राजपथ - जनपथ

Posted Date : 19-Sep-2018
  • चौदह बरस तक रमन सिंह सरकार ने जितने अच्छे काम किए हों, उन पर पानी फेरने का काम अब उनकी पार्टी के कुछ नेता, और कुछ अफसर कर रहे हैं। कहीं स्कूली बच्चियों पर एसडीएम खुद लाठी लेकर टूट पड़ रहे हैं, तो कल बिलासपुर में जिस तरह पुलिस ने कांग्रेस भवन के भीतर घुसकर पार्टी के लोगों को पीटा, वह पूरी तरह नाजायज और अलोकतांत्रिक काम था। इस पिटाई का जो वीडियो सामने आया है उसमें पुलिस खुलेआम मां-बहन की गालियां देते हुए नेताओं को पीट रही है। यह सब उस शहर में हो रहा है जहां पर प्रदेश का हाईकोर्ट मौजूद है, और कल से आज तक हाईकोर्ट ने भी इसे देखा होगा। अब सवाल यह उठता है कि बस्तर के जंगलों में तो सुरक्षा बल बेजुबान और अलग-थलग बसे हुए आदिवासियों के साथ जैसा चाहे वैसा सुलूक कर लें, और उसकी आवाज उठाने पर आवाजों को शहरी नक्सल करार दे दिया जाए, लेकिन बिलासपुर के कांग्रेस भवन के भीतर भी अगर पुलिस ऐसी ही गुंडागर्दी कर रही है, तो उससे गांव-जंगल में उसके बर्ताव का अंदाज लग सकता है। 
    चुनावी सर्वे का ऐसा नतीजा!
    अभी एक मीडिया-हाऊस ने छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के नतीजों का अंदाज लगाने के लिए एक सर्वे करवाना शुरू किया है जिसमें अब तक 48 सीटों का अनुमान मिल गया है। प्रदेश की 90 सीटों में से इन 48 सीटों पर जो पार्टी अभी 32 पर काबिज है, उसकी सीटें घटकर 17 रह जाने का अंदाज मिला है। अब पार्टी का नाम न बताकर दोनों ही पार्टियों को सम्हल जाने का मौका देना ठीक होगा। दूसरी तरफ बाकी 42 सीटों पर सर्वे जारी है, और इसके नतीजे अगर सही है, तो वे प्रदेश की राजनीति में कहीं खुशी कहीं गम की नौबत ले आएंगे। 
    टिकट नहीं, पर सट्टा शुरू
    विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस ने प्रत्याशियों की घोषणा भले ही नहीं की है, लेकिन  सट्टा बाजार के भाव खुल चुके हैं। सटोरियों ने एक नई स्कीम लांच की है, जिसके अनुसार 20 जीतने वाले प्रत्याशियों के नाम बताने होंगे। सही जवाब मिलने पर एक रुपये का 33 गुना मिलेगा। यानी एक लाख रुपये लगाने पर 33 लाख रुपये मिलेंगे। यह भी शर्त जोड़ी गई है कि विजयी प्रत्याशियों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का नाम नहीं होना चाहिए। 

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Posted Date : 18-Sep-2018
  • आखिरकार चंदर विधानी व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन चेम्बर ऑफ कॉमर्स का कार्यवाहक अध्यक्ष बन गए। चेम्बर में विवाद के चलते अध्यक्ष जितेन्द्र बरलोटा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। काफी कोशिशों के बाद भी वे इस्तीफा वापस लेने के लिए राजी नहीं हुए। उन्हें कार्यवाहक अध्यक्ष बनवाने में रायपुर उत्तर के विधायक श्रीचंद सुंदरानी और चेम्बर के मनोनीत चेयरमैन योगेश अग्रवाल की भूमिका अहम रही है। 
    बरलोटा के खिलाफ पिछले कुछ समय से विशेषकर कोषाध्यक्ष प्रकाश अग्रवाल ने मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने खुले तौर पर अलग-अलग कार्यक्रमों के आयोजन में वित्तीय अनियमितता की बात उठाई थी। बरलोटा की छवि एक साफ-सुथरे व्यापारी नेता की है और वे पिछले 25 साल से चेम्बर में सक्रिय रहे हैं। अपने करीबी सहयोगियों पर उठती उंगलियों को वे सहन नहीं कर पाए और पद छोड़ देना ही उचित समझा। खैर, जिस तरीके से कार्यकारिणी की बैठक के पहले ही मनोनीत पदाधिकारियों ने चंदर विधानी को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया है, उससे कई सवाल खड़े हुए हैं।  
    योगेश अग्रवाल, प्रकाश अग्रवाल के चचेरे भाई हैं। वैसे तो वे बरलोटा को मनाने की मुहिम में जुटे थे, तो भाई प्रकाश का भी साथ दे रहे थे। इससे परे श्रीचंद सुंदरानी को चेम्बर चुनाव में अमर परवानी को अध्यक्ष प्रत्याशी नहीं बनाने पर सिंधी समाज में नाराजगी झेलनी पड़ रही थी। हालांकि विरोध के बावजूद वे भारी मतों से बरलोटा को अध्यक्ष बनवाने में कामयाब रहे। ऐसे में जब विधानसभा चुनाव नजदीक हैं तो उन्होंने समाज के लोगों को साधने के लिए सिंधी समाज से ही वरिष्ठ उपाध्यक्ष चंदर विधानी को कार्यवाहक अध्यक्ष बनवा दिया। इस फैसले से भले ही समाज के लोगों की नाराजगी दूर हो गई हो, लेकिन अन्य वर्ग के व्यापारियों में नाराजगी दिखाई दे रही है। चुनाव के इतने आसपास चेंबर की उथल-पुथल चुनाव पर भी छाया डाल सकती है।

    सांसद विधायक बनने के फेर में
    भाजपा के एक सांसद ने चुनाव लडऩे की इच्छा जताई है। वे पार्टी कार्यकर्ताओं को टटोल रहे हैं। सांसद महोदय, सरगुजा जिले की भटगांव अनारक्षित सीट से संभावनाएं तलाश रहे हैं। सुनते हैं कि पार्टी ने उन्हें पिछले चुनाव में अंबिकापुर सीट से चुनाव लडऩे के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया था। हालांकि पार्टी उन्हें चुनाव लड़ाएगी या नहीं, यह साफ नहीं है। कहा तो यह भी जा रहा है कि पार्टी के प्रमुख नेता उनसे नाराज हैं। उन्हें बड़ी उम्मीदों के साथ सांसद बनाया था, लेकिन वे नए लोगों को जोडऩे में नाकाम रहे। उनका ज्यादातर समय दिल्ली में गुजरता है। सांसद निधि के मद से होने वाले निर्माण कार्य में कमीशन की राशि भी सबसे ज्यादा होती है। फिर भी उनकी सक्रियता से क्षेत्र में हलचल मची हुई है। 

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Posted Date : 17-Sep-2018
  • लंबी बीमारी के बाद दुर्ग के पूर्व सांसद मोहन भैया का शनिवार को निधन हो गया। मोहन भैया छत्तीसगढ़ में जनसंघ की नींव रखने वालों में से थे। वे ईमानदार होने के साथ-साथ अपनी बातों को बिना लाग-लपेट के रखते थे। उनसे जुड़ा एक किस्सा आज भी लोगों को याद है कि कई साल पहले उन्होंने एक राज्यपाल को भिलाई होटल में सबके सामने खरी-खोटी सुनाई थी। 
    हुआ यूं कि राज्यपाल महोदय हर हफ्ते भिलाई जाते थे। उन्हें भिलाई के एक होटल का चिकन खूब भाता था। कई बार तो बिना किसी  कार्यक्रम के भिलाई चले आते थे। एक बार होटल में किसी कार्यक्रम के दौरान मोहन भैया भी पहुंच गए। उन्होंने राज्यपाल से सीधे भिलाई आने का कारण पूछ लिया। एक ने उन्हें शांत करने की कोशिश की, तो राज्यपाल को ही कह गए कि ये सिर्फ यहां मुर्गा खाने आ जाते हैं। मोहन भैया की टिप्पणी का असर यह हुआ कि राज्यपाल ने भिलाई आना-जाना ही बंद कर दिया था। हालांकि बाद में उनके लिए राजभवन में चिकन आने लगा। 

    हारने वाले को कैसे टिकट दें?
    भाजपा के रणनीतिकार एक आयोग के एक अध्यक्ष से परेशान हैं। अध्यक्ष महोदय विधानसभा चुनाव लडऩा चाहते हैं। उनकी गिनती पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में होती है, लेकिन जीत की संभावना लगभग नगण्य है। उनके खिलाफ मतदाताओं की नाराजगी का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उनके इलाके में मुफ्त साइकिल वितरण हुआ था, लेकिन जितनी साइकिलें वहां बंटी थीं उतने हितग्राही लेने नहीं पहुंचे थे। काफी खर्च करने के बाद भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा। मगर, इस बार वे सीट बदलकर चुनाव लडऩा चाहते हैं। उन्होंने पार्टी नेताओं के सामने जो अपनी पसंद बताई है, वहां से टिकट देने के लिए पार्टी तैयार नहीं दिख रही है। वजह यह है कि पार्टी वहां से पिछले चुनाव में हारे हुए नेता को ही रिपीट करना चाहती है, क्योंकि वे दिग्गज कांग्रेस नेता के मुकाबले  बेहद कम वोटों से हारे थे। पार्टी नेताओं का अंदाजा है कि यदि आयोग के अध्यक्ष को उनके कहे अनुसार सीट बदलकर टिकट दे दी जाती है तो वहां से भी जीतना मुश्किल है। दिक्कत यह है कि टिकट नहीं देने पर वे छत्तीसगढिय़ा-गैर छत्तीसगढिय़ा का नारा बुलंद करते नजर आएंगे। यह सब सोचकर पार्टी नेता उलझन में है। 
    कांग्रेस  में ओहदों के मोबाइल
    आखिरकार टिकट से पहले कांग्रेस की जम्बो कार्यकारिणी घोषित हो गई। कार्यकारिणी में सभी गुटों को पर्याप्त महत्व मिला है। अध्यक्ष भूपेश बघेल अपने सभी समर्थकों को पदाधिकारी बनाने में कामयाब रहे। पहली बार संयुक्त महासचिव का पद बनाया गया। जिले स्तर के नेता प्रदेश कार्यकारिणी में जगह पा गए। उसके बाद भी वोरा-सिंहदेव और महंत के कई समर्थक रह गए हैं। यानी असंतोष कायम है। दूसरी तरफ कई ऐसे पदाधिकारी बना दिए गए हैं जो कि जोगी के करीबी हैं, और कई तरह के अपराधों से भी जुड़े हुए हैं। एक कांग्रेसी नेता ने कहा कि भाजपा जिस तरह जनता को मोबाइल बांट रही है, उस तरह कांग्रेस  पद बांट रही है।

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Posted Date : 16-Sep-2018
  • मुफ्त मोबाइल की योजना से भाजपा के कई नेताओं को बड़े चुनावी फायदे की उम्मीद जता रहे हैं, लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं को नुकसान का अंदेशा भी है। इससे परे राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि चुनाव के वक्त कुछ भी मुफ्त में मिल जाए, तो इसका फायदा ही मिलता है। मुफ्त मोबाइल बांटने से वैसा फायदा नहीं हो रहा है, जैसी उम्मीद लगाई जा रही थी। कुछ जगहों पर मोबाइल फटने की घटना के बाद बाकी हिस्सों में नकारात्मक संदेश भी गया है। लेकिन जानकारों का कहना है कि लाखों मोबाइल में से दो-चार की बैटरी अगर खराब हुई है, तो इससे अधिक तो खुले बाजार में खरीदे गए मोबाइल की बैटरियां खराब होती हैं, सरकारी खरीद होने के बावजूद लाखों में से गिने-चुने फोन की ही शिकायत आई है।
    अलग-अलग पार्टियों के कुछ लोगों का यह भी कहना है कि दारू दुकानों के बाहर लोग 3-3 सौ रुपये में मोबाइल बेच दे रहे हैं। अब अगर ऐसा है भी, तो शराबी तो पीडीएस का चावल भी बेचते आए हैं, और दूसरे किस्म की सरकारी रियायतें भी। सरकार तोहफा दे तो सकती है, लेकिन उसे बेचने से नहीं रोक सकती।
    पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि चुनाव में भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा आबादी पट्टे के वितरण से मिलने की उम्मीद है। गांव-गांव में सालभर पहले सर्वे हो चुके थे और चुपचाप आबादी जमीन पर लोगों को मालिकाना हक दे दिया गया। यह काम इतने सलीके से हुआ है, कि विपक्ष के लोग इसका विरोध नहीं कर पाए। पिछली सरकारों ने भी आबादी पट्टा का वितरण किया था, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री की तस्वीर के साथ-साथ मालिकाना हक का कार्ड लोगों के घर पहुंच गया। इससे उन लाखों लोगों को विशेष राहत मिली है जो कि कब्जा हटाए जाने से सशंकित थे। 
    जोगी कांग्रेस से रवानगी की वजह
    जोगी पार्टी से कई लोग बाहर हुए हैं और कुछ और के भी निकलने की उम्मीद जताई जा रही है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ टिकट या पद न मिलने के कारण नेताओं ने पार्टी छोड़ी है, बल्कि कुछ पर गंभीर आरोप भी लग गए थे, जिसके कारण वे पार्टी में अपना भविष्य न देखते हुए चुपचाप निकल लिए। 
    सुनते हैं कि जोगी पार्टी की कुछ महीना पहले साइंस कॉलेज मैदान में एक बड़ी सभा हुई थी। जोगी तबीयत खराब होने के चलते करीब दो घंटा विलम्ब से पहुंचे। सभा में अच्छी खासी भीड़ जुटी, लेकिन एक हिस्सा खाली रह गया। जोगी पार्टी के प्रमुख नेताओं को मैदान के अलग-अलग हिस्सों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्हें आर्थिक संसाधन भी मुहैया कराए गए थे, लेकिन जब भीड़ की समीक्षा हुई तो खाली हिस्से के लिए जिम्मेदार नेता को तलब किया गया। काफी डांट-फटकार भी हुई। पैसे का हिसाब-किताब भी लिया गया। इसके बाद से जिम्मेदार नेता कोप भवन में चले गए थे और फिर आखिर में पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामना उचित समझा। (rajpathjanpath@gmail.com)

     

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Posted Date : 15-Sep-2018
  • बिलासपुर-रायपुर फोरलेन के निर्माण में देरी पर हाईकोर्ट ने कड़ा रूख अपनाया है। कोर्ट ने निर्माण एजेंसियों के साथ-साथ पीडब्ल्यूडी अफसरों को जवाब-तलब किया है। फोरलेन के निर्माण की प्रक्रिया 6 साल पहले हुई थी और वर्ष-2015 में इसके लिए एग्रीमेंट हुआ था। कहा जा रहा है कि निर्माण एजेंसियों की लापरवाही और अन्य कारणों के चलते निर्माण में देरी हुई और लागत भी साढ़े तीन सौ करोड़ बढ़ गई। निर्माण कार्यों के चलते आवागमन में लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सरकार की भी किरकिरी हो रही है। 
    ऐसा नहीं है कि फोरलेन के निर्माण को जल्दी पूरा करने के लिए कोई कोशिश नहीं हुई। सीएम भी इस सिलसिले में बैठक ले चुके हैं।   सुनते हैं कि पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव रहे अमिताभ जैन ने नए सिरे से टेंडर करने का सुझाव दिया था। उन्होंने यह भी कहा था कि ठेकेदार ही देरी के लिए जिम्मेदार है। यदि टेंडर निरस्त कर दोबारा टेंडर किया जाता है, तो इस प्रक्रिया में 6 माह का समय लग सकता है, लेकिन रफ्तार से काम होगा। तब उस समय उनके सुझाव को खारिज कर दिया गया था। बाद में वे पद से हट भी गए। अब विभाग के लोग मान रहे हैं कि अमिताभ जैन के सुझाव को मान लिया जाता, तो कोर्ट कचहरी की नौबत नहीं आती। अब तक सड़क बन भी चुका होता। 

    सरकारी देर से हटने का खतरा
    आईपीएस में विलंब होने के कारण राज्य पुलिस सेवा के अफसर  धमतरी एसपी रजनेश सिंह, जशपुर एसपी प्रशांत ठाकुर, कोरिया एसपी विवेक शुक्ला और कवर्धा एसपी लालउम्मेद सिंह का हटना तय माना जा रहा है। अभी तक डीपीसी के लिए तिथि तय नहीं हुई है और अगले एक हफ्ते में इसकी संभावना भी कम दिख रही है। यदि अगले 10 दिन में डीपीसी हो भी जाती है, तो अधिसूचना जारी होने में महीनेभर का समय लग सकता है। विधानसभा चुनाव के लिए आचार संहिता अक्टूबर के पहले हफ्ते में प्रभावशील होने की संभावना जताई जा रही है। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार एसपी पद पर आईपीएस अफसर ही रह सकते हैं। ऐसे में इन चारों की जगह आईपीएस अफसरों को मौका मिल सकता है।  

    इतना चंदा कैसे?
    नोटबंदी-जीएसटी के चलते  इस बार चुनावी चंदा जुटाने के लिए राजनीतिक दलों के नेताओं को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। भाजपा कार्यसमिति की बैठक में चुनावी चंदे को लेकर दिए गए फरमान से पार्टी के दूसरे पदाधिकारी टेंशन में हैं। सुनते हैं कि पार्टी पदाधिकारियों को हर विधानसभा सीट से 25 लाख रूपए जुटाने के लिए कहा गया है। यह राशि नंबर एक में होगी और बाद में इसे प्रत्याशियों को दिया जाएगा। खैर, अभी तो फंड जुटाने से दावेदार भी बचते दिख रहे हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 14-Sep-2018
  • भाजपा में औपचारिक रूप से प्रत्याशी के चयन की प्रक्रिया भले ही शुरू नहीं हुई है, लेकिन सर्वे रिपोर्ट का हवाला देकर कुछ विधायकों को उनकी हालत का अहसास कराया जा रहा है। ऐसे ही दुर्ग संभाग के एक विधायक को साफ तौर पर बता दिया गया कि सर्वे रिपोर्ट में उनकी हालत अच्छी नहीं है। टिकट कटने का संकेत मिलते ही इस विधायक ने पार्टी के दूसरे असंतुष्ट नेताओं से मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया है।  सुनते हंै कि एक  जगह असंतुष्ट नेता आपस में चर्चा के लिए एकत्र भी हुए थे। फिलहाल यह तय किया गया है कि टिकट की अधिकृत घोषणा का इंतजार किया जाए। इसके बाद पूरे जिले में पार्टी और सरकार के खिलाफ मुहिम छेड़ी जाएगी। इसमें किसान संगठनों को आगे किया जाएगा। पहले भी असंतुष्ट नेता किसानों की समस्याओं को लेकर अच्छी भीड़ जुटा चुके हैं। जानकारों का अंदाजा है कि असंतुष्ट गतिविधियां तेज हुई, तो भाजपा को राजनांदगांव और कवर्धा व बेमेतरा जिले में सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

    कारोबार को चुनावी राहत
    चुनावी साल में वोटरों को लुभाने के लिए गिफ्ट बांटने का सिलसिला शुरू हो गया है। रक्षा बंधन से इसकी शुरूआत हुई थी। इसमें रायपुर के एक भाजपा विधायक ने रक्षाबंधन के पहले अलग-अलग स्तरों पर कार्यक्रम रख करीब दो हजार से अधिक महिलाओं को साडिय़ां और अन्य उपहार बांटे थे। सुनते हैं कि बस्तर की एक महिला भाजपा नेत्री ने साडिय़ों का लंबा-चौड़ा आर्डर दिया है। चुनाव आचार संहिता के पहले इसका वितरण भी हो जाएगा। नोटबंदी और जीएसटी की मार झेल चुके कपड़ा व्यापारियों के लिए चुनावी साल में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। कारोबारी भी मानते हैं कि सोने की तुलना में कपड़ा कारोबार के चमकने की उम्मीद ज्यादा है। 

     

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Posted Date : 13-Sep-2018
  • शैलेश नितिन त्रिवेदी, किसी परिचय के मोहताज नहीं है। वे राज्य बनने के बाद से मीडिया में कांग्रेस का पक्ष रख रहे हैं। इंजीनियरिंग में स्नातक शैलेश को लेकर पार्टी के एक खेमे में धारणा रही है कि वे जिस किसी के साथ रहे, मीडिया में उनका पलड़ा भारी रहा है। छात्र नेता के रूप में कभी अजीत जोगी के साथ अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत करने वाले शैलेश जब उनसे अलग हुए, तो उसके बाद से जोगी का प्रचार तंत्र ही गड़बड़ा गया। मुद्दों की गहरी समझ और बेहद मेहनती होने के कारण वे न सिर्फ कांग्रेस बल्कि दूसरी पार्टियों के मीडिया-प्रवक्ताओं से भारी पड़ते हैं। 

    शैलेश विधानसभा चुनाव लडऩे की इच्छा रखते हैं। वे अपने गृह नगर बलौदाबाजार से टिकट चाहते हैं। खास बात यह है कि राज्य बनने के बाद प्रदेश में चार बार विधानसभा के चुनाव हुए हैं। हर बार बलौदाबाजार से कांग्रेस से टिकट के दावेदारों के पैनल में उनका नाम रहा है। इस बार भी बलौदाबाजार से टिकट के लिए जो तीन नाम योग्य समझे गए हैं, उनमें शैलेश का नाम भी बताया जा रहा है।  उन्हें चुनाव मैदान में उतारने के लिए पार्टी कितनी गंभीर है, इसका पता उनसे जुड़े एक किस्से से लगाया जा सकता है। हुआ यूं कि 6 साल पहले तत्कालीन प्रदेश प्रभारी बीके हरिप्रसाद सड़क मार्ग से बिलासपुर में कार्यक्रम में शामिल होने गए। उनके साथ गाड़ी में दिवंगत प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और अन्य वरिष्ठ नेता भी थे। इन नेताओं का  जगह-जगह स्वागत हुआ। शैलेश ने भी अपने साथियों के साथ सिमगा में हरिप्रसाद और अन्य नेताओं का स्वागत किया। 
    स्वागत के बाद सभी ने गाड़ी में शैलेश की कार्य कुशलता की तारीफ की और उनकी चुनाव लडऩे की इच्छा पर भी चर्चा की। सुनते हंै कि एक प्रमुख नेता ने सुझाव दिया कि शैलेश को चुनाव लड़ाने के बजाए राज्यसभा में भेजा जाना चाहिए ताकि उसकी प्रतिभा का सही उपयोग हो सके। बाकियों ने भी इसमें हामी भरी। खास बात यह है  कि उस समय की चर्चा के दौरान गाड़ी में मौजूद नेताओं ने दो अभी भी चुनाव समिति में हैं और प्रत्याशी चयन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में शैलेश को लेकर उनकी धारणा बदली है या नहीं, टिकट  की घोषणा के बाद ही पता चल पाएगा। 

    कार्यक्रम के बाद उम्मीद न थी...
    आयकर की टीम दो बड़े स्पंज आयरन उद्योग समूहों के यहां जांच पड़ताल में जुटी है। इनमें से एक राजेश अग्रवाल, रीयल इस्पात के मालिक हैं। यह भी संयोग है कि अग्रवाल के ही वृंदावन हॉल में पिछले दिनों आयकर कमिश्नर पीके दास का कार्यक्रम हुआ था। इसमें राजेश और उनकी कंपनी के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। आयकर कमिश्नर के छापों को लेकर विचार से वहां मौजूद उद्योगपति -व्यापारी काफी संतुष्ट थे और चुनाव से पहले छापों का अंदेशा नहीं था। छापेमारी से उद्योग जगत में हड़कंप मचा है। दूसरे स्पंज आयरन कारोबारी अनिल नचरानी पहले से ही चर्चा में थे। अनिल ने कपड़े व्यवसाय से स्पंज आयरन के क्षेत्र में कदम रखा था। और वे विमल जैन से विवादों को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। सुनते हैं कि दोनों के बीच विवाद को निपटाने के लिए कई नेताओं ने हस्तक्षेप भी किया था। ब्याज के लंबे-चौड़े काम के चलते नचरानी परिवार की चर्चा होने लगी थी। ऐसे में जब आयकर टीम ने उनके यहां दबिश दी, तो कारोबारियों को आश्चर्य नहीं हुआ। 

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Posted Date : 11-Sep-2018
  • सरगुजा संभाग की विधानसभा सीटों में भाजपा बेहतर प्रत्याशी की खोजबीन में जुटी है। पार्टी दो बार सर्वे भी करा चुकी है। पार्टी के रणनीतिकार स्थानीय दिग्गज नेताओं के तेवर से परेशान हैं। सुनते हैं कि राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम अपनी परम्परागत रामानुजगंज सीट के बजाए प्रतापपुर से टिकट चाहते हैं। जबकि पार्टी उन्हें रामानुजगंज से ही प्रत्याशी बनाने की सोच रही है। प्रतापपुर सीट का प्रतिनिधित्व गृहमंत्री रामसेवक पैकरा करते हैं। जिनकी कंबल वाले बाबा के चक्कर में हालत पतली मानी जा रही है। इससे परे दिवंगत पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिव प्रताप सिंह के बेटे विजय प्रताप भी प्रतापपुर से टिकट चाहते हैं। कुल मिलाकर प्रतापपुर की टिकट को लेकर दिग्गजों में मची खींचतान से आसपास की सीटों पर भी नुकसान अंदेशा जताया जा रहा है। 
    सरगुजा की भटगांव सीट को लेकर एक अलग ही तरह का मामला सामने आया है। भटगांव अनारक्षित सीट है और भाजपा के स्थानीय विरोधी नेताओं ने यह खबर फैला दी कि पूर्व विधायक श्रीमती रजनी त्रिपाठी चुनाव नहीं लडऩा चाहती हैं, जबकि वे पूरे पांच साल सक्रिय रहीं हैं और अब उन्हें जगह-जगह अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ रही है। अफवाह फैलाने में कांग्रेस नेताओं का कोई मुकाबला नहीं रहा है और इसके चलते कईयों की टिकट भी कट गई। 
    पुराने कांग्रेसी बताते हैं कि गुजरे जमाने के बड़े कांग्रेस नेता मथुरा प्रसाद दुबे को लेकर दिल्ली में यह अफवाह फैल गई कि वे अस्वस्थ हैं और चुनाव नहीं लडऩा चाहते हैं। पार्टी हाईकमान ने दुबे की जगह उनके भांजे राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल को कोटा सीट से टिकट दे दी। जब शुक्ल के नाम की अधिकृत घोषणा हुई, तब दुबेजी को गड़बड़ी का पता चला। बाद में वे दिल्ली पहुंचे और वरिष्ठ नेताओं को सफाई दी कि वे स्वस्थ हैं और चुनाव लडऩा चाहते हैं, लेकिन तब तक शुक्ल के नाम बी-फार्म जारी हो चुका था और दुबेजी प्रत्याशी बनने से रह गए थे। 

    कांग्रेस में माथापच्ची जारी
    कांग्रेस में टिकट को लेकर काफी माथापच्ची हो रही है। कुछ दिग्गज नेताओं की स्थिति अच्छी नहीं होने के बावजूद चुनाव समिति के सदस्य  उनकी जगह अन्य मजबूत नामों पर जोर नहीं दे पा रहे हैं। सुनते हंै कि भानुप्रतापपुर सीट से मनोज मण्डावी की टिकट सिर्फ इस आधार पर फायनल मानी जा रही है कि वे आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं। जबकि जोगी कांग्रेस से पुराने कांग्रेस नेता मानक दरपट्टी के चुनाव मैदान में उतरने से मनोज की राह कठिन हो गई है। ऐसा नहीं है कि यहां पार्टी के पास मजबूत विकल्प नहीं है। जिला पंचायत सदस्य और पूर्व जनपद अध्यक्ष रह चुके वीरेश ठाकुर भी यहां से टिकट की रेस में हैं। उनकी साख अच्छी है। 
    वीरेश के पिता सत्यनारायण ठाकुर भानुप्रतापपुर से विधायक रह चुके हैं। उनके भाई  वीबीएस ठाकुर मप्र में एडीजी रहे हैं। कुल मिलाकर वीरेश का परिवार पढ़ा-लिखा और सम्मानित माना जाता है। ऐसे में मजबूत विकल्प होने के बावजूद वीरेश को टिकट की रेस में फिलहाल मनोज से पीछे ही माना जा रहा है। कुछ सुझाव यह भी है कि वीरेश को भानुप्रतापपुर की जगह कांकेर से प्रत्याशी बना दिया जाए। हालांकि अभी तक भानुप्रतापपुर और कांकेर के लिए सभी नेता एक राय नहीं हो पाए हैं। ऐसे में अंतिम क्षणों में कोई बदलाव हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होगा। 

     

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Posted Date : 10-Sep-2018
  • सेवा अवधि पूरा होने के बाद पीएन सिंह को राज्य विद्युत नियामक आयोग के सचिव पद पर संविदा नियुक्ति देने के प्रस्ताव को सदस्य ने खारिज कर दिया। उनकी संविदा नियुक्ति को लेकर सस्पेंस अंत तक कायम रहा। उन्होंने महीनेभर पहले ही चुपचाप आयोग के अध्यक्ष नारायण सिंह से उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले अपनी संविदा नियुक्ति बढ़ाने की अनुशंसा ले ली थी। और अपना कार्यकाल खत्म होने के आखिरी दिन इसको सार्वजनिक किया। चूंकि  संविदा नियुक्ति का प्रस्ताव विधि सम्मत नहीं था, इसलिए उन्हें हटाकर आयोग के संचालक को सचिव का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। 
    पीएन सिंह अभियंता संघ के अध्यक्ष रहे हैं और बिजली अफसरों पर उनकी पकड़ रही है। नारायण सिंह और पीएन सिंह की जोड़ी उद्योगपतियों में काफी लोकप्रिय रही। हालांकि पीएन सिंह से किसान संघ काफी खफा रहा है। पहले सरकार के लोग पीएन सिंह को काफी महत्व देते थे, लेकिन एक विवादित फैसले के बाद आला अफसरों ने उनसे मुंह मोड़ लिया। सुनते हैं कि आयोग ने राज्य पॉवर कंपनी के जिंदल पॉवर से बिजली खरीद के लिए टैरिफ का अनुमोदन किया था। तीन साल तक तो इसे मान्य किया जाता रहा, लेकिन 2014-15 में अमान्य कर दिया। इस फैसले के बाद जिंदल समूह से 153 करोड़ की रिकवरी निकाली गई। 
    इस फैसले को जिंदल समूह ने ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, लेकिन वहां उन्हें राहत नहीं मिली। हाल यह है कि पॉवर कंपनी को जिंदल से रिकवरी के लिए कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाना पड़ रहा है। खैर, इस फैसले से न तो सरकार और न ही जिंदल समूह खुश है। सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि तीन साल तक बिजली खरीदी के लिए टैरिफ को पहले तो मान्य किया, बाद में प्रस्ताव निरस्त क्यों कर दिया? यदि गलत था तो पहले ही इस पर आपत्ति करनी चाहिए थी। कहा तो यह भी जाता है कि जब उद्योग समूहों से तालमेल अच्छा रहता था, तो आयोग के लोग उद्योग समूहों के प्रतिनिधियों की महंगी गाडिय़ों में घूमने से परहेज नहीं करते थे। खैर, अब जब पीएन सिंह को आयोग से बेदखल किया गया तो सबने उनसे किनारा कर लिया।  

    धमतरी पर सेठ का दावा
    कांग्रेस में धमतरी सीट को लेकर उलझन बढ़ गई है। यहां से गुरूमुख सिंह होरा विधायक हैं, लेकिन इस बार उन्हें टिकट के लिए पार्टी के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल से लोहा लेना पड़ रहा है। रामगोपाल की चुनाव लडऩे की हसरत काफी पहले से रही है, लेकिन उनकी जगह टिकट कोई और उड़ा लेते रहे हैं। इस बार उनके हौसले बुलंद हंै। इसकी वजह भी है कि उन्होंने नए पीसीसी दफ्तर राजीव भवन के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। 
    राजीव भवन के निर्माण के चलते रामगोपाल की पकड़ दिल्ली दरबार में भी बन गई है। इसके अलावा उनके परिवार के कांग्रेस के एक दिग्गज नेता से कारोबारी संबंध बताए जाते हैं। इससे परे होरा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत के करीबी माने जाते हैं, जो कि चुनाव अभियान समिति के मुखिया हैं। सुनते हैं कि जहां-जहां महंत की दिलचस्पी ज्यादा है उन सीटों पर पैनल बन गया है। ऐसे में महंत को होरा समेत अन्य समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है। 

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Posted Date : 09-Sep-2018
  • पिछले विधानसभा-लोकसभा चुनावों की तुलना में इस बार सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे लोग चुनाव मैदान में उतरेंगे। जहां आम आदमी पार्टी की टिकट से कृषि वैज्ञानिक, मेडिकल ऑफिसर, सहकारिता अफसर, इंजीनियर सहित निजी क्षेत्र में ऊंचे ओहदे पर काम कर चुके  लोग चुनाव मैदान में है। जोगी पार्टी से पूर्व आईएएस चुनाव मैदान में हैं। इसके अलावा कांग्रेस और भाजपा से भी पूर्व आईएएस, पूर्व पुलिस अफसर सहित कई अन्य लोग चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। कुल मिलाकर इस बार पढ़े-लिखे उम्मीदवारों की संख्या ज्यादा होगी। ऐसा लगता है कि विधानसभा में न सही, कम से कम चुनावी मैदान में औसत शिक्षा पहले से ज्यादा रहेगी।

    प्रेमप्रकाश के खिलाफ कुरैशी?

    कांग्रेस में टिकट को लेकर खींचतान चल रही है। यह तकरीबन तय माना जा रहा है कि भिलाई नगर सीट से उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय के खिलाफ पूर्व मंत्री बदरूद्दीन कुरैशी ही मुख्य मुकाबले में होंगे। सुनते हैं कि पिछले कई महीनों से महापौर देवेंद्र यादव भिलाई नगर से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे थे। भूपेश बघेल भी ऐसा ही चाहते रहे हैं, लेकिन बाबूजी के साथ ही कुछ और नेता बदरूद्दीन को टिकट देने के पक्ष में रहे हैं। कुछ समीकरणों के चलते देवेंद्र यादव को वैशाली नगर से चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। यानी प्रेमप्रकाश और बदरूद्दीन कुरैशी छठवीं बार विधानसभा चुनाव में आमने-सामने हो सकते हैं। दूसरी तरफ भिलाई में जन्मी-पढ़ी एक तेलुगू महिला भाजपा की वैशालीनगर से उम्मीदवार हो सकती हैं, विभा राव शादी के बाद बिलासपुर में रहती हैं, लेकिन वे हैं तो भिलाई की ही। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 08-Sep-2018
  • सरकार के पुराने मंत्रियों के खिलाफ कांग्रेस मजबूत उम्मीदवार की खोज में जुटी है। दिग्गज मंत्रियों को घेरने की रणनीति बनाई जा रही है।  बृजमोहन और अमर अग्रवाल के खिलाफ कई दावेदारों के नाम चर्चा में हैं। कांग्रेस के रणनीतिकार मानते हैं कि बिलासपुर में अमर के खिलाफ माहौल है, लेकिन उनके  खिलाफ नाराजगी को भुनाने के लिए उम्मीदवार का आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी है। क्योंकि अमर आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर हैं और इस बूते पर वह अपने खिलाफ नाराजगी को दबाने में सफल हो जाते हैं। कांग्रेस संगठन जिस लड़ाकू स्वभाव के नेता को टिकट देना चाहते हैं वे अमर के मुकाबले आर्थिक तौर पर कहीं नहीं टिकते हैं। पार्टी भी  बहुत ज्यादा फंड देेने की स्थिति में नहीं है और अमर अग्रवाल के मुकाबले अग्रवाल उपनाम के एक आर्थिक रूप से मजबूत नेता को प्रत्याशी बनाने पर विचार हो रहा है। ऐसे में बिलासपुर शहर में लड़ाई अमर अग्रवाल वर्सेस अग्रवाल, और रुपया वर्सेस रुपया हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

    रमन को सरगुजा का सुझाव?
    सीएम रमन सिंह और नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव की गहरी छनती है। दोनों ही सरल और मिलनसार हैं। स्वभावगत विशेषता के कारण सिंहदेव को अपने पार्टी के भीतर ज्यादा आलोचना का सामना करना पड़ता है। उनके विरोधी छोटी-छोटी बातों को हाईकमान तक पहुंचाने में देर नहीं करते। इससे परे भाजपा में नेता प्रतिपक्ष उनके विधानसभा क्षेत्र में घेरने की तगड़ी कोशिश हो रही है। सुनते हैं कि एक सुझाव यह भी आया है कि खुद सीएम भटगांव से चुनाव लड़ेें। भटगांव सीट, नेता प्रतिपक्ष के विधानसभा क्षेत्र अंबिकापुर से सटी है। अंबिकापुर रेलवे स्टेशन भटगांव विधानसभा क्षेत्र में आता है। यहां से रविशंकर त्रिपाठी विधायक रहे हैं और उनके निधन के बाद उनकी पत्नी रजनी त्रिपाठी विधायक रहीं। रजनी त्रिपाठी पिछला चुनाव हार गई थीं इसकी मुख्य वजह उनका चुनाव मैनजमेंट बिखरना रहा। वे रविशंकर त्रिपाठी के निधन के पहले कभी सक्रिय राजनीति में नहीं रही। सीएम का नाम सुझाने वालों का मानना है कि सीएम के भटगांव से चुनाव लडऩे से पूरे सरगुजा संभाग में फर्क पड़ेगा। खैर, इन सुझाव को पार्टी के रणनीतिकार कितनी गंभीरता से लेते हैं, यह देखना है। यह सुझाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बनारस जाकर लडऩे के बाद अब अगला चुनाव ओडि़शा के पुरी से लडऩे की चर्चा सरीखा है कि बड़े नेता कहीं से भी जाकर लड़ सकते हैं। मध्यप्रदेश में छिंदवाड़ा से कांगे्रस के कमलनाथ जीवन में सिर्फ एक बार हारे जब सुंदरलाल पटवा जाकर लोकसभा उपचुनाव में कमलनाथ के खिलाफ लड़े थे। उधर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद अर्जुन सिंह ने शुक्ल बंधुओं के छत्तीसगढ़ में आकर, और भाजपा के लखीराम अग्रवाल के गृहनगर खरसिया से विधानसभा उपचुनाव लड़ा था। इसलिए बड़े नेता कहीं से भी जाकर लड़ सकते हैं, और रमन सिंह के लिए तो पूरा प्रदेश ही छोटा है, वे किसी भी अनारक्षित सीट से लड़ सकते हैं।

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Posted Date : 07-Sep-2018
  • रायपुर उत्तर से टिकट के लिए कांग्रेस और भाजपा से रोजाना नए नाम सामने आ रहे हैं। दावेदारों की भीड़ पर दोनों ही पार्टी के बड़े नेता मजे ले रहे हैं और उन्हें आपस में उलझा भी रहे हैं। कांग्रेस से पूर्व विधायक रमेश वल्र्यानी टिकट के लिए खूब लॉबिंग कर रहे हैं। वल्र्यानी के सिंधी समाज से ही आनंद कुकरेजा के पुत्र पार्षद अजीत कुकरेजा की भी दावेदारी है। पिछले चुनाव में कम वोट से हारने वाले पूर्व विधायक कुलदीप जुनेजा, महापौर प्रमोद दुबे और डॉ. राकेश गुप्ता भी यहां से टिकट के लिए प्रयासरत हैं। सुनते हैं कि टिकट के आवेदन के बाद वल्र्यानी छानबीन समिति के एक प्रमुख सदस्य को एक प्रतिद्वंदी के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा दे आए। 
    समिति के सदस्य इतने चालाक निकले कि उन्होंने तुरंत संबंधित बुलावा भेजा और उन्हें उनके खिलाफ शिकायतों की पूरी जानकारी दे दी। इतना ही नहीं, उनका पक्ष भी ले लिया। अब हाल यह है कि टिकट के दावेदार एक दूसरे को भला-बूरा कहने में नहीं चूक रहे हैं। यही हाल भाजपा का भी है। उत्तर से मौजूदा विधायक श्रीचंद सुंदरानी की स्वाभाविक दावेदारी है, लेकिन कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने अपने विभाग से जुड़े एक अस्पताल के कार्यक्रम में बाकी दावेदारों को भी अतिथि बनवा दिया। यह कार्यक्रम पंडरी में हुआ और पंडरी रायपुर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में आता है, लेकिन इस कार्यक्रम में विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में श्रीचंद सुंदरानी के साथ-साथ छगनलाल मुंदड़ा, संजय श्रीवास्तव, सुनील सोनी, मोहन एंटी, प्रफुल्ल विश्वकर्मा, सुभाष तिवारी और सूर्यकांत राठौर भी थे। खास बात यह है कि ये सभी टिकट चाहते हैं और अपने-अपने स्तर पर मेहनत भी कर रहे हैं। अब सुंदरानी समर्थक इस बात से खफा हैं कि  सरकारी कार्यक्रम में सभी दावेदारों को बराबर का दर्जा देकर एक तरह से आपस में उलझाने की कोशिश भी हो रही है। 
    डगर कठिन है राजनीति की
    मौजूदा हालात में राजनीति कठिन हो चली है। हफ्तेभर पहले आईएएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए ओपी चौधरी को अहसास भी हो रहा होगा। जब तक कलेक्टर थे तब उन पर कभी उंगलियां नहीं उठी, लेकिन राजनीति में आते ही पुराने मामले ढूंढ निकाले गए और उन्हें इसका सार्वजनिक तौर पर जवाब भी देना पड़ गया। 
    प्रकरण दंतेवाड़ा का है। ओपी चौधरी दंतेवाड़ा कलेक्टर थे तब जमीन की अदला-बदली की फाइल पर मुहर लगाई। आरोप है कि सस्ती निजी जमीन लेकर महंगी सरकारी जमीन आबंटित कर चार लोगों को फायदा पहुंचाया। चौधरी की तरफ से सफाई आई, कि उन्होंने कोई आदेश पारित नहीं किया है। उन्होंने प्रकरण का खुलासा करने वाले आम आदमी पार्टी के नेताओं को बहस की भी चुनौती दी है। प्रकरण को नजदीक से जानने वाले एक राजस्व अफसर बताते हैं कि चौधरी एक तरह से सही कह रहे हैं कि उन्होंने कोई आदेश पारित नहीं किया, लेकिन फाइल उन्हीं के समय तैयार हुई थी और बाद के कलेक्टर ने सिर्फ आदेश पारित किया। यदि गड़बड़ी हुई है, तो न सिर्फ चौधरी बल्कि बाद के कलेक्टर भी जिम्मेदार हैं। 
    यह आरोप कि सरकार ने कोई जांच नहीं कराई, गलत है। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद विधि आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष जस्टिस टीपी शर्मा की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच कमेटी बनाई थी। जांच आगे बढ़ पाती कि पक्षकार सुप्रीम कोर्ट चले गए और कोर्ट ने स्टे लगा दिया। आम आदमी पार्टी के नेताओं ने लोकायुक्त के समक्ष प्रकरण की जांच के लिए शिकायत दर्ज कराई है। यह भी संयोग है कि आज के लोकायुक्त जस्टिस टीपी शर्मा पहले ही इस मामले को देख चुके हैं। अब चूंकि सुप्रीम कोर्ट का स्टे लगा हुआ है। ऐसे में प्रकरण जांच हो पायेगी, इसकी संभावना कम है। खैर, चुनाव नजदीक हैं ऐसे कई प्रकरणों का जवाब देने के लिए चौधरी को तैयार रहना होगा। 

    इन दिनों आपका फोन नंबर किसी कारोबारी के पास गया, तो फिर उसका भगवान ही मालिक है। एक ग्राहक ने एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड की दूकान से खरीददारी की, और वहां बाद में किसी डिस्काउंट-कूपन की उम्मीद में अपना फोन नंबर दे दिया। नतीजा यह हुआ कि उसकी खरीदी का जिक्र करते हुए उसके फोन पर एसएमएस आया कि आपने हाल ही में पुरूषों के कुछ कपड़े हमसे खरीदे हैं, इन कपड़ों का नया स्टॉक आया है। 
    अब ग्राहक इस फिक्र में पड़ गया कि अगर उसने किसी लड़की या महिला के लिए कपड़े खरीदे होते, तो भी यह दूकान उसे उस बाद का जिक्र करते हुए ऐसा एसएमएस भेजती, और वे कपड़े घर के बाहर किसी के लिए होते, तो घर पर आग लगनी तय होती।
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 06-Sep-2018
  • आईएएस की नौकरी छोड़ राजनीति में आए ओपी चौधरी भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी से दूर रहने की कोशिश कर रहे हैं। वैसे तो उन पर सीएम के करीबी होने का लेबल लगा है, लेकिन वे सीएम विरोधियों का भी साथ चाहते हैं। वे पार्टी में शामिल होने के बाद रायपुर आए, तो स्वागत सत्कार के बाद सबसे पहले बृजमोहन अग्रवाल से मिलने उनके निवास गए और उनसे आशीर्वाद लिया। 
    दिलचस्प बात यह है कि केरल बाढ़ पीडि़तों की सहायता के लिए चावल का रैक रवाना किया गया, तो कलेक्टर चौधरी की गैर मौजूदगी पर बृजमोहन अग्रवाल ने खुले तौर पर नाराजगी जाहिर की थी। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया में वायरल हुआ। अब जब नौकरी छोड़कर मिलने आए तो बृजमोहन ने उनके फैसले को त्यागपूर्ण करार दिया। चौधरी भली-भांति जानते हैं कि बृजमोहन ही भाजपा के अकेले नेता है, जो कि अपनी सीट खुली छोड़कर बाकियों की सीट में तांक-झांक की हैसियत रखते हैं। सीएम को छोड़ दें, तो पार्टी के प्रदेश स्तर के नेता नामांकन के बाद अपने क्षेत्र से बाहर निकलने का जोखिम तक नहीं उठा पाते। ऐसे में जब चौधरी चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, तो उनके लिए यह जरूरी भी था कि वे बृजमोहन का भी साथ लें। वैसे ही चुनाव के बाद अगर राज्य में भाजपा की सरकार आती है, तो लंबी लीड से जीतने की सबसे अधिक संभावनाओं वाले दो-तीन नेताओं में बृजमोहन के भी रहने का आसार है, और पार्टी में नए आए नेता को उनसे भी ठीक बनाकर चलना समझदारी है।

    रेणु जोगी पर मतभेद जारी
    अब तक साथ-साथ रहे भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव, रेणु जोगी को टिकट के मसले पर आपस में टकरा सकते हैं। रेणु जोगी कांग्रेस टिकट से ही चुनाव लडऩा चाहती हैं, लेकिन भूपेश उन्हें टिकट देने के खिलाफ हैं। वे रेणु जोगी के बजाए शैलेष पाण्डेय को टिकट दिलाना चाहते हैं। भूपेश की मंशा देखकर जिला और ब्लॉक कांग्रेस ने भी रेणु जोगी के नाम की सिफारिश नहीं की। 
    जबकि वे तीन बार विधायक रह चुकी हैं। अजीत जोगी के खिलाफ मुहिम में भूपेश के साथ कदम ताल  मिलाने वाले सिंहदेव रेणु जोगी के मामले में उनसे अलग राय रखते हैं। वे चाहते हैं कि रेणु जोगी को हर हाल में टिकट मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि जोगी समर्थक विधायक आरके राय और सियाराम कौशिक   से परे डॉ. रेणु जोगी पूरी तरह अनुशासित रही हैं और पार्टी के निर्देशों का कभी उल्लंघन नहीं किया। ऐसे में उनकी टिकट काटने का कोई औचित्य नहीं है। संकेत साफ हैं कि छानबीन समिति की बैठक में भूपेश-सिंहदेव के बीच मतभेद उभरकर सामने आ सकते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 04-Sep-2018
  • भाजपा के दिग्गज नेता अपने आसपास की सीट से पसंद का उम्मीदवार चाह रहे हैं। इसके लिए पार्टी फोरम में माहौल भी बनाने की कोशिश हो रही है। सुनते हैं कि बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के भाजपा विधायक गौरीशंकर अग्रवाल, शिवरतन शर्मा और डॉ. सनम जांगड़े ने एक राय होकर बलौदाबाजार सीट से साहू समाज का प्रत्याशी चाहते हैं। इन तीनों विधायकों के क्षेत्र कसडोल, भाटापारा और बिलाईगढ़ में साहू समाज के मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। ऐसे में विशेषकर गौरीशंकर और शिवरतन शर्मा की कोशिश है कि बलौदाबाजार में साहू समाज से प्रत्याशी उतारा जाए, ताकि जाति संतुलन बना रहे और तीनों को इसका फायदा मिले। 
    चर्चा है कि गौरीशंकर और शिवरतन शर्मा इसके लिए विशेष जोर लगा रहे हैं। वजह यह है कि गौरीशंकर के भांजे के हिट एण्ड रन केस के चलते साहू समाज का बड़ा तबका नाराज है। इसके अलावा जोगी पार्टी ने भी उनके लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। जोगी पार्टी ने कसडोल से परमेश्वर यदु को प्रत्याशी बनाया है, जो कि भाजपा में रहे हैं। यदु जिला पंचायत के उपाध्यक्ष रहे हैं और चार बार जिला पंचायत के सदस्य रह चुके हैं और उनकी इलाके में अच्छी पकड़ है। शिवरतन शर्मा के खिलाफ भी जोगी पार्टी ने पूर्व विधायक चैतराम साहू को चुनाव मैदान में उतारा है। साहू समाज भाजपा के परम्परागत वोटर रहे हैं। ऐसे में चुनाव निकालने के लिए साहू वोटरों को साधना जरूरी हो गया है। कुछ ऐसी ही स्थिति रायपुर जिले में भी है। 
    सुनते हैं कि बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत, रायपुर उत्तर से सिंधी समाज से प्रत्याशी चाहते हैं। मौजूदा विधायक श्रीचंद सुंदरानी का सामाजिक और पार्टी स्तर पर कई लोग विरोध कर रहे हैं। जानकारों का मानना है कि रायपुर उत्तर से सिंधी उम्मीदवार न होने से मूणत को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन रायपुर दक्षिण में 20 हजार सिंधी मतदाता हैं। सिंधी समाज की नाराजगी से उन्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि बृजमोहन समर्थक मानते हैं कि वर्ष-08 में भी रायपुर उत्तर से सिंधी समाज से प्रत्याशी नहीं दिया गया था। बावजूद इसके बृजमोहन 24 हजार मतों से चुनाव जीते थे। श्रीचंद के विरोधियों का तर्क है कि सिंधी समाज के लोग भाजपा के परम्परागत वोटर हैं। ऐसे में सुंदरानी की जगह किसी और को टिकट देने से भी कोई नुकसान नहीं होगा। वैसे भी सिंधी समाज पर पकड़ बनाए रखने के लिए पार्टी में जल्द ही एक बड़े सिंधी समाज के एक नेता को लाने की कोशिश हो रही है।
    पूरे प्रदेश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों को छोड़ दें, तो बाकी तमाम सीटों पर जातियों का समीकरण ऐसा है कि लोग अपने आसपास भी संतुलन चाहते हैं, और इसके बाद वे अपनी सीट पर निर्दलीय या बागी उम्मीदवार खड़े करके उसी तरह संतुलन पैदा करते हैं जैसे तराजू ठीक न होने पर छोटे दूकानदार कुछ और चीजें बांधकर पलड़ों का संतुलन बनाते हैं।

    श्यामाचरण के समय से
    श्यामाचरण शुक्ल की परंपरागत सीट रही राजिम से जब बाद में उनके बेटे अमितेष लड़े, जीते भी और हारे भी, तब भी लगातार उनकी कोशिश थी कि अगल-बगल किसी न किसी साहू को टिकट जरूर मिले, ताकि राजिम विधानसभा क्षेत्र के साहू मतदाताओं की नाराजगी न हो। ऐसे में जब अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे और उन्होंने टिकटें बांटी थीं, तो उन्होंने अमितेष के लिए परेशानी खड़ी करने को अगल-बगल की सीट पर साहू उम्मीदवार की जगह किसी गैर साहू को टिकट देने की तैयारी की थी, और इससे हड़बड़ाए अमितेष ने बिफरकर जोगी के सामने गुजारिश की थी कि उन्हें हरवाने की कोशिश न करें।

    चुनाव के पहले बवाल का खतरा
    आने वाले विधानसभा चुनाव में एक दलित सरकारी अधिकारी के साथ हुई ज्यादती के खिलाफ राजनांदगांव जिले के दलित समाज के भीतर एक बवाल खड़ा होने का खतरा है। और इससे जुड़ा हुआ एक दूसरा मामला है जिसमें पिछड़े वर्ग की एक महिला कर्मचारी के साथ हुई ज्यादती के खिलाफ ओबीसी-मुद्दा बनने जा रहा है। सरकार के हाथ से इसे सुधारने की गुंजाइश हर दिन खत्म होते जा रही है, और हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से सरकार को शर्मिंदगी हासिल होनी है। जो अफसर ऐसी ज्यादती के पीछे हैं, उनको चुनाव नहीं लडऩा है, और न ही वे चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की कोशिश मदद ही करने वाले हैं।

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Posted Date : 03-Sep-2018
  • हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स डॉ. आर के सिंह इस महीने रिटायर हो रहे हैं। उनके उत्तराधिकारी को लेकर कानाफूसी चल रही है। हालांकि वर्ष-82 बैच के अफसर शिरीषचंद्र अग्रवाल सबसे सीनियर हैं। वैसे वे डॉ. आर के सिंह से भी सीनियर थे, लेकिन सरकार ने उन्हें हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स नहीं बनाया। उनके कामकाज को लेकर कई तरह की शिकायतें रही हैं। इससे परे डॉ. आर के सिंह की साख काफी अच्छी रही है और उन्हें काबिल अफसर माना जाता है। 
    हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स और पीसीसीएफ मुख्यालय के लिए मुदित कुमार सिंह दौड़ में सबसे आगे है। आईएफएस के 84 बैच के अफसर मुदित कुमार वर्तमान में लघु वनोपज संघ के एमडी हैं। वे लंबे समय तक एपीसीसीएफ (लैंड मैनेजमेंट) के पद पर रहे हैं। उनके अलावा हाल ही में प्रमोट डॉ. के सी यादव और कौशलेन्द्र सिंह भी दौड़ में हैं। कौशलेन्द्र ने पीसीसीएफ (वाईल्ड लाईफ) का पद पाकर अपनी ताकत दिखा दी है। वैसे राकेश चतुर्वेदी भले ही हाल ही में एपीसीसीएफ बने हैं, लेकिन वे भी इस दौड़ से बाहर नहीं हुए हैं। जल्द ही उन्हें पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नत करने के लिए डीपीसी हो सकती है। इन सबके बावजूद मुदित सिंह फिलहाल रेस में आगे दिख रहे हैं। 

    संस्कृति विभाग की ज्यादती...
    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रदेश का सबसे पुराना संग्रहालय है, महंत घासीदास स्मृति संग्रहालय। एक वक्त यह सिर्फ संग्रहालय था, बाद में वह संस्कृति विभाग का दफ्तर बन गया, और फिर सरकारी काम करने वाले पेशेवर लोककला जत्थों का ठिकाना भी। संग्रहालय की हालत यह हुई कि यहां छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग की होली मनने लगी, अब छत्तीसगढ़ी खानपान का ठिकाना खुल गया, और एक ऐसा खुला रंगमंच बना जिसमें आए दिन कार्यक्रम होते हैं। मतलब यह कि संग्रहालय का संग्रह का काम किनारे रह गया, बाकी तमाम काम होने लगे।
    अब यहां पर शाम के कई घंटे होने वाले कार्यक्रमों के लाऊडस्पीकर आसपास के लोगों का जीना हराम कर चुके हैं। आसपास सैकड़ों मकान हैं, और उन्हें अनचाहा संगीत रोज घंटों सुनना पड़ता है। दूसरी तरफ इसी खुले रंगमंच के पास ही राजभवन है, और उसके आसपास तो हॉर्न बजाने की भी मनाही है, लेकिन ऐसे लाऊडस्पीकर चलते ही रहते हैं। 
    एक जानकार ने बताया कि राज्यपाल बनने की उम्र तक लोगों को कम सुनाई देने लगता है, और इसलिए राजभवन को खास दिक्कत होती नहीं है। फिलहाल ऐसा लाऊडस्पीकर कोई और जगह रोज बजाए तो पता नहीं सरकार उसका क्या हाल करेगी?
    इस बारे में पूछने पर संस्कृति विभाग के एक अफसर ने कहा-अब इसी का बदला निकालने के लिए मेरे घर के पास एक मंदिर रात-दिन कर्कश लाऊडस्पीकर बजा रहा है।
    मौजूदा जरूरत के मुताबिक?
    छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए बनाए गए कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में बरसों से राष्ट्रवाद से जुड़े हुए मुद्दों पर पढ़ाई और चर्चा जारी है। पत्रकारिता दरकिनार है, और पत्रकार बनने पहुंचे लोगों को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद में पारंगत किया जा रहा है। लेकिन इस सिलसिले की पराकाष्ठा अभी सामने आई है जब अगले हफ्ते इस विश्वविद्यालय में वैश्विक संस्कृति में हनुमान एवं आध्यात्मिक संचार विषय पर दो दिन की अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी की जा रही है। और जैसा कि इस विषय से जाहिर है, इसमें उत्तरप्रदेश के संस्कृति विभाग का अयोध्या शोध संस्थान भी भागीदार है। अब इस संगोष्ठी के बीस विषय देखें, तो इनमें से एक का भी संचार से कोई लेना-देना नहीं है, और हर विषय धर्म, संस्कृति, हनुमान, राम, रामायण, रामकथा, देवपूजन, रामसप्ताह, मंत्र पर केंद्रित है। लेकिन हो सकता है कि विश्वविद्यालय इस मायने में सही हो कि आज देश में ऐसी ही पत्रकारिता की जरूरत रह गई है जिसमें पत्रकारिता का नाम भी न हो, और रामनाम या हनुमाननाम हो। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 02-Sep-2018
  • भाजपा के ताजा हासिल आईएएस ओ पी चौधरी के बाद कांग्रेस ने एक रिटायर्ड आईएएस आर पी एस त्यागी को हासिल किया है, और उन्हें कोरबा जिले से चुनाव लड़वाने की चर्चा है। ऐसे अफसरों के राजनीति में आने, या उन्हें राजनीति में लाने से एक बात तो साबित होती है कि एक तरफ तो जब चुनाव के वक्त यह चर्चा रहती है कि जनता सरकारी मशीनरी से बहुत नाराज है, तो उसके बीच कुछ सरकारी अफसर चुनाव लडऩे के लायक भी पाए जाते हैं जिससे यह जाहिर होता है कि वे जनता के बीच कम से कम अलोकप्रिय तो नहीं हैं। अफसरों को राजनीति में लाने और चुनाव लड़वाने की पार्टियों की कोशिशों से पार्टियों का दीवालियापन भी साबित होता है कि उनके पास अपने लाखों-करोड़ों सदस्य और कार्यकर्ता होने का दावा महज कागजी है क्योंकि चुनाव लडऩे के लिए उम्मीदवार आयात करने पड़ रहे हैं। आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ में कई और मौजूदा या रिटायर्ड अफसरों पर निशाना लगने वाला है, और जिन इलाकों से इन्हें लड़वाया जाएगा, उन इलाकों के उन पार्टियों के नेताओं को अपने बारे में सोचना चाहिए कि उनमें आखिर कमी क्या रह गई है? 

    त्यागी का त्याग, या फिर...
    पूर्व आईएएस आरपीएस त्यागी शनिवार को कांग्रेस में शामिल हो गए। त्यागी मूलत: उत्तरप्रदेश के रहने वाले हैं, लेकिन उन्होंने अविभाजित मध्यप्रदेश में डिप्टी कलेक्टर से अपने प्रशासनिक कैरियर की शुरूआत की। राज्य बंटवारे के बाद उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर आबंटित किया गया। वे यहां आना नहीं चाहते थे, इसके लिए उन्होंने जमकर भाग दौड़ की, लेकिन जब उन्हें अनुभव हुआ कि छत्तीसगढ़ आने से वे कैडर लिस्ट में ऊपर आ जाएंगे और मध्यप्रदेश की तुलना में यहां जल्दी आईएएस हो सकते हैं, तो वे वर्ष-2004 में यहां आ गए।  त्यागी जल्द ही सीएम हाऊस के करीबी भी हो गए। उन्हें आईएएस अवार्ड होते ही धमतरी, कोरबा और फिर जांजगीर-चांपा जिले का कलेक्टर बनाया गया। कलेक्टर रहते यहां उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग गई। उन्हें दफ्तर में काम करने के बजाए किसी कार्यक्रम में अतिथि बनना ज्यादा भाता रहा है। स्थानीय नेताओं से उनके मधुर संबंध रहे हैं। रिटायर होने के बाद वे तुरंत पद भी पा गए। उन्हें राज्य प्रशासनिक सुधार आयोग का सचिव बना दिया गया, लेकिन आर्थिक रूप से सक्षम त्यागी जल्द ही अपने पद से इस्तीफा देकर कोरबा जिले में अपनी राजनीतिक संभावनाएं तलाशने लगे। वे कटघोरा विधानसभा क्षेत्र में काफी दौरा भी कर रहे थे। प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया से वे पूर्व परिचित रहे हैं और यही वजह है कि कांग्रेस में शामिल होने का निर्णय लिया। उन्हें अब टिकट की आस है।

    जोगी पार्टी उम्मीद पर जिंदा
    जोगी पार्टी के नेता एक-एक कर कांग्रेस में जा रहे हैं। जोगी पार्टी अब तक करीब 45 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर चुकी है, लेकिन पार्टी नेताओं के पलायन को देखकर बाकी सीटों पर प्रत्याशी की घोषणा रोक दी गई है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशियों की घोषणा के बाद जोगी पार्टी बाकी सीटों पर प्रत्याशियों के नाम का ऐलान करेगी। सुनते हैं कि अब तक जिन सीटों पर प्रत्याशी घोषित हुए हैं, उनमें से 4-5 को छोड़ दें, तो बाकी उम्मीदवार मुख्य मुकाबले में ही नहीं दिख रहे हैं। अच्छे और मजबूत उम्मीदवार के लिए जोगी पार्टी को दूसरे दल से आए नेताओं का इंतजार है। चर्चा है कि कांग्रेस आधा दर्जन से अधिक विधायकों की टिकट काट सकती है। ऐसे में इन विधायकों का रूख जोगी पार्टी की तरफ हो सकता है। इससे कुछ हद तक अच्छे उम्मीदवार का टोटा खत्म होने की उम्मीद है। (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 01-Sep-2018
  • कांग्रेस की चुनाव तैयारियां पिछले चुनावों की अपेक्षा इस बार बेहतर दिख रही है। यह चुनाव आयोग के साथ बैठक में जाहिर भी हुआ। कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग को चुनाव नतीजों को प्रभावित करने के तौर-तरीकों से अवगत कराया। पार्टी ने मतदाता सूची में गड़बडिय़ों को लेकर आयोग को ब्यौरा दिया है। साथ ही पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर ने प्रेजेंटेशन देकर यह दिखाया कि कवर्धा के कुछ इलाकों में पिछली बार सही ढंग से ईवीएम न रखने पर ज्यादातर वोट नोटा को पड़े। 
    सुनते हैं कि आयोग के साथ बैठकों के लिए कांग्रेस ने हफ्तेभर पहले से तैयारियां कर रखी थी। राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने अपने कुछ सहयोगियों को रायपुर भेजा था, जिन्होंने राज्य के नेताओं के साथ मिलकर शिकायतों का प्रारूप तैयार किया। इसका नतीजा यह रहा कि कांग्रेस की शिकायतों पर चुनाव आयोग के अफसर गंभीर नजर आए। इससे परे भाजपा नेताओं का हाल यह रहा कि वे आयोग से मिलने ही काफी देरी से पहुंचे। मुख्य निर्चाचन पदाधिकारी दफ्तर के अफसर लगातार भाजपा नेताओं को फोन कर जल्द आने का आग्रह करते रहे। जब श्रीचंद सुंदरानी वहां पहुंचे, अफसरों ने राहत की सांस ली। 

    सुब्रमण्यम रिटायर
    पीसीसीएफ और विज्ञान-प्रौद्योगिकी संस्थान के डीजी के सुब्रमण्यम   रिटायर हो गए। सुब्रमण्यम सीएम सचिवालय में लंबे समय तक रहे हैं।  वे अपने पूरे कॅरियर में पूरी तरह ईमानदार रहे। सीएम के सचिव रहने के साथ-साथ अलग-अलग विभागों में भी काम किया। उनकी साख ऐसी रही कि असहमत होने के बावजूद किसी भी मंत्री को उनसे व्यक्तिगत तौर पर कोई परेशानी नहीं रही। मध्यप्रदेश की तरह छत्तीसगढ़ में भी व्यापमं में गड़बडिय़ां सामने आई थीं। पीएमटी के पर्चे फूट गए थे। ऐसे में आनन-फानन में सरकार ने उन्हें व्यापमं का चेयरमैन बनाकर कठिन जिम्मेदारी दी। 
    उन्होंने बहुत कम समय में दोबारा परीक्षा कराकर व्यापमं की साख लौटाई। सुब्रमण्यम ने ऐसी व्यवस्था कायम की, कि व्यापमं उनके हटने के बाद अब तक सुचारू ढंग से चल रहा है और ढेरों परीक्षाएं करा चुका है, लेकिन कहीं भी कोई शिकायत नहीं आई। कुल मिलाकर उन्होंने परीक्षार्थियों का भरोसा बहाल किया। कहा जा रहा है कि सरकार उनकी काबिलियत को देखते हुए कुछ जिम्मेदारी दे सकती है। 

    व्यापारी पर निशाना
    व्यापारियों के बीच अपनी पकड़ बरकरार रखने के लिए भाजपा एक बड़े व्यापारी नेता को साथ लाने की कोशिश कर रही है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के समक्ष उनका भाजपा प्रवेश हो सकता है। व्यापारी नेता को रायपुर उत्तर से टिकट के दावेदार माना जा रहा है।  श्रीचंद सुंदरानी से नाराज लोग उन्हें मदद भी कर रहे हैं। यह साफ है कि व्यापारी नेता के भाजपा में आते ही विशेषकर रायपुर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में खींचतान शुरू हो सकती है। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 31-Aug-2018
  • बस्तर संभाग के एक जिले के कलेक्टर से भाजपा के स्थानीय नेता  काफी परेशान हैं। उनका कहना है कि कलेक्टर जिले के बजाए एक विधानसभा क्षेत्र में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इसी विधानसभा में वे ज्यादा दौरा करते हैं। सुनते हैं कि कलेक्टर महोदय विधानसभा चुनाव लडऩा चाहते हैं। वे भाजपा नेताओं के संपर्क में भी हैं। टिकट नहीं मिलने पर वे निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने पर भी विचार कर रहे हैं। पहले भी वे इस तरह का रिस्क ले चुके हैं, लेकिन बाद में कुछ नेताओं के समझाने पर अपना नाम वापस ले लिया था। कलेक्टर से नाराज नेताओं ने पहले पार्टी संगठन में इससे अवगत कराया है। साथ ही साथ कुछ लोग चुपचाप चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर इसकी जानकारी देने जा रहे हैं, ताकि चुनाव पहले उनकी बदली हो जाए। 

    चुनावी वक्त के पैमाने अलग
    रायपुर कमिश्नर बृजेशचंद मिश्रा शुक्रवार को रिटायर हो गए। वे जांजगीर-चांपा और दुर्ग के कलेक्टर रहे हैं। एक प्रशासनिक अफसर के रूप में मिश्रा की साख बड़ी अच्छी रही है। उस वक्त जब जांजगीर-चांपा जिला पॉवर प्लांटों के लिए जमीन अधिग्रहण के चलते आंदोलित था तब उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के एक-एक विवाद को सुलझाया। वे पूरे तीन साल जांजगीर-चांपा जिला कलेक्टर रहे। रायपुर और दुर्ग कमिश्नर के रूप में उन्होंने बेहतर काम किया। उनके आने से राजस्व प्रकरणों के निराकरण में तेजी आई। बृजेशचंद मिश्रा रायपुर के साइंस कॉलेज में पढ़े हैं, और उस वक्त विवेक ढांढ उनके सहपाठी थे जो कि बाद में मुख्य सचिव भी बने।
    मिश्रा की जगह गोविंदराम चुरेंद्र को कमिश्नर बनाया गया है। चुरेंद्र को लोक सुराज अभियान के दौरान काम में ढिलाई बरतने के कारण सूरजपुर कलेक्टर पद से आनन-फानन में हटा दिया गया था। पहले दुर्ग कमिश्नर दिलीप वासनीकर को रायपुर कमिश्नर का भी दायित्व सौंपे जाने की चर्चा चल रही थी। वासनीकर बस्तर में तीन साल कमिश्नर रहे हैं और उन्होंने काफी बेहतर काम किया। पर चुरेंद्र बाजी मार ले गए। चुरेंद्र के ससुर जीआर राणा राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी हैं। खैर, किसी भी सरकार में चुनाव के आसपास की पोस्टिंग काम के बजाए स्थानीय समीकरणों को देखकर ज्यादा होती है। 

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Posted Date : 30-Aug-2018
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    छत्तीसगढ़ के एक नौजवान आईएएस ओ पी चौधरी के भाजपा में आने के बाद पार्टी के भीतर जितना उत्साह है, उससे एक सवाल यह भी उठता है कि क्या इतनी पुरानी पार्टी के भीतर नौजवान लीडरशिप में एक ऐसा शून्य था जिसे भरने की उम्मीद चौधरी से की जा रही है? इस पार्टी का छात्र संगठन, इस पार्टी का नौजवान संगठन, इसका महिला संगठन, ये सभी दशकों से अस्तित्व में हैं, लेकिन इतना जोश किसी और नौजवान लीडरशिप के लिए देखने में नहीं आया। यह ओ पी चौधरी के लिए तो खुशी की बात हो सकती है, लेकिन किसी भी पार्टी के लिए यह सोचने की बात जरूर है। 
    अभी जब दिल्ली में ओ पी चौधरी का भाजपा प्रवेश चल रहा था, ठीक उसी वक्त यह सुगबुगाहट भी उठी कि क्या छत्तीसगढ़ के कुछ और अफसर भी भाजपा प्रवेश करने जा रहे हैं? यह बात आज दो दिन बाद भी जारी है, और लोग आईएएस या आईपीएस नामों को लेकर अटकल लगा रहे हैं। 
    एक जानकार ने यह कहा कि एक तरफ तो मोदी सरकार केन्द्र सरकार में आईएएस वाले पदों पर सीधी भर्ती से अपनी पार्टी की सोच वाले लोगों को लाने की तैयारी में है, और दूसरी तरफ मौजूदा आईएएस को भाजपाई सोच के आधार पर पार्टी में लाया जा रहा है। यह अदला-बदली दिलचस्प है, और चुनावी फायदे को लेकर चल रही है। 

    अब जवाब देने का वक्त
    कहावत है यदि आपको अपने बारे में कुछ नहीं मालूम तो राजनीति में चले जाइए, विपक्ष के लोग आपकी जन्म कुण्डली ढूंढ निकालेंगे।  अजीत जोगी जब तक  अफसर थे, तब तक वे बेहद सफल रहे। सत्ता और विपक्ष के लोग उनकी कार्यशैली के मुरीद रहे, लेकिन राजनीति में आते ही विरोधियों ने उनकी वंशावली जारी कर दी। इसमें यह साबित करने की कोशिश की गई कि अजीत जोगी आदिवासी नहीं है। वंशावली को गलत ठहराने के लिए पिछले दो दशक से जोगी पिता-पुत्र कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं। 
    कुछ इसी तरह की स्थिति अफसरी छोड़ राजनीति में आए ओपी चौधरी के साथ हो सकती है। चौधरी भी अफसर रहते बेदाग रहे हैं। अब उनकी पदस्थापना के दौरान की फाइलें खंगाली जा रही है। वैसे भी कलेक्टर जैसे पद पर रहकर रोजना सैकड़ों फाइल करते रहे हैं। ऐसे में एक-दो में चूक संभावित भी है। प्रदेश में कोई भी अफसर ऐसा नहीं रहा है जिससे चूक नहीं हुई हो। ये अलग बात है कि जाने अनजाने में चूक को कभी कोई महत्व नहीं दिया गया। अब चौधरी राजनीति में आ गए हैं, लेकिन उन्हें अब इस तरह की चूक के लिए जवाब देने तैयार रहना होगा। 
    (rajpathjanpath@gmail.com)

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Posted Date : 29-Aug-2018
  • भीमा कोरेगांव हिंसा और पीएम मोदी की हत्या की साजिश की जांच कर रही महाराष्ट्र पुलिस ने कथित नक्सल समर्थकों की गिरफ्तारी की है। इनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज भी हैं। सुधा पिछले तीन दशकों से अधिक समय से छत्तीसगढ़ में सक्रिय हैं और वे मजदूरों-आदिवासियों के मामले उठाते रही हैं। वे सुप्रीम कोर्ट में मानवाधिकार हनन के प्रकरणों की पैरवी करती रही हैं। प्रकरण की जांच से जुड़े एक पुलिस अफसर का दावा है कि गिरफ्तार लोग नक्सलियों को शहरी इलाकों में नेटवर्क तैयार करने में मदद करते रहे हैं। 
    कहा तो यह भी जा रहा है कि कुछ समय पहले भिलाई में एक बैठक भी हुई थी। साथ ही सितम्बर महीने में बिलासपुर में एक बड़ी बैठक की तैयारी भी चल रही थी। दावा किया जा रहा है कि चूंकि आदिवासी-ग्रामीण इलाकों में सुरक्षाबलों की सख्ती की वजह से नए लोग भर्ती नहीं हो पा रहे हैं, इसलिए नक्सली नेताओं ने अपने समर्थकों के जरिए शहरी नेटवर्क तैयार करने की कोशिश में जुटे हैं। चर्चा यह है कि सुधा की गिरफ्तारी के बाद छत्तीसगढ़ के कुछ और लोगों की गिरफ्तारी भी हो सकती है। चूंकि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में कथित नक्सल समर्थकों की गिरफ्तारी से मामला राजनीतिक रंग भी ले सकता है। 
    लेकिन सुधा भारद्वाज के काम को अच्छी तरह जानने वाले लोग यह जानते और मानते हैं कि वे गरीबों, जरूरतमंदों, मजदूरों, और आदिवासियों के हक के लिए अदालत के भीतर लड़ाई लड़ती रही हैं, और इसलिए वे अफसरों की नजरों में खटकती हैं। जब अफसर अदालत में उनसे नहीं निपट पाए, तो अब सुबूतों का दावा करते हुए उन्हें एक मामले में लपेट लिया गया। केंद्र में कांगे्रस का कब्जा हो या भाजपा का, अफसर तो वही रहते हैं, और ऐसे ही अफसरों ने ऐसे ही सामाजिक कार्यकर्ताओं को बरसों तक कैद रखने के बाद उनके खिलाफ कुछ भी साबित करने में नाकामयाबी पाई है, और जिंदगी के कई बरस बर्बाद करने के बाद उन्हें जेल से छोड़ा गया है। सुधा भारद्वाज के कानूनी संघर्ष से छत्तीसगढ़ में दसियों लाख दबे-कुचले लोगों की आवाज हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक उठ पाई है, और उनकी गिरफ्तारी का आने वाले चुनाव पर क्या असर पड़ेगा यह देखना है। वे उस छत्तीसगढ़ मुक्तिमोर्चा से जुड़ी रही हैं जिसके नेता शंकर गुहा नियोगी की हत्या के दशकों बाद भी आज उसके लाख-लाख मजदूर एकजुट होते हैं। मजदूरों की यह एकजुटता चुनाव के मौसम में बिकाऊ भी नहीं रहती।

    धर्मस्थान बेचने की तैयारी
    राजधानी रायपुर के सबसे व्यस्त बाजार के बीच अल्पसंख्यक समुदाय के एक धार्मिक स्थान को बेचने का हल्ला है। पता लगा है कि अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर के एक सबसे अल्पसंख्यक तबके का यह धर्मस्थान बड़ी महंगी जगह पर है और उसका भारी बाजार मूल्य है। उसे वहां पर खरीदकर उसके बदले शहर के एक रिहायशी इलाके में जमीन देने की पूरी साजिश बना ली गई है, आने वाले दिनों में देखना होगा कि मुस्लिम संस्थाओं की जमीन-जायदाद नियंत्रित करने वाला वक्फ बोर्ड इस बारे में कुछ करता है या नहीं। 
     लेकिन ऐसा भी नहीं कि महज मुस्लिमों के धर्मस्थान बिक रहे हैं। हिंदुओं के बहुत से धार्मिक ट्रस्टों पर नेताओं और मवालियों का कब्जा है और उनकी जमीन बेचने की साजिश बारहमासी है। रायपुर की एक दूसरी घनी और कारोबारी बस्ती में संस्कृत से जुड़ी एक महंगी जमीन को एक बिल्डर को बेचकर वहां पर बड़ी इमारत बनाने की साजिश में नेता जुट गए हैं, और छोटे अफसरों को दबाकर उसकी इजाजत भी निकलवा ली गई है। rajpathjanpath@gmail.com

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