राजपथ - जनपथ

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Posted Date : 17-Nov-2018
  • भाजपा के चर्चित किसान नेता चंपू भैया मुश्किल में फंस गए हैं। अभनपुर सीट से उनका नाम घोषित होते ही कई पदाधिकारियों ने पार्टी छोड़ दी थी। उन्हें इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि विधानसभा का समीकरण उनके अनुकूल था। वे यह कहते फिर रहे थे कि नाराज नेताओं के भाजपा छोडऩे से उन्हें फायदा होगा। उनका मुकाबला मौजूदा विधायक और उनके पुराने प्रतिद्वंदी धनेंद्र साहू से है, लेकिन कांग्रेस के बागी और जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी दयाराम निषाद से उन्हें फायदा मिल रहा था। निषाद कांग्रेस के परंपरागत वोटों पर सेंध लगा रहे थे। निषाद आर्थिक रूप से सक्षम भी हैं। सुनते हैं कि कुछ दिन पहले निषाद की तबियत अचानक बिगड़ गई। इसके बाद उन्होंने डॉक्टरों की सलाह पर प्रचार बंद कर दिया। ऐसे समय में जब चुनाव प्रचार शबाब पर है, जोगी पार्टी के उम्मीदवार का प्रचार कम होने से कांग्रेस को फायदा हो रहा है और कांग्रेस प्रत्याशी धनेंद्र मजबूत स्थिति में दिख रहे हैं। इन सबके चलते चंपू भैया के लिए एक बार फिर विधानसभा जाने का रास्ता कठिन हो चला है। 

    विरोधियों को भी मदद
    खबर है कि प्रदेश के एक ताकतवर नेता ने विरोधी दल के कई उम्मीदवारों को चुनावी चंदा उपलब्ध कराया है। विरोधी प्रत्याशी चंदे के लिए भटक रहे थे। पार्टी भी उनकी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रही थी। ऐसे में नेताजी की सहयोग राशि से उन्हें काफी मदद मिली है। सुनते हैं कि बस्तर के कई प्रत्याशियों को 15-15 पेटी तक दिए गए। कहावत है कि दान की बछिया के दांत नहीं देखे जाते। ऐसे में मदद कहीं से भी मिले, गलत नहीं है।

    कर्जा माफ
    सरकार बनी तो कांग्रेस ने किसानों का कर्जा माफ करने का वादा किया है। महासमुंद जिले के एक विधानसभा के निर्दलीय प्रत्याशी ने भी कर्जा माफ की घोषणा की है। दरअसल वे छोटे-मोटे ब्याज का धंधा भी करते हैं। कई गरीब वोटरों ने इनसे कर्ज ले रखा है। इन वोटरों से वोट मांगते कहा कि वे जीत गए तो उनका कर्जा माफ, लेकिन हार गए तो उन्हें लौटाना होगा। क्योंकि हार जाने के बाद इन्हीं रुपयों से गुजारा होगा। तुरंत खुशी, तुरंत गम में डूबे ये वोटर समझ नहीं पा रहे क्या करें, क्या न करें?
    जनसैलाब शब्द का पतन
    चुनाव प्रचार घमासान है। हर नेता-प्रत्याशी ज्यादा समर्थन का दावा कर रहा है। अखबार के लिए विज्ञप्ति ई-मेल से जारी किए जा रहे हैं। किसी भी दल का प्रत्याशी हो इन विज्ञप्तियों में जिस शब्द का इस्तेमाल कर रहा है, वह है-जन सैलाब।  प्रचार के दौरान किसी चौक या मुहल्ला हो या फिर गांव की गलियां, महज हजार-पांच सौ की भीड़, उन्हें जनसैलाब दिखने लगी है। रुपये की तरह अवमूल्यन का शिकार यह शब्द आने वाले दिनों में कहीं दर्जनों के लिए भी इस्तेमाल होने न लगे।
    बड़े सितारे को छोटों की मदद
    चुनावी सभाओं के लिए छत्तीसगढ़ी लोकगायक-कलाकार ज्यादा कारगर साबित हो रहे हैं, तभी तो  बसना विधानसभा के एक जनसभा में गई भाजपा की स्टार प्रचारक स्मृति ईरानी की सभा में भीड़ लाने के लिए छत्तीसगढ़ी लोककलाकारों को लगाया गया था। 
    रोजी पर रिश्तेदारों के घर
    बसना-सरायपाली विधानसभा का इलाका ओडिशा सीमा से लगा हुआ है। सीमावर्ती इलाके के लोगों का रोटी-बेटी का संबंध है। इस चुनाव ने इन दिनों ओडिशा के इन लोगों को काम दे दिया है। तीन सौ रुपये रोजी के साथ, खाना-पीना भी।  रिश्तेदारों के घर घूमना भी हो रहा है।  
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Posted Date : 16-Nov-2018
  • चुनाव में अनाप-शनाप पैसे खर्च होते हैं। ऐसे समय में जब व्यापार-उद्योग मंदी की मार झेल रहे हैं, चुनावी चंदा जुटाने में प्रत्याशियों को काफी पापड़ बेलने पड़ रहे हंै। सत्ता में होने की वजह से भाजपा के प्रत्याशियों को फिर भी पार्टी और बाहर से किसी तरह फंड का इंतजाम हो जा रहा है, लेकिन वे भी इस बार सोच-समझकर खर्च कर रहे हैं। रायपुर के एक भाजपा प्रत्याशी ने तो फंड बांटने की जिम्मेदारी खुद अपने हाथ में ले रखी है। वे अपने संचालकों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। सुनते हैं कि पिछले चुनाव में नेताजी को 70 पेटी का चूना लग गया था। जिन्हें बांटने के लिए पैसे निकाले थे वह संबंधित तक नहीं पहुंच पाया। यानी बीच के लोगों ने गड़बड़झाला कर दिया था। इस बार वे सतर्क हैं और खुद पैसे बांट रहे हैं। 
    एक खबर यह भी उड़ी है कि बस्तर की एक सीट के भाजपा प्रत्याशी को आखिरी में फंड के लिए काफी जूझना पड़ा। जिस चुनाव संचालक को फंड नीचे तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गई थी, वह दीवाली के दूसरे दिन जुएं में काफी कुछ गंवा बैठा। ले-देकर किसी तरह फंड का इंतजाम हो पाया और टेंशन में चुनाव निपटा। 
    प्रदेश में माहेश्वरी समाज का अकेला उम्मीदवार भाटापारा से सुनील माहेश्वरी है। नतीजा यह है कि प्रदेश भर से इस समाज के लोग अपनी बिरादरी से एक विधायक बनाने के लिए खूब नगद मदद कर रहे हैं। इस समाज के कुछ लोगों का कहना है कि मारवाडिय़ों के नाम पर अब तक महज अग्रवाल और जैन लोगों को ही टिकट मिलते रही है, और अब इस जाति के कोटे से एक माहेश्वरी को टिकट मिली है तो उसे जिताना सबकी जिम्मेदारी है। प्रदेश भर से इस समाज के कई लोग प्रचार के लिए भी भाटापारा पहुंच रहे हैं।

    स्टिंग के खतरों के बीच
    छत्तीसगढ़ में बहुत सी पार्टियों के बहुत से नेताओं पर स्टिंग ऑपरेशनों का हमला होते रहा है, और जारी भी है। अब जिन नेताओं को अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं के खिलाफ बयान देते हुए कैमरों पर कैद किया गया है, वे इस परेशानी में हैं कि इस चुनाव में उन बड़े नेताओं से मदद कैसे मांगें। दूसरी तरफ अधिकतर बड़े नेताओं का यह मानना है कि कभी न कभी वे भी किसी से बंद कमरे में ऐसी बातें करते हैं जो अगर बाहर आएं तो वे आत्मघाती होंगी। इसलिए वे स्टिंग ऑपरेशनों पर प्रतिक्रिया देने के भी खिलाफ हैं। ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह छत्तीसगढ़ के सबसे सुरक्षित नेता हैं। वे इतना कम बोलते हैं कि अगर कोई रिकॉर्ड भी कर ले, तो भी गलत बात शायद ही रिकॉर्ड हो। 
    हालांकि वे यह भी जानते और मानते हैं कि फोन पर बात करने वाले बहुत से लोग बातचीत रिकॉर्ड करते हैं, और एक अनौपचारिक चर्चा में उन्होंने एक बार कहा था कि वे मानकर चलते हैं कि उनसे फोन पर बात करने वाले तीन चौथाई लोग उसे रिकॉर्ड कर रहे होंगे। जो इतना जागरूक हो, उसके खुद के फंसने का खतरा कम ही रहता है।

    भीड़ की हकीकत और तस्वीर
    चुनावी सभा के बाद भीड़ को देखकर कार्यक्रम और प्रत्याशी की सफलता को लेकर गुणा भाग किया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता-वक्ता तो नहीं रहे कि जिन्हें सुनने देखने दूर-दूर से लोग खुद होकर पहुंचे। अब तो, ले-देकर, खा-पीकर भी लोग सभा में नहीं जाते। वैसे भी ठंड ने दस्तक दे दी है। कोरिया-सरगुजा जैसे वनांचल में शाम होने से पहले लोग घरों में दुबक रहे हैं। हाथियों का डर सो अलग। वहीं धान कटाई के कारण किसान खेतों में हैं। गांवों में वोटर नहीं मिल रहे हैं। भीड़ का टोटा होने लगा है। लिहाजा कम भीड़ को ज्यादा कैसे दिखाया जाए इसकी चिंता प्रत्याशियों को लगी हुई है। जनसभा ऐसी जगहों पर ली जा रहा है जहां कम भीड़ भी ज्यादा लगे। सभा खचाखच भरा हुआ दिखाई दे।  
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Posted Date : 15-Nov-2018
  • सदर बाजार के प्रतिष्ठित पुजारी परिवार के सदस्य ओमप्रकाश पुजारी करीब दो दशक बाद भाजपा की राजनीति में मुख्य धारा में लौटे हैं। पार्टी ने उन्हें रायपुर ग्रामीण के भाजपा प्रत्याशी नंदकुमार साहू का चुनाव संचालक बनाया है। पुजारी सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के अभिन्न मित्र रहे हैं और उनके साथ छात्र राजनीति और युवा मोर्चा में काम किया। उस वक्त शिवराज सिंह चौहान और मौजूदा केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी युवा मोर्चा के पदाधिकारी थे। बृजमोहन और ओमप्रकाश पुजारी के बीच दूरियां उस वक्त बढ़ गई जब 90 के विस चुनाव में पार्टी ने बृजमोहन अग्रवाल को  रायपुर शहर से प्रत्याशी बनाया। पुजारी भी टिकट के प्रबल दावेदार थे। तब पार्टी केकई बड़े नेता पुजारी को ही टिकट देने के पक्ष में थे। खैर, बृजमोहन प्रत्याशी बने और जीतकर पटवा सरकार में मंत्री भी बन गए। बाद में उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इससे परे पुजारी, पार्टी के पटवा विरोधी खेेमे से जुड़ गए और धीरे-धीरे भाजपा की राजनीति में हाशिए पर चले गए। वे केंद्रीय मंत्री उमा भारती के करीबी रहे हैं। 
    ओमप्रकाश कुशल संगठनकर्ता माने जाते हैं और उन्होंने कई मौकों पर इसको साबित भी किया। राज्य बनने से पहले उन्हें कठिन माने जाने वाले गुंडरदेही उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी का चुनाव संचालक बनाया गया था, जिसमें पार्टी प्रत्याशी डॉ. दयाराम साहू को जीत हासिल हुई। वे दिवंगत भाजपा नेता डॉ. रमेश के भी चुनाव संचालक रहे। संगठन के बड़े नेताओं से नाराजगी के बाद ओमप्रकाश पुजारी ने पार्टी छोड़ दी। बाद में पार्टी में वापसी हुई, तो वे आरएसएस के सहयोगी संगठन धर्म जागरण मंच के लिए काम करने लगे। पार्टी ने विपरीत परिस्थितियों में उनकी फिर सेवाएं ली है। नंदकुमार साहू का चुनाव प्रचार पहले बिखरा हुआ था, लेकिन पुजारी के कमान संभालने के बाद धीरे-धीरे स्थिति सुधरती दिख रही है और कांग्रेस प्रत्याशी सत्यनारायण शर्मा से मुकाबला कड़ा हो चला है। अब जब बृजमोहन अग्रवाल, सीएम डॉ. रमन सिंह के विरोधी खेमे की अगुवाई करते प्रतीत हो रहे हैं। ऐसे में ओमप्रकाश पुजारी के मुख्यधारा में लौटने की पार्टी के भीतर जमकर चर्चा हो रही है।

    स्याही लगवाओ, नोट लो
    वैसे मुस्लिम वोट बैंक को लेकर राजनीतिक दलों ने कई प्लान तैयार कर रखे हैं। मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में कुछ लोग नोटों के बंडल लेकर घूम रहे हैं। उनका ऑफर है कि वोट डालने न जाएं, घर बैठे ही ऊंगली में स्याही लगवा लें और 2 हजार रुपए प्रति वोट के हिसाब से ले लें। इसी बीच एक प्रत्याशी को शिकायत मिली है कि उसके आदमी मुस्लिमों को 2 हजार की जगह 1 हजार रुपए का ऑफर दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में बिलासपुर में भी मुस्लिमों को वोट से रोकने के लिए एक रात पहले ही उनकी उंगलियों पर निशान लगा देने के लिए भुगतान का सौदा किया गया था।

    मोबाइल ब्रांड का इस्तेमाल ईंटों तक पर 
    पिछले दो दशक से ही हिंदुस्तानियों की जिंदगी में आए मोबाइल फोन ने इतना असर डाला है कि अब कामयाबी मोबाइल ब्रांड का इस्तेमाल ईंटों तक पर हो रहा है। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 14-Nov-2018
  • खबर है कि सरोज पांडेय और रामविचार नेताम के लिए परेशानी बढ़ गई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें अपने-अपने जिले में पार्टी प्रत्याशियों को जिताने की जिम्मेदारी दे दी है। सरोज के गृह जिले दुर्ग में तकरीबन सभी प्रत्याशी मुश्किल में हैं। टिकट की घोषणा के बाद से कार्यकर्ताओं में असंतोष फैला था वह अभी तक कम नहीं हुआ है। पार्टी के रणनीतिकारों ने पहले चरण के मतदान की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि दूसरे चरण की सीटों में बेहतर प्रदर्शन करना होगा, तभी सरकार बन पाएगी। चर्चा है कि बिलासपुर संभाग में त्रिकोणीय संघर्ष के कारण अनुकूल स्थिति बन रही है, लेकिन दुर्ग और सरगुजा संभाग में सीधे मुकाबले के कारण पार्टी प्रत्याशी मुश्किल में हैं। कहा जा रहा है कि दुर्ग और सरगुजा में कई जगहों पर प्रत्याशी चयन सही ढंग से नहीं हुआ। इसकी वजह से भी स्थिति बिगड़ी है। अब जिन्होंने टिकट की सिफारिश की है, उन्हें जिम्मेदारी तो लेनी होगी। चूंकि दुर्ग जिले की सीटों के ज्यादातर प्रत्याशी सरोज की पसंद से तय हुए थे। ऐसे में उन्हें जिताने की जिम्मेदारी भी उन पर आ पड़ी है। 

    राजधानी की सभी सीटों पर...
    रायपुर पश्चिम में पीडब्ल्यूडी मंत्री राजेश मूणत और कांग्रेस के विकास उपाध्याय के बीच मुकाबला है। मूणत समर्थक कुछ दिनों तक इस बात को लेकर परेशान रहे कि उनके कार्यक्रम में कुछ विघ्नसंतोषी तत्व माहौल खराब करके निकल जाते हंै। हीरापुर-जरवाय में मूणत के खिलाफ नारेबाजी भी हुई। खोजबीन करने पर पता चला कि वे कांग्रेस से जुड़े लोग थे और भाजपा के कार्यक्रम में आड़े-तिरछे सवाल पूछकर बाकी लोगों को भी भरमा देते थे। बे्रवरेज कॉर्पाेरेशन की शराब से भरी एक गाड़ी पकड़ी गई, तो यह हल्ला उड़ा कि भाजपा प्रत्याशी बस्तियों में शराब बंटवाने की कोशिश कर रहे हैं। रोज-रोज के विवाद से परेशान मूणत समर्थकों ने अब नई रणनीति बनाई है। मंत्रीजी के कार्यक्रम को अब गुप्त रखा जाने लगा है। मंत्री के प्रचार में जाने से पहले सिर्फ संबंधित वार्ड के प्रमुख नेता को इसकी सूचना दी जाने लगी है। अब जाकर व्यवस्थित तरीके से प्रचार हो पा रहा है। 
    लेकिन मूणत समर्थकों को पिछले 5 बरस में रायपुर शहर में मूणत के विभागों द्वारा करवाए गए सैकड़ों करोड़ के काम पर पूरा भरोसा है कि शहर का नक्शा बदल देने वाले इतने काम अनदेखे नहीं रह सकते। कैनाल रोड से लेकर छोटी लाईन पटरी की जगह पर बन रहे एक्सपे्रस हाईवे ने शहर के भीतर सड़कों का जाल बना दिया है। इसके अलावा रिंग रोड पर, दूसरी सड़कों पर जगह-जगह ओवरब्रिज बनाने से पटरियों पर रूकना करीब-करीब खत्म हो गया है। राजेश मूणत के कामों से रायपुर की चारों सीटों पर भाजपा को फायदा मिलना है, अब यह अलग बात है कि भाजपा का कौन सा प्रत्याशी मतदाताओं को कितने स्टेडियम, कितने सभागृह, कितने गरीब-आवास, कितने तालाब-बगीचे गिना सकता है। जो लोग 5 बरस बाद रायपुर आते हैं, वे शहर को ठीक से पहचान भी नहीं पाते। रायपुर के राजधानी होने की वजह से इस पर मूणत के लोक निर्माण विभाग द्वारा किया गया अतिरिक्त खर्च विधानसभा से बजट में पास भी करवा लिया गया था, इसलिए राज्य के पैसों का किसी एक शहर में यह अनाधिकृत इस्तेमाल भी नहीं है। भाजपा के अलावा कांगे्रस के लोगों का भी कहना है कि मूणत ने जितने काम करवाए हैं, उसका कोई जवाब किसी पार्टी के पास नहीं हो सकता। (rajpathjanpath@gmail.com)

     

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Posted Date : 13-Nov-2018
  • राजनीतिक हल्कों में सरकार के ताकतवर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के उस बयान को लेकर हलचल मची है, जिसमें उन्होंने यह कह दिया कि सीएम कौन बनेगा, यह पार्टी तय करेगी। बृजमोहन ने एक यू-ट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में यह भी कहा कि चुनाव जीतने के बाद पार्टी सीएम तय करेगी। जबकि तीन दिन पहले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, सीएम डॉ. रमन सिंह के विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव में मतदाताओं से यह अपील कर चुके हैं कि वे विधायक नहीं, बल्कि सीएम चुन रहे हैं। शाह इससे पहले भी कई बार कह चुके हैं कि प्रदेश में रमन सिंह के नेतृत्व में चौथी बार भाजपा की सरकार बनेगी। इन सबके बीच बृजमोहन के इस बयान के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। और उनके इस बयान को पार्टी की अंदरूनी खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है। 
     पिछले दो-तीन बरसों में सीएम और बृजमोहन अग्रवाल के बीच कई मौकों पर दूरियां नजर आई हंै। एक समय ऐसा भी आया था कि बृजमोहन को मंत्री पद से हटाने की चर्चा भी होने लगी थी। तब राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद विवाद सुलझा। अब जब चुनाव चल रहे हैं, ऐसे में बृजमोहन के इस बयान को कुछ लोग रमन सिंह के नेतृत्व को चुनौती के रूप में देख रहे हैं। साथ ही इस बात को लेकर भी चर्चा हो रही है कि पार्टी में सब कुछ अभी सामान्य नहीं है। 

    पहले राउंड में किसको कितना?
    पहले चरण की सीटों को लेकर कांग्रेस और भाजपा नेताओं के अपने-अपने दावे हैं। भाजपा के रणनीतिकार पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जता रहे हैं और 18 में से 12 सीट का दावा कर रहे हैं। कांग्रेस को पिछले चुनाव से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। यानी 12 से ज्यादा सीट मिलने की बात कह रहे हैं। कुछ टीवी चैनल अपने सर्वे में भाजपा को बढ़त मिलने के बात कह चुके हैं। इन सबके बीच आईएएस डॉ. आलोक शुक्ला की ईवीएम पर लिखित किताब के विमोचन के मौके पर एक वरिष्ठ पत्रकार की उस टिप्पणी पर खूब तालियां बजी, जिसमें उन्होंने तमाम सर्वेक्षण पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि चुनाव के वक्त हम सच नहीं दिखाते या लिखते हैं, हम झूठ लिखते हैं। ऐसे में लोगों को अपने मताधिकार का प्रयोग सोच समझकर अपने विवेक के अनुसार करना चाहिए। फिर भी पहले चरण में किसको ज्यादा सीट मिलेगी, इसको लेकर बहस जारी है। कुछ लोग सट्टा बाजार पर ज्यादा भरोसा करते हंै क्योंकि सटोरियों का अनुमान ज्यादा सटीक होता है। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 12-Nov-2018
  • जोगी कुनबा कड़े मुकाबले में फंस गया है। हाल यह है कि खुद अजीत जोगी को अपने गढ़ मरवाही में ही चुनाव जीतने में मशक्कत करनी पड़ सकती है। चर्चा तो यह भी है कि जोगी चुनाव भले जीत जाए पर लीड उतनी नहीं रहेगी, जितनी पहले रहती थी। प्रदेश में सबसे ज्यादा वोटों से जीतने का रिकॉर्ड अजीत जोगी के नाम पर है। वे 2003 में 54 हजार से अधिक मतों से चुनाव जीते थे। जोगी पहले कांग्रेस टिकट से चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन इस बार वे अपनी पार्टी के बैनर तले हल चुनाव चिन्ह लेकर मैदान में उतरे हैं। सुनते हैं कि स्थानीय मतदाता नए चुनाव चिन्ह के प्रति आकर्षित नहीं हो पा रहे हैं। जोगी के प्रति लगाव बरकरार दिख रहा है, फिर भी मुकाबला कड़ा हो चला है। इसी तरह कोटा से डॉ. रेणु जोगी भी कड़े मुकाबले में फंस गई हैं। उनकी जीत का अंतर लगातार कम होता रहा है, लेकिन कांग्रेस के परंपरागतगढ़ में नए बैनर तले उनका चुनाव जीतना बेहद कठिन माना जा रहा है। यही हाल, जोगी की बहू ऋचा जोगी का है। ऋचा अकलतरा सीट से बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में है। 
    ऋचा त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी हंै। उनका मुकाबला पूर्व विधायक और भाजपा प्रत्याशी सौरभ सिंह व कांग्रेस प्रत्याशी विधायक चुन्नीलाल साहू से है। चर्चा तो यह है कि बसपा के कट्टर समर्थक अभी भी ऋचा के साथ नहीं जुड़ पा रहे हैं। यद्यपि ऋचा के समर्थन में बसपा सुप्रीमो मायावती यहां सभा ले चुकी हैं। उनकी सभा भीड़ के लिहाज से सफल भी रही है, लेकिन स्थानीय कार्यकर्ता उन्हें बाहरी मानकर दूरी बनाए हुए हैं। इसका सीधा फायदा चुन्नीलाल साहू और सौरभ सिंह को हो रहा है। हालांकि ऋचा के पति अमित जोगी चुनाव प्रबंधन में माहिर माने जाते हैं। ऐसे में जोगी समर्थक उम्मीद से हैं। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 11-Nov-2018
  • प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी, यह चर्चा आम है। नौकरशाहों में इसको लेकर उत्सुकता ज्यादा दिख रही है। वे दीवाली की बधाई देने आए छोटे अफसरों - आम लोगों से आपसी चर्चा के बीच यह पूछ लेते हैं कि प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी। कुछ लोग इतने चालाक होते हैं वे वही जवाब देते हैं, जो साब सुनना चाहते हैं। ऐसे ही चर्चा के बीच एक साब ने सामने बैठे बिजनेसमैन और छोटे अफसरों से पूछ लिया कि प्रदेश में सरकार किसकी बनेगी। 
    अफसरों ने एक सुर में जवाब दिया कि ऐन-केन प्रकारेण भाजपा की ही सरकार बनेगी। पर चतुर बिजनेसमैन को साब के रिश्तों का पता था उसने तपाक से बोल दिया कि प्रदेश में जोगी किंगमेकर होंगे और उनके बिना सरकार बन ही नहीं सकती। आखिर में साब ने अपने विचार रखे कि  भाजपा की सीटें 65 प्लस रहेगी। ये बात अलग है कि कट्टर भाजपाई भी इतनी सीटों का दावा नहीं कर पा रहे हैं। 

    सिंहदेव अघोषित रूप से घोषित?
    क्या कांग्रेस ने टीएस सिंहदेव को सीएम प्रोजेक्ट कर दिया है, यह सवाल पार्टी के अंदर और बाहर चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल, राहुल गांधी और कांग्रेस के बाकी नेता जिस तरह सिंहदेव को महत्व दे रहे हैं, उससे इन अटकलों को बल मिला है। राहुल ने तो घोषणा पत्र जारी करते समय सिंहदेव से यह पूछ लिया कि इन घोषणाओं को किस तरह पूरा करेंगे? सिंहदेव ने अपनी योजनाओं से राहुुल और मीडिया को अवगत कराया। राहुल ने आगे यह भी कहा कि कांग्रेस से जो भी सीएम बनेगा, उसे इन घोषणाओं को पूरा करना होगा। 
    हालांकि, कांग्रेस से सीएम की रेस में डॉ. चरणदास महंत और दुर्ग सांसद ताम्रध्वज साहू भी हैं। भूपेश बघेल को स्वाभाविक तौर पर इसका दावेदार माना जाता है, पर सीडी-वीडी के चक्कर में वे पिछड़ गए हैं, ऐसा लगता है। टिकट वितरण में सिंहदेव को महत्व दिया गया। सुनते हैं कि बस्तर और सरगुजा संभाग की सारी टिकटें सिंहदेव के हिसाब से तय हुई हैं। बाकी टिकटों में भी उनकी खूब चली। रमन सिंह के मुकाबले में सिंहदेव कांगे्रस पार्टी का सौम्य चेहरा हैं। हाईकमान ने उनकी पकड़ और पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता को भांपते हुए  महीनाभर पहले ही एक हेलीकॉप्टर उपलब्ध करा दिया था। वे प्रदेश कांग्रेस के अकेले नेता हैं जो बस्तर की सारी सीटों में प्रचार के लिए गए और सभाएं लीं। बाकी सीटों पर भी उनकी मांग बनी हुई है। पार्टी के एक-दो को छोड़ दें, तो सारे प्रत्याशी सिंहदेव के संपर्क में हैं और वे उनकी मदद करते दिख रहे हैं। ऐसे में सीएम पद को लेकर कोई बहस हो रही है, तो वह बेवजह नहीं है। हालांकि राजनीति के जानकार जब पुराने फार्मूले लेकर नए नतीजे निकालने बैठते हैं तो एक नतीजा यह निकलता है कि चरण दास महंत मध्यप्रदेश के समय से सबसे पुराने और अनुभवी मंत्री रहे हैं, वे पिछड़े वर्ग के भी हैं, और कांगे्रस के सभी गुटों को मिलाकर चलना भी जानते हैं। कुछ दूसरे लोगों का यह मानना है कि कोई कांगे्रस नेता अगर अचानक सामने  आने की संभावना रखता है तो वह ताम्रध्वज साहू है। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 10-Nov-2018
  • भाजपा को बड़ा फायदा यह मिलता है कि चुनाव प्रचार खत्म होते-होते कांग्रेस का प्रबंधन बिखर जाता है। कुछ सीटों पर इस चुनाव में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। राहुल गांधी ने पहले प्रत्याशी की घोषणा 15 अगस्त तक करने की बात कही थी, लेकिन प्रदेश के नेताओं की आपसी खींचतान-विवाद के चलते नामांकन दाखिले की शुरू होने के बाद प्रत्याशियों की घोषणा की गई। देरी से प्रत्याशी की घोषणा का  नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। मसलन, बिलाईगढ़ सीट में कांग्रेस ने शिक्षाकर्मी नेता चंद्रदेव राय को प्रत्याशी बनाया है। प्रत्याशी भी ठीक-ठाक है, लेकिन वे मौजूदा विधायक व भाजपा प्रत्याशी डॉ. सनम जांगड़े के खिलाफ नाराजगी को भुना पाने में फिलहाल सफल होते नहीं दिख  रहे हैं। बिलाईगढ़ में चार सौ गांव आते हैं और वहां प्रचार खत्म होने तक प्रत्याशी का पहुंचना मुश्किल दिख रहा है। इसी तरह जैजेपुर और कुछ अन्य सीटों में भी प्रचार-प्रसार की कमी की वजह से कांग्रेस प्रत्याशी दिक्कत मेें हैं। जानकार मानते हैं कि जल्द ही इन सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव प्रबंधन दुरूस्त नहीं किया, तो नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

    भात तो था, बकरा चाहिए...
    बकरा-भात न खिलाने की बात करते हुए कांग्रेस के स्व. रामचंद्र सिंहदेव ने चुनाव लडऩे से इंकार कर दिया था। चुनाव आयोग की नजरों के कारण गांवों में अब बकरा-भात पकना मुश्किल हो गया है। लिहाजा इसका तोड़ भी निकाल लिया गया है। बसना के एक इलाके में इन दिनों वोटरों के घर बकरे का गोश्त बांटने की चर्चा है। बताया जाता है कि वोटर के सदस्यों के हिसाब से परिवार को गोश्त बांटा जा रहा है। बांटने की होड़ में  निर्दलीय भी पीछे नहीं हैं। गोश्त का मजा ले चुके एक वोटर का कहना था कि भात का इंतजाम तो चाऊंर वाले बाबा ने पहले ही कर दिया है। बांटने वाले का खर्चा भी कम हुआ है। समस्या बकरों की है। आने वाले दिनों में न जाने कितने बकरों की शामत आएगी।    
    वैसे बसना का छेरी बाजार मशहूर है। ओडिशा सीमा से लगे होने के कारण यहां से बकरे-बकरियां काफी संख्या में बिकने पहुंचते हैं। वोट पड़ते तक न जाने कितने बकरे चुनावी बलि होंगे और वोटर पता नहीं किसे बकरा बनाएगा?

    सोच-समझकर फंसना
    सरायपाली-बसना, सोच-समझकर फंसना, यह उक्ति न जाने कितने बरसों से चली आ रही है। कहा जाता है उक्तियां जनपदों के लोक अनुभवों से उपजी होती हैं। यह बसना सरायपाली के संदर्भ में सटीक बैठती है कि पूरे प्रदेश में इन दोनों विधानसभाओं में कांग्रेस और भाजपा ने सोचने-समझने में सबसे ज्यादा वक्त लगाया और अब मतदान के बाद तय होगा कि सबसे ज्यादा समझदार कौन है, जो फंस गया।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 09-Nov-2018
  • सरकार के एक मंत्री अपने निर्वाचन क्षेत्र के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों के अपने लोगों को हर साल दीपावली पर मिठाईयां, चाकलेट,फल,पटाखे गिफ्ट में भेजा करते थे। कई कांग्रेसियों के घर भी मंत्रीजी का गिफ्ट पहुंचा करता था। इस बार न जाने क्यों, मंत्रीजी का गिफ्ट नहीं पहुंचा है। हो सकता है कि गिफ्ट की टोकरी जमाने में देर हो गई हो और लोगों के घरों तक एक-दो दिन बाद गिफ्ट पहुंचे। लेकिन वे लोग परेशान हैं। इसी बीच हल्ला है कि कमजोर प्रतिद्धंदी मैदान में आने से मंत्रीजी ने अपना हाथ बांध लिया है।  

    टिकट और गरीबी 
    पता नहीं क्यों चुनाव की टिकट मिलने के बाद ज्यादातर प्रत्याशी गरीब हो जाते हैं। यह भी संयोग है कि कांग्रेस प्रत्याशियों के साथ ऐसा अक्सर देखने को मिलता है। टिकट की दावेदारी करते समय जो लोग 5, 10, 20 करोड़ रुपए खर्च करने का दंभ भरते हैं, वहीं लोग टिकट मिलने के बाद मदद मांगने निकल पड़ते हैं और बात-बात पर अपनी गरीबी का रोना रोने लगते हैं। इस बार भी यही सबकुछ हो रहा है। भाजपा के धन्ना सेठ प्रत्याशियों का हवाला देकर कांग्रेस के कई प्रत्याशी हाथ बांधे बैठे हैं। पार्टी के ज्यादातर प्रत्याशियों ने वार्डों में तभी फंड बांटा, जब उन्हें पार्टी से फंड मिल गया। कहीं प्रति वार्ड 25-25 हजार रुपए दिए गए तो कुछ प्रत्याशियों ने 20-20 हजार देकर बचत कर ली है, अब आगे देखिये क्या होता है? 

    फंड की कमी नहीं 
    वैसे, कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशियों को भरपूर आर्थिक मदद कर रही है। जानकारों का दावा है कि पिछले चुनाव में 35-35 पेटी की मदद मिली थी।लेकिन इस बार राहुल गांधी के आदेश पर दोगुनी मदद मिल रही है। मदद की पहली किश्त दीपावली के ठीक पहले सभी प्रत्याशियों तक पहुंचा दी गई है। मदद की दूसरी किश्त मतदान के दो-तीन दिन पहले दे दी जाएगी। कांग्रेसियों को जानकारी मिल चुकी है कि पार्टी ने खजाना खोल दिया तो वे अपने प्रत्याशियों से भी दोगुनी राशि मिलने की उम्मीद कर रहे हैं। इसी वजह से चुनाव कार्यालय खोलने के इच्छुक लोगों की संख्या एकाएक बढ़ गई है। 

    दूध का जला...
    कांंग्रेस के प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया कुछ दिनों से बेहद सक्रिय हैं। हालत यह है कि पुनिया दीपावली के दिन सुबह लखनऊ गए और दूसरे दिन सुबह यहां लौट आए। पार्टी की अंदरूनी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले एक कांग्रेस नेता की मानें तो पुनिया पहले भी सक्रिय थे। लेकिन सीडी कांड के बाद से ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। दूध के जले हैं, इसलिए छाछ को भी फूंक-फूंक कर पी रहे हैं, यानी किसी पर भी जरूरत से अधिक भरोसा नहीं कर रहे हैं। न जाने कौन, कब और कहां निपटा दे इसलिए सफर में भी पूरी सावधानी रख रहे हैं। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 06-Nov-2018
  • पुलिस के कई रिटायर्ड अफसर भाजपा और कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं। रिटायर्ड डीजी राजीव श्रीवास्तव समेत कई रिटायर्ड पुलिस अफसर भाजपा की फिर सरकार बनाने के लिए माहौल बनाने में जुटे हैं, तो कांग्रेस के पक्ष में भी कुछ रिटायर्ड पुलिस अफसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें चर्चित नाम जीएस बाम्बरा का भी है। 
    डीएसपी के पद से रिटायर हो चुके बाम्बरा किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। वे सालों से रायपुर में रहे हैं और हर तरह की गुत्थियां सुलझाने में माहिर माने जाते हैं। रिटायर्ड होने के बावजूद पुलिस शीर्ष अफसर अब भी अलग-अलग मामलों में उनकी सेवाएं और राय लेते हैं। बाम्बरा सिख फोरम से जुड़े हैं। वे रायपुर उत्तर के कांग्रेस प्रत्याशी कुलदीप जुनेजा को मदद कर रहे हैं। सुनते हैं कि कांग्रेस के ही कई नेता जुनेजा से खफा रहे हैं, लेकिन बाम्बरा ने उन्हें कुलदीप के पक्ष में प्रचार के लिए राजी किया। वे मूलत: सरगुजा के रहवासी हैं और सिंहदेव परिवार से उनके अच्छे संबंध हैं। वे न सिर्फ रायपुर बल्कि अन्य सीटों पर भी पार्टी के बड़े नेताओं को सलाह मशविरा दे रहे हैं। जब बाम्बरा जैसे लोग कोई सलाह देते हैं, तो उनकी बातें बिना किसी किन्तु-परन्तु के मानी जाती है। 

    एक पंथ दो काज
    पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय कांग्रेस प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार करने आए हैं। सहाय पड़ोसी राज्य झारखंड के रहने वाले हैं। वैसे तो वे कोई भीड़ जुटाने वाले नेता तो नहीं है, लेकिन छत्तीसगढ़ से उनका नाता जरूर है। हल्ला है कि सिलतरा स्थित एक स्टील कंपनी में उनकी भागीदारी है, ऐसे में उनका छत्तीसगढ़ आना-जाना लगा रहता है। अब चुनाव चल रहे हैं, तो हिसाब-किताब देखने के साथ-साथ प्रचार भी हो जा रहा है। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 05-Nov-2018
  • सिंधी समाज के नेताओं ने भाजपा हाईकमान पर दबाव बनाकर श्रीचंद सुंदरानी के लिए रायपुर उत्तर की टिकट हासिल तो कर ली है, लेकिन उन्हें जिताने के लिए एकजुटता नहीं दिख रही है। श्रीचंद से नाराज कई सिंधी नेता जोगी पार्टी के प्रत्याशी अमर गिदवानी के समर्थन में आ गए हैं। गिदवानी को चुनाव मैदान से हटाने की भरसक कोशिश हुई, कई स्तरों पर चर्चा भी चली, लेकिन गिदवानी नाम वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुए। ऐसे में सिंधी वोटरों का बंटवारा तय माना जा रहा है। हालांकि सिंधी वोटरों की संख्या कोई बहुत ज्यादा नहीं है। मात्र 12 हजार सिंधी मतदाता हैं, पर जिस अंदाज में रायपुर उत्तर की सीट पर समाज से जुड़े कई लोगों ने हक जताया, उससे फायदा कम नुकसान होता ज्यादा दिख रहा है। 
    रायपुर उत्तर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी कुलदीप जुनेजा को दूसरे समाजों का बैठे-बिठाए समर्थन मिल रहा है। सुनते हैं कि गुजराती समाज के एक बड़े तबके ने कुलदीप को समर्थन देने का ऐलान किया है। समाज से जुड़े लोग इस बात से ज्यादा नाराज है कि सिंधी से ज्यादा वोटर रायपुर उत्तर में गुजराती हैं। फिर भी टिकट के लिए सामाजिक दबाव नहीं बनाया। और तो और सिंधी समाज के कांग्रेस नेता अब कुलदीप के पक्ष में प्रचार के लिए तैयार हो गए हैं। पिछले चुनाव में ये नेता एक तरह से तटस्थ हो गए थे। यानी श्रीचंद की राह कठिन हो गई है, लेकिन वे भी एक जीवट विधायक की तरह पूरे 5 बरस अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे रहे। सुबह मरीन ड्राइव पर सैकड़ों लोगों से मिलकर दिन शुरू करना, और हर समारोह में पहुंचना, मेकाहारा में मरीजों से संपर्क रखना। ये सारे काम उनके काम भी आ सकते हैं। 

    कमाऊ विभागों का यहां भी बोलबाला
    कई पूर्व पुलिस और आबकारी अफसर अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ रहे हैं। दो रिटायर्ड डीएसपी आरके राय गुण्डरदेही और श्यामलाल कंवर रामपुर से फिर चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले चुनाव में दोनों ने अच्छे खासे वोटों से जीत हासिल की थी।  इस बार कोटा से नौकरी छोड़ चुके डीएसपी विभोर सिंह कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पूर्व सीएम अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी को टक्कर दे रहे हैं। पूर्व थानेदार अनूपनाग भी अंतागढ़ सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में डटे हैं। इससे परे पूर्व आबकारी अफसर इंद्रशाह मंडावी मानपुर-मोहला सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इससे परे एक अन्य आबकारी अफसर की पत्नी लक्ष्मी ध्रुव भी कांग्रेस टिकट से नगरी-सिहावा सीट से चुनाव मैदान में है। पुलिस और आबकारी अफसरों की राजनीति में सक्रियता चर्चा का विषय है। वैसे भी राजनीति में पैसे का बोलबाला हो गया है। ऐसे में पुलिस और आबकारी अफसर मौजूदा राजनीति की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम दिखते हैं। राजनीतिक दल भी इन्हें टिकट देने में गुरेज नहीं करती, क्योंकि ये चुनावी खर्चे के लिए दल पर निर्भर नहीं रहते हैं। ये फंड का जुगाड़ खुद कर लेते हैं। कभी कभार दूसरों की मदद भी कर देते हैं।
     सुनते हैं कि एक रिटायर्ड पुलिस अफसर ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद एक बड़े राजनेता को करीब 50 लाख उधार दिए थे।  पैसा तो वापस नहीं मिला, लेकिन पार्टी की नीति निर्धारक जरूर बन गए। अफसर को भी पैसे वापसी की जल्दी नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि नेताजी पॉवर में आएंगे तो हिसाब-किताब हो जाएगा। इधर भूपेश बघेल के खिलाफ पाटन से लड़ रही एक ताकतवर महिला प्रत्याशी के पति एक सबसे कमाऊ विभाग में इंजीनियर हैं, और वहां पर करोड़ों के खर्च की चर्चा है। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 04-Nov-2018
  • टिकट बंटने के बाद कांग्रेस में खींचतान और बढ़ गई है। हाल यह है कि प्रत्याशियों को नाराज नेताओं को मनाने में ज्यादा समय देना पड़ रहा है। रायपुर की सीमा से सटे विधानसभा क्षेत्र के प्रत्याशी को अपने ही दल के नेताओं से जूझना पड़ रहा है। राजीव भवन के कर्ता-धर्ता एक पदाधिकारी के भाई-बंधुओं ने प्रचार करना तो दूर, पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ ही माहौल बनाना शुरू कर दिया है। सुनते हैं कि पार्टी पदाधिकारी ने किसी एक को प्रत्याशी बनवाने के लिए प्रॉमिस कर दिया था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। अब उन्होंने पार्टी प्रत्याशी की राह में  रोड़े अटकाने शुरू कर दिए हैं। इसी तरह रायपुर जिले की एक सीट के प्रदेश संगठन के एक बड़े पदाधिकारी प्रत्याशी को पिछले दिनों एक अन्य दावेदार की नाराजगी झेलनी पड़ी। 
    हुआ यूं कि संगठन के प्रमुख पदाधिकारी बी-फार्म लेने के लिए पार्टी दफ्तर पहुंचे थे। दफ्तर पहुंचते ही उनका सामना एक नेता से हो गया जो कि उसी सीट से टिकट के दावेदार थे। पहले संगठन के प्रमुख पदाधिकारी ने उनके लिए प्रयास करने का भरोसा दिलाया था, लेकिन बाद में वे उसी सीट से खुद प्रत्याशी बन गए। टिकट के वंचित नेता, पदाधिकारी को देखते ही भड़क गए। आसपास कोई और सुन न ले इसलिए पदाधिकारी उन्हें एक कमरे में ले गए। बाहर सिर्फ तेज आवाज ही सुनी गई। बाहर जब दोनों निकले तो उनके चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था। न सिर्फ रायपुर जिला बल्कि अन्य जगहों पर भी इसी तरह का तनाव देखने को मिल रहा है। 

    पुनिया अब पस्त हैं
    प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया अब पहले की तरह सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। वे पिछले प्रभारियों की तुलना में ज्यादा सक्रिय रहे हैं। और चुनाव शुरू होने से पहले तकरीबन सभी विधानसभा क्षेत्रों में जा चुके थे। चुनाव को लेकर इतने ज्यादा सक्रिय थे कि उन्होंने पार्टी के एक नेता को किराए का मकान देखने के लिए कह दिया था। मतदान खत्म होने तक यहां रहकर चुनाव संचालन की उनकी योजना थी, लेकिन जैसे ही विधानसभा सीटों की कथित सौदेबाजी की सीडी जारी हुई, वे यहां आने से कन्नी काटने लगे। यह भी हल्ला उड़ा कि पुनिया की भी सीडी जारी हो सकती है, काफी दिनों तक नहीं आए। चर्चा तो यह भी है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ का प्रभार छोडऩे की इच्छा भी जाहिर कर दी थी, लेकिन हाईकमान की समझाइश पर वे फिलहाल पद पर बने रहने के लिए तैयार हो गए। उनकी भूपेश बघेल से मतभेद की खबर मीडिया में छाई हुई है और उन्होंने प्रचार छोड़कर अपने आपको बैठकों तक ही सीमित कर लिया है। चर्चा तो यह भी है कि वे छत्तीसगढ़ के प्रभार से किसी तरह पीछा छुड़ाना चाहते हैं। 

    सूत न कपास, जुलाहों में...
    भाजपा में कुर्सी को लेकर सूरतेहाल यह है कि राजनांदगांव के शहरी नेता मधुसूदन यादव ने डोंगरगांव का रूख क्या किया, उनकी संभावित जीत के गुमान में महापौर की कुर्सी के लिए अंदरूनी तौर पर दौड़ शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव के नतीजों का अता-पता नहीं है, लेकिन नगर निगम में बहुमत वाली भाजपा में बिना लड़े एक साल की मेयर की कुर्सी को लेकर सियासी बिसात बिछ रही है। बताते हैं कि यादव के विजयी होने की पूरी उम्मीद को लेकर मेयर इन काउंसिल के सदस्य और मुखर महिला पार्षदों ने भी कुर्सी पर टकटकी लगाई  है। यादव के निर्वाचित होने की आस में बैठे भाजपा पार्षद बिना किसी उठापटक के  सीट को हथियाने की जुगत में है। पार्टी में इस  तरह की हड़बड़ाहट को लेकर कई पार्षदों को डपट खानी पड़ी। उत्साही पार्षदों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि महापौर और विधायक के पद पर एक साथ रहने में कानूनी अड़चन नहीं है। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 03-Nov-2018
  • रायपुर उत्तर विधानसभा सीट पर जोगी कांग्रेस ने टिकट के दो दावेदारों को बी-फॉर्म जारी कर दिया है। वैसे तो जोगी कांग्रेस में जो न हो वो कम है, लेकिन इस अनोखी घटना का राज हर कोई जानने को बेताब है, एक टिकट के लिए दो बी-फॉर्म दिए जाने को लेकर तरह-तरह की कहानियां सुनने को मिल रही है। एक तो यह कि टिकट के दोनों दावेदार अमर गिदवानी और नितिन भंसाली जोगी परिवार में अच्छी पकड़ रखते हैं। इसलिए इसे दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी कहानी भाजपा के सेठ प्रत्याशी की ओर इशारा कर रही है। जोगी बंगले के ही एक दमदार नेता की मानें तो अमर गिदवानी के चुनाव लडऩे से भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगेगी। आखिर गिदवानी अपने समाज से ही वोट बटोरेंगे, जो श्रीचंद सुंदरानी के लिए नुकसानदेह साबित होगा। इसीलिए गिदवानी की जगह भंसाली को भी बी-फॉर्म दे दिया गया है, लेकिन गिदवानी को मैदान से हटाने का फैसला अभी फाइनल नहीं हुआ है। 

     प्रत्याशियों की भीड़ का राज 
    इस बार विधानसभा चुनाव में लगभग हर सीट पर प्रत्याशियों की भीड़ दिख रही है। चुनाव के पंडितों के अनुसार धनलाभ के लिए चुनाव बेहतर अवसर है। प्रत्याशियों को चुनाव लडऩे को धन मिलता है और चुनाव मैदान से हटने या फिर घर बैठने का भी धन लाभ प्राप्त होता है। रायपुर दक्षिण सीट पर परंपरागत रूप से अधिक प्रत्याशी मैदान में हैं। यहां 50 में से 23 प्रत्याशी मुस्लिम समाज से हैं। दरअसल इस क्षेत्र में पिछले 27 सालों से मुस्लिम समाज एकदम से सक्रिय हो जाता है, और उसकी वजह से कांग्रेस को वोटों का नुकसान लगातार बना हुआ है।  सौ-दो सौ वोट भी पाने वाले मुस्लिम प्रत्याशी को सफल मान लिया जाता है। हजार-हजार वोटों को मिलाकर ही बड़ा फासला बनता है। आखिर में चुनावी मैदान में जो प्रत्याशी बाकी बचेंगे, वे शहर के अलग-अलग हिस्सों से कुछ दर्जन या कुछ सौ वोट पाने के हकदार साबित होंगे। लेकिन इस बार अजमेर जाना कितने लोगों को नसीब होगा, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। 
    पिछले चुनाव का नतीजा देखें तो अब्दुल नईम खान को 929, शमशेर अली को 737, रईस फाजिल को 596, श्रीमती नजत अली को 259, मो. सगीरुद्दीन को 264, नियाज भाई को 247, अब्दुल कय्यूम खान को 205, वाशिम अफरीदी को 179, अजमत भाई को 105, अनवर भाई को 91, हबीब भाई को 86, मो. अफजल को 85, मजहर इकबाल को 73, मौलाना सलाम को 65, इलियास हुसैन को 64, महबूब खान को 59, फिरोज खान को 57, मो. वासिम रिजवी को 57, फरहा नाज को 50, ताजदार खान को 49, हाजी सैय्यद हकीमुद्दीन को 40 वोट मिले थे। 

    दरबारियों का दुख 
    विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को किनारे लगा दिया है। बघेल की यह हालत यहां उनके कुछ दरबारियों को बेहद खल रही है। वे दुखी हैं और मौका मिलते ही भड़ास भी निकाल रहे हैं। सुनते हैं कि कांग्रेस भवन में रोज दोपहर को कुछ दरबारी एकत्र होते हैं और एक कमरे में बैठकर पुुनिया, सिंहदेव, महंत, जैसों को घंटों कोसते हैं और फिर घर लौट जाते हैं। वो भी दिन थे, जब प्र्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात करने के लिए लोग इन्हीं दरबारियों के आगे-पीछे घूमते थे। 

    तोडफ़ोड़ के फायदे 
    प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद कांग्रेस के दफ्तरों में हुई तोडफ़ोड़ और उससे हुए नुकसान को तो लोगों ने घर बैठे देख लिया। कांग्रेसजन अब तोडफ़ोड़ करवाने के फायदे भी देख रहे हैं। पार्टी के प्रदेश मुख्यालय राजीव भवन में जहां तोडफ़ोड़ करवाई गई थी, वहीं शुक्रवार को अजीब नजारा देखने को मिला। तोडफ़ोड़ करवाने वाले युवा पार्षद को पार्टी की ओर से हीरो के रूप में पेश किया गया। बकायदा उस युवा पार्षद की प्रेस कांफ्रेंस करवाई गई। प्र्रेस कांफ्रेंस में उस युवा पार्षद ने तोडफ़ोड़ के लिए माफी मांगी और पार्टी ने उसे माफ भी कर दिया। बताया गया कि तोडफ़ोड़़ से हुए नुकसान की भरपाई युवा पार्षद ही करेंगे। एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने उस पार्षद की तारीफ के कसीदे पढ़ते हुए यहां तक कह दिया कि वो तन-मन और धन से कांग्रेस के साथ हैं। ऐसे में टिकट से वंचित अन्य दावेदार हाथ मल रहे हैं कि उन्होंने हीरो बनने और पब्लिसिटी का एक बेहतर अवसर गवां दिया है।

    नोट लाने-ले जाने का इंतजाम...
    प्रदेश में नोटों की धरपकड़ ऐसी चल रही है कि नेता तो नेता, कारोबारी भी परेशान हो चुके हैं। ऐसे में एक पार्टी ने नोटों के लिए एक तरकीब निकाली है। इन दिनों राजधानी रायपुर में घर तक खाना पहुंचाकर देने वाले नौजवान मोटरसाइकिलों पर पीछे बड़े-बड़े बैग लिए सरपट आते-जाते हैं। एक पार्टी ने इसी मार्के वाले ऐसे ही बैग का इंतजाम किया है, और आधी रात तक आसानी से उसका इस्तेमाल हो सकता है। एक बैग में करोड़ों के नोट आ सकते हैं, या दर्जनों लीटर दारू।

    भाई नहीं तो ससुर की टिकट से खुश
     राज्य पुलिस के एक बड़े अफसर के घर में कुछ दिनों से कांग्रेस की टिकट नहीं मिलने का गम अचानक से खुशियों में बदल गया और यह खुशी छत्तीसगढ़ के रास्ते नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश से होकर घर तक पहुंची। सुनते हैं कि राजधानी में पदस्थ एएसपी प्रफुल्ल ठाकुर के भाई वीरेश ठाकुर कांकेर की भानुप्रतापपुर सीट से कांग्रेस से टिकट की उम्मीद से थे। पर कांग्रेस ने मनोज मंडावी पर फिर भरोसा किया। सुनते हैं कि यह परिवार लंबे समय से कांग्रेस समर्थक रहा है। टिकट नहीं मिलने का मलाल के बीच एएसपी ठाकुर के परिवार में उस वक्त दुख सुख में बदल गया जब मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा के अमरवाड़ा सीट से ससुर प्रेमनारायण ठाकुर को भाजपा ने मैदान में उतारा। चर्चा है कि एएसपी ठाकुर का परिवार इस बात से ही खुश हो गया है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भले ही उनके परिवार को नजरअंदाज किया, लेकिन मध्यप्रदेश भाजपा में उनकी सुनी गई। कभी दिग्विजय सिंह सरकार में परिवहन मंत्री रहे प्रेमनारायण ठाकुर का राजनीतिक रसूख अमरवाड़ा इलाके में बरकरार रहा। गत चुनाव में वहां से एएसपी ठाकुर के साले साहब को भाजपा ने मौका दिया था और वे मामूली अंतर से पराजित हुए थे।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 02-Nov-2018
  • रायपुर दक्षिण की टिकट नहीं मिलने पर पार्षद एजाज ढेबर के समर्थकों ने पीसीसी दफ्तर में जमकर उत्पात मचाया। ढेबर समर्थकों का गुस्सा स्वाभाविक था। सुनते हैं कि कांग्रेस के बड़े नेता ढेबर परिवार के एक तरह से मेहमान की तरह रहे हैं। वे उनके चार सितारा होटल में ठहरते थे और लजीज व्यंजनों का लुफ्त उठाकर मुंह पोंछकर निकल जातेे थे। होटल में कभी किसी ने उन्हें बिल के लिए नहीं पूछा। और तो और प्रत्याशी चयन के लिए रायपुर आई स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य भी ढेबर के होटल में रूके थे। पिछले दो साल से कांग्रेसियों के लिए ढेबर का होटल एक तरह से गेस्ट हाऊस की तरह उपयोग हो रहा था। अब पता नहीं किस तरह स्क्रीनिंग की गई, जिसके होटल में रूके थे उनका नाम ही पैनल में नहीं रखा गया। लाखों फूंकने के बाद टिकट हाथ नहीं आई तो गुस्सा किसी न किसी पर उतरना था। सो, पीसीसी दफ्तर में बड़े नेताओं नेताओं की गैर मौजूदगी में ढेबर समर्थकों ने उनके कमरों में तोडफ़ोड़ कर खीझ निकाली। कुछ समय पहले तक कांग्रेसियों के लिए गुरुमुख सिंह होरा का होटल ऐसे ही काम आता था, और अब यह एक होटल और जुड़ गया है।

    सीडी के बाद की सतर्कता

    कांग्रेस में प्रत्याशी चयन में इस बार अतिरिक्त सतर्कता बरती गई। विधानसभा सीटों की सौदेबाजी की कथित सीडी आने के बाद पैसे वाले दावेदारों की पसंदीदा सीटों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया था। 
    सुनते हैं कि रायगढ़ सीट के लिए एक बड़े कारोबारी ने आसपास की चार सीटों के प्रत्याशियों का खर्च उठाने की पेशकश भी की थी। प्रदेश के  एक-दो नेता तो इसके लिए तैयार भी थे, लेकिन छानबीन समिति ने कारोबारी की टिकट के लिए अनुशंसा करना तो दूर, उनका नाम पैनल में भी नहीं रखा। टिकट भी ऐसे व्यक्ति को दी गई जो कि जातिगत समीकरण के हिसाब से फिट बैठ रहा था। इसी तरह रायपुर उत्तर से पूर्व विधायक कुलदीप जुनेजा सिर्फ इसलिए टिकट पा गए कि वे सर्वे में सबसे ऊपर थे। जबकि प्रदेश के ज्यादातर बड़े नेताओं का रूझान कुकरेजा या प्रमोद दुबे की तरफ था, जिन्होंने बड़े नेताओं की सेवा सत्कार में कभी कोई कमी नहीं की। जबकि कुलदीप हाथ हिलाकर निकल जाते थे। रायपुर उत्तर की सीट पर जब मंथन हुआ तो यह बात सामने आई कि कुलदीप की जीत की संभावना सबसे ज्यादा है। विपरीत परिस्थितियों में भी वे पिछले चुनाव में कम वोटों से हारे थे। ऐसे में स्थानीय नेताओं की अनुशंसा को दरकिनार कर कुलदीप को प्रत्याशी बना दिया गया। 

    खरसिया फिर चर्चा में
    खरसिया का इस बार का चुनाव इस चुनाव क्षेत्र को दूसरी बार चर्चा में ला रहा है। पहली बार मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जब 80 के दशक में यहां से उपचुनाव लडऩे आए थे, और दिलीप सिंह जूदेव ने उन्हें नाकों चने चबवा दिए थे। उसके बाद इस बार का चुनाव अनोखा है कि एक कलेक्टर भरी जवानी में इस्तीफा देकर मतदाताओं के सामने उतरा हुआ है। ओपी चौधरी भाजपा की टिकट पर लड़ रहे हैं, और कहीं वे शेविंग किट बांट रहे हैं तो कहीं मतदाताओं को चमका भी रहे हैं। कुल मिलाकर वे खबरों में हैं। 
    यह सीट नंद कुमार पटेल की परंपरागत सीट मानी जाती है, और जीरम घाटी के नक्सल हमले में उनके शहीद होने के बाद उनका बेटा उमेश पटेल यहां से कांगे्रस विधायक बना। इस हिसाब से यह सीट अफसरी से राजनीति में आए चौधरी के लिए आसान नहीं थी, लेकिन चुनाव में उन्होंने अपने पक्ष में एक लहर खड़ी की है। नंद कुमार पटेल के पूरी जिंदगी के साथी रहे बालक राम पटेल इस बार ओपी चौधरी के चुनाव-प्रचार में रात-दिन जुटे हुए हैं। 
    कवर्धा में चौकसी
    कवर्धा में पिछले चुनाव में नोटा से कम वोटों से हारने वाले कांगे्रस प्रत्याशी मोहम्मद अकबर ने पिछली बार जो सबक लिए हैं, उनका इस्तेमाल इस बार वे करने वाले हैं। अब वहां पर न तो मतदान के समय किसी एंबुलेंस से कोई सामान इधर-उधर लाया ले जाया जा सकेगा, और न ही नोटा की तरकीब काम लाई जा सकेगी।
    हाथी किसके हैं?
    छत्तीसगढ़ में जगह-जगह हाथियों के जत्थे खेतों और इंसानों को रौंद रहे हैं। रात-दिन चुनाव में मशगूल एक नेता ने कहा कि चारों तरफ कमल का निशान देखकर हाथियों को लग रहा है कि लक्ष्मीजी कहीं आसपास ही होंगी, और उनके अगल-बगल खड़े होने के लिए हाथी चारों तरफ तलाश कर रहे हैं। दूसरी तरफ राजनीति के कुछ और लोग कहते हैं कि बसपा का हाथी लक्ष्मीजी को ढूंढते घूम रहा है कि वे मिलें तो बैठूं। तीसरी थ्योरी यह है कि छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी बसपा के हाथी के महावत बन बैठे हैं, और उन्होंने जानबूझकर कुछ चुनिंदा इलाकों को कुचलने के लिए हाथियों को ढील दे रखी है, अब उन इलाकों के उम्मीदवारों पर है कि वे इन हाथियों की कैसी आवभगत करते हैं। फिलहाल हाथी अधिक परेशान नहीं है क्योंकि न तो वे चुनावी बातें सुनते, और न ही अखबार पढ़ते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 01-Nov-2018
  • दिग्गज भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ रायपुर दक्षिण सीट से कांग्रेस प्रत्याशी कौन होगा, इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। पिछले चुनाव में बृजमोहन ने तेज तर्रार नेत्री किरणमयी नायक को रिकार्ड 37 हजार से अधिक वोटों से हराया था। बृजमोहन के खिलाफ प्रत्याशी को लेकर यह धारणा रहती है कि वे या तो उनके अपने रहते हैं या फिर अपने होने का हल्ला उड़ा दिया जाता है। किरणमयी को लेकर भी कुछ इसी तरह की अफवाह उड़ी थी, जबकि वे चुनाव हारने के बाद बृजमोहन के खिलाफ अलग-अलग मामलों को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रही हैं। खैर, इस बार चुनाव में कांग्रेस से टिकट के कई दावेदार हैं। सुनते हैं कि पार्टी जिन दो-तीन नामों पर गंभीरता से विचार कर रही है उनमें से एक तो पिछले दिनों रामसागरपारा स्थित एक होटल में नजर आए। होटल जाना सामान्य बात है और इसमें किसी आपत्ति भी नहीं हो सकती, लेकिन वहां रायपुर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के भाजपा के रणनीतिकारों की बैठक चल रही थी। इस बैठक में कांग्रेस टिकट के ये प्रबल दावेदार नेता भी मौजूद थेे। अब पार्टी उनके अपने को प्रत्याशी बना देती है, तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 
    वैसे बृजमोहन अग्रवाल कई मायनों में भाजपा के एक मंत्री से बड़े नेता हैं। वे कम से कम एक दर्जन सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की मदद करते हैं, नगद भी, और सामान भी। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के अलावा वे ही अकेले मंत्री हैं जो कि बहुत सी दूसरी सीटों पर, दूसरे जिलों में प्रचार करने को जाएंगे। दूसरी सीटों के लिए जिसे समय निकालना हो, वह अगर अपनी सीट पर विपक्षी चुनने में दिलचस्पी भी ले, तो उसमें नाजायज क्या है? इससे विपक्ष तक पकड़ तो पता लगती ही है।
    टिकटों में चली किसकी?
    यह चर्चा आम है कि भाजपा में प्रत्याशी का चयन सही नहीं किया गया। पार्टी का एक खेमा इसके लिए राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय को जिम्मेदार ठहरा रहा है। सुनते हैं कि सरोज ने आधा दर्जन से अधिक टिकटें बदलवा दी, जिससे समीकरण एकदम बिगड़ गया। सीएम जगदलपुर-कोण्डागांव सहित कई जगहों पर नया चेहरा चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। 
    चर्चा तो यह भी है कि राजिम से चंद्रशेखर साहू और अभनपुर से अशोक बजाज को टिकट देने की सिफारिश की गई थी। इतना ही नहीं, जांजगीर-चांपा से नारायण चंदेल की जगह व्यास कश्यप को टिकट देने का सुझाव दिया गया था। कुछ जगह बृजमोहन अग्रवाल की वजह से टिकट नहीं बदल पाई, तो कई जगहों पर सरोज का अड़ंगा आ गया। टिकट वितरण में सरोज की अच्छी-खासी चल गई, लेकिन वे अपने भाई को टिकट नहीं दिला पाई। अब उनके लिए तेज तर्रार भाई-भाभी को मना पाना मुश्किल हो रहा है। पार्टी हाईकमान नेताओं के बागी तेवर पर निगाह रखे हुए हैं। ऐसे में आज सरोज पाण्डेय अपने भाई को लेकर भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचीं, और उससे माहौल कुछ शांत हुआ है।
    भीड़ का इंतजाम मुश्किल
    चुनाव आचार संहिता के चलते भाजपा-कांग्रेस नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। पिछले दिनों कांकेर की एक सभा में केन्द्रीय मंत्री रामकृपाल यादव की सभा में मात्र 40-50 लोग ही जुटे थे। कांग्रेस के पास संसाधनों की कमी है, ऐसे में प्रदेश के बड़े नेताओं की सभा में गिनती के लोग ही आ रहे हैं। राहुल गांधी की सभा में भी ज्यादा भीड़ जुट नहीं पाई थी, लेकिन भाजपा के लोग भीड़ को लेकर संवेदनशील रहते हैं और बड़े नेताओं की सभा में अच्छी खासी भीड़ जुट जाए, इसकी कोशिश रहती है। 
    बावजूद इसके सीएम की चारामा के निकट हलबा गांव की सभा में गितनी के लोग ही पहुंच पाए थे। यह सभा 29 तारीख को हुई थी। सुनते हैं कि एक जिम्मेदार व्यक्ति ने सभा के लिए जरूरी इंतजाम करने के लिए जिला संगठन के प्रमुख पदाधिकारी को पांच पेटी दी थी। इन सबके बावजूद भीड़ नहीं जुटी, तो 30 तारीख को जिले के पदाधिकारी को बुलाकर खोज-खबर ली गई। जिले के पदाधिकारी इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते नजर आए। इस पर पदाधिकारियों को जमकर सुननी पड़ी। 

    सीट आखिर सिंधी समाज में रही
    आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद रायपुर उत्तर सीट से मौजूदा विधायक श्रीचंद सुंदरानी को टिकट मिल गई। इस बार उन्हें अपने ही समाज के अमर परवानी से लोहा लेना पड़ा। भाजपा हाईकमान मोटे तौर पर सिंधी प्रत्याशी बनाने के लिए सहमत था, लेकिन दोनों में से किसको प्रत्याशी बनाया जाए इसको लेकर अलग-अलग राय थी।  दोनों ने अपनी टिकट के लिए हाईकमान को हिला दिया था। 
    सुनते हैं कि सुंदरानी को टिकट दिलाने में शदाणी दरबार के प्रमुख संत युधिष्ठिर लाल की भूमिका अहम रही है। इसके अलावा सुंदरानी के लिए नागपुर के प्रभावशाली सिंधी नेता घनश्याम कुकरेजा लॉबिंग कर रहे थे। कुकरेजा के आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से करीबी रिश्ते बताए जाते हैं, तो परवानी के लिए भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य लद्दाराम प्रयासरत थे। लद्दाराम मुंबई के रहने वाले हैं और वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। पार्टी का एक खेमा श्रीचंद सुंदरानी को टिकट देने के सख्त खिलाफ रहा है और समाज के कई लोग उनके विरोध में मुखर रहे हैं। ऐसे में परवानी का दावा मजबूत दिख रहा था। बुधवार को सरदार पटेल की जयंती के मौके पर मरीन ड्राईव में पार्टी नेता एकत्र हुए। उनमें से कुछ ने सुंदरानी को अग्रिम बधाई भी दे दी थी, लेकिन बाद में परवानी को एक मैसेज मिला, इसके बाद वे और उनके समर्थक सक्रिय हो गए। परवानी ने सिविल लाईन में कार्यालय के लिए जगह भी चिन्हित कर ली थी और वहां साफ-सफाई भी शुरू हो गई थी। दोपहर बाद खबर आई कि सुंदरानी के टिकट क्लीयर हो गई है। इसके बाद परवानी समर्थक कार्यालय बंद कर निकल गए। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 31-Oct-2018
  • भाजपा की फायरब्रांड नेत्री उमा भारती का खैरागढ में ठंडा मिजाज पार्टी नेताओं के गले नहीं उतर रहा है। लोधी वोटों को साधने के लिए संगठन ने उमा को प्रचार के लिए बुलाया था। भाजपा को उमा से धारदार बोल की उम्मीद थी, लेकिन उनकी खराब सेहत की वजह से वे किसी तरह अपना भाषण पूरा कर पाई। बताते हंै कि उमा भारती की तबीयत इन दिनों ज्यादा कुछ ठीक नहीं रहती है। नागपुर में कार्यक्रम में शरीक होने पहुंची उमा को एकाएक चुनावी सभा के जाने का फरमान जारी किया गया था। सुनते हैं कि उमा ने अनमने ढंग से कार्यक्रम के लिए हामी भरी। इसी के कारण उमा करीब दो घंटे की देरी से पहुँची।  हेलीकाप्टर से उतरते ही उमा ने कुछ समय आराम करने के बाद सभा में जाने का प्रस्ताव रख दिया। एक घर में उनके आराम की व्यवस्था की गई थी, लेकिन उमा ने वहां रूकना पसंद नहीं किया। सभा में देर से पहुंचने के कारण ज्यादातर भीड़ छंट गई। उमा की पुरानी साख सभा से नदारद रही। चर्चा है कि भाजपा प्रत्याशी कोमल जंघेल से उमा के करीबी संबंध रहे हैं। यही बात उमा को खैरागढ़ तक ले आई थी, लेकिन उनके ठंडे रूख ने पार्टी नेताओं को मायूस कर दिया। 

    रोटी, कपड़ा और मकान

    चुनाव प्रचार अभियान चल रहा है। बैनर-पोस्टर लगने लगे हैं और कुछ हाथों को काम मिल गया है। इन हाथों को इससे मतलब नहीं कि काम वे किसका कर रहे हैं। उनको तो बस अपनी रोजी-रोटी की चिंता है। कांग्रेस ने कभी रोटी, कपड़ा और मकान तथा गरीबी हटाओ का नारा दिया था और सत्ता पर काबिज भी हुई, लेकिन बेकार हाथों, गरीबों के हालात पहले की तरह हैं। सोशल मीडिया पर वायरल यह तस्वीर खरसिया की है जहां रायपुर के कलेक्टर रहे ओपी चौधरी चुनावी मैदान पर भाजपा के प्रत्याशी हैं। कुछ दिन पहले शेविंग किट बांटने की चर्चा थी और अब इस तस्वीर में साफ दिख रहा है कि टी-शर्ट भी बांटे गए हैं। पहनने वाला युवक कांग्रेस प्रत्याशी उमेश पटेल का पोस्टर चिपका रहा है। यानि रोटी का इंतजाम कांग्रेस ने तो कपड़े का भाजपा ने कर दिया है। पोस्टर चिपकाने वाले युवक के पास अपना मकान हो न हो, यह दीवार किसी आम जनता की है जिससे पोस्टर चिपकाने की इजाजत शायद ही ली गई हो। वैसे सोशल मीडिया पर इस युवक पर दिलचस्प टिप्पणी की गई है- यह वही बेरोजगार युवक है जिसे मात्र 3 फीसदी के ब्याजदर पर 2003, 2008 , 2013 के चुनावी घोषणापत्र में स्वरोजगार हेतु सरकारी सहयोग का आश्वासन दिया गया था।
    रामसुंदर दास खरे निकले
    दूधाधारी मठ के प्रमुख महंत रामसुंदर दास को कांग्रेस ने कसडोल से टिकट नहीं दी। वे पार्टी नेताओं के कहने पर ही पिछले तीन साल से वहां मेहनत कर रहे थे। टिकट नहीं मिलने से उनकी नाराजगी स्वाभाविक थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि वे पार्टी छोड़ देंगे। मगर, पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी शकुंतला साहू जैसे ही उनसे आर्शीवाद लेने पहुंची वे अपना सारा दुख भूल गए। उन्हें न सिर्फ विजय होने का आर्शीवाद दिया बल्कि उनके पक्ष में प्रचार करने का भरोसा दिलाया। इसी बीच भाजपा और जोगी पार्टी के कई नेता उन्हें अपने साथ लाने की कोशिश करते रहे। 
    सुनते हैं कि जोगी पार्टी के मुखिया अजीत जोगी ने अपने एक विश्वस्त सहयोगी को उनके पास भेजा और खुद भी मोबाइल से चर्चा की। महंतजी को जोगी राजनीति में लाए थे और उनकी पहल पर कांग्रेस ने उन्हें प्रत्याशी बनाया। महंतजी दो बार लगातार विधायक बने, लेकिन पिछला चुनाव वे हार गए थे। खैर, जोगी ने महंतजी को  अपनी पार्टी में शामिल होने का न्योता दिया और कहा कि कसडोल से उन्हें प्रत्याशी बनाया जाएगा। वे आसानी से जीत हासिल कर लेंगे, लेकिन महंतजी ने साफ कर दिया कि वे पार्टी नहीं छोड़ेंगे। भाजपा के लोग महंतजी के बागी होने का उम्मीद लगाए बैठे वे अब निराश हैं। क्योंकि महंतजी अब पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में जमकर प्रचार करेंगे।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 30-Oct-2018
  • सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की राह इस बार आसान नहीं है, यद्यपि वे पिछले चुनावों में भारी मतों से जीतते आए हैं। इस बार भाजपा के कई पुराने कार्यकर्ताओं ने उनसे मुंह मोड़ लिया है। बृजमोहन को इसका भान भी है। और वे नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने के लिए खुद आगे आए हैं। सुनते हैं कि बृजमोहन पिछले दिनों अपने एक पुराने सहयोगी को मनाने पुरानी बस्ती स्थित उसके घर भी गए। घंटेभर की चर्चा के बाद भी वे उन्हें मना नहीं पाए। नाराज सहयोगी बरसों से इलाके में प्रचार की कमान संभालते रहे हैं। उन्होंने बृजमोहन को कहा बताते हैं कि वे पार्टी नहीं छोड़ेंगे, लेकिन प्रचार भी नहीं करेंगे। पर बृजमोहन ठहरे, कुशल संगठनकर्ता उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है और नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने के लिए कई और नेताओं को लगा रखा है। अब देखना है कि इनमें से कितनों को प्रचार के लिए तैयार कर पाते हैं। 
    पार्षदों की मौज के दिन
    रायपुर नगर निगम के पार्षदों की निकल पड़ी है। कुछ तो टिकट के दावेदार हैं। सभी टिकट के लिए खूब धूमधड़ाका कर रहे हैं। उन्हें दूसरे खेमे से यह संकेत मिल चुका है कि जो जितना धूम धड़ाका करेगा, उसकी दीवाली उतनी ही रौशन होगी। दूसरा खेमा कई पार्षदों को चुप रहने की भी कीमत अदा करते रहा है। सुनते हैं कि पिछली बार इनको 5-5 पेटी दिए गए थे। एक ने तो तुरंत नई डस्टर खरीद ली थी। इस बार पार्षदों को पहले की तुलना में ज्यादा मिलने की उम्मीद है, क्योंकि पिछली बार की तुलना में इस बार मुकाबला ज्यादा कठिन है। न सिर्फ पार्षदों बल्कि पूर्व पार्षदों का भी ख्याल रखा जा रहा है। कुछ को एडवांस भी दिया गया है। यानी जितना खर्च कर वे पार्षद बने थे, विधानसभा चुनाव में बिना लड़े सब खर्चा निकल जा रहा है।
    कांग्रेस​ में किसान घाटे में
    भाजपा ने अपने किसान नेताओं का खूब ख्याल रखा है। किसान मोर्चे के अध्यक्ष पूनम चंद्राकर, महामंत्री जागेश्वर साहू सहित सात पदाधिकारी टिकट पा गए, लेकिन कांग्रेस के एक भी किसान पदाधिकारी  को मौका नहीं मिल पाया है। किसान कांग्रेस के अध्यक्ष चंद्रशेखर शुक्ला धरसींवा से टिकट चाहते हैं, लेकिन यहां का मामला जातिगत अंकगणित में उलझ गया है। रायपुर की दो सीटों पर ब्राम्हण उम्मीदवार हो गए हैं, ऐसे में पार्टी नेताओं का सोचना है कि धरसींवा में किसी ब्राम्हण को टिकट देने से जातिगत समीकरण बिगड़ सकता है। ऐसे में विधानसभा समन्वयक से लेकर तमाम रिपोर्ट को नजर अंदाज कर सिर्फ जाति देखकर प्रत्याशी तय होने की उम्मीद जताई जा रही है।
    करुणा बुआ
    भाजपा की शीर्ष नेत्री रही करुणा शुक्ला की राजनीतिक समझ कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर उनके लिए कारगर साबित हो रही है। नांदगांव में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से चुनावी मुकाबला करते वह रिश्तों की डोर से लोगों को आसानी से बांध रही है। रिश्ते का तानाबाना फिलहाल चुनावी नींव पर टिका हुआ है और इसी के दम पर करुणा को प्रचार में निकले कांग्रेसी कार्यकर्ता 'बुआÓ कहकर पुकार रहे हैं। सुनते हैं कि राजनांदगांव के  एक परिवार से करुणा शुक्ला की रिश्तेदारी भी है। जिसके चलते करुणा को एक रिश्तेदारी में नाम भी मिल गया। रिश्तों के गठजोड़ में बंधते ही करुणा का आत्मविश्वास का बढऩा लाजमी है और राजनीति में आसानी से संबंध बनने का राजनेता भरपूर फायदा भी उठाते हैं। नंादगांव में यह संबंध करुणा की ताकत को बढ़ाने में कितना कारगर साबित होगा, यह देखना है।

    ताकतवर अफसर
    कमाऊ विभाग के कई अफसर एक जगह पर दस साल से एक ही जगह में जमे हुए हैं। वैसे तो चुनाव आयोग तीन साल से अधिक समय से एक ही जगह पर पदस्थ अफसरों को हटाने के लिए दिशा निर्देश जारी करता आया है। तबादले होते भी हैं, लेकिन कई कमाऊ पूतों का बाल-बांका नहीं हो पाता। आयोग भी इनके आगे नतमस्तक दिखता है। ऐसे ही पीडब्ल्यूडी के अफसर राजीव नशीने पिछले दस साल से यहां टिके हुए हैं। वे ईई के प्रभार पर हैं और उन पर कई आरोप हैं। पर उन्हें भी नहीं बदला जा सका है। उनका रसूख इतना है कि विभाग कभी उनके तबादले का प्रस्ताव नहीं भेजता। उन्हें विभाग में कमाऊ पूत के रूप में जाना जाता है। अब इस कमाऊ पूत पर कांग्रेस की नजर पड़ी है। इसकी शिकायत चुनाव आयोग में की गई है। देखना है कि आयोग इस पर क्या एक्शन लेता है। फिलहाल एक विमान के साथ ऐसी तस्वीर इस अफसर की ताकत तो बताती ही है।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 29-Oct-2018
  • खरसिया से भाजपा प्रत्याशी पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी के चुनाव प्रचार का ढंग निराला है। चर्चा है कि उन्होंने एक हजार युवकों को प्रचार के लिए हॉयर किया है। प्रचार में जुटे इन युवकों को करीब डेढ़ सौ रुपये रोज दिए जाते हैं यानी प्रतिदिन कुल डेढ़ लाख बंटता है। जैसे कलेक्टोरेट में हर अफसर की अलग-अलग जिम्मेदारी होती थी। कुछ इसी तरह का वर्क डिवीजन उन्होंने कर रखा है। यानी सीधे उनसे कोई चर्चा करने की जरूरत नहीं है। कोई आ जाता है तो वे संबंधित काम देखने वाले के पास भेज देते हैं। कलेक्टर रहते काम संतोषजनक न होने पर वे अफसरों पर झल्ला जाते थे। ठीक कभी-कभार कार्यकर्ताओं पर उनका गुस्सा फट जाता है। अब राजनीति में आए कुछ महीने ही हुए हैं ऐसे में पुरानी आदतें जल्दी नहीं बदलती हैं। 
    ईमानदार, लडऩे लायक नहीं
    राजनीति में ईमानदार नेताओं का टोटा है। फिर भी सभी दल में एक-दो नेता ऐसे हैं जिन्हें बेहद ईमानदार माना जाता है। ये अलग बात है कि ज्यादातर ईमानदार नेता हाशिए पर हैं। कांग्रेस-भाजपा से परे चर्चा बसपा की करें तो पार्टी की मुखिया मायावती भले ही ढेरों आरोपों से घिरीं हैं और जांच झेल रही हैं, पर प्रदेश में उनकी ही पार्टी में ऐसे नेता हैं जिन्होंने जीत की प्रबल संभावना के बावजूद आर्थिक तंगी के चलते चुनाव लडऩे से मना कर दिया। पामगढ़ से बसपा से विधायक रह चुके दूजराम बौद्ध की पहचान इलाके में बेहद ईमानदार और सक्रिय नेता की है। कोई एक बार विधायक बन जाता है तो वह आर्थिक रूप से बेहद सक्षम हो जाता है। भाजपा-कांग्रेस के कई एक बार के विधायक अब करोड़ों में खेलने लग गए हैं, लेकिन दूजराम बौद्ध फक्कड़ ही बने रहे। उनका खर्च भी विधायक पेंशन से ही निकलता है। इस बार पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाना चाहा तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि उनके पास चुनाव लडऩे के लिए पैसे नहीं है। अब जिस सीट को बसपा कन्फर्म मानकर चल रही थी वहां नये उम्मीदवार के चलते जीत के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। 
    गुरूमुख कायम
    लंबी जद्दोजहद के बाद रामगोपाल अग्रवाल का धमतरी से पत्ता साफ हो गया। पहले मौजूदा विधायक गुरूमुख सिंह होरा की जगह उन्हें प्रत्याशी बनाने पर सहमति बन गई थी। होरा को कुरूद से लडऩे के लिए कह दिया गया था, और होरा ने अनमने भाव से कुरूद से तैयारी भी शुरू कर दी थी। बाद में पार्टी के दो बड़े नेता अड़ गए और होरा को कुरूद भेजने के औचित्य पर सवाल खड़े किए। 
    चर्चा है कि दिल्ली में मौजूद कुरू द से टिकट के दावेदारों ने स्थानीय को ही टिकट देने के लिए दबाव बनाया। दावेदारों की कोशिश रंग लाई और कुरूद से स्थानीय को ही टिकट देने पर सहमति बन गई। इसके बाद होरा को धमतरी से ही लड़ाने पर भी जोर दिया गया। सुनते हंै कि भूपेश बघेल, रामगोपाल अग्रवाल को लेकर दिल्ली में  ही डटे रहे। मप्र के कई नेताओं ने भी रामगोपाल के लिए दबाव बनाया, लेकिन भूपेश छोड़ प्रदेश के बाकी बड़े नेता गुरूमुख को ही धमतरी से लड़ाने पर जोर देते रहे।  उनकी कोशिश रंग लाई और गुरूमुख सिंह का धमतरी से ही टिकट फाइनल हो गया। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 28-Oct-2018
  • पहले चरण की सीटों में भाजपा असंतुष्टों को मनाने में कामयाब रही। सीएम को खुद अपने गृह जिले राजनांदगांव में कलह को शांत करने के लिए आगे आना पड़ा। तीन बार के विधायक रजिन्दरपाल सिंह भाटिया को टिकट न देने का फैसला जोखिम भरा था। क्योंकि पिछले चुनाव में भाटिया टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गए थे और भाजपा को तीसरे स्थान पर ढकेल दिया था। 
    सुनते हैं कि महापौर मधुसूदन यादव खुज्जी से चुनाव लडऩा चाहते थे। उनकी टिकट की दावेदारी की खबर भाटिया तक पहुंची। भाटिया के पुत्र लक्की ने उन्हें चेता दिया कि यदि पिता की टिकट कटवाकर  चुनाव लड़ते हैं तो चुनाव किसी भी दशा में जीत नहीं पाएंगे। और पिताजी फिर पार्टी छोड़कर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरेंगे। चर्चा है कि इस बात को लेकर दोनों में कहा सुनी भी हुई। मधुसूदन को रजिन्दरपाल सिंह भाटिया की ताकत का अहसास रहा है। लिहाजा, उन्होंने पीछे हटना उचित समझा और फिर डोंगरगांव से प्रत्याशी बन गए। खैर, सीएम की समझाइश पर रजिन्दरपाल सिंह भाटिया चुनाव मैदान में नहीं है, बावजूद इसके भाजपा की राह कठिन बताई जा रही है। टिकट कटने से उनके समर्थक गुस्से में हैं और कई लोग दूसरे भाटिया, यानी जोगी पार्टी के उम्मीदवार जनरैल सिंह भाटिया को जिताने में जुट गए हैं।
    एक्सीडेंट से प्रत्याशी तय
    आखिरकार महंत रामसुंदर दास गच्चा खा गए। दिग्गज नेताओं की सलाह पर पिछले 3 साल से कसडोल में मेहनत कर रहे थे, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह शकुंतला साहू को प्रत्याशी बना दिया। पार्टी के रणनीतिकारों ने कसडोल से भाजपा प्रत्याशी गौरीशंकर अग्रवाल की आर्थिक ताकत को देखकर पहले राजकमल सिंघानिया को टिकट देने का मन बनाया था, लेकिन बाद में सामाजिक-जातीय समीकरणों  देखते हुए शकुंतला साहू को उम्मीदवार बनाया।
    पार्टी के रणनीतिकारों का सोचना था कि कसडोल में साहू समाज के मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। और समाज के लोग गौरीशंकर अग्रवाल के भांजे के हिट एण्ड रन केस के बाद से नाराज चल रहे हैं।  उनके भांजे की गाड़ी में दबकर साहू समाज के पोती-दादा की मौत हो गई थी। तब से समाज के लोगों में गौरीशंकर अग्रवाल परिवार के खिलाफ नाराजगी है। ऐसे में साहू समाज को साधने को इरादे से इसी समाज से प्रत्याशी बनाया गया है। अब देखना है कि गौरीशंकर की आर्थिक ताकत का कांग्रेस प्रत्याशी किस हद तक मुकाबला कर पाती हैं। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)
      

     

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Posted Date : 27-Oct-2018
  • खबर है कि भाजपा के ताकतवर नेता-प्रत्याशी अपनी छवि सुधारने के लिए एनजीओ की सेवाएं ले रहे हैं। एनजीओ के लोग चौक-चौराहों में जाकर प्रत्याशियों के कामकाज का ब्यौरा दे रहे हैं और दबी जुबान में विपक्ष की आलोचना भी करते हैं। यह भी जोर शोर से  प्रचारित किया जा रहा है कि भाजपा की चौथी बार सरकार में वापिसी तय है। यही नहीं, रायपुर शहर की दोनों सीटों दक्षिण और पश्चिम के भाजपा प्रत्याशी से जुड़े लोग संभावित प्रतिद्वंदी को बेहद कमजोर बताकर सिर्फ जीत के अंतर पर चर्चा में मशगूल दिख रहे हैं।  इन सबके बीच सोशल मीडिया में वायरल वीडियो ने रायपुर दक्षिण से भाजपा प्रत्याशी बृजमोहन अग्रवाल के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। 
    वायरल वीडियो में बृजमोहन अग्रवाल के परिजनों की जलकी रिसॉर्ट के अंदर का नजारा है। यह दिखाया गया कि किस तरह सरकारी-आदिवासी जमीन पर कब्जा किया गया है। जलकी रिसार्ट का मामला सुर्खियों में रहा है और कांग्रेस के लोग इसकी सीबीआई जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट भी गए थे। सरकार की एजेंसी ईओडब्ल्यू इस प्रकरण की पड़ताल कर रही है। साथ ही जमीन कब्जे से जुड़े प्रकरणों की महासमुंद कलेक्टर न्यायालय में सुनवाई चल रही है। ऐसे में जीत-हार को लेकर बढ़-चढ़कर दावा करना बृजमोहन के रणनीतिकारों को भारी पड़ सकता है। क्योंकि इस बार वे सब दस्तावेज सामने आ सकते हैं जिस पर टीका-टिप्पणी से बृजमोहन मुश्किल में  घिरे रहे हैं। इन सबके चलते चुनावी मुकाबला पहले के मुकाबले ज्यादा दिलचस्प और कड़ा होने का अंदाजा लगाया जा रहा है। 

    जातियों के आंकड़ों का खेल
    उत्तर रायपुर विधानसभा सीट से मौजूदा विधायक श्रीचंद सुंदरानी के मुकाबले उन्हीं की पार्टी के कई नेता तो टिकट के दावेदार हो ही गए हैं, कांगे्रस पार्टी की ओर से भी सुंदरानी के ही सिंधी समाज के कम से कम दो नेता दावेदार हैं। अब ऐसे में जाहिर है कि चुनावी माहौल में आंकड़ों से विश्लेषण करने वाले जुट गए हैं कि क्या इस विधानसभा सीट पर जातिगत समीकरण काम करता है, या करेगा? ऐसे कुछ आंकड़े एक प्रमुख पार्टी के लोगों ने सामने रखे हैं कि करीब एक लाख 80 हजार वोटरों में से करीब चौथाई लाख मुस्लिम हैं, उनसे थोड़े कम उडिय़ा हैं, सतनामी और गांडा समाज के 18 हजार हैं, साहू समाज के 16 हजार हैं, यादव समाज के 12 हजार हैं, सिंधी समाज के 11 हजार 4 सौ हैं, सिख समाज के 11 हजार हैं, और बाकी समाजों के मिलेजुले 67 हजार से अधिक हैं। ऐसे में अगर जाति के आधार पर टिकट देनी हो, तो किसे दी जाए? 

    एक हथियार हुआ बेकार
    एक दूसरी बात यह है कि बृजमोहन के मुकाबले अब तक जो नाम सामने आने की उम्मीद है, उस नाम, रूचिर गर्ग, के नाम के साथ एक धेले की भी कोई अप्रिय चर्चा नहीं है। इसलिए जवाबी हमला भ्रष्टाचार या कानून तोडऩे को लेकर नहीं हो सकता, ऐसे में भाजपा और भाजपा नेता-प्रत्याशी के हाथ से एक बड़ा चुनावी हथियार छिन जाएगा। कुछ महीने पहले बृजमोहन के भाई के एक जमीन कब्जे के मामले को लेकर भी कुणाल शुक्ला जैसे कुछ सामाजिक कार्यकर्ता लगातार सोशल मीडिया पर जुटे हुए हैं, और इन सबको चुनाव के समय एकदम से दफन करना आसान इसलिए नहीं होगा कि पिछले चुनाव के वक्त तो वॉट्सऐप नहीं था, इस बार तो है।

    पंजाब और छत्तीसगढ़ 
    छत्तीसगढ़ में महिलाओं के शोषण के बाद भी जब बड़े पुलिस अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष भूपेश बघेल ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के दुर्ग आने पर एक कड़ा बयान जारी किया था। जिसमें उन्होंने सरकार के खिलाफ हमला बोला कि ऐसे शोषण करने वाले लोगों को सरकार प्रमोशन देती है या बर्खास्तगी के बाद कैबिनेट उन्हें बहाल करता है। 
    अब पंजाब में कांग्रेस सरकार के एक मंत्री के खिलाफ एक आईएएस महिला ने मुख्यमंत्री से शिकायत की है कि वह मंत्री उन्हें कई बार गंदे संदेश भेज चुका है। मुख्यमंत्री ने ऐसी शिकायत मिलने की बात कहते हुए कहा कि उन्होंने मंत्री से उस महिला से माफी मंगवाई है। 
    अब जब इस मामले पर पंजाब कांग्रेस की प्रभारी महासचिव आशा कुमारी से मीडिया ने पूछा तो उन्होंने कहा कि किसी को भेजे गए संदेश यौन शोषण नहीं हो जाते। अब आशा कुमारी छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेता, और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव की बहन भी हैं। अब सवाल यह उठता है कि छत्तीसगढ़ में एक महिला सिपाही को अश्लील संदेश भेजने या रात-बिरात फोन करके बुलाने वाले आईपीएस अफसर के खिलाफ कांग्रेस यहां किस मुंह से कुछ बोलेगी अगर पंजाब में ऐसे संदेश भेजना यौन शोषण या यौन प्रताडऩा नहीं माना जा रहा है। जो पार्टियां देश भर में मौजूदगी रखती हैं, और कहीं सत्ता पर रहती हैं, कभी विपक्ष में रहती हैं, उन्हें अपने कुकर्म भी याद रखना चाहिए, क्योंकि अब इक्कीसवीं सदी में पूरा देश एक गांव जितना बड़ा ही रह गया है।(rajpathjanpath@gmail.com)

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