राजपथ - जनपथ

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Posted Date : 26-Apr-2018
  • आखिरकार पूर्व मेयर वाणीराव और चिरमिरी मेयर डमरू रेड्डी की कांग्रेस में वापसी हो गई। दोनों को गुपचुप तरीके से दिल्ली में राहुल गांधी से मिलवाया गया और वहीं उनके पार्टी में शामिल होने की घोषणा की गई। सुनते हैं कि दोनों को पहले रायपुर में ही नगरीय निकाय और पंचायत प्रतिनिधियों के सम्मेलन में राहुल गांधी के समक्ष पार्टी में शामिल कराने की तैयारी थी लेकिन राहुल का दौरा स्थगित होने के कारण उन्हें दिल्ली ले जाकर शामिल कराया गया। 
    वाणीराव के कांग्रेस में शामिल होने से जोगी पार्टी को तगड़ा झटका लगा है। जिस वक्त वाणीराव, कांग्रेस में शामिल हो रही थीं, उस वक्त जोगी पिता-पुत्र भी दिल्ली में थे। लेकिन उन्हें इसकी भनक नहीं लगी। वाणीराव ने निकाय चुनाव में टिकट वितरण पर खुले तौर पर असंतोष जाहिर किया था। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को काफी भला-बुरा कहा था। उन्हें नोटिस भी जारी किया गया था, बाद में उन्होंने खुद होकर पार्टी छोड़ दी। डमरू रेड्डी ने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा था। पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था। इन दोनों नेताओं को पार्टी में फिर शामिल कराने में प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया की भूमिका बेहद अहम रही है। वे पिछले प्रभारियों से एकदम अलग तरीके से काम कर रहे हैं। 
    वे प्रदेश दौरे में पार्टी नेताओं से लगातार मेल मुलाकात करते हैं। कोई नेता उनसे अकेले में चर्चा करने की इच्छा जाहिर करता है तो वे परहेज नहीं करते। यही वजह है कि वे पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी से वाकिफ है और कई असंतुष्ट नेताओं को भी मनाकर काम में लगाने में सफल रहे हैं। वाणी राव के बाद जोगी पार्टी के कुछ विधानसभा प्रत्याशियों को भी पार्टी में लाकर बड़ा झटका देने की  तैयारी चल रही है। 

    एक दिन में 4 केंद्रीय मंत्री
    कल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की चार-चार ताकतवर केंद्रीय मंत्रियों से एक के बाद दूसरी मुलाकात से छत्तीसगढ़ का मोदी सरकार में महत्व दिख रहा है। एक वक्त था जब अटल बिहारी प्रधानमंत्री थे, और एनडीए के उस पहले कार्यकाल में अविभाजित आंध्र के मुख्यमंत्री चंद्रा बाबू नायडू जब दिल्ली पहुंचते थे, तो एनडीए में उनके सांसदों की गिनती के महत्व के मुताबिक केंद्रीय मंत्री उनका इंतजार करते थे, और वे एक-एक दिन में आधा दर्जन मंत्रियों से मिलकर आंध्र के काम करवाकर लौटते थे। 
    अभी छत्तीसगढ़ से लौटने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरफ से पार्टी या बाकी मंत्रियों को जो भी संदेश गया है, उसका सीधा असर कल देखने मिला जब चारों केंद्रीय मंत्रियों ने रमन सिंह के रखे गए हर प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।  मंत्रियों ने अपने सचिवों को ये निर्देश दिए थे कि इनमें से कोई भी प्रस्ताव बाकी न रह जाए, और सारे काम पूरे किए जाएं। यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ में कुछ महीने बाद चुनाव भी होने हैं, लेकिन राज्य से लौटकर प्रधानमंत्री ने बताया जाता है कि यहां की बहुत सी योजनाओं की तारीफ की है।

    ब्लूटूथ लगाए नरेन्द्र मोदी
    जब कोई मशहूर इंसान किसी सामान का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका चलन बढ़ जाता है और उसकी बिक्री तेजी से होने लगती है। अभी नरेन्द्र मोदी ने कर्नाटक के अपने कार्यकर्ताओं से बात करते हुए कान में ब्लूटूथ ईयरफोन लगा रखा है। वे मन की बात कहते हुए कानों पर हेडफोन तो लगाए हुए दिखते रहते हैं, लेकिन ब्लूटूथ लगाने का यह पहला ही मौका था। इसका इस्तेमाल बढ़ जाए तो कम से कम दुपहिया चलाते हुए सिर तिरछा करके फोन को दबाकर चलना कुछ कम हो जाएगा, और कई लोगों की जिंदगी भी बच सकती है।

    इस शौच पर जुर्माना क्यों नहीं?
    देश भर में खुले में शौच के खिलाफ अभियान चल रहा है। सार्वजनिक शौचालय बनाए जा रहे हैं, खुले में शौच करने वालों को नगर निगम या नगरपालिका पकड़कर जुर्माना कर रही हैं। स्वच्छता के लिए लोगों को जागरूक करने हर तरह की तरकीब निकाली जा रही है। शहर के तालाबों के आसपास अब शौच करते लोग दिखाई नहीं देंगे। गावों में जंगली जानवरों के भय ने दिशा-मैदान वाले लोगों को कम कर दिया है। पर पढ़े लिखे, साफ-सुथरे पैसेवालों को खुले में शौच करते पकड़ाने पर कोई कार्रवाई पढऩे-सुनने को शायद ही मिली है। 
    गौरवपथ हो या सिविल लाइंस की सड़कें या फिर बूढ़ातालाब का फुटपाथ। सुबह-सुबह कुत्तों को फारिग कराने निकले सैकड़ों लोग मिल जाएंगे। जब तक कुत्ता फारिग न हो जाए वे उनके पीछे घूमते रहते हैं। इनकी गंदगी एक तरह से उनका मालिक ही कर रहा है। जब बच्चों की तरह अपने कुत्तों को रखते हैं, बच्चों सी ही साफ-सफाई भी करते हैं। तो फिर इनके शौच को सार्वजनिक सफाई के हवाले करना क्या जायज है?  वैसे दुनिया के सारे सभ्य देशों का कानून यह नियम रखता है कुत्तों को घुमाने वाले अपने साथ उनके पखाने के लिए बैग लेकर जाएं, और अगर वे नहीं उठाते हैं, तो उन पर खासा जुर्माना लगता है। मजे की बात यह है कि कॉलोनियों के भीतर लोग अपने कुत्ते को पखाना करवाने के लिए अपने घर से दूर दूसरों के घर के आसपास ले जाते हैं, ताकि उसकी छोड़ी हुई गंदगी से अपनी कार खराब न हो, और न ही अपने जूते-चप्पल खराब हों। ( rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 25-Apr-2018
  • कसडोल के विधायक गौरीशंकर अग्रवाल के भांजे के खिलाफ हिट एंड रन केस दर्ज है। इस केस की वजह से गौरीशंकर अग्रवाल को राजनीतिक असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।  विधानसभा चुनाव में छह माह बाकी है। ऐसे में गौरीशंकर पर भांजे को संरक्षण देने का आरोप गरमा रहा है। महीनाभर पहले उनके भांजे की गाड़ी से कुचलकर दादा-पोती की मौत हुई थी। 
    सुनते हैं कि घटना के तुरंत बाद पीडि़त परिवार को आर्थिक सहायता कर मामले को शांत करने की कोशिश भी की गई थी। मृतक साहू समाज से हैं, जो कि कसडोल विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा संख्या में है। इलाके में धीरे-धीरे यह मामला सुलग रहा है और साहू समाज की सामाजिक बैठकों में गौरीशंकर अग्रवाल को मुख्य अतिथि तौर पर नहीं बुलाने का फैसला भी लिया गया। हालांकि भाजपा के कई नेता लगे हैं कि दुर्घटना को राजनीतिक रंग न दिया जाए। लेकिन यह कोशिश फिलहाल सफल होती नहीं दिख रही है। 
    साहू समाज में पकड़ रखने वाले मोतीलाल साहू भी कसडोल के रहने वाले हैं और वे समाज के दो बार अध्यक्ष रह चुके हैं। मोतीलाल चुनाव लडऩे के इच्छुक भी बताए जाते हैं। लेकिन गौरीशंकर के रहते उन्हें कसडोल से टिकट मिलना बेहद कठिन है। उनका समाज के साथ खड़े रहना मजबूरी भी है। इसी बीच, 30 अप्रैल को कुछ संगठन कसडोल में प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं। ये संगठन पीडि़त परिवार को 50 लाख रूपए मुआवजा और एक सदस्य को नौकरी देने की मांग कर रहे हैं। मांग पूरा न होने की दशा में आंदोलन पेश करने की चेतावनी दी गई है। कुल मिलाकर गौरीशंकर के लिए राहें आसान नहीं रह गई हैं। 


    इस जमाने का सौंफ-सुपारी का डिब्बा

    एक समय था जब कोई मिलने पहुंचे तो लोग उसे पानी पिलाकर, चाय पूछकर, और चाय के बाद या बिना चाय के सौंफ-सुपारी का डिब्बा सामने रखते थे। अब वक्त बदल गया है। सिगरेट जाहिर तौर पर जानलेवा साबित हो गई है, और लोग उससे बिदकने लगे हैं। गुटखा और पान-मसाला के बारे में यह स्थापित हो गया है कि इससे कैंसर हो सकता है, इसलिए उसे पेश करना भी कम हो गया है। ऐसे में दो नए सामान लोग पान-सुपारी की जगह पेश कर सकते हैं जो कि लोगों को आते ही काम के लग सकते हैं, और जाने तक काम आ सकते हैं। 
    अब मेहमानों के लिए एक पॉवर बैंक रखना चाहिए और उनके आने पर पूछ लेना चाहिए कि फोन चार्ज करना हो तो वे इसमें लगा सकते हैं। दूसरी बात वाई-फाई की, मेहमानों के आने पर अगर सचमुच शिष्टाचार निभाना है तो वाई-फाई का नाम और पासवर्ड भी लिखा हुआ रखना चाहिए और मेहमानों को पूछ लेना चाहिए। समय के साथ-साथ शिष्टाचार के तरीके बदलते रहते हैं, और आज बैटरी की चार्जिंग और इंटरनेट तक पहुंच एक बड़ा शिष्टाचार हो सकता है।

    * जिनको मुस्लिम टैक्सी ड्राइवर से परहेज हो, उन्हें अपनी नफरत के लिए ट्विटर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। सऊदी राजकुमार अलवदीद बिन तलाल अलसौद ट्विटर का एक बड़ा शेयर होल्डर है।

    * मैंने ओला कैब की बुकिंग तब कैंसल कर दी जब ड्राइवर का नाम मोदी पता लगा। मैं समझ गया था कि यह पहुंचाएगा कहीं नहीं, महज जुमले सुनाकर गोल-गोल चक्कर लगाते रहेगा।

    * एक आदमी ने ओला कैब बुक की, और ड्राइवर का नाम पता लगते ही कैंसल कर दी। अब अर्नब नाम के ड्राइवर की चीख-पुकार कौन सुने।

    * एक मुसाफिर ने बुक की हुई ओला टैक्सी में चढऩे से मना कर दिया क्योंकि ड्राइवर का नाम रहमान था। एक दूसरे ने चढऩे से मना कर दिया क्योंकि ड्राइवर के ऊपर टंगा केसरिया पुतला हनुमान था।

    * एक मुसाफिर ने बुक की हुई ओला टैक्सी में चढऩे से मना कर दिया क्योंकि ड्राइवर का नाम रहमान था। एक दूसरे ने चढऩे से मना कर दिया क्योंकि ड्राइवर के ऊपर टंगा केसरिया पुतला हनुमान था।

    * मैंने ओला टैक्सी की बुकिंग तब कैंसल कर दी जब एसएमएस आया कि ड्राइवर का नाम भगवान है। मैं तो नास्तिक हूं...

    * मेहमान को ग्रीन-टी पिलाने के फायदे, 1- रईस दिखते हैं, 2- दूध का खर्च बचता है, 3- साथ में बिस्किट नहीं देने पड़ते, 4- दुबारा नहीं मांगते, 5- हो सकता है दुबारा आएं भी नहीं...

    * मैंने एक ओला कैब बुक की थी, लेकिन फिर कैंसल कर दी क्योंकि ड्राइवर का नाम विकास बताया गया था, इसलिए उसके आने की कोई उम्मीद नहीं थी...

    * एक आदमी ने ओला टैक्सी की बुकिंग तक रद्द कर दी जब एसएमएस पर ड्राइवर का नाम नरेन्द्र दिखा। वह समझ गया कि यह ड्राइवर सिर्फ यू-टर्न लेते रहेगा।

    * मैंने ओला कैब की बुकिंग कैंसल कर दी क्योंकि एसएमएस पर ड्राइवर का नाम तुलसी दास खान आया था। मैं ऐसे आदमी के साथ सफर नहीं कर सकती जिसका नाम आज के माहौल में भी ऐसी साम्प्रदायिक एकता बताता हो...

    * मैंने ओला कैब की बुकिंग रद्द कर दी क्योंकि ड्राइवर का नाम अमर अकबर एंथोनी था, और मुझे धर्मनिरपेक्षता से नफरत है।

    * मैंने ओला कैब बुक की, और कैंसल नहीं की, क्योंकि वह कल का जोक था।

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Posted Date : 24-Apr-2018
  • जोगी पार्टी को अब तक चुनाव चिन्ह नहीं मिल पाया है। पार्टी नेताओं के मुताबिक जुलाई में ही चुनाव चिन्ह मिल पाएगा। पार्टी के मुखिया अजीत जोगी की केन्द्रीय चुनाव आयुक्त ओपी रावत से चर्चा की भी खबर है। रावत मध्यप्रदेश कैडर के अफसर हैं और वे जोगी के जूनियर रहे हैं। जोगी की उनसे पुरानी जान पहचान है। सुनते हैं कि जोगी ने चर्चा कर चुनाव चिन्ह जल्द आबंटन को लेकर बात की है। जोगी पार्टी ने आयोग के समक्ष नारियल चुनाव चिन्ह आबंटन का आग्रह किया था। लेकिन यह चिन्ह एक अन्य क्षेत्रीय दल को आबंटित   कर दिया गया है। हालांकि पार्टी के लोगों ने अभी भी नारियल को लेकर आस नहीं छोड़ी है। चुनाव चिन्ह आबंटन में देरी से पार्टी के कई बड़े नेता बेचैन हैं। चर्चा है कि एक दो बड़े पदाधिकारी कांग्रेस नेताओं के संपर्क में भी हैं। ये सभी कर्नाटक चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि यदि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनाती है, तो जोगी कांग्रेस के नेताओं का झुकाव कांग्रेस की तरफ हो सकता है। विपरीत नतीजे आने पर वे भाजपा के साथ हो सकते हैं। 

    देश से ब्रेन-ड्रेन, नेहरू जिम्मेदार
    देश में इन दिनों नेहरू को कोसने का खासा फैशन चल रहा है। इसे देशभक्ति और राष्ट्रवाद का सुबूत भी माना जा रहा है। ऐसे में एक जानकार ने इतिहास के तथ्य गिनाते हुए कहा कि देश से प्रतिभाशाली लोगों को देश के बाहर भेजने में भी नेहरू की साजिश रही। उन्होंने 1950 में पहला आईआईटी शुरू किया, 1956 में पहला एम्स शुरू किया, 1959 में पहला रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज शुरू किया, 1961 में पहला आईआईएम शुरू किया, 1961 में ही पहला नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन शुरू किया, इसी बरस उन्होंने शिक्षा की उत्कृष्टता वाली संस्था एनसीईआरटी शुरू की, अगले बरसल 1962 में उन्होंने सीबीएसई बोर्ड बनाया, 1963 में पहला केंद्रीय विद्यालय खोला, और 1963 में मध्यान्ह भोजन योजना शुरू की। अब नेहरू इतना सब न करते, तो भारत की प्रतिभा निखरती भी नहीं, और भारत छोड़कर जाती भी नहीं। महज घरेलू रोजगार-बाजार के लायक औसत दिमाग बनते, और देश से ब्रेन-ड्रेन होता ही नहीं। इसलिए विश्वस्तर के दिमाग तैयार करने के संस्थान बनाने की तोहमत भला नेहरू के अलावा और किस पर लगेगी? 
    इस लिस्ट की चर्चा के बाद बहस में शामिल कुछ लोग नेहरू के सिगरेट पीने, मांस खाने, और महिलाओं से उनकी दोस्ती पर उतर आए, क्योंकि और कोई तर्क नेहरू के खिलाफ बचा नहीं था।


    दिग्गजों को घेरने की तैयारी
    भाजपा अपनी चौथी बार सत्ता में आने के लिए रणनीति बना रही है। सुनते हैं कि पार्टी ने वर्ष-03 के विधानसभा चुनाव के फार्मूले पर अमल कर सकती है। इसमें दिग्गज कांग्रेस नेताओं के खिलाफ दमदार प्रत्याशी उतारकर उन्हें घेरने की योजना बना रही है। वर्ष-2003 में मरवाही में अजीत जोगी के खिलाफ नंदकुमार साय को चुनाव मैदान में उतारकर सबको चौंका दिया था। जोगी भारी मतों से चुनाव जीते, लेकिन उन्हें अंतिम के दिनों में प्रदेश के बाकी क्षेत्रों को छोड़कर अपने ही विधानसभा क्षेत्र में सिमटकर रहना पड़ा। कुछ इसी तरह कांग्रेस के बड़े नेताओं के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार उतारने की तैयारी चल रही है। कहा जा रहा है कि पार्टी से बाहर के कोई साफ छवि के सामाजिक कार्यकर्ता, चिकित्सक अथवा नौकरशाह को भी  प्रत्याशी बना सकती है। ऐसे लोगों की सूची भी तैयार की जा रही है। 


    शाकाहार ही सेहतमंद?
    भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अभी एक इश्तहार छपवाकर लोगों को यह समझाने की कोशिश की है कि मांसाहारी और अधिक शक्कर-मैदे वाली चीजें खाने वाले किस तरह मोटे होते हैं, और शाकाहारी किस तरह दुबले होते हैं। इसके लिए जो तस्वीर बनाई गई उसे अगर देखें तो इन दोनों ही शरीरों में जो सामान दिखाए गए हैं, वे विदेशी व्यंजनों की तस्वीरें हैं। मांसाहारी शरीर में दिखाए गए कई सामानों का तो  भारत चलन भी बड़ा ही सीमित है। 
    दूसरी तरफ शाकाहारी शरीर में जो फल दिखाए गए हैं, उनमें से बहुत से फल सीधे-सीधे विदेशी हैं, या भारत में बहुत ही कम चलन वाले हैं। देश की 90 फीसदी से अधिक आबादी ऐसे विदेशी फल चख भी नहीं पाती है, और उतने ही फायदेमंद हिंदुस्तानी सस्ते मौसमी फलों को इस तस्वीर में कोई जगह नहीं मिल पाई है। हालांकि मांसाहार के साथ-साथ कई मीठी और तली चीजों को जोड़कर उस खानपान से मोटापे के खतरे तो बताए गए हैं, लेकिन कुल मिलाकर इससे एक ऐसा संदेश निकलता है कि शाकाहार ही एक बेहतर खाना है। यह देश के सवर्ण तबके के एक छोटे से हिस्से का खानपान तो है, लेकिन देश का शायद तीन चौथाई हिस्सा मांसाहारी है, और मांसाहार में भी कई किस्म के आहार ऐसे बुरे नहीं रहते जैसे कि इस तस्वीर में दिखाए गए हैं। अब यह खानपान की एक खास संस्कृति को लोगों पर लादने की एक और कोशिश है?


    एक शहर, एक पार्टी, एक पीढ़ी से दो!
    राजनांदगांव शहर ने एक ही पीढ़ी के दो बड़े कांग्रेस नेताओं को हादसो में खोया है। पहले पूर्व विधायक उदय मुदलियार झीरम घाटी नक्सल हमले में चले गए और अब कुछ दिन पहले पूर्व महापौर विजय पाण्डेय अचानक लीवर खराब होने से दिवंगत हो गए। काफी कोशिशों के बाद भी पाण्डेय को नहीं बचाया जा सका। मुदलियार एक बार विधायक रहे और वे बेहद सक्रिय माने जाते थे। जबकि विजय पाण्डेय निर्दलीय महापौर चुनाव जीतकर चर्चा में आए। वे विद्याचरण शुक्ल के करीबी थे। विजय पाण्डेय राजनीति के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी काफी सक्रिय रहे हैं। 
    उन्होंने राजनांदगांव के दशहरा उत्सव को प्रदेश में पहचान दी। इसके अलावा अलग-अलग आयोजनों के चलते काफी सुर्खियों में रहे। कांग्रेस कीटिकट से महापौर चुनाव हारने के बाद पाण्डेय की सक्रियता कम नहीं हुई थी और वे शहर विकास के लिए लगातार सक्रिय रहे। उदय और विजय, नांदगांव से कांग्रेस के ऐसे नेता थे जिन्हें पार्टी मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार सकती थी। लेकिन  उनके नहीं रहने से न सिर्फ कांग्रेस बल्कि राजनांदगांव शहर की राजनीति में कमी महसूस की जा रही है।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 23-Apr-2018
  • देवव्रत सिंह की कांग्रेस में वापसी की कोशिशें हो रही है। उन्होंने  अपमानित महसूस कर कांग्रेस छोडऩे का निर्णय लिया था। सुनते हैं कि जिन लोगों की वजह से देवव्रत ने कांग्रेस छोडऩे का फैसला लिया था उनमें मध्यप्रदेश के एक कांगे्रस नेता कमलेश्वर पटेल भी थे। पटेल को अब छत्तीसगढ़ के प्रभारी सचिव पद से हटा दिया गया है। हालांकि यह कहा जा रहा है कि कमलेश्वर ने खुद होकर प्रभार छोडऩे का फैसला लिया था क्योंकि वे मध्यप्रदेश से चुनाव लडऩा चाहते हैं। लेकिन पार्टी के कुछ लोग मानते हैं कि देवव्रत प्रकरण की वजह से ही कमलेश्वर को यहां के प्रभार से मुक्त किया गया। 
    हुआ यूं कि कमलेश्वर छत्तीसगढ़ का प्रभारी सचिव बनने के बाद राजनांदगांव जिले के दौरे पर गए थे। खैरागढ़ में उन्होंने ब्लॉक पदाधिकारियों की बैठक बुलाई। कांग्रेस की बैठक हमेशा वहां के राजमहल परिसर स्थित भवन में होती रही है। राजघराने के मुखिया देवव्रत ने बैठक के लिए पहले से ही तैयारियां कर रखी थीं। लेकिन कमलेश्वर ने फरमान सुना दिया कि बैठक महल परिसर से बाहर होगी। इससे देवव्रत ने खुद को अपमानित महसूस किया और फिर पार्टी से अलग हो गए। अब कमलेश्वर के हटने के बाद उनकी वापसी के लिए पार्टी के कुछ प्रभावशाली नेता उनसे बात भी कर रहे हैं, लेकिन वे इसके लिए फिलहाल तैयार नहीं हैं।

    नफरत के साथ जियेंगे कैसे?
    सोशल मीडिया पर पिछले दो-चार दिनों से एक ऐसे आदमी की ट्वीट घूम रही है जिसे मुस्लिमों से बड़ी नफरत है। उसने लिखा कि उसने एक टैक्सी बुक की, और जब गाड़ी आई तो देखा उसका ड्राइवर एक मुस्लिम था। उसने बुकिंग कैंसल कर दी, और ट्वीट किया कि वह अपना पैसा किसी आतंकी को देना नहीं चाहता। उसकी इस खुली नफरत को लेकर सोशल मीडिया पर बहुत से लोग उसके खिलाफ आए, और बहुत से उसके साथ भी आए। दिलचस्प बात यह रही कि इस टैक्सी कंपनी ने भी इसके जवाब में ट्वीट किया और यह लिखा कि हमारे देश में यह टैक्सी सेवा एक धर्मनिरपेक्ष प्लेटफॉर्म है, और यह सर्विस अपने ड्राइवर-पार्टनरों या ग्राहकों से उनकी जाति, धर्म, जेंडर, किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं करती। टैक्सी सर्विस ने लिखा कि उसकी अपने ग्राहकों और ड्राइवर-पार्टनरों से अपील है कि हर वक्त एक-दूसरे के साथ सम्मानपूर्वक पेश आएं।
    अब जिन लोगों को मुस्लिम की चलाई टैक्सी से नफरत है, उनको कोई भी डीजल-पेट्रोल या रसोई गैस इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि ये सब मुस्लिम देशों से ही आते हैं। जिनको मुस्लिमों से नफरत है, उनको किसी धार्मिक उपवास के मौके पर काला नमक नहीं खाना चाहिए, क्योंकि वह पूरे का पूरा पाकिस्तान से ही आता है। उन्हें खजूर, छुहारा, या किसी भी किस्म के मेवे नहीं खाने चाहिए क्योंकि वे तकरीबन सारे के सारे मुस्लिम देशों से ही आते हैं। कल की ही खबर है कि सीरिया पर अमरीकी हमला अगर जारी रहा तो पेट्रोलियम के साथ-साथ जीरे का दाम भी बढ़ जाएगा। अब मुस्लिमों से नफरत करने वालों को छौंक में जीरा डालना बंद कर देना चाहिए। भारत में पाकिस्तान से ऊन, चमड़े के सामान, समेत कई तरह के तेल के बीज भी आते हैं, और इनके इस्तेमाल करने वालों को अपने बारे में सोच लेना चाहिए।
    अभी छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक के बाद दूसरी जगह नेकी की दीवार बन रही है ताकि लोग अपने गैरजरूरी कपड़े, जूते, और दिगर सामान लाकर वहां रख सकें, और जरूरतमंद उन्हें उठाकर ले जा सकें। अब नेकी की यह दीवार, दीवार-ए-मेहरबानी, बहुत पहले ईरान में बेघर लोगों के लिए शुरू हुई थी, और ठंड में मर जाने वाले लोगों को बचाने के लिए संपन्न लोग यहां पर सामान छोडऩे लगे थे। इसके पीछे की सोच थी- जरूरत न हो तो छोड़ जाओ, जरूरत हो तो ले जाओ। बाद में ईरान की इस सोच से पाकिस्तान में भी पिछले बरसों में ऐसी दीवारें बनीं, और पाकिस्तान के बाद भारत में यह काम शुरू हुआ। तो क्या अब मुस्लिम देशों से होकर आई इस सोच का भी मुस्लिम-विरोधी लोग नफरत करेंगे?
     

    विज्ञापन की दीवार भी बनाई जाए
    नेकी की दीवार की तर्ज पर ही 'विज्ञापन की दीवार' (दीवारों) की भी अत्यंत आवश्कता है। ऐसी दीवार पर अलग-अलग सेक्शन बना दिए जाएं ताकि टिफिन सेंटर, छात्रों के लिए कमरे उपलब्ध, गल्र्स हॉस्टल, फोटोकॉपी सेंटर, ड्राइविंग स्कूल, कोचिंग क्लासेस वगैरह-वगैरह के विज्ञापन लोग लगा सकें। इससे इतना फायदा तो अवश्य होगा कि शहर को स्मार्ट सिटी बनाने की दिशा में मदद मिलेगी और साथ ही मार्ग विभाजकों, उन पर लिखे निर्देशों (बाए चलिये वगैरह) पर विज्ञापन चस्पां करके नियमों की धज्जियों उड़ाना शायद बंद हो जाए। सार्वजनिक पार्कों के नजदीक ऐसी व्यवस्था संभवत: उचित रहेगी क्योंकि वहां हर वर्ग, हर उम्र और हर हैसियत के लोगों का आना जाना लगा रहता है। सड़क के निर्देश, संकेत भी सुरक्षित और उपयोगी बने रहेंगे। (rajpathjanpath@gmail.com)

    थैली वालों की तलाश
    कांग्रेस में रायपुर शहर की तीनों सीटों पर मजबूत प्रत्याशी की खोजबीन चल रही है। चर्चा है कि प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया ने कुछ प्रमुख नेताओं से नाम सुझाने के लिए कह दिया है। पार्टी यहां से साफ छवि के साथ-साथ युवा और विशेषकर आर्थिक रूप से मजबूत नामों को ही तरजीह देगी।
    सुनते हैं कि रायपुर की एक सीट में पार्टी को सिर्फ इसलिए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा क्योंकि प्रत्याशी ने चुनावी फंड को ब्याज पर दे दिया था। जबकि शहर के प्रत्याशियों को पार्टी ने बाकियों के मुकाबले दोगुनी राशि दी थी। यही नहीं, प्रचार में लगे कार्यकर्ताओं को कुछ पैसा देने के लिए एक वरिष्ठ नेता ने सिफारिश की थी लेकिन पैसा देना तो दूर, प्रत्याशी ने अपना मोबाइल ही बंद कर दिया। एक प्रत्याशी ने तो पैसे की कमी को लेकर राहुल गांधी के सामने भी रोना रो दिया था। पार्टी ने भरपूर मदद की लेकिन प्रत्याशियों ने पूरा खर्चा ही नहीं किया। इससे सबक सीखते हुए पार्टी उन नामों पर विचार कर रही है जो कि आर्थिक रूप से सक्षम हो और पैसे की कमी का रोना न रोए। 

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Posted Date : 22-Apr-2018
  • सुरक्षित यौन संबंध के लिए, नियोजित परिवार के लिए डॉक्टर कंडोम उपयोग करने की सलाह देते हैं। स्वास्थ्य विभाग इसके प्रचार-प्रसार के लिए विज्ञापनों में करोड़ों खर्च कर देता है। एक विज्ञापन में घर जाते असहज एक युवा को पुलिस वाला रोककर तलाशी लेता है तो कंडोम बरामद करता है और कहता है-समझदार हो...। इस विज्ञापन में यह पुलिसवाला कहां का था यह तो पता नहीं पर हमारी छत्तीसगढ़ पुलिस के लिए तो कंडोम आपत्तिजनक चीज है। कल रायगढ़ में पुलिस ने एक सैक्स रैकेट पकड़ा तो प्रेसवार्ता में एक आला अफसर ने पूरा ब्यौरा देते कहा कि इनके पास शराब के अलावा आपत्तिजनक चीज बरामद की गई। जानकारी मांगे जाने पर पता चला, वह आपत्तिजनक चीज थी-कंडोम। कल ही राजधानी रायपुर में भी एक होटल में भरी दुपहरी छापे में देह व्यापार में लिप्त लोगों को पकड़ा गया और इनके पास से भी आपत्तिजनक चीजें बरामद होने की बात कही गई। ब्यौरा देने वाले पुलिस वाले से जब आपत्तिजनक चीज के संबंध में पूछा गया तो उसका जवाब था- अरे, इसे भी नहीं जानते? इस्तेमाल तो किया होगा, फिर जोर देने पर झिझक के साथ कहा....कंडोम।
    किसी आरोपी से पूछताछ के दौरान धाराप्रवाह गालियों की बौछार करने वाले छत्तिसगढि़हा पुलिस वाले आखिर कंडोम से इतना घबराते क्यों हैं।  वैसे बस्तर में नक्सल मुठभेड़ के बाद बरामद सामानों में कंडोम का भी जिक्र होता है, लेकिन यहां आपत्तिजनक चीज नहीं कहा जाता। हथियारों, विस्फोटकों की बरामदगी के साथ साफ साफ बता दिया जाता है कि कंडोम भी इतनी मात्रा में मिले।  
    दरअसल, कंडोम टैबू बन गया है। इसी कारण आम जनता में भी  झिझक देखने को मिलता है और शायद इसे आपत्तिजनक स्वीकार कर लिया गया है। कुछ रुपयों के लिए ही सही, दो वयस्कों में आपसी सहमति से देह संबंध के दौरान कंडोम का आपत्तिजनक चीज बन जाना पीड़ादायक ही है। पुलिस को तो चाहिए कि पकड़े गए ऐसे लोगों से पहले पूछे कि क्या उसने कंडोम का इस्तेमाल किया है। नहीं किए जाने पर उन दोनों का मेडिकल परीक्षण कराए कि कहीं यौन जनित संक्रमण के शिकार तो नहीं हुए हैं। समझदार कहने से पहले उसे भी तो बनना होगा। सेक्स चाहे सामान्य हो, चाहे खरीदा हुआ हो, चाहे जबर्दस्ती हो, एक कंडोम का इस्तेमाल तो उसे सुरक्षित ही बनाता है, उसे एक अपराध के सुबूत की तरह दर्ज करके पुलिस महज अपनी उस सोच को ही जाहिर करती है जो कि भारत में पिछली और इस सदी में बच्चों को दी गई है। 

    आनंद तिवारी, नई पारी
    रिटायर्ड आईपीएस आनंद तिवारी नई पारी शुरू करने जा रहे हैं। उन्हें राज्य पॉवर कंपनी में ईडी (विभागीय जांच) के पद पर नियुक्ति दी गई है। कंपनी ने इस पद के लिए रिटायर्ड आईएएस-आईपीएस अफसरों के आवेदन बुलाए थे। लेकिन एकमात्र आनंद तिवारी का आवेदन आया और उन्हें दो साल की संविदा नियुक्ति मिल गई। 
    बताया गया कि राज्य पॉवर कंपनी में बड़ी संख्या में अफसरों के खिलाफ जांच चल रही है। कहा जाता है कि जांच कभी भी समय पर पूरी नहीं हो पाती है। गड़बड़ी के एक मामले की शिकायत की जांच 8 साल बाद तब पूरी हुई, जब अफसर तीन प्रमोशन पाकर रिटायर हो चुका था। कंपनी ने अफसरों के खिलाफ शिकायतों की पड़ताल के लिए अलग से सेल बनाने का निर्णय लिया है। राज्य शासन में विभागीय जांच आयुक्त का एक अलग से पद है। आनंद तिवारी का काम भी कंपनी के अफसरों की विभागीय जांच का रहेगा। तिवारी लंबे समय तक ईओडब्ल्यू और एसीबी में काम कर चुके हैं। रिटायर होने के बाद भी पुलिस मुख्यालय में महत्वपूर्ण कानूनी पेचीदगियों को निपटाने में उनकी अनौपचारिक सलाह ली जाती रही। उम्मीद है कि कंपनी में शिकायतों की पड़ताल अब तेजी से होगी।  


    बसना में शनिदेव
    छत्तीसगढ़ी लोकगायक स्व. शेख हुसैन ने किसी कार्यक्रम में कहा था-सराईपाली-बसना, सोच समझकर फंसना, यह वाक्य अब इतने चलन में आ गया है कि मुहावरे की तरह प्रयोग होने लगा है। चुनाव आने वाले हैं और कई नेता विधायक का टिकट हासिल करने अपनी-अपनी जुगत में लगे हैं। जनसंपर्क अभियान तो चल ही रहा है। गांव-गांव में इन दिनों अचानक कबड्डी, क्रिकेट, वॉलीबॉल आदि खेल प्रतियोगिताएं होने लगी हैं।  गांव में रामनाम यज्ञ शुरू होने लगे हैं। 
    इन सबमें इन नेताओं की आमद, कौन कितना बड़ा आयोजन कर पा रहा है इसे उस नेता की ताकत से जोड़ा जाने लगा है। बसना में राम-जानकी, गायत्री, संतोषी सभी विराजे जा जुके हैं। शनि की कमी थी, अब तक उनका आगमन नहीं हुआ था, एक नेता की ताकत देखने को मिली कि उनका शानदार दाखिला हुआ और एक मंदिर में शनिदेव स्थाई रूप से बिराज गए। शनि के चक्कर में अच्छे खासों को मंदिर का चक्कर लगाते देखा जा सकता है। पर शनि जिसके हाथों आकर विराजे उसका चक्कर न जाने कितने लगाते होंगे। कभी जिलाबदर, और अब कारोबार से इस्तीफा देकर फुलटाइम समाजसेवी बने इस नेता की चकरी कैसी चलेगी ये तो आने वाला वक्त बताएगा, बहरहाल, बसना में शनिदेव बस चुके हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 21-Apr-2018
  • सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील दुष्यंत दवे इन दिनों चर्चा में हैं। उन्होंने चर्चित जस्टिस लोया केस में बाम्बे हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से पैरवी की, जो कि जस्टिस लोया की मौत को संदिग्ध बताते हुए जांच की मांग करते रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जांच की मांग खारिज कर दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में अपने धारदार तर्कों से दुष्यंत दवे ने बहुतों को प्रभावित किया।
    उन्होंने सीधे-सीधे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी निशाने पर लिया, जिनके प्रकरण की सुनवाई जस्टिस लोया कर रहे थे।  आप सोच रहे होंगे कि दुष्यंत दवे की चर्चा क्यों की जा रही है। दवे गुजराती हैं और वकालत के पेशे में उनकी साख अच्छी है। वे मोदी-शाह के विरोधी माने जाते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के लिए उनके मन में काफी सम्मान है। कुछ साल पहले ओडिशा में छत्तीसगढ़ खनिज निगम को आबंटित कोल ब्लॉक से जुड़े एक प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट में व्यस्तता के बावजूद पैरवी के लिए सिर्फ इसलिए तैयार हुए, कि सीएम रमन सिंह अच्छे व्यक्ति हैं और यह बात वहां मौजूद राज्य सरकार के अफसरों से भी कही। खास बात यह है कि  दुष्यंत दवे से रमन सिंह का कोई खास संपर्क नहीं रहा है, लेकिन उन्हें लेकर प्रदेश और बाहर में जो धारणा बनी है, उसकी वजह से ही वे अब तक, 15वें बरस में भी, नाबाद हैं। 

    फिक्र लड़कों के मां-बाप को भी...

    भाजपा ने कुछ समय पहले कांगे्रसमुक्त भारत का नारा दिया। अभी आरएसएस प्रमुख ने इससे अपनी असहमति जताई और कहा कि देश में विपक्ष की भी जरूरत रहती है। अब इंटरनेट और सोशल मीडिया पर एक नया नारा शुरू हुआ है बलात्कारमुक्त भारत। लोग इस हैशटैग के साथ ट्विटर पर तरह-तरह की पोस्ट कर रहे हैं। और बलात्कार आज सचमुच ही इतना बड़ा मुद्दा बन गया है कि लोग अपने बच्चों के बारे में सोचते हुए तुरंत ही इस बारे में सोचने लगे हैं। एक वक्त था जब लड़कियों के मां-बाप फिक्रमंद रहते थे कि लड़की बड़ी होगी तो उसकी हिफाजत करना मुश्किल हो जाएगा। देश के ऐसे माहौल में कैसे चैन से सो सकेंगे जब लड़की घर के बाहर जाएगी। लेकिन इन दिनों एक दूसरे किस्म की फिक्र भी सामने आ रही है। लड़कों के मां-बाप भी फिक्रमंद हैं कि कहीं लड़के ऐसे किसी सेक्स-अपराध में न फंस जाएं। लोगों को लगता है कि बुरी संगत में पड़कर अगर कहीं लड़का ऐसा कुछ कर बैठे तो वे समाज में मुंह कैसे दिखाएंगे, और कोर्ट-कचहरी में अपनी ही औलाद को बचाएंगे या नहीं बचाएंगे।
     कुल मिलाकर बलात्कार का तनाव लोगों की सामान्य जिंदगी और सामान्य सोच को बहुत बुरी तरह कुचल रहा है। छोटे-छोटे बच्चों के साथ हो रहे बलात्कार, और खासकर स्कूल में टीचर, पड़ोस के लोग, घर के लोग जिस तरह बलात्कार में शामिल रहते हैं, उसे देख-देखकर लोगों का अपने आसपास के लोगों पर से भी भरोसा उठ रहा है, और यह भी कम तनाव की बात नहीं है, अगर अपने सबसे करीबी लोगों से भी परिवार के बच्चों और महिलाओं को लेकर चैन और भरोसे के साथ नहीं रहा जा सकता, तो फिर जिंदगी का चैन तो छिनना ही है। (  rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 20-Apr-2018
  • प्रदेश के एक बड़े शराब कारोबारी मुश्किलें बढ़ सकती है। कुछ महीने पहले उनके यहां आयकर छापा पड़ा था। यह परिवार होटल, शराब सहित कई तरह के कारोबार से जुड़ा है। इसका कारोबारी मुखिया अपने अपार राजनीतिक-प्रशासनिक संपर्कों के लिए जाना जाता है। 
    आयकर छापे के बाद भी कोई खास दिक्कत न होने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन पिछले कुछ समय से चल रही जांच का दायरा अब बढऩे के संकेत हैं। सुनते हैं कि आयकर विभाग बेनामी कंपनियों के साथ लेन-देन सहित अन्य मामलों को लेकर प्रकरण प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को सौंपने की तैयारी कर रहा है। यदि ऐसा होता है तो इस कारोबारी की समस्याएं बढ़ सकती है। 
      
    ईसा को हिंदू बनाने की कोशिश
    इन दिनों सोशल मीडिया उफनता और झाग बिखराता हुआ एक ऐसा बर्तन हो गया है जो तेजाबी गंध भी फैलाते रहता है। लोग अपनी सोच के मुताबिक सोशल मीडिया पर शौच फैलाते रहते हैं, और फिर उनके मुकाबले, उनके जवाब में दूसरे लोग अपनी शौच फैलाते हैं। सोशल मीडिया पर बहस का तथ्य और तर्क से रिश्ता रफ्तार से खत्म हो जाता है और लोग अपनी नफरत फैलाने में लग जाते हैं। कुछ दूसरे लोग जो कम हिंसक रहते हैं, वे दूसरों को सहमत कराने में जुट जाते हैं क्योंकि उनकी नजर में असहमति की कोई जगह नहीं रहती है।
    ऐसी ही एक बहस में एक समझदार इंसान ने असहमत लोगों को समझाया कि कुदरत की विविधता की तरह कई तरह की सोच एक साथ चल सकती हैं, और किसी एक सोच के एकाधिकार की जरूरत नहीं रहती। उसने दूसरों को यह भी समझाने की कोशिश की कि जो लोग अपने विचारों पर कट्टर हैं, उनके ख्याल बदलने के लिए मेहनत नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह ईसा मसीह को हिंदू बनाने की कोशिश सरीखा काम होगा। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 19-Apr-2018
  • विधानसभा चुनाव के पहले डीजीपी ए एन उपाध्याय को बदले जाने की संभावना नहीं है। उपाध्याय को चार साल पूरे हो गए। वे अगले साल रिटायर होंगे। सुनते हैं कि पिछले कुछ समय से उन्हें बदलने के लिए अलग-अलग स्तरों पर प्रयास भी हुए थे। कुछ लोगों ने डीजी (नक्सल) डीएम अवस्थी को ही डीजीपी बनाने का सुझाव दिया था। आईबी में एडिशनल डायरेक्टर बीके सिंह भी खुद होकर प्रयास कर रहे थे। डीजी (जेल) गिरधारी नायक के लिए भी कई सिफारिशें आई थी। लेकिन अंदर की खबर यह है कि चुनाव को छह माह बाकी रह गए हैं और ऐसे में सीएम ने अब बड़े स्तर पर बदलाव के पक्ष में नहीं है। अवस्थी को लेकर यह साफ कहा गया है कि वे नक्सल मोर्चे पर बेहतर काम कर रहे हैं और इसमें किसी तरह बदलाव से समस्याएं पैदा हो सकती है। वैसे भी उनके रिटायरमेंट में काफी समय बाकी है। इन सबके बावजूद उपाध्याय के पक्ष में यह बात जाती है कि उनकी साख अच्छी है और कुछ पूर्ववर्तियों की तरह उनका नाम कभी किसी लेन-देन में नहीं आया। ऐसे में कम से कम चुनाव से पहले बदले जाने की संभावना खत्म हो गई है। यह एक अलग बात है कि इन दिनों एक बड़े आईएएस अफसर से असहमति और बहस के दौरान उन्हें फोन पर चीख-पुकार के बीच यह भी सुनना पड़ा कि वे (आईएएस) उन्हें (उपाध्याय को) इस कुर्सी से हटवाकर रहेंगे। यह बात सुनकर पीएचक्यू के आला अफसर हक्का-बक्का रह गए, और उनमें से कुछ का मानना था कि इस बदसलूकी का जमकर विरोध किया जाना चाहिए, लेकिन अपने शांत और संन्यासी मिजाज के मुताबिक उपाध्याय ने इसे भी बर्दाश्त कर लिया। राज्य के एक सबसे बड़े अफसर को कुर्सी से हटवाने की धमकी का यह पहला मामला है, और मुख्यमंत्री तक इस बात को पहुंचाकर लोग उनके रूख का इंतजार कर रहे हैं। 

    खुद होकर छोड़ा मंत्री दर्जा
    छत्तीसगढ़ वित्त आयोग के अध्यक्ष चन्द्रशेखर साहू ने खुद होकर मंत्री स्तर का दर्जा छोड़ दिया है। अचानक उन्हें लालबत्ती और इस दर्जे से वैराग कैसे हो गया, इसका भी एक रहस्य है। उन्हें मंत्री के दर्जे के साथ अध्यक्ष की तनख्वाह किसी मंत्री के बराबर करीब पौन लाख रुपये मिलती थी। बहुत समय तक वे इतनी तनख्वाह में संतुष्ट थे। लेकिन बाद में वित्त आयोग के एक सदस्य की तनख्वाह का कागज उनके सामने आया जिसमें तनख्वाह उनसे करीब दो गुना थी। वे हक्का-बक्का रह गए, और दरयाफ्त की। पता लगा कि वित्त आयोग के अध्यक्ष के रूप में उनकी तनख्वाह हाईकोर्ट के जज के बराबर होनी चाहिए थी जो करीब ढाई लाख रुपये महीने होती। लेकिन मंत्री स्तर के दर्जे की वजह से वह घटकर करीब एक चौथाई ही थी। ज्ञानचक्षु खुलते ही वे तेजी से मंत्रालय भागे, और अपना मंत्री का दर्जा खत्म करवाया, और तनख्वाह बढ़वाई। लेकिन अभी भी जब-जब अघोषित रूप से मंत्री दर्जे की सुविधा पानी होती है, वे लालबत्ती और सायरन का इस्तेमाल कर लेते हैं, लेकिन पहली तारीख आते ही वे इस दर्जे को भूल जाते हैं और जज दर्जे की तनख्वाह लेने लगते हैं।

    मरणोपरांत प्रमोशन
    अभी पीएससी के सामने खुलकर एक प्रमोशन के मामले आए हैं। इनमें से कुछ अफसर-कर्मचारी तो प्रमोशन मांगते-मांगते रिटायर भी हो चुके हैं लेकिन सरकारी नियमों में रिटायरमेंट के बाद भी पिछली तारीख से प्रमोशन का इंतजाम है। लेकिन अब एक केस ऐसा भी आया है जिसमें अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त का अधिकारी गुजर चुका है, और उसकी पत्नी ने मध्यप्रदेश में उसे प्रमोशन न दिए जाने के खिलाफ अपील की है, और मांग की है। सरकार में नियम देखकर अफसरों ने यह पाया है कि मृत्यु के बाद भी प्रमोशन हो सकता है अगर जीते-जी किसी गलती से या लापरवाही से वह न दिया गया हो। हालांकि खुद सरकार के भीतर बहुत से लोगों को ऐसी व्यवस्था की जानकारी नहीं है। 


    कार से बिलासपुर आने तैयार
    छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट में एक केस लडऩे के लिए दिल्ली के एक बड़े वकील से बात करने रायपुर से एक बड़े अफसर गए। उन्होंने हाईकोर्ट का नाम सुना, तो हामी भर दी। वहां के लिए टिकट बुक करने की बात हुई तो कहा कि वे कार से आ जाएंगे। अफसर हक्का-बक्का रह गए कि इस गर्मी में कोई दिल्ली से बिलासपुर करीब 14 सौ किलोमीटर कार से क्यों आना चाहते हैं? जब उन्हें बताया गया कि रायपुर तक प्लेन से आकर यहां से तीन घंटे के कार सफर से बिलासपुर पहुंचा जा सकता है, तो उनका हौसला पस्त हो गया। वे 400 किलोमीटर दूर हिमाचल के बिलासपुर की बात समझ रहे थे, फिर उन्हें याद पड़ा कि वहां के बिलासपुर में तो जिला अदालत ही है, हाईकोर्ट नहीं। और फिर छत्तीसगढ़ के नाम पर उनकी फीस बढ़ गई।


    नई पोस्टिंग के आसार
    सरकार ने सीनियर आईएफएस अफसर आलोक कटियार की पोस्टिंग आरडीए सीईओ के पद पर कर दी है, लेकिन उन्होंने अब तक जॉइनिंग नहीं दी है। सुनते हैं कि कटियार अपनी नई पोस्टिंग से खुश नहीं हंै और आरडीए सीईओ बनने के बजाए वापस वन विभाग में जाना पसंद करेंगे। कटियार वैसे भी एपीसीसीएफ स्तर के अफसर हैं और आरडीए सीईओ पद पर एडिशनल कलेक्टर दर्जे के अफसर ही रहते आए हैं। जल्द ही उनकी पोस्टिंग बदल सकती है। 

    * महाभारत काल में इंटरनेट था, मामा शकुनि ने युधिष्ठिर से जुए में उनका डेढ़ जीबी डेटा तक जीत लिया था।
    अगर त्रिपुरा के सीएम के अनुसार महाभारत काल में 'इंटरनेट' था  तो उस हिसाब से तो आज हमारे देश के लोगों के हाथों में 'मोबाइल'  फोन की जगह एक-एक 'सेटेलाईटÓ होने चाहिए थे।

    *  भारत में इंटरनेट, सैटेलाइट, प्लास्टिक सर्जरी सब था। महाभारत काल से ही। बस शौचालय नहीं थे जो मोदी अब बनवा रहे हैं।

    *  महाभारत काल में इंटरनेट था, बी आर चोपड़ा ने पूरी महाभारत टोरेंट से डाउनलोड कर ली थी।

    *  कोई मोरनी की आँखों से वीर्यपात करा रहा है, कोई महाभारतकाल में इंटरनेट इंवेंट किए बैठा है, किसी ने गोबर से परमाणु बम विकसित किया हुआ है... बस एक शौचालय का इंवेंशन ही मोदीजी के हिस्से में आ पाया..

    *  महाभारत काल में इंटरनेट था, अर्जुन के बाणों में चिप लगी थी 

    *  नेहरू की जगह सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बना दिया जाता तो रामायण काल में भी बीजेपी इंटरनेट लगवा देती।

    *  महाभारत काल में इंटरनेट था। सोचिए फिर भी उन्होंने महाभारत करना चुना, इंटरनेट पर डिबेट करना नहीं। :)

    *  महाभारत काल में इंटरनेट था और शकुनि मामा ने मोबाइल पर लूडो किंग हैक करके पांडवों को हराया था।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 18-Apr-2018
  • तकनीक और बाजार ने हमारी सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं तक में घुसपैठ कर ली है। डिजिटल तकनीक से बने शोक संदेश के कार्ड में जब पहली बार मृतक की तस्वीर देखी तो याद आया कि पहले किस तरह कार्ड का कोना फटा रहता था और पाने वाला अपढ़ भी समझ जाता था कि इसमें मौत की खबर है। वहीं पढऩे वाले इसे तुरंत फाड़ देते थे। पूर्व केबिनेट मंत्री भाजपा के वरिष्ठ नेता हेमचंद यादव के तेरहवीं के शोक संदेश कार्ड में उनकी रंगीन तस्वीर भी छपी है। पारंपरिक रूप से किसी व्यक्ति की तस्वीर को फाड़ा नहीं जाता उसे नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। जिस तरह हम दीवाली में सफाई करते वक्त घर में लगे देवी-देवताओं की पुरानी तस्वीरों को नदी में विसर्जित करते हैं। अब इस कार्ड को लेकर कइयों को असमंजस का सामना करना पड़ सकता है?
    अभी कुछ समय पहले एक परिचित के यहां तेरहवीं में भगवत् गीता की कॉपी प्रसाद के साथ बांटी गई। इसमें मृतक की तस्वीर छापी गई थी। इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई कि चूंकि भगवत गीता पूजा घर में या फिर पूजा वाली जगह रखी जाती है तो फिर मृतक की तस्वीर वाले भगवत गीता को कहां रखा जाए। यहां भी लोग असमंजस में दिखे। अब कुछ ने विसर्जित करने की सलाह दी। 
    असमंजस के ये हालात दुख वाली घटनाओं के साथ ही नहीं खुशी में देखने को मिलते हैं। एक परिचित अपने बेटे का शादी कार्ड लेकर पहुंचे। दरअसल वह कार्ड नहीं कैलेंडर था। गणेश और देवी-देवता की तस्वीर वाले इस कैलेंडर में शादी में बंधने वाले जोड़े की भी तस्वीर लगी थी। न्यौता देने आए इन परिजन का कहना था कि लोग कार्ड फें क देते हैं कैलेंडर घर में कम से कम टंगा रहेगा, याद भी बना रहेगा। पर शादी के कुछ ही माह बाद दोनों में तलाक हो गया। अब भी कई परिचितों के घर ये कैलेंडर टंगा मिलता है।
    वैसे इन दिनों अमेजन खरीदी वेबसाईट पर अंतिम क्रिया कर्म का पूरा किट मात्र 2999 में मिल रहा है। अमेजन के मुताबिक यह 4 मार्च को पहली बार लॉन्च हुआ है। दरअसल बाजार का निजी जीवन में दखल इतना बेहिसाब बढ़ता जा रहा है कि पैदा होने से लेकर मृत्यु तक में बाजार शामिल हो गया है। वह भी नए जमाने वाले ई बाजार के साथ।

    एक परिवार, दो बंगले
    सीएस अजय सिंह की छवि शांत और साफ-सुथरे अफसर की है। वे जल्दबाजी में कभी कोई फाईल नहीं करते हैं और किसी के दबाव में भी नहीं आते हैं। प्रशासनिक हल्कों में उनकी पहचान नियमपसंद अफसर की है। लेकिन उनके सरकारी बंगलों को लेकर कानाफूसी चल रही है। सीएस बनने के बाद अजय सिंह नए सरकारी बंगले में शिफ्ट हो गए। यह बंगला विवेक ढांड ने सीएस का पद छोडऩे से एक माह पहले ही खाली कर दिया था। अजय सिंह इससे पहले शांतिनगर स्थित सरकारी बंगले में रहते थे। सीएस वाले बंगले में शिफ्ट होने के बाद भी पुराने बंगले पर कब्जा बरकरार है। हालांकि यह बंगला उनकी पत्नी मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ. आभा सिंह के नाम आबंटित हो गया है। प्राइम लोकेशन के सरकारी बंगले के लिए वैसे ही मारामारी रहती है। ऐसे में सीएस परिवार के पास दो सरकारी बंगले को लेकर चर्चा चल रही है और कुछ लोग इसे नियम कायदे से भी जोड़कर देख रहे हैं। 

    मोदी-भंजदेव बातचीत
    धुर नक्सल इलाके बीजापुर में पीएम का दौरा हर लिहाज से सफल रहा। नक्सल धमकी के बावजूद पीएम की सभा में लोगों की भीड़ संतोषजनक रही। बीजापुर जाने से पहले जगदलपुर एयरपोर्ट पर पीएम ने सीएम-सरकार के मंत्री और भाजपा के चुनिंदा पदाधिकारियों से मुलाकात की। लेकिन पीएम की युवा आयोग के अध्यक्ष कमलचंद भंजदेव से चर्चा ने सबका ध्यान खींचा। भंजदेव से पीएम करीब चार-पांच मिनट तक अकेले में बात करते रहे। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 17-Apr-2018
  • युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए योग्य नामों पर मंथन चल रहा है। पार्टी हाईकमान ने अलग-अलग राज्यों से कुछ युवा नेताओं को बुलाया भी था। इनमें छत्तीसगढ़ से विधायक उमेश पटेल भी थे। नक्सल हमले में पिता नंदकुमार पटेल के दिवंगत होने के बाद उमेश सक्रिय राजनीति में आए और खरसिया से विधायक निर्वाचित हुए। 
    इंजीनियरिंग में स्नातक उमेश पटेल पर पार्टी हाईकमान की निगाह पहले से ही रही है। राहुल गांधी, उमेश के हौसले और इच्छा शक्ति के कायल हैं। राहुल के बस्तर प्रवास के दौरान पार्टी मीटिंग में जब उमेश ने उसी स्थान से परिवर्तन यात्रा आगे बढ़ाने की इच्छा जताई थी जहां उन्होंने अपने पिता और बड़े भाई को खोया था, तो हर किसी ने उनकी तारीफ की। 
    सुनते हंै कि हाईकमान ने उनसे युवक कांगे्रस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की इच्छा को लेकर चर्चा भी की। कहा जा रहा है कि उमेश ने विनम्रता पूर्वक फिलहाल इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभाने में असमर्थता जता दी है। बताते हैं कि उन्होंने कहा कि इस साल राज्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं, साथ ही वे भी विधानसभा चुनाव में उतरेंगे। ऐसे में बाकी राज्यों की तरफ ध्यान दे पाना मुश्किल होगा। उमेश के तर्क से संतुष्ट पार्टी हाईकमान ने उन्हें राज्य में ही काम करने की छूट दे दी है। 

    अमित जोगी की फड़कती बाहें
    जोगी पार्टी ने संस्थापक पूर्व सीएम अजीत जोगी के जन्मदिन 29 अप्रैल को अपनी ताकत दिखाने की तैयारी की है। इस मौके पर सार्इंस कॉलेज मैदान में सभा आयोजित की गई है। जिसमें एक लाख से अधिक लोगों के आने का दावा किया जा रहा है। कार्यक्रम में अतिथि के रूप में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बैनर्जी, बसपा प्रमुख मायावती, तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव को भी आमंत्रित किया गया है। लेकिन ये लोग आएंगे या नहीं तय नहीं है। भीड़ जुटाने के लिए सभी विधानसभा प्रत्याशियों और पार्टी पदाधिकारियों को टारगेट दिया गया है और जरूरी सुविधाएं भी मुहैया कराई जा रही है। उम्मीद के मुताबिक भीड़ जुटने के आसार देखकर अमित जोगी अपने विरोधियों को चुनौती दे रहे हैं। कांग्रेस नेताओं को तो यहां तक कह दिया कि वे साईंस कॉलेज मैदान में राहुल गांधी सभा कराकर दिखाएं। फिलहाल भाजपा के लोग उनकी बयानबाजी का मजा ले रहे हैं। 

    बसपा के लिए राहुल तैयार नहीं?
    विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बसपा के तालमेल को लेकर अटकलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। हालांकि दोनों ही दल के नेता इससे इंकार भी कर रहे हैं, लेकिन पार्टी के अंदरखाने में बहुत कुछ चल रहा है। सुनते हैं कि प्रदेश प्रभारी पी एल पुनिया ने पिछले दिनों राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से चर्चा की। हल्ला यह भी है कि प्रदेश कांग्रेस तालमेल होने की स्थिति में बसपा को अधिकतम 10 सीटें देने के लिए तैयार है। लेकिन राहुल ने कहा बताते हैं कि तालमेल को लेकर किसी भी तरह की चर्चा करना अभी उचित नहीं है। चुनाव नजदीक आने पर आगे कोई बात हो सकती है। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 16-Apr-2018
  • राजधानी रायपुर को स्मार्ट बनाने के लिए करोड़ों रूपए खर्च किए जा रहे हैं।  लेकिन पुरानी समस्या यथावत बनी हुई है। पिछले बरसों की तरह इस साल भी गर्मी शुरू होते ही पेयजल की समस्या सामने आई। पाईप लाईन लीकेज होने से कई जगहों पर गंदा पानी सप्लाई होने लगा और फिर इससे पीलिया फैल गया। इस साल पीलिया से अब तक शहर के आधा दर्जन से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। पिछले साल इसी तरह गर्मियों की शुरूआत में पीलिया से एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई थी। पिछली गलतियों से निगम के अमले ने कोई सबक नहीं सीखा। हड़बड़ाहट में शहर के बाहरी इलाके मोवा में भारी मात्रा में क्लोरीन के टेबलेट बांटकर आ गए। शहर को स्मार्ट बनाने के चक्कर में निगम अफसर लोगों को यह बताना भूल गए कि क्लोरीन टेबलेट का इस्तेमाल किस तरह किया जाना है। क्लोरीन टेबलेट को पानी में डाला जाता है और फिर छानने के बाद पानी रोगाणुविहीन हो जाता है और फिर यह पानी पीने योग्य रहता है। लेकिन बस्तियों में बीमारी फैलने से डरे लोगों ने टेबलेट खाना शुरू कर दिया। इसके चलते कई लोगों को दस्त की शिकायत होने लगी।   (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 15-Apr-2018
  • हेमचंद यादव के निधन से विशेषकर प्रेमप्रकाश पाण्डेय, बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर और शिवरतन शर्मा को सदमा लगा है। ये सभी युवा मोर्चा और कॉलेज के जमाने से ही एक-दूसरे के साथ रहे हैं। भाजपा की गुटीय राजनीति में भी वे साथ रहे। वर्ष-2008 में   जब प्रेमप्रकाश पाण्डेय और अजय चंद्राकर चुनाव हार गए, तो हेमचंद यादव ने दोनों का भरपूर ख्याल रखा। यादव ने अपने उच्च शिक्षा विभाग में अजय चंद्राकर को हर तरह से फैसले लेने की छूट दे रखी थी। 
    विभागीय अफसरों को अजय की सिफारिश का पूरा ध्यान रखने के आदेश दिए गए थे। यादव सिंचाई, परिवहन, पंचायत और उच्च शिक्षा जैसे मलाईदार विभाग के मंत्री रहे, लेकिन वे फक्कड़ ही रहे। उनके विभाग की मलाई दूसरे ही छानते रहे। पैसे न होने के बावजूद  उनकी मित्र मण्डली ने उन्हें किसी तरह की कोई कमी नहीं होने दी। उनके जन्मदिन पर दुर्ग शहर बैनर-पोस्टर से अटा पड़ा रहा। इसका खर्चा भी उनकी मित्र मण्डली ने वहन किया था। हाल यह रहा कि गंभीर बीमारी से जूझने के लिए इलाज के पैसे तक नहीं थे। ऐसे में बृजमोहन, प्रेमप्रकाश और अजय ने भरपूर जिम्मेदारी निभाई। खुद सीएम भी इन तीनों के संपर्क में थे और यह कहा गया था कि देश से बाहर भी ले जाना पड़े, तो उन्हें ले जाए। लेकिन हेमचंद को बचाया नहीं जा सका। अब उनके दशगात्र कार्यक्रम को जोर-शोर से करने की तैयारी की जा रही है। इसमें भी तीनों मंत्री लगे हैं। 

    नामकरण का सरप्राइज
    आखिरकार दुर्ग विश्वविद्यालय का नामकरण दिवंगत मंत्री हेमचंद यादव के नाम कर दिया गया। पिछले कुछ समय से विश्वविद्यालय के नामकरण को लेकर माथापच्ची हो रही थी। कुछ संगठनों ने अलग-अलग सुझाव भी दिए थे। लेकिन हेमचंद यादव के निधन के बाद उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने विवि का नामकरण उनके नाम से करने की इच्छा जताई। प्रेमप्रकाश की हेमचंद से नजदीकियां   किसी से छिपी नहीं रही है। सुनते हैं कि प्रेमप्रकाश ने जब अपने मन की बात सीएम को बताई, तो वे तुरंत तैयार हो गए। सीएम भी हेमचंद को काफी पसंद करते थे। 
    चर्चा यह है कि विवि के नामकरण की जानकारी प्रेमप्रकाश के अलावा बृजमोहन अग्रवाल और अजय चंद्राकर को ही थी। दिवंगत पूर्व मंत्री की अंत्येष्टि के बाद सीएम ने जब श्मशानघाट में ही विवि का नाम हेमचंद यादव के नाम से करने की घोषणा की, तो हर कोई भौंचक्का रह गया। कहा जा रहा है कि प्रेमप्रकाश और उनसे जुड़े लोगों को शंका थी कि नामकरण को लेकर देरी से वाद-विवाद भी हो सकता है। ऐसे में बिना किसी देरी के तुरंत घोषणा चाह रहे थे और सीएम ने उनकी बात रख ली। 

    दो प्रसारण आगे-पीछे
    छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश के लिए कल का दिन बड़ा महत्वपूर्ण था। बाबा साहब अंबेडकर के जन्मदिन पर दोनों प्रदेशों में एक साथ बड़े-बड़े कार्यक्रम हुए, छत्तीसगढ़ के बस्तर में प्रधानमंत्री ने दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की, और मध्यप्रदेश के महू में  राष्ट्रपति का तकरीबन उसी समय भाषण हुआ जहां पर अंबेडकर की स्मृति में सबसे बड़ा कार्यक्रम था। जब दोनों प्रसारण साथ-साथ चल रहा था, तो यह लग रहा था कि कहीं दोनों के भाषण आपस में न टकराएं, लेकिन फिर राष्ट्रपति का भाषण पहले खत्म हो गया और उसके बाद प्रधानमंत्री का भाषण शुरू हुआ। अब यह तो नहीं मालूम कि इन दोनों के अलग-अलग समय को सावधानी से आगे-पीछे रखा गया था, या यह अचानक हुआ, लेकिन टीवी पर देखकर भाषण सुनने और नोट करने वाले मीडिया को इससे सहूलियत जरूर हो गई। 

    यह छत्तीसगढ़ में ही चल सकता है...
    छत्तीसगढ़ के तेंदूपत्ता फड़मुंशियों को साइकिल देने की मुख्यमंत्री की घोषणा अब पूरी होने जा रही है, और दस हजार से अधिक साइकिलों की खरीदी के आदेश दे दिए गए हैं। तेंदूपत्ता कारोबार से जुड़े एक जंगल अफसर का कहना है कि तमाम फड़मुंशी वैसे भी मोटरसाइकिल चलाते हैं, इसलिए साइकिल का पता नहीं उनके लिए कितना महत्व होगा। लेकिन मुख्यमंत्री ने अपनी तरफ से ये आदेश भी दिए हैं कि साइकिल किसी रद्दी कंपनी की न हो, और सबसे अच्छी क्वालिटी की साइकिल ही दी जाए। इसके अलावा बहुत बड़ी संख्या में स्कूली बच्चियों को भी आने वाले दिनों में साइकिलें बंटने वाली हैं। लेकिन उत्तरप्रदेश से छत्तीसगढ़ आने वाले एक बड़े भाजपा नेता ने साइकिलों के मुद्दे पर कहा कि यह छत्तीसगढ़ में तो किया जा सकता है, लेकिन भाजपा सरकार उत्तरप्रदेश में इसे नहीं कर सकती क्योंकि वहां हर साइकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह बनकर भाजपा का नुकसान ही करेगी। छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांगे्रस के अलावा जो तीसरी पार्टी मैदान में रहेगी वह है अजीत जोगी की कांग्रेस। इस पार्टी ने नारियल चुनाव चिन्ह मांगा था, जो कि उसे मिला नहीं। मिल जाता तो बाकी पार्टियां पूजा-पाठ में पता नहीं उस चुनाव चिन्ह से कैसे परहेज करतीं।

    पीएम विजिट रद्द होने की खबर
    इंटरनेट पर कुछ सौ रुपये में डोमेन-नेम बुक करके कुछ हजार रुपये में एक न्यूज पोर्टल शुरू करना बड़ा आसान हो गया है और जिस तरह आसानी के हर काम में गलतियों का खतरा अधिक रहता है, एक न्यूज पोर्टल ने अभी तीन दिन पहले नक्सल खतरे को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का छत्तीसगढ़ का दौरा रद्द हो जाने की खबर पोस्ट की, और फिर उसे वॉट्सऐप पर फैलाया भी। जरूरत से अधिक सस्ता औजार कई बार ऐसी चूक करवा देता है। अखबार छापना महंगा कारोबार रहता है इसलिए चौकन्नापन कुछ अधिक रहता है।

    * बलात्कार का आरोपी उप्र का भाजपा विधायक सेंगर इससे पहले बसपा और सपा से विधायक था। मतलब यह कि उसे हर पार्टी में रहते हुए तजुर्बा हासिल होते रहा

    * कांग्रेस करोड़ों खर्च करके अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसके नेता कुछ सौ रुपये के छोले-भटूरे खाकर उसकी मेहनत पर पानी फेर दे रहे हैं। और भक्त हैं कि 399 के रिचार्ज में हर वोटर तक खाने-पीने की फोटो फैला दे रहे हैं।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 12-Apr-2018
  • सरगुजा के सांसद कमलभान सिंह का बताया जा रहा एक ऑडियो दो-तीन दिनों से खबरों में बना हुआ है जिसमें वे अपनी ही पार्टी, भाजपा, के एक सवर्ण नेता को गालियां दे रहे हैं। इससे कुछ अलग-अलग बातें निकलकर सामने आ रही हैं। पहली बात तो यह कि आदिवासी बहुल सरगुजा में भाजपा के भीतर का हाल कुछ गड़बड़ है। एक सवर्ण पार्टी पदाधिकारी पिछले कुछ दिनों से इस सांसद के खिलाफ सोशल मीडिया और मैसेंजर पर प्रचार छेड़े हुए थे। उसी को लेकर बिफरे हुए सांसद ने तीसरे दर्जे की गालियां देते हुए यह खुली धमकी दी कि उनके बेटे-बेटियां आकर इस पार्टी पदाधिकारी को सड़क पर जूतों से पीटेंगे। सांसद को यह अंदाज था कि उनकी बात की रिकॉर्डिंग हो रही है, और इस टेलीफोन कॉल में वे इस बात को बार-बार बोल भी रहे हैं, और इसके साथ-साथ गंदी गालियां भी देते जा रहे हैं, धमकियां भी देते जा रहे हैं, और चुनौतियां भी देते जा रहे हैं कि पार्टी के बड़े नेताओं, रामविचार नेताम, या रामसेवक पैकरा जैसे ताकतवर लोगों के खिलाफ बोलने की हिम्मत क्यों नहीं होती? वे आदिवासी प्रतिष्ठा का मुद्दा भी उठा रहे हैं कि क्या आदिवासियों की कोई इज्जत नहीं है? कुल मिलाकर सरगुजा भाजपा के भीतर यह गुटबाजी तो है ही, यह सवर्ण और आदिवासी के बीच टकराव भी है, और आदिवासी नेताओं के बीच आपसी टकराव भी है। अब यह तो सचमुच भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है कि ऐसे में सरगुजा में पार्टी की सीटें कैसे बढ़ाए। फिलहाल तो यह ऑडियो रिकॉर्डिंग जो कि जाहिर तौर पर सवर्ण भाजपा पदाधिकारी ने अपने फोन पर की है, और खुद ही बाहर फैलाई है, वह जिंदा रहने वाली है, और चारों तरफ घूमने वाली हैं। अब मां-बहन की इतनी गालियों का असर मतदाताओं पर कितना पड़ता है, यह देखने की बात है। 

    छत्तीसगढ़ी विमान सेवा के नफे
    छत्तीसगढ़ के सभी प्रमुख शहरों के बीच विमान सेवा शुरू होने जा रही है। जो लोग महत्वपूर्ण हैं और जनता के पैसों से सफर करते हैं, उनमें से बहुत से अब कारों के बजाय प्लेन से इन शहरों में आना-जाना करेंगे। दूसरी तरफ जो लोग पैसे वाले हैं, वे लोग भी सड़क पर कई घंटे बर्बाद करने के बजाय प्लेन से चलेंगे। निजी लोगों का तो कुछ नहीं, लेकिन सरकार, अदालत, और संवैधानिक संस्थाओं के जो लोग पायलट गाडिय़ों के सायरन सहित काफिले में चलते हैं, उनसे अगर सड़कों को थोड़ी-बहुत राहत मिलेगी, तो जनता को अच्छा लगेगा। आज इनकी वजह से कहीं भी ट्रैफिक रोक दिया जाता है, और कहीं भी इनके काफिले सड़कों पर खड़े हो जाते हैं। बड़े लोगों को बड़ी हवाई राह से ही चलना चाहिए, और इस तुच्छ धरती की सड़कों को आम लोगों के लिए छोड़ देना चाहिए। छत्तीसगढ़ के शहरों के बीच के ऐसे सफर से ताकतवर और पैसे वाले तबकों के बीच भी एक नया घरोबा कायम होगा क्योंकि आसपास बैठे-बैठे जान-पहचान भी बढ़ेगी। 

    लोगों के उत्साह से कांग्रेस गद्गद्

    नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव चुनाव घोषणा पत्र तैयार करने के लिए जिलों का दौरा कर रहे हैं। वे व्यापारी-सरकारी कर्मचारी, किसान-मजदूर संगठनों के लोगों से बात कर रहे हैं। बिलासपुर में 60 से अधिक संगठनों अथवा उनके प्रतिनिधियों ने अलग-अलग बैठक कर उनसे चर्चा की। जिस तरह अलग-अलग तबकों के बीच अपने मुद्दों को घोषणा पत्र में शामिल करवाने होड़ मची हुई है, उससे न सिर्फ भाजपा बल्कि सिंहदेव की अपनी पार्टी में उनके विरोधी नेता भी हैरान हैं। इससे पहले तक बंद कमरे में चुनाव घोषणा पत्र तैयार होता था, लेकिन सिंहदेव ने नई पहल की है। राजनांदगांव में वे दो दिन रूके थे। इस दौरान सैकड़ों लोगों ने उनसे मुलाकात की। वे देर रात तक अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से उनकी समस्याओं को लेकर चर्चा करते रहे। खास बात यह है कि लोग खुद होकर उनसे मिलने आ रहे हैं। पंद्रह साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस की सरकार बनेगी या नहीं, यह चुनाव में तय होगा, लेकिन जिस तरह जन घोषणा पत्र को लेकर लोगों में उत्साह है उससे कांग्रेस के लोग गद्गद् हैं। 

    * बड़े लोगों से संबंध बनाओ, लेकिन साथ में छोटे लोगों को भी अपनाओ क्योंकि अंतिम समय कंधा वही देते हैं, बड़े लोग तो कार से सीधे श्मशान पहुंच जाते हैं।

    * अरविन्द केजरीवाल के घर-दफ्तर में एलजी के एसी लगे हुए थे, निकलवाकर दूसरे ब्रांड के लगवा लिए। 

    * 1998 के मामले में अगर समय रहते कार्रवाई हुई होती, तो 2002 में फुटपाथ पर सोए एक आदमी की जान बच सकती थी।

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Posted Date : 10-Apr-2018
  • सरकारी बिजली कंपनी में तबादले का एक रोचक मामला सामने आया है। पति बिजली कंपनी में ऊंचे पद पर हैं, तो पत्नी एक सरकारी विभाग में पदस्थ हैं। दोनों एक ही शहर में पदस्थ थे। लेकिन आपसी विवाद के चलते पत्नी ने पति से अलग रहने की ठानी और चुपचाप पति के तबादले की अर्जी बिजली कंपनी के शीर्ष अफसरों को भेज दी। पहले तो पत्नी की अर्जी कुछ दिन तक पड़ी रही, लेकिन बाद में कंपनी के एमडी ने इसे संज्ञान में लिया और पत्नी की सिफारिश मानते हुए पति का तबादला कर दिया। अचानक तबादले से पति भौंचक्क रह गए। वे ठहरे, यूनियन लीडर। उन्होंने कारणों की पड़ताल करवाई तो पता चला कि खुद उनकी पत्नी ने तबादले की सिफारिश की थी। इसके बाद जल्द ही पत्नी का दूसरा आवेदन कंपनी के पास आ गया जिसमें पति का तबादला निरस्त करने का आग्रह किया गया है। पति अपनी यूनियन को लेकर कंपनी के आला अफसरों से मिल रहे हैं और  तबादला वापस उसी स्थान पर करने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। लेकिन कंपनी प्रबंधन इतनी जल्दी आवेदन पर निर्णय लेने को तैयार नहीं है। वजह यह है कि जल्दी-जल्दी तबादला करने और निरस्त करने से कामकाज प्रभावित होता है। अधिकारी-कर्मचारी  अनुशासनहीन हो जाते हंै। इससे परे यदि पत्नी ने फिर से अपने पति का तबादला करने के लिए आवेदन भेज दिया तो क्या होगा?
    अविभाजित मध्यप्रदेश के समय रायपुर में एक आरटीओ हुआ करते थे, आर्या। आरटीओ की कुर्सी बड़ी मेहनत और बड़े लंबे पंूजीनिवेश से ही उस वक्त भी मिलती थी, और रायपुर को इंदौर के बाद मध्यप्रदेश का दूसरे नंबर का आरटीओ माना जाता था। एक दिन अचानक उनका तबादला हो गया। भागे-भागे भोपाल गए तो पता लगा कि उनकी पत्नी ने जाकर मुख्यमंत्री से मुलाकात करके उनका तबादला करवाया था। लेकिन यह तो उनको मालूम था उनकी सीधी-सादी पत्नी घर पर ही थी और भोपाल गई ही नहीं थी। बाद में पता लगा कि उनके विरोधियों ने किसी और घूंघटधारी महिला को मुख्यमंत्री के सामने पेश करके तबादले की अर्जी दिलवा दी थी। यह शायद उसी वक्त की बात थी जब रायपुर के आरटीओ में आग लगी थी, और सारा भ्रष्टाचार जलकर आरटीओ दफ्तर आग में तपकर निकले सोने सरीखा साफ हो गया था।

    दिग्विजय छत्तीसगढ़ काडर में...
    मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 70 बरस की उम्र में जिस तरह छह महीने तक नर्मदा की परिक्रमा की और 33सौ किलोमीटर पैदल चले, वह देखने लायक है। देखने लायक इसलिए भी है कि इसमें पूरे वक्त उनकी पत्नी अमृता भी साथ थीं, जो कि आमतौर पर एयरकंडीशंड टीवी स्टूडियो में काम करती आई हैं, और इस पूरे लंबे कड़े सफर में वे गांव, जंगल, नदी पार करती रहीं। जब दिग्विजय छत्तीसगढ़ के करीब अमरकंटक पहुंचे तो छत्तीसगढ़ के सारे के सारे बड़े कांग्रेस नेता जाकर उनसे मिले, और उनका आशीर्वाद भी लिया।
    छत्तीसगढ़ कांग्रेस में दिग्विजय सिंह का आज भी इतना असर है कि अगर यहां की कांग्रेस लीडरशिप उनके हवाले कर दी जाए तो कांग्रेस के तमाम गुट एक होकर कांग्रेस की जीत की संभावना भी ला सकते हैं। आपस में एक-दूसरे से मुकाबला करने वाले, या मनमुटाव वाले भूपेश बघेल, रविन्द्र चौबे, सत्यनारायण शर्मा, चरण दास महंत, टी एस सिंहदेव, ये सारे ही लोग दिग्विजय के खेमे के ही गिने जाते थे, और आज भी वे राज्य अलग हो जाने पर भी पूरी तरह उनके साथ बने हुए हैं। यह एक अलग बात है कि अपने बहुत ही तीखे तेवरों और आक्रामक संघ-विरोध की वजह से दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी के भीतर ही एक किनारे पर कर दिए गए हैं। उन्होंने अभी दो दिन पहले यह कहा कि अगर मध्यप्रदेश में कांग्रेस पार्टी को एक करके उसे जिताने का जिम्मा उन्हें दिया जाता है तो वे इस जिम्मेदारी के लिए तैयार हैं, लेकिन वे मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे।
    मध्यप्रदेश में कमलनाथ से लेकर राहुल सिंह तक, और ज्योतिरादित्य सिंधिया तक बहुत से लोग दिग्विजय सिंह के विरोधी हैं, वहां की कांग्रेस में वे अलग-थलग और अकेले हैं, लेकिन दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में तकरीबन पूरी कांग्रेस पार्टी उनके साथ है। अगर मुख्यमंत्री नहीं बनना है, तो दिग्विजय सिंह छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेस को एक कर सकते हैं, और वे यहां कांग्रेस को जिता भी सकते हैं। यह बात बहुत अटपटी भी नहीं होगी क्योंकि देश में कई नेता दूसरे प्रदेशों में जाकर बड़ी राजनीति करते आए हैं। 
    सीएस के सहपाठी
    पिछले कुछ साल महत्वहीन कुर्सियों पर रहने के बाद आईएएस हेमंत पहारे की पूछ परख बढ़ी है। पहारे, सीएस अजय सिंह के स्कूल के दिनों के साथी हैं। वे उनके साथ बिलासपुर के गवर्मेंट हाई स्कूल में पढ़ाई कर चुके हैं। दोनों एक ही जिले के रहने वाले हैं। पहले शिकवा-शिकायतों के चलते उन्हें गरियाबंद कलेक्टर के पद से हटाया गया था और फिर एडिशनल कमिश्नर बनाकर बिलासपुर भेजा गया। काफी कोशिशों के बाद उनकी राजधानी में वापसी हुई और फिर उन्हें पीएससी में सचिव बनाया गया। लेकिन पीएससी चेयरमैन के आर पिस्दा के साथ उनकी पटरी नहीं बैठ पाई। उन्हें हटाकर मंत्रालय में संसदीय कार्य एवं जनशिकायत निवारण विभाग दिया गया। जहां उनके पास ज्यादा काम नहीं था। सचिव बनने के बाद काफी दिन तक कोई खास महत्व का विभाग नहीं रहा, पहले उन्हें स्कूल शिक्षा दिया गया था। अजय सिंह के सीएस बनने के बाद ग्रामोद्योग विभाग का प्रभार सौंपा गया। वैसे व्यवहार में पहारे अफसरी से एकदम दूर, भोला छत्तिसगढिय़ा किस्म के हैं और उनसे मिलकर बात करने में गांव के लोग भी डरते नहीं हैं।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 09-Apr-2018
  • रविवार को छुट्टी के दिन डेढ़ दर्जन आईएएस अफसरों को इधर से उधर किया गया। इस पूरे फेरबदल में कुछ बातें हजम नहीं हुई, जैसे मुंगेली कलेक्टर नीलम नामदेव एक्का को दुर्ग कमिश्नरी में एडिशनल कमिश्नर बनाकर भेजा गया है। वहां अभी एडिशनल कमिश्नर का पद स्वीकृत ही नहीं हुआ है। इसी तरह आलोक अवस्थी को पहले आयुक्त कृषि बनाया गया था, बाद में संशोधन कर एमडी बीज निगम रहने दिया गया। उन्हें अब बीज निगम से हटाकर एमडी खादी एवं ग्रामोद्योग की जिम्मेदारी दी गई है। सीसीएफ स्तर के अफसर आलोक कटियार को आरडीए का सीईओ बनाया गया है। उनका नाम सीएसआईडीसी एमडी के लिए चर्चा में था। जहां उनके मित्र सुनील मिश्रा पदस्थ हैं। मिश्रा को 4 साल हो चुके हैं, ऐसे में प्रशासनिक हल्कों में उनके तबादले की चर्चा थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कटियार को आरडीए सीईओ की जिम्मेदारी दी गई, यह उनके लिए थोड़ा असुविधाजनक माना जा रहा है। वे पहले आईएफएस हैं, जो आरडीए में गए हैं। राज्य बनने के बाद अब तक एडिशनल कलेक्टर अथवा जूनियर आईएएस ही रहे हैं। जबकि कटियार जल्द ही एपीसीसीएफ बनने वाले हैं, जिसका वेतनमान प्रमुख सचिव के समकक्ष है। आरडीए सीईओ का जो पद कल तक एक एडिशनल कलेक्टर रैंक के अफसर के दो चार्ज में से एक था, उस पद पर इतने वरिष्ठ आलोक कटियार को भेजना हैरान करता है।
    फेरबदल-2 
    तबादला सूची को लेकर कई अफसर निराश हुए, जो कि कलेक्टर बनने की राह में थे और इसके लिए भरपूर मेहनत भी कर रहे थे। इनमें  सुनील जैन भी हैं, जो कि बलौदाबाजार जाने के इच्छुक थे और कई भाजपा नेताओं के संपर्क में भी रहे। लेकिन बलौदाबाजार जाना तो दूर उनसे मलाईदार नान एमडी के पद से हटाकर पंजीयक सहकारी संस्थाएं की जिम्मेदारी दी गई। नान के कुख्यात घोटाले की जांच करने के अधिकारियों का अभी भी नान से लगातार संपर्क रहता है, और वे लोग इस बात पर हैरान हैं कि तमाम जांच के चलते हुए भी नान में भ्रष्टाचार पहले की तरह ही जारी है। 
    कुछ अफसर ऐसे हैं जो कि सालभर भी कलेक्टरी नहीं कर पाए। इनमें कार्तिकेश गोयल, नीलम एक्का और राजेश सिंह राणा हैं। सुनते हैं कि तीनों को अलग-अलग कारणों से बदला गया है।  गोयल को हटाने के लिए मंत्री दयालदास बघेल लगे हुए थे। उन्होंने एक-दो नाम भी दिए थे। लेकिन उनकी जगह महादेव कांवरे को बेमेतरा कलेक्टर बनाया गया। उनकी साख अच्छी है और नियम पसंद अफसर माने जाते हैं। राजेश सिंह राणा को लेकर कई तरह की शिकायतें रही है। जनप्रतिनिधि उनसे नाखुश चल रहे थे। फिर भी वे महिला बाल विकास विभाग संचालक जैसा अहम दायित्व पाने में सफल रहे। बिलासपुर जिला कलेक्टर पी दयानंद को हटाने की जमकर चर्चा थी। कहा जा रहा है कि स्थानीय विधायक और मंत्री अमर अग्रवाल भी उन्हें हटाने के पक्ष में थे। समीक्षा बैठक के दौरान भी उनका परफार्मेंस कोई खास नहीं रहा। बावजूद उनकी कुर्सी सलामत रही। ( rajpathjanpath@gmail.com)

     

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Posted Date : 08-Apr-2018
  • पूर्व मंत्री हेमचंद यादव गंभीर रूप से बीमार हैं। उनका मुंबई के  एक  निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। यादव पिछले दो साल से स्वास्थ्य की समस्या से जूझ रहे हैं। वे स्वस्थ होने के बाद चिकित्सकीय सलाह को नजरअंदाज कर पार्टी की जनसंपर्क यात्रा में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। नतीजा यह हुआ कि उनकी तबियत बिगड़ गई। यादव, सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और प्रेमप्रकाश पांडेय के करीबी माने जाते  हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी उन्हें पसंद करते हैं। यादव की तबियत बिगडऩे की जानकारी मिलने पर दोनों मंत्रियों ने अपने कुछ समर्थकों के साथ बेहतर इलाज के लिए उन्हें मुुंबई रवाना किया और वे खुद भी देखने गए। मुख्यमंत्री भी लगातार दोनों मंत्रियों के साथ-साथ यादव  परिवार के सदस्यों से चर्चा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने दोनों मंत्रियों को यहां तक कह दिया है कि यदि स्वास्थ्य में सुधार नहीं होता  है, तो उन्हें देश से बाहर भी इलाज के लिए ले जाया जाए। तीन बार के विधायक और 10 साल सरकार में मंत्री रहने के बावजूद हेमचंद यादव आर्थिक रूप से मजबूत नहीं रहे। उनकी साख अच्छी है और यही वजह है कि जब वे बीमारी से जूझ रहे हैं, तो सरकार के मंत्री निजी तौर पर इलाज का खर्च वहन कर रहे हैं। दरअसल जिस वक्त उनके पास कमाऊ विभाग थे, उस वक्त भी उन विभागों से कमाई का जिम्मा और हक कुछ दूसरे नेताओं के पास था।

    गुस्सा निकल गया?
    भाजपा की जनसंपर्क यात्रा का तकरीबन समापन हो चुका है। एक महीने तक आम कार्यकर्ता से लेकर पार्टी पदाधिकारी तक गांव-गलियों  में घूमे। कुछ जगह टिकट के दावेदारों में वाद-विवाद भी हुआ। अहिवारा में तो विधायक सांवलाराम डाहरे और पूर्व विधायक डोमनलाल कोर्सेवाड़ा के बीच खुले तौर पर नोंक-झोंक भी हो गई। कई जगहों पर टिकट के दावेदारों की अति सक्रियता से स्थानीय पार्टी विधायक परेशान भी रहे। इसको लेकर शिकवा-शिकायतें भी प्रदेश नेतृत्व तक पहुंची हैं। यात्रा के दौरान कई जगहों पर स्थानीय विधायक के खिलाफ गुस्सा भी फूटा। इन सबके बावजूद पार्टी के रणनीतिकार जनसंपर्क यात्रा को बेहतर बता रहे हैं। उनका तर्क है कि चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले ही मतदाताओं का गुस्सा निकल गया। चुनाव प्रक्रिया शुरू होगी तो लोग शांत रहेंगे। इससे प्रत्याशी और पार्टी को फायदा होगा। लेकिन क्या वाकई ऐसा होगा, यह तो चुनाव के दौरान पता चलेगा। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 06-Apr-2018
  • सिंधी समाज के युवा दुर्ग में जानलेवा हमले के आरोपी को हथकड़ी पहनाने के विरोध में आंदोलित है। आंदोलन कर रहे युवाओं का आरोप है कि आरोपी नाबालिग है और पुलिस ने हथकड़ी पहनाकर ज्यादती की है। सिंधी समाज के किशोर की गिरफ्तारी के खिलाफ न सिर्फ दुर्ग बल्कि रायपुर और कई अन्य शहरों में प्रदर्शन हुआ। सरकार और पुलिस के आला अफसरों ने जांच पड़ताल के बाद कार्रवाई का भरोसा दिलाया है, लेकिन मामला शांत होने के बाद अचानक फिर बढ़ गया। हाल यह है कि अलग-अलग जगहों पर सिंधी समाज के कई युवा रात में दुकान बंद करने के बाद अथवा रविवार के दिन प्रदर्शन के लिए निकल जाते हैं। 
    सुनते हैं कि कुछ लोगों में आंदोलन के बहाने समाज में पकड़ दिखाने की होड़ मची हुई है। रायपुर उत्तर के विधायक श्रीचंद सुंदरानी सिंधी समाज के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। चेम्बर में अपने समर्थक जितेन्द्र बरलोटा को भारी वोटों से जिताकर समाज के भीतर अपनी पकड़ भी साबित की है। लेकिन उनका विरोधी खेमा शांत नहीं बैठा है। इनमें कुछ कांग्रेस टिकट के दावेदार भी बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि उनमें से कुछ ने समाज के किशोर की गिरफ्तारी के मामले को हवा देकर सुंदरानी के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। 
    मामले को निपटाने के लिए सिंधु सभा भवन में गुरूवार को बैठक भी हुई थी। कहा जा रहा है कि समाज के बुजुर्गों ने मामले को शांत करने की अपील की। लेकिन श्रीचंद ने जैसे ही बोलना शुरू किया, कुछ युवकों ने हंगामा शुरू कर दिया। सुंदरानी समर्थक और विरोधियों के बीच हाथापाई की नौबत भी आ गई। इसके बाद सुंदरानी को भाषण दिए बिना लौटना पड़ा। अब हाल यह है कि सुंदरानी पर समाज के लोगों को समझाने का दबाव बन रहा है, तो विरोधी अपनी ताकत दिखाने में जुटे हैं। ऐसे में आंदोलन कैसे खत्म होगा, यह अभी तक किसी को समझ में नहीं आ रहा है। 

    कलेक्टरों की सिबलिंग राइवलरी
    कलेक्टरों के तबादलों पर जब मौका आता है तो जिलों में तैनात अफसर बेचैन हो जाते हैं कि कहीं हटने की उनकी बारी तो नहीं आ जाएगी? फिर बहुत अच्छा काम करने वाले कुछ कलेक्टर इस सोच में पड़ जाते हैं कि उनके लिए इससे बड़ा, इससे अधिक महत्वपूर्ण और कौनसा जिला हो सकता है जहां उन्हें भेजा जा सके? इनमें से कुछ लोग  अपने राजनीतिक संबंधों का इस्तेमाल बेहतर जिले में जाने, या कम से कम उसी जिले में बने रहने में करते हैं। इसके साथ-साथ जिस तरह परिवार में बराबरी के बच्चों के बीच सिबलिंग-राइवलरी रहती है, उसी तरह आसपास की बैच के अफसर एक-दूसरे के जिलों पर नजर गड़ाए रखते हैं, और देखते हैं कि कैसे उनके बैचमेट उनसे आगे न निकल जाएं। ऐसे में मीडिया में अपने काम को अच्छी तरह जगह दिलवाना और प्रतिद्वंद्वी की चूक को भी ठीक से सामने रखवाना एक आम बात हो गई है। लेकिन महत्वपूर्ण जिलों की परिभाषा हाल के बरसों में पूरी तरह बदल गई है। अब जिन जिलों में एमडीएफ, यानी खनिज कमाई से स्थानीय विकास की संभावना अधिक रहती है, उन जिलों में जाने में अफसरों की अधिक दिलचस्पी रहती है। ऐसे जिलों में वे अपनी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करके ऐसे प्रोजेक्ट बना सकते हैं जिससे वे राष्ट्रीय स्तर के किसी पुरस्कार या सम्मान के हकदार हो सकें। लेकिन इस चक्कर में कई जिलों में प्रशासन का रोजमर्रा का काम बेहाल हो जाता है क्योंकि रोजमर्रा का काम अच्छा होने पर कोई पुरस्कार या सम्मान तो है नहीं। इसलिए लोग ताजमहल बनाने में जुट जाते हैं, और आगरा की नालियां गंदगी से लबालब पड़ी रहती हैं। 

    * प्रिय मीडिया, अब सलमान के पीछे ही मत भागते रहो, बीच-बीच में जाकर तैमूर के डॉयपर भी चेक करते रहो...

    * सलमान ने एक हिरण को मारा तो राजस्थान के कोर्ट ने 5 साल कैद सुनाई। लेकिन शंभू लाल रेगर ने न सिर्फ एक इंसान को मारा बल्कि उसकी वीडियो भी बनवाकर शेयर की। राजस्थान की कोर्ट ने क्या सजा सुनाई उसे?

    * हिरण ने तो भगवान श्रीराम को भी परेशान कर दिया था, ये सलमान किस खेत का मुल्ला है।

    * हिंदुस्तान में इंसान मारने पर रिहाई, और जानवर मारने पर कैद मिलती है। इन दोनों की मिसाल अकेला सलमान

    * सलमान खान को आज ये बोध हो गया होगा कि असली बिगबॉस कोई और है।

    * कौन है जिसे कमी नहीं है,
    आसमां के पास भी, जमीं नहीं है।

    * सारे मुद्दे हुए हवाहवाई
    टीवी पर सिर्फ सलमान भाई
    मोदीजी ने क्या मास्टरस्ट्रोक लगाई
    भूल जाओ नीवर और चौकसी भाई

    *इस दौरे सियासत का इतना सा फसाना है, 
    बस्ती भी जलानी है, मातम भी मनाना है।

    * सलमान को सजा के बाद विवेक ओबेराय ने किया भंडारे का ऐलान, और ऐश्वर्या ने कहा भंडारे में सूजी का हलवा मेरी तरफ से...

    * सारे टैक्स खत्म करके जीएसटी लागू कर दिया है, क्यों न सारी जातियां खत्म करके सबको भारतीय घोषित कर दिया जाए...

    * सलमान की जगह केजरीवाल होते तो अभी तक हिरणों से माफी मांगकर फिर अगले शिकार पर निकल जाते।

    * टाईगर जिंदा है की अपार सफलता के बाद प्रस्तुत है- टाईगर अंदर है...

    भक्तों को सलमान के जेल जाने से कम, और तैमूर के अब्बू के बरी होने से ज्यादा खुशी हो रही है। बोले जीजाजी छूट गए, मुल्ला पकड़ा गया। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 05-Apr-2018
  • सरकार ने छोटा सा प्रशासनिक फेरबदल किया। फेरबदल में कुछ त्रुटियों को ठीक किया गया। मसलन, जन्मेजय मोहबे को दो दिन बाद ही मार्कफेड एमडी के पद से हटाकर बीज निगम का एमडी बनाया गया। मोहबे भाप्रसे के 2011 बैच के अफसर हैं और वे पहले राजभवन में उपसचिव थे। उनकी मार्कफेड एमडी के पद पर पदस्थापना की गई थी। वहां पहले से ही वर्ष-2008 बैच के अफसर सत्यनारायण राठौर एडिशनल एमडी के पद हैं। सीनियर अफसर को जूनियर के नीचे बिठाने से अच्छा संदेश नहीं जा रहा था। इसके बाद तुरंत गलती सुधारकर विशेष सचिव स्तर के अफसर पी अलबंगन को मार्कफेड एमडी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। 
    फेरबदल में लंबे समय से लूप लाईन में रहे आलोक अवस्थी को अहम जिम्मेदारी दी गई है। उन्हें कृषि आयुक्त बनाया गया। राज्य बनने के बाद कृषि आयुक्त पद पर अपर मुख्य सचिव अथवा  प्रमुख सचिव स्तर के अफसर रहे हैं। हालांकि कृषि विभाग में अपर मुख्य सचिव सुनील कुजूर पहले से ही हैं, लेकिन आयुक्त का पद न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि बाकी राज्यों में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। अवस्थी दो जिलों के कलेक्टर रहे, लेकिन बाद में उन्हें अच्छी पोस्टिंग नहीं मिल पाई। खैर, देर से ही सही अवस्थी की सुध ली गई। 

    महिला अफसरों से सहमे बड़े
    राज्य सरकार में कुछ खास मामलों को लेकर महिला आईएएस अफसरों के रूख से बड़े अफसर भी सहमे हुए हैं। कुछ फाईलों पर उनसे व्यवहारिक रूख इस्तेमाल करने को कहना बेकार गया, और ऐसे कई मामलों के बाद अब बहुत से मंत्री भी महिला सचिवों से कतरा रहे हैं। यह कहने का मतलब कहीं भी उनकी काबिलीयत या साख को कम आंकना नहीं है, लेकिन सरकार में फाईलों से परे एक शब्द का इस्तेमाल होता है, हिकमत। इसका मतलब होता है समझ। हर काम नियम के मुताबिक नहीं हो पाता, लेकिन सरकार की मर्जी के मुताबिक ऐसे कामों को या तो कोई रास्ता निकालकर किया जाता है, या फिर उसे न करके पड़े रहने दिया जाता है। अंगे्रजी में इसे टैक्टफुल होना कहते हैं। इसकी कमी बहुत से अफसरों को आगे बढऩे से रोक देती है। वे समय पर अपना प्रमोशन तो पा लेते हैं, लेकिन महत्व और जिम्मेदारी के ओहदों से वे कई बार दूर रहते हैं। छत्तीसगढ़ में आज अफसरशाही के बीच ऐसा माहौल बना है कि किसी महिला अफसर को किसी विभाग में बिठाने के बाद उससे काम करवाना मुश्किल रहता है। इसलिए ऐसे विभागों में जहां हिकमत के अधिक इस्तेमाल की जरूरत पड़ती है, वहां से महिला अफसरों को दूर ही रखा जा रहा है।(  rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 04-Apr-2018
  • अजीत जोगी के नई पार्टी बनाने के बाद कांग्रेस नेताओं से रिश्तों में तल्खी आ गई है। कांग्रेस के कई छोटे-बड़े नेता उन्हें दुश्मन नंबर एक मानने लगे हैं। कईयों को तो न सिर्फ जोगी बल्कि उनकी पार्टी के झंडे-बैनर तक से चिढ़ होने लगी है। इन सबके बीच सीएम के गृह जिले कवर्धा के एक गांव में पिछले महीने कांग्रेस के ब्लॉक स्तर के पदाधिकारियों ने कार्यक्रम रखा। टेंट लगाने का भी ऑर्डर दे दिया।  कार्यक्रम तैयारियों का जायजा लेने आयोजक पहुंचे, तो देखा कि टेंट गुलाबी रंग का है। जोगी पार्टी का बैनर-झंडा गुलाबी रंग का ही होता है। आयोजकों ने तुरंत टेंट मालिक को बुलाकर फटकार लगाई और किसी दूसरे रंग का टेंट लगाने के लिए कहा। ऐसा न होने पर भुगतान नहीं करने की भी चेतावनी दे दी। इसके बाद आनन-फानन में टेंट मालिक दौड़े और गुलाबी रंग के बीच हरे-सफेद कपड़े लगवाए। तब कहीं जाकर कार्यक्रम शुरू हुआ। (  rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 03-Apr-2018
  • मनेन्द्रगढ़ में पदस्थ एक पीडब्ल्यूडी अफसर और टाईम कीपर के बीच विवाद सुर्खियों में है। टाईम कीपर, पिछले कुछ समय से अफसर पर एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी को निकालने के लिए दबाव बना रहा था। अफसर ने ऐसा करने से मना किया, तो टाईम कीपर ने अपनी डिप्टी कलेक्टर बेटी से डांट पिलवा दी। बावजूद इसके अफसर नहीं माना, तो डिप्टी कलेक्टर बेटी ने उसका कैरियर खराब करने की धमकी दे दी। अफसर ने इसकी शिकायत पुलिस से कर दी। इसके बाद टाईम कीपर से प्रताडि़त अन्य अफसरों का हौसला बढ़ा और पिता-पुत्री के खिलाफ अलग-अलग स्तरों पर शिकायतें कर रहे हैं।  इंजीनियरों ने इस पूरे मामले की जांच की मांग कर दी है। हालांकि बीच-बचाव के लिए भी कुछ लोगों ने कोशिश की है और इंजीनियरों को समझाने-बुझाने में लगे हैं। बावजूद इसके मामला शांत होता नहीं दिख रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि डिप्टी कलेक्टर बेटी का बताया गया जो टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड होकर सोशल मीडिया पर तैर रहा है उसमें वह खुलकर धमकी देते दिख रही है और मंत्रियों तक अपनी पहुंच का बार-बार जिक्र कर रही है। वह अपनी ताकत का ऐसा दावा कर रही है जैसा कि राज्य को कोई मुख्य सचिव भी आजतक न कर पाया हो। यह एक मामला तो अलग रहा, लेकिन जांच में इस महिला डिप्टी कलेक्टर के बाकी दावों को भी परखना होगा वह किस तरह 5 मिनट के भीतर अपना तबादला रद्द करवा लेती है। 
    प्रेस कॉन्फ्रेंस​ महंगी पड़ी
    जोगी पार्टी के एक प्रमुख पदाधिकारी के इस्तीफे की चर्चा है। यह युवा पदाधिकारी अजीत जोगी काकरीबी माना जाता रहा है। सुनते हैं कि पिछले दिनों उसने वरिष्ठजनों की सलाह को अनदेखा कर भाजपा और सरकार के प्रमुख लोगों के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर अभियान चलाया था। जोगी पार्टी के लोगों को इससे दिक्कत नहीं थी, लेकिन कुछ सावधानी बरतने के लिए कहा गया था। यानी भाजपा के एक पदाधिकारी के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस पार्टी दफ्तर के बजाए किसी होटल अथवा प्रेस क्लब में लेने का सुझाव दिया गया था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।  पार्टी दफ्तर में ही कॉन्फ्रेंस ले ली। दूसरी बार भी यही गलती दोहराई, जिस दिन कॉन्फ्रेंस हुई उस दिन बिल अदा नहीं कर पाने के कारण पार्टी दफ्तर की बिजली कट गई थी। अखबारों में कॉन्फ्रेंस के मुद्दों के बजाए जोगी पार्टी दफ्तर की बिजली कटना सुर्खियों में रही। इस पर वरिष्ठ नेताओं ने उसे जमकर डांट पिलाई। इससे नाराज होकर उसने पद से इस्तीफा दे दिया। अब हाल यह है कि न तो इस्तीफा मंजूर किया जा रहा है और न ही उन्हें कोई काम दिया जा रहा है। ऐसे में यह युवा नेता अपने भविष्य को लेकर कोई निर्णय नहीं ले पा रहा है। 
    62 के आगे क्या?
    छत्तीसगढ़ के बड़े भाई मध्यप्रदेश में राज्य कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र दो बरस बढ़ाकर 60 से 62 कर दी है। चुनाव के बरस में इसका नफा भी हो सकता है, और नुकसान भी। नफा यह कि जो सरकारी कर्मचारी हैं, वे खुश हो जाते हैं कि उन्हें दो और बरस तक जवान मान लिया गया है, और उन्हें बुढ़ापे के खाली गुजरने वाले बरसों में दो और बरस काम मिल जाएगा। दूसरी तरफ एक-एक सरकारी कुर्सी के लिए जो हजारों बेरोजगार कतार में लगे रहते हैं, और वे निराश हो जाते हैं कि अब दो बरस और कुर्सियां खाली नहीं होंगी। फिर ऐसे सरकारी कर्मचारी भी कुछ निराश होते हैं जिनके ऊपर के लोग रिटायर होने पर उनका प्रमोशन हो सकता था। लेकिन उम्र बढ़ाने के बहुत से असर होते हैं। सरकार को उन कुर्सियों पर काम करने के लिए कुछ लोग और दो बरस मिल जाते हैं, जहां पर काबिल लोगों की कमी है। दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को दो और बरस तक किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने का मौका मिल जाता है, और तुरंत घर चलाने के लिए नौकरी ढूंढने का दबाव नहीं रहता। तीसरी बात यह है कि हिंदुस्तानियों की औसत उम्र लगातार बढ़ रही है, और कामकाजी लोगों का खानपान औसत नागरिकों से बेहतर होता है, इसलिए वे अधिक सेहतमंद भी रहते हैं, और सरकारी कर्मचारियों को तो इलाज की सहूलियत भी रहती है। इसलिए बुढ़ापा देर से आता है, लोग अधिक उम्र तक काम के लायक रहते हैं। छत्तीसगढ़ में अब 62 बरस तक रिटायरमेंट बढ़ाए हुए 5 बरस हो चुके हैं। पिछले चुनाव के पहले 26 जनवरी, 2013 को इसकी घोषणा हुई थी। क्या छत्तीसगढ़ सरकार इस चुनावी वर्ष में रिटायरमेंट को आगे बढ़ा सकती है? ऐसा करने पर रिटायरमेंट के वक्त जो भुगतान करना पड़ता है, वह भी आगे खिसक जाता है। (  rajpathjanpath@gmail.com)

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