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उत्कृष्ट साहित्य का सिलसिला : ठोकू गोसाईं नाच रहा था, बिहार के लौंडा नाच की याद
27-Jul-2020 3:52 PM 13
उत्कृष्ट साहित्य का सिलसिला :  ठोकू गोसाईं नाच रहा था, बिहार के लौंडा नाच की याद

22 मार्च को भारत में हुए जनता कर्फ्यू और 24 मार्च से लगातार चल रहे लॉकडाऊन के बीच साहित्य के पाठकों की एक सेवा के लिए देश के एक सबसे प्रतिष्ठित साहित्य-प्रकाशक राजकमल, ने लोगों के लिए एक मुफ्त वॉट्सऐप बुक निकालना शुरू किया जिसमें रोज सौ-पचास पेज की उत्कृष्ट और चुनिंदा साहित्य-सामग्री रहती थी। उन्होंने इसका नाम ‘पाठ-पुन: पाठ, लॉकडाऊन का पाठाहार’ दिया था। अब इसे साप्ताहिक कर दिया गया है। इन्हें साहित्य के इच्छुक पाठक राजकमल प्रकाशन समूह के वॉट्सऐप नंबर 98108 02875 पर एक संदेश भेजकर पा सकते हैं। राजकमल प्रकाशन की विशेष अनुमति से हम यहां इन वॉट्सऐप बुक में से कोई एक सामग्री लेकर ‘छत्तीसगढ़’ के पाठकों के लिए सप्ताह में दो दिन प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले दिनों से हमने यह सिलसिला शुरू किया है। 
यह सामग्री सिर्फ ‘छत्तीसगढ़’ के लिए वेबक्लूजिव है, इसे कृपया यहां से आगे न बढ़ाएं। 
-संपादक

ठोकू गोसाईं नाच रहा था
बिहार के लौंडा नाच की याद


गीता श्री कथाकार एवं पत्रकार हैं। अब तक पाँच कहानी संग्रह, दो उपन्यासों के साथ-साथ स्त्री विमर्श पर चार शोध पुस्तकें प्रकाशित हैं। कई चर्चित किताबों का संपादन-संयोजन किया है। इन्हें वर्ष 2008-09 में पत्रकारिता का सर्वोच्च पुरस्कार रामनाथ गोयनका, बेस्ट हिंदी जर्नलिस्ट ऑफ द इयर समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हैं। 24 सालों तक पत्रकारिता के बाद फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता और साहित्य लेखन में सक्रिय हैं।
-गीता श्री
पिया...मोरे जोबना पर लोटे सांप हो, तनि बीन बजा दअ...

 

1978 की बात है। यही सावन का महीना था। झमाझम बारिश हो रही थी। अब सावन सूखा होता है। तब सावन बरसता था झूम के। पानी केसाथ कई बार मछलियाँ भी बरसती थीं। उस दोपहर भी सावन मन भर बरस रहा था। मैं आठवीं क्लास में पढ़ती थी। मुझे पहलेही देर हो चुकी थी। इसलिए तेज-तेज कदम बढ़ाती हुई घर की ओर सरपट बढ़ी चली जा रही थी। पैरो मेंप्लास्टिक की चप्पलें थीं जो छींटे उड़ाती हुई चल रही थीं मेरेसंग-संग।
मेरा कोई दोस्त नहीं था। किसी सेमन बंधता ही न था। सरकारी स्कूल में माहौल इतना अजीब था, लडक़े इतने बेढब थे कि दोस्ती करते नहीं बनता था। मैं उनकी तरफ गौर से देख भी नहीं पाती थी। जबकि मेरे भीतर बहुत कुछ बदल रहा था। देह जगने की उम्र थी वह। सवाल मछलियों की तरह देह में तैरते सारे सवाल अनुत्तरित!
एक अबूझ बेचैनी-सी रहती पुराने दोस्तों के बिछडऩे से बोझिल मैं अजीब-सी तरस का सामना कर रही थी। मेरी कक्षा में कई लड़कियाँ थीं। उनमें एक लडक़ी मीना मुझे रोज स्नेह से निहारा करती थी। जब देखूं, वो टकटकी लगाए मुझे घूरे जाए। मेरे भीतर का जमा हुआ सन्नाटा दरकने लगा था।

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फिर एक दिन अचानक कुछ घटित हुआ। मेरे लिए पहली पहली बार था यह सब कुछ। मैं इसके लिए बिल्कुल तैयार न थी। एक दिन स्कूल से लौटते हुए मीना कुचायकोट के पास अपने गाँव पकडक़र ले गई। वहाँ नजारा ही कुछ और था। उसकी माँने वहाँ सखि लगाने की पूरी तैयारी कर रखी थी। बाकायदा मेरे कपड़े बदले गए। एक जैसे फ्रॉक हम दोनों को पहनाए गए। उपहार मिले, पैसे मिले और फिर मुझे घर आने की इजाजत मिली। मैं बढिय़ा, सुस्वादु भोजन खाकर लौट रही थी।
माँ गाँव गई हुई थीं। वहाँ खेती-बाड़ी का काम देखने उन्हें बीच-बीच में जाना पड़ता था। बाबा भी वहाँ इनके हिस्से आए थे। सबकी बारी आती थी। पाँच बहुएँ बारी-बारी से एक महीना वहाँ रहकर बाबा और खेती की देखभाल करती थीं। नौकर-चाकरों से काम लेती थीं। संयुक्त परिवार था और चाचा लोग बाहर काम पर जाते थे। दादी गुजर चुकी थीं।
गोपालगंज छूटने का गम इतना था कि माँ के गांव जाने का दुख कभी हुआ ही नहीं। मैं जैसे बेसुधी में दिन काट रही थी। स्कूल जाना और आना। न सिनेमा देखना न बाजार जाना। शहर गोपालगंज और उसकी मस्ती छिटककर दूर जा चुकी थी। बड़े भइया रोज गोपालगंज जाते-आते, बस से। बहनें अपनी दुनिया में मस्त थीं। हम दो छोटे भाई-बहन थाना-परिसर में कैदी जैसेहो गए थे। बाबूजी को चोर-उचक्कों से फुरसत कहाँ! मेरा मन बावरा हो गया था। मुझे मनोरंजन चाहिए था। सिनेमा या नाटक। कुछ तो चाहिए था। घर में एकमात्र रेडियो था जिसका सिग्नल सिर्फ दीदी के हाथों के स्पर्श को पहचानता और पकड़ता था। दीदिया ससुराल थी और बाबूजी अति व्यस्त, इसलिए इन दोनों के सिरहाने से गुलशन नंदा गायब थे। अब सिरहाने में कोई किताब नहीं मिलती थी। किताबों के मुफ्त आपूर्तिकर्ता गौरी चाचा गोपालगंज में छूट चुके थे। मेरे लिए मनोरंजन का घोर अकाल हो गया था। एक तन्हा जान, तन्हा मन लेकर जल बिन मछली की तरह छटपटाती घूमे।
मैं मीना के गांव से पैदल चलती हुई कुचायकोट पहुँची थी। गांव के छोर तक सीधा रास्ता पकड़ाने मीना की विधवा माई आई थीं जो रास्ता बताकर, उपहार वगैरह पकड़ाकर लौट गईं। मैं कच्चे रास्ते पर चलती हुई, कीचड़ से सने पैर लिए, कभी रिमझिम में भींग जाऊं तो कभी झमाझम में। मुझे लग रहा था कि मीना के अलावा ये बारिशें भी मुझसे सखि लगाना चाह रही हैं। तब मैं इसे किस नाम से पुकारुंगी!
मीना को तो अब नाम से नहीं पुकारना था कभी। सखि ही बोलना था। यह सखि लगाने के बाद का बदलाव है। बारिशें राह रोक रही थीं और मैं बाबूजी केडर से दौड़ रही थी। आज तो पिटाई तय। पिटाई मतलब दारोगा वाला काला रुल लेकर दरवाजे पर खड़े होंगे—डील-डौल वालेएक सुदर्शन प्रौढ़। गाँव जाते समय माई मेरी जिम्मेदारी उन्हें थमा गई थी, जिसे निभाने की बाबूजी भरसक असफल कोशिश कर रहे थे।
जैसे ही मैं पानी से लथपथ कुचायकोट थाना के पास पहुँची, पक्की सडक़ आ चुकी थी। पक्की सडक़ से दाएँ उतरकर एक रास्ता थाना के कैंपस में जाता था, जहाँ पहला चर्टर ही हमारा था। गेट के आसपास दो चौड़ी नालियाँ थीं जो बारिश में किसी नदी की तरह उफनती रहती थीं। उसी में मैं समंदर और दरिया देख लेती थी।
मैं अब लगभग दौडऩे लगी थी कि अचानक गाने की किसी तेज आवाज ने रोक लिया। मुझे वीराने में बहार जैसा महसूस हुआ। ये कौन है, जिसकी आवाज न स्त्री जैसी है, न पुरुष जैसी! दोनों को घोलकर एक अलग ही आवाज बनाई गयी थी। वह जो भी आवाज थी, मुझे रोक रही थी। बाबूजी का भय जाता रहा। मनोरंजन या मनोविलास की चाहत कई बार भय पर भारी पड़ जाती है।

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गोपालगंज में इसका भरपूर अनुभव हम ले चुके थे। मेरे कदम उस रिमझिम में उधर बढ़ते चले गए जिधर से यह तीसरे किस्म की आवाज आ रही थी। नया फ्रॉक गीला हो चुका था। हाथ का सब सामान भी पानी से लथपथ। किसे परवाह! मन खींचा चला जा रहा था।
गाने के बोल उभरे—‘पिया...मोरे जोबना पर लोटे सांप हो...’
भोजपुरी ही तब मेरी मातृभाषा थी। हिंदी कम बोलती थी। बज्जि का बिल्कुल नहीं आती थी। मैं मंत्रमुग्ध-सी बढ़ती चली जा रही थी... कोई डोर खींचेजा रहा था। बीच-बीच में धमाधम की आवाज आती, पैर पटकने की। फिर गाना बंद। कोई जोर-जोर से बोलता...
मैं पहुँच गई, एकदम पास। जैसे पानी पहुँचता हैकंठ के पास। जैसे बिजुरी बदरा केपास। टेंट लगा हुआ था। थोड़ा ऊंचा मंच बना हुआ था। उस पर कुछ साजिंदे बैठे थे। एक स्त्री नाच रही थी। कुछ लोग आधे गीले, आधे सूखे से झूम रहे थे। टेंट के खंबे से टिककर देखने लगी। वह स्त्री नाचती हुई पास आई, हाथ वैसे नहीं लहरा रही थी जैसे सिनेमा में हीरोइने या मुजरे वाली लहराती हैं। ताजा फिल्म ‘खिलौना’ देखा था, जिसमें का मुमताज वाला मुजरा याद आया...‘अगर दिलवर की रुसवाई हमें मंजूर हो जाए...’
मैंने जरा गीली पलकों को ठीक से पोंछा और उस नर्तकी की तरफ देखा।
अरे, ये अजीब-सी क्यों लग रही है! और ये अजीब-सी हरकते क्यों कर रही हैं? ऐसे नाचता है कोई? जरा सलीके से नाचे...जब वह गाती—‘जोबना पर सांप लोटे...’—तो हाथ को सांप बनाकर अपनी छातियों पर फिराती और खुद ही दबा लेती...उपस्थित लोग फिस्स-फिस्स करके हँस पड़ते।
गाना बंद करके वह रुकती...दो लाइन का कुछ पढ़ती...लोग तालियाँ बजाते...फिर वह मंच के चारो तरफ चक्कर काटती...और कूद-कूदकर नाचने लगती। उसका लंहगा लहराने लगता, कमर ठुमकने लगती। वह गोल-गोल चक्कर काटता, मानो हवा में भंवर पड़ गए हों। लोग रुपये फेंकते, सिक्के उछालते। एक सहायक आता, सब बटोरकर ले जाता।
मैं खो गई थी उसके नाच में। थोड़ी देर में उसकी नजर मुझ पर पड़ी।
वह पास आई, नाचते-नाचते...
‘क्या सुनोगी गुडिय़ा...हम कुछ तुम्हारी पसंद का सुनाएँ?’
मैं एकदम हड़बड़ा गई। सब लोग मुझे नोटिस करने लगे। किसी ने कहा—अरे, ये तो दारोगा जी की बेटी है! नाच देखने आई है!
मैं तो सुध-बुध खोकर उसके नाच में डूबी थी। कुछ कहते न बना।
सच कहूँ तो उस वक्त मेरी रुह नाच रही थी। मन किया, मंच पर उसे हटाकर खुद नाचूं...
जाने कैसे बेसुधि में मुँह से निकला—‘हाय, हाय येमजबूरी...तेरी दो टकिये की नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए’
‘आय-हाय, मेरी नन्हीं जान! क्या फरमाईश करे हो...लो सुन लो...’

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उसने पलटकर साजिंदों की तरफ इशारा किया और मंच पर कमर मटका-मटका कर गाने लगी—‘हाय, हाय ये मजबूरी...’
मुझे जीनत अमान इस नाच के आगे फीकी लग रही थीं। मन ही मन मैंने उनसे क्षमा माँगी और लीन हो गई इस नाच-गान में। एक पैरा गाकर वह रुकी। दो लाइन कुछ पढ़ा उसने...मेरी तरफ इशारा करके—
‘सागर से सुराही टकराती, बादल को पसीना आ जाता तुम जुल्फें अगर बिखरा देती, सावन का महीना आ जाता’
कोई भीड़ में से चिल्लाया—‘सावन का महीना त आ गईल बा हो मोरे राजा, भादो के बुला दअ...काहे आग लगावे पर उतारु बारअ हो...’
‘सवनवा मेंमोरा जियरा तरसे...जियरा तरसे...हो जियरा तरसे...’
वह एक रसिक था जो झूम-झूमकर खुद भी गाने लगा था। ठुमक भी रहा था। एक और आवाज आई—‘फिल्मी गाना छोड़ द रज्जा... बिदेसिया गाव...’ रोई रोई पतिया... लिखेलेरजमतिया... ‘ई का तू फिल्मी गाना सुरु कर देलअ हो ठोकू गोंसाई!’
मैं चौंकी। इस स्त्री को ठोकू गोंसाई क्यों कहा इसने! मैंने आंखों को और साफ किया। थोड़ा और पास जाकर उसे देखना चाहती थी।

लंबी-लंबी चोटियाँ ऐसे लहरातीं कि उसके बदन से लिपट जातीं। मुझे वह कहानी याद आई कि एक राजकुमारी से एक नाग को प्यार हो गया था। रोज रात को सोते समय उसके पास आता और उसके बदन से लिपट जाता। धीरे-धीरे यह बात फैल गई और लोग राजकुमारी से डरने लगे। कथा लंबी है। राजा ने ऐलान किया कि जो नाग को भगा देगा, उसे ही राजकुमारी से ब्याह देंगे...और फिर शुरू हुआ खेला! फिलहाल तो मुझे इसकी देह राजकुमारी-सी लग रही थी, जिस पर काला नाग लिपट रहा था। मेरा मन हुआ, पास जाकर नाग को पकड़ लूं। गेट के पास उफनते हुए बरसाती नाले में से कितने सांपों को लकड़ी से पकडक़र हमने घुमाकर दूर फेंका था।

मैं उस दोपहर सब भूल चुकी थी। बाद में मेरे साथ क्या होने वाला है, कुछ अहसास नहीं था। तंद्रा तब टूटी जब वह स्त्री घोषणा कर रही थी—रोज यहाँ इसी समय नाच होगा। आप लोग पधारें, अपनी-अपनी फरमाइश लेकर। ठोकू गोसांई एवं मंडली यहीं मिलेगी...
ठोकू...ये क्या नाम हुआ भला! मुझे शंका हुई। मैं उसे पास से देखना चाहती थी। बात करना चाहती थी। कुछ लोग मुझे पहचान रहे थे। गीले कपड़ों में मैं वैसे भी अजीब लग रही थी। असमंजस में थी। भीड़ छंटने लगी थी। मैं मुड़ी, घर जाने के लिए। अचानक नजर गई, मंच के पीछे। नर्तकी खड़ी होकर बीड़ी फूंक रही थी। मंच के एक साइड में जाकर लंहगा उठा खड़ी हो गई। मुँह में बीड़ी सुलग रही थी। अजीब लगा। मैं भाग जाना चाहती थी। मैंपलटी कि पीछे से धर लिया किसी ने। मेरे हाथ में जो सामान था, सब बिखर गया।
‘कहाँ भाग रही हो बबुनी...डरो मत...हमको पहचानती हो...हम औरत नहीं हैं...हम हैं मरद...ये देखो...’
उसके मुँह से बीड़ी की तेज गंध आई। मुझे इस गंध से कुछ अटपटा नहीं लगा। माई और रजौली वाली चाची की गप्प-गोष्ठियों में यह गंध फैली रहती थी।
‘रोज आना...हमारा नाच देखने। आजकल लगन का सीजन नहीं है न तो हम कमाई के लिए बाजार मेंही नाच करते हैं...तुम कुछ मत देना हमको...बस देखने आ जाना...ठीक हय!’

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वह औरत अब मर्द में बदल रही थी। उसके हाथ में काले-काले रोएँ थें। चोटी खुल चुकी थी। बाल लंबे थे। कमर तक लंबे। उसने चोली में हाथ डालकर कुछ बाहर निकाला, रुई के गोले जैसा...वह आदमी हँसता रहा...देखते-देखते लहंगा भी उतारने लगा...हमसे इतना न देखा गया...बेतहाशा भागी...दरवाजे पर ही जाकर सांस लिया।
इस तरह का नाच देखने का पहला मौका था, जहाँ कोई औरत मर्द में बदल जाए। मर्द भी औरतनुमा। उसे आंख भर देख नहीं पाई थी। बस, उसकी आवाज कानों में देर तक पीछा करती रही—‘बबुनी...ठोकू गोसांई को भूल मत जाना। आना नाच देखने...हर तरह का नाच दिखाएँगे...फरमाइशी...
मनोरंजन के लिए तरसते मेरे किशोर मन को यह नए किस्म का मनोरंजन विचित्र सुख देरहा था।
‘लौंडा-नाच देखोगी...तुम्हारी उम्र है ये नाच देखने की...लौंडा-लपारे
देखते हैं ये नाच-गाना! भले घर की लड़कियाँ नहीं देखती हैं। कोई और लडक़ी थी वहाँ? कोई औरत...बताओ...क्यों गई थी वहाँ?’
आंगन में बाबूजी का प्रलाप चल रहा था—‘आने दो माई को...उसके बाद ही स्कूल जाओगी...घर में बंद रहो...बिना बताए, सखि लगाने चली गई...कौन लोग हैं, कैसे लोग हैं, कुछ होश है? कब समझोगी? अकेली, पैदल तीन कोस गांव चली गई...हद है! हम कोई सिपाही भेज देते साथ में...हे भगवान...’
हाथ में काला रुल लहरा रहा था, मगर मेरी तरफ बढ़ा नहीं। मुझे तो गाना याद आनेलगा...‘जोबना पर लोटे सांप...’
मुझे वो काला रुल किसी कालेनाग की तरह दिखाई देरहा था जो किसी राजकुमारी की बदन से नहीं लिपटा था, हवा में लहरा रहा था...दूर कहीं बीन बजा रहा था कोई...
‘देखता हूँ...कौन था वो लौंडा...बीच बाजार में कैसे नाच शुरु कर दिया है...खबर लेता हूँ...हाजत में बंद करेंगे न, तब साला सब नाच भूल जाएगा...बड़ा मउगी बनने का शौक चर्राया है...’
मुझ पर उनकी डांट का कोई असर नहीं हुआ। ठोकू गोसांई के नाच का असर ज्यादा गहरा था। वह जो गान-नाच केबीच-बीच में फकरा पढ़ता था, वो मेरे कानों को प्रिय लगा था। कुछ स्मृति में दर्ज कर लाई थी। उसका इस्तेमाल करना था कहीं। कुछ दिन उसके नाच से वंचित रहना था। सोचा, गोपालगंज की सखियों को पत्र लिख कर सजा के कुछ दिन काट लूँ।
फूल है गुलाब का सुगंध लीजिए, पत्र है गरीब का जवाब दीजिए
बड़े भैया गोपालगंज से दो दिन बाद लौटे। तब तक मैं तीन-चार चिट्ठी लिख कर रख चुकी थी। मिकी, सीमा और हनी के नाम।
सीमा सबसे करीब थी। पहली बार मैंने पत्र मेंएक फकरा लिखा—
‘फूल है गुलाब का सुगंध लीजिए, पत्र है गरीब का जवाब दीजिए’
पत्र के साथ गुलाब का एक फूल भी रख दिया था। मुझे इतनी सुंदर अनुभूति हो रही थी, पत्र लिखते हुए कि क्या बताऊं! मुझे मेरी भावनाओं को व्यक्त करनेके लिए कुछ पंक्तियाँ मिल गई थीं। मेरा मन हो कि और ऐसी और पंक्तियाँ मिलेंतो चिट्ठी  मेंऔर लिखूं।

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सहेलियों पर रोब भी जमेगा और मेरी छटपटाहट भी उन तक पहुँच जाएगी। इसके लिए ठोकूगोसाई से बेहतर मददगार कौन!
नाच देखने पर पाबंदी थी और मुझे मालूम नहीं था कि ठोकू रहता कहाँ पर है। माई के आने में समय था। वह धनरोपनी के बाद ही आने वाली थीं। बारिश की वजह से गांव की सडक़ें भी खराब हो गई थीं। दो-तीन दिन बीतने पर बाबूजी ने स्कूल जाने के लिए कहा। उधर मीना यानी मेरी सखि पगला गई थी। सखि लगानेकेबाद तीन दिनों तक उसने मुझे नहीं देखा तो वह अलग बावरी-सी हुई जा रही थी। मुझे उससे अभी कोई खास लगाव न था। मैं तो तब तक गोपालगंज की सखियों के मोह मेंही पड़ी हुई थी। इस उम्मीद मेंथी कि एक दिन फिर वहाँ वापस जाना है। भैय्या वहाँ एक फेमस डॉक्टर की बेटी से मोहब्बत कर बैठे थे। बस, पढ़ाई खत्म होनेका इंतजार हो रहा था।
स्कूल में मेरे गले लगकर सुबकती हुई सखि को मैंने सारा कांड बता दिया। वह रोना भूल गई। बोली—‘अरे, तुम नही जानती। दुबौली गांव का है ठोकू गोसांई। हमारे इलाके का सबसे प्रसिद्ध लौंडा। उसका नाच देखने लोग दूर-दूर से आते हैं। लगन में उसके पास टाइम नहीं रहता। नेटुआ, पमरिया, बाई जी, सबको फेल कर दिया है...सबसेआगे है, आगे...’
सखि हाथ नचा-नचा कर बोल रही थी। जैसेगर्व से भरी हो।
‘मुझे ठोकू से मिलना है...’
‘काहे?’, कमर पर हाथ रख कर पूछी सखि।
मैंने झेंपते हुए कहा, ‘मुझे उससे फकरा लिखवाना है...गाने के बीच में वह सुंदर-सुंदर फकरा पढ़ता है...हमको चाहिए...’
‘अरे, उसका त किताब भी मिलता हैरे...चल बाजार, हम दिलवाते हैं...’
‘नहीं, हमको ठोकूसे मिलवा दो...’
‘ये नहीं हो पाएगा, सखि! वो बहता पानी है, आज यहाँ, कल वहाँ... कहीं नाचते हुए दिखा तो हम उसको बता देंगे, वो मिलना चाहे तो मिल लेगा।’
सखि छुट्टी के बाद हमको किताबों की एक फुटपाथी दुकान पर ले गई। जहाँ हमने शीत-बसंत, तोता-मैना की कहानी, रानी सारंगा की, रानी केतकी की...अल-बल किताबें खरीदीं। एक देसी दोहों की, चटपटी शायरी की किताब भी मिली।
पहला पन्ना पलटा तो लिखा था—
‘गुड है अच्छा, बैड खराब वाटर पानी, वाइन शराब’
मैंने वह किताब वही फेंक दी, ‘ये क्या बकवास लिखा है। ये मेरे किस काम का।’
सखि ने कहा, ‘रे, अंदर तो देख...’
दो पन्ने के बाद मिला—प्रेमी-प्रेमिका की शायरी और उनके सवाल-जवाब.
उफ्फ! फिल्मी गानों के बीच से लाइनें उठाकर शायरी बना दी गई थी। प्रेमी रुठ कर लिखता है—
‘मेरी मोहब्बत, तेरी जवानी...
मिलकर करेंगे बहारों की बातें...’
प्रेमिका का जवाब—
‘दिल पुकारे...आ रे, आ रे...
अन्हियारे रातों में करेंगे सितारों की बातें...’
और भी जाने कितने गानों की पैरोडी थी! मेरा मन हुआ, गुलशन बावरा को बोलूं कि इस किताब के लेखक पर फिल्मी मुकदमा कर दे।
ये किताबें वहीं छोड़ आई। मेरे सामने अब फकरा का संकट खड़ा हो गया था। एक सुना था, ‘फूल है गुलाब का...’, वो लिख चुकी थी। आगे जारी कैसे रहे? और मुझे नाच भी तो देखने का मन था। स्कूल से लौटते हुए उस जगह पर गई, जहाँ तीन-चार दिन पहले ठोकू नाच रहा था। पता चला कि वहाँ उजाड़ है, वह कहीं और तंबू गाड़ चुका है।
‘यहाँ कुछ सिपाही आए थे, भगा दिए उसको। थाना के आसपास इस तरह का नाच-गाना असभ्य लगता है। माहौल खराब होता है, चोर-डाकू आ सकते हैं।’
ओह, तो मेरे नाच देखने का ये इनाम मिला ठोकू को! मेरे मनोरंजन का सामान फिर सेखो गया था। मुझ पर वज्रपात हुआ। सखि से मेरी दशा देखी न गई। उसने ठोकू को ढूंढना शुरु किया। वह स्थानीय थी। सारा इलाका जानती थी।

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सावन अभी तक मेहरबान था और धूप आंखमिचौली खेल रही थी।
सखि मेरे लिए अपन मां सेगांती बनवा कर लेआई थी। खाद के प्लास्टिक का बोरा था, उसे बहुत कलात्मक ढंग से उसकी मां ने गांती में बदल दिया था। हम दोनों गांती पहनकर बारिश में ठोकू को ढूंढ रहे थे। क्लास छोड़ दी थी।
एक नहीं, कई दिन यही चला। स्कूल से टिफिन केसमय निकल लेते, ठोकू को ढूंढते। शाम के चार बजे छुट्टी होती तो स्कूल की भीड़ में शामिल होकर घर की तरफ निकल आते। ऐसा लगता, हम सीधे स्कूल से चले आ रहे हैं।
उधर गोपालगंज से सीमा का पत्र आ चुका था, जिसमें उसने खूब शायरी लिखी थी। एक शायरी के जवाब में तीन-चार शायरी झोंक दी थी। अब मेरे लिए उसके टक्कर की शायरी भेजने की चुनौती हो गई थी। ठोकू का मिलना बहुत जरुरी था, नही तो मेरी प्रतिभा पर सवाल खड़े हो जाते। किसी तरह ढूंढना ही होगा।
सखि ने सुझाव दिया, ‘तब तक खुद ही क्यों नहीं दो-चार लाइन का फकरा गढ़ लेती है! गाना उठाओ, अपने हिसाब से बना लो। चल, हम मिलकर बनाते हैं...’
‘बताओ...सखि नेक्या लिखा है तुम्हारे लिए...फिर हम लोग दिमाग चलाते हैं...’
मैंने सीमा का पत्र आगे बढ़ा दिया—
लिखती हूँ खत खून से स्याही मत समझना
मरती हूँ तेरी याद में जिंदा मत समझना
सखि ने कहा, ‘इसके उल्टा लिख दे।’ मैं उसके झांसे में आ गई। आज तक झांसे में आने का स्वभाव वैसे ही बरकरार है। 
तो मैने शायरी इस प्रकार बनाई—
लिखती हो खत क्यों खून से, क्या स्याही नहीं मिलती मरती हो क्यों मेरी याद में, क्या दूसरी नहीं मिलती मैं उछल पड़ी कि मुझे शायरी करनी आ गई। उधर गोपालगंज से ‘बॉबी’ फिल्म की गूंज आ रही थी—‘मैं शायर तो नहीं...मगर ऐ हसीं...जब से देखा, तुझको, मुझको...’
भैया गोपालगंज से हमारे लिए ‘बॉबी’ प्रिंट का फ्रॉक ले आए थे। पत्र सीमा केपास पहुँचा और मेरी जवाबी शायरी को पढ़ते ही उसका मुझसे मोहभंग हो गया। आज लगता है कि मोहभंग नहीं, उसका रसभंग हुआ होगा। उसके पत्र आने बंद हो गए। एक बनावटी शायरी नेमेरी दोस्त का दिल तोड़ दिया। मैं बहुत दिनों तक अपना गुनाह समझ ही नहीं पाई। आज भी अनजाने में कितने गुनाह किए होंगे, गुनाह अबूझ रहा।
गोदिया में बइठा के सिनेमवा दिखइअ हो करेजऊ 
मेरा मन कमससाता रहता कि आखिर क्यों मैं लौंडा नाच नहीं देख सकती। हमें बाईजी का नाच भी नहीं देखने दिया जाता है। और तो और, जब बीते कार्तिक मास में सोनपुर मेला में बाबूजी की डयूटी लगी तो हम सबको वहाँ उठाकर ले गए थे। टेंट में रहते थे, पुआल के बिस्तर पर सोते थे। वहाँ गुलाब बाई कंपनी की नौटंकी आई हुई थी। वहीं पर पहली बार बिजली वाली लडक़ी देखे थे, टिकट लगाकर लोग देखने जाते थे। नीलेरंग की साड़ी मेंएक गोरी-पतली लडक़ी कुर्सी पर बैठी रहती। एक आदमी आता, उसकी देह से टयूब लाइट छुआता, बल्ब छुआता, वो भक्क सेजल जाते। लोग तालियाँ बजाते। मैं हाथ बढ़ाकर उसे छूना चाहती। जोर से चीखता हुआ वह आदमी मुझे खदेड़ देता। खदेड़ी तो मैं नौंटकी से भी गई थी। जब चुपके से हम शो में घुस गए थे। मंच पर सचमुच पहली बार हीरो-हीरोइन को नाचते देखा तो लगा, परदा जीवित हो उठा है। आज की भाषा में कहूँ तो लाइव सिनेमा देखा था। हरेक तरह के खुले सीन थे और सीटियाँ मारी जा रही थीं। बाबूजी का सहयोगी हमें वहाँ से खदेड़ता हुआ ले आया, जैसे बच्चे गाड़ी के पुराने टायर हाँकते घूमते रहते हैं। हम उसी टायर की तरह हाँक दिए गए। हम चले तो आए, लेकिन वहाँ गाना बजता रहा... ‘एगो चुमा देलेजइअह हो करेजऊ...’
अब हमारे नौटंकी देखने पर भी संकट! मेरे भीतर विद्रोह जमने लगा। तय कर लिया, देखेंगे जरुर, मगर चोरी-चोरी चुपके-चुपके। और जिस दिन खुदमुख्तार होंगे, उस दिन बाबू साहब की तरह दुआर पर ठाट से बैठकर देखेंगे...पैर पर पैर चढ़ाकर पैसा फेंकेंगे। तब ऐसा सोचे थे। मन ही मन हम ठोकू गोसाई पर कितना रुपया, सिक्का फेंक चुके थे, उसका हिसाब आज तक नहीं किए हम। हिसाब लगाने बैठूं तो ठोकू पर बहुत कर्ज निकलेगा मेरा।

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हाँ तो, हम दुखड़ा यह रो रहे थे कि मनोरंजन के तमाम साधन लडक़ी-विरोधी, बच्चा-विरोधी थे उस जमाने में। लौंडा नाच देखने से वंचित मैं बेचारी तड़प रही थी। ठोकू के रूप में मुझे एक दोस्त नजर आ रहा था जो मेरी मदद कर सकता था। जिसे नाचते हुए देखना सुखद अहसास था। वह नाचते हुए भरपूर मनोरंजन करता था। बदले में लोग उसे अपनी मर्जी से रुपये देते थे। वह माँगता नहीं था। सुना था कि लगन में नाचने का वह मोटा शुल्क लेता था। फिर भी बाई जी से पिछड़ जाता था। ठोकू को लोग अन्न के बदले भी नचवा लेते थे। वो उपहार भी ले लेता था। औरतें उसे सिंगार-पटार का सामान देती थीं। लगन में तो सलमा सितारा वाली साड़ी से कम कुछ न लेता था। वो खूब सजता और औरतों को दिखाने जाता। तरह-तरह से मुँह बना-बनाकर दिखाता, औरतें हंसती। उनके मर्दो को लौंडा से खतरा महसूस नहीं होता। उन्हें औरतों की तरह ही देखते थे। लौंडे भी मर्दो से ज्यादा औरतों की संगति में खिल-खिलाते थे। यह सब मैंने अपनी आंखों से देखा, जब एक दिन मेरी खोज पूरी हुई। मीना मुझसे ज्यादा आजाद थी। कहीं भी घूमने-फिरने और टंडइली के लिए। अपनी मां की वह इकलौती संतान थी। लडक़ों की तरह उसे छूट मिली हुई थी। मुझे मुक्ति का मार्ग उसी ने समझाया था। विद्रोह का पहला पाठ भी। मीना यानी सखि ने सखि-धर्म का सही-सही निर्वाह किया और एक दिन फिर स्कूल से पकडक़र कुचायकोट के ही एक टोले में ले गई। जहाँ औरतों की टोली के पास बैठा ठोकू ठिठोली कर रहा था। औरतें उससे फिकरा सुनतीं और ठठा कर हंसतीं। ठोकू मुझे देखकर खिल उठा था। ऐसा उसके चेहरे से मुझे लगा। वह अचानक पैंतरा बदल कर वहाँ से उठा और मेरे और मीना के संग-संग चलने लगा।
भादो आ चुका था। लगभग समाप्ति की ओर था। ठोकू के संग-संग चलते हुए मैंने उसके गायब होने पर खूब लानतें दीं। वह मुझसे खरी-खोटी सुनता रहा। हम दोनों को साथ लेकर वह दूर खेतों की तरफ निकल आया था। वहाँ हम एक मचान पर बैठे।
‘खाली समय में हम यहाँ पहरा देते हैं...मेरा मचान है...बैठो...वो देखो, सामने पुतला...बिजू का बोलते हैं उसको। एक जीवित बिजू का हम...इहाँ बैठकर हम गाने का अभ्यास करते हैं।’
‘मुझे फकरा सुनाओ...मुझे लिखना है। अपनी सहेलियों को भेजना है...तुम बहुत सुंदर-सुंदर फकरा पढ़ते हो। कहाँ से लाते हो?’
‘खाली लडक़ी को लिखिएगा...लडक़ों को लिखना हो तो बहुते माल है अपने पास...दें क्या?’
मैं झेंप गई। मीना ने उसको घुडक़ी दी, ‘तुम लडक़ी वाला कविता दो...छोड़ो लडक़ा-फडक़ा वाला। बूझे...’
ठोकू को मुँह जबानी सैकड़ों गाने, शायरी, फिल्मी गीत याद थे। जैसे फूल झरते हों। वह एक-से-एक फकरा पढ़ता गया...मैंन नोट कर पाई, न याद रख पाई। बस, इतना याद है कि वह मचान से कूद गया और खेत में ही पैर पटक-पटक के नाचने लगा। खेतों में पानी भरा था। छप-छप करे, पानी के छींटे उड़ाए। मुझे लगा, उसके पैरों से छिटकता पानी बादलों तक पहुँच रहा है। लौटेगा पानी, साथ में कुछ मछलियाँ लेकर।
हम तीनों अक्सर मिलते। ठोकू फुर्सत पाकर स्कूल कैंपस तक आ जाता। हमेशा अपने बाल का जूड़ा बनाकर रखता। उसकी चाल में नाच की लय थी। मेरा मन करता कि मैं भी उसके साथ कभी नाचूं।
नाचना-गाना सपना बन कर रह गया था। एक दिन ठोकू उदास-सा आया। हमने पूछा तो सिर्फ इतना बोला कि लोग गंदे-गंदे गाने की फरमाइश करते हैं। कोई नया भोजपुरी गायक आया है, उसका गाना जोर पकड़ लिया है। लोग उस पर नाचने को बोलते हैं। हमारा नाच औरतें भी देखती हैं, बच्चे भी देखते हैं, हम कैसे गाएँगे! एक छौरा है, सुंदरवा, नया लौंडा तैयार हुआ है। वह सब कुछ करने को तैयार है। अपनेको औरत ही समझने लगा है। हम औरत बन कर नाचते जरुर हैं, औरत थोड़े न हैं। लेकिन औरतन को समझते हैं। जब हमको इतना छेड़ता है सब, औरतन को कितना तंग करता होगा...’
मैंने उस दिन उसे अपने हाथों से बनाया हुआ सूती रुमाल उपहार दिया। बोला, ‘रुमाल नहीं देते, अशुभ होता है। इसके बदले ये चवन्नी लीजिए।’
मैं उसे अनसुना करते हुए चवन्नी झटक कर बढ़ आई।
धरमेंदर से एक बार मिला द, सजन बेलबाटम सिला दअ ना वो बरसाती रात थी। भादो बरस रहा था, घनघोर! माई लौटकर आ चुकी थी। ठोकू की तलाश छोड़ दी मैंने। घर पर यह बातें चलने लगी थीं कि माई हम सब भाई-बहनों को लेकर कुछ महीने गांव में ही रहेंगी, वहीं ढबढब स्कूल में हम पढ़ेंगे। बाद में किसी नई जगह पर बाबूजी हमें बुला लेंगे। किसी खास मिशन में लगना है। परिवार से अलग रहना होगा कुछ समय़। 
सो हम गांव जाने की तैयारी मेंलग गए। पहले गोपालगंज, अब कुचायकोट...और ठोकू गोंसाई का नाच—सब पीछे छूट रहा था।
एक रात जब हम सब सोने जा चुके थे। थाने का परिसर कोलाहल से भर गया था। बरसाती रात थी। मुझे नींद नहीं आ रहा थी। मुझे बाहर बारिश के साथ जमीन पर बरसती छोटी-छोटी मछलियाँ याद आने लगीं। जिन्हें मैं पकडक़र पानी में डाल देती थी या कभी बोतल में पानी डालकर उसमें रख लेती थी। बादल बूंदों के साथ तब छोटी मछलियाँ बरसाते थे। मुझे वो उफनते हुए दो नाले याद आने लगे, जिनमें कागज के जाने कितनेनाव बहा दिए थे, अपने सपने लादकर...जाने वे कहाँ बिला गए होंगे...
सखि मीना याद आनेलगी जो किसी दूसरी लडक़ी को ढूंढकर सखि बना लेगी। मैं करवट बदलते-बदलते उठ गई। पहले आंगन में पानी बरसते देखा। फिर खिडक़ी से बाहर झांका। दूर कैंपस में लाइट झिलमिला रही थी। गाने-बजाने की आवाजें थीं। बाबूजी घर नहीं लौटे थे। दिन में सुना था कि निरीक्षण के लिए सीनियर आने वाले हैं। नेता लोग भी आएँगे। नाच-गाने और खाने-पीने का इंतजाम हो रहा था।
घर में सब सोये पड़े थे।
मैं दबे कदमों से उठी तो हमारा सेवक मुन्ना जाग गया। मैंने इशारे से उसे चुप कराया। उसको साथ लेकर वहाँ पहुँची, जहाँ महफिल जमी थी।
दस बीस लोग थे। चौकी जमाकर मंच बनाया गया था। उस पर बजनिया बजा रहे थे। ठोकू गोंसाई की मंडली नाच रही थी। आज ठोकू अकेला नहीं नाच रहा था, साथ में एक सुंदर लौंडा भी नाच रहा था, जिसे देखकर कोई भी मोहित हो जाए। ठोकू उसके सामने साधारण दीख रहा था। नाच में ठोकू भारी पड़ रहा था और अदाओ में वो नया लडक़ा।
महफिल से फरमाइशें उठ रही थीं—‘अरे, वो गाना गाओ...धरमेंदर से एक बार मिला दअ सजन बेट लाटम सिला दअ न...’
‘अरे, का बेकार गाना है! ई छोड़ो...दोसर गाओ, नाचो...’
‘कटहल के कोआ तू खइलअ...’
उस समय ठोकू डाकू सुल्ताना पर नाच-गान कर रहा था। बीच-बीच में वही फकरा यानी शायरी पढ़ता।
बहुत शोरगुल होने पर ठोकू नाच रोककर चिल्लाया—‘साहब लोग, हम अश्लील गाना न गायब, न नाचब। बूझ जाईं रउआ लोग।’
नीचे बैठा हुआ एक सफेद कुरते वाला आदमी बोला, ‘हमें लैला-मजनू सुना दो...’
ठोकू बोला, ‘सुना देंगे हुजूर...लौंडा नाच का एक कायदा-कानून होता है, सरकार। हम लोग उसके बाहर नहीं जा सकते। थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे चलता है। एकदम्मे सेएतना गंदा नहीं गा सकते।‘
ठोकू ने अपने दोनों कानों से हाथ को लगाया। बोलते हुए भी अपना पैर बार-बार मंच पर पटक रहा था। यह नाच का तरीका है... 
हाथ खूब नचाना और पैर खूब पटकना...गोल-गोल घूमना...कमर के ठुमके...
यह ठोकू के नाच की विशेषता थी। एक सिपाही उठा, ‘तुम बैठ जाओ ठोकूआ...ई सुंदरी है न...नई लैला...उसको नचवाएँगे हम... नाच रे सुंदर...’
बाबूजी एक कोने में बैठे सारा तमाशा देख रहे थे। उन्हें आनंद आ रहा होगा, मगर वे इसमें शरीक नहीं थे।
ठोकू अपमानित होकर एक तरफ जाकर खड़ा हो गया। सुंदर, कोमल-सा लडक़ा उठा, जिसे सब सुंदरी-सुंदरी कहकर पुकार रहे थे। उसने अदाएँ दिखाकर नाचना शुरु किया। फिल्मी गाने की फरमाईश होती रही। सुंदर ठुमक-ठुमक कर नाचता रहा। उसकी भी जान सांसत में रही होगी। ठोकू डर के मारे सटका हुआ था। थाना परिसर में उसकी हिम्मत न हुई कि विरोध करे। मन ही मन ठान लिया था कि अपने पांरपरिक नाच से समझौता नहीं करेगा। चाहे सुंदर नचनियाँ कुछ भी नाचे-गाए। सफेद कुरते वाला उठकर सुंदर नचनिया से देह में देह रगड़ कर नाचने लगा था। बाकी लोग सिसकारियाँ भरने लगे। ठोकू सन्न अवस्था में बैठा रहा। अपने नाच की ऐसी गति की कल्पना न की हो शायद उसने!
नीचे से एक सिपाही चिल्लाया, ‘हुजुर , इसको लौंडा फौज में भर्ती कर लीजिए न! कोठी का सोभा बढ़ाएगा।’
‘भक्क, बुरबक...’
वह नशे में झूमता रहा। तालियाँ बजती रहीं। चुन-चुनकर गानों की फरमाइश हो रही थी। सुंदर अपनी फटी हुई आवाज में गाने की कोशिश करता। वह ठोकू जितना सुरीला न था। कोई चिल्लाया, ‘अरे ठोकूआ, गला काहेबंद करके खड़ा हो गया हैरे, गाओ...’
ठोकू गाने लगा। थोड़ी देर में ठोकू लडक़ा बना, सुंदर लडक़ी; और दोनों गाना गाने लगे—‘हो तेरा...रंग है नशीला, अंग-अंग है नशीला...’
मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। ऐसे नजारे की कल्पना न की थी। ऐसा तो चचेरी बहन की शादी में शामियाना फाड़ कर छेद से देखे थे। तब नाचने वाली वे लड़कियाँ थीं। यहाँ लडक़े हैं, जो स्त्रियों की तरह नाच रहे हैं। ठोकू बीच-बीच में बोलता है, ‘ये हमारी पंरपरा है, लौंडा नाच की परंपरा। बहुत पुरान नाच है सरकार लोग...हम आज प्रस्तुत करेंगे...’
‘चोप्प...तुम वही प्रस्तुत करोगे जो हम कहेंगे...बंद करो ये अपना लैला-मजनू, डाकू सुल्ताना का ड्रामा...’
हमारा सेवक मुन्ना फुसफुसाया, ‘बबुनी, चलिए यहाँ से। पकड़े गए तो हम दोनों को मार पड़ेगी। हमको तो साहब हाजत में ही बंद कर देंगे।’
हम दोनों भादो की बरसात में भींग भी रहे थे। छींक आती तो भेद खुल जाता, सो हम वापस भागे। ठोकू से मिलने की लालसा मन में रह गई।

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कुछ दिनों के बाद हमारा सामान ट्रक पर लादा जा रहा था। हमें भी सामान के साथ ट्रक पर ही बैठकर जाना था। बैठने की अच्छी-सी जगह बनाई गई थी। लेकिन चारों तरफ से तिरपाल लगा था, बारिश से बचाव के लिए। मेरी माई को जतरा बनाने में बहुत विश्वास था। बिना जतरा के कहीं नहीं निकलती थीं। उस दिन सुबह जतरा के लिए कुछ और निर्धारित था। माई ने कहा कि चलने से पहले रतन-चौकी जमाएँगी। ‘बहुत शुभ होता है।’
माई द्वार पर अंचरा फैलाकर बैठी थीं। उस पर ठोकू गोंसाई नाच रहा था। उसके लंबे, घने बाल खुले थे। हवा मेंलहरा रहे थे। वह भर-भर हाथ चूड़ी पहने हुए था। होंठों पर गहरी लाली, आँखों में काजल की मोटी लकीरें खींचे हुए, माथे पर टिकुली, लाल-पीला लगाए हुए पूरा मेकअप में था। वह देवी-गान गा रहा था। फूल बरसा रहा था। अक्षत छींट रहा था।

ठोकूजब हटा तो माई अपना अंचरा संभाल कर, फूल-अक्षत समेत कमर में बांध लीं। वे बहुत गदगद थीं। बाबूजी ने उनकी बात रख ली थी। ठोकू मुझे देखे जाए...गाए जाए। कभी हैरान हो तो कभी बेचारगी दिखाए। कभी उदासी लाए तो कभी हरियाए। कभी शिकायती मुँह बनाए तो कभी दुलार भर लाए।
मैं बस एक बार उससे कहना चाहती थी, ‘कुछ फकरा पढ़ दो...या लिखकर देदो...अपनी रूठी दोस्त को मनाने के काम आएगा।’
मैं कह नहीं सकी, वह सुन नहीं सका। बारिश तेज होने लगी थी। पानी में छपछप चलते हुए जब ट्रक तक पहुँची तो अनेक छोटी मछलियाँ इधर-उधर छितराई हुई, छटपटा रही थीं...

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