राजनीति

क्या भाजपा के लिए सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम पर विधानसभा चुनाव जीतने के दिन लद गये हैं?
क्या भाजपा के लिए सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम पर विधानसभा चुनाव जीतने के दिन लद गये हैं?
Date : 12-Feb-2020

-हिमांशु शेखर
नई दिल्ली, 12 फरवरी । दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम आ गए हैं। एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लोगों ने प्रचंड बहुमत दिया है। हालांकि, 2015 के मुकाबले इस बार आप को कम सीटें मिली हैं लेकिन यह अंतर इतना ज्यादा भी नहीं है। 2015 में आम आदमी पार्टी को दिल्ली की कुल 70 में से 67 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस बार उसे 63 सीटें मिलती दिख रही हैं।
दिल्ली प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी का प्रदर्शन 2015 के मुकाबले इस बार थोड़ा सुधरा है। लेकिन उसकी सीटों की संख्या इतनी भी नहीं बढ़ी है कि कहा जा सके कि उसे राजधानी में सम्मानजनक हार मिली है। साल 2015 में जहां भाजपा को 70 में से सिर्फ तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा था, वहीं इस बार उसे सात सीटें मिलते दिख रही हैं।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत और भाजपा की हार का विश्लेषण अलग-अलग ढंग से हो रहा है। अधिकांश राजनीतिक जानकार यह कह रहे हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि प्रदेश स्तर के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं और इसमें भी आम लोगों से जुड़े बुनियादी मुद्दों की निर्णायक भूमिका होती है। यह इस आधार पर कहा जा रहा है कि दिल्ली में आप ने तो स्थानीय स्तर के वे जमीनी मुद्दे उठाए जो लोगों की जिंदगी से सीधे जुड़े हुए हैं, लेकिन भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में राष्ट्रीय मुद्दों को प्राथमिकता दी।
भाजपा नागरिकता संशोधन अधिनियम, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर, कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाए जाने, शाहीन बाग और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही थी। आप और कांग्रेस का आरोप था कि भाजपा इन मुद्दों के जरिए दिल्ली में हिंदू-मुस्लिम विभाजन पैदा करके चुनावी लाभ लेना चाह रही है। भाजपा के कुछ नेताओं प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर द्वारा सीधे-सीधे वैमनस्य फैलाने वाले बयान दिए गए। इन बयानों पर चुनाव आयोग भी हरकत में आया। केंद्रीय मंत्री और भाजपा की ओर से दिल्ली के चुनाव प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी तक कहा।
वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी बुनियादी मुद्दों पर ही टिकी रही। आप के नेताओं और उम्मीदवारों ने लगातार यही बात की कि पिछले पांच साल में केजरीवाल सरकार ने पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन के क्षेत्र में क्या-क्या कार्य किए हैं। आम आदमी पार्टी की ओर से लोगों को यह बताया गया कि 20,000 लीटर तक पानी और 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त करने से आम लोगों के कितने पैसे बच रहे हैं और इस पैसे का इस्तेमाल गरीब लोग कैसे अपना जीवन स्तर बेहतर बनाने के लिए कर रहे हैं। आप के उम्मीदवारों ने दिल्ली परिवहन निगम की बसों में महिलाओं के लिए शुरू की गई मुफ्त यात्रा का मुद्दा भी उठाया। साथ ही मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने जैसे मुद्दे भी आप की ओर से प्रमुखता से उठाए गए।
ये सब ऐसे मुद्दे थे जिनका सीधा लाभ आम लोगों को हो रहा था। आम लोग इनका फायदा सीधे तौर पर महसूस भी कर रहे थे। इस वजह से भाजपा के लिए तार्किक ढंग से इन योजनाओं की आलोचना करना आसान नहीं था। भाजपा ने इन योजनाओं की आलोचना करने के बजाए इन योजनाओं के क्रियान्वयन में कमियों को रेखांकित करना शुरू किया। लेकिन चुनाव परिणामों को देखकर ऐसा लगता है कि दिल्ली की जनता ने भाजपा की इन आलोचनाओं को बहुत गंभीरता से नहीं लिया।
दिल्ली के विधानसभा चुनाव पहले ऐसे विधानसभा चुनाव नहीं हैं जिनमें राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय स्थानीय मुद्दे अधिक प्रभावी साबित हुए हैं। इस संदर्भ में 2018 में छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनाव और 2019 में झारखंड में हुए विधानसभा चुनावों का उदाहरण भी दिया जा सकता है। इन दोनों राज्यों के बारे में यह माना जा रहा था कि दोनों जगह भाजपा की सत्ता में वापसी हो रही है। दोनों चुनावों में भाजपा ने जमकर राष्ट्रीय मुद्दे उठाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के तमाम राष्ट्रीय नेताओं ने इनमें जमकर चुनाव प्रचार किया। लेकिन इन दोनों राज्यों में क्षेत्रीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाले दलों ने राष्ट्रीय मुद्दों के साथ चुनाव लड़ रही भाजपा को पटखनी दे दी।
पहले छत्तीसगढ़ और फिर झारखंड और अब दिल्ली के विधानसभा चुनावों का एक राजनीतिक संकेत यह भी है कि भाजपा के लिए अब सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम पर विधानसभा चुनाव जीतने के दिन लद गए हैं। इन तीनों राज्यों से पहले हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों से भी यह बात साबित होती लगती है। 2017 में गुजरात में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा किसी तरह बहुमत के आंकड़े के पार पहुंच पाई थी। 2018 में कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर तो उभरी लेकिन अपनी सरकार नहीं बना पाई थी। बाद में दूसरे दलों के विधायकों के साथ जोड़-तोड़ कर उसने कर्नाटक में अपनी सरकार बनाई। 2018 में ही छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान भाजपा के हाथ से चले गए। 2019 में हरियाणा में किसी तरह भाजपा गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब हो पाई। और इसी साल महाराष्ट्र में जोड़-तोड़ की काफी कोशिशों के बावजूद उसकी सरकार नहीं बन सकी।
इन सभी चुनावों में भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ उतरती रही है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी भाजपा की ओर से जो भी पोस्टर लगे थे, उनमें नरेंद्र मोदी और उनसे जुड़े मुद्दों के आधार पर ही जनता का समर्थन मांगा गया था। दिल्ली में तो भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तक नहीं घोषित किया था। हालांकि, 2015 के मुकाबले इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाएं कम हुईं लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि भाजपा दिल्ली में उनके नाम पर ही चुनाव लड़ रही थी।
जिन विधानसभा चुनावों का ऊपर जिक्र किया गया है, उनमें से कुछ के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव हुए थे। जिन राज्यों की सत्ता से भाजपा बेदखल हुई, उन सभी राज्यों में भाजपा ने लोकसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन भी सामान्य नहीं था बल्कि ऐसा था कि विपक्षी पार्टियां भाजपा के मुकाबले कहीं ठहर ही नहीं पाईं। लेकिन इसके कुछ ही महीने बाद जब कुछ अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा फिर से मुंह की खाने लगी।
इसका राजनीतिक विश्लेषण इस रूप में किया जा सकता है कि लोकसभा चुनावों में तो अब भी नरेंद्र मोदी का जादू चल रहा है लेकिन विधानसभा चुनावों में उनका करिश्मा नहीं काम कर रहा है। जबकि 2014 और उसके आसपास स्थितियां इससे अलग थीं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की जीत के तकरीबन छह महीने के अंतर पर हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव हुए थे और भाजपा इन सभी राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। उस वक्त इन राज्यों में उसने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तक घोषित नहीं किया था। जम्मू-कश्मीर के पिछले चुनावों में भी भाजपा ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था और वहां भी वह गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब रही थी।
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में इतनी बड़ी जीत हासिल करने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी के लिए उतने प्रभावी साबित नहीं हो पा रहे हैं।(सत्याग्रह)
 

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