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तालिबान शासित अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत के रुख़ में बदलाव क्यों?
22-Oct-2021 8:00 PM (43)
तालिबान शासित अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत के रुख़ में बदलाव क्यों?

-सलमान रावी

अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत अपनी नीति में बदलाव के स्पष्ट संकेत मिलने शुरू हो गए हैं. पहले दोहा में भारतीय राजदूत की तालिबान प्रतिनिधि से मुलाक़ात और अब मॉस्को में विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव की तालिबान प्रतिनिधियों के साथ बैठक.

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय सहायता की बात भी स्वीकार की. साथ ही आर्थिक और कूटनीतिक संबंघ बेहतर करने पर भी ज़ोर दिया गया.

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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत तालिबान से 'एंगेज' न करने की नीति पर चलता आया था.

लेकिन जानकारों का कहना है कि सामरिक दृष्टि से भारत की नीति में बदलाव आवश्यक है. नीति में बदलाव के संकेत उस समय आना शुरू हुए, जब क़तर की राजधानी दोहा में तालिबान के प्रतिनिधियों से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ था.

हालाँकि भारत ने खुले तौर पर 'बैक डोर चैनल' से तालिबान के साथ बातचीत करने की बात कभी स्वीकार नहीं की, लेकिन 31 अगस्त को दोहा में भारत के राजदूत से तालिबान के शीर्ष नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्टैनिकज़ई की मुलाक़ात हुई.

तालिबान के नेता ख़ुद भारतीय दूतावास गए थे और इस दौरान भारत के राजदूत दीपक मित्तल से उनकी लंबी बातचीत हुई. स्टैनिकज़ई दोहा में स्थित तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख भी रहे हैं. तालिबान के साथ भारत की ये पहली औपचारिक बातचीत थी.

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस बातचीत के बारे में जो बयान दिया, उसमें कहा गया कि ये बैठक तालिबान के अनुरोध पर हुई थी, जिसमे मूलतः अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और वहाँ रह रहे अल्पसंख्यकों को भारत आने की अनुमति पर बात हुई.

भारत ने तालिबान के शीर्ष नेता के साथ सामरिक मुद्दे को भी उठाया, जिसमें आश्वासन भी मिला कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत के ख़िलाफ़ नहीं होने देगा.

तालिबान के साथ दूसरी औपचारिक बैठक 21 अक्तूबर को हुई, जब मॉस्को में विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव जेपी सिंह के नेतृत्व में भारत का एक प्रतिनिधिमंडल तालिबान के प्रतिनिधियों से मिला. तालिबान के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उनके उप प्रधानमंत्री अब्दुल सलाम हनफ़ी कर रहे थे.

ये प्रतिनिधिमंडल रूस के निमंत्रण पर अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर आयोजित 'मोस्को फ़ॉर्मेट' सम्मेलन में शामिल होने गया था और सम्मेलन के इतर भारत और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई.

तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहउल्लाह मुजाहिद के हवाले से अफ़ग़ानिस्तान की समाचार एजेंसी 'टोलो' का कहना था कि दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने एक दूसरे की चिंताओं को ध्यान में रखने पर विचार किया. इसके अलावा दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को बेहतर बनाने की बात पर ज़ोर भी दिया गया.

सम्मलेन के समापन के दौरान इसमें शामिल भारत सहित 10 देशों ने अफ़ग़ानिस्तान को मानवीय सहायता देने के साझा प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए. अगस्त की 15 तारीख़, यानी वो दिन जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर नियंत्रण कर लिया था, तब से लेकर 21 अक्तूबर तक अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत की नीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला.

पहले भारत कह रहा था कि वो तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं देगा और विश्व समुदाय से भी अपील की थी कि तालिबान के शासन को मान्यता देने में कोई जल्दबाज़ी नहीं की जानी चाहिए. भारत के तब के रुख़ और अब के रुख़ में बड़ा बदलाव है.

इतना ही नहीं भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर चार देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक आयोजित करने का प्रस्ताव भी रखा है. इन देशों में चीन, रूस और पाकिस्तान भी शामिल हैं. इस प्रस्तावित बैठक की कोई तारीख़ पक्की नहीं की गई है.

लेकिन विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि ये 10 या 11 नवंबर को दिल्ली में आयोजित हो सकती है और इन सभी देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इसमें ख़ुद मौजूद रहेंगे. सूत्रों का कहना है कि इस सम्मलेन के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद यूसुफ़ को भी औपचारिक रूप से न्योता भेजा गया है.

अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत की कभी 'कोई एक नीति' नहीं रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत ने अमेरिका और नेटो की फ़ौजों पर सुरक्षा और सामरिक मुद्दों को छोड़ दिया था और अपना पूरा 'फ़ोकस' अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण तक ही रखा.

चाहे वो छात्रवृति देने की बात हो, नए संसद और डैम का निर्माण हो या फिर बिजली और सड़क की योजनाएँ हों. भारत ने सिर्फ़ इसी तक अपना दायरा सीमित रखा और भारी निवेश भी किया.

लेकिन सामरिक मामलों के विशेषज्ञों को लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान के मामले में भारत बहुत दिनों तक 'मैदान से बाहर बैठकर' सब कुछ नहीं देखता रह सकता है. वो ये भी मानते हैं कि 'तालिबान अपना शासन नियम से चलाए' कहते रहने से और उसका इंतज़ार करते रहने से भारत को कुछ हासिल भी नहीं हो सकता है.

'थिंक टैंक' ऑब्ज़ेर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की चयनिका सक्सेना मानती हैं कि भारत के लिए ये सही नहीं होगा कि वो अफ़ग़ानिस्तान में बदलते हुए हालात से ख़ुद को दूर रखे और उस देश में जो हो रहा है, उसे भाग्य भरोसे छोड़ दे. खास तौर पर तब, जब वो क्षेत्रीय ताक़तें या देश, जिनके साथ भारत के संबंध अच्छे नहीं है, वे वहाँ बड़े सक्रिय दिख रहे हैं.

अपने एक शोध में चयनिका सक्सेना लिखती हैं, "भारत को अफ़ग़ानिस्तान में एक पैर हमशा दरवाज़े के अंदर ही रखना होगा. तालिबान से संपर्क रखने को कहीं से भी इस दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए कि भारत उसे मान्यता दे रहा है. इसे इस रूप में देखा जाना चाहिए कि भारत ऐसी सरकार से डील कर रहा है जो अपने निर्णय लेने में कमज़ोर है. भारत को अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की ख़ातिर वहाँ अपनी मौजूदगी बनाए रखनी चाहिए."

विशेषज्ञ मानते हैं कि जिस तरह से पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान के मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है, उससे भारत को भी अपनी नीति पर पुनर्विचार करने के ज़रूरत है.

हाल ही में बीबीसी से इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए भारत के उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके अरविंद गुप्ता का कहना था कि भारत को अभी सब्र के साथ ही काम लेना चाहिए. उनका ये भी मानना था कि तालिबान से भारत को कुछ हासिल होने वाला नहीं है.

बीबीसी से बातचीत के क्रम में अरविंद गुप्ता ने ये भी कहा था कि तालिबान के असली चेहरे से सब परिचित हैं जो अभी तक एक 'घोषित चरमपंथी गुट' ही है. उनके अनुसार 'चरमपंथ और रूढ़िवाद' बड़ी समस्या बने रहेंगे. क्योंकि वो सोच कहीं से ख़त्म नहीं होने वाली है. तालिबान के सत्ता पर दख़ल से जिहादी सोच और भी विकसित होगी, जिसके दुष्परिणाम पूरी दुनिया ने पहले ही देख लिए हैं.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान और चीन के बढ़ते प्रभाव और हस्तक्षेप की वजह से सामरिक मामलों के विशेषज्ञ अब मानने लगे हैं कि भारत को भी अपने अफ़ग़ानिस्तान नीति की समीक्षा और उस पर पुनर्विचार करना चाहिए.

शायद यही वजह है कि तालिबान से दशकों तक दूरी बनाए रखने के बाद अब भारत भी आगे क़दम बढ़ा रहा है. चाहे दोहा के दूतावास में तालिबान के प्रतिनिधि से राजदूत दीपक इत्तल की मुलाक़ात हो या फिर मॉस्को फ़ॉर्मेट सम्मलेन के इतर भारत और तालिबान के प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई मुलाक़ात हो. अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत के रुख़ में बदलाव या नीति में बदलाव स्पष्ट रूप से झलकता है.

अगले महीने चार देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की दिल्ली में प्रस्तावित बैठक को भी राजनयिक हलकों में बड़े क़दम के रूप में ही देखा जा रहा है.

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