राजपथ - जनपथ

Posted Date : 21-Jul-2018
  • जीएसटी-नोटबंदी के बाद वैसे तो जमीन का कारोबार मंदा है। हाल यह है कि रायपुर और आसपास के इलाकों में रजिस्ट्री दर पर भी खरीददार नहीं मिल रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि कई इलाकों में जिला प्रशासन की तय की हुई जमीन की दर असल बाजार भाव से बहुत अधिक है, और लोग बहुत खुश होंगे अगर सरकार ही उस रेट पर उनकी जमीन ले ले। ऐसा न होने पर दो किस्म की दिक्कतें आ रही हैं, रजिस्ट्री ऑफिस तो सरकार की घोषित दर से ही रजिस्ट्री शुल्क लेता है, फिर चाहे असल खरीदी उससे कम पर क्यों न हुई हो। अब सरकारी रेट से कम पर बेचने वाले को भुगतान होता है, तो मामला इनकम टैक्स की नजर में आ जाता है कि भुगतान दो नंबर के पैसों में हुआ होगा।
    चुनाव लडऩे के इच्छुक कांग्रेस और भाजपा के कई नेताओं ने जमीन में भारी निवेश कर रखा है। यह सोचकर कि जमीन बेचकर चुनाव खर्च निकल जाएगा, लेकिन कुछ लोग परेशान है क्योंकि खरीददार नहीं मिल रहे हैं। इन सबके बीच सत्तारूढ़ दल के करीबी कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो कि तेजी से जमीन के सौदे कर रहे हैं। सुनते हैं कि भाजपा के प्रभावशाली नेता के एक बेहद करीबी बिल्डर ने महीने भर में ही 7सौ करोड़ की जमीन खरीदी है। बिल्डर ने एक कांग्रेस नेता को भी राहत दी है, जो कि चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे है और जमीन न बिकने से परेशान थे। खैर, जमीन के सौदेबाजी में कांग्रेस और भाजपा नेता एक-दूसरे को भरपूर सहयोग कर रहे हैं। हिंदी फिल्म का एक गाना भी है कि बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया...

    प्रत्याशी बनने कुर्सी छोड़ी...
    कांग्रेस के तीन जिला अध्यक्षों ने अपने पद से इस्तीफा देकर टिकट की दावेदारी की है। इस्तीफा देने वाले जिला अध्यक्ष विकास उपाध्याय रायपुर पश्चिम, आशीष छाबड़ा बेमेतरा और अभिषेक शुक्ला गुंडरदेही से टिकट चाहते हैं। तीनों ने भूपेश बघेल के उस बयान पर कि जिस पदाधिकारी को टिकट की दावेदारी करना है, उसे पद से इस्तीफा देना होगा। तीनों को टिकट मिलेगी या नहीं, अभी तय नहीं है। वैसे भी उनके क्षेत्र में कई और मजबूत दावेदार हैं, लेकिन पद छोडऩे के फार्मूले को लेकर कांग्रेस के नेता ही दबे स्वर में सवाल खड़े कर रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि पद छोड़कर दावेदारी करने का फार्मूला विकास की वजह से ही लाया गया। कहा जा रहा है कि भूपेश, शहर जिला अध्यक्ष पद पर गिरीश दुबे को चाहते थे। मगर, विकास पार्टी हाईकमान और स्थानीय प्रमुख नेताओं व अपनी सक्रियता के बूते पर दोबारा अध्यक्ष बनने में कामयाब रहे। अब चूंकि विकास ने इस्तीफा दे दिया है। इसलिए पार्टी की कुर्सी पर गिरीश की राह आसान दिख रही है, लेकिन उम्मीदवारी की कुर्सी पर क्या होगा, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। 

    जोगी और जोश
    भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कल लंबे इलाज के बाद दिल्ली से लौटे, तो उनका स्वागत खासा दमदार हुआ। राजधानी रायपुर में मरीन ड्राइव पर एक से अधिक शामियाने लगे थे, और उनके पहुंचने के घंटों पहले से लोग वहां डट गए थे। हर किसी को विधानसभा चुनाव में टिकट न चाहिए, न मिल सकती, लेकिन राजनीतिक दलों के सार्वजनिक कार्यक्रमों में चेहरा दिखते रहने से पुलिस और दूसरे अफसरों को उनका अहसास हो जाता है, और फिर छोटे-मोटे काम में आसानी हो जाती है। फिर यह भी है कि जब वार्ड के चुनावों का वक्त आएगा, तो उसकी उम्मीदवारी भी आजकल खासी महंगी रहती है, और खासे दाम की भी रहती है। कुछ लोग जिताने के लिए, तो कुछ लोग किसी को हराने के लिए कई तरह से सहयोग करते हैं, और हर पार्टी में ऐसा मौका पाने की हसरत बहुत से लोगों की रहती है। इसलिए अब अगला पूरा एक बरस  दो-तीन किस्म के चुनावों की वजह से सड़कों पर जोश बना रहेगा।

     

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Posted Date : 20-Jul-2018
  • छत्तीसगढ़ के पहले वित्तमंत्री रामचंद्र सिंहदेव को लेकर कई यादें जुड़ी हुई है। वे 2003 में ही सक्रिय राजनीति से सन्यास लेना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन सीएम अजीत जोगी के अनुनय-विनय पर चुनाव लडऩे के लिए तैयार हुए। जोगी ने उनसे कहा बताते हैं कि आपके चुनाव नहीं लडऩे से लोग यह कहेंगे कि एकमात्र ईमानदार मंत्री की टिकट भी जोगी ने कटवा दी। 
    2008 में राजनीति छोडऩे के बाद वे अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को सलाह देते रहते थे। बताते हैं कि वे सीएम डॉ. रमन सिंह को हर हफ्ते एक पत्र जरूर  भेजते थे, जिसमें विकास से जुड़े मुद्दों को लेकर सलाह होती थी। सीएम के पास रामचंद्र सिंहदेव के पत्रों का एक पूरा बंडल है। न सिर्फ राजनीतिज्ञों बल्कि अफसरों को भी सलाह देने के लिए हमेशा उपलब्ध  रहते थे। वे सिंचाई योजनाओं के गहरे जानकार थे। विवेक ढांड जब जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव थे, तब वे सिंचाई योजनाओं को लेकर सिंहदेव से सलाह लेते थे। सिंहदेव राज्य सरकार के अफसरों के घर जाकर उनसे चर्चा करने से परहेज नहीं करते थे। कुछ दिन पहले उन्होंने सीएस अजय सिंह के बंगले जाकर अलग-अलग विषयों पर उनसे चर्चा की थी। 
    लेकिन रामचंद्र सिंहदेव को लेकर उन्हें जानने वालों की स्मृतियां अनगिनत हैं। वे निजी जीवन में ऐसी किफायत से जीते थे कि उधर कोरिया के उनके महल से तो चोर फर्नीचर पर लगी चांदी उखाड़कर बोरों में भरकर ले गए थे, और इधर वे रायपुर के अपने घर में सड़क किनारे से दो-चार हजार में खरीदकर लाया गया सोफा इस्तेमाल करते थे। किसी तरह की शान-शौकत, दिखावा, उन्हें कुछ भी नहीं सुहाता था। किफायत का उनका हाल यह था कि लोग उन्हें कंजूस भी मान लेते थे। न उन्होंने कभी कार का शौक किया, न कपड़ों का, और न ही खानपान में कोई रईसी। वे पकाने के शौकीन थे, और अपने करीबी लोगों के घर जब खाने जाते थे, तो कभी-कभी कुछ जगहों पर रसोई में जाकर कोई चीज पकाकर दिखाते भी थे, और सिखाते भी थे। 
    राज्य के कल्याण और विकास को लेकर उनकी सोच और कोशिशें बेमिसाल थीं, और किसी पार्टी की सरकार रहे, कोई मंत्री रहे, कोई अफसर रहे, वे अपनी सलाह और योजना के साथ लगे रहते थे। 
    वे और शौक उन्हें फोटोग्राफी का था। लेकिन अपनी किफायत और कंजूसी के चलते वे आखिरी के बरसों तक नया कैमरा खरीद नहीं पाए जबकि हर बरस उन्हें करोड़ों की कमाई पारिवारिक पूंजीनिवेश से ही होती थी। बाद में उनके एक फोटोग्राफर-भतीजे ने उन्हें एक नया डिजिटल कैमरा भेजा। वे अपने परिचित परिवारों की लड़कियों या महिलाओं की तस्वीरें तो खींच देते थे, लेकिन सावधान इतने रहते थे कि लोगों से कहते थे कि वे अपना कैमरा लेकर आएं, और फोटो खींचकर वे कैमरा ही लौटा देते थे कि खुद ही उसका प्रिंट बनवाएं। आज चारों तरफ लोगों की बदनामी की जैसी घटनाएं होती हैं, उन्हें देखते हुए रामचंद्र सिंहदेव इतने सावधान रहते थे कि किसी लड़की या महिला की तस्वीर भी अपने कैमरे में नहीं रखते थे।
    लेकिन कोलकाता में कोई आधी सदी पहले पढ़ाई करते हुए, या काम करते हुए वे बंगाली फिल्मों की कई अभिनेत्रियों की बड़ी शानदार तस्वीरें खींचते थे, और उनके प्रिंट फे्रम कराकर अपनी दीवारों पर रखते भी थे। आने-जाने वाले लोगों को इन तस्वीरों को दिखाकर, उनके किस्से बताकर, उनकी तारीफ सुनने की उनकी हसरत भी किसी मासूम बच्चे जैसी थी। उन्हें खूब बातें करना, खूब सुनाना, और खूब सुनना सब कुछ बहुत अच्छा लगता था। मिलने वाले जानकार लोगों से वे ताजा राजनीति के बारे में दरयाफ्त भी करते रहते थे, और अपनी बेबाक राय भी बताते रहते थे।
    रामचंद्र सिंहदेव सरकारी फिजूलखर्ची के इतने खिलाफ थे कि उनके साथी मंत्री या उनके मातहत अफसर उनके पास किसी फाईल को ले जाने के पहले चार बार सोचते थे कि कौन-कौन सी बातों के लिए सुनना पड़ेगा। मंत्री न रहने पर वे राजधानी रायपुर में किसी बड़े मकान के चक्कर में नहीं पड़े, और सिंचाई कॉलोनी में छोटे अधिकारियों के लिए बने एक साधारण से मकान में वे बरसों तक रहे। रामचंद्र सिंहदेव का जाना छत्तीसगढ़ की राजनीति में सादगी और ईमानदारी के एक युग का चले जाना है। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 19-Jul-2018
  • छत्तीसगढ़ के पहले वित्त मंत्री, और बेमिसाल ईमानदार साख वाले नेता रामचंद्र सिंहदेव की हालत खासी खराब है। वे अस्पताल में वेंटिलेटर पर हैं, यानी खुद सांस नहीं ले पा रहे हैं। उम्र भी हो चली है, और बीमारी भी कम नहीं है। ऐसे में कल शाम यह खबर उड़ी कि वे गुजर गए हैं। आम तौर पर यह माना जाता है कि किसी की मौत की अफवाह उडऩे पर उसकी उम्र बढ़ जाती है, रामचंद्र सिंहदेव राजनीति और भारतीय जीवन में उस दुर्लभ नस्ल के तकरीबन आखिरी सफेद शेर हैं जो कि अरबों कमाने का मौका रहते हुए भी एक कप चाय नहीं कमाते। किसी बेबसी में नहीं, अपनी पसंद से। वे राजनीति में कांगे्रस में रहते हुए भी वामपंथियों जैसी सादगी और ईमानदारी वाले हैं, हालांकि वे वामपंथ से कोसों दूर भी हैं। वे उन नेताओं में से एक हैं जो कि बकरा और दारू बांटने के बजाय चुनाव न लडऩा बेहतर समझते हैं। जोगी सरकार में सिंहदेव वित्त मंत्री थे, और जनता का पैसा इतनी किफायत से, इतनी कंजूसी से खर्च करते थे कि जब कांगे्रस चुनाव हार गई तो पार्टी के सारे मंत्री-विधायकों ने रामचंद्र सिंहदेव को कोसा कि वे जनता का खजाना इतना बचाकर चल रहे थे कि पार्टी ही चुनाव में निपट गई। लेकिन रामचंद्र सिंहदेव ऐसी तोहमतों को एक सर्टिफिकेट मानते हैं, और सरकार चले जाने का उन्हें कोई गम नहीं रहा, उन्होंने बस काम अपने नीति-सिद्धांत के मुताबिक किया। 
    आज अस्पताल में वेंटिलेटर पर रामचंद्र सिंहदेव नहीं हैं, राजनीति में ईमानदारी का एक पूरा युग वेंटिलेटर पर है।

    अगली सरकार ही कुछ करेगी...
    राज्य के कई अधिकारी-कर्मचारी संगठनों के नेता सरकार से खफा हैं। इन नेताओं की शिकायत है कि सरकार ने प्रशासन में सुधार के लिए आयोग का गठन तो कर लिया, लेकिन रिपोर्ट की सुध नहीं ले रही है। आयोग के अध्यक्ष एस के मिश्रा, सीएस रह चुके हैं और उनकी साख भी अच्छी है। कर्मचारी नेता प्रशासन में सुधार को लेकर आयोग को अपने सुझाव दे चुके हैं। हाल यह है कि सरकार ने आयोग से रिपोर्ट लेना तो दूर, अध्यक्ष का कार्यकाल दिसम्बर तक के लिए बढ़ा दिया है। सरकार के कार्यकाल में तीन-चार महीने ही बाकी हैं। ऐसे में यदि आयोग की सिफारिश भी आ जाती है, तो इस पर अमल करने के लिए समय ही नहीं बच पाता है। यानी जो भी सिफारिश आएगी, उस पर अमल अगली सरकार करेगी। 

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 18-Jul-2018
  • प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल चर्चा में हैं। वे बेटे की पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ टीका-टिप्पणी कर अपने पुत्र के लिए परेशानी खड़ी करते रहे हैं। अभी नंदकुमार बघेल का ऑडियो वायरल हुआ है, जो कि कांग्रेस नेताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
    नंदकुमार बघेल कथित ऑडियो में यह कहते सुने जा रहे हैं कि पंडरिया सीट के लिए नीलू चंद्रवंशी का नाम सबसे ऊपर है, उसे ही टिकट दी जाएगी। बिलासपुर शहर से अटल श्रीवास्तव और कोटा से शैलेष पाण्डेय का नाम सबसे ऊपर है। बातचीत में यह भी कह रहे हैं कि पंडरिया से पिछली बार हार चुके लालजी चंद्रवंशी इस बार भी टिकट चाहते हैं लेकिन उन्हें समझाया गया है कि वे लोकसभा का चुनाव लड़ें। पार्टी इस बार युवाओं को ज्यादा टिकट देगी। पन्द्रह कुर्मी और 15 साहू प्रत्याशियों को टिकट दी जा सकती है। ब्राम्हणों को तीन-चार से ज्यादा टिकट नहीं देंगे, ये लोग आपस में तय कर लें कि किसे चुनाव लड़ाना है। 
    नंदकुमार बघेल के ऑडियो की पुष्टि 'छत्तीसगढ़Ó नहीं करता है। भूपेश अपने पिता के विचारों से कभी सहमत नहीं रहे हैं। नंदकुमार बघेल एक समय तत्कालीन सीएम अजीत जोगी के नजदीकी थे जबकि भूपेश, जोगी के धुर विरोधी। यह भी साफ है कि कांग्रेस में भी प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। दावेदारों से ब्लॉक स्तर पर आवेदन बुलाने की तैयारी चल रही है। खैर, कथित ऑडियो को कांग्रेस के लोग ही चटकारे लेते सुन रहे हैं। भूपेश और नंद कुमार बघेल के बीच पारिवारिक, सामाजिक, और राजनीतिक असहमति जग-जाहिर है, लेकिन जब किसी को भूपेश के खिलाफ कोई और मुद्दा न मिले, तो ऐसी रिकॉर्डिंग किसी काम तो आ ही जाती है।

    गुरू कृपा से पीयूष गोयल ने बात सुनी
    पीयूष गोयल पिछले दिनों व्यापारी-उद्योग संगठनों से रूबरू हुए। उनसे खुलकर चर्चा हुई। इस दौरान बेकरी व्यवसायियों ने भी अपनी परेशानी गिनाई। एक ने बेकरी ऑयटम पर जीएसटी ज्यादा लगने का जिक्र किया, तो अमर अग्रवाल ने उन्हें टोका। इस पर पीयूष गोयल ने अमर को शांत रहने का इशारा करते हुए, बेकरी व्यापारी को डिटेल में समझाने के लिए कहा। उसने कहा कि आप मुंबई के रहने वाले हैं। पीयूष ने हां कहते हुए कहा कि वे मुंबई में ही पैदा हुए हैं और बेकरी मुझे पसंद है। 
    व्यापारी ने आगे कहा कि आप मुंबई में 'गुरू कृपा' भी गए होंगे। पीयूष ने कहा हां, वे अक्सर वहां जाते हैं। 'गुरू कृपा' के समोसे मुझे काफी पसंद है। व्यापारी ने कहा कि शायद आपको संस्थान के मालिक के दर्द का अंदाजा नहीं होगा। उसने कहा कि समोसा बनाने के लिए आलू पर कोई टैक्स नहीं लगता, लेकिन तेल-मैदा पर पांच फीसदी जीएसटी देना होता है। समस्या यह है कि जैसे ही समोसा बनकर तैयार होता है, 18 फीसदी जीएसटी देना होता है। यानी 13 फीसदी अतिरिक्त लगता है। गोयल को उनकी बात वाजिब लगी और तुरंत उन्होंने पूछा कि रायपुर या प्रदेश में कितने प्रमुख बेकरी-व्यापारी हैं। इस पर बताया कि 30-40 प्रमुख व्यापारी हैं। गोयल ने कहा कि वे पहले कितना टैक्स देते थे और अब कितना जीएसटी देना पड़ रहा है। इसका डिटेल अमर अग्रवाल या फिर मुझे सीधे उपलब्ध करा दें, ताकि उन्हें इसको लेकर फैसला लेने में आसानी हो। अब बात यही खत्म नहीं होती, बाकी बेकरी व्यापारी डिटेल देने के लिए फिलहाल तैयार नहीं दिख रहे हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 17-Jul-2018
  • भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को देखें तो लगता है कि वे तमाम विरोधियों की हसरतों पर पानी फेरते हुए उठ खड़े होते हैं। उनके एक्सीडेंट से लेकर उनकी बीमारी तक हर मौके पर ऐसे लोगों को लगता है कि अब वे सक्रिय राजनीति में उतनी हिस्सेदारी नहीं कर सकेंगे। लेकिन वे फिर पलटकर आते हैं, और पहले के मुकाबले अधिक ताकतवर साबित होते हैं। इस बार वे दिल्ली से न सिर्फ सेहत लेकर लौट रहे हैं, बल्कि अपनी पार्टी के लिए चुनाव चिन्ह भी लेकर आ रहे हैं। चुनाव चिन्ह भी उनके मिजाज के मनमाफिक है, हल चलाता हुआ किसान। जोगी की पकड़ शहरों में नहीं है, और गांवों में है। गांवों में भी गरीब, दलित, आदिवासी, ऐसे लोगों के बीच उनकी ज्यादा पकड़ मानी जाती है। वे अपने इस चुनाव चिन्ह का अपने वोटर-तबके के बीच जमकर इस्तेमाल भी करेंगे। इसके साथ ही उनके विरोधियों का यह मजा भी खत्म हो गया है कि जोगी की पार्टी का तो रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है, या उसे चुनाव चिन्ह नहीं मिला है। 
    अब जब कांगे्रस पार्टी ने अजीत जोगी की विधायक पत्नी रेणु जोगी को अघोषित और अनौपचारिक बिदाई दे दी है, तो अगले विधानसभा चुनाव में इस परिवार के चार लोगों में से कौन कहां से लड़ेंगे, यह सवाल खड़ा हो गया है। रेणु जोगी और उनकी बहू ऋचा, और जोगी पिता-पुत्र आदिवासी केस के चलते हुए पता नहीं अब आदिवासी सीटों से लडऩा चाहेंगे, या कि अनारक्षित सीटों से। 
    और कांग्रेस का हाल
    दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी ने ऐसा रूख बनाया है कि उसके बड़े-बड़े दिग्गज, लेकिन आज खाली नेताओं को भी विधानसभा का चुनाव लड़वाया जाए। चरण दास महंत भी विधानसभा चुनाव में उतारे जा सकते हैं क्योंकि एक बार राज्य में कांगे्रस की सरकार बन जाए, तो लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ाने में आसानी भी होगी। लेकिन कांगे्रस एक दूसरी बात से जूझ रही है कि बड़ी-बड़ी लीड से हारने वाले बड़े-बड़े नेताओं को कैसे टिकट दे, और छोटी-छोटी लीड से हारे हुए दूसरे नेताओं को टिकट के लिए मना कैसे करे। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 16-Jul-2018
  • केन्द्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल रविवार को व्यापारी-उद्योग संगठनों से रूबरू हुए। यह पहला मौका था जब किसी केन्द्रीय वित्त मंत्री ने  राज्य में उद्योगपतियों और व्यापारियों को सामने बिठाकर उनकी समस्याएं सुनी। स्वागत भाषण देते समय सीएसआईडीसी चेयरमैन छगन लाल मुंदड़ा जीएसटी का जिक्र करते हुए बोले कि समुद्र मंथन में अमृत और जहर दोनों निकला था। एक साल गुजर गए और अब हम व्यापारियों को अमृत की आशा है। 
    उन्होंने गोयल की तारीफों का पुल बांधते हुए यह भी कहा कि देश भर के व्यापारियों की इच्छा थी कि पीयूष गोयल देश के वित्त मंत्री बने। उन्होंने गोयल को वित्त मंत्रालय देने पर पीएम का आभार माना। उनकी इस टिप्पणी पर गोयल ने ठहाके लगाए। क्योंकि यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अरूण जेटली का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है और इस वजह से कुछ समय के लिए ही गोयल को वित्त विभाग का प्रभार दिया गया। जेटली अब धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही फिर से वित्त विभाग का प्रभार संभालेंगे। 

    जेलों का अलग साम्राज्य जारी
    जिस तरह उत्तरप्रदेश की एक जेल में एक खतरनाक मुजरिम को कत्ल किया गया, उससे जाहिर है कि देश की बाकी जेलें भी चौंकी होंगी। तकरीबन उसी वक्त यह बात सामने आई कि छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिले में जेल में बंद एक पुराना गैंगस्टर वहीं से जमीनों पर कब्जे और खरीद-बिक्री का अपना साम्राज्य चला रहा है, करोड़ों वसूल कर रहा है। इसके बाद हड़बड़ी में जेल प्रशासन ने उसे दुर्ग से अंबिकापुर भेजा ताकि वह अपने इलाके से कुछ दूर रहे। लेकिन जेल प्रशासन को मालूम होते हुए भी वह अनजान बने रहता है कि प्रदेश की हर जेल में धड़ल्ले से मोबाइल फोन चलते हैं, गैरकानूनी रसोईघर चलते हैं, और हर किस्म का नशा भी खासे मोटे दाम पर बिकता है। 
    एक जानकार ने बताया कि कचरा लेने के लिए जो गाड़ी बाहर से जेल के भीतर जाती है, वह सामानों से भरी रहती है, और उसे अनदेखा करने की सबको कीमत मिलती है। जेल के भीतर अलग-अलग बैरक को अलग-अलग मुजरिमों को ठेके पर दे दिया जाता है, और वे जहां से जितनी वसूली कर सके करते हैं। कुछ लोगों को पीटकर दहशत में लाकर, तो कुछ लोगों को सामान और सहूलियत देकर मोटी वसूली की जाती है। जेल के हर कैदी को इन तमाम चीजों के रेट मालूम हैं, अगर नहीं मालूम हैं तो उन आला अफसरों को नहीं मालूम है जिन्हें अपने साम्राज्य में सब ठीक लगता है।
    वित्त मंत्री के आने से खुशी...
    केन्द्रीय वित्त मंत्री के कार्यक्रम से उद्योगपति-व्यापारी काफी खुश नजर आए। कार्यक्रम के सफल आयोजन पर चेम्बर अध्यक्ष जितेन्द्र बरलोटा की जमकर वाहवाही हुई। इससे पहले किसी भी चेम्बर अध्यक्ष के कार्यकाल में इस स्तर का कार्यक्रम नहीं हुआ। पिछले कुछ समय से व्यापारी नेताओं के बीच आपसी मतभेद के चलते चेम्बर सुर्खियों में रहा है। चेम्बर के पूर्व अध्यक्ष अमर परवानी ने कैट के बैनर तले अपनी राह अलग कर ली है। कुछ नेताओं को समस्या श्रीचंद सुंदरानी के दखल से रही है। यह भी कोशिश हुई कि चेम्बर के बैनर तले यह कार्यक्रम न हो, लेकिन सरकार के रणनीतिकारों ने ऐसा करने से मना कर दिया। जितेन्द्र बरलोटा ने बड़ा दिल दिखाते हुए चेम्बर से नाराज चल रहे व्यापारी नेताओं को पीयूष गोयल के सामने अपनी बात रखने में भरपूर सहयोग दिया। बाद में जब चेम्बर के पदाधिकारियों ने गोयल के सम्मान में स्मृति चिन्ह भेंट किया, तो गोयल ने व्यापारियों के इस सम्मान को तुरंत प्रदेश भाजपा दफ्तर में रखने के लिए कहा है। 

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 15-Jul-2018
  • धरसीवां के एक कार्यक्रम में पूर्व केन्द्रीय मंत्री रमेश बैस का दर्द एक बार फिर छलक पड़ा। वे छत्तिसगढिय़ों की उपेक्षा पर फट पड़े और यहां तक कहा बताते हैं कि कब तक द्रोपदी माता का चीरहरण होते रहेगा और हम कब तक भीष्म पितामह की तरह चुप रहेंगे। उनकी नाराजगी स्वाभाविक थी, क्योंकि सबसे वरिष्ठ सांसदों में होने के बाद भी उन्हें मोदी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाई। और अब तो वे पार्टी के कोर ग्रुप से भी बाहर हैं। कार्यक्रम में पूर्व आईएएस गणेश शंकर मिश्रा समेत कुछ स्थानीय प्रतिभाओं का सम्मान किया गया। मिश्रा रिटायर होने के बाद से सालभर से खाली हैं और उन्हें अब तक कोई पद नहीं मिल पाया। रिटायर होने के बाद वे भी यहां-वहां छत्तिसगढिय़ों की उपेक्षा का जिक्र करते सुने जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह कार्यक्रम प्रयास संस्था के बैनर तले हुआ। जिससे मिश्राजी के भतीजे भी जुड़े हैं। चुनाव आचार संहिता लगने में तीन महीने बाकी हैं, ऐसे में कहा जा रहा है कि मिश्राजी को जल्द ही कोई पद नहीं मिला तो छत्तिसगढिय़ों की का स्वर और तेज होगा। यह सब देखकर लोगों को याद पड़ रहा है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के चौथाई सदी पहले से जब किसी बड़े छत्तीसगढ़ी नेता को भोपाल या दिल्ली में महत्व नहीं मिलता था, तो पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की मांग उठती थी। मतलब यह कि कुछ व्यक्ति अपनी उपेक्षा को, या उम्मीदें पूरी न होने को छत्तीसगढ़ क्षेत्र की उपेक्षा बताने लगते थे। अब राज्य बन गया तो उपेक्षा क्षेत्र की तो नहीं हो सकती, छत्तिसगढिय़ों की उपेक्षा का नारा फिर भी काम आ सकता है। ऐसे में लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि पिछले हफ्ते छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के आदेश से तीन विश्वविद्यालयों की कुलपति नियुक्त हुए हैं। इनमें से दो सरकारी विश्वविद्यालय हैं, और एक निजी। लेकिन तीनों के तीनों कुलपति महाराष्ट्र के हैं, और गैरछत्तीसगढ़ी महाराष्ट्रियन हैं, ऐसा भी नहीं कि वे पीढिय़ों से यहां पर बसे हुए मराठी हों। अब छत्तीसगढ़ के जो लोग कुलपति बनने के लायक हैं, या ऐसी चाहत रखते हैं, उनके लिए भी एक मुद्दा तो तैयार हो ही गया है। 

    थोड़ा पहले ही जाग  जाते साहब...
    कल पूरे छत्तीसगढ़ के आला पुलिस अफसरों ने मिलकर दिमाग लगाया कि छोटे पुलिस कर्मचारियों का क्या-क्या भला करना जरूरी है।  यह बात बड़े ओहदों को खुद होकर नहीं सूझी थी, जब पुलिस-परिवारों का एक अभूतपूर्व आंदोलन हुआ, तब जाकर सरकार नींद खुली कि ऐसे बागी तेवर धमाके से सामने आने के पहले अफसरों को समझ क्यों नहीं आए थे। वैसे तो अफसरों से अधिक यह बात नेताओं को समझ आनी थी क्योंकि वे जनता से अधिक जुड़े रहते हैं, लेकिन यह जाहिर है कि अब वे जनता से पर्याप्त नहीं जुड़े रहते हैं। और जैसा कि बोलचाल की जुबान में कहा जाता है, जब तक बच्चा न रोए, माँ भी उसे दूध नहीं पिलाती है, पुलिस परिवारों के सड़क पर आने के पहले तक किसी को उनकी फिक्र नहीं हुई थी। लेकिन अब बड़ी वर्दियों में हड़बड़ाहट है कि ऐसी नौबत दुबारा न आ जाए, इसलिए कल दिन भर मगजमारी हुई है, दिमाग लगाया गया है। इस दिमाग की जगह अगर पहले दिल लगा लिया गया होता, तो यह नौबत ही नहीं आती।
     खैर पानी सिर तक पहुंचने के पहले यह सोच-विचार शुरू हो गया है, और बड़े अफसरों के लिए फिक्र का एक सामान बिलासपुर हाईकोर्ट से भी आया है जिसमें इस आंदोलन के दौरान बर्खास्त किए गए छोटे पुलिस कर्मचारियों की बर्खास्तगी पर रोक लगा दी है। यानी बड़ी पुलिस की की हुई सारी कार्रवाई धरी रही और छोटी पुलिस की फिक्र करनी ही पड़ रही है।
    आखिर वह इंसान तो है नहीं...
    शहर की एक संपन्न कॉलोनी में घर के बाहर चौकीदारी कर रहा एक उत्तर भारतीय एक सांड के बदन पर कुछ करते दिखा। आमतौर पर लोग अगर स्पेन के नहीं हैं, तो सांड से डरते ही डरते हैं, स्पेन में जरूर लोग सांडों के सामने दौड़ते हैं, और उनसे तरह-तरह से लड़ते हैं। ध्यान से देखने पर दिखा कि यह आदमी सांड के बदन पर चिपके कीड़ों को खींच-खींचकर निकाल रहा था, और मानो सांड को भी यह साफ समझ आ रहा था कि उसका खून चूसने वाले कीड़ों से मिल रही राहत उसके भले की है। वह एकदम शांत खड़ा था, और हिल भी नहीं रहा था। पास से गुजरते हुए उस चौकीदार के किसी परिचित ने जोरों से हांका लगाया, नंदी बाबा की सेवा हो रही है? 
    चौकीदार ने जवाब दिया, हमारे पिताजी भी सेवा करते आए हैं, और उन्होंने तो खूब बड़े-बड़े, इतने ऊंचे-ऊंचे नंदी पाल रखे थे, यह तो छोटा सा है। 
    अब यह नंदी इस चौकीदार के साथ इस तरह हिल-मिल गया है कि वह रोज कीड़े निकलवाने पहुंच जाता है। मारना तो दूर रहा वह चौकीदार के पीछे-पीछे छोटे से पिल्ले की तरह घूमते रहता है। आखिर वह जानवर है, इंसान तो है नहीं कि अपना भला करने वाले को भूलकर उसे सींग मारने लगे। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 13-Jul-2018
  • विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने नाराज वर्गों को मनाने की कोशिश में लगी है। शिक्षाकर्मियों के बाद अब व्यापारियों की नाराजगी को दूर करने की पहल की गई है। व्यापारी वर्ग भाजपा के परम्परागत  वोटर रहे हैं, लेकिन नोटबंदी-जीएसटी और आयकर छापों के चलते यह वर्ग छिटक गया है। सरकार और पार्टी के रणनीतिकारों को इसका भान भी है। यही वजह है कि केन्द्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल को यहां व्यापारियों से आमने-सामने कराकर उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिश की गई है। 
    सुनते हैं कि खुद सीएम ने पीयूष गोयल को यहां आने के लिए तैयार किया है। गोयल 15 तारीख को व्यापारियों से रूबरू होंगे। इसमें प्रदेशभर के व्यापारी नेताओं को बुलाया जा रहा है और वे गोयल के सामने अपनी बात रख सकेंगे। हालांकि यह कार्यक्रम चेम्बर के बैनर तले हो रहा है, लेकिन कार्यक्रम को सफल बनाने का काम परदे के पीछे सीएसआईडीसी चेयरमैन छगनलाल मुंदड़ा और विधायक श्रीचंद सुंदरानी को दिया गया है। गोयल, व्यापारियों को कितना संतुष्ट कर पाते हैं, यह देखना है। 

    सख्ती से चुनाव तक परहेज
    बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल चुनाव के पहले कुछ प्रशासनिक फेरबदल चाहते हैं। सुनते हैं कि वे पहले कलेक्टर को हटाने के पक्ष में थे। अब वे चाहते हैं कि आईजी दीपांशु काबरा को बदल दिया जाए। हल्ला है कि काबरा ने कोयला कारोबारियों पर नकेल कस दिया है। अवैध परिवहन पर सख्ती बरती जा रही है। जबकि अमर चुनाव तक इसको लेकर रियायत चाहते हैं। अब चूंकि रायपुर आईजी  प्रदीप गुप्ता को बदला जाना तय है, तो अमर समर्थकों ने विकल्प के रूप में काबरा का नाम सुझा दिया। सरकार को अभी फेरबदल को लेकर हड़बड़ी नहीं है क्योंकि 30 अगस्त तक फेरबदल किया जा सकता है। और यह भी जरूरी नहीं है कि काबरा ही प्रदीप गुप्ता की जगह लें।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 12-Jul-2018
  • राज्य विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष नारायण सिंह का कार्यकाल शुक्रवार को खत्म हो रहा है। नए अध्यक्ष के चयन के लिए जस्टिस एससी व्यास की अध्यक्षता में कमेटी का गठन हो चुका है, लेकिन अभी  आवेदन मंगाने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। कुल मिलाकर अध्यक्ष का पद कम से कम महीने भर खाली रहेगा और एकमात्र सदस्य के बूते आयोग का काम चलेगा। 
    सुनते हैं कि आयोग के अध्यक्ष पद के लिए कई सेवानिवृत्त आईएएस लगे हुए हैं। साथ ही तकनीकी विशेषज्ञ भी इसके लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं। आयोग के पहले अध्यक्ष एस के मिश्रा, सीएस का पद छोड़कर बने थे। इसके बाद सीएसईबी के सचिव रहे मनोज डे काबिज हुए, फिर एसीएस अफसर नारायण सिंह को अध्यक्ष बनने का मौका मिला। इस बार पावर कंपनी के लोग चाहते हैं कि कंपनी से जुड़े रहे अफसर को ही अध्यक्ष बनाया जाए। हालांकि आईएएस लॉबी यह पद अपने पास ही रखना चाहती है। गणेश शंकर मिश्रा को रेस में सबसे आगे माना जा रहा है। खैर, आचार संहिता लगने से पहले सरकार की यह आखिरी नियुक्ति होगी। ऐसे में चुनाव से पहले किसी तरह का विवाद न खड़ा हो, यह ध्यान में रखकर निर्णय लेने की संभावना है, और जैसा कि चुनाव के पहले के महीनों में होता है, किसी छत्तीसगढ़ी, स्थानीय को ही मौका मिलने की राजनीतिक अटकल लगाई जा रही है।


    एक तरफ तो हिंदुस्तान में सरकारों से लेकर अदालतें तक बढ़ते हुए शोरगुल को काबू में करने की बात करती हैं, दूसरी तरफ सड़कों पर हमेशा से दिखने वाला हॉर्न प्लीज का नारा गाडिय़ों पर से हटने का नाम भी नहीं ले रहा। ऐसा लिख देखकर पीछे चलती गाड़ी को यही लगता है कि हॉर्न बजाना जरूरी है। अगर इस आदत को घटाना है, इस नारे को बदलकर नो-हॉर्न लिखवाना जरूरी है।

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 11-Jul-2018
  • भाजपा के दो दिग्गज नेताओं के रिश्तेदारों ने उनके नाक में दम कर रखा है। विधानसभा चुनाव में तीन-चार महीने बाकी हैं और रिश्तेदारों के कारोबारी झगड़े से दोनों नेताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एक के रिश्तेदार पर तो बाजार का करीब साढ़े तीन सौ करोड़ का कर्जा है। कर्जा देने वाले नेताजी के सामने खड़े हो रहे हैं, लेकिन रिश्ता इतना नाजुक है कि नेताजी भी हस्तक्षेप नहीं कर पा रहे हैं। दूसरे नेता का मामला कुछ अलग है। 
    उन्होंने अपने रिश्तेदार से करीब सात करोड़ लेकर जमीन में निवेश कर दिए। नोटबंदी और जीएसटी के चलते जमीन का कारोबार बुरी तरह बैठ गया है। नेताजी चुनाव लडऩे की भी तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में वे अपनी अर्थव्यवस्था दुरूस्त करने में जुटे हुए हैं, लेकिन रिश्तेदार ने पैसा वापसी के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। पहले तो समझाने-बुझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बन पाई। दोनों के बीच लेन-देन की खबर बाहर आने लगी, तो कुछ समाज के प्रमुख लोगों ने विवाद को सुलझाने के लिए  हस्तक्षेप भी किया है। मामला कुछ हद तक सुलझ भी गया है, लेकिन कभी कभार सोशल मीडिया के माध्यम से नेताजी के प्रति अलगाव जाहिर कर देते हैं। ऐसे में नेताजी का टेंशन में रहना स्वाभाविक है। 
    तुलना शुक्लबंधुओं से लेकर...
    छत्तीसगढ़ के पुराने लोगों को श्यामाचरण शुक्ल अक्सर अच्छी बातों के लिए याद आते हैं। एक इंसान के रूप में उनकी बड़ी खूबियां थीं, और उनके छोटे भाई विद्याचरण शुक्ल के तेवर अलग किस्म के थे। दोनों की तुलना करते हुए उस वक्त के लोग कहते थे कि श्यामाचरण बेहतर इंसान हैं, और विद्याचरण बेहतर राजनेता। ऐसी तुलना बहुत से लोगों की होती है, जो कि सार्वजनिक जीवन में रहते हैं। महज बालों, और चेहरे-मोहरे की वजह से तुलना करने वाले प्रियंका गांधी की तुलना इंदिरा गांधी से भी करते रहते हैं। वैसे इससे भी अधिक तुलना आजकल कई नेताओं की चाणक्य से होने लगी है कि आज का कौन सा नेता चाणक्य जैसा है, उसकी टक्कर का है, या उससे बढ़कर है। 
    इसी बीच आजकल में विश्वकप फुटबॉल का जो मौसम है वह भी सिर चढ़कर बोल रहा है। और तुलना करने के लिए लोगों ने एक अच्छी लिस्ट सोशल मीडिया पर पोस्ट की है। 
    आज इंग्लैंड का क्रोएशिया के साथ विश्व कप फुटबॉल में सेमीफाइनल मैच होने जा रहा है। पिछली बार इंग्लैंड 1990 में सेमीफाइनल में पहुंचा था, और तब से अब तक एक पीढ़ी से अधिक गुजर चुकी है। ऐसे में इंटरनेट पर लोग इस बात का मजाक भी बना रहे हैं कि पिछली बार जब इंग्लैंड सेमीफाइनल में था, तब आज की कौन-कौन सी चीजें नहीं थीं। 
    ट्विटर पर ऐसी एक लिस्ट में गिनाया गया है कि आईफोन, फेसबुक, गूगल, अमेजान, एंड्राइड, ट्विटर, इंस्टाग्राम, आईपॉड, याहू यू-ट्यूब, स्नैपचैट, लिंक्डइन, विकिपीडिया, एसएमएस, बजफीड, ब्लैकबेरी, टेसला, स्काईप, उबेर, बिटक्वाइन, फिटबिट, ई-बे, आईपेड, और क्रोएशिया। सेमीफाइनल में इंग्लैंड को आज टक्कर देने वाला क्रोएशिया इंग्लैंड के पिछले सेमीफाइनल के वक्त देश भी नहीं बना था। वह 25 जून 1991 को देश बना है। 

    मुंह ही नहीं, कान भी हैं...
    प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पी एल पुनिया की कार्यप्रणाली एकदम अलग है। उनके पूर्ववर्ती बी के हरिप्रसाद चुनिंदा नेताओं से मिलते थे और बड़े आयोजनों में ही शिरकत करते थे, लेकिन पुनिया छोटे-बड़े नेताओं से अलग से मेल-मुलाकात में परहेज नहीं करते हैं। यदि कोई छोटा नेता शिकायत करता है, तो वे उसे ध्यान से सुनते हैं और शिकायत की तह तक जाने की कोशिश करते हैं। उनकी कार्यप्रणाली के चलते ही कुछ हद तक कांग्रेस में एकजुटता दिखने लगी है। कुछ दिन पहले वे गांधी उद्यान में मॉर्निंग वॉक के लिए गए, तो उनके पीछे दो पुराने कांग्रेस समर्थक भी हो लिए। दोनों आपसी चर्चा में पुराने कांग्रेसियों को उपेक्षित करने का जिक्र कर रहे थे। आगे-आगे पुनिया उनकी बात सुन रहे थे और तीन चक्कर पूरा होने के बाद रूक गए। 
    उन्होंने दोनों का परिचय लिया और पुराने कांग्रेसियों की उपेक्षा पर बात की। इसके बाद दोनों को ऐसे नेताओं की सूची बनाकर देने के लिए कहा। पुनिया ने उनसे कहा कि वे खुद उपेक्षित नेताओं से मिलकर उनकी नाराजगी दूर करेंगे। पुनिया की बात सुनकर दोनों गद्गद् हैं और सूची भी तैयार करने में लगे हैं। 


    सरकारी बोर्ड बाजार भाव से खासे अधिक दाम पर लगते हैं, और उसके बाद भी अगर उनमें ऐसी गलतियां रह जाती हैं जिनसे कि आसपास से गुजरते बच्चे भाषा को गलत सीख लें, तो सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए। बड़ी संख्या में ऐसे सरकारी बोर्ड दिखते हैं जिनमें हिज्जों की गलतियां रहती हैं। वैसे तो उस इलाके में रहने वाले पढ़े-लिखे लोग भी इन गलतियों को बता सकते हैं, लेकिन एक बार बाहर से छपकर आ गया बोर्ड फिर सुधरे तो कैसे सुधरे? यह हाल गांवों का ही नहीं है, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ऐसी गलतियों वाले बोर्ड से भरी पड़ी है। तस्वीर / छत्तीसगढ़

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Posted Date : 10-Jul-2018
  • केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों में पुलिस महानिदेशक बनाने के नए नियम आए, तो हर राज्य में सबसे ऊपर के कुछ अफसरों में बेचैनी और हड़बड़ी छा गई। अफसरों को अपनी रिटायर होने की तारीख के पहले डीजीपी बनने का हिसाब-किताब सूझने लगा। केंद्र के नए निर्देशों में अब सरकार ऐसे किसी को डीजीपी नहीं बना सकेगी जिसकी नौकरी पर्याप्त बाकी न हो। छत्तीसगढ़ में फिलहाल तो राज्य सरकार मौजूदा डीजीपी ए.एन. उपाध्याय से कई बरस संतुष्ट चली आ रही है, और ऐसे आसार नहीं हैं कि चुनाव के पहले उनके नाम पर कोई और विचार किया जाए। ऐसे में अगली सरकार ही अगले किसी डीजीपी के बारे में  सोच सकती है। उस हालत में राज्य के आज के सबसे वरिष्ठ आईपीएस गिरधारी नायक का नाम वरिष्ठता की वजह से एक बार फिर लिस्ट में तो रहेगा ही। लेकिन चूंकि सरकार ने उनकी वरिष्ठता को किनारे रखकर उपाध्याय को डीजीपी बनाया है, इसलिए गिरधारी नायक की संभावना  कम लगती है, लेकिन वरिष्ठता में वे तब तक बने रहेंगे, जब तक वे रिटायर नहीं हो जाते। उनके बाद डी.एम. अवस्थी का नाम रहेगा जिनकी नौकरी इतनी लंबी बाकी है कि अगर उनको डीजीपी बनाया गया, और उपाध्याय की तरह लंबी पारी मिली, तो उनके बाद के तीनों अफसर, संजय पिल्ले, आर.के. विज, और मुकेश गुप्ता, सभी रिटायर हो जाएंगे। केंद्र सरकार के आदेश-निर्देश में अभी भी थोड़ी सी गलतफहमी की गुंजाइश बाकी है क्योंकि उसमें रिटायर होने में पर्याप्त समय बाकी होने का जिक्र है, और यह पर्याप्त कितना लंबा या छोटा हो, यह अपने-अपने नजरिए की बात होती है।

    एसटीएफ है या कालापानी?
    वैसे तो प्रदेश में नक्सलियों से निपटने के लिए एसटीएफ का गठन  हुआ है, लेकिन यहां पोस्टिंग को लूप लाईन माना जाता है। यानी ज्यादातर पुलिस अफसर एसटीएफ में पोस्टिंग के इच्छुक नहीं रहते। यह भी देखा गया है कि सरकार जिससे नाराज रहती है, उसे सजा के तौर पर एसटीएफ में भेज देती है। पिछले दिनों विधायक डॉ. विमल चोपड़ा से मारपीट के चलते सुर्खियों में रहे आईपीएस उदयकिरण को महासमुंद से हटाकर एसटीएफ में भेज दिया गया। उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग हो रही थी। उदयकिरण से पहले एसटीएफ में राजेश कुकरेजा पदस्थ थे। वे भी महासमुंद में डॉ. चोपड़ा से विवाद कर आए थे। चूंकि विधायक महोदय को सरकार नाराज नहीं करना चाहती थी, लिहाजा उन्हें भी हटाकर एसटीएफ में भेजा गया था। उदयकिरण के खिलाफ सख्त कार्रवाई की उम्मीद थी, लेकिन भाजपा के ही स्थानीय नेता उल्टे डॉ. चोपड़ा पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाने लगे। चुनाव निकट है और सरकार स्थानीय नेताओं को नाराज नहीं करना चाहती थी। ऐसे में एसटीएफ में पोस्टिंग के रूप में बीच का रास्ता निकाला गया। अंगे्रजों के वक्त जिसको कड़ी सजा देनी होती थी, उसे कालापानी पर अंडमान भेज दिया जाता था। छत्तीसगढ़ में...


    पत्नी या पे्रमिका अगर आप पर हावी हैं, तो उनके दबाव से निकलने का रास्ता सुझाने की यह दूकान दिल्ली में है। सात सौ रुपये घंटा देकर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं... और दूसरी तरफ एक भारत प्रसिद्ध चुनौती है जिसका इस्तेमाल करके आप 7 घंटों में सौतन या दुश्मन को तड़पता देख सकते हैं...

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 09-Jul-2018
  • भाजपा की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय की कुछ दिनों पहले खैरागढ़ में सिद्धार्थ सिंह के साथ मुलाकात की राजनीतिक हल्कों में जमकर चर्चा है। सिद्धार्थ सिंह सीएम के करीबी रिश्तेदार हैं। उनके पुत्र विक्रांत सिंह नगर पालिका अध्यक्ष रह चुके हैं। विक्रांत, खैरागढ़ सीट से भाजपा टिकट के दावेदार भी हैं। कहा जा रहा है कि विक्रांत भी अपने पिता की सरोज के साथ बैठक के दौरान मौजूद थे। पार्टी नेता इसे सामान्य मेल-मुलाकात बता रहे हैं, लेकिन हल्ला यह है कि सरोज की वैशाली नगर सीट को लेकर काफी दिलचस्पी है। चर्चा है कि वे अपने भाई राकेश पाण्डेय को वैशाली नगर से टिकट दिलाना चाह रही हैं। वैसे सरोज की भाभी भी भिलाई सीट से चुनाव लडऩे की इच्छा जता चुकी है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों से यह साफ हो गया है कि भिलाई विधानसभा सीट से विधायक प्रेम प्रकाश पाण्डेय की सीट बदलना नामुमकिन है। खुद पीएम ने भिलाई प्रवास के दौरान प्रेमप्रकाश को खास तवज्जो दी थी। खैर, पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि सरोज चाहती हैं कि खुद सीएम राकेश को टिकट देने की सिफारिश करे। यदि ऐसा होता है तो राकेश की टिकट तय हो जाएगी। सीएम को इसके लिए तैयार करने का जिम्मा सरोज ने सिद्धार्थ सिंह को दिया है और वे विक्रांत को युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दिलाने के लिए प्रयास करेंगी। दोनों की मुलाकात को लेकर जितने मुंह, उतनी बातें हो रही है, लेकिन टिकट को लेकर जिस तरह पार्टी में हलचल है उससे कई प्रमुख नेता इसे सच भी मान रहे हैं। लेकिन बंद कमरों की बातचीत जब छनकर बाहर आती है, तो कई बार उसमें से सच का बहुत सा हिस्सा छन्नी में रह जाता है, और कई अनकही बातें जुड़ भी जाती हैं। इसलिए राजनीति में इन बातों का वजन इस आशंका को ध्यान में रखते हुए ही तौलना चाहिए। कहने वाले यहां तक कहते हैं कि सरोज पाण्डेय के लिए संसद मंजिल नहीं, महज एक रास्ता है जिससे वे मुख्यमंत्री निवास तक पहुंचना चाहती हैं।

    बिना कड़वाहट के मुकाबले
    अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के साथ ही चौथे विधानसभा का आखिरी सत्र खत्म हो गया। सत्र के पहले दिन दिवंगत पूर्व मंत्री हेमचंद यादव, केयूर भूषण और विक्रम भगत को श्रद्धांजलि दी गई। विशेषकर हेमचंद की कमी सदस्यों को काफी खली। क्योंकि सदन में मौजूद ज्यादातर सदस्यों से उनका नाता था। हेमचंद के चिरपरिचित प्रतिद्वंदी अरूण वोरा ने भी उनके साथ अपने संबंधों को याद किया। 
    अरूण वोरा और हेमचंद, एक-दूसरे के खिलाफ पांच चुनाव लड़ चुके हैं। जिसमें तीन बार हेमचंद और दो बार अरूण की जीत हुई। राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के बावजूद शायद ही ऐसा कभी हुआ हो, जब दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ व्यक्तिगत हमले किए हों। अरूण वोरा ने एक कदम आगे जाकर सदन में दुर्ग विश्वविद्यालय का नामकरण हेमचंद यादव के नाम पर करने के लिए सीएम को धन्यवाद भी दिया। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा का ही एक खेमा विवि का नामकरण हेमचंद के नाम पर करने पर असहज हो गया था। चूंकि प्रेमप्रकाश पाण्डेय और बृजमोहन अग्रवाल के प्रयासों के चलते सीएम ने अचानक इसकी घोषणा कर दी, तो हेमचंद के विरोधियों को चुप रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था। 

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 30-Jun-2018
  • भाजपा के अंदरखाने में यह चर्चा है कि प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन पर सभी 90 सीटों में चुनाव संचालन की रणनीति बनाने की जिम्मेदारी होगी। सीएम ने पार्टी हाईकमान को उन्हें राज्यसभा में भेजने के लिए तैयार भी कर लिया था, लेकिन अपनी गलतियों के कारण कौशिक राज्यसभा में जाने से रह गए।
    पार्टी नेताओं के बीच चर्चा है कि खुद मुख्यमंत्री राजनांदगांव से चुनाव लड़ेंगे। कौशिक भी चुनाव लड़ते हैं, तो चुनाव प्रचार की रणनीति प्रभावित हो सकती है। वैसे भी, उनकी परंपरागत बिल्हा सीट आसान नहीं रह गई है। यदि पार्टी सरकार में आती है, तो उनके लिए राज्यसभा में जाने का रास्ता आसान हो जाएगा। या फिर पार्टी उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ा सकती है। कुल मिलाकर चुनाव न लड़कर भी कौशिक फायदे में रहेंगे। लेकिन कुछ और नेता भी ऐसे हैं जिन्हें विधानसभा के बजाय अगला लोकसभा चुनाव लडऩा खुद के लिए भी बेहतर लग रहा है, और पार्टी भी ऐसा कर सकती है। चुनाव या बिना चुनाव, ऐसी भी चर्चा है कि अमर अग्रवाल को दिल्ली ले जाया जा सकता है क्योंकि जीएसटी की दर्जनों बैठकों में केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली उनसे भारी प्रभावित बताए जाते हैं। 

    वन विभाग का अच्छा साल
    वन विभाग के सबसे बड़े अफसरों की एक प्रमोशन लिस्ट बैठक हो जाने के बाद भी करीब महीने भर से रूकी हुई है। विभाग के एसीएस सी के खेतान पढऩे के लिए हार्वर्ड विश्वविद्यालय गए हुए थे, और अब अधिक पढ़-लिखकर लौटकर हो सकता है कि वे विभाग की फाईल को ऊपर तेजी से करवा सकें। वैसे वन विभाग के लिए यह साल शायद इतिहास का सबसे अच्छा साल होगा जब कई आला अफसरों के ऊपर से चल रही जांच और कार्रवाई का खात्मा हुआ, और बहुत से अफसरों के प्रमोशन हुए, और पूरा वन विभाग नया रायपुर में एक नई विशाल इमारत में चले गया। तेंदूपत्ता के धंधे में खूब कमाई हुई और लाखों लोगों में बोनस बंटा। आखिर सबसे गरीब तेंदूपत्ता संग्राहकों की दुआ काम तो आती ही है।

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Posted Date : 29-Jun-2018
  • सरगुजा के भाजपा लोकसभा सदस्य कमलभान सिंह को कल एक परिवार में जाकर माफी मांगनी पड़ी क्योंकि उस परिवार के एक पत्रकार-बेटे ने सांसद के निकम्मेपन की एक खबर कहीं पोस्ट की थी, और उस पर सांसद-पुत्र ने जाकर उस परिवार में बूढ़े मां-बाप को बेदम पीटा था। अब यह माफी तो पार्टी के भीतर अपनी जगह बचाने के लिए, और आगे का भविष्य बर्बाद होने से बचाने के लिए मांगी गई है, लेकिन प्रदेश भाजपा को इस वारदात को लेकर सावधान होने की जरूरत है कि उसकी सरकार चाहे कितना ही अच्छा काम क्यों न कर रही हो, लोगों की नाराजगी उसके सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और बाकी सत्तारूढ़ नेताओं से बड़ी बुरी तरह निकल सकती है। यह प्रदेश भाजपा की एक बहुत बड़ी चूक है कि इसी सांसद की एक रिकॉर्डिंग कई हफ्ते पहले सामने आई थी जिसमें सोशल मीडिया पर ही उसकी आलोचना करने वाले भाजपा के ही एक जिला पदाधिकारी को उसने गंदी-गंदी अश्लील गालियों के साथ धमकी दी थी कि उसका बेटा आकर, उसे ढूंढकर मारेगा। और यह धमकी उस टेलीफोन कॉल में एक बार नहीं, दर्जन भर बार दी थी। वह कॉल रिकॉर्डिंग पूरे प्रदेश में फैल गई थी, और भाजपा के ही अनगिनत लोगों के बीच वह घूम रही थी। जाहिर तौर पर पार्टी ने अपने उस सांसद से इसके बारे में न तो कोई जवाब मांगा, और न ही सार्वजनिक रूप से इससे कोई असहमति जताई कि सांसद पार्टी पदाधिकारी को इतनी गंदी और इतनी अश्लील गालियों के साथ हिंसा की इतनी धमकियां देकर कैसे अछूता है। अगर उस वक्त पार्टी ने कार्रवाई की होती, तो हो सकता है कि सांसद की धमकी के मुताबिक उसके बेटे को हिंसा का हौसला अब नहीं हुआ होता। लेकिन अब जब चुनाव को कुछ महीने ही बाकी हैं, भाजपा के लोगों के तौर-तरीके इस हद तक बेकाबू चल रहे हैं। यह ताजा वारदात याद दिलाती है कि किस तरह पुलिस विभाग के संसदीय सचिव लाभचंद बाफना के भाई ने आरटीओ के एक अफसर को बुरी तरह पीटा था, और पुलिस में उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई, उसे लाईन अटैच जरूर कर दिया गया था। सत्ता से जुड़े लोगों की एक हिंसा को संरक्षण मिलने का नतीजा यही होता है कि और लोगों को वैसी हिंसा की छूट मिलने का भरोसा हो जाता है। लेकिन चाहे भाजपा का सांसद ही क्यों न हो, चुनाव के वक्त, मतदान के दिन उसकी दी हुई गालियों से कोई उसकी पार्टी को वोट नहीं देगा, और कॉल रिकॉर्डिंग और खबरों को, धमकियों और हिंसा को कोई भूलेगा भी नहीं। 
    छत्तीसगढ़ का राजकपूर
    गुजरे जमाने की हिट फिल्म 'श्री-420Ó के एक दृश्य में हीरो राजकपूर    बीए की डिग्री और ईमानदारी के प्रमाणपत्र के सहारे नौकरी की तलाश में मुंबई आता है। आप सोच रहे होंगे कि फिल्म का जिक्र  यहां क्यों किया जा रहा है। वह इसलिए कि ईमानदारी के लिए प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होती। यह किसी के कामकाज-व्यवहार के आधार पर धारणा बन जाती है। प्रदेश में भी कई पूर्व और वर्तमान में ऐसे नौकरशाह हैं, जिनकी ईमानदारी को लेकर आम राय है। राजनेताओं में पूर्व मंत्री डॉ. रामचंद्र सिंहदेव को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है। इससे परे कई की छवि भ्रष्ट की बन गई है। इन्हीं में से एक जबरिया रिटायर किए गए प्रमुख सचिव बाबूलाल अग्रवाल भी हैं। 
    बाबूलाल अग्रवाल के खिलाफ देश-प्रदेश की हर जांच एजेंसी में शिकायतें हुई थी और सभी ने एक-एक कर जांच भी की। सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया। ईडी ने उनकी संपत्ति सीज कर ली, लेकिन वे एक-एक कर सभी से बेदाग होकर निकल रहे हैं। पहले एसीबी से क्लीनचिट मिल गई। ईडी ने उनकी संपत्ति रिलीज करने के आदेश दे दिए। सीबीआई की जांच पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। ऐसे में वे भी किसी संस्था से राजकपूर की तरह ईमानदारी का प्रमाणपत्र लेकर सामने आ जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 28-Jun-2018
  • अमित शाह ने मिशन-65 का टारगेट दिया है। भाजपा के रणनीतिकार  दावा कर रहे हैं कि पार्टी आसानी से टारगेट पूरा कर लेगी, लेकिन पंचायत और नगरीय निकाय उपचुनाव के नतीजों पर नजर डाले, तो टारगेट मुश्किल सा दिखता है। नगरीय निकायों का हाल यह रहा कि प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के विधानसभा क्षेत्र बिल्हा के बोदरी नगर पंचायत सीट में भाजपा प्रत्याशी को बुरी हार झेलनी पड़ी। सीएम के विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव के वार्ड नंबर-26 में पार्टी प्रत्याशी के प्रचार की कमान खुद जिला अध्यक्ष संतोष अग्रवाल  ने संभाली थी, वे इसी वार्ड के रहने वाले हैं, लेकिन अपने वार्ड से पार्टी प्रत्याशी को नहीं जिता पाए। 
    संसदीय सचिव राजू क्षत्रिय के विधानसभा क्षेत्र तखतपुर नगर पंचायत के भी वार्ड चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। पंचायत चुनाव की बात करें, तो स्थिति और भी बुरी रही। कांगे्रस प्रदेशाध्यक्ष भूपेश बघेल के चुनाव क्षेत्र पाटन के एकमात्र जिला पंचायत उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी को करारी हार का सामना करना पड़ा। जनपद-पंचायतों के उपचुनाव में भी कमोबेश यही स्थिति रही। अलबत्ता, जांजगीर-चांपा जिले की राहौद नगर पंचायत के अध्यक्ष और कोरिया जिले के वार्डों के उपचुनाव में कब्जा बरकरार रख भाजपा नेताओं ने किसी तरह लाज बचाई। सुनते हंै कि इन उपचुनाव को लेकर पार्टी गंभीर थी और प्रभारी मंत्री से लेकर विधायकों और जिलाध्यक्षों को विशेष रूप से जिम्मेदारी दी गई थी। नतीजा उलट आने पर सबने खामोशी ओढ़ ली है। पार्टी नेता कहते फिर रहे हैं कि  छोटे चुनाव में पार्टी के बजाए प्रत्याशी की छवि ज्यादा महत्व रखती है और हार-जीत उसी आधार पर तय होता है। यह भी कहा जा रहा है कि पिछले नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा तीनों बड़े शहरों में हार गई थी, लेकिन विधानसभा चुनाव के नतीजे ठीक इसके उलट रहे। कुछ भी हो, दिल बहलाने के लिए ख्याल अच्छा...। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 27-Jun-2018
  • छत्तीसगढ़ के सरकारी दफ्तरों में अश्लील हरकतों और यौन-शोषण की शिकायतें हर दो-चार दिन में कहीं न कहीं से आती हैं। अब ताजा मामला जांजगीर-चांपा जिले का है जहां मालखरौदा के स्वास्थ्य केंद्र में महिला कर्मचारियों ने एक अफसर के अश्लील बर्ताव की शिकायत बार-बार की। सरकारी जांच तो ऐसे मामलों में किसी किनारे पहुंचती नहीं है, लेकिन राज्य के महिला आयोग ने इसकी जांच करवाने की बात कही है। इस खबर के साथ महिला आयोग की सुनवाई की 22 जून की जो तस्वीर सामने आई है, वह हैरान करने वाली है। इसमें आयोग की सुनवाई चल रही है, और एक सदस्य अपने मोबाइल पर व्यस्त है। दूसरी सदस्य जो कि इस तस्वीर में अध्यक्ष की तरह मुख्य कुर्सी पर है, वह एक शिकायतकर्ता महिला की बात सुनती हुई दिख रही है। लेकिन शिकायत करने वाली महिला खड़ी हुई है और सदस्या हाथ बांधे कुर्सी पर बैठे उसकी बात सुन रही हैं। अश्लील व्यवहार की शिकायत करने वाली महिला जो कि छोटी सरकारी कर्मचारी है, उसे अगर महिला आयोग भी बिठाकर हमदर्दी से उसकी बात नहीं सुन सकता, तो एक दुखी-प्रताडि़त महिला और किससे उम्मीद कर सकती है? लोगों के हाव-भाव, और उनकी शारीरिक भाषा दूसरे लोगों का हौसला कम या ज्यादा करते हैं। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 26-Jun-2018
  • पिछले दिनों पूर्व सीएम अजीत जोगी का हालचाल जानने पूर्व मंत्री विधान मिश्रा और जोगी पार्टी के कोषाध्यक्ष गजराज पगारिया दिल्ली गए थे। दोनों ने जोगी से मुलाकात की और उनकी तबियत के साथ-साथ पार्टी गतिविधियों पर भी संक्षिप्त चर्चा की। जोगी के साथ चर्चा के दौरान एक अन्य व्यक्ति भी मौजूद था, जिसे बाहर कई लोग पहचान नहीं पाए। विधान और पगारिया की निगाह, जब उस व्यक्ति पर पड़ी, तो उसकी मौजूदगी पर दोनों को सफाई देनी पड़ रही है। जो व्यक्ति, दोनों के साथ जोगी से मुलाकात के दौरान मौजूद था, उसे प्रदेश का सबसे बड़ा एमसीएक्सबाज मन्नू नत्थानी के नाम से जाना जाता है। 
    विरोधियों ने यह भी खबर उड़ा दी कि विधान और पगारिया, के आने-जाने की फ्लाईट की बिजनेस क्लास टिकट का बंदोबस्त नत्थानी ने ही किया था। बाद में विधान ने कुछ लोगों को सफाई दी कि हम इकोनॉमी क्लास में गए थे और मन्नू नत्थानी को जानते तक नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा बताते हैं कि मन्नू पहले से ही वहां मौजूद था और हम मुलाकात कर बाहर निकले, तब उसे देखा। सच्चाई कुछ भी  हो, लेकिन जोगी पार्टी के नेताओं के बीच मन्नू नत्थानी की मौजूदगी  राजनीतिक हल्कों में जमकर चर्चा है। 


    राहुल के लिए आईना तैयार
    कांगे्रस के छात्र संगठन एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोज खान पर अपने संगठन की युवतियों के साथ जैसे सेक्स-शोषण के आरोप लगे हैं, वे छत्तीसगढ़ के भिलाई की युवतियों से शुरू हुए हैं। उन्होंने दिल्ली जाकर राहुल गांधी के करीबी लोगों से सब कुछ बताने की कोशिश की, और वॉट्सऐप के पेज खोलकर दिखाए कि किस तरह यह राष्ट्रीय अध्यक्ष लड़कियों को रात में घर बुलाने की जिद्द करते आया था। ऐसे सुबूतों के बाद भी जब उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई, तो थक-हारकर उन्होंने राहुल गांधी को ईमेल किए, और जब वह शिकायत भी अनसूनी रह गई तो उन्होंने कुछ और लोगों को यह बात बताई और यह सोशल मीडिया से आगे बढऩा शुरू हुई। अब मोबाइल फोन पर रात को आने के न्यौते वाले सारे संदेश हिफाजत से रखे हुए हैं, और इंतजार कर रहे हैं कि राहुल गांधी या कांगे्रस किसी महिला के शोषण को राजनीतिक मुद्दा बनाएं और उन्हें आईना दिखाया जाए।(rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 25-Jun-2018
  • अजीत जोगी की तबियत में सुधार हो रहा है। जोगी, रमन सिंह के बाद दूसरे सबसे ज्यादा भीड़ जुटाने वाले नेता माने जाते हैं। उनकी पार्टी का अस्तित्व भी काफी हद तक उन पर ही टिका है। यही वजह है कि कांग्रेस-भाजपा सहित अन्य दलों के नेता उनके स्वास्थ्य की जानकारी ले रहे हैं।

    जोगी कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे हैं। कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्य भी रहे हैं। गांधी परिवार और कांग्रेस के कई बड़े नेताओं से उनकी निकटता रही है। पिछले दिनों वे मेदांता में भर्ती थे, तब राहुल गांधी ने सीधे उनकी पत्नी रेणु जोगी को फोन कर हालचाल जाना। सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल और वी जॉर्ज भी रेणु जोगी के संपर्क में हैं और वे लगातार अजीत जोगी की तबियत के बारे में जानकारी ले रहे हैं।

    जोगी के बीमार रहने से पार्टी गतिविधियां कुछ हद तक थम सी गई थी, लेकिन बहू ऋचा जोगी ने मोर्चा संभाल लिया है। ऋचा अलग-अलग जिलों में धरना-प्रदर्शन कार्यक्रम में शिरकत कर रही हैं, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साहवर्धन के लिए जोगी की कमी महसूस की जा रही है। प्रेक्षक मानते हैं कि जोगी पार्टी का आधार इस बात पर निर्भर करेगा कि वे (जोगी) प्रचार के लिए कितना समय दे पाते हैं। फिलहाल तो लोग उनके आने का इंतजार कर रहे हैं।

    त्रिकोण के बीच धर्मजीत

    जोगी की गैरमौजूदगी में उनकी पार्टी के नंबर दो के नेता धर्मजीत सिंह की पूछ-परख काफी बढ़ गई है। कांग्रेस के कई नेता चाहते हैं कि धर्मजीत पार्टी में वापस आ जाए। इसके लिए कुछ ने प्रयास भी किया था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल उनके घर तक गए थे, लेकिन उन्होंने अपने इरादे साफ कर दिए हैं। उन्होंने कह दिया है कि वे किसी भी हालत में कांग्रेस में नहीं जाएंगे। जोगी पार्टी ने उन्हें लोरमी से उम्मीदवार घोषित कर रखा है।

    फिर भी उनको लेकर अटकलें खत्म नहीं हो रही है। कुछ लोगों का अंदाजा हैै कि धर्मजीत भाजपा में जा सकते हैं। भाजपा-सरकार के रणनीतिकारों से उनके करीबी संबंध हैं। हल्ला तो यह भी है कि एक भाजपा विधायक को निगम पदाधिकारी बनवाने में उनकी भूमिका रही है। जोगी पार्टी में भी उनकी राय को काफी महत्व दिया जाता है। अमित जोगी को उनकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते। ऐसे में धर्मजीत  के रूख पर लोगों की निगाहें टिकीं हुई है। 

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Posted Date : 24-Jun-2018

  • किसे क्या मिले, इसका कोई हिसाब नहीं,
    तेरे पास रूह नहीं, मेरे पास लिबास नहीं।

    (सोशल मीडिया से)

    पुलिस परिवार के आंदोलन के चलते सरकार टेंशन में है। एक बात  साफ हो चुकी है कि आंदोलन को भड़काने में निलंबित और बर्खास्त पुलिस कर्मियों की प्रमुख भूमिका है। पुलिस का काम कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना है। ऐसे में पुलिस कर्मियों को अनुशासित होना बेहद जरूरी होता है, लेकिन आंदोलन पुलिस कर्मियों के परिजन  कर रहे हैं। इससे सरकार को कार्रवाई में दिक्कत हो रही है। पुलिस कर्मियों से लिखित में लिया जा रहा है कि उनके परिजन आंदोलन में शामिल नहीं होंगे। 
    दूसरी तरफ, पुलिस कर्मियों की मांगों को लेकर सरकारी असंवेदनशीलता भी सामने आई है। आज भी वर्दी के नाम पर शायद 60 रुपये प्रति महीने मिलते हैं। आज भी पुलिस को इसी रकम के आसपास साइकिल भत्ता मिलता है जबकि पिछले 20 बरस से शायद ही कोई सिपाही बिना मोटरसाइकिल हो, और सिपाहियों तक से जिस दौड़-भाग की उम्मीद की जाती है, वह साइकिल पर कभी पूरी हो भी नहीं सकती। पुलिसकर्मी अपनी समस्याओं को लेकर आला अफसरों के सामने गुहार लगाते रहे हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। जानकारों का मानना है कि सरकार उनकी मांगों को लेकर तुरंत कोई कमेटी बना देती, तो यह नौबत नहीं आती। ऐसा लगता है कि सरकार यह मानकर चलती है कि पुलिस भ्रष्टाचार से अपना काम चला सकती है, और उसकी किसी मांग पर ध्यान देना जरूरी नहीं है। 
    हाल यह है कि चुनाव में तीन-चार महीने बाकी है। ऐसे में पुलिस परिवार के आंदोलन को राजनीतिक दलों का खुला समर्थन मिल रहा है। साथ ही कई जगहों पर पुलिस परिवार के साथ राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल हो रहे हैं जिन्हें फर्क करना मुश्किल हो रहा है। सरकार आंदोलन को लेकर सख्ती भी बरत रही हैं, लेकिन आंदोलन नहीं थम रहा है। ऐसे में सरकार का टेंशन में आना स्वाभाविक है। 
    लेकिन कानून के जानकार लोगों का यह मानना है कि पुलिस कर्मियों के परिवार के लोगों पर किसी तरह का ऐसा कानून लागू नहीं होता कि वे आंदोलन न करें। और आज सरकार जिस राजद्रोह कानून के तहत पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार कर रही है, या बर्खास्त कर रही है, ऐसा राजद्रोह का कानून पत्रकारों पर भी लगाया जा चुका है जो कि अदालत में खारिज हो गया। बस्तर में एक सिपाही की बर्खास्तगी और मकान खाली करने के नोटिस के बाद उसकी पत्नी ने आत्महत्या की कोशिश की। आज जिस अंदाज में सरकार पुलिस आंदोलन पर कार्रवाई कर रही है, यह उसकी एक बड़ी चूक साबित होने का ही अधिक खतरा है। अब पुलिस के साथ-साथ नगर सैनिकों के परिवार भी आंदोलन में शामिल हो चुके हैं।
    आरोप तो हैं, पर जवाब नहीं...
    भाजपा ने हर जिले में कोर कमेटी बनाई है। यह कमेटी जिला स्तर पर संगठन को मजबूत बनाने के अलावा सरकार के कामकाज की समीक्षा करने के लिए बनाई गई है। कमेटी में जिले के प्रभारी मंत्री, स्थानीय विधायक और प्रमुख पदाधिकारी रहते हैं। रायपुर जिले की कोर कमेटी की आखिरी बैठक कब हुई थी, यह कई पार्टी नेताओं को याद नहीं है। अलबत्ता, राजनांदगांव जिले कीबैठक लगातार हो रही है। कुछ दिन पहले कोर कमेटी की बैठक हुई, तो इसमें प्रभारी मंत्री राजेश मूणत भी मौजूद थे। कुछ पदाधिकारियों ने यह कह दिया कि तहसीलदार-एसडीएम तक हमारी बात नहीं सुन रहे हैं। इस पर मूणत ने कहा कि 15 साल से सरकार चला रहे हैं। हमारी बात नहीं सुन रहे, तो किसकी बात सुनते हैं? उन्होंने काम नहीं करने वाले अफसरों का नाम पूछ लिया, तो पदाधिकारी बगल झांकने लग गए। एक ने यह कह दिया कि किसानों में नाराजगी है। इस पर मूणत ने कहा कि प्रदेश में सबसे ज्यादा राजनांदगांव के किसानों को साढ़े चार सौ करोड़ फसल बीमा का भुगतान में हुआ है। उन्होंने पूछ लिया कि नाराजगी किस बात की है? बैठक में फिर सन्नाटा छा गया।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 23-Jun-2018
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    मोहन भागवत की मौजूदगी में पिछले दिनों आदिवासियों की समस्याओं पर चिंतन के लिए निमोरा ट्रेनिंग सेंटर में आरएसएस की सहयोगी संस्था वनवासी कल्याण आश्रम की बैठक हुई। बैठक में केंद्र और राज्य सरकार के आदिवासी मंत्री भी मौजूद थे। साथ ही अजजा आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष नंदकुमार साय भी बैठक में शामिल हुए। 
    चूंकि बैठक में पत्थरगड़ी पर विशेष रूप से चिंतन होना था। इसलिए पूर्व मंत्री गणेशराम भगत को भी बैठक में बुलाया गया था। भगत भाजपा से निष्कासित हैं, लेकिन वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यों में सक्रिय हैं। वे पत्थरगड़ी के खिलाफ मुखर रहे हैं और उन्होंने इसके खिलाफ रैली भी निकाली थी। दिग्गज आदिवासी नेता पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर को बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया था, बावजूद वे मोहन भागवत से मिलने पहुंचे थे। बताते हैं कि व्यवस्था में जुटे कार्यकर्ता उन्हें मुलाकात कराने का भरोसा दिलाते रहे। तीन घंटे इंतजार करने के बाद भी जब भागवत से मुलाकात नहीं हो पाई, तो कंवर पैर पटकते चले गए। प्रदेश भाजपा के कई प्रमुख नेता-विधायक, भागवत से मिलने की कोशिश में लगे रहे, लेकिन किसी से उनकी मुलाकात नहीं हो पाई। दरअसल ननकीराम कंवर लगातार सरकार के खिलाफ, मंत्रियों और मुख्यमंत्री के खिलाफ, अफसरों के खिलाफ सार्वजनिक अभियान चलाते आए हैं, और उनके इसी मिजाज के चलते वे पार्टी के भीतर हाशिए पर चले गए हैं। भागवत के प्रवास के दौरान सिर्फ  अजय चंद्राकर ही ऐसे थे, जो कि भागवत से अलग से मुलाकात करने में सफल रहे। वैसे, कार्यक्रम स्थल पंचायत ग्रामीण विकास विभाग का था। ऐसे में मेहमान से मेजबान की मुलाकात होना स्वाभाविक था। 

    मुख्य सचिव का मिजाज
    मुख्य सचिव अजय सिंह के काम को करीब से देख रहे लोगों का कहना है कि उन्होंने उनके बारे में चली आ रही कई धारणाओं को ध्वस्त कर दिया है। उनके बारे में यह बात फैलाई गई थी कि वे काम बहुत धीमे करते हैं। लेकिन अभी मुख्य सचिव बनने के बाद उन्होंने एक-एक फाईल को लेकर सचिवों के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि जहां मंत्री के दस्तखत की जरूरत हो, उसे लेकर ही फाईल मुख्य सचिव तक भेजी जाए। कई मामलों में सचिव ऐसी आजादी लेते आए थे और मंत्रियों का महत्व कम हो गया था। अजय सिंह ने कड़ाई से बिजनेस रूल्स को लागू करवाया है। इसके अलावा वे हर फाईल को इतने बारीकी से देखने लगे हैं कि अफसरों को पहले पन्ने से परे भी फाईल ठीक रखनी पड़ती है। राज्य के प्रशासन में न तो उनको पसंदीदा है, और न ही कोई उन्हें खास पसंद है, इसलिए वे तटस्थ भाव से काम कर रहे हैं।(rajpathjanpath@gmail.com)

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