संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मंत्रियों का छात्र बन क्लास में बैठना तो ठीक है, लेकिन छात्र जैसे सीखना भी जरूरी
02-Jun-2024 5:10 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  मंत्रियों का छात्र बन क्लास  में बैठना तो ठीक है, लेकिन छात्र जैसे सीखना भी जरूरी

छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने दो दिन रायपुर के आईआईएम में देश के दूसरे आईआईएम से भी आए हुए विशेषज्ञों के व्याख्यान सुने, और शासन चलाने के बेहतर तरीकों पर उनसे जानकारी हासिल की। सोच थोड़ी नई है क्योंकि प्रदेश चलाने वाले लोग किसी की क्लास में जाकर बैठें, ऐसा कभी नहीं होता है, आमतौर पर निर्वाचित नेताओं को सर्वगुण संपन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान मान लिया जाता है। जिस तरह किसी हीरे को और शुद्ध करना मुमकिन नहीं रहता, उसी तरह सत्तारूढ़ पार्टी के निर्वाचित, मनोनीत, या संगठन पर काबिज नेता अपने को समझते हैं। इसलिए अगर छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने यह तय किया कि उसे शासन-प्रशासन के जानकार और विशेषज्ञ लोगों से कुछ सीखना है, तो यह एक अनोखी पहल है जिससे दूसरे देश-प्रदेश भी सीख सकते हैं। इस पर छत्तीसगढ़ के एक कांग्रेस नेता की प्रतिक्रिया हैरान करने वाली थी जिसका कहना था कि भाजपा ने प्रदेश में 15 बरस राज किया है, और अगर आज के भाजपा मंत्रियों को कुछ सीखना था, तो अपने ही भूतपूर्व मंत्रियों से सीखना चाहिए था। यह सलाह किसी विरोधी या दुश्मन को तो दी गई हो सकती है, यह सही नहीं हो सकती। 15 बरस बाद जिस सरकार ने सत्ता इस बुरी तरह गंवाई थी, उससे सीखने की बात कोई दुश्मन ही कर सकते हैं। सच तो यह है कि जिंदगी के बहुत से दायरों में बाहर के लोग ही गलतियां बताने, सुधार सुझाने, और नई बातें सिखाने के लायक हो सकते हैं। इसीलिए बाहरी व्यक्तियों, या आऊटसाइडर्स का एक अलग महत्व होता है क्योंकि उनके स्वार्थ ऐसे भीतरी लोगों से जुड़े हुए नहीं होते हैं जिन्हें सिखाने की जिम्मेदारी मिली है। अब वैसे तो किसी भी राज्य में प्रशासन के मुखिया, मुख्य सचिव मंत्रियों को सिखाने के काबिल हो सकते हैं, लेकिन वे इसी व्यवस्था का हिस्सा रहते हैं, और इन्हीं निर्वाचित मंत्री-मुख्यमंत्री के मातहत काम करते हैं, इसलिए बाहरी विशेषज्ञों और जानकारों से शासन-प्रशासन की कुछ बातों को सीखना काम का हो सकता है। 

दूसरी तरफ किसी भी देश-प्रदेश में कई ऐसे दूसरे तबके रहते हैं जिनसे चाहे सीखने जैसे शब्दों में न कहें, लेकिन जिनसे समझना काम का हो सकता है। किसी भी प्रदेश में गंभीर अखबारनवीस, जनसंगठनों के लोग, जिंदगी के अलग-अलग दायरों के विशेषज्ञ और जानकार ऐसे हो सकते हैं जिनसे बात करके सरकार कुछ सीख सके। यह तो ठीक है कि चुनाव और मतगणना के बीच यह तकरीबन खाली वक्त छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने आईआईएम के विशेषज्ञ प्राध्यापकों को सुनने में लगाया, और अगर हम दुनिया में भारत की विशेषज्ञता का सम्मान देखते हैं, उसकी कामयाबी देखते हैं, तो उनमें आईआईएम और आईआईटी दो सबसे प्रमुख संस्थान हैं। इसलिए चाहे यह शोहरत पाने की एक कसरत हो, है तो सही दिशा में। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और चीजों पर भी सरकार को मेहनत करनी चाहिए, अगर उसकी नजर में विशेषज्ञ का सचमुच ही सम्मान है। 

हम बहुत से विभागों के कामकाज, और म्युनिसिपल जैसी स्थानीय संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों को देखते हैं, तो बहुत तकनीकी मामलों में भी किसी तकनीकी विशेषज्ञ से कोई राय नहीं ली जाती, और निर्वाचित नेता या गिने-चुने प्रशासनिक अफसर तकनीकी फैसले लेते भी रहते हैं। अक्सर यह लगता है कि शिक्षाशास्त्री, इंजीनियर, डॉक्टर या दूसरे विषय विशेषज्ञों की कोई जरूरत नहीं है, और राज्य में हर किस्म के फैसले सत्तारूढ़ निर्वाचित नेता, या उनके चुने गए अफसर ले सकते हैं। इसी का नतीजा रहता है कि कोई सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी महीनों तक अपनी पसंद से ऐसी योजनाएं बनाते रहते हैं जो उन्हें वोटों के लिए जरूरी लगती हैं, और जो अगली सरकार को भी पसंद आएं, ऐसी कोई गारंटी नहीं रहती। विशेषज्ञों के सम्मान की सोच बहुत अच्छी है, जो सचमुच ही बड़े नेता से महान नेता बनना चाहते हैं, उन्हें किसी भी तरह के नीतिगत फैसले लेने के पहले, जनकल्याण के कार्यक्रम बनाने के पहले जानकार-विशेषज्ञों से राय लेनी चाहिए, अपनी सोच के विरोधियों से भी विचार-विमर्श करना चाहिए, और उसके बाद सत्ता अपने फैसले लेने को आजाद तो रहती है। 

दरअसल सत्ता लोगों में यह अहंकार भर देती है कि उन्हें कुछ भी सीखने-समझने की जरूरत नहीं है, और वे 24 कैरेट सोने की तरह खरे हैं। यही खुशफहमी उन्हें बड़े नेता से महान नेता बनने नहीं देती। समझदार वे लोग रहते हैं जो कि दूसरों के तजुर्बों से लगातार सीखते चलते हैं, अपनी सोच को लागू करने की ताकत जब हो, तब दूसरों की राय सुनकर एक बेहतर नीति या योजना बनाने की समझदारी निर्वाचित नेताओं में रहनी चाहिए। बहुत आसपास के दूसरे नेता या अफसर तो आमतौर पर ठकुरसुहाती में लग जाते हैं, और अपने नेता के पांव भी जमीन पर नहीं पडऩे देते। हमने किसी दूसरे संदर्भ में पहले यह बात लिखी थी कि जो लोग बिना बात पांव पकड़ते रहते हैं, वे लोग कोई गलती या गलत काम दिखने पर भी हाथ पकडक़र रोक नहीं सकते। इसलिए बाहरी लोगों से सीखना तो महत्वपूर्ण है ही, जिंदगी में रोज के कामकाज में भी जानकार लोगों, विरोधियों, आलोचकों, और विशेषज्ञों से सीखने की कोशिश करनी चाहिए। निर्वाचित और सत्तारूढ़ होने के बाद किसी भी नेता की कोशिश महान काम करके महान नेता बनने की रहनी चाहिए। लेकिन लोग सत्ता से चिपके रहने, अधिक से अधिक कमा लेने को ही सब कुछ समझ लेते हैं। जो लोग इससे उबर पाते हैं, वही लोग सचमुच के नेता बनते हैं। 

इस देश के एक सबसे महान दार्शनिक कबीर ने यह लिखा था, निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।  बड़े-बड़े काबिल और कामयाब नेताओं को हमने ऐसे ही बर्बाद होते देखा है क्योंकि उन्होंने अपने आसपास चापलूसों की फौज इकट्ठा कर रखी थी। और हामी भरने वाले दरबारियों के बीच किसी का कद नहीं बढ़ सकता। राज्य शासन से बाहर के विशेषज्ञों से कुछ सीखने की मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार की यह पहल अच्छी है, और हम उम्मीद करते हैं कि उनकी सरकार में सत्तारूढ़ नेता और अफसर अलग-अलग विषयों और क्षेत्रों के जानकार लोगों के तजुर्बे का फायदा रोजाना के कामकाज में भी लेंगे। पांच बरस के कार्यकाल में कुछ दिनों की यह पहल तो अच्छी है, लेकिन इसका नियमित रूप से इस्तेमाल भी होना चाहिए। मंत्रालय से लेकर म्युनिसिपलों तक जब जानकार विशेषज्ञों का सम्मान होगा, तो ही सत्तारूढ़ नेता भी असल कामयाबी पा सकेंगे। सत्ता पर काबिज बने रहना ही जो लोग कामयाबी मान लेते हैं, वे वहीं थमकर रह जाते हैं, उससे आगे नहीं बढ़ पाते। देखना यह भी रहता है कि सत्तारूढ़ नेताओं के राजनीतिक और प्रशासनिक सहयोगी उन्हें अपनी कैद से कितना बाहर निकलने देते हैं। हमने कई सरकारों में सत्तारूढ़ नेताओं को अपने ही दायरे के कैदी बनते देखा है, और उसका क्या चुनावी नतीजा रहा है, यह भी लोगों को अच्छी तरह याद होगा। फिलहाल प्रदेश के दूसरे स्थानीय निर्वाचित नेताओं के लिए भी ऐसे सत्र आयोजित किए जाने चाहिए जिनसे वे नगरीय विकास, स्थानीय शासन, पंचायती राज, और ग्रामीण विकास के अलग-अलग पहलुओं को बेहतर सीख-समझ सकें।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)   

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