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Posted Date : 12-Aug-2017
  • मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह के कार्यकाल का पांच हजार दिन पूरे होने पर भाजपा कार्यकर्ता रायपुर समेत प्रदेश में मंडलवार तिरंगा यात्रा निकालने में लगे हैं। इस दौरान वे सभी बैनर-पोस्टर के साथ लोगों को रमन सरकार की उपलब्धियां बता रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रदेश में चौथी बार भी भाजपा की सरकार बनेगी और  गांव से लेकर शहर तक का और तेजी के साथ विकास होगा।  तस्वीर / छत्तीसगढ़

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Posted Date : 11-Aug-2017

Posted Date : 11-Aug-2017
  • ये है गरीबा, जो हर साल मेरे को बारिश के इन दिनों स्मार्ट सिटी बिलासपुर के करीब गांव मंगला में मुझे सुबह मछली जाल फेंक कर मछली पकड़ते और फिर सड़क के किनारे बेचता दिखता है। उसका जो अनुभव है वह पर्यावरणविदों के लिए चिन्तादायी है। उसका अनुभव है कि गढ्डों में कचरा फेंकने और गंदगी के कारण मछली की कई प्रजातियां अब नहीं मिल रही।
    आज सुबह मेरी उससे मुलाकात हुई, वो यीं, खोकसी आदि मछलियां पकड़ रहा था। जाल में कुछ मछलियां अभी फंसी थी। बीते दो तीन साल से एक्वेरियम के लिए एंजिल फिश के आकार की पारदर्शी मछली चंदेनी के लिए उससे मिलता हूँ। पर वो इधर नहीं मिल रही। गरीबा बोला, यहां का पानी कचरे के कारण गन्दा हो गया है। अब यहां जीवट मछलियां ही मिलती है। नदी के बहते पानी की मछलियां इधर नहीं चढ़ती और आती तो बचती नहीं। चमकीली कोतरी, शार्क की बनावट वाली टेंगना, साँप सी, बामी, और जिसके आरपार दिखता है, चंदेनी, गंदे पानी में नहीं मिलती।
    उसका कहना गंदे पानी याने प्रदूषण वाले पानी गंदले पानी में। पर नदी नालों के वाले पानी में ये बाकी है। गरीबा ने फिर कहा नदी नालों का पानी भी अब पहले सा नहीं और वो मैला गन्दा होता जा रहा है। एक मछेरा मछली पकड़ता है, पर सबकी करतूत और उसका असर समझता है। संकट मछलियों पर है तो गरीबा जैसे मछुवारों की जीविका पर भी। पर बड़ा संकट ये कि जब लोकल मछलियां कम होगी तो पानी के कई कीड़ों को खाकर वह जो सफाई करती थीं, वह अब कैसे होगी, कालांतर इस चेन की कड़ी टूटने का दुष्प्रभाव सब पर पड़ेगा। 
    प्राण चड्डा, बिलासपुर के वरिष्ठ पत्रकार-छायाकार 

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Posted Date : 10-Aug-2017
  • मारुआन फलइनी अपनी मजबूती और टफ परफॉर्मेंस के लिए जाने जाते हैं। मैनचेस्टर यूनाइटेड के मिडफील्डर की हालिया तस्वीर ने एक बार फिर इस पर मुहर लगा दी है। रियाल मैड्रिड के साथ मंगलवार को हुए मैच में हार के बावजूद उन्होंने अपने फैंस को मुस्कुराने का एक मौका दे ही दिया।
    एक फोटोग्राफर ने उस लम्हे को कैमरे में कैद कर लिया जब फुटबॉल उनके चेहरे से आकर जोर से टकराई। फुटबॉल इतनी जोर से टकराई थी कि उनका चेहरा बुरी तरह सिकुड़ गया। तस्वीर में देखा जा सकता है कि कैसे उस वक्त उनके घुंघराले बाल हवा में उड़ रहे थे, उनकी आंखें बंद हो गईं थी और मुंह दर्द से खुल गया था। फलइनी ने खुद यह तस्वीर अपने ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट की और लिखा, उन सब का शुक्रिया जिन्होंने ये तस्वीर पोस्ट की और मुझे भेजी। तस्वीर सोशल मीडिया पर आते ही लोगों ने मीम्स बनाने और फोटो को मजेदार कैप्शन के साथ शेयर करना शुरू कर दिया।
    एक ट्विटर यूजर ने अपनी फोटोशॉप स्किल दिखाते हुए उनका चेहरा पंखे के सामने रख दिया और लिखा, मैं मारुआन का बड़ा फैन हूं। एक दूसरे ट्विटर यूजर ने लिखा, आप पिघलती हुई मोमबत्ती जैसे दिख रहे हैं।
    उनके एक प्रशंसक ने बैंडेज बांधे उनकी तस्वीर शेयर की और लिखा, योद्धा। किसी ने रोनाल्डो की तस्वीर भी उनके साथ जोड़ दी। वैसे फलइनी के हिम्मत की दाद देनी होगी, इतनी बुरी तरह चोट लगने के बावजूद वह मैदान से हटे नहीं बल्कि सिर पर बैंडेज बांधकर खेलते रहे। मैनचेस्टर यूनाइटेड मैच नहीं जीत पाई, फलइनी ने गोल भी नहीं किया लेकिन अपने शानदार खेल और हिम्मत से उन्होंने सबका दिल जीत लिया। (बीबीसी)

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Posted Date : 09-Aug-2017
  • एशियाई जंगली भैंसा की संख्या आज 4000 से भी कम रह गई है। एक सदी पहले तक पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में बड़ी तादाद में पाये जाने वाला जंगली भैंसा आज केवल भारत, नेपाल, बर्मा और थाईलैंड में ही पाया जाता है। ये भारत में काजीरंगा और मानस राष्ट्रीय उद्यान में पाया जाता है। मध्य भारत में यह छत्तीसगढ़ में रायपुर संभाग के गरियाबंद जिले में स्थित उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में वन भैंसा पाया जाता है, जिसकी संख्या दशकों पहले काफी थी लेकिन बदलती परिस्थितियों में ये पशु कम होते चले गए। 

    छत्तीसगढ़ में इनकी दर्ज संख्या वर्तमान में ग्यारह है। ये छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु है जिसकी वंश वृद्धि को लेकर वन विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। सबसे खास बात ये है कि राज्य के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में पाया जाने वाला वन भैंसा विश्व के दूसरे वन भैंसों से अलग, ज्यादा बलशाली और विशालकाय है। 

    उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में वन विभाग ने कुछ वन भैंसों को सुरक्षित घेरे में रखकर उनका प्रजनन कार्यक्रम चला रखा है, लेकिन सिर्फ एक उम्रदराज मादा होने की वजह से कुछ दिक्कतें खड़ी हो रही हैं। हालांकि वन विभाग ने चिकित्सा विशेषज्ञों और वन्य प्राणी विशेषज्ञों के माध्यम से अपनी कोशिशें जारी रखी है। जानकारों की माने तो एक मादा अपने जीवनकाल में 5 शावकों को जन्म देती है, इनकी जीवन अवधि 9 वर्ष की होती है। नर शावक दो वर्ष की उम्र में झुंड छोड़ देते हैं। शावकों का जन्म अक्सर बारिश के मौसम के अंत में होता है। 
    आमतौर पर मादा जंगली भैसें और शावक झुंड बनाकर रहती है और नर झुंड से अलग रहते हैं पर यदि झुंड की कोई मादा गर्भ धारण के लिये तैयार होती है तो सबसे ताकतवर नर उसके पास किसी और नर को नहीं आने देता। यह नर आमतौर पर झुंड के आसपास ही बना रहता है। यदि किसी शावक की मां मर जाए तो दूसरी मादायें उसे अपना लेती हैं। इनका स्वभाविक शत्रु बाघ है, पर यदि जंगली भैंसा कमजोर बूढ़ा या बीमार हो तो जंगली कुत्तों और तेंदुओं को भी इनका शिकार करते देखा गया है। वैसे इनको सबसे बड़ा खतरा पालतू मवेशियों की संक्रमित बीमारियों से ही है, इनमें प्रमुख बीमारी फुट एंड माउथ है। रिडंर्पेस्ट नाम की बीमारी ने एक समय इनकी संख्या में बहुत कमी ला दी थी। 
    वर्तमान में करीब पांच वन भैंसा जिनमें से दो को रेडियो कॉलर लगाया गया है वे उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में स्वछंद विचरण कर रहे हैं जिन्हें खोजना और तस्वीरें उतारना मुश्किल के साथ-साथ काफी जोखिम भरा है। ये वन भैंसे काफी खतरनाक हैं।
    -तस्वीर और जानकारी बिलासपुर के फोटोजर्नलिस्ट सत्यप्रकाश पाण्डेय द्वारा

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Posted Date : 08-Aug-2017
  • पीढ़ी दर पीढ़ी मूर्तिकला को संजोने वाले रायपुर के अश्विनी नगर के मूर्तिकार वासुदेव प्रजापति, पत्नी, बेटे, बहू समेत इन दिनों जबकि गणेश प्रतिमाओं में रंग भर रहे हैं, उनका पोता पुष्पेन्द्र चूहों में रंग भरने में रमा हुआ है। पुष्पेन्द्र के पिता कुलेश्वर ने बताया कि हाल में उन्होंने अपने बेटे को स्कूल में दाखिला दिलाया है, लेकिन पुष्पेन्द्र का रूझान पढऩे की जगह मूर्तिकला की ओर ज्यादा है। मूर्ति बनाने के लिए वह तरह-तरह की कल्पनाएं करता है और मूर्तियों में रंग भरने के लिए जिद करता है, लेकिन गिनती लिखने की जब बारी आती है तो वह बे मन से उल्टे अंक लिखने लग जाता है। कुलेश्वर कहते हैं बड़ा होकर शौकिया तौर पर पुष्पेन्द्र भले ही मूर्ति बनाए लेकिन मैं नहीं चाहता हूं कि मेरा बेटा मूर्तिकार बनकर मूर्ति कला पर आश्रित रहे। तस्वीर / छत्तीसगढ़

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Posted Date : 08-Aug-2017

Posted Date : 07-Aug-2017

Posted Date : 06-Aug-2017

Posted Date : 06-Aug-2017

Posted Date : 05-Aug-2017

Posted Date : 05-Aug-2017

Posted Date : 05-Aug-2017
  • -सत्यप्रकाश पांडेय
    एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके का लखनपुर इन (सारस क्रेन) पक्षियों की मेजबानी के लिए तैयार रहता था पर बीते दो बरस से मेहमान (सारस क्रेन) नहीं आये है। मैंने लखनपुर के कुछ लोगों और राजपरिवार के सदस्यों से मेहमान पक्षियों की बेरुखी का पता लगाया तो मालूम हुआ सारस क्रेन विकास की तेज हवाओं का शिकार बन गए। मतलब ये की लखनपुर में जिन मेहमान पक्षियों का पिछले छ: दशक से डेरा था वो जगह तालाब से खेत की शक्ल में तब्दील हो गई।
     60 बरस पुराना रिश्ता पिछले कुछ वर्षों में यूँ टूटा की अब सारस क्रेन उस इलाके में खोजे नहीं मिलते। सिंहदेव परिवार के सदस्य रणविजय सिंहदेव से बातचीत करने पर मालूम हुआ की लखनपुर में उनके खेत के समीप राजाखार नाम का एक तालाब था जहां उन पक्षियों के अनुकूल बड़ी-बड़ी घास और भोजन का माकूल इंतजाम था। उस जगह पर हर साल सारस क्रेन ब्रीडिंग भी करते थे लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उस तालाब को पाटकर खेत बना दिया गया। यही वजह है की सारस क्रेन जैसा दुर्लभ खासकर छत्तीसगढ़ के लिए अब लखनपुर की ओर रुख नहीं करता। 
    सारस क्रेन उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी है। छत्तीसगढ़ में समय-समय पर इसकी उपस्थिति के कई साक्ष्य मिले है लेकिन यहां की फिज़ा बदलते वक्त के साथ इन्हे रास नहीं आई और ये इस राज्य से रिश्ता तोड़कर हमेशा के लिए रुखसत हो गए। अगर हमारी सोच सकारात्मक होती, अगर हमको इन पक्षियों से मोह होता या फिर जंगल विभाग इनकी मौजूदगी को लेकर गंभीरता दिखाता तो शायद ये प्रवास सालों साल चलता रहता। अफ़सोस ऐसा कुछ हुआ नहीं और अब सारस क्रेन लखनपुर के किस्से कहानियों का हिस्सा बन गए।

     

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Posted Date : 04-Aug-2017

Posted Date : 03-Aug-2017

Posted Date : 02-Aug-2017

Posted Date : 02-Aug-2017

Posted Date : 01-Aug-2017

Posted Date : 01-Aug-2017

Posted Date : 31-Jul-2017