राजपथ - जनपथ

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31-Oct-2020 8:04 PM 47

बैंक खाता खुला नहीं, ठगी शुरू

जिस रफ्तार से लोगों के पास फोन, कम्प्यूटर, इंटरनेट बढ़ रहे हैं इससे अधिक रफ्तार से साइबर ठगी और जालसाजी बढ़ रही है। अभी हफ्ते भर पहले एक नंबर से कुछ बहुत आकर्षक मोबाइल नंबरों की बिक्री का मैसेज आया। उसमें से एक नंबर खरीदने के लिए छत्तीसगढ़ से एक व्यक्ति ने फोन लगाया तो बेचने वाले ने तुरंत ही अपना बैंक खाता नंबर दे दिया कि इसमें 18 हजार रूपए जमा करा दें। उससे पूछा गया कि वह किस शहर में है, तो उसने जयपुर बतलाया। जब कहा गया कि जयपुर में ही किसी को नगद रकम देकर भेज देते हैं जो सिम ले लेगा, तो उसने अनमने ढंग से एक अधूरा पता दिया। उसके नंबर पर जब जयपुर से किसी ने फोन किया कि पता समझा दो, नगद रकम लेकर आ रहे हैं, सिम लेने के लिए, तो उसकी दिलचस्पी बिक्री में खत्म हो गई। दिक्कत यह है कि देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में खाता खोलकर ऐसी जालसाजी आसानी से की जा रही है, और बैंकों के ग्राहक शिनाख्ती के सारे इंतजाम मानो शरीफों को परेशान करने के लिए हैं, और जालसाजों को लिए दोस्ताना हैं।

रायपुर में आज सुबह इस अखबारनवीस ने एक बैंक में खाता खोला। अभी टेलीफोन पर उसकी एक औपचारिकता होना बाकी थी। खाता खोलते वक्त एक फिंगरप्रिंट डिवाइस पर अंगूठे का निशान लिया गया था, उसका ईमेल आधार कार्ड की तरफ से आ भी गया। अभी बैंक से फोन नहीं आया, लेकिन एक किसी का भेजा एसएमएस जरूर आ गया कि खाते में 92 हजार रूपए जमा है। अब 15 हजार रूपए देकर जो खाता खोला गया है, अभी तो वह रकम भी दूसरे बैंक से निकली नहीं है, नए बैंक पहुंची नहीं है, और जालसाज को खबर लग गई, उसने 92 हजार रूपए उपलब्ध होने का मैसेज भी भेज दिया। इसके नीचे कोई एक लिंक है जिसे क्लिक करने के लिए कहा गया है। अब कितने लोग होंगे जो ऐसे लिंक को क्लिक करने से अपने को रोक पाएंगे? और क्लिक करते ही जालसाजी का सिलसिला आगे बढ़ निकलेगा।

इस तरह की साइबर जालसाजी और ठगी बढ़ते ही चल रही है। और सरकार है कि लोगों के सुलभ शौचालय जाने पर भी आधार कार्ड अनिवार्य करने पर आमादा है। अंगूठे का निशान देते ही आधार का ईमेल आया, और कुछ मिनटों के भीतर जालसाज का एसएमएस भी आया। इन दोनों का कोई रिश्ता हो तो भी हैरानी नहीं होगी क्योंकि सरकार के अधिकतर कम्प्यूटरों तक हैकरों की घुसपैठ आम बात है।

इनसे दाल-सब्जी में संशोधन करवाएं...

रात-दिन सरकार के समाचार भेजने वाले लोग भी जब आए दिन अपनी भेजी खबरों में संशोधन भेजते हैं, तो उन लोगों को भारी परेशानी होती है जिन्होंने उनकी पहले की खबर पर मेहनत करके उसे सुधारकर तैयार किया है। अब यह संशोधन कायदे से तो सिर्फ इतना आना चाहिए कि कौन सा हिस्सा बदला जा रहा है। लेकिन उसे फिल्मी सस्पेंस की तरह रखकर पूरे का पूरा प्रेस नोट दुबारा भेज दिया जाता है, जिसका मतलब यह होता है कि पूरे प्रेस नोट को दुबारा सुधारा जाए।

ऐसे लोगों को घर पर दो-दो बार नमक पड़ी हुई दाल और सब्जी मिलनी चाहिए, और पहला कौर खाते वक्त जुबानी संशोधन बताया जाए कि नमक दो बार पड़ गया है, संशोधित करके एक बार का नमक हटा दें। जब ऐसे लोग इस तरह से नमक हटाने की मेहनत करेंगे, तब उन्हें समझ आएगा कि सुधारकर, संपादन करके तैयार किए गए प्रेस नोट में संशोधन कितना आसान होता है!


30-Oct-2020 7:04 PM 192

भाजपा में बदलाव की बयार

विधानसभा चुनाव में अभी तीन साल बाकी हैं, और भाजपा हाईकमान ने आरएसएस के साथ मिलकर नए लोगों को आगे करने की रणनीति बना रही है। चर्चा है कि सांसदों को अहम जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। राजनांदगांव के सांसद संतोष पाण्डेय को भारतीय खाद्य निगम की छत्तीसगढ़ इकाई के परामर्श दात्री समिति का अध्यक्ष बनाया जा चुका है। जशपुर के नेता संकेत साय को सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया है।

आरएसएस से जुड़े एक नेता का कहना है कि पिछले 15 साल में नई पीढ़ी उभरकर सामने नहीं आ पाई है। बस्तर और सरगुजा में तो सत्ता  हो या संगठन, चुनिंदा लोगों को ही महत्व मिलता रहा है। इसका प्रतिफल यह रहा कि दोनों आदिवासी संभाग में भाजपा की दुर्गति हो गई। आरएसएस का आंकलन है कि सिर्फ तीन ही विधायक अपने दम पर जीते हैं। बाकियों की नैय्या जोगी पार्टी अथवा निर्दलियों के सहारे ही पार हुई है।

 कई विधानसभा ऐसे हैं जहां बड़े नेताओं ने दूसरी पंक्ति के नेताओं को उभरने नहीं दिया। मगर अब हर विधानसभा सीट में नए और साफ छवि के लोगों को आगे लाने की कोशिश की जाएगी। बस्तर में तो धर्मांतरण के खिलाफ मुहिम के बहाने युवाओं की नई पौध तैयार करने की कोशिश भी हो रही है। संकेत है कि नवम्बर के महीने से प्रदेश भाजपा में थोड़ा बहुत बदलाव देखने को मिल भी सकता है। यह बदलाव कब और किस तरह होगा, यह देखना है।

इन बच्चों के लिए क्या करें?

स्कूलें बंद हैं, और स्कूली-उम्र के बहुत से बच्चे सुबह से कॉलोनियों की नालियों में झांकते घूमते रहते हैं, नाली के पानी-कीचड़ में जहां उन्हें मछली मिलने की उम्मीद दिखती है, सडक़ पर लेटकर वे नाली में हाथ डाल देते हैं। ऐसी टोलियों में कोई भी मास्क लगाए नहीं दिखते, और जो नाली से जरा-जरा सी मछलियां पकडऩे उसमें हाथ घुसाए हुए हैं, उनसे सेनेटाइजर की भी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। अब सवाल यह उठता है कि इन बच्चों की कोई मदद कैसे की जाए? क्या कॉलोनियों के संपन्न लोग इन्हें कोई फुटबॉल दे सकते हैं कि वे उससे खेलकर अपना वक्त गुजारें? या कार साफ करने, घर के बाहर की घास छीलने जैसा कोई काम दे सकते हैं? समाज के भीतर इस पर भी चर्चा होनी चाहिए कि इन्हें गंदगी और बीमारी के खतरे से कैसे बचाएं, और इनके समय का बेहतर इस्तेमाल कैसे करवाएं?


29-Oct-2020 6:49 PM 199

अफसर की बैटिंग, चौके-छक्के

रिटायरमेंट के ठीक पहले पड़ोस के जिले के प्रशासनिक मुखिया जिस अंदाज में बैटिंग कर रहे हैं, उससे जानकार लोग हतप्रभ हैं। कुछ इसी तरह बैटिंग पूर्व एसीएस टी राधाकृष्णन भी करते थे। इसका नतीजा यह रहा कि उन्हें अब तक पूरी पेंशन नहीं मिल पा रही है। उनके खिलाफ अभी भी एक-दो जांच चल ही रही है। मगर पड़ोसी प्रशासनिक मुखिया इतनी जल्दबाजी में हैं, कि उन्होंने सारी सीमाएं लांघ रखी हैं ।  सुनते हैं कि रिश्वत की रकम लेने से कुछ दिन पहले तो मुख्यालय छोडक़र रायपुर तक आ गए। जिस ठेकेदार से उन्हें रकम लेनी थी वह तेलीबांधा मरीन ड्राइव में उनका इंतजार कर रहा था।

अफसरने कुछ दूर अपनी गाड़ी रूकवाई और फिर स्कूटर से मरीन ड्राइव पहुुंचे। वैसे तो सैर-सपाटे के लिए मरीन ड्राइव को सबसे उपयुक्त जगह माना जाता है, लेकिन बड़े लोग यहां काम की बात करने भी आते हैं। खैर अफसर पहुंचे, तो काम के एवज में लेनदेन की चर्चा भी हुई। ठेकेदार ने उन्हें रकम तो दी, लेकिन अफसर इससे ज्यादा की उम्मीद कर रहे थे। चूंकि अफसर ने रकम ले ली, तो ठेकेदार काम को लेकर निश्चिन्त थे। मगर बाद में अफसर ने ठेकेदार की गाडिय़ां भी पकड़वा दीं। हाल यह है कि अफसर की कारगुजारियों की चर्चा न सिर्फ मंत्रालय तक पहुंची है बल्कि सेंट्रल एजेंसियों तक इसकी जानकारी भेजी गई है। देखना है कि अफसर जांच के घेरे में आ पाते हैं या नहीं।

इलाज की सहूलियत, लेकिन अनुदान

छत्तीसगढ़ सरकार में एक अफसर अपनी कड़ाई के लिए मशहूर थे। किसी का सौ रूपए का भी गलत बिल अगर सामने चले जाए तो जुबानी उसकी खाल खींच लेते थे। गालियां देने में दूसरे के परिवार के कई लोगों से रिश्ता बना लेते थे। साख ऐसी थी कि न गलत करते हैं, न गलत होने देते हैं। ठीक वैसी ही जैसी कि देश के बड़े नेता के बारे में बनी थी, न खाऊंगा, न खाने दूंगा। खाऊंगा तो पता नहीं लेकिन देश के लोगों का खाना तो बंद हो ही गया है।

अब जिस अफसर की चर्चा हो रही है उनको रिटायर होने के बाद भी अपने और परिवार के इलाज के लिए खूब सारा सरकारी इंतजाम हासिल है। इसके बावजूद पिछली सरकार के रहते उन्होंने मुख्यमंत्री से इलाज के लिए 5 लाख रूपए मंजूर करवा लिए थे। यह जानकारी सुनने वाले लोग हैरान हैं, लेकिन जानने वाले लोग सरकारी फाइलों की फोटोकॉपी लेकर चल रहे हैं।

फाईल सम्हालकर रखी है...

इलाज की बात निकली तो पिछली सरकार में एक अफसर ने अपने इलाज के लिए इतनी बड़ी रकम मंजूर करवा ली थी कि वह सरकारी नियमों से दुगुनी या उससे भी ज्यादा थी। बाद में कुछ लोगों ने समझाकर रकम आधे से कम करवाई, लेकिन जिन्होंने अपनी कलम बचाने के लिए यह रकम कम करवाई, उन्होंने बीमार अफसर को फंसाने के लिए उसकी लगाई हुई अर्जी की कॉपी भी सम्हालकर रख ली। सरकारी नौकरी और राजनीति के हिसाब चुकता करने के लिए रिटायर होने के बाद भी खासा समय बचता है। प्रदेश के एक भूतपूर्व प्रिंसिपल सेक्रेटरी पी.एस. राघवन ने अभी हाल में ही एक बुकलेटनुमा किताब लिखी है जिसमें उन्होंने कई लोगों से हिसाब चुकता किया है। अब तो सोशल मीडिया और ब्लॉग पर भी हिसाब चुकता करने और भड़ास निकालने की गुंजाइश असीमित है। देखना है कि इलाज के कागजों का कब इस्तेमाल होता है। 

चप्पल वालों के पसीने छूट रहे हवाई यात्रा से...

रायपुर से जगदलपुर के बीच हवाई सेवा शुरू हुए अभी मुश्किल से एक माह ही हुए हैं कि किराया बढ़ गया है। 21 सितम्बर को जब एलायंस एयर की सुविधा शुरू हुई तो रायपुर-जगदलपुर के बीच किराया करीब 1400 रुपये था। अब इसे बढ़ाकर 2000 रुपये कर दिया गया  है। जगदलपुर से आगे हैदराबाद तक इसी फ्लाइट पर जाना हो तो अब 2700 रुपये अतिरिक्त देने होंगे, जबकि हवाई सेवा शुरू हुई तो किराया 1900 रुपये था। जगदलपुर राजधानी से काफी दूर है। कई राज्यों की सीमायें इसके मुकाबले पास है। बस और ट्रेन का सफर पूरा दिन या पूरी रात ले लेता है। कोरोना के चलते इन दिनों ट्रेन बस यातायात सामान्य भी नहीं हुआ है। इसके चलते फ्लाइट्स में पैसेंजर ठीक-ठाक संख्या में मिल रहे हैं। किराये में एकाएक बढ़ोतरी के बावजूद मजबूरी है कि जो खर्च कर सकते हैं, वे हवाई सुविधा का ही इस्तेमाल करें। मगर किराया इसी तरह, इतनी जल्दी आगे भी बढ़ता रहा तो?  उड्डयन मंत्रालय ने उड़ान सेवा ‘उड़े देश का आम नागरिक’ स्लोगन को लेकर ही तय किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि यह स्कीम हवाई चप्पल पहनने वाले लोग भी हवाई सफर करायेगी, पर महंगा होता किराया तो सिर्फ सूट-बूट वाले ही बर्दाश्त कर पायेंगे।

महानगर दर्जे के अपराध..

पता नहीं क्यों, अब छत्तीसगढ़ से जिस तरह से ख़बरें आ रही हैं उनके चलते महानगरों वाली फीलिंग होने लगी है। राजधानी के एक क्लब में लॉकडाउन के दौरान मयखाना खुलना, धनी लोगों का जमावड़ा और फिर गोलियों का चलना। इसके बाद लगातार एक के बाद ड्रग्स, चरस, कोकीन, अफीम के रैकेट में राजधानी के अमीर लडक़ों और कुछ युवतियों का भी नाम आना और मुम्बई, दिल्ली से उनका तार जुड़ा होना। इस समय आईपीएल क्रिकेट का मौसम है। हर रोज दो चार केस हाईटेक सट्टे का पकड़ लिया जा रहा है। दस बीस हजार का खेल नहीं इनमें लाखों रुपयों के दांव लग रहे हैं। खाईवाल, कारों में, होटलों में और देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठकर गेम खेल रहे हैं, खिला रहे हैं। इनके भी तार देश के बड़े शहरों से जुड़े हुए हैं।

अब रोड रेज़ का मामला रह गया था। गरियाबंद में कांग्रेस नेता के बेटे ने जिस तरह ग्रामीणों को एसयूवी से रौंदा और उसमें चार साल के बालक की मौत हुई, कई लोग घायल हुए- उससे यह कसर भी पूरी हो गई। देश-विदेश में रहने वालों को शिकायत है कि लोगों को जब बताते हैं वे छत्तीसगढ़ में रहते हैं, तो पूछा जाता है ये जगह कहां है? मुमकिन है आगे ऐसे सवालों का पूछा जाना बंद हो जायेगा।

मजदूरों के बचाव के विधेयक में देर

विशेष सत्र में केंद्र सरकार के नए कृषि और श्रम कानून के प्रभाव को सीमित करने के लिए सरकार 4 संशोधन विधेयक लाने वाली थी, लेकिन लंबी चर्चा के बाद सिर्फ एक मंडी संशोधन विधेयक को लाने पर सहमति बनी। सीएम भूपेश बघेल ने कहा था कि श्रम कानून में संशोधन के चलते सरकार श्रमिकों-कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए अपना कानून बनाएगी। केंद्र के नए कानून के मुताबिक सौ कर्मचारी संख्या वाले कारखानेदार छंटनी कर सकेंगे। पहले तीन सौ कर्मचारी वाले कारखानों में ही छंटनी की अनुमति थी। सरकार ने कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखकर संशोधन विधेयक लाने की तैयारी भी कर ली थी, लेकिन बाद में पता चला कि नए श्रम कानून का अभी नोटिफिकेशन भी नहीं हुआ है। इसके बाद अब बाकी विधेयकों को लाने का विचार त्याग दिया गया। बाकी तीन विधेयक अब शीतकालीन सत्र में पेश किए जाएंगे।


28-Oct-2020 6:45 PM 269

सरोज पांडेय की बारी आएगी?

चर्चा है कि बिहार चुनाव के बाद केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल हो सकता है। इसमें छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य सरोज पाण्डेय का नंबर लग सकता है। वैसे अभी छत्तीसगढ़ से रेणुका सिंह अकेली मंत्री हैं । वे भी यहां कोई प्रभाव छोडऩे में सफल नहीं रही हैं। ऐसे में सरोज को भी मंत्रिमंडल में जगह मिल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सरोज, अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय महामंत्री के पद पर थीं। मगर टीम नड्डा में उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य तक नहीं बनाया गया।

ऐसे में पार्टी के भीतर रमन सिंह की ताकत बढऩे और सरोज की हैसियत कम होने के भी कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि सरोज को करीब से जानने वाले लोग इससे इंकार कर रहे हैं। हल्ला है कि पिछले दिनों सरोज के लिए तगड़ी लॉबिंग भी हुई है। इसके बाद से उन्हें मंत्री बनाने की अटकलें लगाई जा रही है। वैसे भी कुछ लोगों का कहना है कि पार्टी हाईकमान रमन सिंह को अकेले फ्री हैंड देने के पक्ष में नहीं है। इसलिए सरोज को अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। देखना है कि आगे-आगे होता है क्या।

भाजपा बूथ प्रबंधन अमित देख रहे हैं ?

जोगी परिवार मरवाही के चुनाव मैदान से भले ही बाहर है, लेकिन अमित जोगी, परिवार का दबदबा बरकरार रखने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। रेणु जोगी और अमित मरवाही में ही डटे हैं। रेणु जोगी न्याय यात्रा निकालने की अनुमति मांगी थी, मगर आयोग ने अनुमति देने से मना कर दिया। अमित जोगी खुले तौर पर कांग्रेस का विरोध कर रहे हैं, इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलने की उम्मीद है।

कांग्रेस के खेमे से खबर छनकर आई है, उसके मुताबिक अमित जोगी भाजपा प्रत्याशी का चुनाव संचालन कर रहे हैं। भाजपा का बूथ प्रबंधन खुद अमित देख रहे हैं। चुनाव प्रबंधन और खर्च भी कुछ हद तक अमित की राय के अनुसार हो रहा है। अमित के चुनाव प्रबंधन की कुशलता किसी से छिपी नहीं है। पिछले चुनाव में अजीत जोगी को 70 हजार वोट मिले थे।

अगर अमित अपनी पार्टी के आधे वोटों को भी भाजपा के पक्ष में मोडऩे में कामयाब होते हैं, तो चुनाव नतीजे बदल सकते हैं। हालांकि कांग्रेस के लोगों का मानना है कि ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि लोगों ने अजीत जोगी को देखकर ही वोट दिया था। अमित के कहने पर वोट ट्रांसफर नहीं होंगे। मगर अमित की सक्रियता ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है।

आपदा में अवसर...

कोरोना के खतरे के चलते आपदा में एक अवसर भी है। छोटे बच्चों को अभी से सावधानी सिखाने का एक बड़ा मौका आया है। उन्हें लेकर कहीं बाहर जाना हो, तो उन्हें मास्क पहनाकर ले जाएं, घर पर बार-बार हाथ धोना हो तो उनके सामने हाथ धोएं, और उसकी चर्चा भी करें। खुद ऑक्सीमीटर से अपनी जांच कर रहे हों तो बच्चों को भी सिखाएं क्योंकि इसमें कोई खतरा नहीं है। ऐसे ही एक बच्चे ने बाहर जाते हुए जब उसे मास्क पहनाया गया, तो उसने अपने खिलौने के भालू को भी मास्क पहना दिया।

आज की जवान, अधेड़, और बूढ़ी पीढ़ी को अगर अपने-अपने बचपन से ऐसी सावधानियां सिखाई गई होतीं, तो आज भारत में संक्रमण इतना नहीं फैला होता। हिन्दुस्तानी मिजाज से लापरवाह हैं, गंदगीपसंद हैं, और इस वजह से कोरोना अधिक फैला, यह एक अलग बात है कि लोग कोरोना से जल्दी उबर भी गए क्योंकि हिन्दुस्तानियों को बीसीजी जैसे टीके लगते आए हैं, और यहां के लोगों की प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा है।

मोहल्लों में गूंजतीं नई-नई आवाजें!

लॉकडाऊन के बाद कारोबार बंद हुआ, तो सबसे छोटे लोग सबसे बुरी तरह बेरोजगार हुए। उनका काम तो वैसे भी रोज की मजदूरी या रोज की कमाई का रहता था, और वे बड़े दुकानदारों की तरह कुछ महीने जिंदा रहने की ताकत नहीं रखते थे। नतीजा यह हुआ कि फल-सब्जी से लेकर झाड़ू और वाइपर जैसे सामान लेकर लोग कॉलोनियों में सुबह 7 बजे के भी पहले से निकल पड़ते हैं। उनमें से अधिकतर ऐसे हैं जिनकी आवाज पहले कभी इन सडक़ों पर गूंजी नहीं थी। लेकिन पापी पेट का सवाल है तो हर मुंह जोर-जोर से आवाज लगाने लगा है। बहुत से ऐसे छोकरे ठेलों पर सामान लिए घूमते हैं जिस उम्र के लडक़े पहले कभी काम करते नहीं दिखते थे। कुछ छोटे बच्चे भी हैं जो अपने मां-बाप के साथ, या किसी और के साथ ठेले या ऑटोरिक्शा पर सामान लिए चलते हैं, और जाहिर है कि घूम-घूमकर बेचने के काम में कुछ पैसा उनको भी बचता होगा, या उनके घर के काम में कुछ मदद मिलती होगी।

कुछ बहुत बुजुर्ग आदमी-औरत भी सामानों की फेरी लिए भटकते हैं, और सोशल मीडिया पर कई लोग यह लिखने लगे हैं कि बड़े सब्जीवालों के मुकाबले इन लोगों से खरीदना चाहिए, और मोलभाव भी नहीं करना चाहिए।


27-Oct-2020 8:40 PM 120

कॉलेज तो खुलेंगे, आयेंगे बच्चे ?

कोरोना के नये मामलों में आई गिरावट स्थायी है या नहीं, यह साफ तौर पर कोई नहीं बता पा  रहा। स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि इसकी दूसरी लहर ठंड के मौसम में आ सकती है। दूसरी तरफ धीरे-धीरे स्थिति सामान्य करने की कोशिश भी चल रही है। शिक्षा को कोरोना महामारी के कारण बड़ा नुकसान हुआ। अब हाईस्कूल से लेकर कॉलेजों में भी कक्षायें शुरू करने की कोशिश की जा रही है। एक नवंबर से स्कूल कॉलेज खोलने का आदेश सरकार की तरफ से जारी किया गया है लेकिन पालकों, छात्र-छात्राओं की ओर से उत्साह नहीं दिखाया जा रहा है। कॉलेजों में तो प्रवेश की अंतिम तिथि तीसरी, चौथी बार बढ़ाई गई लेकिन सीटें पूरी नहीं भर पा रही हैं। प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे निजी कॉलेज भी हैं जिन्हें यूजीसी से किसी तरह का अनुदान नहीं मिलता और वे विद्यार्थियों की फीस पर ही निर्भर हैं। कोरबा, अम्बिकापुर, बिलासपुर में कई निजी कॉलेज हैं जिनमें एडमिशन 25 फीसदी भी नहीं हो पाई। खर्च नहीं निकल पाने के कारण वहां काम करने वाले स्टाफ को वेतन का संकट बना हुआ है। कक्षायें शुरू होने की घोषणा के बाद भी एडमिशन लेने की कोई हड़बड़ी छात्रों ने नहीं दिखाई। इसके चलते कई में तालाबंदी की स्थिति भी बन रही है। सामान्य दिनों में जनवरी माह तक कोर्स पूरा होने के बाद परीक्षा की तैयारियों का अवकाश शुरू हो जाता है। मौजूदा परिस्थिति यही बताती है कि छात्र-छात्राओं का एक साल यानि दो सेमेस्टर कोरोना की भेंट चढ़ रहा है।

मेरा साया साथ होगा

मरवाही में जोगी परिवार से कोई चुनाव नहीं लड़ पाया। जोगी की चुनाव में प्रासंगिकता बनाये रखने के लिये छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस द्वारा न्याय यात्रा निकाली जा रही थी। कोटा विधायक ने जन समस्या निवारण और कोरोना पर जागरूकता लाने के नाम पर जीपीएम प्रशासन व रिटर्निंग ऑफिसर से अनुमति मांगी थी जो नहीं मिली। अब अमित जोगी और डॉ. रेणु जोगी की मरवाही में सभायें नहीं हो सकेगी। इसके बावजूद चुनाव में जोगी की अप्रत्यक्ष मौजूदगी कायम है। चुनावी सभाओं में जोगी का प्रसंग उठाना न तो भाजपा के नेता भूल रहे न ही कांग्रेस के। भाजपा के कई बड़े आदिवासी नेता अमित जोगी के जाति प्रमाण पत्र को निरस्त करने का स्वागत कर चुके हैं, पर भाजपा के प्रचार में जुटे अनेक भाजपा नेता जोगी कांग्रेस और उनके समर्थकों के प्रति हमदर्दी दिखा रहे हैं। वे भाषणों में कह रहे हैं, अमित के साथ अन्याय हुआ ऐसा नहीं होना चाहिये था। यह अलग बात है कि जब तक अजीत जोगी थे उन पर सवाल उठाकर ही लगातार कई चुनावों में भाजपा ने बढ़त हासिल की। इधर कांग्रेस नेता अपने भाषणों में जोगी को नकली बता रहे हैं। इसे लेकर डॉ. रेणु जोगी ने आपत्ति की और चुनाव आयोग के पास शिकायत भी दर्ज कराई है। मतलब, अमित, डॉ. रेणु जोगी को न्याय यात्रा निकालने, जन सम्पर्क करने का मौका मिले न मिले जोगी मरवाही चुनाव के केन्द्र में बने हुए हैं।


26-Oct-2020 5:18 PM 209

सत्ता के दिन गए तो...

चेंबर चुनाव की तिथि अभी घोषित नहीं हुई है, लेकिन इसकी हलचल शुरू हो गई है। बड़े व्यापारी नेता अपने एसोसिएशन में पकड़ बनाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं, ताकि चुनाव में अहम भूमिका निभा सके। ऐसे ही राईस मिल एसोसिएशन में अपना दबदबा कायम रखने की कोशिश पर योगेश अग्रवाल को काफी कुछ सुनना पड़ गया।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा सर्कार रहते हुए योगेश की राईस मिल एसोसिएशन में तूती बोलती थी। भाई के मंत्री पद का रूतबा भी था। मगर जैसे ही भाजपा सरकार बदली, राईस मिल एसोसिएशन में रामगोपाल अग्रवाल समर्थक हावी हो गए। इस पर योगेश ने राईस मिल एसोसिएशन के समानांतर अरवा चावल मिल एसोसिएशन का गठन कर दिया और वे खुद अध्यक्ष बन बैठे।

राइस मिल का कारोबार एफसीआई और नागरिक आपूर्ति निगम से जुड़ा हुआ है। रामगोपाल अग्रवाल, निगम के चेयरमैन हैं। ऐसे में अलग एसोसिएशन भले बना लें, लेकिन कारोबार की अच्छी सेहत के लिए रामगोपाल का आशीर्वाद जरूरी है। सुनते हैं कि पिछले दिनों योगेश उनका आशीर्वाद लेने भी गए, लेकिन रामगोपाल ने आशीर्वाद देना तो दूर, योगेश को बुरी तरह फटकार लगा दी। रामगोपाल ने योगेश को इतनी जोर से डांटा कि इसकी गूंज बाहर तक सुनाई दी, और बात धीरे-धीरे एसोसिएशन के बाकी सदस्यों तक पहुंच गई। रामगोपाल नाराज हैं, तो एसोसिएशन के सदस्य योगेश के साथ जुड़े रहेंगे, यह सोचना भी गलत हैं। कुल मिलाकर राईस मिल एसोसिएशन में वर्चस्व बनाने की कोशिश करना योगेश के लिए भारी पड़ गया। इसीलिये बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि अपने अच्छे दिनों में ताकत का इस्तेमाल सम्हलकर करना चाहिए, लेकिन पंद्रह बरसों की लगातार सत्ता अच्छे-अच्छे लोगों को बददिमाग कर देती है। 

हाथियों से अलर्ट करते वाट्सएप ग्रुप

गजराज मीडिया, हाथी मित्र दल, वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट, हाथी मेरे साथी, हाथी विचरण। ये कुछ वाट्सअप ग्रुप हैं जो सरगुजा संभाग के सूरजपुर, बलरामपुर जिलों में चल रहे हैं। इन वाट्सअप समूहों को युवाओं ने खुद की प्रेरणा से बनाया है। इनसे सैकड़ों लोग आपस में जुड़ गये हैं। वे ग्रुप में सूचना डालते रहते हैं कि हाथी उनके इलाके में कहां भ्रमण कर रहा है, किस ओर से आया और किस तरफ आगे बढ़ गया है। अब लोगों को किसी रास्ते पर निकलने से पहले पता चल जाता है कि उनका हाथी से सामना तो नहीं होने वाला।

ये ग्रुप वन विभाग के लिये भी काफी मददगार साबित हो रहे हैं। फील्ड पर काम कर रहे अनेक गार्ड्स, अधिकारी, कर्मचारी आदि इससे जुड़ गये हैं जिन्हें हाथियों की मूवमेंट पर वाट्सएप ग्रुपों से मिली सूचना से मदद लेकर ग्रामीणों और फसल की समय पर सुरक्षा करने में मदद मिल रही है। अब तक कुछ हाथियों में रेडियो कॉलर लगाकर, रेडियो के जरिये सूचना देकर लोगों को सतर्क करने का तरीका अपनाया जाता है पर यह नया प्रयोग ज्यादा कारगर साबित हो रहा है।

कुछ दिन पहले कोरबा से खबर आई थी कि युवाओं ने वाट्सएप ग्रुप बना रखे हैं जिससे वे कोरोना के कारण स्कूल नहीं जा पाने वाले, अपने आसपास रहने वालों बच्चों को पढ़ा रहे हैं। ऐसे प्रयोग और भी हो रहे होंगे, छत्तीसगढ़ ही नहीं दूसरे राज्यों में भी हो रहे होंगे। स्मार्टफोन का ऐसा स्मार्ट इस्तेमाल कई समस्याओं को सुलझाने में मदद कर सकता है।

दशहरे में नीलकंठ दिखा क्या?

वाट्स अप का सबसे ज्यादा इस्तेमाल गुड मार्निंग, गुडनाइट और पर्वों पर शुभकामना संदेश भेजने में होता है। नवरात्रि के पहले दिन से चला आ रहा यह दौर आज दशहरे पर खत्म हुआ है, कुछ दिन रुककर फिर शुरू हो जायेगा क्योंकि दीपावली भी आगे है। दशहरे के कई शुभकामना संदेशों में खूबसूरत नीलकंठ की तस्वीरें भी हैं।

हम जिन पक्षियों को तेजी से विलुप्त होते देख रहे हैं उनमें गिद्ध और कौवों की तरह नीलकंठ को भी शामिल कर लेना चाहिये। कुछ वर्षों तक रावण दहन देखने के लिये निकलने से पहले नीलकंठ के दर्शन हो जाते थे। इसके बिना दशहरा अधूरा भी माना जाता था। हम इसे स्थानीय बोली में टेहर्रा चिरई कहते हैं। छत्तीसगढ़ धान की फसल लेने वाला इलाका है पर यहां भी नीलकंठ के दर्शन दुर्लभ हो गये हैं। धान की बालियां चुगना और फसलों में मौजूद कीड़ों को खाना नीलकंठ को प्रिय है।

विशेषज्ञों का कहना है कि नीलकंठ का यही प्रिय आहार उनके विलुप्त होने की वजह बनता जा रहा है। वे भोजन के साथ फसलों में डाले गये कीटनाशक और उससे मरने वाले कीड़ों को निगल रहे हैं जिससे उनकी संख्या घट रही है। 40 फीसदी वनों से आच्छादित होने के बावजूद छत्तीसगढ़ में वन्य प्राणियों, पक्षियों को विलुप्त होने से बचाना हमारी प्राथमिकता में नहीं है। बेमेतरा के गिधवा बांध में पक्षी विहार बनाने की योजना आज से सात-आठ साल पहले बनाई गई थी, पर आज उसे सब भूल चुके हैं। 

छत्तीसगढ़ में स्थानीय पक्षी तो हैं पक्षी विशेषज्ञ बताते हैं कि लगभग 140 तरह के प्रवासी पक्षी भी आते हैं। इसके कई पहचाने हुए डेरे हैं पर वहां पर्यटकों से ज्यादा शिकारी पहुंचते हैं। शिकारियों के डर से कई ठिकानों पर प्रवासी पक्षियों ने डेरा डालना बंद भी कर दिया है। राम गमन मार्ग पर तेजी से काम कर रही सरकार को उस काल के प्रिय पात्र नीलकंठ और विलप्त होते दूसरे पक्षियों को बचाने के लिये कुछ करना चाहिये।

मरवाही में माहौल भक्तिभाव का...

चुनाव प्रचार के दौरान प्रत्याशी और प्रचार में जुटे नेता कार्यकर्ता विनम्र हो जाते हैं। स्वर में कोमलता आ जाती है, हाथ जुड़े हुए रहते हैं। बुजुर्गों का चरण स्पर्श करते हैं। सब माताएं, बहनें और चाचा, काका, मामा दिखाई देते हैं। अद्भुत दृश्य होता है। मतदाताओं में ईश्वर दिखाई पड़ता है। आम वोटर सोचता है कि काश ऐसा पूरे पांच साल होता। लोकतंत्र में दरअसल नेता सेवक होता है और जनता उसकी मालिक। पर चुनाव खत्म होते ही ऊंट करवट बदल लेता है। इन दिनों मरवाही में चल रहे उप-चुनाव के दौरान मतदाताओं के प्रति तो भक्तिभाव दिख ही रहा है मंदिरों और धार्मिक समारोहों में नेताओं की उपस्थिति दर्ज हो रही है। प्रभारी मंत्री जयसिंह अग्रवाल ने दुर्गोत्सव के दौरान दुर्गा पूजा पंडाल में ही माइक संभाल ली और कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में वोट मांगे।

मरवाही इलाके के कुछ इलाकों में दो बार गणेश उत्सव मनाया जाता है। इस समय भी कुछ स्थानों पर गणेश प्रतिमायें स्थापित की गई हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु देव साय वहां पहुंच गये। गणेश जी के पंडाल पर उन्होंने चुनावी सभा ले ली। गुंडरदेही के विधायक कुंवर सिंह निषाद ने एक जवारा यात्रा के दौरान खप्पर लेकर नृत्य किया। वैसे निषाद नृत्य करना पसंद करते हैं। उनकी पहले भी इस पर वीडियो वायरल हो चुकी है।

आम तौर पर मतदाता धार्मिक स्वभाव का होता है। नेता जब उनके आराध्य की पूजा करते  हैं तो एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ जाते हैं। इससे उनके वोट हासिल करने में मदद मिलती है। यह बात अलग है कि चुनाव अभियान के दौरान प्रचार के लिये धार्मिक स्थलों का इस्तेमाल करना विधि के विरुद्ध है पर शिकायत कौन करे, सब इस गंगा में नहा रहे हैं।  


24-Oct-2020 6:21 PM 179

नेक काम की शुरुआत पुलिस खुद से करे..

इन दिनों पुलिस महकमा ही नहीं विभिन्न जिलों के कलेक्टर, विधि विभाग, सब मिलकर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों को लेकर गंभीरता दिखा रहे हैं। यौन प्रताडऩा, शारीरिक हिंसा, एसिड अटैक आदि की शिकार महिलाओं को मुआवजा देने की  दो साल से रुकी फाइलें आगे बढ़ रही हैं। अब हर जिले में सूची बन रही है, कुछ जिलों में तैयार भी हो गई है और जल्द मुआवजा बांटने का सिलसिला भी शुरू हो जायेगा। चीफ सेक्रेटरी ने बीते दिनों कलेक्टरों की बैठक लेकर ऐसे मामलों में फुर्ती लाने कहा था, अब डीजीपी ने भी जिले के कप्तानों को सचेत किया है।

शुक्रवार को हुई इस बैठक में पहली बार दंड और ईनाम के नियम बनाये गये हैं। अब गूगल स्प्रेड शीट पर हर दिन जानकारी अपडेट करनी होगी। पुलिस मुख्यालय में मॉनिटरिंग के लिये महिला सेल का गठन होगा। एफआईआर दर्ज होने के 15 दिन में गिरफ्तारी नहीं हुई तो जिले को यलो अलर्ट में, गिरफ्तारी के 15 दिन में चालान पेश नहीं होगा तो रेड अलर्ट में, गिरफ्तारी के 60 दिन में चालान पेश नहीं होने पर उस जिले की पुलिस को ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जायेगा।

जाहिर है, ब्लैक लिस्ट में आने पर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। दूसरी तरफ तेजी से परिणाम देने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत भी किया जायेगा।

छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताडऩा और घरेलू हिंसा के बहुत मामले आते हैं, पेंडिंग की सूची बड़ी लम्बी है। एक पर राज्य ने, दूसरे पर केन्द्र ने कानून बना रखा है, जो प्रदेश में लागू है। एक महिला हेल्प डेस्क हर थाने में बनाने और वहां महिलाओं को प्रभार देने की बात निर्भया कांड के बाद हुई थी। अधिकांश डेस्क काम नहीं कर रहे। हेल्पलाइन नंबर वैसे तो 1091 और 1090 पूरे देश के लिये है, 181 में भी फोन किया जा सकता है पर ज्यादातर महिलाओं, विशेषकर घरेलू महिलाओं को इसके बारे में पता नहीं होता।

प्रदेश के कई जिलों में पुलिस विभाग के ही कई अधिकारी, कर्मचारियों पर ही महिलाओं के विरुद्ध अपराध के अनेक मामलों की जांच और कार्रवाई रुकी हुई है। क्या ही अच्छा हो कि पुलिस विभाग लगे हाथों ऐसे मामलों की भी समीक्षा कर ले। किसी भी नेक काम की शुरूआत खुद से करना ठीक रहेगा, पुलिस पर भरोसा बढ़ेगा।

बोधघाट के विरोध पर नक्सल दृष्टि

राज्य सरकार के बड़े फैसलों में 40 साल से रुकी बोधघाट परियोजना को मंजूरी देना भी एक है। अरविन्द नेताम सहित बस्तर के अनेक नेता इस परियोजना के विरोध में हैं। परियोजना का विरोध करने वालों का तर्क है कि इससे बस्तर को लाभ नहीं, परिवार जरूर उजड़ जायेंगे। जब परियोजना की कल्पना की गई तो बिजली उत्पादन ही उद्देश्य था, जिसकी अब जरूरत नहीं रह गई हैं। अभी भी चित्रकोट, बीजापुर, बारसूर में अनेक स्थानीय नेता इस परियोजना के विरोध में एकजुट हो रहे हैं। बताया जाता है कि इसमें कांग्रेस-भाजपा दोनों ही दलों के लोग शामिल हैं।

पिछले दिनों मारडूम थाना में भाजपा नेता व पूर्व विधायक लच्छूराम कश्यप और राजाराम तोड़ेम के खिलाफ पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। इन पर आरोप है कि उन्होंने कोविड-19 महामारी पर लगाई गई पाबंदी के खिलाफ जाते हुए बैठक रखी। यहां तक तो ठीक है पर कुछ ऐसी रिपोर्ट्स भी आ रही हैं कि ग्रामीणों में इस परियोजना के लेकर मौजूद शक को भुनाने के लिये नक्सली भी उनके करीब आ रहे हैं और ग्रामीणों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। यह मौका उन्हें क्यों मिल रहा है? किसी योजना का गुण-दोष के आधार पर समर्थन या विरोध तो किया जा सकता है।

अभी दो ही दिन हुए हैं जब मुख्यमंत्री ने बस्तर के पंचायत प्रतिनिधियों की मांग पर नई औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी देने की घोषणा की है। हर परियोजना के साथ समर्थन और विरोध की आवाजें लाजिमी है, उठेंगीं। ऐसी स्थिति में यह जरूरी प्रतीत होता है कि बस्तर के सरकारी नुमाइंदे, स्थानीय प्रशासन, जल संसाधन विभाग और सम्बन्धित विभागों के अधिकारी इन योजनाओं से जुड़ी शंकाओं का वे ग्रामीणों के बीच खुद जाकर निराकरण करें। सरकारी मशीनरी के कामकाम में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे। विरोध को नजरअंदाज करना, प्रशासन की दांडिक शक्ति पर भरोसा रखना गलत नजरिया हो सकता है। इससे बस्तर में शांति स्थापित करने की कोशिशों को धक्का लगता रहेगा।  


23-Oct-2020 7:24 PM 78

कोरोना की दहशत का दोहन

कोरोना महामारी के प्रकोप से जो बचे हुए हैं उनके मन में दहशत बनी हुई है कि कभी उन पर भी वायरस का हमला हो गया तो क्या होगा?  कोरोना आने के साथ-साथ बाजार में इस डर को भुनाने का खेल शुरू हो गया था। विशेषज्ञों ने बताया कि नियमित व्यायाम के साथ शरीर का इम्यून सिस्टम दुरुस्त होना चाहिये, कुछ ही दिनों के भीतर इम्युनिटी बढ़ाने का दावा करने वाली दर्जनों दवाईयां बाजार में आ गई। अख़बारों, टीवी चैनलों पर इनके विज्ञापन पटे रहते हैं। जब बाबा रामदेव के इस दावे को आईसीएमआर से खारिज किया कि कोरोनिल दवा कोरोना को ठीक करती है तब बाकी कम्पनियां सावधान हो गईं और वे कोरोना ठीक करने का दावा सीधे-सीधे नहीं करते पर लेना जरूरी बताती हैं। कोरोनिल का कोरोना की दवा के रूप में बेचना मना है, मालूम है लोगों को कि यह कोरोना की दवा नहीं है पर डर ऐसा कि बाजार में इसकी जबरदस्त मांग है। ये सब मार्केटिंग रणनीति है जिसे अब चुनाव में भी अपनाया जा रहा है। वैसे भी पिछले कुछ चुनावों में मार्केटिंग गुरुओं की भूमिका बढ़ी है। बिहार में कोरोना की वैक्सीन मुफ्त देने का वादा चुनावी घोषणा पत्र में हुआ। उसके बाद मध्यप्रदेश में भी हुआ। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने भी मुफ्त वैक्सीन की घोषणा कर दी। अब तक होता यही रहा है कि महामारी व संक्रामक बीमारियों पर नियंत्रण के लिये दवायें या तो मुफ्त मिलती रही हैं या मामूली शुल्क पर। ऐसे में कोरोना वैक्सीन का मुफ्त देना किसी भी सरकार के लिये बोझ नहीं हो सकता। इसे चुनाव घोषणा पत्र में शामिल कर एक डर से बचाने का सौदा किया जा रहा है। अब आयें मरवाही पर, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की दशा बेहद दयनीय है। गंभीर मरीजों को बिलासपुर रेफर करना पड़ता है। कई बिलासपुर नहीं ला पाते। जो रवाना होते हैं वे सब के सब जिंदा नहीं पहुंचते। पर इस बार वहां दो सफल डॉक्टरों के बीच मुकाबला है। कोरोना वैक्सीन न सही, क्षेत्र के मतदाताओं को दोनों डॉक्टरों से इतना आश्वासन जरूर ले लेना चाहिये कि उन्हें मरवाही और अपने जिले में एक बेहतरीन अस्पताल, विशेषज्ञों की टीम के साथ मिलेगा। जीते कोई भी, इस आदिवासी बाहुल्य इलाके का भला हो।  

ट्रंप के भक्त

राष्ट्रपति का चुनाव अमरीका में हो रहा है, लेकिन बहुत से हिन्दुस्तानी ट्रंप समर्थक दिखाई पड़ रहे हैं। लोगों को याद होगा कि पिछले बरसों में कई हिन्दूवादी संगठनों ने ट्रंप की फोटो लगाकर हवन और यज्ञ किए थे। ट्रंप के कल्याण के लिए पूजा की थी। अभी पिछले पखवाड़े ही एक खबर आई कि ट्रंप के एक प्रशंसक ने भारत में उनका एक मंदिर बना रखा था, जहां वह रोज पूजा करता था। उसकी तस्वीर भी आई थी जिसमें वह ट्रंप की प्रतिमा का गाल चूम रहा है। ट्रंप को जब कोरोना की वजह से अस्पताल में भर्ती किया गया तो इस आदमी ने ट्रंप के ठीक होने की मनौती मानकर उपवास शुरू कर दिया। और उपवास में वह मर गया।

ट्रंप के कुछ समर्थक तो इस किस्म के हैं, और कुछ दूसरे समर्थक वे हैं जो मास्क से ट्रंप के परहेज को धार्मिक भावना के मानते हैं। चूंकि ट्रंप भगवान मास्क नहीं लगाते, इसलिए हिन्दुस्तान में भी करोड़ों लोग बिना मास्क घूमते हैं। लोगों ने कोरोना से डरना छोड़ दिया है। हिन्दुस्तान में मरीजों की गिनती थोड़ी सी घटी है, तो लोग बेफिक्र हो गए हैं। यह बेफिक्री उन्हें ट्रंप का मंदिर बनवाने वाले के पास ले जा सकती है। फिलहाल उनकी जिंदगी में इस खतरे के अलावा एक नुकसान यह भी है कि ट्रंप का भक्त होने के बावजूद उनके पास ट्रंप को वोट देने का अधिकार नहीं है।

चुनाव और प्याज के भाव

लोगों ने एक लोकसभा चुनाव वह भी देखा है जब अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ‘शाइनिंग इंडिया’ के नाम पर अनेक उपलब्धियां गिनाती रह गई और प्याज की कीमतों ने उनकी सरकार दुबारा नहीं बनने दी। इस समय चुनाव भी हो रहे हैं और प्याज की कीमतें भी हर दिन बढ़ती जा रही हैं। पर है ये विधानसभा का चुनाव जबकि कीमतों का बढऩा, रोकना केन्द्र सरकार के बूते की बात है। नये कृषि कानून ने स्टॉक लिमिट पर रोक हटा दी है। अब व्यापारी जितना चाहे माल रोककर रख लें। माल जितना जाम रख पायेंगे कीमत उतनी ही वसूल सकेंगे। छत्तीसगढ़ में इस समय प्याज 70 रुपये किलो बिक रहा है। बाजार के जानकार कहते हैं कि महाराष्ट्र में बेमौसम बारिश के कारण प्याज की फसल बर्बाद हुई है जिसके चलते इसके दाम 100 रुपये तक पहुंच सकते हैं। आलू भी कमजोर नहीं, 50 रुपये किलो बिक रहा है। बताया जा रहा है त्यौहारों के कारण आलू की खपत ज्यादा है, आवक कम है। वैसे हर बार महंगाई बढऩे पर इसी तरह की ख़बरें आती हैं कि फसल कमजोर है, सप्लाई कम हो रही है। छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों को निर्देश तो है कि मांग और खपत पर निगरानी रखें। व्यापारियों को अपना स्टाक प्रदर्शित करने के लिये भी कहा गया है लेकिन अब नये कानून के कारण वह जब्ती-सख्ती नहीं रह गई। महंगे आलू और प्याज को आने वाले कई-कई दिनों तक बर्दाश्त करने के लिये तैयार रहिये। कोई लोकसभा चुनाव निकट भविष्य में नहीं है। 

 


22-Oct-2020 7:10 PM 211

भाजयुमो से आगे बढऩे का रास्ता

भाजयुमो के अध्यक्ष अमित साहू ने खूब तामझाम के साथ पदभार ग्रहण किया। वे पगड़ी पहनकर आए थे। एकात्म परिसर में पदभार ग्रहण कार्यक्रम के दौरान बृजमोहन अग्रवाल ने कार्यकर्ताओं को संघर्ष करने की सीख दी। उन्हें बताया कि वे युवा मोर्चा के दिनों में किस तरह संघर्ष करते हुए आगे बढ़े हैं।

पुरानी घटनाओं को याद करते हुए बृजमोहन अग्रवाल ने बताया कि अर्जुन सिंह के सीएम रहते जनहित के मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन करते हुए उन पर काला झंडा फेंक दिया था। इस पर पुलिस और कांग्रेस के नेताओं ने उनकी जमकर पिटाई की थी। फिर भी वे पीछे नहीं हटे। इसका प्रतिफल यह रहा कि वे विधायक और मंत्री बने।

बृजमोहन की तरह मोहम्मद अकबर को वीपी सिंह की रैली का विरोध करने पर जनता दल के कार्यकर्ताओं की मार झेलनी पड़ी थी। उस समय कांग्रेस के खिलाफ माहौल था। अकबर को अविभाजित मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस के महासचिव का पद दिया गया। वे फिर विधायक बने और वर्तमान में मंत्री हैं। ये तो पुराने छात्र नेताओं की बात है। नए नवेले नेता तो पद पाते ही साधन-संसाधन के जुगाड़ में लग जाते हैं, और जल्द बदनाम भी होते हैं।

पिछली सरकार में भाजयुमो के एक नेता तो पद मिलने के बाद ट्रांसफर पोस्टिंग के जुगाड़ में लग गए थे। एक सिंचाई अफसर की पदस्थापना के एवज में काफी कुछ बटोर भी लिया था। इसकी काफी दिनों तक चर्चा होती रही। अब सरकार तो है नहीं, अमित साहू कैसा काम करते हैं यह देखना है।

पर्यावरण बचाने ऐसे पटाखे जिन्हें फोडऩा नहीं, बोना है!

पटाखों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को देखते हुए उसी शक्ल में एक नया अभियान शुरू किया गया है। पर्यावरण के अनुकूल सामानों की एक दुकान में बीज-पटाखों की बिक्री शुरू की है जो अलग-अलग परंपरागत पटाखों के रूप-रंग में तो हैं, लेकिन जिन्हें जलाना नहीं है, बल्कि बोना है। ऐसे कुछ पटाखों का एक पैकेज नारियल के रेशों से बने हुए दो गमलों के साथ एक पैकेज में करीब 7 सौ रूपए में बेचा जा रहा है। इसमें अनार से लेकर बम तक हर किस्म के पटाखों के भीतर अलग-अलग बीज हैं, और उन्हें स्थानीय लोगों से छिंदवाड़ा जिले की सौंसर तहसील के पारडसिंगा में एक संस्था ने बनवाया है, और इसकी ऑनलाईन बिक्री की जा रही है।

सीजन में भी चूक कर रहे फूड वाले...।

अमूमन लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते कि होटलों में साफ-सफाई बरती जा रही है या नहीं। कभी गंदगी या लापरवाही दिखी भी तो नाक भौं सिकोडक़र आगे बढ़ लेते हैं। यह है, बड़ा मुद्दा। होटलों का खान-पान कैसा है इसका हमारी सेहत पर खासा असर पड़ता है और यदि वहां स्वच्छता नहीं हो, तो कार्रवाई के लिये कानून बने हैं। बस नागरिक को जागरूक होना चाहिये। दुर्ग कलेक्टर को एक नागरिक ने फोन कर खबर की कि अमुक होटल में जिस पानी का इस्तेमाल हो उसकी है कि उसकी टंकी सफाई अरसे से नहीं की गई है। इससे बीमारी फैलने का खतरा है। होटल ने पार्किंग के लिये तय जगह पर ताला लगा रखा है, यातायाता में बाधा पहुंचती है। कलेक्टर ने एक्शन लिया। उनके निर्देश पर मातहत गये और जांच के बाद पांच हजार रुपये का जुर्माना ठोक दिया गया। आम तौर पर ग्राहक सजग नहीं होते और इस तरह के लफड़े में नहीं पड़ते। अधिकारियों की तरफ से रिस्पांस मिलेगा या नहीं इसे लेकर भी सशंकित रहते हैं। वैसे यह सीजन तो है ही होटलों में छापा मारने का। दशहरा-दीपावली पर फूड और नगर निगम वालों की कमाई का मौसम। पता नहीं दुर्ग में चूक कैसे हो रही है।

सख्ती हो तो ग्वालियर हाईकोर्ट जैसी...

चुनावी रैली करने से पहले, सभा में पहुंचने वाले अनुमानित लोगों के लिये मास्क और सैनेटाइजर खरीदने पर जितनी राशि खर्च होगी उससे दुगना कलेक्टर के पास नेताओं को जमा करना होगा। मास्क और सैनेटाइजर देना भी प्रत्याशी की जिम्मेदारी होगी। उनको बताना होगा कि यहां वे वर्चुअल सभा क्यों नहीं कर सकते?  चुनाव आयोग इस व्यवस्था से संतुष्ट होंगे, इसी के बाद कलेक्टर की अनुमति प्रभावी मानी जायेगी। यह आदेश मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ  का है। कोर्ट ने कहा कि जिस तरह प्रत्याशी को प्रचार करने का हक है उसी तरह लोगों को जीने का। दतिया और ग्वालियर के मामलों में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ कोर्ट ने एफआईआर का निर्देश दिया है। इन नेताओं की 5 अक्टूबर को रैलियां हुई थीं, जिसमें लोगों ने न मास्क पहने, न सोशल डिस्टेंस का पालन हो रहा था। छत्तीसगढ़ के मरवाही विधानसभा चुनाव की तस्वीर इससे कुछ अलग नहीं है पर यहां सभा, रैलियों की अनुमति आसानी से मिल रही है और सभी दलों के नेता मुक्त प्रचार में लगे हैं। वे कोरोना से बचाव के दिशा-निर्देशों को मानने की बजाय एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। मरवाही गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले के अंतर्गत आता है जहां बीते कुछ दिनों से कोरोना संक्रमण के केस बढ़ रहे हैं। ग्वालियर पीठ ने जो आदेश कलेक्टरों को दिया है, वह यहां लागू क्यों नहीं होना चाहिये?

मरवाही में ठिकाना ढूंढते वीआईपी..

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बीते दिनों गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही के दौरे पर नामांकन के दौरान रखी गई सभा में कह गये कि यह इलाका जिला नहीं बनने के कारण 20 साल पीछे चला गया। उनकी बात कितनी खरी थी, यह कांग्रेस ही नहीं भाजपा के नेता भी इन दिनों महसूस कर रहे हैं। वे यहां ठहरने और भोजन का ठिकाना ढूंढकर परेशान हुए जा रहे हैं। पूरे जिले में गौरेला स्टेशन के आसपास का हिस्सा ही कस्बाई है बाकी सब गांव देहात। यहां कुछ जमा पांच होटल लॉज हैं और इतने ही ठीक-ठाक भोजनालय। सब जगह भीड़। मरवाही में तो यह सुविधा भी नहीं है। चुनाव आचार संहिता के कारण सरकारी रेस्ट हाउस नेताओं को मिलने से रहे। अब वे स्थानीय लोगों से मनुहार कर रहे हैं। कुछ को तो जगह मिल गई है पर ज्यादातर लोगों को, जिनमें महिला नेत्रियां भी शामिल हैं, खासी परेशानी है। कुछ नेता तो अगले एक पखवाड़े के लिये मकानों का मुंहमांगा किराया देने के लिये भी तैयार हैं पर ग्रामीण इसके लिये भी हां नहीं कह रहे हैं। उन्हें बाहर से आये लोगों से कोरोना फैलने का डर है। कांग्रेस से तो कम से 50 वीआईपी हैं, पर भाजपा से भी कम नहीं। करीब इतने ही भूतपूर्व वीआईपी उनकी तरफ भी हैं। कई नेता अमरकंटक, बिलासपुर के रास्ते में इक्के-दुक्के बने रिसॉर्ट में ठहर रहे हैं। कुछ ने कहीं-कहीं से रिश्तेदारी, परिचय निकालकर ठिकाना ढूंढा है बाकी भटक रहे हैं। मना रहे हैं टास्क पूरा हो और यहां से निकल भागें।


21-Oct-2020 6:38 PM 256

समर्थक बेचैन हैं...

पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कट्टर समर्थक बेचैन हैं। उन्हें संगठन में पद नहीं मिल रहा है। जबकि राजेश मूणत अपने कई करीबियों को प्रदेश कार्यकारिणी में जगह दिला चुके हैं। पार्टी के कई नेता मानने लगे हैं कि संगठन में पद पाने के लिए रमन सिंह का आशीर्वाद जरूरी है। हाल यह है कि रमन सिंह के धुर विरोधी माने जाने वाले बृजमोहन अग्रवाल के समर्थक अब रमन सिंह के दरवाजे जाने से परहेज नहीं कर रहे हैं।

बृजमोहन के एक करीबी युवा नेता ने तो उज्जैन महाकाल मंदिर के सामने से बकायदा वीडियो जारी कर रमन सिंह को जन्मदिन की बधाई दी। वे यह बताने से नहीं चूके कि रमन सिंह के दीर्घायु होने के लिए भगवान महाकाल से प्रार्थना की है। इतना सबकुछ करने के बावजूद प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति में उनका नाम नहीं जुड़ पाया।

ऐसे ही बृजमोहन के एक करीबी पूर्व विधायक पिछले कुछ महीनों से रमन सिंह के निवास मौलश्री विहार के चक्कर काट रहे हैं। पूर्व विधायक की इच्छा जिला अध्यक्ष बनने की है, और वे इसके लिए रमन सिंह का समर्थन पाने की उम्मीद से हैं। सुनते हैं कि पूर्व विधायक के पद के लिए जोगी पार्टी के एक नेता ने भी पैरवी की है। जोगी पार्टी के इस नेता के रमन सिंह से काफी अच्छे संबंध हैं। मगर पूर्व विधायक की इच्छा पूरी हो पाती है या नहीं, देखना है।

उम्मीद से हैं..

जोगी की जाति प्रकरण पर संतकुमार नेताम ने लंबी लड़ाई लड़ी है।  पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर संतकुमार नेताम भाजपा के आदिवासी मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यालय मंत्री रहे हैं, और वे नंदकुमार साय के करीबी माने जाते हैं। नेताम को प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी, तो उन्हें पद मिलने की उम्मीद थी। मगर उन्हें कुछ नहीं मिला। थक हारकर विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले कांग्रेस में शामिल हो गए।

कांग्रेस में शामिल होने के बाद नेताम जोगी परिवार के खिलाफ जाति प्रमाण पत्र प्रकरण को लेकर और भी ज्यादा मुखर हो गए। अमित जोगी और ऋचा जोगी का नामांकन निरस्त होने के बाद वे सुर्खियों में हैं। नेताम ने मरवाही सीट से टिकट भी मांगी थी, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला, मगर वे निराश नहीं हैं। वजह यह है कि सरकार के निगम-आयोग में उन्हें जगह मिल सकती है। पिछले दिनों आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने उन्हें साफ तौर पर बता दिया कि चुनाव के बाद सरकार उन्हें आयोग में पद देगी। ऐसे में नेताम का खुश होना लाजमी है।

कृषि कानून, अब बढ़ेगी धान की तस्करी?

नये कृषि बिल के रुझान आने लगे हैं। किसी भी जगह से कोई ऐसी ख़बर नहीं है कि किसानों को समर्थन मूल्य से ज्यादा देकर उपज खरीदने के लिये कोई व्यापारी तैयार हो, अलबत्ता पंजाब में यूपी और बिहार के धान की तस्करी होने लगी है। राइस मिलर्स 900 रुपये से 1100 रुपये क्विंटल पर धान खरीदकर ला रहे हैं। पंजाब में एमएसपी 1880 रुपये है। क्विंटल पीछे भाड़ा भी 100-150 रुपये जोड़ देने पर वे 500 रुपये प्रति क्विंटल मुनाफे में हैं। पंजाब पुलिस और मंडी के अधिकारी इस तस्करी को रोकने के लिये सीमाओं पर तैनात हैं। हाल ही में करीब 1.5 करोड़ रुपये का धान पकड़ा भी गया। छत्तीसगढ़ भी धान के बड़े उत्पादक राज्यों में है। यहां तो धान का समर्थन मूल्य पंजाब से भी 620 रुपये ज्यादा है। सीमाओं पर वैसे भी निगरानी बढ़ानी पड़ती है क्योंकि एमपी और दूसरे लगे हुए राज्यों का धान स्थानीय किसानों की ऋ ण पुस्तिका का इस्तेमाल कर बेच दिया जाता है। पंजाब की तरह छत्तीसगढ़ सरकार ने भी केन्द्र का कानून लागू नहीं करने का निर्णय लिया है। विधानसभा के विशेष सत्र में जो राज्यपाल द्वारा फाइल लौटाने की वजह से चर्चा में आ गया है, इसी पर चर्चा होगी। यानि अब राज्य के उडऩ दस्तों को एम पी की शराब के साथ चावल की गाडिय़ों पर भी नजर रखना जरूरी हो जायेगा।

जब जिंदा होने का सबूत देना पड़े...

कहते हैं गांवों में कलेक्टर से ज्यादा ताकतवर पटवारी होता है। पर यह मुहावरा सरपंचों पर भी सही बैठता है। मुंगेली जिले के लोरमी ब्लॉक के चेचानडीह गांव की चार वृद्ध महिलायें दूर गांव से चलकर लाठियां टेकते वहां कलेक्टोरेट पहुंचीं। उन्होंने बताया कि वे यहां अपने जिंदा माने जाने की फरियाद लेकर आई हैं। सरपंच ने आवास मंजूरी के लिये ग्राम सभा बुलाई और हमारा नाम मृत लोगों की सूची में डाल दिया। आवास तो चलो मिले न मिले, लेकिन पेंशन और राशन भी इसकी वजह से बंद हो गई है। एक बार नाम कटने के बाद दुबारा जुडऩा मुश्किल है। इनके पास कोई सिफारिश भी नहीं है। सरपंच बताते हैं कि पूर्व सरपंच ने किसी बात का बदला लेने के लिये यह किया है। शायद आवास योजना का कोटा अपने लोगों के लिये तय करना होगा। इन वृद्धाओं को उम्मीद है कि अब उन्हें जीते जी, जिंदा होने का कागज मिल जायेगा और राशन पेंशन भी।


20-Oct-2020 6:26 PM 204

दो नंबर की दारू, मालिक का क्या?

हरियाणा पुलिस ने दिल्ली जाकर वहां एक शराब कारखाना के मालिक को गिरफ्तार किया है कि उसके कारखाने में बनी शराब हरियाणा में स्मगलिंग से पहुंच रही थी। इस डिस्टिलरी में बनी शराब हरियाणा में पकड़ाई थी, और वहां पुलिस की जांच में इसका मालिक अशोक जैन पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रहा था। अब एक अदालत के आदेश से पुलिस उसे गिरफ्तार कर ले गई।

इधर छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरे प्रदेशों के लिए बनी हुई शराब स्मगलिंग से आकर गांव-गांव में बिक रही है। मध्यप्रदेश में बनी गोवा का बड़ा स्टॉक अभी यहां जब्त हुआ, तो आबकारी विभाग के जानकार लोगों ने बताया छत्तीसगढ़ में केडिया डिस्टिलरी यह ब्रांड बनाती है, और केडिया का ही दूसरा बेटा मध्यप्रदेश में यह ब्रांड बनाता है। नियमों के हिसाब से कोई ब्रांड एक ही प्रदेश में बनाया जा सकता है, और उस नाम से दूसरे प्रदेश में दारू नहीं बनाई जा सकती।

लेकिन इस नियम से परे बड़ी बात यह है कि दो नंबर की दारू का बड़ा-बड़ा स्टॉक पकड़ाने के बाद भी, महंगी गाडिय़ों में जब्ती होने के बाद भी जहां से दारू बनकर आई है उस कंपनी या कारखाने के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती? अगर चार बड़े कारखानेदार जेल चले जाएं, तो सारी तस्करी थम जाएगी। लेकिन शराब कारखानेदार सत्तारूढ़ राजनीति में इतना वजन रखते हैं कि उनकी गिरफ्तारी आसान नहीं रहती है। अभी हरियाणा में जिस जैन की गिरफ्तारी हुई है उसके बारे में भी लोगों का यही कहना है कि हरियाणा सरकार से पटी नहीं होगी, इसलिए उसे पटरी से उतार दिया। क्योंकि लोगों ने यह देखा कि जिस वक्त की शराब तस्करी के लिए इस डिस्टिलरी मालिक को गिरफ्तार किया गया उसी दौर में आधा दर्जन दूसरे डिस्टिलरी की भी टैक्स चोरी की शराब जब्त हुई थी, लेकिन उनमें से किसी के खिलाफ कुछ नहीं हुआ। दो नंबर की दारू जनता के हक में आने वाले टैक्स की बहुत बड़ी चोरी होती है, और जिस देश में जनता एक-एक पैसे के लिए तरस रही है, वहां पर अरबों की टैक्स चोरी छोटी बात तो है नहीं।

मरवाही में नोटा पर भी नजर...

मरवाही में जोगी दम्पत्ति का नामांकन रद्द होने के बाद भी यहां के एक-एक घटनाक्रम पर लोगों की जबरदस्त दिलचस्पी बनी हुई है। अमित जोगी किसी का समर्थन या विरोध नहीं करेंगे यह अपने बयान में कह चुके हैं लेकिन वे यह भी कह रहे हैं कि वे गांव-गांव जायेंगे और न्याय मांगेंगे। अब, मरवाही के मतदाताओं ने उनके साथ कोई अन्याय तो किया नहीं। उन्होंने तो हर चुनाव में रिकॉर्ड मतों से जिताया। जो संकट सामने है उसका फैसला तो आखिरकार कोर्ट में होना है। अमित जोगी के इस रुख का किसे कितना फायदा होगा, या नुकसान आने वाले कुछ दिनों में साफ होगा। वे पक्ष-विपक्ष किसी का साथ नहीं देने की बात कर रहे हैं। ऐसे में उनके दौरे चुनाव आयोग के घेरे में भी नहीं होंगे। बस, एक बात ध्यान में रखनी होगी कि इस बार कांग्रेस या भाजपा किसी के लिये भी यह चुनाव एकतरफा नहीं है, जैसा जोगी के मैदान में रहते होता था। अब नोटा भी उलटफेर कर सकती है। दंतेवाड़ा का सन् 2018 का चुनाव याद होगा जब भीमा मंडावी जीते थे। उनके और कांग्रेस उम्मीदवार के बीच हार-जीत का फासला करीब दो हजार मतों का था और नोटा में चले गये थे जागरूक तथा नेताओं से खिन्न मतदाताओं के 9929 वोट। कांग्रेस भाजपा के बाद नोटा से अधिक वोट पाने वाले एक ही उम्मीदवार थे सीपीआई के नंदराम सोरी। मरवाही में 2018 के चुनाव में अगर कड़ी टक्कर होती तो नोटा पर ध्यान जाता। यहां भी नोटा को 4500 से ज्यादा वोट मिले। कुल दस प्रत्याशियों में पांच ऐसे थे जिन्हें नोटा से कम मत मिले। मरवाही में फैसला दो डॉक्टरों पर होना है। देखें नोटा की यहां क्या भूमिका होगी? नोट और नोटा ?!

धान का एथेनॉल और हंगर इन्डेक्स

धान खरीदी पर प्रोत्साहन दिये जाने के कारण इसका उत्पादन प्रदेश में लगातार बढ़ता ही जा रहा है लेकिन उगाये धान को खपाये कहां? पिछले सीजन में करीब 83 लाख टन मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई, जिससे 56.50 लाख टन चावल मिला। विभिन्न योजनाओं में खपाने के बावजूद करीब 10.50 लाख टन मीट्रिक धान या कहें 7.10 लाख चावल बच गया। केन्द्र सरकार अतिरिक्त चावल खरीदने को तैयार नहीं होता। इसे लेकर पिछले सत्र में विवाद था आगे भी इसकी संभावना बनी हुई है। इसे देखते हुए बचे हुए धान का एथेनॉल बनाने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने केन्द्र को दिया था और इसके लिये मंजूरी तथा मदद मांगी थी। केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इस प्रस्ताव को मान लिया है। भाजपा की बैठक में उन्होंने इस निर्णय की घोषणा की। धान खरीदी के कारण राजस्व पर पडऩे वाला अतिरिक्त भार इससे कुछ कम होगा। दूसरी ओर दो दिन पहले ही आई एक और रिपोर्ट सामने है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के 107 देशों में भारत का स्थान 94वां है। एक तरफ लोगों की जरूरत से ज्यादा अनाज है दूसरी तरफ भुखमरी भी। एक ही देश में। कल्याणकारी योजनाओं  और वितरण व्यवस्था की विफलता, नीति बनाने वालों की गड़बड़ी, आखिर ये है क्या?


19-Oct-2020 6:49 PM 244

कल तक नकली, आज हमदर्दी !

पूर्व सीएम रमन सिंह ने अमित और ऋचा जोगी के जाति प्रमाण पत्र और नामांकन निरस्त करने के फैसले की आलोचना कर पार्टी के आदिवासी नेताओं की नाराजगी मोल ले ली है। रमन सिंह का जोगी परिवार के समर्थन में खड़े होना विशेषकर दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, ननकीराम कंवर और रामविचार नेताम को बिल्कुल नहीं भा रहा है। तीनों ने जाति प्रमाण पत्र निरस्त करने के छानबीन समिति के फैसले का स्वागत किया है।

सुनते हैं कि पार्टी के भीतर आदिवासी एक्सप्रेस चलने की सुगबुगाहट है। रमन सिंह के पहले कार्यकाल में भी आदिवासी एक्सप्रेस दिल्ली रूट पर चली थी। तब आदिवासी-गैर आदिवासी, करीब डेढ़ दर्जन विधायकों ने रमन सिंह के खिलाफ मोर्चाबंदी की थी। तब हाईकमान और रमन सिंह की शालीनता-सज्जनता के आगे ये विधायक नतमस्तक  होकर रह गए थे और फिर कभी खुले तौर पर नाराजगी सामने नहीं आई। इसके बाद तो पार्टी के भीतर रमन का कद बढ़ता गया और 15 साल सीएम रहने के बाद उन्हें विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। वे प्रदेश से अकेले राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।

अब जब रमन सिंह, जाति प्रमाण मसले पर जोगी परिवार के साथ खड़े दिख रहे हैं, तो ये आदिवासी नेता बुरी तरह उखड़े नजर आ रहे हैं क्योंकि भाजपा पहली बार जोगी को नकली आदिवासी प्रचारित कर सत्ता में आई थी। तब जोगी के खिलाफ मुहिम के अगुवा नंदकुमार साय थे। ये अलग बात है कि विधानसभा चुनाव में उन्हें अजीत जोगी के हाथों बुरी हार का सामना करना पड़ा और वे सीएम पद की दौड़ से बाहर हो गए। साय इस बात को नहीं भूल पाए हैं।

चर्चा है कि साय और बाकी आदिवासी नेता पार्टी के भीतर रमन सिंह के दबदबे को खत्म करने के लिए मुहिम चला सकते हैं। इन नेताओं के बीच आपस में चर्चा चल भी रही है, और कुछ लोगों का अंदाजा है कि रमन सिंह विरोधी गैरआदिवासी नेताओं का भी उन्हें साथ मिल सकता है। पार्टी के असंतुष्ट नेता आने वाले दिनों में कैसा रूख अपनाते हैं, यह देखना है।

12 साल बाद वही, पर हालात अलग

नवंबर 2006 की घटना है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल के निधन के बाद कोटा विधानसभा चुनाव के प्रबल दावेदार उनके परिवार के ही किसी सदस्य को माना जा रहा था। सब मानते थे कि स्व। शुक्ल की कोटा क्षेत्र में इतनी पकड़ थी कि उनके परिवार का कोई भी सदस्य चुनाव लड़े जीत पक्की थी। स्व। शुक्ला के परिवार के प्राय: सभी लोग अच्छे शासकीय सेवा में थे और हैं। सिर्फ एक बेटे जिनकी राजनीति में दिलचस्पी थी, वे सुनील शुक्ला हैं। कांग्रेस ने उनके लिये टिकट पक्की कर दी। इधर कोटा के कार्यकर्ताओं का एक धड़ा शुक्ल विरोधी भी था जो स्व। अजीत जोगी के करीबी थे। उन्होंने सुनील शुक्ला को टिकट देने के खिलाफ आवाज उठाई। नामांकन दाखिले के अंतिम दिन तक ऊहापोह की स्थिति थी। सुनील शुक्ला पर भारी दबाव था, उन्हें अपनी मिली हुई ऐसी टिकट जिसमें जीत पक्की थी, वापस करनी पड़ी। डॉ। रेणु जोगी को इस चुनाव में टिकट मिली, तब से वे लगातार जीतते आ रही हैं। पिछली बार उन्होंने कोटा से जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की टिकट पर चुनाव जीता तो पहली बार कांग्रेस यहां से बुरी तरह हारी। लोगों ने यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के डमी प्रत्याशी थे। पहली बार हुआ कि हमेशा जीतने वाली कांग्रेस इस सीट में तीसरे स्थान पर रही। सन् 2018 के चुनाव में जब हवा चलने लगी कि डॉ। जोगी को कांग्रेस की टिकट नहीं मिलेगी, तब फिर सुनील शुक्ला ने बयान दिया कि अब वे अपने पिता की विरासत को संभालना चाहते हैं। पर इन 12 सालों में बहुत कुछ घट गया था। टिकट लौटाने के बाद वे कांग्रेस के कार्यक्रमों में भी नहीं दिखते थे। एकाएक टिकट की मांग की तो पार्टी में उनके नाम पर किसी ने गंभीरता से विचार ही नहीं किया। इस क्षेत्र में कोटा के बाद मरवाही दूसरी सीट है जहां किसी कद्दावर नेता की मौत के बाद उनके परिवार को उनकी विरासत संभालने का मौका नहीं मिल पाया। इतिहास की पुनरावृत्ति हुई है पर परिस्थितियां भिन्न हैं। टिकट तो अमित जोगी के हाथ में था पर नामांकन वैध कराना नहीं। 

तब तक ढील नहीं...

कोरोना संक्रमण के मामले में देश के अलग-अलग राज्यों से मिले-जुले आंकड़े आ रहे हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने शायद अति उत्साह में कह दिया हो कि कोरोना का पीक दौर चला गया है। पीडि़तों की संख्या में कभी उछाल तो कभी गिरावट आती ही रही है। वैसे अपने ही बयान में उन्होंने यह भी कह दिया है कि ठंड के दिनों में एक आंधी और आ सकती है। छत्तीसगढ़ में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। पूरे प्रदेश में कल काफी दिनों के बाद ऐसा हुआ कि संक्रमितों की संख्या दो हजार से कम मिली लेकिन मौतों की संख्या कम नहीं हो रही है। बीते 24 घंटे में 10 लोगों की मौत दर्ज की गई। इनमें से 7 केस ऐसे बताये गये हैं जो किसी अन्य गंभीर बीमारी से भी पीडि़त थे। जब मंत्री कहें कि कोरोना से मुक्त हो रहे हैं तो उनका बयान एमपी, बिहार, मरवाही के कार्यकर्ताओं का हौसला या कहें, लापरवाही बढ़ाने के लिये काफी है। बीते सात-आठ महीने का बहुत खराब दौर गुजर जरूर चुका है पर मौजूदा हालात को नजरअंदाज करना घातक होगा। कोरोना से बचकर बाहर आये अमिताभ बच्चन कह रहे हों तब तो मान ही लेना चाहिये- जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं।

कल ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का यह बयान भी देखें कि केरल में त्यौहार के बाद जिस तरह कोरोना बढ़ा उसे याद रखना चाहिए। अभी तो अगला एक महीना छत्तीसगढ़ में त्यौहार ही त्यौहार हैं। 


18-Oct-2020 6:23 PM 102

मौत एक और आदिवासी लडक़ी की...

छत्तीसगढ़ के सरगुजा और बस्तर संभाग की कई गंभीर ख़बरें राजधानी तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती है। सुर्खियों में महिला सुरक्षा, दलित अत्याचार पर सेमिनार, सरकारी बैठकें और सख्त निर्देश होती हैं। कहा जा रहा है कि फरसगांव में एक आदिवासी बालिका का एक पुलिस कर्मी शारीरिक शोषण करता रहा। गर्भवती हुई तो उसे दुत्कार दिया। सामाजिक उलाहना के डर से बालिका घर छोडक़र शिशु के साथ निकल गई और संदिग्ध परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आत्महत्या की बात सामने आई। मौत के बाद उस कथित  पुलिस वाले के खिलाफ शिकायत हुई। कार्रवाई क्या हुई? उसे बस निलम्बित कर दिया गया है। दुष्कर्म के आरोप में न एफआईआर न कोई गिरफ्तारी। सरगुजा संभाग और बस्तर की कुछ घटनायें सामने आने पर राज्यपाल ने भी पुलिस के रवैये पर तेवर तीखे किये थे। पर दिखता यही है कि जब तक प्रशासन का दबाव न हो, पुलिस अपने विभाग के लोगों को बचाने की कोशिश करती है। केसकाल के पूर्व विधायक कृष्ण कुमार ध्रुव ने इस सवाल को बाल संरक्षण आयोग और उच्चाधिकारियों के सामने रखा है, देखें उनकी शिकायत को गंभीरता से लिया जाता है या नहीं।

मुख्यमंत्री ने पुलिस को महिला प्रताडऩा पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश तो दे दिए हैं, लेकिन वे पहले पुलिस विभाग के भीतर सेक्स शोषण के मामलों को तो देख लें जो बरसों से पड़े हैं !

मां तो बस मां होती है....

मरवाही विधानसभा उप-चुनाव के लिये नामांकन दाखिले के दिन जिला मुख्यालय के सामने भारी गहमागहमी थी। काफी उलझन और तनाव भरे माहौल में जोगी परिवार भी इसी परिसर में मौजूद था। अमित जोगी और ऋ चा जोगी साथ खड़े थे, एक खबरनवीस ने ऋ चा जोगी से कहा, पिछला चुनाव (अकलतरा) बस दो हजार से हार गईं लेकिन इस बार तो आपको विधानसभा में पहुंचने का पूरा मौका है। खबरनवीस को लगा कि अपनी तारीफ सुनकर ऋ चा जोगी खुश होंगी, लेकिन उन्होंने कहा- नहीं, मैं तो सोच रही हूं कि अगर किसी कारण से मुझे चुनाव में निकलना  पड़ेगा तो सब कैसे मैनेज होगा। अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है, मैं तो चाहती हूं पूरे समय उसे अपनी आंखों के सामने रखूं। मुझे तो परिस्थितियों के चलते सामने आना पड़ा है, अभी तो ऐसी कोई इच्छा थी नहीं।

कोरोना का रोल मॉडल अस्पताल

एम्स, मेडिकल और सरकारी कोविड अस्पतालों में कोई शक नहीं डॉक्टर और स्टाफ अपनी पूरी क्षमता से कोरोना संक्रमितों का बेहतर इलाज की कोशिश कर रहे हैं। इन सबके बीच अलग तरह का काम कर रहा  रहा है केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल भरनी के अस्पताल में तैनात युवा डॉक्टर। तीन डॉक्टरों डॉ. रमेश यादव, डॉ. एस के जैन और डॉ. सुरेन्द्र सानगोड़े  की टीम ने अब तक 150 कोरोना मरीजों का इलाज किया। यहां किसी की मौत नहीं हुई। मरीजों में न केवल सुरक्षा बल व पुलिस के जवान हैं बल्कि आम लोगों के बीच से हैं। ये मरीज सिर्फ सीआरपीएफ कैंप के नहीं बल्कि बस्तर, रायपुर से भी आये हैं। जब बिस्तर खाली हो तो बाहरी मरीजों को भी भर्ती किया जाता है। इन डॉक्टरों का दावा है कि कोरोना संक्रमण का असर चेस्ट पर कैसा है इसी से बीमारी की गंभीरता को वे भांप लेते हैं। मरीज के छाती का प्रतिदिन तय समय पर एक्स रे लिया जाता है फिर उसकी स्टडी कर उनके लिये उपचार तय किया जाता है। इन डॉक्टरों का यह भी कहना है कि कोरोना का इलाज महंगा नहीं है बस सावधानी और ऑब्जर्वेशन जरूरी है।  यह संयोग ही है कि इसी भरनी से थोड़ा आगे जाने पर गनियारी गांव मिलता है जहां स्थापित जन सहयोग केन्द्र के डॉक्टरों का किफायती इलाज पूरे देश में चर्चित है।


17-Oct-2020 6:14 PM 43

अर्चना पोर्ते के जाने का राज

मरवाही की भाजपा नेत्री अर्चना पोर्ते कांग्रेस में शामिल हुई, तो भाजपा में खलबली मच गई। अर्चना को पिछले विधानसभा चुनाव में  भाजपा ने मरवाही से उम्मीदवार बनाया था और वे दूसरे स्थान पर रहीं। उपचुनाव में उन्हें टिकट मिलने का पूरा भरोसा था। मगर पार्टी ने उनकी जगह चिकित्सक गंभीर सिंह को उम्मीदवार बनाया, तो अर्चना की नाराजगी स्वाभाविक थी। मगर वे भाजपा छोड़ देंगी, इसका अंदेशा पार्टी नेताओं को नहीं था।

सुनते हैं कि अर्चना पोर्ते को कांग्रेस में लाने में जोगी पार्टी के विधायक देवव्रत सिंह की अहम भूमिका रही है। देवव्रत और अर्चना पोर्ते की कॉलेज के दिनों से जान-पहचान है और दोनों बैंग्लोर में एक साथ पढ़ाई करते थे। अर्चना को टिकट नहीं मिली, तो कांग्रेस के रणनीतिकारों ने देवव्रत से संपर्क किया। फिर क्या था, देवव्रत की पहल पर अर्चना कांग्रेस में आने के लिए तैयार हो गईं। चर्चा है कि दाऊजी ने खुद फोन कर अर्चना को कांग्रेस में लाने के लिए देवव्रत को धन्यवाद दिया।

कार्यकर्ताओं का गुस्सा

मरवाही विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस अपनी ताकत झोंक रही है।  50 विधायकों की तो ड्यूटी लगाई गई है, लेकिन प्रदेशभर से छोटे-बड़े कार्यकर्ता प्रचार के लिए वहां जाना चाहते हैं। रोजाना राजीव भवन में पदाधिकारियों को फोन लगाकर इसके लिए अनुमति भी मांग रहे हैं। मगर प्रदेश संगठन इसकी अनुमति नहीं दे रहा है।

दूसरी तरफ, भाजपा का हाल बेहाल है। स्थानीय कार्यकर्ता तो ठीक से जुट नहीं रहे हैं, दूसरे इलाकों से भी कार्यकर्ता प्रचार में जाने से कन्नी काट रहे हैं। सुनते हैं कि बिलासपुर भाजपा के कुछ नेताओं ने महामंत्री (संगठन) पवन साय को फोन कर चुनाव संचालक अमर अग्रवाल और भूपेन्द्र सवन्नी को ही बदलने की मांग कर दी है। अमर का चुनाव प्रबंधन काफी बेहतर रहता है। बावजूद इसके उन्हें बदलने की मांग करना पार्टी नेताओं को चौंका भी रहा है।

चर्चा है कि पिछले दिनों अमर ने मंडल स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाने के निर्देश दिए थे। खर्चा-पानी के लिए 25 हजार रूपए देने की बात हुई थी, एक जगह सम्मेलन तो हुआ, लेकिन भीड़ कम आई। सवन्नी ने 25 हजार के बजाए 5 हजार रूपए ही देने के निर्देश दिए। इससे वहां के कार्यकर्ता काफी खफा हैं। एक तरफ पेंड्रा के आसपास के ढाबों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को मनचाहे खाने-पीने की छूट है, तो  भाजपा के लोग चाय-नाश्ते का इंतजाम भी ठीक से नहीं कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा कार्यकर्ताओं का गुस्सा भडक़ना तो स्वाभाविक है।

70 साल की आजादी के बाद  बिजली

बस्तर की नक्सल समस्या का हल कैसे हो इस पर अनेक विशेषज्ञों ने शोध किये और सुझाव देते रहे हैं, पर एक तरीका तो हमेशा कारगर होगा कि वहां के निवासी प्रशासन पर भरोसा करें। दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर चिकपाल धुर नक्सल इलाकों में शामिल है। यहां सीआरपीएफ ने अपना कैंप लगा रखा है। हैरानी की बात नहीं कि यह बस्तर के उन दर्जनों गांवों में एक है जहां लोगों ने आजादी के 70 साल बाद हाल ही में बिजली देखी। हाल ही में बिजली विभाग ने ट्रांसफार्मर लगाया और जहां लाइन नहीं खींची जा सकती थी वहां क्रेडा ने सोलर पैनल लगा दिया। ज्यादातर ग्रामीणों ने आधार कार्ड नहीं बनवाये थे, वहां कार्ड बनवाने के लिये कैम्प लगा दिया गया। खेती, पशुपालन, उद्यानिकी, स्व-सहायता समूह के तहत वनोपज तथा हल्दी अदरक की खेती जैसे कई काम चार पांच महीने के भीतर ही शुरू हुए हैं और गांव में बदलाव दिखाई दे रहा है। वहां देवगुड़ी को इस तरह संवार दिया गया है कि यहां पर्यटन करने वाले भी पहुंचे। यह सब वहां के कलेक्टर की रुचि पर हो रहा है। सरकारी सूचना के मुताबिक उन्होंने इसे आने के बाद आदर्श गांव के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। कलेक्टर की रूचि के चलते जिले व ब्लॉक स्तर के बाकी अधिकारी भी वहां लगातार दौरे कर रहे हैं। बस, होना यह चाहिये कि कलेक्टर बदलें तो भी चिकपाल जैसे गांवों को संवारा जाता रहे। अक्सर ऐसा होता नहीं। 

वाट्सएप प्रेमी हजार से ज्यादा युवा बने शिक्षक

पढ़े लिखे बेरोजगार युवक गांवों में रहकर कैसे वक्त बिताते हैं? जाहिर है वाट्सएप चैटिंग और दूसरे मीडिया प्लेटफॉर्म पर। कोरोना काल में जब स्कूलों के ताले नहीं खुल पा रहे हैं, उनके इस समय काटने वाली गतिविधि को कोरबा जिले के शिक्षक उत्पादकता से जोडऩे में लगे हुए हैं। जिले में करीब एक हजार प्रायमरी और मिडिल स्कूल हैं। इन कक्षाओं का कोर्स इतना कठिन भी नहीं कि 10-12वीं और ग्रेजुएट हो चुके युवा समझ और समझा न सकें। शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने मिलकर अभियान चलाया और अब तक 1300 ऐसे युवाओं को तैयार कर लिया है जो अपने मोहल्ले के, आसपास के बच्चों को कुछ घंटे देंगे और उनकी रुकी हुई पढ़ाई को रफ्तार देंगे। क्या पढ़ाना है यह वाट्सअप पर, शिक्षा विभाग के अधिकारी और शिक्षक उन्हें वाट्सअप भेजकर बतायेंगे। कोई कठिनाई आ रही हो तो उसे दूर करने के लिये भी वाट्सएप पर चैटिंग कर ली जायेगी। अब तो सुदूर क्षेत्रों में भी नेटवर्क पहुंच रहा है। कोई युवा चार बच्चों को तो कोई 6 को पढ़ा रहा है। अपने ही घर में बुलाकर या उनके पास जाकर पढ़ा रहे हैं। जो युवा बैठे हैं उनमें से सभी फालतू मैसेज फारवर्ड करने वाले नहीं मिले, बहुत से लोग है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। कोई ऑनलाइन बिजनेस मैनेजमेंट सीख रहा है तो कोई और कुछ। इनका कहना है कि बच्चों को पढ़ाने से उनको भीतर से खुशी मिल रही है साथ ही जिन परीक्षाओं की वे खुद तैयारी कर रहे हैं उसमें भी लाभ मिल रहा है। कोरोना काल में शिक्षा को बचाये रखने जारी रखने के लिये अलग-अलग तरह से प्रयोग किये जा रहे हैं। इनमें एक नया ईजाद यह भी है।


16-Oct-2020 6:34 PM 82

अपने बच्चों को चुनौती देकर देखें

जिन लोगों को लगता है कि आज कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, वीडियो गेम्स खेलने वाले उनके बच्चे पुरानी पीढिय़ों के मुकाबले अधिक होशियार हैं, तो उन्हें इम्तिहान का यह पर्चा देना चाहिए जो कि कक्षा पांचवीं का है। यह अलग बात है कि यह पौन सदी पहले 1943-44 की छमाही परीक्षा का है। इसे एक पत्रकार समरेन्द्र शर्मा ने पोस्ट करते हुए राहत की सांस ली है-गनीमत है कि हमारे समय में ऐसा पर्चा नहीं होता था!

नख, शिख, दंत विहीन आयोग..

आम लोग प्रताडि़त होते हैं  पर कई बार सरकारी मशीनरी दबाव में, प्रभाव में आकर पीडि़तों के साथ न्याय नहीं करती। ऐसे में पीडि़तों को संवेदना के साथ शीघ्रता से न्याय मिले, पुलिस और अदालत की जटिल प्रक्रिया में न उलझना पड़े,  इसके लिये बहुत से आयोग बनाये गये हैं। जैसे लोक आयोग, बाल आयोग, महिला आयोग। पर सरकारें कोई भी हों इन आयोगों की ताकत को जान-बूझकर सीमित रखना चाहती हैं। मंत्रालयों के अफसर इनकी भूमिका को बर्दाश्त नहीं करते।

लोक आयोग के एक पूर्व अध्यक्ष जस्टिस एल सी भादू ने एक बार अपनी रिपोर्ट में कहा था कि आयोग की शक्तियां कुछ नहीं हैं। वह नख, शिख, दंत विहीन है। आयोगों में जिनकी शिकायत होती है उनमें से अनेक लोगों को यह पता होता है और वे आयोग की नोटिस, फैसलों, सिफारिशों की वे परवाह नहीं करते। आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। अब यही बात खुलेआम एक प्रशासनिक अधिकारी ने कह दी है।

बैकुंठपुर कोरिया के एडीएम को उनकी पत्नी की शिकायत पर नोटिस देकर बुलाया गया, तो उन्होंने महिला आयोग की अध्यक्ष को ही धमका दिया। सुनवाई के दौरान कह दिया कि वे आयोग को नहीं मानते, जो करना है कर ले। आयोग के पास अधिकारी की पत्नी तब पहुंची थी जब पुलिस और विभागीय स्तर पर की गई शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। अधिकारी पर घरेलू हिंसा, मारपीट का आरोप है। हाल ही में महिला आयोग अध्यक्ष ने पुलिस मुख्यालय के एक शीर्ष अधिकारी के खिलाफ शिकायत करने वाली महिला आरक्षक को भी न्याय दिलाने की बात कही थी पर उस पर कोर्ट ने फिलहाल अधिकारी को राहत दे दी है।

भाजपा शासनकाल में सन् 2014 के आसपास आयोगों को अधिकार सम्पन्न बनाने के लिये मंत्रियों की एक समिति भी बनाई गई थी, पर उस समिति ने क्या रिपोर्ट दी अब तक पता नहीं है। धमकाने वाले एडीएम पर कार्रवाई के लिये किसी आयोग को सीएम या सीएस से शिकायत करने की जरूरत क्यों पडऩी चाहिये। लोक आयोग, महिला आयोग की सिफारिशों पर कार्रवाई नहीं करनी है, उन्हें शक्तियां नहीं देनी है तो फिर भारी-भरकम सेटअप देकर अपव्यय क्यों किया जा रहा है और पीडि़तों को जबरन पेशियों में बुलाकर भटकाया क्यों जाता है?

बंगाली समाज की अनुशासित दुर्गा पूजा

राज्य के कई जिलों में नवरात्रि, दशहरा और दीवाली को देखते हुए बाजार को खोलने की समय सीमा में छूट दे दी गई है। कोरोना के कारण दुकानों, रेस्टारेंट को बंद करने की सीमा घटाई गई थी। अब पूरे त्यौहार निपटने तक छूट रहेगी। रेलवे ने भी स्पेशल ट्रेनों की घोषणायें की हैं। यह ट्रेन नवंबर माह के आखिरी तक चलेंगी।

त्यौहारों की माहभर से ज्यादा लम्बी कड़ी में सबसे ज्यादा भीड़ इक_ी होती है नवरात्रि पर। हजारों ज्योति कलशों का जगमगाना, देवी मंदिरों में लम्बी कतारों का लगना। मां के दरबार के लिये पदयात्रायें करना। विशाल दुर्गा प्रतिमायें, पंडाल की भारी सज्जा के साथ स्थापित करना। इस बार महामाया रतनपुर, मां बमलेश्वरी डोंगरगढ़ जैसे मंदिरों में दर्शन पर रोक लगी हुई है।

यूं तो हर त्यौहार सामाजिक उत्सव है लेकिन छत्तीसगढ़ में रह रहे बंगाली समाज के लिये नवरात्रि का अलग ही मतलब है। उनके दूर-दराज के रिश्तेदार घर लौटते हैं। काली बाड़ी में देवी की प्रतिमा स्थापित होती है। ढाकी बजते हैं। परिवार का हर सदस्य इसमें शामिल होता है। पंडित पारम्परिक तरीके से पूजा अर्पित कर प्रसाद वितरित करता है। यह प्रसाद ही उनका नौ दिनों का भोजन होता है। अधिकांश घरों में खाना ही नहीं बनता। हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। कोरोना महामारी के दौरान पूजा उत्सव के आयोजन पर लगाये गये प्रतिबंध के घेरे में उनका उत्सव आ गया है।

हावड़ा ट्रेन रूट के सभी बड़े शहरों में बंगाली समुदाय के लोग बसे हुए हैं। आयोजकों का कहना था कि पहले भी हम बहुत अनुशासित ढंग से पूजा करते थे और अब कोरोना के दौर में करना है तो निर्देशों को मानेंगे, कुछ और कड़ाई बरतेंगे। लेकिन कोलकाता शहर की तस्वीरें बंगालियों ने ही पोस्ट की हैं जिनमें दुकानों ने लोगों का रेला लगा हुआ है, मास्क लगाए हुए धक्का-मुक्की हो रही है. आखिर हर बंगाली के साल भर के कपडे पूजा के वक़्त ही बनते हैं, खरीददारी कैसे ना हो?


15-Oct-2020 6:41 PM 69

वही चखना, वही डिस्पोजल, वही आंदोलन...

दुर्ग जिले में मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र पतन के जामगांव ‘एम’ की शराब दुकान खोलने का विवाद दो माह से ज्यादा पुराना है। भाजपा के प्रदर्शन के दौरान वहां शराब की गाड़ी पहुंची और लूट ली गई। अमलेश्वर थाने में सात पेटी शराब लूट लिये जाने की एफआईआर दर्ज है। लूट के आरोप में गिरफ्तार हुए वे भाजपा के पदाधिकारी हैं। लॉकडाउन के दौरान प्रदेश में कई जगहों पर शराब दुकानें खुली रखी गईं। शहरी इलाकों में लॉकडाउन था तो बगल की देहात में खुली रहीं। भाजपा का कहना है कि हमें प्रदर्शन के लिये मजबूर होना पड़ा, लूटपाट हुई हो तो वह भीड़ में घुस आये असामाजिक तत्वों ने की। उनका आरोप है कि इसके पीछे कांग्रेसी थे। लूट के पहले ही आंदोलनकारियों ने मोर्चा संभाल लिया था। पर एफआईआर और गिरफ्तारी के बाद तो अब जो होना है, अदालत से होगा। दुर्ग सांसद के नेतृत्व में अब भाजपा कार्यकर्ता फिर आंदोलन पर हैं। अलग-अलग गुटों में एकता भी दिख रही है। क्या ऐसा नहीं लगता कि ऐसा ही माहौल पिछली सरकार में भी दिखाई देता रहा है? वैसी ही अशांति, वैसा ही चखना, डिस्पोजल, आबकारी, कानून- व्यवस्था और अपराध। बस आंदोलन के किरदार बदल गये हैं।

किसान फंसे ऑनलाइन पंजीयन में

समर्थन मूल्य पर धान बेचने के लिये बीते कई सालों से धान के रकबे को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता रहा। बेजा कब्जा, पड़त भूमि, भर्री-बंजर भूमि को भी किसान अपने नाम पर बता देते थे, जिसके चलते उन्हें ज्यादा धान बेचने का मौका मिल जाता था। यह धान बिचौलियों और बड़े किसानों के होते थे।  तीन चार साल से यह निर्देश है कि किसान की ऋण पुस्तिका काफी नहीं उनको अपना पंजीयन सहकारी समिति में कराना होगा। तब भी गड़बड़ी रोकी नहीं जा सकी। पिछली बार धान का रकबा अचानक बहुत ज्यादा दिखने लगा तो किसान के धान लेने के वास्तविक रकबे की रिपोर्ट (गिरदावरी) बनाने का काम पटवारियों को दिया। इस बार यह काम ऑनलाइन कर दिया गया है। यह सुनिश्चित किया गया है कि पटवारी रिकॉर्ड में दर्ज रकबा और समिति में पंजीकृत रकबे में कोई अंतर नहीं रहे। पर इसमें वे ईमानदार किसान भी पिस रहे हैं जिन्होंने कोई गड़बड़ी ही नहीं की। पटवारियों ने अधिकारियों के दबाव में आकर किसानों का रकबा कम दर्ज किया और भुईयां एप में लोड कर दिया। राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज जमीन से कम खेती का रकबा दिख रहा है, कहीं ज्यादा भी दिख रहा है। जब तक दोनों माप एक नहीं होंगे उनका पंजीयन यानि धान बेचने का मौका नहीं मिलेगा। जांजगीर चाम्पा, बिलासपुर, दुर्ग आदि जिलों से खबर आ रही है कि अब तक आधे किसानों के ही रिकॉर्ड अपडेट नहीं हो पाये हैं। कोरोना की परवाह किये बगैर किसानों की भीड़ पटवारी तथा समितियों में दिखाई दे रही है।


14-Oct-2020 7:14 PM 31

रेप के मामलों पर केवल राजनीति

छत्तीसगढ़ के कोंडागांव और बलरामपुर और उसके बाद सरगुजा संभाग के ही राजपुर और वाड्रफनगर में हुई की दुष्कर्म की वारदातों पर जिस तरह कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने हाथरस से जोडक़र सियासत शुरू की है जरा भी हैरान करने वाली नहीं है। दोनों खुद को एक दूसरे से साफ सुथरा, महिला और बालिका सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बताने पर तुले हुए हैं। कांग्रेस के नेता समझते हैं कि हाथरस की घटना बड़ी है, भाजपा कहती है कि हाथरस मामले में तो सब तरह की जांच बैठा दी गई, हाईकोर्ट ने भी मामले में संज्ञान ले लिया है कार्रवाई तो बस्तर और सरगुजा की घटनाओं में होनी चाहिये। प्रदेश के एक मंत्री कहते हैं कि हाथरस की घटना बड़ी, बलरामपुर की छोटी। तब, भाजपा से नेता प्रतिपक्ष और दूसरे नेताओं के बयान आने लग गये। कोंडागांव की घटना को वहां के सांसद ने ज्यादा गंभीर बताया। हाथरस की घटना को बनावटी कहा और राहुल गांधी की इसमें रुचि लेने के औचित्य पर सवाल उठाया तो कोंडागांव के कांग्रेस कार्यकर्ता प्रदर्शन पर सडक़ पर ही उतर आये। दरअसल, ऐसा करके दोनों ही दल अपनी संवेदनहीनता ही प्रगट कर रहे हैं। हैरानी यही है कि तमाम राजनैतिक दल कहते हैं कि ऐसे मामलों में राजनीति नहीं होनी चाहिये और हकीकत यह है कि राजनीति के अलावा कुछ नहीं हो रहा है।

तो सरकार में रहकर अनशन करेंगे सिंहदेव ?

हाथियों को सुरक्षित रहवास देने और वनवासियों की सुरक्षा के लिये सरकार की लेमरू परियोजना में ज्यादातर इलाका तो कोरबा जिले का है पर इसमें सरगुजा जिले के भी करीब 52 गांव आने वाले हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य एवं ग्रामीण विकास मंत्री टीएस सिंहदेव ने कल खम्हरिया में एक जनसभा में साफ कहा कि यह मत समझना कि मैं सरकार में हूं इसलिये आपका साथ नहीं दूंगा। जरूरत पड़ी तो आप लोगों के साथ आमरण अनशन करूंगा। उनका कहना है कि जब लेमरू एलिफेंट प्रोजेक्ट लाया गया तो इसका दायरा 450 वर्ग किलोमीटर रखने की बात हुई थी, पर अब यह 4000 वर्ग किलोमीटर तक विस्तारित करने की बात हो रही है। गांवों को विस्थापित किया जाना है पर यह ग्रामीणों की सहमति के बिना नहीं हो सकता। सिंहदेव के सामने जब इन ग्रामीणों ने नहीं हटाने की मांग की तब सिंहदेव ने यह बात रखी। सिंहदेव ने उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताया और कहा कि ग्राम सभा की सहमति बगैर कुछ नहीं हो सकता। कई बार सिंहदेव की साफगोई संकेत देने लगती है कि वे अपनी ही सरकार से नाखुश तो नहीं चल रहे?


13-Oct-2020 6:54 PM 42

पुनिया और सुनील सोनी..!

आखिरकार प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीएल पुनिया की दोबारा कोरोना जांच रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई है। पुनिया के संपर्क में रहे कई नेता क्वॉरंटीन हो गए हैं। रायपुर सांसद सुनील सोनी भी पुनिया के साथ दिल्ली से आए थे। सुनते हैं कि विमान में दोनों साथ बैठे थे। यद्यपि उन्होंने मास्क तो लगाया ही था। विमान में बैठने के बाद यात्रियों को उपलब्ध कराए गए फेस कवर भी पहने हुए थे। मगर पुनिया की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई है, तो सुनील सोनी का टेंशन में आना स्वाभाविक है।  कुछ इसी तरह सरकार के मंत्री भी परेशान हैं। ये सभी पुनिया के संपर्क में थे। मरवाही चुनाव में इन मंत्रियों की प्रचार में ड्यूटी लगी है। मगर जयसिंह अग्रवाल को छोड़ दे, तो बाकी मंत्री बाहर निकलने का जोखिम नहीं उठा पा रहे हैं। बीती देर रात पुनिया ने ट्वीट करके अपने और पत्नी के पॉजिटिव होने की खबर की. लेकिन मिलने वाले लोगों के लिए कोई सलाह पोस्ट नहीं की।

सीमेंट के दाम क्यों बढ़े?

बीते एक माह के भीतर सीमेंट के दाम ब्रांड के हिसाब से 30 से 50 रुपये तक बढ़ गये हैं। ठीक-ठाक क्वालिटी का सीमेन्ट जो 240 रुपये था इस समय 280, 290 तक मिल पा रहा है। लॉकडाउन और बारिश के कारण कंस्ट्रक्शन के कार्य लगभग रुके हुए थे। अब जब मौसम साफ हुआ है और कोरोना के बावजूद निर्माण कार्य शुरू किये जा चुके हैं, ठीक ऐसे समय में यह बढ़ोतरी भी हुई है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद तीन साल तक सीमेन्ट का दाम स्थिर था। लगभग 100 रुपये में मिल रहा था। भाजपा की जब पहली सरकार बनी तो यह 120 रुपये हो गया। उसके बाद 155 रुपये तो सन् 2006 के आसपास 200 रुपये तक बिका। 2008 में एकाएक यह 250 से 300 रुपये तक में बिकने लगा। यह वह समय था राजधानी समेत राज्य के बड़े शहरों दुर्ग, भिलाई, राजनांदगांव, बिलासपुर में बड़े पैमाने पर कॉलोनियां और फ्लैट्स तैयार होने लगे थे। सन् 2018 में इसके दाम वैश्विक मंदी के कारण कुछ गिरे और 240, 250 रुपये में आ गया। यह दाम दो तीन साल से स्थिर था। हर बार बढ़ोतरी के बाद विरोधी दल दाम बढऩे के पीछे सरकार से सीमेन्ट विक्रेताओं के सिंडिकेट के साथ साठगांठ का आरोप लगाते रहे हैं। हो-हल्ला होने पर बढ़ी कीमत में से कुछ दाम घटा भी दिये जाते हैं। सीमेन्ट डीलर्स बता रहे हैं कि असल कारण तो यही है कि फिर कार्टल बना हुआ है और निर्माताओं ने एक राय होकर दाम बढ़ाये हैं। निर्माण कार्य में तेजी आने और बारिश के गुजरने का लाभ उठाया जा रहा है। हालांकि यह भी जाहिर बात रही है कि चुनाव के समय सीमेन्ट के दाम अचानक बढ़ते हैं। इस बार ऐसा कुछ है इसकी संभावना इसलिये नहीं है क्योंकि छत्तीसगढ़ में सिर्फ एक सीट पर चुनाव है। मध्यप्रदेश में सीमेन्ट के दाम कम हैं जहां 28 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। जिन लोगों का अपना घर तैयार हो रहा है उनका बजट सीमेन्ट की बढ़ी कीमत से बिगड़ रहा है। बिल्डर्स और सरकारी प्रोजेक्ट्स की लागत भी बढ़ेगी। फिलहाल इस मुद्दे पर कोई सियासी हलचल नहीं है।

स्कूल फीस का मसला अब हल होने की उम्मीद

लॉकडाउन के बाद से ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान बच्चे अपनी स्कूलों में कितनी फीस दें यह विवाद चल रहा है। हाईकोर्ट ने प्राइवेट स्कूलों की याचिका पर तय किया कि ट्यूशन फीस तो लें पर उसके अलावा कोई फीस न लें। एक अन्य याचिका अब भी लम्बित है। पालक तब भी फीस का विरोध करते रहे कि उन्होंने अपनी फीस का अनुमोदन नियमानुसार शिक्षा विभाग से नहीं कराया है। ट्यूशन फीस के नाम पर ही वे कुल फीस का 80 प्रतिशत वसूलने लगे हैं। अब पूरे प्रदेश में फीस पर निगरानी के लिये समितियों के गठन का रास्ता साफ कर दिया गया है। राजपत्र में छत्तीसगढ़ अशासकीय विद्यालय फीस अधिनियम 2020 का प्रकाशन किया है। सरकारी स्कूलों की तरह निजी स्कूलों में भी एक समिति बनेगी जिसके अध्यक्ष तो कलेक्टर होंगे पर उनके द्वारा नियुक्त नोडल अधिकारी भी बैठकें ले सकेंगे। इस समिति में स्कूल प्रबंधक, पालक के प्रतिनिधि के अलावा समाज के अलग-अलग वर्गों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति मौजूदा फीस की समीक्षा तो करेगी ही, हर वर्ष फीस का पुनर्निर्धारण और वृद्धि के मामले में भी फैसला लेगी। फीस बढ़ोतरी के लिये तर्कसंगत कारण बताना होगा। पहले भी फीस निर्धारण पर निगरानी की व्यवस्था थी। पर देखा गया कि कई स्कूलों ने तो बीते चार-पांच सालों से अपनी फीस का अनुमोदन नहीं कराया है। नई समिति भी दबावमुक्त होकर काम करे, समाज से लिये जाने वाले प्रतिनिधि पक्षपात न करें तो प्राइवेट स्कूलों पर कुछ तो नियंत्रण हो सकेगा। वैसे अच्छी बात तो यह होगी कि दिल्ली की तरह सरकारी स्कूलों को प्राइवेट स्कूलों से बेहतर बनाने का काम किया जाये। हर ब्लॉक में प्रदेश में करीब 90 आदर्श आवासीय स्कूल भाजपा शासनकाल में खोले गये थे, पर उसका संचालन नहीं किया जा सका। उसे प्राइवेट स्कूल प्रबंधकों के हाथ ही सौंपना पड़ा है। अभी नया प्रयोग 40 नये अंग्रेजी स्कूलों को खोला जाना है। इनमें प्रवेश को लेकर बड़ा आकर्षण छात्रों में है। यह ठीक से चल निकलें तो स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की आशा बंधे।


12-Oct-2020 6:55 PM 39

मरवाही से कौन?

जाति विवाद के चलते मरवाही में अमित जोगी या उनकी पत्नी डॉ. ऋचा जोगी चुनाव मैदान में नहीं उतर पाए तो क्या होगा, इस पर राजनीतिक गलियारों में बहस चल रही है। हल्ला यह है कि जोगी दंपत्ति के चुनाव मैदान में नहीं उतर पाने की स्थिति में गुंडरदेही के पूर्व विधायक आरके राय जनता कांग्रेस के उम्मीदवार हो सकते हैं। सुनते हैं कि पार्टी के अंदरखाने में इस पर मंत्रणा भी हुई है। आरके राय जोगी परिवार के भरोसेमंद माने जाते हैं।

पुलिस की नौकरी छोडक़र राजनीति में कदम रखने वाले आरके राय मरवाही की भौगोलिक स्थिति से वाकिफ हैं, और वे दर्जनों बार अजीत जोगी, अमित के साथ क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं। मरवाही जोगी परिवार का गढ़ है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर राय को जिताने की जिम्मेदारी स्वाभाविक तौर पर रेणु जोगी और अमित जोगी की रहेगी। कुछ लोगों का मानना है कि वे कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे। एक विकल्प और है कि कांग्रेस से असंतुष्ट और भाजपा के बागी संयुक्त प्रत्याशी उतारने की रणनीति बना रहे हैं। जोगी परिवार इस मोर्चा को समर्थन दे सकता है। खैर जितनी मुंह उतनी बातें। अगले दो-तीन दिनों में मरवाही की तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।

धंधा तो ठीक है पर महर्षि वाल्मीकि का नाम...

इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोगों को तरह-तरह का झांसा देने का काम चलते ही रहता है। इसमें एक लोकप्रिय झांसा कमाई का है। लोगों का ऐसी अंधाधुंध कमाई का भरोसा दिलाया जाता है कि उनकी जिंदगी ही बदल जाएगी। अभी एक किसी मोबाइल नंबर से इस अखबारनवीस को वॉट्सऐप पर मैसेज मिला कि एक मोबाइल फोन और सौ रूपए से हर दिन 10 हजार से 30 हजार रूपए रोज कमाए जा सकते हैं, और कोई समय सीमा भी नहीं है। जो लोग ऐसी कमाई चाहते हैं वे नीचे दिए गए वॉट्सऐप नंबर को अपने फोन पर जोड़ लें।

अब जिस नंबर से यह संदेश आया है उसकी प्रोफाईल खोलकर देखने पर महर्षि वाल्मीकि की तस्वीर डली हुई है। महर्षि वाल्मीकि के बारे में कहा जाता है कि एक समय वे डकैत थे, और बाद में वे एक महान धार्मिक लेखक हो गए थे। उन्होंने रामायण की रचना की थी।

अब उनकी तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए यह संदेश बढ़ाया जा रहा है कि हिन्दुस्तान में 30 करोड़ लोग इस मनीमेकिंग मॉडल से जुड़ चुके हैं। अब अगर 30 करोड़ लोग हर दिन 10 हजार रूपए से लेकर 30 हजार रूपए तक कमा रहे हैं, तो हिन्दुस्तान में गरीबी बचना क्यों चाहिए। केन्द्र सरकार को चाहिए कि हर किसी को एक मोबाइल और सौ रूपए दे दे, तो सरकार पर से गरीबी हटाने का बोझ भी हट जाएगा। महर्षि वाल्मीकि के मानने वालों को देखना चाहिए कि उनकी तस्वीर का इस्तेमाल यह किस धंधे में हो रहा है।

क्रिमिनल दामाद?

फैशन में कई जगह गैरकानूनी कामकाज से जुड़े नामों का इस्तेमाल होता है। कई महंगे इत्र पॉइजन, ओपियम (अफीम), आऊटलॉ, जैसे ब्रांड या सामान बाजार में रहते हैं। अभी दो दिन पहले राजनांदगांव के एक ढाबा मालिक का जो लडक़ा किडनैप किया गया, आज जब उसकी तस्वीरें सामने आई हैं तो उसने जेल में बंद कैदियों की तरह छापे वाले टी-शर्ट पहनी हुई है, और उस पर क्रिमिनल दामाद छपा हुआ दिख रहा है।  फिलहाल तो वह पुलिस या फिरौती की मेहरबानी से पुलिस के दामाद की तरह उनके बीच बैठकर लौट रहा है, और ऐसी चर्चा है कि क्रिकेट-सट्टे के लेन-देन के चक्कर में उसका अपहरण हुआ था। बाकी मां-बाप अपने बच्चों के बारे में सोच लें कि वो सीने पर मुजरिम दामाद जैसा कुछ टांगकर अगर चल रहे हैं, तो उन्हें अगली पटरी पर ले आएं।

एसटी-एससी युवाओं को कर्ज की कड़ी शर्तें

आर्थिक मंदी और कोरोना के दौर में लोग नया कारोबार शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। लोन लेकर रोजगार शुरू करना तो और भी मुश्किल दिखाई दे रहा है। अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के बेरोजगारों को उनके लिये बनाये गये वित्त निगम से कुछ आसान शर्तों पर वर्षों से ऋण दिया जाता रहा है। दस्तावेज और कागजी प्रक्रिया में भी कुछ ढील दी जाती रही। ब्याज में छूट तथा अनुदान भी मिलता है। पर अब शर्तें इतनी कड़ी कर दी गई है कि बेरोजगार युवकों के होश उड़े हुए हैं। उनसे जमीन के पट्टे के कागज जमा करने कहा जा रहा है साथ ही जमानतदार के तौर किसी सरकारी कर्मचारी को पेश करने कहा जा रहा है। प्रदेश के ज्यादातर जिलों में इसके चलते लोन देने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। कोरबा के कांग्रेस पदाधिकारियों ने बकायदा मुख्यमंत्री को चि_ी लिखकर प्रावधानों में संशोधन की मांग की है। किसी बेरोजगार के पास अपनी कोई जमीन नहीं है तो परिवार का पट्टा जमा करना होगा। परिवार लोन के लिये अपनी इकलौते जमीन के टुकड़े को बंधक बनाने राजी हो जायेंगे यह कैसे संभव है? और किसी शासकीय सेवक को क्या पड़ी है कि कि वह जमानतदार बनने की उदारता दिखाये। दूसरा पहलू, इन योजनाओं में रिकव्हरी की स्थिति भी अच्छी नहीं है। हो सकता है कि कुछ ऋणी व्यवसाय में नुकसान के कारण कर्ज नहीं चुका पाते हों पर अधिकारियों को कमीशन देने में भी काफी पैसा लोन लेने के दौरान ही खर्च हो जाता है। हितग्राहियों के दिमाग में बिठाया जाता है कि ऐश करो, लोन वापस करना जरूरी नहीं है। अक्सर ऐसे विभागों के कामकाज की समीक्षा मंत्री, सचिव स्तर पर नहीं हो पाती है, प्राथमिकता में नहीं है। अफसर ही नियम बनाते हैं और योजना संचालित करते हैं। अब जब रोजगार की जरूरत हर तबके को है, ऐसी योजनायें बेहतर और व्यवहारिक तरीके से लागू करना जरूरी है।

धान की खरीद कब से शुरू होगी? 

केन्द्र सरकार ने बीते साल समर्थन मूल्य से अधिक दर पर धान खरीदे जाने की स्थिति में राज्य से चावल का कोटा उठाने से मना कर दिया था। बाद में मूल्य वही रखा गया। किसानों को राजीव न्याय योजना के तहत अतिरिक्त राशि दी जा रही है। केन्द्र और राज्य सरकार के बीच उपजे विवाद के चलते पिछली बार खरीदी शुरू करने की तारीख बहुत आगे 1 दिसम्बर तक चली गई। धान पर बोनस नहीं देने पर कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला बोला था वहीं भाजपा ने धान खरीदी की तारीख आगे बढ़ाये जाने को लेकर सवाल उठाये थे। लगता है इस बार भी ऐसा कुछ होने जा रहा है। केन्द्र का कृषि बिल राष्ट्रपति की दस्तखत के बाद अब कानून बन चुका है। राज्य सरकार ने यह जरूर कहा है कि वह अपने यहां यह कानून लागू नहीं करेगी लेकिन नया कानून बनायेगी। नये कानून पर अभी विचार-विमर्श की स्थिति नहीं बनी है। खरीदी की तारीख अब तक घोषित नहीं हुई है। दूसरी तरफ अब किसानों की फसल पकने लगी है। अर्ली वेरायटी धान की कटाई कुछ दिन में शुरू हो जायेगी। किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जबसे समर्थन मूल्य पर धान खरीदी शुरू हुई है उन्होंने संग्रह करने की जगह कोठी बनाना बंद कर दिया है। वे धान के पैसे का इंतजार करते रहते हैं क्योंकि उन्हें कई रुके काम पूरे करने होते हैं। बीते साल खुली बिक्री पर पाबंदी के बावजूद मिलर्स और आढ़तियों ने जबरदस्त खरीदी की थी। इस बार यदि नये कानून के चलते रोक नहीं लगी तो यह काम चोरी-छिपे करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। अच्छा होता यदि धान खरीदी की तारीख को पिछली बार की तरह एक दिसम्बर तक नहीं खींचा जाये। इसे पहले की तरह 1 नवंबर ही रखा जाये ताकि सरकारी कीमत पर ही लोग धान बेच सकें।  


11-Oct-2020 7:28 PM 18

मीडिया के दूसरे धंधों से नुकसान

एक वक्त था जब यह माना जाता था कि अखबार निकालने वाले लोगों का कोई और कारोबार नहीं रहना चाहिए क्योंकि दूसरी कारोबारी दिलचस्पी अखबार को ईमानदार नहीं रहने देती। लेकिन वह पुराने फैशन की बात हो गई। अब तो अखबार ही अकेले नहीं रह गए, मीडिया के नाम से टीवी चैनल भी आ गए, और समाचार-पोर्टल भी। अब अखबार शब्द के साथ जुड़ी हुई गंभीरता और ईमानदारी दोनों शब्द चल बसे हैं। अब यह समझना नामुमकिन सा हो गया है कि मीडिया कहे जाने वाले कारोबार का घाटा पूरा होता कहां से है, कैसे पूरा होता है, और उसके लिए क्या-क्या समझौते करने पड़ते हैं, कैसे-कैसे सौदे करने पड़ते हैं।

लेकिन पाठक भी जैसे पहले फुटपाथ पर हरेक माल बारह आना वाले से सामान खरीदना बेहतर समझते थे, आज भी वे उसी तरह सबसे सस्ता मिलने वाला अखबार, मुफ्त में सनसनी देने वाला टीवी चैनल बेहतर समझते हैं। जब लोग ही मनोहर कहानियां चाहते हैं, और उसे भी मुफ्त में चाहते हैं, तो दिनमान और रविवार जैसी पत्रिकाओं को तो बंद होना ही था।

मीडिया के जब दूसरे कारोबार भी रहते हैं, तब उसका क्या नुकसान होता है, यह छत्तीसगढ़ इन दिनों अच्छी तरह देख रहा है, और भुगत भी रहा है।

छुट्टी के लिये कोरोना की खरीदी

एक अफसर बीते एक माह से दफ्तर नहीं आ रहे हैं। पहले उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई, होम आइसोलेशन में रहे फिर जब ठीक होकर काम पर निकलने का दिन आया तो उसके परिवार के एक दूसरे सदस्य की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। इस अफसर के बारे में बताया जा रहा है कि रिपोर्ट पॉजिटिव बताने के लिये उन्होंने कोरोना के एक प्राइवेट जांच सेंटर से बात की थी। शिकायत मिल रही है कि कई सरकारी विभागों के अधिकारी-कर्मचारी कोरोना पॉजिटव रिपोर्ट खरीद रहे हैं ताकि उन्हें लम्बी छुट्टी मिल जाये। इसके लिये हजार, दो हजार रुपये खर्च करने के लिये वे तैयार हो जाते हैं। सरकारी जांच में नहीं, निजी जांच सेंटर्स में यह सौदा किया जा रहा है। कोरोना महामारी है। इसके बहाने दफ्तरों में वैसे भी कामकाज बंद जैसा है। सरकार ने खुद भी बड़ी रियायतें दे रखी हैं। रोटेशन में दफ्तर आने के लिये कहा गया है ताकि भीड़ न बढ़े। पर सिर्फ छुट्टी के लिये ऐसी हेराफेरी किया जाना कहीं से भी सही नहीं है।

कोरोना के चलते आंखों पर असर

अम्बेडकर हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने एक दिलचस्प और जरूरी अध्ययन किया है। उन्होंने बताया कि कोरोना के चलते घरों में कैद रहने के कारण मोबाइल फोन, डेस्कटॉप, लैपटॉप बिताये जाने वाले समय में काफी बढ़ोतरी हो गई है। इसका औसत एक से दो घंटे होता था अब 8 घंटे तक जा पहुंचा है। आंखों के सूखापन और लाल हो जाने की शिकायत लेकर अब डॉक्टरों के पास ज्यादा लोग पहुंच रहे हैं। स्कूल, कॉलेज अब तक खुले नहीं हैं और ज्यादातर पढ़ाई ऑनलाइन ही चल रही है। आंखों को ऐसी हालत में दुरुस्त रखने के लिये उनके कुछ सुझाव भी हैं जैसे 20 मिनट के अंतराल पर कम से कम 20 सेकेन्ड के लिये स्क्रीन से नजऱ हटा दी जाये। स्क्रीन को देखने के लिये दूरी 20 इंच कम से कम होनी चाहिये। गेंद खेलकर, हरियाली को देखकर आंखों को राहत पहुंचाने का काम किया जाना चाहिये।

कोरोना महामारी के बाद भी कई चीजें स्थायी हो जायेंगी, हमारी आदत में शामिल हो जायेंगी। इसमें डिजिटल गैजेट्स का इस्तेमाल भी एक होगा। ऐसी हालत में आंखों पर पडऩे वाले असर की तरफ चिंता करना जरूरी है।


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