राजपथ - जनपथ

15-Feb-2021 5:21 PM 84

गैस, पेट्रोल खरीदने की ताकत

इंटरनेट पर ‘गिव इट अप’  का मतलब हिन्दी में जानना चाहेंगे तो जवाब मिलेगा- हार मान लेना। ऐसा नहीं होना चाहिये। रायपुर में आज पेट्रोल प्रतिलीटर केवल 87.53 रुपये है। आज ही घरेलू सिलेन्डर के दाम में 50 रुपये की बढ़ोतरी भी हो गई। सोच सकारात्मक रखिये। प्रधानसेवक भी यही कहते हैं। कई शहरों में पेट्रोल 100 रुपये के ज्यादा दाम पर है। हम वहां के लोगों से 12 रुपये कम में खरीद रहे हैं।

गैस सिलेन्डर के दाम बढऩे पर भी खुशी होनी चाहिये। मोदी सरकार ने ‘गिव इट अप’ अभियान चलाया था। यानि हार मान लें। सबसिडी लेने से आप मना कर दें। कई मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, व्यापारियों ने इसमें भाग लिया और उन्होंने अपने इस अमूल्य योगदान को प्रचारित भी किया। आज हम आप भी उनकी ही तरह श्रेष्ठ हैं। घरेलू गैस की कीमत इतनी बढ़ चुकी है कि कुछ दान करने की जरूरत ही नहीं रह गई। वह टैक्स के तौर पर अपने आप ही सरकार के खाते में जा रही है। आम आदमी की ताकत को कम नहीं आंकना चाहिये।

एलआईसी सोच-समझकर कर रही है?

एक तरफ मोदी सरकार देश के बहुत से दूसरे सार्वजनिक उपक्रमों के साथ-साथ देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी एलआईसी में भी हिस्सेदारी बेचने जा रही है, दूसरी तरफ खुद एलआईसी दूसरे सरकारी उपक्रमों की तरह लापरवाही से काम कर रही है। लोगों को एलआईसी से जो प्रिंट की हुई चि_ियां, सूचना, नोटिस, रसीदें मिलती हैं, उनमें अक्सर स्याही इतनी हल्की रहती है कि पढ़ते ही न बने। यह भी हो सकता है कि दुनिया भर में बदनाम बीमा कंपनियों की तरह एलआईसी भी अब इस रास्ते पर चल रही हो कि ग्राहकों को समय पर सूचना न दी जाए, ताकि बाद में उनसे जुर्माना लिया जा सके, या पॉलिसी पूरी हो जाने पर भी अपठनीय सूचना भेजी जाए ताकि लोग रकम समय पर न निकाल सकें, और एलआईसी मुफ्त में उसका इस्तेमाल कर सके।

फिलहाल यह एक नमूना है कि एलआईसी किस तरह न पढऩे लायक सूचना भेजती है। और यह प्रिंट ही तो कम्प्यूटर-प्रिंटर निकालता है, उसे मोडक़र लिफाफे में डालकर भेजने का काम तो अभी भी इंसान करते हैं जिन्हें आसानी से यह दिखता है कि ये प्रिंट कोई पढ़ नहीं सकेंगे। महज एक कानूनी औपचारिकता पूरी करने के लिए एलआईसी ऐसे कागज भेजना दिखा रही है जिसे न भेजें तो सिर्फ कानूनी औपचारिकता की कमी रहेगी।

कॉलेज में भी पढ़ाएं, ऑनलाईन भी!

छत्तीसगढ़ में कॉलेज खुलने का हुक्म जारी हुआ, तो एक बात पर कॉलेज के शिक्षक हैरान हैं। अब कॉलेज जाकर क्लास लेनी है, और जो छात्र-छात्राएं वहां नहीं पहुंचेंगे, उन्हें ऑनलाईन भी पढ़ाना है। हर शिक्षक-शिक्षिका को इतना काम करना है, तो आगे चलकर जब सब सामान्य होगा, तो इनसे आधे लोगों से भी काम चल जाएगा क्योंकि अभी 10-12 घंटे रोज काम करने की आदत हो गई है।

वैसे हालात ठीक होने पर सरकार को एक मुहिम चलाकर अपने हर कर्मचारी-अधिकारी को ऑनलाईन काम करने की ट्रेनिंग देनी चाहिए, और कम्प्यूटर-इंटरनेट का हर जगह इंतजाम भी करना चाहिए क्योंकि कुंभ के मेले में खोया हुआ कोरोना का भाई साल-छह महीने में पता नहीं कब लौटकर आ जाए, और एक बार फिर लॉकडाऊन-वर्कफ्रॉमहोम की नौबत आ जाए। इस बार तो लोग और दफ्तर तकनीकी रूप से तैयार नहीं थे, लेकिन अगली बार की सोचकर यह इंतजाम कर लेना चाहिए।

शेयर से विरक्त आम आदमी

बढ़ती महंगाई और सोने के गिरते भाव के बीच शेयर सेंसेक्स का ऊंचा होते जाना वाजिब है। शुक्रवार को जब बाजार बंद हुआ तो 50 हजार का आंकड़ा था। आज बाजार खुलते ही 52 हजार पर पहुंच गया। कोरोना काल में जब लोग दूसरे काम धंधे नहीं कर पाते थे तो ऑनलाइन ट्रेडिंग ही करते थे। कुछ जोखिम उठाने वालों ने घर बैठे-बैठे 15-20 लाख रुपये कमा लिये।

शेयर की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचना बताता है कि आम आदमी की माली हालत से इसका कोई रिश्ता नहीं है। एक आंकड़ा है कि केवल 0.6 प्रतिशत लोग शेयर मार्केट में पैसा लगाते हैं और इनमें से भी करीब 0.1 प्रतिशत लोग नियमित ट्रेडिंग करते हैं। आम लोगों को तो इसी बात से मतलब है कि रोजमर्रा की चीजें महंगी हुईं या सस्ती। इन दिनों सोनी लिव पर एक वेब सीरिज बहुत पॉपुलर हुई है- ‘स्कैम 1992’। स्टॉक मार्केट का खेल कैसा है, इस वेब सीरिज को देखकर बड़ी गहराई से समझा जा सकता है। मीडिया से जुड़े लोगों के लिये इसमें महत्वपूर्ण जानकारी है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्टर सुचेता दलाल ने हर्षद मेहता के फ्रॉड को सामने लाया था। बाद में उन्हें इस रिपोर्टिंग के लिये ‘पद्मश्री’ से भी सुशोभित किया गया।

खनन माफियाओं पर नरमी

मुंगेली जिले में सरपंच के पति और उनके साथियों ने पूर्व सरपंच और उनके समर्थकों पर तब रॉड, लाठी-डंडों से हमला कर दिया जब वे अवैध मुरूम खनन को रोकने के लिये गये। बलवा हो गया, अस्पताल में घायलों का इलाज हो रहा है। पूरे राज्य में नदियों से रेत और सरकारी जमीन से मुरूम के अवैध उत्खनन का काम बड़े पैमाने पर हो रहा है। प्रतिपक्ष भाजपा इसके विरोध में ज्ञापन प्रदर्शन करती रही है। जगदलपुर में कल ही भाजपा नेताओं ने अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। पर बाकी जगहों पर वे खामोश हैं। शायद उनके भी लोग इस धंधे में हैं।

शांत छत्तीसगढ़ में उत्खनन को लेकर हिंसक वारदातें हो नहीं रही है। होनी भी नहीं चाहिये। पर इसकी एक वजह यह भी है कि खनिज विभाग के अधिकारी आंख मूंद लेते हैं। शायद सोचते हों कि रेड क्यों करें, झंझट लेने से क्या फायदा। ज्यादातर लोग तो सरकार से जुड़े लोग ही हैं। मध्यप्रदेश की स्थिति तो बड़ी खराब है जहां डीएसपी, एसडीएम, पत्रकार या तो मारे गये या बुरी तरह घायल हुए। क्या हम छत्तीसगढ़ में भी ऐसी नौबत आने का इंतजार करें?


14-Feb-2021 5:03 PM 177

सरगुजा के कलाकारों की नाराजगी

मैनपाट महोत्सव में खेसारीलाल यादव को लगभग 20 लाख रुपये देकर बुलाया गया। कैलाश खेर को, मालूम हुआ है, 25 लाख रुपये दिये जायेंगे। टीवी, यूट्यूब पर अक्सर दिख जाने वाले इन कलाकारों के पीछे महोत्सव के बजट का इतना बड़ा हिस्सा खर्च किये जाने पर स्थानीय कलाकारों ने अपना विरोध जताया है। लोककला और थियेटर से जुड़े कलाकार कहते हैं कि जब उन्हें बुलाया जाता है तो हाथ खींचकर बहुत कम पैसा दिया जाता है। भुगतान के लिये भी महीनों चक्कर लगाने पड़ते हैं। पर ये कलाकार पूरी रकम हाथ में आये बिना मंच पर चढ़ते नहीं। विरोध में कुछ लोगों ने यह भी कहा है कि कैलाश खेर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के घोर समर्थक हैं। उन्होंने किसान आंदोलन के विरोध में हाल ही में कई पोस्ट डाले हैं।  कांग्रेस नेता अगर किसान आंदोलन के समर्थन में हैं तो उन्हें ऐसे मौके पर क्यों बुलाया गया?

इस बारे में जब खाद्य मंत्री अमरजीत भगत कहते हैं कि किस कलाकार को बुलाना है यह अफसर तय करते हैं। कैलाश खेर के किसान आंदोलन के खिलाफ पोस्ट्स पर कहा कि किसी की राजनीतिक विचारधारा क्या है, इससे क्या फर्क पड़ता है। कलाकार तो कलाकार है।

बेशक, पर कांग्रेस इसे फिजूलखर्ची मानती रही है, जब राज्योत्सव में भाजपा की सरकार इसी तरह से बड़ी रकम देकर बॉलीवुड कलाकारों को बुलाया करती थी। उसके विरोध में बयानबाजी की जाती थी। अब वही रास्ता इन्हें क्यों रास आ रहा है?

महोत्सव में अफरा-तफरी

भोजपुरी कलाकार खेसारी लाल यादव के कार्यक्रम में मैनपाट महोत्सव के दौरान लाठियां चल गई। जो बातें सामने आई हैं उसके अनुसार बैठक व्यवस्था ही ठीक नहीं थी। सामने जमा लोगों के कारण पीछे के लोगों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, कुर्सियां पर्याप्त नहीं थी। साउन्ड सिस्टम भी खराब था। नाराज लोग कलाकार को करीब से देखने सुनने के लिये इधर-उधर चढऩे लगे और कई लोग जख्मी भी हो गये। पुलिस को सीधा उपाय समझ में आया लाठियां घुमाओ। इस घटना से महिलायें और बच्चे ज्यादा डर गये। अब पुलिस सफाई दे रही है कि लाठियां चलाई नहीं, सिर्फ लहराई। बारीक सा अंतर है। लाठी चार्ज करना एक दांडिक कार्रवाई है, इसलिये इस शब्द का तकनीकी तौर इस्तेमाल करने से प्रशासन परहेज करता है।

मैनपाट की छत्तीसगढ़ में अलग छाप है। यहां तिब्बतियों का रहवास और बौद्ध मंदिर हैं। 3400 फीट की ऊंचाई पर मौजूद अद्भुत प्राकृतिक छटा की वजह से इसे छत्तीसगढ़ का शिमला भी कहते हैं। महोत्सव का आयोजन इस पहचान को ही व्यापकता देने के लिये है, पर प्रशासनिक तैयारियों में कमी के चलते विवादित हो गया है। आज वहां कैलाश खेर और अनुज शर्मा के कार्यक्रम हैं। देखना होगा, व्यवस्था को लेकर दर्शक, खासकर महिलायें और बच्चे निश्चिंत हैं या नहीं।

केवल किराये के लिये कोरोना

कोरोना महामारी के बहाने से बंद की गई लोकल, पैसेंजर ट्रेनों को आखिरकार रेलवे ने शुरू कर दिया है। आखिरी वक्त तक रेलवे इस बात को छिपाती रही कि इन ट्रेनों में पहले की तरह किराया रहेगा या नहीं। काउन्टर खुले तब लोगों को मालूम हुआ कि कई छोटे स्टेशनों पर ये रुकेंगी भी नहीं और किराया एक्सप्रेस का है। । मसलन, रायपुर से बिलासपुर तक सफर के लिये 30 रुपये की जगह 55 रुपये लिये जा रहे हैं। रेलवे अधिकारियों का कहना है कि कोरोना का प्रसार न हो, यात्री ज्यादा सफर करने से बचें इसलिये किराया ज्यादा लिया जा रहा है। मासिक टिकटें और रियायती टिकट भी इसी नाम से बंद हैं। हकीकत यह है कि कोरोना के डर से गेट पर केवल टिकट चेक किया जा रहा है। मास्क और सैनेटाइजर भी जरूरी नहीं है। एक बर्थ पर चार-चार यात्रियों को टिकट दी जा रही है, यानि सोशल डिस्टेंस की भी परवाह नहीं । ऐसे में केवल किराया बढ़ा देने से कोरोना कैसे रुकेगा, यह रेलवे ही बता सकती है।


13-Feb-2021 5:51 PM 206

शुभ टोटका है यह राज्य..!

प्रदेश भाजपा की प्रभारी डी पुरंदेश्वरी, सहप्रभारी नितिन नबीन के साथ शनिवार को रायपुर पहुंची, तो कई नेताओं ने नबीन को बधाई दी। नबीन कुछ दिन पहले ही बिहार सरकार में मंत्री बने हैं। एक नेता ने उनसे कहा कि छत्तीसगढ़ आप लोगों  के लिए शुभ है, जो भी यहां प्रभारी रहा, उसकी राजनीतिक उन्नति हुई है। इस पर दोनों नेता मुस्करा दिए। सर्वविदित है कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद नरेन्द्र मोदी प्रभारी रहे। वे तो प्रदेश भाजपा कार्यालय में आगजनी के साक्षी भी रहे हैं। बाद में वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने, और अब प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाल रहे हैं। कुछ समय बाद वेंकैया नायडू यहां के प्रभारी बनाए गए। बाद में वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने, और केन्द्र सरकार में मंत्री रहे। अभी उपराष्ट्रपति के पद पर हैं।

छत्तीसगढ़ में पहली बार विधानसभा आम चुनाव के पहले राजनाथ सिंह को प्रभारी बनाया गया था। उस समय राजनाथ सिंह के उत्तरप्रदेश में सीएम रहते पार्टी को बुरी हार गई थी। मगर छत्तीसगढ़ प्रभारी बनते ही उनकी भी किस्मत चमक गई। वे केन्द्र सरकार में मंत्री बने। बाद में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे, और वर्तमान में रक्षा मंत्री का दायित्व संभाल रहे हैं। राजनाथ सिंह के बाद धर्मेन्द्र प्रधान को यहां का प्रभारी बनाया गया। बाद में उनकी भी राष्ट्रीय राजनीति में पैठ बनी, और पिछले 6 साल से केन्द्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।

धर्मेन्द्र प्रधान के बाद जगतप्रकाश नड्डा यहां के प्रभारी रहे। बाद में वे पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री बने, फिर केन्द्र सरकार में मंत्री रहे, और वर्तमान में राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व संभाल रहे हैं। कुछ समय के लिए रामशंकर कठेरिया प्रभारी रहे, लेकिन वे यहां नहीं आए। फिर भी उनकी राजनीतिक उन्नति हुई। वे केन्द्र सरकार में मंत्री रहे, और वर्तमान में अनुसूचित जाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

कठेरिया के बाद डॉ. अनिल जैन प्रभारी रहे। उनके कार्यकाल में यहां पार्टी की दुर्गति हो गई। फिर भी उन्हें केन्द्र सरकार में मंत्री बनाए जाने की चर्चा चल रही है। वर्तमान सह प्रभारी नितिन नबीन तो कुछ दिनों के भीतर ही बिहार में मंत्री पद पा गए। प्रभारी डी पुरंदेश्वरी की भी उज्जवल भविष्य की संभावनाएं जताई जा रही है। पहली तो यह कि वे आंध्रप्रदेश में भाजपा का चेहरा हो सकती हैं। पुरंदेश्वरी, आंध्रप्रदेश के सीएम रहे एनटी रामाराव की बेटी हैं। वे केन्द्र सरकार में मंत्री रही हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ भाजपा संगठन का प्रभार संभालने के बाद वे भी बाकियों की तरह राजनीतिक परिदृश्य में छा जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी यहां पिछले  रिकॉर्ड को देखते हुए तो कम से कम यह कहा ही जा सकता है।

अजय चंद्राकर तैयारी से हैं..

पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर और महामंत्री भूपेन्द्र सवन्नी के बीच विवाद अब तक खत्म नहीं हुआ है। इस विवाद पर प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने महामंत्री (संगठन) पवन साय से बात की थी। सुनते हैं कि अजय ने बकायदा एक लिस्ट तैयार की, जिससे यह साफ हो जाएगा कि उन्हें कब-कब बैठक में नहीं बुलाया गया। जबकि बैठक व्यवस्था और सूचना देने की जिम्मेदारी सवन्नी की थी। अजय इस बार पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। देखना है कि पुरंदेश्वरी इस विवाद का निपटारा कैसे करती हैं।

जान को खतरा या कुर्सी की लड़ाई?

को-वैक्सीन का इस्तेमाल नहीं करने को लेकर स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के बयान और चि_ियों पर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और सनसनी नहीं फैलाने की नसीहत दी । हालांकि उन्होंने माना है कि इसे क्लीनिकल ट्रायल के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाना है। यह स्वास्थ्य विभाग के विशेषज्ञ और परीक्षण के सिद्धांतों को जानने वाले बता पायेंगे कि क्या बड़े पैमाने पर आम लोगों को क्लीनिकल ट्रायल के तौर पर क्या कोई वैक्सीन दी जा सकती है? क्या लोगों का यह अधिकार नहीं है कि वे ट्रायल के लिये तैयार होने से मना कर दें। सरकार इस मामले में लोगों पर दबाव डाले?  केन्द्र का कहना है कि देशभर में इस तरह के ट्रायल हो रहे हैं। इसमें कोई खराबी नहीं है। लक्ष्य के अनुरूप वैक्सीनेशन नहीं कर पाने के कारण छत्तीसगढ़ सरकार लोगों का ध्यान भटका रही है।

इधर पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने इसे सीधे प्रदेश कांग्रेस में सत्ता की राजनीति से जोड़ दिया और कहा कि यह मंत्रिमंडल का सामूहिक फैसला नहीं है। कुर्सी की लड़ाई में कोविड मरीजों की जान को जोखिम में डाला जा रहा है। केन्द्रीय मंत्री की जवाबी चि_ी और प्रदेश के भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया के बाद क्या को-वैक्सीन इस्तेमाल करने का निर्णय पलट दिया जायेगा, या फिर टीके  रखी रह जायेंगी, यह आने वाले दिनों में मालूम होगा।

हवाई चप्पल वाले कैसे उड़ेंगे ?

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से हवाई सेवा शुरू करने की मांग राज्य बनने के बाद से ही होती रही है लेकिन इस मांग ने धार पकड़ी जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने रुचि ली। इसी दौरान शहर के नागरिकों ने संघर्ष समिति बना ली और वे बीते एक साल से भी ज्यादा समय से वे अखंड धरना दे रहे हैं। हाईकोर्ट में लगी याचिकाओं ने भी हवाई सेवा शुरू करने के लिये केन्द्र और राज्य सरकार दोनों पर दबाव बनाया है। अब मार्च से यहां से उड़ानें शुरू हो जाने की घोषणा की गई है। उड़ान स्कीम के अंतर्गत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उड़ान- उड़े देश का आम नागरिक (यूडीएएन) योजना शुरू करते हुए घोषणा की थी कि हवाई चप्पल पहनने वाले भी हवाई सफर कर सकेंगे। बिलासपुर से अधिकांश महानगरों की दूरी 600 किलोमीटर से अधिक है, जिसके चलते उड़ान स्कीम में टिकटों पर रियायत नहीं मिलने वाली। ऊपर से अब यात्रा टिकट 30 प्रतिशत तक महंगी भी कर दी गई है। न्यूनतम किराया भी 2200 रुपये हो गया है। बिलासपुर हवाई अड्डे को तैयार करने के रास्ते में अनेक बाधायें तो दूर कर ली गईं, पर उड़ानें शुरू होने के बाद देखना होगा कि चप्पल पहनने वाले कितने लोग इनमें यात्रा का सुख ले पायेंगे।

सूपेबेड़ा से इच्छा मृत्यु की मांग

राज्यपाल अनुसूईया उइके सुपेबेड़ा, गरियाबंद के दौरे पर 22 अक्टूबर 2019 को गई थीं। इस दौरान सरकार और राज्यपाल के बीच थोड़ा टकराव भी हुआ। हेलिकॉप्टर देने या नहीं देने के नाम पर। आखिरकार राज्यपाल वहां गईं, साथ में स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव भी थे। राज्यपाल ने किडनी पीडि़तों और उनके परिवार के लोगों की तकलीफें सुनीं। सरकार को कई निर्देश दिये। स्वास्थ्य मंत्री ने आश्वस्त किया कि यहां के किडनी मरीजों का न केवल इलाज मुफ्त होगा बल्कि अस्पताल में रहने खाने का खर्च भी उठाया जायेगा। अन्य विभागों ने भी शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। लेकिन अब वहां क्या स्थिति है। जिस तेल नदी से शुद्ध पेयजल पहुंचाने का वादा किया था वह फाइलों में उलझ गई है। किडनी से मौतों का सिलसिला अब भी जारी है और यहां लोगों को राहत नहीं मिली। यही वजह है कि गरियाबंद में कल कलेक्टर से मिलकर सुपेबेड़ा और आसपास के 10 गावों के लोगों ने इच्छा मृत्यु मांगी है और अपनी बात राज्यपाल तक पहुंचाने का निवेदन किया है। ग्रामीण बता रहे हैं कि हाल के दिनों में मौतों का आंकड़ा 90 से ऊपर जा चुका है।

सुपेबेड़ा व आसपास के गांवों की यह समस्या करीब 10 साल से है। अब तक वहां किडनी से मौतें हो रही हैं। राज्यपाल, स्वास्थ्य मंत्री और अन्य नेताओं की पहल के बावजूद। क्या यह पीड़ादायक नहीं है?


12-Feb-2021 5:35 PM 178

कोरोना के बाद कोचिंग सेंटर्स का हाल

स्कूल-कॉलेजों की पढ़ाई के भरोसे प्रतिस्पर्धा में आना मुश्किल माना जाता है। कोचिंग सेंटर्स युवाओं की उपलब्धि के अनिवार्य संस्थान के रूप में विकसित हो चुके हैं। इस स्थिति को बहुत से लोग अच्छा भी नहीं मानते। कोचिंग संस्थानों की फीस इतनी ज्यादा होती है कि सक्षम परिवारों के मुकाबले गरीब परिवारों के बच्चे पिछड़ जाते हैं। कोचिंग सेंटर्स की अहमियत देखकर कुछ सरकारी योजनायें भी प्रतिभावान गरीब बच्चों के लिये चल रही हैं। हालांकि इन पर किये जाने वाले खर्च के मुकाबले नतीजे उत्साहजनक नहीं मिलते। कोचिंग सेंटर्स का व्यवसाय कुछ सालों से छत्तीसगढ़ में खूब फलता-फूलता दिख रहा है। भिलाई, रायपुर, बिलासपुर जैसे शहरों में इनकी भरमार है।

अब स्थानीय कोचिंग संस्थायें दूसरे नंबर पर आती हैं। कोटा, दिल्ली, कोलकाता, नागपुर जैसे शहरों की पापुलर ब्रांड की ब्रांच की तरफ युवाओं का रुझान ज्यादा दिखाई देता है। धंधे में कुछ संचालकों ने तो इतनी कमाई कर ली कि टिकट की दौड़ में भी लग गये। दूसरी ओर इन कोचिंग संस्थानों के भरोसे, नौकरी से वंचित कई प्रतिभावान युवाओं को रोजगार भी मिल जाता है। आमदनी का बहुत थोड़ा हिस्सा उनके पास आता है फिर भी इससे खर्च चलाने में उन्हें मदद तो मिल जाती है।

पर, कोविड महामारी ने सब गड्ड-मड्ड कर दिया। अनेक कोचिंग संस्थानों की इतने दिनों में हालत खराब हो गई है। स्टाफ और टीचर्स का वेतन, फ्रेंचाइजी फीस, भवन किराया, बिजली बिल पटाने के दबाव में जो टूटे कि दुबारा ताला खोलने की स्थिति नहीं रह गई है।

लॉकडाउन का दूसरा असर यह हुआ कि ऑनलाइन कोचिंग का व्यापार खूब पनपा। विद्यार्थी जो सचमुच कैरियर को लेकर गंभीर है वे इसे ज्यादा सुविधाजनक पा रहे हैं और वे अब कोचिंग सेंटर्स की तरफ दुबारा रुख करने से बच रहे हैं। छत्तीसगढ़ पीएससी की प्रारंभिक परीक्षा 14 फरवरी को होने जा रही है। इसमें शामिल होने वाले ज्यादातर विद्यार्थियों ने ऑनलाइन तैयारी की है। ऑनलाइन क्लासेस का असर, फिजिकल क्लासेस की तरह नहीं है पर फीस काफी कम है।

कोचिंग इंस्टीट्यूट्स को 50 प्रतिशत उपस्थिति और कोरोना गाइडलाइन के पालन के साथ खोलने की अनुमति दी गई है पर अनेक संस्थानों का बोर्ड अब उतर चुका है। कुछ फिर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। देखना होगा कि इन ठिकानों पर पहले की तरह चहल-पहल में कितना वक्त लगता है या फिर जो बदलाव अभी दिख रहा है वह एक नया स्थायी ट्रेंड बन जायेगा। 

आईपीएस का फिटनेस वीडियो

बहुत से आईपीएस अधिकारी हैं जो नियमित रूप से वर्कआउट कर अपनी फिटनेस बनाये रखते हैं। वे जब सोशल मीडिया पर इसकी फोटो, वीडियो पोस्ट करते हैं तो जाहिर है इसका प्रभाव उनके मातहतों पर भी पड़ता है और उन्हें भी फिट दिखने की इच्छा होती है। आईपीएस रतनलाल डांगी के अनेक फिटनेस वीडियो फेस बुक, ट्विटर पर पोस्ट होते रहते हैं। 7 फरवरी की उनकी दौड़ के वीडियो को 41 लाख लोगों ने देखा है। अन्य वीडियोज भी हजारों बार देखे जा चुके हैं। सब वीडियो, फोटो मिला दें तो उन्हें देखने वालों की संख्या करीब एक करोड़ है और शेयर करने वाले भी कई हजार। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों को सुविधा रहती है कि वे आम दिनों में काम और व्यायाम के घंटे खुद तय कर सकें।

आईजी दीपांशु काबरा, डीजी आर के विज, अपनी कसरत की तस्वीरें पोस्ट करते रहते हैं. दीपांशु और उनकी पत्नी साईकिल पर 25 -50 किलोमीटर चले जाते हैं।

फील्ड पर काम करने वाले टीआई, हवलदार, सिपाही इतना वक्त इन गतिविधियों को दे सकें तो और भी बेहतर। इन्हें काम का बोझ इतना होता है कि वे अपना शरीर नहीं संभाल पाते, बीमारियां घेर लेती हैं और, कई बार तो मानसिक तनाव के चलते बहुत अप्रिय घटनायें भी सुनने को मिलती रहती है। 

अब होली का इंतजार

बीते साल कोरोना महामारी से बचाव के लिये लॉकडाउन होली त्यौहार के ठीक कुछ दिनों बाद लगा था। कुछ लोग घबरा रहे थे कि होली मनाने के दौरान वे वायरस के सम्पर्क में तो नहीं आ गये। पर अनेक लोगों को राहत भी थी कि चलो कम से कम त्यौहार तो मना लिया। बीच में अनेक तीज-त्यौहार गुजरे। सबमें सोशल डिस्टेंसिंग जरूरी थी। धार्मिक स्थलों पर ताला लगा रहा। एक जगह एकत्रित होने पर मनाही थी। पर अब तो हर तरफ ढील दी जा रही है। लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि होली तक क्या इतनी बेहतर स्थिति हो पायेगी कि लोगों को गुलाल लगाने, गले लगने, रंग डालने की मंजूरी मिल जाये। मिल भी जाये तो क्या लोग बेफिक्री से हर बार की तरह अगली होली मना पायेंगे। वैसे इस साल की होली मार्च के अंत में 29 तारीख को है। यानि, तय करने में अभी लगभग डेढ़ माह का वक्त है। 


11-Feb-2021 5:52 PM 191

कुछ खुश, कुछ नाखुश

काफी उहापोह के बाद भाजयुमो की कार्यकारिणी तो घोषित हो गई, लेकिन कई ऐसे नाम हैं, जो कि तय मापदण्ड में खरे नहीं उतरते हैं। उन्हें भी जगह मिल गई। पार्टी ने 35 वर्ष से अधिक उम्र वालों को कार्यकारिणी में जगह नहीं देने का फैसला लिया था। बावजूद इसके कई ऐसे लोग जगह पा गए, जिनकी उम्र 40 के आसपास है।

ये अलग बात है कि पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष के सख्त निर्देश के बाद नेता पुत्रों को कार्यकारिणी में जगह नहीं मिल पाई। जबकि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के बेटे नितिन अग्रवाल, रामसेवक पैकरा के बेटे लवकेश पैकरा, रामविचार नेताम की बेटी सहित कई अन्य कतार में थे।

सुनते हैं कि अध्यक्ष अमित साहू अपने करीबी 15 लोगों को कार्यकारिणी में जगह दिलाने में कामयाब रहे। पूर्व सांसद अभिषेक सिंह की भी खूब चली है। कई ऐसे युवा नेता हैं, जिन्हें कार्यकारिणी में जगह  नहीं मिल पाई है, वे सभी अभिषेक को कोस रहे हैं। नाराज युवा नेता दबे स्वर में कह रहे हैं कि अभिषेक की दखलंदाजी की वजह से उन्हें जगह नहीं मिल पाई है। भले ही यह सच न हो, लेकिन युवा मोर्चा की कार्यकारिणी को लेकर विवाद बरकरार है। 

पूरा प्रशासनिक अमला परेशान

कांकेर बस स्टैण्ड में अवैध कब्जा हटाना स्थानीय प्रशासन को भारी पड़ रहा है। कुछ ऐसे निर्माण को भी हटा दिया गया, जिन्हें पट्टा मिला  हुआ था। विधानसभा में सवाल लगा, तो जवाब सही नहीं आया। प्रश्नकर्ता विधायक ननकीराम कंवर ने विधानसभा की प्रश्न संदर्भ समिति में गलत जवाब देने की शिकायत की। समिति ने जांच शुरू की, तो हडक़ंप मच गया। कलेक्टर ने नजूल अफसर और तहसीलदार से स्पष्टीकरण मांगा है। बात यही खत्म नहीं हो रही है। विधानसभा के बजट सत्र में इस मामले को लेकर अलग-अलग आधा दर्जन सवाल लगे हैं। हाल यह है कि पूरा प्रशासनिक अमला परेशान है।

ट्रायल के लिये को-वैक्सीन, हरगिज नहीं

कोविड महामारी ने फार्मा कम्पनियों को भारी मुनाफा दिया । पीपीई किट, बेड, इक्विपमेंट्स, वेंटिलेटर, सैनेटाइजर, क्लोरोक्वीन दवा, आदि की अचानक मांग बढ़ी और पूरे देश में इसकी आपूर्ति की होड़ लगी। लाखों पैकेट दवायें निर्यात भी हुईं। कुछ की गुणवत्ता और कीमत पर सवाल भी उठते रहे लेकिन महामारी के खौफ ने इस पर ज्यादा बहस के लिये जगह नहीं दी। वैक्सीन के ईजाद और इसके उत्पादन को लेकर यही बात है। पहले दूसरे देशों से वैक्सीन मांगने की बात थी पर बाद में देसी उत्पाद ही बाजार में पहले आ गये। बाबा रामदेव ने कोरोलिन का दावा सबसे पहले किया पर उसे आईसीएमआर ने मानने से मना कर दिया। इसके बाद मान्यता प्राप्त वैक्सीन का उत्पादन तो बढ़ा पर कोरोना का डर भागने लगा।

जो परिस्थितियां बन रही हैं उससे लगता है कि वैक्सीन निर्माताओं की उम्मीद के अनुरूप मांग आ नहीं रही है। छत्तीसगढ़ में फ्रंटलाइन वारियर्स, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का पंजीयन किया गया पर ऐसा नहीं हुआ कि वे वैक्सीन लगवाने के लिये टूट पड़े, बल्कि इससे बचते भी रहे। आज प्रदेश में कोविशील्ड का पहला चरण पूरा करने का आखिरी दिन है, पर अब भी लाखों की संख्या में वैक्सीन बच गये हैं। पखवाड़े भर पहले एक दूसरी दवा, को-वैक्सीन की खेप केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भेज दी। को-वैक्सीन लगाने के लिये जो तैयार होंगे एक फार्म भी उन्हें भरना होगा, जिसमें सहमत होना है कि वे इसे ट्रायल बेस पर ही लगवा रहे हैं। ऐसा करने में खतरा तो है। ट्रायल के लिये आम लोगों को जबरदस्ती तैयार करना तो ठीक नहीं। फिलहाल, छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे इस्तेमाल में लाने से मना कर दिया है। को-वैक्सीन स्टेट लेवल के स्टोर रूम में ही रखे हुए हैं। सरकारी खरीदी और घोषणा के चलते ये मुफ्त में लगने हैं। आने वाले दिनों में वैक्सीन की कीमत तय करने की योजना थी, पर जब मुफ्त की वैक्सीन ही नहीं खप पा रही हो तो..?

राम के नाम पर ऑनलाइन दे बाबा...

भगवान के नाम पर भीख, चंदा, चढ़ावा, दक्षिणा मांगना सबसे आसान काम है। ट्रेन, बस-स्टाप और घर के दरवाजे तक भी पारम्परिक भिक्षावृत्ति करने वालों के मुंह से जब निकलता है, राम के नाम पर दे दे बाबा.. तो सुनकर लोग पिघल जाते हैं। कोई तरस खाकर, कोई श्रद्धा-विश्वास की वजह से तो कोई-कोई पीछा छुड़ाने के लिये इन पर मेहरबानी करता आया है।

राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिये जो ‘निधि’ देशभर से एकत्र हो रही है वह इन दिनों चर्चा में है। शायद ही कोई सहयोग देने से मना कर रहा हो। इसे ऑनलाइन जमा करने की सुविधा भी है। इसके लिये अधिकारिक पोर्टल और एप भी तैयार किये गये हैं। ऑनलाइन ठगी के इन दिनों के कितने कारनामे हो रहे हैं, हम सब वाकिफ हैं ही। अब राजधानी की साइबर सेल की जानकारी में यह बात आई है कि लोगों के फोन व सोशल मीडिया पेज पर, फर्जी लिंक भेजे जा रहे हैं। लोग इसके जरिये पैसा जमा कर भी रहे हैं। लोगों को पता नहीं है कि उन्होंने फर्जी लिंक में पैसे दे डाले। इसलिये कितनी ठगी इस तरह हो चुकी है, यह पता नहीं चला है। फर्जी लिंक में पैसा जमा करने वालों को पता नहीं, पुण्य मिलेगा या नहीं, पर ठगों के एकाउन्ट में तो लक्ष्मी आती जा रही है। ऐसी ठगी के सामने बिलासपुर की एक महिला द्वारा चंदे के लिये रसीद छपवाना तो मामूली सा अपराध लगता है।

एक साल में नक्सल का खात्मा! 

बस्तर से नक्सलवाद खत्म करने के लिये हर सरकारें संकल्प लेती रही हैं। महीनों कोई वारदात नहीं होती तो कहा जाता है कि अब वे बिखर गये हैं। जन प्रतिनिधि श्रेय भी लेते हैं। पर अचानक फिर कोई बड़ा हमला कर नक्सली अपनी मौजूदगी का एहसास करा देते हैं। दंतेवाड़ा नक्सल प्रभावित संवेदनशील इलाका है। यहां से एक साल के भीतर नक्सल खत्म करने का दावा किया गया है। दावा किसी नेता ने नहीं पुलिस कप्तान ने किया है। वीर गुंडाधूर और बस्तर के पहले आंदोलन की याद में यहां कल भूमकाल दिवस मनाया गया। इसी में यह दावा किया गया। एक बात एसपी ने और कही- पुलिस और नक्सलियों में से जो जनता का विश्वास जीतेगा, जीत उसी की होगी। वास्तव में सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि नक्सली आदिवासियों का विश्वास जीतने में क्यों सफल होते रहे हैं। यह भी जुड़ा हुआ प्रश्न ही है कि भरोसा सहज सहमति की वजह से है या भय के कारण। यही सवाल जनता और पुलिस के बीच के विश्वास जीतने के मामले में उठाया जा सकता है। चूंकि यह पुलिस का बयान है, राजनीतिक नहीं। इसलिये एक साल बाद क्या कोई बदलाव आता है, देखना जरूरी हो जायेगा।


10-Feb-2021 5:37 PM 163

पीडि़त रेंजर का सस्पेंड होना

कथित मीडियाकर्मी और उसकी गर्लफ्रेंड की ब्लैकमेलिंग के पीछे 1.40 करोड़ लुटा चुके मुंगेली के रेंजर सीआर नेताम ने पैसे की व्यवस्था करने के लिये ऐसा फर्जीवाड़ा कर दिया कि अभी तो उसे निलम्बित कर दिया गया है, अब एफआईआर की तैयारी भी की जा रही है। दरअसल, नेताम ने 25 लाख रुपये रतनपुर के मजदूरों के निकाल लिया। वह भी तब जब 6 माह पहले यहां से उनका तबादला हो चुका था। दरअसल नये अधिकारी के आने पर सम्बन्धित बैंकों में उनका अधिकृत हस्ताक्षर भी भेजा जाता है। बैंक के पास जो भेजा ही नहीं गया और रतनपुर से हटने के बाद भी वे यह रकम निकाल ले गये। अब रतनपुर के मजदूर अपनी मजदूरी के लिये परेशान हैं तो दूसरी तरफ संस्पेंड हो चुके नेताम के खिलाफ धोखाधड़ी की एफआईआर दर्ज कराये जाने की तैयारी हो रही है।

कामयाब होगा सोशल मीडिया कैम्पेन?

कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में सोशल मीडिया कैम्पेन के लिये फिलहाल 11 हजार  स्वयंसेवकों को जोडऩे का अभियान शुरू करने का निर्णय लिया है। कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपने विरोधी दल भाजपा से काफी पीछे है। न केवल प्रदेश स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी। भाजपा के असल नाम से कुछ सैकड़ा ही प्रोफाइल होंगे पर फेसबुक, वॉट्सअप और दूसरे प्लेटफॉर्म पर हजारों की संख्या उन लोगों की है जो पहचान में ही नहीं आते। ऐसे अनजान लोग अपनी पोस्ट को जो कई बार भ्रामक, तथ्यहीन और उकसाने वाले भी होते हैं वे एक से दूसरे तक वायरल होते हुए लाखों लोगों तक पहुंच चुके होते हैं। कांग्रेस किस तरह से इनका मुकाबला कर पायेगी?

छनकर क्या निकलेगा भाजपा में?

भाजपा इन दिनों अपने सांगठनिक उठापटक को लेकर ज्यादा चर्चित है। भाजयुमो में 35 साल से ऊपर के लोगों को नहीं लिये जाने को लेकर काफी विवाद की स्थिति बनी रही, आखिरकार इसमें शिथिलता बरती गई और कई नाम इससे ऊपर वाले भी दिखाई दे रहे हैं। राजनांदगांव की भाजपा कार्यकारिणी की सूची में मृत कार्यकर्ताओं को जगह देने से बात सामने आई है। भाजपा महामंत्री भूपेन्द्र सवन्नी और विधायक डॉ. अजय चंद्राकर के बीच का विवाद भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। शिकायत केन्द्रीय नेतृत्व तक पहुंच गई है। कांग्रेस इन बातों पर कटाक्ष कर रही है। नई प्रदेश प्रभारी सत्तारूढ़ कांग्रेस के प्रति धारदार विरोध की रणनीति बनाने के लिये परिश्रम करती दिख रही हैं पर शायद उन्हें घर सुधारने में ही काफी समय लग जायेगा।


09-Feb-2021 5:42 PM 80

जरूरी जिन्दगी का इम्तेहान

मोहब्बत से ज्यादा जरूरी जिन्दगी का इम्तेहान में कामयाब होना जरूरी है। लगता है छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने यही सबक सिखाने के लिये प्रारंभिक परीक्षा की तारीख तय कर दी है। इस बार 14 फरवरी को न तो मातृ-पितृ पूजन दिवस और न ही वैलेन्टाइन डे। हजारों युवा परीक्षा हॉल में दिखाई देंगे। कोविड के कारण वैसे भी त्यौहारों का हाल फीका है। होटल-गार्डन, स्कूल कॉलेज सब बंद रहे इसलिये प्यार की कोंपलें भी फूट नहीं पाईं। इन सबके चलते ऐसा लग रहा है कि इस बार रोज डे पर गुलाबों की बिक्री भी कमजोर रहेगी। वैलेंन्टाइन डे पर हंगामा करने वालों के पास भी कुछ कम काम रहेगा। वैसे भी पीएससी के इम्तेहान में जो कामयाब हो जायेगा, उसे तो मनमाफिक हमसफर वैसे भी मिल जाना है।

कोरोना का बहाना बनाये रखने के लिये

छत्तीसगढ़ से पैसेंजर और लोकल ट्रेनों को चलाने के लिये रेलवे ने राज्य सरकार से अनुमति मांगी है। हाईकोर्ट में लगाई गई एक जनहित याचिका के बाद रेलवे ने यह कदम उठाया है, जिसमें राज्य सरकार से पूछा गया है कि कोविड गाइडलाइन के मद्देनजर इन ट्रेनों को चलाने की अनुमति देने पर विचार करें। हैरानी यह है कि एक्सप्रेस और स्पेशल ट्रेनों को चलाने के लिये तो रेलवे ने कोई मंजूरी नहीं ली। दूसरे राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और मुम्बई में तो उसने पहले ही राज्य सरकार की बिना मंजूरी लिये ही चालू कर दी। फिर छत्तीसगढ़ में ऐसा क्यों। स्वास्थ्य सचिव ने भी रेलवे से लगभग यही सब बातें पूछ लीं। दरअसल, रेल मंत्रालय के सर्कुलर में भी सिर्फ इतना कहा गया है कि राज्य सरकार को सूचना देनी है। अनुमति जैसी कोई बंदिश नहीं लगाई गई है। खुशखबरी यही है कि ग्रामीण और कम आय वालों को इस माह से ट्रेनों में सफर का में मौका मिल जायेगा।

टमाटर होने लगे लाल

टमाटर की भरपूर पैदाइश छत्तीसगढ़ की पहचान भी रही और इसकी सही कीमत नहीं मिलना भी किसानों को तकलीफदायक देता है। दिसम्बर, जनवरी में जब टमाटर खेतों से खूब निकले तो उत्पादकों को एक दो रुपये ही मिल पाते हैं। पर समस्या सिर्फ प्रबंधन का लगता है। रायगढ़ और जशपुर जिले में जिन दिनों टमाटर का थोक भाव 5 रुपये किलो था, उन्हीं दिनों में बेमेतरा, दुर्ग आदि जिलों में इसकी कीमत उत्पादन लागत से भी कम थी। रायगढ़, जशपुर के टमाटर की मांग झारखंड के रास्ते में कई राज्यों को भेजा जा रहा है। अब कुछ नई उम्मीद स मैदानी इलाके के टमाटर उत्पादकों के लिये भी दिखाई दे रही है। इन दिनों मध्यप्रदेश और कर्नाटक के थोक सब्जी व्यापारी टमाटर पर रुचि दिखा रहे हैं। इसकी कीमत वे क्वालिटी के हिसाब से 7 से 12 रुपये किलो तक दे रहे हैं। उम्मीद करनी चाहिये कि सरकारी भी इस मांग को समझकर नये उभर रहे बाजार को प्रोत्साहित करेगी।

दुनिया का सबसे पुराना?

लोग अपने इतिहास को लेकर बड़े दिलचस्प दावे करते हैं। रायपुर के महानदी प्रकाशन ने अपने बोर्ड में अपने को विश्व का प्रथम पुस्तक प्रकाशक लिखा है। आगे आप खुद समझदार हैं और आपका इतिहास का ज्ञान जिम्मेदार है। तस्वीर/‘छत्तीसगढ़’


08-Feb-2021 6:48 PM 113

शिकायत भारी पड़ी

सरकार के एक बोर्ड के कर्मचारी के खिलाफ शिकायत करना कांग्रेस के एक पदाधिकारी को भारी पड़ गया। कर्मचारी के खिलाफ गड़बड़ी की कई तरह की शिकायतें रही हैं, और जब इन शिकायतों पर कार्रवाई के लिए पदाधिकारी मंत्रीजी के पास गए, तो उल्टा उन्हें ही सरकारी कामकाज में ज्यादा दखल नहीं देने की नसीहत दे दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई। मंत्रीजी ने पदाधिकारी पर अपने लेटरहेड का दुरूपयोग करने का आरोप मढ़ दिया, और प्रदेश कांग्रेस के मुखिया से इसकी शिकायत कर दी। अब पदाधिकारी को ही अपने द्वारा की गई शिकायतों के संबंध में सफाई देनी पड़ रही है।

बड़े नेताओं के झगड़े

प्रदेश भाजपा प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने पांच तारीख तक जिलों की कार्यकारिणी और मोर्चा पदाधिकारियों की सूची जारी करने की सख्त हिदायत दी थी। पुरंदेश्वरी के आदेश का कुछ हद तक पालन भी हुआ, और भाजयुमो के साथ-साथ दुर्ग-भिलाई की कार्यकारिणी को छोडक़र बाकी सभी जारी हो गई।

भाजयुमो की कार्यकारिणी को लेकर बड़े नेताओं का इतना दबाव है कि अमित साहू अब तक सूची जारी नहीं कर पाए हैं। वे बड़े नेताओं को सूची दिखा चुके हैं। मगर नुक्ताचीनी इतनी ज्यादा हो रही है, कि महामंत्री (संगठन) पवन साय सूची पर मुहर नहीं लगा सक रहे हैं। दुर्ग-भिलाई में बड़े नेताओं के झगड़े के कारण सूची अटक गई है। कुछ लोगों का मानना है कि पुरंदेश्वरी को ही हस्तक्षेप करना पड़ेगा, तब जाकर सूची हो सकती है।

लोहे, लकडिय़ों से टकराती महिलायें

धीरे-धीरे उन कामों की सूची छोटी होती जा रही है, जिन्हें महिलाओं के वश का नहीं माना जाता है। सेन्ट्रिंग प्लेट और लोहे से बनने वाले फेंसिंग तार भी अब महिलाओं के हिस्से में आ चुके हैं। सरायपाली के किसड़ी ग्राम की महिलाओं ने खुद से सेन्ट्रिंग प्लेट बनाया है और वह इन्हें अब किराये पर दे रही हैं। बागबाहरा ब्लॉक के ग्राम कोमाखान में भी इसी तरह फेंसिंग वायर बनाने का काम हाथ में लिया गया है। सरकारी संस्थायें उनके तार को खरीदने में रुचि तो दिखा ही रही हैं, निजी जरूरतों के लिये भी उनके तार की खरीदी हो रही है। वैसे तो सरकारी योजनाओं का प्रचार करने के लिये प्रशासन के पास अपनी टीम है पर कुछ हटकर काम हो तो उसकी अलग से भी चर्चा भी हो जानी चाहिये।

रसोई गैस के उतरते-चढ़ते दाम

घरेलू रसोई गैस के दाम महीने के पहले पखवाड़े में एक बार फिर बढ़ गये। पिछले महीने एक साथ 190 रुपये दाम बढ़ाये गये थे इस बार फरवरी में अभी सिर्फ 25 रुपये बढ़ाये गये। हालांकि गैस कम्पनियां महीने में दो बार कीमत की समीक्षा करती है इसलिये अगले पखवाड़े में कीमत क्या होगी यह अभी नहीं बताया जा सकता। स्थिति यह है कि ऑनलाइन बुकिंग कम दर पर कराई गई हो तो डिलिवरी के समय अंतर की राशि का नगद भुगतान भी करना होगा। इनके दाम इतनी बार बदल जाते हैं कि लोगों ने इसके महंगे या सस्ते होने के बारे में सोचना ही बंद कर दिया है। ठीक पेट्रोल-डीजल की तरह। गनीमत है कि अभी गैस सिलेन्डर पर रोजाना बदलाव का फार्मूला लागू नहीं किया गया है।

थोड़ी चूक हो गई...

बीते कुछ सालों से राजनेताओं का जन्मदिन भव्य तरीके से मनाने का चलन बढ़ा है। इसी बहाने कार्यकर्ताओं को अपनी निष्ठा दिखाने और नेताओं को अपनी लोकप्रियता नापने का मौका मिल जाता है। सत्तारूढ़ दल से किसी जन्मदिन हो तो अधिकारियों को आगे-पीछे होना ही पड़ता है। गुलदस्ते, उपहार, मिठाईयां देने वालों की आधी रात से ही भीड़ जमने लगती है। सत्ता से उतरने के बाद स्थिति अलग हो जाती है। अधिकारी तो पास फटकने की गलती करता ही नहीं, कार्यकर्ताओं की भी छंटनी हो चुकी रहती है। कोई नहीं पूछता कि सरकार रहने, नहीं रहने के बीच इतना बड़ा फर्क कैसे आ जाता है।

संसदीय सचिव शकुंतला साहू का जन्मदिन सरकारी तौर पर मनाने की चि_ी निकालकर वहां के जनपद पंचायत सीईओ चर्चा में आ गये। एसडीओ से लेकर बाबू, भृत्य तक को जिम्मेदारी दे दी। यही काम बिना लिखा-पढ़ी के भी किया जा सकता था। आखिर अब तक तो करते आए ही होंगे। सार्वजनिक जीवन में लोगों को सहजबुद्धि से बैर नहीं रखना चाहिए। इसीलिए कहा जाता है कि कॉमन सेंस बहुत कॉमन नहीं है।

कौन देशद्रोही कहलाएगा?

अभी प्रधानमंत्री कार्यालय की एक चि_ी के जवाब में उत्तरप्रदेश सरकार ने लिखा है कि गाडिय़ों पर किसी भी धर्म या जाति का नाम या निशान लिखा होने पर उसका चालान किया जाएगा। पुलिस विभाग ने इसका आदेश भी निकाल दिया है। लेकिन छत्तीसगढ़ ऐसी किसी भी फिक्र से आजाद है। यहां गाडिय़ों पर जो चाहे लिखाकर घूमा जा सकता है, और पुलिस-आरटीओ की कमाऊ कुर्सियों पर बने रहने के लिए वहां के अधिकारी-कर्मचारी किसी से पंगा लेना नहीं चाहते। गाडिय़ों पर, नंबर प्लेट पर जात लिखाओ, धर्म लिखाओ, धमकी लिखाओ, जो भी लिखाओ, पुलिस-आरटीओ किसी को नहीं देखते। और आज तो देश का जैसा माहौल है, हिन्दुत्व पर कार्रवाई करके किसी को देश का गद्दार कहलाना है क्या?  तस्वीर/‘छत्तीसगढ़’


07-Feb-2021 7:14 PM 112

पैसेंजर ट्रेनों में भी स्पेशल किराया?

लोगों का आवागमन सडक़ और रेल दोनों ही रास्तों से कठिन होता जा रहा है। पेट्रोल 86 रुपये से अधिक और डीजल 83 से ज्यादा  में मिल रहा है। इधर लोकल ट्रेनें भी नहीं चल रही हैं। बसों में ड्योढ़ा किराया हो चुका है तो रेलवे ने भी यात्रियों की जेब ढीली करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। उन लोगों से भी कमाई हो रही है जो बर्थ कन्फर्म होने की उम्मीद रखते हुए टिकट कटा लेते हैं। रेलवे ने प्लेटफॉर्म पर स्टाफ की तैनाती कर रखी है। टिकट कन्फर्म नहीं होने पर आप भीतर नहीं घुस पायेंगे, लेकिन टिकट ले ली है तो ऐसे कठिन नियम बनाये गये हैं कि वापसी के लिये पसीना बहाना पड़ेगा। इसके लिये 50 से 80 फीसदी तक रकम काटी जा रही है। इस रवैये के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई है। रेलवे ने अपने जवाब में कई बातों को साफ नहीं किया। हालांकि उस पर दबाव बढ़ा है और इसी महीने से लोकल ट्रेनों को चलाने की बात कही जा रही है। देखना यह होगा कि लोकल ट्रेनों का किराया पहले जैसा होगा या फिर स्पेशल ट्रेनों की तरह उनमें भी सरचार्ज के नाम पर ज्यादा वसूली की जायेगी। इससे बड़ी बात क्या इनमें भी सिर्फ कन्फर्म टिकट पर ही सफर करने की इजाजत होगी? 

सरकार से खफा संगठन !

सरकार के मंत्रियों ने राजीव भवन में पार्टी पदाधिकारियों के सामने अपने विभागों के कामकाज का ब्यौरा दिया, तो उन्हें अंदाजा नहीं था कि पदाधिकारी इतना ज्यादा मीन मेख  निकालेंगे। दो-तीन बार तो पीएल पुनिया को मंत्रियों के बचाव में आगे आना पड़ा। सबसे पहले मोहम्मद अकबर ने अपने विभाग की गतिविधियों से अवगत कराया। अकबर ने पॉवर पाइंट प्रेजेंटेशन दिया। जिलाध्यक्षों ने कुछ खामियां गिनाई, और शिकायतें की, तो तुरंत अकबर ने संबंधित विषयों को दिखवाने की बात कर किसी तरह उन्हें संतुष्ट किया।

गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू की बारी आई, तो उन्होंने पुलिस और पीडब्ल्यूडी की उपलब्धियों का बखान किया। इस पर एक ने तो यहां तक कह दिया कि आईजी और एसपी, जिलाध्यक्ष और प्रभारियों के फोन तक नहीं उठाते। खुलेआम जुआ-सट्टा चल रहा है। शिकायतों को अनदेखा किया जा रहा है। कुछ और लोगों ने भी इसी तरह की बातें की, तब पुनिया ने हस्तक्षेप कर पदाधिकारियों को समझाइश दी कि अभी इसी तरह की बातें करना ठीक नहीं होगा।

रविन्द्र चौबे और प्रेमसाय सिंह, पदाधिकारियों की शिकायतों से असहज हो गए। स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह को जिले के एक पदाधिकारी ने यह कहकर घेरा कि जिन अफसरों के खिलाफ विधानसभा चुनाव के ठीक पहले निर्वाचन अधिकारी से शिकायत की गई थी, उन्हें ही डीईओ और अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी गई। रविन्द्र चौबे भी बचाव की मुद्रा में दिखे, और यह कहते रहे कि उनकी शिकायतों को दूर किया जाएगा। बाद में पुनिया ने सभी मंत्रियों को नसीहत दी कि जिलों का दौरे से पहले संबंधित जिले के अध्यक्ष और प्रभारियों को इसकी सूचना जरूर दें। उनके ज्ञापन-प्रस्तावों को अनदेखा न करें।

बैठक से काफी खुश

कांग्रेस के पदाधिकारी मंत्रियों के साथ बैठक से काफी खुश नजर आए। उन्हें प्रदेश प्रभारी की मौजूदगी में एक-एक कर मंत्रियों के समक्ष अपनी भड़ास निकालने का मौका मिल गया। एक जिले के प्रभारी ने तो बैठक के बाद प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम से मिलकर उन्हें धन्यवाद दिया। मरकाम ने कहा कि आप लोगों ने विधानसभा जैसा माहौल बना दिया। उन्होंने आश्वस्त किया कि भविष्य में भी इस तरह की बैठकें होती रहेंगी।

जिसका इंतजार है वह नहीं मिल रहा

प्रदेश से जिन कांग्रेस नेताओं को बूथ मैनेजमेन्ट का प्रशिक्षण देने असम भेजा गया है उनमें से कुछ मुख्यमंत्री के तो, कुछ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के सर्वाधिक विश्वस्त हैं। इन्हीं में कुछ को सत्ता में भी जिम्मेदारी मिल चुकी है पर कई लोग अब भी अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जैसे प्रदेश उपाध्यक्ष अटल श्रीवास्तव। मरवाही उप-चुनाव, बिलासपुर नगर निगम में महापौर व जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में उन पर बड़ी जिम्मेदारी थी। मुख्यमंत्री ने मरवाही नतीजे के बाद उनकी तारीफ भी सोशल मीडिया पर लिखी। अब फिर संगठन के एक बड़े काम के लिये बनी टीम में उन्हें शामिल कर लिया गया है। उनके समर्थक इस जवाबदारी को लेकर खुशी तो जता रहे हैं, पर मायूसी भी है। एक कार्यकर्ता ने कहा कि जब विपक्ष में थे तब भी संगठन के लिये काम कर रहे थे, अब सरकार बन गई है तब भी वही काम। सरकार का आधा कार्यकाल खत्म होने वाला है, सत्ता में भागीदारी कब मिलेगी?

भारत दर्शन में रुचि घटी

पिछले कई सालों से आईआरसीटी देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों के लिये भारत दर्शन ट्रेनें चलाती है। हर साल इन ट्रेनों में सफर के लिये लोगों में बड़ा उत्साह देखा गया है क्योंकि एक तो सीट कन्फर्म होती है और ट्रैवल्स एजेंसियों के अनाप-शनाप रहने, घूमने के खर्च से बच जाते हैं। पर इस बार इस बार लोग भारत दर्शन में रुचि नहीं दिखा रहे। मार्च महीने से शुरू होने जा रही ट्रेनों की सीटें भर नहीं पा रही है। आईआरसीटीसी तो 50 फीसदी सीटें भरने पर भी ट्रेनों को चलाने तैयार है। और सवारियों का इंतजार हो रहा है। लोगों में कोरोना का भय तो अब खत्म सा है, कम से कम सफर के मामले में तो ऐसा कहा जा सकता है। दूसरी वजह शायद ज्यादा ठीक है कि इन दिनों लोग हाथ खींचकर खर्च कर रहे हैं।  


06-Feb-2021 5:54 PM 146

केटीएस तुलसी का रात्रिभोज

सुप्रीम कोर्ट के दिग्गज वकील केटीएस तुलसी छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य तो बन गए हैं, लेकिन वे यहां के ज्यादातर मंत्रियों तक को भी नहीं पहचानते हैं। पहचाने भी तो कैसे, कभी उनका छत्तीसगढ़ से कोई वास्ता नहीं रहा है। मगर राज्यसभा में गए हैं, तो स्थानीय नेताओं से परिचित होना जरूरी है। लिहाजा उन्होंने अपनी तरफ से फाफाडीह के एक होटल में रात्रि भोज रखा है, जिसमें सीएम-मंत्रियों के साथ-साथ पार्टी संगठन के प्रमुख नेताओं को आमंत्रित किया है।

तुलसी राज्यसभा का फार्म जमा करने के बाद चले गए थे। वे अपना निर्वाचन प्रमाण पत्र भी लेने नहीं आए। कोरोना की वजह से उनका आना टलता रहा। अब 9 महीने बाद आए हैं, तो यहां के नेताओं से परिचय ले रहे हैं, और संगठन-सरकार के कामकाज की जानकारी भी ले रहे हैं। यहां के नेता भी उनसे मेल मुलाकात को लेकर उत्साहित दिख रहे हैं। वैसे भी, जिस तरह अलग-अलग विषयों को लेकर केन्द्र सरकार से टकराव चल रहा है, उससे कानूनी तरीके से निपटने में सरकार और पार्टी नेताओं को तुलसी की जरूरत पड़ेगी।

प्रमोशन के लिये मारपीट

निगम मंडलों में न तो नियुक्तियों में पारदर्शिता है न ही खरीदी जैसे खर्चों में। यह बात सडक़ पर आ गई जब गृह निर्माण मंडल  रायपुर के जनसम्पर्क अधिकारी ने कथित रूप से घूस नहीं देने के कारण वहीं के सम्पदा अधिकारी को पीट दिया। शिकायतकर्ता सम्पदा अधिकारी का दावा है कि प्रमोशन के लिये उससे 10 लाख रुपये की रिश्वत मांगी जा रही है। बात ये है कि किसी विभाग का जनसम्पर्क अधिकारी, विभाग प्रमुख तो होता नहीं, वह कैसे किसी का प्रमोशन करा सकता है या उसे रोक सकता है। फिर प्रमोशन के लिये इतनी बड़ी रकम? यदि एफआईआर में लिखाई गई बात सच है तो देखना होगा कि इस विभाग में क्या कोई वरिष्ठता सूची बनती है या फिर पिछले दरवाजे से पदोन्नति और नियुक्ति हो रही है। वैसे यह दफ्तर सबसे भ्रष्ट दफ्तरों में से एक है...!

नान घोटाला, सुनवाई अभी बाकी है...

चर्चित नान घोटाले की नए सिरे से जांच को लेकर अभी भी किचकिच चल रही है। हाईकोर्ट इस सिलसिले में दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है। जांच को लेकर आधा दर्जन जनहित याचिकाएं लगी हुई हैं, जिसमें से विक्रम उसेंडी और धरमलाल कौशिक की याचिकाओं को छोडक़र बाकी पर सुनवाई हो चुकी है।

अब तक की सुनवाई की लब्बोलुआब यह रहा कि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट की निगरानी में अथवा एसआईटी जांच चाहते हैं, और उनके अपने तर्क हैं। उसेंडी की याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई होगी। चर्चा है कि उसेंडी की तरफ से पैरवी के लिए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विकास सिंह आ सकते हैं। उसेंडी के बाद संभवत: अगले हफ्ते कौशिक की याचिका पर सुनवाई होगी। कौशिक का पक्ष बड़े वकील महेश जेठमलानी रखेंगे।

उसेंडी और कौशिक की याचिका तकरीबन एक जैसी है। उन्हें केन्द्र सरकार की एजेंसी सीबीआई पर भरोसा है। और वे पिछली सरकार में हुई घोटाले की जांच को भी ठीक बता रहे हैं। कुल मिलाकर यह मामला अब राजनीतिक रंग ले चुका है। हाल यह है कि पिछले 5 साल जांच पड़ताल को लेकर दायर याचिकाएं अदालतों में घिसट रही है। मगर अब तक किसी किनारे नहीं पहुंच पाई है। देखना है कि आगे होता है क्या?

महिला पुलिस की बैंड

फोर्स में अक्सर महिलाओं की बराबरी की बात होती है तो यह देखा जाता है कि उन्हें दुरूह कार्य पुरुषों की तरह दिये जाते हैं या नहीं। पर बस्तर में कुछ अलग हटकर काम किया गया है। राज्य में पहली बार  यहां महिलाओं का अलग पुलिस बैंड बनाया गया है। शुरूआत 16 महिलाओं की टीम से की गई है। बीते दिनों जब मुख्यमंत्री बस्तर दौरे पर थे इस बैंड ने समां बांधा। वैसे दूसरे वाद्य यंत्रों के मुकाबले यह कुछ कठिन काम हैं। बैंड में सांसों से पूरी ताकत झोंकी जाती है। ड्रम का वजन भी कम नहीं होता।

पास होने का अवसर

कोविड महामारी के चलते पढ़ाई के हुए नुकसान को देखते हुए केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की ओर से लगातार शिथिलता बरती गई है। पहले ही सभी स्कूलों को परीक्षा केन्द्र बनाने का निर्णय लिया जा चुका है। जाहिर है छात्रों को ज्यादा सहूलियत से परीक्षा दिलाने का मौका मिलने वाला है। अब और एक बड़ी राहत देते हुए माशिमं ने तय किया है कि 10वीं, 12वीं के छात्रों को प्रत्येक विषय में केवल तीन एसाइनमेन्ट जमा करने होंगे। इन तीन एसाइनमेन्ट्स में मिले अंकों के आधार पर छह के नंबर तय कर दिये जायेंगे। लगता है, इस बार अब ज्यादा छात्र उत्तीर्ण होंगे। जिन्होंने घर में रहते हुए पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया, उनके लिये भी अवसर दे गई यह महामारी।

ऐसे ‘भारतरत्न’ को आईना!

देश के किसानों के साथ हमदर्दी दिखाने वाले विदेशियों के खिलाफ जिस तरह से हिन्दुस्तानी सितारों को झोंका गया है, वह तो सदमा पहुंचाने वाला है ही कि मानो हिन्दुस्तानी किसानों पर तोप से निशाना लगाना हो। भारत की बड़ी-बड़ी तोपों को ट्विटर पर तैनात किया गया है। बाकी लोगों के बारे में तो हमें कुछ नहीं कहना है, लेकिन भारतरत्न से नवाजे गए सचिन तेंदुलकर की रोजाना की इश्तहारी बातों के बीच पहली बार किसी सामाजिक हकीकत पर उनका मुंह खुला, तो किसानों के खिलाफ खुला। अब वे सत्ता को खुश करने वाला बयान दे रहे हैं, तो उनका भारतरत्न तो छीना नहीं जा सकता, लेकिन लोगों को याद आता है कि रत्न होते कैसे हैं।

अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ ने कल के अंक में सचिन तेंदुलकर के किसान-आंदोलन-विरोधी बयान के साथ 2008 के ऑस्ट्रेलिया के एक अखबार में छपे एक लेख का एक हिस्सा जोडक़र छापा है। इस लेख के मुताबिक- 1971 में दुनिया के महानतम क्रिकेटर कहे जाने वाले डॉन ब्रैडमैन ने दक्षिण अफ्रीका के नस्लवादी प्रधानमंत्री जॉन वोस्र्टर से मुलाकात की ताकि वहां के एक क्रिकेट टूर पर चर्चा हो सके। ब्रैडमैन ने पीएम से पूछा कि उनके देश के टीम में काले खिलाडिय़ों को क्यों शामिल नहीं किया जाता? पीएम का जवाब था कि काले लोग बौद्धिक रूप से कमजोर होते हैं, और क्रिकेट की जटिलताओं से नहीं जूझ सकते। इस पर ब्रैडमैन ने पीएम से कहा था- क्या आपने कभी गैरी सोबर्स का नाम सुना है?

बाद में ब्रैडमैन ऑस्ट्रेलिया लौट आए, और घोषणा की- हम दक्षिण अफ्रीका के साथ तब तक नहीं खेलेंगे जब तक उनकी टीम गैर नस्लवादी आधार पर नहीं बनेगी।

एक अखबार ने हिन्दुस्तानी ‘भारतरत्न’ को आईना दिखाया है कि महान खिलाड़ी का महान सामाजिक सरोकार भी रहता है।


05-Feb-2021 5:41 PM 269

राजिम कुंभ के बाद...

सरकार बदलने के बाद राजिम कुंभ अब मेले में तब्दील हो गया है। पिछली सरकार में कुंभ के नाम पर पखवाड़ेभर रौकन रहती थी, और महाशिवरात्रि में अंतिम शाही स्नान के साथ कुंभ का समापन होता था। स्वाभाविक है कि मेले में पहले जैसी भव्यता नहीं रहती है। यद्यपि मेला ही मूलस्वरूप है।

राजिम कुंभ के आयोजन से पिछली सरकार को कोई फायदा हुआ हो या न हो, मगर बृजमोहन अग्रवाल को जरूर इसका फायदा हुआ। मेले को कुंभ का स्वरूप देने का श्रेय बृजमोहन को जाता है, और पिछले 15 साल में वे इस आयोजन के कर्ता-धर्ता रहे हैं। सरकारी खर्च में साधु संतों की खूब मेहमान नवाजी होती थी। उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों के कलाकार और साधु संत पहचानने लग गए थे।

एक दफा वे केदारनाथ गए, तो वहां उन्हें साधुओं ने पहचान लिया। और तो और उनके पीए मनोज शुक्ला गुजरात के जूनागढ़ गए, तो वहां साधु उनसे मिलने दौड़ पड़े कि देखो मंत्री का आदमी आया है। कुल मिलाकर राजिम कुंभ से बृजमोहन को पहचान मिली।

बैस का सर्वदलीय अभिनंदन

वैसे तो राज्यपाल की नियुक्तियां प्राय: राजनैतिक होती हैं, पर पद पर आसीन के बाद तटस्थ रहना जरूरी हो जाता है। प्रदेश की राजनीति में एक वक्त मुख्यमंत्री के दावेदार समझे जाने वाले रमेश बैस अब त्रिपुरा के राज्यपाल हैं। बैस 16 फरवरी को बलौदाबाजार पहुंच रहे हैं। यहां उनका नागरिक अभिनंदन किया जाना है। इसमें सभी राजनीतिक दलों के लोग शामिल होने वाले हैं। सर्वदलीय बैठक भी हो चुकी है। बैस की टिकट रणनीति के तहत बाकी सांसदों के साथ पिछले लोकसभा चुनाव में काट दी गई थी। तब उनके समर्थकों ने इसका खुलेआम विरोध भी किया था। हालांकि पूरे मसले पर बैस सहज सी प्रतिक्रिया देकर शांत ही रहे। बैस जब राजनीति में रहे तब भी विवाद में पडऩे से बचते रहे जो उनके प्रतिद्वन्दी नेताओं के लिये सुविधाजनक होता था। छत्तीसगढ़ के स्व. मोतीलाल वोरा सहित देश में अनेक राज्यपाल रहे हैं जो कार्यकाल खत्म होने के बाद फिर फ्रंटलाइन की राजनीति में आ गये। बैस का तो काफी समय बचा है पर सेवानिवृत्ति के बाद वे क्या ऐसा करेंगे, यह उनके विरोधी रहे लोगों को ज्यादा पता होगा।

मेडिकल कॉलेज का सरकारीकरण

सीएम भूपेश बघेल ने चंदूलाल चंद्राकर निजी मेडिकल कॉलेज को सरकारी करने की घोषणा से हर कोई भौचक्का रह गया। कॉलेज की माली हालत खराब है, और मान्यता भी खतरे में है। इससे विद्यार्थियों का भविष्य भी अधर में था। विद्यार्थियों और मेडिकल शिक्षा को लेकर तो यह ऐतिहासिक फैसला था, लेकिन इसके संचालकों के लिए फैसला शायद असहज हो।

सुनते हैं कि कॉलेज पर करीब सवा सौ करोड़ का कर्जा था। बैंक 90 करोड़ में सेटलमेंट के लिए तैयार है। चर्चा यह भी है कि भिलाई के ही एक और कॉलेज संचालक ने मेडिकल कॉलेज को खरीदने की तैयारी की थी, और कहा जाता है कि 30 करोड़ रूपए निवेश भी कर दिए थे। बाद में कॉलेज संचालक खुद दूसरे मामले में उलझ गए, और यह डील खटाई में पड़ गई। इसी तरह एक नर्सिंग होम संचालक ने भी कॉलेज खरीदने के लिए कुछ कोशिशें की थीं। उन्होंने भी कुछ खर्च किया था, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई। अब सरकारीकरण का फैसला हो गया है, तो इन निजी निवेशकों का क्या होगा, यह सवाल अभी बाकी है।

चश्मदीद बालक की मुसीबत

खुड़मुड़ा (अमलेश्वर) में दिसम्बर माह में हुई सामूहिक हत्या का अब तक सुराग नहीं लगना पुलिस के लिये बड़ी समस्या बनी हुई है। जिन चार लोगों की हत्या हुई, वे सोनकर समाज के थे। सोनकर समाज ने आरोपियों का जल्द पता लगाकर गिरफ्तारी करने की मांग पर पिछले माह कई जगहों पर कैंडल मार्च भी निकाला था। इन सबके बीच घटना के एकमात्र चश्मदीद गवाह जीवित बच गये 11 साल के दुर्गेश की सामान्य दिनचर्या छिन गई है। उसकी समस्या भी पुलिस से कम नहीं। अपराधियों को पकड़े जाने से लेकर सजा दिलाने तक दुर्गेश की खास भूमिका रहने वाली है। इसलिये उसे पुलिस ने अपने पहरे में रखा है। सादी वर्दी में पुलिस वाले उनके साथ साये की तरह लगे हुए हैं। उसे ज्यादा मेल-जोल करने की इजाजत भी नहीं है। पुलिस को लगता है कि कोई नजदीकी रिश्तेदार भी घटना में शामिल हो सकता है, इसलिये उसे रिश्तेदारों से भी मिलने के दौरान निगाह में रखा जा रहा है। घटना को डेढ़ माह से ज्यादा बीत चुके हैं। अपराधी पकड़े जायें तो दुर्गेश को भी कुछ राहत मिले।

क्या सुधर पायेगी पुलिस की छवि

पुलिस महानिदेशक ने एक समाधान सेल बनाया है। इसके तहत कोई भी व्यक्ति थाने से राहत नहीं मिलने पर सीधे इस सेल में शिकायत कर सकता है। इसमें ऑनलाइन शिकायत और वाट्सअप मेसैज दोनों की सुविधा दी गई है। थानों में अक्सर लोगों की रिपोर्ट नहीं लिखे जाने की शिकायत आती है। रिपोर्ट लिखने के बाद हस्तक्षेप अयोग्य अपराध भी बता दिया जाता है। अब ऐसी शिकायतें समाधान सेल में आने पर सीधे सम्बन्धित जिलों के कप्तान के अलावा थाना प्रभारियों के पास भी भेजी जायेगी। जाहिर है, कोताही बरतने पर सर्विस रिकॉर्ड में भी यह दर्ज होगा। क्या यह मुमकिन है कि प्रदेशभर के थानों की सीधे मुख्यालय से निगरानी हो? शिकायतें आना और उन्हें वापस उसी जिले में फॉरवर्ड करने की प्रक्रिया कहीं खानापूर्ति बनकर ही न रह जाये।


04-Feb-2021 6:31 PM 257

अफसर है कि अंगद का पाँव !

रायपुर शहर के सटे तहसील में निर्माण विभाग के एक एसडीओ तीन दशक से अधिक समय से जमे हुए हैं। जब भी एसडीओ के ट्रांसफर की कोशिश हुई, धार्मिक संस्था से जुड़े प्रभावशाली लोग आड़े आ गए। कुछ समय पहले स्थानीय लोगों ने एसडीओ के खिलाफ ईएनसी को शिकायत भेजी।

शिकायत में एसडीओ कारगुजारियों का ब्यौरा था। यह भी बताया गया कि सरकारी जमीन पर कब्जा कर पहले मंदिर का निर्माण किया, और कॉम्पलेक्स भी बनवा लिया। इन शिकायतों पर अब तक कुछ नहीं हुआ। इतने साल से एक ही जगह पर हैं, तो कुछ बात तो होगी। सुनते हैं कि एसडीओ को हमेशा सत्ता और विपक्ष के जनप्रतिनिधि का साथ मिलता रहा है। यही वजह है कि उनका बाल बांका नहीं हो पाया।

जनप्रतिनिधियों के बीच एसडीओ की छवि उदार अफसर की है, जो कि यथा संभव सहयोग के लिए तैयार रहते हैं। दशहरा, दीवाली हो या नया वर्ष। एसडीओ अपने शुभ चिंतकों को महंगे गिफ्ट, मेवे का डिब्बा भेजने से नहीं चूकते। इस बार एसडीओ थोड़ी दिक्कत में हैं। वजह यह है कि नाराज ग्रामीणों के साथ विभाग के कई लोग भी जुड़ गए हैं, जो कि एसडीओ की जगह लेने के लिए तैयार बैठे हैं। ऐसे लोगों ने भी ईएनसी तक काफी कुछ जानकारियां भिजवाई हैं। देखना है कि इतना कुछ करने के बाद एसडीओ हट पाते हैं, अथवा नहीं।

बजट की आसान समीक्षा

कांग्रेस के एक नेता से बजट पर प्रतिक्रिया पूछी गई, उन्होंने कहा- जिहाल-ए-मस्ती मकुन-ब-रन्जिश, बहाल -ए-हिज्र बेचारा दिल है। ये गाना आज तक आप गा रहे हैं ना। बावजूद इसके कि आपको इसका मतलब समझ नहीं आता। तो फिर निर्मला सीतारमण का बजट भाषण सुनने में आपको क्या तकलीफ है?

तो फिर दाऊ वन कौन हैं?

स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव खुद ही बीच-बीच में कुछ चुटकियां, कुछ संकेत ऐसे दे देते हैं जिससे अफवाहों को हवा मिलती है, फिर बाद में सफाई आती है। बिलासपुर के एक कार्यक्रम में नगर निगम आयुक्त से किसी मुद्दे पर उनको बात करनी थी। आयुक्त देर से पहुंचे। सिंहदेव ने तंज कसा- आप इतनी देर से आये, दाऊ टू हो गये हैं क्या? आप अब अटकलें लगाते रहिये कि दाऊ वन कौन हैं?

रेंजर इतना बड़ा, तो फिर...

पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग की शिकायत मुंगेली जिले के एक रेंजर ने दर्ज कराई है। ऐसी ख़बरें तो आती रहती है पर वसूली करने वाले की हिम्मत और रंगदारी देने वाले रेंजर दोनों की हैसियत का अंदाजा लगायें तो सिर घूम सकता है। पुलिस के मुताबिक पूरे सवा करोड़ वसूलने का प्लान था। पुलिस आठ लाख रुपये कथित ब्लैकमेलर से बरामद भी कर चुकी है। अभी मामले का पूरा ब्योरा आना बाकी है पर बताया जा रहा है कि 95 लाख रुपये रेंजर ने उसे दे डाले। सोचिये, रेंजर से ऊपर के अफसरों की नस पकड़ ली जाती ब्लैकमेलिंग की रकम कितनी बड़ी हो सकती थी।

फिर यह भी समझने की जरूरत है कि जिस विभाग में एक रेंजर की इतनी औकात है, उस विभाग में बाकी के बड़े-बड़े अफसरों की ताकत कितनी होगी ! इसीलिए यहां की चर्चा रहती है कि अपने खिलाफ फाइल रोकवाने के लिए किसने कितने करोड़ रुपये किसको दिए !  


03-Feb-2021 5:32 PM 165

सत्ता नहीं, तो संगठन के लिये ही उठापटक

जब सत्ता हाथ में हो तो संगठन में कौन बैठ रहा है इसे ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता। पर जब सत्ता न हो तो संगठन की अहमियत बढ़ जाती है। भाजपा युवा मोर्चा और महिला मोर्चा में नियुक्तियों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। ऐसे लोगों को युवा मोर्चा में नियुक्ति दी गई है जो 35 की उम्र पार कर चुके हैं। महिला मोर्चा के खिलाफ बयानबाजी करने वाले, संगठन में जमीनी स्तर पर कभी काम नहीं करने वाले तथा एनजीओ चलाने वालों को मोर्चा में नियुक्ति देने का आरोप लगा हुआ है। भाजपा खुद को पार्टी विथ डिफरेंस कहती है। वे कहते हैं कि साधारण से कार्यकर्ता को भी संसद, विधानसभा की टिकट दे दी जाती है। पर इस बार संगठन में उन लोगों को किनारे कर दिया गया जो लगातार परिश्रम करते रहे। उनको तवज्जो दी गई जो बड़े नेताओं के करीबी हैं या फिर रिश्तेदार। भाजपा की प्रदेश प्रभारी डी. पुरंदेश्वरी को सख्त मिजाज का माना जाता है। उनके रहते ऐसी नियुक्ति का जोखिम उठाया गया है तब तो देखना पड़ेगा इसकी प्रतिक्रिया में किसी पर गाज गिरती है या नहीं।

बुजुर्गों पर रेलवे की मेहरबानी

केन्द्रीय बजट से रेल बजट पहले अलग हुआ करता था। लोग इंतजार में रहते थे कि किस इलाके को कौन सी नई ट्रेन मिलने वाली है। अब तो लोग यह बात भूल भी गये हैं। बस लोगों को एक उम्मीद थी कोरोना संक्रमण के नाम पर यात्रियों से जो अधिक रकम लेना शुरू किया गया था और रियायतें बंद की गई थीं उसे फिर से शुरू कर दिया जायेगा। पर इस बारे में कोई स्पष्ट घोषणा नहीं हुई। बुजुर्गों को भी किराये में छूट नहीं मिल रही है। एक रेलवे अधिकारी का कहना है कि कोरोना में बुजुर्गों को ज्यादा जोखिम होता है। उनकी यात्रा को हतोत्साहित करने के लिये यह नियम बनाया गया। यानि 100 प्रतिशत किराया देकर बुजुर्ग यदि खतरा उठा रहे हैं तो रेलवे को कोई आपत्ति नहीं। उनको रियायत देने से कोरोना का खतरा बढ़ जायेगा !

आखिर में कौन बचेंगे?

छत्तीसगढ़ में एलीफेंट रिजर्व से लेकर टाइगर रिजर्व तक का मुद्दा भारी जटिल है। सरकार इन दोनों को बनाना भी चाहती है, लेकिन वह इन इलाकों को आदिवासियों की बेदखली को झेलने की हालत में भी नहीं है। फिर एलीफेंट रिजर्व का मुद्दा कोयला खदानों से भी जुड़ा हुआ है, जमीन के नीचे का कोयला निकालना असंभव हो जाएगा अगर ऊपर के पूरे इलाके को वन्य प्राणियों के लिए आरक्षित कर लिया गया। इसमें राज्य सरकार के हित कहीं केन्द्र सरकार के हितों से टकराते हैं, तो कहीं कारोबारियों के हित सरकारी नियमों से। फिर सरकार के आदेश कहीं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेशों से टकराते हैं, तो आदिवासियों की जिंदगी तो इनमें से तमाम तबकों से टकराती ही है। कुदरत ने भी अजीब इंतजाम किया है, जहां खनिज है, वहीं जंगल भी हैं, और जहां जंगल हैं, आदिवासी भी हैं। शहरी दखल के पहले तक तो आदिवासी जानवरों के साथ आराम से रह लेते थे, लेकिन अब जब सरकारों ने गिने-चुने जंगल छोड़े हैं, और इन गिने-चुने जंगलों में जानवरों और वहां बसे इंसानों में टकराव चल रहा है, तो पूरा मामला बड़ा जटिल हो गया है। पता नहीं आखिर में कौन बचेंगे, शायद खदान चलाने वाले कारोबारी!

 


02-Feb-2021 5:55 PM 255

एस के मिश्रा नाबाद

पूर्व सीएस एस के मिश्रा ऐसे अफसर हैं, जो कि रिटायर होने के 17 साल बाद भी अब तक रिटायर नहीं हुए। यानी सरकार उन्हें एक के बाद एक जिम्मेदारी सौंपती गई, और वे बखूबी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते रहे। मिश्रा वर्ष-2004 में सीएस पद से रिटायर होने के बाद राज्य विद्युत नियामक आयोग के चेयरमैन बने। नियामक आयोग के चेयरमैन का कार्यकाल पूरा होने के बाद वे वित्त आयोग के चेयरमैन बनाए गए। बाद में उन्हें प्रशासनिक सुधार आयोग का अध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया।

पिछली सरकार ने ब्लॉक-तहसील के पुनर्गठन के लिए आयोग का गठन किया था। जिसके चेयरमैन भी एसके मिश्रा बनाए गए। यही नहीं, सरकार ने इंड्रस्टियल डेवलपमेंट पर सुझाव देने के लिए कमेटी बनाई थी, जिसके चेयरमैन भी एसके मिश्रा रहे। वर्तमान में मिश्रा दीनदयाल अंत्योदय योजना के अंतर्गत राज्य स्तरीय आश्रय स्थल निगरानी समिति के चेयरमैन का दायित्व निभा रहे हैं। कुल मिलाकर वे सरकारी कामकाज से आज भी निवृत्त नहीं हुए हैं।

मिश्रा अपने प्रशासनिक कैरियर में बेदाग रहे। यद्यपि रमन सरकार के पहले कार्यकाल में तत्कालीन प्रमुख सचिव पीएस राघवन ने एक दफा उन पर खुले तौर पर गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन मिश्रा खामोश रहे।  ये अलग बात है कि बाद में राघवन को लूपलाइन में जाना पड़ा। बिना प्रमोशन के रिटायर हो गए। मिश्रा अनुभवी होने के साथ-साथ बेहद सुलझे हुए अफसर माने जाते हैं, और लो प्रोफाइल में रहते हैं। यही वजह है कि सरकार चाहे कोई हो, वे हमेशा महत्वपूर्ण बने रहे।

रामबाई फेल हो गई, हमारी पोरा तो टॉप थी

सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय रहने वाले आईपीएस दीपांशु काबरा को दमोह पथरिया (मध्यप्रदेश) की विधायक राम बाई के दसवीं कक्षा में फेल हो जाने का अफसोस है। उन्होंने ट्विटर पर अपनी भावना साझा की है और उनके पूरक परीक्षा में सफल हो जाने की कामना की है। बहुत सी लड़कियां हैं जो बचपन में घरेलू और सामाजिक माहौल नहीं मिलने की वजह से स्कूल नहीं जा पातीं। पिछड़े और दलित समाज में तो स्थिति और भी बुरी होती है। शिक्षा की अहमियत जानकर रामबाई ने दसवीं पास करने का तो सोचा, पर शायद विधायक की जिम्मेदारी होने की वजह से तैयारी ठीक तरह से नहीं कर पाई। ओपन बोर्ड की परीक्षा को कुछ आसान समझा जाता है, ज्यादातर लोग इसमें पास हो जाते हैं। रामबाई को अगर पूरक रिजल्ट मिला तो समझा जा सकता है कि कितनी ईमानदारी से परीक्षा ली गई और कॉपियां जांची गई। अपने यहां पोराबाई का उदाहरण है जो शिक्षकों की मेहरबानी से 99 प्रतिशत नंबर हासिल कर पूरे प्रदेश में टॉप पर थी। रामबाई को दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने पॉवरफुल विधायक रहते हुए भी पोराबाई जैसा तरीका नहीं अपनाया।

नेताओं के बच्चों को जगह नहीं?

चर्चा है कि भाजयुमो की कार्यकारिणी में नेता पुत्रों को जगह नहीं दी जा रही है। भाजपा के एक प्रभावशाली नेता के पुत्र को तो कोषाध्यक्ष बनाने पर तकरीबन सहमति बन भी गई थी। पूर्व सीएम ने भी इसके लिए सिफारिश की थी। इसके अलावा पूर्व गृहमंत्री रामसेवक पैकरा के पुत्र लवकेश पैकरा, रामविचार नेताम की पुत्री, प्रेमप्रकाश पाण्डेय के पुत्र मनीष और नारायण चंदेल सहित कई और नेताओं के बेटे-बेटियों को कार्यकारिणी में जगह मिलने की चर्चा रही।

कुछ तो सक्रिय भी हैं, और अपने इलाके में पकड़ भी रखते हैं। मगर हाईकमान ने निर्देश दिए हैं कि 35 साल से अधिक उम्र वाले को किसी भी दशा में युवा मोर्चा का पदाधिकारी न बनाया जाए। इसके चलते कुछ नेता पुत्र स्वमेव बाहर हो गए। बाद में यह भी निर्देश आया कि किसी भी वरिष्ठ पदाधिकारी के बेटे-बेटियों को कार्यकारिणी में जगह न दी जाए। फिर क्या था, बचे-खुचे भी बाहर हो गए। हालांकि अभी भी एक-दो नाम को एडजस्ट करने के लिए कोशिशें चल रही हैं। देखना है आगे क्या होता है।

रिकॉर्ड धान खरीदी पर वाह-वाह, भुगतान पर?

रिकॉर्ड धान खरीदी के चलते प्रदेश सरकार को बड़ी वाहवाही मिल रही है पर खरीदी की रकम हासिल करने के लिये किसानों के मुंह से आह निकल रही है। तकनीकी रूप से खाते में रकम आ गई है पर बैंक पूरी रकम निकालने नहीं दे रहे हैं, ऐसी कई जगहों से शिकायतें हैं। जशपुर जिले की घटना तो ज्यादा मार्मिक है। एक वृद्धा फरसाबहार के पास के गांव से 90 किलोमीटर चलकर जशपुरनगर पहुंची। घंटो बैठने के बाद भी उसे रकम नहीं मिली। उसने 9 दिसम्बर और 19 जनवरी को दो बार में 55 क्विंटल धान बेचा था, पर खाते में रकम आ जाने के बावजूद अपेक्स बैंक ने चार दिन बाद आने कहा। वृद्धा ने कहा एटीएम कार्ड ही दे दो, अपने आसपास से रकम चार दिन बाद निकाल लेगी। बैंक अधिकारियों ने बताया कि वह तो चार महीने बाद मिलेगा। खाते में पैसे होने के बावजूद भुगतान नहीं करने की वजह क्या हो सकती है? जब सारे निजी और राष्ट्रीयकृत बैंक बैंकों में भीड़ कम करने के लिये एटीएम कार्ड की व्यवस्था हो चुकी है, सहकारी और अपेक्स बैंक शाखायें पीछे हैं। चेन में कहां गड़बड़ी है ये राजधानी के अफसरों को देखना होगा। 

ऑललाइन क्लास लेने में कोताही, नोटिस अब

बच्चों को पढ़ाने में कोताही बरतने को लेकर अक्सर शिक्षा कर्मियों को ही निशाने पर लिया जाता है। लेकिन कॉलेजों का हाल भी कुछ कम बुरा नहीं है। उच्च शिक्षा विभाग के सचिव ने हाल ही में रायपुर संभाग की समीक्षा बैठक ली तो पता चला कि अनेक प्राध्यापक ऑनलाइन क्लासेस नहीं ले रहे हैं। कोरोना के कारण बंद कक्षाओं की भरपाई के लिये उन्हें घर पर बैठकर ही ऑनलाइन पढ़ाई करानी थी, पर सहूलियत के साथ हो जाने वाले इस काम में भी उनकी दिलचस्पी नहीं दिखी। क्लासेस चलती रहें इस पर निगरानी प्राचार्यों को करनी है, जो उन्होंने नहीं की। इसके चलते करीब दर्जन भर प्राचार्यों को नोटिस दी गई है। नोटिस तब दी गई है जब सत्र का लगभग समापन हो चुका है। छात्रों को जो नुकसान होना है वह हो चुका है। वे अपने से पढक़र इस बार परीक्षा देंगे। अब तो नये सत्र से कॉलेजों को खोलने का फैसला भी लिया जा चुका है। कोरोना आराम करने का एक अवसर था, जो जाने वाला है।


01-Feb-2021 5:27 PM 183

ऑनलाइन चुनौती

ऑनलाइन क्लास लेने में कोताही बरतने पर दर्जनभर कॉलेज शिक्षकों को नोटिस थमा दिया गया है। कुछ जानकारों का कहना है कि कोरोना काल में ऑनलाइन क्लास लेना भी चुनौतीपूर्ण है। कई जगहों पर तो विद्यार्थियों का आचरण ऐसा रहता है कि शिक्षक तंग आ जाते हैं। पिछले दिनों एक इंजीनियरिंग कॉलेज में ऑनलाइन क्लास के दौरान एक छात्र का सवाल था कि मैडम, आपके टूथपेस्ट में नमक है? ज्यादातर जगहों पर ऑनलाइन क्लास में इसी तरह हंसी-मजाक की खबरें आती हैं। ऑनलाइन क्लास में शरारती विद्यार्थियों को दण्ड भी नहीं दिया जा सकता है। इसका वे भरपूर फायदा उठाते हैं। कुल मिलाकर ऑनलाइन क्लासेस शिक्षकों के लिए परेशानी का सबब बन गया है।

ऑनलाईन कक्षाओं का एक अभूतपूर्व बोझ उन कॉलेज प्राध्यापकों पर भी पड़ रहा है जिन्होंने कम्प्यूटर पर अधिक काम नहीं किया है, या जिन्हें ऑनलाईन काम का अधिक तजुर्बा नहीं है। उन्हें पहले तो कम्प्यूटर और ऑनलाईन का काम खुद सीखना पड़ रहा है, और फिर कॉलेज के छात्र-छात्राओं को सिखाना पड़ रहा है। जो गरीब बच्चे हैं उनके सामने स्मार्टफोन न होने की भी समस्या है। कई गरीब परिवारों में दो-चार लोगों के बीच एक स्मार्टफोन है, और अलग-अलग समय पर लोग जरूरत के मुताबिक उसका इस्तेमाल करते हैं, और जरूरी नहीं है कि छात्र-छात्राओं की ऑनलाईन क्लास के वक्त परिवार में फोन उनके पास हो।

कम्प्यूटर और ऑनलाईन के हिसाब से लेक्चर तैयार करने का जो नया बोझ कॉलेज प्राध्यापकों पर आया है उससे उनकी उत्पादकता बुरी तरह प्रभावित हुई है। उनका खासा समय सीखने और पॉवर पाईंट प्रजेंटेशन जैसे कामों में जा रहा है। सरकार ने आमतौर पर यह काम 20 हजार रूपए महीने के कोई संविदा कम्प्यूटर कर्मचारी कर सकते थे, इस काम में दो लाख रूपए महीने तनख्वाह वाले प्राध्यापकों को झोंका गया है जिन्हें वक्त भी दस गुना लग रहा है। दरअसल राज्य सरकार ने काम को डिजिटल और ऑनलाईन, वर्क फ्रॉम होम, और कम्प्यूटरीकरण की तैयारी भी नहीं की, और प्राध्यापक तबका तो आरामतलब और बेजुबान रहता है।

राज्य सरकार को कम से कम एक कमेटी ऐसी बनानी चाहिए जो कि अगले किसी लॉकडाऊन के वक्त, या बिना लॉकडाऊन के भी काम को कम्प्यूटर और ऑनलाईन करने का ढांचा विकसित कर सके। ऐसा न होने पर सरकार की उत्पादकता बुरी तरह गिर गई है और किसी को इसकी खास परवाह भी नहीं है। और तो और कॉलेजों में तेज रफ्तार इंटरनेट तक नहीं लग पाए हैं, और प्राध्यापक अपने-अपने इंतजाम से काम चला रहे हैं।

बंद कमरे की बात का राज !

सीएम भूपेश बघेल ने अपने कांकेर प्रवास के दौरान जिला कांग्रेस अध्यक्ष रहे नरेश ठाकुर से बंद कमरे में करीब 1 घंटे चर्चा की। नरेश उन चुनींदा नेताओं में हैं, जिन्हें राहुल गांधी व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं। वे एआईसीसी के प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं।  ऐसे में नरेश के साथ गुफ्तगू की पार्टी हल्कों में जमकर चर्चा है।

सुनते हैं कि नरेश से सीएम ने कांकेर की राजनीतिक गतिविधियों पर चर्चा हुई है। कांकेर जिला कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। यहां की चारों  विधानसभा सीटें कांग्रेस के पास है। इससे पहले भी कांकेर में अंतागढ़ को छोडक़र बाकी सीटें कांग्रेस के पास थीं। नगरीय निकाय और पंचायतों में भी कांग्रेस का कब्जा है। इन सबके बावजूद सरकार आने के बाद स्थानीय नेता आपस में टकरा रहे हैं।

एक खदान के ट्रांसपोटेशन के काम को लेकर भी स्थानीय प्रभावशाली नेताओं में काफी खींचतान हुई थी। बाद में शीर्ष स्तर पर हस्तक्षेप के बाद मामला निपट पाया। खैर, सीएम ने तमाम विषयों पर नरेश से चर्चा की है। इस मुलाकात के बाद नरेश ठाकुर को निगम-मंडल में जगह मिलने की चर्चा है।

कॉलेजों पर नैक की नकेल

ये अलग बात है कि दुनिया के 100 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में अपने देश का कहीं जिक्र नहीं है फिर भी यूजीसी कुछ कोशिशें करती रहती हैं। कॉलेजों की परफार्मेंस तय करने के लिये उसने नैक केलकुलेशन टीम बना रखी है। अनुदान इसी ग्रेडेशन से होना है। 

कॉलेजों के लिये नई गाइडलाइन यह तय की गई है कि जिनका भी नंबर 2.5 से नीचे आयेगा उसकी मान्यता खत्म कर दी जायेगी। इस घेरे में केवल निजी महाविद्यालय नहीं बल्कि सरकारी भी आयेंगे। मापदंडों में कॉलेज और शिक्षकों के बीच का अनुपात, परीक्षा परिणाम, शोध और उनकी राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली शाबाशी, सब शामिल हैं। एक और बात कि कॉलेजों में भूतपूर्व छात्रों का संगठन यानि एल्यूमिनाई का गठन भी करना है। आपने जिस कॉलेज में पढ़ा हो और एल्यूमनाई का सदस्य बनने के लिये फोन नहीं आया हो तो समझ लीजिये कि पढऩे लिखने के बाद आपने क्या तरक्की वह आपके कॉलेज में पता नहीं है।

पुलिस में तृतीय लिंग की भर्ती

कोई घृणा की वजह से तो कोई भयभीत होने के कारण इनके आसपास कोई फटकना नहीं चाहता। यह जानते हुए भी ये सब हमारी ही तरह प्रकृति की कृतियां हैं। मांगलिक कार्यक्रमों में तो इनकी मौजूदगी बहुत जरूरी लगती है। नवजातों के आशीर्वाद के लिये, दिवाली के उजाले के लिये इनकी तलाश होती है, पर समाज पीछे ही इन्हें रखता आया है। पर धीरे-धीरे मानसिकता कितनी बदल सकती है यह किन्नरों ने अपनी काबिलियत साबित करके बताया। खाकी वर्दी पहनने के लिये इन्होंने रायपुर की पुलिस भर्ती में कूद की, दौड़ लगाई। सुप्रीम कोर्ट तक इन्होंने लड़ाई लड़ी तब जाकर उन्हें सरकारी सेवाओं में, खासकर पुलिस भर्ती में प्रतिस्पर्धा करने का मौका मिला। आने वाले दिनों में इनमें से कुछ पुलिस वर्दी में दिखेंगे। अपराधियों की हालत इन्हें ड्यूटी करते हुए देखकर पतली हो जायेगी, यह कहना जरूरी नहीं।


31-Jan-2021 5:23 PM 204

सरगुजा को तंत्र-मंत्र से पहचान दिलाते नेता

वैज्ञानिक सोच को बढ़ाना संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी है। पर सरगुजा में कुछ अनोखा ही काम हो रहा है। सार्वजनिक मंचों पर अवैज्ञानिक तर्कों को बढ़ावा देने वाली बातें कही जा रही है। रामानुजगंज के विधायक बृहस्पति सिंह ने तो अपने विरोधी दल के नेता राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम पर तो गंभीर आरोप लगा दिये हैं। उन्होंने अपने इलाके की एक सभा में आरोप लगाया कि नेताम ने उनकी सडक़ दुर्घटना में असमय मौत के लिये यज्ञ कराया है। यज्ञ में धूप, घी, जौ का हवन होता है पर नेताम ने मिर्च का हवन दिया और बकरों की बलि दी। सिंह ने अपने भाषण में आगे कहा कि इस बलि और हवन से उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा क्योंकि क्षेत्र की जनता चाहती है कि वे उनके बीच सेवा करते रहें। हाल ही में बृहस्पति सिंह तब चर्चा में आये थे, जब उन्होंने कलेक्टर, एसडीएम को गायब बताते हुए उनकी सूचना देने वाले को 1100 रुपये इनाम देने की घोषणा कर दी थी।  बहरहाल, नेताम तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने खंडन किया। कहा-हजारों लोगों ने पूर्णाहुति दी है, तंत्र किया कोई गोपनीय आयोजन नहीं था। भगवान विधायक को सद्बुद्धि दे। 

कम्बल वाले बाबा एक समय भाजपा नेताओं के चहेते बने हुए थे। इन बाबा का एक ऑडियो भी वायरल हुआ जिसमें वे चिंतामणि महराज पर भाजपा में शामिल होने के लिये दबाव डालते हुए पाये गये थे। और, प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव का एक वीडियो तो पिछले दिसम्बर माह में ही वायरल हुआ जिसमें सूरजपुर इलाके के एक कार्यक्रम में ‘मन्नत’ पूरी होने पर 101 बकरों की बलि देने की बात करते हुए दिखे। सोचना होगा कि यहां के नेता सरगुजा को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं या पीछे।

पुलिस की मुस्तैदी को सलाम

जय स्तंभ चौक पर शनिवार को यह गाड़ी खड़ी हुई मिली। गाड़ी पुलिस की है पर शायद यातायात नियमों को यहां तोड़ा गया। इसलिये चक्के पर ट्रैफिक वालों ने ताला जड़ दिया गया। वैसे भी इस समय यातायात मास चल रहा है। रूल यानि रूल, कोई अपना-पराया थोड़े ही देखता है। पता नहीं चालान किसकी जेब से कटा।

(पत्रकार-अवधेश मिश्रा ट्विटर पेज से)

जीपीएम जिले का छोटा सा गांव बना खास

गौरेला, पेन्ड्रा और मरवाही को जिला बनाने के लिये नागरिकों ने कई वर्षों तक एक साथ और अलग-अलग भी आंदोलन किया लेकिन निजी पहचान को लेकर प्रत्येक इलाके, खासकर गौरेला और पेन्ड्रा के लोगों के बीच बड़ी सजगता है। इसके चलते उनके बीच विवाद भी होते रहे हैं। मरवाही इन स्थानों से दूर है लेकिन उसकी एक पहचान विधानसभा मुख्यालय की है। जिला मुख्यालय के बारे में तो उसे सोचा नहीं गया। पहचान का मुद्दा इतना बड़ा था कि जिले का एक शब्द वाला नाम भी कोई नहीं सुझा सका। लम्बा नाम लेने के बजाय अब इसे लोग जीपीएम कहने लगे हैं। यहां तक कि सरकारी दस्तावेजों, पत्राचारों में इसी नाम का इस्तेमाल होने लगा है।

जिला बनने के बाद तात्कालिक व्यवस्था के तहत गौरेला के गुरुकुल में कलेक्टोरेट शुरू कर दिया गया, लेकिन अब इसके परे एक पूरी तरह सुविधाजनक कम्पोजिट बिल्डिंग बनाने की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों के पास गौरेला के बगल में एक खाली जगह थी लेकिन उसके लिये बड़ी संख्या में पेड़ों को काटने की जरूरत थी।

अब जो जगह बताई जा रही है वह रेलवे स्टेशन से करीब 20 किलोमीटर दूर कोदवाही ग्राम को सोचा गया है। यह न तो गौरेला में है न ही पेन्ड्रा में। यह मरवाही इलाके का गांव है। लोग हैरान है कि इस जगह में क्या खासियत है। खाली जगह स्टेशन से पांच सात किलोमीटर दूर भी तो मिल सकती है। पर कुछ मायनों में यह खास है। एक तो गौरेला और पेन्ड्रा के बीच किसे चुनें यह मुद्दा टल गया। फिर मरवाही इलाके में ही मौजूदा विधायक डॉ. के. के.ध्रुव को जबरदस्त बढ़त मिली और विधायक बनने से पहले भी वे इसी क्षेत्र में डॉक्टर के रूप में सक्रिय रहे। मौजूदा मुख्यालय पेन्ड्रारोड तो कोटा विधानसभा का क्षेत्र है। वैसे यह बताना ही काफी होगा कि नई जगह कोरबा संसदीय सीट का हिस्सा है।

सरकारी इरादा पूरा करता धंधा!

जब देश की सरकार पत्रकार की ट्वीट को लेकर उसे देश का गद्दार साबित करने में लगी है, तो जाहिर है कि उसकी जिम्मेदारी की कहीं न कहीं अनदेखी तो होगी ही। आज सोशल मीडिया ऐसी खुली पोस्ट से भरा हुआ है जिसका न्यौता लोगों को भेजा जा रहा है कि वे आकर सेक्स का धंधा शुरू कर सकते हैं। अभी इस अखबार के संपादक को फेसबुक पर एक दोस्ती का न्यौता मिला, और वह पूरा पेज ही सेक्स के रोजगार में लगने के लिए न्यौते का है। गरीब और मध्यम वर्ग की कल्पनाओं को पूरा करते हुए कॉलबॉय बनने वालों को उनके इलाके की बड़े घरों की महिलाओं के सेक्स का भी वादा किया जा रहा है। अब जब तक हिन्दुस्तान में सेक्स का रोजगार गैरकानूनी कारोबार है, तब तक तो सरकार झांसे के ऐसे सोशल मीडिया-ईश्तहारों पर रोक लगा ही सकती है। लेकिन इन लोगों को देशद्रोही करार देने से भी कोई फायदा तो है नहीं, उतनी देर में दो और पत्रकार अंदर किए जा सकते हैं। और फिर सेक्स का धंधा अगर सच में रोजगार दिला सकता है, तो इससे बेरोजगारी कम करने का सरकारी इरादा भी तो पूरा होता है!

आपकी हर जानकारी बाजार में!

अभी लोगों को वॉट्सऐप पर डेटा बेचे जा रहे हैं। जिस तरह कोई भी दूसरा सामान बेचा जाता है, ठीक उसी तरह लोगों की खरीद-बिक्री की जानकारी, उनके भुगतान की जानकारी, उनके सोशल मीडिया इस्तेमाल की जानकारी फोन नंबरों सहित बेची जा रही है। अभी बहुत से लोगों को जो ऑफर मिला है वह दो करोड़ हिन्दुस्तानियों की जानकारी का है। इसमें बुक माई शो वेबसाईट के 42 लाख ग्राहक, पेटीएम के 50 लाख ग्राहक, नेटफ्लिक्स के 18 लाख ग्राहक, जोमैटो के 12 लाख ग्राहक, यूट्यूब चैनल इस्तेमाल करने वाले 35 लाख लोग, इंस्टाग्राम इस्तेमाल करने वाले 45 लाख लोग और फोन-पे इस्तेमाल करने वाले 20 लाख लोगों का सारा डेटा ढाई हजार रूपए से कम पर बेचा जा रहा है। ऑनलाईन कुछ भी करने वाले लोग यह देख लें कि उनका तौलिया कभी भी पल भर में उतर सकता है।


30-Jan-2021 5:08 PM 277

मंदिर के लिए शहर से ज्यादा गांवों में

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर चंदा हो रहा है। भाजपा चंदा एकत्र करने के लिए अभियान चला रही है। चर्चा है कि पार्टी नेताओं में पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल चंदा जुटाने में सबसे आगे रहे हैं। बृजमोहन ने पिछले दिनों चंदा एकत्र करने के लिए अपने निवास पर रात्रि भोज का आयोजन किया था।

बृजमोहन की पार्टी में विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय विशेष तौर पर मौजूद थे। पार्टी में उद्योगपति कमल सारडा, राजेश अग्रवाल, बड़े ज्वेलरी कारोबारी और सिंचाई-पीडब्ल्यूडी के बड़े ठेकेदार मौजूद थे। सुनते हैं कि मंदिर निर्माण के लिए कारोबारियों ने उदारतापूर्वक सहयोग किया।

चर्चा है कि पार्टी में ही करीब एक करोड़ एकत्र कर लिए गए। वैसे केन्द्र सरकार ने मंदिर निर्माण के लिए दान पर 50 फीसदी आयकर छूट दे दी है। इस वजह से भी बड़े कारोबारी सहयोग में पीछे नहीं हट रहे हैं। एक मंदिर के कोषाध्यक्ष ने तो 51 लाख रूपए दान किए।

चेम्बर के एक पूर्व अध्यक्ष ने अपने साथियों के साथ मिलकर 11 लाख एकत्र कर दिए हैं। ये बात अलग है कि कुछ से ज्यादा सहयोग की अपेक्षा थी, लेकिन वे उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। एक उद्योगपति से 51 लाख की उम्मीद थी, लेकिन उन्होंने 21 लाख से ज्यादा सहयोग करने में असमर्थता जता दी है।  उन्हें मनाने की कोशिशें चल रही हैं। चंदा जुटाने के अभियान में लगे नेताओं का मानना है कि शहर से ज्यादा गांवों में मंदिर निर्माण के लिए सहयोग मिल रहा है। गांव के लोग बिना मांगे सहयोग के लिए आगे आ रहे हैं। भाजपा के लोगों को इस अभियान से बड़े राजनीतिक फायदे की भी उम्मीद नजर आ रही है।

आगे भी जारी रहेगा

 विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर के लिए चंदा जुटाने के अभियान से 14 करोड़ परिवारों को जोडऩे की रणनीति बनाई है। करीब साढ़े 4 करोड़ परिवारों से 10 रूपए सहयोग राशि ली जाएगी। इसके बाद साढ़े 4 करोड़ लोगों से सौ रूपए से एक हजार तक राशि ली जाएगी। करीब 20 लाख लोग ऐसे होंगे, जो कि एक करोड़ तक सहयोग राशि देंगे।

छत्तीसगढ़ से ही 51 करोड़ रूपए जुटाने का लक्ष्य है। बृजमोहन की पार्टी में विहिप के उपाध्यक्ष चंपत राय की तारीफों के पुल बांधते हुए अजय चंद्राकर ने कहा कि चंपत रायजी पिछले 29 साल से राम मंदिर निर्माण के अभियान में लगे हैं। राम मंदिर का काम पूरा होने के बाद वे मथुरा-काशी के अभियान में जुट जाएंगे। यानी सहयोग राशि जुटाने का अभियान आगे भी जारी रहेगा।

छत्तीसगढ़ी बोलने पर सजा?

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ को सरकारी कामकाज की भाषा बनाने, प्रायमरी स्कूल में पढ़ाई का माध्यम बनाने जैसी मांगे भाषा को लेकर आंदोलन करने वालों ने कई बार मांग उठाई। विधानसभा में कभी-कभी छत्तीसगढ़ी में चर्चा, वक्तव्य देकर हमारे जनप्रतिनिधि भी चर्चा में आते रहते हैं। सरकारी दफ्तरों में आवेदन छत्तीसगढ़ी में स्वीकार करने का आदेश हो चुका है, अधिकारियों को छत्तीसगढ़ी सीखने के लिये सर्कुलर भी निकलता आया है। पर अब तक छत्तीसगढ़ी जहां थी, राज्य बनने के बाद उससे बहुत आगे बढ़ी नहीं।

नेताओं की पब्लिक मीटिंग को छोड़ दें तो, अब भी छत्तीसगढ़ी जानने वाले बहुत से लोग इसे बोलना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं और जो समझते हैं वे भी नहीं समझ पाने का अभिनय करते हैं। शायद ऐसा ही कुछ कांकेर के एक नर्सिंग कॉलेज में हो रहा है। जैसी खबर है, प्राचार्य छात्र-छात्राओं के लिये सजा तय कर देते हैं यदि वे उन्हें छत्तीसगढ़ी में बात करते हुए मिल जाती हैं। छात्र-छात्राओं ने आठ किलोमीटर पैदल चलकर बकायदा कांकेर आकर कलेक्टर से इसकी शिकायत की है। प्रताडि़त करने के कुछ और भी आरोप उन्होंने प्राचार्य पर लगाये हैं और उन्हें हटाने की मांग की है। देखें, शिकायतों की जांच और कार्रवाई क्या होती है।

और कितना जटिल होगा जीएसटी?

गुड्स एंड सर्विस टैक्स, जीएसटी को जितना आसान बताया गया था व्यापारियों और टैक्स सलाहकारों को इसमें उतनी ही ज्यादा जटिलता महसूस हो रही है। जीएसटी कैसे काम करेगा, इसकी फाइल कैसे दाखिल करनी है, इस पर सम्बन्धित विभागों के अधिकारी हर दो चार महीने में कार्यशाला रखते हैं पर उसके बाद फिर नियम बदल जाते हैं। इससे परेशान टैक्स सलाहकार अब आंदोलन पर उतर आये हैं। आल इंडिया एसोसिएशन के आह्वान पर छत्तीसगढ़ में भी ये सडक़ों पर निकले। सांसदों, विधायकों को भी ज्ञापन-आवेदन दिये। आंदोलन में व्यापारी भी साथ थे।

इनका कहना है कि ऐसे कानून का क्या फायदा? न तो सरकार को ज्यादा कलेक्शन बढ़ रहा है, न ही टैक्स चोरियां और फर्जी कंपनियों से कारोबार रुक रहा है। जीएसटी सर्वर भी धीमे काम करता है। इससे ज्यादा जल्दी तो कागज पेन से काम हो जाता था। व्यापारी और टैक्स सलाहकार क्या, खुद अधिकारी भी इसके नियम कायदे समझ नहीं पा रहे हैं, फिर भी चल रहा है। उन्होंने आंदोलन के लिये यह वक्त इसलिये चुना है ताकि बजट में वित्त मंत्री कुछ लचीला रुख अपनायें और इस बाबत कोई घोषणा करें। पर उन्हें डर भी है। हर बदलाव पहले भी टैक्स और रिटर्न क्लेम आसान करने के नाम पर किया गया लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

कानूनी पेचीदगी और नये अफसर

राज्य प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा के अधिकारियों को प्रोबेशन के समय निचले स्तर से लेकर ऊपर तक के विभागीय कामकाज के तरीके बताये जाते हैं। कुछ दिनों तक वे नीचे के दफ्तरों का प्रभार संभालते हैं, पर ऐसा लगता है कि यह काफी नहीं है। शिक्षण प्रशिक्षण युवा अधिकारियों को कुछ ज्यादा मिलना चाहिये।

हाल ही में दो महिला पुलिस अधिकारियों ने गलतियां की। एक मामले में तो हाईकोर्ट में पेश होना पड़ा। दूसरे मामले ने तूल नहीं पकड़ा, बच गईं। धोखाधड़ी के एक मामले में हाईकोर्ट ने शासन को निर्देश दिया था कि पीडि़त व्यक्ति का बयान लिया जाये और कोर्ट के सामने पेश किया जाये। हाईकोर्ट में शासन का प्रतिनिधि सीधे सरकार का पक्ष या दस्तावेज पेश नहीं करता। उसे महाधिवक्ता कार्यालय के रास्ते से जाना होता है, पर जांजगीर पुलिस ने इस मामले में पीडि़त का बयान, हलफनामा के साथ सीधे हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के पास भेज दिया। हाईकोर्ट ने एसपी को हाजिर होने का फरमान जारी कर दिया। एसपी ने हाईकोर्ट पहुंचकर गलती मानी और बताया कि यह एडिशनल एसपी की वजह से हुई।

दूसरा मामला उज्ज्वला होम बिलासपुर का है। सीएसपी ने पीडि़त युवतियों का खुद ही बयान ले लिया और वीडियो रिकॉर्डिंग कर संतुष्ट हो गईं। पुलिस की फजीहत तब हुई जब दूसरे दिन युवतियों ने मीडिया के सामने आकर उज्ज्वला के संचालकों पर दुष्कर्म, यौन दुर्व्यवहार और नशीली दवा देने का आरोप लगाया। अगले दिन जब यह खबर प्रमुखता से अखबारों में आई तो आनन-फानन में पुलिस को इन युवतियों का मजिस्टीरिअल बयान दर्ज कराना पड़ा। वहां भी युवतियों ने मीडिया में कही गई बातें दुहराईं । कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस को उज्ज्वला होम के संचालक को तथा अगले दिन वहां की तीन महिला कर्मचारियों को गिरफ्तार करना पड़ा। पुलिस पर आरोप भी लगे वह उज्ज्वला होम के संचालकों को बचा रही है। शायद पहले ही बयान दर्ज करने में मजिस्ट्रेट की मदद ले ली जाती तो यह नौबत नहीं आती।

लाखों पौधे कहां लगे, जवाब नहीं

राज्य सरकार हो या केन्द्र सरकार के उपक्रम। हरियाली के नाम पर फर्जीवाड़ा आम बात है। कुछ साल पहले एक अध्ययन में दावा किया गया था कि यदि छत्तीसगढ़ में जितने पौधे सरकारी अभियानों के तहत लगाने का दावा अब तक किया गया है उनमें से 20 फीसदी भी पेड़ बच जाते तो आज छत्तीसगढ़ में कोई खाली जमीन बचती ही नहीं। पिछली सरकार में एक जिले के कलेक्टर ने 50 लाख पौधे लगाने का अभियान चलाया। डीएमएफ फंड का इसके लिये खूब इस्तेमाल किया गया। उससे और पीछे जायें तो उदाहरण एक करोड़ से ऊपर पौधों का भी मिल जायेगा। खनन क्षेत्रों में पौधे उजाडऩे के बाद उससे दस गुना अधिक पौधे लगाने की बात की जाती है, पर वे सिर्फ कम्पनियों के दफ्तर के आसपास और उनके कैम्पस, कॉलोनियों में दिखाई पड़ते हैं। धुआं उगलने वाले संयंत्रों को भी बाध्यता है कि वे पौधे लगाने के आंकड़ों को दुरुस्त रखें। इसीलिये एनटीपीसी सीपत के अधिकारियों ने एक पत्रकार वार्ता ली पर्यावरण संरक्षण के लिये 10 लाख पौधे लगाने का दावा किया और अपनी उपलब्धि की तरह पेश किया। पत्रकारों ने सवाल किया कि वे 10 लाख पौधे कहां लगे हैं, हम देखना चाहेंगे। हड़बड़ाये अधिकारियों ने कहा कि हमने सिर्फ तीन लाख लगाये, बाकी सात लाख लगाने के लिये रकम राज्य सरकार को दी। अब दूसरा सवाल उठा कि चलिये आपने जो तीन लाख लगाये वे कहां हैं बता दीजिये, जाहिर है, जवाब कुछ नहीं मिला।


29-Jan-2021 6:01 PM 239

विद्या भैया की चर्चा...

सीएम भूपेश बघेल ने पिछले दिनों दिवंगत विद्याचरण शुक्ल चौक का लोकार्पण किया। इस मौके पर वक्ताओं ने इस दिग्गज राजनेता को याद किया। कार्यक्रम में शुक्ल के भतीजे अमितेश शुक्ल को भी सम्मानित किया गया। अमितेश, दिवंगत शुक्ल बंधुओं के इकलौते राजनीतिक वारिस हैं। ऐसे में उन्हें सम्मानित करना गलत भी नहीं था। ये अलग बात है कि निजी चर्चाओं में अमितेश अपने चाचा को भला-बुरा कहने से नहीं चूकते थे। ये बात कांग्रेस के नेता भली-भांति जानते हैं।

खैर, अमितेश के बोलने की बारी आई, तो उन्होंने बताया कि कैसे चाचा के सानिध्य में अपने राजनीति कैरियर की शुरूआत की, और आगे बढ़े। इसके बाद तो सत्यनारायण शर्मा ने अमितेश को यह कहकर खुश कर दिया कि अमितेश, विद्या भईया के कान में जो कुछ भी कह देते थे, वे तुरंत मान लेते थे। और जब नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिव कुमार डहरिया की बारी आई, तो अपने उद्बोधन में सामने बैठे राजेंद्र तिवारी और सुभाष धुप्पड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अमितेश नहीं, ये सामने बैठे लोग भईया के कान फूंकते थे। इस पर जमकर ठहाके लगे।देखना है आगे होता है क्या

देखना है आगे होता है क्या

प्रदेश में कांग्रेस सरकार सत्तारूढ़ हुई, तो मंत्रालय में एक अफसर के  कमरे में आईएएस अफसरों का जमावड़ा रहता था। अफसर के दाऊजी से अच्छे संबंध रहे हैं। दाऊजी एक बार जेल में थे, तो अफसर चुपके से उनसे मिल आए थे।  वैसे अफसर के पिछली सरकार के प्रभावशाली नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं। स्वाभाविक है कि यह सब जानने वाले लोग काफी दिनों तक अफसर के पावरफुल होने की प्रत्याशा में आगे-पीछे होते रहे। मगर अफसर के दिन नहीं फिरे। और जब अफसर ने मंत्रालय से बाहर बेहतर पोस्टिंग के लिए जुगाड़ लगाया, तो बस्तर संभाग में पोस्टिंग हो गई। यानी आसमान से गिरे, खजूर में अटके वाली कहावत चरितार्थ हो गई। अब कुछ सामाजिक और राजनीतिक लोगों ने अफसर के लिए पैरवी की है। देखना है आगे होता है क्या।

हरकत औलाद की, गाली माँ को!

हिंदुस्तान की सार्वजनिक जगहों पर लोगों का जो अश्लील प्रदर्शन देखने मिलता है उसका नतीजा है कि देश भर की दीवारों पर इस किस्म की चेतावनी लिखी दिखती है। सडक़ों पर गाडिय़ां चलाने वाले लोग जिस तरह दरवाजे खोल कर पान या तंबाकू की पीक उगलते हैं वह देखना भी भयानक नजारा है. किसी और देश के पर्यटक अगर इसे देखें तो उन्हें लगेगा कि कोई खून की उल्टी कर रहा है और वह एंबुलेंस बुलाने की कोशिश करेंगे। लोग सार्वजनिक जगहों पर कोशिश करके भी पेशाब निकालने में लगे रहते हैं, और अगर उन्हें मुंह में पीक ना भी बने तो भी उन्हें हीन भावना होने लगती है कि सार्वजनिक जगह पर इतनी देर से थूका नहीं है पता नहीं इस जगह पर उनका कब्जा अभी कायम है या नहीं। बिलासपुर के फोटोग्राफर सत्यप्रकाश पांडे ने ये तस्वीरें खींची हैं ।

हिसाब तो मिलना ही चाहिये...

राममंदिर के लिये चंदे की बात अलग है। लोगों में होड़ लगी हुई है। तस्वीरें खिंचाकर लोग बता रहे हैं कितना चंदा दिया। इससे प्रभावित दूसरे लोग भी बढ़-चढक़र रसीद कटवा रहे हैं। कीर्तन, भजन के साथ चंदे की टोली निकल रही है। जिस बड़े पैमाने पर चंदे के लिये टीमें निकली हुई हैं, कांग्रेस ने कई सवाल किये हैं। वह विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा बरसों पहले इसी नाम से लिये गये करोड़ों रुपये के चंदे का हिसाब जानना चाह रही है। साथ ही यह भी पूछा है कि किस-किस को चंदा लेने के लिये अधिकृत किया गया है।

बिलासपुर में हू-ब-हू रसीद छपवाकर एक महिला नेत्री द्वारा चंदा मांगने की शिकायत तो थाने में भी हो चुकी है और निचली अदालत से उसकी जमानत याचिका भी खारिज हो चुकी। एक मामला तो पकड़ में आ गया लेकिन क्या पता गांव-गांव में चंदे के लिये निकलने वाली टोलियों में और भी कुछ मामले सामने आ जायें। कांग्रेस का सवाल शायद इसी वजह से है कि बहुत से लोग धोखे का शिकार हो सकते हैं। इसीलिये कांग्रेस सरकार ने अब सीधे ट्रस्ट को पत्र भेजकर जानकारी मांगी है कि चंदा लेने के लिये अधिकृत आखिर कौन है?  अपने छत्तीसगढ़ के विधायक अमितेश शुक्ल और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सही तरीका निकाला, सीधे राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को ऑनलाइन रकम भेजी।

गरीब बेटियों को ऐसे शादी कराई मंत्री ने

दूरस्थ बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में हुए सामूहिक विवाह में मंत्री डॉ. प्रेम साय सिंह टेकाम आशीर्वाद तो देकर आ गये पर इन नव दम्पतियों के साथ जो बर्ताव किया गया उसे गंभीरता से नहीं लिया। पेन्डारी गांव में गरीब परिवारों के 85 जोड़ों का विवाह हुआ। विवाह की रस्म पूरी हुई उसके बाद इन जोड़ों के लिये उपहार दिया गया। टूटी अलमारी, पेटियां उनके हिस्से में आईं। अतिथियों व नव दम्पतियों के लिये बैठने की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई। भोजन इधर-उधर जगह बनाकर करना पड़ा। लोग पानी के लिये भी तरसे। महिला बाल विकास विभाग के इस आयोजन में बजट की कमी पड़ गई या कोई और बात थी, यह तो पता नहीं पर जब पंचायत प्रतिनिधियों ने इस बात की शिकायत मंत्रीजी से की तो उन्होंने भी कह दिया- जो है, सब आपके सामने है। अब ऐसा कहकर उन्होंने जिम्मेदारी किसके ऊपर डाली, उन्हें ही पता होगा।


28-Jan-2021 5:42 PM 226

अभी तो दिल्ली दूर ही है...

बिलासा एयरपोर्ट, बिलासपुर को थ्री-सी हवाई सेवा की मंजूरी मिलने के बाद श्रेय लेने की होड़ लगी हुई है। वहीं अनेक लोग सोशल मीडिया पर ध्यान दिला रहे हैं कि नागरिक आंदोलन व हाईकोर्ट के दबाव के चलते थ्री-सी लाइसेंस मिला तो है पर ज्यादा उड़ानों की संभावना नहीं है। उड्डयन मंत्रालय ने बिलासपुर-भोपाल के बीच उड़ान की घोषणा की है पर उसकी तारीख अब तक तय नहीं हुई है। बिलासपुर से भोपाल का अब आर्थिक, राजनीतिक सम्बन्ध बहुत ज्यादा रह नहीं गया है। लोग दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, मुम्बई आदि की उड़ान चाहते हैं। इसके लिये दूसरे छोटे, पूर्वोत्तर राज्यों की तरह सब्सिडी की जरूरत है। इसकी भी घोषणा नहीं हुई है। बिलासपुर के लोग महंगी हवाई यात्रा कर पायेंगे या विमानन कम्पनियां नुकसान में रहकर सेवायें देंगीं? 

बिलासपुर को 4सी कैटेगरी हवाईअड्डा का दर्जा देने की मांग की गई है, जिसकी संभावना बहुत जल्दी नहीं दिखाई दे रही है। इसके होने पर ही महानगरों के लिये आसान उड़ानें शुरू हो पायेंगीं। बिलासपुर से छोटे कई शहरों में नियमित हवाई सेवायें शुरू हो चुकी हैं। राज्य बनने के बाद एक ठोस घोषणा तो हुई है जिसका जश्न भी मनाया जा रहा है पर मौजूदा परिस्थितियां यही कह रही है दिल्ली अभी दूर है..।

ऑडिट का मौसम

वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर सरकारी विभागों में ऑडिट का काम तेज हो गया है। वैसे तो ज्यादातर दफ्तरों में मासिक ऑडिट होती है, पर मार्च के पहले बजट के सारे हिसाब-किताब दुरुस्त कर बिल वाउचर जमा करने होते हैं। साथ ही इनका परीक्षण करने ऑडिट टीम भी आती है। ऑडिट टीम की चोरी-छिपे खातिरदारी कर गड़बड़ी पर लीपा-पोती भी आम बात है पर यदि यह सेवा खुलेआम होने लगे तो?  मुंगेली के सिंचाई विभाग में ऑडिट टीम पहुंची पर पूरा दफ्तर खाली था। टीम नदारत है, बाबू और अफसर भी। मालूम हुआ कि पूरा दफ्तर ऑडिट टीम को साथ लेकर खुडिय़ा बांध घूमने चला गया है। पिकनिक के बीच किस तरह की ऑडिट रिपोर्ट तैयार हुई होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी तरह बिलासपुर में लोक निर्माण विभाग में बिना टेंडर के 20 करोड़ रुपये खर्च करने का मामला सामने आया है। मुख्यालय की नियमित ऑडिट जांच से यह गड़बड़ी पकड़ी गई। रायपुर से आये जांच के आदेश को बिलासपुर के अधिकारी फिलहाल दबाये बैठे हैं। बताया जा रहा है कि जांच की जवाबदारी उन लोगों को ही दे दी गई है जिन पर गड़बड़ी का आरोप है।

ऑफलाइन परीक्षाओं का बोझ

कई वर्षों से अलग-अलग सेमेस्टर में रुक जाने वाले ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट कक्षाओं के छात्रों को कोरोना का बड़ा फायदा मिला। उन्हें घर से ही ऑनलाइन परीक्षा देने की सुविधा मिली और वे डिग्री हासिल करने में कामयाब भी हो गये। यह सिलसिला अब तक चला आ रहा था, लेकिन बस थोड़े दिनों की बात है। नियमित स्कूल, कॉलेज खुलते ही जा रहे हैं। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अलावा माध्यमिक शिक्षा मंडल ने भी ऑफलाइन परीक्षा लेने की घोषणा कर दी है। बोर्ड परीक्षाओं का सिलेबस अधिकांश स्कूलों में 30 से 40 प्रतिशत ही पूरा हो पाया। अब छात्रों को अपनी ही क्षमता, नोट्स और सेल्फ स्टडी के आधार पर नतीजे लाकर दिखाना है।

पिछली बार ओपन स्कूल बोर्ड परीक्षाओं के छात्रों ने भी इसका फायदा उठाया और घरों में नोट्स, किताबों को देख देखकर सवाल हल किये। इस बार भी ओपन बोर्ड परीक्षाओं असाइनमेंट मिलने की उम्मीद थी, इसके चलते 10वीं, 12वीं बोर्ड में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने परीक्षा फॉर्म भरा। कई साल से जो छात्र फेल हो रहे थे, वे भी खुश हो रहे थे कि चलो कोरोना के चलते दाग धुल जायेगा। पर इधर कोरोना के केस कम होने लगे। अब ओपन बोर्ड परीक्षा भी निर्धारित केन्द्रों में जाकर दिलाने की घोषणा कर दी गई है। ऐसे में रिजल्ट को लेकर वे चिंतित हो उठे हैं।

बच गये निजी स्कूल निरीक्षण से

कोरोना के चलते निजी स्कूल इस बार मान्यता के लिये निरीक्षण के झंझट से बच गये। इस बार शिक्षा विभाग इनकी मान्यता का सीधे नवीनीकरण करने जा रहा है। इसके लिये आवेदन लिये जायेंगे और निर्धारित फीस भी ली जायेगी। वैसे भी निरीक्षण होता भी है तो वह ज्यादातर औपचारिक ही होता है। लैब, फर्नीचर, खेल मैदान, टीचिंग और नान टीचिंग स्टाफ जैसे कई मापदंड पूरे होते नहीं हैं पर निरीक्षण दल की मेहरबानी से ओके रिपोर्ट मिल जाया करती है। इस बार इन दलों की खातिरदारी का खर्च निजी स्कूलों ने बचा लिया।


27-Jan-2021 5:39 PM 243

फीस निर्धारण समितियों का सच

शिक्षा विभाग ने स्कूलों में फीस निर्धारण समिति के गठन को लेकर इस बार तेवर ढीले नहीं किये। फीस निर्धारण समिति नहीं बनाने के कारण शिक्षा विभाग ने अकेले रायपुर जिले में करीब 250 स्कूलों को अगले सत्र की मान्यता रोक ली थी। इसका असर हुआ कि निजी स्कूल, समितियों का ब्यौरा शिक्षा विभाग को सौंपते जा रहे हैं और उनकी मान्यता देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। निजी स्कूल कॉलेजों के लिये जनवरी-फरवरी माह बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि नये सत्र के लिये प्रवेश की प्रक्रिया शुरू होती है। कई स्कूलों में शिक्षकों को भी लक्ष्य दिया जाता है कि वे विद्यार्थी लेकर आयें। दूसरी ओर फीस निर्धारण समिति के गठन को हाईकोर्ट में चुनौती भी दी गई है। स्कूल प्रबंधकों की उम्मीद फैसले पर टिकी हुई है। दूसरी तरफ रायपुर में ही पालकों ने जिला शिक्षा अधिकारी से शिकायत की है कि कई स्कूलों में पालकों की सहमति के बगैर ही नोडल अधिकारियों की मिलीभगत से समितियों का गठन कर दिया गया । यानि सिर्फ मान्यता हासिल करने के लिये जैसे-तैसे समितियां भी बनाई जा रही हैं।

बोधघाट बिजली नहीं सिंचाई के लिये

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बस्तर दौरे के दौरान अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को आड़े हाथों लिया। मुद्दा बोधघाट परियोजना का था। पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री अरविन्द नेताम इस योजना का विरोध करते आये हैं। उन्हें लेकर सीएम ने कहा कि हम चाहते हैं कि सबकी आर्थिक स्थिति नेताम की तरह हो जाये। उनके पेट्रोल पम्प हैं, बढिय़ा खेती है, घर में सब नौकरी-चाकरी कर रहे हैं। उन्होंने सम्पन्नता को लेकर सांसद दीपक बैज का भी उदाहरण रखा। कहा, बोधघाट से खेतों में पानी पहुंचेगा और आदिवासी उनकी तरह खुशहाल हों वे यह चाहते हैं।

बस्तर का विकास किस तरह से हो कि आदिवासी परम्परायें और जीवन शैली सुरक्षित रहे यह सवाल हमेशा हर सरकार के लिये महत्वपूर्ण रहा है। अतीत में कुछ बड़े फैसले हुए, विस्थापन हुए जिससे भय का माहौल बना। और हिंसा पर तो अब तक रोक नहीं लग पाई है। ऐसी स्थिति में चिंता व्यक्त करना भी सही है और उसका समाधान निकालना भी जरूरी।

रुक तो नहीं पाई टैक्स चोरी

नोटबंदी और जीएसटी के दौरान करों की चोरी रोकने और कालेधन पर लगाम कसने का जो अनुमान लगाया गया था वह धरातल पर नहीं उतरा। बीते साल सिर्फ एक बार ऐसा हुआ कि जीएसटी कलेक्शन एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंचा। फर्जी फर्मों, कम्पनियों और के जरिये टैक्स चोरी इसकी एक बड़ी वजह मानी जाती है। इसके चलते राज्यों को नुकसान की भरपाई भी नहीं हो पा रही है।

जीएसटी लागू किया गया तब माना गया कि यह फुल प्रूफ तरीका है। टैक्स चोरी पूरी तरह रुक जायेगी। सन् 2017 से लेकर 2019 के बीच करीब 6.80 लाख शेल कम्पनियों को बंद भी किया गया, जिसे लेकर केन्द्र सरकार ने खूब वाहवाही भी बटोरी। लेकिन यह खेल रुका नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में जीएसटी चोरी के मामले सामने आ रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी में तो 258 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया जिसमें 2 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। छत्तीसगढ़ में यह अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई है। दोनों आरोपी न्यायिक रिमांड पर जेल भी भेज दिये गये हैं। टैक्स कलेक्शन सिस्टम को ऑनलाइन करने के बाद इस तरह के खतरे और बढ़े हैं। धोखाधड़ी करने वाले साइबर एक्सपर्ट्स भी हैं। जीएसटी विभाग के अधिकारियों के हाथ में ऐसे गिने-चुने मामले पकड़ में आ जाते हैं पर वास्तव में चोरी कितनी हो रही है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ी गाना बजाने पर अर्थदंड

छत्तीसगढ़ी में जिस रफ्तार से गाने व फिल्में रिलीज हो रही हैं उसके मुकाबले उनकी प्रशंसा नहीं होती। किसी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्पर्धा में नामांकन भी नहीं हो पाता । कई बार यह बॉलीवुड फिल्मों की खराब नकल के रूप में सामने आती हैं। कुछ अच्छे विषयों पर काम होता भी है तो उन्हें निर्देशन, पटकथा, फिल्मांकन की कमियों के कारण दर्शकों की रिस्पांस नहीं मिलता।

इन दिनों एक गीत यू ट्यूब पर चल रहा है जिसे 1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं। इस गीत को बहुत से लोग अश्लील मान रहे हैं। इस गीत के खिलाफ बीते दिनों धरसीवां इलाके कांदुल ग्राम में बकायदा फरमान जारी किया गया। सरपंच, सचिव ने एक आम सूचना निकालकर चेतावनी दी है कि गांव के मड़ई मेले में यह गीत नहीं बजेगा। जो बजायेगा उसे 5551 रुपये अर्थदंड चुकाना होगा। चाहे वह गांव का व्यक्ति हो या बाहरी। अर्थदंड लेना वाजिब है या नहीं, या नहीं इस पर सवाल उठ सकते हैं पर किसी गाने के विरोध में ऐसा फरमान निकालना शायद पहली बार हुआ। गाने में उन्हें इतनी खामी दिखी कि मेले का माहौल बिगड़ सकता है। कई लोगों ने यू ट्यूब पर इस गाने की तारीफ की है पर एक यूजर ने यह भी लिखा है कि भोजपुरी गाने की तरह अश्लीलता मत परोसें।