राजपथ - जनपथ

Date : 12-Sep-2019

राशन के लिए महिला ही मुखिया
एपीएल कार्ड में भी मुखिया परिवार की महिला सदस्य रहेंगी। रमन सरकार के दूसरे कार्यकाल में महिलाओं के नाम पर राशन कार्ड बनाने का फैसला लिया गया था। इसका फायदा भी चुनाव में भाजपा को मिला और वह सरकार बनाने में कामयाब रही, मगर महिलाओं के नाम पर राशन कार्ड बनाने के फैसले से कई जनप्रतिनिधि असहमत भी रहे हैं। पाली तानाखार से विधायक रहे रामदयाल उइके ने तो विधानसभा में खुलकर इसका विरोध किया था। 
उइके का तर्क था कि कई शादीशुदा महिलाएं अपने प्रेमी के साथ भाग जाती हैं या दूसरी शादी कर लेती है, तो परिवार के बाकी सदस्यों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। चूंकि राशन कार्ड महिला के नाम पर होता है इसलिए राशन भी उन्हें नहीं मिल पाता। उइके की इस दलील का विधानसभा में महिला सदस्यों ने प्रतिवाद भी किया और कहा कि उन्हें महिलाएं ही चुनाव में निपटाएंगी। हुआ भी ऐसा। रामदयाल उइके विधानसभा चुनाव में बुरी तरह निपट गए। 

सोनी सोढ़ी से उम्मीदें
दंतेवाड़ा की आम आदमी पार्टी की नेत्री सोनी सोढ़ी चुनाव नहीं लड़ रही है। उन्हें जोगी कांग्रेस ने भी टिकट का ऑफर दिया था। सोनी सोढ़ी का दंतेवाड़ा के अंदरूनी इलाकों में अच्छा प्रभाव है। उन पर नक्सल समर्थक होने के आरोप भी लगते हैं। ऐसे में उपचुनाव में उनका समर्थन काफी मायने रखता है। 
सुनते हैं कि सीपीआई के नेता उनसे समर्थन की आस में हैं। जबकि  कांग्रेस प्रत्याशी देवती कर्मा, बीजापुर के विधायक विक्रम मंडावी को लेकर कुछ दिन पहले सोनी सोढ़ी से मिलने गई और चुनाव में समर्थन मांगा। सोनी सोढ़ी ने खुलकर समर्थन तो नहीं दिया है, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया से कांग्रेस के स्थानीय नेता खुश हैं। उन्हें उम्मीद है कि सोनी सोढ़ी का कांग्रेस को समर्थन मिलेगा और इससे उन इलाकों में भी पार्टी को अच्छा समर्थन मिलेगा। जहां पिछले चुनाव में पार्टी पिछड़ गई थी।

अफवाह और हकीकत
दस दिन पहले ओडिशा के अखबारों और टीवी चैनलों पर अचानक यह खबर फैली कि ओडिशा छत्तीसगढ़ सीमा पर छत्तीसगढ़ के उदन्ती-सीतानदी अभ्यारण्य में एक शेरनी का शिकार हो गया है। खबर रफ्तार से फैली, और दोनों तरफ के वन विभाग के लोग ऐसी किसी शेरनी को जिंदा या मुर्दा ढूंढने में लग गए। छत्तीसगढ़ का वन विभाग इस तलाश में ओडिशा में भी घुसकर तीन किलोमीटर तक ढूंढ आया, लेकिन कोई हवा नहीं लगी। अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के इस अभ्यारण्य में लगे एक खुफिया कैमरे में यह शेरनी कैद हुई तो इस बात का सुबूत मिला कि वह जिंदा है और उसे कुछ नहीं हुआ है। आज हालत यह हो गई है कि हाथी या भालू कई जगह लोगों को जख्मी कर रहे हैं, या मार रहे हैं। उन्हें लेकर वन विभाग से इतनी दरयाफ्त नहीं हो रही है जितनी कि किसी जंगली जानवर के मरने से होती है। एक-एक चर्चा या अफवाह से भी वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी जंगलों में फंस जा रहे हैं, और अब तो उदन्ती-सीतानदी के जंगलों तक भी नक्सली पहुंच चुके हैं। 

कड़क के मायने ?
अपने प्रशिक्षण के दौर में लोगों के साथ हिंसक बदसलूकी करने के आरोप में एक जगह से हटाए गए नौजवान आईपीएस अफसर उदय किरण को कोरबा में एडिशनल एसपी बनाया गया है। उनके मिजाज और उनके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए कोरबा में उनकी पोस्टिंग के कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं। कोरबा में सरकार कई तरह की कार्रवाई करना चाहती है, कर भी रही है, और ऐसे कड़क अफसर को वहां तैनात किया गया है। (rajpathjanpath@gmail.com)

ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी है तो 10 लाख की गाड़ी एक लाख में बेच दो 

किसान भी तो अपने 20 किलो के प्याज 20 किलो में बेच देते हैं

पत्नी को आपको कूटने का कोई भी बहाना चाहिए
वो इसलिए भी कूट सकती है
तुम्हारे पीने की वजह से विक्रम की लैंडिंग सही नहीं हुई

गर इश्क रहे तो इस शिद्दत से रहे
जुखाम मुझे हो और नाक तेरी बहे

केंद्र सरकार का बड़ा फैसला
1 जीबी रैम वाले मोबाइल वालों को
गरीबी रेखा से 10 फुट नीचे माना जायेगा
पर मुझे क्या मेरा 500 एमबी वाला है

तुम्हारे बिना एक दिन 24 घंटे के बराबर लगता है।

पत्नियाँ चाहती है पति उन पर मरे?
जब मरता है तो बोलती हैं कहीं और जाकर मरो ?
जब कहीं और जाकर मरता है तो बोलती है कहाँ मर गए थे...

इस शहर के लोगों में वफा ढूँढ रहे हो,
तुम जहर की शीशी में दवा ढूँढ रहे हो..!!

गजब है यह दुनिया! सड़कों पर गाडिय़ां ज्यादा नजर आए तो पर्यावरण खतरे में, कंपनियों से गाड़ी ज्यादा ना बिके तो व्यापार खतरे में...


Date : 11-Sep-2019

अब आलोक शुक्ला ही रह गए...

नान घोटाले में फंसे अफसरों-कर्मियों में से प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला को छोड़कर सभी को कोर्ट से राहत मिल गई है। और तो और प्रकरण के मुख्य आरोपी एसएस भट्ट को भी जमानत मिल गई है। डॉ. शुक्ला का अग्रिम जमानत आवेदन हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। सुनते हैं कि करीब तीन महीने पहले उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए आवेदन लगाया था। जस्टिस एमएम श्रीवास्तव की एकल पीठ ने केस डायरी भी बुलाई थी। कोर्ट की ग्रीष्मकालीन छुट्टियों के बाद उनके जमानत आवेदन पर सुनवाई होनी थी, मगर जज ने सुनने से मना कर दिया। 

अब उनके जमानत आवेदन पर अलग-अलग कारणों से सुनवाई में  विलम्ब हो रहा है। उनका दुर्भाग्य यह है कि जमानत नहीं हो पाने के कारण पोस्टिंग नहीं हो पा रही है। भाप्रसे के 86 बैच के अफसर आलोक शुक्ला छत्तीसगढ़ कैडर के पहले अफसर हैं, जिन्हें पीडीएस में उल्लेखनीय कार्य के लिए प्रधानमंत्री अवार्ड मिला था। उनकी योग्यता-काबिलियत असंदिग्ध रही है। उन्होंने चुनाव आयोग में पोस्टिंग के दौरान अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था, लेकिन घोटाले में नाम आते ही उनका कॅरियर तकरीबन चौपट हो गया। सबकुछ ठीक ठाक रहता तो वे कम से कम एसीएस हो चुके होते। अब तो अगले साल उनका रिटायरमेंट है। जबकि उनके बैचमेट सुनील कुजूर सीएस हैं। पिछले बरस उन्होंने अकेलेपन में गुजारे, स्कूल शिक्षा पर कुछ काम किया, और एक डॉक्टर होने के नाते उन्होंने कुछ जगहों पर मुफ्त में इलाज का प्रस्ताव भी रखा था। कुछ वक्त उन्होंने लिखने-पढऩे में भी गुजारा, लेकिन इस एक मामले ने उनकी तमाम सकारात्मक बातों को किनारे कर दिया। 

इंसान का मिजाज ही ऐसा रहता है...
फूलों में सूरजमुखी के बारे में कहा जाता है कि वह सूरज को देखकर अपना रुख बदल लेता है, और इसीलिए उसे सूरजमुखी नाम दिया गया है। लेकिन इंसानों में भी ठीक ऐसी ही बात है। किसी विमान के घंटे दो घंटे लेट होने की खबर मीडिया में प्रमुखता से आ जाती है, लेकिन ट्रेन अगर दस घंटे लेट है, जिस पर दस-बीस गुना अधिक मुसाफिर सवार हैं, तो भी वह खबर नहीं बनती। विमान पर अधिक ताकतवर, अधिक दौलतमंद लोग चढ़ते हैं, इसलिए वह अधिक बड़ी खबर बना देता है। इसी तरह बड़े अफसरों या नेताओं की किसी कॉलोनी में हुई छोटी चोरी भी बड़ी खबर बनती है, और किसी आम कॉलोनी में हुई बड़ी चोरी भी छोटी खबर। इंसान का मिजाज ताकतवर को सलाम करने का रहता है, और मीडिया में जाने के बाद भी इंसानों में ऐसी इंसानियत तो बची ही रहती है। (rajpathjanpath@gmail.com)

एक बात बताओ, इश्क जब हद से गुजर जाता है, तो... जाता कहां है?

भगवान का दिया हुआ सबकुछ है लड़कियों के पास, बस मेरा मोबाइल नंबर नहीं है...

मैं चाहता हूं कि कोई लड़की मेरा मोबाइल नंबर लेके मुझे कॉल करे, और मुझसे धार्मिक बातें करे ताकि मैं सुधर जाऊं...

भला है, बुरा है, जैसा भी है, मेरा ब्वॉयफ्रेंड मेरा देवता है...
पता नहीं ऐसा बोलने वाली मुझे कब मिलेगी

एक साहब के घर रात को चोर आ गये, चोरों को डराने के लिए उन्होंने रिवाल्वर निकाली, चोर देखकर भाग गए..
थोड़ी देर बाद पुलिस आ गई, कहा तुम्हारे पास रिवाल्वर है? उन्होंने दिखाया और कहा साहब ये तो बच्चों का खिलौना है, चोरों को डराया था बस..
पुलिस चली गई....चोर फिर आ गये।

एक बात याद रखना, खाना खाने के पहले हेंडवॉश ना करना लेकिन खाना खाने के बाद हेंडवॉश जरूर करना मोबाइल पर दाग लग सकते हैं


Date : 10-Sep-2019

अगला सीएस, जितने मुंह, उतनी बातें...

प्रदेश में अगले महीने शीर्ष स्तर पर ब्यूरोक्रेसी में बदलाव हो सकता है। मौजूदा सीएस सुनील कुजूर का 31 अक्टूबर को रिटायरमेंट है। वैसे तो चर्चा है कि सरकार ने उन्हें छह माह एक्सटेंशन देने के लिए केन्द्र को चिट्ठी लिखी है। उन्हें एक्सटेंशन मिलेगा या नहीं, यह तय नहीं है। केन्द्र सरकार सीधे तीन माह का एक्सटेंशन दे सकती है। इससे आगे तीन माह के एक्सटेंशन के लिए यूपीएससी की अनुमति जरूरी है।

फेरबदल की चर्चाओं के बीच यह खबर उड़ रही है कि रेवन्यू बोर्ड के चेयरमैन अजय सिंह को फिर सीएस बनाया जा सकता है। लेकिन उनका काम नई सरकार को  पसंद नहीं आया था और उन्हें हटा दिया गया था। अब चर्चा यह है कि सुनील कुजूर को एक्सटेंशन नहीं मिला, तो क्या अजय सिंह को फिर से मुख्य धारा में लाया जा सकता है? अजय सिंह भी छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। उनके एक भाई हाईकोर्ट में जज हैं। अजय सिंह वर्ष-2020 फरवरी में रिटायर होंगे। ऐसे में सीनियर अफसरों की कमी को देखते हुए सरकार उन्हें सीएस बना सकती है। बशर्ते फसल बीमा घोटाला कोई बड़ा मुद्दा न बन जाए, जिसकी जानकारी जारी होने से रोकने के लिए अजय सिंह ने अपनी जान को खतरा बताया था। अब इन नामों से परे एक ही बैच के दो नाम और हैं, चित्तरंजन खेतान, और आरपी मंडल। इन दोनों के आपसी संबंध अच्छे हैं, और बाकी नौकरशाही तो इन दोनों को अलग-अलग रहने पर अगला सीएस बनने की बधाई देते रहती है, इन दोनों ने अनुपम खेर के एक टीवी शो के मुताबिक, कुछ भी हो सकता है, मानते हुए मुस्कुराना और हँसना जारी रखा है। इन दोनों के सामने एक और एसीएस अमिताभ जैन का नाम भी सीएम के सामने रह सकता है।

मददगार बाकी हैं...
निलंबित डीजी मुकेश गुप्ता की अग्रिम जमानत हाईकोर्ट ने भले ही खारिज कर दी है, लेकिन उन्हें हर स्तर पर उन्हें मदद मिल रही है। गुप्ता रमन सरकार में बेहद ताकतवर रहे हैं। उन्होंने कईयों को उपकृत किया है। ऐसे में उनके अपने महकमे से बाहर भी लोग साथ खड़े दिखते हैं। 

पुलिस महकमे का हाल यह रहा कि मिक्की मेहता प्रकरण की जांच में विलंब सिर्फ इसलिए हुआ कि जांच अफसर गिरधारी नायक को मिक्की मेहता की मर्ग रिपोर्ट नहीं मिल पा रही थी। सुनते हैं कि नायक ने पीएचक्यू को कई चिट्ठी लिखी, तब कहीं जाकर महीनेभर बाद उन्हें मर्ग रिपोर्ट मिल पाई। चर्चा तो यह भी है कि नायक ने सीएम को जांच में देरी की वजह भी विस्तार से बताई है। 

मुकेश गुप्ता ने जिन दिनों उनकी एकतरफा चलती थी, बहुत से मातहत लोगों को उपकृत भी किया था, उन्हें मनचाही कुर्सी दिलवाई थी, और मनचाहे अधिकार भी। नतीजा यह है कि सरकार की तिरछी नजर के बावजूद पुलिस महकमे में उनके मददगार बाकी हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


कश्मीर में प्लॉट बाद
में ले लियो...
पहले हेलमेट खरीद लो!
वरना यहाँ का प्लॉट भी बिक जाएगा...

एक तो घोर मंदी, दूसरे तुम्हारे रिचार्ज का बोझ और अब स्कूटी के चालान का पहाड़... नहीं बनना तुम्हारा बाबू।

कल बहुत देर से दो लोग आपस में गाली गलौज कर रहे थे,
फिर मैंने वहां पहुंचकर उन्हें समझाया तब जाकर मारपीट शुरू हुई...

कान खोल कर सुन लो, मेरे पास गाड़ी है पर मैं चालान के डर से नहीं चला रहा हूँ, ऑटो का इस्तेमाल कर रहा हूँ।

लड़कों को चाहिए, जीरो फिगर वाली लड़की पर
लड़के खुद 11 महीने का प्रेग्नेंट पेट लेकर घूम रहे हैं
ऐसा कैसे चलेगा भाइयों

पाकिस्तान ने दावा किया है कि 2022 में पाक अंतरिक्ष में इंसान भेजेगा
मतलब चाँद पर आतंकवादी हमला होने में 3 साल बचे है केवल..!!

इसरो भाई टेंशन नहीं लेने का...
सभी का चांद ऐसे ही नखरे दिखाता है
बाद में मान जाता है

तू चांद है नखरे तो जरूर दिखायेगा ये भारत भी तेरा आशिक है लौटकर वापस जरूर आएगा

लड़की वाले- बेटा कितना कमा लेते हो?
लड़का-जी अपना चालान मैं खुद जमा कर सकता हूँ
लड़की वाले- तो फिर रिश्ता पक्का

गलती हो जाने पर सॉरी बोल देने से इंसान छोटा नहीं हो जाता 
चाहे तो नापकर देख लेना....

चंद्रयान-2 की असफलता पर वो पाकिस्तानी भी मजाक बना रहे हैं जिनकी फटी सलवार को सिलने के लिए सुई-धागा भी चाइना से आता है...
बहुत सोचा पर एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है..?
कश्ती वहाँ डूबी कैसे जहाँ पानी कम था।

समझ नहीं आता मैंने फोन अपने लिए लिया है या चार्जर के लिए...

सड़के - नोकिया 1600 जैसी..
जुर्माने — आईफोन जैसे..


Date : 09-Sep-2019

अंतागढ़ के विवाद का अंत ही नहीं...

अंतागढ़ प्रकरण एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह यह है कि उस समय के कांग्रेस प्रत्याशी मंतूराम पवार ने कोर्ट में बयान देकर हलचल मचा दी है कि उन्होंने दबाव में नाम वापस लिया था। अब उन्होंने न सिर्फ इस प्रकरण में लेन-देन का खुलासा किया, बल्कि तत्कालीन सीएम रमन सिंह और अजीत जोगी को इसके पीछे का मुख्य सूत्रधार भी बता दिया। मंतूराम पवार के पलटी मार देने से रमन सिंह-भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गए हैं। 

मंतूराम पहले नाम वापसी के पीछे किसी तरह दबाव-प्रलोभन से इंकार करते रहे हैं। चर्चा है कि मंतूराम का कोर्ट में धारा-164 के तहत दर्ज बयान काफी हद तक सही है। आगे कोर्ट में उनका बयान टिकेगा या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। वे पहले हाईकोर्ट में नाम वापसी प्रकरण में दबाव-प्रलोभन को झूठा करार देकर जमानत ले चुके हैं। 

सुनते हैं कि प्रकरण की ठीक जांच हुई, तो एक महिला अफसर भी लपेटे में आ सकती हैं। हल्ला यह है कि रमन सचिवालय के लोगों ने नाम वापसी की पटकथा पहले से ही लिख ली थी। महिला अफसर के जरिए नाम वापस करा देर सवेर मंतूराम को अहम पद देने की योजना थी। पर इसी बीच प्रकरण में बेटे-दामाद की भी एंट्री हो गई। लेन-देन भी हो गया। चर्चा तो यह भी है कि  दामाद अमेरिका से सभी लोगों के संपर्क में थे। अब अगर उस समय के फोन-कॉल की जांच हुई, तो बात आगे बढ़ सकती है। लेकिन इसके लिए फिर केन्द्र सरकार की मदद की जरूरत होगी, जो कि बदली परिस्थितियों में आसान नहीं दिख रहा है। ऐसे में इस मामले के ज्यादा किसी नतीजे तक पहुंचने की संभावना पता नहीं कितनी है। 

चेंबर सीढ़ी चढऩे वाले पहले सीएम?
सीएम भूपेश बघेल ने चेम्बर भवन जाकर सबको चौंका दिया। वे पहले सीएम हैं, जिन्होंने प्रदेश के सबसे बड़े व्यापारी संगठन के भवन की सीढ़ी चढ़कर न सिर्फ व्यापारियों की समस्याएं सुनी, बल्कि कई घोषणाएं भी की। वैसे तो भाजपा व्यापारियों के ज्यादा करीब रही है, लेकिन पिछले 15 बरसों में न तो सीएम बल्कि कोई भी मंत्री भी चेम्बर दफ्तर नहीं गए। 

व्यापारियों की नाराजगी भाजपा के मंत्री अमर अग्रवाल को लेकर ज्यादा रही हैं। वे जीएसटी आदि को लेकर सुझावों को अनदेखा कर देते थे। सीएम भूपेश बघेल के पास व्यापारियों ने एक अहम समस्या की ओर उनका ध्यान आकृष्ट कराया और कहा कि अकेले रायपुर नगर निगम की 5 सौ से अधिक दुकानें बनकर खाली पड़ी हैं। यह भी बताया गया कि पूरा पैसा देने के बाद भी 7 फीसदी किराया देना पड़ता है।  सीएम हैरान रह गए। उन्होंने पूछ लिया कि पिछली सरकार में ये सब क्यों ठीक नहीं कराया। जवाब मिला कि पिछली सरकार के समक्ष भी ये बातें रखी गई थी तब सरकार ने कोई रूचि नहीं ली। सीएम ने कहा कि जल्द ही इस मामले में दिखवाएंगे। कुल मिलाकर सीएम ने अपनी साफगोई से व्यापारियों को फिलहाल तो खुश कर दिया है।  

सैकड़ों करोड़ पड़े हैं, काम करवाने वाले नहीं
छत्तीसगढ़ सरकार के कई विभागों का हाल यह है कि केंद्र सरकार से आए हुए सैकड़ों करोड़ पड़े हुए हैं जिनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है क्योंकि उन विभागों में इतने सारे काम करवाने के लिए तकनीकी अफसरों का ढांचा नहीं है। इनमें से एक आदिम जाति कल्याण विभाग है जहां किसी काबिल इंजीनियर की कमी से सैकड़ों करोड़ रुपये पड़े हुए हैं और मंजूर योजनाएं आगे ही नहीं बढ़ पा रही हैं। अभी मुख्यमंत्री ने आदिवासी इलाकों में ओबीसी छात्र-छात्राओं के लिए हॉस्टल बनाने की घोषणा भी कर दी है। घोषणा भी है, बजट भी है, लेकिन बनाने के लिए इंजीनियर नहीं हैं। दूसरे कई राज्यों में एक दूसरे विभाग के इंजीनियरों को लेकर निर्माण कार्य आगे बढ़ाने की परंपरा है, लेकिन छत्तीसगढ़ लीक पर चल रहा है। ऐसे ही नक्सल प्रभावित इलाकों में लोक निर्माण विभाग से कई ऐसी सड़कें बननी हैं जिनके लिए केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय से सैकड़ों करोड़ आकर पड़े हैं, लेकिन काम आगे नहीं बढ़ रहा है, बल्कि शुरू ही नहीं हो रहा है। ऐसी हालत में जब अगली बार केंद्र सरकार से किसी योजना के लिए बजट मांगा जाता है, तो वहां से जवाब मिलता है कि काम निपटाने की राज्य की क्षमता ही नहीं है।

दूसरी तरफ राज्य सरकार की कई ऐसी योजनाएं रहती हैं जिनके लिए बजट की कमी रहती है और उस वजह से वे काम नहीं हो पाते। एक ही इंसान की दो जेबें, एक लबालब, दूसरी खाली। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 07-Sep-2019

सीधे मंत्री का बेकाबू विभाग

ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामले में दो-चार मंत्रियों को छोड़ दें, तो ज्यादातर के निजी स्टाफ गंभीर शिकायतों के घेरे में आए हैं। सबसे ज्यादा विवादित स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह का स्टाफ रहा है। उनके स्टॉफ के खिलाफ तो कई विधायकों ने भी सीएम से शिकायत की है। 

सुनते हैं कि प्रेमसाय ने शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए स्टाफ के कुछ लोगों को बदल दिया है, लेकिन जिनके खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायत है, उसे बदलने का हौसला नहीं दिखा पा रहे हैं। बात राजेश सिंह की हो रही है, जो कि स्कूल शिक्षा मंत्री बंगले में सबसे ज्यादा प्रभावशाली हैं। 

चर्चा तो यह है कि तबादलों में उन्हीं की मर्जी चली है। राजेश सिंह सरगुजा के ही रहने वाले हैं और उन्हें टीएस सिंहदेव का वरदहस्त हासिल है। लोगों को उस वक्त बड़ी हैरानी हुई थी जब कांगे्रस के विधायक पे्रमसाय सिंह और मुख्यमंत्री दोनों पर नाराजगी के साथ चढ़ बैठे थे, और उसके बाद भी सिंहदेव ने मीडिया से बात करते हुए पूरी तरह पे्रमसाय सिंह का पक्ष लिया था, और कांगे्रस के विधायकों को गलत करार दिया था। नाजुक मौके पर इतने बड़े नेता का इतना बड़ा साथ मंत्री को एक तरीके से बचा ले गया।

ऐसे में सीधे-सरल प्रेमसाय सिंह उन्हें चाहकर भी नहीं बदल पा रहे हैं। मगर मंत्री के स्टाफ की मनमानी को सीएम हाउस ने गंभीरता से लिया है और लेन-देन में लिप्त अधिकारियों-कर्मचारियों की सूची तैयार हो रही है। संभव है कि कुछ को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए कहा जा सकता है। पे्रमसाय सिंह को उनके कुछ शुभचिंतकों ने भाजपा के स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप का चुनावी हाल गिनाते हुए सलाह दी है कि वे अपने आसपास के लोगों को बदलें, और विभाग को साफ-सुथरा करें।

अपनों की सुरक्षा चाहते हैं लोग...
छत्तीसगढ़ ने राज्य बनने के पहले से यह देखा हुआ है कि सरकार जब-जब लोगों को हेलमेट पहनाने के काम में लगती है, विपक्ष उसके खिलाफ खड़े हो जाता है, और इसे गैरजरूरी बताते हुए सड़कों पर विरोध करने लगता है। और फिर यह बात महज इस राज्य की नहीं है, अभी 2008 की एक कतरन सोशल मीडिया पर तैर रही है जिसमें महाराष्ट्र में देवेन्द्र फडनवीस हेलमेट अनिवार्य करने के खिलाफ सड़कों पर उग्र आंदोलन करने की चेतावनी दे रहे हैं। अब वह कतरन उनका मुंह चिढ़ा रही है। छत्तीसगढ़ में भाजपा विपक्ष में तो है, लेकिन हेलमेट का विरोध नहीं कर पा रही है क्योंकि नया ट्रैफिक कानून नरेन्द्र मोदी का लागू किया हुआ है, और बाकी देश की तरह छत्तीसगढ़ में भी उस पर अमल करवाने की बात अमित शाह ने की है। इसलिए इस राज्य में भाजपा चुप है, और जिस कांग्रेस सरकार को इस पर अमल करवाना है, वह पीछे हट रही है क्योंकि एक तो राजनीतिक रूप से मोदी सरकार के फैसले का विरोध करना है, दूसरी बात यह कि सत्तारूढ़ पार्टी को डरा दिया गया है कि नए ट्रैफिक नियम से, या सिर्फ हेलमेट अनिवार्य करने से भी आने वाले म्युनिसिपल चुनावों में जनता की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। 

सत्ता के साथ कई दिक्कतें रहती हैं, कई मोर्चों पर वह बददिमागी की हद तक दुस्साहसी हो जाती है, और कई मौकों पर वह बात-बात में भयभीत भी होने लगती है। किसी कड़े कानून को लागू करने के नाम से ही सत्ता को पसीना छूटने लगा है, इस तरह भाजपा को समर्थन या विरोध में से कुछ भी करने की नौबत नहीं आ रही, जो भी हो रहा है वह कांग्रेस और कांग्रेस सरकार के भीतर हो रहा है। पार्टी और सत्ता को डराने वाले लोगों को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि आम घरों में लोग चाहते हैं कि उनके लोग बाहर निकलें तो हेलमेट लगाकर सुरक्षित होकर आएं-जाएं, वे हेलमेट के खिलाफ नहीं रहते हैं। सिर्फ कुछ बददिमाग लोग इसका विरोध करते हैं, सिर्फ राजनीति करने वाले कुछ लोग इसे बढ़ावा देते हैं, और अच्छे-भले नियम-कानून ताक पर धर दिए जाते हैं। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 06-Sep-2019

गाडिय़ों पर आतंकी तख्तियां
राजस्थान सरकार ने अभी तय किया है कि गाडिय़ों पर किसी धर्म के निशान, किसी संगठन या ओहदे का नाम लिखने पर चालान किया जाएगा। अब छत्तीसगढ़ में अगर देखें, तो सत्तारूढ़ पार्टी के आधे से अधिक पदाधिकारियों की गाडिय़ों का चालान हो जाएगा, और पिछले सत्तारूढ़ पार्टी के भी एक चौथाई पदाधिकारी तो अब तक पुरानी तख्तियों को ढो ही रहे हैं। फिर सरकारी विभागों में एक बार जिसने टैक्सी चला ली, वे लोग अपनी गाडिय़ों पर स्थायी रूप से ऑन गवर्नमेंट ड्यूटी लिखवाकर चल रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा और महान तबका पत्रकारों का है। प्रेस लिखाकर चलने वाले प्रदेश की राजधानी में इतने अधिक हैं कि लगता है कि मीडिया में काम करने वाले पत्रकारों के अलावा कपड़े प्रेस करने वाले, और बदन प्रेस करने वाले भी अपनी गाडिय़ों पर प्रेस लिखाकर चल रहे हैं। अभी तो राज्य सरकारें देश के नए ट्रैफिक जुर्माना-सजा कानून से जूझ रही हैं कि लोगों पर कैसे इतना बोझा डाला जाए, या न डाला जाए तो कब तक न डाला जाए, ऐसे में तख्तियों और संगठन या पदनाम पर चालान का बवाल कौन खड़ा करे। राज्य में विधानसभा सदस्यों, सांसदों, या पंचायत-म्युनिसिपल के पदाधिकारियों की तख्तियां तो नंबर प्लेट की जगह लगी रहती हैं जो रियायत पूरे राज्य में सिर्फ राज्यपाल को हासिल है। इसके बावजूद किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, किसी का चालान नहीं होता, और आम जनता जुर्माना पटाती रहती है। विधानसभा अध्यक्ष को भी चाहिए कि अपने सदस्यों को गाडिय़ों पर नंबर प्लेट की जगह विधायक लिखने से मना करें क्योंकि इससे विधानसभा की गरिमा कम होती है कि कानून बनाने वाले लोग इस तरह धड़ल्ले से कानून तोड़ते हैं। 

जर्नलिस्ट बनने का शौक
पता नहीं जर्नलिस्ट के काम में ऐसा क्या आकर्षक है कि तमाम किस्म के लोग पत्रकार होने का कार्ड रखना चाहते हैं, कहीं-कहीं से बनवा लेते हैं, और एक्टिविस्ट रहते हुए भी अपने आपको जर्नलिस्ट जाहिर करते रहते हैं। नतीजा यह होता है कि एक्टिविज्म का नफा होता है, और जर्नलिज्म का नुकसान। दरअसल जब कभी जर्नलिस्ट किसी और काम में शामिल हो जाते हैं, तो अपने पेशे का सीधा-सीधा नुकसान करते हैं, और जब दूसरे पेशों के लोग जर्नलिस्ट की खाल भी ओढ़ लेते हैं, तो भी नुकसान जर्नलिज्म का ही होता है। इन दिनों गाडिय़ों पर ऐसे स्टिकर दिखना आम हैं जिनमें लोग राजनीतिक दल का झंडा या पदनाम भी लगाए होते हैं, और प्रेस या पत्रकार का लेबल भी।

बारिश और टाटा स्काई
अभी जब जमकर बारिश हो रही है तो टाटा स्काई जैसे डिश एंटीना पर सिग्नल आने तुरंत बंद हो गए हैं। लोगों का तजुर्बा है कि कोई छत पर जाकर इस एंटीना के बगल में इतना फुसफुसा भर दे कि पानी गिर रहा है, तो यह काम करना बंद कर देता है। 

कब मिलेंगे ऐसे सांसद-विधायक?
ब्रिटिश पार्लियामेंट में अभी एक सिक्ख सांसद ने प्रधानमंत्री पर इतना तीखा हमला किया कि पूरा सदन तालियों से गूंजते रहा। उसने प्रधानमंत्री को याद दिलाया कि किस तरह उन्होंने बुर्का पहनी महिलाओं को एटीएम मशीनों जैसा दिखने वाला लिखा था और उससे किस तरह नस्लीय नफरत बढ़ी थी। डेढ़-दो मिनट के इस बयान की दुनिया भर में जमकर तारीफ हो रही है, और सोशल मीडिया पर उस वीडियो को बार-बार पोस्ट किया जा रहा है। इसे देखते हुए एक सज्जन ने कहा कि हिन्दुस्तान की पार्लियामेंट में इतने कम शब्दों में इतना तीखा और इतना जायज, और इतना हौसलेमंद बयान देने वाले जाने कब होंगे। अभी हाल में तृणमूल कांग्रेस से सांसद बनी, और पहले कार्पोरेट सेक्टर में काम कर चुकीं एक महिला ने अंग्रेजी में जब इसी किस्म का धुआंधार हमला बोला था, तब भी लोगों ने लिखा था कि हिन्दी में बोलने वाले ऐसे लोग भी संसद में चाहिए जिनकी बात हिन्दीभाषी लोग समझ सकें, और प्रभावित हो सकें। फिलहाल सांसदों और विधायकों को इस सिक्ख ब्रिटिश सांसद का छोटा सा बयान जरूर सुनना चाहिए कि शब्दों की एक टोकरा बर्बादी के बिना भी अखबारी सुर्खी की तरह छरहरा हमला कैसे किया जा सकता है जिस पर प्रधानमंत्री तक की बोलती बंद हो जाए। 

सजा के बीच मजा
हिन्दुस्तानी लोग तकलीफों के बीच भी मजा लेने से नहीं चूकते। दर्द से कराहते रहते हैं, और लतीफे बनाते रहते हैं। अभी ट्रैफिक चालान के खतरों के बीच जीते हुए लोग बैंकों के विलय पर एक लतीफा लिख रहे हैं- जिस तरह बैंकों का विलय हो गया, उसी तरह एक ही किस्म का डिंडोरा पीटने वाले टीवी समाचार चैनलों का भी विलय हो जाना चाहिए ताकि जनता चैनल बदले बिना एक साथ सभी का मिलाजुला प्रचार बैंक की एक ब्रांच की तरह पा सके। इससे रिमोट की बैटरी भी बचेगी। 

हिन्दुस्तान में इन दिनों सोशल मीडिया पर लोगों के हास्य और व्यंग्य की एक नई ऊंचाई देखने मिल रही है। जो लोग गंदगी फैला रहे हैं वो तो अलग हैं, लेकिन उनसे परे बहुत से लोग हैं जो कि बड़े कल्पनाशील तरीके से पैनी बातें लिख रहे हैं। 
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Date : 05-Sep-2019

घोटाले के तनाव से हार्टअटैक
दवा खरीदी घोटाले में उलझे आईएफएस अफसर वी रामाराव हार्टअटैक आया है और वे एक निजी अस्पताल में भर्ती हैं। उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। वैसे तो रामाराव को हार्ट प्रॉब्लम था, लेकिन बीमारी को अनदेखा किया। बाद में बीमारी बढ़ गई। सुनते हैं कि दवा निगम में एमडी रहते उन्होंने पिछली सरकार के प्रभावशाली लोगों के दबाव-सिफारिश पर सैकड़ों करोड़ की दवा खरीदी की थी, जिसमें अनियमितता की शिकायत सामने आई। 

स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने इन शिकायतों में प्रारंभिक दौर पर अनियमितता की पुष्टि होने पर जांच के लिए प्रकरण ईओडब्ल्यू को सौंप दिया। इन सबके चलते रामाराव टेंशन में चल रहे थे। एमडी पद से हटने के बाद अपने मूल वनविभाग में आने के बाद साथी अफसरों ने उनके तनाव को दूर करने की पूरी कोशिश की। उनके साधन सुविधाओं में कमी न हो, इसका भी ध्यान रख रहे थे। उन्हें पात्रता के मुताबिक वाहन और अन्य सुविधाएं तुरंत मुहैय्या भी कराई। अब जब वे बीमार हैं, तो विभाग के अफसर लगातार चिकित्सकों के संपर्क में हैं और उनका कुशल क्षेम पूछ रहे हैं। वैसे भी आईएफएस अफसर अन्य कैडरों के बाकी अफसरों की तुलना में अपने साथियों के लिए ज्यादा संवेदनशील रहते हैं। 

सीपीआई से कांग्रेस को राहत
आखिरकार दंतेवाड़ा में सीपीआई ने भीमसेन मंडावी को प्रत्याशी घोषित कर दिया। भीमसेन को प्रत्याशी घोषित करने से कांग्रेस ने थोड़ी राहत की सांस ली है। दरअसल, यहां से पूर्व विधायक मनीष कुंजाम भी टिकट के दावेदार थे। वर्ष-2008 के चुनाव में कुंजाम यहां दूसरे स्थान पर रहे और उनकी वजह से दिग्गज नेता महेन्द्र कर्मा तीसरे स्थान पर चले गए थे। कुंजाम को काफी मजबूत माना जाता रहा है। पिछला चुनाव उन्होंने कोंटा सीट से लड़ा था जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन भीमा मंडावी की हत्या के बाद उपचुनाव की स्थिति बनी, तो दंतेवाड़ा में काफी सक्रिय दिख रहे थे। 

सुनते हैं कि सीपीआई की राज्य इकाई मनीष और भीमसेन में से प्रत्याशी तय नहीं कर पा रही थी और दोनों को ही नामांकन भरने के लिए कह दिया था, लेकिन आखिरी क्षणों में मनीष खुद ही पीछे हट गए और भीमसेन के नाम पर राजी हो गए। भीमसेन जिला इकाई के सदस्य हैं। मनीष के चुनाव नहीं लडऩे से कांग्रेस नेता अब फायदे की उम्मीद लगाए बैठे हैं। मनीष को अंदरूनी इलाकों में अच्छा समर्थन मिल सकता था, लेकिन अब उनके चुनाव मैदान में नहीं रहने से सीपीआई उम्मीदवार को उतना समर्थन मिल पाएगा, इसकी उम्मीद कम है।
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Date : 04-Sep-2019

केंद्र के कैंपा में तैनाती
भारतीय वन सेवा के अफसर संजय कुमार ओझा की केंद्र सरकार में पोस्टिंग हो गई है। वे कैम्पा में ज्वाइंट सीईओ बनाए गए हैं। वर्ष-89 बैच के अफसर संजय कुमार ओझा पिछले कुछ समय से प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए प्रयासरत थे, लेकिन राज्य सरकार से अनुमति नहीं मिल पा रही थी। उनकी प्रतिनियुक्ति की फाइल एक टेबल से दूसरे टेबल पर सरकती रही। अब केंद्र सरकार में पोस्टिंग की जानकारी आ गई है। ऐसे में अब उन्हें जल्द ही रिलीव किया जा सकता है। वैसे भी जिस कैम्पा के सीईओ के पद पर उनकी पोस्टिंग हो रही है, उसमें वे राज्य का काफी कुछ भला कर सकते हैं। एक तरह से उन्हें भेजना राज्य के लिए फायदेमंद भी है। अभी चार दिन पहले ही राज्य के वन विभाग ने मुख्यमंत्री को पांच हजार 9 सौ करोड़ का एक चेक सौंपा है जो कि केंद्र से राज्य को मुआवजा-वृक्षारोपण के लिए मिला है। इतनी बड़ी रकम देखते ही सरकार में कई लोग खुश हो गए हैं कि कैंपा योजना के तहत कौन-कौन से काम फिट किए जा सकते हैं।

पुनिया का बेटा फिर मैदान में...

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया के पुत्र तनुज पुनिया उत्तरप्रदेश में विधानसभा उपचुनाव लड़ रहे हैं। वे लोकसभा चुनाव मैदान में भी उतरे थे, लेकिन अपनी जमानत नहीं बचा पाए, यद्यपि तनुज के प्रचार के लिए सीएम भूपेश बघेल सहित कई नेता गए थे। जब राहुल गांधी ही चुनाव हार गए, तो तनुज की हार कोई बड़ी बात नहीं रही। यूपी में कांग्रेस की हालत पतली है। यह जानते हुए भी पुनिया अपने पुत्र तनुज को जैदपुर सीट से उपचुनाव लड़ा रहे हैं। दंतेवाड़ा उपचुनाव के ही दिन, जैदपुर में भी 23 तारीख को वोट डाले जाएंगे। चूंकि दंतेवाड़ा उपचुनाव में प्रचार जोखिम भरा है। ऐसे में रायपुर-बिलासपुर के कांग्रेस नेताओं को जैदपुर में प्रचार के लिए जाना ज्यादा बेहतर लग रहा है। तनुज को साधन-संसाधनों की कमी नहीं होगी। क्योंकि कई लोग यहां बहुत कुछ झोंकने के लिए तैयार भी बैठे हैं। वैसे भी, अभी निगम मंडलों में पद बंटने में समय है। 

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Date : 03-Sep-2019

जगहें भरी हुई हैं...
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर सोनमणि बोरा को अध्ययन अवकाश से लौटने के बाद कोई काम नहीं मिला है। वे पिछले 15 दिनों से अपनी पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार उन्हें कोई काम नहीं देना चाहती। उनके पहले भी सी.के. खेतान से लेकर गौरव द्विवेदी तक जब बाहर से लौटकर छत्तीसगढ़ आए, तो उनके लिए जगह निकालने में सरकार को वक्त लगा क्योंकि बड़े अफसरों के काम में फेरबदल करने से कई लोगों में फेरबदल करना होता है।

सोनमणि बोरा पिछली सरकार में समाज कल्याण और जल संसाधन सचिव रह चुके हैं। सुनते हैं कि बोरा कोई बड़ी जिम्मेदारी चाहते हैं। कई प्रभावशाली लोगों ने भी उन्हें अच्छा अफसर बताया है और निर्माण विभागों के लिए सिफारिश की है। मगर दिक्कत यह है कि सरकार पंचायत और पीडब्ल्यूडी में कोई परिवर्तन नहीं चाहती है। खुद इन विभागों के मंत्री भी किसी तरह के बदलाव के पक्ष में नहीं हैं। अब जल संसाधन विभाग बच जाता है, जहां अविनाश चंपावत के काम से विभागीय मंत्री रविन्द्र चौबे संतुष्ट हैं। ऐसे में यहां भी कोई बदलाव की गुंजाइश नहीं दिख रही है। फिर भी संकेत है कि उन्हें कोई अहम दायित्व सौंपा जा सकता है। 

यादें ताजा करने के मौके
अभी देश के राष्ट्रीय धनवान मुकेश अंबानी के घर पर गणेश विराजे, तो फिल्मी दुनिया के तमाम लोग वहां भीड़ की शक्ल में इक_ा हो गए। मीडिया को एक सुर्खी मिली और उसने वहां पहुंचे दो लोगों की अलग-अलग खींची तस्वीरें अगल-बगल लगाकर लिखा कि अमिताभ और रेखा दोनों पहुंचे। खैर, फिल्मी दुनिया के इतिहास में सबसे अधिक चर्चित पे्रम प्रसंगों में से एक, अमिताभ और रेखा का नाम एक साथ आते ही लोगों की यादों में जाने कितनी ही फिल्में आ जाती हैं, और कितनी ही अफवाहें भी। लेकिन छत्तीसगढ़ में तीज के मौके पर जब बहुत सी महिलाएं मायके लौटती हैं, तो पुराने परिचय जिंदा हो जाते हैं, और लोग एक-दूसरे को देखकर सोचने लगते हैं कि कितना बदल गया है, या कितनी बदल गई है। पुरानी यादें जब जहां ताजा होती हैं, बहुत सा दर्द और शायद कुछ खुशी भी दे जाती हैं। मुंबई में अंबानी के गणेश, और छत्तीसगढ़ में तीजा से ऐसा मौका आते रहता है। 
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Date : 02-Sep-2019

रमन के अफसर काम से लगे...

रमन सचिवालय में संविदा में काम कर रहे अफसर काम-धंधे में लग गए हैं। अमन सिंह पहले ही प्राइवेट कंपनी ज्वाइन कर चुके हैं। बाकी भी एक-एक कर लाइन में लग गए हैं। विक्रम सिसोदिया और ओपी गुप्ता अभी भी पूर्व सीएम के साथ हैं। गुप्ता पूर्व सीएम का पॉलिटिकल मैनेजमेंट देख रहे हैं और बिजनेस भी शुरू करने जा रहे हैं। सुनते हैं कि गुप्ता विधानसभा मार्ग पर एक भव्य विवाह भवन बना रहे हैं। शादी-ब्याह के सीजन में लोगों को उपयुक्त भवन की तलाश रहती है। ऐसे में गुप्ता का बिजनेस भी चल निकलने की उम्मीद है। 

इसी तरह रमन सचिवालय में सचिव के पद पर संविदा पर रहे एमके त्यागी भी वकालत के पेशे में उतर आए हैं। त्यागी ने बिलासपुर हाईकोर्ट  में वकालत भी शुरू कर दी है। भाप्रसे के अफसर त्यागी का काम बहुतों को नहीं सुहाता था, फिर भी वे रमन सिंह के उपयोगी माने जाते थे। उस वक्त यह भी चर्चा रहती थी कि जिस फाइल को नहीं करना हो, उसे त्यागी के पास भेज दो। त्यागी इतने नुक्स निकालेंगे कि उस फाइल को करना मुश्किल हो जाएगा। ऐसा माना जाता था कि त्यागी के ऊपर के कुछ अफसर उनकी इसी क्षमता का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें सीएम हाऊस में बनाए रखते थे, और अपनी नापसंद फाईलों पर अडंग़े लगाने के लिए उन्हें इशारा कर देते थे।

संजीवनी और मुख्यमंत्री सहायता कोष की फाइलें भी रमन सिंह के दस्तखत के बाद भी कई बार अटक जाती थी। सरकार बदलते ही सबसे पहले त्यागी की ही संविदा अवधि खत्म कर उन्हें रवाना किया गया, जबकि उन्हें टीएस सिंहदेव से अपने संबंधों के चलते कार्यकाल पूरा होने का भरोसा था। एमके त्यागी रामानुजगंज में एसडीएम रह चुके हैं, तब से सिंहदेव से उनकी पुरानी जान-पहचान है। रमन के एक और ओएसडी अरूण बिसेन का पूर्व सीएम के यहां आना-जाना लगा रहता है। कंसोल आदि से वे अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे हैं। इस कंपनी को रमन सरकार में करोड़ों का काम मिला था, जिसकी जांच-पड़ताल चल रही है। बिसेन को लेकर यह चर्चा है कि उन्हें आगे कुछ करने की जरूरत भी नहीं है। 

रमन सिंह के मुख्य सचिव रहने के बाद विद्युत मंडल के अध्यक्ष बनाए गए शिवराज सिंह मुख्यमंत्री के औपचारिक सलाहकार के पद पर भी थे। उनका कामकाज किसी जांच की आंच में नहीं आया। वे दिल्ली में बसे हुए हैं और भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय के उनके तजुर्बे को जानने वाले लोग उनका परामर्श लेने उनसे संपर्क करते रहते हैं। फिलहाल वे साल में एक-दो महीने रायपुर में भी रह रहे हैं क्योंकि दिल्ली के कुछ महीने बड़े खराब मौसम के रहते हैं।

जीडीपी छत्तीसगढ़ में बना डीजीपी
अंगे्रजी के कुछ शब्दों का हिन्दी में बड़े धड़ल्ले से बेजा इस्तेमाल होता है। अभी देश की अर्थव्यवस्था को लेकर चारों तरफ सकल घरेलू उत्पाद के लिए ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्शन की चर्चा चल रही है। अर्थव्यवस्था को आंकने के लिए यह एक बड़ा पैमाना है जो दुनिया भर में लंबे समय से इस्तेमाल होता है। बोलचाल में इसे जीडीपी कहते हैं। 

अब छत्तीसगढ़ में डीजीपी रैंक के अफसर इतने अधिक खबरों में हैं कि यहां पर बोलचाल में जीडीपी की जगह डीजीपी कहने लगे हैं, और जानकार इसकी तरफ उनका ध्यान में नहीं दिलाते क्योंकि उन्हें मालूम है कि ऐसे लोगों पर खबरें छाई हुई हैं। 

लेकिन खबरों के असर का यह अकेला मामला नहीं है। इमरजेंसी में जब चारों तरफ बीस सूत्रीय कार्यक्रम सुर्खियों में रहता था, एक-एक दिन के अखबार में दस-दस बार ऐसी हैडिंग लगती थी, तब रेलगाड़ी से कटकर एक नौजवान मर गया। उसकी उम्र के मुताबिक हैडिंग बननी थी, और बनी- बीस सूत्रीय युवक रेलगाड़ी से कटकर मरा।

हिंदी में एक और अंगे्रजी शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है, अंगे्रजी के पब्लिसिटी को आमतौर पर बहुत से लोग पब्लिकसिटी कह बैठते हैं, जो कि एक हिसाब से मतलब को बेहतर तरीके से समझाने वाला शब्द है। पब्लिसिटी का मकसद पब्लिक तब पहुंचना ही होता है। 

कई लोग अंगे्रजी शब्दों के बहुवचन का भी बहुवचन बना देते हैं, और लेडीज की जगह लेडिजों कहने लगते हैं। 
एक वक्त रायपुर शहर के मेयर रह चुके तरूण चटर्जी गुजर चुके हैं, लेकिन उनके दो अंगे्रजी शब्द लोगों को याद हैं। उनके मेयर रहते जो लोग उनका विरोध करते थे, उनके लिए वे प्रोटेस्ट बोलते-बोलते प्रोस्टेट बोल जाते थे। इसी तरह वे शराब दुकानों के बाहर उस वक्त लगने वाले ठंडी बीयर के बोर्ड पर अंगे्रजी में चिल्ड बीयर को चाईल्ड बीयर पढ़ बैठते थे। फिर पता नहीं कि वे गलती से ऐसा करते थे या मजाक में।

अश्लील धार्मिक शोर...
गणेशोत्सव पर हर बरस यह दिक्कत आती है कि प्रतिमाओं को स्थापना के लिए लेकर जाते हुए, और दस दिन बाद उन्हें विसर्जन के लिए ले जाते हुए नौजवानों और लड़कों की अराजक भीड़ जिस तरह से सड़कों पर उपद्रव करती है, और अश्लील गाने बजाती है, वैसा किसी और त्योहार में सामने नहीं आता। अभी रायपुर में कान फोड़ देने वाले स्पीकरों पर गाने बज रहे थे, नायक नहीं खलनायक है तू..., और ...चोली के पीछे क्या है। 

धर्म के नाम पर डंडे-झंडे लेकर खड़े हो जाने वाले लोगों को भी न तो दिल दहलाने वाले ऐसे शोरगुल से कोई दिक्कत है, और न ही ऐसे गानों से जिनके अर्थ अश्लील ही रहते हैं। यह सिलसिला गणेशजी के आने-जाने के अलावा सजावट वाले पंडाल से भी ऐसा ही शोर उंडेला जाएगा। (rajpathjanpath@gmail.com) 


Date : 01-Sep-2019

लोग गाडिय़ों के नंबर प्लेट पर अपने देश के निशान लगा लेते हैं, जिनकी जरूरत देश के बाहर जाने पर ही पड़ती है। देश के भीतर देश के संक्षिप्त नाम या झंडे के रंग किसी काम के नहीं रहते। ऐसे में छत्तीसगढ़ की एक गाड़ी की नंबर प्लेट पर जर्मनी का निशान बना हुआ है। और किसी गैरहिन्दी-गैरअंगे्रजी लिपि में कुछ लिखा हुआ भी दिख रहा है। अब जेम्स बाँड जैसे नंबर वाली गाड़ी पर कई देशों का हक हो सकता है। तस्वीर / छत्तीसगढ़

पांच दिग्गज जगहों पर यहां रहे अफसर
दिल्ली में छत्तीसगढ़ अचानक ही एक महत्वपूर्ण जगह बन गया है। छत्तीसगढ़ से पुलिस-प्रशिक्षण शुरू करने वाले ऋषि कुमार शुक्ला आज सीबीआई के डायरेक्टर हैं। वे रायपुर में एएसपी थे, फिर यहीं कोतवाली में सीएसपी बने, और फिर दुर्ग में एडिशनल एसपी। बाद में वे मध्यप्रदेश काडर में रह गए। मध्यप्रदेश के अलावा ऋषि शुक्ला ने इंटेलिजेंस ब्यूरो में भी दो बार काम किया, एक बार वे सिक्किम में तैनात रहे, जहां पर छत्तीसगढ़ के जस्टिस के.एम. अग्रवाल उस वक्त चीफ जस्टिस थे। बाद में ऋषि शुक्ला भोपाल में भी इंटेलिजेंस ब्यूरो के मध्यप्रदेश प्रभारी रहे। मध्यप्रदेश के डीजीपी रहते हुए कमलनाथ सरकार ने आते ही उन्हें इस कुर्सी से हटाया, तो शायद एक हफ्ते के भीतर ही वे सीबीआई के डायरेक्टर चुन लिए गए। बड़ी ऊंची साख और काबिलीयत वाले ऋषि शुक्ला ने सीबीआई उस वक्त संभाली है जब उसके घर के बर्तनों की टकराहट रोजाना सुप्रीम कोर्ट में गूंज रही थी। 

छत्तीसगढ़ के रायपुर में रह चुके आईपीएस विवेक कुमार जौहरी कल सीमा सुरक्षा बल के डीजी बने हैं। वे भी छत्तीसगढ़ में काम करने के बाद मध्यप्रदेश काडर में रह गए थे। ऋषि शुक्ला 1983 बैच के आईपीएस हैं, और विवेक कुमार जौहरी 1984 बैच के। हिन्दुस्तान के आज के हालात में ये दोनों ही एजेंसियां बहुत महत्वपूर्ण हैं। बीएसएफ के जिम्मे पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों की सरहदें हैं, और एक तरफ हमले चल ही रहे हैं, दूसरी तरफ असम की नागरिकता के विवाद के चलते सरहद पर नया तनाव हो सकता है। 

एक तीसरी बड़ी तैनाती देश की एक सबसे बड़ी सार्वजनिक कंपनी कोल इंडिया के मुखिया की है जिस पर छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश के 1991 बैच के आईएएस अफसर प्रमोद अग्रवाल को चेयरमैन नियुक्त किया गया है। वे भी पहले छत्तीसगढ़ में रह चुके हैं, और 1998 के आसपास महासमुंद में कलेक्टर थे। बाद में वे मध्यप्रदेश काडर में चले गए, और अब कोल इंडिया के चेयरमैन-एमडी बनाए गए हैं। वे छत्तीसगढ़ के मौजूदा एसीएस सी.के. खेतान के एकदम करीबी रिश्तेदार भी हैं। 

इन सबसे पहले छत्तीसगढ़ के एसीएस रहे एन.बैजेन्द्र कुमार देश की सबसे बड़ी खनन कंपनी एनएमडीसी के चेयरमैन-एमडी बनाए गए थे जो कि कुछ महीनों से वहीं काम भी कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि एनएमडीसी के काम का सबसे बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ में है क्योंकि लोहा खदानें सबसे अधिक यहीं पर हैं। कोल इंडिया के काम का एक बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ में है क्योंकि कोयला खदानें यहां पर सबसे अधिक हैं। छत्तीसगढ़ से गए विवेक जौहरी की बीएसएफ के भी कुछ सैनिक छत्तीसगढ़ के नक्सल मोर्चे पर तैनात रहते आए हैं। लेकिन ऋषि शुक्ला की सीबीआई का दाखिला छत्तीसगढ़ सरकार ने नए मामलों के लिए बंद कर दिया है, और पुराने मामलों की ही जांच जारी है। 

लेकिन इन सबसे अधिक चर्चा में इन दिनों कश्मीर है जिसके मुख्य सचिव के पद पर पिछले बरस छत्तीसगढ़ के आईएएस अफसर बी.वी.आर. सुब्रमण्यम को भेजा गया। उन्होंने पहले कभी कश्मीर में काम नहीं किया था, लेकिन वे मनमोहन सिंह के समय से प्रधानमंत्री दफ्तर में लंबा कार्यकाल गुजार चुके थे, और किन्हीं वजहों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हें अच्छी तरह जानते भी थे। इसलिए जब कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया, और राज्यपाल प्रदेश चला रहे थे, तो उस वक्त सुब्रमण्यम को वहां मुख्य सचिव बनाकर भेजा गया था जो कि आज कश्मीर के ऐसे ऐतिहासिक दौर के वक्त भी प्रशासनिक प्रमुख हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 31-Aug-2019

वक्त श्रीचंद पर भारी है...
पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी इन दिनों गोवा में सैर-सपाटे के लिए गए हैं। ये अलग बात है कि उनके नाम से रोजाना भाजपा बयान जारी करती है। वे पार्टी के प्रवक्ता भी हैं। ऐसे में उनके नाम से बयान जारी होना गलत भी नहीं है। सुंदरानी धर्म-कर्म और ज्योतिष पर बहुत विश्वास करते हंै। सुनते हैं कि एक ज्योतिष ने उन्हें साल भर ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाने की सलाह दी है, इससे उन्हें राजनीतिक फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो सकता है। 

हुआ भी कुछ ऐसा कि पिछले दिनों उन्होंने एक्सप्रेस-वे का जबरिया उद्घाटन कर लोगों के लिए खोल दिया। इस तमाशेबाजी में उनके खिलाफ प्रकरण तो दर्ज हुआ ही, इस निर्माण में एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश भी हो गया। वे श्रेय लेने के चक्कर में अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर गए। सरकार एक्सप्रेस वे के निर्माण कार्यों में गड़बड़ी की उच्चस्तरीय जांच करा रही है। यही वजह है कि उन्होंने ज्योतिष की सलाह पर पार्टी के सदस्यता अभियान में ज्यादा रूचि नहीं ली। एक तरह से लाग-बुक भरकर गोवा निकल लिए। 

नेताम की लड़ाई नतीजे पर पहुंची
अजीत जोगी को राजनीतिक तौर पर बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जाति प्रमाण पत्र फर्जी घोषित होने के बाद उनकी विधायकी भी जा सकती है। उनकी जाति को फर्जी बताने में संतकुमार नेताम की अहम भूमिका रही है। पेशे से इंजीनियर संतकुमार नेताम पिछले 18 साल से उनके खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। संतकुमार नेताम पहले भाजपा में थे और नंदकुमार साय के करीबी रहे हैं। कांग्रेस शासनकाल में जोगी की जाति का मामला उठाने पर उन्हें काफी प्रताडऩा भी झेलनी पड़ी। लगातार मिल रही धमकियों की वजह से जोगी शासनकाल के आखिरी के तीन महीने वे नंदकुमार साय के जेल रोड स्थित सरकारी बंगले में रहे। 

प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद उन्हें कोई अहम दायित्व मिलने की उम्मीद थी। वे भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के  सदस्य भी रहे, लेकिन सरकार में कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई। बाद में जोगी के खिलाफ आवाज बुलंद की, तो रमन सरकार के कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा। संतकुमार नेताम ने सार्वजनिक बयान दिया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निजी स्टाफ में रहे ओपी गुप्ता ने उन्हें बुलाकर डांटा और फिर एक लाख का पैकेट देकर मुंह बंद करने के लिए कहा। बाद मेें वे कांग्रेस में शामिल हो गए। अब जब जोगी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया गया है, तो एक बार फिर संतकुमार नेताम सुर्खियों में आ गए हैं।  
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Date : 30-Aug-2019

धार्मिक भावनाओं के चलते...

छत्तीसगढ़ में जगह-जगह हाथियों का इंसानों के साथ टकराव चल रहा है। इंसान जंगल में घुस गए हैं, और इसलिए हाथी गांवों और कस्बों में चले आए हैं। चूंकि दोनों की ताकत का कोई मुकाबला नहीं है, इसलिए इंसान ही मारे जा रहे हैं। ऐसे में एक-दो हाथी इतने अधिक नुकसान पहुंचाने वाले हो गए हैं कि उन्हें बाड़े में कैद करके रखना तय किया गया है। लेकिन यह बात कहना आसान है, करना बड़ा मुश्किल। अब गणेशोत्सव शुरू हो रहा है, और भगवान गणेश को हाथी से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में हाथी को कौन हाथ लगाए? और छत्तीसगढ़ के कोरबा के इलाके में सबसे अधिक जनहानि पहुंचाने वाले हाथी का तो नाम ही गणेश है। इसलिए वन विभाग ने तय किया है कि गणेशोत्सव निपट जाने के बाद ही उसे कैद करने की कोशिश शुरू की जाए ताकि लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत न हों। एक जानकार ने यह भी बताया कि बारिश के समय जब सारे तालाब-डबरे लबालब रहते हैं, तब हाथी को बेहोश करने में एक दिक्कत यह रहती है कि वह अगर बेहोशी में पानी के भीतर चले गया, या भीतर जाकर बेहोश हुआ, तो वह डूबकर ही मर जाएगा। इसलिए सोच-समझकर पूरी सावधानी बरतकर ही गणेशोत्सव के बाद गणेश को छूने की कोशिश की जाएगी। 

छोटी कर्मचारी का बड़ा हौसला
आज राज्य में तबादले का मौसम चल रहा है, और लोग तबादले रद्द करवाने के लिए अपनी अर्जियों में अपनी सेहत से लेकर अपने परिवार की सेहत तक के बहुत से तर्क देते हुए नापसंद जगह पर जाने से बच रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ की एक आईएएस अधिकारी, और स्वास्थ्य विभाग में काम देख रहीं प्रियंका शुक्ला ने ट्विटर पर एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के बारे में लिखा है। उन्होंने बताया कि पुष्पा तिग्गा नाम की यह स्वास्थ्य कार्यकर्ता, एएनएम, कैंसर पीडि़त हैं, फिर भी बस्तर के सुकमा जिले के घोर नक्सल प्रभावित इलाके कुन्ना में लगातार काम कर रही है। वे पिछले 11 बरस से वहां पदस्थ हैं, और जिम्मेदारी से अपना काम कर रही हैं। हालांकि जैसा कि उनके नाम से जाहिर है, वे उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा के जशपुर इलाके की हैं, और सैकड़ों मील दूर दक्षिण छत्तीसगढ़ में बस्तर में काम कर रही हैं, लेकिन वे इसी इलाके में काम करना चाहती हैं क्योंकि यहां के लोग भी उन्हें चाहते हैं। अब कैंसर के साथ शहरी इलाकों से इतनी दूर, घोर नक्सल इलाके में काम करने का हौसला छोटा नहीं होता, और तबादले रद्द करवाने को घूम रहे अफसरों और कर्मचारियों को इस कर्मचारी से कुछ सीखना भी चाहिए। उसके समर्पण को देखने वाली एक बड़ी अफसर ने कहा कि इसकी कहानी मंत्रियों को अपने दफ्तर में लगाकर रखनी चाहिए ताकि वे मामूली बीमारियों की वजह से तबादला रद्द करवाने पहुंचती भीड़ को उसे पढ़वा सकें।

सिंहदेव की बेकाबू रफ्तार
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के समय मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे पहले दावा करने वाले टी.एस. सिंहदेव बहुत रफ्तार से काम कर रहे हैं। अस्पतालों का मामला हो, या अफसरों को हटाने का मामला हो, उनके खिलाफ जांच का मामला हो, नियम-कायदों को जब तक उनके मातहत पढ़कर उन्हें बता सकें, तब तक वे अपनी जिम्मेदारी पर कार्रवाई शुरू करवा देते हैं, और अफसरों के बीच इसे लेकर अब कुछ दुविधा भी हो रही है कि शुरू की गई कार्रवाई किनारे कैसे पहुंचाई जाएगी। 
इसी तरह अभी-अभी पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को लेकर उन्होंने बहुत रफ्तार से एक बयान दे दिया कि जोगी के पिता सतनामी थे, और वे अपने को आदिवासी कैसे कह सकते थे? जवाब में जोगी ने सार्वजनिक चेतावनी भेजी कि उनके पिता सतनामी नहीं थे, और वे मानहानि का आपराधिक मुकदमा दायर करेंगे। इस पर आनन-फानन सिंहदेव को दुख जाहिर करना पड़ा, लेकिन उन्होंने तकनीकी रूप से न तो क्षमायाचना की, और न ही खेद व्यक्त किया है। ऐसी किसी भी चि_ी में किंतु-परंतु के साथ लिखी गई बातों का कोई मतलब होता नहीं है, इसलिए सिंहदेव यह कह रहे हैं कि उन्होंने माफी नहीं मांगी और जोगी भी अड़े हुए हैं कि साफ-साफ नहीं मांगी तो अदालत जाना तय है। 

सरकार और सत्ता के जानकार लोगों का कहना है कि सिंहदेव कुछ अधिक रफ्तार से काम कर रहे हैं जिसकी अच्छी और बुरी दोनों किस्म की बातों को निभाना मुश्किल पड़ता है। 

भाजपा सांसदों की निराशा...
प्रदेश के ज्यादातर भाजपा सांसद राज्य सरकार से निराश हैं। वजह यह है कि छोटे-छोटे काम में प्रशासनिक अड़चनें आ रही है, जिसे दूर करने के लिए सांसदों की तरफ से सीएम को गुहार लगाई गई है।

राजनांदगांव सांसद संतोष पाण्डेय तो प्रशासन के राजनीतिकरण और भाजपा के जनप्रतिनिधियों के पक्षपातपूर्ण व्यवहार का आरोप खुले तौर पर लगा चुके हैं। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि किसी भी दल का हो वो सबका होता है। यहां पक्षपात किया जा रहा है। प्रोटोकॉल में सांसद आगे होता है, लेकिन योग दिवस के कार्यक्रम में विधायक का नाम कार्ड में सबसे आगे छपा था। जांजगीर के सांसद गुहाराम अजगले को छोड़कर बाकी पहली बार सांसद बने हैं। और वे अपने-अपने क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा विकास योजनाएं शुरू कराने की दिशा में प्रयासरत दिखते हैं। 

ये लोग दिल्ली प्रवास के दौरान केन्द्रीय मंत्रियों से मेल-मुलाकात भी करते हैं। ताकि छत्तीसगढ़ को ज्यादा से ज्यादा फायदा पहुंच सके। खुद सांसद सुनील सोनी सार्वजनिक मंच पर सीएम के सामने यह कह चुके हैं कि केन्द्र की सभी योजनाएं छत्तीसगढ़ में आए, इसके लिए उनका पूरा प्रयास रहेगा। उन्हें राज्य सरकार के मंत्रियों-अफसरों के साथ केन्द्रीय मंत्रियों से मिलने में भी कोई संकोच नहीं है। यानी भाजपा सांसद विकास योजनाओं के लिए दलीय राजनीति से उपर उठकर काम करने पर जोर दे रहे हैं। मोहन मंडावी जैसे भाजपा सांसद तो सरकार की कुछ योजनाओं से इतने खुश हैं कि उन्होंने सीएम की सार्वजनिक मंच से तारीफ भी कर दी। परन्तु छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर प्रशासनिक अडग़ेबाजी या उदासीनता से ज्यादातर निराश भी हैं। 
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Date : 29-Aug-2019

अब बस करिए श्रीमंत

सांसद सुनील सोनी लोकसभा में भले ही आखिरी बैंच पर बैठते हैं, लेकिन काम कराने के मामले में कई पुराने सांसदों से वजनदार प्रतीत हो रहे हैं। सांसदों का अपने संसदीय क्षेत्र के सेंट्रल स्कूलों में कोटा तय है। हर सांसद अपने कोटे से 10 विद्यार्थियों को सेंट्रल स्कूल में प्रवेश दिला सकते हैं। चूंकि सेंट्रल स्कूल में पढ़ाई अच्छी होती है और फीस भी बेहद कम है। ऐसे में यहां दाखिले के लिए भारी मारामारी रहती है। इस बार भी सांसद कोटे से दाखिले के लिए बड़ी संख्या में आवेदन आए थे। 

सुनील सोनी ने गरीब विद्यार्थियों को प्रवेश दिलाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया और केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल से विशेष अनुमति लेकर 28 विद्यार्थियों को सेंट्रल स्कूल में दाखिला दिलाया। इससे पहले किसी भी सांसद ने इतनी संख्या में विद्यार्थियों को प्रवेश नहीं दिलाया था। सुनते हैं कि रमेश पोखरियाल भी पहली बार केन्द्रीय मंत्री बने हैं। उन्होंने सुनील सोनी के आवेदनों को मंजूरी देने में कंजूसी नहीं की, लेकिन जब पता चला कि सुनील सोनी पात्रता से दोगुने से अधिक विद्यार्थियों को प्रवेश दिला चुके हैं, तो वे खुद भी चकित रह गए। इसके बाद कुुछ और सिफारिश लेकर गए, तो पोखरियाल ने हाथ जोड़कर सुनील सोनी से कहा-श्रीमंत, बस अब हो चुका...

सक्रियता में कमी
भाजपा में सक्रिय सदस्य बनाने के लिए अभियान चल रहा है। प्रदेशभर में कुल 72 हजार सक्रिय सदस्य थे, जिनमें 20 फीसदी की बढ़ाने का लक्ष्य है। यह अभियान खत्म होने में दो दिन बाकी रह गए हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि सक्रिय सदस्य बढ़ाने में काफी मुश्किल आ रही है। पार्टी के रणनीतिकार इस बात से ज्यादा चिंतित हैं कि अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग से सक्रिय सदस्य नहीं बन रहे हैं। यानी इस वर्ग के कार्यकर्ता सक्रिय सदस्य बनने में रूचि नहीं ले रहे हैं। कुछ नेताओं के बीच इसको लेकर चर्चा भी हुई है, जबकि लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा। पार्टी के कुछ लोगों का कहना है कि ऐसी ही स्थिति रही, तो आगामी चुनावों में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है, क्योंकि लोकसभा के चुनाव तो राष्ट्रीय मुद्दों पर आधारित रहते हैं, स्थानीय चुनाव जीतने के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं का पार्टी के प्रति समर्पण जरूरी है, जिसमें फिलहाल कमी दिख रही है। 
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Date : 28-Aug-2019

बोतल को मना करें...

इन दिनों सरकारी या गैरसरकारी, बड़े लोगों के यहां जाने पर पीने के पानी की छोटी-छोटी सीलबंद बोतलें पेश कर दी जाती हैं। ये दिखने में अच्छी लगती हैं, बड़े ब्रांड का लेबल लगा होने से ऐसा भरोसा होता है कि पानी साफ होगा, और एक ग्लास से भी कम पानी वाली यह बोतल एक बार इस्तेमाल के बाद कचरे की टोकरी में चली जाती है। दुनिया भर में वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि प्लास्टिक की बोतलों में कुछ न कुछ कण प्लास्टिक के ऐसे रह जाते हैं जो कि पानी के साथ बदन में जाते हैं। कुछ अधिक समझदार लोगों ने अब घर के फ्रिज या गाड़ी में भी स्टील, तांबे, या कांच की बोतलें रखना शुरू कर दिया है क्योंकि गाडिय़ां धूप में खड़ी रहती हैं, और प्लास्टिक की बोतलों में गर्म हो जाने वाले पानी में कुछ रासायनिक क्रिया भी होने की खबरें हैं जिनसे सेहत को नुकसान पहुंचता है। 
ऐसे में लोग खुद होकर दूसरों के घरों में, या दफ्तरों में प्लास्टिक की सीलबंद बोतल का इस्तेमाल करने से मना भी कर सकते हैं, और साफ पानी ग्लास में मांगकर एक जागरूकता भी फैला सकते हैं। सिर्फ एक बार इस्तेमाल होकर कचरे में चले जाने वाला प्लास्टिक दुनिया पर सबसे बड़ा बोझ बन गया है, और जो लोग ऐसा खर्च कर भी सकते हैं, उन्हें अपनी आने वाली पीढिय़ों को ऐसे प्लास्टिकतले अभी से दफन नहीं करना चाहिए। ऐसी किसी भी बोतल का इस्तेमाल करने के साथ यह सोचना चाहिए कि वह आपकी आने वाली पीढिय़ों का दम किस तरह घोटेगी, ऐसा सोचने पर शायद लोग एक बार फिर फिल्टर किए हुए साफ पानी की तरफ लौट सकेंगे। 

सिंहदेव को पड़ोस का जिम्मा
झारखंड विधानसभा चुनाव के चलते सरगुजा राजघराने के मुखिया टीएस सिंहदेव की पूछपरख बढ़ गई है। कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें वहां प्रत्याशी चयन की जिम्मेदारी सौंपी है। पार्टी ने सिंहदेव को प्रत्याशी चयन के लिए गठित छानबीन समिति का अध्यक्ष बनाया है। झारखण्ड, सरगुजा से सटा हुआ है। सरगुजा की आदिवासी संस्कृति झारखण्ड से मिलती जुलती भी है। छत्तीसगढ़ के मंत्री सिंहदेव झारखण्ड की भौगोलिक स्थिति से पूरी तरह वाकिफ हैं। ऐसे में पार्टी को लगता है कि सिंहदेव झारखण्ड में पार्टी की नैय्या पार कराने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरगुजा की सारी सीटें जीतने में सफल रही। इसका श्रेय काफी हद तक सिंहदेव को जाता है, हालांकि ओडिशा में लोकसभा चुनाव के दौरान भी सिंहदेव को जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन वहां वे सफल नहीं रहे। अब देखना है कि झारखण्ड में अपनी जिम्मेदारियों को सिंहदेव कैसे निभा पाते हैं। 

झांसे के फोन काटना काफी नहीं...
इन दिनों तकरीबन हर किसी के पास टेलीफोन पर बैंक या क्रेडिट कार्ड का फ्रॉड करने वाले लोगों के फोन आते हैं, और बहुत से पढ़े-लिखे, कामयाब, सरकारी अफसर भी इनके झांसे में आकर कभी अपने एटीएम का नंबर बता देते हैं, तो कभी ओटीपी बता देते हैं। नतीजा यह होता है कि रफ्तार से खाते से पैसे निकल जाते हैं। ऐसे में अभी फेसबुक पर रायपुर के एक नौजवान ने एक मोबाइल नंबर पोस्ट किया कि इस नंबर से ऐसी धोखाधड़ी का फोन आया। यह एक अच्छा तरीका हो सकता है कि ऐसा नंबर देखने वाले लोग उसे अपने फोन की फोनबुक में फ्रॉड के नाम से दर्ज कर लें, ताकि वे खुद तो बचें ही, साथ-साथ दूसरे लोगों को भी उससे मदद मिले। इन दिनों बहुत से लोग मोबाइल पर ट्रू-कॉलर एप्लीकेशन का इस्तेमाल करते हैं जो आपकी फोनबुक तक पहुंच देने पर ही शुरू होता है। और आपकी फोनबुक पर जो नंबर फ्रॉड की तरह दर्ज हैं, वे ट्रू-कॉलर बाकी लोगों को भी फ्रॉड की तरह दिखा देता है। इससे लोग सावधान हो सकते हैं। तो कुल मिलाकर झांसे और जालसाजी के आने वाले फोन के नंबर को सोशल मीडिया पर भी डाल सकते हैं ताकि जिन्हें आप पर भरोसा हो वे अपने फोन में भी उसे दर्ज कर लें। दूसरी तरफ आप अपने फोन पर भी उसे फ्रॉड दर्ज कर लें, ताकि ट्रू-कॉलर औरों को सावधान कर सके। 

बदनामी की कई वजहें...
अभी छत्तीसगढ़ के एक म्युनिसिपल नेता का कहा जाने वाला एक वीडियो चारों तरफ फैला जिसमें वे एक राजनीतिक दल की कही जाने वाली युवती के साथ दिख रहे हैं ऐसी चर्चा हुई। हकीकत चाहे जो हो, इसमें कोई जुर्म बनता हो या नहीं, लेकिन इससे दो लोगों की बदनामी तो हुई होगी, इसके साथ-साथ एक दूसरी चीज और हुई। कुछ बड़े शोधकर्ताओं ने इस सेक्स के सेकंड गिने, और इसे घोर निराशाजनक बताया। अब कुछ लोगों का कहना है कि चेहरे से अधिक बदनामी हुई है, या ऐसे प्रदर्शन से, यह कहना अधिक मुश्किल है। कुल मिलाकर इससे नसीहत यही निकलती है कि ऐसी नौबत से दूर रहें, शौक में भी ऐसा वीडियो बनाने से बचें, क्योंकि उसके बाद बदनामी की कई वजहें हो सकती हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 27-Aug-2019

जंगल-दफ्तर में नई टीम
अरण्य भवन में नई टीम का गठन हुआ है। कांग्रेस सरकार बनने के बाद पहली बार एक साथ 58 आईएफएस अफसरों के तबादले किए गए। फेरबदल में कुछ को अच्छा काम भी मिल गया है। पिछले 8 महीने   से खाली बैठे एपीसीसीएफ संजय शुक्ला को लघु वनोपज सहकारी संघ में भेजा गया है। उन्हें संघ में अहम जिम्मेदारी दी गई है। वर्तमान में पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी के पास संघ के एमडी का अतिरिक्त प्रभार भी है।

 संजय शुक्ला पिछली सरकार में अहम पदों पर रहे हैं। लेकिन सरकार बदलते ही उन्हें हटाकर मूल विभाग में भेज दिया गया जहां उनके पास कोई काम नहीं था अब चूंकि सरकार लघु वनोपज से जुड़ी इकाईयां लगाने पर जोर दे रही है, ऐसे में संजय शुक्ला को खुद को साबित करने का बढिय़ा मौका भी है। पिछले एक-दो बरस में वे लगातार कई अप्रिय चर्चाओं से भी घिरे रहे, और अब उनसे भी उबरने का एक मौका उन्हें मिला है। उन्हें पिछली सरकार के सबसे ताकतवर अफसर अमन सिंह ने प्रमुख सचिव के पद पर पदोन्नत करके तमाम आईएएस और आईएफएस को एकमुश्त खफा कर दिया था, लेकिन अफसरों के वॉट्सऐप गु्रप में इसके खिलाफ लंबी-चौड़ी बहस तो चली, लेकिन अमन सिंह के खिलाफ कोई अफसर जाकर मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव से मिले नहीं।

इससे परे सुनील मिश्रा की पोस्टिंग की भी जमकर चर्चा है। सीसीएफ स्तर के अफसर सुनील मिश्रा को भू-प्रबंध का अहम दायित्व सौंपा गया है। खास बात यह है कि इससे पहले तक एपीसीसीएफ स्तर के अफसर को ही भू-प्रबंध का दायित्व सौंपा जाता रहा है। पहली बार सीसीएफ स्तर के अफसर को यह जिम्मेदारी दी गई है। फॉरेस्ट दफ्तर में भू-प्रबंध को असरदार माना जाता है। भू-प्रबंध की अहमियत का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछली सरकार में पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नत होने के बाद भी काफी समय तक भू-प्रबंध का दायित्व मुदित कुमार सिंह के पास ही रहा है। सुनील मिश्रा को इस सरकार में प्रदूषण निवारण मंडल के सचिव पद से हटाया गया था क्योंकि वे बरसों अमन सिंह के साथ काम कर चुके थे। लेकिन वक्त के साथ अब सरकार की सोच बदली हुई दिखती है।

इसी तरह एसएसडी बडग़ैया को रायपुर का सीसीएफ बनाया गया है, जो कि काफी अहम जिम्मेदारी है। बडग़ैया को नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक का करीबी माना जाता है, लेकिन वे इस सरकार में भी अपना रूतबा कायम रखने में सफल रहे। रायपुर आईजी आनंद छाबड़ा की पत्नी शालिनी रैना को प्रभारी सीसीएफ दुर्ग के पद पर पदस्थ किया गया है। वैसे भी रायपुर और दुर्ग के बीच ज्यादा दूरी नहीं है। 

दीवालिया कंपनी और नया रायपुर
आईएलएण्डएफएस कंपनी अब दिवालिया होने के कगार पर है। कंपनी से जुड़े घोटाले में महाराष्ट्र के नेता राज ठाकरे और कई अन्य फंसे हैं। इन नेताओं से ईडी पूछताछ कर रही है। आईएलएण्डएफएस  की सेवाएं नया रायपुर में भी ली गई थीं। इसको लेकर भारी विवाद भी हुआ। यह पूरा विवाद रमन सरकार के पहले कार्यकाल में हुआ था। बिना टेंडर के आईएलएण्डएफएस को काम देने के मामले की लोक आयोग में शिकायत हुई थी और विधानसभा में भी मामला उठा था। 

तब एनआरडीए बोर्ड के चेयरमैन पी जॉय ओमेन थे। सुनते हैं कि तत्कालीन आवास एवं पर्यावरण मंत्री गणेशराम भगत भी बिना किसी टेंडर या ऑफर के आईएलएण्डएफएस को काम देने के खिलाफ थे। विधानसभा में सवाल आया तो जवाब तैयार करने के लिए भगत ने अफसरों की बैठक ली। ब्रीफिंग में ओमेन इस बात पर अड़े रहे कि कहीं कोई गलती नहीं हुई है। आईएलएण्डएफएस में सरकार का शेयर होता है और इसमें आईएएस अफसर पदस्थ होते हैं। 

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि देश की विभिन्न राज्य सरकारों और अर्धशासकीय एजेंसियां आईएलएण्डएफएस से कसल्टेंसी सेवाएं ले रही है। यह सुनते ही गणेशराम भगत भड़क गए थे। उन्होंने पूछा था कि क्या ऐसा कोई नियम है कि जिस संस्थान में आईएएस अफसर पदस्थ हो, तो उसे बिना टेंडर के काम दिया जा सकता है? यह सुनकर ओमेन खामोश रह गए। बाद में प्रक्रिया पूरी बदली गई। फिर भी एनआरडीए में बड़े पैमाने पर सलाहकार नियुक्त किए गए, जिसकी मौजूदा सरकार जांच करा रही है। (rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 26-Aug-2019

शिक्षामंत्री और सत्तारूढ़ विधायक
छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में तबादलों को लेकर अभी जो बवाल हुआ, वैसा इस राज्य के बनने के बाद से कभी भी किसी विभाग में नहीं हुआ था। सत्तारूढ़ पार्टी के आधा दर्जन से अधिक विधायक सीधे शिक्षामंत्री के बंगले पर पहुंचे, और तबादलों की जो लंबी लिस्ट निकली है, उसमें खुले भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए मंत्री पर भारी नाराजगी दिखाई। इनमें से कुछ विधायक विधानसभा अध्यक्ष के बंगले पर जाकर विरोध दर्ज करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने फोन पर ही मना कर दिया था कि मंत्री उनके मातहत नहीं है, और वे इस बारे में कुछ भी नहीं बोलेंगे, जो बात करनी है मंत्री से करें। मंत्री पर नाराजगी के बाद विधायक मुख्यमंत्री तक पहुंचे, और लेनदेन के बहुत से मामले बताए। स्कूल शिक्षा विभाग राज्य सरकार का सबसे बड़ा विभाग है और इसके कर्मचारी तमाम सरकारी कर्मचारियों का बहुत बड़ा हिस्सा होते हैं। ऐसे में सारे विधायकों, और विधायकों से भी बड़े-बड़े बहुत से कांग्रेस नेताओं, मंत्रियों की तबादला सिफारिशों को स्कूल शिक्षा मंत्री के बंगले पर रद्दी में डाल दिया गया, और बंगले पर काम करने वाले लोगों के मार्फत ही तबादले के सौदे हुए। 

सत्तारूढ़ कांग्रेस के विधायकों ने इसके बारे में अफसरों के नाम गिनाए हैं कि कौन से अफसर तबादला उद्योग चला रहे हैं, और इनके नाम लेकर मुख्यमंत्री को और संगठन के केन्द्रीय नेताओं को बताया गया है कि किस तरह आरएसएस और भाजपा के करीबी रहे अफसर लेन-देन करके तबादला लिस्ट बनाते रहे, और प्रदेश सरकार के कुछ सबसे बड़े लोगों के दिए हुए एक-दो नाम भी सैकड़ों की लिस्ट में नहीं आ पाए। पिछली भाजपा सरकार के समय स्कूल शिक्षा विभाग में जो दलाल अलग-अलग स्कूल शिक्षा मंत्रियों के इर्द-गिर्द सक्रिय रहे, उनके स्टाफ में रहे, वे लोग भी अभी पर्दे के पीछे से मोलभाव में लगे रहे, और उनके करवाए काम बड़े भरोसे के साथ हो गए। 

बैटरी की तरह फूले पुल गिरे तो ? 
राज्य के सबसे बड़े निर्माण विभाग पीडब्ल्यूडी का भ्रष्टाचार दिन में दो की रफ्तार से सामने आ रहा है। इस विभाग के बनवाए हुए राजधानी के ही महंगे निर्माणों में घटिया काम, घटिया सामान, और तकनीकी खतरे इतने सामने आ चुके हैं कि किसी दिन शहर के बीच किसी बड़े पुल की दीवार गिरे, और सैकड़ों लोग दबकर मर जाएं, तो भी हैरानी नहीं होगी। पिछली सरकार के भ्रष्टाचार और उसकी मनमानी की एक सबसे बड़ी मिसाल राजधानी के बीच बनाया गया स्काईवॉक है जो भूपेश सरकार के गले में फंसी हड्डी बन गया है जिसे न उगलते बन रहा है, न निगलते बन रहा है। सरकार जो भी फैसला करेगी, वह आलोचना ही लाएगा। लेकिन सरकार और सरकार के बाहर के जानकार लोग इस बात को लेकर हैरान हैं कि इस विभाग के बड़े-बड़े अफसर इतने घोटालों, इतनी गड़बडिय़ों, और इतने भ्रष्टाचार के बावजूद ज्यों के त्यों बने हुए हैं। कुछ लोगों का अंदाज है कि नई सरकार में मंत्री कमाई के जमे-जमाए ढांचे और उसे चलाने वाले अफसरों का रेडी-टू-यूज इस्तेमाल कर ले रहे हैं, बजाय नए ढांचे को खड़ा करने के। इस विभाग को लेकर इतने किस्म की अप्रिय चर्चाएं सरकार में चल रही हैं कि बदनामी विभागीय मंत्री से परे भी पहुंच रही है, और किसी भी सरकार को ऐसी बदनामी के असर का पता तुरंत नहीं चलता है, लेकिन पन्द्रह बरस की रमन सरकार के जाने में जनता के वोटों का जितना हाथ था, उसका बड़ा हिस्सा इस किस्म की बदनामी से ही आया था। 

सुनते हैं कि पीडब्ल्यूडी की कमाई को लेकर नेता और अफसर इस विभाग में बने रहने के लिए अपना दायां हाथ भी दान देने के लिए तैयार हो जाते हैं। अभी ताजा खबर राजधानी के सैकड़ों करोड़ से बने एक्सप्रेस हाईवे की है जिसकी दीवार जगह-जगह उसी तरह फूली हुई दिख रही है जिस तरह घटिया मोबाइल फोन की बैटरी फूल जाती है। अब इसके किनारे से सारे वक्त लोग निकलते रहते हैं, और अगर दीवार गिरी तो फिर नुकसान का अंदाज भी नहीं लग सकता। 

भाजपाई अफसरों के मजे
राज्य सरकार के कई विभागों में पिछली भाजपा सरकार के वक्त पार्टी कार्यकर्ता की तरह काम करने वाले अफसरों में से कई ऐसे हैं जिनके इस सरकार में भी उसी रफ्तार से उतने ही मजे चल रहे हैं। सरकार में किनारे पड़े हुए कई लोग यह नजारा देखकर हैरान हैं कि भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले लोग आज मंत्री हैं, और उन्हीं मातहत लोगों को आज भी सिर पर बिठाकर रखा हुआ है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 25-Aug-2019

सेक्स-वीडियो आते-जाते रहते हैं...
बिलासपुर संभाग के एक नगर पालिका अध्यक्ष का सेक्स वीडियो वायरल हुआ है। नगर पालिका अध्यक्ष महोदय भी भाजपा से ही जुड़े हैं। और एक पूर्व मंत्री के रिश्तेदार भी हैं। सेक्स-वीडियो वायरल होने के बाद अध्यक्ष महोदय खुद तो सामने नहीं आ रहे हैं, लेकिन उनके समर्थक यह जरूर कहते घूम रहे हैं कि नगरीय निकाय चुनाव नजदीक हैं ऐसे में विरोधी, अध्यक्ष की लोकप्रियता से घबराकर छवि धूमिल करने की कोशिश में लगे हैं। 

दिलचस्प बात यह है कि कोई सेक्स-वीडियो को फर्जी नहीं बता रहा है। चर्चा तो यह भी है कि खुद मौज-मस्ती के लिए नगर पालिका अध्यक्ष महोदय ने बनवाई थी। अब वीडियो फैला, तो उन्हें जवाब देना भी मुश्किल हो गया है। सुनते हैं कि सेक्स-वीडियो की खबर भाजपा संगठन के प्रमुख नेताओं को भी है। भाजपा के शुद्धतावादी नेताओं को वीडियो देखकर जरूर बुरा लग रहा है, लेकिन वे इसको निजी मामला बताकर किसी तरह की कार्रवाई करने से बच रहे हैं। उन्हें लगता है कि थोड़े दिन बाद सबकुछ शांत हो जाएगा। हिमाचल से लेकर उज्जैन और अन्य जगहों में भाजपा नेताओं के सेक्स-वीडियो चर्चा में रहे हैं। कुछ दिन की चर्चा के बाद सबकुछ सामान्य हो गया और वीडियो में दिखाई देने वाले नेता काम धंधे में लग गए। हिंदुस्तानी लोग वैसे तो नैतिकता की बातें बहुत बढ़-चढ़कर करते हैं, लेकिन नैतिक कमजोरियों को यह कहकर तेजी से भुला भी देते हैं कि देवी-देवता भी कई बार कमजोर होते रहे हैं, हम लोग तो इंसान हैं। सेक्स-वीडियो में पकड़ाए गए लोग भी बड़ी रफ्तार से माननीय और आदरणीय हो जाते हैं। ऐसे में इनका मोटा इस्तेमाल कुछ समय के लिए नुकसान पहुंचाना रह जाता है, उससे अधिक कुछ नहीं होता, और नैतिकता की बातें करने वाले बड़बोले हिंदुस्तानी अनैतिक बातों को भुलाकर आगे बढ़ जाते हैं।

भूपेश की तारीफ करते भाजपाई
कांकेर के भाजपा सांसद मोहन मंडावी ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में खुले तौर पर सीएम भूपेश बघेल की तारीफ कर पार्टी नेताओं की नाराजगी मोल ले ली है। बघेल की मौजूदगी में मोहन मंडावी ने उन्हें जननायक बताया और कहा कि उनका (भूपेश बघेल) जन्मदिन जन्माष्टमी पर पड़ता है इसलिए वे भगवान कृष्ण से कम नहीं हैं। मंडावी ने आगे यह भी कहा कि सीएम भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ की परम्परा और संस्कृति को समझते हैं और वे छत्तीसगढ़वासियों के हित में काम कर रहे हैं। मोहन मंडावी की टिप्पणी को पार्टी संगठन ने काफी गंभीरता से लिया है। सुनते हैं कि कुछ नेताओं ने उन्हें फोन कर हिदायत भी दी है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरूण जेटली की अंत्येष्टि में शामिल होने पार्टी के बड़े नेता दिल्ली गए हैं। लौटने के बाद मंडावी को बुलाकर उन्हें हिंदी में समझाइश दी जा सकती है। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा नेताओं की तारीफ पाने का भूपेश बघेल का यह पहला मौका नहीं है, ननकीराम कंवर से लेकर नंद कुमार साय तक कई लोग पहले भी भूपेश की तारीफ कर चुके हैं, और ननकीराम ने तो भूपेश बघेल से मेल-मुलाकात पर पार्टी की आपत्ति पर यह तक कह दिया है कि पार्टी चाहे तो उन्हें निकाल दे, वे तो भ्रष्टाचार और जुर्मों की शिकायत करने के लिए भूपेश बघेल से मिलते रहेंगे जिन्होंने तुरंत जांच के आदेश दिए हैं। ननकीराम रमन सिंह के पसंदीदा और अविश्वसनीय रूप से ताकतवर हो चुके अफसरों के खिलाफ दस बरस से जांच की मांग कर रहे थे, लेकिन उनकी शिकायतें रद्दी की टोकरी से होते हुए कागज कारखाने में लुग्दी बनकर फिर उन्हीं अफसरों के कुकर्म छापने के लिए अखबारी कागज बनकर लौटती रही थी, और अपनी ही पार्टी सरकार में ननकीराम हाशिए पर थे। अब भूपेश बघेल उनकी सुन रहे हैं, तो वे भी भूपेश बघेल की तारीफ कर रहे हैं।

अब रावण का जिम्मा...
डब्ल्यूआरएस मैदान में प्रदेश के सबसे बड़े रावण दहन कार्यक्रम की कमान अब रायपुर उत्तर के विधायक कुलदीप जुनेजा संभालेंगे। साथ ही विकास उपाध्याय उनका सहयोग करेंगे। इससे पहले तक पिछले 15 साल से राजेश मूणत ही इस आयोजन के कर्ता-धर्ता रहे हैं। अब भाजपा की सरकार नहीं रह गई है। ऐसे में अब आयोजनकर्ता भी बदल गए हैं। सुनते हैं कि खुद सीएम भूपेश बघेल ने कुलदीप और विकास को इस कार्यक्रम को बहुत अच्छे से करने के लिए कहा है। इसके बाद कुलदीप और विकास अपनी टीम के साथ सबसे बड़े रावण दहन कार्यक्रम को पिछले वर्षों से ज्यादा भव्य और आकर्षक बनाने की तैयारी में जुट गए हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 24-Aug-2019

शिक्षाकर्मी, जितनी संख्या, उतने किस्से

कुछ शिक्षाकर्मी नेताओं के तबादले से सोशल मीडिया में कोहराम मचा है। कई शिक्षाकर्मी सरकार को भला-बुरा कह रहे हैं। सर्वाधिक चर्चा वीरेंद्र दुबे की हो रही है, जो कि शिक्षाकर्मी संघ के एक बड़े धड़े के प्रदेश अध्यक्ष हैं। वे मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र पाटन के एक स्कूल में पदस्थ थे, जिन्हें बेमेतरा जिले में भेजा गया है। वैसे तो शिक्षाकर्मी नेताओं को स्कूल में कभी पढ़ाते नहीं देखा गया, वे ज्यादातर समय टीवी डिबेट पर या फिर अपने संगठन को मजबूत करने में ही लगे रहते हैं। 

शिक्षाकर्मियों की संख्या भी पौने दो लाख से अधिक हो गई है। ऐसे में संगठन के पास अच्छा-खासा चंदा भी इक_ा हो जाता है। शिक्षाकर्मियों में एकजुटता भी है और नियमितीकरण की मांग को लेकर पिछली सरकार को हिलाकर रख दिया था। ऐसे में शिक्षाकर्मी नेताओं पर कभी कार्रवाई नहीं हो पाती। हड़ताल के वक्त कई बार शिक्षाकर्मी नेताओं को बर्खास्त भी किया गया, लेकिन जल्द ही उन्हें बहाल भी कर दिया गया। 

हाल यह है कि वीरेंद्र दुबे जैसे अन्य शिक्षाकर्मी नेता महंगी गाडिय़ों में देखे जा सकते हैं। और चुनाव के वक्त राजनीतिक दल के लोग उनसे समर्थन जुटाने की कोशिश में रहते हैं। कांग्रेस ने शिक्षाकर्मियों का समर्थन हासिल करने के लिए वीरेंद्र दुबे गुट के शिक्षाकर्मी चंद्रदेव राय को कांग्रेस ने टिकट भी दी थी और वे बिलाईगढ़ से अच्छे मतों से चुनाव भी जीते, मगर वीरेंद्र दुबे का जुड़ाव कांग्रेस के बजाए भाजपा से रहा है। 

चर्चा हैं कि शिक्षाकर्मी नेताओं को भाजपा के पाले में लाने में पूर्व कलेक्टर ओपी चौधरी की अहम भूमिका रही है। वे प्रशासनिक सेवा में आने से पहले शिक्षाकर्मी रह चुके हैं। शिक्षाकर्मी नेताओं के समर्थन के बावजूद प्रदेश में भाजपा सरकार नहीं बन पाई। अलबत्ता, खुले तौर पर प्रचार करने वाले नेता कांग्रेस सरकार के निशाने पर आ गए हैं। 

पिछले दिनों एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में वीरेंद्र दुबे ने सीएम भूपेश बघेल से पूछ लिया कि सरकार शिक्षकों के लिए क्या कर रही है? इस पर सीएम ने कहा कि शिक्षकों के लिए बहुत कुछ किया है। रमन सरकार ने संविलियन की सिर्फ घोषणा की थी, लेकिन हमने उसे पूरा किया और 11 सौ करोड़ रुपये बजट में प्रावधान भी किया। साथ ही उन्होंने मंच से ही वीरेंद्र दुबे से कहा कि आपसे अलग से यह जरूर जानना चाहूंगा कि पिछली सरकार में शिक्षाकर्मियों का आंदोलन हुआ था, तो आप एक बजे रात को रहस्यमय तरीके से जेल से निकलकर किससे मिलने के लिए गए थे? फिर अगले दिन आंदोलन खत्म भी हो गया। सीएम की बात सुनकर हड़बड़ाए वीरेंद्र दुबे चुपचाप खिसक लिए। 

बाद में खबर छनकर आई कि उस वक्त के कलेक्टर ओपी चौधरी, वीरेंद्र दुबे और एक-दो अन्य नेताओं को चुपचाप जेल से अमन सिंह से मिलाने ले गए थे। कुछ डील भी हुई और शिक्षाकर्मियों का आंदोलन खत्म हो गया, लेकिन शिक्षाकर्मियों का विश्वास अपने नेताओं पर से उठ गया और उन्होंने विधानसभा चुनाव में रमन सरकार के खिलाफ माहौल तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

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Date : 22-Aug-2019

तबादलों के सौदों का मौसम

ट्रांसफर का सीजन चल रहा है। सरकार कोई भी हो, ट्रांसफर-पोस्टिंग लेन-देन की खबरें चर्चा में रहती हैं। इस बार भी छोटे-बड़े नेता और दलाल सक्रिय दिख रहे हैं। कई विभाग ऐसे हैं, जहां बिना लेन-देन के ट्रांसफर मुश्किल सा दिखता है। इनमें परिवहन और आबकारी विभाग हैं। ये दोनों विभाग बेहद कमाऊ माने जाते हैं। कुछ पुराने परिवहन अफसर याद करते हैं कि अविभाजित मध्यप्रदेश में सिर्फ एक बार ही लेन-देन नहीं हुआ था, वह भी राष्ट्रपति शासन का दौर था। उस वक्त राज्यपाल कुंवर मेहमूदअली खान ने बड़े पैमाने पर परिवहन अफसरों के तबादले किए। तब छत्तीसगढ़ के रिटायर्ड मुख्य सचिव शिवराज सिंह ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के पद पर थे। 

शिवराज सिंह के प्रस्तावों को कुंवर मेहमूदअली खान ने जस के तस मंजूरी दे दी। बिना पैसे के भारी भरकम तबादले की उन दिनों काफी चर्चा रही। छत्तीसगढ़ बनने के बाद विशेषकर परिवहन और आबकारी में तो सीएम हाउस तक का दखल रहा है। सीएम रमन सिंह भी उस वक्त विवादों में घिर गए जब उनके रिश्तेदार संजय सिंह की परिवहन में पोस्टिंग हुई और उनके खिलाफ भारी भ्रष्टाचार की शिकायतें आई। बाद में खुद रमन सिंह को इस मामले में सफाई देनी पड़ी। बाद में संजय सिंह को वापस पर्यटन बोर्ड भेज दिया गया। मगर, इस बार ट्रांसफर सीजन में कमाऊ विभागों से ज्यादा स्कूल शिक्षा विभाग में लेन-देन की खबरें चर्चा में है। खुद स्कूल शिक्षा मंत्री ने एक प्रकरण को पुलिस को जांच के लिए सौंपा है। 

स्कूल शिक्षा मंत्री के दावे के बावजूद उनके विभाग में लेन-देन की चर्चा थम नहीं रही है। रायपुर के सबसे पुराने स्कूल के प्राचार्य का तबादला रूकवाने के लिए एक विधायक और कांग्रेस पार्षद, मंत्री बंगले पहुंच गए। सुनते हैं कि प्राचार्य पिछले चार सालों से वहां हैं और वे पिछली सरकार के एक प्रभावशाली मंत्री के करीबी भी रहे हैं। सरकार बदलने के बाद जब उनके तबादले के प्रस्ताव पर चर्चा हुई, तो कांग्रेस विधायक और पार्षद, प्राचार्य का तबादला रोकने के लिए अड़ गए। इसमें भी लेन-देन की चर्चा है। कुछ सूची तो छोटे-बड़े नेताओं की आपसी खींचतान के चलते जारी नहीं हो पा रही है। 

अब जंगल में मंगल

राज्य बनने के बाद पीसीसीएफ (मुख्यालय) को डीजीपी की तरह अधिकार दिया जा रहा है। यानी पीसीसीएफ (मुख्यालय) रेंजर तक के तबादले कर सकेंगे। इसके लिए फाइल शासन को भेजने की जरूरत नहीं है। यह सब विभागीय मंत्री मोहम्मद अकबर की पहल पर हो रहा है। 
वैसे तो, पिछले 15 साल में वन विभाग ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए कुख्यात रहा है। दागी-बागी टाइप अफसर मलाईदार जगहों पर रहे हैं। लेकिन इस बार कुछ व्यवस्था बदली है। सिर्फ जरूरी तबादले ही हो रहे हैं और उन अफसरों को आगे लाया जा रहा है, जो कि बरसों से लूप लाइन पर रहे हैं, उन्हें काम करने का बेहतर अवसर दिया जा रहा है। इस अवसर का फायदा उठाकर कुछ बेहतर  किया तो ठीक, अन्यथा हटाने में देर नहीं लगेगी।

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