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उत्कृष्ट साहित्य का सिलसिला, आज विख्यात लेखक मंज़ूर एहतेशाम के उपन्यास 'मदरसा' का एक अंश
उत्कृष्ट साहित्य का सिलसिला, आज विख्यात लेखक मंज़ूर एहतेशाम के उपन्यास 'मदरसा' का एक अंश
04-Jun-2020 12:39 PM

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-संपादक
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मदरसा : उपन्यास अंश

-मंज़ूर एहतेशाम

पिछले वर्ष, रमज़ान में...
(मदरसा उपन्यास से)

पिछले वर्ष, बिगाड़ के बावज़ूद, उसके कहने पर, मरियम और बिटिया रमज़ान भर टेकरी पर उसके साथ रहे थे, और पूरे महीने, यहीं रहकर रोजे रखे थे। 
यह उनकी भलमनसाहत ही थी। 
उनतीसवें रोज़े की शाम वकील अपने दोस्त शकील के साथ आ धमका था, और याद दिलाया था कि उस शाम रोज़ा शकील के फॉर्म पर इफ्तारने का तय था। इफ्तार और खाने का सारा सामान उन लोगों के साथ था, हालाँकि वह ख़ुद रोज़े-नमाज़ के मामले में बड़े चोर थे। 
वह गर्मी का एक कठिन रोज़ा था और मरियम से ज़्यादा समय बातचीत भी ताने-तिश्नों में चली थी, इसलिए घर से बाहर निकलने का एक अच्छा बहाना लगा था।
वकील से उसके पुराने मरासिम थे, और तब मिलना हुआ था, जब वह मरियम के साथ पहली बार पनाह खोजता यहाँ आया था। यह बिटिया के जन्म से पहले की बात थी। वकील को लिखने-पढऩे का शौक था और शहर के अदीब-शायरों में उसका उठना-बैठना। यह कि वह ख़ुद भी गंभीरता से कुछ लिखता या लिखने का प्रयास करता था, बाद में खुला था।
शकील वकील के बचपन का दोस्त था, और शिक्षा के बाद नौकरी के बजाय अपना ख़ुद का काम शुरू करने की कोशिशों में लगा था। 
बिटिया के जन्म के बाद से, उन दोनों से, एक प्रकार के पारिवारिक संबंध बन गए थे, और वकील अक्सर (और शकील गाहे-ब-गाहे) उनके घर आता और मिलता रहता था।
दरअसल, कोई डेढ़ दशक पहले के वे दिन, जब वकील और शकील ही नहीं, इस शहर के अन्य कई लोगों से उनका मिलना- जुलना बढ़ा था, जि़न्दगी के अच्छे दिनों की तरह याद किए जा सकते थे।
उम्र की उस दहलीज़ पर कई नौजवानों के लिए साबिर और मरियम एक ऐसा उदाहरण बन गए थे, जिससे अपनी शर्तों पर जीने की भावना को शक्ति मिलती थी। 
यह अलग बात कि मौज़ूदा बिगाड़ में भी, उनमें से अब कुछ, अधेड़ उम्र को पहुँच रहे लोगों का ही, बड़ा योगदान था। 
जैसे कि बादबान साहब!
उनका माँ-बाप का रखा नाम रमेश था, लेकिन स्कूटर चलाते, वह जिस अदा से उसे सड़क पर मोड़ते थे, लगता बादबानवाली कश्ती दरिया में अपनी दिशा बदल रही हो। 
शकील तो उस ज़माने में व्यस्त था, और आज भी मिलने की फ़ुर्सत कम पाता है, लेकिन वकील के पास साधन कम, समय-ही-समय था।
जाने किस घड़ी उसका नाम वकील रखा गया था, कि वह अगर झूठ को भी किसी की पैरवी कर दे, तो, उसका मुक़दमा हारना मुक़द्दर था।
पिछले समय में वही था, जो खुलकर साबिर का समर्थन करता रहा था, और अंजाम सामने था! 
इस बीच वह अपने लेखन के सामर्थ्य और पेट के तक़ाज़े के बीच की दूरी समझने के बाद, अब शकील के ही काम-काज में हाथ बँटा रहा था। शादी और औलाद, किसी समय उसके चेहरे पर खेलते, किसी फि़लॉसफऱ के हर पल मंद-मंद बदलते, तिलिस्मी भाव को, भूचाल डालकर, अजीब प्रकार से हास्यास्पद बना गए थे।
बहरहाल, वह उसके बुरेक्षणों का आसरा था, और अभी तक के अनुभव की रोशनी में, दिल का भला व्यक्ति भी। 
स्वभाव उसने खुलकर बैठने का पाया था, जो वर्तमान परिस्थितियों में ख़ुद साबिर के लिए भी स्वागत-योग्य ही था।
आज फ़ॉइनल इफ्तार है, वकील ने राज़दारी से कहा था।—अभी तक लगातार दो चाँद तीसें हो चुके हैं, इसलिए रमज़ान का अनतीसा होना तय है! अपन चाँद-रात की पूरी तैयारी से चल रहे हैं, बीयर और व्हिस्की, दोनों रख ली हैं! शहंशाहों की तरह, इफ्तार के बाद चाँद देखेंगे, और ऐश करेंगे! 
उसने रमज़ान भर शराब नहीं छुई थी। 
दोस्त टेकरी पर आते रहे थे, पीते रहे थे, लेकिन इसमें उसने किसी का साथ नहीं दिया था। मनोवैज्ञानिक हो, या जो भी हो, रोज़े रखने के साथ वह पीने का सोच ही नहीं पाता था। 
दोस्तों में, ज़्यादा के साथ, समस्या यह थी कि पीते तो थे, मगर अपने घर पर नहीं!
उसे किसी और के पीने पर एतराज़ यूँ भी नहीं था कि दिन भर के रोज़े और मरियम तथा बिटिया से शीत-युद्ध के बाद, वह कोई ऐसी कम्पनी चाहता था जिससे कुछ पानी-परिन्दे की बात की जा सके।
ईद का चाँद सेलिब्रेट करने का आइडिया उसे अच्छा लगा था, और वे सब शक़ील की जीप में सवार दिन भर तपी सड़कों पर बीस किलोमीटर चलकर फ़ॉर्म पहुँच गए थे।
उस शाम आसमान इस तरह धुवैंला था, जैसे उसके नीचे कोयले के इंजनवाली मालगाडिय़ाँ शंटिंग करती रही हों। 
हवा दम-साधे, जैसे उसके चलने से ज़मीन पर कुछ बिगडऩे का ख़तरा हो।
बाँध का विस्तार स्लेटी, जैसे राख और साबुन मिला, नालियों का पानी जमा हो। 
और उजाड़ पहाड़ों का सिलसिला, यूँ हाँफता-साँस लेता, जैसे अपना बोझ साधे-साधे, थक चुका हो।
धूप की तेज़ी मर चुकी थी, और पथरीली ज़मीन गर्म साँसें छोड़ रही थी। 
उस सबमें, विशेष कुछ भी नहीं था, क्योंकि दिन-ब-दिन, गर्मियों की झुलस बढ़ रही थी, और हर साल, पिछले से बदतर होता जा रहा था। 
फ़ॉर्म पर ईंट-गारे का एक छोटा, खपरैल वाला मकान था, और खुले में कुछ कच्चे, गोबर से लिपे चबूतरे। 
वहाँ पहुँचकर पता चला कि शकील ट्यूब-वेल की बोिरंग करा रहा था।
शाम की मुर्दनी के बावज़ूद फ़ॉर्म की लोकेशन की सुन्दरता से इंकार नहीं किया जा सकता था। शहर, जो टिड्डी-दल-सा अपने केन्द्र के चौतरफ़ फैल रहा था, अभी वहाँ से दूर था, और माहौल में पुराने ज़माने की बू-बास और शान्ति जि़न्दा थी।
इफ्तार में कुछ देर थी और उनके पहुँचने के कुछ ही पल बाद बोरिंग करने वालों ने सुरक्षा की वार्निंग दी थी। वह लोग जीप की ओट में दुबक गए थे।
—इस तरह की तोडफ़ोड़ या धमाके कराने हों, उसने शकील से अपनी दानिस्त में मज़ाक से कहा था।
—तो मरियम को ठेका दे दिया करो। बग़ैर बारूद के काम हो जाएगा।
कुछ क्षण धड़कती ख़ामोशी।
धमाका!
दूर-दूर तक पत्थर के रेज़े बरसने की आवाज़, टीन की छत पर मोटी बूँद के बरसते झले-सी।
ठेकेदार और मज़दूरों की बात करने की आवाज़ें।
शकील उन लोगों की ओर बढ़ गया था।
वकील ने उसकी आँखों में देखकर फज़ूल बातें करने से ख़बरदार किया था, और मरियम और बिटिया के साथ उस चबूतरे की ओर बढ़ गया था जिस पर इफ्तार और खाने का सामान सजाया जा रहा था।
यही रवैया रहा था, तमाम दोस्तों और जान-पहचानवालों का!
मरियम और बिटिया के पीठ-पीछे भले उसकी हाँ में हाँ मिलाकर, उनकी नुक़ताचीनी में दो शब्द बोल दें, लेकिन उनके सामने सबके मुँह पर ताले पड़ जाते थे!
ऐसे लोग जो सारे घटनाक्रम के साक्षी और सही-ग़लत के गवाह रहे थे!
—रोज़ा तो नहीं लग रहा? वकील दिलासा देने के स्वर में बिटिया से पूछ रहा था।—तुमने भी कमाल कर दिया। इतनी गर्मी में पूरे रोज़े रख डाले! चलो, आज ख़त्म, ईद का चाँद देखकर चलेंगे!
—हमें तो, मरियम सूखी-सी आवाज़ में कह रही थी,—रोज़े में आम दिनों से बेहतर महसूस होता है। दिल और दिमाग़, दोनों हल्के रहते हैं। 
सौ-फ़ीसदी वही!
मरियम का जिस प्रकार दुनिया में प्रचार था, वह यही था।
ख़ुद मरियम तो 'जन्नत की कुंजी' थी, और साबिर 'दोजख़ का कुन्दा!'
ऐसी बातें और लहज़ा सुनकर उसका ख़ून खौल उठता था।
लाहौल पढ़ता वह आगे बढ़ गया था, शायद धीमी आवाज़ में बुदबुदाता कि हम गुनहगार हैं, इसलिए रोज़े में भूख भी लगती है, और प्यास भी! नेक बन्दे तो, रोज़ा रखकर, ज़मीन से डेढ़ बालिश्त ऊपर हो जाते हैं! सारी पाबन्दियों से आज़ाद!
—पीर झुनझुने, शुरू हो गए! वकील ने आवाज़ देकर उससे कहा था।
लोगों के, नए-नए नाम रखना, उसकी इंटिलेक्चुअल हॉबी थी!
साबिर को वह पीर झुनझुने, और टेकरीवाले ख़्वाजा जैसे नामों से नवाज़ चुका था!
उसके मुँह से सुनकर, कुछ दूसरे भी इन नामों का मज़ाक करने लगे थे।
शकील लौट आया था।
बफऱ् धोई-कूटी गई थी, तरबूज़ और अनन्नास काटकर ठंडे किए जाने को रखे गए थे, और बाक़ी इफ्तारी, प्लेटों में दस्तरख़्वान पर सज गई थी।
शकील सिगरेट के कश लगाता, मरियम और बिटिया से बतियाने लगा था।
उन्हें उनके हाल पर छोड़कर, वह ख़ुद वकील की ओर बढ़ गया था जो आसमान के धुँधलके में उस ओर नजऱें गड़ाए खड़ा था, जहाँ किसी भी पल इफ़्तार का गोला छूटने की चमक नजऱ आ सकती थी।
—यार, वकील के कन्धे पर हाथ रखते हुए उसने दोस्ताना स्वर में कहा था—तुम भी, सबकी तरह मेरे ही दुश्मन हो जाते हो!
वकील के चेहरे पर घनी गम्भीरता मँडराती देखकर उसने हमदर्दी से पूछा था—सब ख़ैर है!
वकील, एक तो यूँ ही, जाने किन-किन चिंताओं में खोया, हमेशा गंभीर दिखता था, और अगर यह एहसास हो जाए कि आसपास कोई देखने वाला मौज़ूद है, तो नाटक भी शुरू कर देता था।
—कितनी गुमसुम, बेजान शाम है! नाक पर चश्मा उचकाते हुए, उसने बहुत उदास भाव से कहा था!—धमाके की आवाज़ तक सकूत नहीं तोड़ पाई। पानी में लहर है, न हवा में जुम्बिश।
—हाँ, सूखे होंठों पर ज़बान फेरते उसने वकील की ताईद की थी।
—बकौल फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'—'यह रात उस दर्द का शजर है/जो तुझसे, मुझसे अज़ीमतर है।'
—यार! वकील ने हाथ जोड़ लिये थे—आप ख़ुद को साहिर लुधियानवी तक ही क्यों नहीं रखते! और ग़लत मौक़े पर तो, कम- से-कम, शेर सही पढ़ दिया करो! मुझसे-तुझसे पर ख़ाक भी डालें, तो बात शाम की हो रही है, और आप शेर पढ़ रहे हो रात का!
—तो क्या हुआ, उसने सहज होकर कहना चाहा था।
- रात की जगह शाम कर लो! वजऩ गड़बड़ हो, तो आप ख़ुद ठीक कर सकते हो!
—आप तो समझते हो, वकील ने कुढ़कर कहा था—भारी आवाज़ से शायरी में भी वजऩ पैदा हो जाता है! देखो, गोला चल गया! 
रोज़दारों, इफ्तार कीजिए! पीर साहब चलिए, रोज़ा खोलिए!
शहर की स्काईलाइन पर गोले छूटने की चमक साफ़ देखी जा सकती थी।
इफ्तार के बाद मरियम और बिटिया नमाज़ पढऩे लगी थीं।
कुछ फ़ॉसले पर शकील अपनी बीयर की बोतल खोले खड़ा था।
—तुम क्या लोगे? वकील ने अपनी व्हिस्की में बफऱ् डालते हुए पूछा था।
—अभी नहीं, उसने तरबूज़ के शर्बत का घूँट लेते हुए कहा था।
—चाँद दिखने के बाद लेंगे।
—वह दिखेगा, शकील ने पुख़्ता यक़ीन से कहा था।—हम कह रहे हैं!
—दिखेगा यार, वकील ने हाँ में हाँ मिलाई थी।—दो-दो तीसे के बाद भी नहीं दिखेगा! धुंध की वजह से, ऐलान में कुछ देर ज़रूर लग सकती है।
—धुंध तो है, उसने पसोपेश में पड़ते कहा था।—मगर इतनी ज़्यादा भी नहीं।
अचानक और पूरी तरह उसके अनजाने, भीतर कुछ हुआ था और उसे ख़ुद भी अपनी आवाज़ बाहर से कानों में आती सुनाई दी थी—लाओ, व्हिस्की दे दो!
खाना लग रहा था।
मरियम और बिटिया नमाज़ ख़त्म कर चुकी थीं।
उसके हाथ में शराब का गिलास, मरियम न मख़ौल उड़ाती नजऱों से देखा था और बिटिया का चेहरा बुझ गया था।
पूरे महीने बाद शराब उसके हलक़ से उतरी थी।
पेग बड़ा था, तो भी दो साँस में गिलास ख़ाली करके उसने वकील से कहा था—दो!
—कर क्या रहे हो! वकील हैरान रह गया था।
—क्या कोई शराब पीने का दंगल लड़ रहे हो!
—दो यार! उसने शराब की सनसनी को शरीर में महसूस किया था और किसी भूली बात की तरह, खय़ाल दिमाग़ में आया था, कि शराब चीज़ों का सहना आसान कर देती है।

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बीते दिनों की कड़वाहट में, शायद शराब न पीने का भी हाथ रहा था।
पहले वह लम्बी मुद्दत तक बिना पिए रह सकता था।
यह हुआ क्या कि किसी चीज़ पर उसका क़ाबू नहीं रहा!
दूसरा गिलास वह एक ही घूँट में गुटक गया था।
सचमुच, शराब ख़ुद पर हँस सकने का हौसला देती है।
ज़्यादा सहनशील बनाती है।
वह शराब की ख़ूबियाँ शुमार करने का मज़ा ले ही रहा था कि दो पेग ने ख़ाली पेट में खलबली मचा दी, और दिमाग़ मनमानी पर उतर आया।
ख़ूबियाँ ही नहीं, सोच की प्रतिध्वनि कह रही थी, शराब में ऐसी खऱाबियाँ भी थीं, जिनके कारण उसे मिडिल-क्लास घरानों में बुराई की नजऱ से देखा जाता था!
असल बात मॉडरेशन, संतुलन की थी।
वही, नॉर्मलवाला संतुलन!
पीने में संतुलन रहे, तो किसे आपत्ति हो सकती है।
हलाल-हराम, कम-अक्लों को डराने की बात थी!
बादशाहों पर वह क़ानून लागू नहीं होता, जो रिआया के लिए होता है! न कभी हुआ, न हो सकता!
बाबर मुसलमान था, लेकिन क्या मज़े ले-लेकर अच्छी शराब पीता था!
अलीगढ़ मामू ने बताया था, फिर उसने ख़ुद, पूरा बाबरनामा पढ़ा था!
अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ—बात संतुलन की थी।
फिर जैसे ही, औरंगज़ेब जैसा कट्टरपंथी आया, दीन और दुनिया का सन्तुलन गड़बड़ाया, ख़्वारा हो गया!
अंग्रेज़ी कुटेशन है—'अल्कोहल गिव्ज़ द डिज़ायर बट टेक्स अवे द परफॉर्मेंस!'—ज़रूर किसी समझदार आदमी का होगा!
वह ख़ुद, अल्कोहलिक तो था नहीं, यार-दोस्तों के साथ नशिस्तें हो जाती थीं, जो मरियम और बिटिया के चले जाने के बाद, ज़्यादा हो गई थीं।
लगभग हर रोज़!
इस बीच, बीवी और बेटी के अलावा भी तो, बहुत कुछ गड़बड़ हुआ था, जिसमें टेकरी का टंटा भी शामिल था, और उन लोगों के तक़ाज़े भी, जिन्होंने पुराने सम्बन्ध पर भरोसा करके, उसे अपनी टी.वी. स्टेंड कम्पनी का एजेंट घोषित करके, माल सप्लाई किया था-उसे यह मुहलत भी न मिल सकी कि दूकानदारों से तक़ाज़ा-वसूली करता!
कौन मारा-मारा फिरता, शहर-शहर, दर-ब-दर!
उधर बादबान साहब, यह कहकर पैसा लौटाने से नट गए थे, कि वह उसी को लौटाएँगे जिससे पैसा लिया था, यानी मरियम!
मरियम से उन्होंने साफ़ कह दिया था, कि पैसा धन्धे में लगा है, जिसे गुंजाइश देखकर कि़स्तों में ही वापस करने का सोचा जा सकता था।
फिर मरियम-समर्थकों द्वारा, उसे नीचा दिखाने के, अन्य-अन्य अभियान; यह दिखाने को कि मरियम सही और वह ग़लत था!
उससे भी पहले, अम्मा से ऐतिहासिक सामना, वस्तुत: साबिर से संबंध समाप्त होने का घोषणापत्र और उनकी शह पर, यहाँ के लोगों का, उससे सम्पूर्ण असहयोग!
बिटिया के निकाह का नाटक!
बम्बई में, अंेिंतम दिनों का अनुभव, बरेली से मोहभंग, और अलीगढ़ मामू से हुई लम्बी बातचीत के नतीजे, अतीत की ओर खुलता, विचित्र एल्बम!
कितना यथार्थ, कितनी फ़ैंटसी, अक़ल तय करने में असमर्थ थी!
बुरा समय बीता था, और बुरा ही चल रहा था!
ज़रूरत संतुलन की थी, और उनतीसवें रोज़े की उस शाम, इफ़्तार के बाद, वह शकील के फ़ॉॅर्म पर खड़ा, व्हिस्की गुटक रहा था!
वह शराब के लम्बे घूँट ले रहा था, जि़न्दगी में तब तक हो चुकी अप्रिय घटनाओं की यादों की जुगाली करता, लेकिन दिमाग़ में एक नए ख़तरे का डंका पिटना शुरू हो चुका था।
उसके समूचे होशो-हवास, हर बीतते क्षण के साथ, उसकी देखने की क्षमता में केन्द्रित होते गए थे, और नजऱें शहर की स्काईलाइन पर गड़ गई थीं।
चाँद के गोले की चमक के इन्तज़ार में।
इफ़्तार के बाद, काफ़ी देर हो चुकी थी, लेकिन अभी तक गोले छूटना शुरू नहीं हुए थे! उसकी शंका ग्लानि और अपराध-बोध को बढ़ा रही थी।
हो सकता है, आज चाँद न दिखे! एक पछतावा घेर रहा था।
शराब पीना गुनाह हो या नहीं, वह ख़ुद जो उस समय कर रहा था, वह गुनाह था!
सारेफ़ल्सफ़े और विचारधाराएँ उसे निहत्था छोड़ गए थे, इस ग़म और पश्चात्ताप के सिवा, कि जहाँ उनतीस दिन सूखे रहकर गुज़ारे, वहाँ एक दिन और इन्तज़ार क्यों न किया!
यह गुनाह था और इसकी सज़ा उसे मिलेगी।
उस सारे वबाल से हटकर जिसमें वह वैसे ही घिरा था, ज़रूर मिलेगी।
अब सोचो तो विश्वास नहीं होता, कि इस बात को लेकर वह कितना भावुक और उत्तेजित हो गया था।
देखा जाए तो पीना, पीना ही होता है।
उनके लिए मना, जो उसे हराम मानते हैं, दिन रमज़ान के हों या किसी और महीने के।
वह पल, वास्तव में, उसे एक अन्य पराजय के अनुभव से भर रहे थे-मरियम की फ़तह, और साबिर नईम की पराजय के अनुभव से!
कोई भारी बोझ, उसकी आत्मा पर यूँ आ लदा था, कि उसे साध पाना दूभर हो रहा था।
यह ठीक नहीं हुआ! की तकऱार उसके वजूद में गूँज रही थी।
—हवा तो चलना शुरू हुई, याद नहीं शकील ने ऊँची आवाज़ में कहा था या वकील ने।—मगर यार, चाँद के गोले अभी तक नहीं चले?
तब ही, फिर सुरंग लगाए जाने का ऐलान किया गया था, और सब सुरक्षित जगहों पर दुबक गए थे। वह वकील के साथ जीप की आड़ में हो गया था।
सुरंग का धमाका हुआ था, और वह कुछ समझ नहीं पाया था।
तक़लीफ़ की ऊँची कराह उसके मुँह से निकल गई थी।
पत्थर का कोई रेज़ा, धमाके में उड़कर, उसकी गर्दन से आ चिपका था!
मरियम, बिटिया, वकील, हाथ में टॉर्च लिये शकील और पेट्रोमेक्स उठाए मज़दूर, उसकी ओर दौड़े आए थे।
चोट ऐसी नहीं थी कि ख़ून निकला हो या मरहम-पट्टी की ज़रूरत पेश आई हो।
उसकी कराह के पीछे भी, चोट की तक़लीफ़ से अधिक, कोई अनजाना ख़ौफ़ था जो उसे वजूद में उतरता महसूस हुआ था।
आसमानी ताक़तों की हुक्म-अदूली, और उसकी सज़ा का ख़ौफ़!
आसमान उसी तरह उजाड़ था : न चाँद, न तारे, न दूर शहर की स्काईलाइन पर छूटते गोलों की चमक।
तैश में उसने और शराब पी थी, और उन मज़हब के माननेवालों को कोसा था, जो चौदह सौ साल गुजऱ जाने के बाद, आज तक, अपना स्थायी कैलेंडर तक नहीं बना पाए थे!
जिनके सबसे महत्त्वपूर्ण तीज-त्योहार, रमज़ान, ईद—सब पूरी तरह, मौसम और बादल-बदली के रहम के मोहताज थे।
जिन्हें दावा था यूनान को खोजकर बाक़ी दुनिया से परिचित कराने का, उमर ख़ैयाम के कैलेंडर तरतीब देने का, सितारों की राहें दरयाफ़्त करने का, लेकिन जो ख़ुद, उस सबसे बेफ़ैज़, जि़न्दा थे!
महीनों के चाँद की गवाही देनेवालों को खोजते, और यह पैमाइश करते कि उनकी आँखों देखे गए पर एतबार किया जा सकता है या नहीं!
उनकी आँखें नहीं, दाढ़ी और हुलिया नापकर!
रात साढ़े नौ बजे, वह वापस शहर पहुँचे थे, तो वहाँ गोले छोड़कर चाँद दिखाई दे जाने का ऐलान किया जा रहा था : आसपास गाँव में किसी को चाँद नजऱ आ गया था, और ऐसी गवाही मिल गई थी, जिसे शरीअत के अनुसार क़बूल किया जा सकता था।
उस पल, उसे पत्थर के उस रेज़े पर, बेपनाह ग़ुस्सा आया था, जिसने उसे चोट पहुँचाई थी।
साथ ही, यह इत्मीनान भी हुआ था कि मरियम और बिटिया से एक शर्मिन्दगी का सामना टल गया था।
लड़ाई का वह राउंड, जिसे वह हारा हुआ मान चुका था, बराबरी पर ख़त्म हो गया था।
यह पिछले साल की बात थी।
टेकरी, मदरसा और अमजद : उठाव की घड़ी अँधेरा पूरा पड़ाव डाल चुका था।
तालाब की सतह पर दूसरे किनारे की रोशनियाँ घेरा बाँधे अदब से जगमगा रही थीं।
गर्मियों की शामें ख़ामोशी से रात में बदल जाती हैं और समय का एहसास नहीं हो पाता।
ख़ासतौर पर, टेकरी पर, जहाँ किसी आगे बढ़ते जहाज़ के कप्तान की तरह, उसका ठिया था।
यहाँ से शहर कोई पेंटिंग या फ़ॉेटोग्रॉफ़ लगता था।
दूसर ेकिनारे, पहाड़ी के विभिन्न लेविलों पर, इमारतों की जगमगाहट थी, और दाईं ओर, कम होती रोशनियों के बाद, घुप्प अँधेरा, आगे फैले वीराने की शुरुआत।
वहाँ चिडिय़ाघर बनाया गया था, जहाँ फिलहाल गिनती के जानवर थे।
उनमें, एक इकलौता शेर भी था, जिसकी कराहती दहाड़, रात के सन्नाटे में कानों में पड़ जाती थी।
बाईं ओर, रोशनियों का सिलसिला, तेज़ी से बढ़ते शहर का इश्तिहार था।
इस बार, भोपाल आकर, भविष्य में यहाँ के विस्तार को नजऱ में रखते हुए, और मदरसे की उस धुँधली योजना को, जो जाने-अनजाने उसकी सोच का हिस्सा बनती गई थी, रूपाकार देने की मंशा से, उसे यह टेकरी और आसपास फैली ज़मीन बहुत मुनासिब लगी थी।
तब यहाँ कच्ची खपरैल के एक झोंपड़े के सिवा कुछ नहीं था, जिसमें एक बूढ़ा और उसकी पत्नी, अपनी मुफ़लिसी की जि़न्दगी जी रहे थे। वह किसी समय महल के ख़िदमतगार रह चुके थे।
टेकरी और उसके साथ की फ़ैली ज़मीन, शाही महल का उजाड़ पिछवाड़ा थी।
समय का बदलाव था, और शाही महल, हद कि क़सरे-सुल्तानी तक, जहाँ भूतपूर्व रियासत के शासकों के वारिस रहते थे, ख़स्ता हालत, और देखरेख के मोहताज थे।
उसने जगह की तफ़सील, लोगों और नगर-निगम में कुछ परिचितों से, मालूम की थी, और पूरी तसल्ली होने पर वहाँ रहनेवाले दम्पत्ति को जगह और उससे सम्बन्धित पेपर्स, जो उनके पास थे, की इतनी क़ीमत ऑफऱ की थी, जो बाज़ार-भाव से बहुत कम, लेकिन उनकी कल्पना से कहीं अधिक थी।
सौदा हो गया था, और उसने उन लोगों से जगह फ़ॉैरन ख़ाली करने को भी नहीं कहा था।
अपनी मदरसे की योजना का, उसने सिफऱ् मरियम से, सरसरी जि़क्र किया था, और एक एज्यूकेशन सोसायटी का, कोई अच्छा-सा नाम सुझाने को कहा था, जो जगह के औपचारिक सौदे के डॉक्यूमेंट्स में इस्तेमाल किया जा सके।
उस पल किसने कल्पना की थी कि बहुत जल्द हड़बड़ाहट में उसे ख़ुद अपना सिर छिपाने के लिए वहाँ यह एस्बस्टॉस की शीट्स की छतवाला टप्परनुमा स्ट्रक्चर बनवाना पड़ेगा।
इसमें हर तरह का बेजा ख़र्च हुआ था।
बिजली की लाइन, पानी का कनेक्शन, पहुँचने की सड़क—सबके लिए गिरह से ख़र्च करना पड़ा था।
इसके अलावा, सबसे बड़ा नुक़सान यह हुआ था कि टेकरी पर नया स्ट्रक्चर बनते देख, वह स्पॉट लोगों की नजऱ में आ गया था, और देखते-ही-देखते, आसपास नाजायज़ क़ब्ज़ों की होड़ लग गई थी।
अक्सर लोग उसके बारेमें भी यही समझते थे, कि नाजायज़ कब्ज़ा था, और उसने किसी को सफ़ॉई देने की ज़रूरत भी नहीं समझी थी।
कुछ आसमानी-सुल्तानी ऐसा होता है, जिससे टक्कर ले सकने की क़ुव्वत, जाने-अनजाने, व्यक्ति के भीतर निहित होती है, लेकिन कुछ ऐसा भी होता है, जो बिलकुल बिजली गिरने के समान होता है।
इस अन्तर के साथ, कि जलाकर भस्म कर डालने के बजाय, वह उसी ताप की हड़बड़ाहट पैदा करके, व्यक्ति को जि़न्दा छोड़ जाता है, पीड़ा और सदमे की थाह समझ सकने के लिए।
उसे भी कुछ-कुछ अन्दाज़ा तो होने लगा था कि बादल घिर रहे हैं, गरज-चमक किसी आनेवाले तूफ़ॉन का संकेत है, लेकिन उसकी सूरत-शक्ल बीवी और बेटी का साथ छोड़ जाना भी हो सकता था, यह क़तई अन्दाज़ा नहीं था।
बस, एक दिन उस किराए के फ़्लैट में जहाँ बिटिया, मरियम और साबिर साथ रहते थे उसने ख़ुद को अकेला पाया था, और ख़ुद भी कहीं सिर छुपा सकने को टेकरी पर उस टप्पर को बनवाना शुरू कर दिया था।
यह भोपाल में एक साल साथ गुज़ार चुकने के बाद हुआ था!
उसके बाद भी मरियम से रिश्ता, ऊँच-नीच, निकटता-दूरी, भावुकता-तटस्थता की एक दास्तान रहा था।
सारे कागज़़ात, जिनमें चेक-बुक और बैंक-अकाउंट से संबंधित सारे पेपर्स भी थे, आज भी मरियम के ही पास थे: अकाउंट ऑपरेट करने का अधिकार ही उसको था।
हाथ की तंगी के कारण दिन में वह बीस किलोमीटर की यात्रा, मोटरसाइकिल पर करके शहर के उस छोर पर पहुँचा था जहाँ मरियम ने बिटिया के साथ रहना चुना था।
—महलवालों का फ़ॉइनल करना है, रस्मी बातचीत के बाद उसने इस तरह कहा था, जैसे ख़ुद से बात कर रहा हो।—उनका तक़ाज़ा है, मुश्किल खड़ी कर सकते हैं।
—मुझे ख़ुद पैसों की ज़रूरत है, मरियम ने लापरवाही से कहा था।
—किससे माँगूँ? मालूम तो है, किस-किसको कितना-कितना दिया हुआ है! लोग अपनी सहूलियत से लौटाएँगे।
यह सही था, कि ज़्यादा पैसा, मरियम द्वारा कई जगह इन्वेस्ट किया हुआ था-सही शेयर खऱीदने-बेचने की समझ भी उसी को थी। मगर उसे अन्दाज़ा था कि दो लाख, जिसकी उसे ज़रूरत थी, बैंक अकाउंट में था। बल्कि उससे ज़्यादा था।
जब उसने बैंक का हिसाब देखना चाहा था, तो मरियम ने बहाना कर दिया था।
—पेपर्स कहीं रखे गए हैं, उसने बेमुरव्वती से कहा था।
-मिलेंगे तो दिखा दूँगी।
वह ख़ाली हाथ लौट आया था।
यह अपनी जगह था, लेकिन पैसों की व्यवस्था ज़रूरी थी।
बूढ़ा और उसकी पत्नी तो कभी के अपना हिस्सा लेकर चले गए थे, मगर फ़ॉइनल हिसाब महलवालों से किया जाना था।
टेकरी में कई पार्टियों की दिलचस्पी बढ़ गई थी और लोग रक़में लेकर वहाँ पहुँचने लगे थे।
उसके पास कुछ कागज़़ात और जगह का कब्ज़ा था, इसलिए महलवाले भी चाहते थे मामला उसी से तय हो जाए।
वह चीज़ों को बोली पर लगाकर, जो मिल सकता था, जल्द-से-जल्द पाना चाहते थे।
ख़ुद उसकी सारी भाग-दौड़ के बाद भी, पैसे का इन्तज़ाम अभी नहीं हो पाया था।
नीचे अँधेरे में धुँधियाई हेड-लाइट्स का स्कूटर आकर रुका था।
—तुम्हारे स्कूटर को मोतियाबिन्द उतर रहा है! एक शाम लाइट्स की ओर इशारा करते, उसने अमजद से कहा था, जिसे सुनकर वह देर तक फूट-फूट के हँसता रहा था।
हँसी हो या संजीदगी, अमजद पर दोनों के दौरे पड़ते थे। 
स्कूटर बन्द नहीं हुआ था और हॉर्न की रुँधी आवाज़, दरअसल तक़ाज़ा था कि वह ख़ुद उठकर नीचे जाए।
उसने चिल्लाकर अमजद से ऊपर आने को कहा था, और कुछ पसोपेश के बाद, स्कूटर की लाइट और आवाज़ बन्द हो गई थी।
अमजद ऊपर आ रहा था।
—आप यहाँ बैठे हो? ऊपर पहुँचकर उसने बदिक़क़त फूली साँसों पर क़ाबू पाते, अचरज और फि़क्रमंदी में डूबे स्वर में कहा था।
—क्या किसी ने ख़बर नहीं की?
—क्या? अमजद की उलझन उसकी समझ से बाहर थी।
नीचे, तेज़ रफ़्तार से, किसी मोटरसाइकिल के गुजऱने की आवाज़, हौले-हौले, ख़ालीपन और सन्नाटे के उस शून्य में खोती, जिसे वह ख़ुद 'आवाज़ों का कारख़ाना' कहता था।
सारी दुनिया की आवाज़ें अधर में उस बेपता फ़ैक्टरी से बनकर आतीं और फिर वहीं लौट जाती थीं।
—कमाल है! अमजद का आश्चर्य पर क़ाबू पाना मुहाल हो रहा था।
—अरे यार, मरियम भाभी की तबीयत गड़बड़ है, वह नर्सिंग होम में एडमिट हैं! मैं यहाँ आ रहा था, तो रास्ते में, वह आपकी पहचान के मिल गए—वह जो न्यू ईयर पर यहाँ मिले थे! अमजद को नाम याद रखने में दिक़क़त होती थी।
—उन्होंने बताया।
साबिर का इत्मीनान देखकर अमजद के स्वर की कसावट ढीली पडऩे लगी थी।
—बैठो, उसने दूसरी कुर्सी खींचकर चबूतरे पर बिछाते हुए कहा, और ख़ुद अन्दर चला गया।
उसे शराब का गिलास लिये लौटता देखकर अमजद की उलझन सीमाएँ लाँघने लगी थी।
—लो, उसे गिलास थमाते हुए साबिर ने कहा था।—ख़ैरियत पूछने गए थे? अच्छा किया।
—कमाल है, अमजद की आवाज़ एकदम फुसफुसा गई थी।
—यार साबिर, आपको समझ पाना बड़ा मुश्किल काम है!
—ठीक ही है, उसने दिलासे के अन्दाज़ में कहा था।
—जितने थोड़े में काम चल जाए, उतना बेहतर।
—ख़ाक बेहतर! अमजद ने झल्लाए स्वर में कहा था।
आते हुए उसके स्वर का कोलम्बस की तरह नई दुनिया खोज निकालने का जोश क़ाफूर हो चुका था।
साबिर को, कभी बचपन में रटा—'इट वाज़ कोलम्बस, हू डिस्कवर्ड अमेरिका, एंड वास्को डीगामा फाउंड द सी-रूट टु इंडियाÓ याद आ रहा था।
सही-सही यह याद नहीं आ पा रहा था कि उन दोनों में से ट्रेजडी किसके साथ हुई थी, कि करने निकले थे एक काम, और हो गया दूसरा!
—मैं ख़ुद देखकर आ रहा हूँ! अमजद की थकान और बेकऱारी लडऩे पर अब भी बजि़द थे।—चीयर्स! साबिर के हाथ में गिलास देखकर उसने हथियार डालने का फ़ैसला किया था और अपना गिलास लहराने के बाद होंठों से लगाकर एक बड़ा सिप लिया था।
—ग्लूकोज़ चढ़ी है, ख़ासी कमज़ोर हो गई हैं। बहकी-बहकी बातें कर रही थीं।
—तुम्हें पहचाना? न चाहते हुए भी उसके स्वर में व्यंग्य का पुट शामिल हो गया था।—पहचान लिया ना? बात सँभालने की ख़ातिर उसने जोड़ा था।—अब चैन से बैठो।
—मैं तो कहकर आया था, अमजद का ज़मीर फिर तड़पड़ाया था
—कि जाकर तुम्हें बताता हूँ...।
—तो बता दिया, उसने आश्वस्त किया था।—नाऊ रिलैक्स! मेरी ज़रूरत हुई, तो चला जाऊँगा।

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मरियम और साबिर के रिश्ते को समझना, चाहते हुए भी वह अमजद जैसे बाहर के आदमी से नहीं कह सकता था, हर एक के बूते की बात नहीं थी।
इस संबंध का कुछ भी, मुहब्बत या अदावत, वैसा नहीं था जैसा ऊपरी तौर पर नजऱ आता था।
मरियम की तो ख़ूबी यही थी कि जो उससे मिलता उसकी हमदर्दी में गिरफ़्तार हो जाता था!
दोस्ती साबिर से जताता था, और असल हमदर्दी, मरियम और बिटिया से होती थी।
अमजद भी, दिल-ही-दिल में, कब का उसका ख़ैरख़्वाह बन चुका था, यह अन्दाज़ा उसे ख़ूब था।
महज़ यह देखकर कि मरियम अलग रहकर जॉब कर रही थी, औलाद की ख़ातिर, और साबिर अलग रहकर गुलछर्रे उड़ा रहा था!
दूसरे के बीवी-बच्चों के लिए सद्भावना सबसे आसान सौदा था, जो बिना असलियत जाने आसानी से किया जा सकता था।
फिर, मरियम में तो ढेरों ऐसी विशेषताएँ थीं, जो आम औरतों में ढूँढ़े नहीं मिल सकती थीं।
इसमें अमजद का क्या क़सूर!
कैसे बताया जाए कि उससे शादी से पहले वह ख़ुद उसका कितना बड़ा हमदर्द था। बाद के दिनों में जब वह उससे मिलने मरियम के घर जाता (जो तब पिंकी हुआ करती थी) तो उसका बड़ा भाई व्यंग्यात्मक- हास्यात्मक ढंग से, पंजाबी लहज़े में 'आओ जी, आओ! पिंकी के हमदर्द-दवाख़ाने साहब, आओ!Ó कहकर उसका स्वागत करता था।
उस ज़ालिम ने साबिर का नाम 'पिंकी-का-हमदर्द-दवाख़ाना' रख दिया था!
ग़लत नहीं रखा था, क्योंकि इसी भावना पर उन दोनों के बीच रिश्ते की बुनियाद पड़ी थी।
और ज़बानी जमा-ख़र्च अलग, सारेबिगाड़ के बावज़ूद, उसे मरियम से आज भी उतनी ही, हमदर्दी ही नहीं बल्कि मुहब्बत थी, जितनी कभी रही थी।
जाने कैसे, इस मुहब्बत की तासीर पर, धीरे-धीरेज़ंग लगती गई थी। 
मरियम का उससे पराई औरतों में दिलचस्पी का शिकवा, बिलकुल ग़लत तो था नहीं।
लेकिन मरियम को यह भी सोचना चाहिए कि उसकी उम्र और स्वास्थ्य के मर्द की कुछ आवश्यकताएँ होती हैं!
जब पत्नी पु_े पर हाथ न धरने दे, तो वह कहीं-न-कहीं तो मुँह मारेगा!
और उसने यह सब, ख़ुद छिपाने की कोशिश भी नहीं की।
उनका रिश्ता बना ही यूँ था, कि दो लोग अपने अलग अतीत, और किसी सीमा तक वर्तमान के बावज़ूद एक परिवार की तरह रह सकते थे।
अन्य पुरुषों को लेकर, अपने मन में उपजे शुबहा को, उसने कभी इश्यू नहीं बनने दिया था।
इसके बावज़ूद, कुछ जि़दें—उसकी या मरियम की! आड़े आईं, और वह अलग-अलग रह रहे थे।
ख़ुद उसका मानना था, कि ऐसा मरियम की हठधर्मी के कारण था। 
मरियम अलगाव का किसे दोष देती थी, यह तो वह ख़ुद, या उसके हमदर्दों की बड़ी संख्या ही जानती होगी।
फिलहाल दूसरा मसला दरपेश था।
अमजद दरअसल महलवालों का दलाल था, और टेकरी के पैसों की बात करने की मंशा से आया था।
दो लाख, जिनका इन्तज़ाम नहीं हो पाया था!
हालाँकि अमजद की औक़ात भी, इस बीच, वह ख़ूब समझ चुका था, लेकिन बहरहाल, उसका महल आना-जाना था।
उसने अमजद से सम्बन्ध बनाए ही यह सोचकर थे कि वह इस डील में सहायक हो सकता था, जो किसी हद तक हुआ भी था।
उसे पहली बार महल ले जाने का श्रेय भी जाता अमजद को ही था।
हालाँकि, अब सोचो तो लगता है, काहे का महल और कैसी बेग़म साहिबा!
जब तक आँखों से नहीं देखा था, दिल में महल का हौवा था, लेकिन वहाँ जाकर बड़ी निराशा हाथ लगी थी।
यहाँ के महलों से तो कहीं शानदार, यू.पी. के मामूली रईसों की कोठियाँ थीं।
देख-रेख न होने से, जो था, वह भी, बिलकुल उजाड़ लगता था।
सिफऱ् ताल और पहाड़ थे, जिन्होंने ख़ूबसूरती के नाम पर, शहर की इज़्ज़त रखी हुई थी।
ख़ुद बेग़म साहिबा, बोलती उर्दू और अंग्रेज़ी, दोनों निहायत नफ़ॉसत के साथ थीं, लेकिन ख़ुद उनके व्यक्तित्व में नफ़ॉसत की कोई भूमिका नहीं थी।
सुर्ख़ो-सफ़ेद चमड़ी, या खड़े नाक-नक़श से तो कोई ख़ूबसूरत नहीं हो जाता।
छोटा-सा क़द, बैरिल जैसी काठी और आँखों में रोब की जगह धूर्तता का भाव : वह शेक्सपियर के शायलॉक का, बिलकुल लेडी शायलॉक-संस्करण लगती थीं!
क़ीमती क़ालीनों पर, झाड़-फानूस और एंटीक फर्ऩीचर के बीच, ढेरों 'बिया', 'बिया' करते मुसाहिबों में न घिरी हों, तो कौन समझेगा उन्हें बेग़म!
एक ऐसे सिलसिले की कड़ी, जिसने पीढिय़ों रियासत पर हुकूमत की!
उन्होंने हुकूमत की, और यह अब, बचे-खुचे को, परचून की तरह, मोल-भाव करके, ठिकाने लगाने पर तुली थीं!
बड़े नखऱों के बाद अमजद उसके मिलने के लिए टाइम ले पाया था।
ख़ुद अमजद का महल से यूँ सम्बन्ध था कि बीते ज़माने में उसके बुज़ुर्ग रियासत के ख़िदमतगार रह चुके थे।
अब ख़ुद अमजद छोटे-छोटेमामलों में महलवालों के लिए दलाली का काम कर रहा था : पार्ट-टाइम दलाली, और फुल-टाइम चमचागिरी!
ख़ुद उसके शब्दों में उसका स्वभाव कुछ ऐसा था कि 'ब्लू ब्लड' की जी-हुज़ूरी कर सकता था, 'लुच्चे-लफ़ंगों' की यस सर नहीं!
साबिर को किसी तरह अमजद को अपनी मुश्किल समझानी थी, कि वह कुछ और मुहलत उसके लिए माँग सके।
अभी तक दोस्ती गाँठने और मुफ़्त की शराब पीने के अलावा अमजद उससे अपनी सेवाओं के एवज़, पैसा भी लेता रहा था, और आगे भी लेगा।
अमजद की कमाई ही इस तरह के कामों से थी।
साबिर के पास एक क़ीमती स्कॉच थी, जो वह बम्बई से लाया था।
अमजद का दिल वह सवा लीटर की ख़ूबसूरत बॉटल ही जीत सकती थी!
वैसे उसका दावा था, कि उसने दुनिया की सबसे क़ीमती शराबें पी थीं।
इतनी, कि अब रम के सिवा किसी में मज़ा नहीं आता था!
कहाँ पी थी?
महल पर!
किसके साथ?
बात टाल जाता था।
महलवालों के साथ बैठकर पी सकने की औक़ात उसकी नहीं थी।
वह दोबारा उठकर अन्दर गया था और स्कॉच का गिफ़्ट-पैक लेकर लौटा था।
—यह लो, गिफ़्ट-पैक अमजद की ओर बढ़ाते उसने कहा था।
—यह क्या? अमजद आश्चर्यचकित था।
—तुम्हारी बर्थडे का एडवांस गिफ़्ट, उसने सहजतापूर्वक कहा था
—खोलकर तो देखो।
अमजद क़ीमती ब्रांड देखकर बाग़-बाग़ हो गया था।
—बाई गॉड! वह ग़लत अंग्रेज़ी बोलने में माहिर था, और 'माई' को 'बाई' कर दिखाना, उसका छोटा-सा कमाल। 
—यार, यह तो बहुत महँगी ब्रांड है!
ख़ुश होने के साथ-साथ वह उदास भी हो गया था।
—थैंक्यू, यार! वह भावुक हो उठा था। 
—मगर मेरी बर्थडे में
तो अभी काफ़ी दिन हैं। घर में मैं शराब पीता भी नहीं, इसे यहीं
सँभालकर रखो! साथ-साथ सेलिब्रेट करेंगे।
—यह क्या बात हुई! साबिर ने बुरा मानने के अन्दाज़ में कहा था।
—वह अलग करेंगे। इसे तुम महल में ले जाना। चलो, ड्रिंक तो ख़तम करो।
—वेरी गुड यार! अमजद को सुझाव पसन्द आया था, साथ ही 'महल' सुनकर कुछ ज़रूरी याद भी आ गया था।
दोनों ने साथ गिलास ख़ाली किए थे और नए पेग बन गए थे।
अमजद, मरियम की तबीयत के अलावा, कुछ सोच रहा था, साबिर अन्दाज़ा लगा सकता था। अपनी बात शुरू करने को वह मुनासिब लफ्ज़़ और लहज़ा तलाश कर रहा था।
साबिर समझता था, वह क्या कहने में हिचक रहा था।
—यार! तैयारी के बाद भी वह शुरू हुआ तो अटकता हुआ। —तलबी हुई थी, दरबार में! उन्हें जल्दी है। कुछ इन्तज़ाम हुआ?
—वह बात भी करते हैं, पहले साँस तो दुरुस्त कर लो, उसने इस तरह कहा था जैसे कोई रोज़मर्रा का मामला हो।
—नहीं, अमजद का स्वर कोरा कारोबारी हो गया था।
—उन्हें पैसों की ज़रूरत है, ज़्यादा नहीं रुक पाएँगे।
—तुम्हारे होते वह मेरा बिगाड़ क्या लेंगे। वह जानता था, इस तरह की फूँकें अमजद पर शराब के साथ ही चढ़कर उतर जाती थीं।
किया क्या जा सकता था! किसी तरह, कुछ मुहलत हासिल करनी थी।
—तुम जानते तो हो, उसने अमजद को मनाने के अन्दाज़ से कहा था।
—मैंने यहाँ एक नेक मंशा से अपना पैसा उलझाया है, एक अच्छा, बच्चों का स्कूल या मदरसा खोलने की प्लानिंग से। यह तो इत्तिफ़ॉक़ है, कि फि़लहाल मुझे ख़ुद यहाँ रहना पड़ रहा है।
—मेरे जानने से क्या होता है यार, उन्हें तो पैसा चाहिए! स्कूल नहीं आप होटल खोल लो! अपनी नेक मंशा से उन्हें क्या लेना- देना! अपन मजबूर थोड़ी कर सकते हैं, अमजद बेचारगी से कह रहा था।—उनकी चीज़ है, वह जिसे चाहे दें। कब्ज़ा तुम्हारा है, और कुछ कागज़़ात भी तुम्हारे पास हैं, इसलिए वह औने-पौने भी देने को राज़ी हैं।
—औने-पौने मतलब! साबिर ने बुरा मानने का नाटक करते हुए कहा था। 
—अभी तक तीन लाख से ज़्यादा ख़र्च कर चुका हूँ इस वीराने पर!
—वह उन्हें तो नहीं मिले, बेशक आपने दस लाख ख़र्च कर दिए।
ख़र्च करके और अपनी मुसीबत मोल ले ली! अब यह वीराना नहीं, प्रॉपर्टी डीलर्स के लिए शहर का प्राइम-स्पॉट है! मैं चाहता हूँ, जल्द-से-जल्द निबटारा हो जाए, उसी में तुम्हारा फ़ॉयदा है।
—मैं ख़ुद भी चाहता हूँ। यह भी जानता हूँकि तुम मेरा ही भला सोचते हो। दो लाख देना है, कोई इनकार थोड़ी है। यह भी नहीं कि पास नहीं है। है, मगर इधर-उधर बँटा हुआ है, तुम्हें बता चुका हूँ। वसूल करने में वक़त लग रहा है, मगर हो जाएगा। चाहूँ तो दो लाख कहीं से उठा लूँ, सूद ही देना होगा, मगर मामला मदरसे का है, ठीक नहीं रहेगा! कुछ मुहलत मिल जाए, तो आसानी होगी। मरियम से भी मशवरा करना होगा, उन्हीं के बूते स्कूल का सोचा है, और लोगों को पैसा भी उन्होंने ही दिया हुआ है, वही वसूल करेंगी।
—कितनी मुहलत? अमजद का स्वर गम्भीर था।
—ऐसे क्या कह सकता हूँ, उसने अपनी मजबूरी समझाना चाही थी।
—जैसे ही पैसा मिल जाए। हफ़्ता भी हो सकता है, और महीना भी लग सकता है।
—या उम्र भी लग सकती है! अपने खय़ाल में अमजद ने मज़ाक किया था।
—यार, मुझे वह मुद्दत बता दो, जो मैं उनसे कहकर देख सकूँ?
—'देख सकूँ'—क्या मतलब! उनमें हिम्मत है मुझे यहाँ से निकालने की? उसने चिढऩे का नाटक किया था।
—मगर कोई डैड-लाइन तो देनी होगी, कि हमें इतना वक़त चाहिए, है कि नहीं?
—मैं महीने-भर का कहकर देखता हूँ, वैसे उम्मीद कम लगती है।
—ठीक है। यूँ नहीं, तो फिर किसी और तरह निबटने का सोचेंगे। न चाहते हुए भी उसकी आवाज़ में थकान उभर आई थी। दोनों ने तेज़, और ज़्यादा शराब पी थी। अमजद की बातों से पुख़्ता हुआ था कि लैंड-माफिय़ा की टेकरी और आसपास की ज़मीन में दिलचस्पी बढ़ी थी। वह लोग महल से सीधा सम्पर्क बनाए हुए थे। ख़ुद उसने अमजद को यह बताना ज़रूरी नहीं समझा था कि एक पार्टी की ओर से, जगह के लिए, 'मुनासिब प्रॉफि़ट' का ऑफऱ, अर्थात् धमकी! सीधे उस तक पहुँच चुकी थी।
महलवालों को उनके आपसी लेन-देन से मतलब नहीं था।
वह अपने दो लाख चाहते थे, जो भी उन्हें दे दे।
हो सकता है, यह जानकारी अमजद को भी महल से मिल चुकी हो, लेकिन उसने साबिर को अपना विश्वासपात्र बनाने के योग्य न समझा हो।
साफ़ था कि आगे झूठी हमदर्दी के सिवा अमजद से किसी सहायता की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। लगा, वह थोड़ा और अकेला पड़ गया था।
अमजद को रुख़सत करने के बाद खय़ाल आया, उसने दोपहर में भी खाना नहीं खाया था।
फ्रिज में ऐसा कुछ नहीं था, जिससे काम चल सकता।
सहसा उसे ठंडी सड़क, हमीदिया रोड के ढाबे किसी पुराने दोस्त की तरह याद आए।
कभी रही होगी वह ठंडी, अब तो उस सड़क की दुनिया ही बदल चुकी थी, और ख़ुद उसका उधर से गुजऱ भी, कभी-कभार ही हो पाता था।
पिछली बार वहाँ खाना खाने कब जाना हुआ था, इस समय उसे यह तक याद नहीं था।
ढाबों की दुनिया आबाद, और हाफ़-डाउन शटर्स से ग्राहकों की आवक-जावक जारी थी।
मोटरसाइकिल प्रेम पंजाब ख़ालसा नाइट के सामने खड़ी करके उसने झुककर अन्दर प्रवेश किया था।
ढाबे का मालिक प्रेम उसे पहचानता था और काउंटर से दोस्ताना मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया था।
एक शाम प्रेम ने उसे उस परीक्षा से विस्तार से अवगत कराया था, जिससे शहर के सिख समुदाय को मिसेज़ गांधी की हत्या के बाद गुजऱना पड़ा था—आँसू-भरी आँखों के साथ, जिसकी प्रेम के साथ अलग से कल्पना असंभव थी।
यह ख़ुद साबिर के उन दिनों की बात थी, जब वह मरियम और बिटिया के साथ किराए के बाकऱीना फ़्लैट में, अख़बार पढ़ते, टीवी देखते, संगीत सुनते, दुनिया से तटस्थतापूर्ण जुड़े रहकर, अपने अतीत और वर्तमान के बीच कोई संधि खोजने के जतन कर रहा था। रोज़ शाम, कुछ दोस्त घर आ जाते, और देर रात तक, महफि़लें सजी रहतीं।
देश में सिखों के साथ हुई ज़्यादतियों का उसे, और ख़ासतौर पर मरियम को, अन्दाज़ा था, लेकिन यहाँ भोपाल में भी वैसा कुछ हुआ, प्रेम से जानकर बड़ा अचम्भा हुआ था।
उसकी व्यथा-कथा सुनते, वह यांत्रिक ढंग से, आश्चर्य और अफ़सोस प्रकट करने के सिवा, कर भी क्या सकता था। बाक़ी तफ़सील तो धीरे-धीरे सामने आई थी।
वह वक्त ही अजीब था।
इंदिरा गांधी की हत्या, यूनियन कार्बाइड की 'किलर गैस' का रिसना,
और देश में इलेक्शन, सब साथ-साथ ही हुए थे।
लगता था, तस्बीह के दाने, जिन पर उँगली फेरता, बनाव के बजाय,
कोई बिगाड़ की बददुआ, वज़ीफ़े की तरह पढ़ रहा था!
प्रेम अनोखा सरदार इस मायने में था कि उसका सिफऱ् एक हाथ था, पहाडिय़ों-से नाक-नक़श और दाढ़ी में गिनती के बाल।
उसकी एक ख़ास सज-धज की जीप थी, जिसे वह एक हाथ से शहर की भीड़-भरी सड़कों पर दौड़ाता फिरता था।
उसकी दादागिरी के कि़स्से सारा शहर जानता था, लेकिन ढाबे पर हुई लड़ाई में, बेटे की मौत के बाद, वह बुझ गया था।
वह सिख था, पंजाबी बोलता था, मगर अजीब टूटे-फूटेलहज़े में, जिसे शायद उसके कऱीबी ही पूरी तरह समझ पाते हों।
गेहुँए से दबा रंग, छोटा क़द और कंचों-जैसी गोल-गोल आँखें।
बोलते हुए, उसकी आवाज़, जऩाना और मर्दाना के बीच, लगातार गेयर बदलती थी।
कुर्तेनुमा लम्बा क़मीज़ और शलवार, पेशावरी सूट उसका पहनावा था और सिर पर लिपटी पगड़ी का तुर्रा बाहर निकला रहता था।
इस समय उसने नीले रंग का सूट और सफ़ेद पगड़ी पहनी हुई थी, और नौकरों से हिसाब लेने में व्यस्त था।
वातावरण में बसी बघार की दम तोड़ती महक से अन्दाज़ा लगाया जा सकता था कि यह उठाव की घड़ी थी जब नए ग्राहकों की उम्मीद ख़त्म हो जाती है।
रात गए ढाबों का धंधा, वैसे भी खाने से अधिक पानी मिली शराब मनमानी क़ीमत पर बेचने से चलता था।
एक आपसी समझ के अन्तर्गत होटलों पर पुलिस के छापे भी पड़ते थे, ख़बरें भी छपती थीं, और अख़बार के साथ ही पुरानी हो जाती थीं।
आसपास ठहरने के सस्ते होटलों की भरमार थी, क्योंकि रेलवे-स्टेशन और बस अड्डा, दोनों नज़दीक थे।
जो लोग क़ीमती होटलों में खाना-पीना अफ़ोर्ड नहीं कर पाते थे, या जिन्हें काम की भाग-दौड़ में यह याद नहीं रह पाता था कि शराब की दूकानें रात दस बजे बन्द हो जाती हैं, सब इस सड़क के ढाबों के मेहमान ठहरते थे।
और कुछ ऐसे भी, जिन्हें ढाबेबाज़ी में मज़ा आता था।
ऐसे परिचित, अपनी शराब, ढाबों में बैठकर पी सकते थे।
—खाने में क्या है? केबिन का पर्दा हटाकर टेबिल साफ़ करते वेटर
से उसने पूछा था।—और रम, एक चर्टर, ब्रांड प्रेम से पूछकर!
दाल फ्राइ, गोभी की सब्ज़ी—गोभी-आलू और गर्म तन्दूरी पराँठा।
खाना जऱा ठहरकर, शाबाश!
वेटर चला गया था।
उठाव की घड़ी, जब सारी थकान के बावज़ूद जल्दी होती है।
ताज़ा-दम होकर, नया दिन शुरू कर सकने, और बीते दिन की उकताहट से छुटकारा पाने की जल्दी!
वेटर एक खुला पौवा, काँच का गिलास, पानी भरा जग और सलाद की प्लेट सपाटे से, लिनोलियम जड़ी टेबिल पर रखकर, केबिन का पर्दा बराबर करते हुए, लौट गया था।
टमाटर, ककड़ी और प्याज़ की बासी क़ाशें।
गिलास में रम उँडेलते लगा कोई पर्दे से अन्दर झाँक रहा था।
—प्रेम! उसने कहा था, और नजऱ उठाकर देखा था, प्रेम ही था!
—मैं ज़्यादा देर नहीं रुकूँगा। टाइम हो गया है, मुझे अन्दाज़ा है। आओ एक ड्रिंक हो जाए।
प्रेम, बिना जवाब दिए, पिच्छे पाँव लौटा था, और अपना ट्रेडमार्क, स्टेनलेस स्टील का भरा गिलास, और भुने पापड़ की प्लेट लिये, लौटा था।
ऐसा कम होता था, और प्रेम सम्बन्धों को धन्धे से गड़बड़ाता नहीं था।
सामने बेंच पर, गर्दन को ख़ास ढंग से झटका देकर, बैठते हुए, गिलास लहराकर, उसने चीयर्स किया था और किसी गहरी चिन्ता में डूब गया था।
—और क्या हाल-चाल हैं? उसने प्रेम को वर्तमान में बुलाने के लिए पूछा था।
—यहाँ हमीदिया रोड पर कुछ नया-ताज़ा? बहुत ट्रैफि़क बढ़ गया है यार, इधर से तो गुजऱने की हिम्मत नहीं पड़ती।
उसने झूठ-मूठ, जैसे इतने दिन बाद, ढाबे पर आने की सफ़ॉई दी थी।
प्रेम ने दोबारा गर्दन हिलाई थी, मानो सहमति जता रहा हो कि बेशक, ट्रैफि़क तो बढ़ गया, और चुप साधे रहा था।
—यह ढाबा ख़त्म कर रहा हूँ, एकाएक उसने सुधरी हिन्दी में, फ़ैसला सुनाने के ढंग से कहा था।
—क्यों? विश्वास कर पाना सम्भव नहीं था।
साबिर प्रेम के बिना ढाबे, या ढाबे के बिना प्रेम की कल्पना नहीं कर सकता था।
—यह काम का धंधा नहीं रहा जी, प्रेम की आवाज़ सनातन उदासी में डूबी थी।
—न पहले-सा मज़ा रहा, न लोग! ज़मीन खऱीदी है, हल चलाऊँगा। पुश्तैनी काम है।
—यह तो अच्छी ख़बर है, दोस्त-दुश्मन सबके लिए। दुश्मनों के लिए यूँ, कि उन्हें हमीदिया रोड की शहंशाही मिल जाएगी! कोई कॉम्पिटीशन नहीं रहेगा।
वह महज़ बोलने के लिए, प्रेम से सतही बातचीत करता, उसकी खेती की योजना के बारेमें पूछताछ करता रहा था, लेकिन दिमाग़ प्रेम के जवान बेटे, लवली की मौत के मायने-मतलब खोजने में उलझता रहा था।
शराफ़त, गुंडागर्दी, ख़ून-खऱाबा, पुलिस: कुछ भी, इस बूढ़े होते सरदार के लिए, उसकी उम्र और पेशे में, नया नहीं हो सकता था।
इन सब शब्दों के मायने, वह उससे कहीं बेहतर समझता होगा, जो किसी शब्दकोश में दर्ज किए जा सकते थे।
रहस्य हो सकता था, लवली का न रहना, और बाक़ी सारे संसार का, ज्यों-के-त्यों, चलते रहना!
एक अनुभव जो सारी, ठंडेदिल से सोची, जीवन-संबंधी परिभाषाओं को ठेंगा दिखा सकता था!
रोज़, नित नए ढंग से, दिखाता ही रहता था!
हथियार न डालने की कोशिश ज़रूर की जा सकती थी, मगर उसमें कामयाबी शर्त कहाँ!
हर ख़ुशी की शुरुआत मातम में क्यों तब्दील होती जाती थी?
उसे बिटिया की याद बेतरह घेरने लगी थी।
क्या सचमुच, वह इस सच को नहीं जानता था, कि बिना प्रदर्शन के बच्चे प्यार को नहीं समझ सकते?
या ऐसा न करना, उसकी उसी लापरवाही के कारण था, जिसमें उससे अभी तक अनेक घपले होते रहे थे!
क्या कुछ भी, जीवन के साथ बिताए समय में, ऐसा नहीं था, जो बिटिया को उससे बाँधकर रख पाता?
जो उसे यक़ीन दिला पाता, कि उसका पिता, अपनी सारी कमज़ोरियों के साथ, उसे सच्चे दिल से चाहता, और उसके लिए कुछ भी कर सकता था!
कैसा अजनबीपन, कब और क्यों, बिटिया के मन में उसके लिए पलता-परवरिश पाता रहा!
क्या सचमुच, उसने अपनी बेटी के लिए, कभी कुछ किया ही नहीं?
सिफऱ् मरियम ही थी जिसने उसे सारा प्यार दिया?
ज़रूर मरियम ने बिटिया को साबिर के एक से अधिक सन्तान के आग्रह को, अपनी तरह से तोड़-मरोड़कर बयान किया होगा, और बिटिया ने उसके एबॉर्शन कराने का समर्थन, यह सोचकर कि उसकी माँ उस अकेली पर ही, अपना सबकुछ न्योछावर करना चाहती है।
वह खुलकर बिटिया से कभी पूछ ही नहीं सका या कभी कोशिश की तो उसने किसी चालाक वकील की तरह, उसके सारे सवालों के ऐसे जवाब दिए, जिनसे किसी प्रकार उसके दिल का हाल नहीं खुलता था!
अब तो इसके लिए वह ख़ुद को जि़म्मेदार मान ही चुका था-बच्चे वही करते हैं, जिसके लिए हम उन्हें तैयार करते हैं; और अवश्य ही, उसके बिटिया से व्यवहार में अनेक कमियाँ रही थीं।
वह इस समय प्रेम से भी कुछ सवाल करना चाहता था।
कि उसे लवली की पहली स्मृति क्या थी?
लवली के अलावा तुम्हारे और भी बेटे हैं, जिन्हें तुम मुँह पर गाली देकर निकम्मा, जऩख़ा और जाने क्या-क्या कहते हो-यहीं ढाबे पर, ग्राहकों के सामने।
यह ग़लत है।
मेरा अनुभव कहता है, उनमें से कोई भी, किसी पल, अच्छे-बुरे की परवाह किए बिना, विद्रोह कर सकता है।
तुम्हारी उम्र में तो थका और बेज़ार ही हुआ जा सकता है, लेकिन नौजवानों का सोचो, जो विद्रोह कर सकते हैं।
नई पीढ़ी, हमारे दोग़लेपन को समझ चुकने के बाद इस खेल में भी, हमें हरा सकने की क्षमता रखती है।
अपने जि़न्दा बेटों की परीक्षा मत लो, और उनसे ऐसा व्यवहार करो कि आने वाले समय में वह अपने बुज़ुर्गों के नाम के साथ, दुनिया की चमत्कारपूर्ण घटनाएँ जोड़कर, बयान कर सकें।
बंद करने में क्या है, तुम ढाबा बन्द कर रहे हो, और जिस पार्टी से मेरा सौदा चल रहा है, वह अपनी भूतपूर्व रियासत की आखिऱी दूकानें!
तुमसे किसने कह दिया कि खेती, बाक़ी दुनियादारी से हटकर, सिफऱ्
शराफ़त के बूते की जा सकती है?
या यह ढाबा चलाने से किसी तरह आसान होती होगी!
मुझे तो ऐसा नहीं लगता।
वह यह भी पूछना चाहता था कि यार! इस जगह की क्या क़ीमत
मिल रही है—दस या पन्द्रह लाख?
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उसमें से कुछ समय के लिए, दो लाख तुम मुझे दे दो!
नेक काम, मदरसा क़ायम करने के खय़ाल से ज़मीन लेने का सोचा था मैंने!
तुम्हारी सहायता से मेरी एक मुश्किल हल हो जाएगी, जो इस वक़त हड्डी बनकर गले में अटकी है!
वह प्रेम को यह मशवरा भी देना चाहता था कि अपने प्रस्तावित फ़ॉॅर्म का नाम वह अपने प्यारे बेटे, लवली के नाम पर रखे, क्योंकि आगे क्या हो कुछ तय नहीं।
बीता याद करने का पल भी मिले न मिले!
सब अच्छे के लिए ही होता होगा।
इनसान किस-किस परछाईं से कब तक हिलेेगा!
बला की तेज़ी पकड़ ली है जि़न्दगी ने।
बहुत धूल उड़ और जम रही है।
तुम्हें मेरी बातें सुनते, जख़़्मी परिन्दों की चीत्कार या सूफ़ी शब्दावली में, 'रक़से बिस्मिल' का आभास हो, तो यह मेरा या तुम्हारा क़सूर नहीं।
हम सब बहुरूपिए हैं!
मेरे मामू, किसी ज़माने में, अपने कऱीबी दोस्त (मेरे दिवंगत, सगे
पिता!) को बहुरूपिया कहते थे।
यह उन्हीं का बताया शब्द है।
मेरा तो कुछ भी नहीं। उस अर्थ में, पढ़ा हुआ भी नहीं।
वैसे मैंने बहुत पढ़ा है, लेकिन पास हाई स्कूल भी नहीं किया!
ऐसा पढ़ा किस काम का!
मदरसा
इल्म की भी चोरी ही की है मैंने।
कुछ लोग चोरी करने के बीमार होते हैं, और कुछ चोरी पर पर्दा
डालने का स्वाँग रचने के।
उसके भीतर नशे के अन्धड़ चल रहे थे, बफऱ्बारी हो रही थी।
प्रेम किसी समन्दर में डूबा, डूबा ही रहना चाहता था।
खाना खाते, उसने मरियम को सरप्राइज़ देने का तय किया था।
नर्सिंग होम पुराने जीपीओ के पास था।
हर चीज़ दो—नई और पुरानी!
शहर से लेकर क़ब्रिस्तान, तालाबों से लेकर रेलवे स्टेशन!
हो सकता है, आनेवाले ज़माने में, यह शहर तालाबों के बजाय,
अस्पतालों के शहर के नाम से जाना जाए!
मरियम सो रही थी।
अटेंडेंट ने उसे डिस्टर्ब करने से मना किया था।
ख़ास परेशानी नहीं। डीहाइड्रेशन से कमज़ोरी हो गई थी। अब सब
ठीक था। सुबह छुट्टी हो जाएगी।
शीशे से, बिस्तर की सफ़ेद चादरों में खोई, मरियम को वह लाचारी
से देखता रहा था-बिटिया उस समय जाने कहाँ थी?
रुकना चाहिए या लौट जाना, दिमाग़ तय नहीं कर पा रहा था।
कऱीब-दूर सन्नाटा-किसी मरीज़ या अटेंडेंट के खाँसने-खखारने
की आवाज़ तक नहीं।
भारी क़दमों, ज़ीना उतरकर, वह वापस मोटरसाइकिल तक आया था।

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