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शिवानी के जन्मदिन पर उनके लिखे के बारे में लिखा बेटी मृणाल पांडेय ने..
17-Oct-2020 6:36 PM 5
शिवानी के जन्मदिन पर उनके लिखे के बारे में लिखा बेटी मृणाल पांडेय ने..

-मृणाल पाण्डे

17 अक्टूबर , सन् 1923 , विजयादशमी के दिन राजकोट स्थित प्रिन्सेज़ कालेज के प्रिन्सिपल अश्विनी कुमार पान्डे के घर उनकी पत्नी लीलावती की कोख से उनकी तीसरी पुत्री और चौथी सन्तान ने जन्म लिया। मकर राशि , मिथुन लग्न , नाम रखा गया गौरा। पितामह ने कहा साक्षात् दुर्गा आयी हैं। पिता ने कहा यह हमारी सरस्वती होगी। माँ एक और बेटी होने से तनिक खिन्न थीं, पर उनको आश्वस्त करते हुए कुल पंडित ने कहा मकर राशि की इस कन्या की जन्मकुन्डली में ग्रहों की स्थिति अद्भुत व प्रथम श्रेणी की है। नाम गौरा रखा गया और बालिका गौरा शेष परिवार के साथ अल्मोड़ा और राजकोट , अल्मोड़ा और रामपुर , अल्मोड़ा और बंगलोर की मिली जुली संस्कृतियों और भाषाई परिवेश के बीच अनेक भाषायें सुनती , घुड़सवारी और संगीत के साथ अक्षर ज्ञान पाती बड़ी हुई।

आठ वर्ष की आयु में बड़ी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ गौरा को रवीन्द्र्नाथ टैगोर की नवस्थापित शिक्षण संस्था शान्ति निकेतन के लिये रवाना किया गया। टैगोर परिवार के साथ कुछ माह बिताने के बाद हंसमुख कुशाग्र बच्चे जल्द ही मातृभाषा कुमाँउनी, तथा हिंदी और गुजराती के साथ धाराप्रवाह बाँग्ला बोलना सीखकर नये परिवेश में रम गये। गौरा ने पहली रचना बांग्ला में की, तो गुरुदेव ने कहा , पढ़ो सब भाषायें, पर लिखो अपनी ही मातृभाषा में, वही सुंदर सहज होगा। गौरा ने बात गाँठ बाँध ली।

जब लिखना शुरु किया तो उपनाम रखा मूल नाम का ही समानार्थी, शिवानी। यह वह ज़माना था जब एक स्त्री के लिये अपने नाम से छपने के लिये लिखना नाना अप्रिय टिप्पणियां न्योतना होता था। उपनाम और कुछ नहीं तो एक तिनके की ओट तो था ही। बारह साल की आयु से शुरु हुई ‘शिवानी’ की यह लेखकीय यात्रा तमाम प्रिय अप्रिय अनुभवों तथा आलोड़नों के बीच उनकी मृत्यु तक, यानी पूरे 67 वर्षों तक जारी रही।

शिवानी की कहानियाँ बीसवीं सदी के भारतीय राज समाज की, और उसके दौरान देश में आये बदलावों के बीच जनता, खासकर स्त्रियों की स्थिति की एक ऐसी विहंगम चित्रपटी हैं, जिसके अंतिम छोर को हम बीसवीं सदी के आखिरी पर्व की तरह पढ़ सकते हैं। इस महागाथा में देश के औपनिवेशिक काल के सामंती पात्रों तथा संयुक्त परिवारों के मार्मिक चित्र भी हैं और उस समय के उदात्त अपरिग्रही समाज सुधारकों तथा शांति निकेतन परिसर से जुड़े विवरण भी, युगों पुरानी रवायतों को जी रहे कुमाऊँ का पारंपरिक सरल ग्रामीण समाज है, तो लखनऊ , कोलकाता तथा दिल्ली जैसे नगरों का अनेक स्तरों पर बंटा, लोकतांत्रिक राजनीति की पेचीदगियों तथा पारिवारिक विघटन के एकदम नये अनुभवों के बीच जी रहा आधुनिक नागर समाज भी।

आज़ादी के बाद के साठ बरसों में देश में उपजे तमाम किस्म के नायक, खलनायक, अच्छे और भ्रष्ट राजनेता, विदूषक, अपराधी, वेश्यायें, दलाल और कुट्टिनियाँ, विदेश जाने को लालायित युवा और उनके पीछे छूटे अभिभावकों की मूक या मुखर व्यथा, सब इन रचनाओं में मौजूद हैं।

शिवानी का कथात्मक फलक मूलत: एक गहरे सौन्दर्य बोध तथा एक स्पष्ट पारंपरिक नैतिकता को लेकर चलता है। आप उनसे असहमत भले हों, उनकी दृष्टि की मूल ईमानदारी या कथाप्रसंग मे बड़ी सहजता से गूँथी गयी परंपरा की व्याख्या को झुठला नहीं सकते। जभी उनका साहित्य आज तक भारत के सभी वर्गों के पाठकों के साथ एक ऐसी कालातीत, तरंग और सहृदय सहभागिता रचता है, जो किसी भी लेखक के लिये स्पृहणीय है।

मूलत: एक बड़ा लेखक समालोचकों, राज्य सम्मान या पुरस्कारों को लक्ष्य बना कर कभी नहीं लिखता, अपनी अन्त: प्रवृत्तियों के दबाव से, अपनी अंतरात्मा को साक्षी मान कर लिखता है। इसलिये हर युग में सत्ता से या समाज से या दोनों से उसका टकराव हुआ है। पर यदि ईमानदार लेखन से किसी का परोक्ष समर्थन या विरोध होता दिखता भी हो, उसके लिये लेखक को निन्दा या प्रशंसा का पात्र बनाना साहित्य की अंत: प्रवृत्ति को अनदेखा करना है।

आखिर प्रेमचंद ने मार्क्स को खुश करने, निराला ने अपनी जयंती मनवाने या निर्मल वर्मा ने अनिवासी भारतीयों का चौधरी बनने को तो नहीं लिखा था। लोग बाग भले ही उनको विचारधारा विशेष का प्रतीक मानने बैठ गये हों, सच तो यही है कि इस किस्म की सीमित पक्षधरता राजनीति का गुण होती है, साहित्य का नहीं। एक साहित्यकार अगर कोई हलफनामा उठाता है, तो सिर्फ मनुष्यता के नाम। शिवानी ने भी यही किया।

शिवानी का जीवन और साहित्य दिखाते हैं कि देश में स्त्री स्वाधीनता की एक कितनी खामोश लड़ाई पिछली सदी में शुरू हो गई थी। और जिन स्त्रियों ने अगली पीढ़ी के लिये राह बौद्धिक क्षेत्र में प्रशस्त की, उन्होंने इस लड़ाई में निजी स्तर पर कितना कुछ चुपचाप सहा और झेला था। पर उन स्त्रियों की इस प्राय: पारिवारिक वजहों से मूक, लगभग अलिखित दास्तान की प्रत्यक्षदर्शी रही हर लेखिका जानती है कि यह लड़ाई पुरुषों या परिवार व्यवस्था के खिलाफ नहीं, जैसा कि प्रचारित किया गया, बल्कि उस आत्म वंचना और छद्म परंपरावाद के खिलाफ थी, जिसके पीछे तब से आज तक पुरुष निर्मित तथा पोषित धर्म, राजकीय सत्ता और अर्थनीति की बर्बर ताक़तें खड़ी हैं।

इन ताकतों की समवेत युति ने सदियों से स्त्री ही नहीं समाज के हर कमज़ोर वर्ग के लिए पराधीनता की काराएँ घर से सड़क तक रची हैं। स्त्रियों या कमज़ोर वर्गों के सशक्तीकरण के नाम पर की जाने वाली थोथी राजनैतिक तलवार भँजाई या बाज़ार की विज्ञापनी नारेबाज़ी से उन काराओं का कुछ नहीं बिगड़ सकता। उनके खिलाफ महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान और शिवानी तथा उनकी परवर्ती पीढ़ी की लेखिकाओं का साहित्य ही सही मोर्चा रचता है। स्त्री या कमज़ोर वर्गों की शक्ति का यह अपमानजनक अवमूल्यन चूँकि विद्या के, चिन्तन के क्षेत्र से उनकी लंबी बेदखली ने किया है, उसी क्षेत्र में बहाल हो चुकी स्त्रियों द्वारा उसकी सही पहचान की गयी और उसका सही प्रतिकार किया जाना संभव हुआ है।

अंतत: हर बड़ा लेखक परंपरा का महत्व स्वीकार करता है, उस परंपरा का, जिसमें न सिर्फ बुनियादी मूल्यों का स्वीकार है, बल्कि उन मूल्यों के हनन की स्वीकृति भी है जो बासी पड़ कर हटाने के क़ाबिल हो गये हैं। इस मायने में शिवानी जैसा लेखन न केवल अतीत का प्रात:स्मरण, बल्कि वर्तमान के घटिया अंशों के विरुद्ध खड़ा एक दुर्ग भी बन जाता है। वह ऊपरी जीवन के भीतर छुपा एक अन्य जीवन है, जिसके बिना भारतीय जीवन का कोई भी ब्योरा अपूर्ण और बेमानी है।

वर्ण और धर्म से परे हट कर पात्रों की मानवीयता से साक्षात्कार, शिवानी के भावबोध की विशिष्टता है। उनकी रचनाओं के विधर्मी पात्र भी : ईसाई, मुसलमान, पारसी तथा समाज के परित्यक्त व तथाकथित पथभ्रष्ट लोग : वेश्याएँ, डकैत, हत्यारे, हिजड़े, कोढ़ी तथा भिखारी, सब उनकी पूरी सहानुभूति पाते हैं। शिवानी के लेखन की सफलता यह है कि वह न तो अपने चारों ओर के यथार्थ से घृणा करता है, न भावुकता भरा प्रेम, वह जीवन को समग्रता से समझने की और उसे समझाने की एक ईमानदार कोशिश करता है, उनके प्रिय तुलसी के शब्दों में :(navjivan)

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