राजपथ - जनपथ

Date : 21-Jan-2020

कुछ मंत्रियों से नाखुश, कुछ से खुश

खबर है कि प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और सीएम भूपेश बघेल कुछ मंत्रियों के परफार्मेंस से नाखुश चल रहे हैं। चर्चा है कि पुनिया ने अपने पिछले प्रवास के दौरान सीएम से मंत्रियों के कामकाज पर बात भी की थी। जिन मंत्रियों का परफार्मेंस खराब बताया जा रहा है, उनमें  बिलासपुर और सरगुजा संभाग के एक-एक और दुर्ग संभाग के दो मंत्री हैं। 

सुनते हैं कि इन मंत्रियों को बदले जाने पर भी विचार किया गया है। हालांकि अभी इस पर प्रारंभिक चर्चा ही हुई है। इन मंत्रियों के प्रभार और उनके अपने विधानसभा क्षेत्र में म्युनिसिपल और पंचायत चुनाव के नतीजों की समीक्षा होना बाकी है। हल्ला यह है कि चुनाव समीक्षा में खरा नहीं उतरने पर चारों में से कम से कम दो को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। फेरबदल बजट सत्र के बाद होने की पूरी संभावना है। 

इससे परे दो-तीन मंत्रियों के कामकाज को बेहतर माना जा रहा है। इनमें नए नवेले कैबिनेट मंत्री उमेश पटेल भी हैं। पार्टी के भीतर यह माना जाता है कि उमेश के विभाग में करप्शन का स्तर दूसरे विभागों की तुलना में कम है। शिकवा-शिकायतों के बाद भी ट्रांसफर पोस्टिंग में उमेश ने पूरी पारदर्शिता बरती। यही नहीं, युवा महोत्सव का सफल आयोजन कर सीएम का भरोसा जितने में कामयाब रहे हैं। 

युवा महोत्सव में करीब 10 हजार प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। राज्य बनने के बाद अब तक का सबसे बड़ा आयोजन था। इसमें पूरी व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद थी कि कहीं से किसी को कोई शिकायत का मौका नहीं मिला। दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले रेलवे ने इसी तरह खेल आयोजन किया था, लेकिन कुछ सौ लोगों के बीच के आयोजन में कई तरह की खामियां रही। हाल यह रहा कि दूषित भोजन के चलते कई खिलाड़ी बीमार पड़ गए। मगर हजारों की संख्या में आए प्रतिभागी युवा महोत्सव की व्यवस्था को काफी सराहते रहे।

खुद सीएम ने प्रतिभागियों के बीच में जाकर उनसे व्यवस्था को लेकर पूछताछ की। प्रतिभागियों के फीडबैक से सीएम खुश नजर आए। यह सब उमेश की लगातार मॉनिटरिंग के बूते संभव हो पाया और उनके सचिव सिद्धार्थ कोमल परदेशी ने भी काफी मेहनत की। प्रशासनिक फेरबदल में परदेशी का कद बढ़ा है और उन्हें पीडब्ल्यूडी जैसे बड़े विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है। ऐसे में देर-सबेर उमेश के विभागों में भी इजाफा हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  

माफिया पर कार्रवाई
प्रदेश में अपराध नियंत्रण के लिए सीएम-गृहमंत्री ने पुलिस को फ्री हैण्ड दे दिया है। उन्होंने माफियाओं पर सख्त से सख्त कार्रवाई के लिए दिशा निर्देश दिए हैं। मगर सत्तारूढ़ दल के कई प्रभावशाली नेता ही ऐसे लोगों को बचाने में जुटे हैं। ऐसे ही एक प्रकरण में सत्ताधारी दल के एक सीनियर विधायक को भूमाफिया का बचाव करना काफी महंगा पड़ गया।

हुआ यूं कि पुलिस ने कुख्यात भूमाफिया की घेरेबंदी की, तो उसने विधायक के निवास में डेरा डाल दिया। पुलिस को तो सख्त निर्देश हैं, फिर क्या था पुलिस ने विधायक निवास को ही घेर दिया था। हड़बड़ाए विधायक ने यहां-वहां फोन लगाया, लेकिन कहीं से कोई राहत नहीं मिली। आखिरकार एक ताकतवर मंत्री के कहे हुए पुलिस वहां से हटी, और भूमाफिया को अपने घर से निकाला गया। उस दिन तो भूमाफिया तो बच निकला, लेकिन कुछ दिनों बाद रायपुर पुलिस ने आखिर उसे दबोचकर ही दम लिया। हुआ यह भी है कि मध्यप्रदेश में कांगे्रस सरकार जितने आक्रामक तरीके से तरह-तरह के भूमाफिया, हनीट्रैप माफिया, अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, उससे भी छत्तीसगढ़ में सरकार पर एक दबाव पड़ रहा है कि वह भी ऐसे छंटैल लोगों के खिलाफ कुछ तो करे।

हिंदी प्रदेश में हिंदी का हाल
छत्तीसगढ़ हिन्दीभाषी प्रदेश है, और यहां की हिंदी बेहतर भी मानी जाती है। लेकिन राजधानी रायपुर को देखें, तो राज्य सरकार, और म्युनिसिपल ने पिछले पन्द्रह-बीस बरस में जगह-जगह गेट बनाकर उन पर कुछ महान लोगों की लाईनें लिखी हैं, उनमें जगह-जगह हिज्जों की गलतियां दिखती हैं। इसके अलावा सड़क और चौराहे जिन नामों पर हैं, उनके हिज्जों में भी गलतियां खटकती हैं। भगत सिंह के नाम पर से ऊपर की बिंदी गायब दिखती है, और देश की महानता की कविताओं की लाईनें गलत लिखी गई हैं। अब राज्य सरकार और म्युनिसिपल की स्कूलों में सैकड़ों हिंदी-शिक्षक-शिक्षिकाएं हैं। कॉलेजों में भी हिंदी पढ़ाने वाले लोग हैं जो कि ऐसी गलतियों के सामने से रोज निकलते हैं, लेकिन भाषा की गलतियां सुधारने की कोई कोशिश नहीं दिखती। जो हिंदी भाषा का ही कमाते-खाते हैं, वे भी इस बारे में बेफिक्र रहते हैं। 

ये तो बात सरकारी बोर्ड की हुई, लेकिन निजी दुकानों के बोर्ड और होर्डिंग पर भी हिंदी और अंगे्रजी की गलतियां ही गलतियां दिखती हैं, और लोग इसे अनदेखा करके आते-जाते रहते हैं कि गलतियां सुधारना उनका काम तो है नहीं। नतीजा यह होता है कि स्कूल आते-जाते बच्चे भी इन गलतियों को सीखते चलते हैं, इन्हें ही सही मानने लगते हैं। 

इन दोनों से अलग एक बड़ी दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे हिंदीभाषी प्रदेशों से लेकर महाराष्ट्र जैसे मराठीभाषी बहुत से प्रदेशों तक ट्रक-कार जैसे गाडिय़ों पर जो शब्द सबसे अधिक गलत लिखा दिखता है, वह आशीर्वाद है। गाडिय़ों पर माँ-बाप का आशीर्वाद जैसी बातें लिखी दिखती हैं, और अधिकतर जगहों पर आशीर्वाद को आर्शीवाद लिखा जाता है। अब पेंटरों ने यह गलती कहां से सीखी इसका पता लगाना तो नामुमकिन है, लेकिन हिंदी को चाहने वाले कुछ लोग पेंटरों के पास रूककर उनकी गलतियां सुधारने का योगदान तो दे ही सकते हैं।


Date : 20-Jan-2020

आखिर मदनवाड़ा-जांच
आखिरकार भूपेश सरकार ने दस बरस पुराने मदनवाड़ा नक्सल प्रकरण की जांच के लिए आयोग के गठन का फैसला लिया है। राज्य के पूर्व लोकायुक्त जस्टिस शंभूनाथ श्रीवास्तव आयोग के मुखिया होंगे। मदनवाड़ा नक्सल हमले में राजनांदगांव के तत्कालीन एसपी विनोद कुमार चौबे समेत 29 जवान शहीद हो गए थे। इस पूरे प्रकरण पर पुलिस के आला अफसरों की रणनीतिक चूक भी सुर्खियों में रही है और इसके लिए तत्कालीन आईजी मुकेश गुप्ता निशाने पर रहे। मगर मुकेश गुप्ता को इस घटना के बाद गेलेन्ट्री अवार्ड मिल गया था। 

कांग्रेस नेता और पूर्व एसपी चौबे के परिजन बरसों से प्रकरण की न्यायिक जांच की मांग करते रहे हैं और जब आयोग के गठन की घोषणा हुई, तो भाजपा ने सरकार के इरादे पर ही सवाल खड़े कर दिए।  खैर, आयोग के अध्यक्ष जस्टिस शंभूनाथ श्रीवास्तव की साख काफी अच्छी रही है। उन्होंने प्रमुख लोकायुक्त के पद पर रहते कई अहम आदेश पारित किए थे। जस्टिस श्रीवास्तव ने पिछली सरकार में बेहद ताकतवर रहे पुलिस अफसर मुकेश गुप्ता के खिलाफ शिकायतों की पड़ताल की थी और 30 पेज की जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। 

गुप्ता लोक आयोग के समक्ष हाजिर नहीं हुए। जांच रिपोर्ट में मुकेश गुप्ता के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को सही पाया गया था और इसकी सीबीआई जांच की अनुशंसा की गई। ये अलग बात है कि जांच रिपोर्ट मिलने के बाद रमन सरकार के हाथ-पांव फूल गए और जीएडी में चार माह तक आयोग की अनुुशंसा धूल खाते पड़ी रही। इसी बीच लोकायुक्त की रिपोर्ट के खिलाफ मुकेश गुप्ता हाईकोर्ट चले गए और  कोर्ट से उन्हें राहत मिल गई। फिलहाल प्रकरण पर रोक लगी हुई है। अब जस्टिस शंभूनाथ श्रीवास्तव प्रकरण की जांच करेंगे, तो मदनवाड़ा का सच सामने आने की उम्मीद है। लोगों का अंदाज यह भी है कि इससे मुकेश गुप्ता की मुश्किलें और बढ़ सकती है। 

कुलपति को चुनौती के पीछे कौन?
छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विवि में पढ़ाई-लिखाई तो पहले से ही भगवान भरोसे है, अब तो यहां का कामकाज भी भगवान भरोसे है। लगता है न कोई बोलने वाला है और न ही टोकने वाला। अब इस वाकये को ही लीजिए जिसमें विवि के एक शिक्षक ने यहां के प्रभारी कुलपति को कोर्ट की नोटिस भेज दी और नोटिस भी ऐसी वैसी नहीं बल्कि उनकी नियुक्ति को लेकर। जिसमें कहा गया है कि संभाग आयुक्त को शासन ने 6 महीने के लिए कुलपति का प्रभार दिया था। छह महीने का समय बीत गया तब वे असंवैधानिक रूप से कुलपति के प्रभार पर बने हुए हैं। शिक्षक ने अदालत से मांग की है कि संभाग आयुक्त को प्रभारी कुलपति पद से हटाया जाए और उन्हें (स्वयं को) इस पद पर नियुक्ति दी जाए, क्योंकि वे सर्वाधिक काबिल और अर्हता पूरा करने वाले शिक्षक हैं। पत्रकारिता के इस शिक्षक को कौन बताए कि शासन ने नियमित कुलपति की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने तक प्रभारी कुलपति का कार्यकाल बढ़ा दिया है। फिर भी वे कोर्ट पहुंच गए। आलम यह है कि शिक्षक महोदय विवि में सीना तानकर घूम रहे हैं और लोगों को बता रहे हैं कि उन्होंने प्रभारी कुलपति को हटाने के लिए कानूनी लड़ाई छेड़ दी है और देर सबेर उनकी नियुक्ति हो जाएगी। खैर, फैसला जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि विवि के शिक्षकों का अपना जलवा है, लेकिन प्रभारी कुलपति की नियुक्ति करने वाले शासन में बैठे लोग अब तक चुपचाप हैं, यह बात गले नहीं उतर रही है। कुछ लोगों का कहना है कि इन शिक्षक महोदय को संघ का समर्थन है। अगर, ऐसा है तो और बड़ी बात है, क्योंकि साल भर से राज्य में कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस सरकार में कोई संघ के समर्थन से ऐसा कर रहा है या इसके पीछे किसी फूल छाप कांग्रेसी का हाथ है, इस पर परदा उठना बाकी है।

काले जादू की दुकान...
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के चौराहों पर इन दिनों मजदूरी पर रखे गए लोग एक विजिटिंग कार्ड रूके हुए लोगों के बीच बांट रहे हैं। यह कार्ड किसी मूसा पठान बंगाली नाम के आदमी का है जिसका फोन नंबर भी इस पर दिया गया है। इसमें इस आदमी को विश्व का नंबर एक तांत्रिक बताया गया है, और काले व रूहानी इल्म का माहिर भी। यह कार्ड दावा करता है कि नौकरी, कारोबार, किया-कराया, गृहक्लेश, मनचाही शादी, सौतन-दुश्मन से छुटकारा, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका वश में करवाना, वशीकरण मुठकरणी करवाना या तोड़वाना, सभी समस्याओं का समाधान गारंटी के साथ। अब यह दावा अपने आपमें कानून के खिलाफ है जिसमें जादू को गैरकानूनी माना गया है। लेकिन छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में हर बरस बड़ी संख्या में महिलाओं को टोनही-जादूगरनी कहकर मारा जाता है, उन पर हमले होते हैं, उनका सामाजिक बहिष्कार होता है। अंधविश्वास में इस तरह डूबे हुए देश में जादू-टोने का ऐसा दावा करने वाले लोग कमा भी रहे हैं, खा भी रहे हैं। फिलहाल रायपुर में जो कार्ड बंट रहा है उसमें पीछे की तरफ गुरूमुखी लिपि में भी यही बातें छपी हैं, याने मूसा पठान बंगाली पंजाब में भी लोगों को अपने हुनर का झांसा देकर या तो आया है, या यहां से उधर जाएगा। अब ऐसे खुले प्रचार के बाद भी पुलिस इन लोगों पर, ऐसे लोगों पर कोई कार्रवाई करती है या नहीं, पता नहीं। 

अदालती फैसला और समझबूझ
वैसे अभी त्रिपुरा हाईकोर्ट का एक ऐसा फैसला सामने आया है जो कि देश भर में बड़बोले अफसरों के लिए मददगार हो सकता है। नौ और दस जनवरी को इस हाईकोर्ट ने अभिव्यक्ति के आजादी के तहत, खासकर सोशल मीडिया के सिलसिले में यह कहा कि सरकारी कर्मचारी भी वहां पर अपनी राजनीतिक राय रख सकते हैं, और राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल भी हो सकते हैं। अब देश के किसी भी दूसरे प्रदेश में कोई मामला अदालत तक पहुंचने पर त्रिपुरा के इस फैसले की नजीर तब तक काम आएगी, जब तक उस राज्य का हाईकोर्ट, या सुप्रीम कोर्ट इसके खिलाफ कोई फैसला न दे। यह अदालती फैसला दूर तक जाएगा जो कि सरकारी कर्मचारियों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। लेकिन इसके साथ-साथ हर प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को इतना तो याद रखना ही पड़ेगा कि अदालत सिर्फ सजा से बचा सकती है, निलंबन खारिज कर सकती है, लेकिन किस अफसर को किस कुर्सी पर बिठाया जाए, और कहां से हटाया जाए, यह फिर भी सरकार का अपना विशेषाधिकार बने रहेगा, इसलिए लोगों को किसी अदालती फैसले के साथ-साथ अपनी सामान्य समझबूझ का भी इस्तेमाल करना चाहिए। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 19-Jan-2020

डॉक्टर की स्वीकारोक्ति

डॉक्टर की स्वीकारोक्ति - आज अपने डॉक्टर की क्लीनिक में लगी एक मज़ेदार प्रार्थना देखी, जिसमें डॉक्टर लिखते हैं कि यह विडंबना है कि उनकी जीविका दूसरों की बीमारियों पर निर्भर करती है। मैं सोच रहा हूँ कि अगर कभी कोई राजनीतिक व्यक्ति अपने घर के आगे ऐसी ईमानदार स्वीकारोक्ति लगाये तो क्या लिखेगा कि उसकी जीविका कैसे चलती है? क्या खय़ाल है आपका?-ओमप्रकाश व्यास (फेसबुक पर)

अपार जनसमूह का राज...
इन दिनों फोटो में फेरबदल करने के आसान सॉफ्टवेयर के चलते लोग फर्जी तस्वीरें बनाकर उन्हें पोस्ट करते हैं, और अपनी बदनीयत आगे बढ़ाते हैं। जो लोग ऐसा करना नहीं जानते वे किसी एक देश की तस्वीर को किसी दूसरे देश की बताते हुए गलत जानकारी के साथ उसे पोस्ट करते हैं, और झूठ फैलाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, और चैन की नींद सोते हैं। अभी भारत के एक बड़े नेता की सभा में अपार भीड़ दिखाने के लिए नेता के पीछे जो तस्वीर दिख रही थी, उसकी जांच-पड़ताल करने पर पता लगा कि वह कालीन के रेशों की तस्वीर है जो कि रेशों को सिरों की तरह बता रही है। कालीन के रेशे अपार जनसमूह की तरह दिख रहे हैं। लेकिन ऐसी गढ़ी हुई तस्वीर देखकर एकदम से यह मान लेना भी ठीक नहीं है कि यह उस नेता के किसी समर्थक या प्रशंसक की ही गढ़ी हुई है। यह तस्वीर किसी विरोधी की गढ़ी हुई भी हो सकती है जो कि उस नेता को बदनाम करने के लिए बनाई गई हो, और फिर कालीन के रेशों की जानकारी बताते हुए पोस्ट की गई हों। फोटोशॉप के इस जमाने में कुछ भी हो सकता है, अनुपम खेर के एक टीवी शो की कैचलाईन की तरह।

नाजुक भावनाएं घर रखकर आएं... 
शादियों का मौसम चल रहा है और लोगों को एक-एक दिन एक से अधिक शादी में भी जाना पड़ रहा है। लेकिन बड़ी-बड़ी दावतों वाली शादियों में भी कोई यह पूछने या बोलने वाले नहीं रहते कि खाना खाया या नहीं, खाना खाकर ही जाईएगा। लोगों को खाने की इच्छा है तो खाएं, वरना घर जाकर नमकीन-सेंवई पकाकर खाएं। जो लोग ज्यादा संवेदनशील हैं कि मेजबान के कहे बिना वे कुछ खाएंगे नहीं, वे पहले से अपना इंतजाम करके आएं क्योंकि यह कहने का रिवाज अब खत्म हो गया है। अपनी नाजुक भावनाओं को घर छोड़कर जाना चाहिए, और जैसे चौथाई सदी पहले बुजुर्ग बफे डिनर या लंच को बफेलो खाना कहते थे, उसी तरह लोगों को मेज पर रख दिए गए खाने पर गाय-भैंस की तरह टूट पडऩा होता है।


Date : 18-Jan-2020

सरकारी बंगले का मोह

सरकारी बंगले का बड़ा मोह होता है। एक तो बंगला हासिल करना काफी मुश्किल होता है और मिल जाए तो पद जाने के बाद महीनों तक इसका मोह छूटता नहीं। ऐसी ही स्थिति शहर के मेयर बंगले को लेकर देखने को मिल रही है। पुराने मेयर अभी भी बंगले में जमे हुए हैं और नए को बंगले की जरूरत महसूस हो रही है। यह अलग बात है कि दोनों ने अपनी मंशा जाहिर कर दी है। पुराने महापौर का कहना है कि उन्हें भी बंगला 6 महीने लेट से मिला था और 6 महीना तैयार होने में लगा था। इस तरह वे एक साल बाद बंगले में शिफ्ट हुए थे। इसके साथ ही उनका यह भी कहना है कि वे अपने घर में ऑफिस बनवा रहे हैं, जैसे ही काम पूरा होगा, वे बंगला खाली कर देंगे। अब समझने वाले के लिए इशारा काफी है कि नए मेयर को बंगले के लिए कम से कम 6 महीना से साल भर का इंतजार करना ही चाहिए। लेकिन नए मेयर इंतजार के मूड में बिल्कुल नहीं हैं, हालांकि वे भी लगातार कह रहे हैं कि वे बंगला खाली करने नहीं कहेंगे। भले ही उन्हें ऑफिस का कामकाज निपटाने के लिए बंगले की सख्त जरूरत है। यहां दोनों नेता तू डाल-डाल मैं पात-पात की रणनीति पर चल रहे हैं। अब देखना यह होगा कि कौन अपनी मुहिम में सफल होता है। बात यही खत्म नहीं होती, सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी जब दोनों नेता पहुंचते हैं तो भी बंगले का टॉपिक जरूर आता है। वे भले ही न करें, लेकिन समर्थक बंगला का मुद्दा ले आते हैं। अब समर्थकों को कौन समझाए कि जख्मों को जितना कुरेदा जाए, उतने ही हरे होते हैं। एक तो पुराने मेयर को इस बात का भारी मलाल है कि वे दोबारा कुर्सी पर नहीं बैठ पाए और ऊपर से लोग बंगले के पीछे पड़ गए हैं। कुछ लोगों ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा कि पद पांच साल के लिए मिला था, तो बंगले में एक साल और रहने के लिए पात्र हैं।

कलेक्टरी के साथ सलाह मुफ्त

एक युवा आईएएस को लंबे इंतजार के बाद कलेक्टरी मिली, तो स्वाभाविक है कि खुशी हुई होगी और बिना देरी किए पुरानी पोस्टिंग से कलेक्टरी के लिए रिलीव हो गए। पता नहीं कब सरकार का मूड बदल जाए और नया आदेश निकल जाए, इसलिए तो रिस्क लेना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। खैर, नई पोस्टिंग मिलने के बाद लोग बधाई के साथ ज्ञान भी खूब देते हैं। इन साहब को भी लोग सलाह मशविरा दे रहे हैं। कुछ लोगों ने ज्ञान दिया कि अब आप दीनदयाल उपाध्याय पर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन गांधी के बारे में बोलने से बचना पड़ेगा। शायद याद हो तो ये वही युवा आईएएस हैं, जिनकी सीईओ की कुर्सी पिछली सरकार में दीनदयाल उपाध्याय पर सवाल उठाने के कारण गई थी। हालांकि कांग्रेस ने उनकी बातों को हाथों हाथ लिया था। अब कुछ लोग यह भी मान रहे हैं कि कलेक्टरी भी इसी कारण से मिली है। वहीं कुछ लोगों ने उनको यह राय दी कि अभी सावरकर और गोडसे सोशल मीडिया और सरकार में ट्रेंड कर रहे हैं, इनके बारे में बोलने पर हो सकता है कि कुछ बड़ा इनाम मिल जाए। अब ये युवा आईएएस किसकी सलाह पर काम करते हैं और इनाम पाते हैं या सजा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन हम तो यही उम्मीद कर सकते हैं कि लंबे इंतजार के बाद कलेक्टरी पाने वाले इस अफसर को इस बात का अंदाजा तो जरूर होगा कि कौन सी सलाह उनके काम की है और कौन सी नहीं, क्योंकि पिछला अनुभव भी तो उनके सामने है।

नाम बदलना ठीक होगा...

अभी मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के गृह जिले दुर्ग में एक स्कूल में एक थानेदार बच्चों को ट्रैफिक के नियम पढ़ा रहे थे, और उन्होंने कहा कि लोगों को शराब पीकर गाड़ी नहीं चलाना चाहिए, तो हाईस्कूल के कुछ बच्चे खड़े हुए और कहा कि शराब तो पुलिस ही बिकवाती है। अब पुलिस चूंकि सरकार का पहला चेहरा रहती है, इसलिए कुछ भी होने पर लोग उसी को सरकार मान लेते हैं। पुलिस का शराब बिकवाने से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन सरकार की किसी भी बदनामी से वह आसानी से हाथ नहीं झाड़ पाती। अब किसी तरह यह बात आई-गई हुई, लेकिन सरकार और पुलिस विभाग को इस नौबत के बारे में जरूर सोचना चाहिए कि एक थाने का नाम भट्टी रहने से थानेदार को बच्चे भी दारूभट्टी वाला समझ रहे हैं। कम से कम थाने का नाम तो ठेका, भट्टी, अहाता जैसा न रहे, वह पुलिस की अपनी इज्जत के लिए भी ठीक है। एक वक्त शायद भिलाई स्टील प्लांट की फौलाद पिघलाने की भट्टी इस थाने के इलाके में आती होगी, और उस वजह से इसका नाम भट्टी रखा गया होगा। लेकिन ठेका और भट्टी किसी दूसरे संदर्भ में याद करने लायक शब्द नहीं है, लोग इनसे दारू का ही रिश्ता जोड़ते हैं। हालांकि यह थाना उत्तरप्रदेश में नहीं आता है, फिर भी इसका नाम बदला जा सकता है, ताकि यहां के थानेदार भी इज्जत से सिर उठाकर जी सकें।

वैसे किसी नए शहर में दारू की दुकान ढूंढने के लिए लोग एक आसान फॉर्मूला बताते हैं। जानकारों का कहना है कि शहर में एमजी रोड या महात्मा गांधी मार्ग ढूंढ लें, वहां पर दारू की दुकान जरूर रहती है। अब लोग अपने-अपने शहर-कस्बे में इस पैमाने को परख लें।


Date : 17-Jan-2020

भौंरा-गेड़ी तक तो ठीक है, लेकिन...
छत्तीसगढ़ की फिजां में इन दिनों छत्तीसगढिय़ावाद खूब रच बस गया है। सभी की जुबान पर गेड़ी, भौंरा और यहां के तीज त्यौहार का रंग ऐसे चढ़ गया है, मानों वे बरसों से इसके आदी हों। खैर, इसी बहाने राज्य की कला-संस्कृति को तो बढ़ावा मिल रहा है, लेकिन एक छत्तीसगढिय़ा सज्जन इस चक्कर में बुरे फंस गए। दरअसल, छत्तीसगढिय़ा सज्जन लोगों को ज्ञान दे रहे थे कि अब यहां छत्तीसगढ़ी कल्चर और तीज त्यौहार मनाने वालों के कामकाज बनेंगे, इसीलिए गेड़ी चढऩा और भौंरा चलाना सीख लेना चाहिए। दूसरे लोगों को लगा कि वे बात तो ठीक कर रहे हैं, क्योंकि आजकल तो इसी का हल्ला सुनाई देता है और तस्वीरें दिखाई देती है। छत्तीसगढिय़ा सज्जन ने बकायदा ऐलान कर दिया कि अगर कोई हाथ में भौंरा चलाना और गेड़ी चढऩा सीखना चाहता है तो संपर्क कर सकते हैं, वे सीखने में मदद कर सकते हैं। छत्तीसगढिय़ा सज्जन की बातों से दूसरे लोग बड़े हीनभावना से ग्रसित महसूस कर रहे थे कि ये तो नागरिकता प्रमाण पत्र हासिल करने से ज्यादा कठिन शर्त यहां चल पड़ी। अब तो कोई चारा नहीं बचा है। इसी बीच तमाम बातों को गंभीरता से सुन रहे एक दूसरे व्यक्ति ने पूछा कि भाई साहब कि ये सोंटा खाने का क्या सिस्टम है। सोंटा खाने की बात सुनते ही महाशय की बोलती बंद हो गई। दरअसल, छत्तीसगढ़ में गौरा-गौरी पूजा के समय कुश की बनी रस्सी से हाथ में मारा जाता है। जाहिर है कि मार खाना हिम्मत का काम है। भौंरा-गेड़ी तक तो ठीक है, लेकिन सोंटा सभी के बस की बात नहीं है। कई बार इस तरह का खतरा होता है कि अपनी ही गोली रिवर्स हो जाती है। यहां भी कुछ ऐसा ही माजरा देखने को मिला।  लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पिछले दिनों ऐसा सोंटा खाते हुए मीडिया में बड़ी शोहरत पा चुके हैं, इसलिए सोंटे के खिलाफ भी कुछ बोला तो नहीं जा सकता।

आईएएस-आईपीएस खींचतान
आईएएस-आईपीएस अफसरों के बीच छत्तीस का आंकड़ा कोई नहीं बात नहीं है। आईएएस अपने-आपको सुपीरियर ही मानते हैं और वे इसे साबित करने का शायद ही कोई मौका छोड़ते हैं। ऐसे ही पिछले दिनों युवा महोत्सव के दौरान देखने को मिला। हुआ यह कि सूबे के मुखिया इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे थे। इस कार्यक्रम में युवाओं की अच्छी खासी तादाद थी, वे सभी करीब से सीएम की एक झलक पाने के लिए बेताब थे। सभी अपने हाथों में मोबाइल लिए सीएम के नजदीक आने का इंतजार कर रहे थे। इसी बीच सीएम के सलाहकार और आईएएस अफसरों ने सुझाव दिया कि उनको युवाओं के बीच जाना चाहिए। सीएम साहब को इसमें कोई बुराई नहीं लगी तो उन्होंने तत्काल हामी भर दी। जब इस बात की जानकारी सीएम के सुरक्षा में तैनात अफसरों और आईपीएस अधिकारियों को लगी तो उनकी भृकुटी तन गई, क्योंकि भीड़ इतनी थी कि संभालना काफी मुश्किल और ऊपर से सीएम की सुरक्षा का सवाल था। इतना ही नहीं जहां युवाओं के बीच जाना था, वहां की जमीन भी उबड़-खाबड़ थी। ऐसे में वरिष्ठ आईपीएस अफसरों के पास सीएम को वहां जाने से रोकने के लिए भरपूर ग्राउंड था, तो उन्होंने तुरंत सीएम को समझाया कि वहां सुरक्षागत कारणों से जाना उचित नहीं है। अब सीएम साहब ने उनकी बात मान ली। इस बीच सलाहकारों और आईएएस अफसरों को इसकी भनक लगी, तो उन्होंने फिर से सीएम के कान में फुसफुसाया। सभी को लग रहा था कि युवाओं के बीच लोकप्रिय होने का इससे बेहतर मौका नहीं मिल सकता। फिर क्या था सीएम बिना किसी के सुने सीधे पहुंचे गए युवाओं के बीच। फिर वहां का नजारा ही देखने लायक हो गया। युवा सेल्फी लेने के लिए एकदम से टूट पड़े। इसके बाद तो सुरक्षा में तैनात, और आईपीएस अफसरों के पसीने ही छूटने लगे कि वे भीड़ को कैसे मैनेज करेंगे और इसमें कुछ ऊंच-नीच हुई तो गाज पुलिस वालों पर गिरना तय है। जैसे-तैसे कार्यक्रम निपटा तब तमाम पुलिस अफसरों की जान में जान आई। राहत की सांस लेते हुए एक आईपीएस ने कहा कि सलाह देने वाले अफसरों का क्या होगा वे तो बोल के निकल जाएंगे आखिर फंसना तो पुलिस को ही पड़ता है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 15-Jan-2020

अभी प्रदेश का एक बड़ा समारोह, युवा उत्सव, हुआ तो उसमें गांधी के एक बड़े से पोस्टर के सामने एक गरीब नौजवान श्रद्धा से प्रणाम करते हुए दिखा। अब यह तो गनीमत है कि यह छत्तीसगढ़ है, कोई और प्रदेश होता तो हो सकता है कि इस नौजवान की कहीं पिटाई हो जाती कि देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ रहा है। गांधी पर केंद्रित इस आयोजन में यह फोटो अजीम पे्रमजी फाउंडेशन के अवधूत ने खींची।

चाचा-भतीजे की जोड़ी
बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद प्रदेश संगठन में चुनाव होंगे। छत्तीसगढ़ बीजेपी को नया प्रदेश अध्यक्ष मिल सकता है। ऐसे में अध्यक्ष के नामों की चर्चा और लांबिग भी तेज हो गई है। जातीय समीकरण के अलावा सियासी पहलुओं के आधार पर भी नाम सुनने को मिल रहे हैं। कुछ लोगों की दलील है कि प्रदेश अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग से होना चाहिए, तो कई आदिवासी अध्यक्ष की वकालत कर रहे हैं। कांग्रेस ने आदिवासी को अध्यक्ष बनाया है और मुख्यमंत्री पिछड़ा वर्ग से आते हैं। ऐसे में बीजेपी में भी इसी फार्मूले को अजमाने के आसार हैं। पार्टी के भीतर कुछ लोगों को कहना है कि नेता प्रतिपक्ष का पद कुर्मी यानी पिछड़े वर्ग को दिया गया है, तो अध्यक्ष पिछड़े वर्ग से नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद दुर्ग जिले के एक पिछड़े वर्ग के नेता अध्यक्ष बनने के लिए खूब मेहनत कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि सरकार के खिलाफ पूरी ताकत से हमला बोलने के लिए दुर्ग जिले से ही अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री भी इसी जिले से आते हैं और सरकार के कई भारी भरकम मंत्री भी इसी जिले के हैं। सरकार को गृह क्षेत्र से ही घेरने के हिसाब से इसे महत्वपूर्ण एंगल माना जा रहा है। अगर, ऐसा हुआ तो सियासत में नए समीकरण बनकर उभरेंगे और दोनों पार्टियों के लिए केंद्र बिंदु दुर्ग जिला होगा, लेकिन इस जोड़तोड़ में रिश्तेदारी रोडा बनकर सामने आ रही है। दरअसल, प्रदेश के मुखिया और दुर्ग जिले के ये भाजपा नेता चाचा-भतीजे हैं। अगर रिश्तेदारी का अंडगा दूर गया तो चाचा-भतीजे के बीच सियासत रोचक हो सकती है। 

आईएएस और आईपीएस का फर्क
राज्य के दो आईएएस अफसरों को अभी प्रिंसिपल सेक्रेटरी सेे पदोन्नत करके अतिरिक्त मुख्य सचिव बनाया गया। यह कुर्सी प्रदेश के प्रशासनिक मुखिया, मुख्य सचिव, की कुर्सी से बस एक ही कदम पीछे रहती है। ऐसे में जाहिर है कि यह एक बड़ा प्रमोशन है। इस आदेश के आखिर में लिखा गया है कि इन प्रमोशन के लिए 11 दिसंबर को भारत सरकार को पत्र भेजा गया था, लेकिन वहां से 30 दिनों में कोई जानकारी न आने से, और मुख्य सचिव वेतनमान में रिक्तियां उपलब्ध होने से ये पदोन्नति की जा रही हैं।

इस आदेश को देखकर पुलिस विभाग के वो अफसर तो हैरान-परेशान हैं हीं जिनके प्रमोशन के लिए केंद्र सरकार से 9 दिसंबर को ही मंजूरी आ गई थी, लेकिन तबसे अब तक सवा महीने में भी दो आईपीएस के प्रमोशन के लिए डीपीसी नहीं की गई। दूसरी तरफ 11 दिसंबर को भेजी चि_ी के 30 दिन पूरे होते ही दो आईएएस के प्रमोशन कर दिए गए। पुलिस विभाग का यह मानना रहता है कि सत्ता पर बैठे नेता और आईएएस अफसर मिलकर पुलिस को मातहत ही बनाए रखते हैं, और बराबरी से उनका हक कभी नहीं मिलता। इन दो मामलों को देखकर तो ऐेसा लगता ही है। दूसरी तरफ नया रायपुर में आईएएस अफसरों के बैठने के सचिवालय को देखें तो वह 5 मंजिला इमारत है। दूसरी तरफ पुलिस मुख्यालय कुल दो मंजिला है जो कि पुलिस को उसका कद दिखाने का एक तरीका भी है।


Date : 14-Jan-2020

अफसर भी मुखिया की राह पर

छत्तीसगढ़ के मुखिया हाथ में भौंरा चलाने के कारण खूब ट्रेंड होते हैं। सड़क से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया में उनकी यह कला सुर्खियों में रहती है। बचपन के ये खेल पचपन में भी लोगों के सिर चढ़कर बोलेगा, शायद ही किसी ने सोचा होगा। स्थिति यह है कि गांव-गलियों और शहर से निकलकर यह खेल सरकारी दफ्तरों और मंत्रालय के गलियारों तक पहुंच गया है। युवा उत्सव में शहर के एसपी-कलेक्टर भी भौंरा चलाते नजर आए। उन्होंने भी सूबे के मुखिया की तरह हाथ में भौंरा चलाकर लोगों को थोड़ा चकित किया, क्योंकि आमतौर पर ऐसे खेल गांवों में ज्यादा प्रचलित हैं, लेकिन मौजूदा दौर में तमाम पारंपरिक खेलकूद विलुप्त होते जा रहे हैं। अधिकांश गांवों में बच्चे और युवा क्रिकेट का बल्ला थामे दिखते हैं। ऐसे में राजधानी के इन दो युवा अफसरों, कलेक्टर और एसपी के भौंरा चलाने के वीडियो ने सभी का ध्यान खींचा है। इससे दूसरे जिलों के अफसरों को नया टॉस्क मिल गया है। जिन्हें भौंरा चलाना नहीं आता, वो थोड़े असहज महसूस करने लगे हैं। कुछ अफसरों ने तो बकायदा भौंरा चलाना, गेड़ी चढऩे की प्रैक्टिस शुरू कर दी है। संभव है कि अलग-अलग जिलों के अफसरों की भी भौंरा चलाते तस्वीर वायरल हो। वैसे अफसरों की तासीर होती है कि वे मुखिया को तेजी से फॉलो करते हैं। कुछ अफसरों को यह भी लगता है कि मुखिया की पसंद नापसंद के हिसाब से चलने में असुविधाजनक स्थिति की आशंका नहीं रहती। यह बात तो तय है कि मुखिया को खुश करने के चक्कर में छत्तीसगढ़ के स्थानीय खेलकूद और लोक पर्व की पूछपरख तो बढ़ गई है, लेकिन समस्या यह है अफसर भी भौंरा-गेड़ी में मग्न हो जाएंगे तो प्रशासनिक कामकाज का क्या होगा। कहा तो यह भी जाता है कि अफसरों के लिए सियासतदारों की नकल कभी भी भारी पड़ सकती है। 

लेकिन समाजशास्त्रियों का यह अनुभव है कि नौकरशाही अगर स्थानीय बोली, स्थानीय संस्कृति, स्थानीय पोशाक से जुड़कर चलती है, तो उसे जनता का विश्वास तेजी से मिल जाता है। देश के बहुत से सबसे कामयाब आलाअफसर ऐसे ही रहे हैं जिन्होंने स्थानीयता के साथ काम किया। अब अगर भौंरा चलाने, या गेड़ी पर चलने से सत्ता और जनता के बीच की दूरी घटती है, तो उस पर थोड़ा वक्त लगाना प्रशासन के लिए अच्छा ही है। और यह भी है कि इन अफसरों के बहाने इनके बच्चे भी देसी खेल सीख पाएंगे जिससे उनके आसपास के दूसरे बच्चों के बीच भी एक दिलचस्पी पैदा होगी।

फिल्मों के सियासी-पब्लिक मायने
देशभर में फिल्म को लेकर सियासत मची हुई है। छत्तीसगढ़ में भी इसका असर देखने को मिला। राज्य के मुखिया लाव लश्कर के साथ सिनेमा देखने पहुंचे। इसके तुरंत बाद पूर्व मुखिया ने भी पत्नी और पार्टी के नेताओं के साथ सिनेमा का आनंद उठाया। आमतौर पर लोग फिल्म मनोरंजन के लिए देखते हैं, लेकिन राजनीति में मनोरंजन से ज्यादा सियासी मयाने होते हैं। दोनों नेताओं ने अलग-अलग फिल्में देखकर पार्टी लाइन और विचारधारा का भी संदेश दे दिया। यहां पसंद-नापसंद से ज्यादा महत्व संदेश का होता है। इसी आधार पर दोनों सियासतदारों ने फिल्मों का सलेक्शन किया, लेकिन लोगों का क्या है, उनका काम तो बोलना है। लोगों ने चर्चा शुरू हो गई है कि डॉक्टर साहब कहीं तन्हा महसूस तो नहीं कर रहे हैं, जिसकी वजह से तानाजी देखने पहुंचे गए। अब लोगों को कौन समझाए कि तन्हा हो भी जाएं तो भी राजनीति में जाहिर नहीं किया जाता।

दूसरी बात यह है कि कांगे्रस-गैरभाजपाई पार्टियों की ताजा पसंद दीपिका की फिल्म आज के एक सामाजिक मुद्दे को लेकर है, हिंदुस्तानियों लड़कियों पर तेजाबी हमले पर। और उसके मुकाबले जिस दूसरी फिल्म को भाजपाई-बढ़ावा मिल रहा है वह एक ऐतिहासिक विषय पर बनी हुई है। ये दोनों ही किस्म की पसंदें इन दोनों राजनीतिक खेमों की अच्छी तरह स्थापित सोच के मुताबिक ही है। लेकिन जब भाजपा के कुछ लोगों ने यह तुलना शुरू की कि तानाजी की कमाई छपाक से बहुत अधिक है, तो एक गुटनिरपेक्ष आदमी ने कहा कि तानाजी की कमाई की तुलना करना है तो दूसरे ऐतिहासिक मुद्दों पर बनी हुई फिल्मों की कमाई से करें, जलते-सुलगते तेजाबी सामाजिक हकीकत पर बनी फिल्म की कमाई से तुलना तो नाजायज है।

तजुर्बा अनिवार्य नहीं होता...
राज्य सरकार में 3-3 भूतपूर्व पत्रकार सलाहकार के पद पर काम कर रहे हैं, उसका असर है, या फिर जनसंपर्क विभाग के खुद के कामकाज का, पिछली सरकार के मुकाबले तस्वीरों और खबरों के मामले में यह सरकारी अमला अब अचानक बेहतर काम करते दिख रहा है। आदिवासी नृत्य महोत्सव, और अब युवा उत्सव, इन दो बड़े आयोजनों में जनसंपर्क विभाग ने एक अभूतपूर्व चुस्ती दिखाई है, और शायद वह भी एक वजह है कि इन कार्यक्रमों का मीडिया में कवरेज बेहतर हो रहा है। रमन सिंह सरकार के समय तस्वीरों और खबरों के लिए चौकन्ने अखबारों को लगातार जनसंपर्क के अफसरों से संघर्ष करना पड़ता था, और अखबारों के संस्करण छपने जाते रहते थे, खबरों का ठिकाना नहीं रहता था। उस वक्त जनसंपर्क में कुछ भूतपूर्व पत्रकार थे, और अब तो विभाग में भूतपूर्व पत्रकार नहीं हैं, फिर भी अखबारी जरूरत बेहतर तरीके से पूरी हो रही है। मतलब यह कि किसी काम को अच्छा करने के लिए उस पेशे का तजुर्बा अनिवार्य नहीं होता, और उसके बिना भी बेहतर काम हो सकता है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 13-Jan-2020

ओनली कैश! 
शादी-ब्याह या किसी पारिवारिक कार्यक्रम में अधिकांश लोग उपहार स्वरुप लिफाफा लेकर जाते हैं, जिसमें हम अपनी हैसियत के मुताबिक कैश रखते हैं, लेकिन बहुत सारे लोग उपहार में कैश देना पसंद नहीं करते और गुलदस्ता या सामान बतौर गिफ्ट देते हैं। वैसे देखा जाए, तो उपहार लेने-देने का प्रचलन बरसों पुराना है, हालांकि समय के साथ इसमें बदलाव आया है, पुराने समय में तो कैश देने-लेने का ही रिवाज अधिक प्रचलित था। आजकल तो कई आमंत्रण में उपहार नहीं लाने के संदेश दिखाई और सुनाई देते हैं। ऐसा करने वालों की मंशा होती है कि पारिवारिक कार्यक्रमों को मेलजोल तक सीमित रखा जाए और उपहार की औपचारिकता में न बांधा जाए। बावजूद इसके शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रम में लोग खाली हाथ जाना उचित नहीं समझते और वर-वधू को आशीर्वाद स्वरुप कुछ न कुछ देना जरूरी समझते हैं। 

खैर, यहां पर उपहार का लेना-देना बहस का विषय नहीं है, क्योंकि यह व्यक्तिगत ज्यादा है। इसके जिक्र के पीछे भी एक शादी का न्यौता है, जोकि हमें सोशल मीडिया में देखने को मिला। दरअसल, कार्ड में लिखा गया है कि द कपल इज ऑन द मूव, सो ओलनी कैश एज गिफ्ट इज वेलकम। सही भी है क्योंकि नवदंपत्ति को शादी के बाद बाहर जाना है और उपहारस्वरुप मिले सामानों को वे अपने साथ ले जाने की स्थिति में नहीं है तो ऐसा संदेश वाजिब दिखाई पड़ता है। शादी-ब्याह में नई गृहस्थी के हिसाब से बड़े और महंगे उपहार भी दिए जाते हैं, जो या तो उनके पास पहले से होते हैं या फिर वे उसके उपयोग करने की स्थिति में नहीं होते। मना करने के बाद भी कुछ न कुछ उपहार दिए ही जाते हैं, तो कैश लिए जाना ही सही तरीका हो सकता है। यह मेहमान और मेजबान दोनों के लिए सुविधाजनक है और व्यर्थ के खर्चों से बचाने वाला भी है। 

कुछ लोग शादी पर उपहार देने में लड़के और लड़की में फर्क करते हैं। अगर वे दूल्हे के परिवार के न्यौते पर पहुंचे हैं, तो वे लिफाफे में सिर्फ शुभकामना का छपा हुए एक कार्ड लेकर जाते हैं, और अगर दुल्हन-परिवार की ओर से मिले न्यौते पर गए हैं, तो कोशिश करते हैं कि अपने खाए पर लड़की के पिता के हुए अंदाजन खर्च से अधिक का लिफाफा देकर आएं। इनमें भी रायपुर के एक प्रमुख व्यक्ति इतने कट्टर हंै कि एक दिन में ऐसी दो किस्म की शादियां हो, तो वे वर पक्ष के न्यौते वाला खाना खाते हैं, और कन्या पक्ष के न्यौते की दावत में कन्या को नगदी का लिफाफा देकर आते हैं। उनका मानना है कि लड़की के पिता को तो लड़के वाले वैसे ही लूट लेते हैं, उस पर और बोझ क्यों बना जाए।

लालबत्ती की बेचैनी
छत्तीसगढ़ में अब लालबत्ती के दावेदारों की बेचैनी बढऩे लगी है। सालभर से ज्यादा का इंतजार पूरा होने वाला है और बैक टू बैक चुनाव भी अंतिम पड़ाव पर है, हालांकि दावेदारों को खुश होना चाहिए, क्योंकि फल प्राप्ति का समय आ गया, लेकिन स्थिति उलट हो गई है। दरअसल, कहा जा रहा है कि लालबत्ती की लिस्ट भी किश्तों में निकाली जाएगी। संभव है कि पहली लिस्ट सीमित हो। कुछ खास लोगों को लालबत्ती मिले। ऐसे में नंबर कटने की आशंका से दावेदार परेशान हैं और इसके लिए रायपुर से लेकर दिल्ली तक लॉबिंग चल रही है। कुछ लोगों का तो यह भी दावा है कि लालबत्ती के लिए बोली भी शुरू हो गई है। इस दावे की सच्चाई पर संशय हो सकता है, लेकिन जोड़-तोड़ में कोई संशय नहीं है। इसका अंदाजा सरकार के नजदीकी लोगों और मंत्रियों के बंगलों में भीड़ को देखकर लगाया जा सकता है। तमाम दावेदार सक्रिय देखे जा सकते हैं। ऐसे ही एक दावेदार को इसकी जानकारी लगी तो समझ आया कि दावा मजबूत रखने के लिए ऐसा करना पड़ता है, वो भी निकल पड़े अभियान में। जैसे ही वो अभियान में कूदे उनका वास्ता दूसरे दावेदारों से हुआ। सभी के अपने अपने अनुभव और तौर तरीके। किसी ने उनसे कहा कि आपकी लालबत्ती तो पक्की है आपको ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं, लेकिन तीसरे दावेदार को पता चला तो उन्होंने जातीय समीकरण में उनको निपटा दिया। नेता बड़े कन्फ्यूज्ड हो गए कि लालबत्ती मिलेगी या नहीं और केवल प्रत्याशा में वे अभियान में कूद गए हैं, जिसमें पैसे भी खर्च हो रहे हैं। इस असमंजस में उनको परिवार के लोगों ने सलाह दी कि आपको लालबत्ती जब मिलेगी तब समझना, लेकिन अभी तो आपके नेतागिरी के चक्कर में धंधे पानी पर असर पड़ रहा है। बच्चों की शादी-ब्याह का समय निकल रहा है। लालबत्ती के चक्कर में धंधा पानी चौपट हो गया तो कहीं के नहीं रहेंगे। एक तो व्यापार पहले से मंदी की चपेट में है। बेचारे नेताजी को परिवार वालों की सलाह जची और कारोबार में ज्यादा फोकस कर रहे हैं और समय बचने पर ही दावा आपत्ति के लिए निकलते हैं और वो भी बंगले में जुटने वाले अभियान से हटकर दावेदारों को फिट अनफिट का समीकरण बताने में लग गए हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 12-Jan-2020

नामों में बहुत कुछ रक्खा है...
हिन्दुस्तान, और बाकी दुनिया का भी, शहरी मीडिया आदिवासियों या मूल निवासियों को लेकर मोटेतौर पर अनजान ही बने रहता है, या ये तबके शहरी आंखों के लिए पारदर्शी से रहते हैं। ऐसे में पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में जब एक राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव हुआ और जिसमें देश के बाहर के कुछ देशों से भी आदिवासी लोकनर्तक पहुंचे, तो वह छत्तीसगढ़ के इतिहास का एक किस्म से सबसे बड़ा जलसा बन गया। अब इस कार्यक्रम में पहुंचे आदिवासी-कलाकारों या उनके दल के मुखिया लोगों के नाम देखें तो कुछ दिलचस्प बातें दिखती हैं जो वहां के समाज और लोगों की जाति, उनके नाम को लेकर हैं।

अब ओडिशा से एक नृत्य ग्रुप आया तो उसमें ग्रुप लीडर का नाम तो प्रतिमा रथ था, लेकिन उनके अलावा जो सत्रह लोग ग्रुप में शामिल थे उनमें से हर एक का जाति नाम 'दुरुआ' था। मध्यप्रदेश से आए एक ग्रुप के मुखिया तो सतीश श्रीवास्तव थे लेकिन नर्तक दल के बाकी तमाम नौ लोगों के जातिनाम 'कोलÓ थे। राजस्थान से आए एक दल में कुछ राम, पूजा, जमुना जैसे हिन्दू नाम थे, और इतने ही मुस्लिम नाम भी थे। 

महाराष्ट्र से आए एक दल में आधा दर्जन लोगों में से पांच लोग ऐसे थे जिनके नाम में भास्कर और भोसले दोनों ही शब्द थे। 

चूंकि ये आदिवासी नृत्य दल थे, इसलिए बहुत से प्रदेशों से ये एक-एक जाति से ही निकले हुए दल थे, और उनमें सभी या अधिकतर लोगों के सरनेम या उपनाम एक जैसे थे। अरूणाचल प्रदेश के एक दल के पन्द्रह लोगों में से पांच के सरनेम पलेंग थे, और बहुत से लोगों के पहले नाम भी ईसाई जैसे थे। अरूणाचल प्रदेश के एक दूसरे दल में एक दिलचस्प बात यह थी कि एक दर्जन से अधिक लोगों में से किन्हीं भी दो लोगों के सरनेम एक सरीखे नहीं थे। 

झारखंड के एक दल के डेढ़ दर्जन लोगों में दर्जन भर महतो थे। झारखंड के ही एक दूसरे दल में भी महतो और मुंडा इन दो सरनेम की भरमार थी।

राजस्थान के एक दल में आधे लोगों का जातिनाम गमेती था। उत्तराखंड के एक दल में बहुत ही कम लोगों के जातिनाम लिखे थे, लेकिन जिनके लिखे थे उनमें तकरीबन सारे ही हिन्दवाल थे। केरल के नर्तक दल में किसी की भी जाति नहीं लिखी गई थी, और सारे के सारे नाम बस पहले नाम थे। कुछ ऐसा ही उत्तरप्रदेश के एक दल के साथ था जिसमें किसी के जाति नाम नहीं लिखे गए थे। 

गुजरात के एक दल के बीस लोगों में से उन्नीस के नाम के अंत में भाई शब्द था और एक महिला कलाकार के नाम में आखिर में बाई जुड़ा हुआ था। यह पूरी की पूरी टीम राठवा शब्द से शुरू होने वाले नामों की थी, और तमाम बीस नामों में स्त्री या पुरूष कलाकारों के साथ पिता के नाम भी जुड़े हुए थे, जैसे राठवा दीपिका बेन रंगू भाई। गुजरात की ही एक दूसरी टीम में हर किसी का नाम वासव, या वासवा से शुरू हुआ, और लगभग हर नाम में भाई शब्द था ही। 

लद्दाख की टीम के उन्नीस नामों में से हर एक का सरनेम अलग था, और कोई भी दो सरनेम एक सरीखे नहीं थे। 

चूंकि ये नाम अलग-अलग प्रदेशों से आए थे इसलिए लोगों ने उनमें से किसी लिस्ट में शादीशुदा होने या न होने की बात लिखी थी, किसी में नहीं लिखी थी, लेकिन तमिलनाडु की एक टीम के तमाम उन्नीस सदस्यों के नाम के साथ श्रीमती लिखा हुआ था जो कि हर सदस्य के शादीशुदा होने का संकेत था। 

अपने मुख्य आदिवासी इलाके झारखंड से अलग होने के बाद बाकी बचे बिहार को लेकर आदिवासी समुदाय की चर्चा कम होती है। लेकिन बिहार के जो नृत्य कलाकार यहां पहुंचे उस टीम के नाम देखें तो सारे के सारे नाम झारखंड के आदिवासी समुदाय के लगते हैं- एक्का, लकरा, तिग्गा, उरांव, टोप्पो, कुजूर, मिंज, बारा, केरकेट्टा वगैरह। 

गुजरात में बसे हुए अफ्रीकी मूल के एक सिद्दी समुदाय के आदिवासी कलाकारों के नाम देखें तो वे सारे के सारे मुस्लिम भी दिखते हैं, इमरान, बादशाह, बिलालभाई, साजिद सुल्तान, बाबूभाई, तौसीफभाई, हुमायूं, शब्बीर, शेख मूसा, रसीदभाई, गुलाम असलम, नसीरभाई, और मोहम्मद सलीम।

हिमाचल के एक नर्तक दल के नाम देखें तो वे लाल या चंद पर खत्म होने वाले थे, और महिलाओं और लड़कियों के नाम देवी और कुमारी पर खत्म हो रहे थे। इनके साथ जातिसूचक नाम नहीं थे। जम्मू से आई हुई टीम के दो दर्जन लोगों में से तकरीबन सारे ही मुस्लिम थे, लेकिन उनके बीच दो हिन्दू नाम भी दिख रहे थे। 

त्रिपुरा से आई हुई टीम शायद एक ही जाति की थी, और दर्जन भर से अधिक लोगों में से हर एक का जातिनाम देबबर्मा था। मध्यप्रदेश की एक और टीम एक ही जनजाति की थी, और उसमें टीम लीडर सलमान खान को छोड़ दें तो हर कलाकार का जातिनाम भील था। पश्चिम बंगाल के नृत्य दल के लोगों के नाम देखें तो उनमें आधे नाम झारखंड के आदिवासी समुदायों के दिखते थे, टुडू, मुरमू, सोरेन, हंसदा, किस्कू, और शायद इनका झारखंड और बंगाल का पड़ोसी प्रदेश होने से कुछ लेना-देना था। 

सिक्किम के एक दल के दस नामों में से नौ नौ नामों के साथ एक ही जातिनाम, लिम्बू का जिक्र था। 

लोगों के नाम कैसे रखे जाते हैं, उनके उपनाम कैसे रहते हैं, उनके नाम के साथ परिवार या पिता, या माता के नाम का जिक्र किस तरह होता है, यह एक बड़ा दिलचस्प समाजशास्त्रीय अध्ययन है, छत्तीसगढ़ आए देश भर के कलाकारों के नामों से यह एक झलक मिली है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 10-Jan-2020

जोगी-भाजपा साथ-साथ...

जोगी पार्टी की भाजपा से नजदीकियां बढ़ती जा रही हैं। म्युनिसिपल चुनाव में जोगी पार्टी के सहयोग के दम पर गौरेला, पेंड्रा, रतनपुर और कोटा में भाजपा ने जीत हासिल की। यहां कांग्रेस ने जोगी पार्टी के लोगों को तोडऩे की कोशिश भी की, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिल पाई। कोटा और मरवाही विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व जोगी दंपत्ति करते हैं। वैसे तो जोगी परिवार की कांग्रेस में शामिल होने की खबर उड़ती रहती है। मगर यह परिवार भाजपा के ज्यादा नजदीक रहा है। 

बलौदाबाजार में भी जोगी पार्टी के विधायक हैं। यहां उम्मीद की जा रही थी कि जोगी पार्टी के पार्षदों का कांग्रेस को साथ मिलेगा और नगर पालिका में कांग्रेस का कब्जा हो जाएगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। नगर पालिका में जोगी पार्टी के पार्षदों का समर्थन भाजपा को मिल गया और भाजपा का नगर पालिका अध्यक्ष पद पर कब्जा हो गया। जोगी की जाति की जांच के मामले को भाजपा सरकार ने 15 साल तक लटकाए रखा। जबकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनते ही जांच में तेजी आई। ऐसे में जोगी पार्टी का भाजपा को साथ मिल रहा है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  

अपनी समझ भी इस्तेमाल करें...
छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने सिगरेट की खुली बिक्री पर रोक लगा दी है। अब जिसे खरीदना हो वह पूरा पैकेट ही खरीदे। मतलब यह कि कोई सिगरेट पीने की लत छोडऩे की कोशिश कर रहे हों, और एक बार में एक सिगरेट खरीद रहे हों, तो वह मुमकिन नहीं है। अब पूरे का पूरा पैकेट लेना होगा, और आदत छोडऩे की हसरत अगर हो, तो उस हसरत को ही छोडऩा होगा। इसके पीछे तर्क यह है कि सिगरेट के पैकेट पर तो उससे कैंसर होने की चेतावनी दर्ज रहती है, लेकिन सिगरेट पर अलग से ऐसी कोई चेतावनी नहीं रहती, और एक सिगरेट खरीदकर पीने वाले को सावधानी का ऐसा संदेश नहीं मिलता। 

कोई कानून किस तरह अपने मकसद को ही शिकस्त देने वाला हो सकता है, यह उसकी एक शानदार मिसाल है। यह छत्तीसगढ़ सरकार का अपना फैसला नहीं है, बल्कि बीते बरस केन्द्र सरकार ने ही कोटपा नाम के इस कानून को लागू किया है जिसके तहत सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू प्रोडक्ट की बिक्री पर कुछ प्रतिबंध और लागू किए गए हैं, और इन्हें तोडऩे पर बड़े जुर्माने का इंतजाम किया गया है। अभी प्रतिबंधित इलाकों में सिगरेट पीने पर भी दो सौ रूपए का जुर्माना है, और स्कूल-कॉलेज के आसपास सिगरेट-बीड़ी-तम्बाकू की बिक्री पर भी। केन्द्र सरकार ने सिगरेट की खुली बिक्री पर जुर्माना बढ़ाते हुए इस बात को अनदेखा किया है कि देश में करीब 70 फीसदी सिगरेट खुली बिकती है, और पैकेट खरीदने की ताकत भी कम लोगों में रहती है। अब यह नया जुर्माना एक तो लागू करना नामुमकिन है, दूसरी तरफ यह लोगों के जेब में हमेशा पैकेट को बनाए रखेगा जिससे उनका सिगरेट पीना बढ़ेगा। छत्तीसगढ़ सरकार को केन्द्र सरकार के इस नियम को लागू करते हुए अपनी खुद की समझ का भी इस्तेमाल करना चाहिए। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 09-Jan-2020

निर्बाध ताकत ने पूरा भ्रष्ट कर दिया
अंग्रेजी में कहावत है-पॉवर करप्ट्स एण्ड एब्सोल्यूट पॉवर करप्ट्स एब्सोल्यूटली। यानी ताकत भ्रष्ट करता है और निर्बाध ताकत पूरी तरह भ्रष्ट करती है। यह कहावत रमन सिंह के पीए ओपी गुप्ता और अरूण बिसेन पर एकदम फिट बैठती है। अरूण बिसेन कंसोल नाम की कंपनी से रिश्तों और, पत्नी की नियम विरूद्ध नियुक्ति को लेकर सुर्खियों में रहे हैं, तो रिंकू खनुजा आत्महत्या मामले में पुलिस एक बार उनसे पूछताछ कर चुकी है। गुप्ता के कारनामे तो और भी भयंकर हैं। उनके खिलाफ नाबालिग ने बरसों से लगातार यौन शोषण का मामला दर्ज कराया है। आरोप है कि गुप्ता बरसों से पढ़ाने के नाम पर एक नाबालिग स्कूली छात्रा को रखकर उसका यौन शोषण कर रहे थे। 

पुलिस फिलहाल ओपी गुप्ता से पूछताछ कर रही है। रमन राज में मामूली हैसियत के दोनों पीए गुप्ता और बिसेन की ताकत सीनियर आईएएस अफसरों से कम नहीं थी। मंतूराम पवार प्रकरण हो, या फिर निर्दलीय प्रत्याशियों की दबावपूर्वक नाम वापसी का मामला हो, रमन सिंह के दोनों पीए का नाम चर्चा में रहा है। इन शिकायतों को नजरअंदाज करना आज रमन सिंह के लिए भारी पड़ रहा है। सौम्य और मिलनसार रमन सिंह की छवि को भी नुकसान पहुंचा है। सुनते हैं कि ये दोनों सहायक आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर भी हैं। ओपी गुप्ता का राजेन्द्र नगर में भव्य बंगला है, तो अरूण बिसेन करोड़पतियों-अरबपतियों की कॉलोनी स्वर्णभूमि में निवास करते हैं। भाजपा के कई ताकतवर लोग इन दोनों के खिलाफ रहे हैं। मगर दोनों का बाल बांका नहीं हो पाया। अब जब दोनों जांच-पड़ताल के घेरे में आए हैं, तो पार्टी के लोग चैन की सांस ले रहे हैं। कहा भी जाता है कि जैसी करनी, वैसी भरनी। 

प्रेतनी बाधा से सीडी तक
वैसे ओपी गुप्ता इसके पहले भी बस्तर की एक स्थानीय निर्वाचित नेत्री के साथ रिश्तों को लेकर पार्टी और सरकार में सबकी जानकारी में विवाद में थे, और वे खुद आपसी बातचीत में मंजूर करते थे कि प्रेतनी-बाधा दूर करने में करोड़ों रुपये लग गए थे। दूसरी तरफ अरूण बिसेन का सीएम हाऊस में जलवा देखकर लोग हक्काबक्का रहते थे जब वे एक सबसे महत्वपूर्ण विभाग चला रहे आईएएस राजेश टोप्पो को राजेश कहकर ही बुलाते थे। इन्हीं दोनों के नाम मुंबई जाकर सेक्स-सीडी देखने से लेकर अंतागढ़ में पैसा पहुंचाने तक, चुनाव से नाम वापिस लेने तक के फोन जैसे कई मामलों में उलझे ही रहे।

भीतरघात की शिकायत
म्युनिसिपल चुनाव में भाजपा के कई बड़े नेताओं के खिलाफ भीतरघात की शिकायतें सामने आई है। इनमें पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी भी हैं। सुनते हैं कि रायपुर के एक वार्ड प्रत्याशी ने शिकायत की है कि श्रीचंद ने उनके खिलाफ काम किया है। प्रत्याशी ने पार्टी के प्रमुख नेताओं को मौखिक रूप से  श्रीचंद की चुनाव में गतिविधियों की जानकारी दी है। यह भी बताया गया कि श्रीचंद ने पार्टी के प्रत्याशी के बजाए निर्दलीय को सपोर्ट किया। भाजयुमो के महामंत्री संजूनारायण सिंह ठाकुर ने भी कई नेताओं के खिलाफ भीतरघात की शिकायत की है। हालांकि कुछ नेताओं के खिलाफ कार्रवाई तो की गई है, लेकिन बड़े नेताओं के खिलाफ कार्रवाई का हौसला संगठन नहीं जुटा पा रहा है। ऐसे में देर सबेर मामला गरमा सकता है। 

कांग्रेस की बड़ी कामयाबी
म्युनिसिपल चुनाव में कांग्रेस को अच्छी सफलता मिली है। प्रदेश के 10 में से 9 म्युनिसिपलों में कांग्रेस के मेयर-सभापति बने हैं। कोरबा में शुक्रवार को चुनाव हैं। कांग्रेस नेता मानकर चल रहे हैं कि कोरबा में भी कांग्रेस का मेयर-सभापति बनेगा। इस सफलता के बाद भी कांग्रेस में शिकवा-शिकायतों का दौर चल रहा है। कहा जा रहा है कि पार्टी ने अनारक्षित सीटों में भी आरक्षित वर्ग के नेताओं को मेयर बना दिया। पंचायत चुनाव में वैसे भी अनारक्षित वर्ग के नेताओं की भागीदारी नहीं के बराबर रह गई है। क्योंकि दो को छोड़कर बाकी सभी जिला पंचायत के अध्यक्ष के पद आरक्षित हो गए हैं।
 
असंतुष्ट नेता बताते हैं कि पिछले चुनाव में सैद्धांतिक रूप से फैसला लिया गया कि अनारक्षित सीटों पर सामान्य वर्ग से प्रत्याशी उतारने का फैसला लिया गया था। मेयर पद के लिए सामान्य वर्र्ग के प्रत्याशी उतारने के अच्छा संदेश भी गया। पार्टी को सरकार न रहने के बावजूद सफलता भी मिली। अब जब डायरेक्ट इलेक्शन नहीं हुए हैं ऐसे में अनुभवी और योग्य सामान्य वर्ग के नेताओं को नजर अंदाज कर दिया गया। खुद सीएम के विधानसभा क्षेत्र पाटन के कुम्हारी में ऐसा हुआ है। दुर्ग को छोड़कर कहीं भी सामान्य वर्ग से मेयर नहीं बन पाया। पार्टी के आलोचक मान रहे हैं कि सरकार बनने के बाद जातिवादी ताकतें हावी हो गई। जिनके दबदबे के चलते पिछले चुनाव की तरह कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। 

सुनते हैं कि पार्टी के कुछ नेता ने एक सीनियर विधायक को इसके लिए तैयार कर कर रहे हैं और उनके जरिए जल्द ही पार्टी हाईकमान को इससे अवगत कराया जाएगा। 

उधर चंद्राकर की पहल...
इससे परे भाजपा में पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर सामान्य वर्ग के नेताओं को संगठन में पर्याप्त महत्व मिले, इसके लिए मुखर रहे हैं। चंद्राकर ने धमतरी जिलाध्यक्ष के चयन के मौके पर बेबाकी से अपनी राय रखी थी। उन्होंने कहा कि जिले की तीन सीटों में खुद समेत दो पिछड़े वर्ग के विधायक हैं। एक सीट अजजा वर्ग के लिए आरक्षित है। ऐसे में संगठन में सामान्य वर्ग से अध्यक्ष बनाए जाने से संंतुलन बना रह सकता है और पार्टी की ताकत बढ़ सकती है। चंद्राकर के सुझाव की पार्टी के भीतर काफी प्रशंसा भी हो रही है। चंद्राकर के सुझाव को पार्टी बाकी जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में ध्यान रख सकती है। 


Date : 07-Jan-2020

गुरूचरण होरा का योगदान

एजाज ढेबर की बड़ी जीत में यूनियन क्लब के अध्यक्ष गुरूचरण सिंह होरा की अहम भूमिका रही है। सात में से छह निर्दलीय पार्षदों को गुरूचरण ने अपने होटल में रख लिया था। ये पार्षद पूरे समय उनकी निगरानी में रहे। निर्दलीय पार्षद गुरूचरण के साधन-संसाधन और खातिरदारी से इतने खुश थे कि वे एजाज को छोड़कर किसी दूसरे के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। वैसे तो गुरूचरण भाजपा के सक्रिय सदस्य हैं। पेशे से इंजीनियर गुरूचरण विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नौकरी छोड़कर विधिवत भाजपा में शामिल हो गए थे। उन्होंने रायपुर उत्तर से टिकट की दावेदारी भी की थी। 

मगर मेयर चुनाव में गुरूचरण की सक्रियता से भाजपा नेता हक्का-बक्का हैं। वैसे तो खेल संघों की राजनीति गुरूचरण के इर्द-गिर्द घूमती है। राज्य बनने के बाद वे तत्कालीन सीएम अजीत जोगी के करीबी माने जाते थे। तब जोगी को ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बनवाने में बशीर अहमद खान और गुरूचरण सिंह होरा की अहम भूमिका रही। इसके बाद वे सीएम रमन सिंह के करीबी हो गए। रमन सिंह की ओलंपिक संघ अध्यक्ष पद पर ताजपोशी भी गुरूचरण के होटल में हुई थी। बशीर और गुरूचरण की जोड़ी ने रमन सिंह को हाल ही में ओलंपिक संघ से बेदखल भी किया।

मिलनसार और अपार संपर्कों के धनी गुरूचरण हमेशा सीएम हाऊस के नजदीक रहे हैं। उन्हें अब भूपेश बघेल का नजदीकी माना जाने लगा है।

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 07-Jan-2020

मृत्युंजय और अनिल दुबे

बहुत कम समय होने के बावजूद भाजपा के मेयर प्रत्याशी मृत्युंजय दुबे ने निर्दलीय पार्षदों और कांग्रेस में सेंधमारी की भरपूर कोशिश की। निर्दलीय पार्षदों ने यह कहकर हाथ जोड़ लिए कि अब बहुत देर हो चुकी है। वे कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए वचनबद्ध हैं। अलबत्ता, कांग्रेस का एक पार्षद जरूर पुराने संबंधों को देखते हुए भाजपा के साथ आने के लिए तैयार हो गया था।  

सुनते हैं कि मृत्युंजय के बड़े भाई अनिल दुबे ने भी कांग्रेस में कोशिश की। यह खबर उड़ी कि कांग्रेस के कई पार्षद एजाज की उम्मीदवारी से खुश नहीं हैं। इसके बाद मतदान के घंटेभर पहले भाजपा के पक्ष में लाबिंग तेज हो गई। अनिल दुबे को एक महिला पार्षद के पति ने भरोसा दिलाया था कि उनकी पत्नी मृत्युंजय दुबे के पक्ष में मतदान करेंगी। इसके लिए उन्होंने किसी तरह की डिमांड भी नहीं की थी। अलबत्ता, पार्षद पति को आशंका थी कि कांग्रेस के लोग उन पर शक कर सकते हैं। उन्होंने अपनी दुविधा अनिल दुबे को बताई, तो अनिल दुबे ने उन्हें अपने दल का साथ न छोडऩे की नसीहत देकर दुविधा से बचा लिया।

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 07-Jan-2020

भाजपा की यही जीत कि...
रायपुर म्युनिसिपल के मेयर चुनाव में भाजपा को जीत की उम्मीद तो थी नहीं, पार्टी का कोई भी पार्षद नहीं छिटका, यही बड़ी उपलब्धि रही। चूंकि निर्दलियों को अपने पक्ष में करने की कवायद इतनी देर से हुई कि कोई भी निर्दलीय पार्षद भाजपा के साथ नहीं जुड़ सका। पार्टी के रणनीतिकारों के पास इस बात की पुख्ता जानकारी थी कि भाजपा के 4 से 5 पार्षद क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। चर्चा यह भी रही कि इन पार्षदों को एडवांस भी दिया जा चुका है। बाद में खुद बृजमोहन अग्रवाल ने कमान संभाली और सभी पार्षदों को एकजुट रखने में कामयाब रहे।

सुनते हैं कि भाजपा पार्षदों के पिकनिक से लौटने के बाद चुनाव के दिन सुबह परम्परा गार्डन में ठहराया गया था। बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत पार्षदों को मतदान के तौर तरीके सिखाते रहे। पार्षदों को यह भी संकेत दिया गया कि किसी ने कांग्रेस को वोट देने के लिए प्रॉमिस कर दिया है, तो भी उन्हें डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह पता लगाना संभव नहीं है कि किस पार्षद ने किसको वोट दिए हैं। 

खास बात यह है कि निर्दलीय पार्षद अमर बंसल भी वहां पहुंच गए उन्होंने भाजपा पार्षदों के साथ चाय-नाश्ता किया और भरोसा दिलाकर गए कि वे भाजपा को ही वोट करेंगे। बंसल को मिलाकर 30 वोट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन मेयर प्रत्याशी मृत्युंजय दुबे को 29 मत ही हासिल हुए। अमर बंसल कसम खाते फिर रहे हैं कि उन्होंने भाजपा को ही वोट दिए हैं। मगर भाजपा के लोग उन पर भरोसा नहीं जता पा रहे हैं, क्योंकि वे शायद कुछ इसी तरह का आश्वासन कांग्रेस के नेताओं को भी दे चुके थे। 

(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 07-Jan-2020

भाजपा की यही जीत कि...
रायपुर म्युनिसिपल के मेयर चुनाव में भाजपा को जीत की उम्मीद तो थी नहीं, पार्टी का कोई भी पार्षद नहीं छिटका, यही बड़ी उपलब्धि रही। चूंकि निर्दलियों को अपने पक्ष में करने की कवायद इतनी देर से हुई कि कोई भी निर्दलीय पार्षद भाजपा के साथ नहीं जुड़ सका। पार्टी के रणनीतिकारों के पास इस बात की पुख्ता जानकारी थी कि भाजपा के 4 से 5 पार्षद क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। चर्चा यह भी रही कि इन पार्षदों को एडवांस भी दिया जा चुका है। बाद में खुद बृजमोहन अग्रवाल ने कमान संभाली और सभी पार्षदों को एकजुट रखने में कामयाब रहे।

सुनते हैं कि भाजपा पार्षदों के पिकनिक से लौटने के बाद चुनाव के दिन सुबह परम्परा गार्डन में ठहराया गया था। बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत पार्षदों को मतदान के तौर तरीके सिखाते रहे। पार्षदों को यह भी संकेत दिया गया कि किसी ने कांग्रेस को वोट देने के लिए प्रॉमिस कर दिया है, तो भी उन्हें डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह पता लगाना संभव नहीं है कि किस पार्षद ने किसको वोट दिए हैं। 

खास बात यह है कि निर्दलीय पार्षद अमर बंसल भी वहां पहुंच गए उन्होंने भाजपा पार्षदों के साथ चाय-नाश्ता किया और भरोसा दिलाकर गए कि वे भाजपा को ही वोट करेंगे। बंसल को मिलाकर 30 वोट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन मेयर प्रत्याशी मृत्युंजय दुबे को 29 मत ही हासिल हुए। अमर बंसल कसम खाते फिर रहे हैं कि उन्होंने भाजपा को ही वोट दिए हैं। मगर भाजपा के लोग उन पर भरोसा नहीं जता पा रहे हैं, क्योंकि वे शायद कुछ इसी तरह का आश्वासन कांग्रेस के नेताओं को भी दे चुके थे। 

मृत्युंजय और अनिल दुबे
बहुत कम समय होने के बावजूद भाजपा के मेयर प्रत्याशी मृत्युंजय दुबे ने निर्दलीय पार्षदों और कांग्रेस में सेंधमारी की भरपूर कोशिश की। निर्दलीय पार्षदों ने यह कहकर हाथ जोड़ लिए कि अब बहुत देर हो चुकी है। वे कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए वचनबद्ध हैं। अलबत्ता, कांग्रेस का एक पार्षद जरूर पुराने संबंधों को देखते हुए भाजपा के साथ आने के लिए तैयार हो गया था।  

सुनते हैं कि मृत्युंजय के बड़े भाई अनिल दुबे ने भी कांग्रेस में कोशिश की। यह खबर उड़ी कि कांग्रेस के कई पार्षद एजाज की उम्मीदवारी से खुश नहीं हैं। इसके बाद मतदान के घंटेभर पहले भाजपा के पक्ष में लाबिंग तेज हो गई। अनिल दुबे को एक महिला पार्षद के पति ने भरोसा दिलाया था कि उनकी पत्नी मृत्युंजय दुबे के पक्ष में मतदान करेंगी। इसके लिए उन्होंने किसी तरह की डिमांड भी नहीं की थी। अलबत्ता, पार्षद पति को आशंका थी कि कांग्रेस के लोग उन पर शक कर सकते हैं। उन्होंने अपनी दुविधा अनिल दुबे को बताई, तो अनिल दुबे ने उन्हें अपने दल का साथ न छोडऩे की नसीहत देकर दुविधा से बचा लिया।

गुरूचरण होरा का योगदान
एजाज ढेबर की बड़ी जीत में यूनियन क्लब के अध्यक्ष गुरूचरण सिंह होरा की अहम भूमिका रही है। सात में से छह निर्दलीय पार्षदों को गुरूचरण ने अपने होटल में रख लिया था। ये पार्षद पूरे समय उनकी निगरानी में रहे। निर्दलीय पार्षद गुरूचरण के साधन-संसाधन और खातिरदारी से इतने खुश थे कि वे एजाज को छोड़कर किसी दूसरे के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। वैसे तो गुरूचरण भाजपा के सक्रिय सदस्य हैं। पेशे से इंजीनियर गुरूचरण विधानसभा चुनाव के ठीक पहले नौकरी छोड़कर विधिवत भाजपा में शामिल हो गए थे। उन्होंने रायपुर उत्तर से टिकट की दावेदारी भी की थी। 

मगर मेयर चुनाव में गुरूचरण की सक्रियता से भाजपा नेता हक्का-बक्का हैं। वैसे तो खेल संघों की राजनीति गुरूचरण के इर्द-गिर्द घूमती है। राज्य बनने के बाद वे तत्कालीन सीएम अजीत जोगी के करीबी माने जाते थे। तब जोगी को ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बनवाने में बशीर अहमद खान और गुरूचरण सिंह होरा की अहम भूमिका रही। इसके बाद वे सीएम रमन सिंह के करीबी हो गए। रमन सिंह की ओलंपिक संघ अध्यक्ष पद पर ताजपोशी भी गुरूचरण के होटल में हुई थी। बशीर और गुरूचरण की जोड़ी ने रमन सिंह को हाल ही में ओलंपिक संघ से बेदखल भी किया।

मिलनसार और अपार संपर्कों के धनी गुरूचरण हमेशा सीएम हाऊस के नजदीक रहे हैं। उन्हें अब भूपेश बघेल का नजदीकी माना जाने लगा है।

(rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 06-Jan-2020

सबके चक्कर में उजागर हो गए...

रायपुर के तीनों कांग्रेस विधायकों ने मेयर पद के लिए किसका नाम सुझाया था, यह साफ नहीं है। मगर दावेदारों को यह जरूर पता लग गया कि कौन उनके समर्थन में हैं, और कौन विरोध में। सुनते हैं कि दावेदार आपस में विधायकों की गतिविधियों को एक-दूसरे से साझा कर रहे थे। इन सबके चक्कर में एक सीनियर विधायक एक्सपोज भी हो गए। 

हुआ यूं कि पिकनिक पर जाने से पहले मेयर के एक दावेदार एक सीनियर विधायक से मिलने उनके घर गए। दावेदार ने उनसे अपने लिए लॉबिंग करने का आग्रह किया। सीनियर विधायक ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे पूरी तरह उनके साथ हैं और निर्दलियों को अपने पाले में करने के लिए टिप्स भी दिए। विधायक के समर्थन का भरोसा मिलने के बाद दावेदार, मेयर पद के दूसरे दावेदार से मिलने पहुंचे। दोनों के बीच चर्चा चल रही थी कि सीनियर विधायक का फोन दूसरे दावेदार के पास आया और उन्होंने अपने पास समर्थन मांगने के लिए आए मेयर के दावेदार से चर्चा का ब्यौरा भी दे दिया। 

दोनों दावेदारों ने एक-दूसरे से सीनियर विधायक के साथ हुई बातचीत साझा की। दिलचस्प बात यह है कि यह सब सीनियर विधायक को पता ही नहीं चला और वे सभी को अपना बताने के चक्कर में एक्सपोज हो गए। इसी तरह एक अन्य विधायक के किस्से को भी पार्टी केे लोग चटकारे लेकर सुना रहे हैं। यह विधायक एक दावेदार के घर दो-तीन दिनों तक घंटों मीटिंग कर मेयर बनाने के लिए लॉबिंग करने का दिखावा करते रहे। मगर जिसके लिए लॉबिंग कर रहे थे, उसका नाम ही आगे नहीं बढ़ाया। यह बात भी दावेदार के कानों तक पहुंच गई।

चर्चा यह है कि तीनों विधायक इस कोशिश में थे कि मेयर का दावेदार ऐसा हो, जो भविष्य में उनके लिए चुनौती न बन सके। यानी मेयर पद के लिए एजाज ढेबर को चुपचाप समर्थन दे दिया। ढेबर रायपुर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से पार्षद बने हैं और दक्षिण सीट भाजपा के पास है। ऐसे में ढेबर तीनों विधायकों के लिए चुनौती नहीं है। जबकि मेयर के अन्य दावेदार ज्ञानेश शर्मा, विकास उपाध्याय के लिए, नागभूषण राव और श्रीकुमार मेनन, पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा के लिए चुनौती बन सकते थे। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात तो साफ हो गई कि  दो विधायकों से मेयर पद के  दावेदार से खुश नहीं हैं।

दुर्ग संभाग और भाजपा
दुर्ग संभाग में अधिकांश जगहों पर भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया है। कुछ जगह पर तो भाजपा बढ़त के बाद भी अपना अध्यक्ष नहीं बना पाई। भाजपा में प्रत्याशी चयन को लेकर तनातनी चलती रही। संभाग में बुरी हार के लिए पार्टी के भीतर पूर्व सीएम रमन सिंह और सरोज पाण्डेय की आलोचना हो रही है। राजनांदगांव-कवर्धा में रमन सिंह और दुर्ग में सरोज की एक तरफा चली है। सुनते हैं कि राजनांदगांव मेयर पद के लिए शोभा सोनी की जगह नए चेहरे को उतारने का सुझाव भी आया था, लेकिन पूर्व सीएम ने अपने कुछ करीबियों के कहने पर सुझाव को अनदेखा कर दिया।

हाल यह रहा कि नांदगांव में एक भाजपा पार्षद ने ही कांग्रेस के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी। यहां भाजपा की आसान हार हो गई। पूरे कवर्धा जिले में भाजपा एक भी जगह मुकाबले पर नहीं रही। डोंगरगढ़ में ज्यादा पार्षद होने के बावजूद पालिका अध्यक्ष का चुनाव हार गई। दुर्ग जिले का हाल यह रहा है कि एक भी म्युनिसिपल में पार्टी को जीत हासिल नहीं हो सकी। दिलचस्प बात यह है कि दुर्ग में हार पर बचाव के लिए सौदान सिंह आगे आए हैं। वे यह कहते सुने गए कि दुर्ग के वार्डों में पहले भी भाजपा पीछे रही है। ऐसे में अब असंतुष्ट नेता हार की भी समीक्षा करने की मांग से परहेज करने लग गए हैं। 

छात्र आंदोलनों से परहेज!

सोशल मीडिया पर महज शब्दों से लोगों के दांत, नाखून, बदन की धारियां, और उनकी नीयत, सब कुछ उजागर हो जाते हैं। अभी जामिया मिलिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, और जेएनयू को लेकर बहुत से लोगों को लग रहा है कि विश्वविद्यालयों को राजनीति से दूर रहना चाहिए, रखना चाहिए। ये लोग जिस विचारधारा के समर्थन में ऐसे परहेज की वकालत कर रहे हैं, उनके मां-बाप अगर उसी विचारधारा के थे, तो उन्होंने आपातकाल के वक्त, और उसके बाद छात्र आंदोलनों से ही, छात्र राजनीति से ही नेहरू की बेटी की सरकार को जाते देखा था, और उसका जश्न मनाया था। जिन छात्रों को वोट डालने का हक है, जिन विश्वविद्यालयों में राजनीतिक दलों के अपने खुद के छात्र संगठनों के बैनरतले छात्रसंघ के चुनाव होते हैं, उनमें से भी कुछ दलों को आज विश्वविद्यालयों में राजनीति खटक रही है। ऐसे लोग आपातकाल के आलोचक रहे हैं, और उसके बाद की जनता सरकार के दौरान मीसाबंदियों की शक्ल में फायदा भी उठाया है। अब आज उन्हें लग रहा है कि छात्र आंदोलन मोदी सरकार से असहमति के साथ आगे बढ़ रहा है तो वे विश्वविद्यालयों में आंदोलनों के खिलाफ हो गए हैं। हिंदुस्तान केे इतिहास में अगर आपातकाल के वक्त छात्र आंदोलन न होते, तो जयप्रकाश नारायण के पीछे खड़े होने वाली भीड़ उतनी बड़ी न होती, और हो सकता है कि देश में आज भी आपातकाल चलते रहता। इसलिए अलग-अलग दौर में छात्र आंदोलनों का समर्थन और विरोध दर्ज होते चलता है। कम से कम उन लोगों को तो इसका विरोध नहीं करना चाहिए जो कि आपातकाल में उंगली भी कटाए बिना शहीद होकर पेंशन पा रहे हैं।
(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 05-Jan-2020

चुनाव प्रभारी के अपने घर में...
बिलासपुर मेयर-सभापति के चुनाव में कांग्रेस को वाकओवर देने पर भाजपा ने विवाद शुरू हो गया है। यहां भाजपा बहुमत से ज्यादा दूर नहीं थी, बावजूद इसके उसने मैदान छोड़ दिया। इसको लेकर खुद पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल पार्टी नेताओं के निशाने पर आ गए हैं। अमर अग्रवाल नगरीय निकाय चुनाव के लिए पूरे प्रदेश में पार्टी के प्रभारी थे। ऐसे में उनके खुद के शहर के म्युनिसिपल में पार्टी का बुरा हाल हो गया। इससे परे जगदलपुर में भाजपा बहुमत से बहुत पीछे थी। फिर भी पूरी दमदारी से मेयर का चुनाव लड़ी और कांग्रेस को भी तोडऩे की कोशिश की, यद्यपि इसमें सफलता नहीं मिल पाई। 

इसके उलट बिलासपुर में एक दिन पहले तक पार्टी ने मेयर-सभापति का चुनाव लडऩे के लिए तैयारी पूरी कर ली थी। पार्टी पर्यवेक्षक प्रेमप्रकाश पाण्डेय भी वहां पहुंच गए थे। सुनते हैं कि मेयर के नाम को लेकर अमर अग्रवाल और धरमलाल कौशिक एकराय नहीं थे। फिर नांदगांव से ज्यादा बुरा हाल होने की आशंका थी। 
नांदगांव में तो सिर्फ एक पार्षद ने क्रास वोटिंग की थी, लेकिन बिलासपुर में तो 4 से 5 भाजपा पार्षदों की क्रास वोटिंग के संकेत मिल गए थे। ये पार्षद अमर अग्रवाल की पसंद पर मुहर लगाने के लिए तैयार नहीं थे। हल्ला यह भी है कि धरमलाल कौशिक और प्रेमप्रकाश पाण्डेय, किसी भी दशा में मैदान छोडऩे के पक्ष में नहीं थे। ऐसे में अमर अग्रवाल ने सीधे सौदान सिंह से चर्चा की। फिर क्या था, सौदान के हस्तक्षेप के बाद पार्टी ने चुनाव लडऩे का इरादा छोड़ दिया। 
राजनीति के कुछ जानकारों का यह मानना है कि जीतने की संभावना तो नहीं थी, लेकिन क्रास वोटिंग से पार्टी भीतर ही भीतर और टूट गई होती, विपक्ष में बैठी भाजपा के लोग भी एक-दूसरे के प्रति शक से भरे रहते, और चुनाव के बाद यह एक दूसरा नुकसान हुआ रहता। ऐसे में जंग न लडक़र सिपाहियों को जख्मी होने से बचाने, और दुश्मन खेमे में जाने से रोकने के लिए ऐसा किया गया होगा।

ऐसे लोगों को सजा दिलवाएं...

कल देश भर में केन्द्र सरकार और भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं की अपील पर नागरिकता-संशोधन कानून का समर्थन दर्ज करने के लिए एक टेलीफोन नंबर तय किया गया था जिस पर लोग एक मिस्डकॉल देकर यह काम कर सकते थे। जब खर्च न करना पड़े तो हिन्दुस्तानी लोग ऐसा मिस्डकॉल देते भी हैं। और लोगों को याद है कि कुछ बरस पहले जब देश भर में भाजपा ने सदस्यता अभियान चलाया था, तो उस वक्त भी ऐसी ही मिस्डकॉल से मेंबर बनाए गए थे, और उनकी गिनती भी जाहिर की गई थी, यह एक अलग बात है कि उसके बाद के चुनाव में भाजपा को उतने वोट भी नहीं मिले थे जितने सदस्य बनाने का उसका दावा था। अब नागरिकता-समर्थन का मामला थोड़ा सा ठीक रहता, लेकिन सोशल मीडिया ट्विटर पर जिस अश्लील किस्म के आकर्षक न्यौते देकर लोगों को इस टेलीफोन नंबर पर कॉल करने के लिए उकसाया गया, उसे देखकर सब लोग हक्का-बक्का हैं। क्या किसी एक गंभीर राजनैतिक-सामाजिक मुद्दे पर समर्थन जुटाने के लिए सेक्स के आकर्षण का सहारा लिया जाना चाहिए? अब इंसाफ तो यही कहता है कि जब तक यह साबित न हो जाए कि भाजपा ने ऐसा किया, तब तक यह मानना चाहिए कि पता नहीं किसने ऐसा किया। काल्पनिक रूप से तो यह भी मानना चाहिए कि भाजपा के विरोधियों ने भाजपा को बदनाम करने के लिए उसके दिए गए नंबर को सेक्स-न्यौतों के साथ जोडक़र, फ्री-इंटरनेट, फ्री-डेटा, फ्री-नेटफ्लिक्स, मुफ्त नागरिकता का लालच दिया। लेकिन कुल मिलाकर केन्द्र सरकार भाजपा के हाथ है, और उसे या तो अपने आपको ऐसे बाजारू तरीकों से अलग होने का भरोसा दिलाना चाहिए, और ट्विटर पर दर्ज ऐसे न्यौते पोस्ट करने वाले दसियों हजार लोगों के खिलाफ जुर्म कायम करना चाहिए कि उसने भाजपा जैसी बड़ी पार्टी का नाम बदनाम करने के लिए ऐसी साजिश की है। जिन लोगों ने ऐसे झांसे पोस्ट किए हैं, उनके पिछले महीनों के ट्वीट देखें, तो उनकी राजनीतिक विचारधारा साफ दिखती है, फिर भी यह भाजपा की जिम्मेदारी है, और भाजपा अगुवाई वाली केन्द्र सरकार का अधिकार है कि ऐसे लोगों को सजा दिलवाए जिन्होंने भाजपा को ऐसी बदनामी दिलवाई है। 


Date : 04-Jan-2020

स्थानीय कुर्सी, राष्ट्रीय सिफारिश
रायपुर मेयर को लेकर जंग चल रही है। एक-दो दावेदारों के नाम पर राष्ट्रीय नेताओं ने भी सिफारिश की है। सुनते हैं कि कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री वेणुगोपाल ने भी एक दावेदार के लिए सिफारिश की है। इसके विपरीत दो दावेदारों के खिलाफ पार्षदों को अपने पाले में करने के लिए प्रलोभन देने की शिकायत भी सीएम तक पहुंची है। बिलासपुर में रामशरण यादव का नाम चौंकाने वाला रहा। वैसे तो रामशरण मेयर और विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन दोनों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस बार वे पार्षद का चुनाव लड़े और जीते, लेकिन उन्हें मेयर बनाने में सीएम के साथ-साथ प्रभारी सचिव चंदन यादव की भूमिका भी रही है। 

कामयाबी दिखती नहीं, और...
किसी भी देश-प्रदेश की सरकार हो, कुछ एक कुर्सियां ऐसी होती हैं जिनकी कामयाबी हवा की तरह ओझल रह जाती हैं, और जिनकी नाकामयाबी फिल्म शोले की पानी की टंकी पर चढ़े धर्मेन्द्र की तरह चीख-चीखकर दुनिया को बताती है। इनमें से एक कुर्सी सरकार के खुफिया विभाग की रहती है, और दूसरी कुर्सी सरकारी वकील की रहती है। केंद्र से लेकर राज्य तक, अगर खुफिया विभाग की खुफिया जानकारी के आधार पर कोई हमला टल जाता है, तो सरकारें उसका प्रचार नहीं कर पातीं। चूंकि विभाग का नाम और काम दोनों ही खुफिया रहता है, इसलिए उसकी कामयाबी बंद कमरे की रहती है, लेकिन अगर कोई बड़ी वारदात हो जाती है, तो विपक्ष से लेकर मीडिया तक देश में इंटेलीजेंस ब्यूरो पर चढ़ बैठते हैं, और राज्यों में भी वहां की खुफिया विभाग पर। इसी तरह केंद्र और राज्य सरकारों के सरकारी वकील लगातार इस दबाव में रहते हैं कि वे कोई भी मामला न हारें, क्योंकि उनके जीते हुए दर्जनों मामले सार्वजनिक जीवन में दर्ज नहीं होते, और उनके हारे हुए एक-एक मामले को लेकर सरकार के भीतर की गुटबाजी भी उन पर चढ़ बैठती है कि उनका काम बहुत खराब है, और सरकारी वकील को बदल देना चाहिए। सरकार के हर पहलू के जानकार लोग यह बात जानते हैं कि ये दोनों कुर्सियां किसी अस्पताल में सबसे गंभीर और नाजुक मरीजों को देखने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर की कुर्सी जैसी रहती हैं जहां से जिंदा निकलने वाले मरीजों की किसी को याद नहीं रहती, और मरकर निकलने वाले मरीजों के परिवार के लोग रोते-पीटते दिखते हैं, और वे ही याद रहते हैं।


Date : 03-Jan-2020

स्मार्ट सड़क और स्मार्ट नेता
रायपुर स्मार्ट सिटी की एक सड़क को स्मार्ट बनाने की दिशा में काम चल रहा है। फिलहाल सड़क तलाशने में ही अफसरों को दिक्कत हो रही है। सुनते हैं कि एक सड़क चिन्हित जरूर की गई है, लेकिन उसको लेकर विवाद चल रहा है। चर्चा है कि सड़क के किनारे सत्तारूढ़ दल के एक प्रभावशाली नेता की जमीन है। नेताजी की तरफ से भी सड़क को स्मार्ट बनाने के लिए काफी दबाव भी है। मगर ऊंचे ओहदे पर बैठे नेताजी के खिलाफ कई तरह की शिकायतें सीएम तक पहुंची है। ऐसे में अफसर उक्त सड़क को स्मार्ट बनाने का प्रस्ताव तैयार नहीं कर पा रहे हैं। 

कुछ इसी तरह की स्थिति महाराजबंद तालाब के किनारे की सड़क की है। इस सड़क को स्मार्ट बनाया जा रहा है। यानी इस सड़क में अंडरग्राउंड डक, ड्रेनेज-सीवरेज और अंडरग्राउंड इलेक्ट्रिक-वाटर सिस्टम होगा। 25 साल तक इस सड़क की खुदाई नहीं हो सकी है। दिलचस्प बात यह है कि सड़क के आस-पास बसाहट नहीं है। चूंकि आगे महामाया मंदिर के आसपास की गरीब बस्तियां हैं इसलिए भारी वाहनों की आवाजाही भी कम रहेगी। ऐसे में सड़क तो सुरक्षित रहेगी ही। एक बात और, कि सड़क के किनारे भाजपा नेताओं ने जमीन खरीद ली है। यानी स्मार्ट सड़क से आम लोगों को फायदा हो न हो, भाजपा नेता की कौडिय़ों की जमीन करोड़ों की हो गई है। 

कुछ अनौपचारिक सा नुक्कड़ टी-कैफे
बड़े-बड़े ब्रांड की कॉफी शॉप का बिल बड़ा-बड़ा बनता है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में रायपुर से शुरू करके ऐसे टी-सेंटर शुरू हुए हैं जो कि कम दाम पर चाय-कॉफी और खाने-पीने के सामान रखते हैं। शहर के एक नौजवान प्रियंक पटेल ने ऐसा नुक्कड़ टी-कैफे तो शुरू किया ही है, उसके साथ सामाजिक सरोकार की कई बातों को जोड़ा भी है। वहां पर काम करने वाले जितने कर्मचारी हैं, वे या तो सुन-बोल नहीं सकते, या फिर वे थर्डजेंडर समुदाय के हैं। कुल मिलाकर ऐसे कर्मचारी जिन्हें आमतौर पर कोई काम पर न रखे, और जिनसे या तो लिखकर बात हो सकती है, या इशारों की जुबान में, वे ही वहां काम करते दिखते हैं। पहली बार वहां गए लोगों को कुछ अटपटा जरूर लगता है, लेकिन धीरे-धीरे बिना जुबान भी बात होने लगती है। लोगों को कागज पर लिखकर ऑर्डर देना होता है, और इशारों से ही बिल बन जाता है।

इसे शुरू करने वाले प्रियंक पटेल ने इसके भीतर तरह-तरह की रचनात्मक और साहित्यिक गतिविधियों के लिए भी एक कोना बनाया है, एक बुकशॉप बनाई है, और हैण्डलूम के कपड़ों की बिक्री का एक कोना भी है। जलविहार कॉलोनी में एक घर मेें ही मामूली फेरबदल करके, मामूली साज-सज्जा करके यह जिंदा जगह विकसित की गई है जहां समय-समय पर लोग कभी किसी का तजुर्बा सुनने के लिए जुटते हैं, तो कभी किसी की कविताओं को सुनने के लिए।


Date : 02-Jan-2020

जंगल-अफसरों की टोली का मुखिया
एपीसीसीएफ सुधीर अग्रवाल आईएफएस एसोसिएशन के अध्यक्ष  चुने गए। अरण्यक भवन परिसर में नववर्ष मिलन समारोह में सुधीर अग्रवाल और अन्य पदाधिकारियों को आईएफएस अफसरों ने बधाई दी। सुधीर से पहले नरसिम्हाराव एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। उनके पीसीसीएफ बनने के बाद सुधीर को सर्वसम्मति से अध्यक्ष की जिम्मेदारी सांैपी गई। पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी ने सुधीर की कार्यशैली की प्रशंसा की और कहा कि उनके प्रयासों के फलस्वरूप ही 25 आईएफएस अफसरों को समय पर पदोन्नति दी जा सकी है। 

एपीसीसीएफ (प्रशासन) का दायित्व संभाल रहे सुधीर अग्रवाल की साख बहुत अच्छी है। वे छत्तीसगढिय़ा हैं और रायपुर की पुरानी बस्ती के मूल रहवासी हैं। वे सरकार के अलग-अलग पदों पर काम कर चुके हैं। रमन सरकार में डायरेक्टर शहरी विकास पद पर रहते उन्होंने गरीबों के आवास निर्माण में भारी गड़बड़ी के सत्ता के इरादों पर पानी फेर दिया था। इसको लेकर उन्हें अमर अग्रवाल का कोपभाजन बनना पड़ा और ईमानदारी की उनकी इस कोशिश पर उल्टे सुधीर के खिलाफ ही विभागीय जांच बिठा दी गई थी। इसके बाद भी सुधीर का हौसला कम नहीं हुआ। बाद में उनके खिलाफ विभागीय जांच खत्म भी कर दी गई। 

सुधीर की ईमानदार कोशिशों का नतीजा रहा कि प्रदेश में प्रधानमंत्री सड़क योजना आज पटरी पर है। एक समय ऐसा भी था जब केंद्र से पीएमजीएसवाय के मद में फंड मिलना बंद हो गया था। ग्रामीण सड़कों का काम तकरीबन रूक गया था। तब सुधीर की पीएमजीएसवाय सीईओ के पद पर पोस्टिंग की गई। वे पूरे चार साल इस पद पर रहे। उनके आने के बाद ग्रामीण सड़कों का पूरी रफ्तार से काम हुआ। अब एसोसिएशन के मुखिया के रूप में अपने कैडर के अफसरों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने और इसका निराकरण के लिए प्रयास करने की उन पर बड़ी जिम्मेदारी भी हैं। 

कौन बनेगा करोड़पति, सॉरी महापौर...
कांग्रेस में रायपुर मेयर पद के दावेदारों में खींचतान चल रही है। सुनते हैं कि विधायकों ने भी अपनी पसंद प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया को बता दी है। हल्ला है कि कुलदीप जुनेजा ने एजाज ढेबर को मेयर बनाने की वकालत की है, तो विकास उपाध्याय ने श्रीकुमार मेनन को मेयर पद के लिए उपयुक्त बताया है। जबकि मौजूदा महापौर प्रमोद दुबे को पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा की पसंद माना जा रहा है। इससे परे प्रभारी मंत्री रविंद्र चौबे की राय ज्ञानेश शर्मा के पक्ष में दिख रही है। दिलचस्प बात यह है कि खुद सीएम भूपेश बघेल ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। ऐसे में इनमें से कौन मेयर बनेगा, यह आंकलन करना कठिन हो गया है। यद्यपि अन्य म्युनिसिपलों के लिए यह फार्मूला तय किया गया है कि जिसके पक्ष में पार्षदों की संख्या ज्यादा रहेगी, उसे ही मेयर अथवा अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। पर रायपुर में कौन मेयर बनेगा, यह तो कह पाना अभी पार्टी नेताओं के लिए भी मुश्किल हो चला है।