विशेष रिपोर्ट

रायपुर,हाथियों को हक देने कोरबा जिले में एलिफेंंट रिजर्व पर राज्य का विचार
रायपुर,हाथियों को हक देने कोरबा जिले में एलिफेंंट रिजर्व पर राज्य का विचार
Date : 10-Jun-2019

हाथियों को हक देने कोरबा जिले में एलिफेंंट रिजर्व पर राज्य का विचार
छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 10 जून।
हाथियों की समस्या  निपटाने के लिए सरकार ठोस कार्ययोजना तैयार कर रही है। इस कड़ी में बरसों से लंबित कोरबा के लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने पर विचार हो रहा है। खास बात यह है कि करीब 8 सौ वर्ग किमी का यह इलाका घना जंगल है और कोयला खदानें भी हैं। यह सब देखकर पिछली सरकार एलीफेंट रिजर्व पर रूचि नहीं ले रही थी। 

विधानसभा के बजट सत्र में भी अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत ने लेमरू एलीफेंट रिजर्व के प्रस्ताव पर भी जानकारी चाही थी। यह विषय विधानसभा के प्रश्न-संदर्भ समिति के पास है। समिति ने इसको लेकर सरकार से जानकारी भी ली है, लेकिन वनमंत्री मोहम्मद अकबर ने 'छत्तीसगढ़' से चर्चा में सिर्फ इतना ही कहा कि हाथियों की समस्या गंभीर है और इस पर कैबिनेट में चर्चा होगी। 

माना जा रहा है कि हाथियों की समस्या के गंभीर रूप धारण करने के बाद अब कैबिनेट इसके निराकरण की दिशा में कोई ठोस फैसला ले सकती है। हाल यह है कि हाथी अब रायपुर शहर की सीमा तक पहुंच गए हैं। जशपुर-सरगुजा, कोरिया और कोरबा में हाथियों का उत्पात जारी है। अब तक कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। कहा जा रहा है कि यह समस्या इसलिए भी गंभीर हो रही है कि प्रदेश में एलीफेंट रिजर्व नहीं है। जबकि केन्द्र सरकार ने वर्ष-2007 में कोरबा का लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व करने की घोषणा की थी, लेकिन राज्य सरकार का रूख सकारात्मक नहीं रहा। यही वजह है कि एलीफेंट रिजर्व अधिसूचित नहीं किया जा सका। 

सरकार बदलते ही अब प्रदेश में हाथियों की समस्या से निपटने के लिए चिंतन-मनन का दौर चल रहा है। बताया गया कि खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस सिलसिले में बैठक भी ले चुके हैं। बैठक में वनमंत्री मोहम्मद अकबर के साथ-साथ मुख्य सचिव सुनील कुजूर और अन्य अफसर भी थे। सूत्र  बताते हैं कि श्री बघेल ने लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने के पुराने प्रस्ताव पर गहन मंत्रणा भी हुई है। 

सरकार और वन्यप्राणी विशेषज्ञों का मानना है कि लेमरू वन परिक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व बनाने से हाथियों की समस्या से काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। हसदेव अरण्ड के इस इलाके में भरपूर पानी है। इससे हाथियों को इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा। मगर, इसको लेकर कई तरह की दिक्कतें भी हैं। यह पूरा इलाका कोयले से भरा पूरा है। एसईसीएल की तीन खदानें हैं। इसमें से दो बंद हो चुकी है और एक खदान चालू है। चूंकि यहां अंडरग्राउंड माइनिंग हो रही है इसलिए कोई विशेष दिक्कत नहीं है। मगर, कई और खदानों के लिए निजी कंपनियों को पीएल दिया जा चुका है। ऐसे में एलीफेंट रिजर्व बनाना आसान नहीं है। इसको लेकर कंपनियों का भी काफी कुछ दबाव रहेगा।

बताया गया कि केन्द्र के प्रस्ताव के बाद एलीफेंट रिजर्व घोषित करने की प्रक्रिया भी रमन सरकार में शुरू हुई थी। खनन संभावनाओं को देखते हुए लेमरू वनपरिक्षेत्र के 817 वर्ग किमी क्षेत्र को घटाकर 4 सौ किमी कर दिया गया था। बाद में यह भी प्रस्ताव अधिसूचित नहीं किया जा सका। चर्चा है कि कंपनियों के दबाव की वजह से ऐसा नहीं हो पाया है। मगर, भूपेश सरकार अब पुराने प्रस्ताव के मुताबिक ही एलीफेंट रिजर्व बनाने की दिशा में काम कर रही है। इस सिलसिले में कोरबा डीएफओ से वनविभाग ने जानकारी भी बुलाई है और कोरबा डीएफओ में आंकड़ों समेत तमाम जानकारियां भेज भी दी गई है। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में लेमरू वनक्षेत्र को एलीफेंट रिजर्व घोषित करने का वादा किया था। सरकार अब इस दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। इस पर जल्द ही फैसला होने की उम्मीद है।  

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