दयाशंकर मिश्र

03-Aug-2020 9:55 PM

मन की गांठ, कैंसर से कम खतरनाक नहीं। अगर कैंसर को सही समय पर नहीं पकड़ा जाए, तो जीवन छोटा हो जाता है। ऐसे ही मन की गांठ समय रहते न खोली जाए, तो यह जीवन के चंद्रमा पर पूरी तरह ग्रहण लगा सकती है!

हमारा मन समुद्र से गहरा है! समुद्र की गहराई का अनुमान तट पर खड़े होकर नहीं लग सकता। उसके लिए तो समंदर के भीतर ही प्रवेश करना होता है। मन का स्वभाव भी ऐसा ही है। मन के बारे में हमें इतने तरह के भ्रम हैं कि उन्हें सरलता से पहचानना संभव नहीं। मन हमें बाहर से वैसा ही दिखता है, जैसे समंदर में बर्फ के बड़े-बड़े पहाड़ दूर से दिखते हैं। ऐसा लगता है कि छोटे-मोटे टीले हैं, चट्टाने हैं। जहाज को इनसे खतरा नहीं, लेकिन होता अक्सर इसका उल्टा है। ‘टाइटैनिक’ फिल्म को देखें, तो इसका आधार मन की गलतफहमी है, जहाज के कप्तान की जानकारी में कमी नहीं। ‘टाइटैनिक’ के पास एक से बढक़र एक अनुभवी और गहरी जानकारी रखने वाले विशेषज्ञ थे, लेकिन वह भी समंदर के भीतर बैठे बर्फ के पहाड़ को ठीक से पकड़ नहीं पाए। क्योंकि दूर से वह बहुत छोटा दिख रहा था।

जीवन भी ठीक इसी मिजाज का है। डिप्रेशन (अवसाद) की छोटी-छोटी झलकियां हमें अक्सर दिखाई देती हैं, लेकिन हम इनको गंभीरता से नहीं लेते। हम मन में उगने वाले तनाव के खरपतवार को समय रहते हटाने का काम नहीं कर पाते। इसकी कीमत हमें जीवन की फसल के नुकसान के रूप में चुकानी होती है।
एक छोटी सी कहानी कहता हूं। इससे आपको अपने मन की शक्ति और संभालने में सहजता होगी।
एक पहलवान जिसे हराना अपने समय में बहुत मुश्किल था। अब बुजुर्ग होकर ज़ेन साधक बन गया था। ज़ेन बौद्ध धर्म की ही शाखा है जो जापान तक पहुंचते हुए कुछ परिवर्तन के साथ अधिक परिपक्व और तर्क के साथ नए रूप में करोड़ों लोगों के ज्ञान पाने का माध्?यम बनी।
यह बूढ़ा साधक अब पहलवानी से बहुत दूर आ गया था। उन दिनों एक नौजवान लड़ाके की बड़ी चर्चा थी। वह बहुत तेज़ तर्रार होने के साथ चतुर भी था। उसने अपने समय के सभी बड़े योद्धाओं को हरा दिया था। उसे ख्याल आया कि इस बुजुर्ग को हराकर ही वह सिद्ध माना जाएगा। तो उसने बुजुर्ग को चुनौती दे डाली।

बूढ़े साधक के शिष्यों ने उनको बहुत समझाया। लेकिन वह नहीं माने और युवा पहलवान की चुनौती स्वीकार कर ली। चतुर लड़ाका अपने सामने एक शांत, स्थिर लड़ाके को देखकर समझ गया कि इसकी शक्ति का केंद्र कहीं और है। उसने दूसरा उपाय अपनाया। उसने बूढ़े साधक को अपशब्द कहने आरंभ कर दिए। एक के बाद एक ऐसी अपमानजनक बातें कहीं कि कोई दूसरा होता तो बौखला जाता। लेकिन अनुभवी साधक एकदम शांत खड़ा रहा।

कुछ देर बाद युवा पहलवान बेचैन हो उठा। उसके सारे पैंतरे बेकार हो गए। उसने हार मान ली।

बुजुर्ग साधक से उसके शिष्यों ने पूछा, उसकी बातें सुनकर हमारा खून खौल रहा था। लेकिन आप शांत रहे, और वह हार गया। साधक ने केवल इतना कहा, उसने मेरे बारे में जो कुछ कहा, उनमें से कोई भी बात सच नहीं थी। इसलिए मैंने उनको स्वीकार नहीं किया। और हम, अपने मन पर दूसरों के कचरे को परत दर परत जमाते जाते हैं। मन को अंधेरे की ओर धकेलने वालों से सावधान रखना जरूरी है।

आइए, मन की ओर चलते हैं। चेतना की सारी जड़ें मन की गहराई में हैं। हम जैसे भी हैं, अपने मन के कारण ही हैं। इसलिए इसके काम करने के तरीकों को समझना सबसे पहला कदम है, जीवन की ओर।आइए समझें, दर्द की परतों को किस तरह धीरे-धीरे खोलना है।

मन में बैठे दर्द की परतों को धीरे-धीरे खोलिए। संवाद का मरहम ही इसे ठीक करने में सक्षम है। इसके सरीखा जादू किसी दूसरी दवा में नहीं। जब भी मित्र, परिचित, सहकर्मी, परिजन मन की पीड़ा/तनाव/मन की गांठ लेकर आपके पास आएं, तो उसे ‘हवा’ में मत उड़ाइए। उनको सुनिए, सुनना संकट सुलझाने की पहली किश्त है!

उससे मत कहिए कि अपनी नौकरी की चिंता करो। तुम्हारे ऊपर जिम्मेदारी का बोझ है। बेकार की बातों में उलझे हो! मत कहिए कि वह जिंदगी को समझ नहीं पा रहा है! नहीं समझ रहा, इसीलिए तो आपके पास आया है। मन की गांठ, कैंसर से कम खतरनाक नहीं।

अगर कैंसर को सही समय पर नहीं पकड़ा जाए, तो जीवन छोटा हो जाता है। ऐसे ही मन की गांठ समय रहते न खोली जाए, तो यह जीवन के चंद्रमा पर पूरी तरह ग्रहण लगा सकती है!

जब भी कोई मन की गांठ लेकर आपके समीप आए, उसे उतने ही स्नेह, अनुराग से सुनिए, जिस तरह हमारी जटिल बीमारी का इलाज करने वाला समझदार डॉक्टर हमारी बात सुनता है। अपनी व्यस्तता भूल जाइए जब कोई दोस्त/प्रियजन मन की कुछ बात कहने आया हो। अपने किंतु/ परंतु/ आशंका के बादल एक तरफ रख दीजिए। बस उसे सुनिए।

सुनने पर इतना जोर इसलिए, क्योंकि हम हमेशा जल्दबाजी में रहते हैं। किसी के लिए दो पल का समय भी तन्मयता और सघनता के साथ नहीं दे पाते। हम सुन नहीं पाते। बिना सुने कोई बात कैसे समझी जा सकती है। इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि कहने वाला कौन है! हमें तो बस सुनने का अभ्यास करना है। यह दूसरों से अधिक हमारे मन को स्वस्थ रखने के लिए उपयोगी है। यह मन को ठोस, सुंदर और निरोगी बनाता है। (hindi.news18.com)

-दयाशंकर मिश्र


02-Aug-2020 10:34 PM

मन में जब भी अतीत के घाव तैरने लगें, हमेशा उनको करुणा का मरहम दीजिए। क्षमा की खुराक दीजिए। कुछ जख्म होते हैं, जिनको भुलाना आसान नहीं होता लेकिन इतना इंतजाम तो किया ही जा सकता है कि वह कम से कम नुकसान दें।

जीवन संवाद में हम निरंतर प्रेम, अहिंसा, क्षमा और करुणा की बात करते हैं। जीवन का प्राथमिक उद्देश्य मनुष्य बनना होना चाहिए। मनुष्यता के इतिहास के महानतम नायकों में सबसे शक्तिशाली संदेश यही है। लेकिन हम लालच को सफलता, स्वार्थ को प्रेम और महत्वाकांक्षा में लालच को इस तरह मिलाने में व्यस्त हुए कि जीवन के असली रंग से ही दूर हो गए।

हम वर्तमान में रहना भूलते जा रहे हैं। जीवन संवाद को हर दिन मिलने वाले संदेश, ईमेल और व्हाट्सएप को अगर एक छोटा सा आधार मान लिया जाए तो नब्बे प्रतिशत लोग इसलिए प्रसन्न नहीं होते। सब से दूर रहते हैं क्योंकि वह अपनी स्मृतियों से अंधेरा ही खींचते रहते हैं। जबकि कठिन से कठिन परिस्थिति में रहने वाले मनुष्य के जीवन में भी प्रेम का ऐसा एक भी कोमल पल न हो यह संभव नहीं। लेकिन हम उस एक पल को महत्वपूर्ण नहीं मानते।

हम उसे जरूरी ही नहीं मानते, जो शीतल हवा है। आत्मा का अमृत किसी गहरे सागर में नहीं है वह हमारे पास ही है लेकिन अवचेतन मन में इतने गहरे बैठ गया है कि बिना किसी गहरी पुकार, प्रेम की गहरी आकांक्षा के वह बाहर नहीं आ सकता।

आपसे एक छोटी सी कहानी कहता हूं। संभव है उससे मेरी बात लिख सरलता से स्पष्ट हो पाएगी।

एक दिन सक्सेना जी (इनका नाम ही सक्सेना जी है) अपने मित्र से मिलने उसके घर पहुंचे। वह फोन पर सक्सेना जी की दुख भरी बातें सुन सुनकर परेशान हो गए थे। उसने सक्सेना जी से कहा आइए, स्वागत है। बताइए क्या सेवा की जाए।

सक्सेना जी अपने ऑफिस के बड़े अधिकारी थे। लेकिन रहते हमेशा दुखी। उन्होंने कहा ऐसी कोई विशेष इच्छा नहीं। उनके मित्र बड़े सुलझे हुए थे।

उनने सक्सेना जी को थोड़ी देर में घर के व्यंजन परोसने शुरू कर दिए। सक्सेना जी के सामने जो थाली आई उसमें बासी रोटियां थीं। एकदम ठंडी दाल थी। सब्जी थी जो दाल से भी ठंडी थी। उसके बाद इसी तरह की और भी चीजें हैं जो बिना संदेह बासी थीं। गर्मी के दिन थे। आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि यह बचा हुआ खाना ही था जो सक्सेना जी को पेश किया गया! सक्सेना जी एकदम गुस्से से लाल हो गए। उन्होंने दोस्त से कहा यह क्या है मुझे बासी खाना पेश किया जा रहा है। मित्र ने उतनी ही सरलता से कहा नहीं देखिए चाय उबल रही है। वह एकदम ताजी है।

सक्सेना जी गुस्से में जरूरत थे लेकिन मित्र की सरल, सहज और बुद्धिमता पूर्ण जीवन शैली के कायल भी थे। इसलिए सोचने लगे कि इसका मतलब क्या है! मित्र ने अधिक परेशान न करते हुए अपने बच्चों से वह सभी बासी चीजें हटा लेने के लिए कहा। उसके बाद तुरंत लजीज? व्यंजन पेश किए गए! जिनकी सुगंध से घर महक उठा।

मित्र ने कहा, सक्सेना जी- मैंने आपसे कई बार निवेदन किया है बासी-बासी बातें न किया करो। जब देखो तब अतीत का दुख मन पर लादे रहते हो। जो बीत गया वह हमारे नियंत्रण से बाहर है! इसलिए उसकी चिंता में केवल हम घुल सकते हैं। लेकिन अतीत में टहलते रहने से कुछ हासिल नहीं होता। अतीत में हाथ-पांव मारने से भी कुछ नहीं मिलता। अतीत एक दलदल है, जैसे दलदल में जितनी ऊपर आने की कोशिश हम करते हैं उतना ही धंसते जाते हैं।

अतीत की तरह ही जो भविष्य होगा, उस पर भी हमारा बस नहीं। इसलिए हमें केवल वर्तमान के आनंद में रहने का अभ्यास करना चाहिए। मन में जब भी अतीत के घाव तैरने लगें, हमेशा उनको करुणा का मरहम दीजिए। क्षमा की खुराक दीजिए। कुछ जख्म होते हैं, जिनको भुलाना आसान नहीं होता लेकिन इतना इंतजाम तो किया ही जा सकता है कि वह कम से कम नुकसान दें। जीवन केे प्रति कृतज्ञता और आस्था के सिद्धांंत को अपना कर हम बहुत सारे ऐसेेे कष्टों से मुक्त हो सकते हैं, जो हमारे अपने ओढ़े हुए हैं। (hindi.news18.com)
-दयाशंकर मिश्र


01-Aug-2020 10:29 PM

हमारा दिमाग बहुत ही ताकतवर मशीन की तरह काम करता है। हम जैसे-जैसे उसे इनपुट देते हैं उसके आधार पर ही वह आउटपुट देता है। यहां भी चेतन और अवचेतन मन का संबंध महत्वपूर्ण हो जाता है।

कोरोना हम सबके जीवन को ऐसे मोड़ पर ले आया है, जहां पर सबके सामने तरह-तरह की चुनौतियां हैं। कुछ लोगों की दिशा ही बदल गई। बहुत से लोगों का काम हमेशा के लिए बदलने वाला है। बड़ी संख्या में लोगों को अपना काम बदलना पड़ेगा। इस बीच इस बदलाव के कारण मन पर जो दबाव पड़ रहा है, उसके कारण बड़ी संख्या में लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है।

जीवन संवाद के सजग पाठक महेश विश्वकर्मा ने जोधपुर से हमें लिखा है कि पिछले कुछ समय से वह ठीक से सो नहीं पा रहे हैं। उनको नींद नहीं आ रही। दिनभर की चिंताएं रात को मस्तिष्क पर सवार होकर मन में उतर आती हैं। मन में अधूरी चिंताएं हलचल पैदा करती हैं, दिमाग को विश्राम नहीं करने देतीं। यह तब है, जब महेश को अब तक किसी भी तरह का वित्तीय नुकसान नहीं उठाना पड़ा है। असल में वह भविष्य के प्रति बहुत अधिक आशंकित हैं। इसके साथ ही उन्होंने बहुत अधिक आशा बांध रखी है। देश, काल, परिस्थितियों को देखते हुए भी नहीं देखना हमारी बड़ी पुरानी समस्याओं में से एक है।

महेश दुनिया भर से आने वाली खबरों के कारण मानसिक रूप से परेशान हो रहे हैं। हमारा दिमाग बहुत ही ताकतवर मशीन की तरह काम करता है। हम जैसे-जैसे उसे इनपुट देते हैं उसके आधार पर ही वह आउटपुट देता है। यहां भी चेतन और अवचेतन मन का संबंध महत्वपूर्ण हो जाता है। हम अनेक बातों/चीज़ों को अवचेतन मन की ओर धकेलते जाते हैं। अनसुलझी बातें इक_ी होती जाती हैं। जैसे घर में कबाड़ जरूरी चीजें को संभाल कर रखने से शुरू होता है लेकिन धीरे-धीरे सभी बेकार की चीज़ें वहां जमा होती जाती है। अवचेतन मन भी ठीक इसी तरह से काम करता है। इसलिए हमें उसके प्रति सतर्क, जागरूक रहने की जरूरत है।

इसलिए, मन कैसे काम करता है। यह समझना जरूरी है। इससे हम उन रास्तों पर भटकने से बच जाएंगे, जिनका जीवन से कोई सरोकार नहीं होता। एक छोटी सी कहानी कहता हूं आपसे। इससे मेरी बात आप तक अधिक स्पष्टता से पहुंच पाएगी।

राजा के सबसे प्रभावशाली, बुद्धिमान मंत्री का पद रिक्त हुआ। राजा ने मंत्री से कहा- जाने से पहले वह इस पर किसी को नियुक्त करके जाए। प्रतियोगिता हुई, तरह-तरह की परीक्षाओं से अंत में दस उम्मीदवार बचे। अंतिम मुकाबला इन्हीं में से होना था। मंत्री ने सबको बुला कर कहा, एक सप्ताह का समय है। एक सप्ताह के बाद मुख्य परीक्षा होगी। हम देखना चाहते हैं कि आप में से कौन सबसे अधिक सजग दृष्टि रखता है। आप सबको एक बड़े कमरे में बंद किया जाएगा। दरवाजा भीतर से ही बंद होगा। वहां एक ताला लगा होगा। जो दरवाजा खोलकर बाहर आएगा, वही विजेता होगा।

सारे उम्मीदवार इस सूचना के बाद नगर के बाजारों में टहलने निकल गए। ऐसी किताब खोजने में जुट गए, जिनमें तालों के बारे में जानकारी हो। कुछ तो ताला बाजार में जाकर चाबियां भी इक_ी कर लाए। चोरी छुपे चाबियों को अपने कपड़ों में छुपा कर कमरे में परीक्षा के लिए पहुंचे। एक रात पहले सबको उस कमरे में बंद कर दिया गया। जिस दिन उस से निकल कर सीधे राजा के दरबार में पहुंचने का रास्ता खुल जाना था!

रात भर कोई नहीं सोया। केवल एक उम्मीदवार को छोडक़र जो न तो किताब खोजने गया और न ही ताले की चाबी। वह पूरी मौज में विश्राम में रहा। रात भर पूरी शांति से सोया। उसके अलावा बाकी नौ, सारी रात जागते रहे। सोचते रहे कि किस तरह दरवाजा खोला जा सकता है। अगले दिन रात भर के जागे और चिंता में डूबे उम्मीदवार तालाा खोलने में जुट गए। वह जो रात भर सोया था, गहरी शांति में था। उसक भीतर जरा भी बेचैनी नहीं थी। बाकी नौ जल्दबाजी में थे। सबने जाकर कोशिशें शुरू कर दीं। उस विशाल कमरे में कुछ ऊंचाई पर एक खिडक़ी थी। जहां वह बूढ़ा मंत्री शांति से बैठ कर सारे दृश्य देख रहा था।

जब सारे उम्मीदवार अपनी कोशिश में हार गए तो वह युवक शांति से उठा। उसने रात को ही गहराई से कमरे और दरवाजे को समझा था। वह शांति से दरवाजे के पास पहुंचा, और दरवाजे की सिटकनी खोलकर बाहर निकल आया।

बुजुर्ग मंत्री प्रसन्नता से झूमते हुए उसका स्वागत करने दरवाजे की ओर बढ़ गए। असल में ताला तो था लेकिन बाहर निकलने के लिए ताला खोलने की जरूरत नहीं थी। ताले को इस तरह लगाया गया था कि उसे बिना खोले ही बाहर जाना संभव था। लेकिन उसके अतिरिक्त सभी उम्मीदवार अपना सारा ध्यान, ज्ञान और चेतना ताले पर ही केंद्रित किए रहे इसलिए उन्हें ख्याल ही नहीं रहा इसके बिना भी दरवाजा खोला जा सकता है। (hindi.news18.com)
-दयाशंकर मिश्र


31-Jul-2020 10:49 PM

स्वतंत्रता, जितनी बाहरी जरूरत है उससे कहीं अधिक यह हमारी आंतरिक विचार प्रणाली से जुड़ी हुई है। अपने निर्णय को निष्ठा के कर्ज से दूर रख कर ही हम उस स्वतंत्रता की ओर बढ़ सकते हैं जिसकी हम अक्सर बातें करते हैं।

महाभारत की सबसे बड़ी शिक्षा में से एक है, निष्ठा के प्रति सतर्कता। महाभारत की पूरी कहानी में निष्ठा एक ऐसा किरदार है, जिसके आसपास पूरी कथा रची गई है। निष्ठा पर विचार करते समय इसमें से मनुष्यता, नैतिकता और न्याय का दृष्टिकोण भुला देने के कारण ही वह भीषण संघर्ष हुआ जिसकी कहानी महाभारत है। दुर्योधन के प्रति कर्ण की निष्ठा में इन तीनों गुणों की कमी है। उसकी निष्ठा की आंखें केवल और केवल दुर्योधन को देख पाती हैं। क्योंकि उनकी आंखों पर दुर्योधन के कर्ज की पट्टी बंधी है!

आज ‘जीवन संवाद’ में महाभारत की चर्चा इसलिए क्योंकि हमें बड़ी संख्या में पाठकों ने लिखा है कि वह कई बार ना चाहते हुए भी माता-पिता और परिवार के दबाव में, उनके प्रति निष्ठावान होने के कारण अपने निर्णय नहीं करते। परिवार में कुछ भी गलत होते हुए देखने के बाद भी उसके विरुद्ध खड़े नहीं होते। क्योंकि वह सम्मान और निष्ठा की डोर से बंधे होते हैं।

कर्ण का जीवन दुखमय है। उसमें दुख, उपेक्षा और प्रतिभाशाली होते हुए भी अधिकारों के प्रति वंचित किए जाने की पीड़ा है। ऐसी पीड़ा के बीच दुर्योधन जैसे सहारे के प्रति निष्ठावान होना स्वाभाविक तो हो सकता है लेकिन न्याय संगत नहीं। इससे मनुष्यता के इतिहास में कर्ण की भूमिका उसके सभी गुणों के बावजूद धूमिल होती जाती है। जबकि कर्ण जैसा दानवीर पूरी कथा में दूसरा नहीं है। निष्ठा के दूसरे उदाहरण स्वयं भीष्म पितामह जो धर्म के ज्ञाता, महावीर और हर प्रकार के संकट का सामना करने में सक्षम हैं। लेकिन वह भी कर्ण की तरह केवल सिंहासन के प्रति निष्ठावान हैं।
इसीलिए भीष्म पितामह और कर्ण का जीवन उस यश को प्राप्त नहीं होता जो उनसे बहुत कम प्रतिभाशाली और सक्षम दूसरे किरदारों को मिला। निष्ठा अक्सर ही हमसे उस समय मौन रहने को कहती है जब समाज को हमारी आवाज़ की जरूरत है। इसीलिए अक्सर विद्रोही, पढ़े लिखे और चैतन्य विचार के लोग राजनीति में सफल नहीं हो पाते। क्योंकि राजनीति उस तरह की निष्ठा की मांग करती है जिसकी पूर्ति बहुत हद तक भीष्म, द्रोण और कर्ण करते हैं। यहां विदुर का उल्लेख भी जरूरी है, जो इन सब के बीच धृतराष्ट्र की नौकरी करते हुए भी सत्य के पक्ष में सजगता से खड़े हैं। उनके बिना तो पांडवों की यात्रा आगे जाती नहीं दिखती।

इन सब किरदारों पर विस्तार से बातचीत हम जीवन संवाद के अगले अंकों में करेंगे, आज की बातचीत को हम कर्ण पर ही केंद्रित रखते हैं। कर्ण से हम क्या सीख सकते हैं! 'जीवन संवाद' के लॉकडाउन के दौरान एक व्याख्यान में यह प्रश्न पूछा गया। इस प्रश्न में शामिल था कि दोस्ती कर्ण जैसी होनी चाहिए!


कर्ण से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। लेकिन दोस्ती और निष्ठा के विवेक में अंतर करना जरूरी है। कर्ण से हम सीख सकते हैं, लोगों के तानों और 'लोग क्या कहेंगे' के बीच प्रतिभा को निखारते रहना। द्रोण जैसे गुरु से अपने अंगूठे की रक्षा करना। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है, जो गलती की उसे नहीं दोहराना। किसी के प्रति निष्ठावान होते हुए भी अपने विवेक की ओर से आंखें नहीं मूंदना।

हमें इस बात को याद रखना ही होगा कि विवेक हमारा ही है। कर्ण दुर्योधन के राज्य से बाहर जाकर, उसका राज्य लौटा कर एक सामान्य जीवन जीने का विकल्प चुन सकते थे, यदि उन्हें सत्य के प्रति राज्य से अधिक अनुराग होता। कर्ण ने द्रौपदी वस्त्र हरण के समय जिस तरह का व्यवहार किया वह यह बताता है कि अपने मित्रों के प्रति सतर्क न रहने और निष्ठा की पट्टी आंखों पर बनी रहने के कारण हमारा दिमाग, चेतना कब अन्याय की ओर झुक जाए। इसका कोई ठिकाना नहीं।

व्यक्तिगत असहमतियों को हम अन्याय में नहीं बदल सकते। कर्ण के व्यक्तित्व का प्रकाश उस दिन निष्ठा की पट्टी ने धूमिल कर दिया जब उसने दुर्योधन की प्रसन्नता के लिए अपने मनुष्यता के दायित्व को भुला दिया।

हमें इस बात को स्पष्टता से समझना है कि किसी की मेहरबानियों का कजऱ् उतारते समय यह अवश्य ध्यान रखा जाए कि निष्ठा का अर्थ अपने विवेक और मनुष्यता के प्रति सतर्क विचारों से दूरी नहीं है। हम अक्सर निर्णय लेने के समय ऐसे ही विचारों से लगे रहते हैं। स्वतंत्रता, जितनी बाहरी जरूरत है उससे कहीं अधिक यह हमारी आंतरिक विचार प्रणाली से जुड़ी हुई है। अपने निर्णय को निष्ठा के कर्ज से दूर रख कर ही हम उस स्वतंत्रता की ओर बढ़ सकते हैं जिसकी हम अक्सर बातें करते हैं।

अपने जीवन को हम जितना अधिक स्वतंत्र बना पाएंगे, उसमें आनंद की सुगंध उतनी ही व्यापक होगी। इसलिए अपने विचार और मन को उधार के विचारों से जितना संभव हो दूर रखें। निष्ठा का अर्थ अपने विवेक और मनुष्यता के प्रति सतर्क विचारों से दूरी नहीं है! (hindi.news18.com)
-दयाशंकर मिश्र


30-Jul-2020 12:49 PM

इस समय हर कोई बहुत जल्दी में है, यह बात और है कि कोई कहीं पहुंचता दिखाई नहीं देता। अक्सर पहुंचकर भी रास्ते में ही रहते हैं!


बच्चों के लिए माता-पिता का आशावाद, चिंता नई चीज नहीं है। यह हमेशा से थी। हां, पहले यह बहुत हद तक ‘समय’ से आकार लेती थी। अब यह चिंता बच्चे की शिक्षा आरंभ होते ही तनाव में बदल जाती है। ‘डियर जिंदगी’ को बड़ी संख्या में अभिभावकों के सवाल मिल रहे हैं।

परीक्षा के कठिन मौसम में बच्चों से कहीं अधिक तनाव में अभिभावक रहते हैं। इस समय इंटरनेट पर दस साल का बच्चा एलेक्स छाया हुआ है। एलेक्स खुद को ‘ओशियानिया एक्सप्रेस’ का संस्थापक और सीईओ कहता है। एलेक्स ने ऑस्ट्रेलियन एयरलाइंस ‘क्वांटस’ के सीईओ एलन जोएस को चि_ी लिखकर अपनी एयरलाइंस खोलने के लिए मदद करने की गुजारिश की है। बच्चे ने लिखा, ‘प्लीज, मुझे सीरियसली लें, मैं एक एयरलाइंस शुरू करना चाहता हूं।’ एलन ने चि_ी का जवाब देने के साथ ही उन्हें मिलने के लिए भी बुलाया है।

यहां चि_ी के जिक्र का अर्थ केवल इतना है कि दुनिया के दूसरे समाजों में बच्चों को किस तरह लिया जाता है। बच्चे की चि_ी को एक सीईओ कितनी गंभीरता से ले रहा है, उसे संवाद का मौका दिया जा रहा है और उसे जितना संभव हो प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके उलट हमारे यहां माता-पिता केजी वन से लेकर पहली दूसरी में ही बच्चे के स्कूल में प्रदर्शन से दुखी हुए जा रहे हैं। हम अपने बच्चे को एक ऐसे ‘तुलना घर’ में धकेले जा रहे हैं जहां हर समय उसे परीक्षा से गुजरना है। बच्चे की रुचि, उसकी प्रतिभा के दायरे तलाशने की जगह हम पहले से चुनी, तय की हुई चीजें उसके ऊपर थोप रहे हैं।

हम बच्चे को ऐसे ‘दीवार’ की ओर धकेल रहे हैं जहां कोई खिडक़ी नहीं है जहां कोई रोशनदान नहीं, बस गहरा अंधेरा है। अब यह केवल संयोग की बात हो सकती है कि उसके धक्के से या तो दीवार में सुराग हो जाए या किसी वजह से कोई हाथ बढ़ाकर उसे दीवार के उस पार ले जाए। हम बच्चों पर अपने और अपने समय के वह सभी ग्लैमरस सपने थोप रहे हैं जिनसे उनके ‘कुछ हो जाने’ की आस है।

हमारे एक मित्र हैं जो किसी जमाने में गायक बनना चाहते थे, नहीं बन पाए तो आप अपने 15 बरस के बेटे में अपना सपना जीने की कोशिश कर रहे हैं। बच्चे की आवाज निसंदेह अच्छी है, लेकिन वह तो कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहता है। अमेरिका जाकर पढऩा चाहता है और भारत के लिए सुपर कंप्यूटर से बहुत आगे की कोई चीज तैयार करना चाहता है। वह अपने सपने को जीना चाहता है, मित्र बेटे के बहाने ‘अपने’ सपने को पूरा करना चाहते हैं। यह सपनों का टकराव नहीं, सपने का अतिक्रमण है।

अब जरा एलेक्स के सपने और इस बच्चे के सपने को सामने रखकर देखिए। एलेक्स के सपने को एक अनजान सीईओ का सहारा मिलता है। दूसरी ओर हमारे यहां एक पिता अपने सपने के लालच को संभाल नहीं पा रहा। बच्चे में उसके खुद के स्वतंत्र सपने को पूरा करने की हिम्मत कैसे भरेगा।

हमें बहुत गंभीरता से एक समाज के रूप में यह समझने की जरूरत है कि हम अपने बच्चों को कितनी स्वतंत्रता दे रहे हैं और कितनी देने की जरूरत है। बच्चों को महंगे स्कूल, महंगी जि़द, कपड़े और गैजेट की जगह अगर किसी चीज़ की सबसे ज्यादा जरूरत है तो ‘उनके’ सपनों की तलाश में मददगार बनने की। उनके भीतर की प्रतिभा को बिना किसी मिलावट के जानने और समझने की। बच्चों पर दांव लगाने की और उनके सपनों में साझेदार होने की। इससे हम बहुत हद तक उनके भीतर बढ़ रहे तनाव, गहरी निराशा और आत्महत्या जैसे खतरे को कम कर सकते हैं। (hindi.news18.com)
-दयाशंकर मिश्र


28-Jul-2020 7:55 PM

दूसरे को पराजित करने का भाव मनुष्य के मन को 'बदलापुर' बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. जैसे ही इस बदलापुर की जगह करुणा को मिल जाती है हमारा मन दूसरों के प्रति कोमल होने लगता है.

हमारे मन में दूसरों के लिए जब कभी क्षमा का भाव आने लगता है तो उसे रोकने का काम कठोरता करती है. इस कठोरता को हम करुणा की कमी भी कर सकते हैं! इसलिए बहुत जरूरी है कि हम इस बात की ओर निरंतर ध्यान देते रहें कि मन में करुणा की मात्रा कहीं कम तो नहीं पड़ रही.

करुणा, जीवन में उस समय कम नहीं पड़ती दिखती जब हमें एहसास हो जाएगी सामने वाले के पास बहुत थोड़ा समय है. थोड़ा संवेदनशील होकर सोचिए. हम सबके जीवन इतने अधिक अनिश्चित और छोटे हैं कि उस में कठोरता की जगह बहुत कम होनी चाहिए. अगर हम करुणा के कोमल भाव को अपने हृदय में स्थान दे पाते तो संभव है कि समाज की दिशा कुछ और होती. मनुष्यता गहरा विचार है, हमने इसे समझने और जीवन में उतारने की जगह केवल रट लिया है.

ठीक उसी तरह जैसे 'पंचतंत्र ' की एक कहानी में साधु तोतों के समूह को शिकारियों से बचाने के लिए उन्हें सिखाता है, 'शिकारी आता है, जाल फैलाता है, लेकिन हमें जाल में नहीं फंसना है.' तोते जब यह दोहराने लगते हैं, तो साधु को भ्रम हो जाता है कि तोतों ने समझ लिया है कि अब वह शिकारी के जाल में नहीं फंसेंगे. वह उनकी शिक्षा को पर्याप्त समझ कर आगे बढ़ जाता है. लेकिन कुछ ही दिन बाद देखता है कि शिकारी अपना जाल समेट कर जा रहा है. उसमें फंसे तोते रटा हुआ पाठ दोहरा रहे हैं, शिकारी आता है ,जाल फैलाता है लेकिन हमें जाल में नहीं फंसना है!

हमारी स्थिति तोतों से बहुत अलग नहीं. जब बच्चा छोटा होता है तो हम सारी अच्छी बातें उसे सिखाने, समझाने की जगह रटाने में ऊर्जा खर्च करते हैं. नैतिक शिक्षा का जीवन में उपयोग करने की जगह जब से हम उसे रटने लगे, मनुष्यता, उसके साथी संकट की ओर बढ़ने लगे.

मनुष्यता का कटोरा इसलिए हर दिन रिक्त होता जा रहा है क्योंकि उसमें करुणा की कमी होती जा रही है. मन से करुणा का मिटना मनुष्यता का संकुचन है. तोते इसलिए संकट में नहीं पड़े क्योंकि उनके पास शिक्षा नहीं थी. शिक्षा तो थी उनके पास, लेकिन उन्होंने उसे जीवन की जगह पाठ/रटने में खोजा. हम भी यही गलती कर रहे हैं. हमने साक्षरता को ही शिक्षा मान लिया है.

किसी भी आदमी के पढ़े-लिखे होने का अंदाजा उसकी डिग्री देखकर नहीं लगाया जा सकता. साक्षरता अलग बात है और शिक्षा की रोशनी दूसरी बात. मेरे जीवन में दो महिलाएं ऐसी रहीं जिनकी साक्षरता का प्रतिशत शून्य है. मेरी दादी और मां. लेकिन मैं विश्वास पूर्वक कहता हूं कि दोनों ही शिक्षित हैं. शिक्षा और साक्षरता इतनी अलग-अलग बात है.

साक्षरता उस गली का नाम है जिस से गुजर कर आप शिक्षा की ओर थोड़ी आसानी से जा सकते हैं. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी के शिक्षित होने के लिए साक्षरता अनिवार्य है.

अब बात माफी और करुणा की. अगर हमारी दृष्टि में थोड़ी करुणा की मात्रा बढ़ जाए तो जीवन में तनाव, दुर्भावना और ईर्ष्या का बहुत सारा कचरा स्वयं ही मन से साफ हो जाता है. जैसे ही हमें पता चलता है इस व्यक्ति का जीवन अब सीमित है हमारे मन में उसके लिए करुणा आ जाती है. उसके दोष के प्रति हम विनम्र हो जाते हैं. हम सब का जीवन एक जैसा ही अनिश्चित और छोटा है.

निश्चित तो केवल मृत्यु है. लेकिन इस बात की तो हमने केवल रटा है. समझा नहीं है. अगर समझ गए होते तो हमारे भीतर करुणा अधिक होती. दया, प्रेम और ममता अधिक होती. लेकिन हम संसार में सबसे अधिक निश्चित मृत्यु को ही हमेशा अपने से दूर मानते हैं. इतने दूर कि उसके बारे में कभी विचार तक नहीं करते.

इस पर विचार/चिंतन न करने के कारण दूसरों के प्रति बदला मन में तैरता रहता है. दूसरे को नीचा दिखाने की भावना. दूसरे को पराजित करने का भाव मनुष्य के मन को 'बदलापुर' बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. जैसे ही इस बदलापुर की जगह करुणा को मिल जाती है हमारा मन दूसरों के प्रति कोमल होने लगता है.

जैसे ही मन कोमल होता है, उसमें प्रेम उतरने लगता है. जिसके जीवन में प्रेम के फूल खिल जाते हैं उसके सारे संकट स्वयं हल हो जाते हैं. हमें अपने भीतर प्रेम को बढ़ाना है. करुणा को गहराई देनी है!

-दयाशंकर मिश्र


27-Jul-2020 8:55 PM

हमें इस बात को समझना होगा कि हम चाहते क्या हैं. जीवन में सपनों के पीछे दौड़ना और उन चीजों को हासिल करना जिन्हें हम कामयाबी कहते हैं, समझते हैं. इसमें कुछ भी खराबी नहीं है. तब तक जब तक हम उसे खुद से भी कीमती न समझने लगें.

हम जितने अधिक अकेले होते जा रहे हैं, हमारा मन उससे कहीं अधिक सुगंध, महक, उदारता और प्रेम से दूर होता जा रहा है. बोगनवेलिया सरीखा. दूर से देखने पर झाड़ी में इस पौधे की सुंदरता मन को मोहित करती है लेकिन पास जाते हैं, हमें समझ में आता है कि असल में इसमें पास आने जैसा कुछ नहीं. बोगनवेलिया, सजावटी फूल है. दूर से देखने पर ही इसका सुख है. इसमें वह सुगंध नहीं, जो मन को महका सके. यह आंखों के लिए तो फिर भी ठीक है, लेकिन जो प्रेम की आशा में इसके पास जाएंगे वह अनमने होकर ही लौटेंगे.

हम प्रेम से धीरे-धीरे इतने दूर होते जा रहे हैं कि हमारा मन बहुत तेजी से बोगनवेलिया की तरह होता जा रहा है. बाहर से दिखने में तो बहुत आकर्षण है, बहुत सजावट है. लेकिन भीतर रोशनी की कमी है. प्रेम की हवा नहीं है. स्नेह की उदारता नहीं. अगर कुछ बचता है तो केवल एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा. किसी भी कीमत पर आगे निकलने की होड़. अपनी सुगंध, स्वभाव से दूर जाकर हम बहुत अधिक हासिल नहीं कर सकते. क्योंकि इसकी कीमत चुका कर जो भी हमें मिलेगा उससे जीवन में उजाला नहीं आएगा.

चंद्रमा का उजाला उधार का उजाला होता है. बहुत अच्छी बात है कि चंद्रमा इस बात को जानता है. इसलिए वह शीतल है. लेकिन मनुष्य दूसरों के उजाले को अपना प्रकाश मानने की जिद किए बैठा है!

जीवन में अधिकांश लोग मन की सुगंध को बोगनवेलिया होने की चाहत में खोते जा रहे हैं. खुद से दूर निकलते जा रहे हैं. लॉकडाउन में मनुष्य के स्वभाव की इतनी विचित्र परतें सामने आ रही हैं, जिसका स्वयं हमें भी अंदाजा नहीं था. इतनी जल्दी लोग टूट रहे हैं जैसे उनके मन कांच के बने हुए. संघर्ष की धूप जरा सी उन पर पड़ी नहीं कि चटक जाते हैं. इस चटकने को हम ऐसे दिखाते हैं, मानो यह कोई बाहरी समस्या है.

हमारे अधिकांश प्रश्न बिल्कुल भीतरी होते हैं. एकदम अंदरूनी. लेकिन हम उन्हें बाहर-बाहर ही खोजते रहते हैं. तलाशते रहते हैं. अपने रिश्तों में प्रेम की कमी, जीवन में उल्लास, आनंद, उदारता और स्नेह की कमी भीतर से उपजी है. इसलिए उपजी, क्योंकि प्रेम, अहिंसा, क्षमा और करुणा से दूर होते जा रहे हैं. जंगल के बाहर खड़े होकर जंगल को महसूस नहीं किया जा सकता. उसके लिए तो जंगल के भीतर उतरना ही होगा. हमारा मन जो इतना बेचैन, उदास, परेशान दिख रहा है. उसके कारण बाहरी नहीं हैं. नितांत अंदरूनी हैं.

हमें इस बात को समझना होगा कि हम चाहते क्या हैं. जीवन में सपनों के पीछे दौड़ना और उन चीजों को हासिल करना जिन्हें हम कामयाबी कहते हैं, समझते हैं. इसमें कुछ भी खराबी नहीं है. तब तक जब तक हम उसे खुद से भी कीमती न समझने लगें. हमें इस बात को अपने भीतर उतारने की जरूरत है कि जिंदगी सबसे जरूरी है. जिंदगी का कोई विकल्प नहीं. वह अविकल्पनीय है.

हम जैसे ही जिंदगी का विकल्प ढूंढने लगते हैं, खुद को कमजोर करने लगते हैं. ‌ कुछ समय पहले अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने जो रास्ता अपनाया, वह जिंदगी के विकल्प खोजना है. सांसों की डोर टूटती के बाद कोई उजाला नहीं है. बस एक अंधेरा है. मुक्ति नहीं है, मुक्ति का भ्रम है. आत्महत्या मनुष्यता का की हत्या है. मानवता का वध है. इस विचार को खुद भी समझिए और दूसरों को भी इसके प्रति सजग करिए.

आत्महत्या को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता. जिन दुखों को हम इतना बड़ा मान बैठे हैं कि जीवन दांव पर लगाने को तैयार हैं. वह दुख नहीं, हमारी चेतना के अंधेरे हैं. प्रेम और क्षमा मनुष्यता के इतिहास की सबसे खूबसूरत मीनारें हैं. हम इनसे दूर चले गए, इसका अर्थ यह नहीं कि इनका अस्तित्व नहीं!

चलिए, अपने पास चलते हैं. खुद से प्रेम करते हैं. खुद को क्षमा करते हैं. खुद को प्यार करते हैं. बिना स्वयं को इनसे परिचित कराए इसे दूसरों के साथ कैसे किया जा सकता है. अपने जीवन को ही सबसे बड़ी प्रार्थना समझिए. जीवन में हर चीज़ को दोबारा हासिल करना संभव है, बस जीवन ही ऐसा है जिसे खोकर प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसलिए अपने मन को प्रेम के निकट ले जाइए. उसे रेगिस्तान बनने से बचाइए. बोगनवेलिया बनने से बचाइए.
-दयाशंकर मिश्र


24-Jul-2020 8:29 PM

जीवन का सुख एक-दूसरे के साथ संबंध में संतुलन से है। कुछ उसी तरह जैसे हम कोई वाहन चलाते हैं। कार चलाते समय केवल ब्रेक पर पांव रखने से कार आगे नहीं बढ़ेगी। उसी तरह केवल एक्सीलेटर पर सारा जोर देने से कार पर नियंत्रण नहीं रहेगा।

कोरोना ने सेहत पर जितना संकट उत्पन्न किया है, उतना ही इसके कारण घर-परिवार में तनाव गहराया है। कोरोना दृश्य और अदृश्य दोनों रूप में बराबरी से कष्ट दे रहा है। हमें इससे पहले लंबे समय से इस तरह एक साथ, बंद कमरों में रहने का अभ्यास नहीं था। इसलिए, लॉकडाउन के बीच पारिवारिक तनाव, तकरार बढ़ती जा रही है। घर-परिवार में एकदम मामूली चीजों को लेकर तनाव बढ़ रहा है।

पति-पत्नी के बीच होने वाला सामान्य विवाद कलह की सीमा तक बढ़ रहा है। छोटी-छोटी बात पर झगड़े इतने अधिक हो रहे हैं कि साथ रहने की मिन्नतें करने वाले हम सब अब थोड़ी दूरी की प्रार्थना कर रहे हैं। ‘जीवन संवाद’ को इस बारे में बहुत से संदेश मिले हैं। हम बहुत अधिक सुनाने में यकीन रखते हुए ‘सुनने’ से दूर जा रहे हैं। हमारे बहुत से संकट केवल इस बात से बड़े होते जाते हैं कि हम सुनने को एकदम तैयार नहीं होते। हमें एक दूसरे के साथ रहते हुए एक-दूसरे का वैसा ही ख्याल रखना होगा जैसा हम दूर रहने वाले का करते हैं!

अति हर चीज की खराब है। भले ही वह साथ रहने की क्यों न हो। हम अक्सर दूरी का महत्व कम करके देखने लगते हैं। कोरोना ने हमें समझाया कि मनुष्य के लिए रिश्ता और उनके बीच सही तालमेल की कितनी जरूरत है। यह कुछ उसी तरह है, जैसे लॉकडाउन के दौरान हमारा प्रकृति के मामलों में हस्तक्षेप बंद हुआ तो पर्यावरण निखर गया। नदियां, फूल पत्ते, सब में हमने जो अति मिला दी थी। कोरोना ने उसमें अति हटाकर संतुलन कर दिया।


रिश्तों में भी कुछ इसी तरह के संतुलन की जरूरत है। खासकर उन दंपतियों के बीच जिनमें से कोई एक या दोनों कामकाजी हैं। ऑफिस के काम के साथ घर के काम को लेकर वहां तनाव नियमित होता जा रहा है।

दंपतियों के बीच तनाव को लेकर आज आपसे एक छोटी सी कहानी कहता हूं। संभव है, इससे आप मेरी बात सरलता से समझ जाएंगे। एक जेन साधक के पास उनके शिष्य ने अपनी परेशानी रखी। उनका कहना था कि उनकी पत्नी अत्यंत कठोर अनुशासन वाली है। उनके नियम कायदे अत्यधिक सख्त हैं। उसके थोड़ी देर बाद उनकी एक शिष्या ने ऐसी ही कुछ बात अपने पति के बारे में कही। साधक ने दोनों को बुलाया। अगले दिन दोनों को कहा गया कि वे अपनी पत्नी, पति के साथ आएं।

चारों लोगों से बात करते हुए साधक ने अपनी मुट्ठी बंद करते हुए कहा, अगर हाथ हमेशा के लिए ऐसा हो जाए तो आप लोग क्या कहेंगे। सब ने उत्तर दिया, यही कहेंगे कि हाथ खराब हो गया है। मुट्ठी नहीं खुल रही, तो अवश्य ही गंभीर संकट है। उसके बाद साधक ने अपने दोनों हाथ खोलकर फैला दिए। जेन साधक ने कहा, अगर हमेशा के लिए हाथ ऐसा ही हो जाए उंगलियां मुड़ें ही न तो कैसा होगा! इस पर भी चारों का यही उत्तर हुआ तब भी हाथ खराब ही कहा जाएगा।

साधक ने आनंदित होते हुए उंगलियों को खोलते-बंद करते, हवा में लहराते हुए कहा आपको याद रखना होगा, दांपत्य जीवन के सुख, आनंद का रहस्य इसमें ही है। साथ रहते हुए एक दूसरे के लिए बंधन के साथ सहज सम्मान, आज़ादी का इंतजाम करना ही होगा। इसके बिना बात नहीं बनेगी।

जीवन का सुख एक-दूसरे के साथ संबंध में संतुलन से है। कुछ उसी तरह जैसे हम कोई वाहन चलाते हैं। कार चलाते समय केवल ब्रेक पर पांव रखने से कार आगे नहीं बढ़ेगी। उसी तरह केवल एक्सीलेटर पर सारा जोर देने से कार पर नियंत्रण नहीं रहेगा। ब्रेक और एक्सीलेटर दोनों के संतुलन से ही वाहन का गतिमान और सुरक्षित होना संभव है। ठीक इसी तरह हमारा जीवन है। यह केवल रोकने से नहीं चलेगा। उसी तरह गति से भी नहीं चलेगा। यह संतुलन के सौंदर्य से ही सुगंधित होता है।
-दयाशंकर मिश्र


23-Jul-2020 9:43 PM

हमें प्यार और स्नेह की जरूरत सबसे अधिक कब होती है। उस वक्त जब हम सुख और आनंद की तरफ बढ़ रहे होते हैं, उस समय जब हम अपने मुश्किल दौर से गुजर रहे हों। इसका उत्तर बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन हम मनुष्यता और संवेदनशीलता से दूर होते जाने के कारण मन की बहुत सामान्य जरूरत से दूर होते जा रहे हैं। इसका सबसे सरल उदाहरण हम इस समय देख रहे हैं कि सडक़ पर हो रही/ हो चुकी दुर्घटना, हिंसा में जीवन के लिए संघर्ष कर रहे लोगों की मदद में हमारी दिलचस्पी हर दिन घटती जा रही है।

हम वीडियो बनाने में इतने अधिक व्यस्त हैं कि इसे ही हम अपनी जिम्मेदारी समझ बैठे हैं। भारतीय समाज वायरल वीडियो का सबसे बड़ा उपभोक्ता तो बन गया है लेकिन मदद करने के मामले में हमारा मन कमजोर हो रहा है। मदद के लिए जब तक हम आगे नहीं आएंगे, हमारी मदद के लिए भी कोई नहीं आएगा। इस सहज सिद्धांत से मन कहीं दूर चला गया है। हमें मन को एक बार फिर कोमल, उदार और संवेदनशील बनाने की दिशा में आगे बढऩा है!

हमें बचपन में सुनाई जाने वाली कहानियों में एक बड़ी सुंदर कहानी मदद के बारे में है। एक घने जंगल में बहुत सुंदर और ताकतवर शेर रहा करता था। उस की दहाड़ इतनी दूर तक जाती थी कि उसके आसपास कई मील तक सन्नाटा पसरा रहता। उसे दूसरे ही शेरों की तरह नींद बहुत प्रिय थी। जब वह सोता तो किसी की हिम्मत न होती कि उसके आसपास फटके। पेड़ों पर रहने वाले बंदर तक इस बात का ध्यान रखते थे। उसके सेवक लोमड़ी, लकड़बग्घा भी हर प्रकार से कोशिश करते कि उसकी नींद में कोई परेशानी पैदा न हो!

जंगल का राजा शेर एक दोपहरी शिकार के बाद नींद के आनंद में था। उसी समय उसकी गुफा में कहीं से चूहा आ गया। संभव है चूहा अपने किसी रिश्तेदार के यहां घूमने-फिरने आया हो। क्योंकि उसकी गुफा के आसपास रहने वाले चूहे तो शेर की आदत से अच्छी तरह परिचित थे। चूहा अपनी मौज में इस तरह डूबा कि शेर की पीठ पर उछल कूद कर बैठा। शेर की नींद खुल गई। उसकी अलसाई आंखों में गहरा गुस्सा उतर आया। उसने एक ही झटके में अपने पंजे से चूहे को दबोच लिया। तुम्हारी ऐसी हिम्मत। शेर ने दहाड़ते हुए कहा। चूहे को अपनी गलती का एहसास हो चुका था। वह बुद्धिमान चूहा था। उसने संकट के समय भी धैर्य नहीं खोया। तुरंत शेर से अभयदान की मांग करते हुए अपनी जान बख्शने की गुजारिश करने लगा। इस दौरान इसने एक ऐसी बात कही जो अब तक शेर से किसी ने न कही थी।

चूहे ने कहा, आप हमारे राजा हैं। राजा को चूहे का वध शोभा नहीं देता। मेरी जान बख्श दीजिए, संभव है मैं किसी दिन आपके काम आऊं! उसका जवाब सुनकर शेर को हंसी आ गई। हंसने से उसका गुस्सा दूर हो गया। उसने कहा, तुम मेरे किस काम आओगे। लेकिन मैं तुम्हारी सोच से प्रभावित हुआ। जाओ, लेकिन ध्यान रहे ऐसी गलती दोबारा न हो। चूहा अपने ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ, वहां से भागा।

समय बीता। कुछ दिन बाद जंगल में एक शिकारी आया। उसने कई दिन की जांच पड़ताल के बाद यह पाया कि शेर को पकडऩे का सबसे अच्छा वक्त दोपहर का है। जब वह गहरी नींद में होता है। उसने एक दोपहर बहुत ही कुशलता से शेर को जाल में फंसा लिया। दोपहर का वक्त था वह काफी मेहनत करके थक गया था। जैसे ही उसने देखा कि शेर फंस चुका है। वह अपने साथियों के साथ थोड़ी देर विश्राम के लिए चला गया। इसी बीच उस चूहे को यह खबर मिल गई। उसे अपना वायदा याद आया।

वह तुरंत शेर के पास हाजिर हो गया। अपने कुछ साथियों को भी ले गया। शेर ने उसे देखते ही पूछा तुम यहां क्या कर रहे हो। चूहे ने कहा अगर आपकी अनुमति हो तो मैं तुरंत जाल काटने के काम में लग जाऊं। शेर ने कहा इतना आसान नहीं है फिर भी तुम कोशिश करके देख लो। चूहे ने अपने पूरे परिवार को इस काम में लगा दिया।

थोड़ी ही देर में चूहों ने अपने और साथियों को इस काम में शामिल कर लिया। उसके कुछ देर बाद जंगल का राजा आजाद हो चुका था। इस बार उसकी दहाड़ कुछ ऐसी थी कि शिकारी और उसके साथी चुपचाप जंगल से भाग गए। शेर ने चूहे और उसके साथियों का धन्यवाद किया!

मुझे यह कहानी इसलिए भी याद आती रहती है क्योंकि हमारी जिंदगी भी कुछ इसी तरह है। कौन कब कहां आपकी मदद करने के काम आ सके, इसका कोई भरोसा नहीं। जिंदगी इस बात से तय नहीं होती कि हम ‘शेर’ के साथ कैसे पेश आते हैं। जिंदगी की दिशा और दशा इस बात से तय होती है कि हम उन लोगों के साथ कैसे पेश आते हैं जो हमारी नजर में ‘छोटे’ होते हैं। कहानी की भाषा में कहें तो ‘चूहे’ होते हैं।

इसलिए मदद को स्वभाव बनाइए। मदद कभी बेकार नहीं जाती, वह आपको अधिक प्रसन्नता आनंद और सुख देगी। हमको तो बस इस कहानी के शेर जैसा सहनशील, क्षमाशील होना है। बाकी जिंदगी खुद समझ लेती है! (hindi.news18.com)
-दयाशंकर मिश्र


22-Jul-2020 4:32 PM

बहुत सारी चीजें हमारे स्वभाव का अनचाहे ही हिस्सा बन जाती हैं। धीरे-धीरे वह हमारे स्वभाव में घुलने लगती हैं। अगर समय रहते उनको ठीक ना किया जा सके तो वह हमारे अवचेतन मन में प्रवेश करने लगती हैं।

हम सब अक्सर अपने स्वभाव की छोटी- मोटी चीजों को लेकर परेशान होते रहते हैं। हमारा ध्यान उस ओर कम ही जाता है, जिस ओर जाना चाहिए। अक्सर हम मन पर पड़े बोझ के पत्थर कम देख पाते हैं। दूसरों से उलझने और अपने को सही साबित करने के चक्रव्यूह में ही फंसे रहते हैं। प्रसन्नता हमारे स्वभाव से दूर जा रही है। नाराजगी और स्वभाव में उग्रता बढ़ती जा रही है।

अपने भीतर का जब तक हमें बोध नहीं होता, हम शांति की ओर नहीं बढ़ सकते! स्वभाव से जुड़ी छोटी सी कहानी आपसे कहता हूं। संभव है इससे मेरी बात अधिक सरलता से आप तक पहुंच सके।

एक सरकारी अफसर साधक के पास पहुंचा। साधक गहरे मौन में रहते। बहुत जरूरी प्रश्नों के ही उत्तर देते। अफसर अक्सर इस गुमान में रहते हैं कि वही दुनिया चला रहे हैं। दुनिया उनकेे ही दम पर टिकी है। अफसर ने साधक से कहा मेरे पास समय नहीं है। मुझे जल्दी से समझाइए कि जीवन में शांति कैसे आ सकती है। साधक ने कोई उत्तर नहीं दिया। जो व्यक्ति उन्हें साधक के पास ले गए थे, उन्होंने किसी तरह अफसर को समझाया कि आपकी दुनिया के नियम सब जगह लागू नहीं होते। वह अफसर जल्दबाजी में थे, चले गए।

घर जाकर उनको एहसास हुआ कि अब तक तो जिन साधु और साधकों के पास वह पहुंचे, वह तो जैसे उनके इंतजार में ही बैठे थे। इस मायने में यह साधक अनूठे हैं।

अगले दिन वह अपने उस मित्र के यहां भागे जो उनको साधक के पास ले गए थे। वह गुस्से में मित्र के ऊपर भी नाराज हो गए थे कि उसने उनका बेहद कीमती समय ऐसे साधक के पास लेे जाकर खराब कर दिया, जो अपने यहां आने वालों से ठीक से बात नहीं करता। दूसरोंं के समय का सम्मान नहीं करता। संयोग से उनके मित्र सजग थे। प्रेम का रंग उनकी आत्मा में घुला हुआ था। वह उनको लेकर साधक केे पास गए। इस बार इस अफसर ने कोई जल्दबाजी नहीं की। प्रेम से बैठे रहे। समय आने पर बहुत इत्मीनान से उन्होंने कहा, मेरा स्वभाव बहुत उग्र है। इस नियंत्रित करने का उपाय बताइए।

साधक ने कहा यह तो नई चीज़ है। मैंने आज तक नहीं देखी। जरा दिखाओ तो कैसा होता है, उग्र स्वभाव! उस व्यक्ति ने कहा वह तो अचानक कभी-कभी होता है। उस पर मेरा नियंत्रण नहीं है। साधक ने कहा, यदि वह हमेशा नहीं है तो वह तुम्हारा स्वभाव नहीं है। किसी कारण से तुमने उसे थोड़ी देर के लिए पहना हुआ है। हमेशा इसी बात का ख्याल रखना। ओढ़ी हुई चीज थोड़ी देर के लिए होनी चाहिए हमेशा के लिए नहीं।

हम सबके साथ भी कुछ ऐसा ही है। बहुत साारी चीजें हमारे स्वभाव का अनचाहे ही हिस्सा बन जाती हैं। धीरे-धीरे वह हमारे स्वभाव में घुलने लगती हैं। अगर समय रहते उनको ठीक ना किया जा सके तो वह हमारे अवचेतन मन में प्रवेश करने लगती हैं। आपनेे देखा होगा कुछ लोगों का स्वभाव धीरे-धीरे बदलने लगता है। लेकिन एक दिन वह आपको पूरी तरह बदले हुए नजऱ आते हैं। वह छोटे-छोटे परिवर्तनों के प्रति सजग नहीं होते। घने से घना जंगल भी कुछ वर्षों में मैदान बन सकता है अगर वहां होने वाली कटाई पर समय रहते रोक न लगाई जाए।

हम सब अपने-अपने जीवन में अलग-अलग जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हैं, अपनी जिंदगी चलाने के लिए। जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने के लिए। बस यही बात मन में गहराई से बैठी रहनी चाहिए। इसे बहुत अच्छी तरह समझना होगा कि नौकरी की जरूरत को जिंदगी में जरूरत से ज्यादा महत्व नहीं देना है।

अपने स्वभाव का सजगता से निरीक्षण करते रहे। जांच करते रहें। कहीं कुछ चीजें आपके स्वभाव में दूसरों की तो शामिल नहीं हो रहीं। कभी-कभी जरूरत पडऩे पर सफर में हम दूसरों की चीजों से काम चला लेते हैं। लेकिन वह हमेशा के लिए हमारे पास नहीं रहतीं। ठीक इसी तरह से ध्यान रखना होगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि गुस्सैल, क्रोधी, किसी भी कीमत पर सब कुछ हासिल करने की जिद पर रहने वालों के साथ रहते हुए हम भी तो वैसे ही नहीं होते जा रहे!

अपने स्वभाव को सरल और प्राकृतिक बनाए रखना है। दूसरों का पहना और ओढ़ा स्वभाव हमारे किसी काम नहीं! (hindi.news18.com)

-दयाशंकर मिश्र