दयाशंकर मिश्र

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24-Oct-2020 11:37 AM 17

परस्पर विश्वास और प्रेम का पुल कितना ही मजबूत क्यों न हो, अगर उस पर संवाद का रंगरोगन न किया जाए, तो देर-सबेर दीमक लगने ही लगती है!

कई बार हम बहुत अधिक नजदीकी रिश्ते में संवाद को अनदेखा करते रहते हैं। एक साथ रहने, समय बिताने और साथ भोजन करने का यह अर्थ यह नहीं है कि हम हमेशा एक दूसरे के मन को ठीक से पढ़ पाएं। मन के भीतर चल रही उठापटक तक पहुंचने के लिए उससे कहीं अधिक आगे पहुंचना जरूरी है। इस तरह के अनेक अनुभव मिलते हैं, जब हमें पता चलता है कि किसी ऐसे व्यक्ति ने जीवन में अप्रिय निर्णय ले लिया, जिसकी इस तरह की कोई संभावना ही नहीं थी। फिर किसी दिन हमें पता चलता है, अरे! यह क्या हो गया। उसके बारे में तो कभी इस तरह सोचा ही नहीं था। वह भी ऐसा कदम उठा सकता है/सकती है! इसीलिए जीवन संवाद में हम सबसे अधिक जोर इस बात पर देते हैं कि हम एक-दूसरे के मन को शक्ति प्रदान करते रहें। परस्पर मन टटोलते रहें। ऐसा न हो कि भीतर कुछ घुटन चल रही हो, लेकिन हमें उसका एकदम अंदाजा ही न हो।

आज का संवाद खास है। अगर आपके छोटे भाई हैं, तो आप इस संवाद को जरूर पढ़ें। अगर आप खुद छोटे हैं, तो यह आपके लिए ही है।

इंदौर से जीवन संवाद के सुधी पाठक राजेश ठाकुर ने लिखा कि बहुत दिनों से वह महसूस कर रहे थे कि उनका छोटा भाई कुछ परेशानी में है, लेकिन जब भी वह बात करते, तो वह टाल देता- ‘मैं एकदम ठीक हूं, आप बेकार परेशान हो रहे हैं।’ राजेश, कोशिश तो कर रहे थे बात करने की, लेकिन आपसी रिश्तों का संकोच, परंपरावादी संयुक्त परिवार के कारण खुलकर बात कर पाने में हिचक रहे थे।

जब उनसे मेरी बात हुई, तो मैंने उन्हें विनम्रतापूर्वक सुझाव दिया कि इस काम में अपनी पत्नी को भी शामिल करें। उन्होंने बताया था कि उनकी पत्नी, छोटे भाई और उसकी पत्नी के बीच बहुत ही मधुर संबंध हैं। थोड़ी हिचक के बाद उन्होंने इस बात को स्वीकार कर लिया। वह, उनकी पत्नी और भाई चार घंटे के लिए एकदम अलग जगह मिले। बिल्कुल इत्मिनान से। बिना गुस्से में आए। एक-दूसरे को सुना गया। गलतियों को स्वीकार किया गया। आगे का रास्ता बुना गया। जबसे बातचीत हुई दोनों भाई सुकून में हैं।

परस्पर विश्वास और प्रेम का पुल कितना ही मजबूत क्यों न हो, अगर उस पर संवाद का रंगरोगन न किया जाए, तो देर-सबेर दीमक लगने ही लगती है!

संवाद से गुजरने के बाद राजेश ने बताया कि उनका भाई दस साल से बस इसी कोशिश में है कि किसी तरह रातोंरात अमीर बन जाए। दस साल से वह किसी एक काम में ध्यान देने की जगह रोज ही नए काम की तैयारी में जुटा रहता है। इसी कारण उसने अपनी शानदार नौकरी छोड़ दी थी। उसे अपने दोस्तों की तरह बिजनेस में अपार सफलता की संभावना दिख रही थी। उसके बाद उसे शुरुआती सफलता तो नहीं मिली, लेकिन वह आने वाली सफलता को संभालने की स्थिति में भी नहीं था। उसके पास पैसे खूब आए। जमकर आए, लेकिन दूसरों से नकल की होड़, स्वयं को सबसे बेहतर साबित करने की वजह से बेपनाह खर्च बढ़ते गए। हर छह महीने में नए दोस्त बनते गए। यहां तक कि एक समय ऐसा आया, जब राजेश खुद ही भाई से उपेक्षित महसूस करने लगे, लेकिन उनकी पत्नी की समझबूझ से दोनों भाइयों का रिश्ता टूटने से बचता रहा!

आज जब छोटा भाई कर्ज में डूबने की कगार पर है, तो वही बड़ा भाई उसे किनारे पर लाने के प्रयास कर रहा है, जिसे दोस्तों की भीड़ के बीच अकेला छोड़ दिया गया था।

यह संवाद छोटे-बड़े से अधिक एक-दूसरे के लिए दिल में जगह बचाए और बनाए रखने के लिए है। इसे हमेशा ध्यान में रखें! (hindi.news18.com)
-दयाशंकर मिश्र


23-Oct-2020 1:45 PM 11

यह कहानी ईमानदार कोशिश के साथ परिवार की शक्ति को बताने वाली है। संकट का सामना करने में वित्तीय समझदारी से अधिक जीवन की आस्था, साहस की भूमिका होती है!

कोरोना के कारण दुनियाभर में छाए संकट के बीच कुछ ऐसी कहानियां जीवन संवाद को मिलीं, जिनमें जीवन की आस्था, मनुष्यता और साहस का गहरा बोध है। आज ऐसी ही एक कहानी के लिए आपको मैं भोपाल लिए चलता हूं। खेती-किसानी से जुड़े खाद-बीज, छोटे-छोटे उपकरण बनाने वाली एक कंपनी के बड़े अधिकारी अमिताभ त्रिवेदी नौकरी छोडक़र अपना काम शुरू करने का फैसला करते हैं। दस बरस पहले लिया गया फैसला सही साबित होता दिख रहा था। तभी उनके एक प्रोडक्ट की असफलता ने उनको भारी कर्ज की ओर धकेल दिया। देनदारियां इतनी बढ़ गईं कि अपना घर उन्हें गिरवी रखना पड़ा। उसके बाद भी बात नहीं बनी, तो बेचकर अपने ही घर में किराएदार बनना पड़ा। इस बीच उनके कारोबार में अहम भूमिका निभाने वाले पारिवारिक सदस्य के भ्रष्टाचार के बारे में जानकारी मिली।

पारिवारिक दृष्टि से वह व्यक्ति इतना महत्वपूर्ण था कि अचानक उस पर संदेह करना संभव नहीं था, लेकिन जांच-पड़ताल के बाद अमिताभ जब इस नतीजे पर पहुंचे कि उसकी गतिविधियां उनके कारोबार को डुबोने की ओर बढ़ रही हैं। उस व्यक्ति पर निर्भरता इतनी अधिक थी कि उसके बिना कारोबार के बारे में सोचना ही संभव नहीं था, लेकिन कड़े फैसले करते हुए अमिताभ ने उसे स्वयं से अलग कर लिया। नए सिरे से कंपनी को खड़ा करने का काम किया। ऐसा करते हुए हर दिन आर्थिक संकट बढ़ता गया। लगभग चार करोड़ रुपए तक!

उन्होंने अपने सभी लेनदारों को इकट्ठा किया। साफ-साफ सब कुछ बताया। जब इतना अधिक कर्ज हो, तो सबसे बड़ी चुनौती मानसिक संतुलन बनाए रखने की होती है। इस काम में उनकी पत्नी ने अपनी भूमिका का निर्वाह बेहद संवेदनशीलता, आत्मीयता से किया। अपने दोनों बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को यथासंभव इस संकट से बचाए रखा। उन्होंने अपनी जीवनशैली को इतनी स्पष्टता और ईमानदारी से पैसा देने वालों के सामने रखा कि हर किसी ने इस बात का भरोसा किया कि अमिताभ का पैसा उनकी किसी लापरवाही, फिजूलखर्ची से नहीं डूबा, बल्कि विशुद्ध रूप से व्यापार में नुकसान के कारण हुआ। इसकी भी बड़ी वजह मौसम और तकनीकी विफलता है।

अमिताभ और उनकी पत्नी के साथ संवाद के दौरान मैंने इस बात को निरंतर महसूस किया कि पति-पत्नी की आपसी समझबूझ से किसी भी संकट को सरलता से सहा जा सकता है। अमिताभ के कर्ज अब धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं। वह जोर देकर कहते हैं कि मृत्यु और शारीरिक बीमारी के अलावा कोई भी ऐसा संकट नहीं, जिसका समाधान न हो।

अपने इस संकट को संभालने की योग्यता उन्हें एक वित्तीय सलाहकार (कंसलटेंट) के रूप में भी बाजार में स्थापित कर रही है। अपने कारोबार के साथ वह नए लोगों को मुश्किल आर्थिक स्थितियों को संभालने की सलाह दे रहे हैं। यह कहानी ईमानदार कोशिश के साथ परिवार की शक्ति को बताने वाली है। संकट का सामना करने में वित्तीय समझदारी से अधिक जीवन की आस्था, साहस की भूमिका होती है!

‘जीवन संवाद’ के पाठकों को याद होगा, पिछले कुछ समय में हमें भोपाल, जयपुर और लखनऊ सहित देश के अनेक शहरों से ऐसी कहानियां मिलीं, जिनमें आर्थिक संकट के कारण आत्महत्या करने, एक शहर से दूसरे शहर चले जाने, अपनी पहचान छुपा लेने की बात है, लेकिन अमिताभ की यह कहानी कुछ और ही कहती है। अगर आपके व्यवहार में ईमानदारी है। आप अपनी कही बात/वादे निभाने का हुनर रखते हैं, तो मुश्किल समय में अगर बहुत से लोग आपका साथ छोड़ भी देते हैं, तो भी कुछ लोग जरूर आपके साथ खड़े रहते हैं! आपको संकट से बाहर निकालने के लिए बहुत से लोगों की नहीं, केवल कुछ लोगों की जरूरत होती है। कई बार तो एक ही व्यक्ति पर्याप्त होता है। हमें अपने सुख के दिनों में हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारा सबसे बड़ा संकटमोचक कौन है। जिनने संकट में मदद की, उनका हमेशा ख्याल रखिए। सुख की व्यस्तता में उनको मत भूलिए। मदद करते वक्त ध्यान रहे कि अपने लिए ही कुछ किया जा रहा है, दूसरों के लिए नहीं। जैसे हम पौधे लगाते हैं! (hindi.news18.com)
-दयाशंकर मिश्र


20-Oct-2020 2:10 PM 4

दुनियाभर में आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े बताते हैं कि पुरुष अपने जीवन को संभालने में स्त्रियों के मुकाबले कहीं कमजोर साबित हुए हैं। आंसुओं की कमी इसकी मुख्य वजहों में से एक है!

अपने जीवन के संघर्ष, तनाव को संभालने के मामले में दुनियाभर में स्त्रियां पुरुषों से कहीं आगे हैं। यही वजह है कि असमय अपने जीवन को समाप्त करने वाले पुरुषों की संख्या बहुत अधिक है। पुरुष स्त्रियों से दोगुनी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। सामान्य सोच यह बताती है कि इस मामले में स्त्रियों की संख्या अधिक होगी, लेकिन आंकड़ों का अध्ययन यह नहीं कहता। इस बात को थोड़ा धीरज के साथ समझने की जरूरत है कि कोमलता, संवेदनशीलता और प्रेम को कमजोरी के रूप में देखने वाला पुरुष समाज आखिर इतना कठोर कैसे होता जा रहा है कि वह अपने ही जीवन को समाप्त करने के लिए तैयार हो जाता है। आत्महत्या की अनेक परतें हैं। एकदम प्याज की तरह परत के ऊपर परत। जिस तरह अच्छे से प्याज काटना हो तो आंसुओं से गुजरना होता है, उसी तरह मन की तह तक जाने के लिए जरूरी है कि हम उसके भीतर उतरते चले जाएं।

जीवन में कठोरता को हमने इतना अधिक जरूरी मान लिया कि कोमलता से लज्जित होने लगे। विनम्रता और शालीनता से बात करने को हमने उपेक्षित करना शुरू कर दिया। हमारे आसपास एक ऐसा वातावरण बनता जा रहा है, जहां हमारा वाचाल होना, बढ़-चढक़र दावे करना बहुत जरूरी बना दिया गया है! हमारी कोमलता पीछे छूटती जा रही है।

लाओत्से, कहते हैं, ‘तुमने कभी फूल की शक्ति देखी है। निर्बल होकर भी वह कितना शक्तिशाली है। उसे तुम ईश्वर को चढ़ाते समय नतमस्तक हो जाते हो। प्रेमिका को देते समय प्रेम से भर जाते हो। कोमलता ही जीवन है। हम सब रोते हुए ही इस दुनिया में आते हैं, लेकिन धीरे-धीरे आंसुओं से दूरी बना लेते हैं। यह दूरी ही हमें मनुष्यता से दूर धकेलती रहती है।’

हमें लाओत्से को ध्यान से सुनना होगा। कोमल बनने की ओर बढऩा होगा। आंसुओं को फिर से पुकारना है! भीतर फूल खिलने देना है, चट्टान नहीं। चट्टान यह सोचती जरूर है कि वह कितनी कठोर, बलशाली है, लेकिन वह भूल जाती है कि कमजोर दिखने वाली जल की धारा ही अंतत: जीतती है, चट्टान को रेत होकर बहना ही होता है!

लखनऊ से अवसाद से जूझ रहे एक युवा उद्योगपति ने फोन किया। कई हफ्तों की बातचीत के बाद उन्हें इस बात के लिए राजी किया जा सका कि भावनाओं को रोकें नहीं। खुद को सुपरमैन मानने से बचें, जब रोने का मन करे जीभर रो लें। आपसे यह कहते हुए प्रसन्नता हो रही है कि अब वह काफी बेहतर महसूस कर रहे हैं। दुनियाभर में आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े बताते हैं कि पुरुष अपने जीवन को संभालने में स्त्रियों के मुकाबले कहीं कमजोर साबित हुए हैं। आंसुओं की कमी इनकी मुख्य वजहों में से एक है!

जिस पश्चिम की दुनिया की चकाचौंध में हम अक्सर डूबे रहते हैं, वहां तो जान देने वालों में पुरुषों की संख्या कहीं अधिक है। जापान में इस दिशा में कुछ वर्ष पहले से अद्भुत प्रयोग हो रहा है। वहां विश्वविद्यालय युवाओं को रोना सिखा रहे हैं। अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना सिखाया जा रहा है। दुख को जमने नहीं देना है। जमते-जमते वह मन के लिए भारी चट्टान बन जाता है। आंसू में वह शक्ति है, जो चट्टान को अपने कोमल स्पर्श से एक बार फिर रेत में बदल दे।

‘जीवन संवाद’ में हम लगातार कोशिश करते हैं कि मन को आंसुओं के नजदीक रख सकें। जैसे ही कोई व्यक्ति मन के दुख को आंसू उपलब्ध करा देता है, उसका बहुत सारा बोझ हल्का हो जाता है। सहज हो जाता है। अपने आसपास उन लोगों को देखिए, जो थोड़ी-सी बात पर भावुक हो जाते हैं। आप पाएंगे कि उनका मन और तन दोनों कहीं अधिक निरोगी हैं। स्वस्थ हैं। इस दिशा में पहला कदम यह होना चाहिए कि जब कोई रो रहा हो, तो उसे रोकें नहीं। उसके निर्मल बनने में उसके सहभागी बनें। अगर हम अपने लडक़ों को रोना सिखा सकें, तो संभव है दुनिया आगे चलकर कुछ सुंदर बन जाएगी।

पुरुष का आक्रोश और उसकी कुंठा सरलता से प्रेम की ओर बढ़ पाएंगे। यह जो पुरुषों की क्रूरता है, यह बरसों की आंसुओं से दूरी भी है। यह दूरी मिटाना सरल तो नहीं, लेकिन असंभव एकदम नहीं है! हम सबको जीवन की ओर बढऩे के लिए कठोरता के खोल से बाहर निकलने की जरूरत है! यह यात्रा स्वयं से शुरू होकर ही दुनिया की ओर जाएगी।
-दयाशंकर मिश्र


18-Oct-2020 12:49 PM 0

बच्चे पेड़ के पत्ते नहीं हैं, जो वह पेड़ की मर्जी से ही कदमताल करें। उनका स्वतंत्र जीवनबोध है। इस बात को हम जितनी सरलता से स्वीकार कर लेंगे, हमारे रिश्ते उतने ही महकेंगे।

जीवन में यात्रा का कितना महत्व है। यात्राएं बंद होने पर यह बात समझ में आती है। यात्रा बंद होने का अर्थ हुआ, अब जीवन के तट पर काई जमने लगेगी। जो हमेशा ही चलने को तत्पर है, जीवन का आनंद उसे ही मिलेगा! खानाबदोशी, जीवनशैली है, जिसे हासिल हुई, वही आनंद बता सकता है। अष्टावक्र के दृष्टांत को पढ़ते-समझते हुए ‘खानाबदोश’ शब्द के नए अर्थ मिले। रजनीश कहते हैं, खाना यानी घर और बदोश यानी कंधे पर।

जिसका घर अपने कंधे पर है, वही खानाबदोश। जो खानाबदोश है, वही जीवन का मर्म समझ पाएगा। वह कहते हैं, ठहरना मत यहां, अधिक से अधिक टेंट लगा लेना। लेकिन रुक मत जाना! मनुष्य के रूप में हमें कितनी आजादी और स्वतंत्रता मिली है, यह बात हम स्वयं ही भूल चुके हैं। इसलिए, हम नई-नई जकडऩें तैयार करते रहते हैं। नए-नए बंधन बांधे ही जाते हैं। इन बंधनों को ही हम कामयाबी समझते हैं। जबकि असली कामयाबी है, हमारी चेतना की स्वतंत्रता।

जीवन संवाद को रांची? से एक ई-मेल मिला। पिता राधेश्याम जी ने चिंतित होकर पूछा है, ‘मेरा बेटा मेरे बताए रास्ते पर नहीं चलता। इससे हमारे बीच बहुत मुश्किल हो गई है। समझ में नहीं आ रहा क्या किया जाए! कैसे इस परिस्थिति को संभालूं। सरकारी कर्मचारी हूं, अब रिटायरमेंट नजदीक है, लेकिन बेटा मेरी किसी बात पर राजी नहीं। सोचता हूं रिटायरमेंट से पहले उसकी शादी कर दूं। लेकिन वह तैयार नहीं। मैं चाहता हूं सरकारी नौकरी करे, लेकिन वह अपनी प्राइवेट नौकरी से ही संतुष्ट है। जहां उसे पैसे तो ठीक मिल रहे हैं, लेकिन नौकरी की गारंटी नहीं’!

मैं राधेश्याम जी के प्रश्न के बाद से ही सोच रहा हूं कि संकट क्या है? यह अकेले उनका संकट नहीं है। अधिकांश भारतीय माता-पिता अभी भी अपने बच्चों को उसी चश्मे से देख रहे हैं, जो चश्मा खुद उनकी नजऱ के हिसाब से सही नहीं है। अभिभावक होने का अर्थ यह नहीं कि आप हर वक्त केवल इसी चिंता में घुलते रहें कि आपका बच्चा आपके हिसाब से सपने नहीं बुन रहा। राधेश्याम जी से मैंने कहा, ‘क्या उन्होंने पिता का मनचाहा सपना पूरा किया था? क्या उन्होंने पिता की हर बात मानी थी’।

उन्होंने मजेदार उत्तर दिया, ‘अगर मैं उनका कहा मानता, तो मैं किसान ही बना रहता अफसर नहीं बन पाता’। मैंने कहा, ‘जो आप नहीं कर पाए, उसकी अपेक्षा बेटे से मत करिए’!

खानाबदोशी का अर्थ केवल इतना नहीं है कि हम यहां-वहां टहलते रहें। उससे अधिक यह हर व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतिनिधि विचार है। अपने बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता देना। जीवन में बहुत बड़ा कदम है, दिखने में छोटा, लेकिन यह मन? में नन्हा पौधा लगाने जैसा है! बड़े से बड़ा वृक्ष भी पौधे से ही तैयार होता है। हम अपने आसपास व्यक्तियों को जितनी स्वतंत्रता दे पाएंगे, और वह उस स्वतंत्रता का जितना सार्थक उपयोग कर पाएंगे, हमारा जीवन उतना ही रचनात्मक होगा।

जीवन को बांधना नहीं है, उसे बहने देना है। कई बार बच्चों पर थोपा गया अत्यधिक अनुशासन उनकी रचनात्मकता के रास्ते रोक लेता है। आत्मविश्वास से उनको आगे नहीं बढऩे देता, क्योंकि सारे निर्णय कोई और कर रहा होता है।

बच्चे पेड़ के पत्ते नहीं हैं, जो वह पेड़ की मर्जी से ही कदमताल करें। उनका स्वतंत्र जीवनबोध है। इस बात को हम जितनी सरलता से स्वीकार कर लेंगे, हमारे रिश्ते उतने ही महकेंगे।
-दयाशंकर मिश्र


15-Oct-2020 9:40 PM 3

जो अपने भीतर करुणा, प्रेम और कोमलता रखते हैं। उनके भीतर ही कुछ घटने की संभावना अधिक होती है। जीवन का सुख चट्टान से अधिक मिट्टी में है!

एक ही जैसी घटनाओं पर हमारे विचार अक्सर अलग-अलग होते हैं। यहां तक तो ठीक है, लेकिन अगर हम चीजों को ध्यान से देखने लगें, ढंग से देखने लगें, तो पाते हैं कि देखने के एक ढंग से चीज एक तरह से दिखाई पड़ती है। दूसरे ढंग से दूसरी तरह की दिखाई पड़ती है। चीज तो वही है, लेकिन हमारा देखने का ढंग मायने बदल देता है! घटना एक जैसी ही घटती है, हम सबके जीवन में, लेकिन हमारी दृष्टि की भिन्नता अर्थ बदल देती है। हम लोग जीवन में कितनी ही शव यात्राएं देखते हैं। बुजुर्ग बीमारों को देखते हैं, लेकिन हम पर कोई असर नहीं होता। सिद्धार्थ एक दिन देख लेते हैं और उसके बाद वह कभी सिद्धार्थ नहीं रह पाते। वह हमेशा के लिए गौतम बुद्ध बन जाते हैं। अगर बुढ़ापा और अंतिम यात्रा देखने से जीवन की दृष्टि बदलती, तो हम सब बदल चुके होते, लेकिन ऐसा नहीं है। बदलता केवल वही है, जिसके भीतर कुछ घुमड़ रहा हो। बिना बादल के बारिश नहीं होती। बादल होने ही चाहिए और वह भी भीतर से भरे हुए!

एक छोटी-सी कहानी कहता हूं आपसे, संभव है इससे मेरी बात अधिक स्पष्ट हो पाएगी। एक दिन एक राजा ने सपना देखा कि उसके महल के छप्पर पर कोई चल रहा है। उसने जाकर पूछा, ‘तुम कौन हो और छत पर क्या कर रहे हो’? व्यक्ति ने कहा, ‘मेरा ऊंट गुम गया है। उसे ही खोज रहा हूं’। राजा को हंसी आ गई। उसने कहा, ‘तुम पागल मालूम होते हो। कभी छप्पर पर भी ऊंट मिलता है’!

ऊंट खोजने वाले ने कहा, ‘कैसी बात करते हो! अगर तुम्हारे धन और वैभव से सुख मिल सकता है, तो ऊंट भी छप्पर पर मिल सकता है’। राजा को नींद न आई उसके बाद, रातभर। कुछ दिन पहले उसने किसी से इसी तरह की बात कही थी कि सुख तो धन और साधन में है। राजा ने नगर में सब ओर अपने गुप्तचर दौड़ा दिए और कहा कि पता लगाइए कोई बड़ा फकीर आया है।

सैनिक तो खोज न सके, लेकिन एक दिन एक सूफी फकीर ने महल के दरवाजे पर आकर कहा, ‘जाओ, राजा से कहो, इस सराय में मैं रुकना चाहता हूं। मैं पहले भी यहां ठहरता रहा हूं।’ दरबान ने कहा, ‘आपको कोई गलतफहमी हो गई है! यह सराय नहीं, राजा का महल है’। बात काफी बढ़ गई। राजा तक पहुंची, तो वह दौड़ा हुआ चला आया। वह आदरपूर्वक उनको ले आया।

राजा ने फकीर से पूछा, ‘आप इस महल में जब तक चाहें, रहें, लेकिन इस महल को आप सराय क्यों कह रहे हैं, मैं समझ नहीं पा रहा हूं’। फकीर ने कहा, ‘मैं पहले भी यहां आया था, लेकिन तब यहां के राज सिंहासन पर कोई और बैठा था’। राजा ने कहा, ‘वह मेरे पिता थे’। फकीर ने कहा, ‘उसके पहले आया, तो कोई और था! राजा ने कहा, ‘वह मेरे दादा थे’!

फकीर ने ठहाका लगाते हुए कहा, ‘इसीलिए तो मैं इसे सिंहासन कह रहा हूं। यहां लोग बैठते हैं, फिर चल देते हैं। तुम भी भला कितनी देर बैठोगे। यह घर नहीं है। घर तो वहां होता है, जहां बस गए हो बस गए! जहां से हटना संभव न हो’।

सुनते हैं फकीर की बात सुनकर राजा सिंहासन से उतर आया और फकीर से प्रणाम करके कहा, ‘यह सराय है। आप यहां रुकें, मैं जाता हूं’। ऐसा नहीं है कि यह शब्द केवल फकीर ने उस राजा से ही कहे होंगे। फकीर तो एक ही जैसी बात सबसे करते हैं। उनको हमारे कुछ होने और न होने से कोई सरोकार नहीं। जो अपने भीतर करुणा, प्रेम और कोमलता रखते हैं। उनके भीतर ही कुछ घटने की संभावना अधिक होती है। जीवन का सुख चट्टान से अधिक मिट्टी में है! जहां नमी नहीं होगी, वहां कोमलता कैसे होगी। कोमलता के बिना प्रेम, अहिंसा को उपलब्ध होना संभव नहीं। इनके बिना जीवन को पाना सरल नहीं है। जिंदगी बांहें फैलाए खड़ी है, लेकिन कदम हमें ही बढ़ाना है।
-दयाशंकर मिश्र


12-Oct-2020 2:36 PM 7

छोटी-छोटी बात पर हम रिश्ते खत्म करने लगें, तो कोई रिश्ता बाकी ही न रहेगा। सहना, असल में प्रेम का ही पर्यायवाची है। सहना, मनमुटाव से कहीं अधिक प्रेम के निकट है। महाभारत इसकी सरल व्याख्या है!


डॉ. राही मासूम रजा ने महाभारत के संवाद लिखते समय बेहद खूबरसूरत, एक से बढक़र एक शब्दों का उपयोग किया। इन्हीं में से एक कौरव-पांडवों के बीच निर्णायक युद्ध के समय का है। कर्ण के सामने सहदेव हैं। जाहिर है, मुकाबला बराबरी का नहीं है। अपने वचन से बंधे कर्ण, सहदेव को घायल करके आगे बढ़ जाते हैं। जाते हुए वह सहदेव से इतना ही कहते हैं, शिविर में जाकर स्नेहलेप लगाओ, युद्ध अपनी बराबरी वालों से किया जाता है। कितना सुंदर शब्द है, स्नेहलेप! सहदेव को स्नेहलेप की उस समय जितनी जरूरत रही होगी, उससे कहीं अधिक जरूरत इस समय हमारे समाज को है। हम सब एक-दूसरे के लिए बहुत अधिक कठोर होते जा रहे हैं।

हम भूल रहे हैं कि प्रेम ही सर्वोत्तम मार्ग है। हमें एक-दूसरे को सहन, बर्दाश्त करना सीखना होगा। सहनशीलता कमजोरी नहीं, जीवनशैली है। प्रेम को संभालने की कला ही हमें स्नेहन की ओर ले जाएगी। कटु स्मृति, वचन और अपमान स्नेहलेप की प्रतीक्षा में हैं।

एक-दूसरे को बर्दाश्त करने, सहन करने का अर्थ यह नहीं कि हम किसी के अत्याचार को सहन करने की बात कर रहे हैं। परस्पर सहने, बर्दाश्त करने के मायने हुए कि हम गुणों के बीच जितना एक-दूजे की कमजोरी का ख्याल कर जाएं, उस समय जबकि गुस्सा सातवें आसमान पर होता है। मेरे अपने जीवन में मुझसे उम्र में कहीं बड़े एक व्यक्ति हुए जिनसे गहरा प्रेम तो था, लेकिन अनेक विषयों पर भारी असहमति थी।

असहमति के बीच भी हमने एक-दूसरे को बर्दाश्त करना नहीं छोड़ा। अंतत: असहमति गल गई। केवल प्रेम बाकी रहा। छोटी-छोटी बात पर हम रिश्ते खत्म करने लगें, तो कोई रिश्ता बाकी ही न रहेगा। सहना, असल में प्रेम का ही पर्यायवाची है। सहना, मनमुटाव से कहीं अधिक प्रेम के निकट है। महाभारत इसकी सरल व्याख्या है!

इसलिए, हमें समझना होगा कि जिंदगी उतनी बड़ी नहीं, जितनी हम माने बैठे हैं। एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते, मान-अपमान करते, सहते हम कई बार भूल जाते हैं कि जीवन बहुत लंबी यात्रा नहीं। यह तो प्री-पेड सिम कार्ड की तरह है। इधर, टॉकटाइम खत्म उधर संवाद समाप्त। जीवन कोमल, क्षमायुक्त होना चाहिए। एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की क्षमता हम जितनी जल्दी विकसित कर लें, उतना ही सुंदर, सुगंधित हमारा जीवन होगा।

एक छोटा किस्सा आपसे कहता हूं। मुंबई से ‘जीवन संवाद’ के पाठक आयुष्मान त्रिपाठी अपने भाई को किसी अप्रिय घटना के लिए क्षमा करने को राजी न थे। मन में गांठ पुरानी हो चली थी। वह उनका जिक्र आते ही असहज हो जाते थे। कई बरस बीते, सब चाहते कि भाइयों में संवाद कायम हो। सब कोशिश में लगे थे। इस बीच, एक कोशिश मैंने भी की। आयुष्मान से कहा कि अगर तुम्हारे भैया कल किसी वजह से न रहें, तब भी यही नाराजगी कायम रहेगी।

वह विचलित, नाराज होकर बोले- अरे! आप ऐसा कैसे कह सकते हैं। वह मेरे बड़े भाई हैं। मैंने कहा, बस यही तो आप भूल गए! यह भाई का प्यार जो भीतर है, उसे थोड़ा बाहर लाइए। प्रेम को इतना संकुचित मत कीजिए कि वह जीवित के लिए समाप्त हो जाए। केवल किसी के न रहने पर प्रकट हो।

हम अक्सर देखते हैं कि किसी सगे-संबंधी, मित्र को हम बीमारी की हालत में देखने नहीं पहुंच पाते, लेकिन अगर किसी कारण से वह न रहें, तो तुरंत सब काम छोडक़र उनकी ओर दौड़ते हैं। मेरा सुझाव है कि हमें इस दिशा में बदलाव की जरूरत है। हमें जीवित को कहीं अधिक महत्व देने की जरूरत है। हम अभी भी अपने रिवाजों का अधिक ख्याल रखते हैं, बजाय व्यक्तियों के। मैं रिवाज की जगह जीवत से प्यार, स्नेह और उसकी पीड़ा पर स्नेहलेप करने को महत्व देने का निवेदन कर रहा हूं! (hindi.news18)

-दयाशंकर मिश्र


10-Oct-2020 2:57 PM 3

जब बच्चे के नंबर कम आएं/ उसका प्रदर्शन आपके हिसाब से ठीक न हो, तो उस वक्त उसके साथ खड़े होने के लिए बहुत प्रेम और स्नेह की जरूरत होती है। अधिकांश लोग ऐसा कर पाने में सफल नहीं हो रहे हैं!

‘मैं अपने स्कूल के साथियों से बहुत ज्यादा परेशान हूं। उनकी बातें मुझे बहुत चुभती हैं। जब मैं इसके बारे में स्कूल और घर में बात करती हूं, तो कोई गंभीरता से नहीं लेता। अब मैं इससे तंग आ गई हूं, मुझे लगता है जिंदगी छोडक़र चली जाऊं! परीक्षा में प्रदर्शन को लेकर एक-दूसरे को परेशान करने, तंग करने का काम स्कूल न जाने से रुका नहीं। यह काम तो आसानी से ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान भी हो रहा है। केवल शिक्षक के भरोसे यह नहीं रुकने वाला।’

जीवन संवाद को फेसबुक मैसेंजर पर देर रात यह संदेश मिला। एक बहुत ही प्यारी बच्ची का, जो फेसबुक पर अपने पापा के अकाउंट के पोस्ट पढ़ते हुए मुझसे जुड़ गई। उसने मैसेज भेजने के बाद यह भी कहा कि उसका नाम कहीं न लिया जाए। उसका संदेश मिलने के बाद मैं ठीक से सो नहीं पाया रातभर।

कैसी दुनिया बना ली है, हमने! मेरी तकलीफ उस समय और बढ़ गई, जब उस बच्ची ने कहा कि उसने अपनी मां को जब बताया कि कम नंबर आने पर उसके साथी, दोस्त उसे तरह-तरह से ताना मारते हैं। परेशान करते हैं, तो मां ने कहा, ‘बच्चे ठीक ही करते हैं। जब तुम पढ़ती नहीं हो, तो उस वक्त क्यों नहीं सोचती। अगर मेहनत नहीं करोगी, तो दूसरे तो चिढ़ाएंगे ही।’

मैं उनकी मां को जानता हूं, सुलझी, सुशिक्षित और व्यवहार कुशल हैं। लेकिन कई बार इतना ही काफी नहीं होता। अपने बच्चे के लिए हम कठोर हो जाते हैं। हमें नंबरों के पीछे नहीं जाना है, केवल किताबी पढ़ाई -लिखाई ही सबकुछ नहीं, ऐसी बातें करने में तो वह बहुत भली लगती हैं, लेकिन जब अपने बच्चे के नंबर कम आएं, तो उस वक्त उसके साथ खड़े होने के लिए बहुत प्रेम और स्नेह की जरूरत होती है। अधिकांश लोग ऐसा कर पाने में सफल नहीं हो रहे हैं!

माता-पिता का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह बच्चों के साथ अपने भविष्य को जोडक़र चलते हैं। वह यह मानकर भी चलते हैं कि बच्चों के बारे में सारे फैसले उनको ही करने हैं। बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाना, मेरे ख्याल में सबसे जरूरी काम है। बच्चे एक-दूसरे की टिप्पणी का सही तरीके से सामना कर पाएं, यह बहुत जरूरी है। उनके मन को समझना और संभालना हमारा सबसे पहला काम होना चाहिए।

अगर मेरा बेटा/मेरी बेटी अपेक्षा के अनुकूल प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं, तो किसकी ‘जिम्मेदारी’ है, जैसे शब्द का उपयोग न करें। नतीजे ठीक नहीं आने के पीछे बहुत सारे कारण होते हैं। बच्चे की रुचि, उसकी क्षमता, दिए गए वक्त में काम पूरा करने की योग्यता जैसे बहुत सारे पैमाने हैं, जिनके आधार पर नंबर तय होते हैं।

मजेदार बात यह है कि दुनिया को सुंदर, रहने लायक और प्रेमपूर्ण अधिकांश वह लोग नहीं बनाते, जो खूब अच्छे नंबर लेकर आए। इनमें ज्यादा संख्या ऐसे बच्चों की है, जिनको स्कूल, शिक्षा संस्थान समझने में असफल रहे!

रवींद्रनाथ टैगोर की प्रतिभा से हम सब अच्छी तरह परिचित हैं। उनकी पूरी शिक्षा-दीक्षा स्कूल में नहीं घर में हुई। आइंस्टीन को तो उनके स्कूल ने ही यह कहकर निकाल दिया कि इसके कारण दूसरे बच्चे पीछे रह जाएंगे! यहां केवल दो उदाहरण का अर्थ यह नहीं कि दुनिया में ऐसे लोगों की कमी है। दुनिया में ऐसे लोग इतने अधिक हैं कि उनको गिनना संभव नहीं।

असल में स्कूल सारे बच्चों के लिए नहीं हैं। वह सबके लिए बनाए ही नहीं गए। वह केवल उनके लिए बनाए गए हैं, जो उनके सांचे में फिट होते हैं। अब यह हमारी गलती है कि हम अपनी पहचान की कीमत पर उसमें जगह पाना चाहते हैं!

हम सबको समझना होगा कि प्रतिस्पर्धा बढ़ जाने का मतलब यह नहीं कि मनुष्यता के सिद्धांतों से दूर चले जाएं। मैं बार-बार दोहराना चाहता हूं कि बच्चा हमारा है, स्कूल का नहीं। स्कूल की दिलचस्पी बच्चे में नहीं उसके रिजल्ट में है। इसलिए, हमें अपने बच्चे के पक्ष में खड़े होना है। बच्चे के हिसाब से स्कूल बदलने हैं, स्कूल के हिसाब से बच्चे को नहीं।

‘जीवन संवाद’ को अपने हृदय के कष्ट साझा करने के लिए इस बच्ची को स्नेह और प्यार। मैंने केवल उसे यही समझाने की कोशिश कि जो आपसे साझा कर रहा हूं। उसके सपने, जीवन उसका अपना है उस पर दूसरे किसी की छाया नहीं पडऩी चाहिए।

सबसे जरूरी बात है कि उसका मन इतना मजबूत बनाना है कि वह दूसरों की बातों से हताश न हो जाए। निराश होकर कभी भी खुद को अकेला और कमजोर न समझे। कई बार ऐसा होता है जब माता-पिता बच्चे के मन को नहीं समझ पाते, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह उससे प्रेम नहीं करते। मन को न समझते हुए, वह असल में गलती कर रहे होते हैं, और गलती करने का अर्थ यह नहीं कि प्रेम कम है!
-दयाशंकर मिश्र


09-Oct-2020 3:11 PM 5

हमें अपनी भाषा को भी प्रेम देना है। बिना प्रेम के भाषा कमजोर होती जाती है। हमारे आसपास बढ़ता गुस्सा, बर्दाश्त करने की क्षमता का कम होना बताता है कि हमारी भाषा खोखली होती जा रही है, अति की ओर बढ़ती जा रही है, उसे प्रेम का साथ मिलना जरूरी है। इससे ही हम मन को घृणा की ओर बढऩे से रोक पाएंगे।

अपनी हर दिन की जिंदगी में हम अक्सर इस तरह की बातें सुनते रहते हैं, ‘मैं उनसे बहुत प्रेम करता हूं। उनके विरुद्ध कुछ नहीं सुन सकता। मैं उनसे इतनी घृणा करता हूं कि उनके प्रति आदर का मामूली टुकड़ा भी मेरे मन में नहीं!’ असल में हम सब ऐसे समय में हैं जहां अतिवादी शक्तियों का ही वर्चस्व है। टेलीविजन, राजनीति ने हमारे सामान्य जीवन को अपेक्षा से कहीं अधिक प्रभावित कर दिया है।

क्या हम सामान्य नहीं रह सकते। प्रेम और घृणा के बीच भी कुछ है। उसे उपलब्ध होना इतना कठिन तो नहीं, जितना हमने बना लिया है। हमारा रवैया कुछ-कुछ ऐसा है, मानिए, हम गाड़ी चलाएंगे तो अधिकतम सीमा पर ही चलाएंगे, नहीं तो घर ही बैठे रहेंगे। सबकुछ, अति पर जाकर खत्म हो रहा है।

हमने राजनीति को कुछ ज्यादा ही महत्व अपने जीवन में दे दिया है। हमारा सामान्य जीवन भी उनसे इतना प्रभावित हो गया कि हमारी भाषा, विचार और संवाद तक उनके जैसे होने लगे। किसी सभ्य नागरिक समाज के लिए यह बहुत आदर्श स्थिति नहीं मानी जा सकती। समाज कभी राजनीति का नकलची बंदर नहीं हो सकता। समाज के बीच से राजनीति आती है, राजनीति से समाज पैदा नहीं होता। हां, राजनीति चाहे तो उसे आगे चलकर अपने हिसाब से बदलने की कोशिश कर सकती है।

इसलिए नागरिक, समाज को अपने जीवनमूल्यों की रक्षा स्वयं करनी पड़ती है। हम सबको इस बात की पड़ताल करने की जरूरत है कि हमारा जीवन सामान्य बना रहे। प्रेम और घृणा दोनों की अत्यधिक निकटता असल में जीवन को प्रभावित करती है। जब हम बहुत अधिक प्रेम में होते हैं, तो असल में एक ऐसी जगह होते हैं जहां से टकराव का कोई भी द्वार खुल सकता है, क्योंकि प्रेम को हम तुरंत ही अधिकार से जोड़ लेते हैं। घर, परिवार, कारोबार और समाज हर जगह आपसी रिश्तो में टकराव का सबसे बड़ा कारण प्रेम को अधिकार में बदलने की जल्दबाजी है।

टकराव बढऩे पर अगर उसे समय पर न संभाला जाए, तो उसके घृणा की ओर बढऩे में देर नहीं लगती। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि जीवन में संतुलन बना रहे। प्रकृति की पाठशाला में कितना सुंदर संतुलन है। काश! हम इसे समझने की ओर बढ़ पाते।

एक छोटी-सी कहानी आपसे कहता हूं। संभव है, इससे मेरी बात आप तक सरलता से पहुंच सके। एक बार महात्मा बुद्ध से एक नए साधक ने कहा, ‘मैं आपसे बहुत प्रेम करता हूं। आपके विरुद्ध कुछ भी सुनना मेरे लिए संभव नहीं। जब भी आपकी आलोचना सुनता हूं, मन में बेचैनी और हिंसा के विचार आने लगते हैं’।

बुद्ध ने उसकी ओर देखते हुए कहा, अभी तो आए हो। खुद को थोड़ा देखो। अभी तुम्हारा ही मन कमजोर है, तो दूसरों से संवाद कैसे कर सकोगे! मुझसे प्रेम का अर्थ दूसरे के प्रति असहिष्णु हो जाना नहीं है। प्रेम का अर्थ असहमति के द्वार बंद करना नहीं है। असहमति अपनी जगह और प्रेम अपनी जगह!

अपने प्रेम को संकुचित मत करो, उसकी सबके लिए उपलब्धता ही जीवन में सुख का प्रवेश द्वार है। हमें इनको मिलाने की जरूरत नहीं। जब भी किसी के प्रति इतना प्यार हो जाए कि वह दूसरे के लिए संकटकारी हो जाए, तो उसे प्रेम नहीं कहेंगे। असल में वह प्रेम की सरल नदी नहीं है, वह तो प्रेम की बाढ़ हो जाएगी! बाढ़ से किसी का भला नहीं होता।

हमें अपनी भाषा को भी प्रेम देना है। बिना प्रेम के भाषा कमजोर होती जाती है। हमारे आसपास बढ़ता गुस्सा, बर्दाश्त करने की क्षमता का कम होना बताता है कि हमारी भाषा खोखली होती जा रही है। अति की ओर बढ़ती जा रही है, उसे प्रेम का साथ मिलना जरूरी है। इससे ही हम मन को घृणा की ओर बढऩे से रोक पाएंगे।
-दयाशंकर मिश्र


08-Oct-2020 11:46 AM 3

जब हमारे सरोकार सबसे हटकर केवल स्वयं पर आकर टिक जाते हैं, तो हम अक्सर क्रोधित और बात-बात पर अपमानित महसूस करने लगते हैं। जिनका सारा ध्यान अपने पर रहता है उनके साथ यह अक्सर होता है!

एक-दूसरे से बात करते, सहमत-असहमत होते हुए हम एक-दूसरे को ऐसा बहुत कुछ कह जाते हैं, जो असल में कहना नहीं चाहते, लेकिन बहुत कुछ भीतर उमड़-घुमड़ तो रहा ही होता है। बारिश होने से पहले बादल भारी होते ही हैं। भीतर के बिना कुछ भी बाहर नहीं आता। बाहर से कितना भी प्रेम दिखाएंगे, लेकिन अगर वह भीतर बनना बंद हो गया है, तो बाहर कहां से आएगा। कारण कुछ भी हो सकते हैं। बहुत छोटी-छोटी बात पर हम एक-दूसरे से नाराज बने रहते हैं, लेकिन नाराजगी को बाहरी तल पर नहीं ले जाते। बाहर केवल उसे रखते हैं जो दिखाना होता है। घर का कचरा भी दो-चार दिन घर के भीतर रह जाए, तो परेशानी पैदा करने लगता है। फिर यह तो मन का कचरा है। अगर इसे सरलता से निकलने का रास्ता नहीं मिला, तो यह दूसरे रास्ते खोज लेता है।

गुस्से में चिल्लाना, अतीत की बातों को दोहराना, अव्यक्त को कह देना। इस बात को बताते हैं कि भीतर हम कुछ भरते गए हैं। संभव है हमारी नजर उस पर न पड़ी हो, लेकिन गया तो कुछ होगा ही। यह जो भीतर हलचल मच जाती है, उसका कारण भीतर की उठापटक में ही होता है। जब हमारे सरोकार सबसे हटकर केवल स्वयं पर आकर टिक जाते हैं, तो हम अक्सर क्रोधित और बात-बात पर अपमानित महसूस करने लगते हैं। जिनका सारा ध्यान अपने पर रहता है उनके साथ यह अक्सर होता है!

आपने सिगमंड फ्रायड का नाम सुना होगा। मन के विज्ञान को सरलता से समझाने वाले फ्रायड से एक बार किसी ने पूछा, आप इतने सारे लोगों की मानसिक बीमारियों का अध्ययन करते हैं। प्रश्नों के जवाब देते हैं। सुबह से शाम हो जाती है। इतने सारे लोगों के जटिल प्रश्नों के उत्तर देते हुए आपका दिमाग खराब नहीं होता! आप पागल नहीं हो जाते!

बुजुर्ग फ्रायड ने मुस्कराते हुए कहा, अपने पर ध्यान देने का समय ही नहीं मिलता। अपने पर ध्यान दिए बिना पागल होना बहुत मुश्किल है। सुबह से लग जाता हूं, दूसरों की चिंता में। अपने पर ध्यान देने का अवसर नहीं मिलता।

कितनी सुंदर बात कही है, फ्रायड ने। उनकी इस बात की पुष्टि, हमें बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, आविष्कारकों, डॉक्टरों और शोधार्थियों के जीवन में भी देखने को मिलती है। अक्सर ऐसे लोग फ्रायड की तरह ही होते हैं। उनका ध्यान अपने पर नहीं, अपने काम पर होता है। जिसका ध्यान अपने पर जाएगा, वह मान-अपमान और अहंकार की पकड़ में आए बिना नहीं रह सकता। हम अपने मन को इतना कमजोर बना लेते हैं कि छोटी-छोटी बातों को अपने पर हमले के रूप में देखने लगते हैं। छोटी-छोटी असहमतियों को स्वाभिमान और ‘सेल्फ रिस्पेक्ट’ के टूटने से जोडक़र देखने लगते हैं। ऐसे समय में सबसे जरूरी यही है कि ध्यान कहां है! जब ध्यान अपने से हटकर रचनात्मकता, सृजन पर चला जाएगा, अपमान के भाव हल्के होते जाएंगे।

सुपरिचित कवि भवानीप्रसाद मिश्र की सुंदर कविता है, ‘अपमान’...

अपमान का
इतना असर
मत होने दो अपने ऊपर
सदा ही
और सबके आगे
कौन सम्मानित रहा है भू पर
मन से ज्यादा
तुम्हें कोई और नहीं जानता
उसी से पूछकर जानते रहो
उचित-अनुचित
क्या-कुछ
हो जाता है तुमसे
हाथ का काम छोडक़र
बैठ मत जाओ
ऐसे गुम-सुम से!

क्या आपके साथ भी यह होता है? अपमान असल में गुस्से, चलते हुए विचारों के परिणाम के रूप में हमारे सामने आता है। यह सोचना भी जरूरी है कि हम अक्सर अपमान की शिकायत किससे करते हैं! उनसे ही जिनके हम प्रेम में हैं। प्रेम पर कभी जरूरत से ज्यादा जोर मत दीजिए। नहीं तो, वह भी आपको निराशा की ओर ले जाएगा। हमें जीवन को ऐसी जगह ले जाना होगा, जहां वह केवल जीवन रह जाए। सुख-दुख की छाया जब जीवन पर एक जैसा असर करने लगे, तो समझिए जीवन अपने होने को उपलब्ध हो रहा है। अपमान की परतें मन को बदलापुर में बदलने का काम करती हैं। इसलिए, उनके प्रति सजग रहिए। (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


07-Oct-2020 3:38 PM 1

एक उम्र के बाद अपने से बड़ों से कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए। केवल उनसे प्रेम किया जाना चाहिए, क्योंकि जिंदगी इतनी भी लंबी नहीं, जितनी हम माने बैठे हैं। इसलिए, जितना संभव हो उसे जीवन में भर लेना चाहिए। कल का क्या भरोसा!

उनकी आवाज बहुत मीठी थी। मीठे से अधिक उसमें प्यार की खुशबू थी। लगा कोई बरगद अपनी छांव में बैठे यात्री को मीठी हवा के झूले झुला रहा है। उनके शब्दों से प्रेम बरस रहा था। सच तो यह है कि मेरा मन भी उनके शब्दों के लिए कई बरस से तरस रहा था। जीवन उतना सरल नहीं, जितना हम मान लेते हैं। यही इसकी चुनौती, रस है। सारे अरमान निकल जाएं, तो जीने का रस कम न हो जाए! इसलिए आज जो उपलब्ध है, उसे पूरी तरह जीना होगा।

असल में केवल अभी जो मिला है, उसी क्षण को जीना ही सच्चा आनंद है। लाओत्से कहते हैं, यही जीवन-मार्ग है। मुझ पर अपने शब्दों से प्रेम और स्नेह की वर्षा करने वाले पिता सरीखे बुजुर्ग की उम्र अस्सी बरस के आसपास है। मुझे उनकी बातों के बाद देर तक वसीम बरेलवी साहब की याद आती रही। वो लिखते हैं-

‘वो मेरे घर नहीं आता मैं उसके घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअल्लुक़ मर नहीं जाता।’

कभी-कभी शब्द कैसे जिंदगी में उतर आते हैं। जिन्होंने मुझे फोन किया था उनके साथ मेरा एकदम यही रिश्ता है। मैं उनके घर नहीं जाता और वह मेरे घर नहीं आते। ऐसा नहीं कि हम ऐसा नहीं चाहते, लेकिन कभी-कभी चाहना ही काफी नहीं होता।


इसलिए, मैंने निवेदन किया कि कभी-कभी जिंदगी में दोनों में से किसी की भी गलती न होने पर भी सजा जिंदगी को ही मिलती है। उस पिता की विवशता, प्रेम देखिए। अपने बेटे से वह नहीं पूछते कि मैं उनके घर क्यों नहीं आता। मुझसे भी नहीं कहते कि क्यों नहीं आते। लेकिन जानते सब हैं। फोन पर उन्होंने कोई गिला-शिकवा नहीं किया। केवल आशीर्वाद दिया। एक प्यारभरा गीला चुंबन जैसे मेरे माथे पर देर रात तक ताजा है। बात सुबह की है और लिख मैं देर रात को रहा हूं।

जीवन की मोहब्बत यही है। कई बरस तक वह मुझसे इसलिए बात नहीं कर पाए, क्योंकि वह डायरी नहीं मिल रही थी, जिसमें मेरा नंबर लिखा था। कैसा जीवन है! उनके घर में हर किसी के पास मेरा नंबर है, लेकिन वह किसी से मांगना नहीं चाहते थे। वह फोन न करते, तो भी हमें उनसे कोई शिकायत नहीं।

एक उम्र के बाद अपने से बड़ों से कोई शिकायत नहीं करनी चाहिए। केवल उनसे प्रेम किया जाना चाहिए, क्योंकि जिंदगी इतनी भी लंबी नहीं, जितनी हम माने बैठे हैं। इसलिए, जितना संभव हो उसे जीवन में भर लेना चाहिए। कल का क्या भरोसा!

जिनके बारे में लिख रहा हूं, उनके और हमारे रिश्ते का विरोधाभास देखिए। चाहते सब प्रेम ही हैं, लेकिन मन की दीवार कभी-कभी हम इतनी ऊंची उठा लेते हैं कि प्रेम की सारी सीढिय़ां छोटी पड़ जाती हैं। हम चाह करके भी बहुत कुछ नहीं कर पाते। बस, इतना ही कर सकते हैं कि प्रेम बना रहे, उसकी तने, पत्तियां कुछ कमजोर हो सकती हैं, लेकिन जड़ का ख्याल सबसे जरूरी है। यह जो मुझे फोन किया गया था, वह जड़ को सींचने जैसा ही था। यह हुनर सजगता से संभालने योग्य है। प्रेम न सही, प्रेम के पुल तो बने रहें।

यह किस्सा इसलिए भी आपसे साझा कर रहा हूं, क्योंकि ‘जीवनसंवाद’ को बहुत से प्रश्न रिश्तों की जटिलता पर मिलते हैं। मैं कहना चाहता हूं कि जीवन केवल सही-गलत के बीच का चुनाव नहीं। दोनों के बीच बहुत कुछ शेष रहता है। जो प्रेम में होते हैं, सुख को पाना चाहते हैं, उनको दोनों के बीच उतरना ही होगा। (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


01-Oct-2020 3:07 PM 3

अनियंत्रित गति केवल सडक़ पर ही हमें नुकसान नहीं पहुंचाती। जीवन, रिश्ते और आत्मीयता के पुलों को भी तोड़ती चलती है! इसलिए जरूरी है कि सबकुछ जल्दी-जल्दी हासिल करने के सपने के बीच हमें सुरक्षित गति का बोध रहे।

हम कितने भी परेशान क्यों न हों, कोई बस इतना भर कह दे, ‘मुझे तुम्हारी चिंता है’। इससे मन हल्का हो जाता है। मैं हूं ना तुम्हारे साथ, कोई जरूरत पड़े तो बेधडक़ मुझे याद करना। कितने कम शब्द हैं, और कितने प्रबल भाव! लेकिन हमने जिंदगी की गति इतनी अधिक बढ़ा दी है कि हमारे पास किसी चीज के लिए समय नहीं। स्पीड-ब्रेकर सडक़ों के साथ जिंदगी में भी होने चाहिए। इनसे जीवन में दूसरों के लिए हमदर्दी, स्नेह, आत्मीयता बनी रहती है! अनियंत्रित गति केवल सडक़ पर हमें नुकसान नहीं पहुंचाती। जीवन, रिश्ते और आत्मीयता के पुलों को भी तोड़ती चलती है! इसलिए जरूरी है कि सबकुछ जल्दी-जल्दी हासिल करने के सपने के बीच हमें सुरक्षित गति का बोध रहे।

यह जो गहरे भाव हैं मन के- ‘तुम्हारी फिक्र है। अपने को अकेला मत समझो। हम हर हालत में तुम्हारे साथ हैं।’ इन्हें केवल शब्द मत समझिए। हमसे पहले जो लोग धरती पर सुखी जीवन व्यतीत करके गए, जीवन के आनंद को साथ लेकर गए। उन्होंने इन्हें केवल शब्द नहीं समझा था। भावना से अलग होते ही शब्द अपना महत्व खो देते हैं। भावविहीन शब्दों का कोई अर्थ नहीं। हां, केवल औपचारिकता हैं। किसी भी रिश्ते की जड़ में अगर औपचारिकता समा जाए, तो हमें सजग हो जाना चाहिए कि रिश्ता कभी भी टूट सकता है। इसलिए सच्चे मन और हृदय से उपजे भाव को पहचानिए।

जैसे-जैसे हमारी आर्थिक क्षमता बढ़ती जाती है, असल में हम भीतर से उतने ही असुरक्षित, कमजोर और आत्मकेंद्रित होते जाते हैं। जबकि होना ठीक इसके उलट चाहिए। हमें आत्मविश्वासी, मजबूत और दूसरों के लिए तत्पर होना चाहिए। इसका परिणाम यह होता है कि भीतर निरंतर उथलपुथल चलती रहती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस पेशे में हैं। किस पद पर हैं। सारा अंतर केवल इससे पड़ता है कि जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कैसा है। अगर हमारे मन में कोमलता है, तो दूसरों के लिए जगह अपनेआप बनती जाती है। अगर कठोरता है, तो एक अनुभव को हम पकड़े बैठे रहते हैं। किसी ने आपको धोखा दिया। रिश्ते को तोड़ा। प्रेमसंबंध टूट गए। नाजुक मोड़ पर रिश्ते छूट गए। यह जीवन का एक मोड़ है, जीवन नहीं!

अगर एक स्टेशन पर हमसे रेलगाड़ी छूट जाए, तो हम क्या करते हैं? उसके बाद हम रेल में सफर बंद कर देते हैं/ रेलवे स्टेशन जाना छोड़ देते हैं? नहीं, हम ऐसा कुछ नहीं करते। जिस वजह से समय पर रेलगाड़ी नहीं पकड़ पाए, उन वजहों को दूर करने की कोशिश करते हैं। जीवन, रेलगाड़ी से बहुत अलग नहीं है। मिलना-बिछडऩा, नाराजगी हमारे और रेल के रिश्ते जैसे हैं। व्यक्तिगत रूप से मुझे तो रेलयात्रा ने बहुत कुछ सिखाया है। एक-दूसरे को सहने की क्षमता। नाराजगी का प्रेम में बदलना, जबकि हम जानते हैं कि सफर में मिला साथ केवल कुछ ही घंटे का है। जीवन का अनुभव बताता है कि इस सफर में मिले लोग जीवन में बहुत कम मिलते हैं, क्योंकि दुनिया इतनी छोटी भी नहीं है।

इसलिए, जीवन संवाद में हम निरंतर सबसे अधिक जोर अपने मन की कड़वाहट, गुस्सा और हिंसा को दूर करने पर देते हैं। मन के असली मैल यही हैं। दूसरे की चिंता छोडि़ए, उसे बदल पाना हमारे वश में नहीं। हमारे बस में केवल इतना है कि हम खुद को बदल लें। अपने को दूसरे की मर्जी से न चलने दें। जिंदगी को बदलने के लिए इतना ही पर्याप्त है। भवानी प्रसाद मिश्र ने बड़ी सुंदर बात कही है, ‘हर व्यक्ति फूल नहीं हो सकता, लेकिन सुगंध सब फैला सकते हैं।’

अपने कहे गए शब्दों को निभाना, सुगंध फैलाने जैसा ही है। जब आप दूसरों की मदद कर रहे हैं, तो बिल्कुल मत सोचिए कि आप दूसरे की मदद कर रहे हैं, असल में आप अपने लिए दुनिया में थोड़ी-सी कोमलता बढ़ा रहे हैं। प्रेम का बीज गहरा कर रहे हैं! (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


30-Sep-2020 10:20 PM 3

कोरोना ने हमारी सोचने समझने और प्रेम करने की क्षमता को एक साथ प्रभावित किया है। कोरोना के कारण सब कुछ सीमित करने का भाव गहरा होता दिख रहा है। इसलिए मन के भीतर करुणा, प्रेम और आनंद की मात्रा जांचते रहिए।

हम सुख में अधिक खिलते हैं/ मुश्किल में ज्यादा मजबूत होते हैं/ उस समय साहस रखते हैं, जब इसे सहेजना मुश्किल हो/ करुणा और प्रेम से कभी दूर नहीं होते! इनमें से किन पलों में हम सबसे सुंदर, स्वस्थ और कोमल होते हैं। अपने-अपने सुझाव हो सकते हैं। मेरे ख्याल में वही पल सबसे बेहतर है, जब हम कठिनतम पलों में भी स्वयं को प्रेम, करुणा से दूर न करें। कोरोना के कारण ‘शरीर और मन’ दोनों पर एक साथ भारी संकट आ गया है।

कोरोना ने हमारी सोचने समझने और प्रेम करने की क्षमता को एक साथ प्रभावित किया है। कोरोना के कारण सब कुछ सीमित करने का भाव गहरा होता दिख रहा है। इसलिए मन के भीतर करुणा, प्रेम और आनंद की मात्रा जांचते रहिए। संवाद का दायरा बढ़ाते रहिए। कभी-कभी डॉक्टर जब बहुत अधिक भरोसे के होते हैं तो हम न चाहते हुए भी उनके कहने पर कुछ दवाइयां, परहेज कर लेते हैं। कुछ वैसा ही अपने मन के साथ करने का समय है।

मन को भरोसे में लेने का समय है। मन करुणा, स्नेह और प्रेम से दूर जाने को कह सकता है, लेकिन हमें संवाद बनाए रखना है। संवाद ही वह पुल है, जो जीवन को इनसे जोड़े रखता है। इस बात को समझने का समय है कि अगर इस समय कोई हमसे दूर चला गया तो उसकी भरपाई कभी संभव नहीं होगी। हम मानसिक रूप से कमजोर हो रहे हैं। निराशा दिमाग पर हावी होती जा रही है। अनिश्चितता का भाव कहीं गहरा होता जा रहा है।

अंतत: प्रेम ही बचाएगा। प्रेम मन में दूसरे के लिए नमी, कोमलता बनाए रखने से अधिक हमारे लिए करुणा की परत बिछाए रखता है। जिसके मन में जितना अधिक प्रेम बाकी रहेगा, उसके जीवन में कोमलता, स्नेह को उपलब्ध होने के उतने ही अधिक अवसर होंगे।

एक छोटी सी कहानी आपसे कहता हूं। संभव है, इससे मेरी बात अधिक स्पष्ट हो सके।

जापान के क्योतो प्रांत में ज़ेन गुरू कीचू से मिलने वहां के नए राजा पहुंचे। मठ के दरवाजे पर पहुंचकर राजा ने अपने सेवक को भीतर संदेश देने को भेजा। सेवक ने गुरू से कहा, क्योतो के राजा आपसे मिलने आए हैं। कीचू ने भोलेपन से कहा, लेकिन मुझे तो उनसे कोई काम नहीं। और न ही मैं राजा के किसी काम का हूं। इसलिए उनको आदरपूर्वक वापस भेज दीजिए।

घबराए सेवक ने लौटकर राजा से यह बात कही। राजा के मन में प्रेम की कोपलें फूटीं थी। राजा होने के बाद भी उसके भीतर अहंकार की बेल नहीं उपजी थी। उसने अपने सेवकों को मठ से दूर भेज दिया। अपनी भव्य सवारी से उतरा। नंगे पांव कीचू की झोपड़ी के बाहर पहुंचकर उसने आवाज दी। मैं कितागाकी (उसका नाम) हूं, आपसे मिलना चाहता हूं। ज़ेन गुरू ने प्यार से उत्तर देते हुए कहा, कितागाकी ! बाहर क्यों ठहरे हो मेरे भाई, भीतर आ जाओ!

अब थोड़ी देर ठहरकर, कितागाकी और अपने मन के बारे में सोचिए। हम कैसे-कैसे कवच अपने अहंकार को पहना देते हैं। न जाने क्या-क्या कहानियां अपने होने के बारे में पाल लेते हैं। अपने भीतर प्रेम बढ़ रहा है या अपने कुछ होने का अहंकार! इस बात को हमेशा जांचते रहिए। (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


29-Sep-2020 2:06 PM 4

‘जीवन संवाद’ मनुष्य और मनुष्यता के बिना अधूरा है। अपनेपन के पराग के बिना जीवन का शहद तैयार नहीं होता। हमें ध्यान से देखना होगा कि हमारी बातचीत का कितना हिस्सा हमारी जरूरत और कितना हमारे मन से जुड़ा है!

हर वक्त हम किसी की मदद को उपलब्ध रहें यह जरूरी नहीं कि संभव हो पाए, लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है कि उसके दर्द को महसूस कर पाएं। उससे कह सकें कि तुम अकेले नहीं हो! हम तुम्हारे साथ हैं, डूबते को तिनके का सहारा नहीं, बल्कि उसे नाव में बिठाने जैसा है। हमारे जीवन की गति इस समय इतनी तेज है कि हमदर्द होना भी आसान नहीं। जिंदगी की चाही-अनचाही जरूरतों के बीच हम उलझे हुए हैं। हमारा ध्यान केवल स्वयं पर केंद्रित है। दूसरों के मन को समझना, टटोलना भी भारी काम लगता है!

कोरोना के कारण पहले लॉकडाउन, उसके बाद घर पर अघोषित कैद से जिंदगी के दायरे बहुत सीमित हो गए हैं। सामाजिकता का रस हमारे जीवन का जरूरी हिस्सा था। पहले तकनीक और अपनी व्यक्तिगत व्यस्तता में फंसे होने के कारण हमारे पास सबके लिए समय नहीं था। अब समय तो बढ़ता दिख रहा है, लेकिन अवसर नहीं हैं। हर किसी का फोन व्यस्त है। हर कोई अपने संकट से अकेले-अकेले लड़ रहा है। संकट, हमारी समझ, क्षमता के मुकाबले कहीं गहरा है। अगर हम मिलकर इसका मुकाबला करते, तो संभव है कि इसे सरलता से पराजित किया जा सकता था, लेकिन अब अकेले-अकेले लडऩे के कारण हमारी क्षमता घटती जा रही है।

अगर हम सब एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग के लिए तैयार हों, तो हम समझ पाएंगे कि हमारी जीवनशैली कहां जा रही है। हर दिन अपने स्मार्टफोन से होने वाली बातचीत का खुद ही एक ब्योरा तैयार कीजिए। आप जो कह रहे हैं। घंटों-घंटों बातचीत कर रहे हैं। उसकी विषयवस्तु क्या है? वह बातचीत क्या है! इससे हम समझ पाएंगे कि हमारा ध्यान पूरी तरह उन चीजों पर है जो हमें समझाई गई हैं कि हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं।

उदाहरण के लिए दो दोस्त अपनी नई कार पर एक घंटे तक बात करते हैं। बच्चों को किस तरह की चीजें पसंद हैं, इस पर खूब बात होती है। बहुत बात होती है बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर। उनके स्कूल और कॉलेज को लेकर। यह सब जरूरी तो है, लेकिन यह अपनेपन से दूरी का संवाद है। यह जीवन संवाद नहीं। ‘जीवन संवाद’ मनुष्य और मनुष्यता के बिना अधूरा है।

अपनेपन के पराग के बिना जीवन का शहद तैयार नहीं होता। हमें ध्यान से देखना होगा कि हमारी बातचीत का कितना हिस्सा हमारी जरूरत और कितना हमारे मन से जुड़ा है!

अहमदाबाद से एक महीने पहले देवेंद्र शाह ने हमें लिखा कि दिनभर व्यापार के सिलसिले में लोगों से बातचीत करते रहते हैं। कोरोना के दौरान यह बातचीत कई गुना बढ़ गई, लेकिन तभी उनको एहसास हुआ कि कुछ ऐसा है जो छूट रहा है। मेरा सुझाव था कि उनको अपने कुछ मित्रों से नियमित रूप से अपने मन, जीवन और व्यापार से अलग विषयों पर बात करनी चाहिए। इससे मन के भीतर की पीड़ा बाहर आएगी। मन का ठीक तरह से स्नेहन (लुब्रिकेशन) करना होगा।

यह लिखते हुए प्रसन्नता हो रही है कि उन्होंने हर दिन होने वाली बातचीत में जबसे मन का हिस्सा बढ़ाया, तब से वह आनंदित हैं। खुश हैं। हम अपने मन, भीतर की घुटन को अक्सर ही टालते रहते हैं। आज नहीं, कल।

यह जानते हुए भी कि जो अभी नहीं हो सकता, उसका कभी होना तय नहीं। हमें अपने मन, जीवन को ऐसे लोगों का सहारा देना है जिनके भीतर हमदर्दी और करुणा का भंडार हो। जब तक हम दूसरों से प्रेम, करुणा और आनंद साझा नहीं करेंगे। हमारी ओर यह लौटकर नहीं आएगा।

हमदर्द, बनने में कुछ नहीं जाता। कुछ नहीं मिलता। बस, जीवन की जड़ों को वह शक्ति मिलती है, जिससे जीवन आस्था गहरी होती है। एक भी आदमी का हमदर्द होना अपने आसपास प्रेम की मात्रा का बढ़ जाना है। आइए, हमदर्द बनकर देखते हैं !
-दयाशंकर मिश्र


27-Sep-2020 12:35 PM 2

कोरोना वायरस ने हमें जहां लाकर खड़ा कर दिया है, वहां से हमारा अकेले सकुशल लौटना मुश्किल होता जा रहा है। हां, यह आसान हो सकता है, अगर हम साथ मिलकर खड़े हो जाएं।

हमारे ज्यादातर फ़ैसले परिवार के नाम पर होते हैं, लेकिन असल में वह परिवार के लिए नहीं होते। परिवार का अर्थ हर दिन छोटा होता जा रहा है। हम समय के उस टुकड़े में हैं, जहां एक भाई दूसरे भाई को ‘उनके’ परिवार की मंगलकामना के संदेश भेजते हैं। परिवार के दायरे को बढ़ाए बिना प्रेम, स्नेह, आत्मीयता को उपलब्ध होना संभव नहीं! संयुक्त परिवार का संबंध एक साथ रहने से नहीं, होने से है। हम एक जगह रहकर भी एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं, अलग-अलग रहकर भी एक-दूसरे के बहुत करीब हो सकते हैं। कोरोना वायरस ने हमें जहां लाकर खड़ा कर दिया है, वहां से हमारा अकेले सकुशल लौटना मुश्किल होता जा रहा है। हां, यह आसान हो सकता है, अगर हम साथ मिलकर खड़े हो जाएं।

पश्चिम के समाज के मुकाबले हमारी सामाजिकता हमेशा से गहरी रही है। एक दशक पहले भारत में आए भीषण आर्थिक संकट में इसीलिए हम कहीं अधिक सुरक्षित रहे। हमारे पास बचत थी, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण था एक-दूसरे का साथ। एक दशक में परिवार हमारी कल्पना के मुकाबले कहीं अधिक तेजी से बिखर गए। हमने संयुक्त परिवार को केवल साथ रहने से जोड़ दिया। हम भूल गए कि बदली हुई परिस्थितियों में अब एक ही शहर में रह पाना परिवार के सभी सदस्यों के लिए संभव नहीं। एक ही शहर में रहते भी साथ रहना संभव नहीं। लेकिन अलग-अलग रहकर भी साथ निभाना मुश्किल नहीं।

हमारी अधिकांश मुश्किलें मानसिक होती हैं। जब तक हम मन से किसी चीज के लिए तैयार नहीं होते, उसका होना कठिनतम होता जाता है। हमें इस बात को समझने की जरूरत है कि संकट मुश्किल है, लेकिन हमारे साथ होने से उसकी शक्ति आधी हो जाती है।

मैं पिछले पंद्रह दिन में ‘जीवन संवाद’ को मिले एक अनुभव का जिक्र करना चाहता हूं। किस्सा है मध्यप्रदेश के इंदौर से विवेक वासवानी का। वहां पांच भाइयों के भरे-पूरे परिवार में एक भाई को कोरोना के कारण घाटा उठाना पड़ा। इतना अधिक कि उसे अपना सारा काम समेटना पड़ा। उसके बाद दूसरे शहर जाकर उसने अपनी यात्रा आरंभ करने का फैसला किया। उसे दूसरे शहर जाना ही इसलिए पड़ा, क्योंकि उसके परिवार ने उसकी किसी भी तरह की मदद से इंकार कर दिया। क्योंकि सभी का मानना है कि वह एक नहीं, पांच परिवार हैं। मदद तो दूर, उल्टे वह मुश्किल के समय भाई के साथ हिसााब-किताब करने से भी पीछे नहीं रहे, जबकि परिवार के सबसे छोटे सदस्य विवेक ने हमेशा दूसरों के लिए रास्ता बनाने में मदद की है!

विवेक के मन में ऐसे विचार आ रहे थे कि जब उन्होंने किसी का नुकसान नहीं किया तो उनके साथ यह क्यों हो रहा है। उस समय मैंने केवल उनसे इतना ही कहा था कि स्वयं को थोड़ा समय दीजिए। जल्दबाजी मत कीजिए, दुनिया के बारे में अपनी राय बनाने में! मुझे यह लिखते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है कि दूसरे शहर में विवेक के दोस्तों ने बाहें फैलाकर उनका स्वागत किया, क्योंकि उनका मानना है कि वह सब एक ही परिवार के हैं। परिवार की यह वही परिभाषा है, जिसका हमने आज के संवाद में जिक्र किया। विवेक की कहानी अपने ऊपर विश्वास, प्रेम और मनुष्यता की कहानी है। जिंदगी एक दरवाजा बंद करती है, अनेक खिड़कियां खोल देती है। हां, हमें खिड़कियों से नीचे उतरने का हुनर मालूम होना चाहिए। (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


25-Sep-2020 12:00 PM 3

जीवन नींद में होने से उतने संकट में नहीं है, जितना नींद का नाटक करने में है। जो नींद में है, संभव है किसी तरह जाग जाए, लेकिन जो नाटक कर रहा है, उसने तो मन के सारे दरवाजे बंद कर लिए हैं। जिसने दरवाजे बंद कर लिए वह कैसे बाहर आएगा?


हम बहुत सारी बातें जानते हैं। सुनते रहते हैं। अनसुना करते रहते हैं। यह ऐसा सिलसिला है, जो जीवनभर चलता ही रहता है। जीवन ऐसे ही गुजर जाए, जैसे किसी गहरी नींद में हम होते हैं। हमें कई बार पता भी होता है कि उठना है, जागना है, लेकिन नींद कहां टूटती है! जिंदगी की कहानी इससे कुछ अलग नहीं! जापान में बौद्ध धर्म की एक शाखा जेन परंपरा के रूप में बहुत लोकप्रिय है। जेन का सारा मामला तुरंत घटने पर है। इसी समय। बिना किसी तैयारी के। वहां जेन परंपरा के दो रूप हैं। इनमें से एक की चर्चा आज दूसरे की फिर किसी दिन। यह परंपरा है, तत्क्षण संबोधि! इसे अंग्रेजी में सडन इनलाइटनमेंट कहते हैं। भाषा को थोड़ा और सरल करें, तो इसी समय। इसी पल जो घटता है वही असल में घटता है।

इस परंपरा के एक ख्यात गुरु को एक बार जापान के सम्राट ने अपने महल में आमंत्रित किया। गुरु का आना हुआ। भव्य आसन बनाया गया उनके लिए। सम्राट उनके चरणों में बैठा। बड़ी संख्या में लोग उनके वचन सुनने के लिए तत्पर बैठे थे। गुरु जी ने थोड़ी देर इधर-उधर देखा, उसके बाद एक टेबल पर जोर से दो-चार मुक्के मारकर चले गए। उनको वहां बुलाने वाले वजीर से सम्राट नाराज हो गया। उसने कहा, ‘मैंने इतने प्रबंध किए। लेकिन यह कैसे गुरु हैं। आए और बिना कुछ कहे चले गए।’ वजीर अनुभवी था। उसने सम्राट से कहा, ‘यह उनका सबसे महत्वपूर्ण भाषण था। इतना सुंदर भाषण, तो उन्होंने कभी दिया ही नहीं।’

सम्राट का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने कहा, ‘एक टेबल पर दो-चार मुक्के मार देना और बिना कुछ कहे चले जाना। तुम इसे भाषण कह रहे हो!’ वजीर ने कहा, ‘वह ऐसे ही हैं। वह केवल हमें नींद से जगाने की कोशिश करते हैं। मैंने इन गुरु के और भी अनेक व्याख्यान सुने हैं, लेकिन इतना स्पष्ट व्याख्यान कहीं और नहीं था।’

सम्राट को कुछ बात समझ न आई। उसने कहा, ‘मैं नींद में था ही कब। मैं तो बचपन से ही जागा हुआ हूं।’ वजीर समझ गया कि अब संकट उस पर ही है। उसने कहा, ‘आप चिंतित न हों, क्योंकि मैंने इनके बहुत व्याख्यान सुने हैं, लेकिन मैं भी अभी तक जागा नहीं। आपने तो एक ही सुना है! आप पर इसका कोई प्रभाव नहीं होगा।’

सम्राट और वजीर की तरह हम भी गहरी नींद में हैं। जो चला आ रहा है उसकी खुमारी बड़ी प्रिय होती है। उससे प्रिय कुछ नहीं होता। किसी नशे की तरह हमें इसके अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। अहंकार को सबसे अधिक ऊर्जा ऐसे ही मिलती है! राजा है या रंक। वर्तमान, वैभव की आकांक्षा में हम इतने अधिक डूबे हुए हैं कि हम में कतई भी जागने की इच्छा नहीं। यह कुछ-कुछ ऐसा है, जैसे कोई बच्चा नींद में नहीं है, लेकिन नींद में होने का नाटक कर रहा है। जो नींद में होने का नाटक कर रहा है, उसे उठाना आसान नहीं होता। हमारे मन और चेतना को इसी तरह का खाद-पानी दिया गया है, जिसमें नींद में होने का हमें गहरा अभ्यास हो चला है।

जीवन नींद में होने से उतने संकट में नहीं है, जितना नींद का नाटक करने में है। जो नींद में है, संभव है किसी तरह जाग जाए, लेकिन जो नाटक कर रहा है, उसने तो मन के सारे दरवाजे बंद कर लिए हैं। जिसने दरवाजे बंद कर लिए, वह कैसे बाहर आएगा?

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं और क्या कर रहे हैं। सारा अंतर इस बात से पड़ता है कि जीवन के प्रति दृष्टि कैसी है। सुख-दुख को लेकर हम कितने सहज हैं। जीवन हमारे कुछ होने से अधिक हमारी जीवन आस्था और ऊर्जा से शक्ति लेता है। कोशिश करें जीवन के अर्थ को उपलब्ध होने की और अपनी बनी हुई दुनिया से बाहर निकलकर जीवन को समझने की। (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


24-Sep-2020 11:37 AM 2

दुख का सामना करने की हमारी कोई तैयारी नहीं। काश! जीवन को हमने शिक्षा से इतना अलग न किया होता। अगर हममें तनाव, दुख सहने, संभालने की शक्ति नहीं, तो हमें ऐसी शिक्षा, समाज को बदलने के लिए तैयार होना होगा!

कोरोना वायरस के हमारे सामाजिक-आर्थिक जीवन पर जो प्रभाव पड़ रहे हैं, उनका ठीक-ठीक अध्ययन होना बाकी है, लेकिन इतना तो स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि दुख का सामना करने की हमारी कोई तैयारी नहीं। काश! जीवन को हमने शिक्षा से इतना अलग न किया होता। अगर हममें तनाव, दुख सहने, संभालने की शक्ति नहीं, तो हमें ऐसी शिक्षा, समाज को बदलने के लिए तैयार होना होगा! कोरोना वायरस के कारण हमारी आर्थिक स्थिति पर निश्चित रूप से प्रभाव पड़ रहा है। बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन पर इसकी छाया पडऩी शुरू हो गई है। व्यापार, नौकरी सबमें कटौती की तलवार लटक रही है। जीवन संवाद को नियमित रूप से ई-मेल और संदेश मिल रहे हैं। जीवन से जुड़े सभी प्रश्नों पर आपके प्रिय कॉलम में नियमित रूप से चर्चा होती रहती है। दुख के बारे में भी हमने बहुत विस्तार से बात की है।

आज दुख पर चर्चा करने का एक बड़ा कारण कोरोना वायरस का हमारे ऊपर पडऩे वाला मानसिक प्रभाव है। हमें इस बात को समझना होगा कि केवल हम ही परेशान नहीं। केवल हमीं दुखी नहीं हैं। पूरी दुनिया पर दुख की छाया है। इस दुख को सहना तब और अधिक मुश्किल हो जाता है जब हम यह मान लेते हैं कि ऐसा केवल मेरे साथ ही हो रहा है। इस बारे में मेरा सुझाव है कि अगर हम इन दो बातों को मन में बैठा लें, तो हमारे बहुत से संकट सुलझ सकते हैं! सबसे जरूरी और पहली बात। यह केवल आपके साथ नहीं हो रहा। कोरोना के कारण करोड़ों लोगों के जीवन में उथल-पुथल है। सब अपने-अपने तरीके से इस संकट से निकलने की कोशिश कर रहे हैं। कोई भी संकट कितना भी गहरा क्यों न हो, बहुत देर तक हमारे साथ नहीं रहता, इसलिए जीवन की आस्था को मजबूत कीजिए। जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण और नजरिए को ठोस और गहरा बनाइए।

दूसरी बात। मैं ही क्यों! मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया! पति के साथ दूसरे शहर में विस्थापित होने के लिए विवश हुई एक युवा कारोबारी की पत्नी ने आंखों में आंसू लिए हुए मुझसे पूछा। मैंने उनके पति की आंखों में देखते हुए कहा, ‘क्या आपने इनके साथ केवल सुख का वादा किया है?’ पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, ‘मैं हर दुख में इनके साथ हूं।’ मैंने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘आप हर दुख में अगर साथ हैं, तो इन शब्दों को अपने जीवन में उतार लीजिए- जीवन बहुत बड़ी संभावना है। यात्रा है। हम परिवार के साथ केवल सुख के लिए नहीं हैं। दुख की तैयारी जीवन में वैज्ञानिकता का प्रमाण है। अगर हम इसके लिए तैयार रहें, तो अवसाद, तनाव और? भीतर की व्याकुलता से सहज दूर रहेंगे। दुख सहने का बोध जीवन की यात्रा में हमारे मन का सबसे बड़ा साथी है!’

एक छोटी-सी कहानी आपसे कहता हूं। गुरु नानक का काफिला एक बार एक गांव के बाहर रुका, तो उनकी शिक्षा से असहमत गांव के कुछ लोगों ने उनको वहां से जाने के लिए विवश किया। स्वागत-सत्कार तो बहुत दूर की बात है। उनके शिष्य ने पूछा, ‘इनके लिए क्या कहेंगे।’ नानक ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, ‘इनको मेरा आशीर्वाद है कि यह सदा यही रहें। यहीं बस जाएं और फले फूलें।’

जल्द ही दूसरे गांव के बाहर उनका गहरी आत्मीयता और प्रेम के साथ सत्कार किया गया। ऐसा स्वागत जिसमें प्रेम ही प्रेम टपक रहा था। आनंदित थे, लोग वहां अपने बीच नानक को पाकर! वहां से जाते हुए भी जब उसी शिष्य ने पूछा, ‘इनके लिए क्या आशीर्वाद है।’ नानक ने अपने करुणामयी स्वर में कहा, ‘यह लोग जल्द ही बिखर जाएंगे। गांव का हर व्यक्ति अलग-अलग दिशा में चला जाएगा।’

शिष्य को बात समझ में नहीं आई। उसने कहा, ‘जिन्होंने कष्ट दिया वह वहीं रहें। जिनके मन में प्रेम है वह बिखर जाएं। मुझे यह बात समझ नहीं आ रही’। नानक ने समझाया, ‘अगर ऐसे लोग दुनिया में फैल गए, जो दूसरों को कष्ट देते हैं, तो यह खूबसूरत दुनिया नष्ट हो जाएगी, लेकिन इस दुनिया को खतरा तब भी है, जब सारे प्रेम और करुणा में डूबे लोग एक ही जगह बस जाएं।’

जीवन में आस्था, सबसे बड़ा मानवीय गुण है। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि मैंने जो कुछ सीखा जीवन में, ऐसे लोगों से ही सीखा है जो लगातार संघर्ष करते रहे। लेकिन उनके मन में कभी जीवन के प्रति कठोरता नहीं आई। जीवन के प्रति निराशा नहीं आई। यह जो संकट आया है, जाने के लिए ही आया है। कहना निश्चित रूप से सरल है और इसे भोगना उतना ही अधिक कष्टदायक। लेकिन जीवन की आस्था इसे जीने में ही है। जीवन की शुभकामना सहित... (hindi.news18)

-दयाशंकर मिश्र


23-Sep-2020 12:48 PM 3

हमें मन के उस कोने की खोज करनी है, जो हमारी पूरी शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र है। उसके बाद पूरी सजगता से उसे संभालना है। जीवन के लिए गति जरूरी है, लेकिन ठहराव उससे भी जरूरी है!

अपने लिए हम क्या करते हैं। कुछ ऐसा जिसका संबंध विशुद्ध रूप से हमारे भीतर से हो। कुछ होने या न होने से नहीं। ऐसी कोई एक गतिविधि जो हमें आत्मिक आनंद से भर दे। ऐसा कुछ जिससे मन पूरी तरह झूम उठे। जीवन से जुड़ी हमारी अधिकांश शिक्षाएं अब केवल डायरी और किताबों में ही मिलेंगी, क्योंकि हमने सबकुछ पाने की आशा में अपने जीवन का बहुत जरूरी हिस्सा विश्राम खो दिया है। आनंद खो दिया है, क्योंकि सबकुछ नतीजे पर केंद्रित हो गया! ऐसा करने से क्या हासिल होगा! किसलिए! किसलिए! किसलिए!

हमने अपने दिमाग को कुछ इस तरह से प्रशिक्षित किया है कि वह केवल यही दोहराता रहता है कि इस काम का हासिल क्या है। जीवन में श्रेष्ठता की ओर यात्रा अच्छा विचार है, लेकिन कोई भी रास्ता अगर दुनिया के दूसरे रास्ते से कट जाता है, तो वह अंतत: अकेला ही हो जाता है। ऐसा रास्ता, हमें केवल भटकाता है! कहीं पहुंचाता नहीं। कहीं पहुंचने के लिए दिमाग का ठीक तरह से समावेशी होना जरूरी है। उसका टुकड़े में बंटा होना, हमारे जीवन के लिए अच्छा नहीं है। पिछले कुछ दिनों में लखनऊ और पटना से दो युवा उद्योगपतियों से संवाद हुआ। दोनों ही तनाव को ठीक से नहीं संभाल पा रहे हैं। आपको जानकर आश्चर्य हो सकता है कि दोनों का ही संकट आर्थिक नहीं है। हां, इस संकट के कारण अवश्य उनकी पूरी अर्थव्यवस्था मुश्किल में पड़ गई है।

दोनों के व्यक्तित्व में सबसे बड़ी समस्या उनका पूरी तरह से पूर्ण होना है। इतने पूर्णता से भरे हुए हैं कि प्रेम, स्नेह के लिए कोई जगह ही नहीं। परिवार, पत्नी और बच्चों के साथ होते हुए भी दूर हैं। जीवन संवाद में हम इस बात पर सबसे अधिक जोर देते आए हैं कि धन में इतनी शक्ति जरूर है कि वह हमारी सुविधाएं बढ़ा दे। कुछ कष्ट कम कर दे, लेकिन वह हमें सुखी करने के लिए पर्याप्त रूप से शक्तिशाली नहीं है। हमने महत्वाकांक्षाओं के चक्कर में धन को बहुत अधिक शक्तिशाली समझ लिया। सुख, मन के शांत और समभाव होने से उपजा भाव है। इतना दुर्लभ कि किसी से भी पूछ लीजिए कि वह सुखी है, तो वह घबरा जाता है। सुख की बात सुनकर घबराने वाला मन सुखी कैसे होगा! ऐसे प्रश्न के उत्तर में संभव है, कुछ यह कह दें कि वह तो सुखी हैं, लेकिन तुरंत ही संभाल लेंगे कि अगर यह हो जाता, तो मैं सुखी हो जाता। मेरा सुख अभी यहां अटका हुआ है!

जीवन में अतृप्ति का यह अभाव ही हमारे संकट का सबसे बड़ा कारण है। खुद से दूरी का सबसे बड़ा कारण यही है। जब हम खुद को हमेशा स्वयं से ही घेरे रहेंगे तो धीरे-धीरे हम अपने आसपास से आने वाली ऊर्जा, ताजे विचार और प्रेम से खुद को वंचित करते जाएंगे! अपने को केवल ऐसी चीजों से व्यस्त रखना जिनसे नौकरी/कारोबार/आजीविका चलती हो, वास्तव में एक ऐसी कोठरी में बंद कर लेना है, जहां पर केवल चारों ओर आप ही की तस्वीर लगी हो। ऐसा व्यक्ति धीरे-धीरे समाज और दुनिया से दूर खिसकता जाता है!

इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने को वक्त दें। स्वयं को कुछ ऐसी चीजों से जोड़ें, जो हमारे आंतरिक मन को ऊर्जा, आनंद से भर सकें। सबके लिए यह काम अलग-अलग हैं। हमें मन के उस कोने की खोज करनी है, जो हमारी पूरी शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र है। उसके बाद पूरी सजगता से उसे संभालना है। जीवन के लिए गति जरूरी है, लेकिन ठहराव उससे भी जरूरी है! (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


21-Sep-2020 9:49 PM 1

हमारी विचार प्रक्रिया के हिसाब से केवल हम ही निर्दोष हैं। सारी दुनिया हमें सता रही है। केवल हम ही सबसे भले हैं। अपने प्रति यह अतिरिक्त उदारता, भावुकता ही हमें दूसरों के प्रति कठोरता प्रदान करती है।

हम आजीविका के लिए जरूरी साक्षरता पर इतना अधिक जोर देते गए कि धीरे-धीरे हमारे भीतर शिक्षा के मूल्य, नैतिकता के बोध पीछे छूटते चले गए। जीवन के प्रति समझ कमजोर होती गई। एक-दूसरे को हम चुनौती मानने में इतने अधिक व्यस्त हो गए कि सहज प्रेम की डोर उलझने लगी। जिन मूल्यों के सहारे हम मजबूती से कठिनतम समय में भी टिके रहते थे, अब उनके सहारे एक दिन कटना भी मुश्किल हो जाता है! हमेशा जीवन को अपने ही दृष्टिकोण से समझने के प्रयास में रहते हैं। अपने नजरिए को ही अपनी नजर बना लेते हैं, जबकि जीवन एकतरफा नहीं। हम जीवन नदी के तट पर भी समन्वय को नहीं आने देते। नाव में साथ सफर की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है! दूसरे की जगह खड़े होकर देखने की कोशिश कीजिए, जीवन के उत्तर स्वयं मिलने लगेंगे!

महात्मा बुद्ध से जुड़ा संवाद आपसे साझा करता हूं। संभव है, इससे मेरी बात अधिक स्पष्ट हो पाएगी। बुद्ध सुबह प्रार्थना करते, तो रोज वह क्षमा मांगते, संसार से। एक दिन आनंद ने उनसे पूछा, ‘आप तो किसी को कष्ट देते नहीं, फिर किस बात की क्षमा! आप तो किसी को चोट भी नहीं पहुंचाते। फिर किस बात की माफी मांगते हैं’। बुद्ध ने बड़ी सुंदर बात कही। वह कहते हैं, ‘मुझे अपने अज्ञान के दिनों की याद है। कोई मुझे चोट नहीं भी पहुंचाता था, तो भी पहुंच जाती थी। आज जब मैं इस बात से परिचित हूं कि हर तरफ अज्ञान के समूह हैं। इन समूहों को मेरे बिना पहुंचाए भी अनेक बार मेरी बातों से चोट पहुंच रही होगी। फिर मैंने पहुंचाई या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनको तो तकलीफ पहुंच रही होगी। मैं उसी तकलीफ की क्षमा चाहता हूं’!

आनंद ने कहा, ‘चोट उन्हें भले पहुंच रही हो, लेकिन पहुंचाने वाले तो आप नहीं हैं’! बुद्ध ने फिर बात दोहराई, ‘निमित्त तो मैं ही हूं! अगर मैं न रहूं, तो मुझसे चोट नहीं पहुंचेगी। मेरा होना ही काफी है। इसलिए मैं क्षमा मांगता रहूंगा। यह क्षमा किसी किए गए अपराध के लिए नहीं, बल्कि हो गए अपराध के लिए है। और हो गए अपराध में मेरा कोई योगदान न हो, उसके लिए भी है’!

महात्मा बुद्ध के उलट हमारी विचार प्रक्रिया के हिसााब से केवल हम ही निर्दोष हैं। सारी दुनिया हमें सता रही है। केवल हम ही सबसे भले हैं। अपने प्रति यह अतिरिक्त उदारता, भावुकता ही हमें दूसरों के प्रति कठोरता प्रदान करती है। जीवन के प्रति अपनी दृष्टि को बदले बिना हमारा बदलना संभव नहीं। केवल कपड़े बदल लेने से हम नहीं बदल जाते। हां, नए और सुंदर कपड़ों से संभव है दुनिया को हम कुछ और नजर आने लगें, लेकिन जिस तरह हमारे माता-पिता हमें पहचानने में गलती नहीं करेंगे, ठीक उसी तरह हमारा मन कपड़ों से नहीं बदलता। हां, शरीर की भाषा बदल सकती है। संभव है दूसरों का हमारे प्रति व्यवहार बदल जाए, लेकिन इन सबसे हम खुद को बहुत अधिक नहीं संभाल सकते।

असली बात तो वही है जो भीतर है। अपने भीतर को सहेजना सबसे जरूरी है। हमारे जीवन में सबसे अधिक संकट इससे ही आते हैं कि हम खुद को हमेशा, दुखी, पीडि़त और संघर्षशील बताते रहते हैं। बताते हुए मानने लगते हैं, जबकि अपने अतिरिक्त सबको दोषी, अपराधी, अन्यायपूर्ण साबित करने में जुटे रहते हैं। इसे बंद करना होगा। हम दूसरों को समझने की जितनी अधिक कोशिश करेंगे, हमारे भीतर करुणा और कोमलता उतनी ही बढ़ती जाएगी। वहां से जो सुंदर, सुलझी और सुगंधित शांति जीवन में प्रवेश करेगी, वह उन सभी संकटों को संभालने में सक्षम होगी जिनके कारण अभी हमको अनावश्यक संघर्ष करना होता है। इस अनावश्यक मानसिक संघर्ष से जीवन की आस्था और ऊर्जा का बहुत नुकसान होता है! (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


17-Sep-2020 5:23 PM 6

क्षमा तो ऐसे मांगी जाती है, जैसे खूब प्यासे होने पर किसी पानी पिलाने वाले के प्रति गहरी श्रद्धा/स्नेह हो मन में! क्षमा जब तक मन में उतरकर नहीं मांगी जाएगी, अतीत का मैल सरलता से साफ नहीं होगा!

हम अक्सर एक-दूसरे की कमजोर कड़ी खोजते रहते हैं। कमियों/ गलतियों को मन की तिजोरी में संभाले रखते हैं। कितने निर्मम होते जा रहे हैं हम! अतीत की गली में हम एक-दूसरे को लेकर जितना जाएंगे, जीवन को उतनी ही बेचैनी मिलेगी। जीवन संवाद को देश के अलग-अलग हिस्सों से पाठकों की ईमेल और संदेश मिलते रहते हैं। इनमें हम पति-पत्नी/ दांपत्य जीवन के प्रश्नों पर विचार करने पर पाते हैं कि आज के सुख से अधिक हमारा ध्यान उन कमियों/गलतियों पर अधिक रहता है जो जाने अनजाने घटित होती रहीं।

आज से दस बरस पहले दो लोगों के बीच जो कुछ भी हुआ हो उसे हमेशा आज की नजर से देखने पर दुख ही मिलेगा। हम सभी जिस रिश्ते में भी हों समय के साथ एक-दूसरे के प्रति समझ बेहतर होती है। ऐसे में बीते समय में क्या हुआ, उस पर हमारा दृष्टिकोण कैसा रहा, केवल इन बातों को ही दोहराना जीवन के पांव को जंजीरों से बांधने जैसा है।

रांची से धर्मेंद्र झा ने लिखते हैं, ‘कुछ वर्षों पहले तक उनके घर में सबसे अधिक बहस इस बात पर होती थी कि कैसे अनेक अवसरों पर कभी उनकी पत्नी का ससुराल में अपमान हुआ, तो कब-कब पत्नी के मायके में धर्मेंद्र जी को ठीक से सम्मान नहीं मिला।’

धर्मेंद्र कहते हैं कि ‘जीवन संवाद’ ने करुणा, प्रेम और स्नेह के प्रति जागरूक करने में मदद की। जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को बदला! हम उनकी ईमानदार प्रतिक्रिया का सम्मान करते हैं। सामने आकर ऐसा कहने के लिए भीतर जीवन के प्रति गहरी आस्था और समझ का होना बहुत जरूरी है!
भारत में अक्सर रिश्ते अतीत की गलियों में टहलते हुए कमजोर होते रहते हैं। हर छोटी-छोटी बात में अपने अहंकार को ले आना, हमारे स्वभाव का हिस्सा बनता जा रहा है।

कभी-कभी तो यह लगता है कि हम इस प्रतीक्षा में ही रहते हैं कि कैसे कुछ ऐसा घटे, जिससे सामने वाले के अहंकार पर चोट की जा सके। हमें उसके अहंकार की इतनी चिंता नहीं, जितनी असल में अपने अहंकार की है। हमारा अहंकार इस बात से ही खाद-पानी पाता है कि कैसे हम अपने तर्कों से सामने वाले (जो हमारा ही है। पति/पत्नी/भाई/ बहन/पड़ोसी/रिश्तेदार) को उसकी गलती का अहसास करा दें। ? इसे ही जीवन संवाद में हम ‘दुखी करने की आदत कहते हैं’।

बीस/दस/पांच साल पहले जो भी घटा था, उसे पकड़े रहने से कुछ नहीं मिलेगा। अगर कुछ मिलेगा तो वह केवल मन/आत्मा के लिए अहितकारी ही होगा। उससे कुछ अमृत नहीं निकलने वाला।

जब शाम होने को आती है, तो हम इस बात में नहीं उलझते कि घर में कल किसने रोशनी की थी। हमारा ध्यान तो केवल इस पर रहता है कि कोई उठकर आज दीया जला दे। जिस रूप में भी उजाला उपलब्ध है, उस उजाले तक हमें पहुंचा दे। फिर छोटी मोटी बातों पर अतीत की यात्राओं के लिए मन में इतनी व्याकुलता किसलिए!

एक छोटा-सा उपाय आपसे कहता हूं । जब कभी, किसी से भी संवाद में हों, मन अतीत को जाने लगे तो केवल इतना कहिए, आज नहीं कल! इससे भी बात न बने, तो बिना उलझे केवल क्षमा मांगिए। क्षमा से मैल धुलता है, मन का! लेकिन क्षमा ऐसे मत मांगिए, जैसे कोई एहसान किया जा रहा हो। क्षमा तो ऐसे मांगी जाती है, जैसे खूब प्यासे होने पर किसी पानी पिलाने वाले के प्रति गहरी श्रद्धा /स्नेह हो मन में! क्षमा जब तक मन में उतरकर नहीं मांगी जाएगी, अतीत का मैल सरलता से साफ नहीं होगा! (hindi.news18)
-दयाशंकर मिश्र


16-Sep-2020 3:01 PM 1

एक हरा-भरा पेड़ तने और पत्तियों के सहारे नहीं होता। उसकी शक्ति जड़ में होती है। हमने बचत की भारतीय जीवनशैली के उलट जाकर कर्ज से अपने को लहलहता पेड़ बनाने का प्रयास किया। इसका नतीजा यही होना है। जिसे हम अर्थव्यवस्था समझ रहे हैं उसका हमारे सुख-चैन से कोई रिश्ता नहीं।

एक छोटी-सी कहानी से संवाद शुरू करते हैं। जैन आश्रम में भूकंप आया। पूरा आश्रम कांपने लगा। कुछ कमजोर कुटिया तो गिर ही गईं। थोड़ी देर बाद भूकंप थम गया। आश्रम के सबसे वरिष्ठ साधक सामने आए और उन्होंने कहा, आज आपको यह देखने का मौका मिला होगा कि एक सच्चा जैन साधक संकटकाल में भी विचलित नहीं होता। आपने देखा कि भूकंप शुरू होते ही सब घबरा गए थे, पर मैंने आत्मनियंत्रण बिल्कुल भी नहीं खोया। मैं शांत और स्थिर भाव से सबकुछ देखता रहा। जैसा हमें सिखाया गया है, मैं इसके अनुकूल बना रहा।

मैंने ठंडे दिमाग से सोचा कि सबकी सुरक्षा के लिए क्या करना है और सभी डरे घबराए लोगों को एक साथ आश्रम के बड़े रसोई घर में ले गया, क्योंकि उसकी इमारत काफी पक्की, मजबूत है। उसके गिरने का डर नहीं था, लेकिन मैं यह स्वीकार करता हूं कि आत्मनियंत्रण के बाद भी दूसरों की चिंता में मैं थोड़े तनाव में आ गया था, इसलिए रसोई घर में पहुंचते ही मैंने एक गिलास पानी पिया। जिसकी सामान्य स्थिति में मुझे जरूरत न होती। ऐसा कहकर अपनी अभिमानपूर्ण मुस्कान के साथ उन्होंने सबके चेहरे पर नजर दौड़ाई। तभी पीछे से गुरुजी निकलकर आए और हंसने लगे।

साधक ने अपने गुरुजी से पूछा, आप हंस क्यों रहे हैं? क्या मुझसे कुछ गलती हुई? गुरुजी ने शांत भाव से उत्तर दिया, तुमने जो पिया, वह पानी नहीं सिरके से भरा गिलास था। हम घबराहट के मामले में इस साधक के बहुत नजदीक हैं। संकट में दिखाते तो ऐसे हैं जैसे भीतर कोई खलबली न हो, लेकिन पानी की जगह सिरके से भरा गिलास अक्सर पीते रहते हैं।

संकट आने पर घबराहट स्वाभाविक है। हम बस इतना कर सकते हैं कि धैर्य, सरलता, सहजता बनी रहे। घबराहट गहरे न उतरे। वह आए, लेकिन घर की दहलीज से ही गुजर जाए। भीतर प्रवेश न करने पाए। बीते दस-पंद्रह बरस में समाज में तीन चीजें बहुत तेजी से बढ़ीं। पहली, कर्ज (ईएमआई) को आसान मानना। दूसरी, हर चीज ईएमआई पर खरीदना। तीसरी, वर्तमान में रहने की जगह हर समय भविष्य के आधार पर सपने बुनना। यह सपना बुनते समय भी अपनी बचत से अधिक कर्ज की क्षमता पर भरोसा करना!

अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो पाएंगे कि इन तीन चीजों में सबसे बड़ी भूमिका ईएमआई का सामान्य बुद्धि में सहज होते जाना है। ‘जीवन संवाद’ को कोरोनावायरस, लॉकडाउन के हमारे जीवन में आने के बाद से घबराहट, गुस्सा, गहरी चिंता और डिप्रेशन के सवाल बड़ी संख्या में मिल रहे हैं। लोग अपने भविष्य को लेकर बेचैन हो रहे हैं। जिनके सामने संकट नहीं आया है वह उसकी आशंका में अपने दिल को परेशान किए हुए हैं। दूसरी ओर जिनके सामने संकट आ गया है, वह ऐसे पेश आ रहे हैं जैसे यह संकट पहली बार आया हो। वैसे उनकी परेशानी एकदम सही है।

पिछली बार लगभग एक दशक पहले जब आर्थिक मंदी दुनियाभर में अपने पैर पसार रही थी, तो भारत में उसका मुकाबला पारिवारिक शक्ति ने किया था। बचत ने किया था। सांझा चूल्हा ने किया था। घर के बड़े-बुजुर्गों की देखरेख में संकट का सामना किया गया था। अब एक दशक में ही हमारा समाज बचत से अधिक कर्ज की ओर बढ़ गया है। हर चीज़ ईएमआई पर है। वेतन का अस्सी प्रतिशत कर्ज में लौटाने वाला सुखी कैसे हो सकता है!

एक हरा-भरा पेड़ तने और पत्तियों के सहारे नहीं होता। उसकी शक्ति जड़ में होती है। हमने बचत की भारतीय जीवनशैली के उलट जाकर कर्ज से अपने को लहलहता पेड़ बनाने का प्रयास किया। इसका नतीजा यही होना है। जिसे हम अर्थव्यवस्था समझ रहे हैं उसका हमारे सुख-चैन से कोई रिश्ता नहीं। हमारे सुख-चैन में हमारी जीवनशैली की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, इसीलिए भूटान इतना सुखी है। आनंदित है। प्रसन्नता और आनंद के मानकों पर खरा उतरता है।

जीवन सुविधा से नहीं अपने चुनाव से अपनी गति को प्राप्त होता है। मैंने सुना है लोग वहां केवल वर्तमान की छांव में रहते हैं। भूटान जीवन के स्तर को सकल राष्ट्रीय खुशी (जीएनएच) से नापता है, न कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से। सरकार का कहना है कि इसमें भौतिक और मानसिक रूप से ठीक होने के बीच संतुलन कायम किया जाता है। हमें भी अब इन रास्तों पर जाने के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा।
-दयाशंकर मिश्र


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