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विष्णु नागर ने लिखा : मैं भी उस दौर में झोला लटकाए घूमता था
19-Jun-2020 12:05 PM 3
 विष्णु नागर ने लिखा :  मैं भी उस दौर में झोला लटकाए घूमता था

-विष्णु नागर

बात 1980 की है। 1974 में 'पहचान' सीरीज में मेरी कविता पुस्तिका आ चुकी थी मगर 1980 में 'कविता की वापसी' के उस दौर में जिन युवा कवियों के पहले कविता संग्रह प्रकाशित हुए थे, उनमें एक मेरा भी था- 'तालाब में डूबी छह लड़कियाँ। मुझ जैसे नौसिखिया कवि के संग्रह का आवरण जे. स्वामीनाथन जैसे बड़े चित्रकार ने बनाया था। यह अलग बात है कि मध्य प्रदेश में बिक्री होने के कारण उसके फटाफट दो संस्करण प्रकाशक ने प्रकाशित किए। प्रकाशक महोदय की कृपा से पहले संस्करण में 30 गलतियाँ थीं। दूसरा संस्करण उन्हें बहुत जल्दी प्रकाशित करके सरकार को भेजना था, इसलिए उसमें गलतियों की संख्या बढ़कर दुगुनी यानी 60 हो गई।

आदर के साथ मैंने इस कविता संग्रह की प्रतियाँ,जिन्हें भेंट की थीं, उनमें हमारे वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे भी थे। उन्होंने इस संग्रह का स्वागत किया था। इसी दौरान जर्मन विद्वान और हिंदी कविताप्रेमी लोठार लुत्से भारत आए। खरे जी उनके बहुत निकट थे। उन्होंने जानना चाहा होगा कि इस बीच नये कविता संग्रह कौन-कौन से आए हैं तो खरे जी ने अपने पास से जो कविता संग्रह उन्हें भेंट किए, उनमें मेरी यह किताब भी थी। मुलाकात होने पर उन्होंने मुझसे कहा कि मैं तुम्हारे संग्रह की अपनी प्रति लुत्से को दे चुका हूँ तो तुम मुझे दूसरी प्रति उपलब्ध करवाना। मैं भी उस दौर में कंधे पर झोला लटकाए घूमता था, उसमें एक प्रति उनके लिए रख ली। मैं 10, दरियागंज स्थित 'दिनमान' के दफ्तर गया था और शाम को प्रयाग शुक्ल और विनोद भारद्वाज का काम जब खत्म हुआ तो उनके साथ मैं लौट रहा था। बाहर निकलते ही विनोद भारद्वाज ने कहा कि वह अभी खरेजी से मिलने साहित्य अकादमी जा रहे हैं तो मैंने तुरंत कहा कि विनोद जी जब आप उनके पास जा ही रहे हैं तो खरेजी को यह प्रति भी दे दें। चूँकि पहले वाली प्रति पर मैंने लिखकर दिया था- 'आदरणीय खरेजी को सादर' तो अब इस बात को दूसरी बार लिखने में मुझे संकोच हो रहा है।संभव है ऐसा सोचना मेरा बचकानापन रहा हो। विनोदजी ने संग्रह खरे जी को वह संग्रह दे दिया। खरेजी ने उसी समय या बाद में संग्रह को उल्टा- पुल्टा होगा तो उस पर कुछ लिखा नहीं था, खाली प्रति थी। इसका आशय उन्होंने यह समझा कि इस लड़के का पहला कविता संग्रह आते ही इसे घमंड हो गया है। मैंने क्या सोचकर कुछ लिखा नहीं था, बाद में इसका स्पष्टीकरण देने का कोई फायदा उनकी अदालत में नहीं हुआ। उसके बाद उनके जीवन के आखिर तक मेरे और उनके संबंधों में तनावपूर्ण शांति बनी रही। हम आमने- सामने रहने लगे और एक ही अखबार नवभारत टाइम्स में काम करने लगे, तब भी स्थितियाँ बदली नहीं। इसके बावजूद अपने घर पर कुछ युवा मित्रों के कविता पाठ का सिलसिला मैंने कुछ समय चलाया था, तो वह उसमें आते थे और कभी संयोग बन गया रसरंजन का तो उसमें भी हिस्सा लेते थे। दीपावली पर हम पति पत्नी उनसे मिलने जाते थे। हमारी हाउसिंग सोसाइटी का मैं कुछ वर्षों तक सचिव रहा तो उस नाते भी मेरा उनके घर आना-जाना रहा और मुझे उनका पूरा सहयोग मिला। मेरे आग्रह को उन्होंने कभी टाला नहीं,मुझ पर अविश्वास नहीं किया।कभी कोई विवाद पड़ोसी के नाते उनसे हुआ नहीं। उनके परिवार से हमारे परिवार के संबंध एक स्तर पर बने रहे। उनका बेटा और मेरा बड़ा बेटा लगभग हमउम्र हैं और उनके घरेलू नाम भी संयोग से एक हैं-अप्पू। जब हम यहाँ रहने आए तो मेरा छोटा बेटा सात साल का था। कभी -कभी उससे सामना हो जाने पर बड़े प्रेम से उससे बातें करते थे।बाहर उनका जो आतंक हो मगर अपने बच्चों से उनके संबंध दोस्ताना थे।कभी बच्चों को डाँटते फटकारते नहीं सुना,मजाक करते ही सुना।

जब वह नवभारत टाइम्स में शुरू में सहायक संपादक होकर आए तो उनके आते ही एक प्रसंग ऐसा आया कि हमारे संबंधों का तनाव उभर आया।फ्रांस में होने जा रहे भारत महोत्सव के खिलाफ मैंने एक लेख लिखकर अपने संपादक राजेंद्र माथुर को प्रकाशन के लिए दिया था। उन्होंने इस पर विष्णु खरे से टिप्पणी माँगी। मेरे लेख को पूरा देखे बगैर खरेजी ने संपादक को यह लिख कर दिया कि इसके लेखक को इस महोत्सव की ठीक-ठीक तारीखों तक का पता नहीं है। ऐसा लेख प्रकाशन योग्य नहीं। संपादक ने वह लेख वापिस करने की बजाय मुझे अपने कक्ष में बुलाया और कहा कि इस पर खरे जी की यह टिप्पणी है। मैंने माथुर साहब से कहा कि गलती तो नहीं होनी चाहिए मगर फिर भी एक बार चैक कर लेता हूँ। मैं उसी मंजिल पर स्थित लाइब्रेरी में गया। खबर की कतरन को देखा। मैंने तारीखें सही लिखी थीं। मैं कतरनों की वह फाइल लेकर सीधे खरेजी के कक्ष में गया।मैंने वह कतरन उनके सामने रखी और कहा कि आपने संपादक से ऐसा- ऐसा कहा था। यह देखिए फाइल। तारीखें बिल्कुल सही हैं।वह निरुत्तर थे।मैंने पहली बार उनसे कड़क शब्दों में कहा कि आइंदा ऐसी हरकत मत कीजिएगा। खैर वह लेख मैंने दुबारा संपादक को दिया और छपा।

एक समय हम विशेष संवाददाताओं की कापी चैक करने,संपादित करने का दायित्व उन्हें दिया गया था।एक बार मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने अपना मंत्रालय कवर करनेवाले कुछ संवाददाताओं को अपने कक्ष में बुलाया।मैं भी उनमें से एक था। आफिस आकर कापी लिखी और खरे जी के पास भिजवा दी। अगले दिन देखा तो वह खबर नदारद। मन मसोसकर रह गया क्योंकि उस दिन खबर नहीं छपी यानी खबर की हत्या हो गई, वह प्रकाशन योग्य नहीं समझी गई। ऐसा होता है कई बार संवाददाताओं के साथ। पूरे दिन की भागदौड़ पर पानी फिर जाता है। इसके एक या दो दिन के बाद देखता हूँ,वह खबर संपादकीय पृष्ठ पर आठवां कालम के रूप में प्रकाशित है। उसमें व्यंग्य का पुट सहज ही आ गया था।खबर से ज्यादा उसके लिखने के ढँग में रचनात्मकता थी। इसे खरेजी ने पकड़ा और इस तरह उसका उपयोग किया।

एक समय संभवतया 'आलोचना' पत्रिका में उन्होंने युवा कवियों की दो सूचियाँ बनाई थीं। एक में उन कवियों के नाम थे,जिन्हें वह कवि मानते थे।दूसरी सूची में उनके नाम थे,जिन्हें वह तो कवि नहीं मानते थे मगर दूसरे मानते थे। मेरा नाम दूसरी सूची में था। मेरा नाम उनकी नजर में शायद दूसरी सूची में ही हमेशा रहा। मेरी कविता के बारे में जो भी उनकी राय रही हो मगर दो बार ऐसे अवसर आए, जब उन्होंने इंटरकॉम से बात कर मेरी दो कविताओं की प्रशंसा की।इसमें एक कविता 'दोस्त की बड़ी बेटी अन्ना की स्मृति में' थी, दूसरी याद नहीं। मुझे याद है कि उन्होंने इस कविता के बारे में कहा था कि हिंदी में ऐसी शोक कविताएँ कहाँ हैं(निराला की सरोज स्मृति से बड़ी शोक कविता वैसे कहाँ है।) सब जानते हैं कि वह प्रशंसा और निंदा अक्सर अतिरेकपूर्ण ढँग से करते थे। यह उनका सहज ढँग था। अगर वह लिखित रूप से किसी कवि की प्रशंसा कर रहे होते तो किसी दूसरे की नाम लेकर या बिना नाम लिए निंदा का भाव होता।

तो ऊपरी तौर पर सारे विरोध के बावजूद एक महीन तार जुड़ा भी हुआ था। उनके संग्रह'सबकी आवाज़ के पर्द में' का मैं सक्रिय प्रशंसक रहा हूँ।अपने कवि आलोचक मित्र विजय कुमार सहित कई मित्रों का ध्यान उसकी तरफ दिलाया था। यह उन्होंने मुझे भेंट किया था,यह लिखते हुए ' श्री विष्णु नागर को '। इस कविता संग्रह ने एक तरह से रघुवीर सहाय के बाद फिर से कविता का ट्रेंड बदला था, हालांकि इसके सभी चिह्न पहले के संग्रह में मौजूद थे। कविता में बारीक कथात्मक विवरणात्मकता को कैसे नाजुक ढँग से ढाला जा सकता है, इसका उदाहरण उनकी बेहतरीन कविताएँ हैं।बाद में उनके अनुकरणकर्ता यह संतुलन नहीं रख पाए।

धीरे -धीरे उनकी दोनों बेटियों की शादियां हो गईं।बेटे ने फिल्मी दुनिया की राह पकड़ी और वह मुंबई चला गया।फिर कुमुद जी भी बेटे की देखरेख करने चली गईं। बीच-बीच में वह आती रहीं।खरे जी कुछ समय अकेले रहे।फिर वह भी मुंबई चले गए मगर उनकी आत्मा यहीं बसती थी। वह आते- जाते रहते थे। फिर दिल्ली हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के रूप में दिल्ली में कुछ महीने रहे और अंतिम साँस भी यहीं ली। पहले उनके घनिष्ठ देवताले गए,फिर उनके तेरह महीने बाद वह। दोनों का अंतिम कुछ समय तकलीफ़ में बीता। देवताले जी को तो अंत तक होश रहा,खरे जी कुछ समय अचेतावस्था में रहे।

(लेखक लंबे समय तक पत्रकार रहे हैं, और अब अपने को भूतपूर्व पत्रकार लिखते हैं)

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