कोर्ट - ‘निष्पक्षता और सद्भाव’ को बताया सार्वजनिक संस्थाओं की अनिवार्य शर्त
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 8 जनवरी। भारतनेट फेज़-2 परियोजना से जुड़े एक बड़े विवाद में नवा रायपुर स्थित वाणिज्यिक न्यायालय ने छत्तीसगढ़ इन्फोटेक प्रमोशन सोसाइटी (चिप्स ) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड बनाम चिप्स मामले में दिए गए विस्तृत आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक संस्थाएँ यदि निष्पक्षता, पारदर्शिता और सद्भाव से हटकर आचरण करती हैं, तो उन्हें न्यायिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता। प्री साइडिंग जज पंकज शर्मा रहे। पूरा निर्णय ने 137 पेज में जारी किया गया है।
वर्ष 2018 में चिप्स और टाटा प्रोजेक्ट्स के बीच भारतनेट फेज़-ढ्ढढ्ढ के लिए मास्टर सर्विस एग्रीमेंट (एम?एस?ए) किया गया था। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क विकसित किया जाना था। अनुबंध के तहत टाटा प्रोजेक्ट्स ने 167.46 करोड़ की परफॉर्मेंस बैंक गारंटी जमा की।
कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार, परियोजना का गो लाइव अक्टूबर 2023 में घोषित किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कार्यान्वयन चरण पूर्ण हो चुका था। इसके बावजूद चिप्स द्वारा पीबीजी को आगे बढ़ाने और बाद में उसे भुनाने की कार्रवाई को टाटा प्रोजेक्ट्स ने अनुबंध और कानून दोनों के विरुद्ध बताया।
न्यायालय के समक्ष यह तथ्य आया कि चिप्स ने पहले शपथपत्र देकर कहा कि उसने बैंक गारंटी की मांग वापस ले ली है, जिसके आधार पर अदालत ने एक पूर्व कार्यवाही को निरर्थक मानते हुए निस्तारित किया।
हालांकि, इसके कुछ ही दिनों बाद चिप्स ने पूरी बैंक गारंटी राशि तत्काल भुना ली। अदालत ने इस आचरण को अत्यंत गंभीर माना और कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया के साथ निष्पक्ष व्यवहार के अनुरूप नहीं है ।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि—चिप्स का स्वतंत्र आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं है,
संस्था राज्य और केंद्र सरकार के अनुदानों पर निर्भर है, और यदि विवादित राशि खर्च हो जाती है, तो टाटा प्रोजेक्ट्स के पक्ष में आने वाला कोई भी मध्यस्थता पुरस्कार केवल कागज़ी डिक्री बनकर रह सकता है।
इसी आधार पर अदालत ने अंतरिम संरक्षण की आवश्यकता को स्वीकार किया । चिप्स ने यह दलील दी कि विवाद छत्तीसगढ़ मध्यस्थ अधिकरण अधिनियम (सीएमएए) के अंतर्गत आता है। लेकिन अदालत ने कहा कि—अनुबंध में स्पष्ट मध्यस्थता प्रावधान मौजूद है, चिप्स स्वयं पहले उच्च न्यायालय में मध्यस्थता का सुझाव दे चुका था, और परस्पर विरोधी रुख अपनाकर न्यायिक प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, चिप्स की सभी प्रारंभिक आपत्तियाँ अस्वीकार कर दी गईं। निर्णय के अंतिम भाग में अदालत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी संकेत दिया।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जिस प्रकार से चिप्स ने बैंक गारंटी के मामले में आचरण किया—उस पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा उचित स्तर पर परीक्षण/जांच किया जाना अपेक्षित है, ताकि यह देखा जा सके कि क्या सार्वजनिक संस्था ने अपनी शक्तियों का प्रयोग निष्पक्षता और सार्वजनिक हित के अनुरूप किया या नहीं ? कानूनी जानकारों के अनुसार, यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक सशक्त न्यायिक संदेश है।
इस आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि अदालत ने चिप्स को केवल एक सरकारी संस्था मानकर विशेष छूट नहीं दी, बल्कि उसे एक संविदात्मक पक्ष के रूप में कठोर कानूनी कसौटी पर परखा।
सार्वजनिक हित की आड़ में मनमानी, अनुचित वित्तीय निर्णय और न्यायालय को गुमराह करने वाला आचरण स्वीकार्य नहीं है।
यह फैसला केवल टाटा प्रोजेक्ट्स और चिप्स के बीच का विवाद नहीं है। यह आदेश उन सभी सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थाओं के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है जो बड़ी सार्वजनिक परियोजनाओं का संचालन करती हैं— कानून की निगाह में सार्वजनिक संस्थाओं के लिए जवाबदेही का स्तर अधिक है, कम नहीं।