सामान्य ज्ञान

Previous123456789...133134Next
15-Oct-2021 5:48 PM (31)

दुनिया में पृथ्वी पर जीवन के इतिहास में लोगों कि डायनासोर और उनके अंत के बारे में ज्यादा चर्चाएं होती हैं. डायनासोर विषय पर भी अध्ययन बहुत हुए हैं, लेकिन 6.6 करोड़ साल पहले उनका विनाश करने वाली घटना के बाद जीवन का विकास कैसा रहा इस पर हुए शोधों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है. लेकिन एक नए अध्ययन ने डायनासोर युग के बाद के समय पर एक रोचक जानाकरी निकाली है. उस महाविनाश के बाद सांपों में बहुत सारी विविध प्रजातियां अस्तित्व में आई थीं और जैवविविधता की कमी को सांपों के इस जनसंख्या विस्फोट ने काफी हद तक पूरा कर दिया था.

सांपों की जनसंख्या में विस्फोट
डायनासोर के विनाश के बाद पक्षियों, स्तनपायी जीवों और पैर रहित सरीसृपों की जनसंख्या में एक तरह का विस्फोट हो गया था. इस अद्ययनके शोधकर्ताओं का कहना है कि इस सेनोजोइक युग में स्तनपायी जीवों की इतनी ज्यादा विविधता थी कि इसे स्तनपायी जीवों का युग कहा जाता है. लेकिन यह भी सच है कि इस युग में जितने स्तनपायी जीवों की प्रजातियां हुई उतनी ही सांपों की भी प्रजातियां देखने को मिली. इसलिए इसे सर्पों का युग भी कहा जा सकता है.

बहुत से अनसुलझे सवाल
आज दुनिया में सांपों की करीब चार हजार प्रजातियां  हैं. लेकिन इतनी विविधता कहां से, कब और क्यों आई, ऐसे सवालों के जवाब वैज्ञानिक आज भी तलाश रहे हैं. समस्या ये है कि सांपों का जीवाश्म रिकॉर्ड बहुत कम मिलते हैं और जो आज जिंदा है  वे इतने शर्मीले और छिपकर रहने वाले होते हैं कि उनके बारे में जानकारी जमा करना बहुत मुश्किल होता है.

इस वजह से अनिश्चितताएं
एक समस्या और यह भी है कि वैज्ञानिकों ने शोध के मामलों में इंसानों की तरह गर्म खून वाले जीवों को ज्यादा तरजीह दी है. यही वजह है कि जानकारी के अभाव में सांपों के विकास के मॉडलों में इतनी ज्यादा अनिश्चितताएं हैं. लेकिन इस अध्ययन में नए मॉडल ने जानकारी की इस कमी को पूरा करने की पूरी कोशिश की है.

बहुत कम आंकड़े
इस अध्ययन में 882 जिंदा सर्प प्रजातियों के प्रकाशित अध्ययन के आकंड़ों की तुलना संग्रहलायों में जमा नमूनों से की है. यह पहली बार सांपों के उद्भव विश्लेषण में इस तरह से आंकड़ों को अध्ययन में शामिल किया गया है. इसमें आंकड़े में सांपों की सभी बताई जा चुकी प्रजातियों की चौथाई भी शामिल नहीं थी.

बहुत जल्दी आती गई विविधता
यह पड़ताल बताती है कि पारिस्थितिकी अवसरों के मिलते ही जानवरों के वंशज जल्दी ही विविधता को प्राप्त होते गए. इसी का नतीजा यह रहा कि विविधता में एक विस्फोट हो गया जिसके बाद पारिस्थितिकी तंत्र जैवविविधता से तर बतर हो गया, विविधता की गति में कमी आ गई.

सांपों का खानपान
नए मॉडल के मुताबिक पुरातन सांपो के खान पान की प्रवृत्ति में बदलाव आ गया. यहां तक कि आज के सभी सांपों के पूर्वज पहले भी कीड़े मकोड़े ही खाया करते थे. डायनासोर के काल के समय आए महाविनाश के बाद सांपों के खानपान में विविधता शुरू हो सकी. इस मॉडल के मुताबिक आज के अधिकांश सांप छिपकली खाने वाला पूर्वजों से हुई है.

नए शोध इस बात पर एक मत हैं कि सांपों की प्रजातियों में विविधता डानासोर के विनाश के बाद ही हुआ था. लेकिन उनमें नए पारिस्थितिकी हालात में ढलने की बहुत अधिक क्षमता थी. उन्होंने अपने खान में काफी विविधता पैदा की. इसी गुण ने इनकी प्रजातियों में काफी विविधता पैदा कर दी. यह अध्ययन पीएलओएस बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है.(news18.com)


15-Oct-2021 12:53 PM (42)

पृथ्वी के इतिहास के बारे में पड़ताल कर वैज्ञानिक कई सवालों के जवाब तलाशते हैं. एक तरफ पृथ्वी की जलवायु का इतिहास हमें यह जानकारी देता है कि आने वाले समय में हमें किस तरह के बदलाव देखने को मिलेंगे, वहीं जीवाश्मों के अध्ययन से वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास करते हैं कि जलवायु और अन्य बदलावों ने कैसे जीवों के विकासक्रम को प्रभावित किया. लेकिन एक नए अध्ययन में इसकी ठीक उलटा देखने को मिला. शोधकर्ताओं ने जीवाश्मों के डीएनए का अध्ययन कर यह पता लगाया है कि कई हिमयुगों ने मध्य अफ्रीका के वर्षावनों के आकार को बहुत हद कर प्रभावित किया था.

संकुचित होकर बिखर गए वर्षावन
एक्स्टर यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार हिमयुगों की प्रभाव के कारण ही मध्य अफ्रीका के वर्षावन संकुचित होकर बिखर गए जिससे आज के सवाना घास के मैदान अस्तित्व में आ सके. अफ्रीका के वर्षा वन मध्य अफ्रीका का एक बहुत बड़ा भूभाग घेरते हैं. इस अध्ययन में एक्सेटर यूनिवर्सिटी के साथ केपनहेगन यूनिवर्सिटी, यूएलबी ब्रूसेल्स और क्यू के द रॉयल बॉटेनिक गार्डन्स के शोधकर्ताओं का भी योगदान था.

अलग अलग जगह विकसित हुईं एक ही प्रजातियां
शोधकर्ताओं ने की एक ही समय पर एक ही प्रजाति के दो अलग पूर्व जनसंख्याओं के अनुवांशकीय संकेतों की पहचान की जो जंगलों के बिखरकर उनके अलग अलग हिस्सों के बनने से  विकसित हुई थीं. इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस तथ्य का समर्थन करने वाले बहुत से प्रमाण हासिल किए.

खास पेड़ का अनुवांशकीय अध्ययन
माना जाता है कि पिछले कुछ लाखों सालों में बार बार आने वाले हिम युगों की वजह से मध्य अफ्रीका ठंडा और सूखा बनता गया जबकि भूमध्य रेखा से दूर के इलाके बहुत कम तापमान की वजह से जमते रहे. एक्सेटर यूनिवर्सिटी की डॉ रोसालिया पिनेरो ने बताया कि उन्होंने पांच लेग्यूमे पेड़ों के डीएनए का अध्ययन किया.

बिखराव पर दिया विशेष ध्यान
डॉ पिनेरो ने बताया कि लेग्यूमे पेड़ अफ्रीकी वर्षा वनों में बहुतायत में पाए जाते हैं. उन्होंने कहा, “हमने बिखराव यानि जनसंख्याओं के बीच भौतिक विभाजन के बहुत महत्वपूर्ण अनुवांशिकीय संकेतों की पहचान की है. इससे पता चलता है कि जंगल हिम युग के कारण ठंडे और सूखे दौर में पीछे खिसकते चले गए.

पेड़ नहीं जा सके ज्यादा दूर तक
शोध में पाया गया कि इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि हिम युग के बाद जिस दर से प्रजातियां नए इलाके में पनपीं, वह काफी अलग अलग थी. शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसा लगता है कि बीजों और परागों के कम दूरी तक फैलने की प्रणाली के कारण अन्य प्रजातियों की तुलना में पेड़ों में यह दर धीमी रही थी.

अब नहीं हो पाएगा ऐसा
डॉ पिनेरो ने बताया, “आज जलवायु और भूमि उपयोग  मानव गतिविधियों के कारण बहुत तेजी से बदल रहा है. इसकी वजह से ये पेड़ शायद फिर से दूसरी जगह प्रभावी तौर पर ना पनप सकेंगे. वहीं उष्णकटीबंधीय क्षेत्रों की हिम के शोधों के संबंध में  हमेशा ही उपेक्षा की जाती रही है. अफ्रीका और उष्णकटिबंधीय क्षेत्र दोनों का ही इन मामलों में कम अध्ययन हुआ है.

डॉ रोसालिया पिनेरो का यह अध्ययन प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुआ है. उन्होंने बताया कि लंबे इहास के बाद भी उनके नतीजे दर्शाते है कि अफ्रीकी वर्षावन एक गतिक बायोम हैं जहां पेड़ों की विविध प्रजातियों में जलवायु परिवर्तन की वजह से बहुत बदलाव आया है. (news18.com)


15-Oct-2021 10:13 AM (29)

नारियल के भूसे से कॉयर नामक मजबूत रेशा प्राप्त होता है। नारियल का रेशा सबसे अधिक मजबूत प्राकृतिक रेशों में से एक है। वहीं कोकोलॉन नारियल रेशे के जाल से बना होता है। इसे बिछाकर जमीन पर घास लगाई जाती है। कम्बल के रूप में बना बनाया कोकोलॉन उपलब्ध कराया गया है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान आसानी से ले जाया जा सकता है और इस दौरान उसे मोडक़र रखा जा सकता है। सीमेन्ट से बने सतहों पर भी इसे रखा जा सकता है।

नारियल उद्योग का संवर्धन और विकास के लिए संसद  के विधान के अधीन वर्ष 1953 में कॉयर बोर्ड की स्थापना की गई। इसे कॉयर उद्योग अधिनियम 1953 ( 1953 का 45) के नाम से जाना जाता है। यह बोर्ड नारियल रेशे से धन कमाने से जुड़ी गतिविधियों में संलग्न रहा है। उसकी सेवा के साठ वर्ष पूरे हो रहे हैं। कॉयर बोर्ड इस क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों और छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा करता रहा है। इसका उद्देश्य देश में नारियल उद्योग का संवर्धन और विकास करना है। उस समय केरल ही एक मात्र ऐसा राज्य था जहां इसकी गतिविधियां केन्द्रित थीं। किन्तु आज 14 राज्यों में कॉयर बोर्ड की गतिविधियां जारी हैं और देश भऱ में इसके विक्रय केन्द्र हैं। नारियल रेशे से जुड़े कामगारों को इसने बीमा का लाभ भी उपलब्ध कराया है।

भारत में लगभग 10 लाख लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्य़क्ष रूप से इस उद्योग में लगे हुए हैं। कॉयर उद्योग में एक हजार से भी अधिक छोटे उत्पादक लगे हुए हैं। नारियल रेशे के पारंपरिक उत्पादों के अलावा कॉयर उद्योग अब कांफ्रेस बैगों, यूवी उपचारित छतरियों, कॉयर चटाईयों, कॉयर चप्पलों, नारियल रेशे से बने गार्डेन के लिए उपयोगी वस्तुओं, कॉयर प्लाय की वस्तुओं, कॉयर भूवस्त्र, कॉयर जेवरातों और हस्तकलाओं जैसे अनेक उत्पाद तैयार करते हैं।


15-Oct-2021 10:12 AM (28)

ग्रीनविच मीनटाइम का मतलब था रॉयल ऑब्जर्वेटरी लंदन का मीन सोलर टाइम। इसे बाद में वैश्विक स्तर पर मानक समय माना गया। वैसे तो यह कॉर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम यूटीसी जैसा ही है, लेकिन जीएमटी को अधिकतर ब्रिटिश संस्थाएं इस्तेमाल करतीं थी। वर्ष 1884 में तय किया गया था कि ग्रीनविच मीन टाइम, दुनिया का मानक समय होगा।

 ग्रीनविच दक्षिण पूर्वी लंदन का हिस्सा है। इसे आज भी ब्रिटेन सहित कई कॉमनवेल्थ देशों में इस्तेमाल किया जाता है जिनमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं। 1 जनवरी 1972 में यूटीसी के इस्तेमाल के बाद से खगोल विज्ञानियों ने ग्रीनविच मीनटाइम का इस्तेमाल बंद कर दिया है।


15-Oct-2021 10:12 AM (21)

आरवी समुद्र रत्नाकर भू- वैज्ञानिक अनुसंधान पोत है जिसे गुजरात के कांडला बंदरगाह पर राष्ट्र को 12 अक्टूबर 2013 को समर्पित किया गया।  यह अनुसंधान जलपोत इस तरह का दक्षिण एशिया का एकमात्र जहाज है।

भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वे (जीएसआई) ने गहरे समुद्र में सर्वेक्षण और गहरे पानी में मौजूद खनिज के उत्खनन के लिए 600 करोड़ रुपए के आरवी समुद्र रत्नाकर नामक जहाज को सितंबर 2013 में खरीदा गया था। पोत आरवी समुद्र रत्नाकर की आपूर्ति दक्षिण कोरिया की कंपनी हुंडई हेवी इंडस्ट्रीज द्वारा सितंबर 2013 में की गई। यह नवीनतम प्रौद्योगिकी उपकरणों से लैस है।

जीएसआई ने गहरे समुद्र से आंकड़ों के संग्रह के लिए 50 वैज्ञानिकों को तैनात करने की योजना बनाई है। पोत आरवी समुद्र रत्नाकर को शामिल करने के साथ जीएसआई द्वारा पहली बार सर्वेक्षण और उत्खनन के लिए गहरे समुद्र जल में प्रवेश किया जाएगा। इस पोत की क्षमता 2700 डीडब्ल्यूटी है। आरवी समुद्र रत्नाकर के रखरखाव, प्रबंधन एवं संचालन के लिए जीएसआई ने शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के साथ एक समझौता किया है। यह पोत गहरे समुद्र में बेशकीमती खनिजों की खोज और उनके अनुसंधान में बेहद सहायक है। आरवी समुद्र रत्नाकर को दक्षिण कोरिया स्थित दुनिया के सबसे बड़े पोत निर्माण केंद्र उल्सान में तैयार किया गया है। यह अनुसंधान जलपोत आर्वी समुद्र रत्नाकर में 26 आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण लगे हुए है, जो समुद्र के तल में 6 हजार मीटर की गहराई में  अनुसंधान करने के लिए सक्षम है।


15-Oct-2021 10:11 AM (17)

1. भारत में निर्वाचन पद्धति निम्नलिखित में से किस देश के निर्वाचन पद्धति के अनुरूप है?

(अ) रूस (ब) अमेरिका (स) ब्रिटेन (द) फ्रांस

2. प्रत्यक्ष निर्वाचन किसे कहते हैं?

(अ) निर्वाचक मंडल द्वारा प्रतिनिधि चुनना (ब) अभिजात वर्ग द्वारा प्रतिनिधि चुनना (स) जनता द्वारा प्रतिनिधि चुनना (द) इनमें से कोई नहीं

3. रिटर्निंग अधिकारी कौन होता है?

(अ) वह अधिकारी, जो भूमि को दिए जाने के अस्वीकृत प्रार्थना पत्र को वापस करता है (ब) वह अधिकारी, जिसे अपने मूल विभाग में वापस भेजा जाता है (स) वह अधिकारी, जो राज्य विधानसभा सचिवालय का प्रधान होता है (द) वह अधिकारी, जो किसी निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव के लिए उत्तरदायी होता है और परिणाम की घोषणा करता है

4. भारत में मतदान की न्यूनतम निर्धारित आयु कितनी है?

(अ) 18 वर्ष (ब) 21 वर्ष (स) 35 वर्ष (द) इनमें से कोई नहीं

5. भारत के प्रथम मुख्य चुनाव आयुक्त कौन थे?

(अ) के. वी.के. सुंदरम (ब) सुकुमार सेन (स) एस.पी. सेन शर्मा (द) टी. स्वामीनाथन

6. चुनाव के समय किसी चुनाव क्षेत्र में चुनाव प्रचार कब बंद करना होता है?

(अ) मतदान प्रारंभ होने से 24 घंटे पहले (ब) मतदान समाप्त होने से 24 घंटे पहले (स) मतदान प्रारंभ होने से 48 घंटे पहले (द) मतदान समाप्त होने से 48 घंटे पहले

7. ऐसे पठार जो चारों ओर से पर्वत मालाओं द्वारा घिरे होते हैं, वे क्या कहलाते हैं?

(अ) गिरिपद पठार (ब) तटीय पठार (स) अंतरापर्वतीय पठार (द) वायव्य पठार

8. निम्नलिखित में से कौन सा वायुमंडल का सर्वाधिक स्थायी तत्व है?

(अ) नाइट्रोजन (ब) ऑक्सीजन (स) कार्बन डाइऑक्साइड (द) जलवाष्प

9. शरीर के लिए प्रोटीन की आवश्यकता क्यों होती है?

(अ)हड्डियों बनाने के लिए (ब) हार्मोंस व प्रतिजीवी बनाने के लिए (स) अधिक रक्त उत्पन्न करने के लिए (द)इनमें से कोई नहीं

10. किस भारतीय ने देश के बाहर सर्वप्रथम गणतंत्रात्मक सरकार की स्थापना की थी?

(अ) सुभाषचंद्र बोस (ब)राजा महेंद्र प्रताप (स) रासबिहारी बोस (द) मोहन सिंह

11. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने किस अधिवेशन में सर्वप्रथम मुफ्त व आवश्यक प्राइमरी शिक्षा की मांग की?

(अ) बनारस, 1906 (ब) दिल्ली,1918 (स) लाहौर, 1909 (द) बेलगांव, 1924

12. स्वतंत्र भारत में राज्यसभा के प्रथम सभापति निम्नलिखित मे से कौन थे?

(अ) बलिराम भगत (ब) डॉ. एस. राधाकृष्णन (स) डॉ. जाकिर हुसैन (द) बीडी जत्ती

13. राज्यसभा को भंग करने में कौन सक्षम है?

(अ) अध्यक्ष, राज्यसभा (ब) राष्ट्रपति (स) संसद का संयुक्त सत्र (द) इनमें से कोई नहीं

14. इंटरनेट से कंप्यूटर पर किसी फाइल को सेव करने को क्या कहते हैं?

(अ) डाउनलोडिंग (ब) अपलोडिंग (स) ट्रांसफरिंग (द)स्टोरिंग

15. सुपर कंप्यूटरों के साथ प्राथमिक तौर पर किस प्रकार के प्रोसेसिंग स्पीड मेजरमेंट का प्रयोग किया जाता है?

(अ) गीगा हर्ट्ज (ब) सेकंड के फ्रेक्शन (स)फ्लॉप्स (द) एमआईपीएस

16. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने भारत के राष्टï्रपति का पदभार निम्नलिखित में से किस वर्ष संभाला था?

(अ)1999 (ब)2000 (स)2001 (द) 2002

17. भारत में काम के बदले अनाज की राष्टï्रीय योजना कब शुरु की गई?

(अ) वर्ष 2000 (ब)वर्ष 2001 (स)वर्ष 2002 (द) वर्ष 2004

18. क्षुद्रग्रह जिन ग्रहों के बीच पाए जाते हैं, वे निम्नलिखित में से कौन से हैं?

(अ) मंगल और शुक्र (ब) बृहस्पति और शनि (स) मंगल और बृहस्पति (द) शनि और अरुण

19. सर्वप्रथम खोजा गया क्षुद्रग्रह कौन सा है?

(अ) सिरस (ब) पलास (स) जूनो (द) वेस्टा

20. एक कैलेंडर वर्ष में अधिक से अधिक कितने ग्रहण हो सकते हैं?

(अ) 5 (ब) 7 (स) 9 (द)11

21. किस नेटवर्क में नेटवर्क वायरों के सिरे टर्मिनेटरों से जुड़े होते हैं?

(अ) स्टार (ब) बस (स) हाइब्रिड (द) मेश

22. कंप्यूटर के सिस्टम को हैकरों से कौन सा भाग बचाता है?

(अ) स्नॉर्ट (ब) बैकअप (स) हार्ड डिस्क (द) फायरवाल

23. अर्जुन बांध नहर से उत्तर प्रदेश का लाभान्वित जिला निम्नलिखित में से कौन सा है?

(अ) एटा (ब) इटावा (स) गोरखपुर (द) हमीरपुर

24. हिन्डालको किस क्षेत्र में स्थापित किया  गया है?

(अ) राबर्टगंज में (ब) रेनूकुट में (स) मोदीनगर में (द) गोंडा में

25. उत्तरप्रदेश उद्योग बंधु योजना का उद्देश्य क्या  है?

(अ) उत्तरप्रदेश में उत्पादित वस्तुओं के निर्यात को प्रोत्साहित करना (ब) औद्योगिक इकाइयों की समयबद्घ स्थापना सुनिश्चित करना (स) औद्योगिक श्रमिकों को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करना (द) व्यावसायिक प्रशासन में प्रशिक्षण प्रदान

26. पृथ्वी के उत्तरी धु्रव एवं दक्षिणी धु्रव को मिलाने वाली रेखा क्या कहलाती है?

(अ) अक्षांश रेखा (ब) देशांतर रेखा (स) अंतर्राष्ट्रीय रेखा (द) मिलन रेखा 

---

सही जवाब-1.(अ) रूस, 2.(स) जनता द्वारा प्रतिनिधि चुनना, 3.(द) वह अधिकारी, जो किसी निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव के लिए उत्तरदायी होता है और परिणाम की घोषणा करता है, 4.(अ)18 वर्ष, 5.(ब) सुकुमार सेन, 6.(अ)मतदान प्रारंभ होने से 24 घंटे पहले, 7.(स) अंतरापर्वतीय पठार, 8.(द)जलवाष्प, 9.(ब) हार्मोंस व प्रतिजीवी बनाने के लिए, 10.(ब) राजा महेन्द्र प्रताप, 11.(ब) दिल्ली,1918, 12.(ब) डॉ. एस. राधाकृष्णन, 13.(द) इनमें से कोई नहीं, 14.(अ) डाउनलोडिंग, 15.(स) फ्लॉप्स, 16.(द)2002, 17.(द) वर्ष 2004, 18.(स) मंगल और बृहस्पति, 19.(अ) सिरस, 20.(ब) 7, 21.(ब) बस, 22.(द) फायरवाल, 23.(द) हमीरपुर, 24.(ब) रेनूकुट में, 25.(ब) औद्योगिक इकाइयों की समयबद्घ स्थापना सुनिश्चित करना, 26.(ब) देशांतर रेखा।


15-Oct-2021 9:50 AM (33)

इंसान के परिपक्व युवा होने में समय लगता है. मानव के उद्भव की प्रक्रियाओं को समझने के कोशिश में हमारे वैज्ञानिकों ने पाया है कि केवल चिम्पांजी ही मानव से मिलते जुलते हैं. लेकिन उनके भी एक बात अलग है. उनके पूरे दांत जल्दी ही पूरी तरह से विकसित हो जाते हैं जबकि मानव के दातों के साथ ऐसा नहीं होता है. मानव की अक्ल की दाढ़ काफी उम्र बीत जाने के बाद निकलती है. इस दाढ़ के निकलने का मानव के उद्भव से गहरा संबंध है. नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह बात साबित करने में सफलता पाई है. 

अमेरिका की एरिजोना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया है. इस शोध की प्रमुख लेखिका मानविज्ञानशास्त्री हेल्स्का ग्लोवाका का कहना है कि मानव के जैविक विकास में अक्ल की दाढ़ के विकास और जीवन के इतिहास में सटीक संयोजन का आना एक रहस्य था. ग्लोवाका ने एरीजोना यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन ओरिजिन्स के जीवाश्वम मानवविज्ञान शास्त्री गैरी श्ववार्ट्ज की मदद से अलग अलग मानव खोपड़ियों का अध्ययन किया. 21 प्रजातियों के प्राइमेट की हड्डियों और दातों के थ्रीडी मॉडल बनाकर शोधकर्ताओं ने पाया का अक्ल की दाढ़ के विकास का खोपड़ी की बायोमैकेनिक्स से गहरा संबंध है. 

इंसान के जो व्यस्क दांत खाने को चबा कर पेस्ट बनाने के लिए काम आते हैं वे तीन चरणों में निकलते हैं जो 6, 12 और 18 साल की उम्र के आसपास काम करते हैं. वहीं दूसरे प्राइमेट में व्यस्क अक्ल की दाढ़ पहले आती है. जैसे चिम्पांजियों में यह 3, 6 और 12 साल तक आती है. पीले बबून में यह केवल साल की उम्र तक पूरी विकसित हो जाती है. वहीं रीसिस मकाक में केवल छह साल की उम्र में ही विकसित हो जाती है. समय में इस अंतर की वजहों में दातों की जगह भी एक कारक होता है.

मानव के मुंह में कोई बहुत ज्यादा जगह नहीं होता है. हमारी प्रजाति के लिए अक्ल की दाढ़ एक बड़ी समस्या है. लेकिन यह इसकी वजह नहीं है कि हमारे जीवन में यह दाढ़ इतनी देर से क्यों विकसित होती है. चबाने की क्रिया में केवल दांतों का ही नहीं बल्कि मांसपेशियों और हड्डियों की भी भूमिका होती है जिससे पर्याप्त दबाव बनता है और खाना टूटता है और चबाया जा सकता है. 

श्ववार्ट्ज बताते हैं कि हमारे जबड़े धीरे विकसित होते हैं, इसकी वजह हमारा धीमा जीवन और छोटे चेहरे, सुरक्षित जगह का धीमा विकसित होना जैसे कारक हैं. इससे हमारी अक्ल की दाढ़ काफी देर से निकलने लगी. जहां प्राइमेट में अक्ल की दाढ़ दो टेम्पोरोमैंडिबुलर जोड़े के ठीक सामने निकलती है, जो जबड़े और खोपड़ी के बीच जोड़ बनाती है. हमारे शरीर के दूसरे जोड़ों के विपरीत केंद्रक बिंदुओं में समन्वय होना जरूरी है जिससे बल का स्थानांतरण समुचित तरीके से हो सके. खाना चबाने के मामले में ऐसा कई बिंदुओं पर होता है. 

जैवयांत्रिकी में यह तीन बिंदुओं वाली प्रक्रिया कंस्ट्रेंड लेवल मॉडल के सिंद्धांतों से निर्धारित होती है. गलत जगह पर दांत रखने से बल जबड़ों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. लंबे जबड़े वाली प्रजातियों में खोपड़ी सही दातों के लिए मांसपेशियों के पास सही संरचना विकसित करने में कम समय लेती है. मानव का चेहरा सपाट होता है इसलिए उसके साथ ऐसा नहीं हो पाता और उसकी अक्ल की दाढ़ विकसित होने में समय लगता है. 

इससे हमें दातों की स्थितियों के विकास के नए तरीके पता चले हैं, लेकिन इससे जीवाश्व विज्ञानियों को हमारे पूर्वजों में विशेष जबड़ों के विकास को समझने में भी मदद मिलेगी. ग्लोवाका का कहना है कि इस अध्ययन से हमें दांतों और जबड़ों के विकास आदि के संबधों को समझने के लिए नया तरीका मिलता है. यह अध्ययन साइंस एडवांस में प्रकाशित हुआ है.(news18.com)


14-Oct-2021 10:12 AM (34)

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने ऐलान किया है कि उसने मंगल ग्रह से चट्टानों के  नमूने जमा कर पृथ्वी पर लाने की तैयारी शुरू कर दी है. ये नमूने हाल ही में नासा के पर्सिवियरेंस रोवर ने जमा करना शुरू किए हैं. नासा के इस रोवर ने पिछले महीने की एक तारीख से चट्टानों में छेद कर नमूनों को जमा करने की कवायद शुरु की थी. नासा ने पिछले साल जुलाई में पर्सिवियरेंस को मंगल के प्रक्षेपित किया था जो इस साल फरवरी में मंगल की सतह पर उतरा था. अब इन नमूनों को नासा यूरोपीय स्पेस एजेंसी की मदद से पृथ्वी पर लाएगा.

पहली बार होगा ऐसा
यह पहली बार होगा जब किसी दूसरे ग्रह से पृथ्वी पर चट्टानों के नमूने लाए जाएंगे. इन नमूनों का पृथ्वी पर लाना नासा के महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक माना जाता है जिसमें बहुत से अंतरिक्ष अभियान सहित प्रक्षेपण और अंतरिक्षयान शामिल हैं और जिसमें कई देशों का सहयोग शामिल है.

तीन खास चरणों का अभियान
फिलहाल नासा का यह रोवर अगले कुछ सालों तक और जब तक नमूने पृथ्वी पर लाने वाले यान नहीं पहुंच जाते, नमूने जमा करता रहेगा. इस अभियान के तीन प्रमुख चरण हैं जिसमें नमूने जमा करना केवल पहला चरण है. दूसरे चरण में नासा का यान मंगल पर पहुंचेगा और नमूने लेकर उन्हें मंगल ग्रह से बाहर निकालने का काम करेगा. जिसके बाद वह उन नमूनों को तीसरे चरण में उस यान को देगा जो उन्हें पृथ्वी पर लाने का काम करेगा.

पहला चरण ही हुआ है सफल
पहले दो चरण का काम नासा की जिम्मेदारी है और अंतिम चरण का काम ईएसए के अभियान के जरिए पूरा होगा. इस पूरे अभियान के दूसरे और तीसरे चरण के हिस्से डिजाइन और तकनीकी विकास का चरण ही चल रहा है. नासा के मुताबिक नमूने लेने के लिए जाने वाला रॉकेट तैयार हो रहा है और यूरोपीय स्पेस एजेंसी सहित कई निकायों की इसमें सहायता ली जा रही है.

खास कैपसूल विकसित कर रहा है नासा
इस अभियान में ईएसए का सैम्पल फैच रोवर भी मंगल ग्रह पर भेजा जाएगा. इसका प्रक्षेपण इस दशक उत्तरार्ध में पृथ्वी से प्रक्षेपित किया जाएगा. इस रोवर का काम नमूनों का लैंडर तक लाना होगा जो नासा के जेपीएल में विकसित किया जा रहा है. लैंडर की रोबोटिक भुजा रॉकेट के शीर्ष पर पैक करेगी, जिसे नासा का हंट्सविले, अल्बामा का मार्शल स्पेस फ्लाइट सेंटर डिजाइन कर रहा है.

फिर ऑर्बिटर जाएंगे नमूने
इसके अलावा एक नमूने रॉकेट में जमा हो जाएंगे,  वह सैम्पल कैपसूल मंगल की कक्षा में मौजूद ऑर्बिटर कि ओर भेज दिया जाएगा. इसके बाद वह ऑर्बिटर पृथ्वी की  ओर लाने का काम करेगा. इसके लिए विशेषज्ञों का यह सुनिश्चित करना होगा कि रॉकेट का प्रक्षेप पथ, मंगल की कक्षा में मौजूद यान के कक्षापथ से मेल खाए जिससे कैपसूल ऑर्बिटर में स्थानांतरित किया जा सके.

एक काम यह भी
यह योजना तो तैयार है, लेकिन लाखों किलोमीटर दूर से नमूने लाना आसान काम नहीं है. नासा का कहना है कि एक प्रमुख कार्य नमूने के कंटेनर्स को सील करके स्टेरेलाइज करना भी है. लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना है कि इनके रासायनिक गुणओं में किसी तरह का बदलाव ना आने पाए.

ब्रह्माण्ड की नहीं हुई थी कोई शुरुआत, वैज्ञानिक का दावा

नासा के ही गोडार्ड सिस्टम इंजीनियर ब्रेंडन फीहन का कहना है कि फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती नमूनों को मंगल पर सबसे गर्म तापमान से बचाते हुए ठंडा रखने की है. इस अभियान का विरोध करने वालों की भी कमी नहीं हैं. कई बार आशंका जताई जा चुकी है कि मंगल से ऐसे सूक्ष्म जीव भी पृथ्वी पर आ सकते हैं जो वहां पर जीवन के नष्ट होने का कारण हो सकते हैं. या फिर वे पृथ्वी के लिए ही खतरनाक हो सकते हैं भले ही मंगल का इतिहास कुछ भी रहा हो. लेकिन अभी तक इस तरह आशंका केवल कल्पना ही हैं. (news18.com)


14-Oct-2021 10:11 AM (35)

हममें से अधिकतर लोग किसी न किसी प्रकार के डर के शिकार होते हैं. दरअसल, एक खास किस्म के डर को फोबिया कहा जाता है. ऐसा डर जिसका कोई स्तित्व नहीं होता है, लेकिन हमें लगता है कि उससे हमें नुकसान हो सकता है. फोबिया शब्द अंग्रेजी का है और यह ग्रीक भाषा के Phobos से बना है. Phobos का अर्थ होता है भय.

दरअसल, हम सभी लोग अपनी जिंदगी में कई तरह के डर से गुजरते हैं. किसी को पानी से डर लगता है तो किसी को ऊंचाई से देखने पर डर लगता है. उसे लगता है कि वह गिर जाएगा. ये सभी स्थितियां कहीं न कहीं किसी तरह की फोबिया की निशानी हैं. जब आप पानी से डरते हैं तो उसे Hydrophobia कहा जाता है.

खास वस्तु से डर
जब किसी व्यक्ति को कोई फोबिया होता है तो इसका मतलब यह है कि वह किसी खास वस्तु से बुरी तरह डरता है. वैसे यह पूरी तरह से डर का पर्याय नहीं है. फोबिया सामान्य डर से इतर की चीज है.

जिन लोगों को फोबिया होता है वे उन वस्तुओं या स्थिति से बचते हैं जिससे कि उन्हें डर लगता है. जैसे अगर किसी को हाइटफोबिया है तो इसका मतलब यह है कि वह ऊंचाई पर जाने और वहां से फिर नीचे की तरफ देखने जैसी स्थिति से बचता है.

फिक्र संबंधी विकार
यह एक तरह का फिक्र संबंधी विकार होता है. यह बेहद आम बात है. तमाम लोग इससे पीड़ित होते हैं. एक अनुमान के मुताबिक करीब 30 फीसदी लोग इस स्थिति से शिकार हैं.

इस बारे में अमेरिका किए गए शोध में पाया गया है कि अधिकतर तरह का फोबिया बेहद आम होता है. यह शोध अमेरिकी साइकेट्रिक एसोसिएशन ने किया है.

खुली जगह या भीड़ से डरना 
यह खास तरह का फोबिया है. इसमें कोई व्यक्ति खुली या वीरान जगह देखकर डर जाता है तो कोई भीड़ देखकर डरता है. उन्हें ऐसा लगाता है कि कोई ताकत उन्हें नुकसान पहुंचा सकती हैं. हालांकि उनकी इस आशंका का कोई आधार नहीं होता. बल्कि यह उनके मन और दिमाग की उपज होती है.

सोशल फोबिया
इसी तरह सोशल फोबिया होता है. आपको एक ऐसी सामाजिक स्थिति को लेकर भय लगता है, जो वास्तव में कभी होता ही नहीं है.

इस तरह अलग-अलग तरह के फोबिया होते हैं. इसमें खास तरह के वस्तु या स्थिति से आपको परेशानी होती है.

किसी भी रूप और आकार 
आपका ये जो फोबिया यानी डर होता है वो किसी भी रूप और आकार में आ सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि दुनिया में असंख्य तरह की वस्तुएं और स्थितियां हैं. ऐसे में आपको इससे होने वाला डर या भय भी असंख्य तरह का हो सकता है.

क्या है इलाज
दरअसल, मेडिकल साइंस में फोबिया का कोई इलाज भी नहीं होता. यह एक मानसिक स्थिति भर है. वास्तविकता से इसका कोई लेना-देना नहीं होता. आमतौर पर फोबिया का बहुत गहरा संबंध आपके जीवन के अनुभवों से होता है. आपके जीवन में ऐसी स्थिति आई रहती है जब आप डर गए होते हैं और आपके अंदर वही डर घर कर जाता है कि फिर से ऐसी स्थिति पैदा होने पर आपके साथ कुछ बुरा हो सकता है. बुरा होने का यही खयाल ही फोबिया है. (news18.com)


14-Oct-2021 10:10 AM (56)

केरल के कोल्लम की एक स्थानीय अदालत ने कोबरा सांप से डसवाकर पत्नी की हत्या करने के दोषी एक व्यक्ति को दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. इसके साथ ही अदालत ने कहा कि यह एक बेहद दुर्लभ मामला है. लेकिन उसने पति पी. सूरज की उम्र को देखते हुए मृत्यु दंड की सजा नहीं सुनाई. अदालत के इस फैसले से एक बार आजीवन कारावास की सजा और उसकी अवधि को लेकर बहस होने लगी है.

अदालत के अनुसार 32 वर्षीय दोषी को सभी सजाएं अलग-अलग काटनी होगी. इसके साथ ही अदालत ने कहा कि आजीवन कारावास की सजा 17 साल बाद शुरू होगी. इसका मतलब है कि दोषी को बाकी का जीवन जेल में काटना होगा. सोमवार को अदालत ने सूरज को अपनी पत्नी को कोबरा सांप से डसवाकर मारने का दोषी करार दिया था.

क्या है आजीवन कारावास की सजा
आजीवन कारावास का मतलब दोषी को बाकी का जीवन जेल में काटने से है. तमाम मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास की व्यख्या की है. इसके मुताबिक आजीवन कारावास के दोषी को कम से कम 14 साल और अधिकतम पूरा जीवन जेल में काटना होता है.

यहां रोचक बात यह है कि जब इंडियन पीनल कोड बनाया गया तब आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान नहीं था. 1955 में आईपीसी के सेक्शन 53 के तहत ‘ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ’ की जगह ‘इंप्रीजमेंट फॉर लाइफ’ की व्यवस्था की गई.

इस सजा के पीछे का तर्क दोषी को समाज से पूरी तरह से अलग करना होता है. इससे दोषी भविष्य न केवल फिर से कोई अपराध करने से बचेगा बल्कि वह यह सोचने पर मजबूर होगा कि उसने आखिर क्या गलती की है.

सीआरपीसी के तहत प्रावधान
सीआरपीसी के तहत कई ऐसे प्रावधान हैं जिसके तहत आजीवन कारावास की सजा दी जाती है. यहीं पर आईपीसी में एक प्रावधान है जिससे लोग कंफ्यूज हो जाते हैं कि आजीवन कारावास की अवधि क्या होती है. सीआरपीस के सेक्शन 55 और सेक्शन 57 में इसकी चर्चा है.

आईपीसी के प्रावधान
आईपीसी के सेक्शन 432, सेक्शन 433 और सेक्शन 433ए में आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है. इन सभी प्रावधानों में आजीवन कारावास की अवधि को लेकर काफी कंफ्यूजन है.

इसी कंफ्यूजन को सुप्रीम कोर्ट ने अपने तमाम फैसलों में स्पष्ट किया है. ‘नायब सिंह बनाम पंजाब सरकार’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी के सेक्शन 55 और आजीवन कारावास की अवधि की व्यख्या की है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आजीवन कारावास का एक दोषी 14 साल तक जेल में रहने के बाद रिहाई का दावा नहीं कर सकता है. आजीवन कारावास दोषी की मौत तक जारी रहता है. इस सजा की अवधि को केवल माफी और सजा में बदलाव की स्थिति में कम किया जा सकता है.

निष्कर्ष
जैसा कि आजीवन कारावास की सजा से स्पष्ट है कि यह सजा पूरे जीवन के लिए है. हालांकि कोई सरकार कुछ खास कारकों पर विचार कर कैदी को राहत दे सकती है. इस कारकों में कैदी का व्यवहार, उसके परिवार की स्थिति, उसकी उम्र और जेल में कैदी के काम काफी मायने रखते हैं. (news18.com)


13-Oct-2021 8:50 PM (55)

-Sanjay Srivastava

एयरइंडिया दोबारा टाटा के पास पहुंच गई है. करीब 90 साल पहले जेआरडी ने टाटा ने इसे मेल सर्विस के तौर पर शुरू किया. फिर इसे एयरलाइंस में बदला. फिर ये पूंजी बाजार में उतरी. आजादी के बाद 1953 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जब इसका राष्ट्रीयकरण किया तो जेआरडी टाटा को खासा झटका लगा लेकिन नेहरू ने उन्हें आश्वस्त किया कि वो हमेशा एयरइंडिया के बॉस रहेंगे. इसके बाद 1978 तक टाटा लगातार इसके चेयरमैन बने रहे. जब जनता पार्टी के शासनकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें पद से हटाया और जिस तरह हटाया, उससे जेआरडी बहुत आहत हुए. लेकिन इसके दो साल बाद ही इंदिरा गांधी जब सत्ता में आईं तो उन्होंने टाटा को फिर इस पद पर बिठाया.

पिछले दिनों एयर इंडिया को वापस टाटा को दिए जाने के बाद इसे लेकर कई तरह की खबरें मीडिया में आईं. एक खबर इंदिरा गांधी के पत्र की भी आई, जब उन्होंने जेआरडी को पद से हटाने की घटना पर अफसोस जाहिर किया था. अब हम जानेंगे कि ऐसा क्यों किया गया था. हटाने का तरीका क्यों जेआरडी को नागवार पहुंचा.

दरअसल ये बात सही है कि एयर इंडिया को लेकर समय समय पर कई नेता और मंत्री नाराज होते रहे हैं. नाराज होने वाले लोगों में कभी मोरारजी देसाई का भी नाम आया था. हालांकि मोरारजी ने उन्हें हटाने का बहुत अजीब गरीब तर्क दिया था. एक बड़ी वजह भी ऐसी बन गई थी, जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री को ऐसा करने का मौका भी मिल गया था.

एयर इंडिया का बड़ा हादसा 
01 जनवरी 1978 को एयर इंडिया के विमान की बहुत बड़ी दुर्घटना हुई. इसे एयर इंडिया के इतिहास में बड़े हादसों में गिना जाता है. एयर इंडिया का पहला बोइंग 747 विमान मुंबई से उड़ते ही समुद्र में गिर गया. इस विमान में क्रू समेत 213 लोग सवार थे. कोई नहीं बचा. बाद में पता लगा कि ये हादसा पायलट की गलती से हुआ था.

एक महीने बाद जेआरडी को हटा दिया 
इस हादसे के एक महीने बाद ही मोरारजी सरकार ने जेआरडी को हटा दिया. रिटायर्ड एयरचीफ मार्शल प्रताप चंद्र लाल को एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का चेयरमैन बनाया गया. लाल टाटा की ही किसी कंपनी में एमडी थे. 03 फरवरी 1978 को दिन में उन्हीं से जेआरडी ये जानकारी मिली कि सरकार ऐसा करने जा रही है. शाम को आल इंडिया रेडियो पर इस खबर का प्रसारण हुआ.

मोरारजी देसाई ने अपने खत में टाटा से कहा कि कुछ जरूरी बदलावों के चलते वो उन्हें पद से हटा रहे हैं.
मुंबई लौटने पर जेआरडी को पीएम का लेटर मिला
उस समय जेआरडी जमशेदपुर में थे. शाम को जब वो वहां अपने टाप मैनेजमेंट के साथ डिनर कर रहे थे. उनके सहयोगियों ने उन्हें उदास पाया. अगले दिन सारे अखबारों में भी ये खबर सुर्खियों में थी. 09 फरवरी को जेआरडी बांबे लौटे. वहां उन्हें पीएम का भेजा लेटर मिला. जो 04 फरवरी का था लेकिन इसे दिल्ली से डिस्पैच 06 फरवरी को किया गया था. उन्हें 01 फरवरी को तुरत प्रभाव से हटाया गया था.

मोरारजी ने लिखा-बस वो बदलाव कर रहे हैं
प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अपने पत्र में पहले तो एयर इंडिया और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में उनके योगदान की तारीफ की थी. साथ ही ये भी लिखा था कि उन्हें काम में किसी कमी की वजह से नहीं हटाया जा रहा बल्कि कुछ बदलावों के कारण ऐसा करना जरूरी हो गया. बदलाव समय के साथ जरूरी भी है.

जेआरडी का जवाब नाराजगी भरा था
जेआरडी ने इस पत्र के जवाब में खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की. उन्होंने प्रधानमंत्री को जवाबी खत लिखा कि जिस तरह उन्हें हटाया गया, वो तरीका सही नहीं था. अगर सरकार चाहती तो जनता में बात आने से पहले एक बार उन्हें जानकारी दे सकती थी.

एयर इंडिया का राष्ट्रीयकरण होने के बाद नेहरू ने जेआरडी टाटा को इसका चेयरमैन बनाया. जेआरडी 33 सालों तक इस पद पर रहे लेकिन कभी एक पैसा वेतन के रूप में नहीं लिया.
33 सालों तक अवैतनिक चेयरमैन रहे.

शायद जेआरडी अपनी जगह सही थे. उन्होंने 1953 में एयर इंडिया का चेयरमैन बनने के लेकर हटाए जाने तक सरकार से अपने काम के बदले कोई वेतन नहीं लिया था. वह खुद अवैतनिक तौर पर ये जिम्मेदारी संभाल रहे थे. जेआरडी को इस तरह हटाए जाने का असर एयरलाइंस के कर्मचारियों के मनोबल पर भी पड़ा. देश में भी इसका विरोध हुआ. लंदन के “द टेलीग्राफ” अखबार ने खबर छापी, “अनपेड एयर इंडिया चीफ इन सेक्ड बाई देसाई”. प्रधानमंत्री देसाई की इस मामले पर काफी किरकिरी हुई.

इंदिरा ने सत्ता में लौटते ही उन्हें दोबारा सौंपी जिम्मेदारी 
1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में जब वापस लौटीं तो उन्होंने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस दोनों में प्रमुख के पद पर फिर जेआरडी की नियुक्ति कर दी. वो 1986 में वो तब तक काम करते रहे जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रतन टाटा को एयर इंडिया का चेयरमैन बना दिया. 1982 में जब टाटा के विमान सेवा में उतरने के 50 साल पूरे हो रहे थे जब टाटा ने एक और गजब का काम किया. उन्होंने फिर पस मोट विमान को कराची से मुंबई तक उड़ाया. तब वो 78 साल के हो रहे थे. (news18.com)


12-Oct-2021 6:57 PM (57)

देश संभावित बिजली संकट की वजह से कोयला आधारित ताप बिजली उत्पादन क्षमता को लेकर बहस छिड़ी हुई है. सवाल किए जा रहे हैं कि अगर कोयले की सप्लाई की यही स्थिति रहती है तो क्या भारत के सामने इससे उबरने के लिए कोई रास्ता है. दरअसल, आज देश में जो ऊर्जा संकट की स्थिति बनती दिख रही है वो कोई एक दिन की स्थिति नहीं बल्कि इसके दीर्घकालिक असर होने वाले हैं.

आखिर क्यों है संकट
यह बात सभी को पता है कि थर्मल पावर प्लांट्स को कोयले की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने के कारण देश में बिजली संकट पैदा होता दिख रहा है. दूसरी तरफ कोरोना काल में बंद पड़े उद्योगों में फिर से पूरी क्षमता के साथ काम शुरू हो गया है इसलिए बिजली की मांग में भारी वृद्धि हुई. ऐसे में मांग और सप्लाई के बीच यह का अंतर बिजली संकट पैदा कर रहा है.

क्यों नहीं हो रही कोयले की आपूर्ति
भारत में कोयले का विशाल भंडार होने के बावजूद यह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेश के कोयले का आयात करता है. ऐसा इसलिए भारत में कोयला खनन के काम में लगी कंपनियां जरूरत को पूरा करने के लिए खनन नहीं कर पाती है. दूसरी तरफ, दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडार वाला देश चीन भी परेशान है. वहां के भी खदानों में पर्याप्त मात्रा में कोलये का खनन नहीं हो रहा है. दरअसल, चीन ने अपने बड़े खदानों की सुरक्षा ऑडिट करवा रहा है. पिछले दिनों खदानों में हुई दर्घटना को देखते हुए ऐसा करवाया जा रहा है. इससे वहां उत्पादन घटा है.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में चार गुना तक बढ़े दाम
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की आपूर्ति कम हो गई है. इंडोनेशिया और कई अन्य देशों में भारी बारिश की वजह से वहां उत्पादन प्रभावित हुआ है. दूसरी तरफ चीन अपनी बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी कीमत पर अंतरराष्ट्रीय बाजार से कोयला खरीदने को उतारू है. इस कारण बीते कुछ महीनों में कोयले के दाम में चार गुना तक की वृद्धि हुई है.

भारत में कोयले की जरूरत
आप कोलये की जरूरत को इसी से समझ सकते हैं कि भारत अपनी कुल बिजली जरूरत में से आधे से अधिक का उत्पादन कोयले से करता है. भारत सरकार के बिजली मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश में कोयले से 52.6 फीसदी बिजली का उत्पादन किया जाता है.

इसके अलावा इग्नाइट से 1.7 फीसदी, गैस से 6.5 फीसदी और डीजल से 0.1 फीसदी बिजली का उत्पादन किया जाता है. ये सभी जीवाश्म ईंधन के तहत आते हैं. इसके 12 फीसदी बिजली का उत्पादन पनबिजली संयंत्रों से और 25 फीसदी बिजली का उत्पादन पवन, सोलर और अन्य रिन्यूएबल स्रोतों से किया जाता है. देश में अब भी केवल 1.7 फीसदी परमाणु बिजली का उत्पादन किया जाता है.

कोयले का विकल्प
देश की आर्थिक विकास की दर और तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के पास अब भी कोयले का कोई पुख्ता विकल्प नहीं है. भारत ही नहीं बल्कि चीन का भी यही हाल है. चीन में भी ऊर्जा की मांग बेहद तेजी से बढ़ रही है और वह भी अपनी आधी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से कोयले पर निर्भर है.

भारत में ऊर्जा उत्पादन के अन्य विकल्पों पर काम हो रहा है और उसमें तेजी से वृद्धि भी हो रही है लेकिन भविष्य की मांग और लागत को देखते हुए कोयले पर निर्भरता जरूरी है. दरअसल, कोलये के अलावा ऊर्जा उत्पादन के तमाम अन्य स्रोत काफी महंगे हैं. ऐसे में भारत की अर्थव्यवस्था महंगी ऊर्जा के इस बोझ को ढोने में सक्षम नहीं है. (news18.com)


12-Oct-2021 6:56 PM (54)

हमारी पृथ्वी हर क्षण बदल रही है. कुछ प्रक्रियाएं इसे तेजी से प्रभावित कर रही हैं तो अधिकांश बहुत ही धीरे-धीरे. लेकिन आज से 500 साल बाद पृथ्वी कैसी दिखेगी इसका पूर्वानुमान लगाना मुश्किल इसलिए है क्योंकि इसमें बहुत सारे कारक ऐसे भी हैं जो खुद अगले 500 सालों में बदल सकते हैं जिनका भी अनुमान लगा पाना आसान काम नहीं है. यह बिलकुल वैसा ही है 15वीं सदी के लोग आज की दुनिया के बारे में किस तरह से सही अनुमान लगा पाते. इसमें दो तरह की प्रक्रियाएं शामिल हैं. एक वो जिनमें प्राकृतिक चक्र शामिल हैं और दूसरी में मानव सहित जीवन की वजह से होने वाली प्रक्रियाएं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: 

पृथ्वी खुद भी गतिमान और लगातार बदल रही है. उसके घूर्णन और सूर्य की परिक्रमा के अलावा, उसके डगमगाने की प्रक्रिया, उसकी अपनी धुरी पर झुकाव में बदलाव, यहां तक कि कक्षा में बदलाव उसकी सूर्य से दूरी बदल देता है. ये बदलाव हजारों लाखों सालों में होते हैं और इनकी वजह से ही हिम युग जैसी घटनाएं होती हैं. भूगर्भीय लिहाज से 500 साल बहुत बड़ा समय नहीं है. 

दूसरी तरफ जीवन की प्रक्रियाएं भी पृथ्वी में बदलाव ला रहे हैं. जीवन का ग्रह पर असर का अनुमान लगाना मुश्किल है. पारिस्थितिकी तंत्र के एक हिस्सा में बदलाव दूसरे बदलावों को शुरुआत काफी बड़ा अंतर ला सकता है. इसमें मानवजनित प्रक्रियाएं पृथ्वी को बहुत से मायनों में बदल रही हैं और यह असर जीवन के प्रभावों में सबसे बड़ा है. जंगलों का साफ होना, कृषि के लिए वन्यजीवों के आवासों का टूटना, शहरों का बेतरतीब निर्माण, जैसे बहुत से कारक है जिन परिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंच रहा है.

मानव जनित गतिविधियां ग्लोबल वार्मिंग में बड़ा योगदान दे रहीं हैं जिससे जलवायु में स्थायी बदलाव तक हो रहे हैं. ऐसा जीवाश्म ईंधन के जलाने और अन्य क्रियाओं के कारण अधिकाधिक ग्रीन हाउसगैसों के उत्सर्जन हो रहा है जिसे हमारा वायुमंडल सहन और वहन नहीं कर सकता है. ग्रीनहाउस गैसें सूर्य से आने वाली ऊष्मा को अवशोषित कर लेती हैं जो एक अच्छी प्रक्रिया है, लेकिन यह इतनी ज्यादा बढ़ रही है जिससे नुकसान होने लगा है. ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड होने से तापमान बढ़ता है जिससे गर्मी के दिन ज्यादा गर्म हो जाते हैं और आर्कटिक और अंटार्कटिका में बर्फ की चादरें तेजी से पिघल रही हैं जिससे समुद्र तटों पर बसे इलाकों में बाढ़ आने का खतरा है.

लेकिन ये सारी चीजें वो हैं जिनका पृथ्वी अभी सामना कर रही है. ये बदलाव 500 साल बाद पृथ्वी में बहुत ज्यादा अंतर ला सकते हैं. लेकिन काफी कुछ इस पर निर्भर करता है कि इंसान पृथ्वी के प्रति अपने तौर तरीके कैसे बदलता है. गर्म होता ग्रह जमीन पर चरम मौसम जैसे गर्म लहर, तूफान और सूखे जैसे हालाता ला सकता है. पूरी पृथ्वी पर जीवन जोखिम में है. वैसे भी पृथ्वी पर सारे बदलाव इंसान के कारण नहीं होंगे. हां इंसान ने उन्हें खराब जरूर किया है. 

500 साल पहले लोग आज की पृथ्वी की जीवनचर्या की कल्पना भी नहीं कर पाते थे. वे चलती कारें या मोबाइल फोन उनकी सोच के दायरे से बहुत बाहर की चीज रही होगी. जहां तकनीक ने तरक्की कर अकल्पनीय सुविधाएं दी हैं. तकनीक जलवायु समस्या का समाधान तक ला सकती है. तकनीक ने जलवायु परिवर्तन  जैसी समस्याएं पैदा की है. 1980 के दशक में पहचाना गया ओजोन होल का बनना मानव निर्मित तकनीक पैदा हुए क्लोरोफ्लोरो कार्बन जैसे प्रदूषकों की वजह से ही बना था. और तकनीक ने ही उस समस्या के हमारा परिचय कराकर उसके निदान और उपचार के लिए प्रेरित भी किया था. अगर इंसान ने सही दिशा में कदम ना उठाए तो पृथ्वी पर जीवन और दूभर होने वाला है यह तय माना जाना चाहिए. 

(news18.com)


12-Oct-2021 6:54 PM (38)

दुनिया में तकनीक के साथ इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का उपयोग बेतहाशा बढ़ गया है. टनों की मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर रोज सेमीकंडक्टर चिप और अन्य उपकरणों के घटकों का उत्पादन हो रहा है. ये प्रिटेंड सर्किट बोर्ड पर लगाए जा रहे हैं आज के तकनीकों उपकरणों में से अधिकांश के दिमाग की तरह काम करते हैं. गाड़ियों, उत्पान मशीनों, वायुयान, टर्बाइन्स आदि को नियंत्रित करने वाले ये महंगे बोर्ड हजारों डॉलर की कीमत के होते हैं. समय के साथ ये बोर्ड खराब हो जाते हैं और खारिज कर दिए जाते हैं. इस समस्या का समाधान इन्ही खारिज किए गए उपकरणों के हिस्सों के सुधार और पुनः उपयोग में हैं जिससे बहुत सारा इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होने से बच सकता है.

क्यों फेंक दिए जाते हैं उपकरण
दिक्कत यही है कि समय के साथ सर्किट बोर्ड के घटक बेकार हो जाते हैं. सॉफ्टेवेयर अपडेट के कारण ये हिस्से धीमे हो जाते हैं और काम करने लायक ना रहकर बेकार घोषित कर खारिज कर दिए जाते हैं.  जबकि थोड़े से सुधार के साथ इन्हें फिर से उपयोग में लाया जा सकता है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि यह सच जानने के बाद भी बहुत सारे उपकरण पूरे के पूरे खारिज कर कचरे में क्यों फेंक दिए जाते हैं.

बच सकता है ये कचरा
हर स्थिति में यदि किसी इंजीनियर तक टेक्नीशियन को सह उपचार उपकरणों के से सुसज्जित कर प्रशिक्षण दिया जाए तो वह इन महंगे उपकरणों को सुधार कर बहुत से सारे घटकों को कचरा बनने से बचा सकता है. लेकिन खराब हिस्सों वाले उपकरणों को नए उपकरणों से ही बदल देना ई वेस्ट के समस्या को गहरा कर देता है.

एक खास मानसिकता जिम्मेदार
यूनाइटेड नेशन्स यूनिवर्सिटी के मुताबिक पूरी दुनिया में हर साल 5 करोड़ टन से ज्यादा ई- वेस्ट पैदा होता है. पूरे वाणिज्यिक संसार में फैली “सुधारने की जगह बदलने” की मानसिकता इसकी जिम्मेदार है. लेकिन एक अहम काम कचरे को हटाना होता है जिससे उत्सर्जन कम होते हैं और कीमती संसाधन बचाए जा सकते हैं.

आधुनिक उपकरणों के हिस्सों को सुधारने की बजाए पूरा उपकरण ही बदलने की मानसिकता सबसे नुकसानदायक है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
नए उपकरण लाने से नुकसान भी
कई जगह कचरे में फेंके गए सर्किट बोर्ड के अध्ययनों में पाया गया है कि उनमें से बड़ी संख्या में बोर्ड सुधारे जा सकते थे. लेकिन प्रबंधन ने उस कचरे की अहमियत नहीं समझी. पुराने बोर्ड की जगह नए बोर्ड का उपयोग करना महंगा ही नहीं पड़ता, बल्कि संसाधनों का खराब उपयोग भी साबित होता है. नए बोर्ड खरीदने तक उपकरण बंद रहते हैं इससे उत्पादकता और आर्थिक नुकसान भी होता है.

इस वजह से भी बढ़ी ये समस्या
ऐसे ही तौर तरीकों के कारण उद्योग में ई वेस्ट की समस्या पिछले कई दशकों से बढ़ती ही जा रही है. इसमें धारणा यह बनाई जाती है कि सुधारे गए उपकरण से नए उपकरण बेहतर काम करते हैं. मूल उपकरण निर्माता नीति में सुधार को हमेशा हतोत्साहित किया जाता है. ऐसा ना होने पर तक टेक्नीशियनों के पास जरूरी सुधार के लिए सही उपकरण नहीं होते हैं. इससे अरबों डॉलर का नुकसान होता है और टनों की मात्रा में जहरीला कचरा पैदा हो जाता है.

समय ने चेताया है हमें
कोविड-19 महामारी ने हमें उपकरणों के हिस्सों की कमी से बखूबी वाकिफ करा दिया है. इससे कई उपकरण बनने ही बंद हो गए. वहीं उपकरणों की मरम्मत भी आसानी से उपलब्ध नहीं थी. अच्छे और काबिल टेक्नीशियन को रखना भी मुश्किल काम है. हाल ही में ‘रिप्एर डोन्ट वेस्ट’ अभियान चलाया गया जिसमें सुधार पर जोर दिए जाने की वकालत की गई. लेकिन इस दिशा में भी बहुत काम किया जाना बाकी है.

बेशक “बदलने की जगह सुधार” के बहुत फायदे हैं लेकिन इसे बहुत व्यापक बनाने की जरूरत है. खुद उत्पादनकर्ताओं को इसका बढ़ावा देना होगा. एमओयू में रखरखाव और जीवन चक्र समर्थन जैसी चीजों को सही तरह से शामिल करना सबसे अहम होगा. इसके लिए हर स्तर पर शिक्षा और जागरुकता भी जरूरी है. जरूरत लोगों की सोच और नजरिए में बदलाव की सबसे ज्यादा है. (news18.com)


12-Oct-2021 10:08 AM (39)

विटामिन बी1 का वैज्ञानिक नाम थायमिन हाइड्रोक्लोराइड है। वयस्कों को प्रतिदिन विटामिन बी1 की एक मिलीग्राम मात्रा आवश्यक होती है।  गर्भवती स्त्रियों को अपने पूरे गर्भावस्था के समय तक विटामिन बी1 की 5 मिलीग्राम आवश्यक होती है।  शरीर में विटामिन बी1 जरूरत से ज्यादा हो जाने पर पेशाब के साथ बाहर निकल जाता है। व्यक्ति की आयु बढ़ाने में लिए विटामिन बी1 का महत्वपूर्ण योगदान होता है।

विटामिन बी1 की कमी से बेरी-बेरी रोग हो जाता है इसलिए इसको वैज्ञानिक बेरी-बेरी विटामिन भी कहते हंै।  बेरी-बेरी रोग विशेष रूप से उन लोगों को होता है जो मशीन से पिसा हुआ आटा और चावल ज्यादा मात्रा में खाते हैं। यदि भोजन में विटामिन बी1 की कमी हो जाए तो शरीर कार्बोहाइड्रेटस तथा फास्फोरस का सम्पूर्ण प्रयोग कर पाने में समर्थ नहीं हो पाता। इससे शरीर में एक विषैला एसिड जमा होकर रक्त में मिल जाता हैं और मस्तिष्क के तंत्रिका संस्थान को हानि पहुंचाने लगता है। इसकी कमी से होने वाले बेरी-बेरी रोग में रोगी की मांसपेशियों को जहां भी छुआ जाए वहां वेदना होती है तथा उसके पश्चात स्पर्श शून्यता का आभास होता है।   विटामिन बी1 का रोगी अक्सर अजीर्ण रोग रहता है। 

वयस्क व्यक्ति को प्रतिदिन विटामिन बी1 900 यूनिट अ. ई. की आवश्यकता पड़ती है।  विटामिन बी1 मूलांकुरों में अधिक पाया जाता हैं। दूध पीने वाले बच्चों को शरीर में विटामिन बी1 की कमी से उल्टी और पेट दर्द जैसे विकार हो जाते हैं।  इसकी कमी हो जाने से रोगी की भूख मर जाती है तथा वजन तेजी से गिरने लगता है।  हृदय और मस्तिष्क में कमजोरी तथा दूसरे दोष हो जाते हैं। पाचन अंगों को भारी हानि पहुंचती है जो पहले रोगी को समझ में नहीं आती लेकिन बाद में जब उसके भयंकर परिणाम सामने आते हैं।  कार्बोहाइड्रेट्स तथा फास्फोरस का शरीर में पूर्ण उपयोग तभी हो सकता है जब शरीर में पर्याप्त मात्रा में विटामिन बी1 मौजूद हों। बहुत से चर्म रोग विटामिन बी1 की कमी की वजह से भोगने पड़ते हैं। पीलिया रोग के पीछे भी विटामिन बी1 की कमी होती है। मोटे व्यक्तियों को विटामिन बी1 की अधिक आवश्यकता होती है।  इसकी कमी से हृदय बड़ा हो जाना रोगी के लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है।


12-Oct-2021 10:08 AM (31)

सुदूरवर्ती गहन अंतरिक्ष में खगोलीय धूल कणों के घने बादलों से ढंके होने के कारण, पार्थिव प्रकाशीय दूरबीनों से, अनगिनत आकाशीय पिंडों को देख पाना संभव नहीं हो पाता है, लेकिन स्पिट्जर अंतरिक्ष टेलीस्कोप में लगा इंफ्रारेड टेलीस्कोप इन घने बादलों के बीच भी सरलता से देख लेता है। इस शक्तिशाली टेलीस्कोप ने पृथ्वी से 5400 प्रकाश वर्ष दूर अंतरिक्ष में खगोलीय धूल कणों के घने काले बादलों के बीच उत्पत्ति की अवस्था में विद्यमान लाखों तारों का पता गाया है। इन तारों को स्टेला स्टार्स कहा जाता है।

अनंत अंतरिक्ष के रहस्यों को खोजने में जुटी स्पिट्जर अंतरिक्ष टेलीस्कोप ने ट्रिफिड नेबुला नामक निहारिका में घने चमकीले बादलों के बीच लाखों स्टेला स्टार्स का पता लगाया है। इन स्टेला तारों की उत्पत्ति और विकास की प्रक्रिया अति तीव्र है। पृथ्वी से इनकी दूरी लगभग 6 खरब किमी है।


12-Oct-2021 10:07 AM (36)

ड्रिंकर रेस्पिटेर एक प्रकार की मशीन है जिसका उपयोग चिकित्सा के क्षेत्र में किया जाता है। 12 अक्टूबर 1928 के दिन पहली बार अमेरिका के बोस्टन में चिल्ड्रन हॉस्पिटल में एक बच्ची के लिए आयरन लंग नाम की मशीन का इस्तेमाल किया गया. एक मिनट में हुआ जादू। आठ साल की बच्ची का श्वसन तंत्र पोलियो या इन्फैंटाइल पैरालिसिस के कारण काम करना बंद कर चुका था। सांस नहीं लेने के कारण वह मरने की हालत में पहुंच गई थी। उस दौरान आयरन लंग रेस्पिरेटर का पहली बार क्लीनिकल प्रयोग किया गय। एक मिनट के अंदर उस बच्ची की जान बची और मशीन फेमस हो गई।

ड्रिंकर रेस्पिटेर के नाम से मशहूर इस मशीन को फिलिप ड्रिंकर और लुइस अगासिज ने बनाया था। मशीन इलेक्ट्रिक मोटर से चलती थी और उसमें वैक्यूम क्लीनर वाले दो एयर पंप लगे हुए थे। एयर पंप से चौकोन, एयर टाइट मेटल बॉक्स के जरिए हवा फेंफड़ों से निकाली और उसमें डाली जा सकती है। इसे निगेटिव प्रेशर वेंटिलेटर कहा जा सकता है। इसे तब इस्तेमाल किया जाता है, जब किसी बीमारी के कारण सांस नहीं आ सके।


12-Oct-2021 10:06 AM (36)

शेख फैजी का जन्म 1547 ई. में आगरा में हुआ था। वह अकबरकालीन प्रसिद्घ विद्वान शेख मुबारक का पुत्र था। बचपन से ही शेख फैली ने कविता करना प्रारंभ कर दिया था। अकबर शेख फैजी की प्रशंसा सुनकर उससे प्रभावित हुआ। अकबर ने शेख फैजी को अपने दरबार में नियुक्त कर लिया। शेख फैजी स्वतंत्र विचारों वाला विद्वान था तथा धर्मान्धंता का विरोधी होने के कारण अकबर का कृपापात्र भी था।

फैजी अकबर के काल का एक श्रेष्ठï कवि व विद्वान था। बदायूंनी ने फैजी की अत्यधिक प्रशंसा की है तथा उसे काव्य, इतिहास, चिकित्साशास्त्र व निबंध रचना में अद्वितीय बताया है। अकबर के दीन ए इलाही का शेख फैजी सदस्य था। 5 अक्टूबर 1595 को अनेक बीमारियों से पीडि़त होने के कारण शेख फैजी की मृत्यु हो गई।


12-Oct-2021 10:05 AM (29)

12 अक्तूबर वर्ष 1967 में भारत के स्वतंत्रता सेनानी तथा समाजवादी राजनेता डॉ. राममनोहर लोहिया का निधन हुआ। उनका जन्म 23 वर्ष 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में हुआ था। उनके पिताजी हीरालाल पेशे से अध्यापक और राष्ट्रभक्त थे। लोहिया टंडन पाठशाला में चौथी तक पढ़ाई करने के बाद विश्वेश्वरनाथ हाईस्कूल में दाखिल हुए। उनके पिताजी गांधीजी के अनुयायी थे। जब वे गांधीजी से मिलने जाते तो राम मनोहर को भी अपने साथ ले जाया करते थे। इसके कारण गांधीजी के व्यक्तित्व का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। राममनोहर लोहिया अपने पिताजी के साथ 1918 में अहमदाबाद में कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए।

उन्होंने मुंबई के मारवाड़ी स्कूल में पढ़ाई की। लोकमान्य गंगाधर तिलक की मृत्यु के दिन राममनोहर लोहिया ने विद्यालय के लडक़ों के साथ 1920 में पहली अगस्त को हड़ताल की। वर्ष 1921 में फैजाबाद किसान आंदोलन के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू से उनकी भेंट हुई। सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय ऊषा मेहता के साथ मिलकर उन्होंने गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया। 18 जून 1946 को गोआ को पुर्तगालियों के आधिपत्य से मुक्ति दिलाने के लिये उन्होंने आन्दोलन आरम्भ किया। अंग्रेजी को भारत से हटाने के लिये राममनोहर लोहिया ने अंग्रेज़ी हटाओ आंदोलन चलाया। डॉ. राममनोहर लोहिया ने अनेक विषयों पर अपने विचार लेख एवं पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कीं। उनकी मुख्य रचनाओं में अंग्रेजी हटाओ,इतिहास चक्र,देश, विदेश नीति-कुछ पहलू,धर्म पर एक दृष्टि,भारतीय शिल्प,भारत विभाजन के गुनहगा और माक्र्सवाद और समाजवाद इत्यादि का नाम लिया जा सकता है।


12-Oct-2021 10:05 AM (27)

नीपको यानी नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पॉवर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (नीपको) की स्थापना 2 अप्रैल, 1976 को भारत सरकार के पूर्णत: स्वामित्व में विद्युत मंत्रालय के अंतर्गत की गई थी। इसकी स्थापना देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्युत उत्पादन की सम्भावनाओं के विकास के लिए योजना,  प्रोत्साहन, अन्वेषण,  सर्वेक्षण, अभिकल्प, निर्माण, उत्पादन, प्रचालन एवं विद्युत केद्रों के रखरखाव के उद्देश्य से की गई थी। नीपको की प्राधिकृत शेयर पूंजी रु. 5 हजार करोड़ है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्युत उत्पादन में इस कॉर्पोरेशन का योगदान 56 प्रतिशत है।

नीपको भारत सरकार का शेड्यूल ए, मिनी रत्न श्रेणी-1 उद्यम है। वर्तमान में यह भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में पांच जलविद्युत और दो तापविद्युत बिजली घरों का संचालन करता है। इनकी अधिष्ठापित क्षमता 1130 मेगावॉट है, जिसमें पनबिजली क्षेत्र में 755 मेगावॉट और तापविद्युत (गैस आधारित) में  375 मेगावॉट बिजली का उत्पादन होता है। इसके अलावा नीपको 12वीं येाजना में 922 मेगावाट की अतिरिक्त अधिष्ठापित क्षमता जुटाने की प्रक्रिया में हैं। इस प्रकार इसकी कुल अधिष्ठापित क्षमता बढक़र 2052 मेगावाट हो जाएगी। नीपको ने आने वाले वर्षों में कई जल विद्युत परियोजनाओं को जोडऩे की योजना बनाई है जिनमें अरुणाचल प्रदेश में महत्वाकांक्षी 3750 मेगावाट क्षमता वाली सियांग अपर स्टेज -2 एचईपी शामिल हैं।

नीपको वर्तमान में अपनी जल विद्युत परियोजनाओं से करीब 755 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रहा है इनमें  असम की कोपिली जल  विद्युत परियोजना (150 मेगावाट), असम में  कोपिली बिजलीघर, स्टेज 1 विस्?तार (100 मेगावाट), असम में  कोपिली बिजलीघर, स्टेज 2 विस्?तार (25 मेगावाट), नागालैंड में दोयांड जल विद्युत संयंत्र (75 मेगावाट) और अरूणाचल प्रदेश में रंगानदी जल विद्युत संयंत्र (405 मेगावाट) शामिल हैं।

ताप बिजली क्षेत्र में नीपको 375 मेगावाट बिजली असम में मिलने वाली गैस से तैयार कर रहा है, असम (201 मेगावाट) और अगरतला गैस टर्बाइन प्लांट त्रिपुरा (84 मेगावाट), बिजली इसमें शामिल है। औसत प्लांट अवेलिबिटी (पीएएफ) 77 प्रतिशत रहा है जबकि ताप बिजली घरों का औसत पीएएफ वर्ष 2012-13 में 76 प्रतिशत रहा।

नीपको ने 12वीं योजना अवधि के दौरान 922 मेगावाट बिजली क्षमता जोडऩे की योजनाएं बनाई हैं, जिससे इस क्षेत्र में स्थापित क्षमता 1130 मेगावाट बढक़र 2052 मेगावाट हो जाएगी। जहां तक एटी एंड सी क्षतियों का संबंध है, नीपको पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में इन क्षतियों में कमी लाने के उद्देश्य से प्रेषण तंत्र मजबूत कर रहा है।

वर्तमान में इस कंपनी का शुद्ध लाभ रुपये 250 करोड़ है और अगले तीन वर्षों में यह बढक़र रुपये 800 करोड़ हो सकता है। नीपको कोयला और गैस का इस्तेमाल कर रहा है जो इस इलाके में बिजली तैयार करने के लिए बहुतायत से उपलब्ध है।


Previous123456789...133134Next