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उत्कृष्ट साहित्य का सिलसिला, आज विख्यात अभिनेत्री ज़ोहरा सहगल की आत्मकथा का एक अंश
उत्कृष्ट साहित्य का सिलसिला, आज विख्यात अभिनेत्री ज़ोहरा सहगल की आत्मकथा का एक अंश
31-May-2020 12:51 PM

22 मार्च को भारत में हुए जनता कफ्र्यूू और 24 मार्च से लगातार चल रहे लॉकडाऊन के बीच साहित्य के पाठकों की एक सेवा के लिए देश के एक सबसे प्रतिष्ठित साहित्य-प्रकाशक राजकमल, ने लोगों के लिए एक मुफ्त वॉट्सऐप बुक निकालना शुरू किया जिसमें रोज सौ-पचास पेज की उत्कृष्ट और चुनिंदा साहित्य-सामग्री रहती है। उन्होंने इसका नाम पाठ-पुन: पाठ, लॉकडाऊन का पाठाहार दिया है। न्हें साहित्य के इच्छुक पाठक राजकमल प्रकाशन समूह के वॉट्सऐप नंबर 98108 02875 पर एक संदेश भेजकर पा सकते हैं। राजकमल प्रकाशन की विशेष अनुमति से हम यहां इन वॉट्सऐप बुक में से कोई एक सामग्री लेकर 'छत्तीसगढ़' के पाठकों के लिए सप्ताह में दो दिन प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी हफ्ते से हमने यह सिलसिला शुरू किया है। कुछ दिन पहले आपने इसी जगह पर चर्चित लेखिका शोभा डे का एक उपन्यास-अंश पढ़ा था। आज यह दूसरा आत्मकथा-अंश प्रस्तुत है। यह सामग्री सिर्फ 'छत्तीसगढ़' के लिए वेबक्लूजिव है, इसे कृपया यहां से आगे न बढ़ाएं। 
-संपादक

ज़ोहरा सहगल
ज़ोहरा सहगल का आत्मकथा अंश
1959-1962 : दिल्ली


बॉम्बे में 14 साल की हमारी रिहाइश के दौरान कामेश्वर ने तकरीबन हर काम में किस्मत आजमाई, फिल्म निर्देशन, पटकथा लेखन, अपनी पेंटिंग और मूर्तियों की प्रदर्शनियाँ, हमारी नई बनी कम्पनी सहगल बैले के बैनर तले डांस के कार्यक्रम, एक रजिस्टर्ड होमियोपैथ के बतौर दवाइयाँ देना, उन्होंने सब काम किए। हालाँकि उन्होंने जो भी काम किया उसमें पूरी तरह हुनरमंद होने के बावजूद उन्हें वह कामयाबी नहीं हासिल हुई जिसके वे हकदार थे। कला के हर क्षेत्र में उनके काम को विशेषज्ञों की बहुत सराहना मिलती थी, तेजी से बेहतरीन काम करने की क़ाबिलियत के चलते फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज लोग उन्हें 'स्पीड किंग' और 'जीनियस' कहा करते थे। लेकिन उनको कामयाबी लगातार मिलने की बजाय बीच-बीच में किश्तों की तरह मिलती थी। किसी दिन वह कुछ हज़ार रुपए में कोई फि़ल्म की कहानी बेच कर उत्साह से घर लौटकर मुझे कार में बैठाकर मेरे जन्मदिन के उपहार के लिए फ्रिज़ लेने जाएँगे लेकिन अगले ही दिन उनका यह जोश काफ़ूर होता था। वह निराश हो जाते थे, ऐसे में अपने आसपास की हर चीज़ और हर किसी से वह कट जाते थे, हमारे बच्चों को छोड़कर, जिन्हें वो बेहद चाहते थे, उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता था।

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एक के बाद एक नाउम्मीदी की वजह से वह धीरे-धीरे सबसे अलग- थलग होते गए और उनकी उदासी लगातार गहराती गई जिसका असर यह हुआ कि वह बहुत ज़्यादा शराब पीने लगे। इसके अलावा वह ख़ुद पर कई तरह के नशे आजमाने लगे थे जिसके लिए नशे के तरह-तरह के जहरीले मिश्रण इस्तेमाल करते थे। हिप्पियों से बहुत पहले ही उन्होंने दिलो-दिमाग पर चरस से होनेवाले असर का पता कर लिया था। उनका तेज़ दिमाग और हमेशा कुछ नया जानने की आतुरता ने उन्हें काला जादू की ओर खींचा, जिसे बॉम्बे में मछुआरे इस्तेमाल करते थे। काला जादू सीखने के लिए वह घंटों दरवाजा बंद करके बैठे रहते थे, अगरबत्तियाँ जलाकर मंत्रों का जाप करते थे। इस दौरान उनका हँसी-मज़ाक़ का मिजाज पूरे शबाब पर रहा, केवल बहुत करीबी लोगों के अलावा उन्हें जाननेवाले हर आदमी को लगता था कि वह बहुत ही बेफिक्री से जी रहे हैं। यही वजह थी कि बाद में जो कुछ भी हुआ, वह उन लोगों के लिए एक बड़े झटके की तरह था जो उन्हें एक मजाकिया इनसान के तौर पर जानते थे।
पवन के पैदा होने के बाद हम पाली हिल छोड़कर 37 कार्टर रोड, बान्द्रा में समुद्र के किनारे एक खुले हवादार फ्लैट में किराए पर रहने आ गए थे। 11 मई, 1959 की रात कामेश्वर कुछ ज़्यादा ही नाउम्मीद, उदास थे, ऐसे में उन्हें अकेला छोड़ देना ही ठीक रहता था। मैं उन्हें उनके कमरे में छोड़कर बाहर चली गई जहाँ बच्चों के बगल में मेरा बिस्तर लगा था। जब मैं सुबह उठी तो मैंने उनके कमरे के बाहर लगा नोटिस पढ़ा जिसमें लिखा था, परेशान मत करना, मैं छिप रहा हँू। अपनी बातें ज़ाहिर करने के उनके दिलचस्प तरीके के बारे में सोचकर मुस्कराते हुए मैंने दरवाज़े से वह पर्ची उतारी। हमेशा की तरह मैं सुबह की रिहर्सल के लिए गई जो उन दिनों घर के बिल्कुल पास बान्द्रा जिमख़ाना में हो रही थी। दोपहर को खाना खाने मैं दो बजे उजऱा के साथ घर लौटी, उसने मुझसे कामेश्वर के बारे में पूछा। मैंने उसे बताया कि वह अपने कमरे में आराम कर रहे हैं। हमारा डाइनिंग रूम कामेश्वर के बाथरूम के बगल में निचले तल पर था, जिसकी वजह से हमें उनके बिस्तर के पास ज़मीन पर रखा घूमता बिजली का पंखा भी दिख रहा था। मुझे चिन्ता तब हुई जब देर शाम किरण और मैं एक नाटक के बाद घर लौटे और पाया कि कामेश्वर का कमरा अब भी बन्द था और अन्दर लाइट जली थी।
हमने लैवेटरी की खिड़की के रास्ते दरवाज़ा खोला, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी...कामेश्वर बिस्तर पर ऐसे पड़े थे जैसे शान्ति से सो रहे हों, उनके पैरों के पास रखा पंखा अब भी घूम रहा था। वह हमेशा ही ज़मीन पर सोना पसन्द करते थे और हाल ही में उन्होंने अपने दीवान के पाए आरी से काटकर जितने हो सकते थे उतने छोटे कर दिए थे। मुझे याद है कि जब वह ऐसा कर रहे थे तो मुझे बहुत मज़ा आया था, मैं उन्हें चिढ़ा रही थी कि पाए बराबर काटने के फेर में तुम पूरा दीवान ही काट डालोगे, क्योंकि उन्हें पाए बराबर काटने में कुछ दिक्कत आ रही थी और इस चक्कर में हर पाए से थोड़ा-थोड़ा टुकड़ा हर बार कटता जा रहा था। और अब वह ठंडे संगमरमर के फ़र्श पर लेटे हुए थे, गरमी की वजह से कमर से ऊपर शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था, एक हाथ सिर के ऊपर पड़ा हुआ और एक हाथ उनके नीचे दबा हुआ, यह सोते हुए उनकी ख़ास मुद्रा थी। यक़ीन नहीं हो रहा था! 'मुझे अभी हिम्मत नहीं छोडऩी है' मैं अन्दर ही अन्दर बार-बार दोहरा रही थी। 'बच्चों तक इस हादसे की आँच नहीं पहँुचनी चाहिए...' मैंने किरण से, जो मेरी तरह ही भौचक्की थी, मेरे साथ उसकी कढ़ाई की टीचर के घर तक चलने के लिए कहा जो घर के नज़दीक ही था। वहाँ से मैंने पापाजी को टेलीफ़ोन किया। वह जितना मुमकिन था उतनी जल्दी पहँुच गए। मैं नहीं जानती कि वो नहीं होते तो मैं क्या करती!
अब मेरे मरने का दौर शुरू हुआ। मैं ख़ालीपन की एक अजनबी दुनिया में चल रही थी जिसके मानी ख़त्म हो चुके थे। कुछ भी पहले जैसा नहीं था और न कभी हो सकता था। जि़न्दगी इतनी दुश्वार हो चुकी थी जिसमें जीते रहना मुश्किल हो गया था। लेकिन बच्चे किरण और पवन बहुत छोटे थे, पवन जिसकी छठी सालगिरह केवल एक हफ़्ते बाद ही थी, बार-बार पूछता था कि उसका दोस्त क्यों नहीं आया। उजऱा और हामिद हमें अपने फ़्लैट में ले आए थे, जहाँ पवन के जन्मदिन पर कमरा सजाया गया और उसे उपहार देते हुए उसके सामने ऐसा ज़ाहिर करना कि सब कुछ ठीक-ठाक है, मार डालनेवाला अहसास होता था। सबसे ज़्यादा मुश्किल बार-बार पवन के इस सवाल का जवाब देना होता था कि उसके पिता कहाँ हैं। आखिरकार वह शांत हो गया हालाँकि वह बहुत दुखी भी हुआ जब मैंने उसे एक लंबी और दिलचस्प राजकुमारी परी की कहानी सुनाई जो बादलों में अपने साथ खेलने के लिए दोस्त को बार-बार बुलाती थी। राजकुमारी उदास न हो, इसलिए दोस्त ऊपर चले गए हैं और अब कभी वापस नहीं लौटेंगे।
मुझे लगता है कि इस हादसे के तुरन्त बाद मैं लगभग पागलपन के दौर से गुजऱी। मैं ख़ुद को बारी-बारी से हँसते और रोते हुए पाती थी और अपनी हरकतों को ध्यान से देखते हुए उन पर अचरज करती थी। मैं ख़ुद को अजीबो-गऱीब भंगिमाएँ बनाते हुए पाती थी जो सामान्य तौर पर मैं कभी नहीं करती, जैसे जब थिएटर के सारे लोग कामेश्वर की मौत पर दुख ज़ाहिर करने के लिए घर आए तो मैं नमस्ते की बजाय उन्हें सलाम कर रही थी। कभी-कभी दुख और सदमा इतना ज़्यादा होता था कि शारीरिक तौर पर उसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता था और मेरा पूरा शरीर काँपने लगता था जिसे रोक पाना वश में नहीं होता था। मुझे ख़ुद को पागल होने से रोकना होगा, अगर किसी और चीज़ के लिए नहीं तो अपने बच्चों के लिए ही मुझे यह करना होगा, मैं ख़ुद को बार-बार यह बात समझाती थी।
ज़ाहिर सी बात थी कि इस पूरे अरसे में मैं छुट्टी पर थी। अब मैंने सोच लिया कि मुझे ख़ुद को सँभालने की कोशिश करनी होगी और जब अगले दौरे की घोषणा हुई तो मैंने साथ जाने का फ़ैसला किया। मैंने अपने लिए 'पठान' नाटक के आखिर के एक दुख भरे दृश्य को करने की चुनौती तय की। अगर मैं मंच पर दुख बर्दाश्त कर सकती हँू तो इसका मतलब यह होगा कि मैं सामान्य हो रही हँू। यह मुझे दुख से उबरने में मदद करेगा और पागल होने से बचाएगा। जब मैं वापस अपने काम पर लौटी तब मुझे अहसास हुआ कि मेरे पति ने मुझे वह दिया है जो किसी अदाकारा के लिए सबसे बेहतरीन उपहार हो सकता है। उनकी याद मेरे ज़ेहन में हमेशा ताजा रहती है और जब भी मेरे काम में मुझे गहरे दुख के अहसास को जाहिर करने के लिए कहा जाता तो मुझे बस मेरे दिल में हमेशा धधकते रहते शोलों पर पड़ी राख को हल्के से हटा देना भर होता है। उन्हें खोने का यह दुख हमेशा मेरे साथ बना रहेगा। मेरे प्यारे कामेश्वर हम तीनों, मैं और मेरे बच्चों, के साथ हमेशा हैं। हम लोग बहुत प्यार के साथ उनकी बातें करते हैं, उनके असाधारण हुनर को, उनके बेहतरीन हास्यबोध और उनकी ख़ूबसूरती को याद करते हैं। उनकी रचनात्मक ऊर्जा आज तक मुझे चारों ओर से घेरे हुए है और वह मेरे मरने के बाद भी बनी रहेगी।
मैं अक्सर सोचती हँू कि अगर कामेश्वर ने मुझसे शादी नहीं की होती तो क्या उनकी जि़न्दगी किसी और तरीक़े से ख़त्म हुई होती। वह अतिसंवेदनशील इनसान थे जो कभी भी इस बात को मान नहीं पाए कि उनकी बीवी अपने काम में लगातार कामयाबी और इज़्ज़त हासिल करती जा रही है जबकि उनकी ख़ुद की कामयाबी जो हालाँकि कहीं ज़्यादा ऊँचे दजऱ्े की थी, रुक-रुक कर उन्हें मिली। उन्हें मेरी अदाकारी पसन्द थी और एक ड्रेस रिहर्सल के दौरान बड़ी बी के किरदार में मेरी अदाकारी देखकर वह इतने भावुक हो गए कि उनकी आँखों से आँसू बह कर व्यूफाइंडर पर गिरने लगे जिससे वह नाटक की फ़ोटो खींच रहे थे! लेकिन इसके बावजूद, जिस दिन भारत की आज़ादी का ऐलान हुआ, मैं खुलेआम सड़कों पर बिन्दास होकर नाचने के बाद घर लौटी, मैं बुरी तरह थकी लेकिन अब्बास से मिली तारीफ़ कि, अब हमें पता है कि हिन्दुस्तान के पास भी एक इसाडोरा डंकन है से बहुत ख़ुश थी, लेकिन कामेश्वर ने हिकारत से भरकर कहा था, तुमने सोचा कि मुझे कैसा लगा होगा जब मैंने यह सुना कि मेरी बीवी सड़क-छाप नाचनेवालियों की तरह खुलेआम नाच रही है? मेरी बीती जि़न्दगी से जुड़ा दौर जिसमें कामेश्वर मौजूद नहीं था, उसे परेशान करता था। मेरे प्यार और भरोसे की क़समें खाने के बावजूद यह बात उसे बहुत ज़्यादा दुखी करती थी।
बहरहाल, हमारे पास सवालों के तौर पर इतने सारे 'अगर' और 'मगर' हैं, कौन उनके जवाब दे सकता है? एक आदमी के लिए सबसे बड़ी दुश्वारी यह है कि उसके जि़न्दा रहने के सबब के बारे में, 'क्यों', 'कहाँ' और 'इसके बाद' जैसे सवालों का उसके पास कोई जवाब नहीं है। अब तक मुझे जो जवाब मिले हैं वह तसल्ली देने में नाकाफ़ी साबित हुए हैं। शायद हमारे दिमाग़ के कंप्यूटर की प्रोग्रामिंग सही नहीं है! यह अब तक भी एक गहरी और अनसुलझी पहेली है।
मैंने और बच्चों ने बान्द्रा वाला फ़्लैट छोड़ दिया था और उजऱा के मैरीन ड्राइव वाले घर में रहने लगे थे। कुछ समय बाद किरण अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए अलीगढ़ वापस चली गई, लेकिन पवन के लिए स्कूल की मुश्किल हो गई। उसने नर्सरी की पढ़ाई पूरी कर ली थी और एक साल बरबाद न हो, इसके लिए उसे सीधे प्राइमरी स्कूल में भेजा जाना ज़रूरी था। अब नाटक के साथ दौरे पर जाने पर मेरे पीछे उसकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं था। मैं उसे बोर्डिंग स्कूल भेजना चाहती थी लेकिन ऐसा करने की मेरी हैसियत नहीं थी। उस वक़्त मेरी ममेरी बहन हामिदा मेरा सहारा बनी। उन्होंने पवन की पढ़ाई के ख़र्च में हाथ बँटाने का भरोसा दिया। इसलिए हमने उसे देहरादून में छोटे लड़कों के लिए अंग्रेज़ी पब्लिक स्कूल की परिपाटी पर बने वेल्हम प्रीपेरेटरी स्कूल में भेजने का फैसला किया। स्कूल की प्रिंसिपल मिस ओलीफैंट को मैं अपने बचपन से ही जानती थी। वह मेरे मामा की पुरानी दोस्त थीं, जिन्होंने कई साल पहले यह स्कूल खोलने में उनकी मदद की थी। बहुत कम समय बचा होने के बावजूद हालात को देखते हुए पवन को तुरन्त दाखिला मिल गया और उसे देहरादून रवाना कर दिया गया। मैं और चार महीनों तक थिएटर के साथ दौरा करती रही लेकिन अब मेरे लिए उसी माहौल में उसी तरह का जीवन जीना मुमकिन नहीं हो पा रहा था। बॉम्बे में हर चीज़ मुझे मेरे पति की मौत के हादसे की याद दिलाती थी। मैंने महसूस किया कि मुझे इस लगातार दुख से बाहर निकलना पड़ेगा, नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगी।
मैंने पापाजी से बात की कि किन वजहों से मैं अपनी जि़न्दगी बदलना चाहती हँू, और उन्होंने अपनी आदत के मुताबिक़ हालात समझते हुए मुझे थिएटर छोडऩे की इजाज़त दे दी। मैंने दिल्ली में बहुत से लोगों को चि_ियाँ लिखीं जिनमें पंडित जवाहरलाल नेहरू और कमलादेवी चट्टोपाध्याय भी शामिल थे। कमला जी ने मुझे दिल्ली में जल्दी ही खुलने वाली नाट्य एकेडमी फॉर डांस एंड ड्रामा का जिम्मा उठाने का बुलावा भेजा। यह एकेडमी दिल्ली नाट्य संघ के तहत खोली जानी थी। संघ की प्रमुख बेग़म ज़ैदी ने भी मुझे उसी दौरान खुले हिन्दुस्तानी थिएटर के कलाकारों को तालीम देने के लिए कहा। मैंने सोचा कि यह एक अच्छा मौक़ा मिल रहा है और पृथ्वी थिएटर में शामिल होने के ठीक चौदह साल बाद अक्टूबर 1959 में मैंने वहाँ से इस्तीफ़ा दे दिया। 
दिल्ली में मैं रंजीत राय और उनकी ख़ूबसूरत जवान पत्नी कमला के साथ रही। हालाँकि कामेश्वर के बहुत से दोस्त और प्रशंसक थे लेकिन वह कहा करते थे, अगर जि़न्दगी में मेरा कोई सच्चा दोस्त है तो वो रंजीत है। मेरी बेग़म ज़ैदी और कमलादेवी से शुरुआती बातचीत हुई और उनकी इजाज़त लेकर एक महीने बॉम्बे रहने के लिए गई जिससे उस समय हरबर्ट मार्शेल की रहनुमाई में चल रहे बॉम्बे नाट्य संघ के तौर-तरीके समझने के साथ-साथ थिएटर के जानकार और मशहूर निर्माता इब्राहिम अल्काजी के साथ रोजाना बैठक ले सकूँ। चँूकि मैंने किसी तयशुदा कोर्स के जरिए थिएटर नहीं सीखा था इसलिए मैं बहुत ज़्यादा असमंजस में थी कि नई नौकरी में थिएटर सिखाने के लिए मैं क्या करूँगी। हमने तो 'करो या मरो' वाले मुश्किल रास्ते से अदाकारी के पाठ सीखे थे। लेकिन अल्काज़ी ने यह कहकर मुझे बहुत हिम्मत बँधाई कि एक अदाकार और डांसर के बतौर इतने साल का मेरा तज़ुर्बा इसमें मेरी मदद करेगा। उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं मंच पर सीखी अदाकारी को भुलाकर बिल्कुल शुरुआत से शुरू करूँ और फिर उसे सिलसिलेवार कागज पर लिखँू। यह किसी कलाकार के लिए शुरुआती कोर्स का एक खाका बन जाएगा। हालाँकि यह कहना जितना आसान था करना उतना ही मुश्किल। लेकिन एक आला दजऱ्े के कला जानकार से मिली इस सलाह ने मुझे बहुत ज़्यादा हिम्मत दी। अल्काज़ी ने मुझे बहुत मेहनत के साथ थिएटर की दुनिया का पूरा ख़ाका समझाया, थिएटर पढ़ाने के उनके तरीक़ों को समझने के लिए मैं उनके नोट्स ले सकती थी, उनके लेक्चर और नाटकों की रिहर्सलों में जा सकती थी। मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि मैं एक महीने के छोटे अरसे में ड्रामा सिखाने के लिए एक पूरा कोर्स तैयार करने में कामयाब रही लेकिन कम से कम इस दौरान मुझे इसके लिए एक शुरुआती चीज़ समझ में आ गई जिसे आधार मानकर आगे का काम किया जा सकता था।
मैं दिल्ली लौटी और इस बार मुझे मेरी बहन के नॉर्थ एवेन्यू में संसद सदस्यों को मिलनेवाले फ़्लैट की ऊपरी मंजि़ल पर बाथरूम और खुले बरामदे के साथ लगे एक कमरे में पक्के तौर पर रहने का मौक़ा मिला। मेरे जीजाजी उन्हीं दिनों राज्यसभा के लिए नामित हुए थे। यह इन्तज़ाम बहुत ही बढिय़ा था क्योंकि यहाँ ऊपर कमरे तक पहँुचने का अलग रास्ता था, साथ ही मजऱ्ी होने पर जब चाहँू अपनी बहन और उसके परिवार के साथ का मज़ा भी ले सकती थी। यहाँ मैं पूरी तरह से खुद मु$खत्यार थी लेकिन क्योंकि मैं खाना उनके साथ ही खाती थी इसलिए घरेलू कामकाज की दिक्कतों से बची हुई थी। आपा का हमेशा मेरी ख़ुशी के लिए चिन्ता में रहना, मेरे बच्चों के लिए प्यार और मेरे कामकाज़ में बिलावजह खलल न डालने वाला मिज़ाज और उनके शौहर ज़ैन की दरियादिली, मज़ाकिय़ा तबीयत और प्यारी शख्सियत उस समय मेरी दिमागी हालत को सुकून पहँुचाने के लिए बिल्कुल मुफ़ीद थी। 
उनकी मौजूदगी और दिली मोहब्बत से मुझे बहुत सुकून मिला। मैं एक बार फिर से सुरक्षित महसूस करने लगी और जिन्दगी को लेकर मेरा सामान्य रवैया फिर से लौट आया।
मुझे अपने विचारों को पाठ्यक्रम के रूप में तैयार करने में लगभग तीन महीने लग गए, जिसमें मैंने जर्मनी में यूरिदमिक्स की अपनी तालीम, उदय शंकर के साथ सीखे डांस और अल्मोड़ा में बतौर डांस टीचर अपने अनुभवों को चौदह सालों तक पृथ्वी थिएटर में पापाजी की रहनुमाई में सीखी चीज़ों का निचोड़ (या घालमेल!) डाला था। शौकिया तौर पर अभिनय और डांस सीखनेवाले कलाकारों के लिए दो साल का कोर्स तैयार करने में बहुत साल पहले डार्टिंग्टन हॉल में मिशेल चेखव की कक्षाओं में सीखी चीज़ें, स्तानिस्लावस्की के तरीक़ों पर लिखी किताबें, डांस और नाटक के विषयों पर लिखे पुराने लेख, 'भरत नाट्य शास्त्र' से बहुत मदद मिली। मंै तो कहँूगी कि इसे तैयार करने में मेरे शागिर्दों से ज़्यादा मुझे फ़ायदा हुआ। मुझे लगता है कि शुरुआती तालीम के लिहाज़ से सिखाने का मेरा तरीक़ा थोड़ा मुश्किल था, इसलिए मेरे शार्गिद मुझे थोड़ा खिसका हुआ सा समझते थे जब मैं उन्हें ख़ुद को जानवर में बदलने या ऐसे ही कोई और अजीबोगऱीब व्यायाम करवाती थी।
थियेटर की तमाम सहूलियतों और तैयार स्टाफ के साथ नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा पहले से ही मौजूद था। इसके अलावा किसी तरह के भी हुनर वाले सभी शौकिया कलाकार दिल्ली के अलग-अलग ग्रुप से जुड़े थे और उन्हें लगता था कि उन्हें किसी तरह की ट्रेनिंग की जरूरत नहीं है। इसलिए हमारी अकादमी में आनेवाले ज़्यादातर वो लड़के-लड़कियाँ थे, जो किसी भी ग्रुप में शामिल नहीं हो सके थे! बाद में स्कूल व कॉलेज से जुड़े अधिकारियों को मेरे काम में दिलचस्पी जागी और मैं यूनिवर्सिटी और दूसरे कॉलेजों में अपनी क्लास लेने के लिए हफ़्तावार चक्कर लगाती थी। कुछ गिने-चुने विद्यार्थियों के साथ 3 फरवरी, 1960 को अकादमी की शुरुआत हुई, लेकिन फरवरी 62 तक इसमें दाखिला लेने वालों की संख्या 60 तक पहँुच गई। लोक निर्माण और परिवहन मंत्री श्री सुब्रह्मण्यम ने अपने बँगले के अहाते में बनी एक छोटी-सी कॉटेज हमें बतौर ऑफिस इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी थी और कक्षाएँ कनॉट प्लेस के नज़दीक शंकर मार्केट के ऊपर एक छोटे से कमरे में लगती थीं। मैं बहुत ख़ुशकिस्मत रही कि मुझे अपनी वाइस प्रिंसिपल के तौर पर जॉय माइकल की मदद मिली जो एक बहुत तजुर्बेकार नाटककार और टीचर थीं। मैं सोचती हँू कि बग़ैर उनकी मदद के मैं क्या कर पाती? मैं अकादमी से जुड़ी तमाम चीज़ें, जैसे- कक्षाओं, काम, विद्यार्थियों की सूची वग़ैरह रोज़ाना लिखती थी और उनके टाइप किए हुए रिकॉर्ड की प्रतिलिपियाँ कमलादेवी और पृथ्वीजी को भेजा करती थी। ये दोनों ही हमारे कामकाज में गहरी दिलचस्पी लेते थे। नाट्य अकादमी के बेहतरीन कामों में एक तो पापाजी का दिल्ली आना था और दूसरा ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसाइटी में हमारे कलाकारों का दो सालों में सीखे डांस और एक्टिंग का प्रदर्शन था। 
लेकिन नाट्य अकादमी को कामयाब बनाने की मेरी तमाम कोशिशों के बावजूद मेरे बॉस, दिल्ली नाट्य संघ के सदस्य मुझसे नाख़ुश रहते थे। इनमें से ज़्यादातर को इस नौकरी के लिए मेरी शैक्षणिक योग्यता पूरी न होने और विद्यार्थियों के साथ पूरा नाटक तैयार करने में मेरी हिचकिचाहट से दिक्कत थी। हालाँकि किसी ने कभी भी खुले तौर पर मुझसे कुछ कहा नहीं लेकिन इधर-उधर होती कानाफूसियों से मुझे ख़बर लग ही जाती थी। बेगम ज़ैदी, जो हमेशा मेरा साथ देती थीं और मेरे खिलाफ संघ के बाकी सदस्यों की शिकायतों को ज़्यादा तवज्जो नहीं देती थीं, दिसम्बर 1961 को दिल का दौरा पडऩे से अचानक ही चल बसीं। उनके बाद वहाँ मेरा साथ देनेवाला कोई भी नहीं बचा। अकादमी में एक-दूसरे के  खिलाफ साजिश करने का माहौल मेरे मिज़ाज से बिल्कुल मेल नहीं खाता था इसलिए मैं बहुत निराश हो गई। किस्मत अच्छी रही कि दिल्ली में रिहाइश के दौरान मेरे दूसरे कामों को ख़ासी कामयाबी मिली। यहीं मुझे टेलीविजन में आने का दूसरा मौका मिला, 1936 में बीबीसी के लिए डांस करना टेलीविजन पर मेरा पहला मौक़ा था। एक बार बुलाए जाने के बाद, मैं हमेशा ही टी.वी. निर्देशकों के साथ जुड़ी रही और मैंने लगभग 10 नाटकों में काम किया। शौकिया तौर पर काम करनेवाली थिएटर कम्पनियों के कई नाटकों में भी मैंने काम किया क्योंकि दिल्ली में पेशेवर तौर पर कोई थिएटर नहीं था और मैं मंच पर आने के लिए तरस रही थी।
इसके अलावा मुझे बेहतरीन पत्रकार अमिता मलिक के सुझाव पर 'शंकर्स वीकली' के लिए नाट्य-समीक्षक नियुक्त किया गया। रक्षा मंत्रालय ने मुझे हर बार जनवरी में गणतंत्र दिवस के मौके पर होने वाले लोकनृत्यों को छाँटने और उन्हें करवाने में कर्नल गुप्ते का सहयोग करने का मौक़ा दिया। इस ख़ास कार्यक्रम को करवाने के लिए बनी समिति की प्रमुख श्रीमति इंदिरा गांधी थीं। तैयारियों के शुरुआती हफ़्ते में मंत्रालय से चि_ियाँ लाने वाले एक कारिंदे को हेलमेट लगाए, वर्दी पहने अपनी मोटरसाइकिल पर धड़धड़ाते हुए नॉर्थ एवन्यू के चक्कर लगाते दिखना एक आम सा नज़ारा बन गया था। वह पीले रंग का 'बहुत ज़रूरी' लिखा हुआ मोटा-सा लिफ़ाफ़ा जिस पर सरकारी मुहर लगी होती थी, पहँुचाने का काम करता था। लिफ़ाफ़ा पहँुचाने वाले रक्षा मंत्रालय के उस मोटरसाइकिल सवार को देखकर लोग चौंकते थे कि भला विपक्ष के राजनेता के घर पर यह क्या कर रहा है। अगर वह उस बहुत महत्त्वपूर्ण से दिखते लिफाफे से निकलने वाली छोटी-सी पर्ची को देखते तो ज़रूर हँसते, जिस पर लिखा होता था, आपसे गुजारिश है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर होने वाले कार्यक्रमों के सिलसिले में फलाँ तारीख़ को फलाँ समय पर प्रधानमंत्री निवास पर होनेवाली बैठक में शामिल हों। (इंदिराजी जब भी दिल्ली में होती थीं अपने पिता के पास ही ठहरती थीं।) 
गणतंत्र दिवस डांस फ़ेस्टिवल में हिस्सा लेना एक यादगार तज़ुर्बा था। हालाँकि मैं पूरे भारत का दौरा कर चुकी थी और यहाँ के ज़्यादातर लोकनृत्यों को जानती थी, इसके बावजूद मुझे बिल्कुल अन्दाज़ा नहीं था कि हमारे देश में लोकनृत्य की इतनी ज़्यादा शैलियाँ मौजूद हैं। लोकनृत्यों के लिए पहने जानेवाली पोशाकों के रंग व डिज़ाइन, ताल और गत की किस्में, जोश और इन कबीलाई नृत्यों से जुड़ा मिट्टी का सोंधापन मेरे लिए आँख खोलने वाला अहसास था। यह एक नई और अनबूझी दुनिया को खोज लेने जैसा था जिसके साथ एकदम ऐसा लगाव हो जाता है जैसे उससे कभी किन्हीं पिछले जन्मों का जुड़ाव रहा हो। डांस की शैली जितनी पुरानी थी उसका आकर्षण उतना ही ज़्यादा था जैसे तिब्बत और नागालैंड के सीमावर्ती कबीलों के कलाकार वॉर-डांस में लड़ाई का सा प्रभाव डालने के लिए लयबद्ध साँसों और मँुह से फुफकार निकालने जैसी विधियाँ अपनाते थे क्योंकि यह ड्रम या दूसरे किसी वाद्ययंत्र से बहुत पुरानी कला थी। यह बहुत असरदार दिखता था क्योंकि हमने यह डांस तालकटोरा गार्डन में खुले में बने मंच पर बहुत नज़दीक से देखा था जहाँ रिहर्सल होती थीं। खून तक में महसूस होने वाली ड्रमों की धमक, चटकीले रंगों की बहार और ख़ुशी की चीत्कारों से गँूजता किसी एक इलाके का डांस किसी दूसरे इलाके के धीमे और गरिमामय तरीक़े से होने वाले डांस से बिल्कुल अलग होता था। डांस के तरीक़ों में इतनी विविधता थी कि यक़ीन नहीं होता था, यह कभी न भूलने वाला तज़ुर्बा था। समिति की एक बैठक में मैंने एक मशवरा रखा कि इन डांस मंडलियों को देश और विदेश का दौरा करवाना चाहिए जिससे दिल्ली न आ सकने वाले लोगों को भी इन लोकनृत्यों को देखने का मौक़ा मिल सके। हालाँकि श्रीमति गांधी ने मेरा यह मशवरा मान लिया लेकिन बाक़ी सदस्यों ने यह कहते हुए इसे नामंज़ूर कर दिया कि यह व्यावहारिक नहीं है। एक तो इसमें बहुत ज़्यादा ख़र्च आता दूसरा क्योंकि ज़्यादातर कलाकार किसान थे इसलिए वह ज़्यादा समय के लिए अपने घरों से बाहर नहीं रह सकते थे। मैं चाहती थी कि कोई इस पूरे महोत्सव की फि़ल्म बनाकर दुनिया को दिखाए। यह एक ऐसी चीज़ है जिसके ज़बर्दस्त जोश, भव्यता और गज़़ब की ख़ूबसूरती पर देखने के बाद ही यक़ीन आता था (बाद में 1974 में जब मैं हिन्दुस्तान लौटी तो मुझे पता चला कि श्री गोविन्द विद्यार्थी ने ऐसी िफ़ल्मों की रील की रील खींची हुई हैं जो संगीत नाटक अकादमी में रखी हैं)।
एक बार जब मैं इन लोकनर्तकों की टोलियों को इनाम देने के लिए प्रधानमंत्री के घर पर हो रहे कार्यक्रम को देखने पहँुची तो मेरे हाथ में जीतने वालों की एक सूची थमा दी गई और मुझे माइक के आगे खड़ा कर दिया गया। लगता था कि संगीत नाटक अकादमी ने आकाशवाणी के जिस एनाउंसर को बुलाया था वह पहँुच नहीं पाया था इसलिए और कोई रास्ता न पाकर उन्होंने यह जिम्मेदारी मुझे सौंप दी थी। बहरहाल, अपनी घबराहट को जितना मुमकिन था छिपाते हुए मैंने ऊँची और साफ़ आवाज़ में अंग्रेज़ी में बनावटी लहज़े में पढऩा शुरू किया, गणतंत्र दिवस डांस फ़ेस्टिवल का पहला ईनाम मिलता है बिहार से आई टोली को! पंडित जी ग़ुस्से से आगबबूला! टोली में आगे खड़ी एक हँसती हुई देहाती लड़की को उन्होंने मेरे आगे किया। क्या संगीत नाटक अकादमी का कामकाज अब भी अंग्रेज़ी में होता है! तुम कैसे सोच सकती हो कि यह बच्ची तुम्हारी अंग्रेज़ी में कही बात समझ पाएगी? उन्होंने ग़ुस्से-भरी आवाज़ में फुसफुसाते हुए हिन्दी में मुझसे कहा। सूची में अगले ईनाम 'रनर्स-अपÓ यानी दूसरे-तीसरे स्थान पर आई टीमों के लिए थे। मैं किसी भी हालत में उसके लिए हिन्दी में कोई सही शब्द सोच ही नहीं सकती थी।
यह शायद मेरे कैरियर का सबसे शर्मिन्दगी भरा लम्हा था, लेकिन किस्मत से मुझमें इतनी हिम्मत थी कि मैंने ख़ुद पंडित जी से ही पूछ लिया, 'रनर्स-अप के लिए हिन्दी में क्या कहा जाएगा?' अब अटकने की बारी उनकी थी। रनर्स-अप? रनर्स-अप? बरामदे में ऊपर से नीचे चहलकदमी करते हुए वह शब्द दोहराते हुए सोच रहे थे, उनके दोनों हाथ पीठ के पीछे मुड़े थे, एक हाथ की अंगुलियाँ दूसरी हथेली पर ताल दे रही थीं। फि़लहाल इसके लिए रनर्स-अप ही इस्तेमाल करो लेकिन बाक़ी घोषणा हिन्दी में करना! उन्होंने सोचकर कहा।
बॉम्बे में लोगों के सामने बोलने में मुझे बहुत घबराहट होती थी जबकि पृथ्वी जी कई सारे मौक़ों पर हमारा परिचय करवाते हुए हमें आगे आकर बोलने के लिए उकसाते रहते थे। वह ख़ुद बहुत ही शानदार और दिलचस्प वक्ता थे। लोगों के बीच मैंने केवल एक बार ड्रेसडेन में इंडियन एसोसिएशन के सदस्यों और मेहमानों के आगे 1933 में विदाई का एक भाषण बोला था क्योंकि मैं एसोसिएशन की अध्यक्ष थी जिसके सदस्य सात हिन्दुस्तानी थे! उस मौक़े के लिए मेरा वह भाषण काउंटेस ज़ेटविट्ज़ की मदद से जर्मन में लिखा गया था, मैं घर पर उसे इतनी बार दोहरा चुकी थी कि आँगन की मुिर्गयाँ भी उसे सही तरह से बोलना सीख गई होंगी। हालाँकि एसोसिएशन के कार्यक्रम में मौजूद मेहमानों को इस बात का कोई अन्दाज़ा नहीं था कि इसके लिए इतनी तैयारी की गई है, उन्होंने जर्मन भाषा पर मेरी पकड़ और बढिय़ा भाषण के लिए मुझे मुबारकबाद दी। दिल्ली में रहने के दौरान क्लब और कॉलेज वग़ैरह में लेक्चर देने में मुझे बहुत ख़ुशी होती थी और इस काम के लिए पैसा लेते हुए बहुत बड़प्पन का अहसास होता था।
मेरे जीजाजी डॉ. ज़ेड.ए. अहमद पिछले कुछ समय से मुझे समझा रहे थे कि मुझे भारत से बाहर निकलकर फिर से यूरोप घूमना चाहिए, मेरी बहन का भी मशवरा था कि मुझे अपने लेक्चरों के साथ विदेश का दौरा करना चाहिए। मैंने रूस, पूर्वी जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया एम्बेसियों में अर्जियाँ डाली जहाँ से मुझे इन देशों में भारतीय डांस और नाटकों पर लेक्चर-प्रदर्शन के लिए बुलावा मिला जिसकी एवज में मेरे सफऱ और रहने का ख़र्च उन देशों को उठाना था। इससे पहले, मैं लंदन के ब्रिटिश ड्रामा लीग में कलाकारों और नाटककारों के लिए पूरे कोर्स के लिए आवेदन कर चुकी थी और मेरा दाखि़ला भी हो गया था। मैंने डार्टिंग्टन हॉल के मिस्टर एल्महिरस्ट को चि_ी लिखकर बताया कि मेरे लिए इस प्रोजेक्ट के लिए विदेशी मुद्रा जुटा पाना मुश्किल होगा। उनकी ओर से मुझे बहुत ही प्यार-भरा जवाब मिला जिसमें लिखा था कि उन्होंने फिट्जऱॉय स्चयर में ब्रिटिश ड्रामा लीग के नज़दीक मौजूद बैंक में मेरे नाम पर 100 पाउंड जमा करा दिए हैं, जिससे मैं अपनी फ़ीस देने के अलावा दस हफ़्ते के कोर्स के दौरान दूसरे खर्चे भी पूरे कर सकी। पृथ्वी जी अक्सर कहा करते थे 'जो सोचो वह सच हो जाता है' और मेरे साथ वही हो रहा था। मैं फिर से विदेश जाने का ज़ेन का मशवरा हमेशा टालती रही थी क्योंकि मुझे लगता था कि यह मुमकिन नहीं है। लेकिन अचानक यह एक सच बन गया था।
तीन महीने के अन्दर मेरे विदेश दौरे का कार्यक्रम तैयार हो गया। केवल एक चीज़ की कमी थी किराया, इस तरह के कार्यक्रम के लिए विदेशी मुद्रा जुटा पाना लगभग नामुमकिन था। मैंने अपनी इस परेशानी के बारे में श्रीमति विजयालक्ष्मी पंडित को बताया। जब से मैंने अल्मोड़ा में उनकी बेटियों को डांस सिखाया था तभी से वह मेरी अच्छी दोस्त बन गई थीं, वह मेरे पति के हुनर के बड़े कद्रदानों में से थीं। उन्होंने मेरी ओर से पंडितजी से बात की और मुझे हुमायूँ कबीर जी से मिलने के लिए कहा गया, जो सांस्कृतिक और विज्ञान मामलों के मंत्री थे। वह बहुत ही मददगार थे और उन्होंने मुझे लन्दन आने-जाने का हवाई टिकट देने की बात कही। इसका मतलब यह हुआ कि अगर मेरा टिकट दिल्ली-मास्को-लन्दन के हवाई रास्ते का हुआ तो मैं लेक्चर दौरे के लिए जा सकती थी। हुर्रे! अपना काम बन गया इतनी आसानी से!
अब बस एक चीज़ बची थी और वह था तीन महीन की गरमियों की छुट्टियों में विदेश जाने के लिए नाट्य संघ से मंज़ूरी लेना। इसके लिए एक ख़ास बैठक बुलाई गई और मुझे तनख़्वाह के साथ छुट्टी मिल गई, मेरी ग़ैरमौजूदगी में जॉय माइकल को प्रिंसिपल की जिम्मेदारी सँभालनी थी। एक पखवाड़े की गहमागहमी और सामान बाँधने की अफरा-तफरी के बाद मैं निकल गई अपने सफऱ पर। मैंने कभी भी डायरी नहीं रखी अपने पास, लेकिन रूस, पूर्वी जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया के अपने इस सफऱ को मैंने अपनी डायरी में क़लमबन्द किया। मुझे लगता है कि इस सफऱ के बारे में बताने के लिए उसी डायरी के पन्नों को ज्यों का त्यों पेश करना ज़्यादा बेहतर रहेगा।

अनुवाद : दीपा पाठक
[कऱीब से (मंच और फि़ल्मी पर्दे से जुड़ी यादें) पुस्तक से]

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