड़क बनाने वाले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना दफ्तर का हाल भयानक निकल रहा है, और यहां के ठेकेदार पिछले विभागीय मंत्री अजय चंद्राकर के इलाके के थे, उनके पसंदीदा थे, और उनके करीबी थे। आज शुरुआती जांच में ही यह पकड़ में आ रहा है कि अफसरों और ठेकेदारों ने मिलकर भाजपा सरकार के पूरे दौर में फर्जी बिल बना-बनाकर सैकड़ों करोड़ रूपए का संगठित भ्रष्टाचार हर बरस किया। सड़कों की मरम्मत के नाम पर और भी बड़ा भ्रष्टाचार हुआ जिसमें सड़क निर्माण के मुकाबले अधिक धांधली निकली है। आज हालत यह है कि जिन ठेकेदारों की जालसाजी पकड़ में आ रही है, वे दूसरे ठेकेदारों की जालसाजी के मामले लाकर दे रहे हैं, ताकि वे अकेले न डूबें। पूरे प्रदेश में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को पिछली सरकार ने एक ऐसी दुधारू गाय की तरह दुहा, कि उसके थन के तमाम दूध निकल जाने के बाद दुहने की मशीन ने उसके लहू को भी खींच लिया था। भाजपा सरकार के जाते-जाते आखिरी के महीनों में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के टेंडरों में सैकड़ों करोड़ का अतिरिक्त भ्रष्टाचार किया गया, ताकि चुनावी खर्च में पहले की बचत खर्च न करनी पड़े, और ताजा-ताजा उगाही काम आ जाए। सरकार बदलने से अगर भ्रष्टाचार की इतनी जांच हो रही है, तो फिर सरकार बदलना अच्छा ही है। लेकिन आज सत्तारूढ़ कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि पांच बरस बाद यही लाईन लिखने की नौबत फिर आ सकती है, और वैसी नौबत से बचना चाहिए। 

उम्मीदवारी के नाजुक मौके पर

कांग्रेस में लोकसभा प्रत्याशी के चयन की प्रक्रिया चल रही है। इसी बीच रायपुर लोकसभा टिकट के बड़े दावेदार महापौर प्रमोद दुबे पर भ्रष्टाचार के छींटे पड़े हैं। सामान्य सभा की बैठक में प्रॉपर्टी टैक्स पर काफी गरमागरम बहस हुई। निर्दलीय पार्षद मृत्युंजय दुबे ने प्रॉपर्टी टैक्स वसूली के नाम पर लेन-देन का खुलासा किया। यह कहा कि कांग्रेस ने प्रॉपर्टी टैक्स आधा करने का वादा किया था, लेकिन आधा होना तो दूर, पिछले साल से ज्यादा टैक्स लिया जा रहा है। जीआईएस सर्वे के नाम पर अनाप-शनाप मूल्यांकन कर टैक्स लिया जा रहा है। उन्होंने यह भी कह दिया कि महापौर का फोन जाने पर टैक्स कम भी हो जा रहा है। इसकी आड़ में काफी वसूली हो रही है। 
यह स्पष्ट है कि महापौर का निगम अफसर-कर्मियों से काफी मधुर संबंध हैं। उनके बड़े भाई निगम के कर्मचारी नेता रहे हैं और उनकी अभी भी कर्मियों में अच्छी पैठ है। अब जब निगम कर्मियों के जरिए अवैध वसूली की बात हो रही है, तो इसमें महापौर के खिलाफ आरोपों को बल मिल रहा है। यह अलग  बात है कि सामान्य सभा में वाद-विवाद के बाद प्रॉपर्टी टैक्स पिछले साल के बराबर यथावत रखने का फैसला ले लिया गया, लेकिन सामान्य सभा में बहस का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। और यह पार्टी नेताओं तक पहुंचाई गई है कि महापौर प्रमोद दुबे पाक साफ नहीं रहे हैं। और यह बात भी याद दिलाई जा रही है कि किस तरह विधानसभा चुनाव के मौके पर जब पार्टी ने प्रमोद दुबे को बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ लडऩे को कहा था, तो वे पीछे हट गए थे, और उन्होंने मना कर दिया था। बंद कमरे में प्रमोद और छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी पी.एल. पुनिया के बीच क्या बात हुई यह तो ठीक से नहीं मालूम, लेकिन चर्चा यह है कि पुनिया ने प्रमोद दुबे से कहा था कि वे विधानसभा चुनाव लड़ें, और अगर वे हार भी जाते हैं, तो भी पार्टी लोकसभा में उन्हें उम्मीदवार बनाएगी, इसके बाद भी कहा जाता है कि प्रमोद दुबे तैयार नहीं हुए। विधानसभा के चुनावी नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस का जरा भी मजबूत कोई उम्मीदवार इस माहौल में बृजमोहन को हरा देता। ऐसे में रायपुर शहर की एक प्रतिष्ठापूर्ण सीट पार्टी के हाथ आते-आते रह गई। अब यह बात लोकसभा टिकट के समय कितने आड़े आती है, यह तो पुनिया ही बता सकते हैं।

जमीं पर पांव न पडऩे का नतीजा
रायपुर शहर में भारी लागत से एक स्काईवॉक बनाना शुरू हुआ था जो कि शहर के एक विधायक, और राज्य के सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक, राजेश मूणत का सपना था। कागजों पर ही इसकी लागत बढ़ती चली गई, और एक दानवाकार फौलादी ढांचा ऐसा अधूरा खड़ा हो गया है कि जिसे पूरा करके और रकम डुबाना समझदारी होगी, या उसे तोड़कर हटा देना बेहतर होगा, यह अभी किसी को समझ नहीं आ रहा है। फिलहाल इस फौलादी ढांचे को तोडऩे के फैसले की उम्मीद में एक तबका रोज अखबार देखता है कि क्या उसे कोई काम मिलेगा? लोहे के कबाड़ी टकटकी लगाकर बैठे हैं कि अगर स्काईवॉक को तोड़ा जाए, तो उन्हें कई पीढिय़ों का यह सबसे बड़ा कबाड़-कारोबार मिलेगा। फिलहाल सौ-पचास करोड़ रूपए की लागत वाले इस स्काईवॉक के साथ एक कानूनी दिक्कत भी सामने आ रही है। 
शहर के बीचोंबीच, म्युनिसिपल इलाके के भीतर कई किलोमीटर में फैले ऐसे हवाई रास्ते को बनाने के लिए न तो म्युनिसिपल से नक्शा पास हुआ, और न ही टाऊन एंड कंट्री प्लानिंग से इसकी इजाजत ली गई। इन दो कानूनी जरूरतों को पूरा न करने वाले पानठेलों को भी उठाकर फेंक दिया जाता है, लेकिन शहर के बीच के हिस्से की तस्वीर को पूरी तरह बदल देने वाले इस स्काईवॉक को बिना इजाजत बनते देखकर भी अफसर चुप थे, क्योंकि सरकार की मनमर्जी इसके पीछे थी। जैसा कि लोहे के इस हवाई सड़क का नाम था, स्काईवॉक, उसी नाम के मुताबिक पिछली सरकार के पांव जमीन पर पड़ नहीं रहे थे, और वह आसमान पर ही चल रही थी। कानूनी औपचारिकताओं को पूरा किए बिना कोई शहर पर इतना बड़ा फौलादी निर्माण कर दे, शहर की जिंदगी बदल दे, इसकी कोई दूसरी मिसाल छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में नहीं है। एक बात तय है कि आज की कांग्रेस सरकार इस स्काईवॉक को लेकर कोई भी फैसला करे, आधी आबादी उसके खिलाफ ही रहेगी।

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Date : 02-Mar-2019

सरकार बदलते ही कई संस्थानों में विशेषज्ञों की नियुक्ति से कामकाज में फर्क दिख रहा है। सरकार ने पॉवर कंपनी के साथ-साथ संचालक उद्यानिकी, पर्यावरण संरक्षण मंडल में आईएएस-आईएफएस अफसरों की जगह विषय विशेषज्ञों की नियुक्ति की है। पॉवर कंपनी में शैलेन्द्र शुक्ला को लाया गया है, जो कि छत्तीसगढ़ के साथ-साथ हरियाणा में भी काम कर चुके हैं। 
सुनते हैं कि विद्युत नियामक  आयोग के कई फैसलों के खिलाफ पॉवर कंपनी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रही है। आयोग में नारायण सिंह के कार्यकाल में काफी अनाप-शनाप फैसले हुए थे। हाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में लड़ाई के लिए कई करोड़ रूपए पॉवर कंपनी वकीलों पर फूंक चुकी है। शुक्ला ने इन खर्चों पर लगाम कसने के लिए कोर्ट के बाहर सेटलमेंट के लिए पहल की है। उन्हें आयोग के नए अध्यक्ष डीएस मिश्रा का साथ मिल रहा है। डीएस मिश्रा की साख बहुत अच्छी है और वे खुद भी मितव्यतता के पक्षधर रहे हैं। ऐसे में उम्मीद जगी है कि पॉवर कंपनी की हालत अब पहले से बेहतर होगी। पिछली सरकार में तो कमल विहार योजना पर कोर्ट कचहरी के चक्कर में 13 करोड़ से अधिक खर्च वकीलों पर किए गए थे। 
दूसरा सरकार का बड़ा फैसला उद्यानिकी संचालक के पद पर प्रभाकर सिंह की नियुक्ति का है। उद्यानिकी में ज्यादातर समय आईएफएस अफसर पदस्थ रहे हैं। यह विभाग सरकार के लिए परिवहन विभाग की तरह दुधारू बन गया था। काफी समय बाद यहां विषय विशेषज्ञ के आने से कामकाज का तौर तरीका बदलता दिख रहा है। इसी तरह पर्यावरण संरक्षण मंडल में भी ज्यादातर समय आईएफएस अफसर पदस्थ रहे हैं। काफी समय बाद मंडल के ही सीनियर अफसर आरपी तिवारी को ही सदस्य सचिव बनाकर कामकाज में बदलाव की कोशिश की गई है। 

पैनल में विज का नाम नहीं!
डीजीपी पद के लिए पैनल में डीएम अवस्थी और संजय पिल्ले के साथ रवि सिन्हा का नाम रखा गया। जबकि सिन्हा से सीनियर आरके विज और मुकेश गुप्ता हैं। मुकेश गुप्ता का नाम नहीं होना समझ में आ रहा है, क्योंकि वे निलंबित हैं और उनके खिलाफ कई तरह की जांच चल रही हंै, पर 88 बैच के आईपीएस विज का नाम नहीं होना हैरानी का विषय है। 
सुनते हैं कि विज का नाम जानबूझकर नहीं रखा गया। वजह यह है कि वे झीरमकांड के समय एडीजी (नक्सल ऑपरेशन) थे। और उनके पास नक्सल इंटेलीजेंस भी था। इस कांड में कांग्रेस के बड़े नेता मारे गए। कांग्रेस के लोग इसके लिए सरकार और बड़े पुलिस अफसरों पर निशाना साधती रही है। खुद भूपेश बघेल इसको लेकर मुखर रहे हैं। चूंकि अब प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में आ गई है, तो उस समय के प्रभावशाली अफसरों को निशाने पर लिया जा रहा है। ऐसे में विज भी किनारे लगा दिए गए। यह एक दूसरी बात है कि पुलिस विभाग में आज काम का सबसे अधिक बोझ ढोने वाले आरके विज चौबीस कैरेट साख वाले अफसर हैं, और पिछले बरसों में हजारों करोड़ की खरीदी उनके मातहत होने के बावजूद किसी सप्लायर से एक कप चाय पीना भी उनके नाम नहीं लिखा है। कोई कारोबारी दफ्तर में कोई तोहफा भी देना चाहें, तो वे मना कर देते हैं, उनका ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है, और केंद्र सरकार-यूपीएससी के इस पैनल में उनका नाम न रहने से बहुत से अच्छे अफसरों को निराशा हुई है। 
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वाट्सऐप से

  • जितने कट्स पाकिस्तान ने हिंदुस्तान के एक पायलट के वीडियो में किए हैं, उतने तो पहलाज निहलानी ने अपने कॅरियर में नहीं किए...
  • सर्जिकल स्ट्राइक बवासीर के ऑपरेशन की तरह होता है, डॉक्टर हर किसी को कहता है कि वह कामयाब रहा, और मरीज उसे राज बनाए रखना चाहता है...
  • पंजाब में अफवाह फैली कि कफ्र्यू लगने वाला है, पेट्रोल पंप बंद रहेंगे, अपनी गाडिय़ां फुल करा लो..., सभी लोग गाडिय़ां लेकर पंप पर लाईन में लग गए। एक समझदार बूढ़ा ट्रैफिक जाम में फंसकर चिल्लाया- अरे अहमको, जब कफ्र्यू ही लग जाना है, तो गाडिय़ां क्या अपने आंगन में चलाओगे? घर में ही तो बैठोगे। समझ आते ही पूरी कतार पंप छोड़कर दारू ठेके पर चली गई।
  • बीवी को पैसा और पाकिस्तान को सुबूत जितना भी दो उतना ही कम रहता है...
  • हिंदुस्तान में 15 साल पुरानी कार चलाने पर रोक है, लेकिन 50 साल पुराने फाइटर प्लेन को उड़ाने पर नहीं...
  • पाकिस्तान के दोस्ताना बर्ताव का जवाब देने के लिए आज शाम हिंदुस्तान नवजोत सिंह सिद्धू को रिहा करके करतारपुर कॉरिडोर से पाकिस्तानी फौज के हवाले करेगा।
  • फ्रांस सरकार ने मोदी से पूछा है कि राफेल की डिलीविरी सीधे देनी है, या पाकिस्तान में डेमो देते हुए लाएं?
  • हिंदुस्तान के मर्दों की राहत के लिए एक जरूरी खबर यह है कि... पाकिस्तान में हिना रब्बानी सुरक्षित है...
  • ये जो पाकिस्तान के हवाई हमले देख रहे हो न आप, इसका बटन आप ही ने 2014 में दबाया था...
  • देश असमंजस में है कि दुबारा चुनाव करवाएं, या मोदी को सीधे ही शपथ दिलवा दें...
  • हमले के अगले दिन पाकिस्तान में बैठक हुई, और यह तय पाया गया कि कुछ भी बोलो यार, मनमोहन सिंह देवता आदमी था...
  • स्वच्छ भारत अभियान पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर तक पहुंच गया।
  • बचपन से ही मुझे अच्छा इंसान बनने का शौक था, फिर बचपन गया तो शौक भी चला गया...
  • लेन-देन में जल्दबाजी ने करें, प्रॉपर्टी भरोसा, और रिश्ते अभी और भी सस्ते होंगे।

 


Date : 28-Feb-2019

आखिरकार शिवराम प्रसाद कल्लूरी को ईओडब्ल्यू से हटा दिया गया। कल्लूरी ने नान घोटाले-फोन टैपिंग मामले में अपने सीनियर दबंग अफसर मुकेश गुप्ता और एसपी रजनेश सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का हौसला दिखाया। कल्लूरी हमेशा से विवादों से घिरे रहे हैं। उनके खिलाफ कई तरह की शिकायतें रही हैं। इन सबको गिनाकर भाजपा पूरी जांच पर सवाल खड़े कर रही थी। 

हाईकोर्ट में भी सोमवार को नान प्रकरण पर दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान काफी बहस हुई। एक-दो याचिकाकर्ताओं की तरफ से भी जांच पर सवाल खड़े किए गए। साथ ही एसआईटी के मुखिया कल्लूरी के खिलाफ चल रही जांच का जिक्र किया गया। सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने जांच की स्टेटस रिपोर्ट रखी और कहा कि पूर्वाग्रह से कोई कार्रवाई नहीं की गई है। 

चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान कहा कि एसआईटी के प्रमुख के खिलाफ जांच चल रही है। ऐसे में जांच पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकारी वकीलों ने दलील दी कि अब तक की जांच पूरी तरह निष्पक्ष रही है। रिपोर्ट आपके सामने हैं। फिर भी आप चाहते हैं तो सरकार एसआईटी प्रमुख को बदल देगी। चीफ जस्टिस के हामी भरने के बाद देर शाम कल्लूरी को हटाने के आदेश जारी कर दिए गए। उनकी जगह जीपी सिंह की पोस्टिंग की गई। 

सरकार बदलने के बाद जीपी सिंह को पीएचक्यू में बिठा दिया गया था। बाद में उन्हें अंतागढ़ टेपकांड की मॉनीटरिंग की जिम्मेदारी दी गई। उनके मार्गदर्शन में टेपकांड की जांच तेजी से चल रही है और कई अहम सुराग मिले हैं। अब नान घोटाले की जांच किस तरह करते हैं, यह देखना है। क्योंकि वे पिछली सरकार के पसंदीदा रहे हैं। मुकेश गुप्ता और अमन सिंह से उनकी मित्रता किसी से छिपी नहीं है। खुद रमन सिंह उन्हें काबिल अफसर मानते रहे हैं। और कई बार उनकी कार्यशैली की सराहना कर चुके हैं। लोगों को रमन मंत्रिमंडल की वह बैठक याद है जिसमें बृजमोहन अग्रवाल ने जीपी सिंह के खिलाफ जमकर कहा था, कई किस्म के गंभीर आरोप लगाए थे, और यह भी कहा था कि वे जीपी सिंह से बात करना बंद कर चुके हैं। अब वक्त ने ऐसी पलटी खाई है कि जीपी सिंह एसीबी, ईओडब्ल्यू  के आईजी हैं, और खुद बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ एक जांच वहां खड़ी हुई है। राजनीति और सत्ता के खेल में बड़े अजीब और अविश्वसनीय हमबिस्तर होते रहते हैं।

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Date : 27-Feb-2019

छत्तीसगढ़ में स्थानीय जरूरतों को लेकर पहले कुछ ऐसे मौके भी आए हैं जब किसी एक प्रशासनिक जिले के भीतर एक नया पुलिस जिला और बना दिया गया, और एक कलेक्टर वाले जिले में दो एसपी रहे। ऐसे पुलिस जिलों की जरूरत पहले तो नक्सल इलाकों में हुई, लेकिन अब कुछ शहरी इलाकों में भी ऐसी जरूरत महसूस की जा रही है। दुर्ग एक ऐसा जिला है जहां दुर्ग और भिलाई, ये दो जुड़वां शहर हैं, दोनों ही घनी आबादी के हैं, और भिलाई में बाहर के कारोबार और लोगों की इतनी अधिक आवाजाही है कि वहां की पुलिस-समस्याएं बहुत अलग हैं, और भारी-भरकम भी हैं। अभी सरकार के सामने किसी ने जुबानी चर्चा में यह राय रखी है कि भिलाई को एक अलग पुलिस जिला बना देना बेहतर होगा क्योंकि वहां की स्थानीय जरूरतें बाकी के दुर्ग जिले से बिल्कुल अलग है। पन्द्रह बरस बाद राज्य में एक नई सरकार आई है जो बहुत से नए फैसले ले रही है, और ऐसे में लोग नई सोच भी सरकार के लोगों के सामने रख रहे हैं। खुद गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने बार-बार अलग तरह से, और नई सोच के साथ काम करने की बात कही है, और परंपरागत पुलिस प्रणाली में पूरी तरह फेरबदल की बात भी कही है। दुर्ग जिला उन्हीं का गृहजिला है, और आने वाले दिनों में देखना है कि क्या इस जिले के पुलिस ढांचे में कोई फेरबदल होता है? 
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Date : 26-Feb-2019

सीएम बनने के बाद भूपेश बघेल दूसरी बार उत्तरप्रदेश के बाराबंकी गए। वे कबीर आश्रम में सत्संग कार्यक्रम में शामिल हुए। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया बाराबंकी से सांसद रहे हैं। उनके फिर लोकसभा चुनाव लडऩे की चर्चा है। बाराबंकी पहले सामान्य सीट थी और यहां से उत्तरप्रदेश के बड़े कुर्मी नेता बेनी प्रसाद वर्मा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से कुल मिलाकर चार बार सांसद रहे हैं। अब यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई है। यहां अभी भी कुर्मी समाज के वोटर निर्णायक भूमिका में है। ऐसे में भूपेश के बाराबंकी दौरे को कुर्मी वोटरों को कांग्रेस के पाले में लाने की कोशिशों के रूप में देखा जा रहा है। पुनिया ने छत्तीसगढ़ में जी-तोड़ मेहनत कर कांग्रेस को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाया है, तो उन्हें लोकसभा में पहुंचाने के लिए भूपेश बघेल बाराबंकी दौरा कर रहे हैं, तो इसमें कोई गलत नहीं है। वैसे भी पार्टी हाईकमान भूपेश बघेल को यूपी और बिहार में प्रचार की जिम्मेदारी दे रही है। दोनों ही राज्यों में कुर्मी समाज के वोटरों की तादात अच्छी-खासी है। अब भूपेश बघेल के प्रचार से पार्टी को कितना फायदा मिलता है, यह देखना है।

राकेश के आने पर हैरानी नहीं
पीसीसीएफ (मुख्यालय) के पद पर राकेश चतुर्वेदी की पदस्थापना आदेश जारी हुआ, तो हैरानी नहीं हुई। चर्चा तो यह है कि डीजीपी, सीएस से पहले पीसीसीएफ (मुख्यालय) को ही बदलने का विचार था। नए साल के पहले दिन से ही यह चर्चा चल रही थी। वजह यह है कि 84 बैच के अफसर मुदित कुमार सिंह अपने मातहत वन अफसरों के पसंदीदा नहीं रहे। ज्यादातर वन अफसर उनसे नाखुश थे। वे अकेले अफसर रहे हैं जिन्होंने पिछली सरकार में सबसे ज्यादा मौज की थी। उनके पास एपीसीसीएफ लैंड मैनेजमेंट का प्रभार सबसे ज्यादा समय तक रहा। यह पद वन विभाग में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। खास बात यह है कि पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नत होने के बाद भी लैंड मैनेजमेंट का पद काफी समय तक उनके पास रहा। 
सुनते हैं कि भूपेश बघेल विपक्ष के विधायक के रूप में भैंसाकन्हार अवैध खनन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे थे, तो विभाग की तरफ से ओआईसी मुदित कुमार सिंह ही थे। एक तरह से वे पिछली सरकार के बेहद करीब थे। इस दौरान विकास यात्रा और अन्य प्रयोजन में लघु वनोपज के माध्यम से काफी कुछ खेल खेला गया। तब मुदित ही एमडी के पद पर थे। सरकार बदलने के बाद आधा दर्जन से अधिक अफसर प्रतिनियुक्ति से वापस वन मुख्यालय लौटे, तो उनके पास कोई काम नहीं था। मुदित ने अपने तरफ से इन सभी के लिए कोई काम आबंटित करने कोई ठोस प्रयास नहीं किया। दो महीने बाद उनके हटने के साथ वन मुख्यालय में आए अफसरों का कार्य विभाजन किया गया। उनकी यह उदासीनता उन सहकर्मी आलाअफसरों पर भारी पड़ी जो कि अरण्य भवन में एक-एक कमरे में तीन-तीन लोग बैठकर किसी काम मिलने की राह देख रहे थे। दूसरी तरफ राकेश चतुर्वेदी यारबाज अफसर माने जाते हैं जो आसपास सभी लोगों की फिक्र करते हैं, सबकी मदद करते हैं।
नए पीसीसीएफ (मुख्यालय) राकेश चतुर्वेदी से भी सीनियर शिरीष अग्रवाल और कुछ अन्य अफसर हैं, लेकिन वे अगले दो-चार महीनों में रिटायर हो जाएंगे। ऐसे में सोच-समझकर राकेश चतुर्वेदी का नाम तय किया गया। राकेश छत्तीसगढ़ के रहवासी हैं और स्कूल-कॉलेज की शिक्षा रायपुर में ही प्राप्त की है। कुछ विवादों को छोड़ दें, तो उन्हें काबिल अफसर माना जाता है। उनके ऊपर जो तोहमतें लगी थीं, उन सबसे वे पाकसाफ निकल गए। अब इस सरकार के चुनौतीपूर्ण घोषणापत्र से में राकेश पर वनोपज आधारित उद्योग लगाने की महती जिम्मेदारी है, जो कि सरकार की प्राथमिकता है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 25-Feb-2019

विधानसभा में जहां भाजपा के विधायकों ने नरवा योजना को लेकर सवाल खड़े किए, तो बैस की राय उनसे एकदम अलग रही। उन्होंने इस योजना को काफी अहम बताया और कहा कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा। कई अन्य मसलों पर भी भूपेश सरकार को लेकर भाजपा नेता बंटते दिखे। एसआईटी के खिलाफ नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक हाईकोर्ट गए हैं, तो उनके ही विधायक दल के तीन सदस्य मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को एसआईटी जांच के लिए बधाई देकर आ गए। भूपेश बघेल के नाम पर भाजपा नेताओं के बीच वैसे भी दो अघोषित खेमे बन गए हैं। भाजपा के ताकतवर विधायक बृजमोहन अग्रवाल अकेले ऐसे पिछले मंत्री हैं जो कि अब तक अपने उसी सरकारी बंगले में बने हुए हैं। कुछ कारणों से उन्हें वही बंगला दिया भी जा सकता है, और अब तक नए मंत्री रूद्र गुरू को इस मकान में जाने की कोई संभावना दिख नहीं रही है। भाजपा विधायकों के बीच रमन सिंह और धरम कौशिक ही एक तरफ रह गए हैं।

माहौल अडानी के खिलाफ
प्रदेश में अडानी समूह के लिए अनुकूल हालात नहीं हंै। इस समूह का प्रदेश में खनन क्षेत्र में एकाधिकार है। इन सबके बावजूद उद्योग मंत्री ने तो एक कदम आगे जाकर यहां तक कह दिया, कि बैलाडीला में अडानी समूह को घुसने नहीं देंगे। आमतौर पर सरकारें राज्य में निवेश के लिए उद्योग समूहों का स्वागत करती हैं, ऐसे में देश के इस बड़े औद्योगिक घराने के खिलाफ सार्वजनिक खुली नाराजगी को लेकर चर्चा ज्यादा हो रही है। 
सुनते हैं कि अडानी के खिलाफ सरकार की नाराजगी प्रशासनिक न होकर राजनीतिक ज्यादा है। सर्वविदित है कि अडानी समूह भाजपा के ज्यादा करीब माना जाता है। चर्चा तो यह है कि दिल्ली में पार्टी का कोष संभालने वाले कांग्रेस के नेता अडानी समूह से पांच राज्यों के चुनाव के लिए फंड की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन फूटी कौड़ी नहीं मिल पाई। उल्टे राज्य में सीएम पद के लिए अडानी समूह की अपनी अलग पसंद रही है। इन सबको देखते हुए अडानी समूह से नाराजगी बेवजह नहीं दिखती है। अब लोकसभा चुनाव होने हैं ऐसे में अडानी समूह से उम्मीद भी ज्यादा बड़ी दिख रही है। यदि सबकुछ ठीक ठाक नहीं हुआ तो राज्य में इस बड़े घराने के लिए कारोबार में दिक्कत बढ़ सकती है। 

एक ही नाम चढ़ा हुआ था
राज्य में सरकार तो बदल गई है, लेकिन लोगों की जुबान पूरी तरह नहीं बदल पाई है। रमन सिंह 15 साल राज्य के मुख्यमंत्री रहे। लिहाजा, अभी भी सामान्य बोलचाल में कई बार मुख्यमंत्री के रूप में रमन सिंह का नाम आ जाता है। पिछले दिनों धरसींवा के ग्राम पथरी में खूबचंद बघेल की पुण्यतिथि का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस एक मंच पर थे। बैस ने अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री डॉक्टर... बोल गए फिर उन्होंने गलती सुधार भूपेश बघेल का नाम लिया। उन्होंने गलती के लिए क्षमा भी मांगी और कहा कि 15 साल एक ही नाम था इसलिए चूक हो गई। 
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Date : 24-Feb-2019

जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था, तब छत्तीसगढ़ के एक आदमी पर कुछ परेशानी आई, जो कि सरकार से जुड़ी हुई थी। अपने एक परिचित पत्रकार से भोपाल में बात की, तो उनका कहना था कि मुख्यमंत्री से बात करके सब ठीक करवा लेंगे। उनका आत्मविश्वास था कि मुख्यमंत्री जो चाहे कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि लड़के को लड़की, और लड़की को लड़का बनाना ही मुख्यमंत्री के हाथ में नहीं रहता, बाकी तो हर काम मुख्यमंत्री कर सकते हैं। यह बात दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए हुई थी, और बाद में वह समस्या निपट भी गई। भारत जैसे लोकतंत्र में किसी प्रदेश में मुख्यमंत्री किसी भी समस्या को निपटा सकते हैं यह तो सभी लोगों का देखा हुआ है, लेकिन अब छत्तीसगढ़ में जो बातें सामने आ रही हैं, उनसे यह लगता है कि पिछली रमन सिंह सरकार में मुख्यमंत्री के आसपास के लोग समस्याओं को तो निपटाने की ताकत रखते ही थे, वे लोगों को निपटाने की भी ताकत रखते थे, और लोगों को बुरी तरह निपटाया भी था। लेकिन पिछली सरकार की मिसालें इस सरकार के लोगों के भी काम आनी चाहिए कि सरकार की ताकत जब लोगों के इस काम आती है कि वे अपने विरोधियों को किस तरह निपटाएं, तो सरकारी ढांचे में गहरे पैठी हुई यह ताकत अगली सरकारों के लिए भी ऐसा ही एक खतरा रखती भी है। पिछली सरकार के बड़े-बड़े अफसर आज अपने बचे हुए कार्यकाल की बड़ी कुर्सियों को छोड़कर जिस तरह कोर्ट-कचहरी और वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं, वह सब कुछ नेताओं और अफसरों के लिए एक बड़ा कीमती सबक भी होना चाहिए। 

इस बार फिर चर्चा में...
मीडिया के तो एक वक्त हाथ-पांव होते थे, लेकिन सोशल मीडिया बिल्कुल भी बिना हाथ-पांव का होता है, और उस पर चर्चा कब, कैसे, कहां तक पहुंचती है, यह समझ पाना बड़ा मुश्किल होता है। मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग का नाम विधानसभा चुनाव के पहले बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ उम्मीदवारी के लिए चर्चा में आया, और वह महज चर्चा नहीं थी, क्योंकि कई पुराने पत्रकार साथियों, और कई नए कांग्रेसी साथियों के साथ रूचिर चुनाव प्रचार के पहले जनसंपर्क पर निकल भी पड़े थे। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि उनकी जगह टिकट एक ऐसे उम्मीदवार को मिली जिसके बारे में यह कहा गया कि वह बृजमोहन अग्रवाल की असली पसंद था, और टिकट पक्की होने की खबर दिल्ली से कांग्रेस के लोगों ने उम्मीदवार को बाद में दी, बृजमोहन को पहले दी। चुनावी नतीजे आने के बाद कांग्रेस और भाजपा में अब हर कोई यही कहते दिखते हैं कि अगर रूचिर को टिकट मिली होती तो बृजमोहन निपट गए होते। अब एक बार फिर रूचिर का नाम लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार के रूप में चर्चा में घूमना शुरू हुआ है, लेकिन आगे क्या होगा इसके बारे में कांग्रेस पार्टी में एक पुरानी लाईन इस्तेमाल होती है कि कांग्रेस की टिकट और मौत का कोई भरोसा नहीं होता, कब किसे आ जाए।  

गौसेवा का ऐसा मेवा!
छत्तीसगढ़ में दुर्ग, राजनांदगांव सहित कई ऐसे जिले हैं जहां पुलिस और प्रशासन के अफसरों को एक बड़ी डेयरी की तरफ से तोहफे में गाय मिल जाती हैं। अब अफसर हैं तो बड़े-बड़े बंगले रहते ही हैं, वहां पर घास या चारा उगाने के लिए अनगिनत अर्दली, सिपाही, या मजदूर भी रहते हैं। ऐसे में अफसरों के लिए दूध का कारोबार बड़े फायदे रहता है। परिवार तो दूधों नहाता ही है, सरकारी नौकर जाकर दूध बेच भी आते हैं। अभी दुर्ग जिले से एक पुलिस अफसर का पहले तो दंतेवाड़ा तबादला हुआ जो कि इस राज्य में आमतौर पर सजा की तरह होता है। जबकि इस अफसर की पत्नी पुलिस की नौकरी में ही दुर्ग में ही कायम रही। 
आमतौर पर पति-पत्नी को एक शहर में साथ रखा जाता है। इसके बाद दो दिनों के भीतर इस अफसर का कालेपानी की इस सजा से ट्रांसपोर्ट विभाग के मजे में तबादला हो गया, और राज्य की सबसे कमाऊ समझी जाने वाली एक कुर्सी पर यह अफसर पहुंच गया। अब इन दो दिनों में वह गाय कन्फ्यूज हो गई है जो कि दुर्ग से पहले तो दंतेवाड़ा के लिए चल पड़ी थी, और अब वहां से नया रायपुर के लिए उसे मुडऩा पड़ा है। यह रहस्य समझने की कई लोग कोशिश कर रहे हैं कि गौमाता की सेवा का ऐसा नतीजा अगर निकलता है तो वे भी जाकर डेयरी मालिक से एक गाय ले आएं, और सिपाहियों को लगाकर सेवा भी करें, और मेवा भी पाएं। 
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Date : 23-Feb-2019

भाजपा लोकसभा चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो पा रही है।  विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ज्यादातर पदाधिकारी-कार्यकर्ताओं ने बैठकों में आना बंद कर दिया है। पिछले दिनों कांकेर और बस्तर लोकसभा के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन कोंडागांव में रखा गया। इसमें  कुल मिलाकर साढ़े 13 हजार छोटे-बड़े पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं को बुलाया गया था। इन सभी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए महामंत्री (संगठन) पवन साय प्रयासरत थे, लेकिन ले-देकर 2 हजार लोग ही जुट पाए। पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक कार्यकर्ताओं को प्रदेश में लोकसभा की सभी 11 सीटें जीतने के लिए मेहनत करने की सीख देकर चलते बने। 

सुनते हैं कि जो लोग कार्यक्रम में आए भी थे, उनकी नाराजगी कौशिक को लेकर ज्यादा नजर आई। ये लोग इस बात से नाराज हैं कि विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कौशिक को पद से हटाने के बजाए उन्हें दोहरा दायित्व यानी नेता प्रतिपक्ष का भी पद दे दिया गया। असंतुष्टों की नाराजगी इस बात को लेकर भी थी कि पार्टी के प्रभावशाली आदिवासी नेताओं को सम्मेलन से दूर रखा गया। हालांकि दोनों लोकसभा के प्रभारी पूर्व मंत्री केदार कश्यप थे, लेकिन असंतुष्ट नेता चाहते थे कि रामविचार नेताम और पूर्व मंत्री ननकी राम कंवर को भी बुलाया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुल मिलाकर कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार करने में पार्टी नेता नाकामयाब रहे। 

जंगखोरों की दुकानों पर भीड़...
जब देश में साम्प्रदायिक तनाव होता है, या उससे भी बढक़र, जब पड़ोस के किसी ऐसे देश के साथ तनाव होता है जिसे दुश्मन कहा जाता है, तो देश के भीतर बहुत से लोगों ने सबसे पहले राष्ट्रप्रेम जागता है, फिर उस राष्ट्रप्रेम के प्रदर्शन की हसरत पैदा होती है, और इस हसरत को पूरा करते-करते अपने आसपास के कुछ राष्ट्रद्रोहियों की पहचान जरूरी हो जाती है, और फिर यह देखा जाता है कि पड़ोस का वह दुश्मन देश कितनी तकलीफ में पहुंच गया है। इन दिनों हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों तरफ टीवी चैनलों के/की एंकरों को देखते ही बनता है जो कि जंग के फतवे देते और दूसरे मुल्क के पीएम को कोसते और गालियां देते दिखते हैं। हिन्दुस्तान के ऐसे चैनलों को तो लोग जानते ही हैं, सोशल मीडिया की मेहरबानी से पाकिस्तान के भी कुछ चैनलों की एंकरों के वीडियो क्लिप हवा में तैर रहे हैं जो कि मोदी को कोसने के लिए तरह-तरह की मिसालें इस्तेमाल कर रही हैं। फिलहाल भारत के कुछ जंगखोर चैनलों पर जो दिख रहा है, उससे लगता है कि भारत में पाकिस्तानी रसोई घरों पर सर्जिकल स्ट्राईक कर दी है, और वहां पर पतीले-कढ़ाईयां खाली पड़े हैं क्योंकि हिन्दुस्तानी सब्जी वहां जा नहीं रही है। ऐसे ही फतवों के झांसे में आकर छत्तीसगढ़ के वे सब्जी किसान भी बांहें फडक़ा रहे हैं जो कि साल में कई बार टमाटर सडक़ों पर फेंकते दिखते हैं, और अब अखबारी सुर्खियां दे रहे हैं कि 80 रूपए किलो के दाम मिलेंगे तो भी वे पाकिस्तान टमाटर नहीं भेजेंगे। 

रायपुर के लिए एक उम्मीदवार
भाजपा के भीतर विधानसभा चुनाव की ऐसी बुरी शिकस्त से उबरने के लिए लोकसभा चुनाव को लेकर कई तरह की सोच चल रही है। अभी पार्टी के भीतर एक पुराने नेता ने एक बड़े नेता से कहा कि रायपुर लोकसभा सीट से डॉ. रमन सिंह को लड़ाया जाए तो पूरे प्रदेश में भाजपा का एक माहौल बनेगा। लेकिन प्रदेश भाजपा में डॉ. रमन सिंह का वजन अब भी इतना है कि उनकी मर्जी जाने बिना कोई इस बात को दिल्ली बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। जब यह चर्चा हुई कि रमेश बैस की टिकट काटने का क्या असर होगा, तो उसका भी एक रास्ता चर्चा में आया कि किसी राज्य में उन्हें राज्यपाल बनाकर भेजा जा सकता है, उससे उनकी और उनके जातिगत वोटों की नाराजगी भी खत्म होगी। वैसे भी रमेश बैस की टिकट इस बार कटने के आसार भी बहुत से लोग देखते हैं, लेकिन भाजपा में ऐसे नेताओं की संख्या भी कम नहीं है जो यह मानते हैं कि घूम-फिरकर रायपुर की लोकसभा टिकट फिर रमेश बैस को मिल सकती है।


Date : 22-Feb-2019

हिन्दुस्तान के इतिहास में नेहरू को खलनायक के रूप में पेश करने के पांच बरस पूरे होने को हैं। भाजपा और एनडीए की अटल सरकार ने भी कभी ऐसा नहीं किया था, और नेहरू को इतिहास में चैन से सोने दिया था। अब छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद से यह पहला मौका है जब मुख्यमंत्री के दफ्तर में गांधी और नेहरू दोनों को दीवार पर जगह मिली है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कमरे में जिनको जाना नसीब हुआ है, वे समझ सकते हैं कि सरकार में नेहरू की सोच भी अब है। कुछ हफ्ते पहले अपने पहले दिल्ली प्रवास में नए-नए मुख्यमंत्री बने भूपेश बघेल ने वहां नेहरू के शुरू किए हुए अखबार, नेशनल हेरल्ड, के दफ्तर में जाकर वहां के संपादकीय सहयोगियों से मुलाकात की थी और उनके साथ एकजुटता बताई थी। नेशनल हेरल्ड के लिए यह तकलीफ का समय चल रहा है क्योंकि अदालत ने इसकी प्रकाशक कंपनी को सरकारी जमीन पाकर उस पर बनाई इमारत खाली करने का हुक्म दिया है। 
वैसे भाजपा सरकार में भी छत्तीसगढ़ में एक दफ्तर ऐसा था जहां अफसर ने बिना डरे हुए अपने पीछे नेहरू की तस्वीर लगाकर रखी थी। रायपुर के कलेक्टर रहे रामसिंह ठाकुर की दफ्तर में जो भी तस्वीरें खिंचती थीं, उनमें पीछे नेहरू की बड़ी सी तस्वीर दिखती थी। उनका कहना था कि वे जब, जिस दफ्तर में रहे, उन्होंने अपने पीछे यह तस्वीर लगाकर रखी थी। 

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Date : 21-Feb-2019

 

लंबे समय तक इंटेलीजेंस ब्यूरो में रहकर लौटे छत्तीसगढ़ के एक डीजी स्तर के अफसर बी.के. सिंह को कई दिन खाली रहने के बाद कल एक बड़ा जिम्मा मिला, एसीबी-ईओडब्ल्यू का मुखिया बनाया गया। अब लोग आज चल रहीं बहुत सी जांचों के बीच इस कुर्सी को अच्छा मानें या बुरा, यह समझ नहीं पा रहे हैं। लेकिन यह तो तय है कि काम करने वाले सरकारी अफसरों को खाली बैठने से अधिक बुरा और अपमानजनक और कुछ नहीं लगता, इसलिए उन्हें कुछ काम तो मिला है, और खासा नाजुक काम भी मिला है। एक साल से कम का उनका बचा हुआ कार्यकाल आज एसीबी-ईओडब्ल्यू में जारी किसी जांच को शायद ही सजा तक पहुंचते देखे, लेकिन सरकार का सिलसिला तो ऐसे ही चलता है, जुर्म कोई अफसर दर्ज करते हैं, और सजा सुनते हुए कोई अफसर देखते हैं। 
लंबे समय तक राज्य के बाहर रहने की वजह से आईपीएस बी.के. सिंह को छत्तीसगढ़ में कम लोग जानते हैं, लेकिन फिर भी मंत्रालय या सचिवालय में उनको जानने वाले लोग हैं। वे अपने आपको ट्विटर पेज पर आध्यात्मिक रूझान वाला पुलिस अफसर बताते हैं। अब आने वाले दिनों में उनका आध्यात्म जांच में कैसे काम आएगा, यह धीरे-धीरे ही पता लगेगा। एसीएस सी.के. खेतान, और दूसरे एसीएस आर.पी. मंडल दोनों ही आईएएस में बी.के. सिंह के बैचमेट हैं, और उनके तीसरे बैचमेट बी.वी.आर. सुब्रमण्यम जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव हैं। दिलचस्प बात यह है कि खेतान और मंडल ये दोनों भी बी.के. सिंह की तरह बिहारी मूल के ही हैं। 

दारू में भी मिल जाए छूट...

जगदलपुर में पाकिस्तान मुर्दाबाद नारा लगाने पर मिलने वाले रियायती तंदूर चिकन को देखकर अब पूरे छत्तीसगढ़ में पीने वाले इंतजार कर रहे हैं कि किसी दारू दुकान पर भी ऐसा शुरू हो जाए तो वे पीने के बाद पाकिस्तान को और गालियां देने का एडवांस वायदा भी कर सकते हैं। लेकिन दुकानें सरकारी हैं, और कर्मचारियों के अपने खुद के पापी पेट का भी सवाल है, और अपने से ऊपर के लोगों के पापी पेटों का भी उनको ख्याल रखना है, इसलिए वे दाम से अधिक वसूली में से कोई मुर्दाबाद-छूट नहीं दे सकते, और अपने खुद के लिए बचाने की बेबसी उनके सामने है। ऐसे में राष्ट्रवादी देशभक्तों को चाहिए कि शराबियों की भीड़ जुटाकर घंटे भर पाकिस्तान-मुर्दाबाद का नारा लगवाकर फिर उन्हें एक-एक चुल्लू दारू दे सकते हैं। 

 

दो दर्जन रिमाइंडर के बाद

लोकायुक्त में अखिल भारतीय वनसेवा की एक महिला अधिकारी के खिलाफ शिकायत हुई तो वहां से शासन से जवाब मांगा गया। चूंकि महिला आईएफएस थी, और उससे जवाब लेने की जिम्मेदारी भी विभाग के मुखिया आईएफएस पर ही थी, इसलिए जवाब मांगती चि_ियां जाती रहीं, और कोई जवाब आया नहीं। सरकार से परे के लोगों के लिए यह सोचना नामुमकिन होगा कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर किसी अफसर से कितने जवाब या कितनी बार जवाब मांगे जा सकते हैं। इस महिला अफसर से दो दर्जन से अधिक बार जवाब मांगा गया, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद सरकार अब उसकी दो वेतनवृद्धि रोकने जा रही है, और सरकार ने यह भी तय किया है कि दो-दो दर्जन बार जवाब मांगने पर भी जवाब न मिलने पर जिन लोगों ने कोई कार्रवाई नहीं की, उन पर भी कोई कार्रवाई क्यों न की जाए? 


Date : 19-Feb-2019

भूपेश सरकार के मंत्री कुछ अटपटे फैसले भी करते जा रहे हैं। सबसे परिपक्व और गंभीर टीएस सिंहदेव ने प्रदेश के सबसे बीमार स्वास्थ्य विभाग में संचालक चिकित्सा शिक्षा के पद पर एक ऐसे अफसर को तैनात कर दिया जो कि सुप्रीम कोर्ट में गलत काम का दोषी पाया जा चुका है, और जिसके परिवार की मेडिकल छात्राओं को सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर मोटा जुर्माना लगाकर छोड़ दिया था। स्वास्थ्य विभाग की दूसरी कुछ और महत्वपूर्ण कुर्सियों पर पिछली सरकार के दौरान भ्रष्टाचार के लिए चर्चित अफसर बैठे ही हुए हैं। अब इसके बाद स्कूल शिक्षा मंत्री पे्रम साय सिंह ने अपनी ही पत्नी को निजी सहायक बना लिया था, और यह देखकर हक्का-बक्का रह गए सत्तारूढ़ लोगों ने उन्हें समझाया कि ऐसा किया नहीं जा सकता। इसके बाद मंत्रीजी की पत्नी को वहां से हटाया गया। मुख्यमंत्री पद के एक और दावेदार रहे ताम्रध्वज साहू ने अपने दो बड़े विभागों का जिम्मा जिस तरह दो बेटों को दे दिया है, और वे दोनों जिस तरह उपमंत्री के अघोषित ओहदे के साथ काम चला रहे हैं, उसमें परेशानी और मुसीबत बहुत दूर नहीं दिख रही है। बाकी कुछ मंत्रियों के पास भी पुराने विवादास्पद लोग पहुंच गए हैं, कुछ के करीबी अफसर तेजी से बदसलूकी करते जा रहे हैं, और आज के वीडियो और स्टिंग ऑपरेशन के दौर में सारा सिलसिला कुछ खतरनाक भी है। आगे-आगे देखें होता है क्या?

वीडियो सुबूत होने की भी चर्चा...
इसी एक मामले में पिछले सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री राजेश मूणत भी जमानत पाने के लिए दौड़-भाग कर रहे हैं, और पिछले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता भी। इन सब की आवाजों का दावा करने वाले अंतागढ़ टेप के बारे में फिरोज सिद्दिकी का कहना है कि 7 करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ है, जबकि सौदा दस करोड़ रुपये का चल रहा था। उन्होंने कल एक बंगले का जिक्र भी किया है जहां पर यह नगदी पहुंची थी, और बंटी थी। उनका यह भी कहना है कि अंतागढ़ टेपकांड को दबाने के लिए जो कोशिशें हुई थीं, उनके भी वीडियो सुबूत मौजूद हैं। 

अब इन तमाम सुबूतों के सामने आने से लोकसभा चुनाव के पहले बहुत से बदनों पर से सफेद कपड़े हट जाएंगे, और जाहिर तौर पर कांगे्रस के हाथ एक बड़ा मुद्दा रहेगा। लेकिन जांच और अग्रिम जमानत में राजेश मूणत का नाम आने के बावजूद फिरोज सिद्दिकी का यह कहना है कि इस रकम से मूणत का लेना-देना नहीं था, इसे इस चर्चित आईपीएस के करीबी एक शराब ठेकेदार और एक बिल्डर ने दिया था। अब शराब ठेकेदार कौन है इसे लेकर तो कोई गलतफहमी किसी को भी नहीं है, लेकिन बिल्डर कौन है इसे लेकर लोग दो नामों पर नजरें जमाकर बैठे हैं। ये दोनों ही इस आईपीएस के एकदम ही करीबी रहे हैं, आज भी हैं, और जांच इन तक पहुंचना महज वक्त की बात है।

फिरोज सिद्दिकी खबरों में...
अंतागढ़ टेपकांड की शुरूआत राज्य के सबसे चर्चित स्टिंग ऑपरेटर फिरोज सिद्दिकी से हुई थी जो कि योगी परिवार के एक सदस्य जितने करीब थे, लेकिन उन्होंने गलत काम को रोकने का हवाला देते हुए अंतागढ़ से कांगे्रस उम्मीदवार की खरीदी-बिक्री की टेलीफोन बातचीत पूरी तरह रिकॉर्ड की, और आज वही जांच की बुनियाद है। इस बीच रिकॉर्ड की गई खरीदी-बिक्री की खबर सबसे पहले छापने वाले इंडियन एक्सपे्रस के मालिक से लेकर संपादक और संवाददाता तक सभी के खिलाफ जोगी पिता-पुत्र ने मानहानि का मुकदमा चला रखा है। राज्य की पुलिस की एसआईटी अंतागढ़ टेप की जांच कर रही है, और उसकी जांच से जो हासिल हो रहा है, उसे मानहानि का यह मुकदमा कमजोर भी होते चल रहा है। फिरोज सिद्दिकी ने कल ही एक इंटरव्यू में यह भी कहा है कि अंतागढ़ से कांगे्रस उम्मीदवार की खरीदी-बिक्री के पीछे प्रदेश के एक चर्चित आईपीएस तो जुड़े हुए थे ही, एक महिला आईएएस भी इससे जुड़ी हुई थी, और उसका नाम वे आजकल में अदालत में हलफिया बयान में बताने जा रहे हैं। 

अंतागढ़ का लावा फैलते जा रहा...
अंतागढ़ टेपकांड की जांच का जिम्मा रायपुर की एसपी नीथू कमल को दिया गया था, लेकिन जांच शायद कुछ सहमी हुई चल रही थी। इस जांच की निगरानी का जिम्मा रायपुर के आईजी का काम संभाल रहे आनंद छाबड़ा को दिया गया था, लेकिन वे कदम-कदम पर एसपी को निर्देश लेने के लिए सीधे पुलिस मुख्यालय भेज रहे थे। ऐसी हालत में पहले तो आनंद छाबड़ा की जगह जांच की देखरेख आईजी जीपी सिंह को दी गई जो कि दुर्ग से हटाए जाने के बाद पुलिस मुख्यालय में बिना किसी काम के बिठाए गए थे। इसके बाद अब कुछ कारणों से नीथू कमल को हफ्तों के भीतर ही रायपुर से बलौदाबाजार भेजा गया। अब उम्मीद की जाती है कि रायपुर जिले की पुलिसिंग बेहतर हो सकेगी, और अंतागढ़ टेपकांड की जांच में भी तेजी आएगी। 

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Date : 17-Feb-2019

इन दिनों टेलीफोन टैपिंग के पिछली सरकार के इतने मामले सामने आ रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में सरकार बदल जाने के बावजूद लोग सिमकार्ड से फोन लगाने के बजाय वॉट्सऐप कॉल करते हैं, वॉट्सऐप से संदेश भेजते हैं, और अधिक चौकन्ने लोग, अधिक सावधानी बरतते हुए वॉट्सऐप पर संदेशों को भी कुछ देर के भीतर मिटा भी देते हैं। इस मैसेंजर के अलावा सिग्नल जैसे कुछ दूसरे मैसेंजर भी इस्तेमाल हो रहे हैं जो कि भेजे गए संदेशों को कुछ देर के बाद खुद ही मिटा देते हैं, और उस पर आए-गए संदेशों के स्क्रीनशॉट भी नहीं लिए जा सकते। 

वॉट्सऐप या सिग्नल को अधिक सुरक्षित मानते हुए लोग तमाम वांछित और अवांछित किस्म की कॉल भी उस पर करते हैं, और खुलकर बातें करते हैं, खुलकर मैसेज भेजते हैं। अब ऐसे में इस मैसेंजर सर्विस पर बोझ बढऩे की वजह से उसकी कमर टूट रही है, या फिर किसी और वजह से, लोगों के महंगे फोन पर भी वॉट्सऐप बार-बार हैंग होने लगे हैं। एक जानकार का अंदाज है कि भारत सरकार ने अब देश की दस सुरक्षा और टैक्स एजेंसियों को तमाम किस्म के संचार साधनों को टैप करने का अधिकार दे दिया है, और उसी का नतीजा है कि सभी मैसेंजर या कॉल सुविधाएं तरह-तरह की जांच झेल रही हैं, और हो सकता है कि बार-बार वॉट्सऐप हैंग होने के पीछे यह भी एक वजह हो। अब लोगों को इस अतिआत्मविश्वास में अधिक समय तक नहीं रहना चाहिए कि कोई मैसेंजर सेवा सौ फीसदी सुरक्षित है, और उस पर बेधड़क नाजुक बातें करना, फोटो या वीडियो भेजना नहीं करना चाहिए, जिस दिन यह बात खुलेगी कि कौन सी सर्विस तक सरकार की पहुंच हो चुकी है, उस दिन तक लोग अतिआत्मविश्वास में बहुत कुछ आत्मघाती भेज चुके होंगे। 

चुनाव गया, पर चंदा आना जारी!
कसडोल में गौरीशंकर अग्रवाल को बुरी तरह हराने वाली कांग्रेस नेत्री शकुंतला साहू की लोकप्रियता बढ़ रही है। चुनाव के वक्त आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर गौरीशंकर से मुकाबले में कमजोर न पड़ जाए, यह सोचकर गांव वालेे खुद शकुंतला को चंदा एकत्र कर देते रहे। 

यह सिलसिला अभी भी जारी है। विधायक बनने के बाद शकुंतला गांवों में लोगों का हाल-चाल समस्याएं पूछने जाती हैं, तो लोग आपस में चंदा एकत्र कर उन्हें अभी भी 5 सौ- हजार रूपए थमा देते हैं। नई सरकार के गठन को 50 दिन से अधिक हो चुके हैं, लेकिन वे उन चुनिंदा विधायकों में हैं जिन्हें जीत के लिए अभी भी बधाईयां मिल रही हैं। पिछले दिनों पूर्व भाजपा विधायक के परिवार के विवाह समारोह में पहुंची, तो वहां  भी भाजपा नेता उन्हें बधाई देने में आगे रहे। 

सरकार आती-जाती है, पर ये कायम...
सरकार बदलने के बाद भी कई पुराने मंत्रियों के घाघ स्टॉफ अपना पुराना रूतबा हासिल करने में कामयाब रहे। गौरीशंकर अग्रवाल के पीए जितेन्द्र साहू ने टीएस सिंहदेव के यहां जगह बना ली है। प्रोटोकॉल में रहकर लंबे समय तक मंत्रियों की सेवा कर रहे अरविन्द सिंह, ताम्रध्वज साहू के विशेष सहायक हो गए हैं। सबसे ज्यादा चर्चा गिरिराज किशोर खण्डेलवाल की हो रही है, वे 15 साल तक राजेश मूणत के निज सचिव रहे। सरकार बदलते ही वे विधायक कुलदीप जुनेजा के  निज सचिव बन गए। खण्डेलवाल कुलदीप के बड़े भाई महापौर स्व. बलवीर जुनेजा के निज सचिव भी थे। बलवीर के महापौर का कार्यकाल खत्म होने के बाद महापौर तरुण चटर्जी के पीए बन गए। निगम के कर्मचारी खण्डेलवाल पिछले 25 साल से मंत्री-विधायक के यहां सेवा दे रहे हैं। सरकार बदलने से उनकी हैसियत में कमी नहीं आई। ये अलग बात है कि कुलदीप स्कूटर में घुमते हैं और उनके पीए बोलेरो में देखे जा सकते हैं।
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Date : 16-Feb-2019

नान घोटाला और अंतागढ़ टेपकांड की एसआईटी जांच चल रही है। ये दोनों प्रकरण ऐसे हैं जिसमें पिछली सरकार के प्रभावशाली लोग लपेटे में आ सकते हैं। अंतागढ़ टेपकांड के चलते पूर्व मंत्री राजेश मूणत को अग्रिम जमानत के लिए आवेदन भी लगाना पड़ा है। इस पर सुनवाई बाकी है। खुद पूर्व सीएम के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के रणनीतिकारों को बड़ी बदनामी का डर सता रहा है। यही वजह है कि जांच को रोकने के लिए पार्टी के रणनीतिकारों से रायशुमारी के बाद  नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक हाईकोर्ट गए हैं। 
सुनते हैं कि सौदान सिंह इस मामले को लेकर पार्टी के सभी नेताओं को एकजुट करने में लगे हैं। पहले सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया गया, लेकिन यह उत्साहवर्धक नहीं था। पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर तो मुकेश गुप्ता और अमन सिंह के खिलाफ एसआईटी जांच की मांग कर चुके हैं। इस तरह पार्टी के भीतर एसआईटी जांच को लेकर एक राय नहीं रही है। इस विपरीत स्थिति निकलने के लिए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय को आगे किया गया। 

चर्चा है कि सदन में एसआईटी जांच के खिलाफ काम रोको प्रस्ताव लाने से एक दिन पहले ही पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के निवास पर कुछ प्रमुख नेताओं की बैठक भी हुई थी, इसमें पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय खास तौर पर मौजूद थे। प्रेमप्रकाश वैसे तो पूर्व सीएम के धुर विरोधी बृजमोहन अग्रवाल के बेहद करीबी माने जाते हैं, लेकिन पूर्व सीएम से भी उनके अच्छे ताल्लुकात हैं। प्रेमप्रकाश के हस्तक्षेप का नतीजा यह रहा कि सदन में एसआईटी जांच के खिलाफ भाजपा सदस्य एकजुट रहे। कुछ भाजपा सदस्य मुकेश गुप्ता और अमन सिंह का बचाव करने के पक्ष में नहीं थे, फिर भी सदन में एक साथ नजर आए। सदन से परे हाईकोर्ट में बड़े-बड़े वकील लगाए गए हैं। 

बड़े वकील और छोटे वकील
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी कौशिक की पैरवी करने आए थे। अमन सिंह की भी पैरवी करने एक पूर्व अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल आए थे। दूसरे दिन सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने अमन की पैरवी की। राज्य सरकार का हाल यह रहा कि इस महत्वपूर्ण प्रकरण की पैरवी के लिए एडव्होकेट जनरल  मौजूद नहीं थे। जूनियर वकीलों ने सरकार का पक्ष रखा। कौशिक हो या अमन सिंह की याचिका, किसी एक को राहत मिल जाती है तो मुकेश गुप्ता से लेकर हर किसी की मुश्किलें आसान हो जाएगी। ऐसे में अब सड़क और सदन से परे अदालती लड़ाई ज्यादा दिलचस्प हो गई है। ऐसा बताया जा रहा है कि तेज रफ्तार से चल रही सरकारी जांच के बीच हाईकोर्ट में की जा रही दखल से सरकार के लोगों के माथे पर कुछ बल भी पड़ रहे हैं।

मेले के मजे
पिछली सरकार में कृषि मेले के आयोजन में अनियमितता को लेकर सदन में खूब शोर शराबा हुआ। बहस इस बात को लेकर हो रही थी कि मंडी बोर्ड को कृषि मेले के आयोजन के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया था। लेकिन एक भागीदार रोटरी क्लब को एक करोड़ से अधिक भुगतान हो गया। कृषि मंत्री ने माना कि पहली नजर में यह सही नहीं है और उन्होंने जांच कराने की बात भी कह दी। सुनते हैं कि कृषि मेले से किसानों को फायदा हुआ हो या नहीं, लेकिन एक ट्रैवल्स संचालक को खूब फायदा हुआ। ट्रैवल्स संचालक रोटरी पदाधिकारी थे। उन्होंने इस सरकारी आयोजन में खूब फायदा पाया। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 15-Feb-2019

छत्तीसगढ़ के संसदीय इतिहास में संभवत: पहला मौका था जब बुधवार को विभागीय प्रतिवेदन छपकर नहीं आ पाने के कारण पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के बजट प्रस्तावों पर चर्चा नहीं हो पाई। विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिल गया। दरअसल, विभागीय मंत्री टीएस सिंहदेव अपने सीधेपन के कारण धोखा खा गए। वे पहली बार मंत्री बने हैं और कुछ मामलों में उनकी अनुभवहीनता यदा-कदा सामने आ जा रही है। 

सुनते हैं कि एक दिन पहले विधायकों को देर रात विभागीय प्रतिवेदन भेजा गया। सिंहदेव ने इस देरी पर पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर से चर्चा भी की थी। अजय पंचायत विभाग के बजट प्रस्तावों पर चर्चा की शुरूआत करने वाले थे। अजय ने सहृदयता दिखाते हुए खुद विभागीय प्रतिवेदन देरी से मिलने की बात कहकर चर्चा के लिए कोई दूसरी तिथि तय करने का आग्रह करने वाले थे ताकि विभागीय मंत्री को सदन में असहज स्थिति का सामना न करना पड़े, लेकिन वे खड़े हो रहे थे कि इससे पहले ही खुद विभागीय मंत्री सिंहदेव ने हड़बड़ी दिखाते सदन में यह कह गए कि विभाग चर्चा की तैयारी नहीं कर पाया है इसलिए उनके विभाग की चर्चा के समय को आगे बढ़ा दिया जाए। जो बात अजय चंद्राकर को कहनी थी, वो खुद मंत्री ही अपने खिलाफ कह गए। फिर क्या था विपक्षी सदस्य पिल पड़े। सरकार की किरकिरी हो गई। इस वाकये से खुद सीएम खफा बताए जा रहे हैं और इसके लिए जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई भी हो सकती है। 

नए मुख्यमंत्री के नए मिजाज

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल राज्य सरकार के सहयोग से कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में फेक न्यूज से मीडिया को चौकन्ना करने के लिए एक संगोष्ठी हुई जिसमें बाहर से आए प्रमुख वक्ताओं के बीच मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी मौजूद थे। वे जब पहुंचे तब एक वक्ता की बात चल ही रही थी, और उन्होंने बिना किसी बाधा के उसे जारी रखवाया, और वे न केवल ध्यान से सुनते रहे, बल्कि बीच में मजाक में भी शामिल हुए। इसके बाद जब मुख्यमंत्री को बोलने के लिए माईक से बुलाया गया, तो उन्होंने एक और वक्ता को पहले बोलने के लिए कहा, ताकि वे सुन सकें। ऐसा कम ही होता है कि मुख्यमंत्री, और खासकर ऐसे व्यस्त दौर के ऐसे मुख्यमंत्री, बैठकर वक्ताओं की लंबी बात सुनें, लेकिन भूपेश बघेल ने ऐसा किया। 
एक तरफ वे अफसरों और नेताओं में से कुछ के खिलाफ आरोपों की कड़ी जांच के आक्रामक बयानों के लिए सुर्खियों में हैं, लेकिन ऐसे तनावों से परे वे बाकी लोगों के साथ सरलता का बर्ताव भी कर रहे हैं। राज्य बनने के बाद यह पहला मौका है कि कोई मुख्यमंत्री इतने लोगों के पांव छूता हो। वे अपने मंत्रिमंडल के भी कुछ साथियों के पांव छूते हैं, और पुराने परिचित लोगों में से भी बहुत से लोगों के साथ उनका वैसा ही सम्मान का रिश्ता जारी है। 

कल ही एक दूसरे कार्यक्रम में इसके तुरंत बाद वे पहुंचे, और वहां मंच पर सम्मानित किए जा रहे छत्तीसगढ़ के प्रमुख शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सांवर अग्रवाल को सम्मानित करते हुए उन्होंने उन्हें गले लगाया, और इस मौके पर कहा कि वे अपने बच्चों को इलाज के लिए मोटरसाइकिल पर लेकर डॉ. सांवर अग्रवाल के पास आते थे। स्टेज पर उनके शब्द थे- सर, मेरे बच्चों को मोटरसाइकिल पर लेकर आता था, आपके पास। 
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Date : 12-Feb-2019

रायपुर की पुरानी पहचान एक-एक करके अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है। इसी कड़ी में कल सोमवार को जवाहर बाजार की उन दुकानों को भी तोड़ दिया गया जहां किसी समय हमेशा रौनक और चहल-पहल रहा करती थी। 70-80 के दशक में साइकिल किराये पर लेने और देने का रिवाज था। तब इसी जवाहर बाजार में एक दुकान परफेक्ट साइकिल स्टोर्स के नाम पर थी। उन दिनों इस दुकान में सर्वाधिक साइकिलें किराये पर दी जाती थीं। उस समय लोगों के पास दुकानदार को विश्वास में लेने के लिए कोई परिचय पत्र नहीं होता था। न मतदाता परिचय पत्र और न ही किसी तरह का फोटोयुक्त व जगह की पहचान कराने वाला कोई प्रमाणपत्र। आधार कार्ड तो अभी-अभी की बात है। बस यहां के किसी स्थानीय व्यक्ति का परिचय बताओ और 25 पैसे घंटे में साइकिल किराये पर ले जाओ। तब पूरे देश में सबसे शांत, सीधा-सादा और सबले बढिय़ा छत्तीसगढिय़ा की पहचान रखने वाले छत्तीसगढ़ में इस तरह असुरक्षा की भावना भी नहीं थी । बहरहाल साइकिल दुकान के संचालकों के अनुसार यह दुकान 1932 में प्रारंभ की गई थी। उस समय इस बाजार का नाम फिलिप्स मार्केट था जो देश की आजादी के बाद जवाहर बाजार हो गया। इसी तरह इस मार्ग का नाम किसी अंग्रेज के नाम पर बेन्सिल रोड था जिसे स्वतंत्रता के बाद मालवीय रोड कर दिया गया। इसी बाजार से जुड़ी एक और भी रोचक कहानी है। उस समय शास्त्री बाजार बनकर तैयार था। जब इसे शिफ्ट करने की बारी आई तो कोई भी व्यापारी वहां जाने को तैयार नहीं था। उन्हीं दिनों नगर निगम में एक कमिश्नर आए थे। उनका नाम अजयनाथ था। कद-काठी छोटी थी मगर हिम्मत बहुत बड़ी। उन्होंने रात करीब 12 बजे मालवीय रोड को पुलिस छावनी बना दिया और रातों-रात जवाहर बाजार के व्यापारियों का सामान शास्त्री बाजार भिजवा दिया। तब जाकर शास्त्री बाजार शुरू हो पाया। अब नए निर्माण में इस बाजार की पहचान नष्ट न हो इसलिए रायपुर के नागरिकों ने शासन से अनुरोध किया है कि जवाहर बाजार के भव्य और विशाल द्वार को सुरक्षित रखा जाये। नगर निगम इसके लिए तैयार भी हो गया है।
-गोकुल सोनी के फेसबुक पेज से


Date : 11-Feb-2019

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के ठेकों में धमतरी के कुछ चहेते ठेकेदारों से मंत्री के स्तर पर मेहरबानी की जानकारी पूरे विभाग को बनी हुई थी। अब अपने कड़क बर्ताव के लिए चर्चित अफसर आलोक कटियार को इस विभाग में भेजा गया है जहां उन्होंने पहले भी काम करते हुए ठेकों की गड़बड़ी खत्म कर दी थी। काम सम्हालते ही वे धमतरी-कुरूद की सड़कों को देखने निकले, तो जो पत्थर उन्होंने उठाया, उसके नीचे से गड़बड़ी के सुबूत निकलने लगे। लेकिन दिक्कत यह है कि इस विभाग में बरसों से जमे हुए अफसरों की पकड़ जब तक कम नहीं होगी, तब तक बाहर से बीच-बीच में आने वाले अच्छे अफसरों से भी एक सीमा से अधिक काम नहीं हो पाएगा। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ग्राम सड़कों को मरम्मत की जितनी जरूरत है, उतनी ही जरूरत विभाग के अफसरों की मरम्मत की भी है। 
दिक्कत यह है कि पंचायत मंत्री टी.एस.सिंहदेव चिकित्सा मंत्री भी हैं, और पंचायत विभाग को एक बड़ी चिकित्सा की जरूरत है। सिंहदेव अभी-अभी चिकित्सा विभाग में एक प्रमाणित गड़बड़ अफसर की तैनाती करके अपने सारे विभागों के सारे अफसरों को एक गलत संदेश दे चुके हैं कि कितने भी बुरे का वे कितना भी भला कर सकते हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि ग्रामीण सड़कों की भारी गड़बड़ी के बीच वे कहीं किसी और बुरे अफसर का भला तो नहीं करने जा रहे हैं? पिछले पंचायत-चिकित्सा मंत्री अजय चंद्राकर के ये दोनों सबसे ही भ्रष्ट विभाग टी.एस. सिंहदेव को विरासत में मिले हैं। सिंहदेव का हाल यह है कि सरकार बनते समय जब उनसे मंत्रालय के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने साफ कहा था कि वे गृहमंत्री बनना नहीं चाहेंगे क्योंकि यह विभाग बहुत भ्रष्ट है। लेकिन उनकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, और उन्हें पुलिस विभाग से अधिक भ्रष्ट दो विभाग मिल गए हैं, इनकी खोखली बुनियाद को मजबूत करते-करते उनके पांच बरस निकल जाएंगे, और कामयाबी की इमारत खड़ा होना शुरू नहीं हो पाएगा। 

अस्पताल ट्रस्ट भी नजरों में...
मुकेश गुप्ता का बनवाया हुआ एक बड़ा अस्पताल, एमजीएम, शुरू से ही दबाव से दान जुटाकर बनाने की तोहमतें झेल रहा है। इन दिनों वहां पर लंबा-चौड़ा निर्माण और होना था। लेकिन पता लगा है कि विधानसभा चुनाव के दो महीने पहले जब एक बड़े निर्माण की तैयारी हो गई थी तभी अचानक काम रोक दिया गया। करीबी लोगों का कहना है कि यह आसार दिख रहा था कि यही सरकार दुबारा आने वाली नहीं है, और ऐसे में जाहिर था कि उस तरह से दान जुटना मुमकिन नहीं था, इसलिए काम रोक दिया गया था। अब पता लगा है कि सरकार इस अस्पताल ट्रस्ट के दानदाताओं की लिस्ट निकालकर उनसे भी बात करने वाली है कि किस मजबूरी में उन्होंने दान दिया था। ऐसी कुछ जानकारी सरकार के पास पहुंच चुकी है, और एक शासकीय अधिकारी से जुड़े ऐसे ट्रस्ट के लिए दान जुटाने के इन तरीकों के बारे में जांच एजेंसियां कानून खंगाल चुकी हैं। 

इंदिरा बैंक की प्रेतनी भी निकलेगी?
लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले एक इंदिरा बैंक घोटाला हुआ था। इसमें शहर के बड़े-बड़े नामी लोगों की पत्नियां डायरेक्टर थीं, और वैसे ही नामी लोगों ने इस बैंक का पैसा खाया भी था। हजारों खातेदारों की रकम इसमें डूबी थी, और जब इस बैंक के घोटालाबाज मैनेजर उमेश सिन्हा का बयान हुआ था, तो नार्को टेस्ट में अपने बयान की रिकॉर्डिंग में उसने मुख्यमंत्री रहे हुए रमन सिंह सहित कुछ बड़े-बड़े मंत्रियों का नाम भी लिया था कि उन्हें बंगलों में जाकर करोड़ों रूपए उसने खुद ने दिए थे। 
इस जांच की सीडी भी बरसों से बाजार में तैर रही थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की थी, बल्कि जिन लोगों को रिश्वत देना बताया गया था, उनसे पूछताछ भी नहीं हुई थी। अब इस सीडी को लेकर यह भी चर्चा है कि यह मुकेश गुप्ता के पास पूरी की पूरी थी, और उसकी एक कॉपी रायपुर के आईजी रहे जीपी सिंह के पास भी थी। इस सीडी के काटे हुए हिस्से बाजार में घूम रहे थे। अब बदले हुए माहौल में जब तमाम दबे हुए मामलों की जांच हो रही है तो इस सीडी की तलाश भी चल रही है कि पूरे के पूरे बयान की सीडी और इस बैंक घोटाले की फाईल किसके पास है? इन बरसों में ऐसी भी चर्चा रही कि इसी किस्म की कुछ सीडी, और कुछ फाईलों के चलते कुछ लोग ताकतवर बने रहे, और उनका बाल भी बांका नहीं हो पाया था। 

भागने के लिए नहीं, वास्तु-सुधार के लिए
राजधानी बनने के बाद पहली बार पुलिस के डीजी रैंक के अफसर मुकेश गुप्ता के बारे में लोगों का मुंह खुल रहा है, कलम चल रही है, और की-बोर्ड पर उंगलियां चलने की हिम्मत कर रही हैं, तो कई किस्म की गलत बातें भी लिखी जा रही हैं। 
अभी उन्होंने अपने सरकारी मकान के पीछे की दीवार तुड़वाकर एक गेट लगवाया, तो यह हल्ला हो गया कि किसी छापे की नौबत में गिरफ्तारी से बचने के लिए ऐसा किया गया। लेकिन कुछ जानकार लोगों ने बताया कि पूरे घर का नापजोख करके किसी वास्तुशास्त्री ने मुसीबत टालने के लिए पीछे की दिशा में गेट खुलवाने का सुझाव दिया, और उसी मुताबिक यह किया गया है। 
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