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बिहार चुनाव: तेजस्वी यादव अचानक नीतीश के लिए बड़ी चुनौती कैसे बने?
05-Nov-2020 2:50 PM 96
बिहार चुनाव: तेजस्वी यादव अचानक नीतीश के लिए बड़ी चुनौती कैसे बने?

-रजनीश कुमार

रमेश प्रसाद लॉकडाउन से पहले हर दिन सात किलो आलू के समोसे बेच लेते थे और ठीक-ठाक कमाई हो जाती थी. लॉकडाउन खुलने के महीनों बाद भी रमेश की दुकानदारी पहले की तरह नहीं हो पाई है.

अब वो मुश्किल से दो किलो आलू के समोसे बनाते हैं फिर भी बच जाता है. रमेश कहते हैं कि लोगों के पास पैसे ही नहीं हैं तो समोसा कहां से बिकेगा.

जब लालू प्रसाद यादव राजनीति में उफान पर थे तो बिहार में एक जुमला चलता था- जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक रहेंगे बिहार में लालू. लालू यादव जेल में हैं और समोसे बेचने वाले मायूस हैं.

तेजस्वी यादव के विधानसभा क्षेत्र राघोपुर में रमेश की यह दुकान चुनाव की सरगर्मी के बीच भी लॉकडाउन से पहले की स्थिति में नहीं लौट पाई है. इस दुकानदारी में रमेश अपने 15 साल के बेटे से भी मदद लेते हैं.

रमेश कहते हैं कि लॉकडाउन से उनकी दुकानदारी चौपट हो गई और नीतीश कुमार की सरकार से कोई मदद नहीं मिली. वो चाहते हैं कि इस बार बिहार में परिवर्तन हो और कोई नई सरकार बने.

हालांकि हमारी बातों को ध्यान से सुन रहा उनका बेटा दीपक कहता है कि नीतीश कुमार ही ठीक हैं. दीपक की इस बात पर रमेश प्रसाद हँसने लगते हैं.

रमेश कहते हैं, ''लॉकडाउन में नीतीश कुमार ने कुछ नहीं किया. हम अब भी अपने परिवार का पेट कैसे भर पा रहे हैं इससे किसी को कोई सहानुभूति नहीं है. 15 साल से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं. अब किसी और को मौक़ा मिलना चाहिए.''

राघोपुर में यादव वोटर सबसे ज़्यादा हैं. बीजेपी ने भी तेजस्वी के ख़िलाफ़ यादव उम्मीदवार सतीश राय को मैदान में उतारा है. सतीश राय 2010 में राबड़ी देवी को हरा चुके हैं लेकिन 2015 में तेजस्वी से हार गए थे.

राघोपुर में यादव मतदाता सवा लाख के क़रीब हैं और उसके बाद सबसे ज़्यादा राजपूत मतदाता 40 हज़ार के आसपास हैं.

हाजीपुर में प्रभात ख़बर दैनिक अख़बार के ब्यूरो प्रमुख सुनील कुमार सिंह कहते हैं कि तेजस्वी को इस बार सतीश राय अच्छी टक्कर दे सकते थे लेकिन चिराग पासवान ने राकेश रौशन को एलजेपी से उम्मीदवार बनाकर आरजेडी की राह आसान कर दी है.

राकेश रौशन राजपूत हैं और कहा जा रहा है कि अगर उन्हें जाति के नाम पर वोट मिला तो तेजस्वी बड़े अंतर से जीतेंगे.

सुनील कुमार सिंह कहते हैं, ''राकेश रौशन को लेकर राघोपुर में राजपूतों के बीच एक नारा दिया गया है- पहले कुल तब फूल. यानी पहले अपनी जाति की इज़्ज़त बचा लो तब बीजेपी का फूल (कमल) देखा जाएगा. कई बार तो लगता है कि चिराग पासवान ने जानबूझकर तेजस्वी की जीत पक्की करने के लिए राकेश रौशन को उम्मीदवार बनाया है.''

हालांकि एलजेपी के प्रवक्ता अशरफ़ अंसारी इस बात से इनकार करते हैं. वो कहते हैं कि राकेश रौशन एलजेपी की आईटी टीम के हेड रहे हैं और उनका चुनाव लड़ना पहले से ही तय था.

लेकिन ज़्यादातर लोग अशरफ़ अंसारी के इस तर्क से सहमत नहीं हैं. लोगों का कहना है कि जब चिराग पासवान ने बीजेपी के ख़िलाफ़ उम्मीदवार न के बराबर उतारे हैं तो इतनी अहम सीट पर प्रत्याशी खड़ा करना शक पैदा करता है.

तेजस्वी अगर यहां से चुनाव जीतते हैं तो ये उनकी दूसरी बार जीत होगी. यहां से उनके पिता लालू प्रसाद यादव 1995 और 2000 में चुनाव जीते थे. 2005 में तेजस्वी की माँ राबड़ी देवी भी यहां से विधायक बनीं.

लालू बनाम तेजस्वी की राजनीति
लालू यादव 1977 के लोकसभा चुनाव में 29 साल की उम्र में छपरा से सांसद चुने गए थे. लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव 26 साल की उम्र में राघोपुर से 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में विधायक चुने गए. तेजस्वी पहली बार विधायक बने और बिहार के उपमुख्यमंत्री बन गए.

लालू यादव राजनीति में कॉलेज के दिनों में ही आ गए थे. 1973 में लालू यादव पटना यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने थे और उसके बाद से उनकी राजनीति बिहार में कभी थमी नहीं.

तेजस्वी यादव ने क्रिकेट मोह में नौंवीं क्लास के बाद पढ़ाई नहीं की लेकिन छात्र राजनीति की उम्र में ही उन्होंने चुनावी राजनीति में न केवल दस्तक दी बल्कि चुनाव भी जीते और उपमुख्यमंत्री भी बने.

अभी तेजस्वी 31 साल के हैं और मुख्यमंत्री के दावेदार हैं. अगर नीतीश कुमार पर तेजस्वी भारी पड़ते हैं तो देश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनेंगे.


तेजस्वी की राजनीति में एंट्री तब हुई जब उनके पिता लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद चुनावी राजनीति से बेदख़ल हो गए.

अक्टूबर 2013 में लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में जेल की सज़ा मिली और चुनाव लड़ने से भी उन्हें रोक दिया गया. 1997 में भी जब लालू को चारा घोटाले में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था तब मुख्यमंत्री की कुर्सी अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी थी.

राबड़ी देवी ने तवलीन सिंह को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वो मुख्यमंत्री बनने से पहले घर परिवार संभालती थीं. लेकिन लालू ने उन्हें अचानक से मुख्यमंत्री बना दिया था


2013 में लालू यादव के सामने एक बार फिर से वो संकट आया. इस बार उन्होंने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को आगे किया. हालांकि तेजस्वी भी राजनीति में नौसिखिए ही थे लेकिन लालू ने एक बार फिर से अपने परिवार के ईर्द-गिर्द ही सत्ता को रहने दिया.

अब्दुल बारी सिद्दीक़ी, रघुवंश प्रसाद सिंह और रामचंद्र पूर्वे जैसे अनुभवी नेता भी थे लेकिन उन्हें लालू ने आगे नहीं किया. इसी बीच 2014 में आम चुनाव हुआ और आरजेडी महज़ चार सीटों पर सिमट गई. यहां तक कि राबड़ी देवी सारण और लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती पाटलीपुत्र लोकसभा सीट से चुनाव हार गईं.

2014 के लोकसभा चुनाव तक तेजस्वी उतना मुखर नहीं थे. लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने दोनों बेटों को चुनावी मैदान में उतार दिया.

तेजस्वी को लालू ने अपनी पारंपरिक सीट राघोपुर से उतारा जबकि बड़े बेटे तेज प्रताप को महुआ विधानसभा क्षेत्र से.

दोनों बेटों को चुनाव में जीत मिली. 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी क़रीब दो दशक बाद फिर से साथ में आई थी और इस जोड़ी को शानदार जीत मिली थी.

हालांकि आरजेडी 2015 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने. तेजस्वी उपमुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश के मातहत 16 महीने तक रहे. 16 महीने बाद नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ चले गए.

26 की उम्र में तेजस्वी उपमुख्यमंत्री बने

तेजस्वी यादव की असली राजनीति 2017 से शुरू होती है. वो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने. नेता प्रतिपक्ष रहते हुए तेजस्वी ने सदन में नीतीश कुमार पर जनादेश का अपमान करने का आरोप लगाया तो नीतीश कुमार ने जवाब में कहा था कि आरजेडी के साथ रहते हुए सरकार में काम करना मुश्किल था.

लेकिन तेजस्वी यादव के लिए यह मौक़ा था कि वो अपनी राजनीतिक पहचान को पिता की राजनीतिक छाया से अलग करें. इसी बीच 2019 का आम चुनाव आ गया. पूरा कैंपेन तेजस्वी यादव ने संभाला. अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक भी वही थे.

2019 के आम चुनाव में तेजस्वी यादव ने धुआंधार रैलियां कीं. वो अपनी रैलियों में प्रधानमंत्री मोदी पर रोज़गार और नोटबंदी को लेकर ख़ूब हमला करते थे.

अपने पिता की कथित सामाजिक न्याय की राजनीति की बात करते थे. तेजस्वी बताते थे कि उनके पिता ने बिहार में मनुवाद और सामंतवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी और ग़रीबों को इंसाफ़ दिलाया.

2019 में बेगूसराय में तेजस्वी यादव की एक रैली मुझे याद है. तेजस्वी बेगूसराय लोकसभा सीट से अपने पार्टी के उम्मीदवार तनवीर हसन के लिए भाषण कर रहे थे.

मैदान बहुत बड़ा नहीं था. मई महीने की प्रचंड गर्मी थी. तेजस्वी के भाषण से ज़्यादा लोग हेलिकॉप्टर देखने में मशगूल थे. हेलिकॉप्टर के चारों तरफ़ भीड़ तेजस्वी की जनसभा से ज़्यादा थी.

तेजस्वी के भाषण से लोग बहुत कनेक्ट नहीं हो रहे थे. तेजस्वी बार-बार मनुवाद और सामंतवाद जैसे टर्म का इस्तेमाल कर रहे थे लेकिन भाषण सुनने आई जनता में जितने लोगों से पूछा उनमें से किसी ने नहीं बताया कि सामंतवाद और मनुवाद का मतलब क्या होता है.

2019 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी को एक भी सीट नहीं मिली. एक बार फिर से मीसा भारती हारीं और सारण लोकसभा सीट से तेजप्रताप के ससुर चंद्रिका राय भी हारे. अब चंद्रिका राय जेडीयू में हैं.

2019 के लोकसभा चुनाव में तेजस्वी नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री मोदी को आड़े हाथों लेते थे. लेकिन 2020 में तेजस्वी की राजनीति 2019 से बिल्कुल अलग हो गई है.

अब तेजस्वी की जनसभाओं में भारी भीड़ जुट रही है. युवाओं की तादाद सबसे ज़्यादा है और भीड़ बहुत ही आक्रामक तरीक़े से तेजस्वी का स्वागत कर रही है. तेजस्वी का भाषण भी बदल गया है.

अब वो रोज़गार, शिक्षा, सड़क और स्वास्थ्य की बात कर रहे हैं. तेजस्वी लॉकडाउन में बिहारियों को हुई भारी परेशानी का मुद्दा उठा रहे हैं. वो सरकार बनते ही बिहार में 10 लाख सरकारी नौकरी देने की बात कर रहे हैं.

एक साल के भीतर ही तेजस्वी को इतनी मज़बूती कैसे मिली?

पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, ''कोरोना महामारी को लेकर लगे लॉकडाउन से बिहार की राजनीति बदल गई है. लॉकडाउन के दौरान बिहारियों ने सबसे ज़्यादा मुश्किलें झेली हैं और बिहार सरकार उन्हें मदद करने में बिल्कुल नाकाम रही है. लाखों की तादाद में प्रवासी बिहारी अपने गाँव लौटे और सब बदहाली में रह रहे हैं. इस बार जाति और मज़हब पर रोज़ी-रोटी का सवाल भारी पड़ रहा है. तेजस्वी की टीम ने इस चीज़ को समझा है और रोज़ी-रोटी को ही चुनावी एजेंडा बनाया. सरकारी नौकरी में ख़ाली रिक्तियों को भरने का वादा भी बिहारियों को हिट किया है. यहां युवा पढ़ाई कर तैयारी करते हैं लेकिन वेकेंसी को लटकाए रखा जाता है.''

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डीएम दिवाकर कहते हैं कि इस बार कोरोना नीतीश कुमार को सत्ता से बेदख़ल कर सकता है.

बिहार में पिछले एक महीने से चुनावी कवरेज कर रहे एबीपी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर जैनेंद्र कुमार तेजस्वी की कई रैलियों में गए. जैनेंद्र बताते हैं कि तेजस्वी की रैली में भीड़ और उनका भाषण पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में बिल्कुल अलग है.

वो कहते हैं, ''लोगों की भीड़ अनियंत्रित है. युवाओं की तादाद सबसे ज़्यादा है. भीड़ में इस क़दर उत्साह है कि देखते बनता है. ऐसा स्वागत देख 31 साल के तेजस्वी ऊर्जा से भर जाते हैं. तेजस्वी अपने भाषण में बिल्कुल फोकस्ड हैं. वो रोज़गार और बुनियादी मुद्दों की बात करते हैं. तेजस्वी ऐसा कुछ भी नहीं बोलते हैं जिनसे विवाद पैदा हो या विपक्ष को उन्हें घेरने का मौक़ा मिल जाए.''

जैनेंद्र कहते हैं कि वो नीतीश कुमार की रैली में भी गए लेकिन वहां इतनी भीड़ नहीं है.

तेजस्वी की रैली में इतनी भीड़ क्यों आ रही है? इस सवाल के जवाब में जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं, ''तेजस्वी की रैली में भीड़ तो है लेकिन आधी आबादी ग़ायब है. महिला कहां हैं? आप एनडीए की रैली देखिए तो महिलाएं बड़ी संख्या में मौजूद होती हैं.''

जैनेंद्र भी इस बात को मानते हैं कि तेजस्वी की रैली में महिलाओं की संख्या न के बराबर है.

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हालांकि पिछले कुछ महीनों से बिहार के चुनाव को देख रहे युवा पत्रकार विष्णु नारायण कहते हैं कि महिलाएं भले तेजस्वी की रैली में कम हैं लेकिन एनडीए की रैली में भी जो महिलाएं आ रही हैं वो लाई जा रही हैं न कि वो वो ख़ुद भाषण सुनने आ रही हैं. विष्णु कहते हैं कि तेजस्वी का 10 लाख सरकारी नौकरी देने का वादा जातीय दायरे से बाहर निकल चुका है. वो कहते हैं कि इसे वादे की अपील हर जाति में गई है

तेजस्वी के चुनावी कैंपेन से लालू बाहर?
तेजस्वी यादव के पूरे चुनावी कैंपेन में लालू यादव की तस्वीर इस्तेमाल नहीं की गई है.

इसे लेकर तेजस्वी से सवाल भी पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो गठबंधन का चेहरा हैं इसीलिए तस्वीर भी उन्हीं की है.

आरजेडी के एक नेता से पूछा कि आख़िर तेजस्वी के कैंपेन में लालू यादव की तस्वीर क्यों नहीं इस्तेमाल की जा रही है तो उन्होंने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ''बिहार की बड़ी आबादी में लालू जी की छवि बहुत अच्छी नहीं है. लोगों को लग सकता था कि कहीं वो नैरेटिव चर्चा में न आ जाए कि शासन लालू काल वाला ही होगा जब क़ानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए जाते थे. तेजस्वी भले लालू प्रसाद के बेटे हैं लेकिन इस चुनाव में उन्हें बिहार के युवा के तौर पर आगे किया गया है.''


बिहार में दाऊदनगर के अनीश उत्पल गुजरात विद्यापीठ से पीएचडी कर रहे हैं. वो इन दिनों बिहार चुनाव को लेकर कई इलाक़ों में लोगों से मिलकर मुद्दों और नेताओं की अपील को ज़मीन पर समझने की कोशिश कर रहे हैं.

वो कहते हैं, ''यादव मतदाता तेजस्वी को लेकर एकजुट हैं. लेकिन ग़ैर-यादव ओबीसी नीतीश से नाराज़गी के बावजूद तेजस्वी को स्वीकार करने में असमंजस की स्थिति में हैं. कोईरी और कुर्मी यादवों को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते हैं. नौकरी और रोज़गार का मुद्दा ज़रूर हिट है लेकिन सवर्णों और ग़ैर-यादव ओबीसी के मन में लालू यादव के शासनकाल की यादें मिट नहीं गई हैं.''

अनीश को लगता है कि नीतीश कुमार के लिए यह चुनाव कोरोना ने बहुत मुश्किल बना दिया है लेकिन तेजस्वी के लिए यह चुनाव एकतरफ़ा नहीं है. (bbc.com)

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