राजपथ - जनपथ

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Posted Date : 25-Apr-2019
  • अंतागढ़ टेपकांड की एसआईटी जांच चल रही है। टेपकांड के आरोपी राजेश मूणत, डॉ. पुनीत गुप्ता को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। चंडीगढ़ स्थित फोरेंसिक लैब ने इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर परीक्षण करने से इंकार करने पर एसआईटी को झटका लगा है। फोरेंसिक लैब ने अंतागढ़ टेपकांड में जिन 4 सीडी और 2 पेन ड्राइव समेत अन्य ऑडियो और वीडियो को परीक्षण के लिए भेजा गया है, वह डुप्लीकेट कॉपी है, इसलिए इन सीडी और पेन ड्राइव की जांच नहीं हो सकती। जांच कराने ओरिजनल ऑडियो-वीडियो देना होगा। खैर, एसआईटी प्रकरण को पुख्ता करने के लिए और सबूत जुटाने में लगी है। 

    सुनते हैं कि प्रकरण पर बारीक नजर रखने वाले कई लोग जांच से संतुष्ट नहीं है। एक कांग्रेस नेता ने इस सिलसिले में पिछले दिनों सीएम से मुलाकात भी की थी और उन्हें बताया कि कुछ अदृश्य शक्तियां आरोपियों को बचाने में जुटी है। यही वजह है कि जांच किसी किनारे नहीं पहुंच पा रही है और एसआईटी को झटका लग रहा है। चूंकि अब प्रदेश में लोकसभा के चुनाव निपट गए हैं, ऐसे में इन मामलों पर सरकार बारीक नजर रहेगी। 

    चुनाव और जोगी के लोग
    जोगी पार्टी ने प्रत्याशी चुनाव मैदान में नहीं उतारे थे। पार्टी के विधायकों ने अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार कांग्रेस या भाजपा को सपोर्ट किया। खुद जोगी मरवाही में तटस्थ रहे, लेकिन इसका फायदा कोरबा में कांग्रेस प्रत्याशी ज्योत्सना महंत को मिला। वैसे जोगी ने भाजपा प्रत्याशी को भी आशीर्वाद दिया था। अलबत्ता, डॉ. रेणु जोगी ने कोटा में अपने सभी समर्थकों को कांग्रेस के पक्ष में काम करने के लिए कहा। जबकि देव्रवत पहले भाजपा के साथ थे, बाद में वे बदल गए और कांग्रेस के पक्ष में काम किया। 

    दूसरी तरफ, बलौदाबाजार के पार्टी विधायक प्रमोद शर्मा ने आखिरी दिनों में चुप्पी साध ली थी। इससे भाजपा को फायदा हुआ। इन सबसे अलग जोगी पार्टी के विधायक दल के नेता धरमजीत सिंह ने अलग तरीके से प्रचार किया। वे भाजपाईयों की भीड़ देखते ही भाजपा को वोट देने की अपील कर देते थे। कांग्रेसियों की भीड़ में कांग्रेस को सपोर्ट करने के लिए कह देते थे। उनकी नीति जिधर बम, उधर हम, वाली रही। 

    रामविचार की मजबूरी
    राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम ने सरगुजा में पार्टी प्रत्याशी रेणुका सिंह के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। वैसे तो सरगुजा जिले की राजनीति में रेणुका, रामविचार की विरोधी मानी जाती है। बावजूद इसके रामविचार की मेहनत को देखकर कई लोगों को आश्चर्य भी हुआ। 

    सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद सामरी और रामानुजगंज से पार्टी के पराजित प्रत्याशियों ने पार्टी हाईकमान से मुलाकात की थी और उन्हें अपनी हार के लिए रामविचार नेताम को जिम्मेदार ठहराया। चूंकि विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में पार्टी की बुरी हार हुई। ऐसे में शिकायतों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन लोकसभा प्रत्याशी की घोषणा के बाद रामविचार को सरगुजा सीट जीताने के लिए जिम्मेदारी दी गई। अब रामविचार के पास पिछली गलतियों को सुधारने के साथ-साथ अपना कद बढ़ाने का भी मौका था। उन्होंने इसके लिए जमकर मेहनत की। अब परिणाम पक्ष में आ जाते हैं, तो रामविचार का कद बढऩा स्वाभाविक है। 
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Posted Date : 24-Apr-2019
  • लोकसभा की 7 सीटों पर मंगलवार को मतदान हुआ। मतदान के बाद जीत के अपने-अपने दावे हैं। पहले दो चरण के चुनाव में भाजपा के रणनीतिकारों के चेहरे मुरझाए हुए थे, लेकिन बाद की लोकसभा सीटों में मतदान के बाद भाजपाई खेमे में खुशी की लहर है। पार्टी के रणनीतिकारों को इस चुनाव में विधानसभा चुनाव से बेहतर नतीजे की उम्मीद है। टिकट घोषणा के बाद पहले मुकाबला एकतरफा कांग्रेस के पक्ष में दिख रहा था, लेकिन तीसरे चरण के मतदान में शहरी इलाकों में मोदी-इफैक्ट साफ नजर आया। हाल यह रहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस दुर्ग सीट जीतने में कामयाब हो गई थी, लेकिन इस बार दुर्ग का किला बचा पाना मुश्किल दिख रहा है। 

    दुर्ग में भाजपा पलड़ा भारी
    दुर्ग के वैशाली नगर, भिलाई, दुर्ग शहर और ग्रामीण के कई इलाकों में भाजपा के पक्ष में वातावरण दिखा। विधानसभा चुनाव में नवागढ़ सीट से कांग्रेस को सर्वाधिक वोटों से जीत हासिल हुई थी, लेकिन लोकसभा में कांग्रेस को यहां से बढ़त मिलना मुश्किल दिख रहा है। भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल को पार्टी के भीतर पार्टी की राष्ट्रीय नेत्री सरोज पाण्डेय का धुर विरोधी माना जाता है। ऐसे में विजय को जीत दिलाने के लिए सरोज विरोधियों ने जमकर पसीना बहाया, पे्रम प्रकाश पाण्डेय कल शाम तक सड़क पर रहे। जबकि कांग्रेसी दिग्गज आपस में ही उलझे रहे। कुल मिलाकर भाजपा यहां उम्मीद से है।
    बिलासपुर-रायपुर में नतीजे...
    बिलासपुर और रायपुर सीट पर मोदी फैक्टर देखने मिला। मगर, बिलासपुर के कांग्रेस प्र्रत्याशी अटल श्रीवास्तव और रायपुर कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद दुबे प्रबंधन के मामले में भाजपा प्रत्याशियों से बेहतर नजर आए। बिलासपुर में अटल श्रीवास्तव को जोगी कांग्रेस के प्रत्याशी के चुनाव मैदान में नहीं होने से फायदे की उम्मीद थी। जोगी कांग्रेस के कई नेता कांग्रेस में शामिल भी हो गए थे। एक तरह से जोगी कांग्रेस का कांग्रेस के लिए समर्थन दिख रहा था बाद में जोगी कांग्रेस के विधायक दल के नेता धरमजीत सिंह और अन्य से अपेक्षाकृत समर्थन नहीं मिला। जोगी समर्थक सीएम भूपेश बघेल के उस बयान से नाराज रहे जिसमें उन्होंने कह दिया था कि जोगी के लिए कांग्रेस के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। बिलासपुर शहर और आसपास के इलाकों में भाजपा के पक्ष में माहौल रहा। फिर भी यहां अनुसूचित जाति वोटों के सहारे कांग्रेस उम्मीद से है। 
    राजधानी में मोदी, आसपास...
    रायपुर में भी कुछ इसी तरह की स्थिति बनी है। शहर की तीन सीटों और आसपास के इलाकों में मोदी फैक्टर मजबूत दिखा। जबकि रायपुर ग्रामीण, धरसींवा, अभनपुर और भाटापारा के ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस के पक्ष में वातावरण नजर आया। अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस के पक्ष में एकतरफा गिरे हैं। ऐसे में यहां भी कांग्रेस को कुछ उम्मीदें हैं। हालांकि भाजपा खेमे के एक पुराने जानकार ने इस पूरे चुनाव में काम करने के बाद बीती शाम दावा किया कि भाजपा की जीत यहां से एक लाख वोटों से होने जा रही है। अब लोकतंत्र में दावों का हक तो हर किसी का रहता है, मतगणना के दिन तक।
    हमेशा की तरह त्रिकोणीय
    जांजगीर-चांपा लोकसभा में हमेशा की तरह इस बार भी त्रिकोणीय मुकाबला रहा। कांग्रेस और बसपा के बीच अजा वोटों के बंटवारे से भाजपा को हमेशा फायदा मिलता रहा है। इस लोकसभा में बसपा के दो विधायक भी हैं। मगर कांग्रेस ने यहां काफी मेहनत की थी। भाजपा में खींचतान काफी देखने को मिली। यही वजह है कि इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस उम्मीदवार ज्यादा बेहतर स्थिति में नजर आए। 
    सरगुजा में सत्ता बेअसर?
    सरगुजा और रायगढ़ में मोटे तौर पर कांटे की टक्कर रही है। सरगुजा से पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। पार्टी ने उनकी पसंद पर प्रेमनगर के विधायक खेलसाय सिंह को प्रत्याशी बनाया। कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में यहां की सभी सीटों पर जीत हासिल हुई थी, लेकिन लोकसभा चुनाव में स्थिति कुछ हद तक अनुकूल नहीं रही है। वजह यह थी कि कांग्रेस के नेता अपेक्षाकृत ज्यादा सक्रिय नहीं थे। फिर भी सीतापुर, प्रतापपुर और अंबिकापुर के उदयपुर और लखनपुर में कांग्रेस के पक्ष में माहौल नजर आया। जबकि भाजपा प्रत्याशी की स्थिति प्रेम नगर, भटगांव और रामानुजगंज में ज्यादा बेहतर रही है। भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह को काफी हद तक मोदी फैक्टर का फायदा मिला है। यही वजह है कि यहां जीत-हार का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन प्रदेश की राजनीति के एक जानकार ने कल रात यह दावा किया है कि रेणुका सिंह एक लाख से अधिक लीड से सांसद बनने जा रही हैं। लोगों का कहना है कि सरगुजा में विधानसभा चुनाव में वोटर यह मानकर चल रहे थे कि कांगे्रस की सरकार बनेगी और टीएस सिंहदेव मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन वैसा हुआ नहीं और निराश जनता इस बार भाजपा की ओर गई है। दूसरी तरफ दुर्ग सीट के बारे में भी यही बात कही जा रही है कि वहां का साहू समुदाय ताम्रध्वज साहू के सीएम बनने की उम्मीद कर रहा था, और वह भी निराश हुआ है।
    रायगढ़ का फैसला कम वोटों से?
    दूसरी तरफ, रायगढ़ में जशपुर राजघराने ने भाजपा प्रत्याशी गोमती साय के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया। रायगढ़ शहर में तो काफी हद तक मोदी फैक्टर दिखा, तो ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस को फायदा दिख रहा है। सारंगढ़, धरमजयगढ़, लैलूंगा और पत्थलगांव में कांग्रेस प्रत्याशी की स्थिति मजबूत नजर आई। जबकि जशपुर और कुनकुरी में भाजपा के पक्ष में माहौल नजर आया। कुल मिलाकर यहां भी हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। 
    जोगी के मैदान में न रहने से...
    कुछ जानकार लोगों का यह भी मानना है कि इस बार जोगी कांगे्रस मैदान से पूरी तरह बाहर ही नहीं थी, उनके बहुत से समर्थक-समुदाय इस असमंजस में भी है कि जोगी परिवार कांगे्रस में जाने को एक पैर पर खड़ा है। ऐसे में जोगी के समर्थक समुदायों ने कांगे्रस को वोट देना बेहतर समझा है। कल शाम एक टीवी चैनल, आईएनएच पर एक भूतपूर्व भाजपाई वीरेन्द्र पांडेय का यह अंदाज सामने आया कि भाजपा को प्रदेश में दो, या अधिक से अधिक तीन सीटें मिल सकती हैं, बाकी सारी सीटें कांगे्रस को मिलेंगी।
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Posted Date : 23-Apr-2019

  • वैसे तो, रमन सिंह ने भाजपा के लिए सबसे ज्यादा प्रचार किया, लेकिन उनकी सभाओं में पहले जैसी भीड़ नहीं दिखी। पूर्व सीएम, नान-डीकेएस में भ्रष्टाचार के प्रकरणों पर खुद आगे आकर सफाई दे रहे थे या फिर पलटवार कर रहे थे, उससे भी पार्टी के ज्यादातर बड़े नेता सहमत नहीं थे। उनका सोचना था कि रमन सिंह जैसे बड़े नेता का सीधा रिएक्शन अच्छा नहीं है और क्योंकि इससे मोदी फैक्टर कमजोर हो रहा था। रायपुर में तो बैनर-पोस्टर में उनकी तस्वीर गायब थी। इन सबके बावजूद उन्होंने सभी प्रत्याशियों के पक्ष में रोड शो किया। पार्टी प्रत्याशी जिन दो नेताओं से परहेज कर रहे थे, उनमें नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक और पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय भी थे। 

    धरम कौशिक ने बिलासपुर में तो प्रचार किया, लेकिन वे अगल-बगल की सीट पर भी प्रचार के लिए जाना चाह रहे थे। सुनते हैं कि एक प्रत्याशी ने तो कंट्रोल रूम में फोन कर अपने क्षेत्र में उनका कोई कार्यक्रम नहीं रखने का आग्रह कर दिया। सरोज पाण्डेय भी यहां चुनावी सभा संबोधित करना चाह रही थीं, लेकिन किसी भी क्षेत्र से उनकी सभा कराने की मांग नहीं आई। वे दुर्ग के कुछ इलाके में ही सीमित रही। एक चर्चा यह भी है कि वे महाराष्ट्र की भाजपा प्रभारी हैं और वहीं पर अधिक दिलचस्पी ले रही हैं क्योंकि जब राज्यसभा में दुबारा जाने की नौबत आएगी, तो छत्तीसगढ़ भाजपा उन्हें नहीं भेज पाएगी, और महाराष्ट्र से संभावना निकल सकती है। कुल मिलाकर विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद पीएम नरेन्द्र मोदी की सभा से कुछ हद तक कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ और प्रदेश में मोदी फैक्टर से माहौल बना। अब जितनी भी सीटें मिलेंगी वह मोदी फैक्टर पर ही मिलेगी क्योंकि सभी प्रत्याशी नए थे और पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। 

    कल से बाहर
    लोकसभा चुनाव निपटने के बाद भाजपा-कांग्रेस के बड़े नेता दूसरे राज्यों में प्रचार के लिए जाएंगे। मप्र के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने बृजमोहन अग्रवाल को फोन कर भोपाल में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के प्रचार का न्यौता दिया है। पूर्व मंत्री प्रेम प्रकाश पाण्डेय और अजय चंद्राकर पीएम नरेन्द्र मोदी के प्रचार के लिए वाराणसी जा सकते हैं। इसके अलावा राजेश मूणत अपने गृह जिले रतलाम में पार्टी प्रत्याशी के प्रचार के लिए जाएंगे। 

    कांग्रेस से सबसे ज्यादा मांग सीएम भूपेश बघेल की है। भूपेश यूपी और बिहार में चुनाव प्रचार के लिए जाने वाले हैं। इसके अलावा पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव, रविन्द्र चौबे और मोहम्मद अकबर भी प्रचार के लिए मध्यप्रदेश जा सकते हैं। रविन्द्र चौबे अविभाजित मप्र में एक बार दिग्विजय सिंह के चुनाव संचालक भी रह चुके हैं। मोहम्मद अकबर का चुनाव प्रबंधन में कोई तोड़ नहीं है। यही वजह है कि इन नेताओं का पार्टी पूरा उपयोग करना चाह रही है।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 22-Apr-2019
  • महासमुंद लोकसभा सीट में जीत को लेकर कांग्रेस और भाजपा के अपने-अपने दावे हैं। इन सबके बीच कांग्रेस में कुछ जगहों पर भीतरघात की शिकायतें भी आई है। सुनते हैं कि धमतरी में एक पूर्व विधायक ने कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ जमकर काम किया। पूर्व विधायक की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि कांग्रेस प्रत्याशी से जुड़े लोगों ने विधानसभा चुनाव में उनके खिलाफ काम किया था। इसका बदला उन्हें लेना था, सो ले लिया। कांग्रेस प्रत्याशी अभी खामोश हैं। क्योंकि भीतरघात के बावजूद नतीजे अपने पक्ष में आने की संभावना देख रहे हैं। यदि चुनाव परिणाम पक्ष में नहीं आए, तो पार्टी में गदर मच सकता है। फिलहाल, लोग चुनाव नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। 
    चुनावी नतीजे और मंत्रिमंडल?
    लोकसभा चुनाव में सरकार के मंत्रियों की भी परीक्षा होगी। सुनते हैं कि दो मंत्रियों के खुद के विधानसभा क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी की स्थिति अच्छी नहीं है। एक ने तो मंत्री बनने के बाद अपने विधानसभा क्षेत्र से ही दूरियां बना ली थी। उन्होंने क्षेत्र में जाना ही छोड़ दिया था। अब जब वे पार्टी प्रत्याशी के प्रचार के लिए जा रहे हैं, तो प्रमुख कार्यकर्ता उनके साथ नहीं आ रहे हैं। दूसरे मंत्री को लेकर यह बात सामने आ रही है कि वे पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में मेहनत नहीं कर रहे हैं। मेहनत क्यों नहीं कर रहे हैं, यह पार्टी के लोगों को समझ नहीं आ रहा है। जबकि प्रत्याशी भी उनकी अपनी पसंद का है। इन सब पर पार्टी हाईकमान की निगाह है। चर्चा है कि दो अन्य मंत्रियों के अपने क्षेत्र के बजाए दूसरे इलाके में ज्यादा समय देने पर पार्टी हाईकमान ने नाराजगी जताई थी। क्योंकि उनके अपने क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। हाईकमान की फटकार के बाद उन्होंने क्षेत्र में भाग-दौड़ शुरू की है। चर्चा तो यह है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों से आगामी मंत्रिमंडल में फेरबदल भी तय होगा। 

     

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Posted Date : 21-Apr-2019
  • पूर्व सीएम अजीत जोगी के विश्वस्त सहयोगियों ने साथ छोड़ दिया है। अनिल टाह जैसे नेता, जो उनके किचन कैबिनेट का हिस्सा थे उन्होंने भी कांग्रेस का दामन थाम लिया। जोगी कह रहे है कि उनसे पूछकर ही पार्टी के नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। जोगी के भी कांग्रेस प्रवेश की अटकलें चल रही है, लेकिन सीएम भूपेश बघेल ने साफ शब्दों में कह दिया है कि जोगी के लिए कांग्रेस के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं। खुद जोगी पिता-पुत्र ने बार-बार यह कहा है कि वे कांगे्रस में नहीं जाएंगे, लेकिन इस चुनाव में उनके घर बैठने को लेकर ऐसी अटकलें लग रही हैं कि वे कांगे्रस को नुकसान न पहुंचाकर अपनी संभावनाएं बना रहे हैं।


    भूपेश के कथन के विपरीत कई लोग मानते हैं कि जोगी देर सबेर कांग्रेस का हिस्सा हो सकते हैं। जोगी कह चुके हैं कि कांग्रेस में जाना होगा, तो उन्हें सोनियाजी को सिर्फ एक फोन करने की जरूरत होगी। खैर, यह सब इतना आसान भी नहीं है क्योंकि चुनाव नतीजे आने के बाद डॉ. रेणु जोगी, सोनिया से मिल चुकी हैं। और यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि राहुल गांधी, जोगी को नापसंद करते हैं इसलिए उनका कांगे्रस प्रवेश नहीं हो पा रहा है। पर अंदर की खबर यह है कि लोकसभा चुनाव निपटने के बाद कांग्रेस हाईकमान जोगी परिवार को कांग्रेस में शामिल करने पर विचार कर सकता है। चर्चा है कि बसपा सुप्रीमो मायावती इसके लिए पहल कर सकती हैं। और जब मायावती, कुछ कहेंगी तो हाईकमान विचार जरूर करेगा। 

    कवर्धा में फिर गड्ढा?
    राजनांदगांव के सांसद अभिषेक सिंह सरल स्वभाव के हैं। उन्होंने टिकट नहीं मिलने के बाद भी पार्टी का प्रचार किया। राजनांदगांव में पार्टी प्रत्याशी संतोष पांडेय का चुनाव संचालन किया। ऊपरी तौर पर वे काफी मेहनत करते भी दिखे पर चर्चा यह है कि कवर्धा की दोनों सीटों पर जिस तरह काम करना था, पार्टी वैसा नहीं कर पाई। विधानसभा चुनाव में दोनों सीटों से ही करीब एक लाख वोट से भाजपा पीछे रही है। ऐसे में पार्टी के रणनीतिकारों को यहां विशेष ध्यान देने की जरूरत थी पर खबर छनकर आ रही है कि लोकसभा चुनाव में भी दोनों सीटों पर पार्टी के लिए अनुकूल स्थिति नहीं रही। जबकि रमन सिंह 15 साल सीएम रहे और कवर्धा उनका गृह जिला है। ऐसे में लोकसभा चुनाव में भी पिछडऩे की संभावनाओं को चुनाव संचालन में कमियों के रूप में देखा जा रहा है।

     

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Posted Date : 20-Apr-2019
  • प्रदेश में दूसरे चरण की सीटों में जमकर पोलिंग हुई। सबसे अच्छी बात यह रही कि तीनों लोकसभा क्षेत्रों में कहीं भी कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। शांतिपूर्वक मतदान को एक जिले में प्रशासन के आला अफसरों ने सेलीब्रेट भी किया। जिला प्रशासन के मुखिया और जिला पंचायत के सीईओ मतदान खत्म होने के बाद अपनी पत्नियों को साथ लेकर स्ट्राँग रूम पहुंचे और उन्हें पूरा इंतजाम समझाया। 

    स्ट्राँग रूम में निर्वाचन से बाहर के लोगों का प्रवेश वर्जित रहता है। विधानसभा चुनाव में इसको लेकर बखेड़ा भी खड़ा हो गया था, लेकिन अफसरों ने इसका ध्यान नहीं रखा। इतना ही नहीं, ईवीएम जमा होने के बाद वहां खान-पान का दौर भी चला। एक तरह से मतदान के थकाऊ माहौल के बीच प्रशासनिक अफसरों ने पिकनिक मनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।  खैर, इसकी मौखिक शिकायत ऊपर तक पहुंच गई है। देखना है आगे क्या होता है। 

    तर्क तो था, पर बड़ा बेहूदा...

    भाजपा के प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन ने पिछले दिनों पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं के साथ बैठक कर रायपुर और दुर्ग के पार्टी प्रत्याशियों की स्थिति की समीक्षा की। चर्चा में यह बात आई कि रायपुर के अभनपुर विधानसभा सेे पार्टी प्रत्याशी सुनील सोनी को सर्वाधिक बढ़त मिलेगी। अनिल जैन ने इसका कारण पूछा, तो उन्हें एक नेता ने बताया कि अभनपुर में पार्टी के दो बड़े नेता चंद्रशेखर साहू और अशोक बजाज जमकर मेहनत कर रहे हैं। दोनों को उम्मीद है कि अभनपुर विधानसभा के उपचुनाव होंगे और उन्हें चुनाव मैदान में उतरना पड़ सकता है। साहू और बजाज अपनी तैयारी कर रहे हैं। अनिल जैन ने जानना चाहा कि आखिर अभनपुर में विधानसभा के उपचुनाव क्यों होंगे? इस पर उन्हें बताया गया कि अभनपुर के कांग्रेस विधायक धनेंद्र साहू, महासमुंद लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। उनके लोकसभा चुनाव जीतने के बाद स्वाभाविक तौर पर उन्हें विधानसभा की सीट छोडऩी पड़ेगी। ऐसे में यहां उपचुनाव होगा। इस पर अनिल जैन नाराज हो गए और कहा कि हम महासमुंद का चुनाव जीत रहे हैं। अभनपुर में विधानसभा उपचुनाव की नौबत नहीं आएगी। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 19-Apr-2019
  • छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के समय हमने ग्यारह ऐसी सीटों की लिस्ट छापी थी जो कि राज्य में बार-बार सरकार चुनती हैं, और नतीजों ने फिर साबित किया कि इन ग्यारह में से नौ सीटों ने इस चुनाव में कांग्रेस को चुना था। अब देश भर में लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं, और चुनाव के गणितज्ञ एक बार फिर हिसाब लगा रहे हैं कि ऐसी बेलवैदर सीटें कौन-कौन सी हैं जो कि अधिकतर वक्त दिल्ली में सरकार बनाने वाली पार्टी को ही चुनती हैं? 

    चुनावी नतीजों के आंकड़ों से इन सीटों को निकालना बड़ा मुश्किल भी नहीं है। 1977 से लेकर 2014 के बीच में कुछ सीटें ऐसी थीं जिन्होंने बार-बार सरकार चुनीं। इस दौर के तमाम ग्यारह लोकसभा चुनावों में जिन सीटों ने हर बार दिल्ली में सरकार बनाईं, ऐसी दो ही सीटें थीं। एक तो गुजरात की वलसाड, और दूसरी दिल्ली की पश्चिम दिल्ली। जिन सीटों ने ग्यारह चुनावों में दस बार सरकार बनाईं वे थीं महाराष्ट्र की बीड़, चंडीगढ़, हरियाणा की फरीदाबाद और गुडग़ांव, दिल्ली की उत्तर-पश्चिम दिल्ली, झारखंड की पलामू और रांची, मध्यप्रदेश की शहडोल सीटें। 

    1977 से लेकर 2014 के बीच जिन सीटों ने ग्यारह चुनावों में से नौ बार सरकार बनाईं वे हैं- गुजरात की बनासकांठा, जामनगर, जूनागढ़, और पोरबंदर। राजस्थान की भीलवाड़ा, गंगानगर। पूर्वी दिल्ली, हरियाणा की करनाल, और कुरूक्षेत्र। मध्यप्रदेश की खंडवा और मंडला। उत्तरप्रदेश की कुशीनगर और वाराणसी। हिमाचल की मंडी। महाराष्ट्र की नासिक। बिहार की पश्चिम चम्पारण। ओडिशा की सुंदरगढ़ सीटें। 

    अब ऐसी सीटों पर इस चुनाव में भी पार्टियों के आसार देखकर नतीजों का अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि जिस सीट ने हर बार विजेता पार्टी को चुना है, ऐसी दो सीटों में से एक पश्चिम दिल्ली है, जो कि पूरी तरह शहरी सीट है, और दूसरी गुजरात की वलसाड है जो कि आदिवासी आरक्षित सीट है। एक तरफ पश्चिम दिल्ली देश के सबसे संपन्न लोगों की सीट है, तो दूसरी तरफ वलसाड ऐसी है जिसके दो प्रमुख जिलों में से एक डांग, देश के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है। 

    विधानसभा चुनावों के नतीजे आने पर ग्यारह दिसंबर को छत्तीसगढ़ में यह साफ हुआ था कि जो ग्यारह सीटें बार-बार राज्य सरकार चुनती हैं, उनमें से दस सीटों पर कांग्रेस जीती थी, और राज्य में उसी की सरकार बनी। ये ग्यारह सीटें थीं- जशपुर (पिछली तीन सरकारें), बिलासपुर (पिछली तीन सरकारें), अहिवारा (पिछली तीन सरकारें), बेलतरा (पिछली तीन सरकारें), कुनकुरी (पिछली चार सरकारें), धरसीवां (पिछली चार सरकारें), नारायणपुर (पिछली चार सरकारें), नवागढ़ (पिछली पांच सरकारें), डोंगरगढ़ (पिछली पांच सरकारें), बीजापुर (पिछली छह सरकारें), और जगदलपुर (पिछली नौ सरकारें), चुनने वाली सीटें थीं। इस बार के चुनाव में भी इनमें से कुल एक सीट बेलतरा ऐसी थी जिस पर भाजपा जीती, और ग्यारह में से बाकी तमाम दस सीटों ने राज्य के विजेता को चुनने की परंपरा को जारी रखा था। 

    वोटों के बाद बस्तर का हिसाब
    प्रदेश की चार लोकसभा सीटों पर मतदान हो चुका है। यहां मतदान के बाद नतीजों को लेकर दोनों ही मुख्य दल भाजपा और कांग्रेस आशान्वित हैं। विधानसभा में बुरी हार के बाद भाजपा ने सभी सांसदों की टिकट काटकर सारे के सारे नए चेहरों पर दांव लगाया है। जिन चार सीटों, बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव और महासमुंद में मतदान हुआ है, वहां कांटे की टक्कर देखने को मिली है। 

    बस्तर में दंतेवाड़ा विधायक भीमा मण्डावी की हत्या के बाद दंतेवाड़ा शहर, बचेली और आसपास सहानुभूति का माहौल था। चुनाव के शुरूआती दौर में भाजपा एकदम पिछड़ी दिख रही थी वह प्रचार खत्म होने तक कड़े मुकाबले तक ले आई। फिर भी यहां कांग्रेस बेहतर स्थिति में रही। कांकेर में भी भाजपा और कांग्रेस, दोनों के प्रत्याशियों की साख अच्छी है। ऐसे में मतदाताओं के लिए दोनों में से एक को चुनना काफी कठिन था। कांकेर लोकसभा के बालोद इलाके में पीएम की सभा भी हुई। यह इलाका कांग्रेस के लिए मजबूत रहा है। फिर भी  मुकाबला मतदान तक काफी कड़ा हो गया था। इन सबके बावजूद बस्तर संभाग की दोनों लोकसभा सीट पर कांग्रेस को बड़े फायदे की उम्मीद है। 

    महासमुंद के साहू और साहू
    महासमुंद लोकसभा में पूर्व विधायक चुन्नीलाल साहू को कांग्रेस दिग्गज धनेन्द्र साहू के मुकाबले काफी हल्का माना जा रहा था, लेकिन शहर-कस्बों में मोदी फैक्टर ने उन्हें मजबूत बना दिया। समाज के लोगों धनेन्द्र के मुकाबले उन्हें ज्यादा साथ मिला, लेकिन गैर साहू वोटरों में धनेन्द्र की पकड़ नजर आई। हाल यह रहा कि महासमुंद जिले में धनेन्द्र, तो धमतरी जिले में चुन्नीलाल के पक्ष में माहौल रहा। गरियाबंद जिले की सीटों पर बराबरी का मुकाबला देखने को मिला। यहां दोनों के बीच हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। 

    नांदगांव में आखिर होगा क्या?
    राजनांदगांव लोकसभा सीट से भाजपा ने पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और उनके पुत्र मौजूदा सांसद अभिषेक को टिकट न देकर पार्टी ने आरएसएस की पसंद पर संतोष पाण्डेय को चुनाव मैदान में उतारा। जबकि कांग्रेस ने खुज्जी के दो बार के विधायक भोलाराम साहू पर दांव लगाया। आरएसएस के स्वयंसेवक नांदगांव में बड़ी संख्या में डटे रहे। विधानसभा चुनाव में राजनांदगांव शहर को छोड़कर बाकी सीटों पर भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन लोकसभा चुनाव में स्थिति बेहतर दिखाई दी। 

    संतोष पाण्डेय के पक्ष में राजनांदगांव शहर, खुज्जी और खैरागढ़ में माहौल था। जबकि भोलाराम डोंगरगढ़, मानपुर मोहला और पंडरिया में मजबूत नजर आए। कवर्धा और डोंगरगांव में दोनों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। यहां भी हार-जीत का अंतर कम मतों से होने का अनुमान लगाया जा रहा है। अब तक तो यह साफ हो चुका है कि पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस बेहतर स्थिति में रहेगी। क्योंकि पिछली बार मात्र एक सीट मिली थी, जबकि इस बार स्थिति पिछले चुनावों के मुकाबले काफी बेहतर रह सकती है। 

    वोराजी से बौखलाए कांग्रेसी...
    दुर्ग लोकसभा सीट में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है। यह सीट कांग्रेस के लिए काफी प्रतिष्ठापूर्ण मानी जा रही है। खुद सीएम भूपेश बघेल यहां की पाटन सीट के विधायक हैं, तो गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू दुर्ग और बेमेतरा के प्रभारी मंत्री हैं। जबकि कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे भी बेमेतरा जिले के साजा से चुनकर आते हैं। इन सबसे वरिष्ठ पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री और राज्यसभा सदस्य मोतीलाल वोरा भी दुर्ग से आते हैं। इन दिग्गजों के मुकाबले भाजपा ने पूर्व संसदीय सचिव विजय बघेल को उतारा है, जो कि मोदी फैक्टर और व्यक्तिगत साख के चलते मजबूत दिख रहे हैं। 

    कांग्रेस नेता हर हाल में सीट जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। जोगी पार्टी के कई नेता उनके साथ जुड़ गए हैं। न चाहते हुए भी कई को पार्टी में लेना भी पड़ा। ऐसे ही दुर्ग शहर के नेता प्रताप मध्यानी अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल होना चाह रहे थे, तो वोराजी ने पेंच अड़ा दिया। अब कांग्रेस नेता बुदबुदा रहे हैं कि एक-एक वोट के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में वोराजी का रूख समझ से परे है। 

    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 18-Apr-2019
  • नान घोटाला प्रकरण में ईओडब्ल्यू ने चिंतामणी चंद्राकर से लंबी पूछताछ की। चिंतामणी नान का अफसर है। जब पहली बार मैडम सीएम का घोटाले में जिक्र हुआ था, तब प्रकरण में जांच की अगुवाई कर रहे मुकेश गुप्ता ने आगे बढ़कर सफाई दी थी कि मैडम सीएम का मतलब चिंतामणी चंद्राकर मैडम है। यह भी हल्ला उड़ा कि चिंतामणी चंद्राकर, भूपेश बघेल का रिश्तेदार है। मगर, एसआईटी ने बुधवार को उससे लंबी पूछताछ कर पसीने छुड़ा दिए।  

    सुनते हैं कि चिंतामणी चंद्राकर को मुकेश गुप्ता का बेहद करीबी माना जाता है और वह एमजीएम अस्पताल का ट्रस्टी भी रहा है, जिस ट्रस्ट में बहुत बड़े-बड़े लोग ही ट्रस्टी हैं जो कि अनिवार्य रूप से मुकेश गुप्ता के करीबी भी हैं। ऐसे में एक अदना सा कर्मचारी इस ट्रस्ट में बराबरी का ट्रस्टी कैसे बन गया, यह हैरानी की बात है। ईओडब्ल्यू ने चिंतामणी चंद्राकर से घोटाले की रकम के बंदरबांट को लेकर भी पूछताछ की है। दिलचस्प बात यह है कि चिंतामणी चंद्राकर का नाम पहले भी कई बार आया, लेकिन उससे पूछताछ नहीं हुई और जब एसआईटी ने उन्हें (चिंतामणी) नोटिस जारी किया, तो बीमारी का हवाला देकर बचने की कोशिश की। आखिरकार, उन्हें पूछताछ के लिए हाजिर होना पड़ा। 

    चर्चा है कि एसआईटी ने एमजीएम ट्रस्ट से उनके संबंधों को लेकर भी पूछताछ की है। हल्ला यह भी है कि वर्ष-2013 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नान से करोड़ों रूपए इधर-उधर किए गए थे। इसको लेकर भी कुरेद-कुरेद कर पूछा गया। इसका हिसाब-किताब नान डायरी के बाद में बरामद हुए 125 पन्नों में जिक्र है। खैर, चिंतामणी चंद्राकर से पूछताछ होना काफी मायने रखता है क्योंकि नान से लेकर एमजीएम ट्रस्ट तक उसकी दखल रही है। जांच में लगे हुए अफसरों का यह भी मानना है कि नागरिक आपूर्ति निगम से भ्रष्टाचार के करोड़ों रुपये निकलकर एमजीएम में गए हो सकते हैं, और कागजों पर ट्रस्ट का नाम न आए इसलिए उसे नान के ही एक कर्मचारी और एमजीएम के ट्रस्टी चिंतामणी के नाम पर दर्ज किया गया हो।

    एक बार फिर सुर्खियों में
     भाजपा के ताकतवर नेता सौदान सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उन पर विदिशा जिले के पैतृक गांव कागपुर में तालाब गहरीकरण-सौंदर्यीकरण में अनियमितता के आरोप लगे हैं और मध्यप्रदेश ईओडब्ल्यू इसकी पड़ताल कर रही है। पहले भी उनके गृहग्राम की भव्य कोठी को लेकर भी पार्टी के भीतर तरह-तरह की चर्चा होती रही है। पार्टी में दिवंगत पूर्व सांसद ताराचंद साहू और वीरेन्द्र पाण्डेय तो उनकी कार्यशैली की शुरू से खिलाफत करते रहे हैं, लेकिन सौदान का ही प्रभाव था कि उन्हें पार्टी छोडऩी पड़ी। 


    न सिर्फ सौदान सिंह बल्कि उनके पीए गौरव तिवारी की तड़क-भड़क जीवन शैली भी पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय रही है। आम तौर पर संगठन मंत्री सिर्फ पार्टी संगठन तक ही सीमित रहते हैं, लेकिन सौदान सिंह की रमन सरकार में पूरी दखल थी। उनके पिछली सरकार में ताकतवर रहे कई अफसरों से उनके बेहद करीबी संबंध रहे हैं, इसको लेकर भी पार्टी के भीतर उनकी आलोचना होती रही है। पहली बार विधानसभा चुनाव में हार के बाद उनके खिलाफ कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी फूटा था। खैर, रमन सिंह  और उनके करीबी लोगों के खिलाफ अलग-अलग प्रकरणों में जांच हो रही है, ऐसे में किसी संगठन मंत्री का जांच के दायरे में आना भी कम चौंकाने वाला नहीं है। इससे कम से कम यह तो साबित होता है कि सरकार में न रहते हुए भी पार्टी के भीतर उनका विरोध है।

     

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Posted Date : 17-Apr-2019
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल छत्तीसगढ़ आकर साहू-कार्ड खेल गए, और ऐसा लगता है कि मतदान के पहले भाजपा इसी को तुरूप का इक्का मान रही है। अब कांगे्रस के जिम्मे यह बात तो आती ही है कि इसका कोई ऐसा जवाब दे जो कि साहू समाज को मोदी लहर में पडऩे से रोक सके। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा ने मोदी के भाषण के तुरंत बाद मिनटों में फेसबुक पर लिखा- 'मोदी ने फिर वही चाल चली जो वे 2002 से चलते आ रहे हैं। धर्म, जाति, और सम्प्रदाय के बीच जहर बोने की चाल। उन्होंने छत्तीसगढ़ के साहू समाज को पहले मोदी से जोड़ा, फिर पूरे समाज को चौकीदार से। फिर कहा कि जो लोग चौकीदार को चोर कह रहे हैं, वे पूरे समाज का अपमान कर रहे हैं। दरअसल भाजपा चाहती है कि एक पिछड़ी जाति कांग्रेस से नाराज हो जाए, और इसी बहाने चौकीदार भी बरी हो जाए। लेकिन वह शायद नहीं जानती कि साहू समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, और इस समाज की राजनीतिक चेतना राज्य में सबसे प्रखर है। वह किसी के बहकावे में यूं नहीं बहक जाएगा।'

    दरअसल विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने पांच साहू उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से चार जीते थे। और भाजपा ने 14 साहू उम्मीदवार बनाए थे जिनमें से 13 निपट गए थे। यह बात भाजपा के भूलने की नहीं थी, और इसलिए मोदी ने साहू समाज को खासकर छुआ।

    कांग्रेस अब खोद-खोदकर जानकारी निकाल रही है कि भाजपा ने साहू नेताओं के साथ पहले क्या सुलूक किया था। एक नेता ने आज सुबह एक जानकारी भेजी कि राज्य के भाजपा के कुछ बिहारी नेताओं ने ताराचंद साहू को पार्टी छोडऩे के लिए मजबूर किया था। जब उन्हें प्रदेश भाजपाध्यक्ष पद से हटवाया गया, तब उस साजिश के वक्त मोदीजी कहां थे? कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया है कि जागेश्वर साहू को वैशालीनगर उपचुनाव में टिकट देने के बावजूद भाजपा के मंत्रियों ने साजिश करके हरवाया, 2014 में सरोज पाण्डेय ने दुर्ग सांसद रहते हुए साहू समाज के तहसील अध्यक्ष राम कुमार साहू को तीन झापड़ मारे थे, तब मोदीजी कहां थे? कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया है कि 26-11 के मुंबई हमले में जब मोदीजी के परमप्रिय मित्र नवाज शरीफ के भेजे गए पाकिस्तानी आतंकी मौत का खेल खेल रहे थे तब छत्तीसगढ़ के ही बहादुर जांबाज कमांडो दिनेश साहू ने आतंकवादियों की लाशें बिछा दी थीं।

    कांग्रेस की तुरतबयानी बता रही है कि इतना बड़ा साहू-समर्थन वह  खोना नहीं चाह रही है। यह एक अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में मिली हुई टिकट कटने के बाद प्रतिमा चंद्राकर ने ताम्रध्वज साहू से रूबरू जो सलूक किया था, उसने आज दुर्ग को कांग्रेस के लिए खासी, खासी मुश्किल सीट बना दिया है। लेकिन दुर्ग से परे भी और जगहों पर कांग्रेस को एकजुट साहू वोटों का ख्याल तो रखना ही है। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 16-Apr-2019
  • दुर्ग लोकसभा में चुनावी मुकाबला दिलचस्प हो गया है। यहां कांग्रेस की प्रतिमा चंद्राकर और भाजपा के विजय बघेल के बीच कांटे की टक्कर है। विजय, सीएम भूपेश बघेल के भतीजे हैं। दोनों का कार्यक्षेत्र पाटन रहा है। भाजपा ने भूपेश और विजय की रिश्तेदारी को प्रचार में भुनाना शुरू कर दिया है। विशेषकर पाटन के मतदाताओं से कहा जा रहा है कि एक टिकट में दो पिक्चर देखें। यानी भूपेश को तो आपने सीएम बना दिया। अब विजय को सांसद बनाने के लिए वोट दें। चूंकि पाटन सीएम का विधानसभा क्षेत्र है। ऐसे में कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त दिलाना उनके लिए जरूरी भी है, लेकिन भाजपा का नारा पाटन के लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। यह सुरसुरी प्रेमप्रकाश पांडेय ने दुर्ग के नामांकन के दिन छोड़ी थी, जब उन्होंने अपने भाषण में कहा कि एक पार्टी का विधायक तो है ही, दूसरी पार्टी का सांसद भी रख लो, चूंकि सीट मुख्यमंत्री की है इसलिए यहां तो काम हो ही जाएगा, दिल्ली में मोदी सरकार में विजय बघेल काम करवा पाएंगे। कुछ और लोगों ने अटकल को आगे बढ़ाते हुए फैलाया कि सांसद बनने जा रहे भाजपा उम्मीदवारों में विजय बघेल सबसे मजबूत रहेंगे इसलिए उन्हें मोदी सरकार में इस्पात एवं खान राज्यमंत्री बनाया जा सकता है, और इसलिए विजय बघेल को वोट दें। लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों के कुर्मी उम्मीदवारों के बीच दुर्ग जिले के एक और कुर्मी नेता प्रीतपाल बेलचंदन के पुराने मामलों पर अभी कार्रवाई की सुगबुगाहट क्यों शुरू हुई है, यह कई लोगों को समझ नहीं आ रहा है। लोगों का मानना है कि सहकारिता क्षेत्र में तो जिस नेता की फाईल खोलें, उसमें गड़बड़ी ही दिखेगी, इसलिए बेलचंदन की बारी अभी क्यों आई है यह दो कुर्मी नेताओं की चुनावी लड़ाई के बीच समझना थोड़ा सा मुश्किल है। 

    विधायक तो है ही, सांसद भी-2

    महासमुंद के कांग्रेस प्रत्याशी धनेन्द्र साहू के लिए उनके ही समाज के पदाधिकारियों ने मुश्किलें पैदा कर दी है। समाज के कुछ पदाधिकारियों ने यह अभियान चलाया है कि धनेन्द्र वर्तमान में विधायक हैं। जबकि भाजपा प्रत्याशी चुन्नीलाल साहू अभी खाली है। ऐसे में चुन्नीलाल को वोट देना चाहिए, ताकि उनका भी राजनीतिक कद बढ़ सके। चुन्नीलाल एक बार विधायक रह चुके हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में उनकी टिकट काट दी गई थी। महासमुंद लोकसभा में साहू मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है और धनेन्द्र की पकड़ भी है। लेकिन सामाजिक रूप से चल रहे अभियान से चुन्नीलाल साहू वोटरों के बीच में धनेन्द्र से ज्यादा मजबूत दिख रहे हैं। हालांकि यहां आदिवासी और कुर्मी वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में अन्य जातियों के वोट किधर जाएंगे, यह कह पाना अभी मुश्किल है। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 15-Apr-2019
  • जांजगीर-चांपा के भाजपा प्रत्याशी गुहाराम अजगले ने पार्टी दफ्तर को ही ठिकाना बना लिया है। वे दिनभर प्रचार के बाद जिला पार्टी दफ्तर में ही रात्रि विश्राम करते हैं। प्रचार खत्म होने के बाद पार्टी दफ्तर में अपने कपड़े धोते हैं और सुबह तैयार होकर प्रचार के लिए निकल जाते हैं। एक बार सांसद रह चुके गुहाराम अजगले से नामांकन फार्म भरने के लिए पार्टी नेताओं ने उनसे इनकम टैक्स ब्यौरा मांगा तो उन्होंने कह दिया कि इनकम ही नहीं है, तो टैक्स कैसा? पूर्व सांसद के रूप में उन्हें कुल 20 हजार रूपए पेंशन मिलती है। और गांव में थोड़ी सी जमीन है, उसी से उनका गुजारा होता है। 

    चुनाव संचालन कर रहे नेताओं ने उनसे अपनी तरफ से कुछ संसाधन जुटाने के लिए कहा, तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। अब हाल यह है कि उनके लिए पार्टी नेताओं को गाड़ी किराए पर लेनी पड़ी, जिसमें वे क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं। पन्द्रह साल की सरकार में पार्टी के कई छोटे-बड़े नेता करोड़पति-अरबपति बन गए हैं, लेकिन गुहाराम फक्कड़ ही रहे। गुहाराम की सादगी और सरलता के कारण ही पार्टी के छोटे-बड़े नेता उनके पक्ष में प्रचार के लिए निकल पड़े हैं और उन्हें जिताने के लिए भरसक कोशिश कर रहे हैं। 

    जिम्मा फिर सौदान सिंह पर
    लोकसभा चुनाव में भाजपा के राष्ट्रीय सहमहामंत्री (संगठन) सौदान सिंह सक्रिय दिख रहे हैं। जबकि विधानसभा चुनाव में हार के बाद काफी दिनों तक गायब थे और पार्टी के भीतर हल्ला था कि उन्हें छत्तीसगढ़ के प्रभार से अलग कर दिया गया है। प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन हरियाणा और मध्यप्रदेश में ज्यादा समय दे रहे हैं, तो यहां की जिम्मेदारी सौदान सिंह पर आ गई है। ये अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में बुरी हार के लिए उन्हें ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। 

    दुर्ग और कुछ और जगहों पर तो कार्यकर्ताओं ने सौदान के खिलाफ आग उगली थी। खैर, सौदान सिंह सभी लोकसभा क्षेत्रों में जाकर पदाधिकारियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। पिछले दिनों वे हेलीकॉप्टर से अंबिकापुर पहुंचे और वहां प्रदेश के पदाधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में उन्होंने यह कहा कि प्रदेश की सभी 11 सीटें जीत रहे हैं, तो एक-दो कार्यकर्ता मुंह दबाकर हँसने लगे। 

    उन्होंने सरगुजा से भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह को फोन लगाया और कहा कि उनकी स्थिति अच्छी है। और वे चुनाव जीत रहीं हैं। फिर उन्होंने रेणुका को सभी के साथ समन्वय बनाकर काम करने की नसीहत देकर फोन काट दिया। सुनते हैं कि वे खुद टिकट वितरण से नाखुश हैं। वे राजनांदगांव से अभिषेक, रायगढ़ से विष्णुदेव साय को टिकट दिलाना चाहते थे, पर हाईकमान ने एक लाइन में सभी सांसदों की टिकट काटने का फैसला लेकर झटका दिया है। चूंकि वे संगठन मंत्री हैं तो बैठक में औपचारिकता पूरी कर रहे हैं।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 14-Apr-2019
  • पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले मुख्य दलों के प्रत्याशी इस बार  खर्च कम कर रहे हैं। भाजपा चुनाव खर्चों को लेकर हमेशा उदार रही है। मगर प्रदेश में सरकार न होने की वजह से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही है। ऊपर से नए चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा है, जो कि आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम भी नहीं हैं। पिछले पन्द्रह बरस में राज्य सरकार ने बैठे हुए लोग अरबपति बनने के बाद अब अगर चुनाव लड़ते, तो बात ही कुछ और होती। सुनते हैं कि पार्टी ने चुनाव संचालकों के हाथों में ही फंड थमा दिया है, जिससे कुछ प्रत्याशी नाराज बताए जा रहे हैं। एक भाजपा प्रत्याशी ने कुछ पार्टी नेताओं को अपनी व्यथा सुनाई है, कि वे अपने जेब से 15 लाख खर्च कर चुके हैं, लेकिन चुनाव संचालक ने अभी तक एक फूटी कौड़ी नहीं दी है। और तो और चुनाव संचालक फोन भी नहीं उठा रहे हैं। 

    प्रदेश में कांग्रेस सरकार में होने के बावजूद प्रत्याशी कोई बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। चर्चा है कि पार्टी हाईकमान ने यहां के जिम्मेदार नेताओं को अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के उम्मीदवारों को मदद करने के लिए कह दिया है, जिससे वे टेंशन में बताए जा रहे हैं। कुछ प्रत्याशियों ने टिकट से पहले खर्च को लेकर काफी कुछ वादे किए थे, लेकिन वे अब पार्टी का मुंह ताक रहे हैं। एक शिकायत पर प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया ने एक प्रत्याशी को फटकार भी लगाई। साथ ही चुनाव खर्च भी प्रत्याशी के बजाए चुनाव संचालक को देने के लिए कहा है। 

    अमितेष लोकसभा चुनाव प्रचार में!
    पूर्व मंत्री और राजिम के विधायक अमितेश शुक्ल लोकसभा चुनाव प्रचार में डटे हैं। वे सालों बाद लोकसभा का चुनाव प्रचार कर रहे हैं। आमतौर पर लोकसभा चुनाव के दौरान वे पारिवारिक कारण गिनाकर प्रदेश से बाहर चले जाते थे। उनकी जगह स्थानीय नेताओं को प्रचार की जिम्मेदारी दी जाती रही है। पूर्व सीएम अजीत जोगी दो बार महासमुंद से चुनाव लड़े, लेकिन दोनों बार उन्होंने राजिम में अमितेश की जगह अन्य नेताओं को चुनाव संचालक बनाया था। इस बार अमितेश के पुत्र भवानी शंकर खुद टिकट के दावेदार थे। अमितेश अपने पुत्र को टिकट दिलाने के लिए मेहनत भी कर रहे थे, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह धनेन्द्र साहू को प्रत्याशी बनाया। धनेन्द्र स्व. श्यामा चरण शुक्ल के कट्टर समर्थक  रहे हैं। ऐसे में अमितेश का चुनाव प्रचार छोड़कर जाने का कोई कारण नहीं बचा था। वे विधानसभा का चुनाव 55 हजार से अधिक मतों से जीते हैं और अभी तक धनेन्द्र के लिए पूरी मेहनत करते दिख भी रहे हैं।  दरअसल श्यामाचरण शुक्ल के वक्त से उनका परिवार साहू समाज की खास फिक्र रखते आया है क्योंकि राजिम में इस परिवार की जीत साहू वोटों की मर्जी के बिना नहीं हो सकती। इसलिए राजिम से किसी शुक्ल की टिकट पाते हुए श्यामाचरण-अमितेष यह कोशिश भी करते आए हैं कि अड़ोस-पड़ोस की सीटों पर किसी साहू को जरूर टिकट मिल जाए।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 13-Apr-2019
  • सरकार जाते ही भाजपा के कारोबारी नेता, कांग्रेस के लोगों से संबंध मधुर करने में लग गए हैं। ताकि कारोबार में किसी तरह की दिक्कत न आए। ऐसे ही एक भाजपा नेता पिछले दिनों सरकार के एक मंत्री के घर पहुंचे। और मंत्रीजी की तारीफों के पुल बांधने लगे। यह सुनकर असहज हो रहे मंत्रीजी के समर्थकों में से एक ने भाजपा नेता को टोक दिया और याद दिला दिया कि आप तो मंत्रीजी के खिलाफ अपनी पार्टी के प्रत्याशी का चुनाव संचालन कर रहे थे। 

    यह सुनकर वाकपटु भाजपा नेता कुछ क्षण के लिए असहज हो गए, लेकिन तुरंत संभलकर कहा कि हां, मैं मंत्रीजी के खिलाफ चुनाव संचालन कर रहा था, पर मंत्रीजी के कुशल प्रबंधन का कोई तोड़ नहीं है। हमें बुरी तरह हरा दिया। भाजपा नेता और मंत्रीजी के समर्थकों के बीच चर्चा का दौर चल रहा था कि मंत्रीजी ने काम पूछ लिया। फिर क्या था, भाजपा नेता असल मुद्दे पर आ गए। उन्होंने गुजारिश की कि जिस बोर्ड के वे पदाधिकारी थे वहां काम कर रही सीए फर्म को न हटाया जाए, उसे काम करने दिया जाए। मंत्रीजी ने तुरंत फोन कर उनका काम कर दिया। तब कहीं जाकर भाजपा नेता वहां से निकले। 


    छत्तीसगढ़ का हार्दिक पटेल

    छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक 'हार्दिक पटेल' का उदय हो रहा है। सेनानी स्व. खूबचंद बघेल के गृहग्राम पथरी से तालुक रखने वाले अमित बघेल की तुलना कई उत्साही लोग गुजरात के हार्दिक पटेल से कर रहे हैं। अमित विधानसभा चुनाव के दौरान सुर्खियों में आए। उन्होंने कसडोल में गौरीशंकर अग्रवाल और धरसींवा के भाजपा प्रत्याशी देवजी पटेल व महासमुंद के डॉ. विमल चोपड़ा को टारगेट किया और उन्हें चुनाव में बुरी तरह हरवाने में अहम भूमिका निभाई। 

    अमित भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश महामंत्री रहे हैं, लेकिन देवजी से अनबन के चलते उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। इसके बाद अमित ने श्रमिक नेता रामगुलाम सिंह ठाकुर के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ क्रांति सेना का गठन किया। जब सिलतरा के एक उद्योग से कुछ लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया, तो क्रांति सेना के बैनर तले अमित नौकरी से हटाए गए कर्मचारियों के समर्थन में आंदोलन खड़ा किया। फिर क्या था, उन्हें जेल भेज दिया और रमन सरकार के प्रभावशाली लोगों ने तीन माह तक उनकी जमानत नहीं होने दी। जेल से निकलने के बाद उनकी हैसियत और बढ़ गई। उनके संगठन का विस्तार अब प्रदेशभर में हो चुका है। 

    विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें भाजपा के लोगों ने अपने साथ लाने की कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। प्रदेश के गैर छत्तीसगढ़ी मूल के दिग्गज भाजपा नेताओं को चिन्हित कर उनके खिलाफ मुहिम चलाई और चुनाव में उनके खिलाफ माहौल बनवाने में सफल रहे। पूर्व सांसद सोहन पोटाई भी उनके साथ जुड़ गए हैं और छत्तीसगढ़ी समाज के हितों की बात कर रहे हैं। वे कांग्रेस और भाजपा के उद्योगपति-कारोबारी नेताओं के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। 

    सुनते हैं कि कोरबा में सरकार के मंत्री जयसिंह अग्रवाल के खिलाफ अभियान चलाया, तो सीएम भूपेश बघेल को उन्हें फोन कर समझाना पड़ा। उनका मानना है कि राजस्थान-उत्तरप्रदेश, हरियाणा से आए भाजपा और कांग्रेस के नेता यहां जनप्रतिनिधि बन गए हैं और छत्तीसगढिय़ों का शोषण कर रहे हैं। उनके भाषण से प्रभावित बड़ी संख्या में युवा उनसे जुडऩे लगे हैं। कुछ लोग आर्थिक सहयोग भी कर रहे हैं। वे खूबचंद बघेल, गुरूघासीदास, शहीद वीर नारायण सिंह और संत पवन दीवान जैसे छत्तीसगढ़ के महापुरूषों को अपना आदर्श मानते हैं और उन्हीं के सपनों के अनुरूप शोषण मुक्त छत्तीसगढिय़ा राज चाहते हैं। वैसे, छत्तीसगढिय़ा शोषण के नाम पर कई संगठन तैयार हुए और जल्द ही खत्म भी हो गए, लेकिन अब क्रांति सेना का आगे क्या होता है यह देखना है।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 12-Apr-2019
  • सरगुजा में भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह के लिए नई मुश्किलें खड़ी हो गई है। सीतापुर इलाके में तो पार्टी पदाधिकारियों ने बकाया भुगतान न होने पर काम नहीं करने की धमकी दे दी है। सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के लिए पार्टी के बड़े नेताओं के कहने पर स्थानीय कुछ नेताओं ने साहूकारों से कर्ज लेकर चुनाव में लगा दिया। उनसे कहा गया था कि चुनाव निपटते ही पैसा मिल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

    हाल यह है कि जिन लोग ने कर्ज दिए थे वे स्थानीय जिम्मेदार नेताओं के पीछे पड़ गए हैं। अकेले पेट्रोल पंपों का ही लाखों का बिल बकाया है। विधानसभा प्रत्याशी की स्थिति यह है कि चुनाव में हारने के बाद उन्होंने स्थानीय नेताओं से दूरी बना ली। प्रदेश में सरकार नहीं है, तो कोई पूछने वाला नहीं है। अब लोकसभा चुनाव हैं, तो नेताओं ने कर्ज वापसी के लिए दवाब बनाया है। 

    स्थानीय नेताओं ने प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन के सामने भी अपनी बात रखी है। साथ ही साथ चुनाव संचालक रामप्रताप सिंह को चेताया है। उन्हें भरोसा दिया गया है कि जल्द ही उन्हें पैसा लौटा दिया जाएगा। फिर भी दूध से जले नेता, इस वादे पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि बकाया रकम की वापसी के बाद ही काम करेंगे। 

    खफा-खफा से हैं  महाराज
    क्या पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव खफा हैं, यह सवाल पार्टी हल्कों में चर्चा का विषय है। दरअसल, सिंहदेव चुनाव प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन वे अपने क्षेत्र सरगुजा से दूर हैं। सरगुजा राजघराने के मुखिया सिंहदेव की पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि  विधानसभा चुनाव में जिले की सभी सीटों पर प्रत्याशी उन्हीं की पसंद से तय किए गए थे और उन्होंने जिताया भी। सरगुजा लोकसभा प्रत्याशी खेलसाय सिंह भी सिंहदेव के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। 

    सुनते हैं कि सिंहदेव ने सरगुजा लोकसभा में प्रचार की रणनीति बनाने सिर्फ एक बार बैठक ली है। जिसमें विधायकों के अलावा जिलाध्यक्ष व अन्य पदाधिकारी भी थे। इसके बाद खेलसाय को स्थानीय नेताओं के भरोसे छोड़ दिया है। अब जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, भाजपा की स्थिति लगातार मजबूत दिख रही है। चर्चा है कि कुछ लोग सिंहदेव से मार्गदर्शन लेने गए, तो उन्होंने कह दिया कि जैसा करना है वैसा करें। सिंहदेव सक्रिय नहीं दिख रहे हैं, तो ब्लॉक स्तर के नेता भी सुस्त पड़ गए हैं। वे अपने ही गढ़ में दिलचस्पी क्यों नहीं ले रहे हैं, इसकी चर्चा भी हो रही है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि सरकार के कुछ नीतिगत फैसलों से वे सहमत नहीं हैं और यही वजह है कि ओडिशा में ज्यादा समय दे रहे हैं। पार्टी ने उन्हें ओडिशा में प्रचार का अतिरिक्त दायित्व भी दिया है। अब सरगुजा में प्रचार के लिए समय नहीं निकाल पाने का बहाना भी है।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 11-Apr-2019
  • नौकरशाह चिराग के जिन्न की तरह होते हैं। जिनके पास चिराग होता है नौकरशाह उसी का कहना मानते हैं। लेकिन 15 साल सरकार में रहने के बाद  कई भाजपा नेता इस जुमले को भूल चुके थे। सरकार बदलने के बाद नौकरशाहों के तेवर बदले, कुछ भाजपा नेताओं को झटका भी लगा है। ऐसे ही एक मामले में एक भाजपा नेता की रायपुर जिले के बड़े अफसर से नोंक-झोंक भी हो गई। बात देखने-दिखाने तक पहुंच गई। आखिरकार नेताजी को अपमानित होकर लौटना पड़ा। 

    हुआ यूं कि भाजपा नेता चुनाव संबंधी शिकायत को लेकर कलेक्टोरेट पहुंचे थे। अफसर की भाजपा सरकार के एक मंत्री से निकटता रही है। वे मंत्रीजी के स्टॉपमें भी रहे हैं। अफसर के साथ नेताजी का उठना-बैठना था पर जब शिकायत लेकर पहुंचे तो अफसर ने कुछ कानूनी बातें बता दी। यह बात नेताजी को हजम नहीं हुई। उन्होंने अफसर पर नाराजगी जाहिर की, तो उन्हें ऐसी फटकार लगाई कि नेताजी सन्न रह गए। तुरंत नेताजी पूर्व मंत्री के पास पहुंचे और अफसर की शिकायत की। पूर्व मंत्री ने उन्हें प्यार से समझाया कि सरकार बदल चुकी है, तो अफसर के तेवर बदलना भी स्वाभाविक है। बेहतर होगा कि अनुनय-विनय कर किसी तरह अपना काम निकाला जाए। 

    जोगी-नेताओं का बुरा हाल
    जोगी पार्टी के कई नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन कोई उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा है। जोगी पार्टी के चुनाव अभियान प्रमुख रहे पूर्व मंत्री विधान मिश्रा, जोगी के कहने पर भूपेश बघेल को खूब गरियाते थे। अब वे क्षमा मांगकर वापस आना चाहते हैं, लेकिन भूपेश बघेल तो दूर,बाकी कांग्रेस नेता भी उन्हें कोई महत्व नहीं दे रहे हैं। हाल यह है कि जो लोग आ गए हैं उनकी भी हालत कोई अच्छी नहीं है।

    जोगी पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री रहे अब्दुल हमीद हयात को रायपुर लोकसभा के केंद्रीय कार्यालय में अहम जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन पिछले दिनों एक कांग्रेस नेत्री ने वहां पहुंचकर जोगी और उनके समर्थक रहे लोगों को इतना भला-बुरा कहा कि उन्होंने कार्यालय जाना ही बंद कर दिया। सुनते हैं कि खुद जोगी परिवार अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं क्योंकि कांग्रेस में उनके विरोधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 10-Apr-2019
  • बात दो दशक से भी ज्यादा पुरानी है। अविभाजित मध्यप्रदेश में लोकसभा के चुनाव थे। तब उस समय शरदचंद बेहार सीएस और शरदचंद सक्सेना डीजीपी थे। तब बस्तर में नक्सलवाद पांव-पसार रहा था। चुनाव में सुरक्षा तैयारियों पर चर्चा के लिए जगदलपुर में उच्च स्तरीय बैठक हुई। बैठक में आईजी-एसपी और वन अफसर विशेष रूप से मौजूद थे। चूंकि नक्सलियों ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान कर रखा था, इसलिए मतदान के दौरान छिटपुट हिंसा की आशंका भी जताई जा रही थी। 

    बस्तर और कांकेर लोकसभा में सुरक्षा तैयारियों पर चर्चा हो रही थी कि एक नौजवान एडिशनल एसपी ने बड़े आत्मविश्वास से कह दिया कि चुनाव में नक्सल हिंसा नहीं होगी और सब कुछ शांतिपूर्वकनिपट जाएगा। यह सुनते ही डीजीपी शरदचंद सक्सेना,  एएसपी पर भड़क गए, तब सीएस शरदचंद बेहार ने उन्हें शांत किया और फिर एडिशनल एसपी की तरफ  मुखातिब होते हुए कहा कि चुनाव शांतिपूर्वक कैसे हो जाएगा, तब एएसपी ने अलग से चर्चा की इच्छा जताई।
     बैठक के बाद शरदचंद बेहार ने एएसपी को कलेक्टर के कक्ष में मिलने कहा। सुनते हंै कि एएसपी ने सीएस बेहार और डीजीपी सक्सेना को बताया कि एक राजनीतिक दल के प्रत्याशी ने नक्सल नेताओं को पैसा पहुंचा दिया है, इसके बाद अंदरूनी इलाकों में भी प्रचार की छूट दे दी गई है। अब चुनाव में हिंसा नहीं होगी। एएसपी की सूचना सही निकली और चुनाव शांतिपूर्वक निपट गया। पर जब अविभाजित मध्यप्रदेश में परिवहन मंत्री रहे लिखीराम कांवरे की नक्सलियों ने हत्या की थी, तब भी उस समय राजनीतिक हल्कों में यह चर्चा रही कि कांवरे नक्सलियों को नियमित रूप से पैसा पहुंचाते थे, लेकिन बाद में नक्सलियों की तरफ से डिमांड ज्यादा आई और कांवरे ने मना कर दिया, तो नक्सलियों ने उन्हें मौत के मुंह में ढकेल दिया। 

    इससे अलग तरह का वाकया वर्ष-2008 के विधानसभा चुनाव के बाद राजनांदगांव जिले में हुआ था। तब नक्सलियों ने विधानसभा चुनाव निपटने के बाद एक नेता की गोली मारकर हत्या कर दी। चर्चा है कि नेताजी ने चुनाव के वक्त नक्सलियों को कुछ आश्वासन दिया था, जिसे पूरा नहीं किया। इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। यह भी सुनने में आता है कि विशेषकर बस्तर संभाग में संपन्न तबके के दोनों ही प्रमुख दलों के नेता नक्सल हिंसा से बचने या समर्थन जुटाने के लिए नक्सलियों से मदद लेते आए हैं। ये अलग बात है कि दोनों ही दल एक-दूसरे पर नक्सलियों के साथ सांठ-गांठ का तोहमत लगाते हैं। 

    अब जब दंतेवाड़ा विधायक भीमा मंडावी की नक्सलियों ने हत्या की है, तो कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। पुलिस कह रही है कि विधायक को दंतेवाड़ा के कुंआकोंडा इलाके के श्यामगिरी के पहाड़ी वाले रास्ते पर जाने से मना किया गया था, उन्हें नक्सल खतरों से भी अवगत कराया गया था। इस सबको नजरअंदाज कर प्रचार के लिए निकल पड़े। भीमा मंडावी और उनके साथ सभी चारों सुरक्षाकर्मी मौत के आगोश में समा गए, अब इस घटना ने कई सवाल पीछे छोड़ दिए हैं। इसका जवाब मिलना भी मुश्किल है। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

     

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Posted Date : 09-Apr-2019
  • लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रचार तंत्र अपेक्षाकृत बिखरा-बिखरा सा है। कुछ जगहों पर प्रत्याशियों की हालत खराब है, लेकिन वहां पार्टी नेता पूरी तरह ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। मसलन, रायगढ़ में जूदेव परिवार और भाजपा में एकजुटता की वजह से भाजपा प्रत्याशी गोमती साय की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। सीएम भूपेश बघेल वहां कई बार जा चुके हैं, सबसे ज्यादा जरूरत पंचायत मंत्री टीएस सिंहदेव की है, मगर, वे ओडिशा और दूसरे क्षेत्रों में ज्यादा प्रचार कर रहे हैं। बस्तर में उनकी जरूरत भी नहीं थी, फिर भी एक के बाद एक सभाएं ले रहे हैं। वहां सभाओं में वैसे भी कोई ज्यादा भीड़ जुट नहीं रही है। कांग्रेस प्रत्याशी मजबूत स्थिति में है। 

    सिंहदेव की उपयोगिता सबसे ज्यादा रायगढ़ लोकसभा में है और वे जशपुर राजघराने के प्रभाव को कम करने की ताकत रखते हैं। मगर, वहां का प्रचार तंत्र सिर्फ उमेश पटेल के भरोसे छोड़ दिया गया था। जो कि पूरे लोकसभा में प्रभावी साबित नहीं हो पा रहे हैं। यही हाल, जांजगीर-चांपा सीट का है। जांजगीर-चांपा में त्रिकोणीय मुकाबला है और बसपा की दमदार मौजूदगी से भाजपा को बड़े फायदे की उम्मीद है। 

    कांग्रेस प्रत्याशी रवि भारद्वाज की छवि अच्छी है और उनके पिता पांच बार सांसद रहे हैं। लेकिन जांजगीर-चांपा के ज्यादातर बड़े नेता कोरबा कूच कर गए हैं। यहां पूर्व सांसद करूणा शुक्ला और महंत राम सुंदरदास जैसे नेताओं को प्रचार में झोंकने की जरूरत है, पर यह सब नहीं हो पा रहा है। इसी तरह कांग्रेस के एक अन्य स्टार प्रचारक ताम्रध्वज साहू की सबसे ज्यादा जरूरत दुर्ग सीट पर है, लेकिन उन्हें भी हेलीकॉप्टर देकर यहां-वहां प्रचार में भेजा जा रहा है। जहां भीड़ भी ज्यादा नहीं होती है। विधानसभा चुनाव में प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया इन सब चीजों की मॉनिटरिंग करते थे, लेकिन वे अपने बेटे के चुनाव प्रचार में भी व्यस्त हो गए हैं। इन सबके चलते अनुकूल माहौल के बावजूद कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। 

    दोनों की दिक्कतें एक सरीखी
    रायपुर लोकसभा में मौजूदा महापौर प्रमोद दुबे और पूर्व महापौर सुनील सोनी के बीच सीधी टक्कर है। दोनों की समस्याएं एक जैसी है। दोनों को अपनों से ही दो-चार होना पड़ रहा है। प्रमोद ने कई पार्षदों को नाराज कर रखा है। रायपुर उत्तर से टिकट की भी दावेदारी की थी। इस वजह से भी बाकी दावेदार नाराज हैं। दूसरी तरफ, सुनील सोनी को तो पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी यह कह आए कि आपने मेरे लिए गड्ढा खोदा था, लेकिन मैं आपके लिए ऐसा नहीं करूंगा। अब इतना सब कुछ कहने के बाद श्रीचंद अपनी ताकत झोंक रहे होंगे, यह सोचना भी गलत है। फिर भी दोनों को नाराज लोगों को मनाने में महारत भी हासिल है। अब यह देखना है कि दोनों में से कौन यह बेहतर काम कर सकता है। दोनों इसी नगर निगम में महापौर रह चुके हैं, और नये-पुराने पार्षदों की दोनों से कुछ-कुछ नाराजगी रहते आई है जो कि चुनाव में असर डाल सकती है। फिलहाल सुनील सोनी को बृजमोहन अग्रवाल की क्षमता पर अपार भरोसा है।

    अंडा कहना थोड़ा अटपटा
    नया रायपुर विकास प्राधिकरण का नाम इतने बरसों से एनआरडीए चले आ रहा था जो कि अब गड़बड़ा गया है। रमन सरकार के वक्त अटल बिहारी वाजपेयी के गुजरने पर उनकी स्मृति में नया रायपुर का नाम बदलकर अटल नगर तो कर दिया गया, लेकिन बाद में जब अटल नगर विकास प्राधिकरण के अंग्रेजी प्रथमाक्षर जोड़कर देखे गए तो वे एएनडीए, यानी अंडा बन रहे थे। अब अंडा बोलने में कुछ अटपटा भी लगता है, लेकिन नाम है तो है।

    अब सरकार ने नया रायपुर के कामकाज को तकरीबन रोक ही दिया है, और वहां बस चलना भी मुश्किल हो रहा है। चलाने वाले ऑपरेटर को न डीजल का पैसा मिला है, न ड्राइवर-कंडक्टर की तनख्वाह। अब अगर बसें बंद हो जाएंगी, या कम हो जाएंगी तो सरकारी कर्मचारी भी नया रायपुर जाकर बसना छोड़ देंगे, और यह शहर देश का सबसे बड़ा शहरी सुनसान इलाका होकर रह जाएगा। वैसे भी आज तपती दोपहर में अगर कोई जख्मी हो जाए, तो उसे कोई गाड़ी नसीब न हो। एक जानकार ने कहा- नया रायपुर के हाल अइसे होगे हे, कि मरे रोवय्या न मिले...। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 08-Apr-2019
  • कांकेर से भाजपा के मोहन मंडावी और कांग्रेस के वीरेश ठाकुर के बीच टक्कर है। दो अलग पार्टियों में रहने के बाद भी दोनों के बीच संबंध काफी मधुर हैं। दोनों दूर-दराज के रिश्तेदार हैं। वीरेश जब भी भानुप्रतापपुर से कांकेर आते हैं, तो मोहन मंडावी के ही गोविंदपुर के मकान में रहते हैं। अब जब चुनाव में दोनों आमने-सामने हैं, तो वे एक-दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बच रहे हैं। वीरेश के बड़े भाई  बीबीएस ठाकुर मप्र में एडीजी रह चुके हैं। न सिर्फ वीरेश बल्कि उनके पूरे परिवार की साख अच्छी रही है। उनके पिता सत्यनारायण ठाकुर तीन बार एमएलए रह चुके हैं और चाचा अजीत सिंह ठाकुर बस्तर के पहले आईएएस रहे हैं। दूसरी तरफ, भाजपा प्रत्याशी मोहन मंडावी भी छवि के मामले में वीरेश से किसी तरह उन्नीस नहीं पड़ते हैं। वे धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं और उनकी अपनी रामायण मंडली है। वे गांव-गांव में रामायण पाठ करते रहे हैं। ऐसे में वे किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। ऐसे में कांकेर के मतदाताओं के सामने दुविधा है कि दो बेहतर में से किसका चुनाव किया जाए। 

    मंदी और चंदा
    मंदी के माहौल में चुनावी चंदा जुटाने में राजनीतिक दलों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के लोग फिर भी बेहतर स्थिति में हैं। क्योंकि केन्द्र में उनकी सरकार है और ज्यादातर बड़े उद्योग घराने उन्हें दिल खोलकर मदद कर रहे हैं। यहां भी पिछले 15 साल सरकार होने के कारण भाजपा के कई नेताओं का उद्योगपतियों से घरोबा रहा है। सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में ही भाजपा के लोगों ने इतना कुछ जुटा लिया गया था कि लोकसभा में दिक्कत नहीं आनी चाहिए थी, पर राजनीतिक माहौल कुछ ऐसा हो गया कि खर्च करने में कंजूसी करने लग गए। सत्ता में आने के बाद भी कांग्रेस की स्थिति कोई बेहतर नहीं है। चर्चा है कि दिल्ली ने काफी कुछ दबाव बना दिया है और यहां से ओडिशा को भी फंडिंग हो रही है। हल्ला तो यह है कि कुछ मंत्रियों को बकायदा टारगेट भी दिया गया। एक मंत्री तो धमतरी में रेस्टहाउस दो दिन रहे और ट्रांसफर-पोस्टिंग के एवज में काफी कुछ जुटाया भी। लेकिन भाजपा के साधन-सुविधा आज भी कांगे्रस से अधिक हैं। राजधानी रायपुर के भाजपा उम्मीदवार सुनील सोनी के काम में लगे एक बड़े भाजपा नेता ने अनौपचारिक चर्चा में कहा कि खर्च में प्रमोद दुबे कहीं नहीं टिकेंगे, और यह कमजोरी भारी भी पड़ सकती है। लोगों को याद है कि दो चुनाव पहले दुर्ग के विधानसभा प्रत्याशी अरूण वोरा की हार हो गई थी क्योंकि  मतदान के पहले का खर्च जुट नहीं पाया था। यह उस वक्त हुआ था जब उनके पिता मोतीलाल वोरा कांगे्रस के राष्ट्रीय नेता थे, और शायद कोषाध्यक्ष भी थे।

    जिम्मेदारी मिली, तो पुरानी बातें...
    भाजपा में कुछ नेताओं को अहम जिम्मेदारी सौंपे जाने से नाराजगी भी है। मसलन, अवधेश जैन को चुनाव कंट्रोल रूम प्रभारी बनाया गया है। अवधेश के पिता जगदीश जैन शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष रहे हैं, और अवधेश भी एबीवीपी के पदाधिकारी रहे हैं। अवधेश राज्य बनने के बाद एबीवीपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वे कांग्रेस नेता एजाज ढेबर के करीबी माने जाते रहे हैं। जोगी सरकार में जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी के पुतले को सड़क में घसीटा गया था, तो एजाज के साथ अवधेश जैन भी इसमें शामिल थे। खैर, कांग्रेस की सरकार गई, तो अवधेश फिर भाजपा में आ गए। अब चूंकि पुराने भाजपा परिवार से रहे हैं, तो अटलजी के पुतले का अपमान करने की बात भी पीछे छूट गई। अब वे मुख्यधारा में आ गए। ये अलग बात है कि उन्हें अहम दायित्व सौंपे जाने से पार्टी के कई लोग नाराज हैं। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 07-Apr-2019
  • छत्तीसगढ़ में चुनाव का सिलसिला शुरू हुआ ही है कि नक्सलियों ने बस्तर में तो हिंसा की ही है, राजधानी से लगे हुए धमतरी जिले में भी सीआरपीएफ के एक जवान को नक्सलियों ने मार दिया। शहर के लोगों को अधिक हड़बड़ी राजधानी के करीब नक्सल मुठभेड़ होने से है, बस्तर के भीतरी जंगलों में जो होता है उसके आंकड़ों से अधिक दिलचस्पी शहर की नहीं होती। 
    ऐसी हिंसा को देखते हुए चुनाव आयोग ने तुरंत ही एयर एंबुलेंस का इंतजाम करने को कहा है जिसे मतदान तक लगातार तैनात रखा जाएगा ताकि बस्तर या नक्सली इलाके में कोई भी वारदात होने पर घायलों को एयर एंबुलेंस से बड़े अस्पताल तक लाया जाए, और रास्ते में इलाज हो सके। अब सरकार के सामने एक दिक्कत यह आ रही है कि एयर एंबुलेंस के पिछले रेट विधानसभा चुनाव के समय के हैं जो कि कुछ ही राज्यों में हो रहे थे। अब पूरे देश में आम चुनाव हो रहा है इसलिए बाकी विमानों के साथ-साथ एयर एंबुलेंस की मांग भी बढ़ गई है, और साथ-साथ उसके रेट भी। चुनाव आयोग ने तो राज्य सरकार को इंतजाम के लिए लिख दिया है, लेकिन राज्य सरकार इस बात से जूझ रही है कि पिछले टेंडर के रेट पर एंबुलेंस नहीं है, और नए टेंडर बुलाने को समय नहीं है। लेकिन जिंदगियों को खतरा देखते हुए सरकार रेट में भी ढील दे सकती है, और टेंडर की जरूरत को खत्म कर सकती है। 

    अरण्य भवन में हुई बैठक चुनावी?
    सरकार के कमाऊ विभागों में चुनाव के ठीक पहले जब ऐसे अफसरों की बैठक होती है जिनसे सत्तारूढ़ पार्टी को नगदऊ मिल सकता है, तो पूरे विभाग को पता लग जाता है, उन लोगों को भी जो कि बैठक में मौजूद नहीं रहते। अभी-अभी नया रायपुर के अरण्य भवन में प्रदेश भर के डीएफओ इक_ा हुए। बैठक की बात जाने दें, अहाते में गाडिय़ों इतनी भर गई थीं कि रोज ड्यूटी के बाद वहां से जाने वाले कर्मचारियों की बसें भी फंसने लगीं। अब बैठक के भीतर क्या हुआ होगा, यह बहुत बड़े रहस्य की बात नहीं है। लेकिन इस बैठक में पहुंचे एक अफसर ने राहत की सांस लेते हुए कहा, विधानसभा चुनाव के मुकाबले हालत बेहतर है, क्योंकि जोगी चुनाव मैदान को बाहर हैं, और उनकी तरफ से कोई फोन नहीं आ रहे। दूसरे अफसर ने इस पर जड़ा- कम बोलो, कहीं अपनी ही नजर न लग जाए, और फोन न आने लगे कि हाथी के लिए चारा चाहिए।

    भूपेश जैसा कोई नहीं...
    वैसे तो देश में अब खींचतानकर आधा दर्जन के करीब कांग्रेस मुख्यमंत्री हो गए हैं, लेकिन मीडिया में आती खबरों और बयानों को देखें, तो अकेले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा हमला किए हुए हैं। तकरीबन रोज ही वे मोदी के खिलाफ बयान दे रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं, और यह सब उस वक्त जब वे खुद सीबीआई की एक जांच में अभियुक्त बनाए गए हैं, और मामला चल ही रहा है। कुछ लोगों का यह मानना है कि वे दिग्विजय सिंह के असली चेले हैं, और वे छोटे-मोटे वार में भरोसा नहीं रखते, और सीधे आमने-सामने टक्कर देते हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बहुत नेता आए-गए, लेकिन भूपेश जैसे तेवर किसी और के नहीं रहे। न ही अपनी पार्टी के भीतर रहकर एक वक्त नुकसान पहुंचाने वाले किसी नेता के खिलाफ, और न ही आज देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ। 
    आज सुबह से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के सबसे करीबी दो अफसरों पर आयकर के छापे पड़े हैं जो कि कमलनाथ के साथ बहुत लंबे समय से जुड़े हुए हैं, जिन्हें कमलनाथ अपना सबसे भरोसेमंद मानते हैं, और जिनके जन्मदिन पर कमलनाथ ने अपने फेसबुक पेज पर अपने साथ उनकी तस्वीर पोस्ट करके उनकी तारीफ की थी। अब ठीक चुनाव के वक्त जिस तरह कर्नाटक के एक कांग्रेस मंत्री के बाद मध्यप्रदेश में कमलनाथ के अफसरों पर इंकम टैक्स के छापे पड़े हैं, बाकी कांग्रेस राज्यों को भी सावधान हो जाने की जरूरत है। 

    आईआईएम में पढ़ाने लायक
    छत्तीसगढ़ में पिछली रमन सरकार के दौरान कई विभागों के कामकाज जो अब एक-एक कर सामने आ रहे हैं, उन सब पर एक-एक पेपर तैयार होना चाहिए। समाचारों का पेपर नहीं, आईआईएम में पढ़ाने का। सरकार और राजनीति का मैनेजमेंट कैसा होना चाहिए कि उसमें इस तरह के काम न हो सकें, इसे पढ़ाने के लिए इन विभागों को एक मॉडल की तरह पेश करना चाहिए। आम तौर पर पढ़ाया यह जाता है कि काम कैसे-कैसे किया जाए। लेकिन सरकार का मैनेजमेंट बराबरी से, या कुछ अधिक हद तक इस पर टिका होता है कि काम कैसे-कैसे न किया जाए। अब राजधानी में सरकार के सबसे खुले खर्च से बदले जा रहे डीकेएस अस्पताल का हाल आज यह है कि मौजूदा अफसरों और मंत्री से वह न निगला जा रहा, न उगला जा रहा है। न सिर्फ भ्रष्टाचार, बल्कि मनमानी भी इस दर्जे की हुई है कि लोग देखकर हक्का-बक्का हैं कि क्या रमन सरकार ही वापिस आ जाती, तो भी सीएजी के सामने यह अस्पताल नहीं फंसता? जैसे बड़े-बड़े दिग्गजों ने मिलकर इस अस्पताल के नाम पर मंजूर और गैरमंजूर रकम को खर्च किया है, वह हक्का-बक्का कर देने वाला काम है। और अभी इस भ्रष्टाचार से जुड़े हुए लोगों के कई और मामले कब्र फाड़कर बाहर निकलने को उतावले हैं जिनसे सेक्स, क्राइम, और थ्रिल, इन सबसे मिली हुई एक फिल्मी कहानी सामने आने वाली है। नई सरकार के लोग यह देखकर भी हैरान हैं कि नागरिक आपूर्ति निगम और डीकेएस अस्पताल जैसे मामलों के भ्रष्टाचार सरकार में हर बच्चे को मालूम थे, और बड़े ओहदे पर बैठे लोग मानो इससे अनजान थे। अब चल रही जांच में बहुत सी ऐसी बातें भी सामने आ रही हैं जिनसे नई सरकार हैरान भी है, और कुछ हद तक परेशान भी है।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 05-Apr-2019
  • चुनाव में कालेधन का उपयोग हमेशा होते आया है। प्रमुख राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों को चुनाव आयोग द्वारा तय सीमा से अधिक राशि  उपलब्ध कराती है। मगर, खुफिया कैमरे के सामने इसको कबूल करने से बिलासपुर सांसद लखनलाल साहू मुश्किलों में घिर गए हैं। सुनते हैं कि इस चुनाव में दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस अपने उम्मीदवारों को तय सीमा 75 लाख से अधिक  राशि उपलब्ध करा रही है। भाजपा ने 70-70 लाख रूपए सभी प्रत्याशियों के खाते में जमा भी करा दिए हैं। लेकिन पार्टी में सबको मालूम है कि इससे परे दो-दो करोड़ अलग से कैश उपलब्ध कराए जाएंगे। इसी तरह कांग्रेस की भी पहली किश्त जारी हो गई है। कांग्रेस उम्मीदवारों को भी पार्टी 70-70 लाख रूपए दे रही है। मगर, व्यक्तिगत तौर पर सभी प्रत्याशियों को ज्यादा से ज्यादा राशि खर्च करने के लिए कहा गया है। कांग्रेस के सभी प्रत्याशी आर्थिक रूप से सक्षम हैं और उन्होंने टिकट मिलने से पहले ही अपनी क्षमता का ब्यौरा पार्टी के रणनीतिकारों को दिया था। इसके बाद भी एक-दो प्रत्याशी खर्च करने में कंजूसी कर रहे हैं। इस पर एक मंत्री ने राजनांदगांव लोकसभा के प्रत्याशी को फटकार भी लगाई। 

    जोगी के विधायक किधर जाएं?
    खबर है कि पूर्व सीएम अजीत जोगी ने अपने विधायकों को किसी का भी समर्थन करने की छूट दे दी है। चर्चा है कि पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक में विधायक प्रमोद शर्मा ने रायपुर लोकसभा प्रत्याशी प्रमोद दुबे को समर्थन देने की इच्छा जताई। प्रमोद शर्मा ने कहा कि कांग्रेस प्रत्याशी उनके राजनीतिक गुरू रहे हैं। ऐसे में अब पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है, तो वे कांग्रेस की मदद करना चाहते हैं। धर्मजीत सिंह बिलासपुर से कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव का समर्थन कर रहे हैं। देवव्रत सिंह पहले ही रमन सिंह से मिल आए हैं। इन सबसे परे अजीत जोगी वैसे तो बसपा गठबंधन के साथ रहने की बात कह चुके हैं। वे जांजगीर में बसपा प्रमुख सुश्री मायावती के साथ मंच भी साझा करेंगे, लेकिन खुद बसपा का खुलकर प्रचार करेंगे। इसमें कुछ लोगों को संदेह है, क्योंकि ऐसा करने से उनके कांग्रेस में आने की संभावना खत्म हो जाएगी।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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