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विभाजन की त्रासदी का खाका है अलका सरावगी का 'कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए'
19-Nov-2021 12:19 PM (51)
विभाजन की त्रासदी का खाका है अलका सरावगी का 'कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए'

Hindi Sahitya News: अलका सरावगी के उपन्यास ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ में दोहरे विभाजन की स्मृति है. कहानी कोलकाता से शुरू होती है, लेकिन कहानी है बांग्लादेश के कुष्टिया जिले की, जहां से पहले 1947 में और फिर 1971 में हिंदू परिवार भाग कर कोलकाता आ रहे हैं. कुष्टिया में व्यापार और सौदे में बहुत होशियार माना जाने वाला कुलभूषण कोलकाता आकर मानो बिखर जाता है.

Kulbhooshan Ka Naam Darj Keejiye: “गजब बात है!” कहकर कुलभूषण मुस्कराया. सड़क के किनारे पत्थर पर बैठे हुए उसे मुस्कराते हुए किसी ने नहीं देखा. देखता भी तो शायद पागल समझकर आगे बढ़ जाता. यों इस टूटी-फूटी दुनिया में सड़क पर बठैकर रोते या हंसते या अपने-आप से बात करते हुए चलते लोगों की कोई कमी नहीं है. शायद जो लोग उसकी तरह घरों के अन्दर ऐसा नहीं कर पाते, वे बाहर निकलकर आज़ाद हो जाते हैं. उसके मुस्कुराने का कारण यह था कि अभी-अभी कुलभूषण को एक नयी बात का पता चला था. वह भी ऐसे, जैसे कि अपना चश्मा पॉकेट में रखा हो और कोई उसे घर के कोने-कोने में खोजता फिरे.

उसके बेटे प्रशान्त और उसकी पाली हुई बेटी मालविका के आपस में क्या सम्बन्ध थे? क्या वे सम्बन्ध समाज के माने हुए दायरों के बाहर चले गये थे? क्या मालविका ने इसीलिए जीने के बजाय मरना चुना? कुलभूषण ने अपने दिमाग़ को तकलीफ़ की इस भूलभुलैया में भटकने से बचाने के लिए भूलने का बटन दबा दिया था. पर जाने उसे क्या हुआ कि वह बार-बार भूलने का बटन दबाता चला गया था. तभी उसने देखा कि उसका दिमाग़ पीछे और पीछे जाता गया. जैसे पृथ्वी ने उल्टे चक्कर लगा लिए हों और समय उस जगह चला गया हो जब उसके जीवन में न मालविका थी और न प्रशान्त.

कुलभूषण ने अपने दिल में गहरा सुकून महसूस किया जैसे कि कई दशकों का बोझ उसकी आत्मा से उतर गया हो. काश कि भूलने के बटन की इस व क़ाबिलियत का पता लगाने में उसे व करीब-करीब पचास साल न लगे होते.

वह किस साल के किस महीने में मां को लेकर हमेशा के लिए कुष्टिया छोड़कर यहां चला आया था? आज तक न जाने क्यों उसने यह सब याद नहीं किया था. उसे याद आया कि जिस दिन वह लाटैने वाला था, उसके पहले दिन वह गोर्राइ के तट पर घण्टों अकेला बैठा रहा था. अचानक उसे लगा था कि उसकी व क़मीज की कॉलर गीली है. तब उसे पता चला कि वह रो रहा था.

आज तक जब भी उसे रुलाई आयी थी, उसने भूलने का बटन दबा दिया था. पर उस दिन उसे पता ही नहीं चला था. शायद नदी का वह किनारा अब तक उसके आंसुओं से नमकीन होगा. उसे याद आया कि कैसे उसने अपने आंसुओं को दूसरों की निगाहों से देखा था.

श्यामा साथ होता तो सोचता कि वह अपने हृदय में अमला के लिए जागे उस अद्भुत प्रेम के लिए रो रहा है जिसका कोई किनारा कभी मिलनेवाला नहीं है. यदि मां और पिताजी देखते तो शायद सोचते कि वह अपने काम-काज, घर-द्वार छूटने आरै भाईयों-भाभियों के साथ के जीवन के बारे में सोच कर रो रहा है. पर कुलभूषण जैन ही जानता था कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ईस्ट बंगाल की अपनी गंगा-‘गोराई’ नदी के लिए रो रहा है. गोराई के बिना उसका जीवन वैसे ही सूना होगा जैसे कलकत्ते के ढाकापट्टी की तंग गलियाँ बिना पेड़ों की हरियाली के निपट सूनी हैं.

जब कुछ छूटने वाला होता है, तभी पता चलता है कि उसके बिना जीना क्या होगा. गोराई नदी के पास से गुज़रती रेल लाइन के दोनों तरफ़ दुर्गा-पूजा के ठीक पहले उगनेवाले सफ़ेद कास घास के लहराते झुरमुट उसने फिर कभी नहीं देखे. क्या दुनिया में उससे सुन्दर कोई दृश्य हो सकता है? बचपन से सुबह-शाम दोनों वक़्त गोराई में छलांग लगाकर दूर तैरते हुए नहाना और लाइन लगाकर चौक के मकान के सामूहिक गुसलख़ाने में नहाना क्या कभी एक हो सकता है?

गोराई नदी ही उसके सारे सुख-दुख की साथी थी। जब कभी ग़ायब होने पर उसकी खोज होती, वह वहीं बैठा मिलता.

पिताजी कई बार कहते-‘पिछले जनम में तुम गोराई में हिलसा मछली रहे होगे.’

पिताजी जैसे बनियों के लिए नदी उनके व्यापार का माल आने-जाने का रास्ता भर रही होगी. पर कुलभूषण के लिए गोराई उसकी आत्मा में बहती थी. उसकी आंखें नदी के पानी को, उसमें बहती छोटी-बड़ी नावों को और मांझियों को, नदी के किनारे में छोटे-से द्वीप पर उगे पेड़ों और जाड़े में उन पर भर जानेवाली प्रवासी हंसचीलों को देखते-देखते कभी नहीं थकती थीं. बारिश में उफन रही गोराई हो या जाड़े में नीले आकाश को झलकाती शान्त गोराई हो, उसे गोराई हर बार पहले से ज़्यादा अद्भुत लगती.

अलका सरावगी
अलका सरावगी हिन्दी की प्रसिद्ध कथाकार हैं. वे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं. कोलकाता में जन्मी अलका ने हिन्दी साहित्य में एमए और ‘रघुवीर सहाय के कृतित्व’ विषय पर पीएच.डी की उपाधि हासिल की है. “कलिकथा वाया बाइपास” उनका चर्चित उपन्यास है, जो अनेक भाषाओं में ट्रांसलेट हो चुके हैं. अलका का पहला कहानी संग्रह 1996 में ‘कहानियों की तलाश में’ आया. इसके बाद ही उनका पहला उपन्यास ‘काली कथा, वाया बायपास’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ. (news18.com)

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