सुदीप ठाकुर

12-Jun-2020 1:42 PM

सुदीप ठाकुर

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव आज यानी 11 जून को 72 वर्ष के हो रहे हैं। उनके जन्मदिन पर उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने 72 हजार से अधिक गरीब लोगों को खाना खिलाने का एलान किया है। इसकी जानकारी पार्टी के नेता और उनके पुत्र तेजस्वी ने ट्वीटर के जरिये दी है। लालू खुद इस समय चारा घोटाले के मामले में झारखंड की एक जेल में सजा काट रहे हैं। ऐसे समय जब बिहार में कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं, उनके जन्मदिन का यह आयोजन बताता है कि उनकी पार्टी को अब भी उनकी राजनीतिक विरासत पर भरोसा है।

आखिर क्या है उनकी राजनीतिक विरासत? फिर एक ऐसा नेता, जिसे भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराया जा चुका हो, जो जेल में हो और लंबी अदालती लड़ाइयों तथा बीमारियों के कारण जिसके सक्रिय राजनीति में लौटने के कोई आसार भी नजर न आ रहे हों, उसके नाम पर लोग क्यों भरोसा करेंगे? ऐसे दौर में जहां नरेंद्र मोदी और अमित शाह देश की राजनीति की धुरी बन गए हैं, और जिनकी रणनीतियों के आगे सारे सियासी समीकरण ध्वस्त हो जाते हों, लालू की राजनीति क्या मायने रखती है?

पांच दशक के सक्रिय राजनीतिक जीवन के जरिये लालू ने साबित किया है कि आप उन्हें नजरंदाज नहीं कर सकते। 1974 के जेपी आंदोलन से निकले लालू यों तो 1977 में जनता लहर में सवार होकर पहली बार लोकसभा पहुंचे थे, लेकिन 1989-90 के दौर में वह एक अवधारणा की तरह उभरे। फरवरी 1988 में बिहार के महान समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद वह विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता चुने गए थे और यहीं से उनकी सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरुआत हुई। मार्च, 1990 में महज 42 साल की उम्र में लालू बिहार के मुख्यमंत्री बने थे और यह गोपालगंज से निकले एक चरवाहे के बेटे के लिए वाकई बड़ी उपलब्धि थी, जिसने भीषण गरीबी देखी थी। मुख्यमंत्री बनने के कई दिनों बाद तक भी वह वेटर्नरी कॉलेज के उसी सर्वेंट चर्टर में रहते थे, जहां उन्हें कभी उनके चपरासी भाई के पास पढऩे के लिए भेजा गया था!

मुख्यमंत्री बनने के शुरुआती दिनों में वह अचानक हेलीकॉप्टर से किसी गांव में उतर जाते थे और लोगों से सीधे संवाद करने लगते थे। उनकी आत्मकथा गोपालगंज से रायसीना में, मेरी राजनीतिक यात्रा (सह लेखक, नलिन वर्मा) के इस संवाद पर गौर कीजिए:
'क्या लालू ने तुमको रोटी दी?'
'नहीं।'
'क्या उसने तुमको मकान दिया?' 
'नहीं।' 
'क्या उसने तुमको कपड़ा दिया?'
'नहीं।'
'तो फिर उसने तुम्हारे कल्याण के लिए क्या किया?' 
'जीवन में स्वर्ग सब कुछ नहीं होता। उन्होंने हमें स्वर दिया।'

मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू ने पहले दो काम किए, गरीबों से सीधा संवाद और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद जातियों का गठजोड़। लालू ने इसके चलते अमूमन अमीर लोगों के लिए आरक्षित रहने वाले पटना क्लब को निचली जातियों के लोगों के शादी और अन्य पारिवारिक कार्यक्रमों के लिए खुलवा दिया। ऊंची जातियों के वर्चस्व को तोडऩे की दिशा में यह प्रतीकात्मक कदम था। इसके बाद अगले चरण में उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाया। यही वह दौर था, जब मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद, जिसके एक वास्तुकार खुद लालू भी थे, भारतीय जनता पार्टी ने मंदिर आंदोलन को उभारना शुरू किया था। 23 अक्तूबर, 1990 को बिहार में प्रवेश कर रही लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को लालू के निर्देश पर रोका गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। यह मंडल बनाम कमंडल की राजनीति का चरम था।

लालू ने अपने सियासी फायदे के लिए एमवाई (मुस्लिम-यादव गठबंधन) बनाया, जिसका लाभांश भी उन्हें मिला। लालू के आलोचक भी यह स्वीकार करते हैं कि जेपी आंदोलन से निकले वह अकेले नेता हैं, जिन्होंने सांप्रदायिकता से कभी समझौता नहीं किया। यही वजह है कि भाजपा से उनकी पटरी कभी नहीं बैठी। जबकि नीतीश कुमार हों या रामविलास पासवान भाजपा के साथ कभी असहज नहीं रहे।

यह सवाल अब काल्पनिक है कि यदि लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में दोषी नहीं ठहराए जाते, तो बिहार और देश की राजनीति कैसी होती? वह भी ऐसे समय, जब संसद के भीतर और बाहर विपक्ष बिखरा हुआ है। हकीकत यही है कि चारा घोटाले के अनेक मामलों में उन्हें दोषी ठहराया जा चुका है और यह लड़ाई अभी काफी लंबी है। इतनी लंबी की उनकी सक्रिय राजनीति में वापसी असंभव लगती है।

अक्तूबर, 2013 में चारा घोटाले के मामले में दोषी ठहराए जाने के कारण लोकसभा से उनकी सदस्यता खत्म कर दी गई थी और उन पर चुनाव लडऩे पर रोक भी लगा दी गई। उनके साथ दोषी ठहराए गए जनता दल (यू) के जगदीश शर्मा की भी लोकसभा से सदस्यता खत्म हो गई थी। वास्तव में लालू उन गिने-चुने नेताओं में से हैं, जिन्हें भ्रष्टाचार के मामले सजा हुई है और जिनकी लोकसभा या विधानसभा से सदस्यता रद्द हुई है, तथा जिनके चुनाव लडऩे पर रोक लगाई गई।

इस मामले में समकालीन भारतीय राजनीति में लालू प्रसाद यादव की किसी अन्य राजनेता से तुलना हो सकती है, तो वह तमिलनाडु की दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता थीं, जिन्हें भी भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराया गया, जिनकी वजह से उन्हें भी पद छोडऩा पड़ा था। हालांकि एक बड़ा फर्क यह है कि जयललिता राजनीतिक रूप से उस तरह से आज भी अस्वीकार्य नहीं हैं, जिस तरह से लालू प्रसाद यादव। बेशक, जयललिता अपनी अनुपस्थिति में आज भी तमिलनाडु में लोकप्रिय हैं, मगर लालू भी अपने उत्कर्ष में ऐसे ही लोकप्रिय थे।

लालू और जया दोनों का सियासी सफर एकदम जुदा रहा है और फिर हिंदी भाषी प्रदेश और तमिलनाडु की राजनीति में भी फर्क है।सबसे बड़ा फर्क तो यही है कि जयललिता से भारतीय जनता पार्टी को कभी परहेज नहीं रहा। तब भी जब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टालरेंस' के दावे किए जाते हैं। जयललिता का अन्नाद्रमुक एनडीए का हिस्सा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलनीस्वामी के दफ्तर में एमजी रामचंद्रन के साथ ही अम्मा यानी जयललिता की फोटो लगी हुई है। वास्तविकता यही है कि दिवंगत अम्मा आज भी अन्नाद्रमुक की सुप्रीम लीडर हैं।
लालू और जयललिता भ्रष्टाचार के अलग-अलग सियासी चेहरे हैं।

इसके बावजूद भ्रष्टाचार को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। झारखंड की जेल में सजा काट रहे लालू प्रसाद यादव को अपने राजनीतिक गुरु कर्पूरी ठाकुर से जुड़ा यह किस्सा याद आता होगा। पहली बार उपमुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने अपने बेटे रामनाथ को एक पत्र लिखा। पत्र का मजमून कुछ इस तरह से था: 'तुम इससे प्रभावित नहीं होना। कोई लोभ लालच देगा, तो उस लोभ में नहीं आना। मेरी बदनामी होगी।'


27-May-2020

सुदीप ठाकुर का ब्लॉग : विस्थापितों के संकट का सामना किया था नेहरू ने​ 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च की रात जब देशव्यापी लॉकडाउन लागू करने की घोषणा की थी, तो संभवतः इसका अंदाजा नहीं था कि लाखों लोग अपने घरों के लिए निकल पड़ेंगे। ये कौन लोग थे? इसका उत्तर तलाशे बिना सरकार, मीडिया, सोशल मीडिया, नीति नियंता, औद्योगिक जगत, बुद्धिजीवी और साहित्यकार यहां तक कि आम जन ने उनके लिए एक शब्द चुना और वह है 'माइग्रेंट लेबर' या प्रवासी मजदूर। सरकार के एक कदम से यह प्रवासी मजदूर अपने घर लौटने लगा। उसने सरकार से कोई खास अपेक्षा भी नहीं की, शायद उसे बहुत उम्मीद भी नहीं थी। मगर इन दो महीनों के दौरान हमने एक ऐसी परिघटना को देखा जिसे 'रिवर्स माइग्रेशन' कहा जा रहा है, यानी विपरीत दिशा में पलायन। यह विपरीत दिशा उनके घर की ओर जाती है। घर लौटना 'विपरीत' कैसे हो सकता है! यह समय कैसी-कैसी नई शब्दावलियां गढ़ रहा है, यह अलग विचार का विषय है। लेकिन घर लौटते लाखों मजदूरों ने घड़ी की सुई को 73 वर्ष पीछे विपरीत दिशा में धकेल दिया है, जब आजादी मिलने के साथ ही देश को विभाजन की त्रासदी से गुजरना पड़ा था। उस समय देश की पहली सरकार को विभाजन की वजह से हो रहे विस्थापन के कारण आज से कहीं अधिक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था। इन दिनों जब अक्सर पंडित जवाहर लाल नेहरू को 'विलेन' और 'विदूषक' की तरह पेश किए जाने की कोशिश होती रहती है, यह देखना एक सबक की तरह हो सकता है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ने इस चुनौती का किस संवेदनशीलता के साथ सामना किया था।

आगे बढ़ने से स्पष्ट कर दूं कि विभाजन की वजह से हुए विस्थापन और आज हो रहे प्रवासी मजदूरों के पलायन की प्रकृति और कारण में मौलिक अंतर है, लेकिन ये दोनों मानवीय त्रासदियां हैं, इससे कौन इंकार कर सकता है।

विभाजन के बाद जो नया देश पाकिस्तान के नाम से बना था, वह दो हिस्सों में बंटा हुआ था, पश्चिमी पाकिस्तान ( यानी आज का पाकिस्तान) और पूर्वी पाकिस्तान (यानी आज का बांग्लादेश)। 15 अगस्त, 1947 के तुरंत बाद भय, आशंका, और असुरक्षा के बीच बड़ी संख्या में शरणार्थियों का भारत आने का सिलसिला शुरू हो गया था। इन शरणार्थियों को विस्थापित भी कहा जा रहा था। 1950 के आते आते पश्चिमी पाकिस्तान से आने वाले विस्थापितों की संख्या सीमित हो गई थी, लेकिन पूर्वी पाकिस्तान से लगातार विस्थापितों का आना जारी था। आजादी के बाद 1951 में कराई गई पहली जनगणना में उस समय देश के तीसरे महानगर कलकत्ता की कुल आबादी में 27 फीसदी आबादी पूर्वी पाकिस्तान से आए बांग्ला शरणार्थियों की थी! (http://www.catchcal.com/kaleidoscope/people/east.asp) इनमें से अधिकांश पूर्वी पाकिस्तान से आए बांग्ला शरणार्थी थे।

इस बीच, पंडित नेहरू ने एक जनवरी, 1950 को नागपुर में एक पत्रकार वार्ता में कहा, 'पश्चिम बंगाल को किसी भी प्रांत और देश के किसी भी हिस्से की तुलना में विभाजन और उसके बाद की घटनाओं का असर अधिक झेलना पड़ा है। पंजाब को भी कष्ट उठाने पड़े हैं जहां नरसंहार हुए, वहीं आर्थिक रूप से पश्चिम बंगाल को अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा।' ( द लाइफ ऑफ पार्टीशनः ए स्टडी ऑन द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ लाइव्स इन वेस्ट बंगाल)। इसी बीच इसी मुद्दे पर संसद में बहस के दौरान सुचेता कृपलानी ने कहा, 'देश के विभाजन का फैसला पश्चिम बंगाल ने नहीं लिया था, बल्कि यह फैसला हिंदुस्तान का था, इसलिए यह शरणार्थी समस्या पूरे देश की है और सभी राज्यों को पुनर्वास में हिस्सेदारी बंटानी चाहिए।'

कोरोना के संकट काल में अभी संसद और राज्यों की विधानसभाएं स्थगित हैं। प्रधानमंत्री ने महामारी फैलने और लॉकडाउन के दौरान विपक्षी नेताओं के साथ संभवतः एक बार ही वीडियो कांफ्रेंस के जरिये चर्चा की है। वह राज्यों के मुख्यमंत्रियों से पांच बार ऐसी चर्चा कर चुके हैं। मगर विभाजन के बाद की सबसे बड़ी त्रासदी पर अब तक संसद में कोई बात नहीं हुई है, क्योंकि बजट सत्र को नियत तिथि से 13 दिन पहले 22 मार्च को स्थगित कर दिया गया।

अब जरा पीछे लौटिये। पूर्वी पाकिस्तान के विस्थापितों को पहले तो असम, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में बसाया गया। उनकी संख्या जब बढ़ने लगी तो सरकार को उनके लिए नई जगहें तलाशनी पड़ी। संसद में तो इस पर लगातार संवाद होता रहा, उससे बाहर राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठकों में भी इस पर गहन विमर्श हुआ। खुद नेहरू इस मुद्दे को गंभीरता से ले रहे थे। छह मई, 1955 को राष्ट्रीय विकास परिषद की चौथी बैठक हुई जिसमें चर्चा तो दूसरी पंच वर्षीय योजना पर होनी थी, मगर नेहरू ने भोजनवाकाश के बाद उस दिन के सबसे आखिरी बिंदु विस्थापितों के मुद्दे पर सबसे पहले चर्चा शुरू करवा दी।

उन वर्षों में हुई राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठकों के ब्यौरे बताते हैं कि प्रधानमंत्री नेहरू, उनकी पूरी केबिनेट और राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच किस लोकतांत्रिक मर्यादा में रहते हुए किस तरह खुल कर चर्चा होती थी। नेहरू मंत्रिमंडल में बकायदा मेहरचंद खन्ना शरणार्थी और पुनर्वास मामलों के मंत्री थे। आज हम प्रवासी मजदूरों का संकट जिस रूप में सामने आया है, उसमें उनके लिए अलग मंत्रालय के बारे में क्यों विचार नहीं हो सकता?

आखिरकार जब विस्थापितों को 80 हजार वर्ग मील में फैले दंडकारण्य में बसाने पर सहमति बनी तो उससे पहले काफी विचार विमर्श हुआ। यहां तक पहुंचने से पहले नेहरू ने विस्थापितों को बसाने के लिए जगह की उपलब्धता जानने के लिए तकरीबन हर मुख्यमंत्री से सुझाव मांगे। मुख्यमंत्रियों ने भी सुझाव देने और अपनी मुश्किलें बताने में कमी नहीं की। इन बैठकों में आए सुझावों से पता चलता है कि उस समय देश के सामने आधारभूत संरचना के निर्माण की कैसी चुनौती थी। पुराने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल से जब नेहरू ने बस्तर के बारे में पूछा तो उनका जवाब था, 'हां, ऐसा संभव है, बशर्ते की जंगलों की कटाई हो और संपर्क के लिए 120 मील तक सड़कों का निर्माण कराया जाए।'

बाद में दंडकारण्य प्रोजेक्ट परियोजना बनी, जिसके तहत विस्थापितों को बसाने की पहल की गई, मगर उसकी अपनी दिक्क्तें थीं। जो लोग पूर्वी पाकिस्तान से आ रहे थे उनके लिए दंडकारण्य की पारिस्थितिकी अनुकूल नहीं थी। विस्थापितों को बसाने को लेकर स्थानीय आदिवासियों की ओर से विरोध का भी सामना करना पड़ा था।

नेहरू चाहते तो इतनी मशक्कत नहीं करते। उनका पीएमओ एक रिपोर्ट तैयार कर उसे मुख्यमंत्रियों को सौंप सकता था, क्योंकि उस समय तो सारे मुख्यमंत्री कांग्रेस के ही थे! आज उनकी पुण्यतिथि है, लिहाजा उनकी याद आना स्वाभाविक है, मगर जब-जब देश बड़ी त्रासदी का सामना करता है, तो नेहरू याद आ ही जाते हैं।