राजपथ - जनपथ

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Posted Date : 19-Jan-2019
  • पिछले दिनों कांग्रेस के एक बड़े नेता को ऊंचा ओहदा मिलने की खुशी में प्रदेश के एक नामी बिल्डर ने पार्टी दी। वैसे तो बिल्डर को पिछली सरकार के एक सबसे संपन्न मंत्री का करीबी माना जाता है। चर्चा तो यह भी है कि मंत्री रहते जो कुछ भी कमाया था उसका कुछ हिस्सा बिल्डर के प्रोजेक्ट में निवेश भी किया। हाल यह रहा कि नोटबंदी और जीएसटी के चलते जमीन का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ था, तब भी बिल्डर की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। खैर, सरकार बदली तो बिल्डर को अपने कांग्रेस के संपर्कों पर पूरा भरोसा था और पार्टी में भी सरकार के छोटे-बड़े लोग आए थे। इसके बाद यह बिल्डर कॉलोनियों को काबू करने वाले विभाग के मंत्री से मिलने पहुंचा, तो वहां भी दावत के खर्च की शान बघारते रहा। मगर, यहां वे थोड़ी दिक्कत में दिख रहे हैं। वजह यह है कि शानदार पार्टी के बावजूद उनके प्रोजेक्ट की फाइल खुल गई है और तमाम प्रोजेक्ट की पड़ताल हो रही है। बिल्डर को समझ नहीं आ रहा है कि चूक कहां हो गई। जानकार लोगों का कहना है कि अरबों-खरबों के धंधे में जब अनाथ बच्चों के हक की जमीन, गायों के हक की जमीन, खादी के हक की जमीन का इस्तेमाल होता है, तो फिर नतीजा ऐसा ही होता है। समाजसेवी ट्रस्टों की जमीन पर बनने वाले बड़े-बड़े प्रोजेक्ट आज नहीं तो कल सरकार की नजरों में आने ही थे। सरकार के सामने ऐसी सारी शिकायतें पहुंच रही है कि किस मंदिर-मठ, किस अनाथाश्रम, किस संस्कृत शाला, किस गौशाला की जमीन को भूमाफिया किस तरह खरीद-बेच रहे हैं। इन सबकी ठीक से जांच हो जाए, तो बहुत से तिलकधारी, नामधारी कटघरों में दिखेंगे।

    छप्पर उड़े घर में गृहकलह
    भाजपा में करारी हार के बाद सिर फुटव्वल जारी है। नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान जो कुछ हुआ वह सबके सामने आ गए। तब नाराज विधायकों को यह संकेत दे दिया गया था कि प्रदेश अध्यक्ष का नाम तय करने से पहले उनकी राय ली जाएगी। विधायकों के नाराज धड़े ने पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय का नाम मजबूती से रखा। मगर, पार्टी हाईकमान असंतुष्टों की राय को कितना तवज्जो दे रही है इसका आंकलन सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि सभी 11 लोकसभा क्षेत्रों के लिए प्रभारी और संयोजक नियुक्त किए गए लेकिन किसी में भी प्रेमप्रकाश को जगह नहीं मिली। अब जब अध्यक्ष के लिए नामों पर मंथन हो रहा है तो संगठन में हावी खेमे ने आदिवासी वर्ग को कमान सौंपने का सुझाव दे दिया। इस खेमे ने केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय का नाम आगे बढ़ाया है। पार्टी के कुछ नेताओं का अंदाजा है कि यदि सरोज पाण्डेय की चली तो रामविचार नेताम अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं। खैर, प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर शह-मात का खेल चल रहा है। इस बीच रमन-धरम की रणनीति से थके हुए बाकी भाजपा नेता यह भी सोच रहे हैं कि न सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष का पद, बल्कि लोकसभा सीटों की जिम्मेदारी, और लोकसभा की उम्मीदवारी, इन सबको इसी जोड़ी के ऊपर डाल दिया जाए, और फिर अगले विधानसभा तक घर बैठा जाए। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 16-Jan-2019
  • सरकार बदलने के साथ छत्तीसगढ़ में कुछ अफसरों की निकल पड़ी है, और कुछ की शामत आ गई है, इनमें से अधिकतर बातों में लोगों को कोई गलती भी नहीं दिख रही है, बल्कि यह लग रहा है कि यह सब देर से हो रहा है। पन्द्रह साल की सरकार अगर चौथी बार आ जाती तो इनमें से कुछ भी नहीं हुआ होता। फिलहाल कई बड़े अफसर पुलिस मुख्यालय में खाली बिठाए गए हैं, बहुत से बड़े अफसर राज्य शासन के अलग-अलग विभागों से मुक्त करके वन विभाग को वापिस भेज दिए गए हैं, और वे वन मुख्यालय अरण्य भवन में बिना काम बैठे हैं। मंत्रालय से अटैच किए गए कई और अफसर भी बिना काम के हैं। इन पर खर्च का सरकारी मीटर तो घूमते ही रहता है। लेकिन सजा के तौर पर, या बिना सजा के, इनको कोई काम देने में देर होने से एक दिक्कत यह हो रही है कि ये अपने साथी दूसरे अफसरों के कमरों में बैठकर वक्त काट रहे हैं, और एक की जगह दो का वक्त खराब हो रहा है। 

    नीचे मिट्टी-घास के फायदे
    छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग के अरण्य भवन में अलग-अलग कई अफसर कई वजहों से हताश या निराश दिखते हैं। लेकिन वहां इमारत की बाल्कनी के ठीक नीचे मिट्टी पर घास उगी हुई दिखती है, इसलिए किसी के कूदने पर भी मकसद पूरा होने की गुंजाइश नहीं है। 

    घर बदलना शुरू
    मकर संक्रांति आ जाने से अब घर बदलने का पुराना रिवाज निभ गया, और मकान बदलने का समय आ गया। पिछले मुख्यमंत्री से लेकर पिछले मंत्रियों तक ने घर बदलना शुरू कर दिया है और विधायकों की एक कॉलोनी के कई घर बसना शुरू हो गए हैं। ऐसे ही एक भूतपूर्व मंत्री के खाली हो रहे बंगले पर चाय पीने पहुंचे एक अखबारनवीस के लिए चाय तो आई, लेकिन भूतपूर्व मंत्री के आदेश पर भी बिस्किट नहीं आए पाए क्योंकि वे नए घर जा चुके थे। हाऊसिंग बोर्ड की बनाई हुई विधायक कॉलोनी में घरों के आंगन सड़कों से नीचे हैं, और इसलिए बारिश में अहाते के भीतर तालाब बन जाता है। अब न सिर्फ कई भूतपूर्व मंत्री यहां पर अपने खरीदे मकानों की मरम्मत करवाकर उनमें दाखिल हो रहे हैं, बल्कि प्रदेश भर में बिखरे बहुत से भूतपूर्व विधायक इस कॉलोनी के अपने घरों को ठीक कराकर आने की तैयारी कर रहे हैं। पन्द्रह बरस बाद सरकार बदली है और भूतपूर्वों को भी कुछ भविष्य दिख रहा है। इस बार की विधानसभा में नए विधायक बड़ी संख्या में हैं, और उनके लिए फिर एक नई कॉलोनी बनना तय है जिसके मकान वे भुगतान करके ले सकेंगे। कई विधायकों को फिक्र यह है कि सत्ता के शुरू के दिनों में ही मकान खरीदने के लिए रकम आएगी कहां से?

    राजनीति के चंडूखाने से...
    राजनीति के चंडूखाने में कई तरह की अफवाहें और अटकलें चलती रहती हैं। भूपेश-सरकार से नाखुश एक भाजपा-समर्थक जानकार ने एक कल्पना गढ़ी है कि कांगे्रस के पचास से अधिक विधायक अभी कुछ भी न मिलने से नाराज हैं, और जब कभी निगम-मंडल बंट भी जाएंगे, कम से कम से 25 कांगे्रस विधायक तब भी कुछ नहीं पा सकेंगे। तब जोगी और भाजपा की बारी आएगी कि उन्हें कांगे्रस से निकालकर एक सरकार बनाएं जिसमें भाजपा का बाहर से समर्थन रहे। चार दिन पहले तक तो यह नशे में गढ़ी गई तस्वीर लगती थी, लेकिन आज सुबह से जिस तरह कर्नाटक में कांगे्रस के विधायकों का हृदयकमल परिवर्तन होते दिख रहा है, और मध्यप्रदेश में सरकार पलटने के कैलाश विजयवर्गीय के बयान के बाद अब लगता है कि अनुपम खेर के शो की तरह, कुछ भी हो सकता है। फिलहाल कांगे्रस संगठन और सरकार छत्तीसगढ़ में खासे मजबूत हैं, और दो दर्जन विधायकों को कांगे्रस से बाहर निकालने की कल्पना के लिए पांचवें पैग के बाद अटकल लगाना जरूरी है। लेकिन लोग बिना पैग भी यह याद दिलाना नहीं भूलते कि जोगी को अपने कार्यकाल में 13 भाजपा विधायकों की खरीदी का पुख्ता तजुर्बा हासिल है, और अब कांगे्रस विधायक दल में उनके कुछ पुराने खांटी लोग बेचैन भी हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 12-Jan-2019
  • हिन्दुस्तान के खासे बड़े हिस्से में चाय के बिना लोगों का काम नहीं चलता। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में कॉफी का चलन अधिक है लेकिन तमाम उत्तर भारत और कई दूसरे राज्यों में चाय ही चलती है। जो चाय गर्म पीने पर ही अच्छी लग सकती है, उसे सड़कों पर गरीब लोग या छोटे कर्मचारी छोटे से पॉलीबैग में लाते ले जाते दिखते हैं, अब उसमें पहुंचने और पीने तक चाय पता नहीं कितनी गर्म रह जाती होगी। 
    फेसबुक पर एक अखबारनवीस ने लिखा है कि हिन्दुस्तान में वक्त की बर्बादी की सबसे बड़ी वजह चाय है। यह बात एक हिसाब से सही भी है क्योंकि चाय पीने में वक्त कम लगता है, उसे बनाने या लाने में ज्यादा वक्त लगता है, और उतनी देर मेहमान को झेलना कई बार भारी पड़ता है। और फिर बातचीत में यह माना जाता है कि अगर किसी ने चाय के लिए भी नहीं पूछा, तो वह खासी बदतमीजी की बात होती है। लेकिन जिस तरह एक वक्त बुरी तरह पिट चुकी बुलेट मोटरसाइकिल आज हिन्दुस्तानी सड़कों पर राज कर रही है, उसी तरह अदना सी चाय अब ऐसे फैशन में आई है कि चाय कैफे खुलने लगे हैं। ऐसे में कुछ लोगों ने यह पोस्टर पोस्ट किया है- चाय बिना चैन कहां रे...।
    सामाजिक तौर-तरीकों को कुछ अधिक मानने वाले, और मेहमाननवाजी के लिए विख्यात लोग मेहमान के सामने ऐसा बक्सा खोल देते हैं जिसमें दस-बीस अलग-अलग स्वाद और खुशबू वाली चाय के सैशे (पैकेट) रखे होते हैं, इतनी किस्में कि लोग चक्कर खा जाएं कि उनमें से कौन सी छांटें। चाय की मामूली समझ रखने वाले लोगों के लिए ऐसा बक्सा दहशत पैदा करने वाला रहता है कि वे अपनी नासमझी को इस चुनौती के सामने कैसे छुपाएं। फिलहाल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे मंझले शहर में भी अब सौ-पचास रूपए कप की चाय नए फैशनेबल चाय कैफे पर मिलने लगी है। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 11-Jan-2019
  • विधानसभा चुनाव में करारी हार के सदमे से भाजपा नेता और कार्यकर्ता अभी तक उबर नहीं पाए हैं। यद्यपि हाईकमान ने विधानसभा चुनाव की हार को भूलकर लोकसभा चुनाव में जुटने के लिए कहा है। प्रदेश के मोर्चा-प्रकोष्ठों की लगातार मीटिंग हो रही है, लेकिन कई पदाधिकारी इससे दूरी बनाए हुए हैं। पार्टी के एक बड़े नेता के मुताबिक सिर्फ एक तिहाई पदाधिकारी ही सक्रिय हैं। सुनते हैं कि एक मोर्चा प्रकोष्ठ के मुखिया ने तो प्रदेश के बड़े पदाधिकारी को साफ कह दिया कि उनके मोर्चे की हॉल मीटिंग नहीं हो पाएगी क्योंकि ज्यादातर पदाधिकारी आना नहीं चाहते। बेहतर होगा कि रूम में ही मीटिंग कर ली जाए। 
    मीटिंग के दौरान आपसी खींचतान की बात छनकर सामने आ रही है। भाजयुमो कार्यसमिति की बैठक में प्रदेश अध्यक्ष विजय शर्मा  लोकसभा चुनाव के लिए बूथ प्रबंधन को मजबूत करने के लिए टिप्स दे रहे थे, तो पीछे बैठे पदाधिकारी यह कहते सुने गए कि आप प्रदेश के बजाए अपने वार्ड का ही बूथ को ही ठीक कर लें। विजय शर्मा कवर्धा के रहने वाले हैं और भाजपा यहां से प्रदेश में सबसे ज्यादा वोटों से हारी है। खुद विजय शर्मा अपने वार्ड से पार्टी के उम्मीदवार को बढ़त नहीं दिला पाए। 

    पोस्टमार्टम इसलिए नहीं...
    छत्तीसगढ़ में भाजपा अपनी ऐसी शर्मनाक और ऐतिहासिक हार से सबक लेने का कोई इरादा नहीं रखती क्योंकि आज तक पार्टी ने चुनावी हार पर विचार-विमर्श करने के लिए कोई बैठक नहीं की। जीतकर आए विधायकों में से एक ने इस बारे में कहा कि दिल्ली के नेताओं को भी यह मालूम है कि हार की वजहों पर चर्चा होगी, तो बैठक में ही पूरी पार्टी ही हार जाएगी। इसलिए दिल्ली की यह सोच है कि कोई पोस्टमार्टम किए बिना लोकसभा की तैयारी में लगें। वहीं कुछ दूसरे लोगों का मानना है कि ऐसी अप्राकृतिक मौत के बाद अगर पोस्टमार्टम भी नहीं होगा, तो फिर इलाज की गलती और मौत की वजह कैसे पता लगेगी? इस अनुभवी विधायक का मानना है कि आज के माहौल में अगर आम चुनाव में पार्टी 11 में से 5 सीटें भी जीत ले, तो भी बहुत होगा, और यह भी तब जब डॉ. रमन सिंह जैसे को लोकसभा में उतारा जाए। 

    दिल्ली जाने का रास्ता...
    दिल्ली में भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन चल रहा है। इसमें छत्तीसगढ़ से कुल 256 प्रतिनिधि शिरकत कर रहे हैं। सुनते हैं कि आमंत्रित प्रतिनिधियों के पैमाने पर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल फिट नहीं बैठ रहे थे। उन्हें रातों-रात जांजगीर लोकसभा का प्रभारी बनाया गया। तब कहीं जाकर वे अधिवेशन में शामिल होने रवाना हुए, लेकिन पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय और अमर अग्रवाल अधिवेशन में शामिल होने से रह गए, क्योंकि वे किसी भी पद पर नहीं है और चुनाव तो हार ही गए हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 10-Jan-2019
  • पिछली सरकार में कई अफसरों को इतनी छूट मिल गई थी कि वे कार्यक्रमों के लिए खुलकर उगाही करने लग गए थे। अफसरों की चंदाखोरी के कई किस्से चटकारे लेकर सुनाए  जा रहे हैं। सुनते हैं कि बिलासपुर संभाग में विकास यात्रा के दौरान पीएम के एक कार्यक्रम के लिए जिले के एक उच्चाधिकारी ने करीब 4 सीआर चंदा किया था। इनमें से करीब डेढ़ सीआर तो उन्होंने भीड़ वगैरह और अन्य इंतजामों में खर्च किए, लेकिन ढाई करोड़ सीआर अंदर भी कर लिए। इसका खुलासा तब हुआ जब पार्टी नेताओं ने एक उद्योगपति को चुनावी चंदे के लिए आग्रह किया। उद्योगपति ने बताते हैं कि कहा कि वे पीएम के कार्यक्रम के लिए 25 पेटी पहले ही दे चुके हैं। अब अफसर को भी बदलने का समय जा चुका था, क्योंकि चुनाव आचार संहिता लग चुकी थी। राष्ट्रपति और पीएम के कार्यक्रम के सारे इंतजाम सरकारी खर्चों से होते हैं। इसके लिए अलग से चंदे की जरूरत नहीं होती। अब जाकर यह कहा जा रहा है कि अफसरों की उगाही से उद्योगपति-व्यापारी भी तंग थे और उन्होंने चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका दिया। 

    आरक्षण के खिलाफ हिंसक तर्क और हकीकत
    अनारक्षित तबके के भीतर अपेक्षाकृत गरीब लोगों के लिए आरक्षण को लेकर ऐसे तमाम लोगों ने अपने तीर-भाले निकाल लिए हैं जो कि इस आर्थिक पैमाने से ऊपर हैं, और जो किसी भी किस्म के आरक्षण के हकदार नहीं हैं। उन्हीं के पास लिखने का मौका है, बोलने का मौका है, और नाराजगी जताने की ताकत भी। यही वह तबका है जो कि महिला आरक्षण के भी खिलाफ है, और दलित-आदिवासी-ओबीसी आरक्षण के खिलाफ तो रहते ही आया है। इस नए अनारक्षित-आरक्षण को लेकर उनके मन में नाराजगी इतनी है कि उन्होंने तरह-तरह के तर्क गढ़ लिए हैं कि किस तरह अब सरकारी नौकरियों में, और स्कूल-कॉलेज में महज मूर्ख लोग आएंगे। लेकिन बेइंसाफी की जड़ें इस देश में कितनी गहरी हैं, उनसे इस तबके का कोई रिश्ता नहीं है। इंटरनेट पर एक महिला के ऐसे हाथ की तस्वीर मौजूद है जिसमें उसकी कलाई पर उसकी पहचान गुदी हुई है, कालूराम की औरत शांति। जहां औरत को जायदाद की तरह ऐसी तख्ती गोदकर रखा जाता है, वहां उसे संसद और विधानसभाओं में आरक्षण भला कोई कैसे दे देगा? इसी तरह आर्थिक आधार पर अनारक्षित तबके के भीतर की ऐसी नब्बे फीसदी आबादी के लिए महज दस फीसदी सीटों को आरक्षित करने का विरोध आज दस फीसदी आबादी ऐसे हिंसक  तरीके से कर रही है कि मानो ऐसा आरक्षण पाने वालों के माथे पर गुदवा दिया जाएगा-मेरा बाप गरीब है। 
    लोगों को राहुल गांधी का कल का बयान भी देखना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि देश का चौकीदार भाग गया, और अपने को बचाने का जिम्मा एक महिला पर डाल गया। यह बात बड़ी ओछी है और राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस पर राहुल गांधी को नोटिस देकर सही काम किया है। राहुल गांधी के पास बचाव का सिर्फ एक तरीका है, जल्द से जल्द बिना शर्त माफी मांगने का। दरअसल किसी उदार परिवार के नौजवान की भाषा भी देश की सामाजिक-राजनीतिक हकीकत से इसी तरह प्रभावित हो जाती है, लेकिन इस पर माफी मांग लें तो वह गलती कहलाएगी, अड़े रह जाएं तो वह गलत काम कहलाएगा।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 09-Jan-2019
  • छत्तीसगढ़ सरकार में अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे बीवीआर सुब्रमण्यम अभी कश्मीर के मुख्य सचिव हैं। छत्तीसगढ़ में रहते हुए उन्होंने गृह विभाग का प्रभारी रहते हुए भी कभी मीडिया के सवालों का जवाब नहीं दिया, फोन पर बात नहीं की, एसएमएस का जवाब नहीं दिया। रमन सरकार के वक्त सबसे अधिक बदनामी की जड़ रहा गृह विभाग ऐसे संपर्कहीन एसीएस को देखता रहा। फिर अचानक उन्हें कश्मीर का मुख्य सचिव बनाया गया, और वे चले गए। 
    अब ऐसे संपर्कहीन अफसर ने कश्मीर जाने के बाद वॉट्सऐप पर एक ग्रुप बनाया है जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ सहित देश भर के करीब सवा सौ आईएएस, आईपीएस लोगों को जोड़ा है, और उसमें कुछ दूसरे प्रमुख लोग भी जोड़े गए हैं। छत्तीसगढ़ के एक रिटायर्ड मुख्य सचिव सुनिल कुमार का हमनाम होने की वजह से इस नाम के एक अखबारनवीस को भी सुब्रमण्यम ने इस ग्रुप में जोड़ दिया है जबकि इस राज्य में रहते हुए उन्होंने इससे कभी बात नहीं की, कभी फोन नहीं उठाया, कभी संदेश का जवाब नहीं दिया, लेकिन कश्मीर से बनाए इस ग्रुप में उसे भी जोड़ लिया, रिटायर्ड आईएएस समझकर। 
    सुब्रमण्यम ने इस ग्रुप में अपने मोबाइल नंबर भी अपने नाम-ओहदे के साथ लिखकर पोस्ट किया। इसके बाद जितने लोगों को उन्होंने ग्रुप में जोड़ा उसमें से अधिकतर लोग ग्रुप को इस रफ्तार से छोड़ते चले गए जिस रफ्तार से पतझड़ के मौसम में पत्ते पेड़ को छोड़ते चले जाते हैं। इसके बाद खुद सुब्रमण्यम ने यह ग्रुप छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि छत्तीसगढ़ के एक दूसरे आईएएस समीर बिश्नोई अपने आप इस ग्रुप के एडमिन बन गए जो कि वॉट्सऐप की तकनीक की वजह से अपने आप होने वाली एक व्यवस्था है। फिर धीरे-धीरे इसमें लोगों ने देसी इलाज से लेकर सौ तरह की दूसरी चीजें पोस्ट करना शुरू कर दिया, और लोगों का ग्रुप छोडऩा भी जारी रहा। अब हालत यह है कि प्रधानमंत्री के छांटे हुए सुब्रमण्यम के बनाए हुए इस वॉट्सऐप ग्रुप में प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाने वाले बहुत सारे पोस्टर पोस्ट किए जा रहे हैं, जिन्हें देखकर लोग हक्का-बक्का हैं। इस ग्रुप से लोगों के छोडऩे की रफ्तार देखें तो ऐसा लगता है कि जितने लोग जोड़े गए थे शायद उससे ज्यादा लोग इसे छोड़ चुके हैं। 
    मतलब यह कि वॉट्सऐप का ग्रुप बनाकर लोग हमेशा के लिए उस ग्रुप से अपना नाम ऐसा जोड़ लेते हैं कि वह फिर छोड़े नहीं छूटता। खुद तो ग्रुप छोड़ सकते हैं, लेकिन फिर वह बेकाबू चलते रहता है, और तबाही करते रहता है। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 07-Jan-2019
  • पुलिस महकमे में एक बात को लेकर बड़ी सुगबुगाहट है कि भाजपा सरकार में एक वक्त गृहमंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल के बाद पहली बार ऐसा गृहमंत्री आया है जो अपने विभाग पर पूरा काबू अपना ही रहने की बात कर रहा है। पुलिस और गृह विभाग के आला अफसरों के साथ पहली बैठक में गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने यह साफ किया कि वे डमी गृहमंत्री नहीं हैं, और विभाग वे ही चलाएंगे। इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी साफ किया कि खुफिया विभाग की जो रिपोर्ट मुख्यमंत्री तक जाए, वह रिपोर्ट उन्हें भी भेजी जाए। यह बात सरकार में चली आ रही लंबी परंपरा से कुछ हटकर है जिसमें इंटेलीजेंस विभाग को सीधे मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह माना जाता है। अब यह कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के बीच संतुलन का एक नया मौका है, और अफसर इंतजार कर रहे हैं कि कांटा कहां जाकर थमेगा, और वे किसके प्रति अधिक जवाबदेह रहेंगे। 

    पिन निकला हुआ हथगोला...
    सेक्स-सीडी कांड जिस भाजपा नेता कैलाश मुरारका के इर्द-गिर्द घूम रहा है, उसके ताजा अदालती बयान, और अदालत में जमा सुबूत से इस राज्य में सबसे बड़ा सियासी तूफान आ सकता है। मुरारका ने सीधे-सीधे पिछले मुख्यमंत्री रमन सिंह को लपेटे में लिया है कि ब्लैकमेल करने का सामान, सेक्स-सीडी, पूरी तरह उनकी जानकारी थे, और उन्होंने ही अपने ओएचडी अरूण बिसेन को सेक्स-सीडी की जांच करने के लिए मुम्बई और दिल्ली भेजा था। अब तक सीबीआई का केस कोई और तस्वीर पेश कर रहा था, लेकिन कैलाश मुरारका का यह ताजा अदालती बयान, और फोन पर बातचीत की बहुत सी रिकॉर्डिंग पूरे मामले को एक नया मोड़ दे रही है। कुछ लोगों ने मुरारका की तुलना पिन निकले हुए हथगोले से की है जो कि किसी भी पल फट सकता है। दरअसल मुरारका फट चुके हैं, और बहुत से वीडियो कैमरों के सामने भूपेश बघेल और विनोद वर्मा को पूरी तरह बेकसूर करार दे चुके हैं, चुनावी नतीजों के महीनों पहले से। अब मुरारका उन एक-दो उद्योगपतियों को निपटाने के लिए कमर कस चुके हैं जिन्होंने उनको इस सेक्स-सीडी में फंसाया है। आने वाले दिन बड़ी दिलचस्प लड़ाई के रहने वाले हैं। 

    सरकार में विशेषण...
    सरकार में बड़े अफसरों का मूल्यांकन करते हुए उनकी खूबियों और खामियों के बीच कुछ पैमानों पर बड़ी महीन रेखा रहती है। दो अफसरों की तुलना करते हुए सरकार में एक के बारे में कहा गया कि वह होशियार तो है, लेकिन डेढ़ होशियार है। दूसरे के बारे में कहा गया कि वह चतुर तो काफी है, लेकिन चालाक नहीं है। अब ऐसी छोटी-छोटी धारणाएं किसी कुर्सी के लिए किसी अफसर को काबिल मानने का पैमाना बन जाती हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि हकीकत के साथ-साथ जनधारणा भी मायने रखती है क्योंकि अफसरों की लिखित सीआर में ऐसे विशेषणों का इस्तेमाल तो होता नहीं है। 

    व्हाट्सअप से
    सुन लो! दंगों के अपने मुकदमे खुद खारिज करने वाले ने कहा- मेरे राज में यूपी में दंगे नहीं हुए!
    जिनमें हो जाता है अंदाज- ए-खुदाई पैदा, 
    हमने देखा है कि वो बुत तोड़ दिये जाते हैं
    बस यही सोचकर कोई सफाई नहीं दी हमने...
    कि इलजाम झूठे ही सही पर लगाये तो तुमने हैं।

    आज गाय का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
    अब कोई किसान गाय पालने को तैयार नहीं है, 
    छुट्टे गाय और साँड़ फसलों को तबाह कर रहे हैं, 
    तो उनको किसानों ने खदेड़ कर सरकारी इमारतों में बंद कर दिया। नतीजा क्या होगा, यह जानवर भूखे मरेंगे, और क्योंकि कोई पालने को तैयार नही है तो इनका उत्पादन धीरे धीरे खत्म हो जाएगा। भारत से गाय कुछ वर्षों बाद खत्म। 
    - सैय्यद हसन जिया

    नए साल में कोई सुश्री उमा भारती की भी खोज खबर ले लो। कहीं गंगा ने तो नहीं बुला लिया। वालमार्ट के आने पर भी जल कर मरने का वादा था।

    अहंकार करने के लिए सत्य का उपयोग, सत्य का अपमान है।
    -रवीन्द्रनाथ ठाकुर

    लक्ष्मण सिंह देव
    जिस प्रकार धर्मों के विषय में पढ़ाया जाता है उसी प्रकार पाठ्य पुस्तकों में नास्तिक दर्शन एवं तार्किकता का समावेश भी आवश्यक है। जिससे विद्यार्थी बहुपक्षीय विवेचन कर सके। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 02-Jan-2019
  • पिछली सरकार के घपले-घोटालों की फाइलें खुल रही हैं। जिस नालंदा परिसर-आक्सीजोन को लेकर पिछली सरकार अपनी पीठ थपथपा रही थी उसके निर्माण कार्य में गड़बड़ी की शिकायत पर दस्तावेज खंगाले जा रहे हैं। नालंदा परिसर के निर्माण में करीब 18 करोड़ रूपए खर्च किए गए थे। यह निर्माण जिला खनिज निधि के मद से किया गया। वैसे तो यह खर्च जिला खनिज निधि के मद की राशि के उपयोग के लिए निर्धारित गाईड लाइन के खिलाफ बताया जा रहा है, लेकिन निर्माण पर खर्च जिस अंदाज में हुआ वह सवालों के घेरे में आ गया है। 
    सुनते हैं कि नालंदा परिसर- ऑक्सीजोन के निर्माण के लिए 6 करोड़ का टेंडर हुआ था, जो कि बढ़कर 18 करोड़ हो गया। यानी काम जुड़ते गए और भुगतान होता गया। यह सब कलेक्टर से राजनेता बने ओपी चौधरी के कार्यकाल में हुआ था। विधानसभा में जिला खनिज निधि की राशि के दुरूपयोग का मामला भी उठा था। आरोप लगता रहा है कि कलेक्टर मनमाने तरीके से खर्च करते रहे हैं। ऐसे में इस भारी भरकम खर्च की जांच होना स्वाभाविक है। अब जांच होगी, तो दूर तक जाएगी ही। 
    ओपी चौधरी ने खरसिया का चुनाव जिस अंदाज में लड़ा है, उसे लेकर भी भूपेश-सरकार खासी खफा है। वहां के कलेक्टर और एसपी की चुनाव में भूमिका को लेकर भी मतदान के पहले से कांगे्रस के आरोप थे। इन दोनों ही अफसरों को हटा भी दिया गया है। ऐसे में ओपी चौधरी जाहिर तौर पर नई सरकार के निशाने पर हैं। चुनाव के पहले तक रायपुर का कलेक्टर रहते हुए चौधरी सरकार के सबसे चहेते अधिकारियों में से थे, लेकिन अभी जब वे रायपुर आए और अधिकारियों से मिलने पहुंचे तो उनमें हड़कंप मच गया है। बहुत से अफसर मिलने से कतराते भी रहे।

    बदले मिजाज
    प्रदेश की नई कांगे्रस सरकार के मंत्रियों के तौर-तरीके देखकर बड़े अफसर कुछ सहमे हुए हैं, कुछ हक्का-बक्का हैं। पिछली सरकार में कई मंत्री तबादला, पोस्टिंग, और टेंडर के बारे में खुद दिलचस्पी रखते थे, और नीतियां बनाने, कार्यक्रम बनाने का जिम्मा अफसरों को दे रखा था। अब मंत्रियों ने पहला जोर चुनावी घोषणा पत्र के मुताबिक नीतियां बनाने पर दिया है, और इससे सरकारी अमले में खासी असुविधा हो रही है। लेकिन लोगों का अंदाज है कि कुछ बैठकों के बाद मंत्रीजी सामान्य होंगे, और लोकतंत्र आगे बढ़ सकेगा। 

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 01-Jan-2019
  • पिछली सरकार के मंत्रियों के स्टाफ में रहे अधिकारियों-कर्मचारियों को अपने मूल विभाग में एडजेस्ट होने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा परेशानी बृजमोहन अग्रवाल के स्टॉफ में रहे लोगों को हो रही है। बृजमोहन के यहां 18 अधिकारी-कर्मचारी काम कर रहे थे। इनमें से कुछ तो लंबे समय से जुड़े हुए थे। इन्हीं में से एक मनोज शुक्ला करीब 30 साल से बृजमोहन के साथ थे। पहले उनका मीडिया का काम देखते थे बाद में बृजमोहन के मंत्री बनने के बाद उन्हें नौकरी भी लग गई। वे फिर प्रतिनियुक्ति पर बृजमोहन के साथ आ गए। सुनते हैं कि मनोज उनका हर तरह का काम देखते थे अब सरकार नहीं रह गई, तो उन्हें वापस पर्यटन विभाग में भेज दिया गया। पर्यटन में जिस तरह का उनके पास काम है, वह उन्हें रास नहीं आ रहा है। मनोज शुक्ला की साख काम के लिए आने वाली आम जनता की मदद की है, और इसी के चलते भाजपा सरकार से लेकर कांगे्रस के मंत्रियों तक उनके संबंध बहुत अच्छे हैं। 
    बृजमोहन के विशेष सहायक रहे टीआर साहू भी 15 साल से उनके साथ थे उनसे पहले गंगूराम बघेल के विशेष सहायक रहे हैं। साहू भी मूल विभाग में भेज दिए गए हैं। सुनते हैं कि वे अब वीआरएस लेने का मन बना रहे हैं। पहले बृजमोहन अग्रवाल को स्कूल शिक्षा विभाग में पर्याप्त बदनामी दिलाने वाले आर.एन. सिंह ने बाद में तिकड़म करके अगले स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप के बंगले से पूरी सरकारी खरीदी को संभाल लिया था, और सत्ताईस से पैंतीस फीसदी का पैमाना चल रहा था। अब सुना है कि अपने हुनर से संभावनाएं दिखाते हुए वे नई सरकार में भी किसी मंत्री के साथ लग जाने की कोशिश कर रहे हैं।

    नए साल की दावत और कैबिनेट
    सीएम भूपेश बघेल ने नए साल के पहले दिन ही सुबह कैबिनेट की बैठक लेकर कई अफसरों को निराश कर दिया। दरअसल, दो दिन पहले से ही कई अफसर नए साल की छुट्टी मनाने बाहर जाने वाले थे, लेकिन कैबिनेट की सूचना पाकर ठिठक गए। उन्हें प्रोग्राम रद्द करना पड़ा। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 31-Dec-2018
  • शहर में एक नामी संत पधारे हैं। उनके भक्तों ने नई सरकार बनते ही राजधानी में उनका प्रवचन का कार्यक्रम तय करवा दिया। संत तो  संत हैं। समाज में सद्भाव और सबकी उन्नति की कामना करते हैं, लेकिन उनके  कुछ भक्तों को आशीर्वाद विशेष जरूरत देखी जा रही है। ये भक्त संत के कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और आयोजन पर खुलकर खर्च भी कर रहे हैं। भक्तों में एक प्रधानमंत्री सड़क योजना का बड़ा ठेकेदार है। इस ठेकेदार की न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि झारखंड और अन्य राज्यों में भी तूती बोलती है। उनके दो सहयोगी भी हैं जो कि सरकारी विभागों में सप्लाई का काम करते हैं। 
    ठेकेदार भाजपा सरकार के सभी पंचायत मंत्रियों के बेहद करीबी रहे हैं। उन्हें पुराने मंत्रियों का राजदार भी माना जाता है। अब सरकार बदल गई है, तो कांग्रेस सरकार के मंत्रियों का भी आशीर्वाद जरूरी हो गया था। अब संतजी का आशीर्वाद लेने के लिए मुख्यमंत्री और मंत्री भी आ चुके हैं। संतजी से मेल-मुलाकात कराने के बहाने ठेकेदार की कांग्रेस के लोगों से भी अच्छी जान पहचान हो गई है। अब संतजी का आशीर्वाद है कि सरकार बदलने पर भी भक्त को कारोबारी दिक्कत नहीं आएगी। 

    बात आई-गई हो गई
    छत्तीसगढ़ में चुनाव के बीच एक टीवी डिबेट में कांग्रेस और भाजपा के प्रवक्ता भिड़ गए। बाद में दोनों के बीच विवाद मारपीट तक पहुंच गया। चैनल के संपादक और रिपोर्टर ने किसी तरह मामला शांत कराया। भाजपा इस प्रकरण को लेकर इतनी नाराज थी कि कांग्रेस के उस प्रवक्ता के साथ अपनी पार्टी के नेताओं का डिबेट में हिस्सा लेने पर भी रोक लगा दी थी। खैर, समय बीतता गया और चुनाव खत्म होते-होते दोनों प्रवक्ताओं के बीच रिश्ते सुधर भी गए। सरकार कांग्रेस की बन गई। और भाजपा के प्रवक्ता को नए सीएम से मिलने की इच्छा जागृत हुई। चूंकि वे सीएम से गुपचुप तरीके से मिलना चाहते थे ताकि पार्टी के लोग गलत न समझें, उन्होंने इसके लिए कांग्रेस प्रवक्ता से मदद मांगी। कांग्रेस प्रवक्ता ने भी उन्हें निराश नहीं किया और पुराने विवाद को भुलाकर सीएम से मुलाकात करवा दी। 
    ब्याज पर ब्याज, जमीन पर बोझ
    राज्य सरकार की एक कमल विहार योजना ने रायपुर विकास प्राधिकरण की कमर तोड़कर रख दी है। इस योजना को विश्व स्तर की सुविधाओं का बनाने के लिए ऐसी सड़कें बनाई गईं कि उन पर विमान उतर सके। नतीजा यह हुआ कि इसके भूखंड इतने महंगे होते चले गए, बाजार में उनके लिए कोई खरीददार ही नहीं रह गए। अब हालत यह है कि बैंक का सैकड़ों करोड़ का कर्ज चुकाना तो दूर रहा, उसका ब्याज भी देना नहीं हो पा रहा है। ऐसे में पता लगा है कि हर महीने लगने वाला ब्याज कमल विहार की जमीनों के दाम में जोड़ दिया जाता है और जमीनें महंगी होती जाती हैं, उनके बिकने की संभावना और भी कम हो जाती है। 
    बीएसएनएल के पास भाड़ा नहीं...
    देश भर में यह चर्चा आम है कि पिछले बरसों में अलग-अलग सरकारों ने लगातार सरकारी टेलीफोन कंपनी बीएसएनएल को कुचलते हुए निजी कंपनियों को बढ़ावा दिया। अभी चार दिन पहले यह खबर भी आई कि भारतीय रेलवे को संचार सेवा देने का जिम्मा एक जनवरी से रिलायंस जियो को दिया जा रहा है जो कि अभी तक भारतीय एयरटेल के पास था। रेलवे के करीब दो लाख कर्मचारी देश भर में इसी कंपनी का फोन इस्तेमाल करते थे, और अब यह काम जियो के हवाले हो रहा है। बीएसएनएल की हालत ऐसी खोखली हो गई है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अपने एक दफ्तर के लिए उसने जो इमारत किराए पर ली हुई है, उसका छह महीने का भाड़ा भी नहीं दिया गया है। एक-एक करके सरकारी कंपनियों को बीमार और घाटे वाली बताकर बेचने का जो सिलसिला चल रहा है, उसके बाद निजी कंपनियों का एकाधिकार रहेगा, और तब ग्राहकों को असल दाम चुकाने पड़ेंगे।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 30-Dec-2018
  • सरकार बदलने के बाद कांग्रेस के लोग पिछली सरकार के लोगों का काला-पीला निकालने में जुट गए हैं। इसमें सीएम सचिवालय में रहे अफसर विशेष रूप से निशाने पर हैं। कांग्रेस के लोगों का मानना है कि सबसे ज्यादा माल इन्हीं लोगों ने बनाया है। सुनते हैं कि कांग्रेसियों ने रमन सिंह के ओएसडी ओपी गुप्ता की प्रापर्टी के दस्तावेज निकाल लिए हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि गुप्ता ने नया रायपुर के सेक्टर-27 स्थित अपना बंगला लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष के सरकारी निवास के लिए किराए पर दे रखा है। पिछले दो साल से उन्हें नियमित आवक हो रही है। वैसे बंगला किराए पर देना कोई गलत नहीं है और पहली नजर में इसको लेकर कोई अनियमितता भी नहीं दिखती है। बहुत सारे अफसर ऐसा करते हैं, लेकिन गुप्ता की बात कुछ और ही कही जा रही है। गुप्ता के भाई लघु वनोपज संघ के अध्यक्ष भरत साय के निज सचिव हैं। भरत साय के पास पहले से ही मौलश्री विहार में बंगला है जहां वे रहते हैं। यह कहा गया कि गुप्ता का बंगला गेस्ट हाऊस के रूप में उपयोग में आता है। खैर, कांग्रेसियों की शिकायत इस बात को लेकर है कि बंगला खाली पड़ा है और बिना कोई उपयोग के लघु वनोपज संघ इसका किराया दे रहा है। संघ की तीन तारीख को बैठक होने वाली है, इसमें बंगले का मुद्दा जोर-शोर से उठ सकता है। लेकिन प्रदेश के बहुत से बड़े-बड़े अफसरों के निजी बंगलों को बड़ी कंपनियां बाजार भाव से कई गुना अधिक किराए पर लेते आई हैं ताकि उन्हें उपकृत किया जा सके।

    बंगलों की कहानी
    पिछले कृषि और सिंचाई मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभाग नए मंत्री रविन्द्र चौबे को मिले हैं। और बंगला भी ठीक बगल का लगा हुआ, अमर अग्रवाल वाला। अब बंगले पर विभाग का जो-जो सामान रहता है, वह विभाग के किसी दफ्तर में वापिस भेजने के बजाय पड़ोस में सीधे भेजा जा सकता है। बंगलों के बीच की दीवार में एक छोटा गेट लगा दिया जाए तो सामान लाने के लिए सड़क तक भी नहीं ले जाना पड़ेगा। एक दिलचस्प बात यह भी सुनाई पड़ रही है कि बहुत से मंत्रियों ने पिछले मंत्रियों के बंगले छांट-छांटकर मांगे हैं, लेकिन बृजमोहन अग्रवाल का बंगला किसी ने नहीं मांगा है। अगर यह सच है तो इसके दो मायने हो सकते हैं, एक तो यह कि उनके सबसे अच्छे संबंध हैं, दूसरा यह कि क्या उनके नेता प्रतिपक्ष बनने का आसार दिख रहा है? बृजमोहन अग्रवाल के बंगले पर पहले भी मुख्यमंत्री निवास से अधिक भीड़ लगती थी, और अब तो वे रायपुर के अकेले भाजपा विधायक रह गए हैं।

    ख की जगह प हो जाने से...
    विधानसभा चुनाव में भाजपा की ऐसी बुरी हार क्यों हुई, इसके पीछे कई नेताओं के अलग-अलग तर्क हैं। एक बड़े अनुभवी भाजपा नेता ने कहा कि पार्टी इसलिए हारी की वह चुनाव के पहले संभावित विधायक चुनना छोड़कर संभावित मुख्यमंत्री चुनने में लग गई थी, और एक खास नाम तय करके उसी हिसाब से टिकटें फाइनल की गई थीं। यह नाम मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नाम से अलग था, और उस दूसरे मकसद से तय किए गए नाम खुद को डूबे ही, आसपास के लोगों और ले डूबे। इस हार की एक वजह यह भी थी कि पहले चुनावों में भाजपा के नेता एक-दूसरे के पीछे खड़े थे, और इस चुनाव में एक-दूसरे के पीछे पड़े थे। महज एक अक्षर ख की जगह प हो जाने से फर्क ऐसा भयानक पड़ा।

    सतह से उठता हुआ आदमी...
    विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा के नेता किसी तरह लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट रहे हैं। चुनाव नतीजे आने के बाद ज्यादातर भाजपा नेता और कार्यकर्ता घर बैठ गए थे। वे अब अनमने भाव से पार्टी की बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं। उनके चेहरों पर हार की निराशा साफ देखी जा सकती है। पार्टी के रणनीतिकारों के लिए बुरी खबर यह है कि नाराज नेताओं का एक गुट भाजपा से अलग होकर नई पार्टी के गठन की तैयारी कर रहा है। 
    सुनते हंै कि जशपुर में दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के समर्थक नई पार्टी के गठन की रूपरेखा तैयार कर चुके हैं। चर्चा तो यह भी है कि भाजपा से नाराज चल रहे जूदेव समर्थकों की इस मुहिम को उनके पुत्र युद्धवीर सिंह जूदेव का भी समर्थन हासिल है। युद्धवीर के समर्थकों ने विधानसभा चुनाव में जशपुर और कुनकुरी से निर्दलीय प्रत्याशी उतारकर भाजपा की हार सुनिश्चित कर दी थी। ऐसे में जूदेव समर्थक नई पार्टी के बैनर तले भाजपा को एक और झटका देने की कोशिश में जुट गए हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 28-Dec-2018
  • नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले की जांच में नया खुलासा होने के संकेत हैं। कहा जा रहा है कि घोटाले की जांच में लगी विशेष टीम एक अलग फ्लैट में बैठती थी। नए सिरे से जांच शुरू होने पर ईओडब्ल्यू की एक टीम ने बुधवार की रात छापा मारा। 
    हल्ला है कि फ्लैट में एक महिला पुलिसकर्मी रहती थीं। यहां सरकार के समान्तर टेलीफोन टैपिंग भी हुआ करती थी। खुद टीएस सिंहदेव विधानसभा में इसकी तरफ इशारा कर चुके हैं। अब छापेमारी के बाद वहां के कम्प्यूटर सील कर दिए गए हैं। ईओडब्ल्यू तो नान घोटाले की जांच करने गई थी, लेकिन कुछ और भी निकल रहा है। सुनते हैं कि जांच-पड़ताल से हड़बड़ाए पिछली सरकार में प्रभावशाली ओएसडी कुछ पुलिस अफसरों से मिलने भी गए थे। अब बात निकल ही गई है तो दूर तलक जाने के आसार दिख रहे हैं। इस पूरे सिलसिले से उन बहुत से लोगों को भी राहत मिल रही है जिन्हें पिछली सत्ता ऐसे दबे-छुपे संदेश भेजती थी कि उनकी भी कई किस्म की रिकॉर्डिंग मौजूद है। इस बात की पुख्ता जानकारी है कि प्रदेश के कम से कम एक अच्छे अखबारनवीस का टेलीफोन सरकारी रिकॉर्ड में रिकॉर्ड किया जा रहा था। यह तो घोषित रूप से था, अघोषित रूप से बहुतों के फोन टैप हो रहे थे। लोगों के नंबरों के कॉल रिकॉर्ड तो चने-मुर्रे की तरह घूम रहे थे। अखबारी लोगों के बीच वॉट्सऐप कॉल पर भी ऐसी चर्चा होती रहती थी कि उससे भी अधिक सुरक्षित मैसेंजर एप्लीकेशन कौन सा है, सिग्नल है, या कोई और?

    कितने पास कितने दूर...
    छत्तीसगढ़ के पहले तीन मुख्यमंत्रियों के साथ दो बड़ी दिलचस्प बातें जुड़ी हुई हैं। पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी रायपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में कुछ समय पढ़ा चुके हैं, और इस कॉलेज के ठीक सामने के आयुर्वेदिक कॉलेज में राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पांच बरस पढ़े, वहीं हॉस्टल में भी रहे, और डॉक्टर बने। इसी इंजीनियरिंग कॉलेज के सामने के साईंस कॉलेज में भूपेश बघेल पढ़े, और वहीं हॉस्टल में भी रहे। यह सब कुछ एक किलोमीटर के भीतर के दायरे में ही था। अब मुख्यमंत्री की हैसियत से भूपेश बघेल जिस मुख्यमंत्री निवास में रहेंगे, उससे चौथाई किलोमीटर की दूरी पर डॉ. रमन सिंह रहेंगे, और एक किलोमीटर के भीतर ही अजीत जोगी रहते ही हैं।

    बिन मांगी सलाह नापसंद
    सीएम भूपेश बघेल को बिना मांगे सलाह बिल्कुल पसंद नहीं है, लेकिन पिछले 15 बरसों में इसके आदी हो चुके अफसर यदा-कदा बिना मांगे सलाह देने से नहीं चूक रहे हैं। ऐसे ही एक आईजी स्तर के अफसर को सीएम की झिड़की भी सुननी पड़ी। चर्चा है कि पुलिस अफसर सीएम से सौजन्य मुलाकात के लिए गए थे। मुलाकात के दौरान उन्होंने झीरम घाटी प्रकरण की जांच के लिए एसआईटी के गठन को ही अनुचित करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रकरण की जांच एनआईए कर रही है। ऐसे में एक और जांच नहीं बिठाई जा सकती। फिर क्या था सीएम भड़क गए। उन्होंने बिना मांगे सलाह देने पर अफसर को चेतावनी दे दी। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 27-Dec-2018
  • छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक अफसर खबरों से दूर नहीं रहे। लेकिन पिछले पांच बरस में अफसरों की ही अधिक चर्चा रही। आईएएस में 2005 बैच सरकार में सबसे ताकतवर अकेला बैच माना जाता था, और इसके पांच अधिकारी लगातार महत्वपूर्ण कुर्सियों पर बने रहे। मुकेश बंसल मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र, राजनांदगांव के कलेक्टर रहे, और फिर वहां से रायपुर आए तो अपनी ही बैच के रजत कुमार के तमाम काम देखने लगे जो कि ऊंची पढ़ाई के लिए डेढ़ बरस अमरीका गए थे। नया रायपुर के सीईओ, मुख्यमंत्री के सचिव सहित विमानों का काम उन्हें एक गुलदस्ते की तरह मिला। फिर रजत कुमार लौटे तो मुकेश बंसल ऐसी ही पढ़ाई के लिए अमरीका चले गए, और वे तमाम काम ज्यों के त्यों रजत कुमार को वापिस मिल गए, मानो मुकेश बंसल डेढ़ बरस बेबी-सिटिंग कर रहे थे। इसी बैच की आर.संगीता दुर्ग में कलेक्टर रहीं, और एक ताकतवर कलेक्टर की तरह उन्होंने काम किया। भूपेश बघेल की जमीन नपवाने सहित जमीन-जायदाद की दूसरी कब्रगाह उखड़वाने के लिए वे भूपेश बघेल के निशाने पर रहीं, और अब वे नई सरकार आने के बाद प्रसूति-अवकाश पर हैं। संगीता के बारे में भूपेश बघेल सार्वजनिक रूप से यह बोलते आए हैं कि वे भाजपा के जिलाध्यक्ष की तरह काम कर रही थीं। रजत कुमार भी लगातार ताकत की जगहों पर रहने के बाद अब अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण कही जाने वाली कुर्सी पर हैं। इसी बैच के ओपी चौधरी रायपुर की कलेक्टरी छोड़कर भाजपा में गए, खरसिया से चुनाव लड़ा, मतदाताओं को धमकाते वीडियो पर कैद हुए, अंधाधुंध खर्च से एक ईमानदार अफसर वाली साख कुछ खोई, और अब हारने के बाद वे न सरकारी दफ्तर में हैं, न विधानसभा में। सबसे अधिक तकलीफ इस बैच के राजेश टोप्पो को हुई जो कि जनसंपर्क विभाग के आयुक्त और विशेष सचिव दोनों थे। वे कुछ स्टिंग ऑपरेशन से भी घिरे और चुनाव आयोग ने उन्हें चुनाव के बीच ही जनसंपर्क से हटा दिया। अब जनसंपर्क विभाग के कामकाज और खर्चों को लेकर सरकार ने जांच शुरू करवा दी है, और वे खासी परेशानी में घिरते दिख रहे हैं। पिछली सरकार में सबसे ताकतवर अफसर अमन सिंह का यह पसंदीदा बैच था जिसे वे राज्य के प्रशासन का भविष्य मानते थे। कुछ अधिक ही ताकतवर होकर इस बैच को मानो नजर लग गई, और वह नजर अमरीका में पढ़ रहे मुकेश बंसल तक ही नहीं पहुंच पाई, बाकी सभी इसके शिकार हो गए। 

    बाकी निपटे पर ये बचे!
    चुनाव के पहले के बरस में एक महत्वपूर्ण जिले में कलेक्टर बनाए गए एक अफसर के बारे में रमन सिंह के सचिवालय के कुछ बड़े अफसरों को शक था कि यह कलेक्टर जितना खुलकर राजनीतिक काम कर रहा था उससे वह उजागर हो जाएगा, और ऐन चुनाव के पहले चुनाव आयोग उसे हटा देगा। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि न चुनाव आयोग ने उसे हटाया, और न ही नई सरकार की पहली तबादला लिस्ट में उसका नाम आया। अब दूसरे अफसरों में यह चर्चा है कि ऐसा कौन सा हुनर है जिससे सत्तारूढ़ पार्टी का काम करने के बाद भी इस तरह बचा जा सकता है। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 26-Dec-2018
  • भूपेश बघेल सरकार में मंत्री बने बस्तर के दिग्गज विधायक कवासी लखमा की कहानी बड़ी दिलचस्प है, और वे खुद ही उसे मजा ले-लेकर सुनाते भी हैं। जब वे पहली बार विधायक बने, और राजधानी से बस्तर के अपने गांव लौटे, तो सरकार की व्यवस्था के मुताबिक कलेक्टर ने उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र जाने और उसका दौरा करने के लिए एक जीप दी। इस जीप से जब वे गांव पहुंचे तो उनके बुजुर्ग पिता भड़क उठे। उन्हें लगा कि बेटा राजनीति में आते ही भ्रष्ट हो गया है, और आनन-फानन उसने जीप खरीद ली है। अपनी पीढ़ी के और पिताओं की तरह उसने सबक सिखाने का उस वक्त का लोकप्रिय तरीका इस्तेमाल किया, और कवासी लखमा की जमकर ठुकाई की। बूढ़े पिता को यह समझाते हुए दम निकल गया कि यह भ्रष्टाचार की कमाई से खरीदी गई गाड़ी नहीं है, सरकार ने सिर्फ दौरा करने के लिए यह गाड़ी दी है। 

    बस में न चढ़ पाए लोग...
    मंत्री पद नहीं मिलने से कई सीनियर कांग्रेस विधायक खफा हैं। धनेन्द्र साहू और सत्यनारायण शर्मा ने तो अपनी मायूसी जाहिर भी कर दी। अमितेश शुक्ला ने एक कदम आगे जाकर राहुल गांधी के समक्ष गुहार लगाने की बात कह दी है। इन सबके बीच अरूण वोरा भी अपने तेवर दिखाने की कोशिश में लगे रहे। 
    सुनते हैं कि अरूण वोरा ने अमितेश को फोन कर मंत्री पद के लिए मिलकर लॉबिंग करने का प्रस्ताव दिया। इस पर अमितेश ने उन्हें दो-टूक शब्दों में कहा बताते हैं कि उनका (अरूण वोरा) नंबर तो वैसे भी नहीं लगेगा क्योंकि दुर्ग से काफी मंत्री हो गए हैं। उन्होंने कहा कि यदि बाबूजी (मोतीलाल वोरा) से मेरे लिए सिफारिश करोगे, तो हो सकता है मेरा नंबर लग जाए। वैसे भी महासमुंद लोकसभा से किसी को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। 
    सत्यनारायण शर्मा के भी समर्थकों में भारी निराशा देखी गई, लेकिन उनके पुत्र मायूस समर्थकों को समझाइश देते दिखे कि सरकार अपनी है, मंत्रियों के स्थान सीमित हैं। ऐसे में मंत्री पद मिले या न मिले, कोई खास फर्क नहीं पड़ता। 

    जात-धर्म, सम्प्रदाय, सबका इस्तेमाल 
    जिस तरह चुनाव के पहले किसी पार्टी का टिकट चाहने के लिए लोग धर्म और जाति का खुलकर इस्तेमाल करते हैं, उसी तरह अब ट्रांसफर और पोस्टिंग के लिए भी लोगों ने धर्म और जाति के प्रतीक चिन्ह बाहर निकाल लिए हैं। इसके अलावा लोग यह भी पता लगाने लगे हैं कि नई सरकार में फैसला लेने वाले लोगों की आस्था किस संगठन, सम्प्रदाय, गुरू, या मंदिर-दरगाह पर हैं, और वहां से अपना रिश्ता चाहे नया कायम करना पड़े, लेकिन उसे पुराना साबित करने की कोशिश भी हो रही है। कुछ अफसर जो अपने नेताओं की मर्जी पर मनमानी करते थे, वे अब सर्द रात में खुले में बैठी गाय की तरह दयनीय हो गए हैं क्योंकि न तो नेताजी मंत्री या विधायक रह गए, और न ही उनकी पार्टी की सरकार रह गई। ऐसे में सारे पुराने कामकाज कब्र फाड़कर बाहर आने को छटपटा रहे हैं, और लोगों को हिसाब-किताब चुकता करने के लिए यह एक अच्छा मौसम मिल गया है। फिलहाल पौधों की नई कलम की तरह लोग अब सत्तारूढ़ पौधों के तनों पर अपने को ट्रांसप्लांट करने में लग गए हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 25-Dec-2018
  • खबर है कि भाजपा के एक खेमे ने विधानसभा चुनाव में करारी हार के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया है। आप चौंक गए होंगे कि जिसकी बुनियाद पर भाजपा खड़ी है वह हार के लिए जिम्मेदार कैसे हो सकती है। हार से नाराज नेता आरएसएस की व्याख्या रमन,  सौदान और सरोज के रूप में कर रहे हैं। और तीनों को ही हार के लिए दोषी मान रहे हैं।
    सुनते हैं कि पार्टी के कई नेता पिछले दिनों राष्ट्रीय नेताओं से मिले थे। उन्हें विस्तार से बताया कि आरएसएस ने पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र खत्म कर दिया था। सरकार के कामकाज का फीडबैक पार्टी स्तर पर लेना बंद हो गया था। आरएसएस ने चंद नौकरशाहों को फ्री-हैंड दे दिया था। इसके कारण सरकार आम जनता से दूर होते चली गई और इसका खामियाजा चुनाव में भुगतना पड़ा। पार्टी का यह खेमा दबे स्वर में सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ के प्रभार से अलग रखने की मांग कर रहा है। बहरहाल, पार्टी में अंदरूनी लड़ाई तेज हो गई है। 

    समाजवादी सिफारिश
    कांग्रेस और समाजवादियों का हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा है। 90 के दशक में दोनों के बीच में दूरियां कम हुई और अब राष्ट्रीय राजनीति में आज एक-दूसरे के साथ नजर आते हैं। प्रदेश में मोतीलाल वोरा जैसे कई नेता हैं जो पहले समाजवादी थे बाद में कांग्रेस की मुख्य धारा में आए। समाजवादी नेताओं की पूछपरख अभी भी होती है। 
    सुनते हैं कि समाजवादी नेता रघु ठाकुर की सिफारिश पर कांग्रेस ने नवागढ़ से गुरूदयाल बंजारे को प्रत्याशी बनाया और वे भारी मतों से चुनाव जीते। गुरूदयाल, रघु ठाकुर के करीबी माने जाते हैं। रघु ठाकुर के मोतीलाल वोरा और प्रदेश के अन्य नेताओं से अच्छे रिश्ते हैं। यही वजह है कि इस समाजवादी नेता की सिफारिश को महत्व दिया गया। 

    सबसे सीधे से चिपक गए?
    मंत्रिमण्डल के शपथ ग्रहण समारोह में रायपुर के एक नेता की सक्रियता चर्चा का विषय रही। कभी विधानसभा चुनाव लड़ चुके इस नेता की पहचान अब रायपुर से लेकर दिल्ली तक काम करवाने के लिए होती है। सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव के ठीक पहले इस नेता ने पार्टी छोडऩे का मन बनाया था। भाजपा सरकार के एक मंत्री के साथ उनकी बैठक भी हो चुकी थी। भाजपा संगठन ने भी उन्हें पार्टी में शामिल करने के लिए सहमति दे दी थी, पर सत्ता परिवर्तन की आहट से यह कांग्रेस नेता ठिठक गया और पार्टी छोडऩे का इरादा बदल दिया। यह नेता शपथ ग्रहण समारोह में एक सीधे-साधे मंत्री के आगे-पीछे होते देखा गया। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 24-Dec-2018
  • सीएम भूपेश बघेल कई दफा कह चुके हैं कि अफसरों के खिलाफ बदले की भावना से कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। उन्होंने जो कहा था उस पर कायम दिख रहे हैं। रविवार की मध्यरात्रि में अफसरों के फेरबदल के आदेश जारी किए गए। इसमें दुर्ग कलेक्टर उमेश अग्रवाल का नाम नहीं होने से लोगों को काफी अचरज हुआ। जबकि उमेश के खिलाफ कांग्रेस चुनाव आयोग में भी गई थी। हालांकि दंतेवाड़ा, बिलासपुर और जशपुर कलेक्टर के खिलाफ भी चुनाव आयोग में शिकायत हुई थी उन्हें हटाया भी गया, लेकिन कोई पनिशमेंट पोस्टिंग नहीं दी गई। सिर्फ दंतेवाड़ा कलेक्टर रहे सौरभ कुमार की पोस्टिंग होना बाकी है। वैसे अभी जिला स्तर पर कुछ और कलेक्टरों के तबादले होना तय है क्योंकि कांग्रेस ने चुनाव आयोग से आठ कलेक्टरों के खिलाफ शिकायत की थी कि वे भाजपा एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। रायगढ़ कलेक्टर को जिले से हटाने के पीछे एक वजह यह भी है कि आईएएस छोड़कर खरसिया से चुनाव लडऩे वाले ओपी चौधरी ने शम्मी आबिदी के कलेक्टर रहने को अपने चुनाव के लिए जरूरी बताया था। पिछली सरकार ने जब कलेक्टरों में फेरबदल किया था तब शम्मी आबिदी को इसी वजह से वहां रहने दिया गया था। लेकिन सरगुजा में बहुत अच्छा काम करने के बावजूद छत्तीसगढ़ की माटी संतान किरण कौशल को बालोद जैसे अपेक्षाकृत कम महत्व के जिले में इसलिए भेज दिया गया था कि सरगुजा में टीएस सिंहदेव उनके काम से खुश थे, और वे चाहते थे कि उनका तबादला न हो। सरकार में बैठे लोगों ने नेता प्रतिपक्ष के मुंह से तारीफ सुनते ही किरण कौशल को एक छोटे जिले में भेज दिया था। 

    कुछ अफसरों के दिन बदले
    रमन सरकार में अच्छा काम करने वाले कई अफसर दुर्भावना के चलते हाशिए पर रहे। इन्हीं में यशवंत कुमार का नाम भी लिया जाता है। वे सीएम सचिवालय में बेहद ताकतवर रहे अफसर की नापसंदगी के शिकार रहे, लेकिन सरकार बदलने के बाद फिर उनकी क्षमताओं का उपयोग होना शुरू हो गया है। उन्हें रायगढ़ कलेक्टर बनाया गया है। ऐसी ही दुर्भावनापूर्वक पोस्टिंग 95 बैच की आईएएस अफसर श्रीमती डॉ. मनिन्दर कौर द्विवेदी की की गई थी। उन्हें दिल्ली में सीएसआईडीसी का ओएसडी बनाया गया था, जबकि यहां सीएसआईडीसी एमडी के पद पर उनसे काफी जूनियर आईएफएस अफसर पदस्थ हैं। सरकार बदलने पर उनकी पोस्टिंग को दुरूस्त किया गया और उन्हें दिल्ली में आवासीय आयुक्त के पद पर पदस्थ किया गया है। दरअसल गौरव द्विवेदी और मनिंदर कौर द्विवेदी से सरकार के एक ताकतवर अफसर की नाराजगी यह थी कि केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटने के बाद वे जब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से शिष्टाचार की मुलाकात करने गए थे, तब वे मुख्यमंत्री सचिवालय के भीतर के एक ऐसे अफसर के मार्फत समय लेकर गए थे जिसे किनारे करने की कोशिश चल रही थी, और कामयाब भी थी। मुलाकात के इसी चैनल को लेकर यह तय कर लिया गया था कि इस आईएएस जोड़े को किनारे ही रखना है।
     छत्तीसगढ़ में लोगों ने मुख्यमंत्री-सचिवालय की ताकत भी पिछले बरसों में देखी है, और वहां की महल सरीखी राजनीति भी। इसलिए नई सरकार ऐसी नौबत न ही आने दे, तो ही उसके लिए भला होगा। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 23-Dec-2018
  • भाजपा के दिग्गजों के चुनाव हारने के बाद पता लगा है कि पार्टी के राष्ट्रीय संगठन ने ऐसे लोगों के चुनाव क्षेत्र का एक सर्वे करवाया, और उनकी हार के कारणों को बताते हुए उन्हें चि_ी लिखी। दसियों करोड़ का चुनाव लडऩे वाले और बुरी तरह हारने वाले एक मंत्री को जब यह पता लगा कि उसने अपने निजी सहायक और खास कार्यकर्ताओं को लोगों को बांटने के लिए जो रकम दी थी, वह पूरी की पूरी दबा दी गई, तो मंत्री ने ऐसे पुराने करीबी लोगों को पीट-पीटकर घर से निकाल दिया। अब इनमें से एक के भाई ने तीस लाख रूपए की एक कार खरीद ली है जो कि लोगों की नजरों में खटक भी रही है। इसमें से एक मोटी रकम जनमत और जनधारणा तैयार करने वाले तबके के लिए भी रखी गई थी, और उसका कोई हिस्सा लोगों तक पहुंचा नहीं। ऐसे कुछ बड़े और हारे हुए दिग्गजों को सावधान इसलिए भी होना पड़ रहा है कि  इनमें से कुछ को पार्टी लोकसभा का चुनाव भी लडऩे कह सकती है। 

    सुपारी दी थी, पर बात बनी नहीं
    कांग्रेस के बीच इस बात की बड़ी जमकर चर्चा है कि पिछले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कुछ करीबी लोगों ने दिल्ली में कांग्रेस के एक बड़े नेता से इस बात का सौदा किया था कि कांग्रेस का मुख्यमंत्री और चाहे जो भी बन जाए, भूपेश बघेल न बने। अब यह सौदा इतनी बड़ी रकम का सुनाई पड़ रहा है कि यह किसी एक आदमी के बस की नहीं दिखती, इसलिए यह भी अंदाज है कि कुछ अलग-अलग लोगों ने मिलकर इक_ा करके यह रकम दिल्ली पहुंचाई थी। इसके एवज में वहां पर भूपेश से परे तगड़ी कोशिश भी हो गई थी, लेकिन आखिर में भूपेश और सिंहदेव एक हो गए तो बात इन्हीं दोनों में से एक पर तय हुई, और भूपेश मुख्यमंत्री बन गए। 
    अब जिसने दिल्ली में यह सौदा किया था, उससे खफा, सुपारी देने वालों के बीच से यह बात निकल रही है, पता नहीं कांग्रेस हाईकमान तक पहुंच पाएगी या नहीं। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 22-Dec-2018
  • सीएम के पद पर रहते डॉ. रमन सिंह आधा दर्जन विभागों के मुखिया भी थे। वे एक शालीन राजनेता माने जाते हैं, पर उनके विभागों में बाकी विभागों की तुलना में ज्यादा अनियमितता देखने को मिल रही है। स्वाभाविक तौर पर विभागों के रोजमर्रा का काम देखने की उन्हें फुर्सत नहीं थी। वे अपने भरोसे के नौकरशाहों पर ही निर्भर थे, लेकिन उन्होंने रमन सिंह की व्यस्तता का फायदा उठाकर खूब खेल खेला।
    सुनते हैं कि उनके एक-दो विभागों में तो इतनी अनियमितता हुई है, जिसका जवाब देने में उन्हें मुश्किल हो सकती है। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि एक-दो विभाग में तो सामान्य कामकाज के बजाए कुछ लोगों को उपकृत करने का खेल चल रहा था और करोड़ों की अनियमितता हुई है। विधानसभा चुनाव में रमन सरकार की बुरी हार हुई है। लोकसभा के चुनाव निकट है, ऐसे में अनियमितता के ये मामले सामने आते हैं, तो रमन सिंह के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। 

    नक्सलियों ने साथ दिया?
    बस्तर में भाजपा की बुरी हार की अंदरूनी समीक्षा हो रही है। यह कहा जा रहा है कि हार के लिए अन्य कारणों के साथ-साथ वामपंथी रूझान के लोगों के कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। सुनते हैं कि कांग्रेस नेता राजेश तिवारी बस्तर संभाग के पिछले तीन साल से अंदरूनी इलाकों में दौरा कर रहे थे। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से वामपंथ समर्थकों को कांग्रेस का सहयोग करने के लिए तैयार किया। चर्चा तो यह भी है कि पहले मनीष कुंजाम भी कांग्रेस नेताओं को कुछ जगहों पर सहयोग कर रहे थे, लेकिन चुनाव के कुछ महीने पहले वे अलग हो गए, और जोगी पार्टी के साथ उनका गठबंधन हो गया। तब तक कांग्रेस बस्तर के अंदरूनी इलाकों में मजबूत हो गई थी। और जब नक्सलियों ने मतदान के बहिष्कार का आव्हान किया तो इसका कोई असर नहीं पड़ा। जमीनी स्तर पर मेहनत से कांग्रेस को बस्तर में अभूतपूर्व सफलता मिली। 
    एक दूसरी चर्चा यह भी है कि नक्सलियों ने पूरे बस्तर में मतदाताओं को कांगे्रस का समर्थन करने को कहा, सिवाय देवती कर्मा की दंतेवाड़ा सीट के। देवती के पति महेंद्र कर्मा पूरी जिंदगी नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाते रहे और उन्हें झीरम हमले में नक्सलियों ने छांटकर मारा था। इसी एक सीट पर उन्होंने कांगे्रस को नहीं जीतने दिया। अब यह बात महज चर्चा है, इसका कोई सुबूत तो है नहीं।
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    निराशा इतनी है कि...
    विधानसभा चुनाव में बुरी हार से भाजपा में निराशा का माहौल है। हाल यह है कि हार की समीक्षा नहीं हो पा रही है। कार्यकर्ताओं ने पार्टी दफ्तर जाना बंद कर दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक को हार को भूलकर लोकसभा चुनाव में जुटने के लिए कहा है। कौशिक खुद विधानसभा चुनाव जीत गए हैं, इसलिए वे तो हार को भूलकर दौरे पर निकल गए हैं, लेकिन निचले कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना उनके लिए चुनौती बन गया है। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 21-Dec-2018
  • शपथ लेने के बाद सीएम भूपेश बघेल ने जब आईएएस के वर्ष-95 बैच के अफसर गौरव द्विवेदी को अपना सचिव चुना, तो प्रशासनिक बिरादरी में हलचल मच गई। क्योंकि पिछली सरकार में गौरव हाशिए पर रहे हैं। उनका कोई पॉलिटिकल कनेक्शन भी नहीं रहा है। सिवाय इसके कि वे बेहद काबिल अफसर माने जाते हैं। बिलासपुर में जन्मे गौरव छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यहां आए। वे पहले केरल कैडर के थे बाद में उन्हें और उनकी पत्नी डॉ. मनिन्दर कौर द्विवेदी को एक साथ छत्तीसगढ़ कैडर आबंटित हो गया। 
    जोगी सरकार में वे डायरेक्टर बजट के पद पर रहे। उनकी कार्यशैली के दिवंगत वित्तमंत्री डॉ. रामचंद्र सिंहदेव मुरीद रहे हैं। रमन सरकार की सबसे सफल रियायती चावल स्कीम के मास्टर माइंड रहे और पूरी योजना के कम्प्यूटराइजेशन का श्रेय उन्हें जाता है। उन्हें इसके लिए प्रधानमंत्री अवार्ड भी मिला। बाद में केन्द्र सरकार में आईटी की कई सफल योजनाओं के सूत्रधार रहे हैं। सात साल बाद यहां आए, तो उन्हें 15 दिनों तक कोई काम नहीं दिया गया, मंत्रालय में बैठने की जगह नहीं मिली, और कार भी नहीं मिली। 
    बाद में उन्हें प्रशासन अकादमी भेजा गया। वे सीएम सचिवालय के अफसरों की नापसंदगी के शिकार रहे, और यही नापसंदगी दिखाने के लिए उन्हें कई हफ्ते बिना काम बिठाया गया। अफसरों की कमी हुई, तो उन्हें स्कूल शिक्षा का दायित्व मिला। इस विभाग में उन्होंने बेहद कम समय में शिक्षाकर्मियों का संविलियन कर अपनी क्षमता का लोहा मनवाया। जबकि घोषणा के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार में अफसरों की फौज संविलियन को लेकर उलझी पड़ी थी। वे प्रचार-प्रसार से दूर खामोशी से काम करने वाले अफसर माने जाते हैं। सीएम की पहली प्रेस काफ्रेंस में भी वे सुरक्षाकर्मियों के बीच दूर खड़े रहकर सबकुछ व्यवस्थित हो जाए, इस कोशिश में जुटे थे। यह देखकर कई जानकार लोग कहने को मजबूर हो गए कि यही है राइट च्वाइस। 

    इन कलेक्टरों का क्या होगा?

    तबादलों पर रोक के चुनाव आयोग के आदेश से कई कलेक्टर-एसपी ने राहत की सांस ली है। इनमें से एक-दो कलेक्टरों ने तो पार्टी कार्यकर्ताओं की तरह काम किया। चार कलेक्टरों की शिकायत चुनाव आयोग में भी की गई थी। एक कलेक्टर ने तो बस्तर में एक कांग्रेस प्रत्याशी के घर में ही झगड़ा करा दिया। गृहकलह की वजह से कांग्रेस प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन कांग्रेस की सरकार बन गई है और अब कलेक्टर निशाने पर हैं। 26 जनवरी के बाद उन्हें घर में झगड़ा कराने के मामले पर सफाई देनी पड़ सकती है। और जिन कलेक्टरों की शिकायत कांगे्रस ने चुनाव आयोग को की थी, उनके खिलाफ तो कार्रवाई अब सरकार की नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है।

    ये भूपेश बघेल और कमलनाथ भी अजीब मुख्यमंत्री हैं। 
    जब 10 दिन का टाइम था तो शपथ ग्रहण के 2 घण्टे के अंदर किसानों के कर्ज माफ करने की क्या जल्दी थी? 
    यूपी वाले बाबाजी ने तो सबसे पहले मुख्यमंत्री आवास का शुद्धिकरण करवाया था। 
    कालू कुत्ते को बिस्किट और गाय को गुड़ खिलाई थी। 
    इसके बाद अपने ऊपर चल रहे मुकदमो को वापस लेने की फाइल में दस्तखत किए थे। 
    आप भले ही भूल गए लेकिन हमें तो याद है।
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    पति-आज सब्जी ठीक नहीं बनी है!!
    पत्नी-चुप चाप खा लो...
    इसी सब्जी को फेसबुक पे 61 लोगों ने लाइक किया है??
    और 25 लोगों ने तो कॉमेंट में यम्मी भी लिखा है आपके तो नखरे ही अलग है।
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    मप्र की बेरोजगारी के लिए यूपी-बिहारी जिम्मेदार; कमलनाथ 
    रीयली?
    बंगाल से छिंदवाड़ा का सांसद बन मुख्यमंत्री बनने वाले का क्या करें ?
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    बदलते परिवेश मे अब यूपीएससी, पीएससी को भावी अफसरो से नौकरी के पहले ही पूछना चाहिए, पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
    -सुभाष मिश्रा
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    बेकार ही कहते हैं लोग 
    कि पत्नियाँ कभी अपनी गलती नहीं मानती
    मेरी वाली तो रोज मानती हैं...
    गलती हो गई तुमसे शादी कर के...
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    Whosoever called it the Idiot Box must have anticipated Arnab . 
     -Madhup Mohta
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    पता नहीं ठंड का असर है या चुनाव परिणाम का ...
    अकड़ के बैठने वाले लोग भी सुकड़ के बैठ रहे है
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    दिग्विजय सिंह के घर पहुँचे शिवराज सिंह, वहाँ दिग्विजय ने की शिवराज की जोरदार अगवानी..राजा साहब के बेटे ने शिवराज के छुए पैर...
    जो लोग नेताओं के चक्कर में आपसी सम्बंध खराब करते हैं, उनके लिए सबक है इस तरह की तस्वीरें...

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 19-Dec-2018
  • वयोवृद्ध कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा के दांव-पेंच से प्रदेश के बाकी नेता परेशान हैं। पहले सीएम पद के लिए ताम्रध्वज साहू का नाम अड़ाकर बाकी दावेदारों को उलझा दिया था। विवाद बढ़ता देख हाईकमान ने भूपेश बघेल को सीएम बनाकर बीच का रास्ता निकाला। सबकुछ ठीक चल रहा था कि मंत्रिमंडल के गठन को लेकर कई तरह की समस्या पैदा हो गई। पार्टी के दूसरे नेता वोरा के रूख पर नजर रखे हुए हैं। कुछ नेताओं का अंदाजा है कि वोरा अपने बेटे अरूण को मंत्री बनाने के लिए पार्टी हाईकमान के जरिए दबाव बना सकते हैं। 
    वोरा ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि उन्होंने अपने कुछ करीबियों के बीच यह कहा बताते हैं कि रविन्द्र चौबे को विधानसभा अध्यक्ष अथवा प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहिए। चौबे का नाम आगे कर इस दिग्गज नेता ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। सात बार के रविन्द्र चौबे को मंत्री पद के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल है। वेे दिग्विजय और जोगी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं। और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का भी दायित्व संभाला। पर वोरा के कथन के कई मायने हैं। एक तो चौबे को कोई दूसरा अहम दायित्व दिलवाकर अपने बेटे अरूण को मंत्रिमंडल में स्थान सुनिश्चित करना चाहते हैं। क्योंकि एक ही जिले से दो ब्राम्हण को मंत्रिमंडल में जगह मिलना मुश्किल है। रविन्द्र को पूरी तरह किनारे लगाकर अरूण को पद दिया गया तो छत्तीसगढ़ी-गैर छत्तीसगढ़ी का मुद्दा हावी हो सकता है। ऐसे में वोरा के रूख पर निगाहें टिकी हुई हैं। 

    जितने बरस नौकरी, उतने तबादले
    नई सरकार के आने के बाद एक छोटे से प्रशासनिक फेरबदल में भारतीय प्रशासनिक सेवा अफसर चंद्रकांत उइके भी प्रभावित हुए हैं। वे जनसंपर्क संचालक से संस्कृति संचालक के साथ-साथ उप सचिव आबकारी, वाणिज्यिक कर बनाए गए। वे राज्य प्रशासनिक सेवा से पदोन्नत होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में आए। भाप्रसे के वर्ष-08 बैच के अफसर उइके का कुल 23 साल की सेवा में 20 बार तबादला हुआ है, इतनी बार कि एक-दो तबादले उन्हें खुद को ठीक से याद नहीं। उइके नियम-कायदे पसंद अफसर माने जाते हैं और उनका तबादला किसी शिकायत वजह से भी नहीं होता है। बल्कि कई बार तो सीनियर अफसर उनके नियम पसंद होने के कारण तबादला करवा देते थे। खास बात यह है कि उइके को कभी इसका मलाल नहीं रहा। उन्होंने कभी तबादला रूकवाने की भी कोशिश नहीं की। उन्हें जो भी जिम्मेदारी मिली, हंसते-हंसते निर्वहन किया। सुनते हैं कि पीएससी सचिव के पद पर पदस्थापना के दौरान गोपनीयता के नाम पर होने वाली अनियमितता पर सख्ती से अंकुश लगाया। जिससे वहां के कर्ता-धर्ता परेशान हो गए और एक बार फिर उनका तबादला हो गया। ऐसे समय में जब कई अफसर मलाईदार विभाग पाने के लिए नेताओं के आगे-पीछे होते देखे जा रहे हैं, उन्हें उइके से सीख लेनी चाहिए। जनसंपर्क में भी वे एक साल से कम ही रहे, लेकिन फिर दूसरे विभाग में भेज दिया गया, तो भी हँसते-हँसते ही गए। कुर्सी से मोह इतना ही रहना चाहिए कि तबादले के अगले दिन उसे छोड़ते कोई दिक्कत न हो। (rajpathjanpath@gmail.com)

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