राजपथ - जनपथ

04-May-2020

शराब दुकानों की भीड़

छत्तीसगढ़ में 40 दिन के लॉकडाइन के बाद सोमवार से शराब की दुकानें खुलीं। राजधानी रायपुर से लेकर पूरे प्रदेश की तमाम जगहों से शराब दुकानों में भीड़ के नजारे देखने मिल रहे हैं। सुबह दुकान खुलने से पहले ही वहां मदिराप्रेमी इक_ा होने शुरु हो गए थे और थोड़ी ही देर में दुकानों पर कई सौ मीटर की लंबी लंबी कतारें दिखाई देने लगी। वॉकर के सहारे भी चलकर लोग शराब लेने पहुंचे थे, तो कोई अपने साथ परिवार के सदस्यों के साथ लाइन में खड़े थे। कोरोना युग में किसी को इस बात का ध्यान नहीं था कि पर्सनल या सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना है। हालांकि लोग मास्क या गमछा बांधकर जरुर आए थे, लेकिन कोरोना से ज्यादा भय इस बात का था कि कोई पहचान न लें। इस लिहाज से उनके लिए गमछा या मास्क जरुर उपयोगी साबित हुआ। शहर से दूर या गांव के इलाकों में खेत-खलिहान तक में लाइन लगी हुई थी। कुल मिलाकर शराब के लिए लोगों की तड़प का अंदाजा लाइन देखकर लगाया जा सकता था। दूसरी तरफ शराब दुकानों पर मदिराप्रेमियों की भीड़ देखने के लिए मीडिया के लोगों के साथ-साथ आम लोग भी मोबाइल कैमरे के साथ तैनात थे। लिहाजा शराब प्रेमी बचते बचाते शराब लेते दिखाई दिए। उधर, सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म शराब दुकानों के वीडियो और तस्वीरों से भरे पड़े हैं। इसके साथ लोग सरकारों को कोस भी रहे हैं कि ऐसे महामारी के समय में शराब दुकान खुलवाकर अपनी नीयत को जाहिर किया है, लेकिन लोग जानते हैं कि उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने 15 दिन पहले शराब और बीयर बनाने वाली डिस्टलरी को खोलने का आदेश दे दिया था। वहां तो बीजेपी की सरकार है और उसके मुखिया एक योगी हैं। ऐसे में कांग्रेस शासित राज्यों में बीजेपी के लोगों को तो विरोध करने का हक ही नहीं बनता। खैर राजनीति में तो आरोप-प्रत्यारोप एक आम बात है। विपक्षी दल का काम ही है कि सरकार की नीतियों और कामकाज की आलोचना करे। वही दल सत्ता में आता है तो उसका भी आचरण वैसे ही हो जाता है।

स्कूटर सवार सीएस के अफसर

कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए केन्द्र हो या राज्य, हर संभव कोशिश कर रही है। ऐसे मौके पर प्रशासन की भूमिका बेहद अहम रहती है। मगर प्रदेश में एक-दो जिलों में कलेक्टरों का रवैया गैर जिम्मेदाराना रहा है। सुनते हैं कि सीमावर्ती जिले के एक कलेक्टर के खिलाफ तकरीबन रोजाना शिकायत कमिश्नर तक पहुंच रही है। कमिश्नर ने कलेक्टर के गैरजिम्मेदाराना रूख की शिकायत प्रशासनिक मुखिया तक पहुंचाई है। मगर कलेक्टर इससे बेपरवाह हैं। वे आम लोग तो दूर, कुछ सीनियर अफसरों और जनप्रतिनिधियों का भी फोन नहीं उठाते। अक्सर उनका मोबाइल बिजी मोड में रहता है।

एक सीनियर अफसर बताते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान आम लोगों की शिकायतें सुनने की सीख दी जाती रही है। अविभाजित मध्यप्रदेश में तो कलेक्टर सुविधाएं न होने के बावजूद आम लोगों की समस्याओं के निराकरण के लिए इतने तत्पर रहते थे कि वे साइकिल या अन्य दोपहिया वाहन से लोगों के बीच पहुंच जाते थे। खुद मौजूदा सीएस आरपी मंडल भी सडक़-सफाई व्यवस्था देखने के लिए अक्सर स्कूटर से निकल जाते हैं। मगर नए कलेक्टर, सीएस की कार्यप्रणाली से भी कोई प्रेरणा नहीं ले रहे हैं। सीमावर्ती जिले के इस कलेक्टर की हरकत से अब कोरोना के मामले में उनका जिला संवेदनशील होता जा रहा है।

मजदूर भी मंजूर नहीं

छत्तीसगढ़ के जिले-जिले से मनरेगा में मजदूरी देने के जो आंकड़े आ रहे हैं, वे कामयाबी पर हैरान करते हैं. यह राज्य देश में रोजगार देने में अव्वल साबित हो रहा है. जबकि गाँव में हालत यह है कि जगह-जगह लोगों ने सडक़ें काट दी हैं, बाहर के किसी को गाँव में घुसने नहीं दिया जा रहा. प्रधानमंत्री सडक़ योजना के लोगों को जाकर काम नहीं करने दिया जा रहा. किसी ने ठीक ही कहा था कि कोरोना से सावधानी में गाँव आगे हैं, वे अधिक सतर्क हैं. शहरी कॉलोनियों में तो लोग दूसरे शहर से आकर घर घुस जा रहे हैं, लेकिन गाँव में तो आये हुए लोगों को बाहर ही स्कूल जैसी किसी बिल्डिंग में ठहरा दिया जा रहा है. सरकारी रोजगार के कामों में इस वजह से भी दिक्कत आ रही है।


03-May-2020

एलके जोशी की यादें...

कोई अफसर वैसे तो अपने राजनीतिक मुखिया के बढ़ाए किसी महत्वपूर्ण समझी जाने वाली कुर्सी पर पहुंचते हैं, लेकिन वहां पहुंच जाने के बाद वे अपने राजनीतिक-मुखिया को चढ़ाने या गिराने के काफी हद तक जिम्मेदार रहते हैं। कोई सत्तारूढ़ नेता उतने ही कामयाब हो सकते हैं जितने अच्छे अफसर वे अपने आसपास रखते हैं। कल दिल्ली में जब अविभाजित मध्यप्रदेश के एक रिटायर्ड आईएएस एलके जोशी गुजरे तो लोगों को याद आया कि वे मोतीलाल वोरा के मुख्यमंत्री रहते हुए उनके जनसंपर्क सचिव थे, और फिर जब मोतीलाल वोरा उत्तरप्रदेश के राज्यपाल बने, तब भी उन्होंने एलके जोशी को साथ राजभवन ले जाने की समझदारी दिखाई थी। नतीजा यह था कि वोराजी की कामयाबी से बढक़र उनकी शोहरत होती चली गई। ऐसा नहीं कि वे काबिल नहीं थे, लेकिन बहुत से लोग काबिल रहते हुए भी जनता तक अपनी खूबी नहीं पहुंचा पाते, और एलके जोशी ने इस मामले में वोराजी के लिए खूब काम किया था।

एमपी-छत्तीसगढ़ के ही एक दूसरे अफसर सुनिल कुमार को देखें, तो वे वोराजी के वक्त उनका जनसंपर्क देख चुके थे, अर्जुन सिंह के वक्त वे उनके साथ दो-दो बार दिल्ली में रहे, और उनके सबसे काबिल और पसंदीदा अफसर थे। छत्तीसगढ़ राज्य बना तो वे अजीत जोगी के सचिव भी रहे, जनसंपर्क सचिव भी रहे, और इस राज्य को खड़ा करने में वे बुनियाद के एक बड़े पत्थर रहे। भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह लगातार सुनिल कुमार को दिल्ली से वापिस बुलाने में लगे रहे, और आखिर में जब वे लौटे, तो उनको मुख्य सचिव भी बनाया, और रिटायर होने के बाद दिल्ली से बुलाकर योजना मंडल उपाध्यक्ष बनाया, साथ में अपना सलाहकार भी बनाया।

कल एलके जोशी के गुजरने की खबर आने के बाद छत्तीसगढ़ में बसे कुछ रिटायर्ड बड़े अफसरों ने फोन करके इन सब बातों को याद किया, और कहा कि उन्होंने वोराजी को भोपाल से लेकर लखनऊ तक, उनके कद से खासा अधिक बड़ा पेश किया। लेकिन पहली खूबी तो वोराजी की ही थी जो कि उन्होंने एक काबिल व्यक्ति को छांटा था। जोशी की बहुत सी यादें लोगों के पास हैं, जो कि बाकी अफसरों के लिए एक मिसाल भी हो सकती हैं।

एक काबिल अफसर का निलंबन खत्म

आखिरकार भारतीय वनसेवा के अफसर एसएस बजाज का निलंबन खत्म हो गया। उनकी जल्द ही पोस्टिंग भी हो जाएगी। बजाज को नवा रायपुर के पौंता चेरिया में नई राजधानी के शिलान्यास स्थल को आईआईएम को देने के पुराने प्रकरण पर निलंबित कर दिया गया था। हालांकि बजाज की सीधे कोई भूमिका नहीं थी। जमीन देने का फैसला एनआरडीए बोर्ड का था, और इसके चेयरमैन तत्कालीन मुख्य सचिव पी जॉय उम्मेन थे। खैर, बजाज की साख अच्छी रही है और यही वजह है कि आईएफएस अफसर उनकी बहाली के लिए लगातार प्रयासरत थे।

बजाज के इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों के साथी कांग्रेस के संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेष नितिन त्रिवेदी ने भी सीएम से मिलकर बजाज की बहाली के लिए गुजारिश की थी। नियमानुसार आईएफएस अफसर को राज्य सरकार एक माह के लिए निलंबित कर सकती है, लेकिन बाद में विधिवत केन्द्र से अनुमति लेनी पड़ती है। केन्द्र ने निलंबन को लेकर कुछ बिंदुओं पर जवाब भी मांगा था। मगर राज्य ने निलंबन आगे बढ़ाने में कोई रूचि नहीं दिखाई। इसके बाद बजाज का निलंबन स्वमेव खत्म हो गया। सरकार भी अब उनकी योग्यता और अनुभव का पूरा लाभ लेना चाह रही है। वैसे अभी भी विभाग से जुड़े तमाम विषयों पर उनसे काम लिया जा रहा है। मगर उनके पास कोई प्रभार नहीं है, लेकिन जल्द ही उनको काम मिलने के संकेत हैं।


02-May-2020

बृजमोहन के विरोध का राज

पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का शुक्रवार को जन्मदिन था। वैसे तो हर साल बृजमोहन के जन्मदिन पर प्रदेशभर में जलसा होता है। मगर इस बार कोरोना प्रकोप के चलते बृजमोहन ने जन्मदिन नहीं मनाने का निर्णय लिया था। वे होम आइसोलेशन में हैं। और उन्होंने अपने समर्थकों को हिदायत भी दी थी कि वे घर न आएं, लेकिन तमाम हिदायतों के बाद भी बड़ी संख्या में समर्थक बंगले में जुट गए। बस फिर क्या था कांग्रेस प्रवक्ता विकास तिवारी को मौका मिल गया और उन्होंने रेड जोन में होने के बाद भी मंत्री समर्थकों द्वारा लॉकडाउन का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया में जमकर खिंचाई की।

विकास तिवारी पिछले कुछ समय से बृजमोहन के खिलाफ आक्रामक अभियान चला रहे हैं। आमतौर पर कांग्रेस के लोग बृजमोहन के खिलाफ कुछ बोलने से बचते हैं। वजह यह है कि पिछले 15 सालों में सरकार में रहते हुए बृजमोहन ने कांग्रेसी मित्रों का पूरा ख्याल रखा और उनकी निजी जरूरतों को हर संभव पूरा करने की कोशिश की। हालांकि विकास तिवारी भी भाषा पर संयम रखते हुए बृजमोहन के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। वैसे उनका यह अभियान पार्टी से परे, कुछ निजी भी है।

 सुनते हैं कि ब्राम्हणपारा वार्ड में विकास की पत्नी चुनाव मैदान में थी। विकास की पत्नी की जीत सुनिश्चित लग रही थी, तभी बृजमोहन की ब्राम्हणपारा वार्ड में इंट्री हुई और भाजपा की बागी पूर्व पार्षद प्रेम बिरनानी की पत्नी ने अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में नाम वापस ले लिया। बृजमोहन ने यहां रोड शो और डोर-टू-डोर प्रचार किया। इन सबके चलते विकास की पत्नी चुनाव जीतने से रह गईं। चूंकि बृजमोहन ने यहां अतिरिक्त मेहनत कर दी है, तो विकास भी उनके खिलाफ दिन-रात एक कर रहे हैं।लेकिन एक बात और है, राजधानी रायपुर में कांग्रेस के हर नौजवान की हसरत रहती है कि पार्टी उसे बृजमोहन के खिलाफ चुनाव लडऩे का मौका दे. यही हसरत लिए हुए कई नौजवान बूढ़े भी हो गए. इसलिए भी कई कांग्रेसी बृजमोहन के मुकाबले खुद को पेश करने में लगे रहते हैं. चुनाव के वक्त सुना है कि यह बड़े फायदे का भी होता है।

कोटा के बच्चों को प्राथमिकता का कोटा !

राजस्थान के कोटा से हजारों बच्चों को छत्तीसगढ़ सरकार तो लेकर आ गयी, लेकिन समाज के बहुत से तबकों ने सवाल उठाये कि वे वहां पढ़ाई तो नहीं कर रहे थे, वे तो आगे के बड़े कॉलेजों में दाखिले के मुकाबले के लिए कोचिंग ले रहे थे. इस कोचिंग की फीस और वहां रहने का खर्च ही कम से कम लाख रूपये सालाना होता है. ऐसे में सरकार क्यों उनको लाने का खर्च करे? सरकार के लोगों का कहना है कि करीब सौ बसों को हजार किलोमीटर भेजना, वापिस लाना, पुलिस और स्वास्थ्य कर्मचारियों को साथ भेजना, रास्ते के खाने का इंतजाम, और अब 14 दिनों के क्वॉरंटीन का खर्च, कोटा पर राज्य सरकार का एक करोड़ से अधिक का खर्च आ रहा है।

अब लोगों का यह कहना है कि जो मां-बाप लाख रूपए सालाना या और अधिक खर्च करके बच्चों को कोटा में कोचिंग दिला रहे हैं, उन्हें खुद होकर सरकार को यह लागत चुकानी चाहिए। लेकिन अब तक खबरों में हजारों मां-बाप में तो दो-चार की भी मुख्यमंत्री राहत कोष में कोई रकम देने की खबर भी नहीं आई है। सरकारी खजाना तो सभी का होता है, और छत्तीसगढ़ की गरीब आबादी का हक उस पर अधिक है, ऐसे में लोगों को लग रहा है कि गरीब के हक की रकम संपन्न बच्चों पर खर्च की गई, और ये बच्चे कोटा की कोचिंग से लौटकर दूसरे गरीब बच्चों को इन्ट्रेंस एग्जाम में पीछे छोड़ेंगे। लेकिन सरकार का काम इसी तरह चलता है, और उसमें राजनीतिक-न्याय अधिक होता है, सामाजिक-आर्थिक न्याय कम। अब अगर कोटा में पढ़ रहे कुछ हजार बच्चों के समाज में बेहतर हालत वाले मां-बाप की तरह प्रवासी मजदूरों के लिए कहने वाले भी कुछ वजनदार लोग होते तो हो सकता है कि पहली बारी उन लोगों की आती जो कि सडक़ किनारे, बेघर, बेसहारा, बेरोजगार पड़े हुए हैं। अब जब ट्रेन से मजदूरों को उनके इलाकों में पहुंचाने की बात शुरू हुई है, तो केन्द्र और राज्यों के बीच यह बहस भी चल रही है कि ट्रेन का खर्च कौन उठाए। केन्द्र सरकार अगर राज्यों को उसके मजदूरों को पहुंचाने का बिल वसूलने का सोच रही है, तो यह बहुत ही शर्मिंदगी की बात होगी। इस बीच छत्तीसगढ़ में जहां कोटा से लौटे हुए बच्चों को रखा गया है, वे खाना खराब मिलने की शिकायत कर रहे हैं, कई बच्चे और उनके मां-बाप कमरों के एसी न होने की बात कह रहे हैं, कुछ का कहना है कि उन्हें पश्चिमी शैली का शौचालय ही लगता है, और अधिकतर बच्चों ने गद्दे नापसंद कर दिया है। सडक़ किनारे मजदूर इनमें से किसी बात की शिकायत नहीं कर रहे, क्योंकि इनमें से खाना छोड़ उन्हें और कुछ भी नहीं मिल रहा है, और खाने के बारे में अधिकतर जगहों का यह कहना है कि दिन में एक वक्त मिल जाए तो भी बहुत है, और उससे एक वक्त का पेट भी भर पाए तो भी बहुत है। कोटा न हुआ, प्राथमिकता का कोटा हो गया। ऐसे तमाम बच्चों के मां-बाप मुख्यमंत्री राहत कोष में कम से कम 25-25 हजार रूपए तो दें। सरकार तो इन बच्चों के साथ कोटा में अगर मां-बाप भी रह रहे थे, तो उनको भी साथ लेकर आई है, और उनको भी क्वॉरंटीन में ठहराया है।

अकेले भूपेश मैदान में ?

केन्द्र सरकार ने लॉकडाऊन-3 शुरू करते हुए जो निर्देश जारी किए हैं, उनमें 65 बरस से अधिक और 10 बरस से कम उम्र के लोगों को घर से बाहर न निकलने की कड़ी सलाह दी गई है। कहा गया है कि केवल मेडिकल जरूरत पर ही वे बाहर निकलें। अब छत्तीसगढ़ सरकार में एक दिलचस्प तस्वीर बन रही है। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत, स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव, और गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू सभी 65 बरस से अधिक के बताए जा रहे हैं, और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इन सबके बीच अकेले हैं जिनका यह पूरा कार्यकाल भी उन्हें 65 तक नहीं पहुंचाएगा। सरकार में ऊंचे ओहदे पर बैठे एक आदमी ने मजाक किया, भूपेश मोदी सरकार के चाहे कितना टकराव मोल लेते हों, मोदी सरकार ने राज्य में अकेले उन्हीं को काम करने का मौका दिया है, बाकी सभी को घर बैठना है।  


01-May-2020

मॉक ड्रिल किससे पूछकर?

कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए धमतरी जिला प्रशासन की मॉकड्रिल विवादों में घिर गई है। इस मॉकड्रिल के चलते बुधवार करीब 4 घंटे तक पूरे धमतरी शहर में तनाव का माहौल रहा। बाद में प्रशासन ने जब वस्तु स्थिति स्पष्ट की, तब कहीं जाकर लोगों ने राहत की सांस ली। भाजपा सांसद सुनील सोनी ने इस मॉकड्रिल पर कड़ी आपत्ति जताई है और उन्होंने सीधे-सीधे प्रशासन को अपने इस कृत्य के लिए एम्स प्रबंधन और स्वास्थ्य टीम से माफी मांगने तक की सलाह दे डाली।

धमतरी में न तो कोरोना इलाज की सुविधा है और न ही जांच के लिए कोई लैब तैयार है। ऐसे में कोरोना से बचाव के लिए जनजागरूकता अभियान चलाने के बजाए मॉकड्रिल के नाम पर भय का वातावरण बनाने की कड़ी आलोचना हो रही है। सुनते हैं कि धमतरी कलेक्टर ने मॉकड्रिल से पहले प्रभारी मंत्री से चर्चा तक नहीं की थी, लेकिन भाजपा के एक पूर्व मंत्री को विश्वास में लिया था और अपनी सारी योजनाओं  से अवगत कराया था। पूर्व मंत्री ने तो मॉकड्रिल से असहमत होने के बाद भी कलेक्टर का साथ देते हुए खामोशी ओढ़ ली, लेकिन भाजपा के बाकी नेता कलेक्टर पर पिल पड़े हैं। अब चाहकर भी पूर्व मंत्री, कलेक्टर का बचाव भी नहीं कर पा रहे हैं।

सुब्रमण्यिम के रहने का फायदा मजदूरों को

जम्मू-कश्मीर में दो सौ से ज्यादा 36गढ़ी मजदूर फंसे हैं। मगर प्रशासन उनकी अच्छी तरह देखभाल कर रहा है, और मजदूर भी मोटे तौर पर प्रशासनिक व्यवस्था से खुश हैं। यह सब इसलिए भी हो पा रहा है कि जम्मू-कश्मीर के चीफ सेक्रेटरी बीवीआर सुब्रमण्यिम हैं, जो छत्तीसगढ़ कैडर के अफसर हैं। सुब्रमण्यिम छत्तीसगढ़ में एसीएस (गृह) के पद पर काम कर चुके हैं।

सुनते हैं कि सुब्रमण्यिम ने व्यक्तिगत रूचि लेकर 36गढ़ी मजदूरों को राहत दिलवाई है। सुब्रमण्यिम को लेकर एक बुरी चर्चा यह भी है कि वे ज्यादातर अफसरों का फोन तक नहीं उठाते हैं। अलबत्ता, श्रम सचिव सोनमणी बोरा की सुब्रमण्यिम से फोन पर बातचीत हो जाती है। इसकी एक वजह यह भी है कि बोरा जब आईएएस ट्रेनिंग एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहे थे, तब सुब्रमण्यिम उनकी क्लास लेते थे। तब से उनका परिचय है। इसका फायदा भी छत्तीसगढ़ को मिल रहा है।


29-Apr-2020

पहुंच और किस्मत का धनी अफसर

सरकार किसी की भी हो, लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे जुगाड़ू होते हैं कि उनकी हमेशा तूती बोलती है। कई बार तो ऐसी स्थिति आ जाती है जब बड़े अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी जुगाड़ुओं का कुछ नहीं बिगाड़ पाते और वे अपनी मनचाही जगह पर जमे रहते हैं। ऐसे ही बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में पदस्थ सहायक खाद्य अधिकारी अनिल जोशी हैं, जिनकी सेटिंग और पहुंच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विधायक-कलेक्टर तक उसको ट्रांसफर के बाद रिलीव नहीं करा पा रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि वो कोई बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, बल्कि इस अफसर का तबादला ही शिकायतों के आधार पर हुआ था। बताते हैं कि इस सहायक खाद्य अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के भी आरोप हैं। जिले के एक पूर्व कलेक्टर ने तो उनके खिलाफ बकायदा गोपनीय जांच करवाई थी और रिपोर्ट सरकार को भेजी थी। जिसमें उन्होंने लिखा था कि उक्त अधिकारी चोरी-छुपे राइस मिल संचालित कर रहा है और विभाग के काम में बेवजह दखलंदाजी करता है। उसे फील्ड से हटाकर ऑफिस में अटैच भी किया गया। कलेक्टर की चि_ी के बाद शासन स्तर पर उसका तबादला कर दिया गया था। सालभर से ज्यादा समय बीत गया है. लेकिन वो रिलीव नहीं किए गए हैं। 

कलेक्टर के इतने कड़े पत्र और शासन स्तर पर ट्रांसफर के बाद भी उसका उसी जिले में जमे रहना बड़े अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को चिढ़ाने के लिए पर्याप्त है। उसके खिलाफ जांच में पाया गया कि वह मुख्यालय के बजाए राजधानी में रहता है। तबादला आदेश की तामीली के लिए स्थानीय विधायक ने भी शासन-प्रशासन से पत्राचार और शिकायतें की, लेकिन इस अधिकारी की सेटिंग की दाद देनी पड़ेगी कि उसका बाल भी बांका नहीं हो पाया है। इस मामले में समाचार पत्रों और टीवी में भी खूब खबरें प्रसारित हुई। इसका भी आज तक कुछ असर नहीं हुआ। कई बार तो ऐसे मौके भी आए जब इस अधिकारी की ओर से दूसरे उच्च और समकक्ष अधिकारियों ने मीडिया से लेकर जनप्रतिनिधियों के समक्ष पैरवी की। विधानसभा तक में उसके खिलाफ सवाल लगाए गए। मीडिया के सवाल और जनप्रतिनिधि के दबाव में मंत्री जी ने भी 15 दिनों के भीतर ट्रांसफर करने का ऐलान कर दिया था। लेकिन अभी तक उसका कुछ नहीं हुआ और वह स्थानीय अनाज व्यापारियों और राइस मिलर्स की नाक में दम किए हुए है। 

इस अधिकारी के ग्रह नक्षत्र भी उसका भरपूर साथ देते हैं। जैसे ही कार्रवाई की बात जोर पकड़ती है। कुछ ना कुछ जरुरी कामकाज का रोडा अटक जाता है। पिछले दिनों उसका तबादला इसलिए रुक गया था कि धान खरीद का सीजन चल रहा था और किसान सीधे खाद्य विभाग के जुड़े रहते हैं। धान खरीद निपटा तो कोरोना आ गया। इस समय भी राशन वितरण से लेकर तमाम काम खाद्य विभाग के जरिए संचालित हो रहे हैं। ऐसे में ट्रांसफर से कामकाज प्रभावित होने की आशंका से पेंच फंस गया। इस जिले में राइस मिल की कस्टम मिलिंग के चावल में भी करोड़ों की फेरा-फेरी उजागर हुई थी। करोडों रुपए का चावल जमा नहीं किए जाने के कारण एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी और खाद्य अफसरों की भूमिका पर सवाल उठे थे। कुल मिलाकर जुगाड़ के साथ-साथ इस अधिकारी की किस्मत भी बुलंद है। जैसे ही कार्रवाई होने की उम्मीद दिखती है, कोई न कोई जुगाड़ फिट हो जाता है और कार्रवाई रुक जाती है। उक्त खाद्य अफसर बड़े-बड़ों को तू डाल-डाल तो मैं पात-पात की तर्ज पर चकमा दे रहा है।

सेवा के बहाने खुद को स्थापित
पीएम केयर में चंदा जुटाने के लिए भाजपा में किचकिच चल रही है। पार्टी के कई इसमें रूचि नहीं ले रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी के गृह जिले कांकेर का हाल यह है कि उन्होंने अलग-अलग समाज के प्रमुखों से पीएम केयर में दान देने की अपील की थी। मगर जिले में प्रभावशाली क्षत्रिय समाज के लोगों ने पीएम केयर के बजाए सीएम कोष में दान दे दिया। जबकि इस समाज के मुखिया महावीर सिंह राठौर हैं, जो कि भाजपा के सीनियर नेता हैं।

राठौर की प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी से नहीं जमती है। ऐसे में उसेंडी की बात मानना उनके लिए जरूरी भी नहीं था। यही नहीं, पार्टी के एक बड़े नेता को पीएम केयर में धन जुटाने का अहम दायित्व सौंपा गया है। मगर नेताजी के बेटे ने खुद एनजीओ का गठन किया और अलग-अलग जगहों से राशि जुटाकर पीपीई किट और अन्य सामग्री बांटना शुरू कर दिया। नेता पुत्र की निगाह अगले विधानसभा चुनाव पर है और वे इसके लिए अभी से तैयारी कर रहे हैं। सेवा के बहाने खुद को स्थापित करने का अच्छा मौका है, वे चूकना नहीं चाहते हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


28-Apr-2020

जिम्मेदारी से बाहर जाकर काम..

छत्तीसगढ़ के दो अफसर अपनी सीधी जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर जिस तरह सोशल मीडिया पर लोगों की मदद करते दिख रहे हैं, वह उन्हें बाकी लोगों से अलग कर रहा है. जिलों के कलेक्टर या एसपी का तो कई किस्म का जिम्मा भी बनता है, लेकिन बिलासपुर के आईजी दीपांशु काबरा , और राजभवन के सचिव, श्रम सचिव सोनमणि बोरा एक-एक ट्वीट देखते ही उस दिक्कत को सुलझाने में लग जाते हैं. सरकारी इंतजाम में ट्विटर पर जवाब देने के बाद भी बहुत से फ़ोन करने पड़ते हैं, तब कहीं जाकर कोई काम हो पता है. लेकिन ट्विटर पर दीपांशु और सोनमणि जिस तरह लगे हुए हैं, वह देखने लायक है. वे न सिर्फ मदद का वायदा कर रहे हैं, बल्कि काम हो जाने पर उसकी जानकारी भी पोस्ट कर रहे हैं. अफसरों का ऐसा उत्साह भी सरकार की छवि बनाता है, लोगों की मदद तो करता ही है।

सोनमणि बोरा को इस अखबार को मिली एक तकलीफ भेजी गयी. किसी ने पुणे से फ़ोन करके 'छत्तीसगढ़Ó अख़बार को बताया था कि वे छत्तीसगढ़ के हैं, पुणे में फंसे हैं, और काने को भी नहीं है. सोनमणि बोरा ने कुछ घंटों के भीतर ही जवाब भेजा- श्रमिक पुणे में केमिकल कंपनी पोस्ट विंस प्रोसेसर में कार्यरत है. श्रमिक से बात किया गया।  प्रारम्भ में उन्होंने भोजन कोई नहीं पहुंचा रहा है ऐसी शिकायत की थी.  इनसे सुपरवाइज का नंबर 7385------- लिया गया उनसे संपर्क करने पर उन्होंने बताया कि 12 अप्रैल को ही श्रमिकों को भुगतान हुआ है और आवेदक जीवन लाल को 12000 रुपये भुगतान किया गया है , इस संबंध में फैक्ट्री मालिक श्री जाधव जी 9881----- से भी संपर्क किया गया उनके द्वारा भी यही जानकरी दी गई। साथ ही नजदीक के राशन दुकान में सामान देने को कह दिया गया है बताया गया, पुष्टि के लिए पुन: श्रमिक से संपर्क किया गया और श्रमिक ने भी स्वीकार किया कि 12000 रुपये 11 य 12 अप्रैल को प्राप्त हुए है. श्रमिक का कहना है कि मैं अकेले पड़ गया हूं इसलिये डर लग रहा है घर वापस जाना चाहता हूँ. उन्हें लॉक डाउन तक घर पर ही सुरक्षित रहने की सलाह दी गई।

बेवजह की बदनामी
सियासी मामले-मुकदमे आखिर में अदालतों तक ही पहुंचते हैं। पत्रकार अर्नब गोस्वामी के खिलाफ तीन राज्यों में दर्ज एफआईआर की सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट में हुई। यह मामला भी सियासी आरोप-प्रत्यारोप का ही है। सभी राज्यों से अलग छत्तीसगढ़ में अर्नब गोस्वामी के खिलाफ रायपुर से लेकर सुकमा तक 101 एफआईआर दर्ज कराई गई थी। सुनवाई से कुछ देर पहले तक पुलिस लिखा पढ़ी करती रही। ऐन वक्त पर पत्रकार को हाजिर होने के लिए नोटिस जारी किया गया। खैर ये तो कानूनी प्रक्रिया है, जिसके तहत कार्रवाई की जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि मामले मुकदमे दर्ज करने से लेकर नोटिस जारी करने तक कानून की किताबें तो जरुर खंगाली जाती होंगी, लेकिन जिरह के दौरान जिस तरह से कोर्ट ने पाया कि एक साथ 101 एफआईआई का कोई औचित्य नहीं है और इसे विधि सम्मत नहीं माना जा सकता, ऐसी स्थिति में राज्य के कानून विशेषज्ञों और सलाहकारों पर सवाल उठना लाजिमी है।  

सभी जानते हैं कि अदालतों में छोटी सी गलती और सियासी नफा-नुकसान के लिए उठाए गए कदमों का बड़ा संदेश जाता है, क्योंकि अदालतों में सुनवाई तथ्यों और सबूत के आधार पर होती है। ऐसे में बारीक से बारीक बिन्दु का अध्ययन जरुरी है। वरना कोर्ट की फटकार भी लग सकती है। फटकार न भी मिले तो दूसरे पक्ष को राहत मिलना भी बड़ी बात होती है। इस केस में भी कानून विशेषज्ञ इस बात से दुखी है कि केवल सियासी और प्रशासनिक सलाह पर कोर्ट कचहरी की कार्रवाई नहीं चलती। उनका मानना है कि अदालती नतीजा अगर पक्ष में है तो कोई बात नहीं, लेकिन खिलाफ में है, तो सभी कानून के जानकारों की भूमिका पर सवाल उठाते हैं। पहले ही छत्तीसगढ़ के कई कानूनी मामलों में पक्ष में फैसला नहीं आने से सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में इस मामले में भी कमजोर कानूनी तैयारी ने एक बार कानूनी सलाहकारों को कटघरे में ला दिया है। वे इसी बात से परेशान हैं कि बेवजह की बदनामी उन्हें मिल रही है। 

कांग्रेस पार्टी में दिल्ली के स्तर पर ऑपरेशन-अर्नब को नामी वकील और कांग्रेस राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा देख रहे थे. वहीं से एक ड्राफ्ट बनकर आया कि पार्टी जगह-जगह ऐसी पुलिस-रिपोर्ट करवाए. अंग्रेज़ी से हिंदी किया गया और पार्टी के हुक्म को पूरा किया गया. पहले भी बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस-रिपोर्ट की ऐसी कार्पेट-बॉम्बिंग के खिलाफ राहत दी हुई है. अर्नब गोस्वामी को तुरंत राहत मिल गयी. जब कई प्रदेशों में एक सरीखी रिपोर्ट दजऱ् होती है, तो सुप्रीम कोर्ट को भी अभियान समझ आ जाता है. कुल मिलकर देश भर में कांग्रेस के खिलाफ ही माहौल बन गया. यह एक अलग बात है कि इसी दौर में छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंहदेव भी मौके पे चौका लगाने रिपोर्ट लिखने थाने पहुँच गए, जो कि कई लोगों का मानना है कि एक मंत्री को नहीं करना चाहिए था। 

दिग्गजों के चक्कर में नेता प्रतिपक्ष नहीं... 
चार महीने बाद भी भाजपा रायपुर नगर निगम में पार्षद दल का नेता नहीं तय कर पाई है। जबकि प्रदेश के अन्य निकायों में चुनाव के थोड़े दिनों बाद ही पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष का नाम घोषित कर दिया था। रायपुर नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष के लिए अभी तक किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई है। 

सुनते हैं कि सांसद सुनील सोनी और पूर्व मंत्री राजेश मूणत अपने करीबी पार्षद को नेता प्रतिपक्ष बनाना चाहते हैं। दोनों ही अड़ गए हैं। यही वजह है कि नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी अब तक खाली है। चर्चा है कि  सुनील सोनी, सीनियर पार्षद सूर्यकांत राठौर को नेता प्रतिपक्ष बनाने के पक्ष में हैं, तो राजेश मूणत, पार्षद मीनल चौबे को पार्षद दल का मुखिया बनाना चाहते हैं। 

पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने अब तक किसी का नाम नहीं लिया है, लेकिन कहा जा रहा है कि वे भी सूर्यकांत राठौर को नेता प्रतिपक्ष बनाने के पक्ष में हैं। पार्षद दल का नेता नहीं चुने जाने से भाजपा निगम के भीतर विपक्ष की भूमिका अदा नहीं कर पा रही है। कोरोना संक्रमण के चलते रायपुर शहर में लॉकडाउन है, तो अब पीलिया का कहर टूट पड़ा है। भाजपा के कई पार्षदों का हाल यह है कि वे अपने वार्ड में जरूरतमंद लोगों को राशन और अन्य जरूरत की सामग्री उपलब्ध कराने के लिए कांग्रेस के नेताओं के आगे-पीछे हो रहे हैं। पीलिया से करीब 5 हजार लोग पीडि़त हैं। इतना सब होते हुए भी भाजपा पार्षदों ने खामोशी ओढ़ ली है। अब नेता ही नहीं तो लड़ाई-झगड़े का सवाल ही नहीं है।

पीडब्ल्यूडी में फेरबदल के मायने 
आखिरकार पीडब्ल्यूडी में बहुप्रतीक्षित फेरबदल हो ही गया। डीके अग्रवाल की जगह विजय कुमार भतप्रहरी को ईएनसी का प्रभार सौंपा गया। सुनते हैं कि अग्रवाल को हटाने के लिए सालभर पहले ही नोटशीट चल गई थी। भतप्रहरी को अग्रिम बधाई देने वालों का तांता लग गया था। मगर नोटशीट अटक गई थी। इससे परे अग्रवाल निर्विवाद रहे हैं। उनकी साख भी अच्छी रही है। ऐसे में उन्हें हटाने का फैसला आसान नहीं था। लेकिन स्काईवॉक से लेकर एक्सप्रेस-वे में अनियमितता आदि को लेकर अग्रवाल पर भी छींटे पड़ रहे थे। उन पर कामकाज में नियंत्रण न होने का आरोप लग रहा था। 

इन सबके बीच में कुछ दिन पहले एक युवा नेता ने उनके खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा ईओडब्ल्यू को सौंपा था। ऐसे में संकेत मिलने लग गए थे कि देर-सवेर अग्रवाल की बिदाई हो सकती है। ठेकेदारों ने भी इसके लिए जमकर मेहनत भी की थी। ऐसे में सोमवार देर रात को विधिवत आदेश निकला, तो किसी को हैरानी नहीं हुई। खाद्यमंत्री अमरजीत भगत के करीबी एमएल उरांव एसई, सेतु मंडल को अंबिकापुर प्रभारी चीफ इंजीनियर का अतिरिक्त दायित्व सौंपा गया है। उरांव की पदस्थापना से टीएस सिंहदेव के गढ़ में अमरजीत भगत का दबदबा बढ़ा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


27-Apr-2020

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : ऑनलाइन विधानसभा, सम्भावना और आशंका 

ऑनलाइन विधानसभा, सम्भावना और आशंका 

छत्तीसगढ़ विधानसभा के लम्बे समय तक सचिव रहे, और अब भोपाल जा बसे देवेंद्र वर्मा ने एक नया सवाल खड़ा किया है. उन्होंने कल फेसबुक पर लिखा- हमारे देश में कोरोना की वजह से विगत दिनों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों की विधानसभाएं बिना कार्य सम्पादित किये अथवा आपाधापी में बिना चर्चा के एक दिन में चौदह चौदह विधेयक पारित कर स्थगित की गयी. लोकसभा की भी पचास से अधिक् विभिन्न समितियों की बैठकें जो अप्रैल एवं मई माह में प्रस्तावित थी स्थगित कर दी गयी. ऐसी स्थिति में लोकसभा, विधानसभा की वर्चुअल बैठकें शीघ्र आरंभ होना समय की मांग है जिसका श्री गणेश ब्रिटेन में हो चुका है और वहां 21 अप्रैल को संसद की वर्चुअल बैठक भी सम्पादित हुई।

अब अगर उनकी सलाह के मुताबिक छत्तीसगढ़ विधानसभा की अगर ऑनलाइन बैठक होती है तो क्या होगा? एक तो सरकार इस बात को पसंद नहीं करेगी कि कोरोना-मुसीबत से जूझते हुए उसके सर पर विपक्ष भी सवार हो जाये जिसके जिम्मे इस राज्य में तो कुछ है नहीं. दूसरी तरफ दो दिन पहले राजस्थान हिघ्कोर्ट में जैसा हुआ, वैसा भी हो सकता है. वहां वीडियो कांफ्रेंस पर चल रही सुनवाई के दौरान एक वकील साहेब बनियान पहने ही कैमरे के सामने आ गए. जज खफा हो गए, और पेशी बढ़ा दी. अब पता लगेगा कि छत्तीसगढ़ के कोई विधायक गमछे में ही ऑनलाइन विधानसभा में पहुँच गए. वैसे आज देश के हर राज्य के सामने यह रिकॉर्ड बनाने का मौका है कि वहां की विधानसभा ऑनलाइन होने वाली पहली विधानसभा रही।

राधाबाई की रामकोठी काम आई 

छत्तीसगढ़ परंपराओं और रीति-रिवाजों के मामलों में काफी धनी माना जाता है। यहां अच्छे-बुरे सभी तरह की परिस्थितियों के लिए कुछ ना कुछ परंपरा प्रचलित है। खुशी और गम दोनों तरह के वक्त के लिए यहां लोग व्यवस्था रखते हैं। राज्य में नई सरकार बनने के बाद पिछले एक डेढ़ बरस से तीज-त्यौहार और परंपराएं प्रचलित भी हुई हैं। बात चाहे तीजा पोला की हो या फिर पुन्नी मेला की। इनको काफी धूमधाम से मनाया गया। सूबे के मुखिया भूपेश बघेल ने खुद सभी त्यौहारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सभी को याद होगा कि भूपेश बघेल छेरछेरा पुन्नी के दिन खुद सड़क पर निकलकर लोगों से दान लिया था। मान्यता है कि इस दिन दान पुण्य करने से सुख समृद्धि बढ़ती है। दरअसल, छत्तीसगढ़ में मान्यता है कि प्रत्येत किसान अपने घर में रामकोठी रखते हैं। इसमें धान की आमदनी या पैदावार का कुछ हिस्सा रखा जाता है। जोकि आड़े वक्त में काम आता है। यह भी मान्यता है कि रामकोठी कभी खाली नहीं होता। घर में कोई शुभ कार्य के लिए इसी रामकोठी की बचत का उपयोग किया जाता है। इतना ही नहीं परिवार या गांव में सामाजिक कार्य हो या आपदा की स्थिति हो तो हर घर से रामकोठी के अनाज का उपयोग किया जाता है। मुख्यमंत्री ने छेराछेरा मांगते समय रामकोठी का स्मरण कराया था, तब से रामकोठी एक बार चर्चा में था और लोग अपने पुरखों की परंपरा को बनाए रखने रामकोठी में अनाज या बचत का हिस्सा रखते हैं। आज जब पूरा विश्व कोरोना के संकट से जूझ रहा है। ऐसे में फिंगेश्वर जनपद के गांव सरगोड़ की एक बुजुर्ग किसान महिला राधाबाई सिन्हा ने इसके महत्व को बढ़ा दिया है। दरअसल उन्होंने इसी रामकोठी से कोरोना की लड़ाई के लिए दस हजार रुपए मुख्यमंत्री सहायता कोष में जमा करवाई है। 85 साल की राधाबाई सिन्हा अपने पुरखों द्वारा तैयार की गई रामकोठी को सहेजे हुए है। इस कठिन समय में वे मदद के लिए आगे आई हैं।  कोरोना महामारी के चलते इस साल गांवों में धार्मिक, मांगलिक और दूसरे आयोजन नहीं हो रहे हैं। ऐसे में रामकोठी की वह राशि जिससे जरूरतमंदों की मदद में खर्च की जानी थी, मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराया है। छत्तीसगढ़ खेती किसानी वाला राज्य है और इस काम भी सूखा-बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा का भी सामना करना पड़ता है। इस बुजुर्ग किसान महिला ने कोरोना के खिलाफ इस भागीदारी के जरिए बड़ा संदेश दिया है। (rajpathjanpath@gmail.com)


26-Apr-2020

पुरानी कहानी पर नई फिल्म
बात तीस साल पुरानी है रायपुर शहर में एक आबकारी अफसर के यहां छापा पड़ा। अफसर के परिजनों ने नोटों से भरा बैग पड़ोसी के घर फेंका, मगर यह भी छापामार अफसरों की निगाह से नहीं बच पाया और बैग जब्त हो गया। आप सोच रहे होंगे कि पुरानी बातों का यहां जिक्र क्यों हो रहा है? वो इसलिए कि कुछ इसी तरह का वाक्या दोबारा हुआ है। फर्क इतना है कि नोटों से भरा बैग तो बच गया, लेकिन इसमें से नोटों के कुछ बंडल गायब हो गए, जिसको लेकर अभी तक किचकिच चल रही है।
 
हुआ यूं कि कुछ समय पहले नामधारी लोगों के यहां छापा पड़ा था। इनमें से एक को छापेमार दल के आने की सूचना मिल गई, आनन-फानन में परिवार के एक सदस्य ने नोटों से भरा सूटकेस पड़ोसी के यहां फेंक दिया। जब सब कुछ निपट गया, तो दो-तीन दिन बाद नामधारी पड़ोसी के यहां पहुंचा। उसे बैग जैसे का तैसा मिला। 

पड़ोसी ने अपना धर्म निभाया और सूटकेस का पूरा ध्यान रखा। नामधारी, पड़़ोसी के गले लगकर इस उपकार का धन्यवाद दिया। बात यही खत्म नहीं हुई, नामधारी ने बाद में सूटकेस में रखे नोटों की गिनती की, तो इसमें करीब आधा सीआर नोट कम निकले। नामधारी ने पड़ोसी से इसको लेकर पूछताछ की, तो पड़ोसी ने अनभिज्ञता जताई। 

थोड़ा बहुत नोट होता, तो कोई बात नहीं थी। पूरा आधा सीआर गायब हो गया। नामधारी की दिक्कत यह है कि इसको लेकर वह कानूनी मदद लेना तो दूर, किसी को बता भी नहीं पा रहा है। एक-दो ने हस्तक्षेप भी किया, मगर कुछ नहीं हुआ। अब पड़ोसी से रिश्ते में खटास आ गई है। मगर करे क्या, कालाधन तो काला ही होता है। पड़ोसी ने सूटकेस सुरक्षित रख इज्जत भी तो बचाई है। 

  ..पहले भी आ सकते थे मगर... 
सरकार के एक मलाईदार निगम के प्रमुख अफसर लॉकडाउन की वजह से तमिलनाडु में फंस गए। महीनेभर बाद किसी तरह अनुमति लेकर अब सड़क मार्ग से वापस आ रहे हैं। उनके आने-जाने का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। हुआ यूं कि अफसर पड़ोसी राज्य में खेलकूद के लिए गए थे। वहां उनका कंधा लचक गया। अफसर को यहां के डॉक्टरों पर भरोसा नहीं था, उन्होंने तमिलनाडु की तरफ रूख किया, तब से वहां फंसे हैं।
 
सुनते हैं कि अफसर अनुमति लेकर पहले भी सड़क मार्ग से आ सकते थे। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। अंदर की खबर यह है कि निगम में एक बड़े बिल को लेकर किचकिच चल रही थी। अफसर उसे क्लीयर नहीं करना चाहते थे। लिहाजा, उन्होंने मार्गदर्शन के लिए शासन के पास भेज दिया और खुद लॉकडाउन में फंसे रहे। इसी बीच उन्हें सूचना मिली कि भुगतान को हरी झंडी मिल गई है। पार्टियों को भुगतान करना बाकी है। उन्होंने तुरंत कोशिश कर रायपुर आने की अनुमति प्राप्त कर लिया। मोटा भुगतान है। ऐसे में पार्टियां सेवा सत्कार के लिए स्वाभाविक तौर पर तैयार रहती हैं। ऐसे में अफसर क्यों पीछे रहे। 

गाली नहीं प्यार मिला
कोरोना महामारी के इस दौर में पुलिस को कई तरह की चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। कानून व्यवस्था के साथ लॉकडाउन और सार्वजनिक स्थानों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराना मुश्किल टॉस्क है। चौक-चौराहों और सड़कों पर बेवजह घूमने वालों पर कार्रवाई करना, डॉक्टरों और मेडिकल स्टॉफ को सुरक्षा देना जैसे कई काम एक साथ पुलिस के ही जिम्मे में आ गया है। हालांकि छत्तीसगढ़ में दूसरे राज्यों की तरह पुलिस और मेडिकल स्टाफ पर हमले की खबर नहीं मिलना राहत की बात है, लेकिन इन सब कामों में कड़ाई करने के कारण सीधा असर छवि पर पड़ता है और गालियां ही मिलती है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस की अच्छी छवि बनी है। पुलिस के जवान और निचले स्तर के कर्मी भी इससे काफी खुश है। दिन रात हर मौसम सड़कों पर ड्यूटी करने वाले जवानों के प्रति सम्मान का भाव जगा है। पब्लिक से लेकर वीआईपी भी उनके इस काम की तारीफ कर रहे हैं। ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि पुलिस को उनके काम के लिए हर वर्ग के लोगों से सराहना मिले। सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ताओं से लेकर आम व्यक्ति भी पुलिस की मदद के लिए सामने आ रहे हैं। चौक चौराहों में तैनात जवानों को कोई पानी की बोतल दे रहा हैं, तो कोई कोल्ड ड्रिंक दे रहे हैं। इतना ही नहीं उनके खाने पीने के लिए लोग घरों से टिफिन पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इसमें घर की महिलाएं और आसपास के बच्चे भी शामिल हैं। लोगों के मन में पुलिस के प्रति सम्मान से जवान भी गर्व अनुभव कर रहे हैं। उनकी बातचीत और काम करने के तरीके में काफी बदलाव देखा जा रहा है। इस महामारी के दौर में राहत की बात है कि पब्लिक और पुलिस के बीच दोस्ताना व्यवहार कायम हो पाया है। पुलिस के जवान भी इस बात को महसूस कर रहे हैं कि ऐसा पहली बार हुआ कि गाली खाने वालों को प्यार मिल रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह बदलाव लॉकडाउन के बाद भी बना रहेगा। (rajpathjanpath@gmail.com)


25-Apr-2020

कितने इंतजाम करें? 
लॉकडाउन के चलते व्यसन के आदी लोगों को काफी दिक्कतें हो रही है। सुनते हैं कि भाजपा के एक ताकतवर नेता को भी पान मसाले-जरदे की बुरी लत लगी है। उनके लिए पान मसाला-जर्दा का बंदोबस्त करने में पार्टी के लोगों को काफी परेशानी हो रही है। नेताजी संगठन के कर्ता-धर्ता माने जाते हैं। ऐसे में उनके लिए पान मसाले-जर्दा का जुगाड़ करने के लिए कई नेता लगे रहे। नेताजी को विशेष ब्रांड का पान मसाला ही पसंद है। मगर लॉकडाउन की वजह से उनके लिए मनपसंद ब्रांड का पान मसाला नहीं मिल पा रहा था। 

किसी तरह कुछ नेताओं ने थोक व्यापारी के पता ठिकाना ढूंढकर नेताजी के लिए दो-तीन डिब्बा किसी तरह पान मसाला का बंदोबस्त किया। नेताजी भी शौकीन निकले। खाली बैठे-बैठे हफ्ते-दस दिन के कोटे को दो-तीन दिनों में ही खत्म कर दिया। पार्टी के लोग नेताजी के पान मसाले के व्यसन से काफी परेशान हैं। पहले पार्टी ने उन्हें पीएम केयर के लिए राशि जुगाड़ करने का दायित्व सौंप दिया है और अब नेताजी के लिए पान मसाला-जर्दा का इंतजाम करने की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी आन पड़ी है, जो कि पीएम केयर के लिए धन राशि जुटाने से ज्यादा पड़ रहा है।

ठलहा बनिया का करय...
छत्तीसगढ़ी में एक कहावत काफी मशहूर है कि ठलहा बनिया का करय, ये कोठी के धान ल वो कोठी म करय। यह कहावत दरअसल व्यापारियों के लिए है, जो कभी खाली नहीं बैठते। और तो और वे खाली समय में एक कमरे का सामान दूसरे कमरे में रखने का जुगाड़ निकाल लेते हैं। भले ही दूसरों के लिए इसका कोई औचित्य न हो। लॉकडाउन के इस समय में कई लोग ठलहा बनिया हो गए हैं, उनके पास भी कोई काम नहीं है तो एक कोठी के धान को दूसरे में करने में लगे हैं। ऐसा ही नजारा छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में देखने को मिल रहा है, जहां पर एक कोठी के धान को दूसरे कोठी में करने के लिए पानी की तरह पैसे बहाए जा रहे हैं। साल भर पहले रुसा से विश्वविद्यालय को 20 करोड़ रुपए मिले थे। जिसमें से करीब 7 करोड़ रुपए भावी पत्रकारों के लिए स्टूडियो बनाने में खर्च किया गया।  स्टूडियो बनाने के बाद भी 13 करोड़ रुपए बच गए। ऐसे में यहां के अफसरों ने साल भर पहले बने स्टूडियो में ही तोड़ फोड़ शुरु कर दिया। बताया जा रहा है कि लॉकडाउन में यहां की टाइल्स उखाड़ दी गई, जबकि टाइल्स बिल्कुल सही सलामत है। बावजूद इसके यहां नई टाइल्स लगवाई जा रही है। विवि प्रशासन ने लॉकडाउन में ठलहा बनिया की तरह धान को इधर से उधर करने का काम तो ढूंढ लिया, लेकिन उनको कौन बताए कि ठलहा बनिया पाई पाई का सही उपयोग करता है और एक रुपए का भी नुकसान करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। लेकिन पत्रकारिता विवि में तो अफसर करोड़ों रुपए फूंक कर ठलहा बनिया बनने की कोशिश कर रहे हैं। इतना सब कुछ होने के बाद भी उन्हें कोई रोकने टोकने वाला नहीं है। एक तो यहां लॉकडाउन का उल्लंघन करके मजदूरों से काम करवाए जा रहा है, उलटे सरकारी पैसों का खुलकर दुरुपयोग किया जा रहा है। पहले ही इस निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। उससे भी अधिकारियों का मन नहीं भरा तो तोडफ़ोड़ कर करोड़ों का वारा न्यारा करने में तुले हैं। ऐसे उदाहरण और दूसरे विभागों में मिल जाएंगे, जहां सिर्फ सरकारी पैसों की अफरा-तफरी के लिए अधिकारी ठलहा बनिया बनते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसा करने की छूट कैसे मिल सकती है। लोगों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में पिछले कई सालों से सेठों और धन कुबेरों की सरकार थी, तो संभव है कि उस दौर में ठलहा बनिया की परिभाषा बदल गई हो, लेकिन एक बरस से ज्यादा समय से राज्य में खालिस छत्तीसगढिय़ा की सरकार है। ऐसे में तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इस छत्तीसगढ़ी कहावत का सही मायने निकाला जाएगा।

जय वीरु या गब्बर-ठाकुर? 
कोरोना युग में देशभर में जिलों के एसपी कलेक्टर पर बड़ी जिम्मेदारी है। सभी लॉकडाउन और कानून व्यवस्था के साथ कोरोना संक्रमण के खिलाफ अपने-अपने तरीके से लड़ाई लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी एसपी कलेक्टर इस अभियान में जुटे हुए हैं। हालांकि राजधानी होने के कारण पूरी सरकार, पूरा प्रशासनिक अमला और तमाम बड़े लोगों की राजधानी की एक-एक गतिविधियों पर नजर है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। राजधानी रायपुर में भी लॉकडाउन का पांचवा हफ्ता गुजरने वाला है। राजधानी को कोरोना संक्रमण और दूसरे मामलों में सुरक्षित माना जा रहा है। ऐसे में एसपी कलेक्टर को तो क्रेडिट का कुछ हिस्सा जाना ही चाहिए। बड़ा हिस्सा तो सरकार और प्रशासन के बड़े लोगों को जाना तय है। फिर भी दोनों अफसरों ने अपने लिए क्रेडिट का कुछ हिस्सा बचा लिया, यह भी बड़ी बात है। हालांकि कुछ हिस्सा पाने के लिए इन अफसरों को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। राज्य के मुखिया और प्रभावशाली प्रशासनिक अमले के सामने तो ये दोनों अफसर जय-वीरु की जोड़ी की तरह डटे रहे। फ्लैग मार्च और सोशल डिस्टेंशिंग को लागू करवाने के लिए भी दोनों अफसर सड़क पर एक साथ उतरे। 

कलेक्टर-एसपी के बीच जय वीरु का कॉम्बिनेशन वैसे तो काफी पुराना है। रमन सिंह अपने राज में तो कलेक्टर एसपी को इन्हीं फिल्मी किरदारों के अनुरुप तालमेल रखने की हिदायत देते थे, लेकिन उस वक्त विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने इसकी आलोचना की थी। अब जब कांग्रेस सत्ता में है और अफसर जय वीरु की तरह दोस्ती निभा रहे हैं, तो किसी को आपत्ति तो नहीं होनी चाहिए। 

किसी जिले को बर्बाद होना हो, तो वह कलेक्टर और एसपी के बीच झगडे से हो सकता है. और यह झगड़ा पानी में हगे की तरह तुरंत ही सतह पर दिखने लगता है. हर राज्य में ऐसे कुछ मामले होते हैं, और तेज मुख्यमंत्री तुरंत ही किसी एक को हटा देते हैं. जय-वीरू की जोड़ी गब्बर और ठाकुर की जोड़ी की तरह हो जाती है जो अधिकारों के लिए, ये हाथ हमका दे-दे ठाकुर, के अंदाज़ में झगड़ते हैं. 

छत्तीसगढ़ की राजधानी में पिछले 40 बरसों से अच्छी तालमेल वाली जोडिय़ां ही आम तौर पर रही हैं. कुछ जोडिय़ां जरूरत से ज्यादा अच्छी भी रहीं. सुनील कुमार कलेक्टर थे, और सीपीजी उन्नी एसपी, दोनों की दोस्ती भी अच्छी थी, और काम भी अच्छा था. दिक्कत यह थी कि दोनों मलयाली थे. और लोगों के बीच आपस में कोई गोपनीय बात करनी होती थी तो मलयाली में शुरू हो जाते थे. कलेक्टर-एसपी की कहानियां अनंत रहती हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


24-Apr-2020

यहां से आगे कहाँ?
लॉकडाउन खत्म होने के बाद पुलिस में एक छोटा सा फेरबदल हो सकता है। इसमें दो-तीन जिलों के एसपी को बदला जा सकता है। सुनते हैं कि रायपुर एसएसपी आरिफ शेख भी बदले जा सकते हैं। वैसे तो, उनके कामकाज को लेकर किसी तरह की शिकायतें नहीं है। उन्हें  रिजल्ट ओरिएंटेड अफसर माना जाता है। अपने सालभर के कार्यकाल में उन्होंने प्रवीण सोमानी अपहरण कांड जैसे बेहद संवेदनशील और कठिन प्रकरणों को सुलझाया। इसकी काफी तारीफ भी हो रही है। अब ऐसे में उन्हें बदला जाएगा, तो कोई अहम दायित्व ही मिलेगा। कुछ लोगों का अंदाजा है कि आरिफ का अगला ठिकाना परिवहन विभाग हो सकता है।विभाग के मंत्री मोहम्मद अकबर हैं, और आरिफ उनकी पहली पसंद बताये जाते हैं। 

अगला कौन?
पुलिस जवानों को युद्धकला की ट्रेनिंग के लिए 14 साल पहले कांकेर में जंगलवार ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना की गई थी। इस ट्रेनिंग स्कूल में हजारों जवान ट्रेंड होकर नक्सल मोर्चे पर डटे हुए हैं। न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि अन्य राज्यों के जवानों को भी यहां ट्रेनिंग दी जाती है। जवान बसंत पोनवार के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग पाते हैं। पोरवार सेना के रिटायर्ड ब्रिगेडियर हैं और वे पिछले 15 साल से संविदा पर ट्रेनिंग स्कूल में संचालक के पद पर पदस्थ हैं। उनकी संविदा अवधि जल्द ही खत्म होने वाली है। सुनते हैं कि पोरवार की संविदा अवधि बढ़ाने के लिए फाइल भेजी गई थी, लेकिन मंजूरी नहीं मिल पाई है। चर्चा है कि सरकार अब उनकी संविदा नहीं बढ़ाना चाहती है। ट्रेनिंग स्कूल आगे किस तरह काम करेगा, इसका खुलासा नहीं हो पाया है। फिलहाल तो लॉकडाउन की वजह से जवानों की ट्रेनिंग बंद है। 

सरकार की तुरंत प्रतिक्रिया 
इन दिनों सोशल मीडिया की मेहरबानी से उन लोगों को अपने कामों पर जनप्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है जो कि सोशल मीडिया पर चर्चित हैं. लेकिन इसे पूरी प्रतिक्रिया मान लेना ठीक नहीं. बुरी आलोचना करने वाले लोग बिगाड़ करने सामने नहीं आते, और तारीफ करने वाले मौका नहीं छोड़ते. इस तरह सार्वजनिक प्रतिक्रिया अमूमन तारीफ की ओर झुकी रहती है. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोटा में कोचिंग पा रहे बच्चों को वापिस लाने के लिए बसें भेजने की घोषणा की, तो उनकी ट्वीट पर लोगों ने तुरंत तारीफ की बौछार कर दी. लेकिन इस बात को लिखने वाले भी कम नहीं थे कि सिर्फ पैसे वालों के बच्चों को ला रहे हैं, गरीब मजदूरों का क्या? उनको भी वापिस लाएंगे? आलोचना की ट्वीट भी कम नहीं थीं. अच्छा है कि वोट के दिन के पहले भी सरकार को अपने फैसलों को लेकर कम से कम कुछ लोगों की लिखी बातों का पता चलते ही रहता है. भूपेश सरकार के बारे में एक दूसरी बात जिस पर खूब लिखा जा रहा है, वह है शराब को लेकर. अब बहुत से लोग मानने लगे हैं कि एक महीने से ज्यादा तो कोई मेडिकल प्रयोग भी नहीं हो सकता. जब लोग इतने लम्बे वक़्त तक शराब के बिना रह ही चुके हैं, उनकी सेहत और घर की माली हालत दोनों सुधर रहे हैं, तो फिर अब चुनावी वायदे के मुताबिक दारूबंदी कर ही दी जाये !(rajpathjanpath@gmail.com)


23-Apr-2020

हमारे देश के लोग

भोपाल की रहने वाली तेजी ग्रोवर और उनके पति रुस्तम सिंह ग्रोवर वहां फंसे लोगों की मदद में लगे हुए हैं. उनका संपर्क लगातार छत्तीसगढ़  से भी हो रहा है, और उनके लिए भी वे अपनी सीमा से बहार जाकर भी मदद जुटा रही हैं।

आज सुबह उन्होंने फेसबुक पर लिखा- कल शाम पता चला कि 19 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के प्रताप सिंह जी को किराए के मकान से निकाल दिया गया था। वे 22 मार्च को ही भोपाल पहुंचे थे और मात्र एक दिन की दिहाड़ी उन्हें मिल पाई थी कि लॉकडाउन घोषित कर दिया गया। वे मकान मालिक को 1500 अग्रिम किराया दे चुके थे। महीना खत्म हुआ भी न था कि उन्हें और उनकी गर्भवती पत्नी को निकाल दिया गया।

मैंने फ़ोन करके पूछा कि कोई और कमरा उधर मिल रहा हो तो ले लीजिए। ( पत्नी को घबराहट, अपच सब हो रहा है।)

अब सुनिए क्या बोले-वे अभी तो साथियों के साथ झुग्गी में किसी तरह पड़े रहेंगे। आप किराए की व्यवस्था करेंगी तो 3 को लॉकडाउन खुलने से किराया बेकार चला जाएगा। मैंने कहा क्या पता खुलता भी है या नहीं, आप तो ढूंढ लीजिए। उन्होंने हमें कष्ट न देने की गरज़ से मना कर दिया।

कुछ दिन बाद मित्रों से निवेदन करूंगी कि वे इन परिवारों के खातों में सीधे कुछ राशि जमा करवा दें। क्योंकि वे चिंतित हैं कि गांव में जाकर भी वे भूखे ही मरेंगे।

देखिए फल से फल-फूल रहे हैं होटल कारोबारी
लॉकडाइन ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। इस बीच धीरे धीरे मिल रही छूट से कारोबार शुरू होने लगे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि धीरे-धीरे ही सही उद्योग धंधे पटरी पर लौटेंगे, लेकिन ऑनलाइन ट्रेंडिंग और पेमेंट की सुविधा सबसे बड़ी अड़चन दिखाई दे रही है, क्योंकि लोग इसे ज्यादा सुरक्षित और सहूलियत भरा मान रहे हैं। यही वजह है कि पिछले दिनों छत्तीसगढ़ के कारोबारियों ने ऑनलाइन बिजनेस के खिलाफ थाली-घंटी बजाकर विरोध भी किया था। इस विरोध का कितना असर होगा, ये तो कारोबारी ही बता पाएंगे, लेकिन ऑनलाइन बिजनेस ने तो जोर पकडऩा शुरू कर दिया है। राज्य सरकार ने खुद ऑनलाइन सुविधाओं का विस्तार शुरू कर दिया है। दूध, दही और पनीर जैसे उत्पादों के बाद साग-सब्जी की ऑनलाइन डिलीवरी के लिए पोर्टल शुरु हो गए हैं। जाहिर है इससे थोक-चिल्हर व्यापारियों के धंधे पर असर पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि लोगों को एक बार सुविधा की आदत पड़ जाए तो उसे बदलना मुश्किल होता है। फिलहाल तो सुरक्षागत कारणों और सोशल डिस्टेंसिंग के लिए ऐसा किया जा  रहा है, लेकिन आदत पडऩे पर थोक और चिल्हर कारोबारियों के सामने रोजी रोटी का संकट पैदा हो सकता है। हालांकि छत्तीसगढ़ में सरकार का कहना है कि इसमें सभी छोटे-बड़े व्यापारियों को जोड़ा जाएगा। खैर ये तो बाद की बात है, लेकिन फिलहाल तो इस ऑनलाइन कारोबार में भी चंद लोग फल फूल रहे हैं। चर्चा तो यह है कि होटल कारोबार से जुड़े कई बड़े लोग इसमें कूद गए हैं। लॉकडाउन के कारण होटल-रेस्टारेंट तो बंद है, ऐसे में इन लोगों ने होटल से सब्जी-भाजी का धंधा शुरू कर दिया है। अब फल से फलने-फूलने का इससे बड़ा उदाहरण कहां मिल सकता है।

राम भरोसे बीजेपी
छत्तीसगढ़ में लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने वाली बीजेपी सियासी परिदृश्य से एकदम ओझल सी हो गई है। राज्य में अब तक हुए चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा है, लिहाजा पार्टी कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक निराशा तो है, लेकिन फिर भी दुनिया के सबसे ज्यादा सदस्यों वाली पार्टी का दावा करने वाले दल के लोग छत्तीसगढ़ से एकदम से गायब कैसे हो गए हैं, यह बात गले से उतरती नहीं। जबकि पार्टी के राज्य में भारी भरकम सांसद हैं। एक-दो को छोड़ दिया जाए तो बाकियों तो मानो सांप सूंघ गया है। कोरोना जैसी महामारी के दौर में भी उनकी न तो कोई गतिविधियां दिखाई देती है और न ही कोई बयान सुनने-पढऩे को मिलते हैं । खैर, ये पार्टी का अंदरुनी मामला है। इसलिए इस चुप्पी की मीडिया में भी कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हो रही है। गाहे-बगाहे ऐसी चर्चाओं में भाजपाई इसे तूफान के पहले की शांति का नाम दे देते हैं, तो कई अपनी पार्टी को राम भरोसे बताते हैं। जबकि स्थिति तो यह है कि तूफान के इंतजार में बैठे भाजपाई हवा के झोंके में खुद उड़ रहे हैं और जो राम के भरोसे बैठे हैं, उन्हें यह तो पता ही होगा कि छत्तीसगढ़ के लोग उन्हें भांचा मानकर निकल पड़े हैं राम वन गमन पथ पर। अब देखना होगा कि राम किसकी नैया पार लगाते हैं। अपने भांजों की या फिर अपने भक्तों की। 

अंडे का क्या हो?
अंडा खाया जाये या नहीं, मुर्गा-मटन खाया जाये या नहीं इस पर हिंदुस्तान में धार्मिक भावना से भरपूर बहस चलती ही रहती है. अभी छत्तीसगढ़ में इन सबकी बिक्री पर रोक लगी हुई है. प्रदेश में भोजन के अधिकार को लेकर अभियान चलने वाले लोगों ने इस रोक के खिलाफ आवाज़ उठाई है और राज्य सरकार का छपवाया हुआ इश्तहार साथ में  ट्विटर पर पोस्ट भी किया है जो कहता है- अंडा और चिकन से मिलता है उत्तम प्रोटीन, बढ़ती है रोग प्रतिरोधक क्षमता- छत्तीसगढ़ शासन पशुधन विकास विभाग। यह िष्ट: और ट्वीट अभी पिछले ही पखवाड़े सरकार ने छपवाया था, लॉकडाउन शुरू हो जाने के बाद 7 अप्रेल को।(rajpathjanpath@gmail.com)


22-Apr-2020

कोराना युग मीडियाकर्मियों के लिए संकट भरा
इस कोरोना युग में पत्रकार और मीडियाकर्मी चौतरफा संकट से घिर गए हैं। मुंबई में एक साथ 53 पत्रकार कोरोना पॉजिटिव हैं। इसके पहले भोपाल में भी कई पत्रकार कोरोना संक्रमित पाए गए। डॉक्टर, मेडिकल स्टॉफ या दूसरे आवश्यक सेवा के कर्मियों के लिए तो बचाव और सुरक्षा के किट उपलब्ध हैं। आपात स्थिति में परिवार के लिए सरकारी मदद की गुंजाइश है, लेकिन पत्रकारों के पास न तो सुरक्षा के संसाधन हैं और न ही आपात स्थिति में परिवार के लिए राहत की कोई योजना है। फिर भी टीवी के पत्रकार और फोटोग्राफर जान जोखिम में डालकर अपना काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं कोरोना काल में पल पल खतरों के बीच काम कर रहे पत्रकारों के लिए नौकरी बचाना मुश्किल हो रहा है। कई छोटे-बड़े संस्थानों ने मंदी का रोना रोकर कॉस्ट कटिंग तक शुरू कर दी है। लिहाजा पत्रकारों के सामने दोनो तरफ विकट स्थिति है। जबकि सरकारों ने तमाम संस्थानों को सख्त हिदायत दी है कि अपने कर्मचारियों के सुरक्षा के उपाय के साथ उनके भविष्य की योजनाओं पर विचार किया जाना चाहिए। सरकारी निर्देशों का बहुत ज्यादा असर मीडिया संस्थानों में दिख नहीं रहा है। दूसरे तरफ संकट के समय में पत्रकारों को काफी कुछ सीखने समझने का मौका मिल रहा है। प्रेस ब्रीफिंग के लिए मौके पर जाने की जरुरत नहीं पड़ रही है। वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए प्रेस कांफ्रेंस हो रहे हैं, जिससे तकनीक के प्रति जागरुक हो रहे हैं। हालांकि इस युग में नेता-मंत्री और अफसरों के पास वीडियो कांफ्रेंस के आयोजन के लिए तमाम लोग और सुविधा उपलब्ध है, लेकिन पत्रकारों को सब खुद मैंनेज करना पड़ता है, जिससे वे अपडेट हो रहे हैं। इस तरह के कल्चर से आम लोगों के लिए संवाद स्थापित करना आसान हो रहा है। संभव है कि आने वाले दिनों में नेता मंत्री गांव और दूरस्थ इलाकों से जनता के साथ संवाद कर सकते हैं। सीखने समझने की गुंजाइश के बीच मीडिया हाउस में भी इस तरह के आधुनिक संसाधनों के उपयोग का चलन बढ़ सकता है। यह भी पत्रकारों के लिए मुश्किलों भरा साबित हो सकता है। इस स्थिति में स्टूडियो से लाइव या रिकार्डेड इंटरव्यू ज्यादा आसान हो सकते हैं। 

बच्चों की स्मार्ट पढ़ाई !
छत्तीसगढ़ सरकार ने लॉकडाउन अवधि में स्कूली बच्चों की पढ़ाई के नुकसान को देखते हुए ऑनलाइन पोर्टल की शुरुआत की है। पढ़ई तुंहर दुवार नाम से शुरु किए गए इस पोर्टल में वीडियो अपलोड किए गए हैं, लेकिन इस पोर्टल का कितना लाभ मिलेगा, इस पर संशय है। इसके जरिए पढ़ाई करने के लिए छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों के सामने कई तरह समस्या है। अधिकांश बच्चों के पास मोबाइल तो नहीं है, उन्होंने माता-पिता या घर के दूसरे सदस्यों के नंबर दिए हैं। ऐसी स्थिति में उनको पढ़ाई के लिए घर के सदस्यों पर निर्भर रहना पड़ेगा। उसमें भी दिक्कत यह है कि आधे लोगों के पास स्मार्ट फोन नहीं है, वे केवल बातचीत का काम आने वाला फोन उपयोग करते हैं। मान लिया जाए कि उसमें से कुछ स्मार्ट फोन यूज करते भी होंगे तो उनके सामने नेट पैक की समस्या आती है, क्योंकि लॉकडाउन के कारण गरीब और मजदूर वर्ग के लोग नैट पैक की सुविधा कम ही ले रहे हैं। कुछ ले भी रहे होंगे तो उसको निश्चित समय तक चलना भी है। बच्चों के हाथ में गया और एकाध वीडियो देखने में ही पूरा नेट पैक निपट सकता है। कुल मिलाकर ऑन लाइन पढ़ाई के लिए वेबसाइट से बच्चे पढ़ पाएंगे इसकी संभावना तो कम ही दिख रही है। ऐसे समय में कुछ लोग रमन सिंह की स्मार्ट फोन योजना को याद कर रहे हैं। यह योजना चालू होती तो शायद सरकारी स्कूल के बच्चे भी स्मार्ट बन पाते। (rajpathjanpath@gmail.com)


21-Apr-2020

मोर्चे पर अकेली अफसर 
लॉक डाउन में थोड़ी ढील देने के बाद कुछ अफसरों का मंत्रालय में बैठना शुरू हो गया है। मगर राजस्व सचिव रीता शांडिल्य ही एकमात्र ऐसी अफसर हैं, जिन्होंने एक दिन भी ऑफिस नहीं छोड़ा। रीता के पास आपदा प्रबंधन का भी प्रभार है। ऐसे में कोरोना संक्रमण से निपटने की अहम जिम्मेदारी उन पर है। आईएएस की वर्ष-2002 बैच की अफसर रीता शांडिल्य सामान्य प्रशासन विभाग का भी दायित्व संभाल रही हैं। 

वैसे तो रीता के पास भी विकल्प था कि वे बाकी अफसरों की तरह घर में बैठकर फाइलें निपटा सकती थीं और बैठकें ले सकती थीं। मगर वे इक्का-दुक्का अधिकारी-कर्मचारियों के साथ रोजाना मंत्रालय आती थीं और पूरे समय काम में लगी रही। ऐसे समय में जब कोरोना संक्रमण के चलते कई राज्यों का आपदा प्रबंधन गड़बड़ा गया है, रीता की मेहनत से छत्तीसगढ़ आपदा प्रबंधन के मामले में सबसे आगे है। 

मुश्किलें बढ़ेंगी

कोरोना फैलाव रोकने के लिए एहतियात के तौर पर सेंट्रल एसी और कूलिंग सिस्टम को बंद करने के आदेश दिए गए हैं। इससे विशेषकर मंत्रालय के अधिकारी-कर्मचारियों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है।  मंत्रालय के बड़े अफसरों के कक्ष में तो टेबल पंखा लगा दिया गया है। लेकिन छोटे कर्मचारी बिना एसी-पंखे के पसीने से तरबतर काम कर रहे हैं। अभी उपस्थिति बेहद कम है, लेकिन जैसे ही लॉकडाउन खुलेगा, कर्मचारियों की मुश्किलें बढ़ेंगी। 

ताश आवश्यक सामग्री ?
लॉक डाउन के चलते कामकाजी लोगों को घर में समय काटना मुश्किल हो चला है। ज्यादातर लोग टीवी देखकर, किताबें पढ़कर समय गुजार रहे हैं। मनोरंजन के लिए लोग ताश का भी सहारा ले रहे हैं। एकाएक ताश की मांग काफी बढ़ गई है। कई किराना दूकानों में तो ताश नहीं मिल रहा है। ऐसे में किराना दूकानों को ताश सप्लाई कर अच्छा मुनाफा कमाने के फेर में एक व्यवसायी पुलिस के हत्थे चढ़ गया।

हुआ यूं कि व्यवसायी का रायपुर शहर के मध्य में किराने की दूकान हैं। उनके पास ताश का स्टॉक पड़ा हुआ था। पिछले दिनों व्यवसायी ताश को कार्टन में भरकर ले जा रहा था तभी पुलिस ने उन्हें रोक लिया।  कार्टन की तलाशी ली, तो स्वाभाविक था कि उसमें ताश की गड्डियां ही थी। पुलिस ने पूछ लिया कि क्या ताश आवश्यक सामग्री में आता है, जिसकी सप्लाई करना जरूरी हो गया है? व्यवसायी को जवाब देते नहीं बना। इसके बाद पुलिस उसे ले गई। काफी प्रभावशाली लोगों के फोन घनघनाए लेकिन पुलिस टस से मस नहीं हुई। व्यावसायी और उसके परिवारवालों ने काफी अनुनय-विनय किया, तब कहीं जाकर पुलिस ने हिसाब-किताब कर उसे छोड़ा। 

छत्तीसगढिय़ा का भांचा प्रेम
लॉकडाउन पीरियड में रामायण सीरियल का रिपीट टेलीकॉस्ट पहली बार जैसा लोकप्रिय रहा है। अमूमन हर घर में परिवार सहित सीरियल देखने में लोगों की दिलचस्पी देखी गई। रामायण अब अपने क्लाइमेक्स पर है। रावण का वध कर राम अयोध्या पहुंच गए हैं। उनकी इस जीत पर अयोध्यावासी खुशियां मना रहे हैं। त्रेता युग में भगवान राम की जीत का जश्न हजारों-लाखों साल के बाद कलयुग के कोरोना युग में छत्तीसगढ़ में भी देखने सुनने को मिल रहा है। सोशल मीडिया और वाट्सएप पर लोग राम की जीत की बधाई दे रहे हैं। कई लोगों का आचरण तो ऐसा है जैसे उनके किसी अपने या करीबी रिश्तेदार ने लंका फतह कर ली हो। 

दरअसल, पिछले कुछ समय से भगवान राम का छत्तीसगढ़ कनेक्शन खूब प्रचारित हुआ है। मान्यता है कि वनवास काल का बड़ा समय उन्होंने छत्तीसगढ़ में ही बिताया था और राज्य को राम का ननिहाल भी बताया जाता है। इस कनेक्शन के बाद छत्तीसगढिय़ा का भांचा प्रेम जाग गया है और राम को भांचा (भांजा) मानकर लंका विजय की एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं। स्वाभाविक है कि परिवार के किसी करीबी की सफलता पर खुशी तो होती है, लिहाजा यहां भी माहौल ऐसा ही बन गया है। सोशल मीडिया में बधाई संदेशों की बाढ़ आ गई है। 

दूसरी तरफ राज्य सरकार ने भी राम वन गमन पथ और उनके ननिहाल को पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने के लिए खजाना खोल दिया है। कोरोना फैलने के ठीक पहले इस पर तेजी से काम भी शुरू हो गया था। सूबे के प्रशासनिक मुखिया खुद निर्माण कार्य का मोर्चा संभाले हुए थे और उन स्थानों का दौरा कर निर्माण कार्यों की प्रगति का जायजा ले रहे थे। ऐसे में लोगों की भावनाएं कुलांचे मार रही है, तो आश्चर्य की बात नहीं है। सियासतदार भी लोगों की भावनाओं को खूब हवा दे रहे हैं। क्योंकि राम भले ही लोगों की भावनाओं से जुड़े हैं, लेकिन सियासत में तो वे वोट बटोरने के लिए ब्रम्हास्त्र से कम नहीं है। उम्मीद है कि कोरोना युग के निपटने के बाद त्रेता युग के तमाम अस्त्र शस्त्र चुनाव समर तक खूब चलेंगे।(rajpathjanpath@gmail.com)


20-Apr-2020

छत्तीसगढ़ के प्रमुख न्यूरोफिजिशियन डॉ. संजय शर्मा फोटोग्राफी के भी बड़े शौकीन हैं। मरीजों से थक जाते हैं तो कैमरा उठाकर जंगल निकल जाते हैं. फिलहाल यह तस्वीर उनका आम का इंतजार बता रही है !

36 गढ़ी कलेक्टर का मॉडल हिट 
कोरोना संक्रमण रोकथाम के लिए पीलीभीत मॉडल सुर्खियों में है। ऐसे समय में जब देश के कई जगहों पर कोरोना संक्रमण कम्युनिटी स्टेज पर पहुंच गया है। वहां अब कोरोना को नियंत्रित करने के लिए पीलीभीत मॉडल अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने तो सभी जिला प्रशासन को पीलीभीत के तौर तरीके अपनाने के लिए कहा है। 

पीलीभीत को कोरोना मुक्त कराने में वहां के कलेक्टर वैभव श्रीवास्तव की अहम भूमिका रही है। वे बिलासपुर के रहवासी हैं और खालिस छत्तीसगढिय़ा हैं। वे खेल संचालक श्वेता सिन्हा के भाई हैं। कोरोना देश में शुरूआती दौर में था, तब पीलीभीत जिला प्रशासन के पास सूचना आई कि 20 मार्च को सऊदी अरब से उमरा करके करीब 37 लोग पास के ही एक गांव में आए हैं। प्रशासन ने बिना देरी किए सभी लोगों की पहचान कर ली और सभी की कोरोना जांच कराई गई। 22 तारीख को जांच रिपोर्ट आई और इसमें खुलासा हुआ कि दो कोरोना संक्रमित हैं। ये दोनों मां-बेटे हैं। इससे हड़कंप मच गया। उस समय यूपी में गिनती के कोरोना मरीज थे। 

इसके बाद पीलीभीत प्रशासन हरकत में आया और दोनों मां-बेटे को इलाज के लिए भर्ती कराया गया। प्रशासन ने विदेश यात्रा से लौटने की सूचना न देने पर बाकी सभी के खिलाफ एफआईआर करने के आदेश दिए। इसके बाद  सभी विदेश यात्रियों और उनके परिवार वालों को क्वारंटाइन कर दिया गया। वैभव श्रीवास्तव ने तुरंत जिले की सीमा को सील करने के आदेश दिए। आसपास के दो दर्जन गांवों को सेनेटाइज किया गया। जिला प्रशासन और पुलिस ने आम लोगों को भरोसे में लेकर जनजागरूकता अभियान चलाया। 

गांव-गांव और शहर के हर मोहल्ले में प्रशासन और पुलिस के लोगों ने कोरोना से बचाव के तौर तरीके समझाए। जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों को भरोसे में लिया। जिला प्रशासन- पुलिस की मेहनत रंग लाई, तबलीगी जमात के मरकज से कई लोग लौटे, तो खुद होकर सूचना दी। सामाजिक सदभाव बनाए रख मस्जिद और मदरसों को सेनेटाइज किया गया। जिसे भी क्वारंटाइन किया गया, उसने प्रशासन-चिकित्सा स्टॉफ को पूरा सहयोग किया। इसका अच्छा रिजल्ट भी सामने आ गया। मां-बेटे ने कोरोना को मात दे दी और स्वस्थ होकर घर लौट गए। 

लॉकडाउन का सख्ती से पालन किया गया और कोई भूखा न रहे, इसके लिए व्यापक अभियान चलाया गया। सामुदायिक रसोई की स्थापना की गई। समाजसेवी संस्थाओं ने भरपूर सहयोग किया। इसका प्रतिफल यह रहा कि पीलीभीत यूपी का पहला जिला है जो कि कोरोना मुक्त हो गया है। कोरोना को लेकर लोगों में जनजागरूकता इस बात के संकेत दे रहे हैं कि भविष्य में भी जिले में कोरोना को लेकर बुरी खबर नहीं आने वाली है। वैभव श्रीवास्तव की अब तक की मेहनत रंग लाई है और पीलीभीत कोरोना रोकथाम का रोल मॉडल बन गया है।

पत्रकारिता में शह-मात का खेल
मध्यप्रदेश के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में फेरबदल की खबर से छत्तीसगढ़ के लोग चकित हैं। दरअसल, कांग्रेस शासनकाल में कुलपति बनाए गए दीपक तिवारी ने शनिवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 24 घंटे से भी कम समय में यहां प्रभारी कुलपति के साथ पुराने कुलसचिव की वापसी का आदेश जारी हो गया। छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक पत्रकारिता करने वाले संजय द्विेदी की कुलसचिव पद पर वापसी हुई है। लोगों को आश्चर्य इस बात पर है कि जब पूरे देश में कोरोना का कोहराम मचा हुआ है, तब भी अपने लोगों को एडजेस्ट करने का सियासी खेल वहां चल रहा है। जबकि मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल और इंदौर तो कोरोना के हॉटस्पॉट बने हुए हैं। 

मध्यप्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार का गठन तक नहीं हो पाया है। पिछले एक महीने से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अकेले सरकार चला रहे हैं। मंत्रिमंडल का गठन नहीं होना एक बात है उससे महत्वपूर्ण यह है कि वहां का प्रशासनिक अमला तक कोरोना की चपेट में है। ऐसी विषम परिस्थिति में विवाद को जन्म देने वाले आदेश ने लोगों को अचरज में डाल दिया है। इसके विपरीत छत्तीसगढ़ में तमाम परिस्थितियां अनुकूल होने के बाद भी तब के कुशाभाऊ ठाकरे और अब के चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता विवि में एक साल तक स्थायी कुलपति की नियुक्ति नहीं हो पाई थी। नियुक्ति हुई भी तो सरकार की मर्जी के खिलाफ। 

लोगों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की तीन चौथाई बहुमत वाली सरकार को बीजेपी की शिवराज सिंह सरकार से सीख लेनी चाहिए कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी अपनों को उपकृत करने के फैसले तत्काल लिए जाते हैं। लोगों का मानना है कि फैसले लेने में देरी के कारण ही छत्तीसगढ़ में विपरीत विचारधारा के व्यक्ति को कुलपति के रुप में बर्दाश्त करना मजबूरी हो गई है। हालांकि सरकार ने नियुक्ति के बाद तत्परता दिखाते हुए कुलपति की नियुक्ति और पदच्युत करने के नियमों में बदलाव किया, लेकिन बात इससे आगे नहीं बढ़ पाई। इसी दौरान छत्तीसगढ़ सरकार ने विवि का नाम बदलने की भी कार्रवाई की, लेकिन अभी तक नया नाम कागजों से बाहर नहीं आ पाया है। 

याद होगा कि मप्र में कुलसचिव बनाए गए संजय द्विेदी  ने सबसे पहले छत्तीसगढ़ सरकार के इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोला था और राज्य के मुखिया को खुला पत्र लिखकर आलोचना की थी। कयास लगाए जा रहे हैं कि भोपाल में बैठकर छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी सीएम को चुनौती देने के कारण उन्हें कुलसचिव की कुर्सी वापस मिल गई है। ध्यान होगा कि छत्तीसगढ़ के साथ मध्यप्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद कमलनाथ सरकार में संजय द्विेदी से कुलसचिव का प्रभार छीना गया था। इतना ही नहीं उनकी प्रोफेसर पद नियुक्ति के खिलाफ भी शिकायत हुई थी। शिकायत के बाद संभावना जताई जा रही थी कि उनकी प्रोफेसरी जा भी सकती है। उन पर विधानसभा चुनाव में खास विचारधारा के लोगों के पक्ष में काम करने के आरोप भी लगे थे। मप्र के तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी के खिलाफ तक काम करने की शिकायतें सामने आई थी। इसके बावजूद कांग्रेस के एक साल के शासनकाल में उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। बीजेपी की सरकार बनने के चंद दिनों बाद ही वे अपनी पुरानी प्रतिष्ठा पाने में सफल हो गए। 

ऐसे में वे लोग दुखी हैं, जिन्होंने खास विचारधारा के लोगों के खिलाफ मुहिम चलाई थी, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद भी वे किसी का कुछ बिगाड़ नहीं पाए हैं। लोगों को लगता है कि छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विवि में भी ऐसे लोगों की भरमार है, जो खास विचारधारा के माने जाते हैं और उसी योग्यता के कारण नौकरी पाने में सफल हुए थे। लगातार शिकायतों के बाद कार्रवाई तो दूर ऐसे अयोग्य लोगों के मन में सरकारी कार्रवाई और नौकरी जाने का भय तक नहीं बन पाया है और वे अपने पदों पर जमे हुए हैं, सरकार के खिलाफ गतिविधियों में भी शामिल हैं। जाहिर है कि मौका मिलते ही वे फिर से पॉवरफुल हो जाएंगे, जैसा मध्यप्रदेश में हुआ है। छत्तीसगढिय़ा इस बात से चितिंत हैं कि यहां तो पहले ही सरकार की पसंद के खिलाफ कुलपति की नियुक्ति हुई है और मध्यप्रदेश की पत्रकारिता विवि में आक्रामक हिन्दू सोच के लोग फिर से मजबूत हो गए हैं। ऐसे में संभव है कि दोनों मिलकर खिचड़ी पकाने में सफल हो गए तो स्थानीय लोग हाथ मलते रह जाएंगे, क्योंकि कोरोना युग में एमपी में मामा ने शह और मात का खेल तो शुरु कर ही दिया है। (rajpathjanpath@gmail.com)


19-Apr-2020

मासूम बीवी, भूत, और वफादार पति... 

छत्तीसगढ़ में अभी पुलिस ने एक नौजवान को पकड़ा जो कि अलग-अलग लड़कियों और महिलाओं के नाम और तस्वीरों से फेसबुक पोस्ट बनाकर रात-दिन सांप्रदायिक नफरत की बातें पोस्ट करता था. यह तो आज के कॉरोनाकाल की अधिक सावधानी चल रही है इसलिए वह पकड़ा गया, वरना तो सब बढिय़ा चल रहा था. उसके फेसबुक फ्रेंड्स भी लबालब थे, 5000 तक पहुँच रहे थे, सिर्फ एक निशा जिंदल नाम के फेसबुक अकाउंट से. और मजे की बात की उसके 10000 से अधिक फॉलोवर्स भी थे, यानी दोस्ती नसीब नहीं हुई तो फॉलो करने लगे. अब रायपुर में एक पत्रकार युवती ने फेसबुक पर ही बाकी पत्रकारों के मजे लेने शुरू कर दिए हैं कि आप भी निशा जिंदल के दोस्त थे, फॉलोवर थे...!

पुलिस ने भी उसे पकडऩे के बाद कुछ पिटाई के बाद उसकी तस्वीर उसी के फेसबुक पेज पर लगवाई है कि मैं ही निशा जिंदल हूँ. उसके फेसबुक पेज पर बहुत से फैंस  ने बड़ी-बड़ी तारीफें पोस्ट की थीं, और अब लोग सदमे में हैं कि फेसबुक मैसेंजर की राज की बातें सामने आएंगी तो क्या होगा. फिलहाल एक बात सही लग रही है, एक लतीफा अधूरा चल रहा है कि मासूम बीवी, और भूतों का अस्तित्व नहीं होता. इसे सुधारकर लिखना चाहिए- मासूम बीवी, भूत, और वफादार पति, इनका अस्तित्व नहीं होता.

बड़े-बड़े अफसर, बड़े-बड़े पत्रकार निशा जिंदल नाम और चेहरे के पीछे इस भूत के प्रशंसक थे ) फिर अभी इसके बाकी फज़ऱ्ी फेसबुक अकाउंट तो सामने आना बाकी ही है।

अंत भला तो सब भला
कोरोना मरीजों का इलाज कर रहे एम्स के डॉक्टर्स अपना क्वारंटाइन पीरियड एकबार फिर से होटल पिकॉडली में ही बिताएंगे। पूरे विवाद का पटाक्षेप हो गया है। दरअसल शासन, प्रशासन के निर्देश और अलग-अलग फैसलों से स्थिति बिगड़ गई। इसकी शुरुआत उस हिदायत से हुई कि जिसमें कहा गया कि क्वारंटाइन पीरियड में संक्रमण की आशंका रहती है, इसलिए होटल के सेंट्रलाइज्ड एसी को बंद करा दिया गया। इसी तरह डॉक्टरों के डाइट से लेकर पीने के पानी के बारे में निर्देश दिए गए थे। होटल प्रबंधन के लिए नियमों का पालन करना जरुरी था। होटल के लोगों ने मामले को जैसे-तैसे संभाला और व्यवस्था को और दुरुस्त किया। इस बीच प्रशासन को कम रेट पर नई  होटल मिल गई, तो उऩके अधिकारियों ने फरमान जारी कर दिया कि डॉक्टर्स को शिफ्ट किया जाए। इस बात ने आग में घी का काम किया और पूरा ठीकरा होटल प्रबंधन पर फूट गया। बात मीडिया के पास पूरे मिर्च मसाले के साथ पहुंची और अखबारों में बड़ी हेडलाइन के साथ खबर तन गई। टीवी चैनल्स में भी बिग ब्रेकिंग फायर हो गए। दूसरे दिन प्रशासन को भी समझ नहीं आया कि आखिर हो क्या गया ? वे तो इस धोखे में थे कि उनको वाहवाही मिलेगी क्योंकि वे जनता का पैसा बचा रहे हैं। दरअसल, प्रशासन को अंदाजा ही नहीं था कि तवा ज्यादा गर्म है और रोटी जल भी सकती है। स्वाभाविक है उन्हें तो रोटी के जलने के बाद मामला समझ आया।  बात सरकार के प्रमुख लोगों तक पहुंची और पूछताछ हुई तब पूरी पिक्चर साफ हुई कि मामला कुछ था ही नहीं। केवल बैक टू बैक घटनाक्रम ने पूरा रायता फैलाया। इतना सब कुछ होने के बाद भी डॉक्टर्स और प्रशासन दोनों की पहली पसंद यही होटल है, लेकिन कन्फ्यूजन की वजह से मामले ने अलग रुप ले लिया था। यही वजह है कि उसका फिर से उपयोग करने का फैसला लिया गया है। खैर, कहते हैं ना कि अंत भला तो सब भला। 

बड़ों ने झाड़ा पल्ला, फंस गए नेताजी
छत्तीसगढ़ में लॉकडाउन के कारण शराब की तस्करी के मामले लगातार सुनाई दे रहे हैं। अभी जब यह लाइन लिखी जा रही है, राजनांदगाव से 10 लाख की शराब पकड़ी जाने की खबर है. राजधानी रायपुर में पिछले दिनों प्रेस का स्टिकर लगी गाड़ी से शराब की तस्करी का मामला सामने आया। इसी तरह मुंगेली में सत्ताधारी कांग्रेस का एक नेता शराब के गोरखधंधे में लिप्त पाया गया, हालांकि उसके खिलाफ पुलिस ने एफआईआर दर्ज की, और इसकी आंच राजधानी तक पहुंचते-पहुंचते रह गई। चर्चा है कि पकड़े गए नेता ने प्रदेश के सबसे बड़े अधिकारी से संबंध का हवाला देकर धौंस जमाने की कोशिश भी की थी। सरकार के करीबियों और बड़े लोगों से भी संपर्क साधने की खूब चर्चा है। फिर भी वह बच नहीं पाया और पुलिस ने उसकी तमाम एप्रोच की अनदेखी कर कड़ी कार्रवाई की। इस पूरे घटनाक्रम से ये साबित नहीं होता कि सूबे की पुलिस निष्पक्ष और बिना दबाव के काम कर रही है। चर्चा तो यह कि उस पर कई नामी गिरामी लोगों का हाथ था, यही वजह है कि वह बेधड़क इस काम में लिप्त था। जैसा कि अक्सर ऐसे मामले में देखा गया कि बदनामी के डर से बड़े-बड़े साथ छोड़ देते हैं। इस मामले में भी वही हुआ और सत्ताधारी दल के इस नेता की नेतागिरी शुरु होने से पहले ही चौपट हो गई। राजनीति में धरना प्रदर्शन और आंदोलनों के कारण जेल जाने को तो अच्छा माना जाता है, लेकिन सत्ता की आड़ में गोरखधंधा करने वालों की करतूत सार्वजनिक हो जाए, तो जनता के बीच संदेश अच्छा नहीं जाता। इसलिए बड़े से बड़े लोग पल्ला झाडऩे में जरा भी देर नहीं करते। तभी तो कहा जाता है कि दोस्ती बराबर वालों से ठीक होती है। बड़े-बड़ों से ना दोस्ती सही और न ही दुश्मनी। दोनों स्थिति में ही फंसना छोटे को ही पड़ता है। मुसीबत के वक़्त बराबरी के काम आ जाते हैं, छोटे काम आ जाते हैं, लेकिन बड़े? भूल जाओ. (rajpathjanpath@gmail.com)


18-Apr-2020

राज पर्दाफाश
कोरोना प्रकोप रोकने के लिए लॉक डाउन का सख्ती से पालन हो रहा है। लोग भरपूर सहयोग भी कर रहे हैं। मगर एक-दो कॉलोनियों में शराब-शबाब के शौकीन लोग मौका पाकर बाहर चले जा रहे हैं, जिससे  यहां के पदाधिकारी काफी परेशान हैं। उन्हें नियंत्रित करने में काफी दिक्कत हो रही है। ऐसी ही एक बड़ी कॉलोनी में एक कारोबारी की हरकत से नाराज लोगों को पुलिस की मदद भी मांगनी पड़ी। हुआ यूं कि कारोबारी सुरक्षा गार्ड को धमकाकर कार लेकर अक्सर बाहर निकल जाता था। कारोबारी के चाल चलन पर पहले से ही कॉलोनी के पदाधिकारियों को शक था।
 
दो-तीन दिन पहले जब वापस लौटा, तो पदाधिकारियों ने कारोबारी की कार रूकवाई और तलाशी ली। उन्होंने जैसे ही डिक्की खुलवाया, तो वे हक्का-बक्का रह गए। डिक्की में एक महिला थी। इसके बाद कारोबारी और पदाधिकारियों के बीच वाद विवाद बढ़ गया। कारोबारी का तर्क था कि बाहर से किसी के आने पर रोक लगा दी गई है। ऐसे में अपने घरेलू काम के लिए महिला को छिपाकर लाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। बात बढ़कर पुलिस तक पहुंच गई। पुलिस कॉलोनी में पहुंची और फिर कारोबारी को चेताया। भविष्य में गलती दोबारा न करने की चेतावनी देकर पुलिस ने बिना किसी कार्रवाई के छोड़ भी दिया। 

संत स्वभाव का राज... 
वैसे तो लॉक डाउन के चलते शराब दूकानें बंद है। इससे शौकीन परेशान भी हैं। वजह यह है कि उन्हें अपना शौक पूरा करने के लिए तीन-चार गुना अधिक खर्च करना पड़ रहा है। शराब दूकानें बंद होने से भांग की खपत बड़े पैमाने पर हो रही है। शराब की तुलना में भांग थोड़ा आसानी से उपलब्ध हो जाता है और सस्ता भी है। लेकिन शराब के असर से भांग का असर एकदम अलग होता है. बात-बात पर बौखलाने वाले लोग अब अगर एकदम संत स्वभाव के दिखने लगें तो यह भांग का असर भी हो सकता है। 

सुनते हैं कि कुछ दिन पहले तक एक प्रभावशाली नेता तो खुद अपने करीबियों को मुफ्त में शराब दे रहे थे। मगर लॉक डाउन के बीच नेताजी के बंगले में धीरे-धीरे भीड़ बढऩे लगी, तो उन्होंने इसे बंद कर दिया। दूकानें बंद होने से पान मसाले और बीड़ी सिगरेट के शौकीन भी काफी परेशान हैं। कई लोग जिनके पुलिस कर्मी मित्र हैं, उनकी मदद से जरूरत पूरी हो जा रही है। 

अधिक सहूलियत दिक्कत का सामान 
केन्द्र सरकार ने एडवाइजरी जारी कर सेंट्रल एसी-कूलिंग सिस्टम का उपयोग नहीं करने की सलाह दी है, क्योंकि इससे कोरोना का संक्रमण तेजी से फैल सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसको लेकर दिशा निर्देश भी जारी किए हैं। इससे मंत्रालय में काम करने वाले अधिकारी-कर्मचारियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। तेज गर्मी में भी वे एसी का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं और पसीने से तरबतर हो रहे हैं। कुछ लोग इसके लिए पिछली सरकार को कोस रहे हैं। 

ऐसे ही एक जानकार ने खुलासा किया कि जब मंत्रालय बिल्डिंग का निर्माण हो रहा था तब सेंट्रल एसी लगाने की कोई योजना नहीं थी। उस समय गणेश राम भगत मंत्री थे। बिल्डिंग के निर्माण का काम काफी आगे बढ़ गया और रमन सरकार के दूसरे कार्यकाल में आवास पर्यावरण विभाग का जिम्मा राजेश मूणत को सौंपा गया। उन्होंने अफसरों और हॉल में एसी लगाने के बजाए पूरी बिल्डिंग को ही एसी (वातानुकूलित) करने के लिए निर्देश दे दिए। इससे बिल्डिंग की लागत तो बढ़ गई अब जब कोरोना संकट पैदा हो गया है, तो यह दिक्कत का सामान भी बन गया है। (rajpathjanpath@gmail.com)


17-Apr-2020

दाएं हाथ को पता नहीं चलता कि...
जान जोखिम में डालकर कोरोना मरीजों के इलाज में जुटे एम्स के डॉक्टरों-नर्सिंग स्टॉफ के साथ बदसलूकी को लेकर आईएमए में गुस्सा है। होटल पिकाडिली में क्वारंटाइन के दौरान रखे गए डॉक्टरों से रात में होटल बदलने कह दिया गया। होटल का भुगतान नगर निगम के मत्थे डाल दिया गया था, उसने हाथ खड़े कर दिए कि इतने महंगे होटल का खर्च वह नहीं उठा सकता. दिलचस्प बात यह है कि खुद स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने अपनी तरफ से एम्स स्टॉफ के लिए क्वारंटाइन के लिए होटल की व्यवस्था की थी। लेकिन मुनादी तो हो गयी थी, उसका भुगतान कौन सा विभाग करेगा यह तय नहीं था.  महंगे होटल का खर्च वहन करने में सरकारी अमला रास्ता निकालता रहा।

इस महंगे होटल को एम्स के डॉक्टर्स और स्टॉफ के लिए क्वारंटाइन सेंटर बनाने का फैसला लिया गया था चूंकि वह एम्स के एकदम पास था। जिला प्रशासन के अधिकारियों ने प्रस्ताव दिया था कि खाने पीने और रुकने से लेकर तमाम इंतजाम के लिए होटल को साढ़े तीन हजार प्रति रूम के हिसाब से भुगतान किया जाएगा। इस पर होटल प्रबंधन ने भी सहमति जता दी थी। प्रशासन और होटल प्रबंधन के बीच हुए इस समझौते के अनुसार डॉक्टर्स और स्टॉफ को ठहरने यहां भेजा गया। अगले दिन बुधवार को जिला प्रशासन के अधिकारियों ने होटल प्रबंधन को सूचित किया कि मेडिकल स्टॉफ को नजदीक के दूसरे होटल और गेस्ट हाउस में शिफ्ट किया जा रहा है। इसके पीछे प्रशासन की दलील थी कि उन्हें कम दर पर कमरे उपलब्ध हो गए हैं, लिहाजा उन्हें वहां भेजा रहा है। डॉक्टरों को लाने ले जाने का पूरा इंतजाम भी प्रशासन और एम्स प्रबंधन की ओर से किया गया।

पिकाडिली के अलावा दो और होटलों में चिकित्सकों-नर्सिंग स्टॉफ के क्वारंटाइन की व्यवस्था की गई। मगर यहां भी चिकित्सा स्टाफ का अनुभव अच्छा नहीं रहा। उनके लिए होटल के खाने के बजाए टिफिन की व्यवस्था की गई है। यह कहा गया कि होटल का खाना महंगा पड़ता है। यही नहीं, पहले दिन तो बोतल बंद पानी दिया गया, बाद में होटल वालों ने बता दिया कि अब सादे पानी से ही काम चलाना पड़ेगा।  

उद्योगपति रतन टाटा ने देश के सबसे महंगे, अपने मुंबई के  ताज होटल को कोरोना की जंग लड़ रहे डॉक्टर-नर्सिंग स्टाफ को समर्पित कर दिया है ताकि उन्हें कोरोना जंग में किसी तरह की सुविधाओं में कमी महसूस न हो। 

मगर छत्तीसगढ़ में सरकार चिकित्सा स्टॉफ को सुविधाएं उपलब्ध कराना तो दूर, उनका सम्मान भी नहीं रख पाई।दरअसल सरकार के दाएं हाथ को पता नहीं चलता कि बाएं हाथ ने किस हुक्म पर दस्तखत किये हैं। सरकार के भीतर की यह नौबत बार-बार इलाज सी जुड़े फैसलों को बदलवा रही है। एम्स सलाहकार समिति के सदस्य सांसद सुनील सोनी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर स्वास्थ्य मंत्री और विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि सिर्फ एम्स के भरोसे ही कोरोना जांच और इलाज हो रहा है। जबकि राज्य सरकार का एक भी सरकारी अस्पताल जांच और इलाज के लायक तैयार नहीं है। सोनी ने यह भी कहा कि सिंहदेव जो भी कहते हैं, उसका पालन भी नहीं हो पाता है। बहरहाल, एम्स के नर्सिंग स्टाफ के हौसले की तारीफ करनी होगी, जो कि इतना सबकुछ होते हुए कोरोना के खिलाफ  तन-मन से जुटा है, और किसी तरह की बयानबाजी से परहेज कर रहा है । 
 
पिकॉडली होटल से डॉक्टरों को निकाले जाने वाली खबरों पर स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा कि पूरी बात को जानने समझने में कहीं न कहीं चूक हुई है। डॉक्टरों के लिए जिला और नगरीय प्रशासन के माध्यम से पिकॉडली होटल को लिया गया था। इसके लिए रेट भी तय हुआ था, जिसमें खाना वगैरह सब कुछ था। कुछ दिन डॉक्टर वहां रहे भी। अच्छे से रहे, कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई। बाद में कम रेट की एक व्यवस्था हम लोगों को मिली तो विभाग ने उस विकल्प को लिया। स्वेच्छा से विभाग ने डॉक्टरों को शिफ्ट किया, लेकिन पता नहीं ये बात कैसी आई कि होटल प्रबंधन ने ऐसा कुछ किया। उन्होंने कहा कि होटल ने तो हमारा बहुत अच्छा ध्यान रखा। डॉक्टर भी वहां की व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट भी थे। केवल पब्लिक के पैसों के खर्च को देखते हुए हम लोगों ने वहां जाने का निर्णय लिया, जहां कम पैसे में कमरे मिल रहे थे। 

स्टिंग और बहाली
कोरोना के खिलाफ जंग में पुलिस कर्मियों की भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। मगर कुछ घटनाएं ऐसी हो जा रही है जिससे खाकी पर दाग भी दिख रहा है। ऐसे ही एक प्रकरण में पिछले दिनों एक आरक्षक को सस्पेंड भी किया गया था। सुनते हैं कि बाहरी इलाके के थाने में पदस्थ आरक्षक एक प्रकरण को निपटाने के लिए रिश्वत मांगते स्टिंग ऑपरेशन का शिकार हो गया। 

मीडिया में मामला आया, तो एसएसपी ने आरक्षक के खिलाफ कार्रवाई में देर नहीं लगाई। मामला यही खत्म नहीं हुआ। आरक्षक ने अपनी बहाली के लिए भरपूर कोशिश की और उनसे भी संपर्क किया जिसने स्टिंग ऑपरेशन किया था। स्टिंग ऑपरेटर ने बहाली कराने के लिए आरक्षक से ही एक लाख रूपए मांग लिए। अब गेंद आरक्षक के पाले में थी। 

आरक्षक ने भी चतुराई दिखाते हुए बातचीत कर ऑडियो तैयार कर लिया। फिर उसने खुद को पाक साफ बताते हुए प्रमाण के तौर पर ऑडियो टेप आला अफसरों के समक्ष पेश भी किया। परन्तु किसी ने इसमें रूचि नहीं दिखाई। इसके बाद आरक्षक उस राजनेता के पास पहुंचा, जिसकी एसएसपी सबसे ज्यादा सुनते हैं। आरक्षक ने नेताजी को पूरी व्यथा सुनाई। साथ ही प्रमाण के तौर पर ऑडियो टेप भी सुनाई। फिर क्या था नेताजी ने एसएसपी को फोन कर दिया और आरक्षक की बहाली हो गई। 

...जब रावण और केंवट को देखने भीड़ उमड़ी 
दुरदर्शन पर धारावाहिक रामायण चल रहा है। तीन दशक बाद इस सीरियल की लोकप्रियता में कमी नहीं आई है। लोगों के बीच खूब पसंद किया जा रहा है। जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष अशोक बजाज ने रामायण के कलाकारों की बरसों पुरानी तस्वीर साझा की है। उस समय   रावण की भूमिका निभाने वाले अरविंद त्रिवेदी और निषाद राज की भूमिका निभाने वाले कलाकार, दोनों 1991-92 में साथ साथ छत्तीसगढ़ आए थे। वक्त निकाल कर दोनों जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष अशोक बजाज के गृह गांव खोल्हा (अभनपुर) पहुंचे जहां मड़ई मेले का आयोजन चल रहा था। इस दौरान लोगों ने उनका खूब स्वागत किया। 

मड़ई मेले के मंच में उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में रामायण धारावाहिक के डायलॉग भी सुनाये थे। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण कल्चर से दोनों अति प्रभावित हुए थे। मंच में उन दोनों के अलावा जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष अशोक बजाज एवं वर्तमान सांसद सुनील सोनी भी मौजूद थे।


16-Apr-2020

जन्नत की हकीकत

बहुत से अखबारों और पत्रिकाओं में इक्कीसवीं सदी में भी भविष्यफल छपते हैं, आखिर क्यों ना छपें, लोग आज भी कुंडली दिखाकर शादियां करते हैं, महूरत निकालकर घर के बाहर कदम रखते हैं, ऐसे में कुछ चर्चित ज्योतिषी मुफ्त में अपने नाम सहित रोज भविष्यफल छपने को देते है, एक बड़े ज्योतिषी ने तो इस अख़बार को उसके बदले में हर बरस अपना कामयाब पंचांग भी मुफ्त देने का प्रस्ताव रखा था. खैर, आज इसकी चर्चा की जरूरत इसलिए लगी कि छत्तीसगढ़ के एक होनहार कार्टूनिस्ट ने फेसबुक पर एक अख़बार में छापा अपना भविष्यफल दिखाया जिसमें आज विदेशयात्रा का योग दिख रहा है। 
इसे पढ़कर जब भविष्यफल देखा तो और भी मजेदार बातें निकलीं. उसमें छपी कुछ बातें इस प्रकार हैं-
-पश्चिम दिशा में ना जाएँ, जरूरी हो तो काली तिलभात से बनी वस्तु खाकर जाएँ. (मतलब यह कि तिलभात से पुलिस लाठी की मार कम लगेगी? )
- यात्रा का लुत्फ उठाएंगे ! कामकाज में अच्छा मुनाफा होगा ! आज छात्र पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करेंगे !
-आज पूरा दिन तरोताजा रहेंगे, नौकरी में सफलता मिलेगी, व्यापार में धन लाभ होगा, धन सही कार्यों पर खर्च होगा, कार्य में अच्छी सफलता मिलेगी. 
- नौकरी में अच्छा धनलाभ होगा, प्रमोशन के संकेत हैं, व्यापारियों के लिए लाभ की स्थिति है, नौकरी में मान-प्रतिष्ठा, सफलता, प्रमोशन... 
-किसी शादी-विवाह या मांगलिक कार्य में शिरकत करेंगे, कामकाज में अच्छा धनलाभ होगा... 
-छात्रों को प्रतियोगिता में सफलता , कारोबार में वृद्धि... 
-आज विदेश यात्रा का आनंद लेंगे, कामकाज के सम्बन्ध में दूर की यात्रायें संभव, पालिसी, शेयर मार्किट में धन इन्वेस्ट कर सकते हैं... 
-मांगलिक कार्य में सहभागी होंगे, कार्य में सफलता, 
-कामकाज में लाभदायक स्थिति, मांगलिक कार्य में व्यस्त रहेंगे, 
(लेकिन इसके बाद की बात सही भी हो सकती है !)
-आज दांपत्य जीवन में मधुरता रहेगी, परिवार या प्रेमीजनों के साथ अच्छा समय गुजरेगा !
दरअसल भविष्यफल लोगों की जिंदगी में प्लेसिबो इफ़ेक्ट रखता है. जब किसी मरीज को दवा की जरूरत न हो, लेकिन उसे दवा लेने की जिद रहे, तो उसे बिना दवा वाली कैप्सूल दी जाती है, जिसे प्लेसिबो कहते हैं. भविष्यवाणी उसी किस्म की होती है. 
यह अखबारनवीस बहुत पहले एक अखबार में काम करता था. वहां दूर के शहर के एक ज्योतिषाचार्य डाक से लिखा हुआ भविष्यफल भेजते थे. कभी डाक की गड़बड़ी से समय पर भविष्यफल ना पहुंचे तो कंपोज़ीटर ही एक राशि का भविष्य दूसरे में जोड़कर पुराने को ताजा बना देता था. 
सबको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल के बहलाने को ग़ालिब ये खय़ाल अच्छा है...

कमाऊ विभाग के अफसरों की बेचैनी
किसी भी राज्य में आबकारी और रजिस्ट्री विभाग को कमाऊ पूत कहा जाता है। इन दोनों विभागों से राज्य को अच्छा खासा राजस्व मिलता है, इसमें कोई दो राय नहीं है। इन दोनों विभागों के बारे में एक और सार्वजनिक सत्य यह भी है कि यहां काम करने वाले कर्मचारी-अधिकारी भी मोटा माल अंदर करते हैं। लॉकडाउन के समय जब सारे सरकारी दफ्तरों में तालाबंदी है और वर्क फ्रॉम होम लागू है, फिर भी इन दोनों विभाग का महकमा सबसे पहले कामकाज शुरू करने के लिए बेचैन है। ये बेचैनी इस बात का भी संकेत है कि इन विभागों के कर्मचारियों-अधिकारियों की ऊपर की आमदनी बंद हो गई है। यही कारण है कि वे कामकाज शुरु करने के लिए उत्साहित दिखाई पड़ते हैं, जबकि सरकार की चिंता है कि कोरोना के संकट में इन दोनों विभागों में काम शुरू होते ही सोशल डिस्टेंसिंग पूरी तरह से भंग हो जाएगी, लिहाजा वे उचित समय का इंतजार कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि इन दोनों विभागों के अफसर सरकार की मंशा को समझकर भी नासमझ बने हुए हैं और आदेश से पहले ही अपनी तैयारियां शुरु कर देते हैं, ताकि बिना देरी के तुरंत सब शुरू हो जाए। तभी तो कहीं पर शराब दुकानों में सोशल डिस्टेंसिंग के लिए गोले लगाने की तो कहीं बेरिकेड्स लगाने की तस्वीरें वायरल हो रही हैं, तो कहीं कार्यालय को सेनिटाइज करने का काम शुरू कर दिया जाता है। सरकार से ज्यादा अफसरों को अपने राजस्व की चिंता ज्यादा सता रही है। इन उत्साही अफसरों के आदेश और कार्रवाई से सरकार की किरकिरी हो रही है, क्योंकि खाने पीने के शौकीन तो अपने घरों में नशामुक्ति केन्द्र जैसा निर्वासित जीवन जीना सीख रहे हैं, लेकिन विभाग के अफसरों को यह बात सहन नहीं हो रही है और वे हर दूसरे-तीसरे दिन ऐसा कुछ करते हैं, जिससे शौकीनों को उम्मीद की किरण नजर आने लगती है।

कुलपति महोदय को घेरने दांवपेंच
पत्रकारिता विवि के कुलपति बल्देव भाई शर्मा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के फेसबुक पेज पर लाइव आने का विवाद गहराने लगा है। छात्र कांग्रेसियों ने सरकार से इसकी शिकायत की है। मीडिया में खबर आने के बाद कुलपति महोदय ने सफाई दी है कि महत्वपूर्ण यह नहीं है कि किस प्लेटफार्म का उपयोग किया गया है, बल्कि इसमें समाज के लिए दिया गया संदेश महत्वपूर्ण है। इस सफाई के बाद कुलपति जी को घेरने के लिए छात्र कांग्रेसियों ने रणनीति बनाई है। अब उन्हें एनएसयूआई के फेसबुक पेज पर लाइव के लिए इनवाइट करने की तैयारी है। संगठन के पदाधिकारियों को पूरा भरोसा है कि कुलपतिजी संघ की विचारधारा से प्रभावित हैं। ऐसे में वे कांग्रेस के छात्र संगठन के फेसबुक पर लाइव के लिए राजी नहीं होंगे। अगर ऐसा हुआ तो वे साबित करने में सफल हो जाएंगे कि विवि में खास विचारधारा को प्रमोट किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि कुलपति महोदय एनएसयूआई के पेज पर लाइव के लिए राजी हो गए तब तो दांव उलटा भी पड़ जाएगा। खैर, जो भी हो, लेकिन इस एपिसोड में किसका दांव सही होगा और किसका उलटा, यह देखना दिलचस्प होगा।  (rajpathjanpath@gmail.com)


15-Apr-2020

एक तरफ देश भर में छाये कोरोना-संकट की वजह से पुलिस को वैसे भी रात-दिन काम करना पड़ रहा है, उसके ऊपर कहीं लोग महुआ से शराब बनाते पकड़ा रहे हैं, कहीं जुआ खेलते पकड़ा रहे हैं . भिलाई में कल एक उठाईगिरी हो गई और एक कारोबारी की बड़ी रकम चली गयी. पुलिस के मत्थे शहर कस्बों में लोगों की आवा-जाही को रोकना तो है ही, कोरबा जिले के कटघोरा में पुलिस कोरोना का ख़तरा उठाकर भी मरीजों को एम्बुलेंस में बिठाने, जांच करवाने के काम में लगी हुई है. 

इस बीच पुलिस का काम बढ़ाने में किसी को जऱा भी शर्म नहीं आ रही है. अभी राजधानी रायपुर से लगे अभनपुर थाने की एक खबर है कि किसी के घर 12 तारीख की रात 2 बजे बकरे के बाड़े में आवाज आई. इस पर सुनने वाले ने बाड़े के मालिक को फ़ोन किया, वह अपने भाई के साथ पहुंचा, तो दो चोर एक बकरे को मोटरसाइकिल पर लेकर भाग गए, लेकिन बाकी 3 चोर एक और मोटरसाइकिल छोड़कर भागे. मतलब यह कि दो मोटरसाइकिल्स, और पांच चोर ! 5 हज़ार का बकरा लेकर भागे, और एक मोटरसाइकिल छोड़ गए ! छूटी मोटरसाइकिल के नंबर से पुलिस ने आज के आज नया रायपुर और आरंग थाना इलाके के पांच चोरों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया. बकरा भी एक के कब्जे से बरामद करके मालिक को वापिस दिलवाया गया. 

अब सवाल यह है कि दो मोटरसाइकिल्स के पांच मालिकों को 5 हज़ार के बकरे के लिए पुलिस के मत्थे इतना काम लादते शर्म नहीं आयी, जो कि वैसे भी बोझ से लदी हुई चल रही है?

लेकिन लोगों का कहना है कि आने वाले दिन इस किस्म के छोटे-छोटे जुर्म से भरे हुए रहेंगे. लोग बेरोजगार होंगे, और खाली जेब भी. बैठे-ठाले वे कई किस्म के छोटे जुर्म करेंगे. मतलब यह कि कोरोना जाने के बाद भी पुलिस के लिए बोझ छोड़कर जायेगा?

बैगा और परिवार क्वारंटाइन में  

कटघोरा में दो दर्जन कोरोना मरीज मिलने से हड़कंप मचा हुआ है। मरीजों का इलाज रायपुर के एम्स में हो रहा है और तकरीबन सभी की हालत बेहतर है। तब्लीगी जमात से ताल्लुक रखने वाले ये मरीज काफी दहशत में भी थे। बिरादरी के एक युवक के कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद उनसे संपर्क में आए लोग इलाज के बजाए झाड़-फूंक कराने में लग गए। 

सुनते हैं कि क्वारंटाइन में रहने के दौरान इनमें से कुछ लोग पड़ोस के गांव के एक बैगा पास भी गए। बैगा ने झाड़-फूंक कर ठीक करने का दावा किया। ये लोग संतुष्ट होकर लौट आए। झाड़-फूंक के बाद इनका भी सैंपल लिया गया। करीब आधा दर्जन लोग कोरोना संक्रमित पाए गए। अब हाल यह है कि बैगा और उसके परिवार के लोगों को क्वारंटाइन में रखा गया है। हर बीमारी का इलाज करने का दावा करने वाला खुद दहशत में है। 

हनुमान वाला मास्क
कोरोना युग में सोशल मीडिया भी मास्क वाली तस्वीरों से भरा पड़ा है। हालांकि जागरुकता के लिए सेलिब्रिटिज और नेता ऐसा कर रहे हैं, लेकिन फॉलोअर्स कैसे पीछे रह सकते हैं। यही वजह है कि फेसबुक-ट्वीटर की प्रोफाइल पिक्चर से लेकर वाट्सएप के स्टेटस में भी मास्क वाली तस्वीरें छाई हुई हैं । टीवी चैनल के रिपोर्टर और पत्रकार भी मास्क पहनकर लाइव कर रहे हैं। दूसरी तरफ इन दिनों टीवी पर रामायण सीरियल सुबह शाम एक एक घंटे दिखाया जा रहा है। घर-घर में लोग रामायण देख रहे हैं। स्वाभाविक है बच्चों की भी नजर पूरे समय पर टीवी पर टिकी है। रामायण में इस समय हनुमान से लेकर पूरी वानर सेना मैदान पर है। वानर का किरदार निभाने वाले सभी मुंह और नाक में मास्कनुमा मुखौटा लगाए रहते हैं। ऐसे किरदार बच्चों के बीच खासे लोकप्रिय भी होते हैं। इसके पहले जब रामायण का प्रसारण हुआ तो उस दौर के लोगों को याद होगा कि उस समय बच्चों के खेलने के लिए तीर कमान और वानरों के मुखौटों की बाढ़ आ गई थी। तकरीबन हर बच्चों के हाथों में रामायण से जुड़ा ही खिलौना दिखाई देता था। ये उस दौर की बात थी, लेकिन अब समय बदल गया। बच्चे भी हाईटेक हो गए हैं। लैपटॉप-मोबाइल और इलेक्ट्रानिक्स गैजेट्स के जमाने में वे ऐसे खिलौनों से खेलना तो दूर उसके बारे में ठीक से जानते तक नहीं, लेकिन कोरोना युग में रामायण के प्रसारण से उसके पात्रों के बारे में  बच्चे वाकिफ हुए हैं। चूंकि बच्चे सोशल मीडिया और कोरोना युग के हैं तो उनकी बातें और फरमाइश भी अलग ही होगी। वे सवाल करते हैं कि क्या रामायण काल में भी कोई कोरोना जैसी बीमारी फैली थी, जो सभी वानर मास्क लगाए रहते हैं। इसी तरह उनकी फरमाइश की बात करें, तो उसमें रामायण इफेक्ट दिखाई देता है। उन्हें मास्क भी कपड़ों वाला या वैसा पसंद नहीं है, जो आमतौर पर उपलब्ध है। वे तो सेलिब्रेटिस वाला वैसे ही मास्क की डिमांड कर रहे हैं, जिसमें नाक-मुंह ढंका होता है जिसे वे हनुमान मास्क कहने लगे हैं। खैर, फरमाइश और सोच भी समय के साथ बदलती हैं, इसका अनुभव भी लोगों को हो रहा है। यह एक अलग बात है कि कोरोना संकट के इस दौर में बच्चों के तरह तरह के सवालों और ऐसे कनेक्शन जोडऩे से कई माता पिता अपने बाल तो जरुर नोंच रहे होंगे। 


14-Apr-2020

कोरोना के हॉटस्पॉट कटघोरा में सख्ती के लिए छत्तीसगढ़ के दबंग और तेजतर्रार आईपीएस उदय किरण की खासतौर पर तैनाती की गई है। उदय किरण जहां भी पोस्टेड रहे हैं, वे बीजेपी-कांग्रेस नेताओं के साथ-साथ अधिकारियों को खटकते रहे हैं। विवादों से उनका गहरा नाता रहा है। बिलासपुर में बीजेपी के सांसद और मेयर को उन्होंने सीएम के कार्यक्रम में जाने नहीं दिया था, तो वहां पत्रकारों के साथ बदसलूकी के कारण भी वे चर्चा में रहे। नेताओं की बेल्ट से पिटाई और बंदूक तानने के कारण तो हर कोई उनसे खौफ खाने लगा था। महासमुंद पहुंचे तो तत्कालीन विधायक की पिटाई के बाद पूरे प्रदेश में उनकी दबंगई की चर्चा होने लगी थी। उनके खिलाफ डीजीपी, एचएम, सीएम से शिकायत की गई। कुछ लोगों ने तो त्राहिमाम-त्राहिमाम करते हुए हाईकोर्ट में भी याचिका लगाई थी। खैर, अब यही अफसर कटघोरा के लिए ब्रम्हास्त्र साबित हो रहे हैं। कटघोरा के पुरानी बस्ती इलाके में कोरोना का संक्रमण इस कदर फैला हुआ कि सरकार की नींद हराम है। वहां सामुदायिक संक्रमण के खतरे को भांपते हुए पूरे इलाके को सील कर दिया गया है और कर्फ्यू जैसा माहौल है। स्थिति यह है कि पुलिस वाले भी उस इलाके में बमुश्किल जा पाते हैं। पूरे इलाके की निगरानी ड्रोम कैमरे से की जा रही है। ऐसे में लोगों को घरों में कैद रखना बड़ी चुनौती है। लिहाजा, सरकार को ऐसे अफसर की तलाश थी, जिसके नाम का ही लोगों में खौफ हो। ऐसे नाजुक समय में उदय किरण सरकार के क्राइटेरिया में बिल्कुल फिट बैठे हैं, क्योंकि उन्हें डंडा, बेल्ट और बंदूक तानने में खूब महारत हासिल है। खास बात यह भी है कि जिन वीआईपी लोगों को उनका प्रसाद मिला है, वे भी उनको वहां जिम्मेदारी देने की तारीफ कर रहे हैं। ये भी वक्त वक्त की बात है कि जो कभी आंखों की किरकिरी थे, वो आज आंखों का तारा हो गए हैं।  

लालबत्ती के बेचारे
अचानक उभरी कोरोना महामारी के कारण सत्ताधारी दल कांग्रेस के नेता सर्वाधिक हताश और परेशान हैं, क्योंकि यह वक्त उनके पुरस्कार का था। उम्मीद की जा रही थी कि निगम मंडलों की कुर्सियां बंटेगीं और वे पंद्रह बरस बाद सत्ता सुख प्राप्त करेंगे। दावेदार नेताओं ने कुर्सियों पर रुमाल बिछाना भी शुरु कर दिया था, लेकिन अब ऐसा लग रहा है जैसे उन्हीं रुमालों को वायरस ने जकड़ लिया है। बेचारे इन नेताओं के पास इस संक्रमण में मुक्ति के लिए भगवान से प्रार्थना के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। कुछ पदाधिकारी तो शुभ मुहूर्त देखकर पूजा पाठ करने की सलाह तक दे रहे हैं। आमतौर पर नेता पद पाने के लिए खुद पूजा पाठ और हवन करते हैं, लेकिन फिलहाल कोरोना को भगाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। लालबत्ती की चिंता में दुबले हुए जा रहे एक नेता ने दूसरे दावेदार से पूछा कि कोरोना संकट से निपटने के तरीके तो सरकार ढ़ूंढ़ लेगी, लेकिन हमारे अच्छे दिन लाने का कोई उपाय हो तो बताओ। दावेदारी वाले नेता ने ढांढ़स बांधते हुए कहा कि मेरी भी यही चिंता है और उसी के लिए यह उपाय किया जा रहा है। उनका कहना था कि ज्योतिष के अनुसार कोरोना ने राहू केतु की तरह लालबत्ती पर अपनी वक्र दृष्टि डाल दी है। ऐसे में पूजा पाठ करके करोना को भगाने में सफल हो गए, तो लालबत्ती पाने में भी सफल हो जाएंगे। मानो नेताजी का आशय यह था कि जहान है तभी जान है।

मकान मालिक को पद
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अपनी कार्यकारिणी गठित करने में सफल हो गए हैं। हालांकि इसमें उन्हें एक साल से ज्यादा का समय लग गया। एक दिन पहले प्रदेश कांग्रेस की संचार विभाग और प्रवक्ताओं की सूची भी जारी हो गई। इसमें एक्का-दुक्का को छोड़कर करीब-करीब वही पुराने चेहरे हैं, जो पिछली कार्यकारिणी में थे, हालांकि इस सूची में जगह पाने के लिए पार्टी नेताओं की ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, क्योंकि बरसों से कई नेता वहीं के वहीं हैं। उन्हें लगता है कि उनका कद बढऩा चाहिए। उनके बॉडी लैग्वेंज में भी वरिष्ठता के भाव दिखाई देते हैं। संभव है कि संगठन के बड़े नेता उनकी वरिष्ठता को भांप नहीं रहे हैं, या फिर भांपना नहीं चाहते। कुल मिलाकर ऐसे तथाकथित, या स्वघोषित वरिष्ठों के चेहरों पर पद पाने के बाद भी खुशी गायब है। दूसरी तरफ एक-दो नए नेता पदाधिकारी बनाए जाने से काफी खुश हैं, क्योंकि वे सत्ताधारी पार्टी के मीडिया विभाग में आ गए हैं। लेकिन कुछ कांग्रेसियों को उनकी खुशी सहन नहीं हुई, तो मीडिया के सामने पोल खोलना शुरू कर दिया। मीडिया को सूची का विश्लेषण करने के लिए बताया कि गया कि नई सूची में प्रवक्ता बनाए गए एक नेता कांग्रेस के एक बड़े पदाधिकारी के मकान मालिक हैं और एक अन्य दूसरी पार्टी से आने के बाद से लगातार इंतजाम अली की भूमिका निभा रहे थे। अब इन कांग्रेसियों को कौन समझाए कि ये तो पार्टी की पुरानी परंपरा है। पद पाने की बेसिक क्वालिटी है। इसको अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। (rajpathjanpath@gmail.com)