राजपथ - जनपथ

Posted Date : 25-Dec-2017
  • देश के कुछ प्रमुख अखबार, और कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाएं बीच-बीच में अपने सर्वे से यह तय करती हैं कि देश के सबसे ताकतवर अफसर कौन हैं। पहले भी कुछ मौकों पर अमन सिंह को न केवल छत्तीसगढ़ का, बल्कि पूरे देश का एक सबसे ताकतवर अफसर घोषित किया जा  चुका है। अभी न्यू इंडियन एक्सपे्रस ने उन्हें देश के 14 सबसे ताकतवर अफसरों में शुमार किया है। लेकिन ताकतवर होना उनकी कोई खूबी नहीं है, बल्कि खूबियों के चलते हुए वे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सबसे भरोसेमंद साबित हुए हैं, और इस वजह से वे सचमुच ही रमन सरकार में सबसे ताकतवर हैं। जो लोग उन्हें जानते हैं, वे उनसे बातचीत करके यह पाते हैं कि उनमें अपनी इस ताकत का कोई अहंकार नहीं है, और वे राज्य की सारी कामयाबी की तारीफ मुख्यमंत्री को देते हैं, और अपने साथी अफसरों की पूरी टीम को हर बार वाहवाही बांट देते हैं। अमन सिंह को रमन सिंह की ढाल भी माना जाता है कि वे मुख्यमंत्री को किसी भी मुसीबत में फंसने नहीं देते, कहीं कोई चूक होते दिखती है, तो उसे रोकने में भी सबसे आगे रहते हैं। और यही खूबी उन्हें छत्तीसगढ़ की पिछले 14 बरस की इस सरकार में एक अनोखी जगह देती है। इस सरकार को जानने वाले यह जानते हैं कि किसी सही काम की फाईल अमन सिंह की नजरों से बचकर निकल सकती है, लेकिन किसी गलत काम की फाईल पर उनकी तेज नजर रहती है, और सरकार के भीतर वे सचमुच ही सबसे अधिक ताकतवर माने जाते हैं, और हैं। लेकिन सरकारी ढांचे में जो लोग उनसे ऊपर हैं, वे उन्हें अपनी इस ताकत का अहसास नहीं होने देते।


    जोगी पार्टी का हेलिकॉप्टर 
    पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी 26 तारीख से प्रदेश भर के दौरे पर निकल रहे हैं। वे अलग-अलग जगहों पर गुरूघासीदास जयंती कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। रोजाना वे 3 से 4 कार्यक्रमों में शामिल होंगे। सभी कार्यक्रमों में समय पर पहुंच पाएं, इसके लिए उनकी पार्टी ने हेलिकॉप्टर किराए पर लिया है। इस पर लाखों रुपये खर्च हो रहा है। जोगी की सतनामी वोटों पर गहरी पकड़ है। ऐसे में उनके दौरे पर राजनीतिक दलों की निगाहें लगी हैं। पिछले साल भी जयंती समारोह में शामिल होने के लिए उन्होंने हेलिकॉप्टर किराए से लिया था। तब विरोधियों ने सरकार पर हेलिकॉप्टर का खर्च उठाने का आरोप लगाया था। अब जब फिर हेलिकॉप्टर उड़ान भरने वाला है, तो खर्च को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। पार्टी नेताओं ने साफ किया है कि इसके लिए कार्यकर्ताओं ने आपस में चंदा एकत्र किया है। यह भी कहा जा रहा है कि जोगी पार्टी विधानसभा चुनाव तक के लिए हेलिकॉप्टर किराए पर ले सकती है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अलावा खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, जोगी पार्टी को तीसरी शक्ति मानकर चल रहे हैं। कुछ लोगोंं का यह भी कहना है कि तीसरी ताकत की चुनाव में दमदार मौजूदगी से सत्तारूढ़ दल की वापिसी की संभावना बनती है, ऐसे में उन्हें मजबूत करने में थोड़ा बहुत राजनीतिक योगदान हो भी जाता है, तो गलत नहीं। चुनाव आयोग ने कोई रोक तो लगाई नहीं है कि कोई पार्टी किसी दूसरी पार्टी को घोषित-अघोषित चंदा नहीं दे सकती।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 24-Dec-2017
  • अपने एक अनुयायी परिवार की नाबालिग बच्ची से बलात्कार के आरोप में बरसों से जेल में कैद आसाराम के भक्त अब तक बने हुए हैं, और अपने बच्चों के साथ मिलकर उसका प्रचार करने में लगे रहते हैं। राजधानी रायपुर के मरीन ड्राईव पर आसाराम के कई बैनर लगाकर आज सुबह लोगों को तुलसी के पौधे बांटे जा रहे थे और साथ-साथ आसाराम की महिमा का बखान भी किया जा रहा था। कल, 25 दिसंबर  को तुलसी पूजन दिवस मनाया जाता है और ऐसा करके एक ईसाई त्यौहार के दिन एक हिन्दू विकल्प भी पेश कर दिया जाता है। इसी जगह पर बैनर लगे हुए थे जो बता रहे थे कि किस तरह चौदह फरवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाया जाए, जो कि आसाराम ने वेलेंटाइन डे के विकल्प के रूप में पेश किया था। उसके भक्त यह समझाने की कोशिश में भी लगे थे कि भारत के संविधान में कहीं ऐसा लिखा है कि बरसों तक जमानत भी न दी जाए? भक्त-परिवारों की महिलाएं, और बच्चे आते-जाते लोगों को रोक-रोककर तुलसी के पौधे दे रहे थे। बलात्कार की शिकार नाबालिग बच्ची की शिकायत को ये भक्त पश्चिमी देशों और ईसाईयों की साजिश बता रहे थे। 

    चेम्बर या विधानसभा?
    भाजपा विधायक श्रीचंद सुंदरानी के चेम्बर ऑफ कॉमर्स से मोह के चक्कर में सरकार के लिए विधानसभा में मुश्किलें खड़ी हो गई थी। बताते हैं कि विधेयकों पर चर्चा के दौरान सत्तापक्ष के सभी विधायकों को सदन में मौजूद रहने के लिए कहा गया था। लेकिन ऐन  वक्त में सुंदरानी समेत छह विधायक गैरहाजिर रहे। विधेयक तो किसी तरह पास हो गया, लेकिन विधायकों के गैर जिम्मेदारना रवैये से पार्टी नेता खफा हैं। छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी सौदान सिंह ने इसको लेकर विधायकों को जवाब-तलब किया और फटकार लगाई। सुनते हैं कि सुंदरानी ने सफाई दी, कि चेम्बर के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों के शपथ ग्रहण समारोह में उनका रहना जरूरी था सो, चले गए। उनके विरोधी नेता पार्टी के रणनीतिकारों को यह समझाने में जुटे गए हैं कि सुंदरानी को चेम्बर की राजनीति में वापस भेज दिया जाए। वैसे भी उनकी विधानसभा से ज्यादा सक्रियता चेम्बर में रहती है। सुंदरानी अपने उम्मीदवार को चेम्बर में बड़े दमखम से जिताकर ले जाए, उससे तो पार्टी में उनके विरोधी हक्का-बक्का हैं, लेकिन चेम्बर चुनाव के चक्कर में जो लोग उनसे नाराज हुए हैं, उनमें से बहुत से उनकी विधानसभा में रहते हैं, या उस पर असर रखते हैं। दूसरी तरफ उसी सीट से कांगे्रस की टिकट की उम्मीद रखने वाले भूतपूर्व विधायक कुलदीप जुनेजा चेम्बर की राजनीति के बिना अपना पूरा समय सड़क किनारे लोगों से मिलने-जुलने में लगाना जारी रखे हुए हैं। 


    चीनी सामान, और मांसाहार
    छत्तीसगढ़ में दीवाली गुजर जाने के बाद चीनी झालरों का विरोध ठंडा हुआ था, लेकिन अब क्रिसमस और नए साल पर एक बार फिर चीनी सामानों के बहिष्कार की बात हो सकती है। जिन लोगों को अब तक चीनी सामानों से परहेज करने के पूरे तरीके पता न लगे हों, उनके लिए यह जानकारी काम की होनी चाहिए कि भारत अपनी लगभग सारी जरूरी दवाईयों का 80 फीसदी हिस्सा चीन से आयात करता है। इसमें दवाओं के लिए कच्चे माल से लेकर बनी हुई दवाईयां तीन चौथाई से अधिक चीन से ही आती हैं। अब जिन लोगों को चीनी सामानों का बहिष्कार करना हो, वे एलोपैथिक दवाएं छोड़ सकते हैं। चीनी सामानों से जिनको पूरा परहेज है, उनको कम्प्यूटर, मोबाइल फोन, केलकुलेटर का इस्तेमाल तो बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। इसके अलावा हिन्दुस्तान के अधिकतर बिजली घरों में कम या अधिक हिस्से चीन के बने हुए हैं, इसलिए बिजली का उपयोग न करना ही ठीक होगा। 
    इसके अलावा जिन लोगों को पशुओं के बदन के किसी हिस्से से बने हुए सामानों को खाने से परहेज हो, वे लोग मरे पशुओं की हड्डी-चमड़ी से निकालकर बनाए जाने वाले जिलेटिन से बनने वाले कैप्सूल-खोल का इस्तेमाल भी बंद कर सकते हैं। फिर यही जिलेटिन फलूदे पर डालकर खाया जाता है, कई तरह के केक-पेस्ट्री पर भी जिलेटिन सजाया जाता है, इसलिए ऐसे लोग इसका इस्तेमाल भी सोच-समझकर करें। फिर जो लोग आयुर्वेदिक दवा को गैरचीनी, गैरपशु मानते हैं, वे भी यह जान लें कि बहुत सी आयुर्वेदिक दवाएं जीव-जन्तुओं के अंगों से बनाई जाती हैं, और रामदेव की पतंजलि ने भी अपनी दवाओं में शंख के इस्तेमाल की बात मंजूर की थी। 


    कारोबार और जाति की खूबियां
    कुछ जातियों के लोग कारोबार में बड़े माहिर होते हैं, और यह उनकी एक बड़ी खूबी होती है। इस कॉलम को लिखने वाला यह सैलानी एक ठेले पर अमरूद देखकर खरीदने रूका। बड़ा छोटा सा कारोबार था, लेकिन सिंधी परिवार के चार लोग उसे चला रहे थे, या कम से कम उस वक्त वहां मौजूद थे। एक बच्चा तौलने लगा, पिता छांटने लगा, और साथ-साथ यह कहने लगा कि सौ रूपए में ढाई किलो ले जाईये। उसकी पत्नी और बेटी भी यह दिखाने लगे कि बेर भी अच्छे हैं, उसे भी तौल दें क्या? कुल पचास रूपए की खरीददारी के लिए वह पूरा परिवार एक राह चलते ग्राहक को महत्व दे रहा था। यह खूबी किसी भी सिंधी दुकानदार के व्यवहार में देखने मिलती है कि वे उत्साह के साथ ग्राहक से बात करते हैं। दूसरी तरफ शहर के बीच बाजार में मेवे की एक दुकान पर बैठे उसके मालिक का बर्ताव भी देखने लायक था। ग्राहक से बात करते हुए पूरे वक्त उसका हाथ अपने बदन के चुनिंदा हिस्सों को खुजाते चल रहा था और उसका ध्यान भी खुजली के अलावा एक फोन पर बंटा हुआ था, ग्राहक उसकी प्राथमिकता में तीसरे नंबर पर था। इसी तरह अभी एक मॉल में खुले एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड, माक्र्स एंड स्पेंसर के शोरूम में जाने पर वहां की सेल्स-गर्ल सामने पड़ी, उससे पूछा कि क्या उनके पास कॉटन-होजियरी के शॉटर््स हैं? बिना रूके उसका जवाब था कि उनके शोरूम में कोई भी शॉर्ट्स नहीं है। कुछ आगे बढऩे पर जब शॉटर््स टंगे दिखे, तो फिर उससे पूछा गया, तो उसका जवाब था कि शायद अभी-अभी आए होंगे। इसके तुरंत बाद उसने खुद भीतर से लाकर कुछ और किस्म के शॉटर््स दिखाए। शोरूम में और भीतर जाने पर एक और जगह कई किस्म के शॉटर््स सजे हुए दिखे। कुल मिलाकर बात यह थी कि इस बड़े ब्रांड के शोरूम में जो सामान भरा हुआ था, वहां की सेल्स-गर्ल घुसते ही उसकी मनाही करके ग्राहक को लौटाने पर आमादा थी। अमरूद के एक ठेलेवाले का पूरा परिवार एक ग्राहक के लिए जितना उत्साही था, उतना किसी दूसरी जाति के दुकानदार शायद ही रहते हों।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 21-Dec-2017
  • यह शायद पहला मौका है जब गुरू घासीदास जयंती से लगकर, अगले ही दिन से विधानसभा का सत्र हो रहा है। इसकी वजह से उन इलाकों के विधायक परेशानी में हैं जिनके विधानसभा क्षेत्रों में सतनामी समुदाय के लोग पर्याप्त संख्या में हैं। वे लोग अपने-अपने इलाकों में एक-एक दिन में कई-कई जगहों पर कार्यक्रम में शामिल होते हैं, जो कि एक बड़ा जनसंपर्क भी हो जाता है। इसके पहले ऐसा जरूर हुआ था कि विधानसभा का लंबा सत्र रहा हो, और गुरू घासीदास जयंती बीच में पड़ी हो। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ था कि जयंती के एक दिन बाद से सत्र शुरू किया जाए। और यह सत्र तो कुल चार दिनों का है जो कि जयंती के पहले निपटाया जा सकता था, या कि जयंती के दो-चार दिन बाद शुरू किया जा सकता था। ऐसे में कई विधानसभा सीटों के विधायकों को यह लग रहा है कि अगले चुनाव तो अगले बरस की जयंती के पहले ही निपट जाएंगे, इस बार का जनसंपर्क का यह मौका गया। 
    विधानसभा सत्र, कुल चार दिनों का, इतना छोटा है कि विधानसभा के एक बड़े अफसर ने कहा- चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात। दरअसल विधानसभा में काम करने वाले लोगों को महत्व कुल उतने ही दिनों मिलता है, जितने दिनों सत्र चलता है। उसके बाद तो एक सन्नाटा छाया रहता है अगले सत्र तक। सत्र खत्म होता है तो माहौल कुछ ऐसा हो जाता है कि जनवासे से बारात वापिस रवाना हो गई हो, और अब बस दरी उठाने, शामियाना खोलने वाले बचे हों। 

    यह राम को नहीं, पुलिस को दिखाने..
    सड़कों पर गाडिय़ों के पिछले या अगले शीशों पर भी कुछ लोग बड़े-बड़े अक्षरों में जयश्रीराम या ऐसा ही कोई दूसरा धार्मिक नारा लिखवा देते हैं। यह नारा राम या किसी दूसरे ईश्वर को दिखाने के लिए नहीं होता क्योंकि ईश्वर तो सर्वज्ञ है, और वह तो जानता ही है कि गाड़ी के भीतर वालों को दिल के भीतर क्या है, इसलिए उसे तो गाड़ी के बाहर कुछ लिखकर धोखा दिया नहीं जा सकता। ये नारे लिखे होते हैं ट्रैफिक पुलिस के लिए कि इन गाडिय़ों को छूने के पहले यह समझ ले कि वह सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों की गाड़ी है। धार्मिक नारों से परे गाडिय़ों की नंबर प्लेट पर भी एक पट्टी में केसरिया और हरा रंग लगाकर, या इन रंगों के टेप चिपकाकर यह साबित हो सकता है कि यह सत्तारूढ़ पार्टी की गाड़ी है। कुछ लोग गाडिय़ों पर प्रेस लिखवा लेते हैं, कुछ लोग वकील का मार्का चिपका लेते हैं, बहुत से लोग सरकार का नाम लिखवा लेते हैं, कई टैक्सी सर्विस के लोग गाडिय़ों पर ऑन गवर्नमेंट ड्यूटी लिखवा लेते हैं, और कुछ लोग इनसे भी अधिक होशियार होते हैं वे नंबर प्लेट पर वीआईपी लिखवा लेते हैं। पुलिस फतवे जारी करते रहती है, लेकिन ऐसी लिखी हुई गाडिय़ों को छूने का काम नहीं करतीं।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 19-Dec-2017

  • आज से छत्तीसगढ़ विधानसभा चार दिनों के लिए लग रही है। अब लगता है कि राज्य में न तो कोई दिक्कत रह गई है, और न ही सत्तारूढ़ भाजपा और कांगे्रस के बीच बातचीत की कोई जमीन भी विधानसभा के भीतर बची है। विधानसभा किन गिने-चुने मुद्दों पर खत्म हो जाएगी यह उसकी शुरू होने के पहले ही तय हो जाता है। सदन में बहस से अधिक तैयारी सदन के बहिष्कार की रहती है। लेकिन सत्ता और विपक्ष को छोड़ दें, तो शहर के लोगों का जीना भी मुहाल हो जाता है। विधानसभा को जाने वाले रास्तों पर सड़कों पर बल्लियां गाड़कर जुलूस या भीड़ को कई किलोमीटर दूर रोकने की तैयारी ऐसी चलती है कि इस हिस्से के बीच बसी आबादी का अपने घर आना-जाना मुश्किल हो जाता है। मंत्री, विधायक, और अफसर तो सरकारी गाडिय़ों में वहां पहुंच जाते हैं, लेकिन जनता जहां चाहे वहां रोक दी जाती है। विधानसभा जाने वाले रास्तों के किनारे बस्तियों में बसे लोग अब मनाने लगे हैं कि इसे भी उठाकर जल्द ही नया रायपुर ले जाएं, ताकि जीना आसान हो सके।


    सरकार में वैसे तो अधिक से अधिक खर्च करने का मिजाज रहता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के स्कूली बच्चों ने कुछ किफायत बरतने की एक पहल की है। उन्होंने प्लास्टिक के खाली डिब्बों को चीनी मिट्टी के यूरिनल की जगह इस्तेमाल करके अच्छी तरह काम करने वाला एक मॉडल बनाया है। और दिलचस्प बात यह भी है कि कबाड़ से जुगाड़ की मिसाल सामने रखते हुए स्कूल शिक्षा विभाग ने इसे ट्वीट भी किया है।


    अफसर और खबर
    आईएएस और आईपीएस अफसर बड़ी जल्दी खबर बन जाते हैं। पाठकों की दिलचस्पी जितनी रहती है, उससे अधिक दिलचस्पी अखबारों के उन रिपोर्टरों की होती है जो कि इन्हीं अफसरों के बीच काम करते हैं। इनको इस बात की बड़ी फिक्र रहती है कि किस अफसर के आने के कितने दिन बाद तक उसकी पोस्टिंग नहीं हुई और उसे बेकार-बेकाम बिठा रखा गया है। इन दिनों केंद्र से लौटे गौरव द्विवेदी को लेकर ऐसी ही फिक्र चल रही है। सरकार के काम के एक जानकार ने इस बारे में कहा कि जिन दिनों राज्य के सचिवों में बड़ा फेरबदल एक साथ हुआ, उसके पहले अगर वे छुट्टी से आ गए रहते, तो उसी वक्त उनकी पोस्टिंग हो जाती। अब शायद स्वास्थ्य सचिव सुब्रत साहू के पूरी तरह चुनाव आयोग में जाने के साथ ही फिर फेरबदल की गुंजाइश निकलेगी।

    चुनाव आयोग के सर्टिफिकेट को देखें तो उसमें किसी उम्मीदवार के निर्दलीय होने की संभावना को जगह ही नहीं दी गई है। अभी गुजरात में एक दलित नौजवान नेता जिग्नेश मेवाणी ने चुनाव जीता तो उसे आयोग की तरफ से जो प्रमाणपत्र मिला उसमें पार्टी के प्रत्याशी के कॉलम में पार्टी के नाम की जगह निर्दलीय लिखा गया है। तकनीकी रूप से देखें तो यह प्रमाणपत्र गलत इस हिसाब से है कि जिग्नेश मेवाणी को किसी निर्दलीय ने खड़ा नहीं किया है जैसा कि यह प्रमाणपत्र बताता है। अब ठीक ऐसा ही प्रमाणपत्र छत्तीसगढ़ में भी लागू है, और कोई भी निर्दलीय प्रत्याशी इसकी भाषा को चुनौती दे सकते हैं।

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Posted Date : 18-Dec-2017
  • आज सुबह दो खबरें एक साथ आईं। एक तो यह कि शुरूआती रूझान में गुजरात में कांगे्रस भाजपा से आगे थी। और इसके साथ-साथ दूसरी खबर यह आई कि चुनाव आयोग ने राहुल गांधी को दिया हुआ नोटिस वापिस ले लिया। सड़क किनारे की एक होटल में चुनावी नतीजे टीवी पर देखते बैठे लोगों के बीच दो और दो चार करके यह नतीजा निकाला कि चुनाव में कांगे्रस की लीड देखकर चुनाव आयोग ने तुरंत ही अपना नोटिस वापिस लेने राहुल गांधी के घर एक अफसर भेज दिया है। दूसरी बात लोगों की भीड़ के बीच यह निकली कि अगर ईवीएम मशीनों में छेड़छाड़ हुई होती तो भाजपा को हिमाचल जितनी सीटें गुजरात में जीतने से कौन रोक सकता था? और कांगे्रस को गुजरात में तमाम एक्जिट पोल से अधिक सीटें कैसे मिल जातीं? 
    दूसरी तरफ भाजपा के कुछ बड़े नेताओं के बीच दो बातों को लेकर राहत की सांस की आवाज आई। उन्हें यह तो अच्छा लगा कि गुजरात में भाजपा वापिस सरकार में आ गई। लेकिन उन्हें उतना ही अच्छा यह भी लगा कि वहां पार्टी को थोड़ा सा झटका भी लगा है। ऐसे झटके के बिना छत्तीसगढ़ में भी भाजपा के नेताओं को अगले चुनाव में राष्ट्रीय नेताओं से बहुत बड़ी मनमानी की आशंका थी। लेकिन भाजपा के शहर दफ्तर में एक नेता ने कहा- यहां बहुत से विधायकों की टिकट काटने की जरूरत है, और वैसी मनमानी से कम में काम चलेगा नहीं।

    छत्तीसगढ़ में एक जिले का नाम कोरिया जानकर बाहर के बहुत से लोग हैरान भी होते हैं। प्रदेश के बाहर के किसी के सामने यह चर्चा निकले कि कोरिया जाकर लौटे हैं, तो लोग यह पूछने लगते हैं कि नॉर्थ कोरिया, या साऊथ कोरिया? सरगुजा चूंकि छत्तीसगढ़ के भीतर एक सिरे पर बसा हुआ है, इसलिए उसकी जानकारी मैदानी इलाकों, या बाहर के इलाकों को कम रहती है। ऐसे में रायपुर से वहां गईं मंजीत कौर बल को एक ऐसा बोर्ड दिखा जिस पर जगह का नाम पटना था, जिला कोरिया था। अब किसी गैरछत्तीसगढ़ी को हैरान करने के लिए यह काफी है!

    दुखद रहा अंसारी का कार्यकाल

    डीजी रैंक के आईपीएस अफसर एमडब्ल्यू अंसारी अगले कुछ दिनों में रिटायर हो जाएंगे। उत्तरप्रदेश के रहवासी अंसारी का छत्तीसगढ़ में कार्यकाल सुखद नहीं रहा है। जबकि मप्र में वे कई अहम पदों पर रहे हैं। अंसारी ने सबसे पहले जशपुर के तत्कालीन कलेक्टर एमआर सारथी के खिलाफ यौन शोषण के आरोप की जांच की थी और कलेक्टर के खिलाफ रिपोर्ट देकर उस वक्त की जोगी सरकार की नाराजगी मोल ले ली थी। भाजपा सरकार के आने के बाद वे बस्तर आईजी बनाए गए, लेकिन जल्द ही विवादों में घिर गए। तत्कालीन डीजीपी ओपी राठौर से उनकी ठन गई थी। उन्हें हटाकर पुलिस मुख्यालय में पदस्थ कर दिया गया। 
    तत्कालीन गृहमंत्री ननकीराम कंवर भी उनके खिलाफ हो गए थे। उनकी पदोन्नति रोकने की भरपूर कोशिश हुई थी, लेकिन सीएम के हस्तक्षेप के बाद किसी तरह पदोन्नति हो पाई। सुनते हैं कि छत्तीसगढ़ में कोई अहम जिम्मेदारी न मिलने का आसार देखकर उन्होंने केन्द्र सरकार की तरफ रूख किया। हालांकि उनके शुभचिंतकों ने उन्हें प्रतिनियुक्ति पर न जाने की सलाह दी थी। लेकिन वे केन्द्र में जाकर फिर मुश्किल में फंस गए। यहां उनकी गैरमौजूदगी में ए.एन. उपाध्याय को डीजीपी बनने का मौका मिल गया। यदि अंसारी केन्द्र में न होते, तो उपाध्याय डीजी तक नहीं बन पाते। 
    सरकार ने केन्द्र से विशेष अनुमति लेकर उपाध्याय को डीजीपी बनाया था। चूंकि केन्द्र सरकार में भी अंसारी के खिलाफ शिकायतों की पड़ताल हो रही थी। इसलिए यहां वापिसी के बाद कोई अहम जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद वैसे भी नहीं रह गई थी। ऐसे में रिटायर होने के 15 दिन पहले ही प्रभार छीनकर उन्हें चलता कर दिया गया। 

     

    छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता-प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव आमतौर पर समझदारी की बात करते हैं, लेकिन मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता खत्म करने के अभियान में वे भी जुट गए हैं। उन्होंने बयान दिया कि अब चुनाव बैलेट पेपरों से कराया जाए, न कि ईवीएम मशीनों से। सुना है कि इसके बाद सरगुजा इलाके के बहुत से पेड़ सिंहदेेव के राजमहल पहुंचे और उन्होंने वहां आत्महत्या की कोशिश की, कि बैलेट पेपरों के लिए कागज बनाने को क्या उनकी आने वाली पीढिय़ों को भी खत्म कर दिया जाएगा? 

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Posted Date : 17-Dec-2017
  • व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन चेम्बर ऑफ कॉमर्स के चुनाव पर राजनीतिक दलों की नजर है। विधानसभा चुनाव के पहले चेम्बर चुनाव के नतीजे कुछ हद तक व्यापारियों का रूख साफ कर सकते हैं। यदि चेम्बर में एकता या विकास पैनल का कब्जा रहा, तो यह आंकलन लगाया जा सकता है कि व्यापारी अभी भी भाजपा के साथ है। जबकि प्रगति पैनल के चुनाव जीतने पर व्यापारियों का सत्तारूढ़ दल से मोहभंग होने का संकेत जा सकता है। व्यापारियों का यह चुनाव लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव की स्टाईल से लड़ा जा रहा है। तीनों पैनल के प्रत्याशियों ने अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए रैलियां भी निकाली। सड़कों पर पोस्टर भी लगे, इश्तहार भी छपे। यह चुनाव भी जातिवाद से अछूता नहीं रहा। चर्चा है कि कुछ प्रत्याशियों ने मीडिया को भी मैनेज करने की भरपूर कोशिश की। चूंकि आम चुनाव की तरह पेड न्यूज की मानिटरिंग के लिए कोई कमेटी तो थी नहीं, सो कुछ लोगों ने इसका भरपूर फायदा उठाया। वोटरों को लाने ले जाने के लिए लक्जरी गाडिय़ों के साथ-साथ आलीशान होटलों में ठहरने के लिए कमरे बुक कराए गए हैं। चेम्बर में प्रत्याशियों को अधिकतम 10 लाख खर्च करने की सीमा तय की गई थी। लेकिन चुनाव खर्च की सीमा लांघकर पैसे बहाए गए। कुल मिलाकर यह चुनाव पिछले चुनावों से एकदम अलग रहा और चुनाव परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन इस चुनाव में कई आम व्यापारी खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। भाजपा के एक बड़े नेता ने इस चुनाव को बारीकी से देखते हुए कहा कि उनकी पार्टी के विधायक श्रीचंद सुंदरानी ने अपने-आपको बिना मतलब दांव पर लगा दिया है। उनका उम्मीदवार जीत जाए, तो भी विधायक की टिकट से अधिक उन्हें कुछ मिलना नहीं है, और अगर उनका उम्मीदवार हार जाए, तो उन्हें नुकसान जरूर हो सकता है।

    साठे पर पाठे, पर बेरोजगार
    देश में एक विख्यात मॉडल रहे मिलिंद सोमन की सबसे पहले चर्चा तब हुई थी जब उन्होंने एक मॉडल युवती, मधु सप्रे के साथ एक ऐसी तस्वीर इश्तहार के लिए खिंचवाई थी जिसमें दोनों के बीच एक अजगर भी लिपटा हुआ था, और इन दोनों ने कोई भी कपड़े पहने हुए नहीं थे। यह तस्वीर टफ ब्रांड के जूतों के इश्तहार के लिए 1995 में खींची गई थी, और बाद में इसे लेकर बड़ा हंगामा हुआ था, और इसे अश्लीलता और नग्नता के मुकदमे भी झेलने पड़े थे। लेकिन बाद के बरसों में मिलिंद सोमन का नाम बड़ी लंबी-लंबी दौड़ के लिए विख्यात हुआ जिसमें उन्होंने बिना जूते-चप्पल के नंगे पैर अहमदाबाद से मुम्बई तक की दौड़ लगाई थी। पचास बरस का होने पर भी उन्होंने ऐसा हौसलामंद काम किया था। इसके अलावा वे दुनिया की एक विख्यात, और सबसे मुश्किल आयरनमैन स्पर्धा में हिस्सा लिया था जिसमें तैरना, साइकिल चलाना, और दौडऩा, तीनों करना पड़ता है। इधर रायपुर में साठे पर पाठा दिखने वाले रिटायर्ड आईएएस दिनेश श्रीवास्तव हैं जो कि रोजाना कुछ घंटे अपने बदन पर लगाते हैं, और आज भी उन्होंने नया रायपुर में 21 किलोमीटर की हाफ मैराथन पूरी की है। 
    वे ऐसी लंबी दौड़ या लंबे चलने के मुकाबलों में नौजवान छोकरों को भी पीछे छोड़कर लोगों के लिए एक मिसाल बने रहते हैं। आज सुबह की इनकी यह तस्वीर खासी मेहनत की तसल्ली चेहरे पर दिखाती है। लेकिन इतनी फिटनेस, और साफ-सुथरी इमेज के बावजूद सरकार ने उन्हें रिटायरमेंट के बाद किसी और मेहनत के लायक नहीं पाया, यह अफसोस की बात है। 


    दिमागी शांति का राज
    मुख्य सचिव विवेक ढांड को लोगों ने आपा खोते शायद ही देखा होगा। जो लोग मंत्रालय में उनके कमरे में जा चुके हैं, उनको सीएस की दिमागी शांति की एक वजह समझ आ जाती है। उनके कमरे से लगा हुआ एक ऐसा हरा-भरा टैरेस गार्डन है जिसका इंच-इंच हरे-भरे पत्तों से भरा है, और बीच में गौतम बुद्ध की शांत मुद्रा की प्रतिमा रखी हुई है। उनकी कुर्सी पर बैठे-बैठे वह पूरा उद्यान दिखता है और पौधों की हरियाली दिमाग को शांत तो रखती ही है। राज्य के बड़े अफसरों के कम से कम दो दफ्तर ऐसे हैं जिनमें ऐसा टैरेस गार्डन है। अभी मंत्रालय में ऐसा एक दफ्तर महीनों से खाली पड़ा है क्योंकि एन. बैजेंद्र कुमार के जाने के बाद से वह कमरा किसी और को दिया नहीं गया। उस कमरे में भी ऐसा टैरेस गार्डन है, लेकिन मुख्य सचिव के बगीचे जितना हरा-भरा नहीं है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 16-Dec-2017
  • भाजपा की एक महिला नेत्री के घर महाभारत चल रहा है। महिला नेत्री सरकार में प्रमुख पद पर है। कुछ समय पहले तक महिला नेत्री के पति सारा राजनीतिक काम देखते थे। हिसाब-किताब भी वही रखते थे। विभागीय काम के सिलसिले में आए लोगों के लिए पति से मिलना जरूरी था। पति की हरी झंडी के बाद ही काम संभव हो पाता था। शुरू के तीन साल तो पति की एकतरफा चली लेकिन अब परिस्थितियां एकदम बदल गई है। पुत्र बालिग हो गया है। उसने सरकारी कामकाज में दखल देना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ समय से उसने पिता को भी पीछे छोड़ दिया है। अब हाल यह है कि पुत्र की सिफारिश के बाद ही कोई काम हो पाता है। महिला नेत्री के घर में ही विवाद शुरू हो गया है। नेत्री के पति और पुत्र आपस में झगड़ रहे हैं। दोनों में से कोई पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। सुनते हैं कि कुछ लोगों ने कार्यक्षेत्र अलग-अलग करने का सुझाव देकर झगड़ा खत्म करने की दिशा में दिया। लेकिन पुत्र इसके एकदम खिलाफ बताए जा रहे हैं। कहावत है कि जब बेटे का पांव बाप के जूते में फिट आने लगे, तो उसे दोस्त मान लेना ठीक रहता है।
    फिलहाल बाप-बेटे का यह झगड़ा देखकर भाजपा के लोगों को कुछ साल पहले मंत्री रहे एक नेता और उनके बेटे के बीच हुए झगड़े की याद आ रही है। उस मामले में भी मंत्री की करीबी एक महिला, और मंत्री के बेटे की बीच वसूली और उगाही की बड़ी नोंच-खसोट चल रही थी, और बात मारपीट तक पहुंची थी। 

    पेड़ भी बोलते हैं
    अभी बीबीसी में एक नई टीवी डॉक्यूमेंट्री बनाई है जिसमें एक ऑस्कर विजेता अभिनेत्री जूडी डेंच पेड़ों की आवाज सुनते हुए दिखती हैं। वे पिछले तीस बरस से पेड़ों के बीच वक्त गुजारते आई हैं, और एक किस्म से उन्हीं के बीच जीना पसंद करती हैं। बीबीसी की इस फिल्म में यह दिखाया गया है कि किस तरह पेड़ एक अलग भाषा में बोलते हैं, और किस तरह वे एक-दूसरे से भी बातें करते हैं। इस फिल्म की खबर पढ़कर याद आया कि रायपुर में आधी सदी तक आयुर्वेद पद्धति से इलाज करने वाले एक चिकित्सक जब अपनी दवाईयां बनाने के लिए पेड़ों की जड़, छाल, फल, या पत्ते लेने के लिए जाते थे, तो पेड़ों के करीब खड़े होकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करते थे, अपना मकसद बताते थे, और पेड़ों से अनुमति मांगते थे। अनुमति मिलने पर ही वे उन पेड़ों से उनके हिस्से लेते थे। अब यह अनुमति उन्हें अपने मन में पेड़ से सीधे मिलती थी, या कभी-कभी नहीं भी मिलती थी। अनुमति न मिलने पर वे बिना फल-फूल, पत्ते लिए लौट आते थे, और बाद में फिर कभी कोशिश करते थे। उनकी इस सोच और उनके इस तरीके पर आसपास के लोगों को भी यह भरोसा नहीं होता था कि पेड़ भी कभी कोई अनुमति दे सकते हैं। अब जब ये बातें धीरे-धीरे वैज्ञानिक आधार पर स्थापित होती चल रही हैं तो यह समझ आता है कि विज्ञान अभी जो समझा नहीं पा रहा है, वह जरूरी नहीं है कि हो ही नहीं। कुदरत की सीमाएं विज्ञापन की सीमाओं से बहुत अधिक बड़ी हैं, और फैली हुई हैं। छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी-राज्य में परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों वाले बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि प्रकृति के तरह-तरह के रूपों का उपयोग करते हैं, यह अलग बात है कि शहरी लोग और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां उन्हें नीम-हकीम बताकर खारिज कर देती हैं। 

    भारी पड़ सकती है आशिकी
    प्रदेश के एक पुलिस अफसर को आशिकी भारी पड़ सकती है। अफसर के चक्कर में सरकार से बाहर की एक महिला के घर में कलह मच गया है और पति से अलगाव हो चुका है। यह अफसर उस महिला को अपनाने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि उसे अपने घर की फिक्र है। शुरूआत में समझा-बुझाकर महिला को अपने से दूर करने की कोशिश की लेकिन बात अब बिगड़ गई है। अफसर के विरोधियों ने इसकी शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में भी कर दी है। आयोग जल्द ही इसको लेकर सरकार से जानकारी ले सकता है। अब तक सारी बातें सुनी-सुनाई थी, और टीवी-अखबारों तक सीमित थीं, लेकिन मामले की जांच शुरू होने से अफसर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 

    भारी पड़ सकती है आशिकी
    प्रदेश के एक पुलिस अफसर को आशिकी भारी पड़ सकती है। अफसर के चक्कर में सरकार से बाहर की एक महिला के घर में कलह मच गया है और पति से अलगाव हो चुका है। यह अफसर उस महिला को अपनाने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि उसे अपने घर की फिक्र है। शुरूआत में समझा-बुझाकर महिला को अपने से दूर करने की कोशिश की लेकिन बात अब बिगड़ गई है। अफसर के विरोधियों ने इसकी शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में भी कर दी है। आयोग जल्द ही इसको लेकर सरकार से जानकारी ले सकता है। अब तक सारी बातें सुनी-सुनाई थी, और टीवी-अखबारों तक सीमित थीं, लेकिन मामले की जांच शुरू होने से अफसर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 


    इंसाफ की बजाय मरहम ढूंढें
    बीती रात राजधानी रायपुर में भिलाई के एक अरबपति कारखानेदार के परिवार की महंगी कार कई लोगों को कुचलते हुए, जख्मी करके भाग निकली, और फिर गाड़ी सुनसान पड़ी मिली। राजधानी में पुलिस का हाल यह है कि किसी भी शिकायत के सामने आने पर सबसे पहले यह तौल लिया जाता है कि शिकायत कितने ताकतवर के खिलाफ है। पुलिस के बड़े अफसरों का यह मानना है कि राजधानी में हर कोई वीआईपी है, और हर कोई राजनीतिक ताकत रखते हैं, इसलिए उसे देखते हुए ही कार्रवाई करनी पड़ती है। पुलिस का ऐसा हाल सत्तारूढ़ नेताओं और दूसरे किस्म के ताकतवर लोगों के लिए तो अच्छा है, लेकिन जो लोग सड़कों पर कुचले जा रहे हैं, जिनके खिलाफ जुर्म हो रहे हैं, उन्हें पुलिस के दिमाग पर यह वीआईपी-फोबिया नहीं सुहाता। यहां पर किसी मुजरिम पर कार्रवाई की गुंजाइश तभी निकल सकती है जब उसके राजनीतिक कनेक्शन न हों। और तो जाहिर है ही कि हर अरबपति के कुछ न कुछ राजनीतिक कनेक्शन रहते ही हैं इसलिए ऐसी कार से जख्मी लोगों को इंसाफ की बजाय मरहम ढूंढना चाहिए।  rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 15-Dec-2017
  • पिछले दिनों एक नामी उद्योगपति के यहां शादी समारोह की जमकर चर्चा रही। इसमें दिग्गज राजनेताओं से लेकर उद्योग-व्यापार जगत के साथ-साथ साधु-संतों और प्रशासनिक अफसरों का भी जमावड़ा था। मीडिया जगत के कई प्रमुख लोग मौजूद थे। लोगों के स्वागत सत्कार में कोई कमी बाकी नहीं थी। सुनते हैं कि जलसे में भव्य आतिशबाजी की भी तैयारी की गई थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। सरकार ने रायपुर समेत 6 शहरों में प्रदूषण रोकने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें से एक 31 जनवरी तक पटाखे फोडऩे पर प्रतिबंध लगाना भी शामिल है। यहां भी शादी समारोह में आतिशबाजी के लिए अनुमति मांगी गई थी, लेकिन प्रशासन ने साफ तौर पर मना कर दिया। अलग-अलग स्तरों पर इसके लिए प्रयास किया गया, लेकिन विभाग ने चेता दिया कि सरकार के निर्देशों का उल्लंघन हुआ तो कार्रवाई की जाएगी। सो, बड़े लोगों की मौजूदगी में भव्य जलसा बिना धूम-धड़ाके के निपट गया। 


    दारू से अब एमसीएक्स की ओर

    एमसीएक्स धंधे के दो बड़े ब्रोकर मन्नू नत्थानी और नितिन चोपड़ा  के खिलाफ कार्रवाई के बाद कारोबार का स्वरूप बदल गया है। सुनते हैं कि बड़े शराब कारोबारी अब इस धंधे में शामिल हो गए हैं। आबकारी पॉलिसी बदलने के बाद शराब कारोबार का सरकारीकरण हो गया है। ठेकेदार शराब के धंधे से ऑउट हो गए हैं, सो उन्होंने एमसीएक्स का सहारा लिया है। चर्चा यह है कि राजनांदगांव इसका बड़ा केन्द्र बन गया है। किसी कोठारी ने तो बताते हैं कि तीन साल में 5 सौ करोड़ पीट लिए हैं। इस कारोबार को पुलिसिया सहयोग भी मिल रहा है और अब यह फल-फूल रहा है। 

    कचरे पर भी भगवा-केसरिया!

    राजधानी रायपुर में लगे हुए कचरे के डिब्बों पर सभी जगह हिन्दी के हिज्जे गलत हैं। कहीं सूखा कचरा को सुखा कचरा लिख दिया गया है, तो कहीं भाषा की और कई गलती है। आते-जाते बच्चे अब तक सिर्फ सड़कों के बड़े-बड़े बोर्ड से हिज्जों की गलती सीखते थे, अब वे कचरों के डिब्बों से भी अलग गलतियां सीखेंगे। इसके साथ-साथ कचरे के बहुत से डिब्बे ऐसे भगवे-केसरिया रंग के लगाए गए हैं कि जिन्हें देखकर कई लोग भड़क भी रहे हैं कि इस रंग का ऐसी जगह इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है? रायपुर के कमिश्नर के दफ्तर के ठीक बाहर भी ऐसा ही केसरिया कचरा-डिब्बा लगा है।


    सेक्स ने दुनिया के तमाम प्राणियों को जिंदा रखा है, और सीडी शब्द को भी

    समय के साथ-साथ टेक्नॉलॉजी जिंदगी को बदलते जाती है। जिन बच्चों ने अपनी शुरूआत ही मोबाइल फोन से की है उन्हें फोन के रिसीवर नाम के हिस्से से कोई कल्पना नहीं हो पाएगी। एक वक्त था जब बड़ा सा टेलीफोन बजता था, लोग उसका रिसीवर उठाते थे, और बात करते थे या किसी को बुलाने के लिए उसे अलग रखते थे। अब वह सब खत्म हो गया, और लोग रिसीवर नहीं उठाते पूरा फोन ही उठाते हैं। इसी तरह ग्रामोफोन रिकॉर्ड की टेक्नॉलॉजी खत्म हुई और लोगों ने तवे जैसे रिकॉर्ड को गर्म पानी में मोड़कर उससे फूलदान बनाकर दीवारों पर टांगना शुरू कर दिया था, और अब तो वैसे फूलदान भी कबाड़ के कब्रिस्तान में कबके दफन हो चुके हैं। ऐसे में सीडी की टेक्नॉलॉजी पहले तो डीवीडी पर पहुंची, और फिर पेनड्राइव या थम्बड्राइव कही जाने वाली छोटी सी एक चीज पर आ गई। अब मजे की बात यह है कि स्टिंग ऑपरेशन, और सेक्स-स्कैंडल ही कुछ गिनीचुनी ऐसी बातें रह गई हैं जिनकी वजह से सीडी शब्द जिंदा है। अगर ये दोनों बातें न होतीं, तो लोगों को सीडी भूल चुकी होती। 
    अब अगर सेक्स की फिल्म पेनड्राइव पर भी है, या कि फोन के मेमोरी चिप पर भी है, तो भी वह कहलाती सेक्स-सीडी ही है। जिस तरह कुदरत ने प्राणियों की हर नस्ल को सेक्स ने जिंदा रखा हुआ है, सेक्स ने ही पीढिय़ों को आगे बढ़ाया हुआ है, उसी तरह सीडी को भी सेक्स ने जिंदा रखा है। और छत्तीसगढ़ की राजनीति में 2017 के साल में सबसे अधिक बयानबाजी और राजनीतिक झगड़े के पीछे भी सीडी ही रही है। ऐसा लगता है कि अपना अस्तित्व खत्म हो जाने के बाद भी सीडी भाषा और जुबान में सेक्स की वजह से ही जिंदा रहेगी। जिस तरह अब कोई फिल्म फिल्म के इस्तेमाल से शूट नहीं होती, अब कैमरों में सेलुलाईड फिल्में नहीं लगतीं, फिर भी डिजिटल कैमरों से बनने वाली फिल्मों को फिल्म ही कहना जारी है, इसी तरह सीडी भी शायद दुनिया के आखिरी सेक्स-स्कैंडल तक प्रचलन में रहेगी, सिर्फ अपने नाम के साथ, अस्तित्व खत्म हो जाने के बाद भी।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 14-Dec-2017
  • कोरिया जिले के एक आला अधिकारी ऐसे हंै जो बिना गाली के कोई बात नहीं करते। जनसमस्या शिविर हो या सार्वजनिक स्थान या बैठक, अबे साले ...से शुरू करते हैं। गाली खाने में किस मातहत अधिकारी का कब नंबर लग जाए कोई नहीं जानता। जब गाली  ऐसी कि पूरी सरकार शरमा जाए। मातहत अधिकारी भी चुप्पी साधे गाली खाते रहते है। कुछ दिन पहले एक कर्मचारी संघ ने जब इसका विरोध किया था, तब उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी। फिर भी गाली देने की उनकी लत टूटी नहीं है। अपने को सीएम का खास बताते हुए गाली के साथ यह बताना भी नहीं भूलते कि उन्हें दो साल कोई नहीं हटा सकता। 
    गाली देते इन साहब को यह भी ध्यान ही नहीं रहता है कि बैठक में महिलाएं भी हंै, जब शुरू होते हैं बिना रूके 10 मिनट तक गरियाते रहते हंै।  कुछ दिन पहले एक इंजीनियर को बाथरूम में बंद करने की धमकी के साथ जमकर अपशब्द कह डाले।
    हाल ही में सोशल मीडिया में अधिकारियों की बैठक में एक अधिकारी को जमकर गाली गलौज देते हुए उनकी एक वीडियो भी वायरल हुई है। वहीं उनके द्वारा मंगाई 4 रजाई की खबरें भी सोशल मीडिया में तैरती दिखीं। दरअसल, एक अधिकारी से 4 रजाई मंगाई, 4 रजाई की जरूरत पर तो सवाल खड़े हुए ही, मजे की बात तो यह कि जिस अधिकारी से इसकी मांग की गई उसने एक ही भिजवाई, बची तीन रजाई गुजरात चुनाव के परिणाम के बाद देने को कह दिया। 

    पहले एक लतीफा चलता था जिसमें एक सरकारी फॉर्म में मांगी गई जानकारी को भरते हुए एक मासूम आदमी ने सेक्स के कॉलम में 'कभी-कभी' लिख दिया था। अब सोशल मीडिया पर एक बैंक की ऐसी पर्ची सामने आई है जिसमें रकम जमा करने वाले ने बैंक की स्लिप पर राशि (रकम) के कॉलम में कन्या राशि लिख दिया है।


    दफ्तर लेकर भटकती आप
    आम आदमी पार्टी के गठन के बाद यहां भी ताम-झाम के साथ यहां भी प्रदेश इकाई अस्तित्व में आई। दिल्ली में पार्टी की सरकार है और वहां के कई मंत्री यहां प्रदेश दौरे पर आ चुके हैं। लगातार संगठन को मजबूत करने की बातें हो रही है। कई मुद्दों पर धरना-प्रदर्शन भी हुआ। कुल मिलाकर पार्टी ने प्रदेश में तीसरी ताकत होने का अहसास कराने की कोशिश की। लेकिन पार्टी का अंदरूनी हाल ठीक नहीं है। कुछ नेताओं को वाद-विवाद के चलते किनारे लगा दिया गया है। 
    अब सरकार बदलने की कोशिश में जुटे नेता पार्टी के लिए दफ्तर की ही तलाश में जुटे हैं। प्रदेश इकाई का गठन 5 साल पहले हुआ था। तबसे अब तक 5 बार दफ्तर बदले जा चुके हैं। सबसे पहले राजातालाब इलाके में प्रदेश दफ्तर खोला गया। इसके बाद शैलेन्द्र नगर फिर राजकुमार कॉलेज मार्ग, पचपेढ़ी नाका के बाद अब गौरवपथ के समीप पार्टी दफ्तर खोला गया है। पार्टी के ही असंतुष्ट लोग कहने लग गए हैं कि पांच साल में दफ्तर ही दुरूस्त नहीं हो पाया है तो दिल्ली की तरह कोई बड़ी उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन कुछ लोगों का यह भी कहना है कि ईमानदारों के दर-दर भटकने में कुछ भी अटपटा नहीं, अगर बेईमान होते तो दफ्तर लेकर भटकते क्यों?


    पाखंड पर तैरकर आगे बढ़ता देश
    भारत के टीवी चैनलों पर सरकार ने यह रोक लगाई है कि सुबह 6 से रात 10 के बीच कंडोम के इश्तहार नहीं दिखाए जाएंगे ताकि बच्चे उससे बच सकें। इस पर लोगों का कहना है कि कंडोम का उपयोग तो लोग अपनी पसंद से एक स्वाभाविक सेक्स के लिए करते हैं। बलात्कार करने वाले तो इसका इस्तेमाल करते नहीं, और बलात्कार की खबरों पर किसी तरह का काबू नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि बच्चे रात-दिन पूरे वक्त किसी भी समय बलात्कार की खबरें तो देखते ही रहेंगे, सावधानी से स्वाभाविक सेक्स की सीख से परे रहेंगे। कुछ लोगों ने एक दूसरी बात कही कि बच्चों को बुरे असर से बचाना हो, तो देश के बहुत से नेताओं के बयानों पर भी रोक लगानी चाहिए ताकि बच्चे दूसरी जाति या दूसरे धर्म से नफरत से बचें। इस देश में लगने वाली रोकों को देखें तो लगेगा कि अब पाखंड पर सवारी करके आगे बढ़ता देश है।

    जन्मदिन के मायने
    कुछ समय पहले तक प्रदेश भाजपा संगठन में बेहद ताकतवर रहे रामप्रताप सिंह ने दो दिन पहले अपना जन्मदिन धूमधाम से मनाया। सरकार के मंत्रियों के अलावा कई विधायक और पार्टी पदाधिकारी उन्हें बधाई देने पहुंचे थे। संगठन के मुख्य धारा से हटने के बाद रामप्रताप सिंह के बंगले में पहली बार रौनक देखने को मिली।
    सुनते हैं कि खुद रामप्रताप सिंह ने धूमधाम से अपना जन्मदिन मनाना चाह रहे थे। महामंत्री (संगठन) के पद से हटने के बाद उनकी पार्टी में पूछपरख नहीं रह गई है। हालांकि हाईकमान उन्हें बंगाल या ओडिशा भेजना चाह रहा था, लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। वे सरकार के साथ काम करने का मोह नहीं छोड़ पा रहे थे। आखिरकार उन्हें संगठन के पद से हटाकर उनकी जिम्मेदारी पवन साय को सौंप दी गई। रामप्रताप को एक ऐसे निगम के अध्यक्ष बनाया गया है, जिसका बजट बहुत कम है। अलबत्ता, पुराने संपर्कों के चलते सुख-सुविधाएं जरूर मिल गई हैं। विधानसभा चुनाव में अब सालभर से कम समय बाकी रह गए हैं। ऐसे में वे फिर संगठन में अपनी भूमिका चाहते हैं। इसके बीच जन्मदिन आयोजन को इससे जोड़कर देखा जा रहा है।    rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 13-Dec-2017
  • पूर्व केंद्रीय मंत्री रमेश बैस चुपके-चुपके सेक्स-सीडी कांड में फंसे पत्रकार विनोद वर्मा से जेल में मुलाकात कर आ गए। हालांकि बैस ने मीडिया से चर्चा में विनोद वर्मा से मुलाकात का खंडन किया है, लेकिन जेल ने इसकी पुष्टि की है। पूरी भाजपा विनोद वर्मा को सेक्स-सीडी कांड का सूत्राधार मान रही है। ऐसे में बैस की उनसे जेल में मुलाकात की पार्टी हल्कों में जमकर चर्चा है। सुनते हैं कि बैस काफी सोच विचार कर ही विनोद वर्मा से मिलने  सेंट्रल जेल गए थे। पिछले दिनों विनोद वर्मा की गिरफ्तारी के खिलाफ मनवा कुर्मी समाज ने विरोध प्रदर्शन किया था। कांग्रेस से जुड़े कुर्मी समाज के लोग तो इसमें शामिल हुए, लेकिन भाजपा के कुर्मी नेता इससे दूर रहे। 
    बैस भी बुलावे के बावजूद धरना-प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए, लेकिन उनके लोग इस पर निगाह रखे हुए थे। बैस भाजपा की राजनीति में हाशिए पर हैं। साथ ही उनके अपने रायपुर लोकसभा क्षेत्र के पार्टी के चारों विधायक उन्हें कोई खास पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में वे पार्टी के भीतर तो विरोध तो झेल रहे हैं, लेकिन अब उसके साथ-साथ समाज का भी विरोध नहीं चाहते हैं। यही वजह है कि वे पार्टी लाइन से हटकर विनोद वर्मा से मिलने चले गए। बैस के लोगों को भरोसा है कि जब लोकसभा चुनाव के समय पार्टी के विरोधी नेता उनकी टिकट काटने के लिए दबाव बनाएंगे तो बैस को समाज का समर्थन रहेगा। आज हालत यह है कि देश के सबसे वरिष्ठ आधा दर्जन भाजपा सांसदों में से एक होने के बावजूद उन्हें न मंत्रिमंडल में लिया गया, और न ही संगठन में किसी जगह रखा गया। आसार ऐसे भी हैं कि अगली बार उन्हें लोकसभा का उम्मीदवार भी न बनाया जाए।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस के वक्त का राज
    कांग्रेस पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का समय कई बार आगे-पीछे होते रहता है। इस बारे में पूछने पर कांग्रेस प्रवक्ता का कहना था कि कभी भाजपा के मंत्रियों की प्रेस कॉन्फ्रेंस देखकर, फिर उसमें कही बातों पर हमला तय करने के लिए समय रखना पड़ता है, और उसके बाद फिर मीडिया के सामने आना मुमकिन हो पाता है। अब भाजपा के मंत्रियों के अलावा अमित जोगी और अजीत जोगी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के आसपास भी कांग्रेस अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं रखती है, क्योंकि उस वक्त मीडिया की इतनी मौजूदगी भी नहीं होगी, और जोगियों की कही बातों का जवाब भी देना पड़ेगा। फिलहाल जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, दोनों-तीनों पार्टियों का मीडिया से रूबरू होना अब तकरीबन रोज की बात होने जा रही है।

    अब तेरा क्या होगा कालिया?
    कोरिया मनेन्द्रगढ़ की ग्राम पंचायत नागपुर में कल 12 दिसंबर को बिजली तिहार में श्रम मंत्री भइयालाल राजवाड़े एक बार फिर चर्चा में रहे। मंच पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तस्वीर नीचे और ठीक उसके ऊपर श्रम मंत्री भइयालाल राजवाड़े सहित कई भाजपा पदाधिकारी व कलेक्टर ने  अपना उद्बोधन दिया। बापू की तस्वीर इस तरह रखेे जाने पर कई लोग हैरानी जाहिर करते नजर आए। 
    इधर उटपटांग बयानों से चर्चा में रहने वाले श्रम मंत्री राजवाड़े ने फिल्म शोले की तर्ज पर कांग्रेस को कालिया बना डाला। उन्होंने कहा कि धान बोनस तिहार हो गया, तेंदूपत्ता बोनस तिहार और अब बिजली तिहार हो गया, कांग्रेस, अब तेरा क्या होगा कालिया?
    राजवाड़े के बयान पर कांग्रेस उपाध्यक्ष गुलाब कमरो का कहना था कि उनके भाषणों से उनके संस्कारों का पता चलता है। इस मंत्री ने सबसे ज्यादा बार राज्य की महिलाओं पर भद्दी टिप्पणी कर अपमानित किया, बीते दिनों जूते पहने ही धरती माता की पूजा कुर्सी पर बैठकर की।
    मुख्यमंत्री की ढाल
    छत्तीसगढ़ की तरह ही खनिज आधारित राज्य झारखंड में पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा, पूर्व मुख्य सचिव, और बड़े आईएएस अफसरों को एक अदालत में कुसूरवार ठहराया गया है, और इन सबको कल सजा सुनाई जाएगी। खनिज आधारित दूसरा राज्य छत्तीसगढ़ है जिसमें अभी तक सरकार किसी भी मामले-मुकदमे से पूरी तरह बची हुई है। इस बचने के पीछे मुख्यमंत्री की अपनी समझ तो है ही, इसके अलावा सरकार के जानकार लोग बताते हैं कि उनके करीबी एक मौजूदा अफसर और एक रिटायर्ड अफसर ढाल बनकर रहते हैं, और उनसे कोई भी गलत फैसला होने भी नहीं देते। हर फाईल पर इनके दस्तखत हों, यह जरूरी तो नहीं है, लेकिन हर फाईल पर इनकी राय अलग से सीएम को मिल जाती है, और सरकार मुख्यमंत्री के स्तर पर किसी चूक से बच जाती है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 12-Dec-2017
  • सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर देश भर में हाईवे के किनारे के शराबखाने बंद हुए, तो छत्तीसगढ़ में भी ऐसे दर्जनों बार बेकार हो गए। फिर सुप्रीम कोर्ट ने म्युनिसिपल इलाकों के भीतर हाईवे पर बार की छूट दे भी दी, तो भी छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने एक पुराने केबिनेट फैसले को गिनाते हुए बार के नए लाइसेंस देने से मना कर दिया, और कहा कि केवल तीन सितारा या उससे ऊंची होटलों को ही बार का लाइसेंस मिलेगा। जाहिर है कि दारू पीने का हक गरीबों को या मध्यम वर्ग को क्यों होना चाहिए? वे सड़क किनारे या बाग-बगीचे में दारू पी लेते हैं, और गिरफ्तारी का खतरा भी उठाते हैं। रायपुर के एक रिंग रोड पर ऐसे ही बंद हुए एक बार में मालिक ने बिना शराब वाला रेस्तरां खोल लिया, और खाने को भी पहले से बहुत अधिक उम्दा बना दिया। लेकिन एक नई स्टाईल पेश करने के लिए कोल्ड कॉफी या इस तरह की कुछ और चीजों को परोसने के लिए दारू की अद्धी या पौव्वा की बोतल इस्तेमाल होने लगी, फ्री की क्रॉकरी, और नई स्टाईल भी। 

    चेम्बर चुनाव के बाद का चुनाव
    क्या चेम्बर अध्यक्ष अमर परवानी रायपुर उत्तर सीट से भाजपा टिकट के मजबूत दावेदार हो सकते हैं? सुनते हैं कि सिंधी समाज के कुछ प्रमुख नेता श्रीचंद सुंदरानी की जगह परवानी को प्रत्याशी बनाने पर जोर दे रहे हैं। चेम्बर चुनाव के बाद बकायदा इसके लिए मुहिम चलाने की योजना बनाई गई है। सुंदरानी ने हाल ही में चेम्बर प्रत्याशी के चुनाव प्रचार के दौरान भाटापारा में व्यापारियों की सभा में अविभाजित मप्र के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की तारीफों के पुल बांधे थे और उन्हें अब तक के मुख्यमंत्रियों में व्यापारियों का सबसे ज्यादा हितैषी बताया था। सभा का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ है। इसके साथ-साथ अखबारों में छपी सुंदरानी के बयान की कतरनें राज्य से लेकर केन्द्रीय नेताओं को भेजने की तैयारी की जा रही है। भाजपा के कई प्रमुख नेता सुंदरानी की बयानबाजी से वैसे ही खफा हैं। अब उनके विरोधी यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे पार्टी के प्रति वफादार नहीं रह गए हैं और समाज भी उनके खिलाफ हो गया है। ऐसे में उनका तर्क है कि सुंदरानी की जगह समाज से परवानी को प्रत्याशी बनाना चाहिए। कुल मिलाकर चेम्बर चुनाव के बाद सुंदरानी के खिलाफ मुहिम तेज होने के आसार हैं। चेम्बर चुनाव तो निपट जाएगा, लेकिन अगला विधानसभा चुनाव सामने खड़ा रहेगा।

    शिक्षाकर्मी के बाद अब विद्यादानी
    एक तरफ सरकार अभी शिक्षाकर्मियों की एक बड़ी दिक्कत और हड़ताल से ठीक से उबर भी नहीं पाई है, कि दूसरी तरफ राज्य में एक अफसर ने सरकार के लिए एक नया बवाल खड़ा कर दिया है। जिला पंचायत सरगुजा में शिक्षाकर्मी हड़ताल के दौरान सरकार ने जिन पढ़े-लिखे नौजवानों को विद्यादानी के रूप में नि:शुल्क पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया था, उन लोगों को हड़ताल के बाद भी काम से अलग करने से जिला पंचायत सीईओ ने मना कर दिया है। अपने मातहत सभी जनपद पंचायत अफसरों को आदेश दिया है कि विद्यादानियों का काम जारी रखा जाए, और इस बारे में शासन से मार्गदर्शन प्राप्त किया जा रहा है। वहां पर ऐसे लोगों को जुबानी यह बताया गया है कि सरकार से उन्हें सेवा में रखने की इजाजत ली जा रही है, जो कि मिल जाएगी। अब अभी सरकार शिक्षाकर्मियों से तो निपटी नहीं है कि शिक्षादानियों की यह नई फौज तैयार करने की चूक हो रही है। पंचायत विभाग ने इसके खिलाफ कड़ा आदेश दिया है लेकिन सरगुजा जिले में शिक्षादानी कुछ दिन स्कूल में पढ़ाने के एवज में अब उम्मीद से हैं। 

    नया साल, नया एसपी
    रायपुर एसपी डॉ. संजीव शुक्ला इस महीने के आखिर में डीआईजी के पद पर प्रमोट हो जाएंगे। हालांकि एसपी के पद को अपग्रेड कर डीआईजी को एसएसपी के पद पर पदस्थ भी किया जाता रहा है लेकिन डॉ. संजीव शुक्ला के मामले में ऐसा होने की उम्मीद कम है।  सुनते हैं कि वे खुद इस पद पर बने रहने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने पीएचक्यू के आला अफसरों को अपनी मंशा बता दी है। वे पारिवारिक कारणों से किसी भी जिले में जाना नहीं चाहते, और पुलिस मुख्यालय के किसी दफ्तर में तैनाती चाहते हैं ताकि परिवार को कुछ समय दे सकें। वैसे भी अगले विधानसभा चुनाव के पहले उनको इसलिए भी हटना या हटाना होगा क्योंकि चुनाव आयोग तीन बरस से तैनात सभी अफसरों को हटा देता है। ऐसे में नए  एसपी को लेकर चर्चा भी शुरू हो गई है। इस कड़ी में दुर्ग एसपी अमरेश मिश्रा का नाम आगे है, हालांकि बिलासपुर एसपी मयंक श्रीवास्तव का नाम भी चर्चा में हैं। जो भी हो, नये साल में नए एसपी को मौका मिल सकता है। 

    दूसरी अधिसूचना सही या गलत?
    सेक्स-सीडी मामले की जांच सीबीआई कई हफ्तों में भी शुरू नहीं कर पाई और ऐसी जानकारी सामने आई कि इस जांच के लिए सीबीआई  की अधिसूचना में कोई चूक रह गई थी। अब सीबीआई की जो नई अधिसूचना आई है, उसमें 3 हफ्ते पहले की अधिसूचना में सुधार किया गया है, लेकिन अभी भी यह अधिसूचना कहती है कि सीडी कांड की रायपुर के पंडरी थाने में दर्ज पुलिस रिपोर्ट के आगे जांच और पूछताछ करने के लिए सीबीआई की सख्ती और न्यायाधिकार क्षेत्र का विस्तार संपूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य पर किया जा रहा है। अब इस वाक्य से यह सवाल उठता है कि क्या इस अधिसूचना में फिर कोई कमी रह गई है, क्योंकि पुलिस के बताए मामले के मुताबिक यह पूरा का पूरा अपराध तो दिल्ली-गाजियाबाद इलाके में हुआ है। पहली अधिसूचना की गड़बड़ी से भी लोगों के मन में तरह-तरह के शक होना शुरू हो गए थे, और अब यह दूसरी अधिसूचना भी कुछ गड़बड़ भाषा वाली दिखती है।  rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 11-Dec-2017
  • आखिरकार दबंग आईएएस एमके राउत को मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी मिल ही गई। उनका नाम रेरा चेयरमैन के लिए भी जोर-शोर से चला था। उन्होंने इसके लिए आवेदन भी किया था। लेकिन उनके पैरोकारों को यह अच्छी तरह मालूम था कि रेरा में उनका हो पाना मुश्किल है क्योंकि ईडी उनके  विदेश यात्रा के खर्चों की जांच कर रही है। जांच अभी खत्म नहीं हुई है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ईडी की नोटिस की कॉपी समेत शिकायत सलेक्शन कमेटी के चेयरमैन जस्टिस प्रीतंकर दिवाकर को कर रखी थी। ऐसे में राउत का पैनल में नाम आना भी मुश्किल था। लेकिन राउत ठहरे सबके पसंदीदा। सो, उनके लिए मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी बेहतर मानी गई। यह कुर्सी सुप्रीम कोर्ट के जज के समकक्ष है। सुनते हैं कि उन्हें एक दिसम्बर को ही मुख्य सूचना आयुक्त का पद देने की तैयारी थी। लेकिन इसमें विलंब इसलिए हुआ कि मुख्य सूचना आयुक्त चयन समिति के एक सदस्य नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव छुट्टी मनाने अफ्रीका गए थे। वे लौटकर आए तो वे सीधे सीएम हाउस पहुंचे और बिना किसी रोक-टोक के राउत को मुख्य सूचना आयुक्त बनाने के प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी। राउत को पद दिलाने में पंचायत मंत्री की भी भूमिका बेहद अहम रही। 

    अच्छा काम और अच्छा बोलना
    राज्य में भाजपा सरकार के चौदह बरस पूरे होने के मौके पर रोज कम से कम एक मंत्री की प्रेस कांफ्रेंस हो रही है जिसमें वे अपने विभाग के सचिवों के साथ कामयाबी की लिस्ट गिनाते हैं। ऐसे में कुछ मंत्रियों के विभागों की कामयाबी दमदार रही है, लेकिन वे बोलने में कमजोर पड़ जाते हैं, और सिर्फ उसी कागज को पढ़ते रहते हैं जो कि मीडिया को दिया जा चुका है। ऐसे में मीडिया भी उनके पढऩे के खत्म होने की राह देखता है। दूसरी तरफ कुछ ऐसे मंत्री भी हैं जिनके विभाग गलत कामों की वजह से बदनाम हैं, लेकिन जो बोलने में तेज हैं, और अपनी बात को खपा जाते हैं। जब रोजाना हो रही प्रेस कांफ्रेंस की वजह से लोगों की तुलना का मौका मिल रहा है, तो लोगों को समझ आ रहा है कि मंत्री का काम करना, और उसका अच्छा बोलना, दोनों ही मायने रखते हैं। एक सीनियर रिपोर्टर ने सर्किट हाऊस से निकलते हुए औरों से कहा कि यह मंत्री गंजों की बस्ती में कंघी बेच आएगा। 
    जोगी पार्टी तीसरी ताकत बनेगी?
    सीएम रमन सिंह जोगी पार्टी को प्रदेश में तीसरी ताकत के रूप में देख रहे हैं। वे विधानसभा चुनाव में त्रिकोणीय संघर्ष की संभावना जता रहे हैं। लेकिन पार्टी का हाल किसी से छिपा नहीं है। पार्टी ने सभी विधानसभाओं में पैठ बनाने के उद्देश्य से जोर-शोर से अधिकार यात्रा निकाली थी। कई जगहों पर यह यात्रा अभी भी चल रही है। सुनते हैं कि ज्यादातर जगहों पर यात्रा का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। प्रदेश इकाई की तरफ से बैनर पोस्टर उपलब्ध कराने की बात कही गई थी, जो कि पहुंच नहीं पाई। प्रत्येक विधानसभा में साढ़े 4 लाख रूपए खर्च होना था लेकिन पैसों की कमी आड़े आ गई। लिहाजा कई जगहों पर यात्रा पिट गई। यह हाल देखकर कई लोग अब यह कहने लग गए हैं कि पार्टी यात्रा के लिए छोटी सी रकम नहीं जुटा पा रही है तो विधानसभा चुनाव में करोड़ों खर्च होते हैं इसकी व्यवस्था पार्टी कैसे करेगी। लोगों का अंदाजा है कि फंड की कमी से विधानसभा चुनाव में पार्टी का हाल  अधिकार यात्रा जैसा हो सकता है। ऐसे में सीएम का जोगी पार्टी को तीसरी ताकत के रूप में देखना गलत साबित भी हो सकता है। 
    दूसरी तरफ कुछ अनजानी सी अंग्रेजी समाचार वेबसाइटों पर हाल ही में ऐसी खबरें आना शुरू हुई हैं कि राहुल गांधी गुजरात चुनाव से निपटने के बाद जब छत्तीसगढ़ की तरफ ध्यान देंगे, तो वे सबसे पहले जोगी का कांग्रेस प्रवेश करवाने की कोशिश करेंगे ताकि कांग्रेस की जीत की संभावनाओं को बढ़ाया जा सके। अब राहुल गांधी के आसपास ऐसा रहस्यमय घेरा रहता है कि ऐसी अटकल का सच या झूठ अंदाज लगाना नामुमकिन रहता है, फिर भी यह तो तय है ही कि जोगी पिता-पुत्र और बाकी पूरी कांग्रेस के बीच संबंध पानी और तेल सरीखे हैं, जो आपस में मिलकर एक हो नहीं सकते। 
    विदेश जाना मंजूर नहीं
    अब जब कई मंत्री अपने अफसरों के साथ विदेश हो आए हैं, तब इस बात को लिखने से किसी की पहचान उजागर नहीं होगी। एक मंत्री के साथ जाने के लिए जब अफसरों के नाम तय हो रहे थे, तब एक अफसर का नाम छांटा गया, तो उसने कान पकड़कर माफी मांग ली, और कहा कि किसी दूसरे ऐसे अफसर को भेजा जाए जो कि मंत्रीजी के खर्चों को भी उठा सके। काफी जोर डाला गया, लेकिन यह अफसर तैयार हुआ नहीं, और नतीजा यह निकला कि खर्च उठाने की ताकत रखने वाले एक अफसर को यह मौका मिला, और वह खुशी-खुशी पल भर में तैयार भी हो गया। अफसर पहले मंत्री के इलाके में काम भी कर चुका है, और दोनों एक-दूसरे की क्षमता अच्छी तरह जानते-समझते भी हैं। अब इस दौरे के बाद ऐसी चर्चा है कि रायपुर के सांसद ने इस अफसर के खिलाफ मुख्यमंत्री को कुछ गंभीर बातें बताई हैं। 
    शराफत अपनी पार्टी को महंगी
    कांग्रेस पार्टी में एक-दो ऐसे शरीफ नेता हैं कि उनकी पार्टी उनसे कई बार थककर परेशान हो जाती है। भूतपूर्व वित्तमंत्री रामचंद्र सिंहदेव राजनीति से परे हटकर, ऊपर उठकर कभी भी सरकार की मदद को जुट जाते हैं, अगर उन्हें लगता है कि उनकी सलाह से प्रदेश का कुछ भला होगा। वे अपनी पार्टी की राजनीति को बीच नहीं आने देते। दूसरी तरफ टीएस सिंहदेव भी कुछ इसी किस्म के शरीफ नेता हैं, और वे सरकार की फजीहत में दिलचस्पी लेने के बजाय बहुत से मामलों को सरकार को सीधे बता देते हैं, अगर उन्हें लगता है कि इससे समस्या जल्दी निपटेगी। सत्ता को ऐसे लोग पसंद आते हैं, लेकिन पार्टी को लगता है कि ये मौके को खराब कर देने वाले नेता हैं। सरगुजा के कई मुद्दों को लेकर राजनीतिक अभियान छेडऩे के बजाय टीएस सिंहदेव सरकार से बात करके उन्हें सीधे ही निपटा देते हैं। अब ऐसी शराफत चुनाव के साल में अधिक काम की तो रहती नहीं है। rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 10-Dec-2017
  • अभी इस अखबार, 'छत्तीसगढ़', ने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का एक इंटरव्यू रिकॉर्ड किया तो उस मौके पर वे काले ब्लेजर के नीचे बहुत खूबसूरत नीले रंग का शर्ट पहने हुए थे। शर्ट के रंग की तारीफ करने पर उन्होंने बताया कि यह स्कूल की यूनीफॉर्म के कपड़े का शर्ट है जो कि पूरे प्रदेश में स्कूली बच्चे पहनते हैं। उन्होंने बताया कि राज्य भर में अब महिलाओं के स्वसहायता समूह बच्चों के स्कूल ड्रेस सिलते हैं, और इससे महिलाओं को बड़ा रोजगार मिल रहा है। उन्होंने ऐसे ही एक स्वसहायता समूह की महिलाओं से उनका काम देखकर तारीफ करते हुए कहा था कि इस कपड़े का एक शर्ट उनके लिए भी बना दें। उन्होंने यह शर्ट सिलकर दिया और इसे वीडियो-इंटरव्यू के खास मौके पर उन्होंने पहना और खुशी-खुशी बताया कि वे आज स्कूल-यूनीफॉर्म में हैं।


    छोटों के प्रमोशन अजगर की रफ्तार से
    छत्तीसगढ़ सरकार में बड़े-बड़े ओहदों के लिए प्रमोशन वक्त के पहले भी हो जाता है, और नियमों या परंपराओं को तोड़कर भी हो जाता है, लेकिन मंझले या छोटे ओहदों के लिए प्रमोशन लंबे समय तक पड़े रहता है, उसके हकदार लोग रिटायर भी हो जाते हैं। प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों, और तकनीकी शिक्षा विभाग में प्राचार्य के आधा दर्जन पद हैं, लेकिन कुल एक पद नियमित प्राचार्य है, बाकी पांच पर कामचलाऊ इंतजाम चल रहा है। केन्द्र सरकार को छत्तीसगढ़ सरकार ने महीनों पहले लिखकर दिया था कि छह महीने के भीतर प्राचार्य के पदों पर नियमित प्रमोशन कर दिए जाएंगे, अब उन छह महीनों को महज कुछ हफ्ते बाकी हैं, लेकिन विभाग की फाईलें अजगर की रफ्तार से भी करवट लेते नहीं दिख रही हैं। कमोबेश ऐसा ही हाल कई दूसरे विभागों में है, और कहीं-कहीं तो विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक में फैसला हो जाने के बाद भी आदेश निकलने में इतना वक्त लग जा रहा है कि उस बीच लोग रिटायर हो जा रहे हैं। शायद इसीलिए आईएएस अफसरों की ताकत को देखकर उसे आई एम सेफ कहा जाता है, भारत की सबसे सुरक्षित नौकरी। 


    सुगबुगाहट के बैठने का नाम नहीं
    छत्तीसगढ़ के एसीएस पद से एनएमडीसी के मुखिया पद पर गए राज्य के आईएएस अफसर एन.बैजेन्द्र कुमार ने अपने मुख्यालय हैदराबाद में एनएमडीसी का एक बड़ा कार्यक्रम करवाया। इसमें छत्तीसगढ़ राज्य की खूब वाहवाही हुई, और कार्यक्रम के विशेष अतिथि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने लंबे समय के सहयोगी बैजेन्द्र कुमार की जमकर तारीफ की। तारीफ तो कार्यक्रम के साथ खत्म हो गई, लेकिन राजधानी रायपुर में यह सुगबुगाहट शुरू हो गई कि अगले मुख्य सचिव के लिए जब नाम तय किया जाएगा, तब क्या बैजेन्द्र कुमार के नाम पर भी विचार होगा? और क्या वे राज्य के मुख्य सचिव बनने के लिए एनएमडीसी के सीएमडी का पद छोड़कर आना चाहेंगे। इस पर अलग-अलग अफसरों का अलग-अलग नजरिया है, कुछ लोग राज्य के प्रशासन प्रमुख को एनएमडीसी प्रमुख के पद से ऊपर मानते हैं, और कुछ नीचे। फिलहाल जब तक अगले सीएस का नाम तय नहीं हो जाएगा, यह सस्पेंस बना ही रहेगा। 
    बिना कैप्शन तस्वीर से सनसनी
    छत्तीसगढ़ में मीडिया का आकार बढ़ गया है, और खबरें उतनी रहती नहीं, नतीजा यह होता है कि लोग कुछ बातों पर लगातार लिखते हैं, जो कि खबर न होकर अटकल अधिक रहती है। ऐसे माहौल में प्रदेश में रीयल स्टेट कारोबार पर नियंत्रण के लिए बनने वाली एक ताकतवर संवैधानिक संस्था रेरा में मनोनयन पर सारे ही वक्त कहीं न कहीं चर्चा चलती रहती है। छत्तीसगढ़ में अफसरों और मीडिया के कुछ लोगों के दिमाग पर रेरा इस तरह सवार है कि रात में करवट बदलते नींद टूटती है तो बड़बड़ाते हैं कि रेरा का कुछ हुआ क्या? ऐसे माहौल में आज सुबह जब जनसंपर्क संचालक ने कुछ तस्वीरें संपादकों को भेजीं जिनमें मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, मुख्य सचिव विवेक ढांढ को बाकी सचिवों की मौजूदगी में बड़ा सा गुलदस्ता देते हुए दिख रहे थे, तो संपादकों ने तुरंत सवाल किए कि यह किस बात की तस्वीर है? चूंकि शुरू में केवल तस्वीरें आई थीं, और उसकी जानकारी वाला कैप्शन साथ नहीं था, इसलिए बहुतों को पहली नजर में लगा कि विवेक ढांढ को राज्य शासन से बिदाई दी जा रही है, और उन्हें रेरा का अध्यक्ष बनाया जा रहा है। हवा में इतनी सरगर्मी है कि एक गुलदस्ते के भी कई मतलब निकल रहे हैं।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 09-Dec-2017
  • कल छत्तीसगढ़ के कुर्मी समाज का एक भीड़भरा धरना राजधानी रायपुर में हुआ और इसमें गिरफ्तार पत्रकार विनोद वर्मा का मामला उठाया गया। इसके सबसे प्रमुख नेता कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल थे, और असली या फर्जी जैसी भी रही हो, उस सीडी के मामले में विनोद वर्मा के साथ-साथ भूपेश बघेल का नाम भी जुड़ा हुआ है, इसलिए वे भी भाषण में खासे हमलावर थे, और सरकार की इस कार्रवाई को कुर्मी समाज पर हमला माना जा रहा है। लेकिन जैसे कि देश में मणिशंकर अय्यर ने एक फिजूल की बात कहकर राहुल गांधी के गुजरात चुनाव अभियान को पटरी से उतार दिया है, कुछ वैसा ही काम कल राज्यसभा सदस्य छाया वर्मा ने किया, और उन्होंने भूपेश को भावी मुख्यमंत्री बता दिया। अब विनोद वर्मा का मुद्दा धरा रहा, और मुख्यमंत्री का मुद्दा उफान पर आ गया। भूपेश बघेल को ठीक उसी तरह सफाई देनी पड़ी जिस तरह मणिशंकर अय्यर के बयान के बाद कांग्रेस पार्टी को देनी पड़ी थी, लेकिन नुकसान तो हो ही चुका था, और यह पूरा प्रदर्शन समाज का प्रदर्शन न होकर कांग्रेस या भूपेश का प्रदर्शन होकर रह गया। 

    हाथी और नक्सली, जंगल में ठीक
    राजधानी रायपुर में जहां कि लोग पक्के मकानों में रहते हैं, वहां भी इस बात से खलबली मची है कि शहर के किनारे तक हाथी पहुंच गए हैं। अखबारों के फोटोग्राफर गिरते-पड़ते उस इलाके में पहुंचे, और हाथियों को ढूंढने लगे, लेकिन बड़े-बड़े हाथी भी कई घंटों तक दिखे नहीं। शहर में ऐसी खलबली केवल एक ही और मौके पर देखने मिली थी जब यह खबर आई थी कि नक्सली रायपुर तक पहुंच गए हैं। शहरियों की सोच देखें, तो जब तक हाथी और नक्सली जंगलों में हैं, तब तक शहर को कोई दिक्कत नहीं है, दिक्कत तब होती है जब वे शहर की सहूलियतों के बीच पहुंच जाते हैं। 
    मंत्री के अपने शहर में
    बिलासपुर प्रदेश के आबकारी मंत्री अमर अग्रवाल का अपना शहर है, लेकिन वहां पर आबकारी विभाग के कुछ अफसर जिस धड़ल्ले से हर किस्म के भ्रष्टाचार और बेईमानी में लगे हुए हैं, उसे देखकर प्रशासन के बड़े अफसर भी हैरान-परेशान हैं। सुना है कि एक छोटे अफसर की दसियों करोड़ की दौलत की जानकारी अभी सामने आई, और शराब कारोबार में उसकी की जा रही धांधली सामने आई तो मंत्री ने उस पर कड़ी कार्रवाई करने को कहा। लेकिन जब विभाग में इतनी बड़ी कमाई चलती है, तो ऐसे कमाऊ पूतों पर कोई कार्रवाई आसान भी नहीं रह जाती। 

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Posted Date : 08-Dec-2017
  • छत्तीसगढ़ के अधिकतर बड़े खेल मैदानों पर अब भी कहीं प्रदर्शनी लगी रहती है, तो कहीं बिल्डर और ऑटोमोबाइल कारोबारियों की बिक्री दिखती है। इनसे समय बच जाए तो वहां पर धार्मिक, आध्यात्मिक, और सामाजिक प्रवचन होते रहते हैं। आसपास किसी स्टेडियम में बड़ा कार्यक्रम हो तो उसकी पार्किंग भी आसपास के खेल मैदानों पर होती है। कुल मिलाकर खेल का माहौल खत्म है, और महज बड़े स्टेडियमों में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों को छत्तीसगढ़ के खेलों का विकास मान लिया गया है। कुछ खिलाडिय़ों का कहना है कि अगर खेल संगठनों पर मंत्री, नेता, और अफसर काबिज नहीं होते, और खिलाड़ी उनके मुखिया होते, तो हर संगठन सरकारी नजर से देखना बंद कर देता, और खिलाड़ी नजर से देखता। सरकार बार-बार मैदानों का केवल खेल-इस्तेमाल कहती जरूर है, लेकिन ऐसा होता कुछ नहीं है। दो कारोबारी या धार्मिक आयोजनों के बीच खेल मैदान पर केवल गड्ढे बच जाते हैं, वे मानो इस बात की गारंटी के लिए रहते हैं कि वहां पर कोई खेल न ले। 

    बिदा होते ही सामान वसूली
    सरकार के बड़े अफसर जब रिटायर होते हैं, या कि मंत्रालय-सचिवालय छोड़कर जाते हैं, तो उनके दफ्तर में उनके मातहत विभागों से आए हुए सामानों का लौटना देखने लायक रहता है। अभी एक बड़े अफसर नए मिले दफ्तर में बैठे ही थे कि कुछ देर में पिछले अफसर के एक विभाग के अधिकारी कम्प्यूटर लेने पहुंचे, थोड़ी देर बाद एक दूसरे विभाग के अफसर दीवारों पर टंगी पेंटिंग ले जाने आए, थोड़ी देर गुजरी कि कोई और लोग सोफा ले जाने आए। थक-हारकर इस नए अफसर ने एक घंटे के लिए कमरा छोड़ दिया, और कहा कि जो-जो सामान जिस विभाग से आया हो, वे सब ले जाएं, उसके बाद बचे हुए सामान के साथ वे काम शुरू करेंगे। 
    चौकन्ना रहना जरूरी
    जिन लोगों को यह खतरा लगता है कि उनके भेजे गए संदेश का स्क्रीन शॉट लेकर लोग दूसरों को दिखा सकते हैं, उनके लिए कुछ नई मैसेंजर सर्विसेज काम की हो सकती हैं। सिग्नल नाम का एक मैसेंजर ऐसा है जिसमें भेजने वाले ही यह समय तय कर सकते हैं कि कितने सेकेंड बाद उनका संदेश अपने आप मिट जाए। और पाने वाले लोग चाहकर भी, कोशिश करके भी इस मैसेज का स्क्रीन शॉट नहीं ले सकते। आज सरकार और राजनीति में, मीडिया और कारोबार में बहुत से लोग यह चौकन्नापन बरतना शुरू कर चुके हैं, और फोन पर किसी से बात के पहले यह याद रखते हैं कि सामने वाले लोग बातचीत को रिकॉर्ड तो कर ही रहे होंगे।

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Posted Date : 07-Dec-2017
  • भाजपा विधायक श्रीचंद सुंदरानी व्यापारियों का सबसे बड़ा नेता बनने के चक्कर में घिर गए हैं। चेम्बर चुनाव में एकता पैनल से पसंद का प्रत्याशी तय करवाकर अपने ही सिंधी समाज का गुस्सा झेल रहे हैं। समाज के प्रमुख लोगों ने सुंदरानी के प्रत्याशी जितेन्द्र बरलोटा के खिलाफ अमर गिदवानी को चुनाव मैदान में उतारा है। सिंधी व्यापारी गिदवानी के पक्ष में लामबंद होते दिख रहे हैं। विधानसभा चुनाव में साल भर से भी कम समय बाकी है। ऐसे में व्यापारियों के चुनाव में अपनी ताकत झोंककर सुंदरानी ने मुसीबत मोल ले ली है। यदि बरलोटा चुनाव जीतते हैं तो उन पर समाज के प्रत्याशी को हराने का आरोप लगेगा। गिदवानी अथवा यू एन अग्रवाल के  चुनाव जीतने की स्थिति में स्वाभाविक रूप से यह संदेश जाएगा कि व्यापारियों में सुंदरानी की पकड़ नहीं रह गई है। चेम्बर अध्यक्ष रह चुके सुंदरानी को सिंधी समाज के होने के साथ-साथ व्यापारियों का सबसे बड़ा नेता होने की वजह से भाजपा ने टिकट दी थी। ऐसे में सुंदरानी के लिए एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति पैदा हो गई है। पहले एक कहावत कही जाती थी कि चौबेजी छब्बे बनने चले, और दुबे बनकर रह गए, अब सुंदरानी के लिए कोई नई कहावत गढऩी होगी।

    जंगल का राजा तय होने की कहानी
    आईएफएस अफसर शिरीष अग्रवाल वरिष्ठता होने के बावजूद हेड ऑफ फारेस्ट फोर्स की दौड़ में पिछड़ गए। अग्रवाल गाजियाबाद के रहवासी हैं और लखनऊ में उनका ससुराल है। सुनते हैं कि यूपी के कई प्रभावशाली नेताओं ने उन्हें पीसीसीएफ बनाने की सिफारिश की थी। लेकिन साफ-सुथरी छवि और लो-प्रोफाइल में रहने के कारण डॉ. आरके सिंह उन पर भारी पड़ गए। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने तमाम सिफारिशों को नजर अंदाज कर न सिर्फ उन्हें हेड ऑफ फारेस्ट फोर्स बनाने के प्रस्ताव पर मुहर लगाई बल्कि उन्हें वाइल्ड-लाइफ का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया है। ऐसा वर्षों बाद हुआ है, जब दोनों ही पद एक अफसर के पास है। जिस दिन इस प्रमोशन की फाईल सीएम के पास पहुंची, उन्होंने बहुत सी और जानकारी मांगी, और ठोस जानकारी के बिना कोई फैसला लेने से मना कर दिया। इसके बाद आधा दर्जन से अधिक मुद्दों पर जानकारी इक_ा करने के लिए भागदौड़ हुई, और फिर जब पूरी जानकारी सीएम के सामने आई, तभी उन्होंने फाईल पर अपनी पसंद लिखी। यह जानकर उन लोगों को बहुत हैरानी होगी जो यह सोचते हैं कि ऐसे मामलों में सीएम मनमर्जी के फैसले लेते हैं, क्योंकि उन्होंने इस मामले में बड़ी ठोस जानकारी के आधार पर अपनी पसंद तय की।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 06-Dec-2017
  • 6 दिसंबर 1992, आज ही के दिन अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, और उसमें छत्तीसगढ़ से गए हुए कारसेवक भी शामिल थे। उनमें से एक, भाजपा के एक बड़े नेता लौटते हुए गिराए गए ढांचे की ईंटें लेकर लौटे थे, और रायपुर में अखबारों के दफ्तर में जाकर उन ईंटों के दर्शन भी करवाए गए थे। कुछ पत्रकारों ने ईंटों की ऐसी झांकी को डांटकर भगा दिया था, और कुछ ने बड़ी आस्था से प्रणाम किया था। ईंटें लेकर चलने वालों का अंदाज उस वक्त ऐसा था कि सरहद से दुश्मन का सिर काटकर बहादुर सिपाही घर लौटे हैं। बाद के बरसों में भाजपा की सरकार नहीं रही तो ये ईंटें दब गई थीं। अब आज बदले हुए माहौल में भाजपा के वे नेता फिर से उन ईंटों को निकाल सकते हैं कि उन्होंने किस तरह बाबरी मस्जिद की ईंट से ईंट बजा दी थी। 

    अदालत-सरकार बेअसर
    सरकार के नियम बहुत से बन जाते हैं, लेकिन अमल किसी पर होना बड़ा मुश्किल होता है। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए पटाखों और आतिशबाजी पर राज्य सरकार ने रोक लगाई, और वह पूरी तरह बेअसर है। धार्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ शादी और बारात में भी कितनी जमकर आतिशबाजी हुई, यह खुद सरकार के पास तस्वीरों और वीडियो में पहुंची है। प्लास्टिक के कप-प्लेट-ग्लास-चम्मच बिकने में एक धेले की कमी नहीं आई है, और सड़कों के किनारे इसकी दुकानें ज्यों की त्यों सजी हुई हैं। हाईकोर्ट के और राज्य सरकार के हुक्म के बावजूद सड़क पर ऐसी गाडिय़ां के काफिले बारातों के आगे-पीछे दिखते हैं जिनमें दर्जनों स्पीकर बांधकर भयानक शोर किया जाता है। अब सरकार और अदालत ये दोनों अगर बेअसर हैं, तो वह दिन अधिक दूर नहीं है कि दिल्ली में खेल रहे श्रीलंकाई क्रिकेट खिलाडिय़ों की तरह इस शहर में भी लोग मास्क लगाकर घर से निकलें। 
    पदयात्रा ने बढ़ा दी दूरियां
    प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत के बीच खटास बढ़ गई है। कुछ समय पहले जिला अध्यक्षों के चयन और सेक्स-सीडी मामले पर दोनों नेता भिड़ चुके हैं। हालांकि बाद में दोनों ने कई जगहों सरकार के खिलाफ अभियान में साथ आकर सब कुछ ठीक होने का संकेत भी दिया। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। सुनते हैं कि जांजगीर-चांपा और रायगढ़ जिले में पदयात्रा कार्यक्रम को लेकर भूपेश और महंत समर्थकों के बीच फिर ठन गई है। महंत का 13 दिसम्बर को जन्मदिन है। इस दिन कोरबा-जांजगीर चांपा जिले में कई जगहों पर जलसे की तैयारी है। लेकिन भूपेश ने 11 तारीख से पदयात्रा शुरू करने का फैसला ले लिया। राहुल की ताजपोशी के चलते इस कार्यक्रम में परिवर्तन किया गया और अब यात्रा 12 तारीख से निकलेगी। महंत समर्थक चाहते थे कि पदयात्रा 13 तारीख के बाद निकाली जाए। लेकिन पीसीसी ने तारीख आगे बढ़ाने से मना कर दिया। यात्रा में सभी प्रमुख पदाधिकारियों को मौजूद रहने के लिए कहा जा रहा है। इससे महंत समर्थक नाराज हैं और वे इस पदयात्रा को जन्मदिन कार्यक्रम को फीका करने की कोशिशों के रूप में देख रहे हैं।
    स्काईवॉक से एक नया खतरा
    राजधानी रायपुर में बन रहे स्काईवॉक को लेकर कुछ लोगों ने एक नए किस्म की गैरतकनीकी दिक्कत का खतरा सामने रखा है। उनका कहना है कि जब सड़कों पर चल रही गाडिय़ों के दरवाजे खोल-खोलकर लोग थूकते हैं, तो धरती से बीस फीट ऊपर स्काईवॉक पर चलते हुए वे अपनी पीक कहां डालेंगे? जाहिर है कि नीचे चलने वाले लोगों पर। हो सकता है कि इससे दुपहिया वाले लोगों का हेलमेट लगाना बढ़ जाए और उनकी जान बचने लगे, लेकिन कपड़ों के ऊपर रेनकोट जैसी जैकेट इस गर्म इलाके में लोग कैसे पहनेंगे? और पीक की धार मारने वाले लोगों का हाल यह है कि अपनी ऊंचाई से अधिक ऊपर तक वे पीक की मार कर देते हैं। 

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Posted Date : 05-Dec-2017
  • शिक्षाकर्मियों का एक पखवाड़े का आंदोलन बीती रात जिस हैरतअंगेज तरीके से आधी रात को यह हड़ताल वापिस हुई, उसने सबको हक्का-बक्का कर दिया। अपने कार्यकाल के आखिरी पखवाड़े में बहुत ताकतवर और तजुर्बेकार एसीएस एमके राऊत ने इस हड़ताल को टालने की जिस तरह से कोशिश की थी, उससे मुख्यमंत्री के टेबिल पर ही बातचीत टूटने से बड़ी किरकिरी हुई थी, और सरकार इस फजीहत में आ गई थी कि मुख्यमंत्री के बाद भला और कौन यह काम कर सकते हैं? इसके बाद हड़ताल के बीच पंचायत विभाग के एसीएस बनने वाले आरपी मंडल ने भी इसे सुलझाने की कोशिश की, लेकिन बात बनी नहीं। पिछले दो दिनों में मुख्य सचिव विवेक ढांड इसे सुलझाने में या खत्म करवाने में जुटे और प्रदेश भर के कलेक्टरों से बात करके उन्होंने लगातार कोशिश की, लेकिन उससे भी बात बनी नहीं। आखिर में रायपुर के कलेक्टर ओपी चौधरी को बीच में डाला गया, और उनका विभागीय जिम्मा न होते हुए भी पिछले दो दिनों में उन्होंने हड़ताली नेताओं से जेल के भीतर और बाहर बातचीत जारी रखी और उसे किनारे पहुंचाया। इस बीच सरकार के भीतर भी तनातनी इतनी हो गई थी कि कुछ लोग बर्खास्त किए गए शिक्षाकर्मी नेताओं को वापिस लेने के खिलाफ एकदम अड़ ही गए थे। ऐसे में उनसे बातचीत कामयाब होने वाली नहीं थी। कल रात दस बजे के करीब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस पूरे मामले में सीधी दखल दी और रायपुर कलेक्टर को बातचीत करके सभी शर्तें तय करने के लिए अधिकृत किया। उन्होंने यह साफ किया कि ओपी चौधरी जो समझौता करेंगे, वह सरकार पूरी तरह मानेगी। नतीजा यह निकाला कि चौधरी की कुर्सी पर बैठकर राज्य के पहले कलेक्टर रहे राऊत, और बाद में एक और कलेक्टर रहे मंडल की समझौता-क्षमता पार करके चौधरी ने इसे निपटा दिया। रात एक बजे तक मुख्यमंत्री को खबर की जाती रही, और ओपी चौधरी के साथ रायपुर के ही छात्र रहे आज के एसपी संजीव शुक्ला भी लगे रहे। चौधरी की कामयाबी के पीछे यह भी रहा कि वे गांव के एक सरकारी स्कूल से पढ़कर निकले खालिस छत्तीसगढ़ी हैं, और हड़तालियों से बातचीत में उनकी यह जमीन खासी काम आई।
    यह हड़ताल खत्म करवाने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भी आधी रात की बातचीत में ओपी चौधरी को एक नेता मान लिया है। 

    शशि कपूर की कुछ यादें...
    फिल्म अभिनेता शशि कपूर के गुजरने से देश भर में उनको जानने वाले लोगों के बीच बड़ी अच्छी यादें सामने आ रही हैं। रायपुर के बहुत से लोगों को याद है कि किस तरह एक वक्त पृथ्वीराज कपूर अपना नाटक, पठान, लेकर रायपुर आए थे और यहां की एक पुरानी टॉकीज में उसका शो हुआ था। उस नाटक में कपूर परिवार के कुछ और लोगों के साथ-साथ शशि कपूर भी थे जो कि एक बच्चे की भूमिका में थे। पुराने कुछ लोगों को याद है कि नाटक के बाद पृथ्वीराज कपूर परिवार सहित चादर लेकर गेट पर खड़े हो जाते थे, और निकलते हुए लोगों से नाटक के लिए सहयोग मांगते थे।
    छत्तीसगढ़ के एक अखबारनवीस सुनील कुमार ने कई मौकों पर दिल्ली और बंबई में शशि कपूर को इंटरव्यू किया था और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में उनकी कई फिल्में उनके साथ देखी थीं, या उनके बारे में बात की थी। वे छोटे से शहर के एक गैरअंगे्रजीभाषी नौजवान पत्रकार के साथ भी बड़ा हौसला बढ़ाने वाला दोस्ताना बर्ताव करते थे और पूरा समय देते थे। मुंबई फिल्म समारोह के दौरान 1984 में रायपुर से वहां गए हुए यहां के एक फोटोग्राफर प्रद्युम्न अग्रवाल (बालाजी) से तस्वीरें खिंचवाने के लिए जब सुनील कुमार ने शशि कपूर से अनुरोध किया, तो वे तुरंत तैयार हो गए। इसके बाद जुहू में उनके पृथ्वी थिएटर के अहाते में फोटो सेशन तय हुआ, और उन्होंने आधा-पौन घंटे तक जिस तरह फोटोग्राफर ने चाहा, उस तरह दर्जनों या सैकड़ों तस्वीरें खिंचवाईं। 
    रायपुर के नाटकों से जुड़े हुए एक रंगकर्मी सुभाष मिश्रा जब दिल्ली में पृथ्वी थिएटर में हबीब तनवीर का नाटक आगरा बाजार देखने पहुंचे थे, तब भी वहां व्हीलचेयर पर पहुंचे हुए शशि कपूर से उनकी मुलाकात हुई थी, और देर तक बात हुई थी। रायपुर के एक और रंगकर्मी मिर्जा मसूद की भी शशि कपूर से कुछ छोटी-छोटी मुलाकातें हैं। 
    गैस एजेंसी की लॉटरी खुली
    इंसान की किस्मत कब चमक जाए, यह कोई नहीं जानता। ऐसे ही सिंचाई विभाग के एक छोटे कर्मचारी की अचानक किस्मत बदल गई। हुआ यूं कि सिंचाई कर्मी ने अपनी पत्नी के नाम पर गैस एजेंसी लेने के लिए फार्म भरा था और पिछले दिनों उनके नाम की लॉटरी निकल गई। यानी रायपुर शहर में सरकारी गैस कंपनी की उन्हें एजेंसी मिल गई। एजेंसी के लिए सैकड़ों लोग कोशिश करते हैं। हर महीने लाखों रूपए की नियमित आय होने के कारण इसके लिए मारा-मारी रहती है। लेकिन गैस एजेंसी आबंटन की प्रक्रिया अब पारदर्शी हो गई है। इसमें किसी तरह की गड़बड़ी या सिफारिश की गुंजाईश नहीं रह गई है। एजेंसी के लिए सैकड़ों लोग फार्म भरते हैं, लेकिन लॉटरी के जरिए एजेंसी के लिए नाम तय होते हैं। 
    सुनते हैं कि कई प्रभावशाली लोग अब गैस एजेंसी मिलने के बाद सिंचाई कर्मी का पार्टनर बनने के लिए तैयार बैठे हैं। लेकिन उसने सभी को मना कर दिया। अब जल्द ही वीआरएस लेकर एजेंसी का काम शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। न सिर्फ सिंचाई कर्मी बल्कि दो दिन पहले यहां के एक छोटे अखबार के फोटोग्राफर की भी किस्मत संवर गई। उसके परिवार के सदस्य के नाम गैस एजेंसी का लॉटरी निकल गई। अब वे भी जल्द ही गैस एजेंसी चलाने की तैयारी कर रहे हैं। 
    सयान की सीट पर कई नजरें
    विधानसभा उपाध्यक्ष बद्रीधर दीवान 85 बरस के हो गए हैं। वे शारीरिक और मानसिक रूप से फिट भी हैं। लेकिन वे अगला चुनाव  नहीं लड़ेंगे, क्योंकि केन्द्र से लेकर कई राज्यों में भाजपा ने बुजुर्ग नेताओं को घर बिठा दिया है। पार्टी की रणनीति नए चेहरों को आगे लाने की है। दीवान बिलासपुर जिले की बेलतरा सीट से चुनकर आए हैं। बेलतरा को भाजपा का गढ़ माना जाता है। यही वजह है कि पार्टी के कई प्रभावशाली नेता दीवान का उत्तराधिकारी बनने के लिए प्रयासरत हैं। सुनते हैं कि दीवानजी अपने बड़े बेटे को अपनी जगह चुनाव लड़ाना चाहते हैं। जो कि उनका राजनीतिक कामकाज भी देखते हैं। मंझले पुत्र भी चुनाव लडऩे के इच्छुक बताए जाते हैं। ऐसे में घर में ही मतभेद की स्थिति है। इस सीट पर हाऊसिंग बोर्ड अध्यक्ष भूपेन्द्र सवन्नी की भी निगाहें हैं। वे जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। संगठन में उनकी पकड़ भी है, वे प्रदेश भाजपाध्यक्ष धरम कौशिक के एकदम करीबी माने जाते हैं। वे चुनाव लडऩे के इच्छुक हैं। इसके लिए वे क्षेत्र में लगातार मेहनत भी कर रहे हैं। पार्टी के कुछ लोगों का मानना है कि दीवान परिवार में असमंजस की स्थिति का फायदा सवन्नी को मिल सकता है।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 04-Dec-2017
  • सरकार में काम कर चुके कई अफसरों ने अपनी सेवा अवधि के दौरान राज्य में अकूत धन संपत्ति बनाई है। इन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे लेकिन बाल बांका नहीं हो पाया। रिटायर होने के बाद कुछ अपने गृह राज्य में शिफ्ट हो चुके हैं या फिर होने की तैयारी कर रहे हैं। पहले उन्होंने यहां सरकार में पद पाने की कोशिश की थी। लेकिन इसमें अब तक सफलता नहीं मिल पाई। अब ये काली कमाई से जुटाई संपत्तियों को निकालने के फेर में हैं। 
    सुनते हैं कि एसीएस रहे एक अफसर अपने आलीशान मकान को बेचने के लिए प्रयासरत हैं। वीआईपी रोड स्थित उनके मकान की कीमत ढाई करोड़ रखी गई है। यहां लिफ्ट भी लगी हैं। इसी तरह एक रिटायर पुलिस अफसर भी वीआईपी रोड सहित अन्य जगहों पर स्थित अपनी जमीन को निकालने के लिए कोशिश कर रहे हैं। हालांकि ये संपत्तियां उनके करीबी रिश्तेदारों के नाम पर हैं। इन संपत्तियों को बेचने के लिए कई लोग प्रयासरत हैं, जिसमें पुलिस विभाग के लोग भी शामिल बताए जाते हैं। भले ही ये  मकान या जमीन काली कमाई से जुटाई गई है लेकिन दाम ऊंचा चाह रहे हैं। सो, इन सौदों में दिक्कत आ रही है। लेकिन यह लिस्ट बड़ी लंबी है, और छत्तीसगढ़ के कुछ लोगों ने दूसरे लोगों के नाम पर जो बड़ी-बड़ी जमीनें ले रखी हैं, वे उनसे वापिस पा सकेंगे या नहीं इसमें भी शक है। फिर भोपाल में मौजूद इनकमटैक्स के एक बड़े अफसर ने छत्तीसगढ़ में मौजूद अपने संपर्कों से अनुरोध किया है कि ऐसी बेनामी जमीनों की जानकारी देकर सरकार की मदद करें, और इनकी कीमत के अनुपात में ईनाम भी गोपनीयता के साथ-साथ पाएं। अखबारों में कम तनख्वाह पाने वाले कई लोगों के पास ऐसी बहुत सी जानकारी है, और वे कालाधन खत्म करने के राष्ट्रीय अभियान में मदद भी कर सकते हैं, देश की भी, और अपनी खुद की भी।


    कांग्रेस में बदलाव बाकी?
    विधानसभा चुनाव में सालभर से भी कम समय बाकी है लेकिन प्रदेश कांग्रेस अभी भी बदलाव के दौर से गुजर रही है। पार्टी के कई प्रमुख नेताओं ने अध्यक्ष बदलने की मुहिम छेड़ दी है। रोज नए-नए फार्मूले सुझाए जा रहे हैं। एक फार्मूला फिर से पार्टी हल्कों में चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव को अध्यक्ष और भूपेश बघेल को नेता प्रतिपक्ष की कमान देने का सुझाव दिया गया है। सुनते हैं कि पार्टी में इस फार्मूले पर गंभीरता से मंथन भी हो रहा है और पार्टी के कई नेताओं का दावा है कि इस माह के अंत तक फैसला हो सकता है। हालांकि, पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू और पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा के भी अध्यक्ष की दौड़ में होने की चर्चा है। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रभारी सचिव ने अनौपचारिक चर्चा में यह साफ कर दिया था कि जिन चेहरों को आजमाया जा चुका है, उन पर पार्टी दांव नहीं लगाएगी।  

    उसे बसाने, इसे बचाने की तरकीब
    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में साल के हर दिन कोई न कोई धरना-प्रदर्शन चलता ही रहता है। बहुत से दिन तो ऐसे रहते हैं कि एक-एक दिन में कई-कई आंदोलन होते हैं, सड़कों को जगह-जगह बंद कर दिया जाता है, और पुलिस-प्रशासन के अफसर उस दिन केवल आंदोलन से ही जूझते हैं, अपने दफ्तरों का कोई काम नहीं कर पाते। अब स्टेडियम के किनारे जिस जगह पर पार्किंग होनी थी, वह जगह तो धरने के लिए छोटी पडऩे लगी। इसलिए अब ऐतिहासिक हिन्द स्पोर्टिंग मैदान को नया धरनास्थल बना दिया गया है। वहां एक साथ कई धरने शुरू हो गए हैं, इसलिए पूरे मैदान में गड्ढे खोदकर, बल्लियों से उसके अलग-अलग हिस्से कर दिए गए हैं, ठेलों के मेले लग गए हैं, और गंदगी भी शुरू हो गई है। एक और नतीजा यह है कि धरनास्थल से मुख्यमंत्री निवास या राजभवन आते-जाते जुलूस अब शहर की और दो किलोमीटर सड़क पर रास्ता बंद कर देंगे। लोकतंत्र में आंदोलनों की जगह जरूरी है, लेकिन साथ-साथ शहर के ढांचे में शहर के जीने और सांस लेने की जगह भी जरूरी है। जिस मैदान पर स्टेडियम बनाने की बात चल रही थी, वह अब मैदान भी नहीं रह गया, और महज धरनास्थल हो गया है। ऐसा लगता है कि कुछ सौ बरस पहले जब रायपुर जैसे शहर की कल्पना की गई होगी, तब लोकतंत्र और आंदोलनों की कल्पना नहीं रही होगी कि इसके लिए भी जगह रखनी चाहिए। 
    अब पुराने रायपुर में सांस लेने को जगह नहीं है तो यहां आंदोलन ही आंदोलन होते हैं। दूसरी तरफ पूरी सरकार नए रायपुर में बसती है, और वहां पर हजारों एकड़ इलाका खाली पड़ा है, लेकिन वहां किया गया आंदोलन किसी की नजर में तो आएगा नहीं, जंगल में मोर नाचा, किसने देखा, जैसी नौबत आ जाएगी। वरना जहां सरकार है, वहीं पर आंदोलन अगर किए जाते, तो नया रायपुर कुछ बस जाता, और पुराना रायपुर कुछ बच जाता।


    एक नाव के सवार...
    कई बार कुछ लोग इसलिए बच निकलते हैं कि वे किसी और के साथ एक ही नाव पर सवार होते हैं, और ताकतवर लोग बचाते किसी और को हैं, लेकिन उसके लिए बचाना पूरी नाव को पड़ता है, और इसलिए बाकी भी बच जाते हैं। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले राजस्थान में काले हिरण के शिकार का मामला अदालत में चलते-चलते इस हद तक दम तोड़ गया कि सारे गुनहगार बच निकले, और ऐसा लगा कि काला हिरण ही बाजार जाकर बंदूक खरीदकर लाया होगा, और अपने को गोली मारकर उसी ने खुदकुशी की होगी। अब कुछ उसी तरह की बात छत्तीसगढ़ के वन विभाग में लंबे समय से चले आ रहे एक मामले को लेकर है जिसमें एक बड़े नेता के बड़े ही करीबी एक बड़े अफसर को बचाने के लिए अब कोशिश हो रही है, और उससे आखिर में जाकर ऐसा साबित हो सकता है कि आरा मिलों के ल_ों ने बाजार जाकर खुद ही टेप खरीदा, और लौटकर अपनी कमर नाप ली, इसमें सरकार के पैसे ही खर्च नहीं हुए। किसी एक को बचाने के चक्कर में बाकी लोग भी बचते दिख रहे हैं, और आखिर में लकड़ी के ल_ों को ही कुसूरवार ठहराकर फांसी देना ठीक रहेगा। 


    मंदिर हटाते अफसर हटा
    बस्तर में एक जगह सड़क किनारे के अवैध कब्जे हटाते हुए एक मंदिर को भी हटाया गया, और इसे लेकर वहां जनता इस कदर भड़की कि वहां के आईएएस एसडीएम राहुल वेंकट को हटाना पड़ा, और हटाकर जिले में कलेक्टर के मातहत सहायक कलेक्टर रखा गया। इसे लेकर कल आईएएस एसोसिएशन के आधा दर्जन लोग जाकर मुख्य सचिव से मिले, और कहा कि जैसे हालात में एक नौजवान अधिकारी को हटाया गया है, उससे बाकी अफसरों का मनोबल टूटेगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ तो सभी सार्वजनिक जगहों से धर्मस्थलों को हटाने का आदेश दिया है,  दूसरी ओर ऐसा करने पर मंदिर को बचाने की कोशिश हो रही है, और अफसर को तो हटा ही दिया गया है। नतीजा यह है कि पूरे प्रदेश में अवैध धर्मस्थलों का हौसला बुलंद हो गया है, और अफसर चुप बैठने की कगार पर हैं। एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय सिंह के साथ पांच और आईएएस गए थे, और इनके बीच बाद में यह चर्चा होती रही कि हो सकता है कि सीएस के कमरे में एसोसिएशन की ऐसी बैठक में टेबल के इस तरफ अजय सिंह आखिरी बार रहे हों। अगली ऐसी नौबत आने के पहले हो सकता है कि सीएस के कमरे पर तख्ती बदल जाए।   rajpathjanpath@gmail.com

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Posted Date : 03-Dec-2017
  • धान बोनस के मुकाबले तेंदूपत्ता बोनस दस फीसदी के आसपास हो गए हैं, लेकिन जिन आदिवासियों के पास यह पैसा जाएगा, वे किसानों के मुकाबले अधिक गरीब हैं, और छोटी सी रकम भी उनके लिए बहुत मायने रखेगी। लेकिन आज सरकार तेंदूपत्ता बोनस को जितनी बड़ी कामयाबी बता रही है, उसका इतिहास जिन लोगों को याद होगा वे इसके लिए आज भी अर्जुन सिंह को धन्यवाद देंगे। अविभाजित मध्यप्रदेश के इमरजेंसी के बाद के पहले मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने एक सामंती परिवार से आने के बावजूद, और अपनी संपन्नता के बावजूद प्रदेश के सबसे गरीब लोगों के लिए चार ऐसी योजनाएं बनाईं, जो कि उनके चले जाने के बाद, कांग्रेस सरकार के चले जाने के बाद भी किसी ने बदलने की हिम्मत नहीं की। इनमें से तेंदूपत्ते का राष्ट्रीयकरण सबसे बड़ा फैसला था क्योंकि उस वक्त छत्तीसगढ़ में निजी ठेकेदार जंगलों को ठेके पर लेते थे, और फिर मजदूरी देकर तेंदूपत्ते तुड़वाते थे, और फिर उन्हें बीड़ी बनाने वालों को बेचते थे। 
    इस कारोबार में हजारों करोड़ का मुनाफा ठेकेदारों को जाता था, और इनमें छत्तीसगढ़ भाजपा के उस वक्त के सबसे बड़े नेता लखीराम अग्रवाल भी शामिल थे। अर्जुन सिंह ने एक झटके में तेंदूपत्ता का निजी कारोबार बंद किया, तो उससे आदिवासियों को इतना फायदा होने लगा कि आज करीब चालीस बरस बाद भी उस फैसले को कोई छू भी नहीं सका। इसके अलावा उन्होंने गरीबों को एकबत्ती कनेक्शन दिया, रिक्शा चालकों को रिक्शों का मालिकाना हक दिया, और जो गरीब सरकारी जमीन पर जहां बसे हुए थे, वहीं पर उन्हें मकान के लिए जमीन का पट्टा दिया। गरीबों के भले के लिए इन चार योजनाओं से बड़ी और कोई बात कोई अकेले मुख्यमंत्री नहीं कर पाए थे, और ये चारों बातें आज न सिर्फ जारी हैं, बल्कि सरकार के लिए इन सबको आगे बढ़ाना भी एक मजबूरी बनी हुई है। 
    भविष्य पढऩा, और बनाना...
    प्रशासनिक मुखिया विवेक ढांड और पुलिस प्रमुख एएन उपाध्याय भले ही ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते हैं लेकिन कई प्रशासनिक और पुलिस के अफसरों को इस पर पूरा भरोसा है। कईयों को तो ज्योतिष का पूरा ज्ञान है और उनके कम्प्यूटर में ग्रह-नक्षत्रों की पूरी जानकारी फीड है जिसे देखकर वे समय-समय पर अपने करीबियों को परामर्श भी देते हैं। 
    दुर्ग एसपी रहे 83 बैच के आईपीएस अफसर शिवशंकर लाल कुछ समय पहले मध्यप्रदेश में डीजी पद से रिटायर हुए। उनकी ज्योतिष पर काफी कुछ पकड़ रही है और अब रिटायर होने के बाद भोपाल में लोगों को ज्योतिष का परामर्श देते हैं। छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर रहे स्व. वीके कपूर को भी ज्योतिष की अच्छी जानकारी थी। वे इसको लेकर अपने करीबियों को चौंकाते भी रहे हैं। सीएम के सलाहकार शिवराज सिंह, राजस्व मंडल के चेयरमैन केडीपी राव और एडीजी पवन देव को भी ज्योतिष का भरपूर ज्ञान हैं। उनसे कई लोग परामर्श भी लेते हैं। केडीपी राव का छत्तीसगढ़ में कार्यकाल सदमों से भरा हुआ रहा, लेकिन अपने ज्योतिष की जानकारी के चलते उन्हें समय रहते यह अहसास हो जाता था कि आने वाले वक्त में उनका कुछ बुरा होने वाला है। वे देश की सबसे प्रतिष्ठित ज्योतिष पत्रिकाओं में लगातार लिखते भी रहते हैं। लेकिन जाहिर है कि भविष्य का ज्ञान लोगों को बेहतर भविष्य बनाने में अधिक मदद नहीं करता।
    राहुल के निशाने पर, पर यहां करीब...
    गुजरात में अडानी समूह राहुल गांधी के निशाने पर हैं। राहुल अपनी सभाओं में मोदी सरकार पर चुनिंदा उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगा रहे हैं। अडानी समूह की भाजपा नेताओं से नजदीकियां जगजाहिर है। इन सबके बीच यहां के कांग्रेस नेताओं की  अडानी समूह से नजदीकियों की जमकर चर्चा है। सुनते हैं कि अडानी समूह को राज्य में दो जगह कोयला निकालने का काम मिला है। कंपनी ने कोयला परिवहन का काम कांग्रेस से जुड़े लोगों को दिया है। इनमें पार्टी के प्रभावशाली लोगों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका है। इसकी शिकायत पार्टी हाईकमान से भी की गई है। संगठन चुनाव के बाद प्रदेश कांग्रेस में काफी कुछ बदलाव होना है। अगर पार्टी इन शिकायतों को गंभीरता से लेती है, तो पद पाने के इच्छुक ऐसे नेताओं को किनारे लगाया भी जा सकता है। 
    धंधे का धंधा, सेवा की सेवा
    बहुत से बड़े कारखानेदार कभी सरकार के दबाव में, तो कभी अपनी मर्जी से समाजसेवा के कुछ काम करते हैं। वैसे तो सरकार ने यह तय कर रखा है कि उद्योग अपनी कमाई का कितना फीसदी समाजसेवा के लिए खर्च करें, लेकिन कुछ लोग खुद होकर भी उससे कहीं अधिक खर्च करते हैं। लोगों का रूझान इससे भी पता लगता है कि कौन से उद्योगपति किस तरह के काम में खर्च करना चाहते हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ में दो बड़े उद्योगपति ऐसे हैं जो कि अपने मुनाफे के एक कारोबार को आगे बढ़ाकर उसमें बहुत से और लोगों को जोडऩा चाहते हैं। राजनांदगांव के आईबी ग्रुप के बहादुर अली ने डेयरी का काम शुरू किया है, और उसे बड़े पैमाने पर ले जा रहे हैं, छत्तीसगढ़ के गांव-गांव तक उनकी डेयरी का दूध पहुंचने लगा है। दूसरी तरफ राजनांदगांव से ही निकलकर रायपुर आकर काम करने वाले कमल सारडा भी डेयरी के काम को बढ़ाते चल रहे हैं, अपने ब्रांड से दूध-घी की मार्केटिंग कर रहे हैं, और अब वे दूसरे किसानों को डेयरी चालू करवाकर उनके दूध को अपने ब्रांड की मार्केटिंग से जोडऩे का काम भी करने जा रहे हैं, जैसा कि एक वक्त गुजरात के आनंद में किया गया था, और वहां अमूल ब्रांड से दुनिया की एक सबसे बड़ी दुग्ध सहकारी संस्था खड़ी हुई है। यह जरूरी नहीं है कि किसी कारोबार की कामयाबी निजी मिल्कियत पर हो, अमूल ने यह साबित कर दिया है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी जरूरी नहीं है कि कोई कारोबारी अपने मुनाफे के साथ-साथ दूसरों का मुनाफा भी न करवा सके, ऐसा शायद राजनांदगांव के ये दो डेयरी मालिक कर सकें। कमल सारडा आनंद डेयरी को महान बनाने वाले भारत की दुग्ध क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन की आत्मकथा पढ़कर उसकी प्रेरणा से आगे बढ़ रहे हैं।  rajpathjanpath@gmail.com

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