राजपथ - जनपथ

27-Aug-2020 7:26 PM 4

सूखी जगह की तलाश में...

बारिश का वक्त जानवरों के लिए खासी मुश्किल का होता है। वे गीली जगह पर बैठ नहीं पाते, और सूखी जगह बचती नहीं है। इसी के चलते गाय, सांड सडक़ों पर बैठे दिखते हैं जहां से पानी सूख चुका रहता है। दूसरी तरफ बिलासपुर के फोटोग्राफर सत्यप्रकाश पांडेय को एक ऑटोरिक्शा में बैठे ये कुत्ते दिखे, जब तक ऑटो मालिक आ जाए, तब तक तो एक सूखी जगह हासिल है ही।

गालियां नोट कर लेना...

विधानसभा सत्र के पहले दिन दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी को श्रद्धांजलि दी गई। और सत्ता व विपक्ष के कई सदस्यों ने उनसे जुड़े संस्मरण भी सुनाए। संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे ने उनके मुख्यमंत्रित्वकाल की कुछ घटनाओं को याद किया। चौबे ने कहा कि वे उस समय संसदीय कार्यमंत्री थे। तब विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया। उस समय विपक्ष आज से थोड़ा ज्यादा ताकतवर था।

जोगीजी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया, तो उन्होंने कहा कि हम खुद सदन की कार्रवाई का बहिष्कार करेंगे। मैंने कहा आप कैसे बहिष्कार कर देंगे? अविश्वास प्रस्ताव का सामना तो करना पड़ता है। जोगीजी ने कहा सामना करना पड़ता है ये सामूहिक जिम्मेदारी है। आप संसदीय कार्यमंत्री हो, आप अपनी जगह बैठना। मैंने कहा कि मैं अकेले कैसे बैठूंगा, मुझे पानी पीने भी जाना पड़ सकता है। उस समय रामलाल भारद्वाज कांग्रेस विधायक दल के सचेतक हुआ करते थे। जोगी ने कहा कि भारद्वाज को भी साथ रख लिए रहना। सारे सदन में उस समय सीएम जोगी सहित पूरी सरकार सदन से बाहर थी।

चौबे ने बताया कि विपक्षी सदस्य पता नहीं कितना पढक़र आए थे। पूरे छत्तीसगढ़ी के शब्दों में, मुहावरों में गालियां हुआ करती थीं। मैंने अपने जीवन में पहली बार इतना सुना था। सारे विपक्ष के लोगों ने सुबह साढ़े 10 बजे विधानसभा शुरू हुई थी और रात्रि ढाई-पौने 3 बजे तक नंदकुमार साय से लेकर आखिरी मोर्चे तक हर कोई गाली देते रहा। मैं यहां बैठा सुनता रहा। मैंने जोगीजी से पूछा कि इनकी खाली गाली सुनना भर है? तो वह बोले की उसको नोट भी कर लेना। चौबे ने कहा कि अब गाली को मैं कैसे नोट करता। मगर जोगीजी में क्षमता थी।


26-Aug-2020 6:46 PM 5

छोटा सा रोजगार...

सडक़ किनारे वजन की मशीन लेकर बैठे लोग जमाने से रोजी-रोटी कमाते आए हैं। अभी छत्तीसगढ़ के एक भूतपूर्व आईएएस अफसर और भाजपा के एक विधानसभा उम्मीदवार रहे ओ.पी. चौधरी ने सुबह की सैर के वक्त खींची फोटो पोस्ट की है कि रोजी कमाने की बहुत से तरकीबें ढूंढी जा सकती हैं। अब तस्वीर से तो यह बच्ची अपनी मां के साथ बैठी दिख रही है, इन दिनों शहरों में संपन्नता के चलते घर-घर वजन की मशीन रहने लगी है, फिर भी सुबह की सैर के जागरूक लोग अपना वजन तो जांच ही सकते हैं। हजार रूपए के आसपास की ऐसी मशीन किसी को रोजगार दे सकती है, ऐसा सोचकर भाजपा के कार्यकर्ता नरेन्द्र शर्मा ने इन्हें यह मशीन और बोर्ड दिलवाकर यहां बिठाया और स्वरोजगार की एक संभावना पैदा की।

निहारिका की जगह रेणु?

स्वास्थ्य सचिव सुश्री निहारिका बारिक सिंह अगले हफ्ते दो साल की छुट्टी पर जा रही हैं। निहारिका के जाने के बाद छोटा सा प्रशासनिक फेरबदल होगा। कोरोना संक्रमण के चलते स्वास्थ्य महकमा काफी अहम हो चला है। हालांकि दो महीने पहले ही निहारिका से चिकित्सा शिक्षा विभाग लेकर एसीएस रेणु पिल्ले को दे दिया गया था। चर्चा है कि स्वास्थ्य महकमा भी रेणु पिल्ले को सौंपा जा सकता है। रेणु पिल्लै की साख अच्छी है और काफी मेहनती भी हैं। ऐसे में रेणु को कोरोना से निपटने की जिम्मेदारी दी जाती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वे वैसे भी चिकित्सा शिक्षा विभाग प्रमुख के नाते आधा काम देख ही रही थीं।

निहारिका के पति जयदीप सिंह इंटेलिजेंस ब्यूरो के सीनियर अफसर हैं, और उन्हें जर्मनी में भारतीय दूतावास पोस्ट किया गया है. फि़लहाल वे दिल्ली में हैं और एक पखवाड़े बाद जर्मनी रवाना होने वाले हैं।

लेट पोस्टिंग

कोरोना के दौर में स्वास्थ्य विभाग में अहम नियुक्तियों में देरी की काफी चर्चा हो रही है। मसलन, डायरेक्टर महामारी का पद दो महीने से खाली पड़ा था। कई बार फाइल चली। आखिरकार नेत्र विशेषज्ञ डॉ. सुभाष मिश्रा को डायरेक्टर महामारी बनाया गया। इसी तरह डॉ. एसएल आदिले को हटाने के बाद से डीएमई का पद खाली है। डॉ. आदिले रेप के आरोप के बाद से फरार हैं। गंभीर आरोपों के बाद भी उन्हें संविदा नियुक्ति दे दी गई थी। अब जब वे हट गए हैं, उनकी जगह नई पदस्थापना में देरी समझ से परे है।

 

 

 

 

 

 


25-Aug-2020 5:52 PM 3

अब फिर एक साथ !

राज्य पुलिस सेवा के डेढ़ दर्जन अफसर इधर से उधर किए गए। इस तबादले में सबसे ज्यादा चर्चा वायपी सिंह की हो रही है, जिन्हें पीएचक्यू से हटाकर बीजापुर पोस्टिंग की गई है। वैसे तो वायपी सिंह बीएसएफ के अफसर थे और उनकी पोस्टिंग राजनांदगांव में हुई थी। पांच साल के भीतर उनका छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग में संविलियन हो गया। उन्हें 97 बैच आबंटित किया गया।

पिछली सरकार में राज्य पुलिस सेवा के अफसरों ने इसका विरोध भी किया क्योंकि वे  राज्य पुलिस सेवा में आते ही आईपीएस अवार्ड के लिए पात्र हो गए। मगर वायपी सिंह के पैरोकारों ने उन्हें नक्सल मोर्चे पर बेहतर काम करने वाले अफसर के रूप में प्रचारित किया। चूंकि उपनाम सिंह भी था इसलिए राज्य पुलिस सेवा के अफसरों के विरोध का कोई बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ, लेकिन अब सरकार बदल दी गई है। वायपी सिंह को धुर नक्सल प्रभावित जिले बीजापुर में भेजा गया है।

एक संयोग यह भी है कि बीजापुर के मौजूदा एसपी कमल लोचन कश्यप और वायपी सिंह, दोनों ही राजनांदगांव में काम कर चुके हैं। चर्चा तो यह भी है कि दोनों के बीच बोलचाल तक नहीं थी। खैर, अब वायपी सिंह को कमल लोचन के अधीन नक्सल मोर्चे पर जौहर दिखाना होगा। विभाग के कुछ लोग चुटकी ले रहे हैं कि वायपी सिंह के काम का सही मूल्यांकन अब होगा।

पीएचक्यू की भैंस गई पानी में...

पुलिस विभाग में सबसे बड़े कुछ अफसरों के प्रमोशन पर राहू-केतू की मिलीजुली दशा चलती दिख रही है। एडीजी से डीजी बनाने की एक और मीटिंग पिछले दिनों हुई, जिसमें डीजीपी डी.एम.अवस्थी के विरोध के बाद मामला गड्ढे में चले गया। दरअसल यह पूरा सिलसिला निलंबित चल रहे एडीजी मुकेश गुप्ता की वजह से खटाई में पड़ा हुआ है। सरकार मुकेश गुप्ता को किसी भी हाल में प्रमोशन देना नहीं चाहती क्योंकि उनके खिलाफ कई मामलों की जांच चल रही है, मामले अदालत में भी गए हुए हैं। ऐसे में पता लगा है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी वकील से ली गई सलाह यह थी कि प्रमोशन किया जा सकता है, और मुकेश गुप्ता के बारे में जो भी तय हो, उनका लिफाफा बंद रखा जाए, और जब उनके बारे में फैसला हो जाए तब लिफाफा खोला जाए, और डीपीसी की जो सिफारिश उनके बारे में हो उसे माना जाए। ऐसा पता लगा है कि अवस्थी ने यह बात सामने रखी कि किसी प्रमोशन के खिलाफ मुकेश गुप्ता ने अदालत से स्टे ले रखा है, और प्रमोशन करना अदालत के आदेश के खिलाफ होगा। अभी कोई अफसर इस बारे में खुलकर कुछ कहने को तैयार नहीं हैं।

लेकिन डी.एम. अवस्थी आज अकेले डीजीपी बने हुए हैं, और यह नौबत उनके लिए निजी रूप से बहुत अच्छी है। अब संजय पिल्ले, आर.के.विज, केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर गए हुए रवि सिन्हा, और अशोक जुनेजा के दिन ही नहीं फिर पा रहे हैं। अगर यह मीटिंग हो जाती, तो राज्य में कुछ और डीजीपी स्तर के अफसर बन जाते। अब कमेटी के भीतर क्या बातें हुईं, यह तो नहीं मालूम लेकिन फिलहाल तो भैंस पानी में चली गई है, और वह कब निकलेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है।


24-Aug-2020 5:40 PM 7

दुबली पार्टी पर मैसेज की मार...

सच्चिदानंद उपासने के बाद वाट्सएप ग्रुप में भाजपा के एक पुराने नेता ने सौदान सिंह, रमन सिंह की कार्यप्रणाली के खिलाफ आवाज उठाई, तो नाराज कार्यकर्ताओं ने मैसेज को हाथों-हाथ लिया। यह मैसेज पूरे प्रदेशभर में वायरल हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि मैसेज को फैलाने में पार्टी के बड़े नेता भी पीछे नहीं हैं। कुछ लोगों का अंदाजा है कि इस मैसेज को हजारों लोग देख चुके हैं।

वायरल मैसेज में यह कहा गया कि वर्ष-2013 से 18 तक प्रदेश में भाजपा के नाम पर जो सरकार बनी थी, उसमें भ्रष्टाचार चरम सीमा पर था। जनता और आम कार्यकर्ता जानते हैं कि किस-किस ने अपार संपत्ति अर्जित की और भ्रष्टाचार को संरक्षण दिया। यह सबके सामने है। इसकी पुनर्रावृत्ति न हो, इस बात को ध्यान में रखकर पार्टी हित में खुलकर उपरोक्त बातों को रखा जाए, तभी हमारा और पार्टी का अस्तित्व है। यह भी लिखा गया आप चुप रहेंगे, डरेंगे, तो गलत लोग जिले से लेकर प्रदेश तक हावी हो जाएंगे। वर्तमान में ऐसे लोग हावी हो गए हैं, जिसका नुकसान पार्टी को लगातार उठाना पड़ रहा है।

एक अन्य मैसेज में तीजा के मौके पर रमन सिंह के अखबारों में विज्ञापन पर भी कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की गई। विज्ञापन में सिर्फ रमन सिंह की तस्वीर थी और भाजपा का चुनाव चिन्ह था। इसमें प्रदेश अध्यक्ष का फोटो नहीं डाला गया। भाजपा नेता ने वाट्सएप ग्रुप में लिखा कि रमन सिंह यह साबित करने की कोशिश में लगे हैं कि उनके बिना पार्टी का प्रदेश में कोई अस्तित्व नहीं है। कुछ इसी तरह की राय दिवंगत पूर्व सीएम अजीत जोगी की भी थी। जोगी खुले तौर पर कहते थे कि कांग्रेस के बिना जोगी नहीं, और जोगी के बिना कांग्रेस नहीं। मगर जोगी के बिना कांग्रेस रिकॉर्ड विधायकों के साथ सत्ता में आई। नेताजी ने सलाह दी कि रमन सिंह को ऐसी कोशिश से बचना चाहिए। क्योंकि विधानसभा, निकाय और पंचायत चुनाव का हाल सबके सामने है। मजे की बात यह है कि पार्टी के जो असंतुष्ट नेता खुलकर कुछ नहीं कह पा रहे हैं, वे इस तरह के मैसेज को फैलाकर समर्थन कर रहे हैं।

काम करते पॉजिटिव, ठीक होकर फिर...

वैसे तो प्रदेश में कोरोना संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। मगर संक्रमण ढूंढने, इलाज के लिए कोरोना वारियर्स जितनी जोखिम उठाकर मेहनत कर रहे हैं, उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। कुछ कोरोना वारियर्स का स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सम्मान भी किया गया। इन्हीं में से एक अंबेडकर अस्पताल के लैब असिस्टेंट प्रदीप बोगी भी हैं। अस्पताल में कोरोना की जांच के लिए लैब शुरू हुआ था तो प्रदीप को इंचार्ज बनाया गया। वे अलग-अलग स्थानों से सैंपल लेकर खुद आते थे और फिर लैब में जांच सहयोग करते थे। तब उनके पास स्तरीय मास्क भी नहीं था। एक बार तो सैंपल लेकर अंबेडकर अस्पताल जा रहे थे तो उनकी गाड़ी का चालान कर दिया गया।

तब सीएमओ ने खुद वहां पहुंचकर प्रदीप की गाड़ी का चालान पटाया। पुलिस कर्मियों ने उनका यह कहकर चालान कर दिया था कि उन्होंने हेलमेट नहीं पहना है। बाद में पुलिस कर्मियों के इस व्यवहार की स्वास्थ्य मंत्री और डीजीपी तक शिकायत हुई थी। पुलिस कर्मियों को मामूली डांट-फटकार के बाद छोड़ दिया गया। बाद में प्रदीप खुद संक्रमित हो गए। इलाज के बाद ठीक भी हो गए और वे फिर से जोखिम उठाकर कोरोना संदिग्ध के सैंपल की जांच में जुटे हैं। इसकी काफी सराहना भी हो रही है।

लखेश्वर बघेल से सीखें...

कुछ जनप्रतिनिधियों ने भी बिना प्रचार के जन जागरूकता फैलाने और लोगों को सेहतमंद बनाने की दिशा में अच्छा काम किया है। इन्हीं में से एक लखेश्वर बघेल भी हैं, जो कि बस्तर के विधायक हैं और बस्तर आदिवासी विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष भी हैं। लखेश्वर ने अपने पूरे विधानसभा क्षेत्र में आदिवासियों को काढ़ा वितरित कराया। लोगों को कोरोना से लडऩे के लिए इम्युनिटी मजबूत रहे, इसके लिए काफी काम किया है। इसकी भी काफी सराहना हो रही है। जबकि कई अरबपति जनप्रतिनिधि तो कुछ मोहल्लों में कपड़े का मास्क बंटवाकर मीडिया में इतनी जगह पा चुके हैं कि मानो कोरोना के खिलाफ लड़ाई उन्हीं की अगुवाई में लड़ी जा रही है। ऐसे नेताओं को लखेश्वर बघेल जैसों से सीख लेनी चाहिए।


23-Aug-2020 4:36 PM 5

अभी तो यह अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है...

कवर्धा में होमगार्ड भवन के लिए आरक्षित जमीन पर कांग्रेस भवन के निर्माण-भूमिपूजन के पूर्व सीएम रमन सिंह के आरोपों पर कांग्रेस ने तीखा पलटवार किया है। सरकार के मंत्री मोहम्मद अकबर ने पहले तो रमन सिंह के आरोपों को तथ्यहीन और गुमराह करने वाला बताया। वे यही नहीं रूके, उन्होंने रमन सिंह से ही पूछ लिया कि रमन सिंह अपने मकान से सटी सरकारी जमीन पर किए गए कब्जे पर कुछ क्यों नहीं कहना चाहते। कांग्रेस के लोग बताते हैं कि रमन सिंह-परिवार ने मंडी की कुछ जमीन को घेरा हुआ है। बात अब आगे बढ़ चुकी है। कांग्रेस अब इस पर भाजपा को ही घेरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस के कुछ लोगों ने भाजपा दफ्तर कुशाभाऊ ठाकरे परिसर की जमीन के दस्तावेज निकाले हैं, और इसमें भारी गड़बड़ी का दावा किया जा रहा है। 

बताते हैं कि डुमरतराई स्थित कुशाभाऊ ठाकरे परिसर करीब पांच एकड़ जमीन में फैला हुआ है। इसमें से एक एकड़ जमीन धमतरी के एक दवा कारोबारी की  थी। सुनते हैं कि दवा कारोबारी से जमीन की अदला-बदली की गई। रमन सरकार ने दवा कारोबारी को बदले में एक एकड़ से अधिक सरकारी जमीन आबंटित कर दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई। हाउसिंग बोर्ड की जमीन को भी दफ्तर तक जाने के लिए ले लिया गया। जानकार लोग बताते हैं कि उस समय के हाउसिंग बोर्ड अध्यक्ष इसके लिए तैयार नहीं थे, लेकिन बाद में वे खामोश हो गए। अब जमीन से जुड़े सारे दस्तावेज निकाले गए हैं, और अब रमन सिंह-भाजपा पर तीखा पलटवार की तैयारी है। उत्साही कांग्रेसी कह रहे हैं कि रमन सिंह ने बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया है। वाकई में ऐसा कुछ है, यह देखना है। 

नए नेता और घाघ अफसर...

छत्तीसगढ़ के निगम-मंडलों में बहुत से नेताओं को लीडरशिप मिल गई है, लेकिन जो लोग पहली बार सरकारी कामकाज में आए हैं उनमें से अधिकतर को निगम-मंडल के और विभाग के अधिकारी घुमा रहे हैं। किसी को बताया जा रहा है कि उनके दफ्तर की साज-सज्जा का कोई बजट नहीं है, किसी को बताया जा रहा है कि उनके लिए कोई नई कार नहीं ली जा सकती, कोई अपने पसंद का पीए रखना चाहते हैं, तो उसके खिलाफ नियम गिना दिए जा रहे हैं। यहां पर नेताओं की दबंगई काम आती है, या फिर मुख्यमंत्री तक उनकी सीधी पहुंच से अफसर वाकिफ हों, तो अफसर दबते हैं। आने वाले दिनों में तालमेल ठीक बैठने लगेगा, लेकिन तब तक मनोनीत नेता कुछ खिन्न घूम रहे हैं। 

 


22-Aug-2020 6:35 PM 3

कोरोना से अधिक जांच से डर...

छत्तीसगढ़ में कोरोना तेजी से फैल रहा है, लेकिन कोरोना टेस्ट कराने से विधायक ना-नुकुर कर रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत ने 23 तारीख को विधानसभा में सभी विधायकों का कोरोना टेस्ट कराने की व्यवस्था की थी। मगर अब यह स्थगित कर दिया गया है। वजह यह है कि ज्यादातर विधायक कोरोना टेस्ट कराने से मना कर रहे हैं।

यही नहीं, सभी विधानसभा अधिकारी-कर्मचारियों को भी कोरोना टेस्ट कराने की व्यवस्था की गई थी। मगर 12 अधिकारी-कर्मचारियों ने ही इसमें रूचि दिखाई। आखिरकार कोरोना टेस्ट कराने का फैसला ही टाल दिया गया। खास बात यह है कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, दलेश्वर साहू और शिवरतन शर्मा कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। कौशिक और दलेश्वर तो ठीक हो चुके हैं, लेकिन शिवरतन अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं।

बृजमोहन अग्रवाल के बेटे और स्टॉफ के कुछ लोगों को कोरोना हो गया था, लेकिन बृजमोहन की रिपोर्ट निगेटिव आई है। अजय चंद्राकर का गार्ड भी कोरोना पॉजिटिव पाया गया था। कुल मिलाकर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. महंत चाहते हैं कि जो विधायक कोरोना पीडि़त रहे हैं अथवा जिनके परिवार के लोग संक्रमित हैं। वे सदन की कार्रवाई में हिस्सा न लें। ऐसा अनौपचारिक चर्चा में संदेश भेजा गया है। मगर विधायक कितनी गंभीरता से लेते हैं, यह देखना है।

बेनामी की तेज तलाश

केन्द्र सरकार ने आयकर विभाग के नियमों में फेरबदल करके कुछ दफ्तरों के अधिकार सीमित किए हैं, तो कुछ दफ्तरों के अधिकार बढ़ा भी दिए हैं। अब आयकर का एक अमला लोगों की बेनामी संपत्ति की तलाश में लगा हुआ है क्योंकि प्रधानमंत्री ने अपने पिछले कुछ भाषणों में ऐसी कार्रवाई की बात कही थी। सबसे बड़ी बेनामी संपत्ति जमीन-जायदाद की शक्ल में रहती है, और एक बार यह किसी नाम पर चढ़ जाती है तो वह नाम तो सरकारी रिकॉर्ड से खत्म होता नहीं है। ऐसे में आने वाले दिन दो-नंबरी से लेकर दस-नंबरी लोगों तक के लिए परेशानी के रहने वाले हैं। केन्द्र और राज्य के हर विभाग का किसी भी किस्म का टारगेट इस बरस किसी किनारे नहीं पहुंच रहा है, केन्द्र सरकार के पास राज्यों को जीएसटी का हिस्सा देने के लिए भी पैसे नहीं है, इसलिए हर विभाग जहां से हो सके वहां से टैक्स और जुर्माना वसूली करने वाले हैं। आयकर विभाग बेनामी संपत्ति की खबर मिलने पर, और उसके बेनामी साबित हो जाने पर 15 फीसदी ईनाम भी देता है, और दो-नंबरी लोगों के यहां बरसों से नौकरी कर रहे छोटी-छोटी तनख्वाह और बड़ी-बड़ी जानकारी वाले लोगों को भी यह आकर्षित कर सकता है। एक बार इंकम टैक्स के मददगार हो गए, तो फिर मालिक कितने ही दबंग और रंगदार क्यों न हों, वे खबरिया कर्मचारी का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।


21-Aug-2020 7:47 PM 2

हर विधायक को ओहदा

छत्तीसगढ़ देश का संभवत: पहला राज्य है जहां सत्तारूढ़ दल के हर विधायक को सरकार में पद मिलेगा। विधानसभा के 90 सदस्यों में से 69 सदस्य कांग्रेस के हैं। सीएम-विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और मंत्रियों समेत 54 विधायकों को पद मिल चुका है। 15 विधायक बाकी रह गए हैं। दो-तीन विधायकों को हाऊसिंग बोर्ड में जगह मिलेगी। सरकार ने पांच आयोगों में उपाध्यक्ष का पद बनाया है। यहां भी विधायकों को एडजस्ट किया जा सकता है। इसके अलावा एक-दो निगमों में भी विधायक को चेयरमैन बनाया जा सकता है।

कुल मिलाकर हर किसी को कुछ न कुछ मिलेगा। विधायकों से परे निगम-मंडल में जगह पाने वाले ज्यादातर नेता सिर्फ विजिटिंग कार्ड के भरोसे हैं। क्योंकि कई निगम-मंडलों में ऑफिस स्टाफ का अता-पता नहीं है। ऐसे ही एक नवनियुक्त चेयरमैन पदभार संभालने के लिए दो-तीन दिनों तक अपने संस्था के दफ्तर की तलाश करते रहे। उन्हें बताया गया कि संस्था का कोई अस्तित्व नहीं है। यह सिर्फ कागजों में ही है। मंत्रीजी को इसकी जानकारी हुई, तो उन्होंने उदारतापूर्वक चेयरमैन को बुलवाया और मान रखने के लिए उन्हें अपने घर में ही तामझामपूर्वक पदभार ग्रहण करवाया।

सत्र में विधायक रहेंगे कितने?

भाजपा के विधायक सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना कर रहे थे, कि चार दिन का सत्र सिर्फ खानापूर्ति के लिए बुलाया जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक और बृजमोहन अग्रवाल सहित अन्य विधायक सत्र की अवधि बढ़ाने के लिए दबाव बना रहे थे। मगर अब जब सत्र शुरू हो रहा है, तो कुल 14 भाजपा विधायकों में से कई विधायकों की उपस्थिति ही संदिग्ध हो चली है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक कोरोना से उबर चुके हैं, लेकिन वे क्वॉरंटीन पर हैं। ऐसे में सदन में उपस्थित रहेंगे या नहीं, यह तय नहीं है।

इसी तरह पूर्व सीएम रमन सिंह भी क्वॉरंटीन हैं। उनकी पत्नी के अलावा कुछ नजदीकी रिश्तेदार कोरोना के चपेट में आ गए हैं। ऐसे में उनकी भी मौजूदगी को लेकर संशय कायम है। भाजपा विधायक दल के सचेतक शिवरतन शर्मा कोरोना संक्रमित हैं, और वे रामकृष्ण केयर में भर्ती हैं। तेज तर्रार विधायक बृजमोहन अग्रवाल का बेटा भी कोरोना पॉजिटिव हो गया है। यही नहीं, उनके ऑफिस स्टाफ और सुरक्षाकर्मियों में से कई कोरोना संक्रमित हो गए हैं। बृजमोहन खुद क्वॉरंटीन हैं। ऐसे में वे सदन की कार्रवाई में हिस्सा ले पाएंगे इसकी संभावना कम है। क्योंकि कम से कम सात से लेकर चौदह दिन तक क्वॉरंटीन में रहने का नियम है। भाजपा विधायकों की तुलना में कांग्रेस के लोग चुस्त-दुरूस्त हैं। सिर्फ वन मंत्री मोहम्मद अकबर के ही सदन में उपस्थित होने की संभावना कम है। वजह यह है कि अकबर के परिवार के ज्यादातर लोग कोरोना के चपेट में आ गए हैं और इस वजह से वे क्वॉरंटीन हैं। अब सत्र को चार दिन बाकी हैं। देखना है कि उस समय तक कितने लोग कोरोना से दूर रह पाते हैं।

कोरोना जांच में फर्क...

प्रदेश में कोरोना कहर बरपा रहा है। चिकित्सकों का मानना है कि चूंकि टेस्ट ज्यादा संख्या में हो रहा है। इसलिए पॉजिटिव भी ज्यादा निकल रहे हैं। कई लोग टेस्ट के नतीजे को लेकर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। वैसे तो तीन तरह के टेस्ट हो रहे हैं। जिनमें से आरटीपीसीआर टेस्ट को सबसे ज्यादा प्रमाणिक माना जाता है। मगर अलग-अलग लैब से आरटीपीसीआर टेस्ट के नतीजे भी अलग-अलग आ रहे हैं।

कुछ इसी तरह का मामला पूर्व सीएम के ओएसडी रहे विक्रम सिसोदिया से भी जुड़ा है। रमन सिंह के परिवार के कई सदस्य कोरोना के चपेट में आए, तो विक्रम ने भी अपना कोरोना टेस्ट कराया। उन्होंने पहले एक निजी अस्पताल के लैब से कोरोना जांच करवाई, जहां उनकी आरटीपीसीआर जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद उन्होंने मेकाहारा में फिर से आरटीपीसीआर कराई, वहां उनकी रिपोर्ट निगेटिव आई है। विक्रम सिसोदिया को कोई लक्षण नहीं है। मजबूत कदकाठी के विक्रम, खिलाड़ी रहे हैं। चिकित्सकों की सलाह पर वे होमआइसोलेशन पर हैं।


20-Aug-2020 6:36 PM 1

दिल का दर्द फेसबुक पर?

केन्द्रीय राज्यमंत्री रेणुका सिंह की उस फेसबुक पोस्ट की जमकर चर्चा है, जिसमें उन्होंने लिखा - गलत तरीके अपनाकर सफल होने से बेहतर है, सही तरीके के साथ काम करके असफल होना। पार्टी के कुछ लोग रेणुका सिंह के इस पोस्ट को सरगुजा और सूरजपुर जिलाध्यक्ष की नियुक्ति के बाद चल रही अंदरूनी खींचतान से जोडक़र देख रहे हैं। चर्चा है कि रेणुका सिंह दोनों जिलाध्यक्षों की नियुक्ति से नाखुश हैं। सूरजपुर के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष बाबूलाल अग्रवाल तो रेणुका सिंह के धुर विरोधी माने जाते हैं। रेणुका सिंह, शशिकांत गर्ग को जिलाध्यक्ष बनवाना चाहती थी, लेकिन उनकी नहीं चली। 

सरगुजा जिलाध्यक्ष पद पर भी रेणुका सिंह की पसंद को दरकिनार कर लल्लन प्रताप सिंह की नियुक्ति कर दी गई। जबकि रेणुका सिंह ने भारत सिंह सिसोदिया का नाम बढ़ाया था। दोनों जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में स्थानीय सांसद रेणुका सिंह की पसंद को दरकिनार किए जाने की पार्टी हल्कों में जमकर चर्चा है। दोनों ही जिलाध्यक्ष आरएसएस की पसंद के बताए जाते हैं। बाबूलाल अग्रवाल तो आर्थिक रूप से काफी सक्षम हैं, और उन्होंने जिले में संघ का भवन बनवाने में काफी सहयोग किया था। सूरजपुर, रेणुका सिंह का गृह जिला है और वहां उनके विरोधी माने जाने वाले नेता की नियुक्ति को बड़ा झटका माना जा रहा है।

दूसरी तरफ, न सिर्फ रेणुका सिंह बल्कि सुनील सोनी, संतोष पाण्डेय और विजय बघेल भी अपने संसदीय क्षेत्र में पसंद का जिलाध्यक्ष बनवा पाने में नाकाम रहे हैं। चर्चा है कि सुनील सोनी, बलौदाबाजार जिले में सुरेन्द्र टिकरिया को अध्यक्ष बनवाना चाहते थे। मगर पार्टी ने गौरीशंकर अग्रवाल और शिवरतन शर्मा की पसंद पर डॉ. सनम जांगड़े को जिले की कमान सौंप दी। इसी तरह राजनांदगांव में संतोष पाण्डेय की राय को अनदेखा कर मधुसूदन यादव की जिलाध्यक्ष पद पर नियुक्ति कर दी गई। विजय बघेल के दुर्ग-भिलाई में तो अभी जिलाध्यक्षों की नियुक्ति नहीं हुई है, लेकिन वे अपनी पसंद से एक मंडल अध्यक्ष भी नहीं बनवा पाए हैं।

जितने निकले, उससे दस गुना होंगे...

छत्तीसगढ़ में कोरोना के आंकड़े बढ़ते ही जा रहे हैं। और अब तक पॉजिटिव मिल चुके लोगों से दस गुना अधिक ऐसे लोग होंगे जो कि पॉजिटिव हो चुके होंगे, लेकिन जो अब तक जांच तक नहीं पहुंचे हैं। अधिक खतरनाक हालत अस्पतालों के कर्मचारियों के पॉजिटिव निकलने से खड़़ी हो रही है। एक-एक कर्मचारी के संपर्क वहां दर्जनों दूसरे कर्मचारी आते ही हैं, और लोगों को होमआइसोलेशन पर भेज दिया जा रहा है, लेकिन हर किसी की जांच नहीं हो पा रही है। जांच बढ़ेगी तो पॉजिटिव बढ़ेंगे, और किसी के लिए बिस्तर नहीं रह जाएंगे। आज समझदारी इसमें हैं कि लोग अपने घर-दफ्तर में किसी के पॉजिटिव निकलने की नौबत सोचकर दिमाग में तमाम तैयारियां बिठाकर रखें कि वैसी नौबत आने पर क्या किया जाएगा। आज तो हालत यह है कि लोग खाने-पीने के सामानों की दुकानों पर भीड़ लगाकर छककर खा रहे हैं, न शारीरिक दूरी, और न ही मास्क।

कोरोना के बीच हसरतें

अभी जिन परिवारों में लोग कोरोना पॉजिटिव पाए जा रहे हैं, वे अगर संपन्न परिवार या अधिक संपर्क वाले हैं, तो उसके लोगों का टेलीफोन पर बुरा हाल हो रहा है। चारों तरफ से सेहत पूछने को फोन आ रहे हैं, और लोगों ने नंबर बंद करना शुरू कर दिया है। इस बीमारी के इलाज में अस्पताल और डॉक्टर छोड़ किसी की कोई मदद तो है नहीं, और वैसे में हर किसी से हमदर्दी कोई झेले भी तो कितना झेले। वैसे कई ऐसे दुस्साहसी लोग हैं जो आपसी बातचीत में यह हसरत जाहिर करते हैं कि बिना लक्षणों वाला संक्रमण उन्हें हो जाए, और चले जाए, तो उससे बढिय़ा कोई बात नहीं हो सकती, उसके बाद वे आगे संक्रमण के खतरे से आजाद रहेंगे। यह कुछ उसी किस्म का होगा कि जिस वक्त घर और कारोबार में झाड़ू लगा हुआ हो, उस वक्त इंकम टैक्स का छापा पड़ जाए, कुछ भी हासिल न हो, और अगले तीन बरस किसी छापे का खतरा भी टल जाए।


19-Aug-2020 6:38 PM 2

संसदीय सचिव, तब और अब...

वैसे तो संसदीय सचिव न तो संबंधित विभाग के फाइलों पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, और न ही विधानसभा में सवालों का जवाब दे सकते हैं।  कुछ सरकारी सुविधाओं को छोड़ दें, तो संसदीय सचिव एक तरह से अधिकारविहीन हैं। रमन सरकार में तो पूनम चंद्राकर जैसे कई संसदीय सचिवों की कोशिश रहती थी कि फाइलों पर हस्ताक्षर करने के अधिकार भले ही न हो, कम से कम अवलोकन करने के अधिकार मिल जाए। मगर उनकी हसरत पूरी नहीं हो पाई।

पिछली सरकार में संसदीय सचिवों को तो मंत्री, विभागीय बैठकों में भी नहीं बुलाते थे। आम विधायकों की तरह मंत्रियों से मिलने के लिए उन्हें इंतजार करना पड़ता था। ऐसे ही तुनकमिजाजी संसदीय सचिव  ने मंत्री से मुलाकात में देरी पर अपना गुस्सा उनके पीए पर निकाल दिया था। उन्होंने पीए की सबके सामने पिटाई कर दी थी। इसके बाद संसदीय सचिव ने मंत्री के बंगले में जाना भी छोड़ दिया था। मगर कांग्रेस सरकार में कुछ संसदीय सचिवों की स्थिति एकदम अलग है।

विकास उपाध्याय को ही लें, उनकी सक्रियता से विभागीय मंत्री के बंगले में हलचल मची हुई है। विकास उपाध्याय ने अफसरों की टीम ले जाकर एक्सप्रेस-वे सर्विस रोड खुलवा दिया। चर्चा है कि मंत्री तक को इसकी जानकारी नहीं थी। विकास को संसदीय सचिव बने कुछ ही दिन हुए हैं। पीडब्ल्यूडी और अन्य विभाग के अफसर उनके आगे-पीछे होते देखे जा सकते हैं। विकास की धमक को देखकर यह कहा जा सकता है कि संसदीय सचिवों को कोई लिखित अधिकार भले ही न हो, जुबानी जमा खर्च से काफी कुछ काम कराया जा सकता है।

मिजाजपुर्सी के दिन आये

भाजपा में असंतुष्ट नेताओं को मनाने की कवायद चल रही है। खुद सौदान सिंह इस मुहिम में जुटे हैं। असंतुष्टों की नाराजगी सौदान सिंह  की कार्यप्रणाली को लेकर ज्यादा रही है। वे पिछले दो दिनों में अब तक धमतरी-कांकेर और अन्य जिलों के नेताओं के साथ-साथ पूर्व विधायकों से फोन पर बात कर चुके हैं। सौदान सिंह का अंदाज बदला-बदला सा है। वे पार्टी गतिविधियों पर बिल्कुल भी चर्चा नहीं करते। वे पहले हालचाल पूछते हैं।

 परिवार के लोगों के स्वास्थ्य की जानकारी लेते हैं। फिर कहते हैं कि प्रदेश में कोरोना लगातार बढ़ रहा है। हमारे बड़े नेता भी इसकी चपेट में आ गए हैं। इससे बचने के लिए सामाजिक दूरी बनाकर रखें। सौदान से चर्चा करने वाले एक नेता ने अनुभव सुनाया कि 15 साल सत्ता में रहते किसी भी नेता ने हालचाल जानने की कोशिश नहीं की। अब जब नाराज लोगों का गुस्सा फूट रहा है, तो घर परिवार तक की सुध लेने लग गए हैं। दो दिन पहले सच्चिदानंद उपासने ने कहा था कि कार्यकर्ता पद नहीं, सम्मान के भूखे हैं। लगता है कि सौदान सिंह ने उपासने की बातों को गंभीरता से ले लिया है।


18-Aug-2020 6:48 PM 9

अब तक चीन से बचे पोला के बैल

कुछ देसी त्यौहार अभी तक चीन की पहुंच से बाहर हैं। जैसे बैलों की पूजा का पोला, अब तक हिन्दुस्तान के गांव-गांव में बच्चे इस दिन मिट्टी के बने हुए बैल मिट्टी के ही चक्कों पर रस्सी बांध खींचते हुए चलते हैं। कुछ लोगों के घरों में पीढिय़ों से लकड़ी के ऐसे बैल चले आ रहे हैं जिन्हें पहले चमकीले कागज चिपकाकर सजाया जाता था, और अगले बरस फिर नए कागज लगाए जाते थे।

पिछले कुछ महीने हिन्दुस्तान में सभी मजदूरों और कारीगरों के लिए तकलीफ के रहे, जिनमें कुम्हार भी शामिल थे। कारोबार, दफ्तर, सरकार सभी कुछ बंद रहे, तो पूरी गर्मी बिना घड़ों के निकल गई। सिर्फ घर के लिए लोगों ने घड़े लिए, लेकिन न प्याऊ खुले, और न ही दुकानों के बाहर घड़े रखे गए। छोटे-छोटे चाय ठेले भी जो घड़े रखते थे, उसकी भी संभावना पूरी गर्मी में खत्म हो गई। ऐसे में पोला के मौके पर मिट्टी के कुछ बैल बिके, और काम थोड़ा सा चला। जहां हिन्दुस्तानी त्यौहारों के अधिकतर सामान, और तो और देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी चीन से बनकर आने लगी हैं, वहां पोला अब तक चीन से बचा हुआ है।

डरे-सहमे लोगों के लिए फोन

वैसे तो गोपनीय बातचीत की जरूरत वाले लोग मोबाइल फोन के सिम के बजाय वॉट्सऐप या दूसरे मैसेंजरों पर बात करने लगे हैं, लेकिन जिन्हें और ऊंचे दर्जे की बात करनी रहती है वे महंगे आईफोन पर ही उपलब्ध फेसटाईम पर ही बात करते हैं। प्रदेश में एक-दो कारोबार ऐसे हो गए हैं जिनमें दूसरे किसी फोन पर कोई बात ही नहीं होती। शायद बात करने वाले खुद भी इस पर रिकॉर्ड नहीं कर पाते, और सुना है कि खुफिया एजेंसियां भी आईफोन के इस एप्लीकेशन में घुसपैठ नहीं कर पा रही हैं।

लेकिन लोगों को यह याद रखना चाहिए कि इसी छत्तीसगढ़ में ऐसे स्टिंग ऑपरेशन होते आए हैं जिनमें लोगों ने वॉट्सऐप पर बात करते हुए उसकी स्क्रीन की रिकॉर्डिंग दूसरे फोन से की थी। ऐसा सुबूत अदालत में काम आए न आए, निजी और राजनीतिक जिंदगी में तो उसे हथियार बनाया ही जा सकता है। इसलिए सुरक्षित कुछ भी नहीं है, बुरी बातें अपने मन के भीतर-भीतर मार डालें, उसी में हिफाजत है।


17-Aug-2020 6:18 PM 3

उपेक्षित रोये तो रोये, उपासने भी !

छत्तीसगढ़ भाजपा प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने के उस बयान से पार्टी में हलचल मची हुई है, जिसमें उन्होंने कहा कि पार्टी में परिश्रम से ज्यादा परिक्रमा करने वालों को महत्व मिला, जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। उपासने का बयान ऐसे समय में जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत रायपुर में ही थे। उपासने के बयान के मायने निकाले जा रहे हैं। वैसे तो उपासने को 15 सालों में सब कुछ मिला, जिसकी हसरत आम कार्यकर्ताओं को रहती है। उन्हें मलाईदार ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन का चेयरमैन बनाया गया था।

विधानसभा हारने के बाद भी मेयर चुनाव की टिकट दी गई। हार के बाद भी उन्हें संगठन में अहम दायित्व मिला है। पार्टी के एक नेता याद दिलाते हैं कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद दोबारा विधानसभा की टिकट नहीं मिली, तो उपासने के भाई और कुछ करीबी लोगों ने एकात्म परिसर में जमकर हंगामा खड़ा किया था। वरिष्ठ नेताओं पर  टिकट बेचने का आरोप तक मढ़ दिया था। इतना सब-कुछ होने के बावजूद उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखते हुए पार्टी हमेशा उन पर मेहरबान रही है और वे संगठन में महत्वपूर्ण बने रहे हैं।

अब पार्टी प्रवक्ता जैसे अहम पद पर रहते उपासने की खुले तौर पर बयानबाजी को एक खेमा अनुशासनहीनता करार दे रहा है, तो उनके करीबी लोग मानते हैं कि उपासने जिन्हें कुछ नहीं मिला, उनके लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं। उपासने ने अपने बयान में किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन कुछ लोग अंदाजा लगा रहे हैं कि उनका निशाना सौदान सिंह की तरफ था। 

सुनते हैं कि विष्णुदेव साय के अध्यक्ष बनने के बाद से सौदान के खिलाफ संगठन में हाशिए पर चल रहे बड़े नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है। पार्टी के भीतर सौदान के खिलाफ मुहिम चल रही है। असंतुष्टों की नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि जिलाध्यक्षों के चयन में गुट विशेष के लोगों को ही महत्व दे रहे हैं।

एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि, जो कि लॉकडाउन के कठिन समय में सौदान के लिए रजनीगंधा का बंदोबस्त करते थे, वे भी चुपचाप दिल्ली में सौदान सिंह के खिलाफ अप्रत्यक्ष रूप से बड़े नेताओं के कान फूंककर आ गए। यह भी चर्चा है कि रायपुर और दुर्ग जिलाध्यक्ष पद को लेकर सौदान सिंह की अपनी पसंद है, जिसे पार्टी के दूसरे नेता पसंद नहीं कर रहे हैं। अगर सौदान की पसंद पर मुहर लगती है, तो पार्टी में असंतुष्टों का गुस्सा फूट सकता है। फिलहाल तो लोग नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।

बड़े नेता की बड़ी जिद...!

कांग्रेस में निगम-मंडलों की दूसरी सूची तैयार है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि राजीव गांधी जयंती के मौके पर सूची जारी हो सकती है। चर्चा है कि पार्टी के एक बड़े पदाधिकारी इस बात से खफा हैं कि उनकी राय को तवज्जो नहीं दी गई। सुनते हैं कि पदाधिकारी अपने करीबी को एक मलाईदार निगम का चेयरमैन बनाने के लिए अड़ गए थे। उन्हें मनाने के लिए काफी तर्क ढूंढने पड़े। पुराने उदाहरण भी दिए गए, तब कहीं जाकर थोड़े नरम पड़े। अब पदाधिकारी के करीबी को दूसरा पद दिया जा रहा है।

अफसर कम रह गए हैं इसलिए... !

प्रदेश के कई इलाकों में मूसलाधार बारिश हुई है। इस वजह से जगदलपुर और बिलासपुर में दो एनीकट टूट गए। स्वाभाविक है कि एनीकट टूटने पर जिम्मेदारी तय होती है और उस समय के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होती है। एनीकट के टूटने पर विभाग के अफसरों को आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि दोनों एनीकट की गुणवत्ता खराब थी। दोनों निर्माण कार्यों के एवज में इतना कुछ निचोड़ लिया गया था कि गुणवत्ता अच्छी होने का सवाल ही नहीं था। फिर भी, टूट-फूट पर कार्रवाई तो होनी है। विभाग के एक बड़े अफसर ने विभाग के मुखिया तक खबर भिजवाई कि सीनियर लेवल पर अफसर बेहद कम रह गए हैं, और निलंबन जैसी कार्रवाई से चालू परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। अफसर की सलाह के बाद अब कार्रवाई का दूसरा तरीका ढूंढा जा रहा है। ताकि कामकाज पर असर न पड़े।

 


16-Aug-2020 6:22 PM 5

सोशल मीडिया पर अफसरों की ताकत...

छत्तीसगढ़ के कई आईएएस और आईपीएस सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय हैं। इसमें से कई अफसर ऐसे हैं, जिन्हें फील्ड में या मंत्रालय में बड़ी जिम्मेदारी है। फिर भी उनकी सोशल मीडिया, खासतौर पर ट्वीटर पर सक्रियता देखते ही बनती है। अफसर न केवल अपने विभाग से जुड़ी जानकारियों को साझा करते हैं बल्कि सुविचार, जोक्स और व्यक्तिगत गतिविधियों के बारे में लिखते हैं और तस्वीरें शेयर करते हैं। उनकी पोस्ट पर लाइक्स और शेयर भी जमकर होते हैं। खैर, सोशल मीडिया का प्लेटफार्म चीज ही ऐसी है कि इसका नशा चढ़ जाए तो सिर चढक़र बोलता है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। अफसर हुए तो क्या सोशल मीडिया तो सभी के लिए है।

इस पर यहां पर चर्चा करने का कारण ये भी है कि अफसरों के इस शौक से सत्तारूढ़ नेताओं को तकलीफ हो रही है। उनको लगता है कि अफसरों का काम फाइल निपटाना और प्रशासन के कामकाज में ध्यान देने का है। सोशल मीडिया तो प्रचार-प्रसार का माध्यम है। इस पर तो सर्वाधिकार नेताओं का सुरक्षित है। कुछ माननीय तो इसके लिए गाइड लाइन बनाने के पक्ष में है। हालांकि पिछली सरकार में सोशल मीडिया में सक्रियता के कारण कई अफसरों को नुकसान भी उठाना पड़ा था, लकिन वह सोशल मीडिया की वजह से नहीं, उस पर राजनीतिक या विवादस्पद बातें लिखने की वजह से हुआ था । नई सरकार बनने के बाद अफसर कुछ ज्यादा वक्त सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। कोराना काल भी इसकी बड़ी वजह है। अफसर का मेल-जोल काफी कम हो गया है। लिहाजा वे बचे हुए समय का सोशल मीडिया में उपयोग कर रहे हैं। कुछ लोगों को यह बात भी खटकती है कि अफसर पूरे समय सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं तो काम कब करते हैं। इसका यह मतलब भी निकाला जा रहा है कि ऐसे अफसर काम पर ठीक से ध्यान नहीं दे रहे हैं। अब मामला कुछ भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि अफसरों की सक्रियता ने माननीयों की नींद में खलल डाल दी है।

हकीकत यह है कि बिलासपुर आईजी दीपांशु काबरा अपनी खुद की फिटनेस के बारे में तस्वीरें और वीडियो पोस्ट करके पूरे अमले के सामने रोजाना ही फिटनेस का एक बड़ा चैलेंज पेश करते हैं, जिसकी पुलिस विभाग को बहुत जरूरत है. दूसरी तरफ उन्होंने लॉकडाउन के पूरे दौर में चारों तरफ लोगों की जितनी मदद की, उसकी वाहवाही तो सरकार को ही मिली. एक और अफसर सोनमणि बोरा भी दीपांशु की तरह देश भर के अफसरों से बात करके लौटते मजदूरों की मदद करते रहे. सरकार को सोशल मीडिया और अफसरों की ताकत का आगे भी इस्तेमाल करना चाहिए।

पैसा है तो वैक्सीन लगना शुरू?

कोरोना के इलाज के लिए बाजार में अब तक कोई कारगर दवा नहीं आ पाई है। अलबत्ता देश-विदेश में वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है। वैक्सीन को लेकर लोगों में काफी उत्सुकता है। लोगों को उम्मीद है कि अगले दो-तीन महीनों में कोई न कोई वैक्सीन लॉच हो जाएगी। इससे ही बीमारी से बचाव हो पाएगा। देश की तीन कंपनियों और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा कोरोना वैक्सीन विकसित की जा रही है। भारत में भी सरकारी मंजूरी से इसका चुनिंदा अस्पतालों में मानव परीक्षण चल रहा है। सुनते हैं कि रायपुर के एक बड़े अस्पताल के डॉक्टरों ने अघोषित रूप से वैक्सीन मंगवाकर लगा भी ली है। डॉक्टरों ने किस कंपनी की वैक्सीन लगवाई है, यह साफ नहीं हो पाया है। मगर बताते हैं कि 15 हजार रूपए में अनाधिकृत तौर पर वैक्सीन मिल भी रही है। कोरोना संक्रमण से बचने के लिए कई लोग वैक्सीन के जुगाड़ में लग गए हैं। अब वैक्सीन से फायदा होगा या नहीं, इसका तो अभी परीक्षण ही चल रहा है। लेकिन इससे नुकसान नहीं है यह मानकर लोग लगवाने की कोशिश कर रहे हैं।


13-Aug-2020 5:52 PM 5

छत्तीसगढ़ का भरोसा, और एमपी

वैसे तो प्रदेश में कोरोना का संक्रमण तेजी से फैल रहा है, लेकिन यहां अभी स्थिति नियंत्रण में है। छत्तीसगढ़ में सिर्फ सरकारी अस्पतालों के दम पर कोरोना को बेकाबू होने से रोका जा सका है। अभी कुछ दिनों से निजी अस्पतालों में भी कोरोना के इलाज की सुविधा उपलब्ध हो गई है। छत्तीसगढ़ के पड़ोसी मध्यप्रदेश की स्थिति अलग है। मध्यप्रदेश में  लोग सरकारी अस्पतालों के बजाए निजी अस्पतालों में इलाज कराना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान खुद कोरोना पीडि़त हैं और वे निजी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। जबकि भोपाल में एम्स जैसे उत्कृष्ट संस्थान हैं। रायपुर एम्स के डायरेक्टर डॉ. नितिन एम नागरकर, भोपाल एम्स के भी डायरेक्टर हैं। रायपुर एम्स के कोरोना इलाज को लेकर तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तारीफ हो रही है। छत्तीसगढ़  सरकार के सरकारी अस्पतालों में भी कोरोना अच्छे तरीके से इलाज हो रहा है, और बड़ी संख्या में लोग ठीक होकर लौट रहे हैं।

चूंकि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश से अलग होकर बना है। इसलिए दोनों राज्यों में मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं की तुलना होते रहती है और यहां के पूर्व और वर्तमान अफसर एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। मध्यप्रदेश सरकार के एक बड़े चिकित्सक ने छत्तीसगढ़ के एक रिटायर्ड आईएएस अफसर से कहा कि मध्यप्रदेश के कोरोना पीडि़त बड़े लोगों को सरकारी अस्पतालों पर भरोसा नहीं है। खुद सीएम निजी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था ठीक नहीं हो पा रही है। जबकि छत्तीसगढ़ में सरकारी अस्पतालों के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा है। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद भ्रष्टाचार को लेकर स्वास्थ्य विभाग-अस्पताल भले ही कुख्यात रहा है, लेकिन कोरोना ने कुछ हद तक पुरानी छवि को बदलने में मदद की है।

तबादला तो हुआ, पर जाएँ कैसे?

पिछले दिनों सरकार ने राजनांदगांव एसपी जितेन्द्र शुक्ला और ईओडब्ल्यू एसपी सदानंद कुमार को बदल तो दिया, लेकिन वे नया कार्यभार संभाल नहीं पा रहे हैं। शुक्ल को कवर्धा स्थित 17 वीं और कुमार को नारायणपुर के 4वीं बटालियन का कमाडेंट बनाया गया है। जहां पहले से ही दोनों बटालियन में सीडी टंडन और धर्मेंद्र सवाई बतौर कमाडेंट पदस्थ हैं, और इनका तबादला नहीं हुआ है । शुक्ला और कुमार इस तकनीकी पेंच के चलते चाहकर भी पदभार नहीं ले पा रहे हैं। यानी दोनों जगहों पर कुर्सी एक और अफसर दो वाली स्थिति बन गई है। फिलहाल दोनों अफसर इधर-उधर समय काट रहे हैं। सुनते हैं कि दोनों ने डीजीपी को तबादले को लेकर त्रुटि से अवगत भी कराया है। मगर अब तक त्रुटि को ठीक नहीं किया जा सका है। हल्ला तो यह भी है कि दोनों को कामकाज को लेकर नाराजगी के चलते हटाया गया था। और त्रुटि भी अनजाने में नहीं हुई है। ऐसे में इन त्रुटियों को ठीक करने में समय तो लगता है।

गोबर-गणित

छत्तीसगढ़ सरकार जब से गोबर खरीदना शुरू किया है। इसको लेकर तरह-तरह के गुणा-भाग सुनने को मिल रहे हैं। पिछले दिनों ने सरकार ने गोबर संग्राहकों को भुगतान किया। इसके बाद से तो गोबर का गणित अच्छे-अच्छों को पल्ले नहीं पड़ रहा है। दरअसल, भुगतान के बाद संग्राहकों की कहानी को सफलता की कहानी के लिहाज से सरकारी महकमे ने प्रचारित किया। उसमें गोबर से आमदनी से लेकर खरीद-बिक्री के आंकड़े दिए गए थे। ऐसे ही चंद्रखुरी और महासमुंद के संग्राहकों को जिक्र था चंद्रखुरी की एक महिला के बारे में बताया गया कि केवल 10 दिन का गोबर बेचकर 31 हजार कमा लिए। उसके पास 70 गायें है। सोशल मीडिया के विशेषज्ञों ने गुणा-भाग लगाया तो पता चला कि उसकी एक गाय रोजाना 22-23 किलो गोबर दे रहे है, लेकिन महासमुंद के संग्राहकों के गोबर से कमाई का जबकि जमाया गया तो गणित के रोचक आंकड़े सामने। इस संग्राहक ने 13 दिन में 221 क्विंटल गोबर 44 हजार से ज्यादा की कमाई की। जबकि उसके पास 25 गायें है। ऐसे में एक गाय का रोजाना का गोबर 59 किलो के आसपास का आ रहा है। इस तरह के आंकड़े से आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है। संभव है कि संग्राहकों ने काफी पहले से गोबर इक_ा करना शुरू कर दिया हो, लेकिन सरकारी आंकड़ों ने कुछ समय के लिए लोगों को उलझा जरुर दिया था। सोशल मीडिया में कई दिनों तक गोबर गणित को समझने और समझाने का खेल चलता रहा।


12-Aug-2020 6:20 PM 7

हवा देना जारी है, और...

पूर्व सीएम रमन सिंह को पनामा पेपर्स पर एक बार फिर सफाई देनी पड़ रही है। कांग्रेस के लोग रमन सिंह-परिवार की संपत्ति की जांच के लिए दबाव बना रहे हैं। वैसे तो ये आरोप कोई नए नहीं हैं। रमन सिंह सीएम थे, तब सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील प्रशांत भूषण ने पनामा पेपर्स के हवाले से रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह का विदेश में  खाता होने का आरोप लगाया था। पनामा पेपर्स में अभिषाक सिंह नाम है। खैर, रमन सिंह-अभिषेक इस पर कई बार सफाई भी दे चुके हैं।

रमन सिंह ने तो अपने खिलाफ आरोपों पर एक बार कानूनी कार्रवाई  की चेतावनी भी दी थी। बात पुरानी हो गई। उस समय चर्चा थी कि प्रशांत भूषण, रमन सिंह से इसलिए नाराज थे कि उनके सहयोगी जूनियर अधिवक्ताओं के खिलाफ बस्तर में पुलिस ने कार्रवाई कर दी थी। अब प्रशांत भूषण तो खामोश हैं, लेकिन कांग्रेस के लोग थोड़े-थोड़े दिनों में पुराने आरोपों को हवा देते रहते हैं। इससे पूर्व सीएम और भाजपा के लोगों का हलाकान होना स्वाभाविक है।

इससे ज्यादा रमन सिंह के विरोधी एक भाजपा नेता परेशान हैं। उनकी परेशानी की वजह यह है कि जब भी रमन सिंह पर आरोप लगते हैं, मीडिया वाले बाइट लेने उनके घर पहुंच जाते हैं। पार्टी के भीतर के समीकरण भले ही कुछ हो, लेकिन सार्वजनिक तौर पर बचाव करना ही पड़ता है। मीडियावालों के लिए सहूलियत यह रहती है कि भाजपा नेता का बंगला कांग्रेस भवन से कुछ ही दूरी पर है। ऐसे में प्रतिक्रिया के लिए भाजपा दफ्तर के बजाए नेताजी के घर पहुंचना ज्यादा आसान रहता है।

आवभगत में जुटे रहने वाले

कांग्रेस के निगम-मंडलों की दूसरी सूची में कई नामों का हल्ला है। सुनते हैं कि दूसरी सूची में प्रोटोकाल से जुड़े दूसरी पंक्ति के सभी नेताओं के नाम हैं। इनमें अजय साहू, सन्नी अग्रवाल, शिव सिंह ठाकुर और आरपी सिंह प्रमुख हैं। चर्चा है कि प्रोटोकाल से जुड़े नेताओं को पद देने की सिफारिश प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया ने की थी। और उनकी सिफारिश पर राष्ट्रीय नेताओं की आवभगत में जुटे रहने वाले सभी नेताओं का नाम जोड़ा गया है। अब सूची का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है।

दरबार से जुड़े लोग तैयार नहीं

शदाणी दरबार हॉटस्पाट बन गया है। दरबार और इससे सटी कॉलोनी में डेढ़ सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। शदाणी दरबार के प्रमुख संत युधिष्ठिरलाल और उनके परिवार के आधा दर्जन सदस्य भी कोरोना की चपेट में आ गए थे। सभी अब स्वस्थ हैं। युधिष्ठिरलाल चाहते हैं कि शदाणी दरबार को फिर से खोलने की अनुमति दे दी जाए।  चूंकि यह पूरा इलाका हॉटस्पाट बन चुका है। इसलिए प्रशासन ने यहां बैरिकेड्स लगाकर लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी है।

त्योहार का सीजन है, लिहाजा बैरिकेड्स हटाने के लिए कलेक्टर को आवेदन भेजा गया है। आवेदन लेकर खुद श्रीचंद सुंदरानी गए थे। सुनते हैं कि प्रशासन तो बैरिकेड्स हटाने के लिए तैयार है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग इसके पक्ष में नहीं है। सीएमओ ने कह दिया कि वे दरबार और आसपास के लोगों की पूरी जांच कराएंगे। इसके बाद ही विभाग की तरफ से बैरिकेड्स हटाने की अनुमति दी जा सकती है। मगर दरबार से जुड़े लोग इसके लिए तैयार नहीं हैं। कुछ लोगों को शंका है कि एक साथ जांच होने पर कई और पॉजिटिव निकल  सकते हैं। इससे प्रशासनिक अफसर उलझन में हैं।


11-Aug-2020 6:24 PM 6

अगली लिस्ट तैयार...

छत्तीसगढ़ में निगम-मंडलों की दूसरी सूची फाइनल हो चुकी है और यह जल्द जारी हो सकती है। सुनते हैं कि सूची में नेताओं के अलावा सामाजिक संगठन के एक-दो लोगों के साथ ही एक रिटायर्ड आईएएस का भी नाम है। चर्चा है कि इस अफसर के नाम पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। पहली सूची में नाम भी था, लेकिन टाइपिंग की चूक की वजह से नाम छूट गया। साफ छवि के इस रिटायर्ड अफसर के अनुभवों का सरकार पूरा लाभ उठाना चाहती है। और उन्हें आयोग में अहम दायित्व सौंपा जा सकता है।

कल्लूरी के तमाम लोग स्थापित...

पुलिस महकमे के मौजूदा प्रशासनिक ढांचे में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में पावरफुल रही, बस्तर के तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी की टीम की फील्ड फिर से वापसी हो गई है। बस्तर में कल्लूरी के करीबी अफसर प्रदेश में कांग्रेस सरकार आने के बाद महीनों तक लूपलाईन में रहे। अब पौने दो साल बाद कल्लूरी की टीम फिर से मैदान में दिख रही है। आईजी रहते कल्लूरी ने अपनी पसंद के अफसरों के जरिए नक्सलियों के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया था, जिस पर उंगलियां भी उठी थी। कुछ मुठभेड़ की अभी भी जांच चल रही है। कल्लूरी के वक्त एसपी रहे डी. श्रवण, अभिषेक मीणा, आईके ऐलसेला, कमलोचन कश्यप और बीएल ध्रुव को फिर से पोस्टिंग मिल गई है। श्रवण और मीणा को तो राजनांदगांव और कोरबा जैसे बड़े जिलों की कप्तानी मिली है।

ऐलसेला की भले ही दोनों अफसरों की तुलना में बलौदाबाजार जैसे छोटे जिले तैनाती हुई लेकिन वह औद्योगिक नजरिए से तुलनात्मक रूप से बेहतर है। कमलोचन कश्यप की कल्लूरी की टीम में गिनती जरूर होती है, लेकिन वे उनके बाकी अफसरों की तुलना में ज्यादा विवादित नहीं रहे। कांग्रेस सरकार ने कश्यप को बीजापुर भेजकर उन पर भरोसा जताया है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस सरकार आने के कुछ दिनों बाद एसआरपी कल्लूरी को पहले ईओडब्ल्यू-एसीबी का चीफ बनाया गया था। बाद में उन्हें परिवहन विभाग में भेजा गया। अब वे पीएचक्यू में हैं, लेकिन पहले जैसे पॉवरफुल नहीं रह गए हैं। अलबत्ता, उनकी टीम के लोग अब सेट हो गए हैं।

चौधरी या जूदेव?

खबर है कि भाजपा में युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद के लिए काफी खींचतान चल रही है। भाजयुमो अध्यक्ष के लिए पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी का नाम प्रमुखता से उभरा है। चर्चा है कि पूर्व सीएम रमन सिंह, चौधरी को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में हैं। वैसे भी चौधरी को आईएएस छोडक़र भाजपा में लाने में उनकी भूमिका रही है। मगर रमन विरोधी खेमा दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के छोटे पुत्र प्रबल प्रताप सिंह को युवा मोर्चा की कमान सौंपने के पक्ष में है। प्रबल प्रताप ने अपने पिता के निधन के बाद ऑपरेशन घर वापसी कार्यक्रम को आगे बढ़ाया और पूरे प्रदेश के जूदेव परिवार से जुड़े लोगों के लगातार संपर्क में भी हैं। अब तक तो सभी नियुक्तियों में हाईकमान ने रमन सिंह की पसंद को तवज्जो दी है। देखना है कि युवा मोर्चा अध्यक्ष के लिए हाईकमान किसकी सुनता है।

लोग हॉटस्पॉट बनाकर ही मानेंगे...

रायपुर में कोरोना संक्रमण गंभीर रूप ले रहा है। आम लोगों की लापरवाही की वजह से यह तेजी से फैल रहा है। यहां एक पॉश कॉलोनी में कोरोना के चार पॉजिटिव मिले हैं। एसिम्टोमैटिक होने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती न कर होमआइसोलेशन के लिए कहा गया था। मगर कोरोना पीडि़त रोज सुबह-शाम वॉक पर निकल जा रहे हैं। उन्हें देखते ही कॉलोनी के बाकी लोग दहशत में घर के अंदर घुस जा रहे हैं।  कई बार कोरोना मरीजों को  समझाइश देने की कोशिश भी की गई, लेकिन वे मान नहीं रहे हैं। चारों की वजह से पूरी कॉलोनी में डर का माहौल है।  कुछ लोगों को आशंका है कि कोरोना मरीजों की लापरवाही रोकने के लिए प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए, तो कॉलोनी के हाटस्पॉट बनने में देर नहीं लगेगी।

कुछ कॉलोनियों में तो पॉजिटिव निकले लोग आस-पास के लोगों के बीच प्रवचनकर्ता का दजऱ्ा पा चुके हैं, लोग उनसे सुनते रहते हैं कि कैसा लगा था, क्या-क्या इलाज हुआ..! 

गुठली के दाम सरीखे, बीज के दाम

छत्तीसगढ़ में सरकार ने केन्द्र सरकार की कोशिशों से बहुत आगे बढक़र लोगों से वनोपज खरीदने का काम किया है। पहले तेंदूपत्ता ही सबसे अधिक कमाई जंगल के आदिवासियों को और वहां बसे हुए लोगों को देता था, लेकिन राज्य सरकार ने धीरे-धीरे इमली और दूसरे कई किस्म के लघु वनोपज कहे जाने वाले सामान इस लिस्ट में जोड़े, और देश में सबसे अधिक दाम पर सरकार इन्हें खरीद रही है। इनमें इमली भी शामिल है, इसे सरकार तो खरीदती ही है, लेकिन बस्तर में व्यापारी भी इमली में इतनी दिलचस्पी लेते हैं कि उनमें से एक तो वहां के इमली किंग कहलाते थे।

अब एक वैज्ञानिक खबर यह आई है कि इमली का बीज बहुत फायदेमंद होता है, और यह कैल्शियम और खनिजों से भरपूर होता है, हड्डियों को मजबूत करता है। इमली महिलाओं को अधिक पसंद रहती है, और उसका यह बीज भी महिलाओं की उम्र के साथ कमजोर होने वाली हड्डियों को मजबूती दे सकता है। इसके अलावा इमली के बीज से कमर का दर्द कम होता है, और यह वजन कम करने में भी मदद करता है।

अब सरकार अगर चाहे तो इमली के बीज के इन्हीं दो-तीन गुणों की वैज्ञानिक जानकारी जुटाकर बीज की मार्केटिंग भी कर सकती है, और आम के आम, गुठली के दाम की तरह इमली तो इमली, बीज से भी कमाई जैसी बात हो सकती है।


10-Aug-2020 7:03 PM 7

रमन का विधानसभा सीट पर मुकाम

राजनांदगांव के विधायक और पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह का राजनांदगांव में नया आशियाना तैयार हो गया है। अच्छा मुहुर्त देखकर अगले दो-तीन दिन में पूर्व सीएम शहर के मध्य स्थित बंगले के कार्यालय का उद्घाटन कर लोगों से मेल-मुलाकात का सिलसिला शुरू करेंगे। सुनते है कि डॉ. सिंह ने यह बंगला किराए पर लिया है। इससे पहले सीएम रहते उनका सरकारी निवास था, वह अब डीआईजी निवास बन चुका है। इसके बाद से रमन सिंह सर्वसुविधायुक्त बंगले की तलाश में थे। 

चर्चा है कि पूर्व सीएम को उनके करीबियों ने नांदगांव में एक स्थाई कार्यालय खोले जाने की सलाह दी थी। विधायक होने की वजह से उन पर नांदगांव में ही रहने का दबाव है। पार्टी के कुछ कारोबारी नेताओं ने पूर्व सीएम के लिए उपयुक्त बंगला ढूंढने में मदद की। हालांकि यह पहले जैसा आलीशान तो नहीं है, लेकिन सुविधाओं में कोई कमी नहीं है। इस बंगले के रंगरोगन के बाद इसे शानदार रूप दिया गया है। कोरोना संक्रमण निपटने के बाद पूर्व सीएम ज्यादातर समय यहां रहकर सरकार के खिलाफ व्यूह रचना तैयार करेंगे, साथ ही विधानसभा सीट भी देखेंगे. कई नेता बड़े होने के बाद चुनाव क्षेत्र को थोड़ा सा भूलते हैं, तो अगले चुनाव में वह हाथ से निकल जाता है।

याददाश्त का राज

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में पीयूष गोयल की इस बात की तारीफ होती है कि वे महापुरूषों-राजनेताओं को जन्मदिन की बधाई देना नहीं भूलते हैं। उनका बधाई संदेश  ट्विटर-फेसबुक पर देखा जा सकता है। कुछ लोग आश्चर्य करते हैं कि इतने लोगों का जन्मदिन उन्हें  कैसे याद रहता है। मगर इसमें अचरज वाली कोई बात नहीं है। विज्ञापन का डिजाइन तैयार करने वाले कई लोग इस काम में जुटे हुए हैं और उन्हें इस एवज में थोड़ी सी आमदनी भी हो रही है।

रायपुर में बधाई संदेश का डिजाइन तैयार करने का सालाना 15 हजार रूपए का पूरा पैकेज है। इसमें किसी नेता को अपनी पार्टी के बड़े नेताओं-महापुरूषों का जन्मदिन याद रखने की जरूरत नहीं है। डिजाइनर सुबह-सुबह बधाई संदेश वाला विज्ञापन तैयार कर आपको भेज देगा, जिसे आप फेसबुक- ट्विटर और इंस्टाग्राम व वॉटसएप में शेयर कर सकते हैं। रायपुर के कई भाजपा नेता इस तरह की सेवाएं ले रहे हैं। कुछ बड़े नेताओं ने तो अपना फेसबुक और ट्विटर एकाउंट हैंडल करने के लिए कर्मचारी तक नियुक्त कर रखा है।

आरएसी कन्फर्म करने की कोशिश

छत्तीसगढ़ में निगम-मंडलों में मनोनयन से हर कोई खुश हो, ऐसा नहीं है। कुछ लोग मनोनीत होने के बाद भी नाखुश हैं कि उन्हें उनके योगदान या उनके महत्व के मुताबिक कुर्सी नहीं मिली। ऐसे ही एक व्यक्ति ने अभी से एक दूसरी कुर्सी के लिए मुहिम छेड़ दी है, और उसका कहना है कि अभी मिली कुर्सी रेलवे की आरएसी जैसी है, बर्थ मिलने के पहले तक किसी और के साथ मिल-बांटकर बैठने के लिए मिली एक बर्थ। अब यह तो हाथ आ गई है, इसके बाद अब आरएसी को कन्फर्म करने को लेकर कोशिश जारी है।

नई जरूरत, नई फैशन, नई शब्दावली

समय के साथ-साथ भाषा में कुछ नए शब्द भी आ जाते हैं। अभी जिस बड़े पैमाने पर लोगों की जिंदगी में मास्क आ गया है, और पहले से खासकर महिलाएं जिस तरह स्कार्फ का इस्तेमाल करती थीं, तो अब फैशन की एक जरूरत आ गई कि इनको मिलाकर एक बनाया जाए। और जाहिर है कि जब कोई सामान नया बनता है, तो उसका नाम भी नया पड़ सकता है। मास्क और स्कार्फ मिलाकर कुछ ब्रांड मास्कार्फ बनाकर बाजार में उतार चुके हैं और कुछ दूसरी कंपनियों ने माफर््स नाम रखा है। चेहरा भी ढंक जाए, और गला भी।

हिन्दुस्तान में बहुत से फैशन ब्रांड अब मर्दों के शर्ट के साथ मिलते-जुलते या उसी कपड़े के मास्क देने लगे हैं, महिलाओं के कुर्तों के साथ तो मास्क तुरंत इसलिए भी आ गए कि उनमें सिलाई करते समय कतरनें बचती हैं, और कतरनों का इससे बेहतर और कोई इस्तेमाल नहीं हो सकता कि उनके मैचिंग मास्क बना दिए जाएं, और बिक्री बढ़ाने के लिए- मैचिंग मास्क फ्री, जैसा नारा लगा दिया जाए।

पश्चिम में अभी एक नई फैशन ऐसी चली है कि लोग टाई और मास्क एक ही कपड़े का पहनना शुरू कर रहे हैं ताकि अलग-अलग रंग और डिजाइन की मैचिंग का रोज का सरदर्द न रहे। हो सकता है कि इस जोड़े का नाम मास्क और टाई मिलाकर मास्टाई हो जाए, या टाई और मास्क मिलाकर टास्क हो जाए। आज किसी के पास इतना वक्त तो है नहीं कि सारे शब्दों को अलग-अलग लिखें, इसीलिए तो हिन्दुस्तान में एक नया शब्द मोशा शुरू हुआ है। जिन्हें न मालूम हों, उन्हें बता देना ठीक है कि यह मोदी और शाह को मिलाकर बनाया गया है।


09-Aug-2020 5:42 PM 15

सरकारी स्कूली किताब की गलत जानकारी

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग की पांचवीं कक्षा की हिंदी की किताब में हरिवंश राय बच्चन की एक कविता, हार नहीं होती, बड़ी प्रमुखता से छपी है। अब इसके साथ एक छोटी सी दिक्कत यह है कि यह कविता हरिवंश राय बच्चन की लिखी हुई नहीं है और यह एक दूसरे कवि सोहनलाल द्विवेदी की लिखी हुई है। भारतीय हिन्दी साहित्य की एक प्रमुख वेबसाईट कविताकोष में इस कविता के साथ यह साफ किया गया है कि इसे बहुत से लोग हरिवंश राय बच्चन की लिखी मानते हैं, लेकिन उनके बेटे अमिताभ बच्चन ने ही अपनी फेसबुक पोस्ट में यह साफ किया है कि यह कविता सोहनलाल द्विवेदी की है। द्विवेदीजी 1906 से 1988 तक रहे, और उन्होंने खूब साहित्य सृजन किया है। 

अमिताभ बच्चन ने कोई पांच बरस पहले, 4 दिसंबर 2015 को फेसबुक पर यह लिखा था- एक बात आज स्पष्ट हो गई, ये जो कविता है, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, ये कविता बाबूजी की लिखित नहीं है, इसके रचयिता हैं सोहनलाल द्विवेदी। कृपया इस कविता को बाबूजी, डॉ. हरिवंश राय बच्चन के नाम पर न दें, ये उन्होंने नहीं लिखी है। 

कुछ ऐसा ही अमिताभ बच्चन से अभी-अभी तीन दिन पहले हुआ, उन्होंने प्रसून जोशी की लिखी एक कविता अपने पिता के नाम से पोस्ट कर दी थी, और लोगों ने जब उनकी गलती पर टोका, तो फिर अमिताभ ने तुरंत ही इस पर माफी मांग ली। 

उम्मीद पे दुनिया कायम है... 

निगम-मंडलों की एक और सूची जल्द जारी हो सकती है। चर्चा है कि सभी प्रमुख नेता अपने समर्थकों को एडजस्ट कराने में जुटे रहे। सीएम भूपेश बघेल मंत्रियों से अनौपचारिक चर्चा कर उनसे राय ले चुके हैं। इसके अलावा पीसीसी से भी नाम लिए गए हैं। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया सिर्फ नियुक्तियों पर चर्चा के लिए ही आए थे। सुनते हैं कि उन्होंने अपनी तरफ से कुछ नाम जुड़वाए हैं। दूसरी सूची में टीएस सिंहदेव के कुछ और समर्थक जगह पा सकते हैं। हल्ला है कि दूसरे मंत्रियों की तुलना में उन्हें ज्यादा महत्व मिला है। 

पार्टी के एक और बड़े नेता ने तो अपनी तरफ से दो दर्जन से अधिक नामों की लिस्ट सौंपी है। ये अलग बात है कि ज्यादातर नामों को नजर अंदाज कर दिया गया है। पिछले दो दशक से सक्रिय राजनीति से बाहर रहे अरविंद नेताम भी अपने करीबियों को निगम-मंडल में जगह दिलाने के लिए मेहनत करते नजर आए। उनकी पुनिया से एकांत में मंत्रणा भी हुई है। चर्चा है कि दूसरी सूची में दो दर्जन से अधिक नेताओं के नाम होंगे। नए जिले गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के भी कुछ नेताओं को निगम-मंडलों में जगह मिल सकती है। इस बात के संकेत हैं कि सीएसआईडीसी, ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन, मार्कफेड और दुग्ध महासंघ जैसे मलाईदार संस्थानों में फिलहाल नियुक्तियां नहीं होंगी। इन संस्थानों में मरवाही उपचुनाव के बाद नियुक्तियांं होने की बात कही जा रही है।

कोरोना प्रसन्न भये... 

पीएल पुनिया के इस बार के  दौरे में सामाजिक दूरी की जमकर धज्जियां उड़ी। पुनिया वीआईपी रोड स्थित जिस होटल में ठहरे थे वहां रेलमपेल भीड़ रही। कार्यकर्ता पुनिया से मिलकर अपनी दावेदारी पेश करने की कोशिश करते देखे गए। कोरोना के खतरे के बीच कार्यकर्ताओं की भीड़ देखकर पुनिया का मूड बिगड़ गया। कुछ लोगों को उन्होंने फटकार भी लगाई। 

सांसदों की नाराजगी दिल्ली में निकली... 

विष्णुदेव साय की ताजपोशी के बाद भी भाजपा में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के दो सांसदों ने पिछले दिनों दिल्ली में संगठन की कार्यप्रणाली की हाईकमान से शिकायत की है। खास बात यह है कि दोनों ही सांसद पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से अलग-अलग मिले थे। 

एक का दुख यह था कि विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हारे एक नेता ने अपने जिले में पसंद की कार्यकारिणी पर मुहर लगवा ली। सांसद को पूछा तक नहीं गया। दूसरे सांसद की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि उनके जिले में अभी तक अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की गई है। कुछ बड़े नेता पार्टी छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन कोई चर्चा करने वाला नहीं है। उन्होंने इस पूरे मामले में हाईकमान से हस्तक्षेप का आग्रह किया है।

विधानसभा कोरोना रोकने कमर कस रही... 

कोरोना संक्रमण के बीच विधानसभा के मानसून सत्र की व्यवस्था को लेकर माथापच्ची चल रही है। इस सिलसिले में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत सीएम भूपेश बघेल और संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे के साथ बैठक कर चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक से भी पहले उनकी बात हो चुकी है। 

कौशिक जो कि मात्र चार दिन का सत्र रखने पर गुस्साए हुए थे। वे खुद कोरोना की चपेट में आ गए हैं और उनके सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने की संभावना नहीं है। इससे पहले कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू भी संक्रमित हुए थे। रायपुर में कोरोना के तेजी से फैलाव को देखते हुए सामाजिक दूरी का कठोरता से पालन करने का फैसला लिया गया है।

सुनते हैं कि इस बार दर्शक दीर्घा, अध्यक्षीय दीर्घा और पत्रकार दीर्घा पूरी तरह बंद रहेंगे। बैठक व्यवस्था कुछ इस तरह की जा रही है कि सभी सदस्य एक साथ सदन में मौजूद न रहें, यानी प्रश्नकाल में जिस सदस्य का सवाल हो चुका है, वे सदन की कार्रवाई में हिस्सा नहीं लेंगे।  जिनका ध्यानाकर्षण है, या अन्य विषयों पर चर्चा है वे प्रश्नकाल में अनुपस्थित रहेंगे। कुल मिलाकर सदन में सामाजिक दूरी का पालन हो , यह सुनिश्चित करने के लिए दिशा निर्देश जारी किए जाएंगे।  

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08-Aug-2020 7:40 PM 5

लाइन से तबादले...

तेजतर्रार आईपीएस अफसर जितेंद्र शुक्ला की चार महीने में ही बदली हो गई। उनका पन्द्रह महीने में चौथी बार तबादला हुआ है। सबसे पहले सुकमा में एसपी रहते मंत्री कवासी लखमा से विवाद के बाद हटाए गए थे। इसके बाद पीएचक्यू में पोस्टिंग हुई। फिर जल्द ही उन्हें महासमुंद एसपी बनाया गया। महासमुंद में उनके बेहतर काम को देखकर राजनांदगांव एसपी बनाया गया था। यहां भी अच्छा कर रहे थे कि दो टीआई के तबादले को लेकर सत्ताधीशों की नाराजगी मोल ले ली। चर्चा है कि एक टीआई के लिए तो एचएम के यहां से भी सिफारिश आई थी। पर शुक्ला मान नहीं रहे थे। आखिरकार उन्हें ही बदल दिया था। शुक्ला जी के चक्कर में पांच लोगों को इधर से उधर किया गया।

सैमसंग का ऐसा फोन जो बना ही नहीं...

इंटरनेट पर झूठे विज्ञापनों की भरमार रहती है। और जो वेबसाईटें ऐसी झूठी, धोखेबाज चीजों को दिखाने के लिए तैयार रहती हैं, शायद उन्हें इसका भुगतान भी अच्छा मिलता होगा। आप जिस शहर से इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, उस शहर के एक नौजवान की फोटो महंगी विदेशी कार के साथ दिखाई जाएगी जो कह रहा है कि पैसा कमाना मुश्किल भी नहीं है। न वह नौजवान उस शहर का रहता, न उस नाम का कोई उस शहर में रहता, और न ही पैसा कमाने की वह तरकीब सच रहती। वह पैसे लूटने की एक साजिश रहती है, और देश की बड़ी-बड़ी वेबसाईटें खुशी-खुशी ऐसे विज्ञापन दिखाने को तैयार हो जाती हैं। बड़े-बड़े अखबारों और टीवी चैनलों की वेबसाईटों पर ऐसे झांसे सजे रहते हैं, जिनमें शायद गूगल ही उन पर डालता है।

जिस फेसबुक को अपने एल्गोरिद्म पर इतना गर्व है कि वह फेसबुक की किसी तस्वीर से चेहरे पहचानकर उन पर नाम जोडऩे के लिए उकसाते रहता है, उस फेसबुक पर भी फर्जी इश्तहारों की बाढ़ रहती है। अब आज ही सुबह फेसबुक पर यह इश्तहार दिख रहा था जो सैमसंग की अब तक न बनाई हुई एक डिजाइन का फोन दिखाते हुए कह रहा था कि सैमसंग पर भारी बचत, सैमसंग के इन मॉडलों को देखे बिना कोई फोन न खरीदें। और जब इस अनोखी डिजाइन को देखने के लिए इस पर क्लिक किया गया, तो उस पर एलजी कंपनी के तमाम फोन दिखाए जा रहे थे। उस पर सैमसंग का कोई फोन नहीं था, और जो डिजाइन फोटो में दिख रही थी, उस डिजाइन का भी कोई फोन नहीं था। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि फेसबुक के माहिर कम्प्यूटर ऐसे झांसे और धोखाधड़ी वाले इश्तहार पकड़ न सकते हों। लेकिन एक वक्त लोगों को याद होगा जब हिन्दुस्तान की बड़ी लोकप्रिय पत्रिकाओं में भी तांत्रिक अंगूठियों के इश्तहार छपते थे। फेसबुक पर आज भी झांसे चल रहे हैं, बड़े से बड़े अखबार-चैनल की वेबसाइटों पर खुली धोखाधड़ी के इश्तहार चल रहे हैं।


06-Aug-2020 7:09 PM 3

जंगल के बाहर बहुत कम बचे...

सरकार बदलने के बाद ज्यादातर वन अफसरों को मूल विभाग में भेज दिया गया था। दो-तीन अफसर रह गए हैं, जिनकी पोस्टिंग पिछली सरकार ने की थी और मौजूदा सरकार ने उन्हें यथावत रहने दिया। अलबत्ता, वे पहले से ज्यादा पॉवरफुल हो गए हैं। इनमें सीएसआईडीसी के एमडी अरूण प्रसाद भी हैं, जो कि डीएफओ स्तर के अफसर हैं लेकिन उनके पास सीएसआईडीसी के साथ-साथ मंडी बोर्ड के एमडी का भी अतिरिक्त प्रभार है। डीएफओ स्तर के अफसर को इतना अहम दायित्व पहले कभी नहीं मिला था।

हालांकि वन अफसर आलोक कटियार की भी पोस्टिंग पिछली सरकार में हुई थी। मगर वे एडिशनल पीसीसीएफ स्तर के अफसर हैं।  वे प्रधानमंत्री सडक़ योजना के साथ-साथ क्रेडा के सीईओ की भी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। आलोक  कटियार जब हॉर्टिकल्चर मिशन में थे, तब उसके काम की राष्ट्रीय स्तर पर तारीफ हुई थी. जब वे प्रधानमंत्री सडक़ योजना में थे, वहां बहुत अच्छा काम हुआ था. इस बार भी उन्होंने इस दुबारा पोस्टिंग में सडक़-निर्माण तेज कर दिया है, और केंद्र सरकार में उसकी तारीफ हुई है।

सुनते हैं कि सीनियर लेवल पर अफसरों की कमी को देखते हुए कुछेक वन अफसरों की पदस्थापना का सुझाव दिया गया था, लेकिन सीएम ने साफ तौर पर मना कर दिया। उनका मानना था कि प्रदेश में 43 फीसदी वन क्षेत्र हैं, ऐसे में वन अफसरों की ज्यादा जरूरत वन विभाग को है।

कुंभ में बिछुड़े भाई, सोच एक...

हिन्दुस्तान में सदियों से कई ऐसी बातें चली आ रही हैं जिनके बारे में बुजुर्गों का सम्मान करने वाले लोग उन्हें समझदारी की और तजुर्बे की बात कहते हैं। अब ऐसी बातों का चलन यह कहकर भी बढ़ रहा है कि पुराने लोगों को विज्ञान की बहुत समझ थी, और जब उन्होंने ऐसा कहा था, तो जरूर उसके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक तर्क रहा होगा।

सच तो यह है कि वैज्ञानिक तर्क को एक बार छोड़ दिया जाए, तो अंधविश्वास और उसे बढ़ावा देने वाले कहावत-मुहावरे लोगों को वैसे ही बहाकर ले जाते हैं, जिस तरह बाढ़ की तूफानी नदी लकड़ी के मुर्दा टुकड़े को बहाकर ले जाती है।

अभी सोशल मीडिया पर पाकिस्तान से किसी ने वहां के लोगों के बीच मौजूद अंधविश्वास के बारे में लिखा तो लगा कि अरे पाकिस्तान तो हिन्दुस्तान का ही कुंभ के मेले में बिछुड़ा हुआ भाई है, और दोनों की रगों में खून तो एक ही है। उसने पाकिस्तान के अंधविश्वासों के बारे में लिखा- यहां के लोग यह तो नहीं मानेंगे कि कोरोना एक हकीकत है, लेकिन यह जरूर मानेंगे कि खून मीठा होता है, इसलिए मच्छर ज्यादा काटते हैं, यह मानेंगे कि दरख्त के नीचे बैठने से जिन्न और चुड़ैल चिमट जाते हैं, खाली कैंची चलाने से घर में लड़ाईयां होती हैं, हिचक आ रही हो तो उसका मतलब है कि कोई याद कर रहे होंगे।

अब अभी 70-75 बरस ही हुए हैं अलग हुए, दोनों के अंधविश्वास तो एक ही किस्म के होंगे। हिन्दुस्तान में भी सुबह और रात में पैदल घूमने निकले लोगों को देखें तो यही लगता है कि वे कोरोना को एक कल्पना की बात मानकर चल रहे हैं, और अपने आपको गोदरेज कंपनी की बनाई गई तिजोरी मान रहे हैं कि जिसे कोरोना तोड़ नहीं सकेगा। लेकिन अंधविश्वास के मामले में हिन्दुस्तानी पाकिस्तानियों से कहीं पीछे नहीं हैं। अब और किसी वैज्ञानिक वजह से न सही, कम से कम इसलिए हिन्दुस्तानियों को अंधविश्वास छोड़ देना चाहिए कि इस वजह से लोग पाकिस्तानियों से उनकी तुलना करते हैं।


05-Aug-2020 6:44 PM 10

कौशल्या मंदिर तालाब एक नहीं छह

आज जब अयोध्या में राम मंदिर का भूमिपूजन हुआ है, तब लोगों को छत्तीसगढ़ में भी राम से जुड़ी कई बातें याद आईं। रायपुर के एक फोटोग्राफर नरेन्द्र बंगाले ने शहर से लगे हुए आरंग विधानसभा क्षेत्र के चंदखुरी गांव के कौशल्या मंदिर की यह फोटो भेजी है जो उन्होंने 2013 में शायद किसी हेलीकाप्टर से ली थी। इन सात बरसों में वहां आसपास कुछ निर्माण चाहे हो गए हों, लेकिन मोटेतौर पर कौशल्या मंदिर का यह तालाब आज भी चारों तरफ से खुला हुआ है। तालाब के बीच एक टापू पर मंदिर है, और वहां तक जाने के लिए एक पुल बना हुआ है। लेकिन ध्यान से देखें तो एक दिलचस्प बात यह है कि एक बड़े तालाब के इर्द-गिर्द पांच और तालाब बिल्कुल लगे हुए हैं, और खूब हरियाली है, चारों तरफ पेड़ हैं। इस जगह पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अभी कुछ दिन पहले ही पूजा की है, और इस पूरे मंदिर-तालाब के विकास की एक बड़ी योजना घोषित की है। ऐसी कोई भी योजना इन आधा दर्जन तालाबों की खूबसूरती को बरकरार रखने वाली होनी चाहिए।

एमएमआई दिग्गज सेठों का अखाड़ा...

रायपुर के बड़े अस्पतालों में से एक एमएमआई अस्पताल ट्रस्ट में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। शहर के बड़े धन्ना सेठों के दबदबे वाले इस ट्रस्ट में सरकारी-अदालती आदेश के बाद किसी तरह चुनाव हुए और लूनकरण जैन-महेन्द्र धाड़ीवाल के गुट ने ट्रस्ट पर कब्जा कर लिया। हालांकि चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ सुरेश गोयल का धड़ा हाईकोर्ट गया है।

एमएमआई अस्पताल की स्थापना और ऊंचाईयों तक पहुंचाने के योगदान को लेकर दोनों धड़ों के अपने-अपने दावे हैं। यह भी प्रचारित हो रहा है कि ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों ने शहर में बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने अपना काफी कुछ न्यौछावर किया था। इस अस्पताल का नाम एमएमआई रखने के पीछे जाहिर तौर पर वजह थी इसके प्रमुख संस्थापक महेंद्र धाडीवाल की कपडा-फर्म  का नाम एम एम धाडीवाल होना. कपड़ा बाजार में इस फर्म  को एमएम नाम से ही बुलाया जाता था।

 ट्रस्ट के 11 संस्थापक सदस्यों ने अस्पताल की स्थापना वर्ष-1991-92 में कुल पौने दो लाख रूपए की पूंजी लगाई।  बाद में अस्पताल के निर्माण के लिए 6 करोड़ रूपए ऋण लिए गए। यही नहीं, शहर के अनेक दानदाताओं ने उदारतापूर्वक सहयोग किया। तब कहीं जाकर अस्पताल अस्तित्व में आया।

शुरूआत में तो सबकुछ ठीक ठाक चलते रहा और फिर धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति चरमराने लगी। लोन नहीं अदा किया जा सका और फिर एनपीए हो गया। बाद में वन टाइम सेटलमेंट के बाद तीन करोड़ रूपए भुगतान कर अस्पताल को कर्ज मुक्त कराया गया। कुछ लोगों का दावा है कि अस्पताल का ऋण चुकाने में सुरेश गोयल की अहम भूमिका रही है। मगर महेन्द्र धाड़ीवाल से जुड़े लोग इसको नकारते हैं। गोयल वर्ष-2007 से अध्यक्ष रहे। अस्पताल चलाना काफी खर्चीला हो रहा था, तब पूरा नियंत्रण बैंग्लोर के एक बड़े अस्पताल ग्रुप को दे दिया गया। तब से अब तक यह ग्रुप अस्पताल संचालन कर रहा है। ट्रस्ट का हस्तक्षेप सिर्फ इतना ही रहता है कि कुछ रोगियों को इलाज में छूट दिला सकता है। साथ ही ट्रस्ट के संचालन के लिए मुनाफे में से कुल ढाई फीसदी की राशि मिलती है।

अस्पताल का संचालन बैंग्लोर के ग्रुप को देने के बाद ट्रस्ट में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई और सुरेश गोयल विरोधी खेमा उन्हें हटाने की कोशिश में जुट गया । पहले 11 सदस्यों के अलावा कई नए सदस्य बनाए गए थे। सुरेश गोयल का खेमा चाहता था कि नए सदस्यों को भी मतदान का अधिकार दिया जाए। मगर विरोधी खेमा इसके पक्ष में नहीं था। बाद में रजिस्ट्रार फर्म एण्ड सोसायटी के नियमों के अनुसार हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रमुख सचिव मनोज पिंगुआ ने सुनवाई की और संस्थापक सदस्यों को ही वोट के अधिकार दिए गए। अब संस्थापक सदस्यों में से ज्यादातर महेन्द्र धाड़ीवाल के साथ थे, लिहाजा उनके खेमे की जीत हो गई। अब सुरेश गोयल के खेमे ने चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ हाईकोर्ट याचिका दायर की है। कोर्ट का आदेश चाहे कुछ भी हो, लेकिन धन्ना सेठों के आपसी झगड़े से अस्पताल की प्रतिष्ठा पर आंच आई है, धन्ना सेठों की साख पर आंच आयी या नहीं पता नहीं।